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आज रहब येही आँगन

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आज रहब येही आँगन

“ए बबुआ, सीधे सीधे बैठे रहो। बियाह करवा रहे हैं तुम्हरा। कोई लूट नहीं हो रही है। अपनी बेटी दे रहे हैं, और साथ में भर भर कर आसीस। फूल सी बेटी है। तुम्हारा जीवन सवर जाएगा।” एक दबंग ने अपनी लाठी को अखिलेश के पीछे हलके से कोंचते हुए कहा। विवाह का मंडप अश्लील ठहाकों से भर गया।

और, विवाह की वेदी पर अखिलेश अपमान का घूँट पी कर बैठा रहा।

अभी अभी हुई मार की पीड़ा रह रह कर टीस दे रही थी। वो पीड़ा तो खैर सतही थी – असल में उसके सम्मान पर आघात हुआ था। उसकी संभ्रांतता का हरण हुआ था। इन दो कौड़ी के गुंडों ने मार मार कर उसको उनकी बात मानने को बेबस कर दिया था। उनकी जली कटी गालियाँ सुन कर उसके कानों में घंटे बज रहे थे। मरता क्या न करता? इसलिए बेमन से अपनी बलि-वेदी पर बैठा रहा। अपनी बुरी किस्मत को कोसता रहा। ईश्वर को दोष देता रहा, और साथ ही साथ इन दुष्टों के सपरिवार संहार के लिए अपने अभीष्ट से प्रार्थना करता रहा। उधर, पंडित जितनी जल्दी हो सके, मन्त्र पढ़े जा रहा था, रस्मे पूरी किए जा रहा था। ऐसे काम जितनी जल्दी समाप्त हो जाएँ। उतना ही अच्छा।

“....विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पतनीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे।“

‘विष्णु स्वरुप वर! हुँह! ऐसा विष्णु स्वरुप होता तो मुझे मार मार कर ऐसे भुरता बनाते? और उत्तरदायित्व मुझे क्यों दे रहे हैं? ये तो अपनी बला मेरे सर मढ़ रहे हैं..’

अखिलेश कुमार अपनी कम्पनी की तरफ से एक काम के सिलसिले में इस गाँव से होकर अक्सर गुजरता था। इस गाँव के कुछ लोगों से उसकी जान पहचान भी हो गई थी। कभी कभार चाय पानी के लिए यहाँ रुकता भी था। आज जब वो इधर आया तो जीप में सवार कुछ लोगो ने जब उससे पूछा कि ‘अखिलेश कुमार आप ही हैं?’ तो उसने ‘हाँ’ कहते हुए सोचा भी नहीं होगा कि उसके साथ ऐसा भी कुछ हो सकता है, और यह कि आज ही उसका ‘जबरिया बियाह’ भी हो जाएगा।

प्रतिज्ञा लेते हुए अखिलेश ने एक भी शदब नहीं बोला। जब बिन मन की, बिना इच्छा के विवाह हो रहा हो, तो इन सब बातों का मतलब ही क्या रह जाता है? उसके बगल डरी सहमी बैठी उसकी ‘पत्नी’, गायत्री को तो संभवतः इन मंत्रो का अर्थ भी नहीं मालूम था। वो बस यंत्रवत, जो भी कुछ उसको बोला जा रहा था, वो करती जा रही थी। कहने का मतलब यह कि इस शादी का शास्त्रवत कोई मतलब नहीं था; हाँ, सामाजिक महत्व अवश्य था। यह सब रस्में पूरी हो जाने के बाद, अखिलेश और गायत्री, पति-पत्नी कहलाएँगे।

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अपनी चार चार बेटियों का बियाह निबटाते निबटाते बाउजी का रोयाँ रोयाँ महाजन के कर्ज के शूल से ऐसा बिंधाया कि उसकी एक एक कील निकालने में बाउजी और भईया, दोनों ही समय से पहले ही ढेर उम्रदराज़ दिखने लगे। गायत्री के बियाह के बाद घर बाकी लोगों (अम्मा, भौजी और चम्पा – उनकी बेटी) का क्या होगा, यह सोच सोच कर दोनों रुग्ण भी रहने लगे।

गायत्री बेटियों की श्रृंखला में पांचवे नंबर पर हुई थी। खेती में कोई ख़ास बरकत नहीं थी, लेकिन फिर भी एक और पुत्र की चाह में एक के बाद एक बेटियाँ ही जानती चली गईं, अम्मा। और ये कमबख्त बेटियाँ भी न... उनको चाहे कुछ न भी खिलाओ और पिलाओ, लेकिन कम्बख्तें... न जाने कैसे कर्मनाशा की बाढ़ की जैसे उनकी देह में उफान आता ही जाता है। गायत्री भी सयानी होने से पहले ही जैसे बीस की दिखने लगी। लौकी की बेल जैसी बढती कन्या, जैसे पूरे गाँव के ह्रदय पर सांप की तरह लोट रही थी। अपना तो अपना, आस पास के सभी घरों में, या यह कह लीजिए, ग्राम्य-समझ के सभी ठेकेदारों को उसके बियाह की चिंता खाने लगी।

