अपडेट-10
अब मुझे कोई उम्मीद नज़र नही आ रही थी कि जो मुझे क़ासिम के बारे मे बता सके मैं वहाँ से बाहर निकल आया. किसी को भी क़ासिम के बारे मे नही पता था. मैं पूरी रात उसको ढूँढ-ढूँढ कर थक चुका था ऑर मेरे पैर भी चल-चल कर जवाब दे चुके थे. अब ना तो मुझ मे चलने की हिम्मत थी ना ही क़ासिम का कुछ पता चला था मैने घर वापिस जाने का फ़ैसला किया ओर बो-झिल दिल के साथ वापिस घर आ गया जब घर आया तो घर के बाहर पोलीस की गाड़ी खड़ी थी जिसको देखकर ना-जाने क्यो एक पल के लिए मैं चोंक गया. बाबा ऑर फ़िज़ा थानेदार से कुछ बात कर रहे थे मुझे उनको देख कर कुछ समझ नही आया इसलिए वहाँ जाके सारा मामला पता करना बेहतर समझा. जब मैं वहाँ पहुँचा तो जाने क्यो थानेदार मुझे गौर से देखने लगा जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो. लेकिन फ़िज़ा ने मुझे आँखों से ही चुप रहने का इशारा किया ऑर मैं बस पास जाके खड़ा हो गया ऑर थानेदार को सलाम किया.
थानेदार : व.सलाम, ये कौन है.
बाबा : जनाब ये मेरा छोटा बेटा है.
थानेदार : (कुछ याद करते हुए) तुमको मैने पहले भी कही देखा है.
मैं : जी नही साब मैं तो आपको पहली बार मिल रहा हूँ.
थानेदार : क्या नाम है तेरा ?
बाबा : जनाब इसका नाम नीर है बहुत सीध-साधा लड़का है कोई बुरी आदत नही इसको.
थानेदार : ओह्ह अच्छा-अच्छा बेटा है तुम्हारा.... फिर ये कोई ऑर है इसको देख कर किसी की याद आ गई जो एक-दम इसके जैसा था.
इतने मे फ़िज़ा ने नाज़ी को इशारा किया ऑर वो मुझे लेके अंदर चली गई. ये सब क्या हो रहा था मुझे कुछ भी समझ नही आ रहा था...ये थानेदार यहाँ क्यों आया है इतनी रात को, किसी ने भी मुझसे क़ासिम के बारे में क्यो नही पूछा ऐसे ही मेरे अंदर कई सवाल एक साथ खड़े हो गये थे. अचानक मेरी नज़र जीप मे बैठे क़ासिम पर पड़ी तो मैं उसकी ओर जाने लगा लेकिन नाज़ी ने मुझे बाजू से पकड़ लिया ऑर अंदर आने का इशारा किया. मैं बिना कोई सवाल किया चुप-चाप उसके साथ अंदर आ गया.
मैं : ये सब क्या हो रहा है ऑर ये क़ासिम को कहाँ लेके जा रहे हैं, थानेदार मुझे ऐसे क्यो देख रहा था?
नाज़ी : एक तो तुम सवाल बहुत करते हो....अभी कुछ मत बोलो बस अंदर चलो बाबा बात कर रहे हैं ना...
मैं : अच्छा ठीक है (हां मे सिर हिलाते हुए)
कुछ देर बाद थानेदार भी चला गया ऑर उनके साथ क़ासिम भी लेकिन मैं बस खामोश होके अपने सवालो का जवाब जानने के लिए बे-क़रार होके बाबा ऑर फ़िज़ा का इंतज़ार करने लगा. कुछ देर मे बाबा ऑर फ़िज़ा भी घर के अंदर आ गये.
मैं : बाबा ये सब क्या हो रहा है ऑर ये क़ासिम को कहाँ लेके जा रहे हैं?
बाबा : बस बेटा जाने कौन्से गुनाहो की सज़ा मिल रही है मुझ बूढ़े को जो बुढ़ापे मे ये दिन देखने को मिल रहे हैं (अपने सिर पर हाथ रखकर बैठ ते हुए)
मैं : क्या हुआ है बाबा कोई मुझे कुछ बताता क्यो नही.
