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इंसाफ कुदरत का

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कुछ देर बाद वह चुप हो गयी । प्रसून को इसी का इंतजार था । उसने रत्ना से - सुनो बहन कहा । रत्ना ने उसकी तरफ़ देखा । प्रसून ने अपनी झील सी गहरी शान्त आँखें उसकी आँखों में डाल दी । रत्ना 0 शून्य होती चली गयी । शून्य । सिर्फ़ शून्य । शून्य ही शून्य ।

अब उसकी जिन्दगी का पूरा ब्यौरा प्रसून के दिमाग में कापी हो चुका था । वह दुखी जीवात्मा कुछ भी बताने में असमर्थ थी । और प्रसून को उस तरह उससे जानने की जिज्ञासा भी नहीं थी । वह कुछ ही देर में सामान्य हो गयी । उसे एकाएक ऐसा लगा था । मानों गहरी नींद में सो गयी थी । शायद इस नयी अदभुत जिन्दगी में । शायद इस जिन्दगी से पहले भी । उसे ऐसी भरपूर नींद कभी नहीं आयी थी । वह अपने आपको तरोताजा महसूस कर रही थी ।

- कहाँ रहती हो आप । वह स्नेह से बोला - और खाना ?

अब वह लगभग सामान्य थी । प्रसून के कहाँ रहती हो । कहते ही उसकी निगाह खोह नुमा एक ढाय पर गयी । और खाना कहते ही उसने स्वतः ही चिता की तरफ़ देखा । प्रसून उसके दोनों ही मतलब समझ गया । और यहाँ रहने का कारण भी समझ गया ।

- लेकिन । वह फ़िर से बोला - बच्चे । बच्चे क्या खाते हैं ?

उसके चेहरे पर अथाह दुख सा लहराया । स्वतः ही उसकी निगाह त्याज्य मानव मल पर गयी । प्रसून बेबसी से उँगलिया चटकाने लगा । उसके चेहरे पर गहरी पीङा सी जागृत हुयी । सीधा सा मतलब था । उन्होंने बहुत दिनों से अच्छा कुछ भी नहीं खाया था ।

उसने आसपास निगाह डाली । और फ़िर चलता हुआ एक आम के पेङ से पहुँच गया । उसे किसी सूख चुकी आम डाली की तलाश थी । वैसे जमीन पर सूखी लकङियाँ काफ़ी थी । पर वह सिर्फ़ आम की लकङी चाहता था । अन्य लकङियाँ भोजन में कङवाहट मिक्स कर सकती थी । उसने सबसे नीची डाली का चयन किया । और उछलकर उस डाली पर झूल गया । इसके बाद किसी जिमनास्ट चैम्पियन सा वह पेङ की इस डाली से उस डाली पर जाता रहा । और मोबायल टार्च से अन्त में वह सूखी लकङी तोङने में कामयाव हो गया ।

लकङी के सहारे से जलता हुआ मन्दिर का चङावा और उसमें मिक्स शुद्ध घी के खुशबूदार मधुर धुँये से उन तीनों को बेहद तृप्ति महसूस हुयी । शायद मुद्दत के बाद । तब प्रसून के दिल में कुछ शान्ति हुयी ।

उन तीनों को वहीं छोङकर वह उस खोह के पास पहुँचा । उसने एक लकङी से एक अभिमन्त्रित बङा घेरा खोह के आसपास खींचकर उस जगह को बाँध दिया । अब उसमें रत्ना और उसके दो बच्चे ही अन्दर जा सकते थे । अन्य रूहें उस स्थान को पार नहीं कर सकती थी । अतः काफ़ी हद तक रत्ना सुरक्षित और निश्चिन्त रह सकती थी ।

वह वापस उनके पास आया । उसने रत्ना को कुछ अन्य जरूरी बातें बतायीं । और बँध के बाहर डायनों प्रेतों के द्वारा परेशान करने पर उसे कैसे उससे सम्पर्क जोङना है । कौन सा मन्त्र बोलना है । ये सब बताया । उसने रत्ना को भरपूर दिलासा दी । बङे से बङे प्रेत अब उसके या उसके बच्चों के पास फ़टक भी नहीं पायेंगे ।

रत्ना हैरत से यह सब सुनते देखते रही । जाने क्यों उसे लग रहा था । ये इंसान नहीं है । स्वयँ भगवान ही है । पर अपने आपको प्रकट नहीं करना चाहते । जो हो रहा था । उस पर उसे पूरा विश्वास भी हो रहा था । और नहीं भी हो रहा था कि अचानक ये चमत्कार सा कैसे हो गया ।

प्रसून ने उसे बताया नहीं । लेकिन अब वह अपने स्तर पर पूरा निश्चित था । वह प्रेतों के प्रेत भाव से हमेशा के लिये बच्चों सहित बच चुकी थी । अब बस प्रसून के सामने एक ही काम शेष था । वह उन्हें किसी सही जगह पुनर्जन्म दिलवाने में मदद कर सके । लेकिन ये तो सिर्फ़ रत्ना से जुङा काम था ।

वैसे तो उसे बहुत काम था । बहुत काम । जिसकी अभी शुरूआत भी नहीं हुयी थी । यह ख्याल आते ही उसके चेहरे पर अजीव सी सख्ती नजर आने लगी । और वह - चलता हूँ बहन । कहकर उठ खङा हुआ । रत्ना एकदम हङबङा गयी । उसके चेहरे पर प्रसून के जाने का दुख स्पष्ट नजर आने लगा । वह उसके चरण स्पर्श करने को झुकी । प्रसून तेजी से खुद को बचाता हुआ पीछे हट गया ।

- अब । वह रुँआसी होकर बोली - कब आओगे भैया ?

- जल्द ही । वह भावहीन होकर सख्ती से बोला - तुम्हें । उसने खोह की तरफ़ देखा । त्यागे गये मानव मलों की तरफ़ देखा - किसी सही घर में पहुँचाने के लिये ।

फ़िर वह उनकी तरफ़ देखे बिना तेजी से मु्ङकर एक तरफ़ चल दिया । उसकी आँखें भीग सी रही थी ।
 
जिन्दगी क्या है ? इसका रहस्य क्या है ? इसका तरीका क्या है ? इसका सही गणित क्या है ? ये कुछ ऐसे सवाल थे । जिनका आज भी प्रसून के पास कोई जबाब नहीं था । क्या जिन्दगी एक किताब की तरह है । जिसके हर पन्ने पर एक नयी कहानी लिखी है । एक नया अध्याय लिखा है । वह अध्याय । वह कहानी । जो उस दिन का पन्ना खुद ब खुद खुलने पर ही पढी जा सकती थी । अगर इंसान कुछ जान सकता है । तो वो बस अपनी जिन्दगी के पिछले पन्ने । पिछले पन्ने ।

