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आदमी हु आदमी से प्यार करता हु

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अब जब भी हल्का सा ब्रेक लगता, मेरी उंगलियाँ उसके लंड के ऊपर जाकर उसके डंडे को पकड़ लेती. उसकी वासना बढ़ने लगी और उसकी जांघें थोड़ा खुल गई और कमर मेरी तरफ पीछे झुकने लगी.जैसे-जैसे उसके लंड का तनाव पूरा होता गया उसकी जांघें और चौड़ी होकर मेरे पूरे हाथ को उसके लंड पर ले जाने लगीं.मैंने हाथ हटाना चाहा तो वो बोला- क्या हुआ? पकड़ ले ना डंडा… तुझे गिरने नहीं देगा ये!मैंने कहा- भैया, आप गलत मत समझना लेकिन मेरे मन में अब ऐसा कुछ नहीं है.वो बोला- कोई बात नहीं… मैं कौन सा अपना लंड तुझे मुंह में लेने को कह रहा हूँ. जब तक बाइक पर बैठा है तब तक तो आराम से पकड़ ले.

अनजान रास्ता और अनजान शहर होने के कारण मेरे पास कोई और चारा नहीं था. और रात भी होने लगी थी इसलिए ना चाहते हुए भी मुझे उसका तना हुआ लंड उसकी पैंट के ऊपर पकड़ना पड़ा.उसके खड़े लंड को मेरे नर्म हाथों ने पूरी तरह कवर कर लिया और उसके मुंह से कामुक सिसकारियाँ निकलने लगीं, वो बोला- हाय रै लड़के… तू तो छोरी तै भी फालतू सुवाद दे देगा… (हाय रे लड़के… तू तो लड़की से भी ज्यादा मज़ा दे देगा)कह कर वो बाइक पर थोड़ा आगे पीछे होने लगा जिससे मेरा हाथ उसके लंड पर रगड़ मारने लगा.

मैंने पूछा- कितनी दूर है अभी रवि का गांव?तो वो बोला- बस दस मिनट में पहुंच जाएंगे, तू अपना काम करता रह!रात का अंधेरा घिर आया था और रोड पर वाहनों की लाइटें जलनें लगी थीं, मेरा मन थोड़ा घबरा रहा था लेकिन सोचा कि दस मिनट की ही तो बात है, एक बार रवि के पास पहुंच जाऊँ, फिर सब ठीक हो जाएगा.बाइक अंधेरी सड़क पर दौड़ती जा रही थी और संदीप के लंड में तूफान उछाले मार रहा था. तभी मेरी नज़र सामने के ग्रीन साइन बोर्ड पर पड़ी जिस पर लिखा था ‘जाखोद खेड़ा- 10 किलोमीटर और साथ में एक और नाम था नेवली खुर्द- 5 किलोमीटर’साइन बोर्ड देखकर मेरी जान में जान आई, मैंने सोचा कि हम पहुंचने वाले हैं. और मैं खुश हो गया.

मैंने पूछा- संदीप भैया, हम पहुंचने वाले हैं न?संदीप ने कोई जवाब नहीं दिया, मैंने सोचा शायद हवा के शोर में उनको सुनाई नहीं दिया.

मैंने उसके लंड को पकड़ कर रगड़ना जारी रखा और लगभग 2 किलोमीटर के बाद बाइक ने सीधे जाखोद खेड़ा का रोड छोड़कर दाहिने हाथ की तरफ नेवली खुर्द गांव की तरफ कट मार दिया और हम रात के अंधेरे में सुनसान गांव की तरफ अंधेरे में गुम हो गए.

रात हो चुकी थी और बाइक पर चलते हुए संदीप ने अपना खड़ा लंड मेरे हाथ में दिया हुआ था. अचानक रोड पर लगे जाखोद खेड़ा गांव का साइन बोर्ड देखकर मैंने सोचा हम पहुंचने वाले हैं और मैं खुश हो गया.मैंने पूछा- संदीप भैया हम पहुंचने वाले हैं न?संदीप ने कोई जवाब नहीं दिया, मैंने सोचा शायद हवा के शोर में उनको सुनाई नहीं दिया.

मैंने उसके लंड को पकड़ कर रगड़ना जारी रखा और लगभग 2 किलोमीटर के बाद बाइक ने सीधे जाखोद खेड़ा का रोड छोड़कर दाहिने हाथ की तरफ नेवली खुर्द गांव की तरफ कट मार दिया और हम रात के अंधेरे में सुनसान गांव की तरफ अंधेरे में गुम हो गए.

कुछ देर चलने के बाद दूर दराज कुछ लाइटें जलतीं दिख रही थीं. मैंने पूछा- संदीप भैया हम पहुंचने वाले हैं क्या?वो गुस्से में बोला- साले चैन नहीं है तुझे…लंड लेने की ज्यादा ही जल्दी पड़ी है क्या… तुझसे बोला था ना आराम से बैठा रह!मैं घबरा गया… संदीप के तेवर बदले-बदले से लग रहे थे.

रवि के गांव का मेन रोड छोड़कर हम किस रास्ते पर जा रहे थे मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था. लिहाज़ा मैं चुपचाप उसके पीछे बैठा रहा. मैंने सोचा, शायद किसी गांव से कोई शॉर्ट कट होगा, यही सोचकर मैं मन को तसल्ली दे रहा था.लेकिन जो गांव दूर दिखाई दे रहा था उससे पहले ही संदीप ने वीराने में एक कच्ची रेतीली पगडंडी पर बाइक खेतों की तरफ मोड़ दी. मेरा शक गहराने लगा… लेकिन करता भी तो क्या, घबरा कर चुपचाप बैठा रहा, मेरा हाथ उसके लंड से हटने लगा.

मेरा ध्यान अब उसके लंड पर नहीं लग रहा था…वो फिर गुस्से में बोला- साली रंडी, मन भर गया क्या तेरा मेरा लंड पकड़ते-पकड़ते? नखरे मत कर और चुपचाप मेरी पैंट की चेन खोल!मैंने कुछ ना बोलते हुए चलती बाइक पर उसकी पैंट की जिप खोल दी.वो बोला- हाथ अंदर डाल!

मैंने हाथ अंदर डाला तो लंड से निकल रहा प्री कम उसके अंडरवियर को गीला कर चुका था.वो बोला- लंड को बाहर निकाल ले!मैंने चलती बाइक पर उसके लंड को अंडरवियर के कट से बड़ी मुश्किल से निकालते हुए उसकी चेन के बाहर लाकर आजा़द कर दिया. उसके 9 इंच लौड़े का टोपा प्रीकम से सना हुआ था और लंड उसकी पैंट के जिप के बीच से निकल कर किसी मोटे सांप की तरफ आसामान की तरफ सलामी दे रहा था.

