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आयशा खान से सच्चा प्यार और चुदाई--1
मैं जनवरी 2012 को किसी काम से मेरी ससुराल गया हुआ था साम के 5 बजे के समय मैं मेरी BMW कार से जा रहा था जहा रोड में एक मीडियम साइज़ [ना तो ज्यादा मोटी और ना ही ज्यादा दुबली] की औरत को जाते हुए देखा उसकी चाल को देखकर ऐसा लगा जैसे मैं इसे जानता हु , मुझे मेरी आशा याद आ गई कुछ दूर तक कार से पीछे चलते चलते पूरा विश्वास हो गया की ये तो आशा ही है तब मैं कार को उसके पास ले गया और आवाज दिया '' हेल्लो आशा '' तो ओ मेरी तरफ पलट कर देखी और बिना कुछ जबाब दिए आगे को बढ़ गई मैं फिर कार से आवाज दिया '' ओ आशा सुनो तो सही '' तब ओ फिर से मेरी तरफ घूर कर देखी और बोली '' किसे आवाज दे रहे है '' तो मैंने कार के अंदर से ही बोला '' तुम आशा हो ना '' तो ओ बोली '' नहीं मैं आयशा हु '' तब मैंने कार को थोड़ा आगे बढ़ाया और एक किनारे कार को खड़ी किया और
उसके पास जाकर पूछा '' आप तउरेज खान की बेटी आयशा हो ना '' तो ओ बोली ''हां'' तब मैंने उसे कहा ''मुझे नहीं पहचाना क्या '' तो ओ दिमाग पर जोर डाली और ना में सिर हिलाया तब मैंने उसे बोला '' ध्यान से देखो मेरी तरफ'' तो ओ फिर से मेरी तरफ घूर कर देखी और मुस्कुरा कर बोली '' आप तो सर जी है न '' तब मैंने बोला ''हाँ पहचान लिया '' तब मैंने आशा को अपनी कार में बड़े आग्रह के साथ अपने बगल वाली सीट पर बिठाया और कुछ दूर जाने के बाद कार को एक छायादार पेड़ के नीचे खड़ी कर दिया और कार के अंदर बैठे बैठे ही बाते करने लगा आशा का चेहरा बहुत कुछ बदला हुआ है ,आँखों के नीचे काली काली-काली झाइयाँ है फिर भी 40 की उम्र में भी खूबसूरत लग रही है, आशा आगे होकर बोली '' आप यहाँ कैसे ? आपको 20 साल बाद देखी इस लिए पहचान नही पाई आपतो पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लग रहे है ''
तो मैंने उसे बताया ''मेरी ससुराल है यहाँ ''
तो उसने पूछा ''कहा पर''
तो मैंने उसे बताया तो बोली किसके यहाँ तब मैंने मेरी ससुराल वालो का नाम लिया तो बोली '' सच में ओ आपकी ससुराल है '' तो मैंने बोला ''हां'' तब ओ फिर पलट कर बोलती है ''आपकी ससुराल वाले तो बहुत बड़े आदमी है बहुत धनी है ओ लोग '' फिर आयशा ने मेरे बाया हाथ की कलाई के ऊपर देखा और हाथ को चुम लिया और बोली '' ये क्या पहले तो सिर्फ ''आ'' लिखा था ये ''यशा'' कब लिख लिया और ये अभी तक नहीं मिटा '' तो मैंने आयशा से कहा की '' ये मेरी चिता जलने के बाद ही मिटेगा '' तो आयशा मेरे मुह पर हाथ रख दिया और बोली '' चिता जले आपके दुश्मनो की '' फिर आयशा ने पूछा ''आपने ये मेरा पूरा नाम कब लिख लिया '' तो मैंने आयशा को बोला की '' तुम्हारी जुदाई में पूरा नाम लिखा लिया '' फिर मैंने आशा से उसके सौहर - बच्चो के बारे पूछा तो आशा ने बताया '' पहले वाले शौहर से कोई ओलाद नहीं हुई तो उससे तलाक हो गया और दूसरे शौहर से एक लड़का और दो लडकिया है '' मैंने पूछा ''क्या करते है आपके सोहर'' तो आशा ने बताया '' ओ कबाड़ी की दूकान चलाते है '' तब मैंने तपाक से बोला '' आपको भी कबाड़ में बदल दिया '' तो आशा मेरी तरफ घूर कर देखी और बोली ''आप ठीक कहते है सर अब मैं आपको कबाड़ ही नजर आउगी '' आशा की बाते सुनकर मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ और मैंने आशा का हाथ पकड़ कर बोला '' क्षमा करो मेरी जान गलती हो गई '' और इतना कहकर आशा का हाथ 'चुम' लिया तो आशा अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली '' अरे क्या कर रहे है आप ये पब्लिक प्लेस है किसी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा '' तब मैंने आशा को बताया की '' काला कांच लगा हुआ है कोई नहीं देख सकता हम दोनों को'' और इतना कहने के बाद आशा को अपनी तरफ खीच लिया और आशा की चुचियो को दबाते हुए होठो को किस कर लिया ,आशा ने कोई बिरोध नहीं किया और अपनी सीट से झुक कर मेरे सीने से चिपकी रही, आयशा की चुचिया खूब टाइट लगती है जैसे चुशियो को किसी ने कई सालो से किसी ने दवाया ही नहीं | आशा की आर्थिक स्थित, उसे देखकर लगता है बहुत खराब है, साधारण सी चप्पल, सस्ता सा सलवार कुर्ती पहन रखी थी जिसमे कुर्ती में कई जगह पर हाथ से सिलाई की हुई , बाते करते करते मैंने आशा की कुर्ती के गले के पास से हाथ डालकर आशा की चुचियो को दबाया , आयशा की चुचिया मस्त गोलाई लिए हुए बिना लटके, खूब टाइट लग रही थी आशा ने कोई बिरोध नहीं किया और मुझे किस करने लगी, मैंने आयशा से बोला ''आशा तुम तो आज भी बहुत मस्त लगती हो ,तो आयशा ने पूछ लिया '' कैसे मस्त लगती हु '' तो मैंने आयशा की चूची की तरफ इसारा किया और बोला '' ये आज भी खूब टाइट है '' तो आयशा बोली '' हां है तो पर किस काम की '' तो मैंने पूछा '' मतलब क्या है '' तो आयशा कुछ नहीं बोली और उदास हो गई मैंने बहुत पूछा पर आयशा इस बारे में कुछ नहीं बताया, हम दोनों कार में 25 मिनट तक बाते किये ,आयशा बारे पूछा , आयशा ने मेरे बीबी बच्चो के बारे में पूछा , फिर आशा का पता पूछा तो आशा ने पता तो बता दिया जब मैंने बोला चलो छोड़ दू तो आशा ने मना कर दिया और बोली ''मैं चली जाउगी '' तब मैंने आशा से उसका मोबाइल नंबर मांगा तो बोली ''मेरे पास मोबाइल नहीं है '' तो मैंने बोला पति का ही दे दो तो बोली ''नहीं उनके नंबर पर बात नहीं करना आप, कही उन्हें पता चल गया तो 'तलाक तलाक तलाक' बोलेगे और मैं रोड पर आ जाउगी और अब तो कोई नहीं पूछेगा इस उम्र में '' तब मैंने आशा से बोला फिर मैंने ''कैसे मिलूँगा कैसे बात करुगा'' तो आशा बोली ''क्या जरुरत है बात करने की '' तब मैंने बोला '' नहीं मेरी जान इतने दिन बाद मिली हो अब मैं तुमसे फिर से बात किया करुगा तुमसे मिला करुगा '' तब आशा बोली '' मेरे पडोस में एक हिन्दू सहेली है उसका नंबर देती हु उस पर बात कर लिया करना '' और फिर आशा ने नंबर दे दिया मुझे अपने पडोसी का मैंने भी मेरा कार्ड आशा को दे दिया ,फिर बोला इसे सम्हाल कर रखना
और जब आशा कार से उतरने को तैयार हुई तो मैंने मेरी पर्स में से 1000 - 1000 की 21 नोट निकाला और आशा के हाथ में रख दिया तो ओ मेरी तरफ आस्चर्य भरी निगाह से देखी और बोली '' ओ अल्ला ,इतने रुपये क्या करुँगी '' तब मैंने बोला ''रख लो अपने लिए अच्छे अच्छे कपडे ले लेना और अपने लिए एक मोबाइल खरीद लेना है '' तब आशा मेरी तरफ बड़े प्यार से देखी और मुझे किस किया और कार से उतर कर चली गई और मैं भारी मन से अपनी ससुराल आ गया पर मेरा मन बार बार आयशा के साथ बिताये हुए पल को याद करने लगे पर बार बार कोई न कोई डिस्टर्ब कर देता पर जब साम को सोने लगा तो आयशा के साथ बिताये एक एक पल की सुनहरी यादो में खो गया और कब नींद लग गई पता ही नहीं चला पर आयशा के एक एक बाते स्वप्न में सिनेमा की तरह दिमाग में चलने लगा |