रत्ना की जिन्दगी के पिछले पन्ने । जो उसकी दिमाग की मेमोरी में दर्ज हो चुके थे । क्या हुआ था इस दुखी औरत और उसके बच्चों के साथ ? उसने दूसरे के दिमाग को अपने दिमाग से चित्त द्वारा देखना शुरू किया ।

वह निरुद्देश्य सा चलता जा रहा था । और उसके आगे आगे सिनेमा के पर्दे की तरह एक अदृश्य परदे पर गुजरा हुआ समय जीवन्त हो रहा था । वह समय जब रत्ना शालिमपुर में रहती थी ।

सुबह के दस बज चुके थे । रत्ना घर के काम से फ़ारिग हो चुकी थी । नरसी कुछ ही देर में खेत से आने वाला था । बच्चे बाहर दरवाजे पर खेल रहे थे । अब वह जल्दी से नहाकर बस अपने पति के साथ भोजन करने वाली थी । गुसलखाने में जाने से पहले उसने दरवाजे की कुण्डी लगाने का विचार किया । फ़िर उसने ये विचार त्याग दिया । नरसी किसी भी क्षण लौट सकता है । और तब उसे कुण्डी खोलने में दिक्कत आने वाली थी ।

नहाते समय वह बारबार यही सोच रही थी । कितनी खुशनुमा जिन्दगी उन्हें भगवान ने दी है । उसे प्यार करने वाला हट्टा कट्टा पति मिला था । उसके दो प्यारे बच्चे हैं । उसके पास जीवन यापन हेतु पर्याप्त खेती है । उसकी जिन्दगी की बगिया खुशी के फ़ूलों से हर वक्त महकी हुयी थी ।

बस उसे यही कमी खलती थी कि काश नरसी का परिवार कुछ और भी बङा होता । पर ऐसा नहीं था । नरसी अपने माँ बाप का अकेला था । उसके सिर्फ़ एक ही बहन थी । जिसकी दूर देश शादी हो चुकी थी । माँ बाप उसके बहुत पहले ही गुजर गये थे । पर वे नरसी के लिये बीस बीघा जमीन छोङ गये थे । जिस पर खेती से पर्याप्त कमाता हुआ नरसी उर्फ़ नरेश अपने छोटे से परिवार को सुख से चला रहा था । और उन दोनों पति पत्नी को उससे अधिक चाह भी नही थी । वे अपनी जिन्दगी से हर हाल में खुश थे । खुश रहना चाहते थे । जिन्दगी । जिसका एक एक पन्ना रहस्य की स्याही और रोमांच की कलम से लिखा जाता है ।

ब्लाउज के हुक बन्द करते करते उसकी निगाह अपने स्तनों पर गयी । और वह खुद ही शर्मा गयी । पुरुष के सानिध्य से स्त्री कैसे एक फ़ूल की तरह खिल उठती है । महक उठती है । उसका अंग अंग पुरुष के प्यार को दर्शाता है ।

कुँआरेपन से ही उसने इस बारे में क्या क्या अरमान संजोये थे । और अपने आपको वासना के भूखे भेङियों से हर जतन से बचाये रखा था । उसका कौमार्य और जवानी सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने पति पर निछावर करने के लिये थे । और वह वैसा करने में सफ़ल भी रही थी ।

यही सब सोचते हुये उसने साङी का पल्लू कमर में खोंसा । और बाहर निकलने को हुयी । तभी नरसी ने घर के अन्दर कदम रखा । उसकी हालत देखकर वह घवरा गयी । ऐसा लग रहा था । शायद उसका किसी झगङा हुआ था । उसके चेहरे पर भी बैचेनी सी छायी हुयी थी ।

उसने सारा दिन नरसी से बारबार बात पूछने की कोशिश की । पर वह शून्य में देखता हुआ बात को टालता ही रहा । फ़िर रात को उसका धैर्य जबाब दे गया । वह उसके सीने से लग गयी । और बेहद अपनत्व से बोली - सुनो जी ! क्या तुम मुझे परायी समझते हो ।

- रत्ना ! कहीं शून्य में खोया खोया सा उदास नरेश बोला - बाई चांस मुझे कुछ हो जाय । तो तुम खुद को संभालना । इन बच्चों को ठीक से पालना । क्योंकि मेरा कोई भाई नहीं है । और भी कोई नहीं है । फ़िर इन बच्चों का तुम्ही सहारा होगी । वरना ये मासूम बच्चे दर दर को भटक जायेंगे ।

- क्या । वह भौंचक्का होकर बोली - ऐसा क्यों कह रहे हो जी ?

वह बारबार कसम खिलाती रही । पर नरेश जाने क्यों उसे कोई बात बताना नहीं चाहता था । रत्ना को सारी रात नींद नहीं आयी । ये अचानक जिन्दगी ने आज कैसा रंग बदलना शुरू किया था ।
 
चलते चलते प्रसून ने सामने निगाह डाली । महावीर का टयूब बैल नजर आने लगा था । पर वह उसका लक्ष्य नहीं था । उसका लक्ष्य उसके एक दिशा में सामने दूर बनी महुआ आम की बगीची थी । जहाँ प्रेतवासा था । वह तेज कदमों से उसी तरफ़ बढ रहा था ।

तब रत्ना की जिन्दगी का अगला अध्याय शुरू हो गया ।

रात के दस बज चुके थे । नरसी शायद सोया हुआ था । या आँखें बन्द किये हुआ था । पर रत्ना बैचेनी से करवटें बदल रही थी । क्या हो गया था । नरसी को । कुछ दिनों से खोया खोया सा रहता था । उसने चुप चुप उसे रोते हुये भी देखा था । बहुत पूछने पर यही बोला था - रत्ना ! काश हमारे घर भी दो चार भाई या परिवार वाले होते ।

तब वह चुप कर गयी थी । इतना तो वह समझ गयी थी कि नरसी उसे वह बात बताकर और दुखी नहीं करना चाहता । शायद बात ही ऐसी हो । जिसका उसके पास कोई हल ही न हो । चैन इक पल नहीं । और कोई हल नहीं ।

तभी अचानक धप्प से आँगन में कोई कूदा । और वह काँपकर रह गयी । लेकिन इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती । वह साया ठीक नरसी के पास आ खङा हुआ । उसने रिवाल्वर उसके ऊपर टिका दी ।

और बोला - उठ जा भाई ! मौत ये नहीं देखती कि कोई सो रहा है । या जाग रहा है ।

नरसी चुपचाप उठ खङा हुआ । जैसे ये बात पहले ही से जानता हो । तभी वह साया रत्ना को लक्ष्य करता हुआ बोला - भाभी ! तू भी उठ । अपने साजन को विदा नहीं करेगी क्या ?

