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अहसान complete

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अहसान



दोस्तो काफ़ी दिनों से मैं यहाँ कहानिया पढ़ता आ रहा हूँ . मैने राजशर्मास्टॉरीज पर एक से बढ़ कर एक कहानियाँ पढ़ी है

तो मैने सोचा मैं भी एक कहानी पोस्ट कर ही दूं क्या पता मेरी ये कोशिस आप सब को पसंद आए

दोस्तो सबसे पहले मैं इस कहानी के मेन कॅरक्टर्स का थोड़ा सा इंट्रोडक्षन देना चाहूँगा ताकि सब लोगो को कहानी ऑर उनके कॅरक्टर्स अच्छे से समझ मे आ जाए....

नीर (शेरा) :- एज- 26 साल, हाइट - 6.1" (मेन हीरो)

हैदर अली (बाबा) :- एज 65 साल, दुबला ओर पतला (बूढ़ा साइड रोल मे ही रहेगा)

नाज़ (नाज़ी) :- एज- 22 साल, हाइट- 5.6" फिगर- 34-28-36 (बाबा की बेटी)

क़ासिम :- एज- 31 साल, हाइट- 5.8" (बाबा का बेटा एक शराबी ऑर लोंड़िया बाज़ जो अब उनके साथ नही रहता )

फ़िज़ा :- एज-29 साल, हाइट- 5.2" फिगर- 36-30-38 (बाबा की बहू)

(बाकी ऑर भी कॅरक्टर्स इस कहानी मे आएँगे उनका इंट्रो मैं उनके रोल के साथ-साथ देता रहूँगा. मेरी पहली कोशिश आपकी खिदमत मे हाजिर है.)

बात आज से कुछ साल पुरानी है. रात का वक़्त था ओर पहाड़ी रास्ता था वारिस बोहोत तेज़ हो रही थी. सुनसान सड़क पर मैं तेज़ रफ़्तार से अपनी कार भगा रहा था. पोलीस मेरा पीछा कर रही थी ऑर मेरी गाड़ी पर गोलियो की बोछार हो रही थी मेरी पीठ पर ऑर कंधे पर भी 2 गोली लगी हुई थी लेकिन मैं फिर भी बोहोत तेज़ रफ़्तार से कार चला रहा था कि अचानक किसी पोलीस वाले की गोली मेरी कार के टाइयर पर लगी ऑर मेरी गाड़ी जो कि तेज़ रफ़्तार मे थी जाके एक पहाड़ी से ढलान की तरफ नीचे बढ़ने लगी ऑर एक पेड़ के सहारे मेरी कार हवा मे लटक गई अब मैं ऑर मेरी कार एक गहरी खाई की ओर एक कमज़ोर से पेड़ पर लटक रहे थे मैने बोहोत कोशिश करके कार को पिछे की तरफ रिवर्स किया ऑर गाड़ी को खाई मे जाने से बचा लिया लेकिन इससे पहले कि मैं कार से बाहर निकलता पोलीस की जीप खाई के पास आके रुक गई ऑर तभी मेरी आँखो के सामने भी अंधेरा छाने लगा उसके कुछ पल बाद जब मुझे होश आया तो मुझे अपने सीने मे तेज़ दर्द हो रहा था ऑर मेरी पूरी कमीज़ खून से भीग गई थी शायद उन पोलीस वालों ने मुझे कार से उतारकर गोली मार दी थी ऑर फिर मुझे वापिस कार मे बिठा कर ढलान की तरफ कार को धक्का दे रहे थे.

मैं उस वक़्त आधा बेहोश था और आधा होश मे था फिर भी खुद को बचाने की पूरी कोशिश कर रहा था. मैने कार को संभालने की बोहोत कोशिश की लेकिन संभाल नही पा रहा था ब्रेक पर अपने पाओ का पूरा दबाव देने के बावजूद भी गाड़ी घिसट कर पहाड़ी से नीचे जा गिरी ऑर धदाम की आवाज़ के साथ पानी मे गिर गई ऑर कार का स्टारिंग मेरे सिर मे लगा ऑर बेहोशी ने मुझे अपनी आगोश मे पूरी तरह ले लिया उसके बाद क्या हुआ क्या नही मुझे कुछ नही याद. मैं नही जानता मैं कब तक उस पानी मे रहा ऑर पानी का तेज़ बहाव मुझे ऑर मेरी गाड़ी को कहाँ तक बहा कर ले गया. जब आँख खुली तो खुद को एक छोटे से कमरे मे पाया लेकिन जब मैने चारपाई से उठने की कोशिश की तो मेरे हाथ-पैर मेरा साथ नही दे रहे थे ऑर ज़ोर लगाने पर पूरे शरीर मे दर्द की एक लहर दौड़ गई. इतने मे अचानक एक बूढ़ा आदमी मेरे पास जल्दी से आया ऑर मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे लेटने का इशारा किया.

बाबा: बेटा तुम कौन हो क्या नाम है तुम्हारा?

मैं: (मुझे कुछ भी याद नही था कि मैं कौन हूँ बोहोत याद करने पर भी कुछ याद नही आ रहा था कि मेरी पिच्छली जिंदगी क्या थी ऑर मैं कौन हूँ.इसलिए बस उस बूढ़े आदमी को ऑर इस जगह को देख रहा था कि अचानक एक आवाज़ मेरे कानो से टकराई)

बाबा: क्या हुआ बेटा बताओ ना कौन हो तुम कहाँ से आए हो?

मैं: मुझे कुछ याद नही है कि मैं कौन हूँ.....(अपने सिर पर हाथ रखकर) यह जगह कोन्सि है

बाबा: बेटा हम ने तुम्हे पानी से निकाला है मेरी बेटी अक्सर नदी किनारे जाती है वहाँ उसको किनारे पर पड़े तुम मिले. जब तुम उनको मिले तो बोहोत बुरी तरह ज़ख़्मी ओर बेहोश थे वो ऑर मेरी बहू तुम्हे यहाँ ले आई.

मैं: अच्छा!!!!!! बाबा मैं यहाँ कितने दिन से हूँ?

बाबा: बेटा तुमको यहाँ 3 महीने से ज़्यादा होने वाले हैं तुम इतने दिन यहाँ बेहोश पड़े थे. जितना हो सका मेरी बेटी ऑर बहू ने तुम्हारा इलाज किया हम ग़रीबो से जितना हो सका हम ने तुम्हारी खिदमत की.

मैं: ऐसा मत कहिए बाबा आपने जो मेरे लिए किया आप सबका बोहोत-बोहोत शुक्रिया. लेकिन मुझे कुछ भी याद क्यो नही है.

बाबा: बेटा तुम्हारे सिर मे बोहोत गहरी चोट थी जिसको भरने मे बोहोत वक़्त लग गया मुमकिन है उस घाव की वजह से तुम्हारी याददाश्त चली गई हो.

इतने मे एक लड़की की आवाज़ सुनाई दी....बाबा अकेले-अकेले किससे बात कर रहे हो....सठिया गये हो क्या ऑर कमरे मे आ गई. (मेरी नज़र उस पर पड़ी तो मैने सिर से पैर तक उसको देखा ऑर उसका पूरा जायेज़ा लिया) दिखने मे पतली सी लेकिन लंबी, काले बाल, बड़ी-बड़ी आँखें, गोरा रंग, काले रंग का सलवार कमीज़ जिसपर छोटे-छोटे फूल बने थे ऑर कंधे से कमर पर बँधा हुआ दुपट्टा चाल मे अज़ीब सा बे-ढांगापन.

बाबा :- देख बेटी इनको होश आ गया (खुश होते हुए)

नाज़ी :- अर्रे!!! आपको होश आ गया अब कैसे हो...क्या नाम है आपका....कहाँ से आए हो आप (एक साथ कई सवाल)

बाबा : बेटी ज़रा साँस तो ले इतने सारे सवाल एक साथ पुछ लिए पहले पूरी बात तो सुना कर.

नाज़ी :- (मूह बनाकर) अच्छा बोलो क्या है?

बाबा :- बेटी इनको होश तो आ गया है लेकिन इनको याद कुछ भी नही है यह सब अपना पिच्छला भूल चुके हैं.

नाज़ी :- (अपने मूह पर हाथ रखते हुए) हाए! अब इनके घरवालो को कैसे ढूंढ़ेंगे?

इतने मे बाबा मेरी तरफ देखते हुए.

बाबा:- बेटा तुम अभी ठीक नही हो ऑर बोहोत कमजोर हो इसलिए आराम करो यह मेरी बेटी है नाज़ी यह तुम्हारी अच्छे से देख-भाल करेगी ऑर तुम फिकर ना करो सब ठीक हो जाएगा. हम सब तुम्हारे लिए दुआ करेंगे.(ऑर दोनो बाप बेटी कमरे से बाहर चले गये)

यह बात मेरे लिए किसी झटके से कम नही थी कि ना तो मुझे यह पता था कि मैं कौन हूँ ऑर नही कुछ मुझे मेरा पिच्छला कुछ याद था उपर से मैं 3 महीने से यहाँ पड़ा हुआ था. एक ही सवाल मेरे दिमाग़ मे बार-बार आ रहा था कि मैं कौन हूँ....आख़िर कौन हूँ मैं अचानक मेरे सिर मे दर्द होने लगा इसलिए मैने अपनी पुरानी ज़िंदगी के बारे मे ज़्यादा नही सोचा ऑर अपने ज़ख़्मो को देखने लगा मेरी बॉडी की काफ़ी जगह पर पट्टी बँधी हुई थी. मैं इस परिवार के बारे मे सोच रहा था कि कितने नेक़ लोग है जिन्होने यह जानते हुए कि मैं एक अजनबी हूँ ना सिर्फ़ मुझे बचाया बल्कि इतने महीने तक मुझे संभाला भी ऑर मेरी देख-भाल भी की.मैं अपनी सोचो मे ही गुम्म था कि अचानक मुझे किसी के क़दमो की आवाज़ सुनाई दी. मैने सिर उठाके देखा तो एक लड़की कमरे मे आती हुई नज़र आई यह कोई दूसरी लड़की थी बाबा के साथ जो आई थी वो नही थी वो शायद भागकर आई थी इसलिए उसका साँस चढ़ा हुआ था...यह फ़िज़ा थी जो यह सुनकर भागती हुई आई थी कि मुझे होश आ गया है.

मैने नज़र भरके उसे देखा....दिखने मे ना ज़्यादा लंबी ना ज़्यादा छोटी, रंग गोरा, नशीली सी आँखें, पीले रंग का सलवार कमीज़ ऑर सिर पर सलीके से दुपट्टा ओढ़े हुए लेकिन वो दुपट्टा भी उसकी छातियों की बनावट को छुपाने मे नाकाम था) मैं अभी उसके रूप रंग ही गोर से देख रहा था की अचानक एक आवाज़ ने मुझे चोंका दिया.
 
फ़िज़ा: अब कैसे हो?

मैं: ठीक हूँ....आपने जो मेरे लिए किया उसका बोहोत-बोहोत शुक्रिया.

फ़िज़ा: कैसी बात कर रहे हो...यह तो मेरा फ़र्ज़ था...लेकिन मुझे बाबा ने बताया कि आपको कुछ भी याद नही?

मैं: (नही मे गर्दन हिलाते हुए)जी नही.

फ़िज़ा: कोई बात नही आप फिकर ना करो आप जल्द ही अच्छे हो जाओगे

मैं: आपका नाम क्या है?

फ़िज़ा: (अपना दुपट्टा सर पर ठीक करते हुए)मेरा नाम फ़िज़ा है मैं बाबा की बहू हूँ

मैं: अच्छा.....आपके पति कहाँ है?

फ़िज़ा : वो तो शहर मे एक मिल मे काम करते हैं इसलिए साल मे 1-2 बार ही आ पाते हैं.(फ़िज़ा ने मुझसे झूठ बोला)

मैं: क्या मैं बाहर जा सकता हूँ?