वह थोड़ा सा पीछे की तरफ झुका और अपने बाएं हाथ को मेरी गर्दन पर लपेटते हुए मेरी गर्दन को आगे खींचते हुए अपनी जिप के बीच में ले जाकर मेरे होठों में अपना लंड फंसा दिया. उसकी आह निकल गई और बाइक का बैलेंस बिगड़ने लगा. उसने एकदम से ब्रेक लगाए और उसका मोटा लौड़ा मेरे गले में जा फंसा. उसने बैठे-बैठे ही मेरी गर्दन दबोचे हुए मेरा मुंह अपने लंड पर ऊपर नीचे धकेलना शुरू कर दिया.

उसकी हवस इतनी बढ़ गई थी मानो वह कह रहा हो कि मैं आज तुझे अपना लंड खिला ही दूंगा. वो मेरे मुंह को वहीं बाइक पर बैठे-बैठे चोदने लगा. मेरी गर्दन उसकी बगल में फंसी हुई थी और लंड मुंह में फंसा हुआ था. मेरी छुड़ाने और शोर मचाने की हर कोशिश नाकाम ही साबित होती.वो ‘आह.. आह…’ की आवाजें करता हुआ अपना लंड मेरे गले में पेल रहा था. मेरा दम घुटने लगा और गर्दन में दर्द भी हो रहा था.

फिर उसने अचानक मेरी गर्दन पर से अपनी पकड़ ढीली कर दी और बोला- साले तू लड़की होता तुझे इतना चोदता… इतना चोदता कि हर महीने तेरे पेट से बच्चा बाहर निकलता!कह कर उसने मुझे पीछे कर दिया और फिर से बाइक आगे कच्चे रास्ते पर दौड़ा दी. उसका लंड अभी भी उसकी पैंट में ही तना हुआ बाहर निकला हुआ था और बाइक एक कोठरी की तरफ बढ़ रही थी जिसके अंदर एक धीमी सी रोशनी थी.

 
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देखते ही देखते कोठरी के पास जाकर बाइक रुक गई. उसने कहा- नीचे उतर!मैं बाइक से नीचे उतर गया.अगले ही पल वो भी टांग घुमाता हुआ बाइक से नीचे था और उसकी जिप के बीच में से उसके काले से मोटे सांप जैसे लंड का तना हुआ डंडा चांद की चांदनी में बाइक की टंकी से से टकरा रहा था.

वो बोला- चल अंदर!वो मेरा हाथ पकड़कर कोठरी के अंदर ले गया.अंदर जाकर मैं सहम गया. कोठरी के इंटों के बने फर्श पर दरी बिछी हुई थी और उस पर दो जवान, उसी की उम्र के लड़के बैठे हुए थे, उनके आस पास चिप्स के पैकेट बिखरे पड़े थे और उनके सामने दारु से भरे हुए प्लास्टिक के गिलास रखे हुए थे, साथ में खाने पीने का और भी सामान था.

उन्होंने अपनी शर्ट निकालकर एक तरफ रखी हुई थी और दोनों ने ही नीचे लोअर पहनी हुई थी. उनकी छाती नंगी थी और फर्श पर रखे टेबल फैन से आ रही हवा के लगने के बाद भी पसीने से लथपथ हो रही थी. पसीने की बहती हुई धारें उनकी छाती से शुरु होकर उनके पेट से होते हुए नीचे लोअर की इलास्टिक को भिगा रहे थे.

जैसे ही उन्होंने संदीप को देखा, वे मुस्कुराए और तीनों आपस में एक-दूसरे को देखकर हंसने लगे.

मैं असमंजस में उन तीनों की तरफ देख रहा था.

फिर उन्होंने संदीप की पैंट में से निकले लंड को देखा, जो अब तक आधा सो चुका था और केले की तरह नीचे फर्श की ओर लटक रहा था. बल्ब की रोशनी में आधा सोया हुआ लंड भी काफी मोटा और जबरदस्त लग रहा था जिसको चूत में लेने के लिए कोई भी लड़की तैयार हो जाए… इतना सेक्सी लंड कभी कभी देखने को मिलता है.

उसके लंड को देखकर वो दोनों हंस पड़े और बोले- संदीप, लागै है तन्नै तो अपनी तोप के गोले पहले ही इसकी गांड में छोड दिए…(लगता है तूने तो पहले अपनी तोप के गोले इसकी गांड में छोड़ दिए)उनकी बात सुनकर संदीप भी हंस पड़ा और बोला- ना यार… इब्बै तो बस मुंह मैं दिया था…(अभी तो बस मुंह में दिया था)

उनकी ये बातें सुनकर मेरी समझ में सारी कहानी आ गई कि ये सब पहले से ही प्लान किया हुआ था. लगता है संदीप ने इन दोनों को भी मुझे अपने लंड चुसवाने के लिए पहले ही बुलाया हुआ है। मैंने सोचा- सोनू, अब तो तू भगवान भरोसे है… रात को ना तो कोई साधन है और ना दूर-दूर तक कोई आदमी…

संदीप जाकर उनके पास बैठ गया और उसने भी अपनी शर्ट निकाल दी और बनियान भी… संदीप का बदन बनावट में उन दोनों से दोगुना भारी था… उसकी छाती उठी हुई और डोले भी काफी मोटे और मजबूत थे. उसने अपनी बनियान भी निकालकर एक तरफ रख दी उसकी जिप अभी भी खुली हुई थी लेकिन बैठने की वजह से लंड अंदर चला गया था.

उसने मेरी तरफ देखा…और बोला- क्यों बेटा, कैसा लगा सरप्राइज़? खुश हो जा अब तू और हम तीनों को भी खुश कर दे.मैं अपनी बदकिस्मती को कोस रहा था कि गांडू को सब चोदने के सिवा किसी और काम का नहीं समझते. ना ही उसका कोई अपना होता है और ना ही पराया!लेकिन फिर भी मैंने बनावटी मुस्कुराहट देते हुए कहा- भैया, आपने तो कहा था आप रवि के पास ले जाओगे… ये कौन सा गांव है फिर?