लेकिन उसका बियाह हो भी तो कैसे? मिथिला के जिस क्षेत्र में वो रहती है, वहां तो जैसे योग्य वर अपने भार बराबर सोने के की तौल का दहेज़ मांगते हैं! छोटी मोटी वस्तुओं की क्या बिसात है... दहेज़ में लगने वाले बर्तन बासत की मांग तो जैसे तैसे पूरी हो भी जायेगी, कपड़े लत्ते भी निकल जायेंगे एक-दो थान। लेकिन नगदी का क्या होगा? असली चोट तो उसी की लगती है! आज कल के लौंडे वो ऐसे हैं कि चाहे घर की छत पर छप्पर न हो, और कमाने में लूर न हो, फिर भी चालिस-पचास हज़ार तो गिनवा ही लेते हैं सिर्फ द्वार चार में ही। बाकी आवश्यकता के अनुरूप गहने जेवर, घर का जरूरी सर सामान, और बारात लाने और ले-जाने का खर्च अलग से गिनवा लेते हैं। यह सब कैसे होगा! अब तो गिरवी रखने को भी कुछ न बचा है। कहाँ से आएगा इतना द्रव्य? इस प्रश्न का उत्तर समाज के ठेकेदार न तो दे पा रहे थे, और न ही देना चाहते थे।

बात यही तक ही रह जाती तो भी ठीक था। लेकिन एक रोज़ अचानक ही भईया घर आए और बोले, “अम्मा, गायत्री को जल्दी से तैयार कर दो। आजे उसका बियाह हो जाएगा। बर आ रहा है कुछ ही देर में।”

“अरे बेटा, लेकिन ऐसे कैसे...”

“अम्मा, बहस न कर.. उसको जल्दी से तैयार कर। भोजन का बंदोबस्त करवा रहा हूँ।“

“लेकिन बेटा, उसको पहनने..”

“अरे जो मिले वो लपेट दे! और मेरा माथा न खा! जल्दी कर..” भैया ने डपट कर दहाड़ा। अम्मा सहम कर चुप हो गई और आज्ञानुसार गायत्री को तैयार करने चल दीं।

गायत्री का तो जी धक्क से हो गया। यह कैसी शादी? ऐसी अचानक? अभी तो कलेऊ तक तो बियाह का तो कोई जिकर ही नहीं था, फिर ऐसे कैसे? वो सहम गई। बेचारी का मन हुआ कि एक छोटी सी गौरैया बन कर फुर्र से कहीं दूर उड़ जाए और फिर किसी के भी हाथ न लगे। कम से कम इस समस्या से कुछ निदान तो मिलेगा! कुछ ही समय के लिए सही। लेकिन मिथिला की लड़की को विरोध में एक शब्द का उच्चारण करना तो क्या, विरोध की बात सोचना भी अवैध माना जाता है। वो तो बस एक मिट्टी की पोटली के जैसी होती है। घर के मर्दों का जहाँ मन कर दे, उसको वहां रख दें। और फिर, उस स्थान से उसका हिलना डुलना उसके लिए असंभव होता है। यदि आपने खूँटी से बांधना वाली कहावत सुनी है, तो उसका सर्वोच्च उदहारण यहाँ मिलता है।

तो गायत्री को भी विवाह मंडप पर बैठा दिया गया। मानो उसको बलि की वेदी पर बैठा दिया गया हो। उसके बैठते ही पंडित जी का ओम तोम शुरू हो गया। उसी हलचल में अचानक ही एक जीप के रुकने की आवाज़ आई। उस आवाज़ को सुनते ही भईया बोला, “लो... बर आई गवा। जल्दी से गीत नाद सुरु करो। जोन माई दाई हो, सबको बुला लो।”

परन्तु किसी को भी बुलाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। जीप के पीछे पीछे ही कुछ औरतें पैदल चलती आ रही थीं, और सोहर गाती जा रही थीं।

बागे जानी जइह ये दुलहा, बगईचा जनी हो जइह;

अरे लागल टिकोरवा ये दुलहा छोड़वले जनी हो जइह।

बागे हम जाइब ये सासु, बगईचा हम हो जइबो;

अरे लागल टिकोरवा ये सासु छोड़वले हम हो जइबो।

भौजी जब गायत्री को तैयार कर रही थीं, तो वो उनसे लिपट कर जार जार हो कर रोने लगी। उधर भईया दहाड़ मार कर चिल्ला रहा था,

“कइसे तैयार नहीं होगा सार! ओकरे खाल में भुस भर दूंगा। आज सारे को बियाह तो करे का ही पड़े।”

यह सुनते ही गायत्री के कोमल ह्रदय में कुछ चटक कर टूट सा गया। अन्जानी आशंकाओं से उसका दिल डूब गया। भौजी ने उसको अपनी ही एक साड़ी पहना दी। अभी समय ही कहाँ था? न तो कोई तैयारी। नए वस्त्र, खान पान.. किसी भी बात का बंदोबस्त नहीं हो सका। ब्याह की सब रस्में होते हुए गायत्री ने भौजी का हाथ ऐसे पकड़ा हुआ था जैसे वह अथाह समुद्र में डूब रही हो, और भौजी उसका एकमात्र सहारा हों। यदि भौजी चली गई, तो बस, वो अब डूबी कि तब डूबी।