वह उन दोनों को बाहर खङी सूमो तक ले आया । और जबरदस्ती अन्दर धकेल दिया । रत्ना ने सहमकर चारों तरफ़ देखा । पर गली में सन्नाटा था । वह फ़रियाद सी करती हुयी बोली - पर मेरे बच्चे ।

- उनको । वह ठण्डे स्वर में बोला - आराम से सोने दे । क्यों डिस्टर्ब करेगी । बस कुछ ही देर में तू वापस आने वाली है ।

सूमो उन्हें लेकर एक फ़ार्म हाउस पहुँची । वहाँ एक गन्दे से कमरे में बल्ब जल रहा था । उस कमरे में सुरेश और महावीर बैठे हुये शराब पी रहे थे । रत्ना उनको देखकर एकदम चौंककर रह गयी । उसको लाने वाले आदमी ने भी नकाब उतार दिया था । वह भी गाँव का ही रहने वाला इतवारी था ।

नरसी को सुरेश के इशारे पर जंगले से बाँध दिया गया था । उसकी आँखों में तीनों के लिये नफ़रत के भाव थे । मौत को तो मानों वह साक्षात खङी ही देख रहा था । रत्ना को हसरत उदासी गम विदाई के मिले जुले भावों से देख रहा था । फ़िर इसके अलावा भी वह भावहीन शून्य सा खङा था । रत्ना को समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस कदर खामोश क्यों है । उसके कानों में कभी कहे नरसी के शब्द गूँजे - रत्ना ! वैसे मैं एक चींटी को भी कभी नहीं मारता । पर ये भी सच है कि मैं तीन चार को अकेला ही धूल चटा सकता हूँ ।

अभी यह सब देखती हुयी वह कुछ समझने की कोशिश कर ही रही थी । तभी उसे सुरेश की आवाज सुनाई दी । वह उठ खङा हुआ । और बोला - भाभी ! तू बङी सस्पेंस में लगती है । चल तेरा सभी सस्पेंस अब खत्म कर ही देते हैं ।

ये जो जमीन होती है ना । उसने नीचे जमीन की तरफ़ उँगली की - बहुत जमाने से झगङे मौत की तीन खास वजहों में से एक है । वे तीन वजहें ज्ञानियों ने जर जोरू और जमीन ही बतायी हैं । जर यानी जायदाद हमारे पास बहुत है । जोरू भी है । और कम पङती है । तो बाहरवाली मिल जाती है । और वैसे जमीन भी है । पर भाभी जी ये जमीन की भूख ऐसी है । जो कभी कम नहीं होती । अब देखो ना । दुर्योधन के पास कितना बङा राज्य था । पर वह बोला - नहीं ! हरगिज नहीं । मैं पाण्डवों को सुई बराबर जमीन भी नहीं दूँगा । तब सोच भाभी । अगर मैं जो करने जा रहा हूँ । उसमें कुछ गलत हो । तो तेरा जूता मेरा सर । क्यों भाईयो ।

उन दोनों ने सहमति में सिर हिलाया । रत्ना अभी भी कुछ न समझती हुयी असमंजस में उसे ही देखे जा रही थी ।

- मैं फ़िर से बात पर आता हूँ । वह गम्भीरता से बोला - तू जानती ही है । मैं इसके नरसी के सगे चाचा का लङका हूँ । इसका छोटा भाई । यानी तेरा खानदानी देवर । मैंने इसे कई बार समझाया । तू ये बीस बीघा जमीन मुझे दे दे । क्योंकि हो सकता है । फ़िर कहीं ये जमीन ही तेरी जान की दुश्मन बन जाय । और ऐसा भी नहीं हम कोई अन्याय कर रहे हों । ना ना अन्याय तो हम कर ही नहीं सकते । मैंने कहा । तू ये जमीन पाँच हजार रुपया बीघा के हिसाब से दे । और अपने नगद पैसे ले । नगद । उधार का कोई लफ़ङा नहीं । क्यों भाईयों इसमें कोई गलत बात थी । हो तो बोलो । फ़िर भाभी की जूती मेरा सर ।

दोनों ने फ़िर बङी संजीदगी से सिर हिलाया । और बोले - नहीं । कोई गलत बात नहीं । एकदम न्याय वाली बात थी ।
 
देखा भाभी ! वह फ़िर से बोला - ये साले कुत्ते की नस्ल वाले भी इसको सही बता रहे हैं । पर तेरे आदमी को ये एकदम गलत ही लगी । टोटली रांग । इसने मुझे जमीन देने से साफ़ इंकार कर दिया । वोला किसी कीमत पर नहीं । चाहे जान क्यों न चली जाय । और दूसरी बात ये है । वह गौर से रत्ना के ब्लाउज पर देखता हुआ बोला - हम इसे बदले में और जमीन भी दिलवा रहे थे । वहाँ जो जंगल क्षेत्र में जमीन पङी है । बस थोङी सी कम उपजाऊ है । और मौके की नही है । बस इतनी ही तो बात थी ।

फ़िर भाभी जी ! कहावत है ना । एवरीथिंग इज फ़ेयर लव एण्ड वार । और संसार में जंगल राज कायम है । और ये आज का नहीं है । बहुत पुराने जमाने का है । रावन को ले लो । कंस को ले लो । दुर्योधन को ले लो । पूरा इतिहास भरा पङा है । अगर आप गौर करो । तो सबसे ज्यादा लङाईयाँ जमीन के लिये हुयी । सबसे ज्यादा जानें जमीन के लिये गयी । बस हमने भी इससे लङाई की । पर गजब रे गजब । इसने हम तीनों को अकेले मारा । बहुत मारा भाभी जी । कसम से याद आ जाता है । तो अभी भी दर्द होने लगता है । तब हमने साम दाम दण्ड भेद । यानी चारों हथकण्डे अपनाओ । पर बस अपना काम बनाओ । वाली बात अपनायी । क्योंकि हम अच्छी तरह जानते थे । हम इससे लङकर नहीं जीत सकते । हम कट्टा तमंचा चला सकते हैं । तो ये भी चलाना जानता है । हम इसको गोली मार सकते हैं । तो ये भी मार सकता है । भाभी तुम्हारा बलमा कोई गीदङ नहीं । पूरा शेर है । बब्बर शेर । पर शेर भी पिंजङे में आ ही जाता है । बस ट्रिक होनी चाहिये । क्यों भाईयों ?