संदीप बोला- ये तेरी भाभी यानि कि मेरी गर्लफ्रेंड का ससुराल है, जिसको तू बस में मेरी बीवी समझ रहा था. उसको भी मैंने इसी कोठरी में ला ला कर कई बार चोदा है, वो मेरे लंड की दीवानी है और अपने पति को छोड़कर मेरी रातें रंगीन करती है. जैसे तू मेरे लंड का दीवाना है… है न?मैंने कहा- हाँ भैया, लंड तो आपका बड़ा गज़ब का है, कोई भी लड़की आपसे चुदने के लिए तैयार हो जाएगी.

मेरी बात को बीच में ही काटते हुए वो बोला- तो दूर क्यों खड़ा है आकर ले ले ना मुंह में!यह कह कर वो तीनों हंसने लगे.

मैंने सोचा अब तो फंस गया सोनू… आज तेरी गांड की शामत आने वाली है.संदीप ने एक हाथ से मेरा कॉलर पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया, मैं चूतडो़ं के बल धड़ाम से ज़मीन पर जा बैठा. उसकी छाती नंगी थी और वो सिर्फ जिप खुली पैंट में खड़ा होकर मेरे मुंह के सामने अपने जिप वाले भाग को ले आया था.

मुझे घुटनों के बल बैठा कर उसने अपनी खुली जिप में मेरी होठों को धकेल दिया और अगले ही पल पैंट का हुक खोलकर पैंट नीचे गिरा दी, अब वो अंडरवियर में था और उसका लंड पहले से ही बाहर लटक रहा था. उसने अपने लटकते हुए लंड पर मेरा चेहरा यहाँ वहाँ टच करना शुरु कर दिया, कभी उसका लंड मेरे होठों पर आकर लगता तो कभी माथे और कभी आँखों पर… और देखते ही देखते उसके लंड में तनाव आने लगा और अगले एक मिनट में उसका लौड़ा 8 इंच को हो चुका था.

 
उसने अपनी उंगलियों से मेरे गालों को दोनों तरफ से भींच दिया और मेरे होंठ खुल गए और अपना लौड़ा वहीं पर मेरे मुंह में दे दिया और बालों को कसकर पकड़ते हुए तेजी से लंड को मेरे मुंह के अंदर बाहर करने लगा.‘साले, आज तेरी लंड चूसने की प्यास अच्छी तरह बुझाऊँगा मैं…’ कहते हुए उसने अपना लंड चुसवाना शुरु कर दिया और स्पीड तेज होने लगी, उसके दोनों हाथ मेरे सिर के पिछले हिस्से पर कस गए और वो अपनी गांड आगे की तरफ धकेलता हुआ पूरा लंड गले में फंसाने लगा, उसके अंडरवियर का कट मरे होठों में आकर लग रहा था- चूस साले… बहनचोद!

उसकी स्पीड और तेज़ हो गई और लंड का तनाव अपने चर्म पर पहुंच गया. उसका लंड सख्त होकर किसी मोटे डंडे की तरह मेरे मुंह को घायल करता हुआ अंदर बाहर हो रहा था. वो पूरे जोश में पूरी ताकत के साथ मेरे मुंह को चोदे जा रहा था. और स्पीड बढ़ने के साथ-साथ उसकी जांघें मेरे गालों से आकर टकराने लगीं और फट-फट की आवाज़ होने लगी.2-3 मिनट तक ऐसे ही मुंह चुदाई करते रहने के बाद एकाएक उसकी स्पीड कम होना शुरू हो गई और उसके मोटे लौड़े से वीर्य की गर्म पिचकारियां सीधे मेरे गले में टकराती हुई नीचे उतरने लगीं और 5-6 झटकों के बाद वो शांत होकर रुक गया.उसने मेरे थूक से सना हुआ लंड मेरे मुंह से बाहर निकाला और मेरी शर्ट के बटन फाड़ते हुए मेरी शर्ट को अपनी तरफ ऊपर खींच कर अपने लंड को साफ करने लगा.संदीप के दोनों दोस्त ये सब अपनी आंखों के सामने होता देख रहे थे और दारू के पैग लगाए जा रहे थे. उनके चेहरे पर हवस नाच रही थी… जैसे दोनों के दोनों मेरे ऊपर लंड तानकर चढ़ने को उतावले हुए जा रहे हैं.

अभी तक आपने पढ़ा कि मैं रवि की तलाश में हिसार जा पहुंचा और बस में मिले संदीप की बाइक पर बैठकर रवि के गांव की तरफ जा रहा था. रात हो चुकी थी और बाइक पर चलते हुए संदीप ने अपना खड़ा लंड मेरे हाथों से रगड़वाया और एक वीराने रास्ते पर ले जाकर चलती बाइक पर मेरे मुंह में दे दिया. उसके बाद वो मुझे एक कोठरी में ले गया जहाँ उसके दोस्त पहले से ही बैठकर दारू पी रहे थे.कोठरी के अंदर नंगा होकर संदीप ने मेरे मुंह को चोद दिया. वीर्य पिलाने के बाद उन्होंने मेरे लिए भी एक दारू का एक पैग बना दिया. मुझे मजबूरन उसको पीना पड़ा क्योंकि और कोई चारा था ही नहीं मेरे पास!

उसके दोस्त नशे में धुत हो चुके थे, उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींचा और अपनी गोद में लेटाकर मेरी गांड पर हाथ फेरने लगे, दूसरे ने मेरी पैंट निकाल दी और अंडरवियर को फाड़ दिया. मैं नंगा उनकी गोद में पड़ा हुआ था.मेरी नंगी गांड को देखकर दूसरे दोस्त ने मेरी गांड पर हाथ फिराना शुरु कर दिया.

तब तक संदीप जाकर दारू पीने लगा… गांड पर हाथ फिरा रहा रहे दोस्त से संदीप ने पूछा- क्यों जग्गी, कैसी है इसकी गांड?जग्गी बोला- बहुत नर्म है साले की, चोदते हुए मज़ा आएगा.तभी जग्गी ने अपने साथी से कहा- आ जा राजबीर, तू भी देख ले एक बार हाथ लगा कर इसके चूतड़!

इतना सुनकर राजबीर हंसा और उसके पास आकर मेरी गांड को दोनों हाथों से दबाने लगा… वो बोला- हाय रे… मस्त माल है यो तो!वो दोनों अचानक खड़े हुए और मेरी आँखों के सामने उन्होंने अपनी लोअर नीचे गिरा दी. राजबीर ने गहरा नीला अंडरवियर पहना हुआ था और जग्गी ने कुछ भी नहीं पहना था. जग्गी का लंड औसत था और नंगा होने के बाद धीरे-धीरे तनाव में आने लगा था. जग्गी आकर मेरे मुंह के सामने घुटनों के बल बैठ गया और अपने लंड और आंडों को मेरे मुंह और होठों पर फिराने लगा.