फ़िज़ा: हिला तो जा नही रहा बाहर जाओगे कोई ज़रूरत नही चुप करके यही पड़े रहो ओर फिर जाओगे भी कहाँ अभी तो आपने कहा कि कुछ भी याद नही है कुछ दिन आराम करो इस बीच क्या पता आपको कुछ याद ही आ जाए तो हम आपके घरवालो को आपकी खबर पहुँचा सके.

मैं : ठीक है.

फ़िज़ा: भूख लगी हो तो कुछ खाने को लाउ?

मैं : नही मैं ठीक हूँ.

फ़िज़ा: ठीक है फिर आप आराम करो कुछ चाहिए हो तो मुझे आवाज़ लगा लेना.

इस तरह वो कमरे से बाहर चली गई ऑर मैं पीछे से उसको देखता रहा. मैं हालाकी चल नही सकता था लेकिन फिर भी मैने हिम्मत करके उठने की कोशिश की ऑर बेड पर बैठ गया ऑर खिड़की से बाहर देखने लगा ऑर ठंडी हवा का मज़ा लेने लगा. बाहर की हसीन वादियाँ उँचे पहाड़ ऑर उन पर सफेद चादर की तरह फैली हुई बर्फ ऑर उन पहाड़ो के बीच डूबता हुआ सूरज किसी का भी दिल मोह लेने के लिए काफ़ी थे मेरी आँखें बस इसी हसीन मंज़र को मन ही मन निहार रही थी. मैं काफ़ी देर बाहर क़ुदरत की सुंदरता को देखता रहा ऑर फिर धीरे-धीरे सूरज को पहाड़ो ने अपनी आगोश मे ले लिया ऑर नीले सॉफ आसमान मे छोटे-छोटे मोतियो जैसे तारे टिम-तिमाने लगे. मैं यह तो नही जानता कि मैं कौन हूँ ऑर कहाँ से आया हूँ लेकिन दिल मे अभी भी यही आस थी कि कैसे भी मुझे मेरी जिंदगी का कुछ तो याद आए ताकि मैं भी मेरे परिवार मेरे अपनो के पास जा सकूँ. जाने उनका मेरा बिना क्या हाल हो रहा होगा. मैं अपनी इन्ही सोचो मे गुम था कि किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे चोंका दिया.

फ़िज़ा: खाना तैयार है अगर भूख लगी हो तो खाना लेकर आउ

मैं: नही मुझे भूख नही है

फ़िज़ा: हाए अल्लाह!!!! आपने इतने दिन से कुछ नही खाया है खुद को देखो ज़रा कितने ज़ख़्मी ऑर कमज़ोर हो अगर खाना नही खाओगे तो ठीक कैसे होगे बोलो...

मैं: लेकिन मुझे भूख नही है आप लोग खा लो...

फ़िज़ा: ऐसे कैसे नही खाएँगे अगर आप खाना नही खाओगे तो हम भी नही खाएँगे हमारे यहाँ मेहमान भूखा नही सो सकता

मैं: अच्छा ऐसा है क्या.... ठीक है फिर आप मेरा खाना डालकर रख दो मुझे जब भूख होगी मैं खा लूँगा

फ़िज़ा: (अपनी कमर पर हाथ रखकर) जी नही!!!! मैं अभी खाना डाल कर ला रही हूँ आप अभी मेरे सामने खाना खाएँगे उसके बाद आपको लेप भी लगाना है.

मैं: ठीक है जी जैसे आपकी मर्ज़ी.(कुछ सोचते हुए) सुनिए ज़रा!!!!

फ़िज़ा : हंजी(पलटकर मुझे देखते हुए) अब क्या हुआ?

मैं: कुछ नही यह लेप कॉन्सा लगाएँगी आप मेरे

फ़िज़ा : (मुस्कुराते हुए) आपके जो यह ज़ख़्म है इन पर दवा लगाने की बात कर रही थी मैं.

मैं: अच्छा (ऑर मेरी नज़रे फ़िज़ा को कमरे से बाहर जाते हुए देखती रही)

कुछ ही देर मे फ़िज़ा खाना ले आई ओर मैने आज जाने कितने दिन बाद पेट भर खाना खाया था. कुछ देर बाद नाज़ी खाने की थाली ले गई ऑर फ़िज़ा ऑर नाज़ी दोनो कमरे मे आ गई एक कटोरा हाथ मे लिए.

फ़िज़ा: अर्रे आप अभी तक लेटे नही...खाना खा लिया ना

मैं : (हाँ मे सिर हिलाते हुए) हंजी खाना खा लिया बोहोत अच्छा बनाया था खाना

फ़िज़ा :शुक्रिया!!! अब चलिए लेट जाइए ताकि हम दोनो आपके लेप लगा सकें (ऑर फ़िज़ा ऑर नाज़ी ने मुझे मिलकर लिटा दिया)

मैं : जब मैं बेहोश था तब भी आप दोनो ही मुझे दवाई लगाती थी?

नाज़ी: जी हाँ ओर कौन है यहाँ

मैं : मेरा मतलब है कोई आदमी नही लगाता था मुझे

नाज़ी: जी नही बाबा तो अब खुद ही बड़ी मुश्किल से चल-फिर पाते हैं ऑर भाई जान बाहर ही रहते हैं घर कम ही आते हैं ज़्यादातर इसलिए हम दोनो ही आपको दवाई लगाती थी ऑर.....

मैं: ऑर क्या?

नाज़ी: कपड़े भी हम ही आपके बदलती थी(नज़रें झुकाते हुए)

मैं: अच्छा

फ़िज़ा : अच्छा छोड़ो यह सब वो वाली बात तो करो ना इनसे

मैं: कोन्सि बात?

फ़िज़ा: वो हमें आपका असल नाम तो पता नही है इसलिए हम दोनो ने आपका एक नाम सोचा है अगर आपको अच्छा लगे तो....

मैं: क्या नाम बताइए?

फ़िज़ा: "नीर" नाम कैसा लगा आपको?

मैं: जो आपको अच्छा लगे रख लीजिए मुझे तो कोई भी नाम याद नही वैसे यह नाम रखने कोई खास वजह?

फ़िज़ा : आप मौत को मात देकर फिर से इस दुनिया मे लौटे हो ओर हमें पानी मे बहते हुए मिले थे इसलिए हम ने सोचा कि आपका नाम भी हम "नीर" ही रख दे.

मैं: मौत को मात से क्या मतलब है आपका?

नाज़ी : अर्रे कुछ नही भाभी तो बस कही भी शुरू हो जाती है आप बताइए आपको नाम कैसा लगा?

मैं: अगर आप लोगो पसंद है तो मुझे क्या ऐतराज़ हो सकता है

फ़िज़ा: तो फिर ठीक है.... आज से जब तक आपको अपना असल नाम याद नही आ जाता हम सब के लिए आप "नीर" हो.

मैं: जैसी आपकी मर्ज़ी (हल्की सी मुस्कुराहट के साथ)

फ़िज़ा: नाज़ी कल याद करवाना मुझे इनकी दाढ़ी ऑर बाल भी काटेंगे इतने महीनो से यह बेहोश थे तो देखो इनकी दाढ़ी ऑर बाल कितने बड़े हो गये हैं बुरा मत मानना लेकिन अभी आप किसी जोगी-बाबा से कम नही लग रहे हो कोई अजनबी देखे तो डर ही जाए (दोनो आपस मे ही हँसने लगी)

नाज़ी: कोई बात नही भाभी यह काम मैं कर दूँगी बाबा की दाढ़ी बनाते ऑर बाल काट ते हुए मैं अब माहिर हो गई हूँ इस काम मे

मैं : ( मैने दोनो का चेहरा देख कर सिर्फ़ हाँ मे सिर हिलाते हुए) ठीक है

नाज़ी: चलो "नीर" जी कपड़े उतारो

मैं: (चोन्क्ते हुए) क्यो कपड़े क्यो उतारू?

नाज़ी: दवाई नही लगवानी आपने?

मैं: अर्रे हाँ मैं तो भूल ही गया (ऑर अपनी कमीज़ के बटन खोलने की कोशिश करने लगा)

फ़िज़ा: आप रहने दीजिए रोज़ हम खुद ही यह सब काम कर लेती थी आज भी कर लेंगी आप अपने हाथ-पैर ज़्यादा हिलाइए मत नही तो दर्द होगा.

मैं: (खामोशी से सिर्फ़ हाँ में सिर हिलाते हुए)

नाज़ी: फिकर मत कीजिए हम रोज़ आप चद्दर डाल देते थे दवाई लगाने से पहले (उसके चेहरे पर यह बात कहते हुए मुस्कुराहट ऑर शरम दोनो थी)

दोनो ने मेरी कमीज़ उतारी ऑर पाजामा भी उतार दिया जो मेरे पैर से थोड़ा उँचा था शायद फ़िज़ा के पति का होगा या फिर बाबा का होगा ओर मेरी टाँगो पर एक चद्दर डाल दी. मैं दवाई लगवाते हुए भी अपनी पिच्छली जिंदगी के बारे मे सोच रहा था लेकिन मुझे कोशिश करने पर भी कुछ याद नही आ रहा था......मैं बस अपनी ही सोचो मे गुम था कि अचानक मुझे एक कोमल हाथ अपने सिर पर ऑर आँखो पर घूमता महसूस हुआ साथ ही (एक आवाज़ आई कि अब आँखें मत खोलना) फिर दूसरा हाथ अपनी बाजू पर ऑर 2 हाथ एक साथ चद्दर के अंदर आते हुए मेरी टाँगो से रेंगते हुए जाँघो पर महसूस हुए मेरी आँखें बंद थी फिर भी मैं सॉफ महसूस कर रहा था कि जब 2 हाथ मेरी जाँघो पर चल रहे थे तो मेरे लंड मे कुछ हरकत हुई जो कि अकड़ रहा था ऑर इस हरकत के बाद जो हाथ मेरी जाँघो पर दवाई लगा रहे थे उनमे एक अजीब सी कंपन मैने महसूस की.....मुझे उस वक़्त नही पता था कि यह अहसास क्या है लेकिन मुझे उससे सुकून भी मिल रहा था ऑर एक अजीब सी बेचैनी भी हो रही थी...इस मिले-जुले अहसास को शायद मैं समझ नही पा रहा था कि यह मेरे साथ क्या अजीब सी बात हुई ऑर चन्द सेकेंड्स मे मेरा लंड पूरी तरफ खड़ा होके छत को सलामी दे रहा था ऑर लंड महाराज ने चद्दर मे एक तंबू बना दिया था. अचानक एक हाथ मेरे लंड से टकराया कुछ पल के लिए उसने मेरे लंड को पकड़ा ऑर फिर एक दम से छोड़ दिया साथ ही एक मीठी सी आवाज़ मेरे कानो से टकराई. भाभी बाकी लेप आप ही लगा दो मैने नीचे तो लगा दिया है अब मैं सोने जा रही हूँ. शायद यह आवाज़ नाज़ी की थी. उसके बाद मुझे नीचे वो अजीब से मज़े वाला अहसास नही महसूस हुआ मैं वैसे ही आज बिना किसी कपड़े के सिर्फ़ चादर मे लिपटा हुआ सो रहा था

फ़िज़ा जाते हुए 2 कंबल भी मेरे उपेर डाल गई यह कहकर कि यहाँ रात मे अक्सर ठंड हो जाती है. फ़िज़ा ने भी मुझे कपड़े नही पहनाए ऑर ऐसे ही खिड़की बंद करके चली गई शायद उसकी नज़र भी मेरे खड़े हुए लंड पर पड़ गई थी मेरी उस वक़्त आँखें तो बंद थी लेकिन पैरो की दूर होती हुई आवाज़ से मैने अंदाज़ा लगा लिया था कि शायद अब कमरे मे कोई नही सिवाए मेरे ऑर मेरी तन्हाई के.रात को मुझे नींद ने कब अपनी आगोश मे ले लिया मैं नही जानता.सुबह मुझे नाश्ता करवाने के बाद फ़िज़ा ऑर नाज़ी ने मेरी शेव भी की ऑर बाल भी काट दिए. शीशे मे अपना यह नया रूप देखकर मुझे खुशी भी हो रही थी ऑर बेचैनी भी हुई. लेकिन दिल मे अब यही सवाल बार-बार आके मुझे बेचैन कर देता था कि मैं कौन हूँ....आख़िर कौन हूँ मैं.