नाज़ी : वो भाई जान ने हमरी फसल सरपंच को बेच दी थी ऑर उससे पैसे लेके जुए ऑर शराब मे उड़ा दिए थे अब सरपंच अपने पैसे वापिस माँग रहा है लेकिन क़ासिम भाई ने वो सब पैसे खर्च कर दिए इसलिए उस सरपंच ने अपने पैसे निकलवाने के लिए पोलीस को बुला लिया ऑर वो उनको पकड़ के ले गई है.
मैं : तो हम उनके पैसे वापिस कर देते हैं ना उसमे क्या है आख़िर वो इस घर का बेटा है वैसे भी हमारे पास फसल के काफ़ी पैसे बचे हुए हैं
बाबा : नही बेटा क़ासिम के लिए हम बहुत बार पैसे दे चुके हैं अब ज़रूरत नही है शायद जैल मे रहकर ही उससे अक़ल आ जाए.
मैं : बाबा मैं सरपंच से बात करके आता हूँ क़ासिम भाई के लिए शायद वो मान जाए?
बाबा : नही बेटा वो बहुत बे-रहम इंसान है वो नही मानेगा तुम भी इन सब चक्करो मे ना पडो तो बेहतर होगा.(ऑर मायूस क़दमो के साथ अपने कमरे मे चले गये)
मैं : मानेगा बाबा ज़रूर मानेगा नाज़ी मैं अभी आया.
नाज़ी : नही नीर वो बहुत घटिया किस्म का इंसान है जाने दो
मैं : मुझ पर भरोसा है या नही?
नाज़ी : (हाँ मे सिर हिलाते हुए) सबसे ज़्यादा तुम पर ही तो भरोसा है.
मैं : बस फिर चुप रहो मैं अभी आता हूँ
मैं सरपंच की हवेली की तरफ चला गया. जब मैं हवेली के गेट पर पहुँचा तो एक दरबान ने मुझे रोक दिया.
दरबान : क्या काम है अंदर कहाँ घुसा चले आ रहा है?
मैं : मुझे सरपंच से मिलना है बुलाओ उसको.
दरबान : उनकी इजाज़त के बिना उनसे कोई नही मिल सकता ऑर तू है कौन जो इतना रौब झाड़ रहा है चल दफ़ा होज़ा यहाँ से.
मैं : (दरबान की गर्दन पकड़ते हुए) मैं बोला मुझे अभी सरपंच से मिलना है गेट खोल नही तो तेरी गर्दन तोड़ दूँगा समझा....
दरबान : खोलता हूँ भाई मेरी गर्दन तो छोड़ो.... जाओ अंदर.
जब मैं हवेली के अंदर गया तो उसकी शान-ओ-शौकत से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि जाने कितने ही ग़रीबो का खून चूस कर इस इंसान ने इतना पैसा जमा किया है हवेली की हर चीज़ से पैसा झलक रहा था. अंदर से हवेली बहुत ही आलीशान ऑर शानदार थी जहाँ में खड़ा था वहाँ से चारों तरफ रास्ते दिखाई दे रहे थे मुझे कुछ समझ नही आ रहा था कि अब मैं किस तरफ जाऊं मैं वहीं खड़ा हो कर इंतिज़ार करने लगा कि कोई नज़र आए तो में सरपंच का पूच्छू अभी मैं इसी शशो पुंज मे था कि मुझे हवैली के लेफ्ट साइड से किसी की खनकती हँसी की आवाज़ सुनाई दी उस हँसी के बाद फॉरेन ही काफ़ी सारी लड़कियों के खिलखिला कर हँसने की आवाज़ आई मेरा रुख़ खुद-ब-खुद उस तरफ हो गया जहन से आवाज़ें आ रहीं थीं. मुझे वहाँ कुछ लड़कियाँ आपस मे अठखेलिया करती नज़र आई. मैने अपने कदम उनकी तरफ बढ़ा दिए इससे पहले कि मैं उनसे कुछ पूछ पाता कुछ लोगो ने आके मुझे पिछे से पकड़ लिया. इससे पहले कि मैं अपना हाथ उठाता उन लड़कियो मे से एक लड़की ने आगे बढ़कर उन लोगो को हुकुम दिया कि मुझे छोड़ दिया जाए ऑर सब लोगो ने सिर झुका कर उस लड़की का हुकुम मान लिया ऑर मुझे छोड़ दिया....
लड़की : हंजी कौन हो आप ऑर अंदर कैसे आए......