फिराते-फिराते उसका लंड खड़ा हो गया और वो अपना लंड मुझसे चुसवाने लगा. राजबीर पीछे दारू का ग्लास लेकर खड़ा दारू पीता हुआ ये सब देख रहा था, उसके अंडरवियर में उसका लंड तंबू बना चुका था जो मेरी आँखों की तरफ उछल-उछल कर इशारे कर रहा था. वो चलकर पीछे से मेरी गांड पर आकर बैठ गया और अंडरवियर समेत ही अपना लंड मेरी गांड पर रगड़ने लगा.

अब तक मेरे दिमाग में दारू का नशा चढ़ चुका था और मैं बस उनका साथ देने में मग्न सा होने लगा था. हवस और दारू दोनों का नशा जब साथ मिल जाए तो उससे निकलने वाली सेक्स की आग को रोक पाना किसी के बस की बात नहीं होती. हम चारों उसी आग में जल रहे थे.

जग्गी अपना लौड़ा चुसवाने में मस्त हो चुका था और उसके हाथ मेरे सिर को पकड़े हुए मुझे उसके आंडों में धकेल रहे थे. उसका लंड आराम से अंदर बाहर हो रहा था.इधर राजबीर ने अपना अंडरवियर निकाला और नंगे लंड को मेरी गांड पर रगड़ने लगा. उसका लंड मुझे अपनी गांड की दरार में रास्ता बनाता हुआ महसूस हो रहा था. अब उसने दोनों हाथों से मेरी गांड के पाटों को अलग करते हुए मेरे छेद में उंगली डाली और अंदर बाहर करता हुआ सिसकारियां लेने लगा.

मेरे मुंह में जग्गी का लंड था और गांड में राजबीर की उंगलियाँ.इतने में संदीप नशे में बोला- अरे राजू… उंगलियों से ही चोदेगा क्या इसको?सुन कर राजू बोला- थोड़े मजे तो लेने दे इसकी गांड के!संदीप बोला- अंदर डाल कर देख और फिर बता मज़ा आया या नहीं!

इतना सुनते ही राजू ने अपना लंड मेरी गांड के छेद पर लगाया और टोपा अंदर फंसाते हुए लंड धीरे-धीरे अंदर डालने लगा. मेरी गांड खुलती चली गई और उसका लंड गांड में अंदर उतर गया.वो बोला- हाय रै संदीप… जी सा आ ग्या यार… घी सा घल ग्या…(मजा़ आ गया यार…इसकी गांड में लंड डालकर)

कह कर उसने दोनों हाथ मेरी बगल में दोनों ओर टिका दिए और मेरे ऊपर दबाव बनाता हुआ मेरी गांड को चोदने लगा.उधर सामने से जग्गी अपना लंड मेरे मुंह में पेले जा रहा था और मदमस्त हो रहा था. राजू के धक्कों से जग्गी का लंड मेरे मुंह के अंदर बाहर होने लगा.

 
उनकी ये कामक्रीड़ा देखकर संदीप का नशा दोगुना हो गया, वो बोला- सालो, अकेले-अकेले गांड का स्वाद ले रहे हो? इसे लाया तो मैं, और चोद रहे हो तुम!राजू बोला- तू भी आ मेरे भाई! बहुत मज़ा दे रही है साली रंडी!

संदीप ने उठकर अपनी मोटी जांघों में फंसी खाकी पैंट नीचे सरकाई और अंडरवियर के ऊपर से लंड को सहलाते हुए मेरी नज़रों के सामने जग्गी के पीछे आकर खड़ा हो गया. उसका लंड फिर से तनाव में आने लगा था और दो मिनट बाद उसने अपना अंडरवियर भी नीचे निकाल फेंका और वो हट्टा कट्टा देसी मर्द पूरा नंगा होकर अपने खड़े लंड के साथ जग्गी के साथ मिलकर अपने लौड़े को मेरे मुंह पर फिराने लगा.उसको नंगा देखकर मेरी गांड और खुल गई क्योंकि मैं पहली बार उसको पूरा नंगा देख रहा था. उसकी उठी हुई छाती पसीने से भीग रही थी, एक हाथ उसकी कमर पर था और दूसरे हाथ से वो अपने लौड़े की मुट्ठ मार रहा था. उसकी जांघों के बीच में उसके मोटे-मोटे आंड लटक रहे थे जो मुट्ठ मारते हुए आगे पीछे जा रहे थे और लंड के आस-पास बड़े बड़े घने काले बाल थे जो उसकी मर्दानगी और बढ़ा रहे थे.

यह नज़ारा देखकर कुछ पल के लिए मैं अपने होश खो बैठा था और चाह रहा था कि संदीप मेरे ऊपर चढ़ जाए. मैं उन तीनों के लंड चूसना चाह रहा था लेकिन अगले ही पल संदीप राजू के पास पहुंच गया और राजू को कहा- एक बार अपना लंड निकाल… और इसको घोड़ी बना दे.राजू ने ऐसा ही किया और मुझे कमर से पकड़ते हुए घोड़ी बना दिया.

संदीप बोला- अब, डाल अपना लौड़ा…तो राजू ने दोबारा अपना लंड मेरी गांड में डाल दिया…लेकिन अगले ही पल जो हुआ वो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था… राजू को थोड़ा साइड में करते हुए संदीप ने उसको एक पल रोकते हुए अपना लंड भी राजू के लंड के साथ मेरी गांड के छेद पर लगा दिया. अब दोनों के लंड के टोपे एक साथ मेरी गांड के छेद पर लगे थे और संदीप ने कहा- चोद साले को!

यह कहते ही दोनों ने अपने लंड मेरी गांड में अंदर घुसाने शुरु कर दिए. संदीप का लंड तो वैसे ही 4 इंच मोटा था और नशे के कारण उसकी हवस में और खतरनाक हो गया था.दोनों के लंड अंदर जाना शुरू भी नहीं हुए थे कि मेरी गांड फटने लगी… मुझे इतना दर्द हुआ कि मेरे दांत जग्गी के लंड में गड़ गए और उसने मेरे बाल पकड़ कर अपना लंड बड़ी मुश्किल से बाहर खींचा.उसका लौड़ा लाल हो गया था.जग्गी बोला- साले ने काट लिया!मुंह से लंड निकलते ही दर्द के मारे मेरी चीख निकल गई- आ… हह… नहीं!