आयशा खान स्कूल के समय ऐसी ही लगती थी
ये सच कहानी है उन दिनों की है जब मैं एक छोटे से कस्बे जो UP के बार्डर में है वहा की हायर सेकण्ड्री स्कूल में पहली बार लेक्चरर के पद पर नियुक्त हुआ उस समय मैं 27 - 28 साल का हट्टा कट्टा ,खूबसूरत नौजबांन था मुझे स्कूल में क्लास 10Th का क्लास टीचर बनाया प्रिंसपल साहब ने | 10Th क्लास में तो कई लडकिया थी पर उसमे थी आयशा खान [आयशा की पढ़ाई लेट चालु हुई इस लिए आयशा की उम्र 10 Th में 18 साल की हो गई थी] जो बहुत ही सुन्दर और सेक्सी थी पढ़ने में भी अच्छी थी इसलिए मैंने उसे क्लास मॉनिटर बना दिया इस कारण ओ मेरे से ज्यादा घुल मिल गई , पर मैं उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता था एक दिन मैं अपनी रॉयल इनफील्ड बुलट मोटर साइकल से कस्बे के बाजार में निकला तो एक जूते -चप्पल की दूकान में आयशा बैठी हुई मिली,मुझे भी एक स्लीपर लेना था सो मैं आयशा की दूकान के सामने बाइक रोक कर रुक गया , आयशा ने जैसे ही मुझे देखा उठकर खड़ी हो गई और बोली ''क्या चाहिए गुरु जी '' तो मैंने उससे बोला ''आपकी दूकान है'' तो ओ बोली ''हां पर गुरु जी आप मुझे आप क्यों कहते है'' मैं तो आपकी स्टूडेंट हु '' तो मैंने बोला आप स्कूल में स्टूडेंट है यहाँ नहीं तो ओ मुस्कुराई और एक टूटी से चेयर दिया और बोली ''आप बैठ जाए '' तो मैं बैठ गया चेयर में और आयशा से कहा की ''मुझे एक स्लीपर चाहिए '' तो आयशा ने लखानी की एक स्लीपर दिखाया पसंद आ गई तो ओ स्लीपर मैंने रख लिया और आयशा को 20 - 20 के दो नोट दिए [लखानी के स्लीपर उस समय 25 रुपये में मिलती थी] तो आयशा ने रुपये वापस कर दिए और बोली '' आप तो ले जाइए गुरु जी '' तो मैंने कहा की ''नहीं ऐसे कैसे बिना दाम चुकाए ले जाऊ '' तो पलट कर आयशा ने जबाब दिया ''आप तो मेरे गुरु जी है आपसे क्या दाम लू '' और इतना कह कर रुपये मेरे जेब में डाल दिया , रुपये डालते समय आयशा जैसे मेरी तरफ झुकी आयशा की चूची [बूब्स ,स्तन] मुझे दिखाई दे गई और आयशा के बाल मेरे कंधे पर गिर गए , और आयशा के वदन से एक मादक खुसबू निकली जो मुझे मदहोस कर दिया मैं आयशा की चूची ही देख रहा था की इतने में आयशा खड़ी हो गई और मेरी नजरो को समझ गई की मैं क्या देख रहा हु , तो आयशा सर्म के मारे अपना दुपट्टा सम्हालते हुए अपनी मस्त मस्त चुचियो को ढक लिया और दूकान में बैठ गई , तो मैंने फिर से जेब में से 40 रुपये निकाले और आयशा के हाथ को पकड़ा और रख दिया और उठकर चलने,लगा तो आयशा बोली ''गुरु जी 15 रुपये तो लेते जाइए '' तो मैंने धीमी सी अबाज में कहा की '' आप अपने लिए कुछ खरीद लेना और उसे पहनना तो रोज मेरी याद आएगी'' [उस समय पर ब्रा 15 रुपये में मिलती थी और आयशा अभी तक ब्रा नहीं पहनती थी] आयशा समझ गई मेरा इसारा तो हलकी सी मुस्कान बिखेर दिया अपने सुन्दर से गुलाब की पंखुड़ियों के तरह होठो पर और मैं उसके दूकान से चला आया