मैं : जी मुझे सरपंच जी से मिलना है
लड़की : अब्बू तो घर पर नही है बताओ क्या काम है मैं उनकी बेटी हूँ
मैं : (कुछ सोचते हुए) जी कुछ नही फिर मैं चलता हूँ माफ़ कीजिए आपको मेरी वजह से परेशानी हुई
लड़की : तुमको पहली बार देख रही हो तुम कौन हो ऑर यहाँ नये आए हो क्या (साथ ही उन लोगो को उंगली से जाने का इशारा करते हुए)
मैं : जी मेरा नाम नीर है मैं हैदर अली का छोटा बेटा ऑर क़ासिम अली का छोटा भाई हूँ
लड़की : हमम्म तुमने अभी तक बताया नही कि तुमको अब्बू से काम क्या था ऑर इतनी रात गये इस तरह क्यों आए.?
मैने लड़की को सारी समस्या बता दी ऑर उनकी रकम धीरे-धीरे करके लौटाने की बात भी कह दी ऑर उसको मेरी मदद करने को कहा....
लड़की : ठीक है मैं देखती हूँ क्या कर सकती हूँ आपके लिए.
मैं : आपका बहुत-बहुत शुक्रिया
लड़की : अब बहुत रात हो गई तुम अपने घर जाओ सुबह अब्बू आएँगे तो मैं उनसे बात करके देखूँगी कि क्या हो सकता है
मैं : ठीक है जी आपका मुझ पर अहसान होगा अगर आप मेरी मदद कर देंगी तो.
मैं खुशी-खुशी घर की तरफ जा रहा था लेकिन बार-बार मुझे उस लड़की का चेहरा आँखो के सामने नज़र आ रहा था. कुछ तो था उस लड़की मे जो मुझे अपनी ओर खींच रहा था....लड़की इंतेहा खूबसूरत थी...... गोल सा चेहरा, चेहरे पर बालो की पतली सी लट जो बहुत क़ातिलाना लगती थी... बड़ी-बड़ी हिरनी जैसी आँखें... गुलाब की पंखुड़ी जैसे पतले से रस-भरे होंठ जब हँसती थी तो गालों मे गड्ढे से पड़ते थे जो उसकी खूबसूरती मे चार-चाँद लगाते थे शायद ये पहली लड़की थी गाँव मे जो मैने इतनी सजी-सवरी हुई देखी थी ऑर उसके बात करने का सलीका भी बहुत अच्छा था. मैं उस लड़की के बारे मे ही सोचता हुआ पता नही कब घर के सामने आ गया मेरा ध्यान तब टूटा जब नाज़ी ने मुझे हिला कर कहा....
नाज़ी : अब अंदर भी आना है या आज रात यही दरवाज़े पर ही गुज़ारनी है?
मैं : (चोन्क्ते हुए) हाँ आता हूँ
नाज़ी : क्या बात है आज बड़ा मुस्कुरा रहे हो हवेली पर ही गये थे ना या फिर तुमने भी क़ासिम भाई की तरह कहीं ऑर जाना शुरू कर दिया है (मुझे छेड़ते हुए)
मैं : कहीं ऑर से क्या मतलब है तुम्हारा तुमको मैं ऐसा लगता हूँ क्या....हाँ हवेली पर ही गया था ऑर एक खुश खबरी लेके आया हूँ
नाज़ी : (हैरानी से) क्या खुशख़बरी?
मैं : वो मैं जब हवेली पर गया था तो मुझे सरपंच की बेटी मिली थी वो कह रही थी कि वो अपने अब्बू से बात करेगी ऑर हमारी मदद भी करेगी बहुत अच्छी है वो
नाज़ी : नीर तुम कितने भोले हो...तुम आज के बाद कभी हवेली नही जाओगे समझे
मैं : क्यो क्या हुआ मैने कुछ ग़लत किया क्या?
नाज़ी : नही तुमने कुछ ग़लत नही किया बस आज के बाद उस लड़की से मत मिलना
मैं : वो जब हमारी मदद कर रही है तो ग़लत क्या है मिलने मे ये तो बताओ
नाज़ी : मैने जो तुमको कहा वो तुम्हे समझ नही आया ना ठीक है जो तुम्हारे दिल मे आए करो लेकिन मुझसे बात मत करना आज के बाद समझे
मैं : (परेशानी से) यार लेकिन हुआ क्या बताओ तो सही
नाज़ी : कुछ नही हुआ बस तुम आज के बाद वहाँ नही जाओगे नही तो मैं तुमसे बात नही करूँगी. वो लोग अच्छे लोग नही है नीर.