एक दो ठाकुर लोग आपस में बतिया रहे थे।

“ई ससुरे आज कल के पढ़े लिखे लौंडे न जाने का सोचते हैं! हमको तो देखो, जो हमारे ससुरे ने दे दिए वो अपना सौभाग समझ कर अपने माथे से लगा लिया। लेकिन ई पढ़े लिखे लौंडे, साले सब दू तीन पुस्तकें रट कर फन्ने खां बन गए हैं। ई बताओ, अपने पढ़ने लिखने का दाम लड़की के माँ बाप से वसूलोगे का? पढाई लिखाई से मति भ्रम दूर होता है, या मति भ्रष्ट हो जाती है? कैसी उलटी गंगा बह रही है!”

इस उलटी गंगा को सीधा बहाने के लिए क्षेत्र के कुछ दबंगों ने ‘दहेज़ उन्मूलन अभियान’ चलाया था। दहेज़ का कितना उन्मूलन हुआ यह तो नहीं पता, लेकिन इस चक्कर में कुछ वर लोगों का उन्मूलन होते होते बचा, और साथ ही साथ एक कुरीति का भी जन्म हो गया – जबरिया बियाह!

अखिलेश कुमार दिल्ली की एक ताप विद्युत संयंत्र लगाने वाली संस्था में इंजिनियर था। अभी हाल ही में कम्पनी में काम करना शुरू किया था। लोक रीति कुछ मालूम नहीं थी। इसी पास के इलाके में उसकी कम्पनी एक नया संयंत्र लगाने जा रही थी, और उसी काम के सिलसिले में वो इस गाँव से होकर अक्सर गुजरता था। यह गाँव एक सीमान्त गाँव था, और उसके बाद एन बंजर भूमि शुरू हो जाती थी जहाँ यह संयंत्र लगने वाला था। इसलिए जल-पान और चाय पानी के लिए वह इस गाँव में अक्सर रुकता था, और इसी कारण से इस गाँव के कुछ लोगों से उसकी जान पहचान भी हो गई थी। पिछले छः महीने में यह आठवीं बार उसका दौरा था। सामान्य दिनों की भांति ही जब वो आज इधर आया तो, एक जीप में सवार कुछ लोगो ने जब उससे पूछा कि ‘अखिलेश कुमार आप ही हैं?’ तो उसने ‘हाँ’ कहते हुए उसने नहीं सोचा था कि उन लोगो के मन में क्या चल रहा है; उसने सोचा भी नहीं होगा कि उसके साथ ऐसा भी कुछ हो सकता है, और यह कि आज ही उसका ‘जबरिया बियाह’ भी हो जाएगा।

बियाह के बाद वधुएँ डोली में बैठ कर अपने ससुराल जाती हैं। लेकिन गायत्री वहीं कोहबर (वह कमरा, या स्थान जहाँ शादी-विवाह जैसे प्रयोजन होते हैं) में ही बैठी रही। जबरिया बियाह में क्या डोली? क्या विदाई? वहीं कोहबर में ही उसका बियाह हुआ, और यहीं पर लगता है, कि किरिया करम भी हो जायेगा। वैसे भी चन्दन, हल्दी, धूप, आटे, चावल और गेंदे की महक से उसको कुछ कुछ अंत्येष्टि जैसा ही महसूस हो रहा था। कुछ देर में अखिलेश कुमार को वहाँ पर लाया गया।

भौजी ने वर को कहा,

“बबुआ, जो हो गया, सो हो गया। यह सब बीती बातें हैं... आप तो बस आगे की सुध लीजिए। आपके दुःख को हम समझती हैं। लेकिन इन सब में हमारी बउनी का इसमें कोनो कसूर नहीं। आप इसको स्वीकार कर लीजिए। आपने इसको मांग में सेंदुर डाला है, आपकी अर्धांगिनी है ये। अब इसको स्त्री जात की मान मरजादा देना आपके हाथ में ही है। जो आप आज्ञा देंगे, ये वैसा करेगी।”

कहते हुए भौजी ने अखिलेश को प्रणाम किया, और उसको गायत्री के पास ही बैठा दिया और बाहर जाते हुए, दरवाज़ा बंद कर दिया। अपहरण के दुःख, मार-पिटाई के अपमान और जान से हाथ धोने की धमकियों से आहत अखिलेश का गुस्सा पहले से ही सातवें आसमान पर था। और अब ये देवी जी उसको भविष्य की सीख दे रही थीं! ऐसी जुर्रत इन हरामजादों की! दबंगों के सामने तो उसकी क्या चलनी थी? लेकिन एक अबला असहाय लड़की पर गुस्सा निकालना आसान था।

अखिलेश के लिए उस पीली साड़ी में लिपटी, गठरी बनी हुई लड़की का कोई महत्व नहीं था। उसके होने या न होने से उसको कोई फर्क नहीं पड़ता था। उसका ध्यान तो अपने भविष्य की तरफ था। उसके जीवन में पल भर में प्रलय आ गई थी। क्या कुछ सोच रखा था। इतनी अच्छी नौकरी थी। सोचा था कि कुछ समय में किसी सुन्दर सी, पढ़ी-लिखी, शहरी कन्या से शादी करेगा। और यहाँ ये धुर गंवार देहाती, न जाने कैसे उसके गले मढ़ दी गई।