अबकी दोनों ने बिना कुछ बोले ही समर्थन में सिर हिलाया । लेकिन तभी महावीर बोला - सुरेश ! तू जल्दी कहानी खत्म कर । हम यहाँ बैठे नहीं रहेंगे ।

सुरेश ने मुङकर रिवाल्वर उस पर तान दी । और दाँत पीसकर बोला - शटअप ! महावीर । क्या तू जानता नहीं । मैं कितना न्याय पसन्द इंसान हूँ । अन्याय करना । और होते देखना । मुझे कतई पसन्द नहीं । अगर ये ऐसे ही मर गया । तो भाभी जीवन भर यही सोचती रहेगी । आखिर बात क्या थी । इसीलिये इसको बुलाया भी है । वरना इसे खामखाह परेशान करने की भला क्या आवश्यकता थी ।

तो भाभी जी ! फ़िर हुआ यूँ कि हमने इसको साम दाम दण्ड भेद से समझाया । देख नरसी । तेरे छोटे छोटे दो बच्चे हैं । क्या तू चाहता है कि किसी दिन बेचारे अल्पायु ही कहीं कटे मरे पङे मिलें । तेरी जवान बीबी है । क्या तू चाहता है । अचानक किसी दिन कुछ हरामजादे उससे बलात्कार कर जायें । और फ़िर वो तुझे या अन्य किसी को मुँह दिखाने के काबिल भी नहीं रहे । और फ़ाँसी लगाकर । जलकर । नहर में कूदकर । जहर खाकर । मरने के बहुत से आयडिये होते हैं । किसी आयडिये से मर जायें । इसलिये वो लोग मरें । इससे अच्छा तू अकेला ही मर जाये । क्यों तीन हत्याओं का पाप अपने सिर लेगा । फ़िर हम उन तीनों को कुछ नहीं बोलेंगे । क्यों भाईयो कुछ गलत बोला मैं ?

- व्हाट अ आयडिया सर जी ! महावीर बोला - आप हमेशा सही बोलते हैं ।

- खामोश ! वह नफ़रत से बोला - किसी की जान पर पङी है । और तुझे आयडिया सूझ रहा है । तो भाभी जी ...।

- न न नही..नहीं.. भैया नहीं । अचानक रत्ना मानों सब कुछ समझ गयी । वह फ़ूट फ़ूटकर रो पङी । उसे पिछले दिनों के नरसी के रहस्यमय अजीब से व्यवहार के सभी कारण एकदम पता चल गये - आप जमीन ले लो । सब ले लो । पर इन्हें कुछ न कहो । इन्हें छोङ दो । हम लोग इस गाँव से दूर चले जायेंगें । भीख माँगकर गुजारा कर लेंगे । पर मेरे बच्चों को अनाथ न करो । मैं आपसे हाथ जोङकर दया की भीख माँगती हूँ । मुझ पर रहम करो । मेरे छोटे छोटे बच्चों पर दया करो सुरेश । मैं तुम्हारे पाँव पङती हूँ ।

अरे रे रे ..यह क्या कर रही हो भाभी ! वह घवराकर बोला - मुझे क्यों पाप में डाल रही हो । आप मेरी भाभी हो । और भाभी माँ समान होती है । पर..। वह फ़िर से नरसी की छाती पर उँगली से ठकठकाता हुआ बोला - पर मैं क्या करूँ भाभी । मैंने इस बात पर भी बहुत सोचा । क्योंकि मैं बहुत भावुक हूँ ना । दया और प्रेम तो मेरे अन्दर कूट कूटकर भरा हुआ है । अन्याय मुझसे कतई सहन नहीं होता । क्यों भाईयो । ठीक कह रहा हूँ ना । गलत बोलूँ । तो भाभी की चप्पल और मेरा सर ।

- आप बहुत ही दयालु हो । इतवारी बेहद संजीदगी से बोला - आप जैसे दयालु कभी कभी ही पैदा हो पाते हैं । आप गजनी धर्मात्मा हो ।

- ओये खङूस ! सुरेश उसकी तरफ़ रिवाल्वर तानता हुआ बोला - तुझसे किसी ने कहा था । बीच में बोलने को । मैं अपनी प्यारी भाभी जी से बात कर रहा हूँ । हाँ तो भाभी जी । मैंने इस बात पर भी बहुत सोचा कि तुम सबको जीता जी छोङ दूँ । मुझे बस जमीन ही तो चाहिये । जमीन ले लूँ । और तुम सबको कहीं भी जाने दूँ । पर भाभी जी पर..इतिहास..इतिहास गवाह है । जिसने भी ऐसा किया । कुत्ते की मौत मारा गया । दुर्योधन को ले लो । पाँडवों को छोङने का परिणाम क्या हुआ । रावण को ले लो । विभीषण को छोङने का परिणाम क्या हुआ । इसलिये हर समझदार इंसान को इतिहास से सबक लेना चाहिये । क्योंकि इतिहास अपने आपको दुहराता है । इसलिये भाभी जी मैं मरना नहीं चाहता । मैं मरना नहीं चाहता । मुझे मरने से बङा डर लगता है । मारने से बिलकुल नहीं लगता । पर मरने से बहुत लगता है । अगर मैंने इसको छोङ दिया । तो वक्त कोई भी करवट बदल सकता है । आज मैं इसे मारने वाला हूँ । कल ये भी मुझे मार सकता है । समय का क्या भरोसा । ये बहुत जल्द पलटा खाता है । राजा रंक हो जाता है । और रंक राजा । इसलिये समझदार इंसान को समस्या को जङ से ही खत्म कर देना चाहिये ।
 
कहते कहते उसका चेहरा सर्द हो उठा । उसने रिवाल्वर वापस फ़ेंटे में खोंस लिया । और लम्बे फ़ल वाला चमचमाता हुआ चाकू निकाल लिया । चाकू की नोक से उसने अपना अँगूठा चीरा । और वहाँ से बहते हुये रक्त से नरसी के माथे पर तिलक किया । फ़िर वह नरसी के गले मिलकर रोने लगा । और भर्राये स्वर में बोला - मुझे माफ़ कर देना भाई । बङे भैया । मुझे माफ़ कर देना । मैं तुझे बचाना तो चाहता था । पर बचा न सका । बलिदान की परम्परा से ही वीरों का इतिहास लिखा है । ठीक है भाभी..। वह मुङकर उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला ।

रत्ना अचानक आगे का दृश्य तुरन्त समझ गयी । वह दौङकर सुरेश के पैरों से लिपट गयी । वह बारबार नरसी के पैरों से भी - स्वामी आप कुछ करते क्यों नहीं ..कहते क्यों नहीं..कहती हुयी लिपटने लगी । सुरेश भी उसके साथ फ़ूट फ़ूटकर रो रहा था । फ़िर अचानक वह दाँत भींचकर बोला - ऐ हरामजादो ! संभालते क्यों नहीं इसको । मौत का मुहूर्त निकला जा रहा है ।

दोनों तुरन्त रत्ना की तरफ़ लपके । उसी पल सुरेश ने चाकू नरसी के पेट में घोंप दिया । वह कुछ पल नरसी की आँखों में झाँकता रहा । फ़िर उसने चाकू को क्लाक वाइज घुमाया । उसे बङी हैरानी थी । नरसी मामूली सा भी नहीं चीखा । बस उसके चेहरे पर घनी पीङा के भाव जागृत हो गये थे । असहनीय दर्द से उसका चेहरा विकृत हो रहा था । वह बारबार अपने को संभालने की कोशिश कर रहा था । पर असफ़ल हो रहा था । आखिर वह बङी कठिनाई से बोल पाया - र र रत रत्ना इधर आ ।