 
ऐसे ही दिन गुज़रने लगे अब मेरे जखम भी काफ़ी भर गये थे ऑर अब मैं चलने-फिरने के क़ाबिल हो गया था. लेकिन 1 बात मुझे हमेशा परेशान करती वो थे मेरे सीने पर गोली के निशान... ज़ख़्म भर गया था लेकिन निशान अभी भी बाक़ी था मैं जब भी नाज़ी या फ़िज़ा से उस निशान के बारे मे पुछ्ता तो वो बात गोल कर जाती ऑर मुझे उस निशान के बारे मे कुछ भी नही बतती मैं बाबा से यह बात नही पूछ सकता था क्योकि उमर के साथ उनकी नज़र बोहोत कमजोर हो चुकी थी इसलिए उन्हे दिखाई भी कम देता था. मैं सारा दिन या तो खिड़की के सामने खड़ा बाहर के नज़ारे देखता या फिर घर मे दोनो लड़कियो को घर का काम करते देखता रहता लेकिन फिर भी फ़िज़ा मुझे घर से बाहर नही जाने देती थी. मुझे पुराना कुछ भी याद नही था मेरी पुरानी जिंदगी अब भी मेरे लिए एक क़ोरा काग़ज़ ही थी. नाज़ी अब मुझे दवाई नही लगाती थी लेकिन फ़िज़ा रोज़ मुझे दवाई लगाने आती थी ऑर ऐसे ही बिना कपड़ो के उपेर कंबल डाल कर सुला जाती. आज दवाई लगाते हुए फ़िज़ा बोहोत खुश थी ऑर बार-बार मुस्कुरा रही थी उसकी इस खुशी का राज़ पुच्छे बिना मैं खुद को रोक नही पाया.

मैं: क्या बात है आज बोहोत खुश लग रही हो आप

फ़िज़ा: जी आज मेरे शोहार आ रहे है 5 महीने बाद

मैं: अर्रे वाह यह तो बोहोत खुशी की बात है.

फ़िज़ा: हंजी (नज़रें झुका कर मुस्कुराते हुए) आप से एक बात कहूँ तो आप बुरा तो नही मानेंगे?

मैं: नही बिल्कुल नही बोलिए क्या कर सकता हूँ मैं आपके लिए?

फ़िज़ा: वो आज मेरे शोहार क़ासिम आ रहे हैं तो अगर आप बुरा ना माने तो आप कुछ दिन उपेर वाली कोठारी मे रह लेंगे...ऑर हो सके तो उनके सामने ना आना.

मैं: (बात मेरी समझ मे नही आई) क्यो उनके सामने आ जाउन्गा तो क्या हो जाएगा?

फ़िज़ा: बस उनके सामने मत आना नही तो वो मुझे ऑर नाज़ी को ग़लत समझेंगे ऑर शक़ करेंगे असल मे वैसे तो वो बोहोत नेक़-दिल है लेकिन ऐसे उनकी गैर-हाजरी मे हम ने एक मर्द को रखा है घर मे तो वो आपके बारे मे ग़लत भी सोच सकते हैं ना इसलिए.

मैं: क्या आपने उनको मेरे बारे मे नही बताया हुआ?

फ़िज़ा: नही मैने आपके बारे मे उनको कुछ भी नही बताया कभी. मुझे ग़लत मत समझना लेकिन मेरी भी मजबूरी थी

मैं: कोई बात नही!!! ठीक है जैसा आप ठीक समझे

फ़िज़ा: मैं अभी आपका बिस्तर कोठारी मे लगा देती हूँ वहाँ मैं आपको खाना भी वही दे जाउन्गी कुछ चाहिए हो तो रोशनदान मे से आवाज़ लगा देना रसोई मे ऑर किसी कमरे मे नही याद रखना भूलना मत ठीक है.

मैं: (मैं सिर हाँ मे हिलाते हुए) फ़िज़ा जी आपके मुझ पर इतने अहसान है अगर आप ना होती तो आज शायद मैं ज़िंदा भी नही होता अगर मैं आपके कुछ काम आ सकूँ तो यह मेरी खुश किस्मती होगी. आप मेरी तरफ से बे-फिकर रहे मेरी वजह से आपको कोई परेशानी नही होगी.

फ़िज़ा: आपका बोहोत-बोहोत शुक्रिया आपने तो एक पल मे मेरी इतनी बड़ी परेशानी ही आसान करदी.

फिर वो बाहर चली गई ऑर मैं बस उसे जाते हुए देखता रहा. मैं वापिस अपने बेड पर लेट गया थोड़ी देर मे मेरा बिस्तर भी कोठरी मे लग गया ऑर मैं उपेर कोठरी मे जाके लेट गया. कोठरी ज़्यादा बड़ी नही थी फिर भी मेरे लिए काफ़ी थी मैं उसमे आराम से लेट सकता था ऑर घूम फिर भी सकता था. वहाँ मेरा बिस्तर भी बड़े स्लीके से लगा हुआ था अब मैं ऐसी जगह पर था जहाँ से मुझे कोई नही देख सकता था लेकिन मैं सारे घर मे देख सकता था क्योकि यह कोठरी घर के एक दम बीच मे थी ऑर घर के हर कमरे मे हवा के लिए खुले हुए रोशनदान से मैं किसी भी कमरे मे झाँक कर देख सकता था. आप यह समझ सकते हैं कि वो सारे घर की एक बंद छत थी. फ़िज़ा के जाने के कुछ देर बाद मैने बारी-बारी हर रोशनदान को खोलकर देखा ऑर हर कमरे का जायज़ा लेने लगा. पहले रोशनदान से झाँका तो वहाँ बाबा अपनी चारपाई पर बैठे हुए हूक्का पी रहे थे. दूसरे रोशनदान से मैं रसोई मे देख सकता था. तीसरा कमरा शायद नाज़ी का था जहाँ वो बेड पर बैठी शायद काग़ज़ पर किसी की तस्वीर बना रही थी पेन्सिल से. चोथा कमरा मेरा था जहाँ पहले मैं लेटा हुआ था जो अब फ़िज़ा सॉफ कर रही थी शायद यह फ़िज़ा ऑर क़ासिम का था इसलिए. कोठरी के पिछे वाला रोशनदान खोलकर देखा तो वहाँ से मुझे घर के बाहर का सब नज़र आया यहाँ से मैं कौन घर मे आया है कौन बाहर गया है सब कुछ देख सकता था.

मैं अभी बिस्तेर पर आके लेटा ही था ऑर अपनी ही सोचो मे गुम था कि अचानक एक तांगा घर के बाहर आके रुका ऑर उसमे से एक आदमी हाथ मे लाल अतेची लिए उतरा. शायद यह क़ासिम था जिसके बारे मे फ़िज़ा ने मुझे बताया था. देखने मे क़ासिम कोई खास नही था छोटे से क़द का एक दुबला पतला सा आदमी था फ़िज़ा उसके मुक़ाबले कहीं ज़्यादा सुन्दर थी. वो तांगे से उतरकर घर मे दाखिल हो गया मैं भी वापिस अपनी जगह पर आके वापिस लेट गया ऑर मेरी कब आँख लगी मुझे पता नही चला. शाम को अचानक किसी के चिल्लाने से मेरी नींद खुल गई मैने उठकर देखा तो क़ासिम बोहोत गंदी-गंदी गलियाँ दे रहा था ऑर फ़िज़ा से पैसे माँग रहा था. फ़िज़ा लगातार रोए जा रही थी ऑर उसको कहीं जाने के लिए मना कर रही थी. लेकिन वो बार-बार कहीं जाने की बात कर रहा था ऑर फ़िज़ा से पैसे माँग रहा था अचानक उसने फ़िज़ा को थप्पड़ मारा ऑर गालियाँ देने लगा ऑर कहा कि अपनी औकात मे रहा कर रंडी मेरे मामलो मे टाँग अड़ाई तो उठाके घर से बाहर फेंक दूँगा 5 महीने मे साली की बोहोत ज़ुबान चलने लगी है. तुझे तो आके ठीक करूँगा. ऑर क़ासिम तेज़ क़दमों के साथ घर के बाहर निकल गया. फ़िज़ा वही बेड पर बैठी रो रही थी. यह देखकर मुझे बोहोत बुरा ल्गा लेकिन मैं मजबूर था फ़िज़ा ने ही मुझे घर के नीचे आने से मना किया था इसलिए मैं बस उसको रोते हुए देखता रहा ऑर क़ासिम के बारे मे सोचने लगा. फ़िज़ा हमेशा मेरे सामने क़ासिम की तारीफ करती थी ऑर उसने मुझे क़ासिम एक नेक़-दिल इंसान बताया था उसके इस तरह के बर्ताव ने यह सॉफ कर दिया कि फ़िज़ा ने मुझे क़ासिम के बारे मे झूठ बोला था. काफ़ी देर तक फ़िज़ा कमरे मे रोती रही ऑर मैं उसको देखता रहा.

 
रात को फ़िज़ा मेरे लिए खाना लेके आई ऑर चेहरे पर अपनी सदाबहार मुस्कान के साथ. लेकिन मैं इस मुस्कान के पिछे का दर्द जान गया था इसलिए शायद फ़िज़ा की हालत पर उदास था फिर भी मैं नही चाहता था कि उसको मेरी वजह से किसी क़िस्म का दुख हो इसलिए उसको कुछ नही कहा. लेकिन ना चाहते हुए भी मेरे मूह से यह सवाल निकल गया.

मैं: आपके शोहर आ गये?

फ़िज़ा: हंजी आ गये तभी तो आज मैं बोहोत खुश हूँ.(बनावटी मुस्कुराहट के साथ)

मैं:अच्छी बात है मैं तो चाहता हूँ आप सब लोग हमेशा ही खुश रहें.

फ़िज़ा: मैं आपके लिए खाना लाई हूँ जल्दी से खाना खा लो नही तो ठंडा हो जाएगा

मैं: आपने खा लिया

फ़िज़ा: हंजी मैने क़ासिम के साथ ही खा लिया था

मैं: मेरा तो आपको देखकर ही पेट भर गया अब इस खाने की ज़रूरत मुझे भी नही

फ़िज़ा: (चोन्कते हुए) क्या मतलब?

मैं: आपने मुझसे झूठ क्यो बोला था क़ासिम के बारे मे... माफ़ करना लेकिन मैने आपके कमरे मे झाँक लिया था.

फ़िज़ा यह सुनकर खामोश हो गई ऑर मूह नीचे करके अचानक रो पड़ी. मेरी समझ मे नही आया कि उसको चुप कैसे करवाऊ इसलिए पास पड़ा पानी का ग्लास उसके आगे कर दिया. कुछ देर रोने के बाद फ़िज़ा चुप हो गई ऑर पानी का ग्लास हाथ मे पकड़ लिया.

मैं: जब आपको पता था कि क़ासिम ऐसा घटिया इंसान है तो आपने उससे शादी ही क्यो की?