मैं : ठीक है जो हुकुम सरकार का
नाज़ी : (हँसती हुई) तुम जब मेरी बात मान जाते हो ना तो मुझे बहुत अच्छे लगते हो दिल करता है कि.....
मैं : कि...? क्या दिल करता है?
नाज़ी : कुछ नही बुद्धू चलो अब अंदर चलो खाना खा लो तुम्हारी वजह से मैने ऑर भाभी ने भी खाना नही खाया लेकिन तुमको क्या तुम तो जाओ अपनी उस सरपंच की बेटी के पास.....
मैं : अर्रे तुम दोनो ने खाना क्यों नही खाया?
नाज़ी : हमने सोचा आज हम सब साथ मे ही खाना खा लें (नज़रे झुका के मुस्कुराते हुए)
मैं : बाबा ने खाना खा लिया?
नाज़ी : हाँ वो तो खाना खा के सो भी गये बस हम ही दो पागल बैठी है जो अपने बुढ़ू का इंतज़ार कर रही है लेकिन तुमको तो हवेली वाली से ही फ़ुर्सत नही है हमारी याद कहाँ से आएगी..
मैं : (मुस्कुराते हुए) ज़्यादा मत सोचा करो.... चलो मुझे भी बहुत बहुत भूख लगी है.
Update-10
Ab mujhe koi ummeed nazar nahi aa rahi thi ki jo mujhe Qasim ke bare me bata sake main wahan se bahar nikal aaya. kisi ko bhi qasim ke bare me nahi pata tha. Main poori raat usko dhundh-dhundh kar thak chuka tha or mere pair bhi chal-chal kar jawab de chuke the. ab na to mujh me chalne ki himmat thi na hi qasim ka kuch pata chala tha maine ghar wapis jane ka faisla kiya or bo-jhal dil ke sath wapis ghar aa gaya jab ghar aya to ghar ke bahar police ki gaadi khadi thi jisko dekhkar na-jane kyo ek pal ke liye main chonk gaya. Baba or fiza thaanedar se kuch baat kar rahe the mujhe unko dekh kar kuch samajh nahi aaya isliye wahan jake sara mamla pata karna behtar samjha. Jab main wahan pohoncha to jane kyo thaanedar mujhe gaur se dekhne laga jaise kuch yaad karne ki koshish kar raha ho. lekin fiza ne mujhe aankhon se hi chup rehne ka ishara kiya or main bas pass jake khada ho gaya or thanedaar ko salaam kiya.
Thanedaar : W.Salaam, ye kaun hai.
Baba : janab ye mera chhota beta hai.
Thanedaar : (kuch yaad karte hue) tumko maine pehle bhi kahi dekha hai.
Main : jee nahi saab main to aapko pehli baar mil raha hun.
Thanedaar : kya naam hai tera ?
BaBa : janab iska naam Neer hai bahut seedh-sadha ladka hai koi buri aadat nahi isko.
Thanedaar : ohh achha-achha beta hai tumhara.... fir ye koi or hai isko dekh kar kisi ki yaad aa gai jo ek-dam iske jaisa tha.
itne me fiza ne nazi ko ishara kiya or wo mujhe leke andar chali gai. ye sab kya ho raha tha mujhe kuch bhi samajh nahi aa raha tha...ye thanedaar yahan kyo aaya hai itni raat ko, kisi ne bhi mujhse qasim ke bare me kyo nahi puchaa aise hi mere andar kai sawaal ek sath khade ho gaye the. Achanak meri nazar jeep me baithe qasim par padi to main uski or jane laga lekin nazi ne mujhe baaju se pakad liya or andar aane ka ishara kiya. main bina koi swaal kiya chup-chap uske sath andar aa gaya.
Main : ye sab kya ho raha hai or ye Qasim ko kaha leke jaa rahe hain, thanedaar mujhe aise kyo dekh raha tha?
Nazi : Ek to tum sawaal bahut karte ho....abhi kuch mat bolo bas andar chalo baba baat kar rahe hain naa...
Main : achha thik hai (haa me sir hilate hue)
Kuch der baad thanedaar bhi chala gaya or unke sath qasim bhi lekin main bas khamosh hoke apne sawalo ka jawab janne ke liye be-qarar hoke baba or fiza ka intzaar karne laga. kuch der me baba or fiza bhi ghar ke andar aa gaye.