वह तुरन्त उठकर उसके सामने खङी हो गयी ।

- मेरे बच्चों को । वह अटकती आवाज में बोला - संभालना..उन..क ।

और बात पूरी होने से पहली ही उसकी गरदन एक तरफ़ लुङक गयी ।

मौत सिर्फ़ एक है । एक बार ही आती है । अंजाम भी एक ही होता है । वो शरीर जो अब तक चल फ़िर रहा था । उसका निष्क्रिय हो जाना । मिट्टी के पुतले मानुष का वापस मिट्टी में ही मिल जाना । सारे रिश्ते नातों को एक झटके से बेदर्दी से तोङ देती है मौत ।

पर ये एक बार की मौत भी कई अजीव रंग लेकर आती है । कभी खामोशी से । कभी गा बजा के । कभी हाहाकार फ़ैलाती हुयी । कभी सिसकियों के साथ । दुश्मनी भाव में कभी खुशी के भी साथ । अनेक रंग है इसके । अनेक रूप है इसके । इसके रहस्य जानना बङा ही कठिन है ।

ऐसा ही मौत का अजीव रंग नरसी की मौत पर भी छाया था । वो इंसान पता नहीं । कब से जीवित ही मौत को देख रहा था । और एक स्वस्थ हाल आदमी किसी बीमार जर्जर आदमी की मौत मरने पर विवश हुआ था ।

बीस मिनट हो चुके थे । नरसी की लाश जमीन पर पङी थी । अब वह हमेशा के लिये न उठने को गिर चुका था । रत्ना को जोर से रोने भी न दिया था । वह अपनी जगह पर ही तङफ़ङा कर रह गयी थी । और फ़टी फ़टी आँखों से बस नरसी की लाश को देखे जा रही थी ।

अचानक उसका चेहरा सख्त हो गया । भावहीन सी उसकी आँखे शून्य हो गयी । तीनों अभी भी बैठे शराब पी रहे थे । उसने नरसी की लाश पर निगाह डाली । और दौङकर उससे लिपट गयी । अब तक जबरन रोकी गयी उसकी रुलाई फ़ूट पङी ।

हेऽऽ ईश्वरऽऽऽऽ । वह गला फ़ाङकर चिल्लाई - अबऽऽऽ विश्वास नहीं होता कि तू हैऽऽऽऽ । नहीं विश्वास होता । इस दुनियाँ में कोई ईश्वर । कोई भगवान है । इस देवता आदमी ने क्या गुनाह किया था । अपने जान में इसने कभी चींटी नहीं मरने दी । हर परायी औरत को माँ बहन समझा । दूसरे की भलाई के लिये कभी इसने रात दिन नहीं देखा । तेरे हर छोटे बङे द्वार पर इसने सर झुकाया ।

- और परिणामऽऽऽ । उसने छाती पर हाथ मारा । और दहाङती हुयी बोली - मुझे जबाब देऽऽऽ भगवान । मुझे जबाब चाहिये । मुझे जबाब चाहियेऽऽ । वह अपना सर जमीन पर पटकने लगी - मुझे जबाब देऽऽ भगवन । आज एक दुखियारी औरत । एक बेबा औरत । एक अवला नारी । दो मासूम बच्चों की माँ । सिर्फ़ तुझसे जबाब चाहती है । क्या यही है तेरा न्याय ? क्या ऐसाऽऽ ही भगवान है तूऽऽ । तूने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया ? तूने क्यूँ मेरी हरी भरी बगिया उजाङ दी । मुझे जबाब देऽऽ भगवान । वह फ़िर से भयंकर होकर दहाङी - मैं सिर्फ़ऽऽ जबाब चाहती हूँऽऽऽ । मैं तुझसे दया की भीख नहींऽऽ माँग रही । सिर्फ़ जबाब देऽऽ । तुझे जबाब देनाऽऽ ही होगा । मुझे एक बार जबाब दे भगवान ।

मगर कहीं से कोई जबाब नहीं मिला । फ़िर वह उठकर खङी हो गयी । उसके चेहरे पर भयंकर कठोरता छायी हुयी थी । उसने बेहद घृणा और नफ़रत से तीनों की तरफ़ देखा ।
 
और जहर भरे स्वर में बोली - कान खोलकर सुन हरामजादे । नाजायज । रण्डी से पैदा सुअर की औलाद । अगर तूने कुतिया का दूध नहीं पिया । तो मार डाल मुझे भी इसी वक्त । और मार डाल । उन दो नन्हें बच्चों को भी ।

- भाभी..भाभी.. भाभी माँ । सुरेश रोता हुआ बोला - ऐसा मत बोलो । मैं बहुत कमजोर दिल इंसान हूँ ।

- थू..थू.. थू है तुझ पर । वह घृणा से थूक कर बोली - आखिरी बात । गौर से सुन हरामजादे । ये एक अवला औरत । एक पतिवृता नारी । और एक देवता इंसान की.. पत्नी का शाप हैऽऽ तुझेऽऽ । कहते कहते उसने पेट पर नाभि के पास गोल गोल हाथ घुमाया । और ऊपर देखती हुयी बोली - अगर मैंने जीवन भर एक सच्ची औरत के सभी धर्म निभाये हैं । तो यही जमीनऽऽऽ । जिसके लिये.. तूने मेरा घर.. बरबाद कर दिया । बहुत जल्द तुझे मिट्टी में मिला देगी ।

कहकर वह बिना मुङे झटके से बाहर निकल गयी । सुरेश ने इतवारी को उसे छोङने हेतु भेजा भी । पर वह अँधेरे में पैदल ही भागती चली गयी । वह बहुत तेजी से अपने घर की तरफ़ भाग रही थी ।

चलते चलते प्रसून रुक गया । उसकी गहरी आँखों में आँसुओं का सैलाव सा उमङ रहा था । और चेहरे पर अजीव सी सख्ती छायी हुयी थी । क्रोध से योगी की सभी नसें नाङियाँ फ़ूल उठी थी । वह वहीं खङे पेङ के तने पर बेबसी से मुठ्ठी बारबार मारने लगा । काफ़ी देर बाद वह शान्त हुआ । फ़िर योगस्थ होकर उसने गहरी गहरी साँसे खींची । और वहीं पेङ के नीचे बैठकर ध्यान करने लगा । सुबह के तीन बजने वाले थे । प्रेत अपने स्थानों पर वापस जाने लगे होंगे । अतः उसने महुआ बगीची की ओर जाने का ख्याल छोङ दिया । वैसे भी वह निरुद्देश्य वहाँ जा रहा था । उसका पूर्व निर्धारित लक्ष्य अभी कुछ नहीं था । शायद कुछ हो । बस यही सोच थी ।