गायत्री डरी सहमी, सर झुकाए बैठी हुई थी। अखिलेश के लिए उसके निकट बैठना गंवारा न रहा। वो तमतमा कर उठा, दो कदम चला, हठात रुका और फिर मुड़ कर अपने भीतर के सारे गुस्से को अपने पैर में एकाग्र कर के गायत्री के ऊपर चला दिया। गठरी बनी लड़की को कोई पूर्वानुमान भी नहीं था कि उसके साथ क्या होने वाला है। क्रोध भरी मार उसकी पसलियों पर आ कर पड़ी। अखिलेश का पाद प्रहार इतना बलशाली था कि गायत्री भहरा कर पीठ के बल गिर गई। उस आघात से वो इतना हदंग गई कि उसकी चीख तक भी नहीं निकली। ‘काटो खून नहीं’ वाली हालत चरितार्थ हो गई उसकी। वैसे, अखिलेश भी कोई पाषाण का नहीं बना हुआ था। आज तक उसने किसी स्त्री पर क्रोध नहीं किया था, उनसे ऊंचे स्वर में कभी बात भी नहीं किया था। किसी स्त्री को मारना तो बहुत दूर की बात है। उस लड़की की ऐसी दयनीय दशा देख कर वो भी घबरा गया। लेकिन फिर उसने लड़की को जैसे-तैसे सम्हलते हुए, उठते देखा। वो भूमि पर पड़ी रहती तो संभव था उसको वापस क्रोध न आता, लेकिन गायत्री को ऐसे उठता हुआ देखा कर न जाने क्यों उसके क्रोध का पारा वापस अपनी पराकाष्ठा पर उछल गया। उसने आव न देखा न ताव, और तमतमाते हुए पहले से ही सहमी गायत्री के चेहरे पर दो तीन झापड़ रसीद दिए। इस बार गायत्री की आँखों से मूक अश्रुओं की धारा निकल पड़ी।

वो अपने में ही सिमट कर वैसे ही चुपचाप हो कर सुबकने लगी। अखिलेश उससे दूर हो कर किसी कोने में बैठ गया और भविष्य के बारे में सोचने लगा। अभी तो उसकी बारे में किसी को फ़िक्र नहीं होगी, लेकिन एक दो दिन में उसकी ढूंढाई शुरु हो जाएगी। वो भी ठीक है। लेकिन ऐसी शर्मनाक बात वो सभी को बताएगा भी कैसे? इसी उधेड़बुन में रात बीत गई।

सवेरा होने पर उसने दरवाज़ा खुला हुआ पाया। इधर उधर जाने के लिए तो वो स्वतंत्र था, लेकिन गाँव को छोड़ कर जाना असंभव प्रतीत हो रहा था। दिन जैसे तैसे निकल गया। किसी ने उसको परेशान नहीं किया, और न ही किसी ने उससे बात करने की कोशिश भी करी। लेकिन रात आते ही फिर उसने खुद को उस लड़की के साथ उस कमरे में बंद पाया। इस बार वो पुनः क्रोधित हो गया। उसने गायत्री की गर्दन दबोच ली और एक राक्षस की भांति डकारा,

“क्यों रे रंडी। तेरे माँ बाप ने तुझे मेरे पास चुदने भेज दिया है? इतनी गर्मी है तुझमें कि इसको निकालने के लिए किसी भी राह चलते मर्द को उठा कर ले आओगी? और टाँगे खोल कर उसके सामने पसर जाओगी? हम्म? अगर यह तेरे दिमाग में है तो सुन ले रंडी, मैं कुतिया चोद दूंगा.. लेकिन तुझे.. तुझे तो सिर्फ मेरी मार मिलेगी। सिर्फ मार।”

कह कर उसने कुहनी से गायत्री को मार लगाई। मार-पीट तो संभवतः गायत्री बर्दाश्त भी कर लेती, लेकिन ऐसी गिरी हुई, नश्तर सी चुभती बात सुनना उसको पूरी तरह नागवार था। उसने नहीं कहा था किसी को कि उसकी शादी कर दे। न तो उसने खुद के पैदा होने के लिए किसी से विनती करी। ऐसी बुरी किस्मत कि जिन्होंने पैदा किया, उन्ही माँ बाप ने उसको अपने सर का बोझ मान लिया और उसको जैसे तैसे विदा करने के लिए ऐसा नीच काम कर डाला। तो इसमें उसका क्या दोष? उस पर ऐसी ओछी बात? मैं तो गंवार हूँ, लेकिन ये तो पढ़े लिखे हैं। ये ऐसी गन्दी बात कैसे कर सकते हैं? पिट कर वो वापस एक कोने में मूक रुदन करती रही। नींद तो आई ही नहीं।