मैं जनवरी 2012 को किसी काम से मेरी ससुराल गया हुआ था साम के 5 बजे के समय मैं मेरी BMW कार से जा रहा था जहा रोड में एक मीडियम साइज़ [ना तो ज्यादा मोटी और ना ही ज्यादा दुबली] की औरत को जाते हुए देखा उसकी चाल को देखकर ऐसा लगा जैसे मैं इसे जानता हु , मुझे मेरी आशा याद आ गई कुछ दूर तक कार से पीछे चलते चलते पूरा विश्वास हो गया की ये तो आशा ही है तब मैं कार को उसके पास ले गया और आवाज दिया '' हेल्लो आशा '' तो ओ मेरी तरफ पलट कर देखी और बिना कुछ जबाब दिए आगे को बढ़ गई मैं फिर कार से आवाज दिया '' ओ आशा सुनो तो सही '' तब ओ फिर से मेरी तरफ घूर कर देखी और बोली '' किसे आवाज दे रहे है '' तो मैंने कार के अंदर से ही बोला '' तुम आशा हो ना '' तो ओ बोली '' नहीं मैं आयशा हु '' तब मैंने कार को थोड़ा आगे बढ़ाया और एक किनारे कार को खड़ी किया और
उसके पास जाकर पूछा '' आप तउरेज खान की बेटी आयशा हो ना '' तो ओ बोली ''हां'' तब मैंने उसे कहा ''मुझे नहीं पहचाना क्या '' तो ओ दिमाग पर जोर डाली और ना में सिर हिलाया तब मैंने उसे बोला '' ध्यान से देखो मेरी तरफ'' तो ओ फिर से मेरी तरफ घूर कर देखी और मुस्कुरा कर बोली '' आप तो सर जी है न '' तब मैंने बोला ''हाँ पहचान लिया '' तब मैंने आशा को अपनी कार में बड़े आग्रह के साथ अपने बगल वाली सीट पर बिठाया और कुछ दूर जाने के बाद कार को एक छायादार पेड़ के नीचे खड़ी कर दिया और कार के अंदर बैठे बैठे ही बाते करने लगा आशा का चेहरा बहुत कुछ बदला हुआ है ,आँखों के नीचे काली काली-काली झाइयाँ है फिर भी 40 की उम्र में भी खूबसूरत लग रही है, आशा आगे होकर बोली '' आप यहाँ कैसे ? आपको 20 साल बाद देखी इस लिए पहचान नही पाई आपतो पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लग रहे है ''
तो मैंने उसे बताया ''मेरी ससुराल है यहाँ ''
तो उसने पूछा ''कहा पर''
तो मैंने उसे बताया तो बोली किसके यहाँ तब मैंने मेरी ससुराल वालो का नाम लिया तो बोली '' सच में ओ आपकी ससुराल है '' तो मैंने बोला ''हां'' तब ओ फिर पलट कर बोलती है ''आपकी ससुराल वाले तो बहुत बड़े आदमी है बहुत धनी है ओ लोग '' फिर आयशा ने मेरे बाया हाथ की कलाई के ऊपर देखा और हाथ को चुम लिया और बोली '' ये क्या पहले तो सिर्फ ''आ'' लिखा था ये ''यशा'' कब लिख लिया और ये अभी तक नहीं मिटा '' तो मैंने आयशा से कहा की '' ये मेरी चिता जलने के बाद ही मिटेगा '' तो आयशा मेरे मुह पर हाथ रख दिया और बोली '' चिता जले आपके दुश्मनो की '' फिर आयशा ने पूछा ''आपने ये मेरा पूरा नाम कब लिख लिया '' तो मैंने आयशा को बोला की '' तुम्हारी जुदाई में पूरा नाम लिखा लिया '' फिर मैंने आशा से उसके सौहर - बच्चो के बारे पूछा तो आशा ने बताया '' पहले वाले शौहर से कोई ओलाद नहीं हुई तो उससे तलाक हो गया और दूसरे शौहर से एक लड़का और दो लडकिया है '' मैंने पूछा ''क्या करते है आपके सोहर'' तो आशा ने बताया '' ओ कबाड़ी की दूकान चलाते है '' तब मैंने तपाक से बोला '' आपको भी कबाड़ में बदल दिया '' तो आशा मेरी तरफ घूर कर देखी और बोली ''आप ठीक कहते है सर अब मैं आपको कबाड़ ही नजर आउगी '' आशा की बाते सुनकर मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ और मैंने आशा का हाथ पकड़ कर बोला '' क्षमा करो मेरी जान गलती हो गई '' और इतना कहकर आशा का हाथ 'चुम' लिया तो आशा अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली '' अरे क्या कर रहे है आप ये पब्लिक प्लेस है किसी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा '' तब मैंने आशा को बताया की '' काला कांच लगा हुआ है कोई नहीं देख सकता हम दोनों को'' और इतना कहने के बाद आशा को अपनी तरफ खीच लिया और आशा की चुचियो को दबाते हुए होठो को किस कर लिया ,आशा ने कोई बिरोध नहीं किया और अपनी सीट से झुक कर मेरे सीने से चिपकी रही, आयशा की चुचिया खूब टाइट लगती है जैसे चुशियो को किसी ने कई सालो से किसी ने दवाया ही नहीं | आशा की आर्थिक स्थित, उसे देखकर लगता है बहुत खराब है, साधारण सी चप्पल, सस्ता सा सलवार कुर्ती पहन रखी थी जिसमे कुर्ती में कई जगह पर हाथ से सिलाई की हुई , बाते करते करते मैंने आशा की कुर्ती के गले के पास से हाथ डालकर आशा की चुचियो को दबाया , आयशा की चुचिया मस्त गोलाई लिए हुए बिना लटके, खूब टाइट लग रही थी आशा ने कोई बिरोध नहीं किया और मुझे किस करने लगी, मैंने आयशा से बोला ''आशा तुम तो आज भी बहुत मस्त लगती हो ,तो आयशा ने पूछ लिया '' कैसे मस्त लगती हु '' तो मैंने आयशा की चूची की तरफ इसारा किया और बोला '' ये आज भी खूब टाइट है '' तो आयशा बोली '' हां है तो पर किस काम की '' तो मैंने पूछा '' मतलब क्या है '' तो आयशा कुछ नहीं बोली और उदास हो गई मैंने बहुत पूछा पर आयशा इस बारे में कुछ नहीं बताया, हम दोनों कार में 25 मिनट तक बाते किये ,आयशा बारे पूछा , आयशा ने मेरे बीबी बच्चो के बारे में पूछा , फिर आशा का पता पूछा तो आशा ने पता तो बता दिया जब मैंने बोला चलो छोड़ दू तो आशा ने मना कर दिया और बोली ''मैं चली जाउगी '' तब मैंने आशा से उसका मोबाइल नंबर मांगा तो बोली ''मेरे पास मोबाइल नहीं है '' तो मैंने बोला पति का ही दे दो तो बोली ''नहीं उनके नंबर पर बात नहीं करना आप, कही उन्हें पता चल गया तो 'तलाक तलाक तलाक' बोलेगे और मैं रोड पर आ जाउगी और अब तो कोई नहीं पूछेगा इस उम्र में '' तब मैंने आशा से बोला फिर मैंने ''कैसे मिलूँगा कैसे बात करुगा'' तो आशा बोली ''क्या जरुरत है बात करने की '' तब मैंने बोला '' नहीं मेरी जान इतने दिन बाद मिली हो अब मैं तुमसे फिर से बात किया करुगा तुमसे मिला करुगा '' तब आशा बोली '' मेरे पडोस में एक हिन्दू सहेली है उसका नंबर देती हु उस पर बात कर लिया करना '' और फिर आशा ने नंबर दे दिया मुझे अपने पडोसी का मैंने भी मेरा कार्ड आशा को दे दिया ,फिर बोला इसे सम्हाल कर रखना
और जब आशा कार से उतरने को तैयार हुई तो मैंने मेरी पर्स में से 1000 - 1000 की 21 नोट निकाला और आशा के हाथ में रख दिया तो ओ मेरी तरफ आस्चर्य भरी निगाह से देखी और बोली '' ओ अल्ला ,इतने रुपये क्या करुँगी '' तब मैंने बोला ''रख लो अपने लिए अच्छे अच्छे कपडे ले लेना और अपने लिए एक मोबाइल खरीद लेना है '' तब आशा मेरी तरफ बड़े प्यार से देखी और मुझे किस किया और कार से उतर कर चली गई और मैं भारी मन से अपनी ससुराल आ गया पर मेरा मन बार बार आयशा के साथ बिताये हुए पल को याद करने लगे पर बार बार कोई न कोई डिस्टर्ब कर देता पर जब साम को सोने लगा तो आयशा के साथ बिताये एक एक पल की सुनहरी यादो में खो गया और कब नींद लग गई पता ही नहीं चला पर आयशा के एक एक बाते स्वप्न में सिनेमा की तरह दिमाग में चलने लगा |