पर अभी भी उसके सामने सवाल थे । आगे आखिर क्या हुआ था ? क्या रत्ना ने दोनों बच्चों के साथ आत्महत्या कर ली थी । नरसी की मौत के बाद उसका क्या हुआ था । जाने क्यों वह इस कहानी को देखना नहीं चाहता था । पर देखने को मजबूर ही था । उसने एक निगाह दूर पीछे छूट गये शालिमपुर के शमशान की तरफ़ डाली । और रत्ना की जिन्दगी का अगला अध्याय खोला ।

नरसी की मौत के बाद रत्ना ने शालिमपुर छोङ दिया था । वह अपने दोनों बच्चों के साथ खेत पर रखवाली के उद्देश्य से बनी झोंपङी का ही विस्तार कर उसमें रहने लगी थी । अब उसमें जीने की कोई चाह नहीं रही थी । वह बस लाश की तरह अपने बच्चों के लिये जी रही थी । वह अकेली ही दिन रात खेत में जी तोङ मेहनत कर अपने को थका लेती थी । और शाम को सब कुछ भूलकर बेहोशी जैसी नींद में चली जाती थी । बस यही उसकी जिन्दगी रह गयी थी । उसने एक बार दोनों बच्चों के साथ जान देने के बारे में भी सोचा । मगर नरसी के अन्तिम शब्द और उसका लिया हुआ वादा याद आते ही वह काँपकर रह गयी । फ़िर उसने अपनी जिन्दगी की बेलगाम कश्ती को वक्त के निर्मम थपेङों के साथ उसके हालात पर छोङ दिया । उसके चेहरे पर एक स्थायी शून्यता छा गयी थी । उसकी सूनी सी स्याह आँखों में जिन्दगी का कोई रंग नहीं बचा था ।

नरसी की लाश एक नहर के पास से बरामद हुयी थी । जिस पर सभी गाँव वालों ने रोते पी्टते हाय हाय करते हुये किसी अज्ञात हत्यारे द्वारा अज्ञात कारणों से हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी थी । फ़ूट फ़ूटकर रोता हुआ सुरेश अपने तयेरे भाई के साथ ही मानों मर जाने को ही तैयार था । बङी मुश्किल से लोगों ने उसे रोका । वह भाभी भाभी माँ कहते हुये रत्ना के पैरों से भी लिपटता था । और बारबार छाती पीटते हुये यही अफ़सोस करता था कि - काश ! मौत के समय वह भी नरसी भैया के पास होता । तो अपनी जान देकर भी वह उन्हें बचाता ।

रत्ना भावहीन चेहरे से ये सब अन्तिम नाटक देखती रही । और फ़िर वह गाँव का घर छोङकर खेतों पर आ गयी ।
 
तब रात के बारह बजे थे । पूरे शालिमपुर में सन्नाटा छाया हुआ था । गाँव के सभी लोग नींद के आगोश में जा चुके थे । शालिमपुर के शमशान में प्रेतों की चहल पहल जारी थी । रत्ना गहरी नींद में सोयी पङी थी कि अचानक हङबङा कर उठ बैठी ।

कोई उसके सीने पर आहिस्ता आहिस्ता हाथ फ़ेर रहा था । आँखे खुलते ही उसे वे तीन शैतान नजर आये । महावीर और इतवारी एक तरफ़ खङा था । सुरेश जमीन पर आराम से पालथी लगाये उसके स्तनों को सहला रहा था ।

- तू जाग गयी । सुरेश मीठे स्वर में बोला - मैंने सोचा । तुझे डिस्टर्ब न करूँ ।

रत्ना ने भावहीन चेहरे से पास सोये अपने दोनों बच्चों को देखा । बेबसी से उसके आँसू निकलने को हुये । जिसे उसने सख्ती से निकलने से पहले ही रोक दिया । उसने अपना आँचल ठीक करने की कोशिश की । जिसे सुरेश ने फ़िर से झटक दिया । उसे मन ही मन अपनी प्रतिज्ञा याद आयी कि - जीवन में कितना भी जुल्म उस पर हो । वह कोई विरोध नहीं करेगी । बल्कि वह देखेगी कि इस दुनियाँ में भगवान का न्याय क्या है ? भगवान है भी । या नहीं । या यहाँ सिर्फ़ शैतान का राज है । सिर्फ़ शैतान का राज । शैतान ।

और शैतान उसके सामने थे ।

सुरेश उसका ब्लाउज हटाने लगा । वह लाश की तरह हो गयी । और उसने सख्ती से अपनी आँखे बन्द कर ली ।

आँखे खोल भाभी ! सुरेश उसका गाल थपथपाकर बोला - यूँ मुर्दा मत हो । क्यूँ मेरा दिल तोङती है तू । अपने देवर का स्वागत नहीं करेगी क्या । कैसी भाभी है तू । देवर क्या होता है । नहीं जानती । देवर का मतलब होता है । दूसरा वर । जब पहला वर न हो । तब वर की जगह पूरी करने वाला दूसरा वर । देवर .. ही होता है ।

उसके शरीर से उतरते कपङों के साथ साथ उसके आज तक के पहने विश्वास के आवरण भी उतरते जा रहे थे । ईश्वर भी उसकी भावनाओं से उतर गया । भगवान भी उतर गया । खुदाई मददगार भी उतर गये । रिश्ते उतर गये । नाते उतर गये । गाँव उतर गया । शहर उतर गये । और वह अन्दर बाहर से पूर्ण नग्न हो गयी । एकदम नग्न । एक मन्दिर में लगी बेजान पत्थर सी नग्न मूर्ति ।

शैतान उसके मुर्दा शरीर को मनचाहा घुमा रहे थे । और खुद के विचार उसके मन को घुमा रहे थे । ये इंसान किस कदर अकेला है । किस कदर असुरक्षित है । चारों तरफ़ हैवानियत का नंगा नाच हो रहा है । बच्चे कहीं जाग न जायें । इसलिये उसने अपने मुँह से निकलने वाली हर आवाज को रोक दिया था ।

तीनों के चेहरे पर तृप्ति के भाव थे । पर वह किसी भावहीन वैश्या की तरह अपने कपङे ठीक कर रही थी । उसकी सभी भावनायें अभी अभी रौंदी जा चुकी थी । मानसिक हलचल के तिनकों को दरिन्दों की वासना का तूफ़ान उङा ले गया था । उसकी आखिरी अमानत । आखिरी पूँजी । उसका सतीत्व भी लुट गया था । अब कुछ नहीं बचा था । जिसको बचाने का जतन करना था ।