फ़िज़ा: हर चीज़ पर हमारा ज़ोर नही होता मुझे जो मिला है वो मेरा नसीब है

मैं: आप चाहे तो मुझसे अपनी दिल की बात कर सकती है आपके दिल का बोझ हल्का हो जाएगा

फ़िज़ा: (नज़रे झुका कर कुछ सोचते हुए) इस दिल का बोझ शायद कभी हल्का नही होगा. शादी के शुरू मे क़ासिम ठीक था फिर उसकी दोस्ती गाव के सरपंच के खेतो मे काम करने वाले लोगो से हुई उनके साथ रहकर यह रोज़ शराब पीने लगा जुआ खेलने लगा इसके घटिया दोस्तो ने क़ासिम को कोठे पर भी ले जाना शुरू कर दिया. क़ासिम रात-रात भर घर नही आता था. लेकिन मैं सब कुछ चुप-चाप सहती रही कहती भी तो किसको मुझ अनाथ का था भी कौन जो मेरी मदद करता. वक़्त के साथ-साथ क़ासिम ऑर बुरा होता गया ऑर वो रोज़ शराब पीकर घर आता ऑर कोठे पर जाने के लिए मुझसे पैसे माँगता. हम जो खेती करके थोडा बोहोट पैसा कमाते हैं वो भी छीन कर ले जाता. एक दिन क़ासिम ने मुझसे कहा कि मैं उसके दोस्तो के साथ रात गुजारू जब मैने मना किया तो क़ासिम ने मुझे बोहोत मारा ऑर घर छोड़ कर चला गया. कुछ दिन बाद क़ासिम ने चौधरी के गोदाम से अपने दोस्तो के साथ मिलकर अनाज की कुछ बोरिया चुराई ऑर बेच दी अपने रंडीबाजी के शॉंक के लिए. सुबह पोलीस इसको ऑर इसके दोस्तो को पकड़ कर ले गई ऑर इसको 5 महीने की सज़ा हो गई. अब यह बाहर आया है जैल से तो अब भी वैसा है मैने सोचा था शायद जैल मे यह सुधर जाएगा लेकिन नही मेरी तो किस्मत ही खराब है (ऑर फ़िज़ा फिर से रोने लग गई)

मैं: (फ़िज़ा के कंधे पर हाथ रखकर) फिकर मत करो सब ठीक हो जाएगा. अगर मैं आपके किसी भी काम आ सकूँ तो मेरी खुश-किस्मती समझूंगा.

फ़िज़ा: (मेरे कंधे पर अपने गाल सहला कर) आपने कह दिया मेरे लिए इतना ही काफ़ी है

मैं: पहले जो हो गया वो हो गया लेकिन अब खुद को अकेला मत समझना मैं आपके साथ हूँ

फ़िज़ा: कब तक साथ हो आप.... तब तक ही ना जब तक आपकी याददाश्त नही आती उसके बाद?

मैं: (कुछ सोचते हुए) अगर यहाँ से जाना भी पड़ा तो भी जब भी आप लोगो को मेरी ज़रूरत होगी मैं आउन्गा यह मेरा वादा है

फ़िज़ा: (हैरानी से मुझे देखते हुए) चलो इस दुनिया मे कोई तो है जो मेरा भी सोचता है...(मुस्कुराते हुए)शुक्रिया!!!

उसके बाद कोठरी मे खामोशी छा गई ऑर जब तक मैं खाना ख़ाता रहा फ़िज़ा मुझे देखती रही. फिर वो भी मुझे दवाई लगा कर नीचे चली गई. आज भी मैं सिर्फ़ एक कंबल मे पड़ा था अंदर जिस्म नंगा था मेरा. मैं अब नीचे फ़िज़ा को बिस्तर पर अकेले लेटा हुआ देख रहा था. शायद क़ासिम आज भी घर नही आया था इस बार जो फ़िज़ा ने क़ासिम के बारे मे बताया था वो सही था. फ़िज़ा अभी भी जाग रही थी ऑर बार-बार रोशनदान की तरफ देख रही थी शायद वो कुछ सोच रही थी लेकिन उसे नही पता था कि मैं भी उसको देख रहा हूँ. ऐसे ही काफ़ी देर तक मैं उसे देखता रहा फिर मुझे नींद आने लग गई ऑर मैं सोने के लिए वापिस अपने बिस्तर पर लेट गया कुछ ही देर मे मुझे नींद आ गई.

आधी रात को जब मैं गहरी नींद मे सो रहा था कि अचानक किसी के धीरे से कोठरी का दरवाज़ा खोलने से मेरी नींद खुल गई. लालटेन बंद थी इसलिए मैं अंधेरा होने के कारण यह देख नही सकता था कि यह कॉन है इससे पहले कि मैं पूछ पाता उस इंसान ने मेरे पैर को धीरे से हिलाया. मुझे कुछ समझ नही आया कि ये कौन है ऑर इस वक़्त यहाँ क्या कर रहा है. मैं यह जानना चाहता था कि ये इस वक़्त यहाँ क्या करने आया है इसलिए खामोश होके लेटा रहा. फिर मुझे मेरी टाँगो पर उस इंसान के लंबे बाल महसूस हुए. इससे मुझे इतना तो पता चल ही गया था कि यह कोई लड़की है. यह या तो फ़िज़ा थी या फिर नाज़ी क्योकि इस वक़्त घर मे यही 2 लड़किया मोजूद थी. मगर मेरे दिल मे अभी यह सवाल था कि यह यहाँ इस वक़्त क्या करने आई है.

मैं अभी अपनी ही सोचो मे गुम था कि अचानक वो लड़की मेरे साथ आके लेट गई ऑर मेरे गालो को सहलाने लगी. अंधेरा होने की वजह से मुझे कुछ नज़र नही आ रहा था. फिर अचनाक वो हाथ मेरी गालो से रेंगता हुआ मेरी छाती पर आ गया ऑर मेरी छाती के बालो को सहलाने ल्गा ऑर हाथ नीचे की तरफ जाने लगा मैने हाथ को पकड़ लिया तो शायद उस लड़की को यह अहसास हो गया कि मैं जाग रहा हूँ इसलिए कुछ देर के लिए वो रुक गई ऑर अपना हाथ पिछे खींच लिया. मैने धीरे से पूछा कि कौन हो तुम ऑर इस वक़्त क्या कर रही हो. तो हाथ फिर से मेरे सीने से होता हुआ मेरे होंठो पर आया ऑर एक उंगली मेरे होंठो पर आके रुक गई जैसे वो मुझे चुप रहने का इशारा कर रही हो. मेरी अभी भी कुछ समझ मे नही आ रहा था कि वो लड़की जो अभी मेरे साथ बैठी हुई थी धीरे से उसने कंबल एक तरफ से उठाया ऑर खिसक कर कंबल मे मेरे साथ आ गई उसके इस तरह मुझसे चिपकने से ऑर उसके गरम शरीर के अहसास से मेरे शरीर मे भी हरकत होने लगी ऑर मेरे सोए हुए लंड मे जान आने लगी यह एक अजीब सा मज़ा था जो मैं ना तो समझ पा रहा था ना ही कुछ बोल पा रहा था. फिर उसकी एक टाँग मेरी टाँगो को सहलाने लगी ऑर उस लड़की का हाथ मेरे गले से होता हुआ छाती ऑर पेट पर घूमने लगा ऑर अचानक वो लड़की मेरे उपेर आ गई ऑर मेरे गालो को धीरे-धीरे चूमना शुरू कर दिया. मज़े से मेरी आँखे बंद हो रही थी उस लड़की के होंठो का गरम अहसास मेरे लिए बेहद मज़ेदार था उसके होठ मेरी गर्दन ऑर गालो को चूस ऑर चूम रहे थे. साथ मे नीचे मेरे लंड पर वो लड़की अपनी चूत रगड़ रही थी जिससे मेरा लंड लोहे जैसा कड़क हो गया था. मैं मज़े की वादियो मे खो रहा था कि अचानक एक मीठी सी लेकिन बेहद धीमी आवाज़ मेरे कानो से टकराई. तुम मुझे पहले क्यो नही मिले नीर मैं जाने कब से प्यासी हूँ मेरी प्यास बुझा दो. आज मुझे खुद पर काबू नही है मैं एक आग जल रही हूँ मुझे सुकून चाहिए मुझे आज प्यार चाहिए.

मैं बस इतना ही कह पाया कि क्या करू मैं. तो उस लड़की ने मेरा चेहरा अपने हाथो मे थाम लिया ऑर धीरे से अपने निचले होठ से मेरे दोनो होंठो को छू लिया ऑर कहा प्यार करो मुझे तुमने कहा था ना कि जब भी मुझे तुम्हारी ज़रूरत होगी मेरी मदद करोगे तो आज मुझे तुम्हारी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है मैं जल रही हूँ मेरे अंदर की आग को बुझा दो. यह बात मेरे लिए किसी झटके से कम नही थी क्योकि यह बात मैने फ़िज़ा को कही थी. इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाता फ़िज़ा ने अपने गरम होठ मेरे होंठो पर रख कर उन्हे चूम लिया ऑर मेरे सूखे हुए होंठो पर अपनी रसीली जीभ से उन्हे गीला करना शुरू कर दिया. मैने भी अपने दोनो हाथ उसकी कमर के इर्द-गिर्द बाँध लिए ऑर अपनी आँखे बंद कर ली ऑर अपने तपते होठ उसके होंठो से मिला दिए जिसे फ़िज़ा ने चूमते हुए धीरे-धीरे चूसना शुरू कर दिया.
 
Ahasaan

Dosto sabse pehle main is kahani ke main charactors ka thoda sa introduction dena chahunga taki sab logo ko kahani or unke charactors achhe se samajh me aa jaye....

Neer (shera) :- Age- 26 saal, height - 6.1" (Main hero)

Haidar Ali (baba) :- Age 65 saal, dubla or patla (budha side roll me hi rahega)

Naaz (nazi) :- Age- 22 saal, height- 5.6" figure- 34-28-36 (baba ki beti)

Qasim :- Age- 31 saal, height- 5.8" (baba ka beta ek sharabi or londiya baaz jo ab unke sath nahi rehta )

Fiza :- Age-29 saal, height- 5.2" figure- 36-30-38 (baba ki bahu)

(baki or bhi charactors is kahani me aayenge unka intro main unke roll ke sath-sath deta rahunga. meri pehli koshish aapki khidmat me hazeer hai.)

Baat aaj se kuch saal purani hai. Raat ka waqt tha or pahadi rasta tha bareesh bohot tez ho rhi thi. sunsaan sadak par main tez raftaar se apni car bhagaa rha tha. Police mera pichha kar rhi thi or meri gaadi par goliyo ki bochhar ho rhi thi meri peeth par or kandhe par bhi 2 goli lagi hui thi lekin main fir bhi bohot tez raftaar se car chala rha tha ki achanak kisi police wale ki goli meri car ke tyre par lagi or meri gaadi jo ki tez raftaar me thi jake ek pahadi se dhalaan ki taraf niche badhne lagi or ek ped ke sahare meri car hawa me latak gyi ab main or meri car ek gehri khaayi or ek kamzor se ped par latak rhe the maine bohot koshish karke car ko pichhe ki taraf reverse kiya or gaadi ko khayi me jane se bacha liya lekin isse pehle ki main car se bahar nikalta police ki jeep khayi ke pass aake ruk gyi or tabhi meri aankho ke samne bhi andhera chhane laga uske kuch pal baad jab mujhe hosh aya to mujhe apne seene me tez dard ho rha tha or meri poori kameez khoon se bheeg gyi thi shayad unn policewalo ne mujhe car se utaarkar goli maar di thi or phir mujhe wapis car me bitha kar dhalaan ki taraf car ko dhakka de rhe the.

Main uss waqt 1/2 behosh tha or 1/2 hosh me tha phir bhi khud ko bachane ki poori koshish kar rhe tha. maine car ko sambhalne ki bohot koshish ki lekin sambhaal nahi paa rha tha break par apne pao ka poora dabav dene ke bawjood bhi gaadi ghisat kar pahadi se niche jaa giri or dhadaaam ki awaaz ke sath paani me gir gyi or car ka stairing mere sir me lga or behoshi ne mujhe apni aagosh me poori tarah le liya uske baad kya hua kya nahi mujhe kuch nahi yaad. Main nahi janta main kab tak uss paani me rha or paani ka tez bahaav mujhe or meri gaadi ko kaha tak bahake le gaya. Jab aankh khuli to khud ko ek chhote se kamre me paya lekin jab maine chaarpayi se uthane ki koshish ki to mere hath-pair mera sath nahi de rhe the or zor lgane par poore shareer me dard ki ek lehar doud gyi. Itna me achanak ek budha aadmi mere pass jaldi se aaya or mere kandhe par hath rakhkar mujhe letne ka ishara kiya.