आयशा खान स्कूल के समय ऐसी ही लगती थी
ये सच कहानी है उन दिनों की है जब मैं एक छोटे से कस्बे जो UP के बार्डर में है वहा की हायर सेकण्ड्री स्कूल में पहली बार लेक्चरर के पद पर नियुक्त हुआ उस समय मैं 27 - 28 साल का हट्टा कट्टा ,खूबसूरत नौजबांन था मुझे स्कूल में क्लास 10Th का क्लास टीचर बनाया प्रिंसपल साहब ने | 10Th क्लास में तो कई लडकिया थी पर उसमे थी आयशा खान [आयशा की पढ़ाई लेट चालु हुई इस लिए आयशा की उम्र 10 Th में 18 साल की हो गई थी] जो बहुत ही सुन्दर और सेक्सी थी पढ़ने में भी अच्छी थी इसलिए मैंने उसे क्लास मॉनिटर बना दिया इस कारण ओ मेरे से ज्यादा घुल मिल गई , पर मैं उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता था एक दिन मैं अपनी रॉयल इनफील्ड बुलट मोटर साइकल से कस्बे के बाजार में निकला तो एक जूते -चप्पल की दूकान में आयशा बैठी हुई मिली,मुझे भी एक स्लीपर लेना था सो मैं आयशा की दूकान के सामने बाइक रोक कर रुक गया , आयशा ने जैसे ही मुझे देखा उठकर खड़ी हो गई और बोली ''क्या चाहिए गुरु जी '' तो मैंने उससे बोला ''आपकी दूकान है'' तो ओ बोली ''हां पर गुरु जी आप मुझे आप क्यों कहते है'' मैं तो आपकी स्टूडेंट हु '' तो मैंने बोला आप स्कूल में स्टूडेंट है यहाँ नहीं तो ओ मुस्कुराई और एक टूटी से चेयर दिया और बोली ''आप बैठ जाए '' तो मैं बैठ गया चेयर में और आयशा से कहा की ''मुझे एक स्लीपर चाहिए '' तो आयशा ने लखानी की एक स्लीपर दिखाया पसंद आ गई तो ओ स्लीपर मैंने रख लिया और आयशा को 20 - 20 के दो नोट दिए [लखानी के स्लीपर उस समय 25 रुपये में मिलती थी] तो आयशा ने रुपये वापस कर दिए और बोली '' आप तो ले जाइए गुरु जी '' तो मैंने कहा की ''नहीं ऐसे कैसे बिना दाम चुकाए ले जाऊ '' तो पलट कर आयशा ने जबाब दिया ''आप तो मेरे गुरु जी है आपसे क्या दाम लू '' और इतना कह कर रुपये मेरे जेब में डाल दिया , रुपये डालते समय आयशा जैसे मेरी तरफ झुकी आयशा की चूची [बूब्स ,स्तन] मुझे दिखाई दे गई और आयशा के बाल मेरे कंधे पर गिर गए , और आयशा के वदन से एक मादक खुसबू निकली जो मुझे मदहोस कर दिया मैं आयशा की चूची ही देख रहा था की इतने में आयशा खड़ी हो गई और मेरी नजरो को समझ गई की मैं क्या देख रहा हु , तो आयशा सर्म के मारे अपना दुपट्टा सम्हालते हुए अपनी मस्त मस्त चुचियो को ढक लिया और दूकान में बैठ गई , तो मैंने फिर से जेब में से 40 रुपये निकाले और आयशा के हाथ को पकड़ा और रख दिया और उठकर चलने,लगा तो आयशा बोली ''गुरु जी 15 रुपये तो लेते जाइए '' तो मैंने धीमी सी अबाज में कहा की '' आप अपने लिए कुछ खरीद लेना और उसे पहनना तो रोज मेरी याद आएगी'' [उस समय पर ब्रा 15 रुपये में मिलती थी और आयशा अभी तक ब्रा नहीं पहनती थी] आयशा समझ गई मेरा इसारा तो हलकी सी मुस्कान बिखेर दिया अपने सुन्दर से गुलाब की पंखुड़ियों के तरह होठो पर और मैं उसके दूकान से चला आया