हे प्रभु ! वह भावुक होकर मन ही मन बोली - आपको बारम्बार प्रणाम है । प्रणाम है । आपकी लीला अपरम्पार है । पार है । आप दयालु से भी दयालु हो । दयालु हो । सबकी रक्षा करने वाले हो । करने वाले हो । कोई द्रौपदी नंगी होती है । नंगी होती है । तब आप दौङे दौङे आते हो । दौङे दौङे आते हो । हे दाता प्रभु ! आप किसी असहाय पर जुल्म होता नहीं देख सकते । नहीं देख सकते । आपकी इस महिमा को भला आपके सिवा दूसरा कौन समझ सकता है । कौन समझ सकता है । मेरा बारम्बार प्रणाम स्वीकार करें प्रभु । स्वीकार करें प्रभु ।

तभी वह फ़िर से चौंकी । ख्यालों में खोयी उसे सुरेश की आवाज फ़िर से सुनाई दी । वह मधुर स्वर में बोला - भाभी..भाभी जी..भाभी तू कितनी अच्छी है । देख । वैसे तो हम ये सोचकर आये थे कि नरसी मर गया है । किसी राक्षस हत्यारे ने उसे मार डाला । कुछ तेरा हालचाल पूछ आयें । कुछ तेरी भूख प्यास का इंतजाम करें ।

लेकिन भाभी ! आजकल इतना भी टाइम नहीं किसी के पास कि सिर्फ़ एक काम के लिये किसी के पास भागा भागा पहुँच जाये । आज आदमी एक बार के जाने में दो काम निकालता है । तीन भी निकाल लेता है । चार भी । और पाँच भी ।

सो देख । तेरा पहला काम तो हमने निकाल दिया । अब इसे तेरा काम समझ ले । या मेरा समझ ले । ये तेरी मर्जी । हमने तो तुझ पर दया ही की । हमेशा दया । भाभी । वह भीगे स्वर में बोला - मैं बचपन से ही बङा भावुक हूँ । किसी का दुख मुझसे देखा नहीं जाता । यहाँ ..उसने दिल पर हाथ रखा - यहाँ से रोना आता है । क्यों भाइयों कुछ गलत बोला मैं । गलत हो तो । भाभी का जूता । और मेरा सिर ।

कुछ गलत नहीं । महावीर संजीदगी से बोला - आप सच्चे धर्मात्मा हो । गजनी धर्मात्मा ।

- कमीनों ! वह नफ़रत से बोला - डफ़र ! आज शायद पहली बार तुम सही बोले हो । खैर..तुम भाङ में जाओ । मैं अपनी प्यारी भाभी से बात करता हूँ । भाभी ! उसके हाथ में एक शीशी प्रकट हुयी - इसको पायजन बोलते हैं । हिन्दी में जहर । बङे काम की चीज बनायी है । भगवान ने ये । कोई दवा.. दुख दर्द दूर न कर पाये । ये सभी दुख दर्द मिटा देती है । वो भी हाथ के हाथ । इधर दवा अन्दर । उधर दुख बाहर । फ़िर भला मैं कैसे तुझे दुखी देख सकता हूँ । लेकिन ये..। उसके हाथ में कागज और एक पैड प्रकट हुआ - ये भी देख भाभी । इससे अँगूठा की ठप्पा निशानी लगाते हैं । और ये ठप्पा इन कागजों पर लगाना है । इस ठप्पे का मतलब ये है कि हालतों से मजबूर तूने ये जमीन हमें बेच दी । बाकी कोर्ट कचहरी के कुछ झंझट होते हैं । जो सब ले देकर निबट जाते हैं । जैसे दारोगा निबट गया । थाना निबट गया । बीस हजार जमा करो । और थाने में बोलकर मर्डर करने जाओ । अब उनके भी बाल बच्चें होते हैं भाभी । बाल बच्चे..। कहते कहते उसने एक सर्द निगाह सोये हुये मासूम बच्चों पर डाली - बाल बच्चे । जैसे ये हैं । और मैं चाहता हूँ । दो तीन साल के छोटे छोटे ये बाल जैसे फ़ूल से बच्चे भी क्यूँ इस बेदर्द जालिम दुनियाँ में कष्ट भोगें ।

रत्ना के चेहरे पर कोई भाव नहीं था । उसने एक निगाह अपने बच्चों पर डाली । और.. एक मिनट..सुरेश कहती हुयी झोंपङी से बाहर आ गयी । उसने एक निगाह दूर तक फ़ैली अपनी जमीन पर डाली । जिसके जर्रे जर्रे से नरसी की महक आ रही थी । वह झुकी । उसने मिट्टी उठाकर हाथ में ले ली । और उसे अपने बदन पर लगाने लगी । वे तीनों हैरत से उसे देख रहे थे । उसने मिट्टी से मुँह पोत लिया । छाती पर लगाया । और हर जगह लगाया । फ़िर उस विधवा ने उसी मिट्टी का सिन्दूर अपनी माँग में भर लिया । उसने शून्य 0 आँखों से अन्तिम बार फ़िर से खेतों को देखा । और पति के चरणों का भाव करते हुये उसे झुककर प्रणाम किया । उसने मुङकर शालिमपुर को देखा । जहाँ कभी उसके अरमानों की डोली आयी थी । उसने हाथ जोङकर अपनी ससुराल का भाव करते हुये उसे भी प्रणाम किया ।

वह फ़िर से भीतर आयी । और एक निगाह उसने फ़िर से बच्चों पर डाली । किसी भी चिन्ता से बेफ़िक्र वे मासूम मीठी नींद सो रहे थे । उसने एक झटके से सुरेश से कागज ले लिये । और बताये गये स्थान पर अँगूठा लगाती गयी । फ़िर उसने सुरेश के हाथों से जहर की शीशी ले ली । और अपने बच्चों के पास बैठ गयी । न चाहते हुये भी उसके दोनों आँखों से एक एक बूँद गालों पर लुङक ही गयी । उसने अपने बच्चों के गाल पर प्यार से हाथ फ़ेरा । उनके माथे पर चुम्बन किया । और फ़िर दृणता से ढक्कन खोल लिया । सोते हुये बच्चों का मुँह खोलकर उसने बारी बारी से उनके मुँह में जहर उङेल दिया । फ़िर उसने संतुष्टि भाव से शीशी में बचे जहर को देखा । और - हे प्रभु ! कहते हुयी बचा हुआ जहर गटागट पी गयी ।
 
रात के पूरे बारह बज चुके थे । रात किसी यौवन से उफ़नती मचलती नायिका की तरह पूर्ण जवान हो चुकी थी । और पूरी मदहोशी से अँधेरे के आलिंगन में समायी हुयी कसमसा रही थी । अँधेरा उससे और.. और.. और एकाकार होता जा रहा था ।

प्रसून ने चलते चलते एक सिगरेट सुलगाई । और सामने देखा । वह फ़िर से लगभग उसी स्थान पर आ पहुँचा था । कल जहाँ से आगे जाने का इरादा उसने छोङ दिया था । फ़र्क बस इतना था कि कल सुबह के चार बजने वाले थे । भोर का उजाला फ़ैलने लगा था । और आज अभी आधी रात थी । दूर टयूब बैल के एक दिशा में महुआ बगीची दूर से ही नजर आ रही थी ।