अगली रात फिर वही क्रम। अगली रात क्या, फिर तो यह हर रात की बात हो गई। अखिलेश न कुछ कहता न बोलता, बस कमरे में एकांत पाते ही गायत्री को लतियाने, थप्पड़ लगाने, घूंसे मारने लगता। वो बेचारी तो वैसे ही दुःख की मारी थी। लेकिन पति की मार और घिनौनी गालियाँ उसको आत्मा पर लगती। जीवन पहले ही दुखमय था, लेकिन अब लगता है मृत्यु बेहतर है। मन ही मन वो अपने जीवन से मुक्त होने की कामना करने लगी।

पूरे दो सप्ताह तक वर वधू वहाँ रहे। पूरे चौदह दिवस। इन दिनों में दामाद की जितनी भी खातिरदारी, तवज्जो, और मान-सम्मान किया जा सकता है, उन लोगो ने अखिलेश का किया। हर रात भौजी गायत्री को सजा कर – उसकी आँखों में काजल डाल कर, गले में मंगलसूत्र पहना कर, नई साड़ी पहना कर कमरे में भेजती। और हर सुबह उसका बारीकी से निरीक्षण करती। और, हर सुबह गायत्री के चेहरे का रंग उड़ा हुआ सा रहता। उसके माथे पर से सिन्दूर की चटक मानो पूरे सर पर फैली रहती, आँखों का काजल अश्रुधारा में मिल कर गालों को काला किए रहता, और साड़ी में निर्मम सिलवट पड़ी रहती।

भौजी ने आरम्भ में समझा कि नव विवाहित वर-वधू जैसे रमण करते हैं, वही हो रहा होगा। लेकिन बाद में जब उन्होंने गौर किया तो गायत्री का चेहरा किसी खँडहर समान वीरान, सूनसान दिखाई देता। उसको नव विवाहिता होने की न तो कोई प्रसन्नता दिखाई देती, और न ही सम्भोग समागम करने की किसी प्रकार की लज्जा ही दिखती। भौजी को शंका हुई। उन्होंने एक रात कमरे के दरवाज़े पर कान लगा कर सुना। उनकी शंका सही साबित हुई। उन्होंने अम्मा और बाउजी को यह बात बताई। लेकिन उन दोनों ने तो जैसे अपने दोनों हाथ झाड़ कर खुद को एक किनारे कर लिया,

“बिटिया, हम लोग तो बस जनम दिए हैं। अपना अपना भाग्य तो सब ऊपर से ही लिखवा कर धरती पर आते हैं। अब गायत्री के करम में अइसा ही बदा है, तो हम का करें? इस समाज में बिन ब्याही बेटी कैसे रह सकती है। बताओ न पतोहू!”

भौजी का ह्रदय हुआ की उसी समय उन पर बरस पड़ें। ऐसी फूल सी बेटी और उसके संग ऐसा कुकर्म! हाँ कुकर्म। न केवल उन दोनों ने, बल्कि अब उसका पति भी। उस बच्ची का क्या दोष? यह सब बातें भौजी बोल देतीं, लेकिन सदा शांत रहने वाली भौजी आज अपनी मरयादा छोड़ नहीं सकीं। बस, भीतर ही भीतर सुलगती, कुढती रहीं।

‘हा नारी का भाग! तुलसीदास जी ठीकै कह गए।। नारी सचमुच नरक का द्वार है। इसीलिए वो ऐसे पुरुषों को जनम देती है। ऐसे ही पुरुष नारी का मान-हरण करते हैं... प्रकृति का सत्यानाश करते हैं..’

खैर, बारहवें दिवस अखिलेश ने दृढ़तापूर्वक कहा,

“मेरा दिल्ली जाना अत्यंत आवश्यक है। वैसे भी मेरी खोज के लिए कंपनी ने पुलिस में इत्तला कर ही दी होगी। देर सवेर इस गाँव में दबिश होगी ही होगी। आप लोग बच नहीं पाओगे। इसलिए उचित यही है कि सम्मानपूर्वक मुझे जाने दो। जो हुआ सो हुआ। मैं किसी से कोई बैर नहीं करना चाहता। इसलिए मैं पुलिस से किसी भी तरह की शिकायत भी नहीं करूँगा। लेकिन बस इतना ही। इससे अधिक रियायत नहीं मिलेगी आपको। आपने जो अपराध किया है, उसका दंड तो मिलेगा ही। भगवान तो सब देखते हैं।”

गायत्री के बाउजी अखिलेश की यह बात सुन कर उसके सम्मुख लगभग दंडवत ही लेट गए,

“बबुआ, पाप तो हुआ है हमसे। इसकी माफ़ी किस मुँह से मांगू। तुम पढ़े लिखे हो। समझदार हो। जो दंड देना है, दे लेना। हमको स्वीकार है। लेकिन हमारी बिटिया का मान रख लो। इसको अपने साथ ले जाओ। एक लौंडी बन कर तुम्हारी सेवा करेगी। जो दोगे खा लेगी, जो दोगे पहन लेगी। बस, इसको साथ ले जाओ। और अपनी कृपा छाया में रखना।”

विदाई के लिए जो भी सर सामान लदाया था, वो सब अखिलेश ने घृणापूर्वक उतरवा दिया। ससुराल का एक फूटा हुआ धेला तक भी उसने नहीं लिया। उसके लिए एक सूट बड़े शौक से सिलवाया गया था, लेकिन उसने वो भी स्वीकारने से मना कर दिया। विदाई के समय, वो अपनी जीन्स पहन कर ही गया। गाँव से उसके साथ बस गायत्री ही गई।