इतना होते ही जग्गी ने मेरे मुंह पर हाथ रख दिया और इसके चलते संदीप और राजू का जोश और बढ़ गया. उनके लंड मेरी गांड में एक इंच अंदर प्रवेश कर चुके थे. मेरे दबे हुए मुंह से ऊंह… ऊंह… की जोर-जोर की आवाजें आने लगीं लेकिन जग्गी ने मेरे मुंह पर अपने हाथ का दबाव और ज्यादा बढ़ा दिया.

अब संदीप ने और जोर लगाया और उसके लंड के साथ राजू का लंड भी मेरी गांड को चीरता हुआ गहराई में धीरे-धीरे सरकने लगा. दर्द मेरी बर्दाश्त के बाहर हो गया, आँखों से आंसू झर-झर गिरने लगे, मैं जल बिन मछली की तरह छटपटाने लगा.लेकिन मेरा एक हाथ संदीप ने अपने दोनों हाथों से पकड़ कर पीछे की तरफ अपनी ओर खींचे रखा और दूसरा हाथ राजू ने पकड़ लिया, मेरे दोनों हाथों को अपनी तरफ खींचने पर उनके लंड मेरी गांड में और अंदर रास्ता बनाने लगे और मैं दर्द के मारे बेहोशी के कगार पर पहुंच गया.

संदीप और राजू ने एक साथ एक तेज झटका दिया और उन दोनों के लंड आधी लंबाई तक मेरी गांड में उतर गए. उन्होंने मेरे हाथों को और पीछे की तरफ खींचा और अब दोनों के लंड आपस में सटे हुए पूरे के पूरे मेरी गांड में आ फंसे.मैं बेहोश सा हो गया… उसके बाद का मुझे कुछ याद नहीं कि मेरे साथ क्या-क्या हुआ लेकिन जब आंख खुली तो मैं नंगा वहीं दरी पर पड़ा हुआ था, सारा सामान आस-पास बिखरा पड़ा था.

मैंने दोनों तरफ गर्दन घुमाई तो कोठरी में कोई नहीं था, मैं अकेला वहाँ नंगा पड़ा हुआ था. मैंने शरीर को संभालते हुए उठना चाहा तो गांड में जैसे मिर्च लगने का इतना तेज अहसास हुआ जैसे किसी ने कोई जलती हुई चीज़ गांड में देकर निकाल दी हो.मैं दर्द के मारे रो पड़ा… दर्द इतना असहनीय था कि घुटने पेट में घुस गए… लेकिन दर्द कम नहीं हो रहा था.

मैं फूट-फूट कर रोने लगा ‘उई मां… मर गया… रवि… यार तू कहाँ है… आ…हा… रवि… ले जा मुझे… यहाँ से… आ..हा… मर गया…मेरी मां…कलेजा फटने लगा लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था, आधे घंटे तक यूं ही पड़ा हुआ रोता रहा, फिर जैसे तैसे करके फटी शर्ट पहनी और बड़ी मुश्किल से पैंट पहन पाया.टाइम देखा तो सुबह के 3.30 बज चुके थे.

मैं उठा और कोठरी के बाहर कदम रखा ही था कि मुझे चक्कर आ गया. मैंने दरवाज़े का सहारा लिया और खुद को संभाला, भगवान को कोसते हुए चीखकर कहा- मुझे ही गे क्यों बनाया तूने… ऐसी नर्क भरी जिंदगी से अच्छा तो मुझे मौत आ जाए!भगवान और अपने भाग्य को कोसता हुआ मैं किसी तरह लंगड़ाते हुए कोठरी से बाहर निकला और बैग उठाकर पगडंडी पर मेन रोड की तरफ देखा. वो एक किलोमीटर की दूरी हजार किलोमीटर की मालूम हो रही थी. एक एक कदम बढ़ाना भारी हो रहा था.

मैं आँसू गिराता हुआ गांव के मेन रोड की तरफ बढ़ चला.

 
किसी तरह मैंने खुद को संभाला और उठकर चला तो चक्कर आ गया, एक-एक कदम चलना जैसे घायल गांड में जैसे नमक छिड़के जाने का अहसास करा रहा था. सामने मेन रोड किलोमीटर भर दूर था. शरीर और दिमाग में जितनी ताकत थी मैंने सारी एक साथ समेटते हुए आँसू पौंछे और मेन रोड की तरफ चल पड़ा.

नेवली खुर्द के मेन रोड तक पहुंचने के बाद मैं जाखोद खेड़ा की तरफ जा रहे हाइवे की तरफ चल पड़ा.अब तक गांड का दर्द कुछ कम हो गया था और अंदरूनी हौसले ने कदमों की तेजी को सहारा देते हुए उनमें जान फूंक दी थी.

जल्दी ही मैं जाखोद खेड़ा की तरफ जा रही सड़क पर पहुंच गया लेकिन सुबह के 4.30 बजे का टाइम था, सड़क पर ट्रकों के सिवा और कोई वाहन नहीं चल रहा था. मैंने सोचा अगर किसी ट्रक वाले से लिफ्ट मांगी तो फिर कोई गांड मार लेगा क्योंकि अब कोई दर्द झेलने की हिम्मत ना तो दिल में ही बची थी और ना ही गांड में… इसलिए मैंने पैदल चलना ही बेहतर समझा.

चलते-चलते जाखोद खेड़ा का साइन बोर्ड आ गया और उस पर लिखा था- 2 किलोमीटर.

सुबह के 5.30 बज चुके थे और सूरज आसमान में फिर से अपनी लाल रोशनी बिखेरता हुआ चमकने की तैयारी में था. गांव के लोग खेतों की तरफ टहलते आते हुए दिखाई दे रहे थे. कोई पशुओं के लिए बुग्गी में चारा लेकर जा रहा था तो कोई गेहूँ की फसल की कटाई के बाद भूसे से भरी हुई ट्रॉली को ट्रैक्टर से खींचकर ले जा रहा था.

गांव की सीमा में प्रवेश करने के बाद मैंने सोचा कि मैं यहाँ तक पहुंच तो गया लेकिन रवि को ढूंढूंगा कैसे… मैं तो उसके नाम के सिवा कुछ भी नहीं जानता.

लेकिन हरियाणा के गांवों की एक खास बात ये होती है कि यहाँ के लोग गांव के बाकी सभी लोगों के बारे में जानकारी रखते हैं कि कौन किसका बेटा है, कौन किसका दादा है, किसका परिवार कितना बड़ा है, किसके कितने खेत हैं और किसकी कितनी भैंस हैं.गांव में किसी से भी पूछो तो सबका बायोडेटा निकलकर आ जाता है.