Main : Baba ye sab kya ho raha hai or ye qasim ko kaha leke jaa rahe hain?
Baba : Bas beta jane kounse gunaho ki saza mil rahi hai mujh budhe ko jo budhape me ye din dekhne ko mil rahe hain (apne sir par hath rakhkar baith te hue)
Main : kya hua hai baba koi mujhe kuch batata kyo nahi.
Nazi : wo bhai jaan ne hamaari fasal sarpanch ko bech di thi or usse paise leke juwe or sharab me udaa diye the ab sarpanch apne paise wapis maang raha hai lekin qasim bhai ne wo sab paise kharch kar diye isliye uss sarpanch ne apne paise nikalwane ke liye police ko bula liya or wo unko pakad ke lai gai hai.
Main : to hum unke paise wapis kar dete hain naa usme kya hai aakhir wo iss ghar ka beta hai waise bhi hmare pass fasal ke kaafi paise bache hue hain
BaBa : nahi beta qasim ke liye hum bahut baar paise de chuke hain ab jarurat nahi hai shayad jail me rehkar hi usse aqal aa jaye.
Main : baba main sarpanch se bat karke aata hun qasim bhai ke liye shayad wo maan jaye?
Baba : nahi beta wo bahut be-reham insaan hai wo nahi manega tum bhi inn sab chakkaro me naa pado to behtar hoga.(or mayus qadmo ke sath apne kamre me chale gaye)
Main : Manega baba jarur manega Nazi main abhi aaya.
Nazi : nahi neer wo bahut ghatiya kism ka insaan hai jane do
Main : mujh par bharosa hai ya nahi?
Nazi : (haa me sir hilate hue) sabse jyaadaa tum par hi to bharosa hai.
Main : bas fir chup raho main abhi aata hun
Main sarpanch ki haweli ki taraf chala gaya. Jab main haweli ke gate par pohoncha to ek darbaan ne mujhe rok diya.
Darbaan : kya kaam hai andar kaha ghusa chale aa raha hai?
Main : mujhe sarpanch se milna hai bulao usko.
Darbaan : unki ijajat ke bina unse koi nahi mil sakta or tu hai kaun jo itna roub jhaad raha hai chal daffa hoja yahan se.
Main : (darbaan ki gardan pakadte hue) main bola mujhe abhi sarpanch se milna hai gate khol nahi to teri gardan tod dunga samjhaaa....
Darbaan : kholta hun bhai meri garden to chodo.... jao andar.
Jab main haweli ke andar gaya to uski shaan-o-shaukat se hi andaaza lagaya jaa sakta tha ki jane kitne hi gareebo ka khun chus kar iss insaan ne itna paisa jama kiya hai haweli ki har chij se paisa jhalak raha tha. andar se haveili bahut hi aalishaan or shandar thi jahann mein khara tha wahann se charon taraf raste dikhaee de rahe the mujhe kuch samjha nahi aa rahi thi ke abb mein kiss taraf jaoon main waheen khara ho ker intizar kerne laga ki koi nazer aye tu mein sarpanch ka poochon abhi mein isi shasho punj me tha ke mujhe havaili ke left side se kisi ki khankhti hansi ki awaz sunaee di uss hansi ke baad foren hi kafi sari ladkiyun ke khilkhila ker hansne ki awaz aayi mera rukh khud-b-khud uss taraf ho gaya jahann se awazen aa raheen theen. mujhe wahan kuch ladakiyaan apas me athkheliyan kerti nazar ayi. maine apne kadam unki taraf badha diye isse pehle ki main unse kuch puch pata kuch logo ne aake mujhe pichhe se pakad liya. isse pehle ki main apna hath uthata unn ladkiyo me se ek ladki ne aagey badhkar unn logo ko hukum diya ki mujhe chod diya jaye or sab logo ne sir jhuka kar uss ladki ka hukum maan liya or mujhe chod diya....
Ladki : hanji kaun ho aap or andar kaise aaye......
Main : ji mujhe sarpanch ji se milna hai
Ladki : abbu to ghar par nahi hai bataao kya kaam hai main unki beti hun
Main : (kuch sochte hue) ji kuch nahi fir main chalta hun maaf kijiye aapko meri wajah se pareshani hui
Ladki : tumko pehli baar dekh rahi ho tum kaun ho or yahan naye aaye ho kya (sath hi unn logo ko ungali se jane ka ishara karte hue)
Main : ji mera naam Neer hai main haider ali ka chhota beta or qasim ali ka chhota bhai hun
Ladki : hhhmmm tumne abhi tak bataayaa nahi ki tumko abbu se kaam kya tha or itni raat gaye iss tarah kyo aaye.?