बाउजी की धुकधुकी बंधी हुई थी, ‘न जाने बिटिया का क्या होगा। हे परभू, ये कैसा अधम कर दिया मैंने।’

लेकिन तीर तो धनुष को कब का छोड़ चुका। विवाह एक सामाजिक सरोकार है, परन्तु फिर भी स्त्री का ही दाना पानी है, जो उसके अपने ही घर से उठ जाता है। वो दूसरे के घर जाती है, उसका घर अपना मान कर सम्हालती है, एक कुटुंब बनाती है। ऐसे ही एक एक कुटुंब कर के ही तो समाज बनता है। फिर भी, समाज में स्त्री की दशा निम्न से निम्नतर ही ठहरी। जहाँ दहेज़ एक कुरीति है, वहीं जबरिया विवाह भी है। ऐसी कुरीतियाँ स्त्री की पहले से ही दयनीय दशा को और भी अधिक दयनीय बनाती जा रही हैं।

बाउजी अब पूरी तरह से अखिलेश की ही दया माया पर निर्भर थे। उनकी बिटिया अब इस बबुआ की ब्याहता है। अब वो ही उसके दाना पानी का जुगाड़ करेंगे, और सर पर छांह भी देंगे। एक बार मन में आया कि चल कर, बाहर से ही सही, बिटिया का ‘घर’ तो देख लें। लेकिन दामाद के चेहरे पर स्पष्ट घृणा और क्रोध को देख कर उनकी न तो हिम्मत ही हुई, और न ही उन्होंने अपने बेटे को हिम्मत करने दी। पता तो खैर लिखा ही हुआ है। मामला एक बार ठंडा हो जाय, तो एक बार देख लेंगे सोच कर मन को मना लिया।

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रास्ते में अखिलेश का मन हुआ कि इस छोकरी को ट्रेन से नीचे धकेल दे और किसी को कानो कान खबर भी नहीं होगी। लेकिन हत्या जैसा घिनौना कृत्य वो कर नहीं सकता था। न जाने कैसे पिछले दिनों की अप्रत्याशित घटनाओं से उसके अन्दर का राक्षस बाहर निकल आया। इस लड़की से वो आँख से आँख नहीं मिला सकता था। इतनी लज्जा तो थी अन्दर। लेकिन आँखों से आँख मिलाना तो दूर, उसको तो पता भी नहीं कि यह लड़की कैसी दिखती है। और इसका नाम क्या बताया था? ‘जाह्नवी’? नहीं, बहुत मुश्किल सा नाम है.. ये गंवार ऐसा नाम नहीं रख सकते.. कोई तीन अक्षर का नाम था। अब ध्यान ही नहीं आ रहा था। लेकिन इसको पूछे भी तो कैसे? छोड़ो! बाद में देखते हैं। कम से कम उस कैद-खाने से छूट तो मिली।

ट्रेन सवेरे ही दिल्ली पहुँच गई और वहां से दोनों अखिलेश के घर गए। पूरी यात्रा के दौरान गायत्री ने कुछ खाया नहीं था। वैसे भी उसने शादी के बाद से कुछ ख़ास खाया पिया नहीं था, सिवाय लात मार के। एक समय था कि उसके गालों पर यौवन की लालिमा थी, होंठों पर मुस्कान और ह्रदय में एक अबोध प्रेम! इस बियाह ने यह सब उससे छीन लिया था। अब वो बुत मात्र रह गई थी। लेकिन उसने एक बात तो महसूस करी और वह यह कि उसका पति यात्रा-पर्यंत बहुत शांत था। उन्होंने उसके लिए खाना भी खरीदा था.. वो अलग बात है की उन्होंने उससे कुछ कहा नहीं। और बिना पति की आज्ञा के वो कैसे खा ले?

घर? वो घर देख कर उसकी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं। घर ऐसे होते हैं? उसने तो बस गाँव देहात के घर देखे थे; लेकिन यह तो..! और एक जन के लिए दो कमरे? अलग से रसोई! दो दो शौचालय.. और यह एक खुला हुआ बड़ा सा कमरा! वो भौंचक सी, घूँघट की ओट से यह विचित्र नज़ारा देख रही थी। पति ने अभी भी उससे कोई बात नहीं करी; और तैयार होने शौचालय में चले गए। अखिलेश को यह ध्यान नहीं था कि जो बातें उसके लिए साधारण हैं, वही बातें इस लड़की के लिए आश्चर्य हैं.. उसको गुसलखाने का प्रयोग नहीं पता, रसोई का प्रयोग नहीं पता, गैस सिलेंडर का नहीं पता.. इत्यादि इत्यादि। वैसे उसको कोई आवश्यकता भी नहीं थी, क्योंकि उसने एक काम करने वाली बाई लगा रखी थी और ऑफिस को जाते जाते उसने बाई को कहला भेजा कि आज घर की साफ़ सफाई होनी है, और खाना भी पकना है। लेकिन अपने दंभ में लड़की से भी कुछ नहीं कहा। खैर, वो सोच में डूबा हुआ ही अपने ऑफिस पहुंचा।

“किधर थे बेटा अखिलेश,” उसके बॉस ने पूछा, “मैंने कितनी कोशिश करी तुमसे कांटेक्ट करने की! पुलिस में रिपोर्ट भी लिखवाई। तुम कहाँ रह गए थे?”