मैंने भी एक राह चलते अधेड़ उम्र के आदमी से पूछा- अंकल, मुझे रवि के घर जाना है.उसने कुर्ता पजामा पहना हुआ था, शरीर से तगड़ा था और बड़ी-बड़ी मूछें जो उसके होठों को ढकती हुई नाक के दोनों ओर से उसके गालों की तरफ मुड़ी हुई थीं.

उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और बोला- कित तै आया सै बेटा (कहाँ से आया है बेटा)मैंने कहा- मैं बहादुरगढ़ से आया हूँ.वो बोला- तो फिर ये शर्ट कैसे फट गई?अब मेरी हवा निकल गई… इसको क्या जवाब दूं. जल्दी से दिमाग घुमाया और बोला- रात को टैम्पो वाले से लिफ्ट ली थी जब सुबह नीचे कूदने लगा तो उसके हुक में उलझ कर फट गई.वो बोला- अच्छा… तो आराम से देखकर उतरना चाहिए था… चोट-फेट लग जाती तो!

मैंने मन ही मन कहा- चोट तो बहुत गहरी लगी है लेकिन कहाँ लगी है ये नहीं बता सकता… खैर!मैंने उसको और कुछ पूछने का मौका न देते हुए कहा- आप मुझे रवि का घर बता सकते हो?उसने कहा- कौन सा रवि… गांव में तो कई रवि हैं… किसके घर जाना है तुझे?मैंन कहा- रवि जाखड़वो ठहाका मारकर हंसा और बोला- बेटा गांव में सारे ही जाखड़ हैं… ये जाखड़ का ही गांव है.

मैंने कहा- आप ये पर्ची देख लो, उसने यही दिया था मुझे.उसने कहा- भाई मन्नै तो पढ़ना कोनी आंदा( मुझे पढ़ना नहीं आता)मैंने कहा – मैं पढ़कर बताता हूँ. इस पर लिखा है- जाखोद खेड़ा, रामदेव मंदिर के पास!वो बोला- अच्छा… अच्छा… तू रामबीर के छोरे रवि की बात कर रहा है.मैंने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई और कहा- हाँ, हाँ वही!

वो बोला- रेलवे लाइन पार करके सीधे हाथ को एक रोड जा रहा है उस पर सीधे-सीधे चला जाइयो… जब तक मंदिर ना आए.. चलते रहियो.मैंने कहा- धन्यवाद अंकल जी…कह कर मैं आने जाने वालों से रेलवे लाइन पूछता हुआ उसके बताए रास्ते पर चलने लगा.

चलते-चलते मैं पानी के तालाब के पास पहुंच गया जहाँ पर गांव के लोग अपनी भैंसों को नहलाने के लिए ला रहे थे… कोई नहला रहा था तो कोई नहलाकर वापस जा रहा था, कोई भैंस की पीठ पर बैठकर तालाब के पानी में भैंस की सवारी कर रहा था.मैंने सोचा यहाँ पर किसी से पूछ लेता हूँ, मैं पूछने के लिए एक लड़के के पास गया, वो तालाब के किनारे बैठा हुआ अपनी भैंसों को हाँक रहा था जो पानी में दूसरी भैंसों के साथ लड़ाई कर रही थीं. उसका चेहरा तालाब की तरफ था और पीठ मेरी तरफ. शरीर की बनावट में काफी चौड़ा और भरे हुए शरीर का था जैसे अक्सर जाट होते हैं.

मैंने पीछे से जाकर पूछा- भैया, रवि जाखड़ का घर किस तरफ है?आवाज़ सुनकर उसका मुंह मेरी तरफ घूमा तो मेरी आंखों में खुशी और गम के आंसू एक साथ पलकों तक भर आए लेकिन नीचे नहीं गिरे… मैं उसकी आंखों में देख रहा था… वही मुस्कुराता चेहरा, माथे पर बिखरे हुए बाल, लाल-लाल रसीले होंठ और उन पर फैली वही कातिलाना मुस्कान… जिसको पहली बार देखते ही मैं लट्टू हो गया था.

 
दिल की धड़कन धक-धक करने लगी थी… रवि मेरी आंखों के सामने था.

मुझे देखकर उसके मुंह से निकला- अरै सोनू.. तू… इतनी सुबह… और यो के हाल बना रखा है… या बुशट कुकर पाट गी(ये शर्ट कैसे फट गई)उसके होठों से मेरा नाम निकलते ही मेरी पलकों में बंधी आंसुओं की झड़ी चेहरे पर धार बनकर मेरी फटी-शर्ट को भिगोने लगी.

मुझे रोता देखकर वो जैसे ही खड़ा हुआ मैं उसके सीने से लिपट गया. उसकी छाती से लगकर दिल में जैसे दर्द का सैलाब जो रात भर की दरिंदगी के बाद किसी तरह रोके रखा था वो अपने प्यार के सीने से लगते ही वो बांध टूट गया और मैं फूट-फूट कर उसके सीने से लगकर जी भर कर रोया.

वो हैरान था… वो बोलता रहा- अरै के होया… (अरे हुआ क्या)… कुछ बताएगा या ऐसे ही रोता रहेगा?वो बोलता रहा और मैं रोता रहा…

फिर उसने अपने मजबूत हाथों से मुझे अपने से अलग किया और पूछा- बावला हो गया के.. (पागल हो गया है क्या…) क्यूं जनानियों की ढाल रोण लाग रया है (क्यूं लड़कियों की तरह रो रहा है)…मेरे मुंह में जैसे शब्द ही नहीं थे… क्या बताऊं और क्या नहीं.

वो बोला- तू एक काम कर, यहाँ बैठ पहले आराम से… शांत हो जा… मैं ज़रा भैंसों को बाहर खदेड़ कर लाता हूँ.कहकर वो अपनी भैंसों को खदेड़ने नीचे तालाब की कुछ सीढ़ियों पर पानी में उतर गया और अपनी दो भैंसों और उनके दो छोटे बच्चों के साथ जल्दी ही बाहर किनारे पर आ गया.उसने जांघों तक लाल रंग की ढीला कच्छा (अंडरवियर- शॉर्ट्स) पहन रखे थे और ऊपर एक काले रंग की टी-शर्ट.पानी में भीगने के कारण उसके गीले कच्छे में उसका लंबा मोटा लंड दाएं से बाएं और बाएं से दाएं डोलता हुआ अगल से दिखाई दे रहा था.