Baba: beta tum kaun ho kya naam hai tumhara?

Main: (mujhe kuch bhi yaad nahi tha ki main kaun hoo bohot yaad karne par bhi kuch yaad nahi aa rha tha ki meri pichhali jindagi kya thi or main kaun hoo.isliye bas uss budhe aadmi ko or iss jagah ko dekh rha tha ki achanak ek awaaz mere kaano se takrayi)

Baba: kya hua beta btao na kaun ho tum kaha se aaye ho?

Main: mujhe kuch yaad nahi hai ki main kaun hoo.....(apne sir par hath rakhkar) yeh jagah konsi hai

Baba: beta humne tumhe paani se nikala hai meri beti aksar nadi kinare jati hai waha usko kinare par pade tum mile. jab tum unko mile to bohot buri tarah zakhmi or behosh the woh or meri bahu tumhe yha le aayi.

Main: Achaa!!!!!! baba main yha kitne din se hoo?

Baba: beta tumko yha 3 maheene se jada hone wale hain tum itne din yha behosh pade the. jitna ho saka meri beti or bahu ne tumhara ilaaj kiya hum gareebo se jitna ho saka humne tumhari khidmat ki.

Main: aisa mat kahiye baba aapne jo mere liye kiya aap sabka bohot-bohot shukriya. lekin mujhe kuch bhi yaad kyo nahi hai.

Baba: beta tumhare sir me bohot gehri chot thi jisko bharne me bohot waqt lag gaya mumkin hai uss ghaav ki wajah se tumhari yaddasht chali gyi ho.

itne me ek ladki ki awaaz sunayi di....Baba akele-akele kisse baat kar rhe ho....sathhiya gye ho kya or kamre me aa gyi. (meri nazar uss par padi to maine sir se pair tak usko dekha or uska poora jayeza liya) dikhane me patli si lekin lambi, kaale baal, badi-badi aankhen, gora rang, kale rang ka salwaar kamiz jispar chhote-chhote phool bane the or kandhe se kamar par bandha hua dupatta chaal me azeeb sa be-dhangapan.

Baba :- dekh beti inko hosh aa gaya (khush hote hue)

Nazi :- arre!!! aapko hosh aa gaya ab kaise ho...kya naam hai aapka....kaha se aaye ho aap (ek sath kai sawaal)

Baba : beti zara saans to le itne sare sawaal ek sath puchh liye pehle poori baat to suna kar.

Nazi :- (mooh bnakar) Achha bolo kya hai?

Baba :- beti inko hosh to aa gaya hai lekin inko yaad kuch bhi nahi hai yeh sab apna pichhla bhool chuke hain.

Nazi :- (apne mooh par hath rakhte hue) haaye! ab inke gharwalo ko kaise dhoondhenge?

itne me baba meri taraf dekhte hue.

Baba:- beta tum abhi thik nahi ho or bohot kamjor ho isliye aaram karo yeh meri beti hai nazi yeh tumhari achhe se dekh-bhaal karegi or tum fikar na karo sab thik ho jayega. hum sab tumhare liye dua karenge.(or dono baap beti kamre se bahar chale gye)

yeh baat mere liye kisi jhatke se kam nahi thi ki naa to mujhe yeh pta tha ki main kaun hoo or nahi kuch mujhe mera pichhla kuch yaad tha upar se main 3 maheene se yha pada hua tha. ek hi sawaal mere dimaag me bar-bar aa rha tha ki main kaun hoo....akhir kaun hoo main achanak mere sir me dard hone laga isliye maine apni purani zindagi ke bare me jada nahi socha or apne zakhamo ko dekhne lga meri body ki kaafi jagah par patti bandhi hui thi. main iss parivaar ke bare me soch rha tha ki kitne neq log hai jinhone yeh jante hue ki main ek ajnabi hoo na sirf mujhe bachaya balki itne maheene tak mujhe sambhala bhi or meri dekh-bhaal bhi ki.main apni socho me hi gumm tha ki achanak mujhe kisi ke qadamo ki awaaz sunayi di. maine sir uthake dekha to ek ladki kamre me aati hui nazar aayi yeh koi dusri ladki thi baba ke sath jo aayi thi woh nahi thi woh shayad bhaagkar aayi thi isliye usse saans chadha hua tha...yeh fiza thi jo yeh sunkar bhagti hui aayi thi ki mujhe hosh aa gaya hai.

maine nazar bharke usse dekha....dikhane me na jada lambi na jada chhoti, rang gora, nasheeli si aankhen, peele rang ka salwaar kameez or sir par saleeke se dupatta odhe hue lekin woh dupatta bhi uski chhatiyo ki banawat ko chhupane me naakam tha) main abhi uske roop rang hi gor se dekh rha tha ki achanak ek awaaz ne mujhe chonka diya.

Fiza: ab kaise ho?

Main: thik hoo....aapne jo mere liye kiya uska bohot-bohot shukariya.

Fiza: kaisi baat kar rhe ho...yeh to mera farz tha...lekin mujhe baba ne btaya ki aapko kuch bhi yaad nahi?

Main: (nahi me gardan hilate hue)ji nahi.

Fiza: koi baat nahi aap fikar na karo aap jald hi achhe ho jaoge

Main: aapka naam kya hai?

Fiza: (apna dupatta sir par thik karte hue)mera naam fiza hai main baba ki bahu hoo

Main: Achha.....Aapke pati kaha hai?

Fiza : woh to shehar me ek mill me kaam karte hain isliye saal me 1-2 baar hi aa pate hain.(fiza ne mujhse jhooth bola)

Main: kya main bahar jaa sakta hoo?

Fiza: hila to jaa nahi rha bahar jaoge koi jarurat nahi chup karke yhi pade rho or fir jaoge bhi kaha abhi to aapne kaha ki kuch bhi yaad nahi hai kuch din araam karo iss bich kya pta aapko kuch yaad hi aa jaye to hum aapke gharwalo ko aapki khabar pohoncha sake.

Main : thik hai.

Fiza: bhookh lagi ho to kuch khane ko lau?

Main : nahi main thik hoo.

Fiza: thik hai fir aap araam karo kuch chahiye ho to mujhe awaaz laga lena.

 


Iss tarah woh kamre se bahar chali gayi or main pichhe se usko dekhta raha. main halaki chal nahi sakta tha lekin fir bhi maine himmat karke uthane ki koshish ki or bed par beth gaya or khidki se bahar dekhne laga or thandi hawa ka mazaa lene lga. bahar ki haseen wadiya unche pahad or unn par safed chaadar ki tarah failly hui barf or unn pahado ke bich doobta hua sooraj kisi ka bhi dil moh lene ke liye kaafi the meri aankhen bas isi haseen manzar ko man hi man nihaar rahi thi. main kaafi der bahar qudrat ki sundarta ko dekhta raha or fir dheere-dheere suraj ko pahado ne apni aaghosh me le liya or neele saaf asmaan me chhote-chhote motiyo jaise taare tim-timaane lage. main yeh to nahi janta ki main kaun hoo or kaha se aaya hoo lekin dil me abhi bhi yhi aas thi ki kaise bhi mujhe meri zingadi ka kuch to yaad aaye taki main bhi mere parivaar mere apno ke pass jaa saku. Jane unka mera bina kya haal ho raha hoga. main apni inhi socho me gum tha ki kisi ne mere kandhe par hath rakh kar mujhe chonka diya.

Fiza: khana teiyaar hai agar bhookh lagi ho to khana lekar aau

Main: nahi mujhe bhookh nahi hai

Fiza: haye allah!!!! aapne itne din se kuch nahi khaya hai khud ko dekho zara kitne zakhmi or kamzor ho agar khana nahi khaoge to thik kaise hoge bolo...

Main: lekin mujhe bhookh nahi hai aap log khaa lo...

Fiza: aise kaise nahi khaoge agar aap khana nahi khaoge to hum bhi nahi khayenge hmare yha mehmaan bhookha nahi so sakta

Main: achha aisa hai kya.... thik hai fir aap mera khana daalkar rakh do mujhe jab bhookh hogi main khaa lunga

Fiza: (apni kamar par hath rakhkar) ji nahi!!!! main abhi khana daal kar laa rahi hoo aap abhi mere samne khana khayenge uske baad aapko lep bhi lgana hai.

Main: thik hai ji jaise aapki marzi.(kuch sochte hue) suniye zara!!!!

Fiza : hanji(palatakar mujhe dekhte hue) ab kya hua?

Main: kuch nahi yeh lep konsa lagayengi aap mere

Fiza : (muskurate hue) aapke jo yeh zakham hai inn par dawa lagane ki baat kar rahi thi main.

Main: achha (or meri nazre fiza ko kamre se bahar jate hue dekhti rahi)

kuch hi der me fiza khana le aayi or maine aaj jane kitne din baad pet bhar khana khaya tha. kuch der baad nazi khane ki thali lai gayi or fiza or nazi dono kamre me aa gayi ek katora hath me liye.

Fiza: arre aap abhi tak lete nahi...khana khaa liya na

Main : (haa me sir hilate hue) hanji khana khaa liya bohot achha bnaya tha khana

Fiza :shukriya!!! ab chaliye let jayiye taki hum dono aapke lep lga sake (or fiza or nazi ne mujhe milkar leta diya)

Main : jab main behosh tha tab bhi aap dono hi mujhe dawayi lagati thi?

Nazi: ji haa or kaun hai yha

Main : mera matlab hai koi aadmi nahi lagata tha mujhe

Nazi: ji nahi baba to ab khud hi badi mushkil se chal-fir pate hain or bhai jaan bahar hi rehte hain ghar kam hi aate hain jadatar isliye hum dono hi aapko dawayi lagati thi or.....

Main: or kya?

Nazi: kapde bhi hum hi aapke badalti thi(nazare jhukate hue)

Main: achha

Fiza : achha chhodo yeh sab woh wali baat to karo na inse

Main: konsi baat?

Fiza: woh hume aapka asal naam to pta nahi hai isliye hum dono ne aapka ek naam socha hai agar aapko achha lage to....

Main: kya naam btayiye?

Fiza: "Neer" naam kaisa lga aapko?

Main: jo aapko achha lage rakh lijiye mujhe to koi bhi naam yaad nahi waise yeh naam rakhne koi khas wajaha?

Fiza : aap maut ko maat dekar fir se iss duniya me laute ho or hume paani me behte hue mile the isliye humne socha ki aapka naam bhi hum "Neer" hi rakh de.

Main: maut ko maat se kya matlab hai aapka?

Nazi : arre kuch nahi bhabhi to bas kahi bhi shuru ho jati hai aap btayiye aapko naam kaisa lga?

Main: agar aap logo pasand hai to mujhe kya aitraaz ho sakta hai

Fiza: to fir thik hai.... aaj se jab tak aapko apna asal naam yaad nahi aa jata hum sab ke liye aap "Neer" ho.

Main: jaisi aapki marzi (halki si muskurahat ke sath)

Fiza: nazi kal yaad karwana mujhe inki daadhi or baal bhi katenge itne maheeno se yeh behosh the to dekho inki daadhi or baal kitne bade ho gaye hain bura mat manna lekin abhi aap kisi jogi-baba se kam nahi lag rahe ho koi ajnabi dekhe to darr hi jaye (dono aapas me hi hasne lagi)

Nazi: koi baat nahi bhabhi yeh kaam main kar dungi baba ki daadhi banate or baal kat te hue main ab mahir ho gayi hoo iss kaam me

Main : ( main dono ka chehra dekh kar sirf haa me sir hilate hue) thik hai

Nazi: chalo "Neer" ji kapde utaaro

Main: (chonkte hue) kyo kapde kyo utaaru?

Nazi: dawayi nahi lagwani aapne?

Main: arre haa main to bhool hi gaya (or apni kameez ke button kholne ki koshish karne lga)

Fiza: aap rehne dijiye roz hum khud hi yeh sab kaam kar leti thi aaj bhi kar lengi aap apne hath-pair jada hilayiye mat nahi to dard hoga.