“सर.. बहुत लम्बी कहानी है.. थोड़ा बैठ कर बात कर सकते हैं.. किसी प्राइवेट जगह पर?”

“हाँ हाँ.. बिलकुल।“

एक मीटिंग रूम में बैठ कर अखिलेश में बॉस के सर पर बम फोड़ा, “सर, मेरी शादी हो गई है..”

“क्या! अरे कोंग्रेचूलेशंस! अरे भई! ऐसे.. छुपा छुपा कर!”

“सर वो बात नहीं है.. आप पूरी बात तो सुन लीजिए,” कह कर अखिलेश देर तक सारी बात सविस्तार बताने लगा। बात जैसे जैसे आगे बढती जाती, उसके बॉस के माथे पर बल की रेखाएं और गहरी होती जा रही थीं।

“तो अब तुम क्या करना चाहते हो?”

“पता नहीं सर! मेरी तो लाइफ ही खराब हो गई।“ उसकी आँखों से आंसू गिर गए। इतने दिनों का दुःख और अवसाद अब आंसूं बन कर उसके मन से बाहर निकल रहा था। “सोच रहा हूँ, कि पुलिस में शिकायत कर देता हूँ.. किडनैपिंग का केस, और जबरिया शादी करने का केस तो कर ही सकते हैं।“

“हम्म.. और उससे क्या होगा?”

“जेल में सड़ेंगे साले।“ उसका गुस्सा निकल पड़ा, “उनको पता तो चले कि अपराध करने का दंड मिलता है।“

“दंड तो मिल ही गया है उनको... तुम.. क्या नाम बताया तुमने लड़की का?”

“जी.. नहीं बताया..”

“एक्साक्ट्ली! तुमको मालूम भी नहीं उसका नाम। तुमने उनके सर से बोझ नहीं हटाया, और बढ़ा दिया है।“

“सर, आप ये क्या कह रहे हैं?”

“बेटा, एक बात बताओ.. तुमने उस बच्ची को मारा पीटा तो नहीं?”

“जी?” अखिलेश अचानक ही असहज महसूस करने लगा।

“देखो बेटा, तुम्हारे साथ तो नाइंसाफी हुई है.. इसमें कोई डाउट नहीं है। लेकिन उस बच्ची के साथ ही कौन सी इंसाफी हो गई? जिस आदमी को न कभी देखा, न कभी सुना, उसके सर मढ़ दी गई। और अब वो इस अथाह संसार में बिलकुल अकेली, सिर्फ तुम्हारे सहारे है। अब यह तुम पर है कि तुम इसको नाइंसाफी नाइंसाफी बोल कर अपने लिए लोगो की सिम्पथी बटोरो, या फिर इस घटना को एक अपरचुनिटी के जैसे लो और एक साथ दो लोगों की ज़िन्दगी संवार लो – एक अपनी, और एक उस बच्ची की! समझ रहे हो न?”

अखिलेश चुप चाप बॉस की बातें सुनता रहा। बहुत गहरी बात थी। लेकिन उसको बात समझ आ रही थी कि वो क्या कहना चाहते हैं। जब उसने कुछ नहीं बोला तो बॉस ने कहा,

“तुम दो हफ्ते ही छुट्टी ले लो। उस बच्चे के साथ समय बिताओ। तुमको इस महीने की पूरी सैलरी मिलेगी, और साथ ही बोनस भी। कल शाम को एक पार्टी भी करते हैं। लोगो की शादियाँ रोज़ रोज़ नहीं हुआ करतीं! आल द बेस्ट बच्चे! भगवान् तुम दोनों को ही खुश रखें! अब जाओ! घर जाओ..”

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“अरे! भैया, आप आ गए! ये क्या बात हुई! मैं तो सोने की बालियाँ लूंगी नग में! कैसी सुन्दर सी भाभी लाये हैं! एकदम फूल सी.. एकदम परी! और कितनी गुणी! आज खाना उन्होंने ही पकाया है। बहुत कम बोलती हैं, लेकिन कितना मीठा बोलती हैं! मेरा तो जाने का मन ही नहीं हो रहा है.. लेकिन मैं कबाब में हड्डी नहीं बनूंगी! आप लोग बात कीजिए, खाना खाइए, मैं आती हूँ शाम को। कुछ मंगाना है बाज़ार से तो फोन कर लीजियेगा!”

कामवाली बाई बिना किसी रोक टोक दनादन बोलती चली जा रही थी। उसकी हर बात अखिलेश के ह्रदय को बींधती जा रही थी!