लेकिन मेरे अंदर अभी हवस जैसी कोई भावना नहीं आ रही थी. वो अपनी भैंसों को निकाल कर जोहड़(तालाब) के बाहर आ गया, चप्पलें पहनीं और हाथ में डंडा लेकर भैंसों को हाँकते हुए मुझसे बोला- चल घर… अब यहीं बैठा रहेगा?मैं उदास सा चेहरा लेकर उसके पीछे-पीछे चल दिया.

पास में ही रामदेव मंदिर था और उसी के पास थोड़ी दूर पर उसका घर… घर के साथ में ही एक बरामदा था जिस पर लोहे के गजों का बना हुआ गेट लगा हुआ था. वो हाँकता हुआ भैंसों को अंदर ले गया. जैसे अक्सर पशुओं के लिए अलग से बांधने की जगह होती है वो जगह कुछ ऐसी बनी हुई थी. मैं भी उसके पीछे-पीछे गेट के अंदर चला गया. उसने भैंसों के चारा डालने वाली जगह पर बंधीं बेलों को दोनों भैंसों के गले में डालते हुए उनको खूंटे से बांध दिया.

बरामदे में मैं उसके पीछे खड़ा हुआ उसको देख रहा था.बांधने के बाद उसने डंडा एक तरफ फेंका और मुझे अपने पास बुलाने का इशारा किया. साथ में ही भैसों का भूसा पड़ा हुआ था और वो जगह इस तरह से बनी थी कि मेन गेट से सीधा कुछ दिखाई नहीं देता था.

अपने पास बुलाकर वो उसी जगह की तरफ थोड़ा अंदर की ओर जाकर खड़ा हो गया. मैं उसकी ओर कदम बढ़ाते हुए देख रहा था कि उसका लंड उसके लाल ढीले कच्छे में तनना शुरु हो गया है और ऊपर उठता हुआ सा दिख रहा है. वो दोनों हाथ क्रॉस करके अपने भारी से डोलों पर रखे हुए लंड को थोड़ा आगे की तरफ निकाले अपनी कातिल मुस्कान से मुझे देख रहा था.

मेरे पास पहुंचते-पहुंचते उसका लंड लगभग आधा तन चुका था जो कपड़े के अंदर किसी केले की शेप जैसे लग रहा था. मेरे पास जाते ही उसने मुझे अपनी ओर खींच लिया और मेरा बैग नीचे गिराते हुए अपने दोनों हाथ मेरी कमर के दोनों ओर से ले जाते हुए मेरी गांड पर रख कर मुझे अपने बदन से लगा लिया.मेरे लंड वाला भाग उसके लगभग पूरे तन चुके लंड से जाकर सट गया. उसके मजबूत हाथ गांड पर लगते ही जैसे जन्नत का सुकून सा महसूस हुआ… और आगे से उसके लंड का टच होना इस अहसास को चौगुना कर रहा था.

इसी पोजिशन में मुझे अपने जिस्म से चिपकाते हुए उसने अपने रसीले होंठ मेरे चेहरे के पास लाते हुए धीरे से पूछा- और सुना जान… क्या हाल हैं तेरे… तेरी गांड को याद कर करके मैंने बहुत बार अपना कच्छा खराब किया है.उसके बदन के अहसास से मैं सारा दुख भूलकर उसके लाल-लाल होठों की मुस्कान में खो गया… कभी उसके होठों को देखता तो कभी उसकी मोटी मोटी काली नशीली आँखों में… उसके हाथ मेरी गांड पर धीरे-धीरे फिरने लगे जैसे रात भर चुदी गांड को मलहम लगा रहा हो.उसके लंड वाला भाग मेरी जांघों में धीरे-धीरे अंदर की तरफ बढ़ने लगा. उसके हाथों की छुअन से मेरी जांघें फैलने लगीं और गांड खुलने लगी. उसका लंड तनकर मेरी नाभि से टकराने लगा और मेरे हाथ उसकी मजबूत कमर पर जाकर कस गए.

मैं उसके बदन की गर्मी में मदहोश होने लगा… मेरी आंखें बंद हो गईं… वो धीरे-धीरे अपने लंड को मेरी नाभि पर रगड़ने लगा. मैंने उसकी छाती पर टी-शर्ट के बटनों में अपनी नाक को ले जाकर गहरी सांस भरते हुए उसको सूंघा और अपना सिर उसके सीने पर रख दिया और उसकी छाती को चूमने लगा. उसके बदन की खुशबू मेरे अंदर तक जाने लगी… वो अपनी कमर से मेरे हाथ एकदम से हटाते हुए मुझे पलटा और कच्छा में खड़ा लंड मेरी गांड पर लगाते हुए पीछे से अपने दोनों हाथों से मुझे कवर करते हुए मेरी छाती पर लाकर मेरी निप्पलों को टटोलने लगा. धीरे-धीरे लंड को गांड पर रगड़ते हुए वो मेरे निप्पलों को मसलने लगा.

मेरी हवस में पूरी आग लग चुकी थी और अपनी घायल गांड में उसका लंड लेने के लिए मैं वहीं पर खुद बेचैन होने लगा.

 
अभी तक आपने पढ़ा…मैं रवि से मिलने उसके गांव पहुंच गया, वो अपनी भैंसों को जोहड़ में नहला रहा था. हम भैंसों को लेकर उनके लिए बनाए बरामदे में चले गए जहां रवि ने मुझे अपनी तरफ खींचकर मेरी निप्पलों को मसलना शुरु कर दिया और उसका लंड उसके ढीले कच्छे में से मेरी गांड से आकर सट गया. अब मैं खुद ही उसका लंड अपनी घायल गांड में लेने के लिए बेचैन होने लगा, मेरी गांड उसके लंड की तरफ दबाव बनाती हुई उसकी जांघों के बीच में जाकर अंदर की तरफ घुसने लगी, वो मेरी गर्दन को चूमने लगा.

दुनिया की दरिंदगी और गाण्डू जिंदगी से सारी शिकायतें भूलकर मैं अपनी गर्दन पर उसके होठों की छुअन से होने वाली गुदगुदी में ऐसा खोया कि मेरी आंखें बंद हो गईं और मेरे होंठ उसके होंठों की छुअन से वासना में सिसकिया लेने लगे. मैंने उसके हाथों को अपनी पतली कमर पर लपेट लिया और उसके हर एक चुम्बन को जी भर के जीने लगा. उसके मजबूत हाथों का मेरे कोमल बदन पर करारा अहसास और उसके नर्म होठों से निकलती गर्म सांसें मेरे दिल और बदन के हर एक जख्म पर मलहम का काम कर रही थीं. उसका लंड तनकर मेरी पैंट को फाड़कर मेरी गांड में घुसने की इजाज़त मांग रहा था. लेकिन मैं तो सारा का सारा ही उसका था. उसका प्यार पाने के लिए मुझे हर जन्म में गाण्डू भी बनना पड़ता तो मैं बनने के लिए तैयार था. पता नहीं ऐसा क्या था उसमें. वो मेरी अंधेरी गाण्डू जिंदगी का रवि था. मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसे बांके जवान का प्यार भरा साथ मुझे नसीब होने वाला है.