Main: (khamoshi se sirf haa mein sir hilate hue)

Nazi: fikar mat kijiye hum roz aap chaddar daal dete the dawayi lagane se pehle (uske chehre par yeh baat kehte hue muskurahat or sharam dono thi)

Dono ne meri kameez utari or pajama bhi utaar diya jo mere pair se thoda uncha tha shayad fiza ke pati ka hoga ya fir baba ka hoga or meri taango par ek chaddar daal di. main dawayi lagwate hue bhi apni pichhali jindagi ke bare me soch raha tha lekin mujhe koshish karne par bhi kuch yaad nahi aa raha......main bas apni hi socho me gumm tha ki achanak mujhe ek komal hath apne sir par or aankho par ghumta mehsoos hua sath hi (ek awaz aayi ki ab aankhen mat kholna) fir dusra hath apni baaju par or 2 hath ek sath chaddar ke ander aate hue meri taango se rengte hue jangho par mehsoos hue meri aankhen band thi fir bhi main saaf mehsoos kar raha tha ki jab 2 hath meri jangho par chal rahe the to mere Lund me kuch harkat hui jo ki akad raha tha or iss harkat ke baad jo hath meri jangho par dawayi laga rahe the unme ek ajeeb si kampan maine mehsoos ki.....mujhe uss waqt nahi pta tha ki yeh ahsaas kya hai lekin mujhe usse sukoon bhi mil raha tha or ek ajeeb si bachaini bhi ho rahi thi...iss mile-jule ahsaas ko shayad main samajh nahi paa raha tha ki yeh mere sath kya ajeeb si baat hui or chand seconds me mera lund poori taraf khada hoke chhat ko salami de raha tha or lund mahaaraj ne chaddar me ek tambu bna diya tha. Achanak ek hath mere lund se takraya kuch pal ke liye usne mere lund ko pakda or fir ek dam se chhod diya sath hi ek mithi si awaaz mere kaano se takrayi. bhabhi baki lep aap hi laga do maine niche to lga diya hai ab main sone jaa rahi hoo. shayad yeh awaaz nazi ki thi. uske baad mujhe niche woh ajeeb se maze wala ahsaas nahi mehsoos hua main waise hi aaj bina kisi kapde ke sirf chaadar me lipta hua so raha tha fiza jate hue 2 kambal bhi mere upar daal gayi yeh kehkar ki yha raat me aksar thand ho jati hai. fiza ne bhi mujhe kapde nahi pehnaye or aise hi khadki band karke chali gayi shayad uski nazar bhi mere khade hue lund par pad gayi thi meri uss waqt aankhen to band thi lekin pairo ki door hoti hui awaaz se maine andaaza lga liya tha ki shayad ab kamre me koi nahi siwaye mere or meri tanhayi ke.Raat ko mujhe neend ne kab apni aaghosh me le liya main nahi janta.Subah mujhe nashta karwane ke baad fiza or nazi ne meri shave bhi ki or baal bhi kaat diye. sheeshe me apna yeh naya roop dekhkar mujhe khushi bhi ho rahi thi or bechaini bhi hui. lekin dil me ab yhi sawaal bar-bar aake mujhe bechain kar deta tha ki main kaun hoo....aakhir kaun hoo main.

Aise hi din guzarne lage ab mere jakham bhi kaafi bhar gaye the or ab main chalne-firne ke qabil ho gaya tha. lekin 1 baat mujhe hamesha pareshaan karti woh the mere seene par goli ke nishaan... zakham bhar gaya tha lekin nishaan abhi bhi baqi tha main jab bhi nazi ya fiza se uss nishaan ke bare me puchhta to woh baat gol kar jati or mujhe uss nishaan ke bare me kuch bhi nahi btati main baba se yeh baat nahi puch sakta tha kyoki umar ke sath unki nazar bohot kamjor ho chuki thi isliye unhe dikhayi bhi kam deta tha. main sara din ya to khidki ke samne khada bahar ke nazare dekhte ya fir ghar me dono ladkiyo ko ghar ka kaam karte dekhta rehta lekin fir bhi fiza mujhe ghar se bahar nahi jane deti thi. Mujhe purana kuch bhi yaad nahi tha meri purani jindagi ab bhi mere liye ek qora kagaz hi thi. Nazi ab mujhe dawayi nahi lagati thi lekin fiza roz mujhe dawayi lagane aati thi or aise hi bina kapdo ke upar kambal daal kar sula jati. Aaj dawayi lagate hue fiza bohot khush thi or bar-bar muskura rahi thi uski iss khushi ka raaz puchhe bina main khud ko rok nahi paya.

 
Main: kya baat hai aaj bohot khush lag rahi ho aap

Fiza: ji aaj mere shohar aa rahe hai 5 maheene baad

Main: arre waah yeh to bohot khushi ki baat hai.

Fiza: hanji (nazare jhuka kar muskurate hue) aap se ek baat kahu to aap bura to nahi manenge?

Main: nahi bilkul nahi boliye kya kar sakta hoo main apke liye?

Fiza: woh aaj mere shohar qasim aa rahe hain to agar aap bura na mane to aap kuch din upar wali kothari me reh lenge...or ho sake to unke samne naa aana.

Main: (baat meri samajh me nahi aayi) kyo unke samne aa jaunga to kya ho jayega?

Fiza: bas unke samne mat aana nahi to woh mujhe or nazi ko galat samjhenge or shaq karenge asal me waise to woh bohot neq-dil hai lekin aise unki gair-hazri me humne ek mard ko rakha hai ghar me to woh aapke bare me galat bhi soch sakte hain naa isliye.

Main: kya aapne unko mere bare me nahi btaya hua?

Fiza: nahi maine aapke bare me unko kuch bhi nahi btaya kabhi. mujhe galat mat samajhna lekin meri bhi majboori thi

Main: koi baat nahi!!! thik hai jaisa aap thik samjhe

Fiza: main abhi aapka bistar kothari me lga deti hoo waha main apko khana bhi wahi de jaungi kuch chahiye ho to roshandaan me se awaaz lga dena rasoyi me or kisi kamre me nahi yaad rakhna bhoolna mat thik hai.

Main: (main sir haa me hilate hue) fiza ji aapke mujh par itne ahsaan hai agar aap na hoti to aaj shayad main zinda bhi nahi hota agar main aapke kuch kaam aa saku to yeh meri khush kismati hogi. aap meri taraf se be-fikar rahe meri wajah se aapko koi pareshani nahi hogi.

Fiza: apka bohot-bohot shukriya aapne to ek pal me meri itni badi pareshani hi asaan kardi.

Fir woh bahar chali gayi or main bas usse jate hue dekhta raha. Main wapis apne bed par let gaya thodi der me mera bistar bhi kothari me lag gaya or main upar kothri me jake let gaya. kothri jada badi nahi thi fir bhi mere liye kaafi thi main usme aaram se let sakta tha or ghum fir bhi sakta tha. waha mera bistar bhi bade sleeke se laga hua tha ab main essi jagah par tha jaha se mujhe koi nahi dekh sakta tha lekin main sare ghar me dekh sakta tha kyoki yeh kothri ghar ke ek dam bich me thi or ghar ke har kamre me hawa ke liye khule hue roshandaan se main kisi bhi kamre me jhaank kar dekh sakta tha. aap yeh samajh sakte hain ki woh sare ghar ki ek band chhat thi. Fiza ke jane ke kuch der baad maine bari-bari har roshandaan ko kholkar dekha or har kamre ka jayeza lene laga. pehle roshandaan se jhanka to waha baba apni chaarpayi par bethe hue hooka pee rahe the. dusre roshandaan se main rasoyi me dekh sakta tha. teesra kamra shayad nazi ka tha jaha woh bed par bethi shayad kagaz par kisi ki tasveer bna rahi thi pencil se. chotha kamra mera tha jaha pehle main leta hua tha jo ab fiza saaf kar rahi thi shayad yeh fiza or qasim ka tha isliye. kothri ke pichhe wala roshandaan kholkar dekha to waha se mujhe ghar ke bahar ka sab nazar aaya yha se main kaun ghar me aaya hai kaun bahar gaya hai sab kuch dekh sakta tha.

Main abhi bister par aake leta hi tha or apni hi socho me gum tha ki achanak ek taanga ghar ke bahar aake ruka or usme se ek aadmi hath me laal atechi liye utraa. shayad yeh qasim tha jiske bare me fiza ne mujhe btaya tha. dekhne me qasim koi khas nahi tha chhote se qad ka ek dubla patla sa aadmi tha fiza uske muqable kahi jada sunder thi. woh taangey se utarkar ghar me dakhil ho gaya main bhi wapis apni jagah par aake wapis let gaya or meri kab aankh lagi mujhe pta nahi chala. shaam ko achanak kisi ke chillane se meri jaag khul gayi maine uthkar dekha to qasim bohot gandi-gandi galiya de raha tha or fiza se paise maang raha tha. fiza lagataar roye jaa rahi thi or usko kahi jane ke liye mana kar rahi thi. lekin woh bar-bar kahi jane ki baat kar raha tha or fiza se paise maang raha tha achanak usne fiza ko thappad mara or galiya dene lga or kaha ki apni aukaat me raha kar randi mere mamlo me taang adayi to uthake ghar se bahar fenk dunga 5 maheene me saali ki bohot jubaan chalne lagi hai. tujhe to aake thik karunga. or qasim tez qadmko ke sath ghar ke bahar nikal gaya. fiza wahi bed par bethi rou rahi thi. yeh dekhkar mujhe bohot bura lga lekin main majboor tha fiza ne hi mujhe ghar ke niche aane se mana kiya tha isliye main bas usko rote hue dekhta raha or qasim ke bare me sochne lga. fiza hamesha mere samne qasim ki tareef karti thi or usne mujhe qasim ek neq-dil insaan btaya tha uske iss tarah ke bartaav ne yeh saaf kar diya ki fiza ne mujhe qasim ke bare me jhooth bola tha. kaafi der tak fiza kamre me roti rahi or main usko dekhta raha.

raat ko fiza mere liye khana leke aayi or chehre par apni sadabahar muskaan ke sath. lekin main iss muskaan ke pichhe ka dard jaan gaya tha isliye shayad fiza ki haalat par udaas tha fir bhi main nahi chahta tha ki usko meri wajah se kisi qism ka dukh ho isliye usko kuch nahi kaha. lekin na chahte hue bhi mere mooh se yeh swaal nikal gaya.

Main: aapke shohar aa gaye?

Fiza: hanji aa gaye tabhi to aaj main bohot khush hoo.(banawati muskurahat ke sath)

Main:achhi baat hai main to chahta hoo aap sab log hamesha hi khush rahe.

Fiza: main aapke liye khana layi hoo jaldi se khana khaa lo nahi to thanda ho jayega

Main: aapne khaa liya

Fiza: hanji maine qasim ke sath hi khaa liya tha

Main: mera to aapko dekhkar hi pet bhar gaya ab iss khane ki jarurat mujhe bhi nahi

Fiza: (chonkte hue) kya matlab?

Main: aapne mujhse jhooth kyo bola tha qasim ke bare me... maaf karna lekin maine aapke kamre me jhaank liya tha.

fiza yeh sunkar khamosh ho gayi or mooh niche karke achanak rou padi. meri samajh me nahi aaya ki usko chup kaise karwau isliye pass pada paani ka glass uske aagey kar diya. kuch der rone ke baad fiza chup ho gayi or pani ka glass hath me pakad liya.

Main: jab aapko pta tha ki qasim aisa ghatiya insaan hai to aapne usse shaadi hi kyo ki?