‘मैं सचमुच कितना स्वार्थी हूँ। सिर्फ अपने बारे में ही सोचता रहा। और कितना नीच भी हूँ जो एक लड़की पर हाथ उठाया, उसको गन्दी गन्दी गालियाँ दीं.. उस लड़की को, जो मेरी शरण में आई थी, जिसकी सुरक्षा करना, ख़याल रखना मेरा धार्मिक उत्तरदायित्व है। हे प्रभु! मुझे क्षमा करें! अब ऐसी गलती नहीं होगी। मेरे पाप का जो दंड आप देना चाहें, मुझे मंज़ूर है। लेकिन इसको खुश रखें!’

अखिलेश की आँखों से आंसू झरने लगे। सावित्री सर झुकाए खड़ी थी, और अंगूठे से फर्श को कुरेद रही थी। अचानक ही उसने अखिलेश का हाथ और चेहरा अपने पांव पर महसूस किया। अपने पति को ऐसा कलंकित काम करते देख कर वो घबरा गई और बोली,

“अरे! आप यह क्या कर रहे हैं!”

अखिलेश को लगा कि जैसे घुंघुरू की मीठी झंकार बज गई हो.. ऐसी रसीली और खनकदार आवाज़!

“माफ़ कर दो मुझे! मैं पापी हूँ।“

“नहीं नहीं! आप मेरे पैर मत पकड़िए। आपने कुछ भी गलत नहीं किया। अम्मा बाउजी ने ही जबदस्ती कर दी। मेरे पैर पकड़ कर आप और दंड न दीजिए। मैं आपकी दासी बन कर रहूंगी।“

“नहीं दासी नहीं! पत्नी दासी नहीं होती। पत्नी अर्धांगिनी होती है। मेरा सब कुछ, तुम्हारा है। तुम इस घर की स्वामिनी हो।“

“जी?”

“हाँ! तुमको जैसा ठीक लगे, यह घर चलाओ..”

“लेकिन..”

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं.. ये मेरा तुमको पहला और अंतिम आदेश है। बस!”

सावित्री मुस्कुराई।

“अपना नाम बताओगी?”

“सावित्री!”

“और मैं अखिलेश हूँ।“ उसने हाथ आगे बढ़ाया, “नाईस टू मीट यू!”

“जी?” सावित्री का हाथ भी उसका बढ़ा हुआ हाथ मिलाने के लिए स्वतः ही बढ़ गया।

“तुमसे मिल कर अच्छा लगा मुझे!” सावित्री मुस्कुराई। अखिलेश की इस एक बात से उसके ह्रदय का सारा बोझ जैसे उतर गया।

“उम्मीद है, तुम मेरे साथ साथ बूढ़ी होना पसंद करोगी!”

उसके गले से एक श्लील हंसी छूट गई, ‘कैसी मजाकिया बात करते हैं ये!’

“आप खाना खा लीजिए”

“आपके साथ!”

“मैं आपके बाद...”

“आपके साथ!”

“जी!”

“और एक बात.. मेरे सामने भी आप घूंघट काढ़ के रहेंगी?”

“जी?”

“मुझे आपको देखना है।“

“मैं तो आपकी ही हूँ...”

“तो फिर..?”

“मेरा घूंघट तो मैं भी नहीं हटा सकती। वो सिर्फ आप कर सकते हैं।“

अखिलेश ने बढ़ कर सावित्री का घूंघट हटा दिया। ऐसी रूपवती लड़की को देख कर उसको चक्कर आते आते बचा।

‘कैसी किस्मत!’

“खाना खा लें? आपने तो कल खाया भी नहीं था।“

‘मतलब उन्होंने ध्यान दिया है..’

“आइए, मैं परोस देती हूँ।“

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खाने के बाद कमरे में जा कर देखा तो ऐसी सुन्दर व्यवस्था देख कर वो अचंभित रह गया! उसे उम्मीद ही नहीं थी कि उसके पास जितने सामान थे, उससे घर को इतना सुन्दर सजाया जा सकता है।

“मेरी दो हफ्ते की छुट्टी है।“ अखिलेश ने अपनी शर्ट के बटन खोलते हुए कहा, “हनीमून के लिए! हनीमून जानती हो किसको कहते हैं?”

“जी नहीं!”

“इधर आओ।“

सावित्री छोटे डग भरती अखिलेश के पास आ गई। उसने सावित्री को अपने आलिंगन में भर कर उसका गाल चूम लिया। फिर होंठ। और फिर उसकी गर्दन। फिर धीरे धीरे उसकी ब्लाउज के बटन खोलते हुए उसने कहा,

“अभी जो हम करने वाले हैं, उसको कहते हैं!”

जो कोमल भावनाएँ सावित्री ने कभी जवान होते हुए अपने मन में जन्मी थीं, वही भावनाएँ उसके मन में पुनः जागृत होने लगीं। पुरुष का स्पर्श कैसा होता है, उसकी तो बस वह कल्पना कर सकती थी, लेकिन उसके पति का स्पर्श इतना प्रेम भरा, इतना कोमल लेकिन इतना आश्वस्त करने वाला था कि उसने तुरंत ही अपने पति के सम्मुख आत्म-समर्पण कर दिया। जब उसने अपने पति का चेहरा अपने स्तनों के बीच पहली बार महसूस किया, तो उसने मन ही मन सोचा, ‘अब सब ठीक होय जाई..’

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end
 
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