Maine ladki ko saari samasya bata di or unki rakam dheere-dheere karke lautaane ki baat bhi keh di or usko meri madad karne ko kaha....
Ladki : thik hai main dekhti hun kya kar sakti hun aapke liye.
Main : aapka bahut-bahut shukariya
Ladki : ab bahut raat ho gai tum apne ghar jao subah abbu aayenge to main unse baat karke dekhungi ki kya ho sakta hai
Main : thik hai ji aapka mujh par Ahsaan hoga agar aap meri madad kar dengi to.
Main khushi-khushi ghar ki taraf jaa raha tha lekin bar-bar mujhe uss ladki ka chehra aankho ke samne nazar aa raha tha. Kuch to tha uss ladki me jo mujhe apni or khinch raha tha....ladki intehaa khubsurat thi...... gol sa chehra, chehre par baalo ki patli si latt jo bahut qatilana lagti thi... badi-badi hirani jaisi aankhen... gulaab ki pankhudi jaise patle se rass-bhare honth jab hansatee thi to gaalo me gaddhe se padte the jo uski khubsurati me chaar-chaand lagate the shayad ye pehli ladki thi gaav me jo maine itni saji-sawari hui dekhi thi or uske baat karne ka saleeka bhi bahut achha tha. main uss ladki ke bare me hi sochta hua pata nahi kab ghar ke samne aa gaya mera dhyaan tab toota jab nazi ne mujhe hila kar kaha....
Nazi : ab andar bhi aana hai ya aaj raat yhi darwaze par hi guzarni hai?
Main : (chonkte hue) haa aata hun
Nazi : kya baat hai aaj bada muskura rahe ho haweli par hi gaye the naa ya fir tumne bhi qasim bhai ki tarah kahi or jana shuru kar diya hai (mujhe chedate hue)
Main : kahi or se kya matlab hai tumhara tumko main aisa lagta hun kya....haa haweli par hi gaya tha or ek khush khabari leke aaya hun
Nazi : (hairani se) kya khushkhabari?
Main : wo main jab haweli par gaya tha to mujhe sarpanch ki beti mili thi wo keh rahi thi ki wo apne abbu se baat karegi or hamaari madad bhi karegi bahut achhi hai wo
Nazi : Neer tum kitne bhole ho...tum aaj ke baad kabhi haweli nahi jaoge samjhe
Main : kyo kya hua maine kuch galat kiya kya?
Nazi : nahi tumne kuch galat nahi kiya bas aaj ke baad us ladki se mat milna
Main : wo jab hamaari madad kar rahi hai to galat kya hai milne me ye to bataao
Nazi : maine jo tumko kaha wo tumhe samajh nahi aaya naa thik hai jo tumhare dil me aaye karo lekin mujhse baat mat karna aaj ke baad samjhe
Main : (pareshani se) yaar lekin hua kya bataao to sahi
Nazi : kuch nahi hua bas tum aaj ke bad wahan nahi jaoge nahi to main tumse baat nahi karungi. wo log achhe log nahi hai Neer.
Main : thik hai jo hukum sarkaar ka
Nazi : (hansatee hui) tum jab meri baat maan jate ho naa to mujhe bahut achhe lagte ho dil karta hai ki.....
Main : ki...? kya dil karta hai?
Nazi : kuch nahi buddhu chalo ab andar chalo khana kha lo tumhari wajah se maine or bhabhi ne bhi khana nahi khaya lekin tumko kya tum to jao apni uss sarpanch ki beti ke pass.....
Main : arre tum dono ne khana kyo nahi khaya?
Nazi : hamane socha aaj hum sab sath me hi khana khaa le (nazre jhuka ke muskurate hue)
Main : baba ne khana khaa liya?
Nazi : haa wo to khana kha ke so bhi gaye Bas hum hi do pagal baithi hai jo apne budhu ka intzaar kar rahi hai lekin tumko to haveli wali se hi fursat nahi hai hamaari yaad kaha se aayegi..
Main : (muskurate hue) jyaadaa mat socha karo.... chalo mujhe bhi bahut bahut bhukh lagi hai.