Fiza: har chij par hmara jor nahi hota mujhe jo mila hai woh mera naseeb hai

Main: aap chahe to mujhse apni dil ki baat kar sakti hai aapke dil ka bojh halka ho jayega

fiza: (nazre jhuka kar kuch sochte hue) iss dil ka bojh shayad kabhi halka nahi hoga. shaadi ke shuru me qasim thik tha fir uski dosti gaav ke sarpanch ke kheto me kaam karne wale logo se hui unke sath rehkar yeh roz sharab peene lga jua khelne lga iske ghatiya dosto ne qasim ko kothe par bhi le jana shuru kar diya. qasim raat-raat bhar ghar nahi aata tha. lekin main sab kuch chup-chap sehti rahi kehti bhi to kisko mujhe anath ka tha bhi kaun jo meri madad karta. waqt ke sath-sath qasim or bura hota gaya or woh roz sharab peekar ghar aata or kothe par jane ke liye mujhse paise mangta. hum jo kheti karke thoda bohot paisa kamate hain woh bhi cheen kar le jata. ek din qasim ne mujhse kaha ki main uske dosto ke sath raat guzaru jab maine mana kiya to qasim ne mujhe bohot mara or ghar chhodkar chala gaya. kuch din baad qasim ne choudhary ke godaam se apne dosto ke sath milkar anaaj ki kuch boriya churayi or bech di apne randibaazi ke shonk ke liye. subah police isko or iske dosto ko pakad kar le gayi or isko 5 month ki saza ho gayi. ab yeh bahar aaya hai jail se to ab bhi waisa hai maine socha tha shayad jail me yeh sudhar jayega lekin nahi meri to kismat hi kharab hai (or fiza fir se rone lag gayi)

Main: (fiza ke kandhe par hath rakhkar) fikar mat karo sab thik ho jayega. agar main aapke kisi bhi kaam aa saku to meri khush-kismati samjhunga.

Fiza: (mere kandhe par apne gaal sehla kar) aapne keh diya mere liye itna hi kafi hai

Main: pehle jo ho gaya woh ho gaya lekin ab khud ko akela mat samajhna main aapke sath hoo

Fiza: kab tak sath ho aap.... tab tak hi naa jab tak aapki yaddasht nahi aati uske baad?

Main: (kuch sochte hue) agar yha se jana bhi pada to bhi jab bhi aap logo ko meri jarurat hogi main aaunga yeh mera vaada hai

Fiza: (herani se mujhe dekhte hue) chalo iss duniya me koi to hai jo mera bhi sochta hai...(muskurate hue)shukriya!!!

uske baad kothari me khamoshi chha gayi or jab tak main khana khata raha fiza mujhe dekhti rahi. fir woh bhi mujhe dawayi lgake niche chali gayi. aaj bhi main sirf ek kambal me pada tha ander jism nanga tha mera. main ab niche fiza ko bister par akele leta hua dekh raha tha. shayad qasim aaj bhi ghar nahi aaya tha iss bar jo fiza ne qasim ke bare me btaya tha woh sahi tha. fiza abhi bhi jaag rahi thi or bar-bar roshandaan ki taraf dekh rahi thi shayad woh kuch soch rahi thi lekin usse nahi pta tha ki main bhi usko dekh raha hoo. aise hi kaafi der tak main usse dekhta raha fir mujhe neend aane lag gayi or main sone ke liye wapis apne bister par let gaya kuch hi der me mujhe neend aa gayi.

 
aadhi raat ko jab main gehri neend me so raha tha ki achanak kisi ne dheere se kothri ka darwaza kholne se meri jaag khul gayi. laalten band thi isliye main andhera hone ke karan yeh dekh nahi sakta tha ki yeh kon hai isse pehle ki main puch pata uss insaan ne mere pair ko dheere se hilaya. Mujhe kuch samajh nahi aaya ki ye kaun hai or iss waqt yha kya kar raha hai. main yeh janna chahta tha ki yeh iss waqt yha kya karne aaya hai isliye khamosh hoke leta raha. fir mujhe meri taango par uss insaan ke lambe baal mahsoos hue. isse mujhe itna to pta chal hi gaya tha ki yeh koi ladki hai. yeh ya to fiza thi ya fir nazi kyoki iss waqt ghar me yhi 2 ladkiya mojood thi. magar mere dil me abhi yeh sawaal tha ki yeh yha iss waqt kya karne aayi hai. main abhi apni hi socho me gum tha ki achanak woh ladki mere sath aake let gayi or mere gaalo ko sehlane lagi. andhera hone ki wajah se mujhe kuch nazar nahi aa raha tha. fir achnak woh hath meri gaalo se rengta hua meri chhati par aa gaya or meri chhati ke balo ko sehlane lga or hath niche ki taraf jane lga maine hath ko pakad liya to shayad uss ladki ko yeh ahsaas ho gaya ki main jaag raha hoo isliye kuch der ke liye woh ruk gayi or apna hath pichhe khinch liya. maine dheere se poocha ki kaun ho tum or iss waqt kya kar rahi ho. hath fir se mere seene se hota hua mere hotho par aaya or ek ungali mere hotho par aake ruk gayi jaise woh mujhe chup rehne ka ishara kar rahi ho. meri abhi bhi kuch samajh me nahi aa raha tha ki woh ladki jo abhi mere sath bethi hui thi dheere se usne kambal ek taraf se uthaya or khisak kar kambal me mere sath aa gayi uske iss tarah mujhse chipakne se or uske garam shareer ke ahsaas se mere sharir me bhi harkat hone lagi or mere soye hue lund me jaan aane lagi yeh ek ajeeb sa maja tha jo main na to samajh paa raha tha na hi kuch bol paa raha tha. fir uski ek taang meri taango ko sehlane lagi or uss ladki ka hath mere gale se hota hua se chhati or pet par ghumne lga or achanak woh ladki mere upar aa gayi or mere gaalo ko dheere-dheere chumna shuru kar diya. Maze se meri aankhe band ho rahi thi uss ladki ke hotho ka garam ahsaas mere liye behad mazedaar tha uske hoth meri gardan or gaalo ko chus or chum rahe the. sath me niche mere lund par woh ladki apni gaand radar rahi thi jisse mere lund lohe jaisa kadak ho gaya tha. main maze ke wadiyo me kho raha tha ki achanak ek mithi si lekin behad dheemi awaz mere kaano se takrayi. tum mujhe pehle kyo nahi mile Neer main jane kab se pyaasi hoo meri pyaas bujha do. aaj mujhe khud par kaabu nahi hai main ek aag jal rahi hoo mujhe sukoon chahiye mujhe aaj pyaar chahiye. maine bas itna hi keh paya ki kya karu main. uss ladki ne mere chehra apne hatho me thaam liya or dheere se apne nichle hoth se mere dono hotho ko chho liya or kaha pyaar karo mujhe tumne kaha tha na ki jab bhi mujhe tumhari jarurat hogi meri madad karoge to aaj mujhe tumhari sabse jada jarurat hai main jal rahi hoo mere ander ki aag ko bujha do. yeh baat mere liye kisi jhatke se kam nahi thi kyoki yeh baat maine fiza ko kahi thi. isse pehle ki main kuch bol pata fize ne apne garam hoth mere hotho par rakh kar unhe choom liya or mere sukhe hue hotho par apni raseeli jeebh se unhe geela karna shuru kar diya. maine bhi apne dono hath uske kamar ke ird-gird bandh liya or apni aankhe band kar li or apne tapte hoth uske hotho se mila diye jise fiza ne chumte hue dheere-dheere chusna shuru kar diya.

 


कुछ ही देर मे हम दोनो एक दूसरे के होंठों को बुरी तरह चूस ऑर चाट रहे थे वो मेरे होंठों को बुरी तरह चूस रही थी ऑर उनको काट रही थी कभी वो मेरा निचला होंठ चुस्ती ऑर काट लेती कभी उपर वाला होंठ चुस्ती फिर काट लेती. हम जिस मज़े की दुनिया मे थे उसमे ना उसे कोई होश था ना ही मुझे हम बस दोनो ही एक दूसरे मे समा जाना चाहते थे. मेरे दोनो हाथ उसकी पीठ की रीड की हड्डी को सहला रहे थे ऑर उसकी गान्ड लगातार मेरे लंड को मसल रही थी. अचानक उसने मेरे दोनो हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिए ऑर मेरे हाथो को अपनी छाती पर दबाने लगी मैने भी उसके ठोस ऑर बड़े मम्मों को थाम लिया ओर उन्हे ज़ोर से दबाने लगा जिससे उसके मुँह से एक सस्सिईईईईईईईईईई की आवाज़ ही निकल गई ओर वो फिर मेरे होंठों को चूसने लग गई मेरा हाथ बार-बार उसकी छाती से रेंगता हुआ उसकी कमर तक जाता ऑर फिर उसके मोटे मम्मों को थाम लेता अचानक वो रुक गई ऑर लगभग मेरे लंड पर अपनी बड़ी गान्ड रख कर बैठ गई ऑर अपनी कमीज़ ऑर ब्रा को एकसाथ उपर कर दिया ऑर फिर मेरी छाती के उपर लेट गई उसके नाज़ुक ऑर गरम मम्मे जो हर तरह से बे-परदा मेरी छाती से चिपके हुए थे उन्होने मुझे एक अजीब सा मज़ा दिया अब मैं उसके नंगे मम्मों को दबा रहा था ओर उसकी नंगी कमर को सहला रहा था उसको निपल अंगूर की तरह सख़्त हो चुके थे जिन्हे जब मैने पकड़ा तो एक आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह उसके मुँह से निकल गई ऑर उसने मेरे कान के पास मुँह लेक कहा कि "इन्हे चूँसो नीर अब रहा नही जा रहा" मैने थोड़ा नीचे सरक कर उसके एक मम्मे को थाम लिया ऑर अंगूठे से उसके निपल को कुरेदने लगा ऑर अंदाज़े से उसके मम्मे का जायेज़ा लेने लगा वो काफ़ी बड़े थे लेकिन उसके निपल छोटे मगर बोहोत सख़्त हो गये थे. उसका मम्मा मेरे एक हाथ मे पूरा नही आ रहा था अचानक उसने मेरे सिर के बाल पकड़ कर मेरे मुँह को अपने मम्मे पर ज़ोर से दबा दिया ऑर मैने अपना मुँह खोलकर उसके निपल को अपने मुँह मे जाने का रास्ता दे दिया मैं किसी छोटे बच्चे की तरह उसके निपल को चूस रहा था ऑर काट रहा था वो लगातार मुँह से अजीब से आवाज़े निकाल रही थी. अचानक उसने अपनी कमीज़ ऑर ब्रा दोनो एक साथ पूरी तरफ से उतार दी लेकिन सलवार अभी भी उसने पहनी हुई थी. मैं लगातार ज़ोर-ज़ोर से उसके निपल को चूस ऑर काट रहा था ऑर मेरे हाथ उसकी गान्ड की दोनो ठोस पहाड़ियो को बार-बार दबा रहे थे उसका बदन बेहद नाज़ुक ओर मुलायम था. वो बस मेरे सिर पर हाथ फेर रही थी ओर मेरे माथे को बार-बार चूम रही थी.

अचानक मुझे याद आया कि मैं एक लड़की को बालो से पकड़कर बुरी तरह ज़ोर-ज़ोर से चोदा करता था ऑर वो चिल्लाया करती थी. दोस्तो ये वो पहली याद थी जो मुझे वापिस मिली थी वो भी फ़िज़ा की वजह से. मैने फॉरन उसकी सलवार को खोल दिया ओर फ़िज़ा को उसके खुले बालो से पकड़कर नीचे पटक दिया ऑर खुद उसके उपर आ गया. शायद मेरे अंदर का सेक्स का जानवर फिर से जाग गया था इससे पहले कि फ़िज़ा कुछ कह पाती मैने उसकी दोनो टांगे उठाई उपर हवा मे ऑर अपना मुँह उसकी चूत से लगा दिया जो उसके लिए किसी झटके से कम नही था उसके मुँह से एक जोरदार आआअहह निकली ओर उसने मेरे सिर को दोनो हाथो से थाम लिया ऑर अपनी चूत पर दबा दिया मैं लगातार उसकी चूत को चूस रहा था ओर उपर लगे दाने को काट रहा था ऑर अपनी जीभ से छेड़ रहा था. उससे बेहद मज़ा आ रहा था जिसकी वजह से उसकी चूत बोहोत ज़्यादा पानी छोड़ रही थी ऑर मेरा पूरा मुँह उसकी चूत से निकले पानी से भीग चुका था फिर भी मैं लगातार उसकी चूत को चूसे जा रहा था अचानक उसकी टांगे अकड़ गई ऑर उसने अपनी टाँगो मे मेरे मुँह को दबाकर अपनी गान्ड हवा मे उठा ली मैं साँस भी नही ले पा रहा था फिर भी मैने उसकी चूत को चूसना जारी रखा. अचानक उसकी गान्ड ने उपर की तरफ एक झटका लिया अब उसकी टांगे लग-भग बुरी तरह काँप रही थी ऑर कुछ सेकेंड्स के बाद वो धडाम से नीचे गिर गई ओर मेरे मुँह उसकी टाँगो की गिरफ़्त से आज़ाद हो गया. अब वो बिस्तर पर पड़ी ज़ोर-ज़ोर से साँस लेने लगी मैं अब भी उसकी चूत को चूस रहा था लेकिन अब वो शांत हो गई थी अचानक उसने मेरे चेहरे को अपने दोनो हाथो से थामा ऑर इशारे से उपर आने को कहा.