वो मेरे निप्पलों को मसल रहा था, मेरी कमर को अपने हाथों में जकड़े हुए गर्दन को चूम रहा था, उसकी हर एक हरकत मुझे पागल कर रही थी. क्या यही प्यार है. या सिर्फ वासना… कहना बहुत मुश्किल है. लेकिन जो भी है बहुत ही खूबसूरत है.जो अहसास उसकी बाहों में आकर मिला, वो कहीं और नहीं मिला. उसकी छुअन की बात ही अलग थी. शायद यही प्यार था.

उसने मेरी पैंट का हुक खोल दिया वहीं मेरी कोमल गांड को दबाने लगा. इतने में ही बाहर से एक औरत की आवाज़ आई।“आरे छोरे…(अरे लड़के)।कित मर ग्या रे…(कहां रह गया रे). आज इन डांगरा की गैल्या सोवेगा कै(आज इन भैंसों के साथ ही सोएगा क्या)”वो मुझे पीछे धकेलता हुआ खुद आगे होकर आवाज़ लगाकर बोला- आया मां!“भैंसों के आगे सानी(चारा) डाल दूं.”वो रवि की मां थी.

अपने हसीन सपने से जगकर मैं भी घबरा कर पीछे की तरफ छिपकर नीचे बैठ गया.उसकी मां ने कहा- ठीक है, तावला आ ज्या(जल्दी आजा)

रवि ने गेट की तरफ देखा और जब उसकी मां चली गई तो मुझे उठने का इशारा किया. मैंने उठकर पैंट पहन ली.वो बोला- चल मां बुला रही है. यहां कुछ करना ठीक नहीं है.

उसका लंड अभी भी उसके कच्छे में तना हुआ दिख रहा था लेकिन धीरे-धीरे नीचे बैठता जा रहा था. उसने डंडा उठाकर एक तरफ फेंका और भैंसों के लिए लगे बरामदे की छत पर लगे पंखे का बटन दबा दिया और मुझसे बाहर आने का इशारा किया. पहले वो गेट की तरफ बढ़ा. उसने यहां-वहां देखा और फिर मुझे आने का इशारा किया.

हम भैंसों के उस बरामदे से निकलकर बाहर आ गए और लोहे के गजों से बना वो गेट बंद कर दिया. साथ में ही एक मकान था। मैं उसके पीछे-पीछे चल रहा था. उसने गेट खोला और मुझे भी अंदर आने को कहा. मेरे अंदर आने के बाद उसने वो गेट बंद कर दिया.घर में घुसते ही सामने दो कमरे थे. एक तरफ सीढ़िय़ाँ ऊपर की तरफ जा रही थीं और दूसरी तरफ एक रसोई बनी हुई थी. सामने वाले एक कमरे का दरवाज़ा ढला हुआ था और एक का पूरा खुला हुआ था. जिसमें अंदर बिछी खाट(चारपाई) और उनके बीच में रखा हुआ हुक्का बाहर से साफ नज़र आ रहा था.

गेट की आवाज़ सुनकर रसोई से एक 40-45 साल की औरत बाहर निकली. उसने मुझे देखा और फिर रवि को देखा. मैंने उनको नमस्ते कर दी. रवि ने पूछने से पहले ही बता दिया- माँ, ये मेरा दोस्त है, मिलने के लिए आया है।उसकी माँ ने मुझे सरसरी नज़र से देखा और बोली- अच्छा बेटा, आ जा.रवि से बोली- भीतर बठा ले फेर इसनै (इसको अंदर बैठा ले फिर)कहकर वो रसोई में वापस चली गई.

हम दोनों हुक्के वाले कमरे में चले गए.

रवि ने कहा- तू बैठ मैं लोअर पहनकर आता हूं, नहीं तो तेरा छोटा भाई (मेरा लंड) बार-बार परेशान करता रहेगा और घर वालों को शक हो जाएगा.वो साथ वाले कमरे में जाकर दो मिनट में लोअर पहनकर वापस हुक्के वाले कमरे में आ गया. रवि का लंड उसकी लोअर में अभी भी अच्छा खासा उभार बना रहा था. वो आकर मेरे सामने वाली चारपाई पर बैठ गया, मुझसे बोला- हुक्का पीएगा?मैंने कहा- नहीं, मैं तो तुमसे मिलने आया था.रवि ने कहा- फिर रो क्यूं रहा था.मैंने कहा- बस ऐसे ही, तुम्हें देखकर आंखों से आंसूं आ गए.वो बोला- हट्ट बावला… मैं कोए मर गया था जो रोवे था (मैं कोई मर गया था जो तू रो रहा था)

मेरा दिल फिर भर आया.वो बोला- यार तू तो कति छोरी आली हरकत करै है (तू तो बिल्कुल लड़कियों वाली हरकतें कर रहा है) लड़का बन कर रहा कर, मैं कहीं नहीं जा रहा.मैं अपनी भावनाओं को अंदर ही रोकते हुए उसकी हां में हां मिलाता हुआ मुंडी हिलाता रहा.

एक बार दिल कर रहा था कि इसको सारी बात बता दूं, फिर सोचा अगर इसे पता चल गया कि मैं किसी और से चुदकर आया हूं या किसी और का लंड चूसकर आया हूं तो कहीं ये भी मुझे रंडी कहकर दुत्कार न दे, और मैं रवि को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था. मैंने दिल को मजबूत रखा सब कुछ अंदर ही दबा कर रखा.

उसकी मां ने फिर से आवाज़ लगाई- सीटू!रवि बोला- हां माँ?“रोटी खा ले.”

मैं सीटू नाम सुनकर हँस पड़ा.वो बोला- हंस क्या रहा है, मेरा घर का नाम है सीटू.मैं फिर से हँसने लगा.मुझे हँसता देखकर वो बोला- हाँ… यही चाहता हूँ मैं… ऐसे ही हँसता रहा कर… और जो फिर कभी रोया तो तुझे इतना चोदूंगा कि तू चलने फिरने लायक नहीं रहेगा.

 
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