मैं उसके उपर आ गया ऑर अपने हाथ से अपने मुँह पर लगा उसकी चूत का पानी सॉफ करने लगा तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया ओर एक तरफ कर दिया ऑर मेरे चेहरे को फिर से थाम कर मेरे होंठों को फिर से चूसना शुरू कर दिया अब लगभग वो मेरा पूरा चेहरा चाट रही थी. कुछ ही देर मे वो फिर से गरम होने लगी ऑर थोड़ी देर पहले नीचे जो हरकत उसकी गान्ड मेरे लंड के साथ कर रही थी अब वही हरकत उसकी चूत ने मेरे लंड के साथ करनी शुरू कर दी थी वो बार-बार नीचे से अपनी गान्ड उठाकर मेरे लंड पर अपनी चूत के होंठ रगड़ रही थी मुझे उसकी इस हरकत से बहुत मज़ा मिल रहा था मैने फिर से उसके मम्मों को थाम लिया ओर चूसना शुरू कर दिया अब वो भी नीचे से ज़ोर-ज़ोर से अपनी चूत को मेरे लंड पर रगड़ने लगी शायद उसकी चूत अब चुदवाने के लिए लंड चाहती थी. जाने कितने वक़्त की प्यासी चूत थी एक बार झड़ने से कहाँ शांत होने वाली थी. मैं जब उसके मम्मे के निपल को चूसने ऑर काटने मे लगा था तो उसने अपना हाथ नीचे लेजा कर मेरे लंड को थाम लिया ओर अचानक उसके मुँह से निकल गया...इतना बड़ा ............... उसने दूसरा हाथ मेरे कंधे पर रखा ऑर मेरा चेहरा उपर किया ऑर कान मे बोला

फ़िज़ा: नीर ये इतना बड़ा ऑर मोटा कैसे हो गया...दवाई लगाते हुए तो कभी इतना बड़ा नही हुआ था.

मैं: पता नही शायद आज हम इस तरह साथ है इसलिए हो गया होगा

फ़िज़ा: मैं चाहती हूँ तुम अपना ये मेरे अंदर डालो ओर मुझे खूब प्यार करो लेकिन आराम से अंदर डालना मैने बोहोत वक़्त से किया नही ऑर तुम्हारा है भी बोहोत बड़ा.

मैं: (हां मे सिर हिलाते हुए)ठीक है

उसने मेरे लंड को सेट करके उसको अपनी चूत के छेद पर रख दिया ऑर दूसरा हाथ धीरे से मेरी गान्ड पर रखकर दबा दिया अब लंड का टोपा ही उसकी चूत से छुआ था कि उसने एक आआहह भरी ऑर मेरे कान मे बोली धीरे से डालो जब रुकने को बोलूं तो रुक जाना. मैने थोड़ा ज़ोर लगाया तो लंड स्लिप होके उपर को चला गया उसने मेरे लंड को पकड़के फिर निशाने पर रखा ओर कहा अब लगाओ ज़ोर. मैने फिर एक कोशिश की इस बार लंड का टोपा अंदर चला गया ऑर उसने मुझे रोकने के लिए दूसरे हाथ से मेरे कंधे को दबा दिया. मैं कुछ देर के लिए रुक गया फिर कुछ देर बाद उसने फिर से ज़ोर लगाने का कहा तो मैने एक झटका मारा जिससे मेरा 1/4 लंड अंदर चला गया ऑर उसके मुँह से बस एक सस्स्सिईईईईईईईईईई रूको-रूको एक बार बाहर निकालो की आवाज़ निकली.

फ़िज़ा: नीर ये बहुत बड़ा ऑर मोटा है थोड़ा गीला कर लो नही तो मुझे दर्द होगा

मैं: ठीक है तुम कर दो गीला

 
kuch hi der me hum dono ek dusre ke honthon ko buri tarah chus or chaat rahe the wo mere honthon ko buri tarah chus rahi thi or unko kaat rahi thi kabhi wo mera nichla honth chusti or kaat leti kabhi upar wala honth chusti fir kaat leti. hum jis maze ki duniya me the usme na usse koi hosh tha na hi mujhe hum bas dono hi ek dusre me sama jana chahte the. mere dono hath uski peeth ki reed ki haddi ko sehla rahe the or uski gaanD lagatar mere lund ko masal rahi thi. achanak usne mere dono hath pakadkar apni chaatee par rakh diye or mere hatho ko apni chaatee par dabane lagi maine bhi uske thos or bade mummo ko thaam liya or unhe jor se dabane laga jisse uske munh se ek sssiiiiiiiiiiii ki awaaz hi nikal saki or wo fir mere honthon ko chusne lag gai mera hath bar-bar uski chaatee se rengta hua uski kamar tak jata or fir uske mote mummo ko tham leta achanak wo ruk gai or lagbhag mere lund par apni badi gaanD rakh kar baith gai or apni kameez or bra ko eksath upar kar diya or fir meri chaatee ke upar let gai uske nasuk or garam mamme jo har tarah se be-parda meri chaatee se chipke hue the unhone mujhe ek ajeeb sa maza diya ab main uske nange mummo ko daba raha tha or uski nangi kamar ko sehla raha tha usko nipple angoor ki tarah sakht ho chuke the jinhe jab maine pakda to ek aahhh uske munh se nikal gai or usne mere kaan ke pass munh lake kaha ki "inhe chuso Neer ab raha nahi jaa raha" maine thoda niche sarak kar uske ek mamme ko thaam liya or anguthe se uske nipple ko kuredne laga or andaze se uske mamme ka jayeza lene laga wo kaafi bade the lekin uske nipple chhote magar bohot sakht ho gaye the. uske mumma mere ek hath me poora nahi aa raha tha achanak usne mere sir ke baal pakad kar mere munh ko apne mamme par jor se daba diya or maine apna munh kholkar uske nipple ko apne munh me jane ka rasta de diya main kisi chhote bache ki tarah uske nipple ko chus raha tha or kaat raha tha wo lagatar munh se ajeeb se awaaze nikaal rahi thi. achanak usne apni kameez or bra dono ek sath poori taraf se utaar di lekin salwar abhi bhi usne pehni hui thi. main lagatar jor-jor se uske nipple ko chus or kaat raha tha or mere hath uski gaanD ki dono those pahadiyo ko bar-bar daba rahe the uska badan behad nazuk or mulayam tha. wo bas mere sir par hath fer rahi thi or mere mathe ko bar-bar chunm rahi thi.

Achanak mujhe yaad aaya ki main ek ladki ko baalo se pakadkar buri tarah jor-jor se choda karta tha or wo chillaya karti thi. dosto ye wo pehli yaad thi jo mujhe wapis mili thi wo bhi fiza ki wajah se. maine foran uski salwaar ko khol diya or fiza ko uske khule baalo se pakadkar niche patak diya or khud uske upar aa gaya. shayad mere ander ka sex ka janwar fir se jaag gaya tha isse pehle ki fiza kuch keh pati maine uski dono taange uthayi upar hawa me or apna munh uski chut se laga diya jo uske liye kisi jhatke se kam nahi tha uske munh se ek jordaar aaaaahhhhhh nikali or usne mere sir ko dono hatho se thaam liya or apni chut par daba diya main lagataaar uski chut ko chus raha tha or upar lage dane ko kaat raha tha or apni jeebh se chhed raha tha. usse behad maza aa raha tha jiski wajah se uski chut bohot jyaadaa paani chod rahi thi or mera poora munh uski chut se nikale paani se bheeg chuka tha fir bhi main lagatar uski chut ko chuse jaa raha tha achanak uski taangey akad gai or usne apni taango me mere munh ko dabakar apni gaanD hawa me utha li main saanse bhi nahi le paa raha tha fir bhi maine uski chut ko chusna jaari rakha. achanak uski gaanD ne upar ki taraf ek jhatka liya ab uski taange lag-bhag buri tarah kaamp rahi thi or kuch seconds ke baad wo dhadaam se niche gir gai or mere munh uski taango ki girft se azaad ho gaya. Ab wo bister par padi jor-jor se saans lene lagi main ab bhi uski chut ko chus raha tha lekin ab wo shaant ho gai thi achanak usne mere chehre ko apne dono hatho se thama or ishare se upar aane ko kaha main uske upar aa gaya or apne hath se apne munh par laga uski chut ka paani saaf karne laga to usne mera hath pakad liya or ek taraf kar diya or mere chehre ko fir se thaam kar mere honthon ko fir se chusna shuru kar diya ab lagbhag wo mera poora chehra chaat rahi thi. kuch hi der me wo fir se garam hone lagi or thodi der pehle niche jo harkat uski gaanD mere lund ke sath kar rahi thi ab wahi harkat uski chut ne mere lund ke sath karni shuru kar di thi wo bar-bar niche se apni gaanD uthakar mere lund par apni chut ke honth ragad rahi thi mujhe uski iss harkat se inteha maza mil raha tha maine fir se uske mummo ko thaam liya or chusna shuru kar diya ab wo bhi niche se jor-jor se apni chut ko mere lund par ragadne lagi shayad uski chut ab chudwane ke liye lund chahti thi. jane kitne waqt ki pyaasi chut thi ek baar jhadne se kaha shaant hone wali thi. main jab uske mamme ke nipple ko chusne or kaatne me laga tha to usne apna hath niche lejakar mere lund ko thaam liya or achanak uske munh se nikal gaya...itna badaaaaa usne dusra hath mere kandhe par rakh or mera chehra upar kiya or kaan me bola

Fiza: Neer ye itna bada or mota kaise ho gaya...dawayi lagate hue to kabhi itna bada nahi hua tha.

Main: pata nahi shayad aaj hum iss tarah sath hai isliye ho gaya hoga

Fiza: main chati hun tum apna ye mere ander daalo or mujhe khunb pyaar karo lekin araam se ander daalna maine bohot waqt se kiya nahi or tumhara hai bhi bohot bada.

Main: (haa me sir hilate hue)thik hai

usne mere lund ko set karke usko apni chut ki ched par rakh diya or dusra hath dheere se meri gaanD par rakhkar daba diya ab lund ka topa hi uski chut se chhua tha ki usne ek aaaahhhhh bhari or mere kaan me boli dheere se dalo jab rukne ko bolu to ruk jana. maine thoda jor lagaya to lund slip hoke upar ko chala gaya usne mere lund ko pakadke fir nishane par rakha or kaha ab lagao jor. maine fir ek koshish ki iss baar lund ka topa ander chala gaya or usne mujhe rokne ke liye dusre hath se mere kandhe ko daba diya. main kuch der ke liye ruk gaya fir kuch der baad usne fir se jor lagane ka kaha to maine ek jhatka mara jisse mera 1/4 lund ander chala gaya or uske munh se bas ek ssssiiiiiiiiiiii ruko-ruko ek baar bahar nikalo ki awaaz nikali.

Fiza: Neer ye bohot bada or mota hai thoda geela kar lo nahi to mujhe dard hoga

Main: thik hai tum kar do geela

 
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