कल वह बहुत देर तक यहीं बैठा रहा था । चार बज गये । पाँच बज गये । फ़िर छह भी बज गये । पर उससे उठा नहीं गया । वह गन्दी जमीन पर पैर फ़ैलाये कभी ऐसा कभी वैसा ऐसे ही बैठा सिगरेट पर सिगरेट फ़ूँकता रहा । जैसे घर के कालीन पर बैठा हो । यहाँ तक कि सभी सिगरेट भी खत्म हो गये । पर उसके दिमाग में उठता तूफ़ान खत्म नहीं हुआ । वह यही सोचता रहा । कितनी अजीव है ये जिन्दगी भी । कुछ ही दिनों में रत्ना की हँसती खेलती महकती बगिया उजङ गयी थी । न सिर्फ़ उजङ गयी थी । बल्कि वह उस गयी गुजरी जिन्दगी से भी बदतर हालत में अपने दो मासूम बच्चों के साथ भटक रही थी ।

जलते मुर्दों से उङने वाली घी आदि की खुशबू उसका आहार थी । उसके बच्चे मानव मल भी खाते थे । सुअर भी रहने से मना कर दे । ऐसी ढाय में रहती थी । और इस सबके बाबजूद भी वहाँ चैन से नहीं थी । प्रेत अपनी बिरादरी में उसे शामिल करना चाहते थे । और वह इस और भी नयी खौफ़नाक दुनियाँ से एकदम घबरायी हुयी थी । यहाँ तो वह फ़िर से मर भी नहीं सकती थी । देश गाँव छोङकर जा भी नहीं सकती थी । कहाँ जाती ? अकाल मरने के बाद जहाँ भी गयी । प्रेतों का राज नजर आया । यहाँ उसे खाने की कुछ सुविधा थी । और दूसरे प्रेत किसी राउन्ड की तरह ही कुछ घण्टे को आते थे । तब वह उनसे बचती हुयी छुपने की कोशिश करके अपने को बचाती थी । अपनी शेष आयु का पुनर्जन्म कैसे ले । ये शायद ही वह खुद जान पाती । कोई दयालु प्रेत ही रहम खाकर उसे ये तरीका बता सकता था । लेकिन इसमें भी सबसे बङी समस्या थी । उसके दो बच्चे । वह एक ममतामयी माँ थी । और अपने बच्चों को यहाँ अकेला छोङकर जन्म नहीं ले सकती थी । तब फ़िर दो बच्चों और एक औरत का पुनः जन्म हेतु गर्भ स्थापन किसी योगी के बगैर बङी टेङी खीर ही थी । प्रेत शायद ही एक साथ ये व्यवस्था करवा सकते थे । क्योंकि तीन खाली गर्भों की तलाश मुश्किल ही थी । और अकेले वह किसी भी कीमत पर नहीं जा सकती थी । दूसरे गर्भ स्थापन गर्भ खाली होने पर संस्कार मैच होने पर ही हो सकता था । फ़िर उसे कौन कैसे समझायेगा कि तेरे बच्चे पुनर्जन्म हेतु गर्भवास में चले गये । कोई सफ़ल योगी ही यह सबूत दिखा सकता था । तब ही शायद वह मान पाती । शायद बहुत समझाने पर ही अगले जन्म वाली बात उसकी समझ में आनी थी । शायद न भी आती । ये सभी बातें प्रसून के दिमाग में अँधङ की तरह आ रही थी ।

उसके सामने दो खास सवाल और भी थे । नरसी का क्या हुआ था ? और वह तीन हरामजादे किस हाल में थे ? उनका क्या होना था ? उन तीनों में एक शक्ल तो उसकी परिचित ही थी । दो को वह नहीं जानता था ।

प्रेतों के छोटे छोटे झुण्ड उसके पास से गुजर रहे थे । पर न उसे उनसे कोई लेना था । और न प्रेतों का उससे कोई देना था । वह प्रेतवासा बस इसी उम्मीद से आया था कि वह कौन सी गण थी । प्रेत थी । जो महावीर और उसके भाईयों को काट डालने का इशारा करती थी । डराती थी । धमकाती थी । और दूसरे शायद किसी भलमानस प्रेत से उसे यहाँ का मामला समझने सुलझाने में कोई मदद मिले । क्योंकि यह प्रेतों का मामला था । और इसमें प्रेतों की मदद से बहुत कुछ हो सकता था ।

यही सोचकर वह किसी प्रेत प्रेतनी से हल्लो बोलने ही वाला था कि अचानक उसके कानों में किसी मोबायल फ़ोन के स्पीकर से आती डिस्टर्बिंग साउण्ड की तरह झिन झिन मिश्रित आवाज के साथ स्त्री प्रेत की आवाज सुनाई दी - हे प्रसून ! तुम । निश्चय ही यह एक सरप्राइज हुआ मेरे लिये डियर ।

प्रसून को एक आश्चर्यमिश्रित सी खुशी हुयी । वह सिल्विया थी । मरने से पूर्व प्रसून की उससे कोई जान पहचान न थी । पर मरने के बाद हुयी थी । मरने से पूर्व वह मनोविज्ञान की शोध छात्रा थी । और " प्रेत अँधविश्वास या सच " सबजेक्ट पर रिसर्च कर रही थी । इस हेतु वह उपलब्ध जानकारी के सहारे प्रेतवासों में रातों में घूमती रही । और धीरे धीरे प्रेतभाव से गृसित होती गयी । लेकिन अपनी आधुनिक सोच के चलते वह इसे विभिन्न मनोभ्रांतियों के प्रभाव जानती हुयी नकारती रही । और इंगलिश मेडीसन के सहारे अपने दिमाग को दुरुस्त रीचार्ज करती रही ।

पर वह बेचारी नहीं जानती थी कि अज्ञात प्रेत आवेशों से उसका जीवन रस तेजी से सूख रहा था । और उसके अन्दर प्रेतत्व मैटर बढता जा रहा है । प्रेतों की तलाश उसको खुद को प्रेत बना रही थी । और फ़िर उसे शायद बहुत लम्बे समय तक अपने ही खोये अस्तित्व को तलाश करना था । शायद कुछ हजार साल तक ।
 
जब प्रसून को वह मिली थी । तब उसमें सुधार की कोई गुंजाइश न बची थी । वह 34 की होकर मरी थी । और अनजाने में उसने अपनी आयु घटाकर शून्य 0 कर ली थी । तब वह उसको समझाकर दूसरा जन्म या रीबोर्न हेतु भी कोई हेल्प नहीं कर सकता था । उसे भारी हैरत हुयी कि सिल्विया प्रेत बनने के बाद भी खुद को रोमांचित सा महसूस कर रही थी । और इस नये परिवेश में काफ़ी उत्साहित थी ।

प्रसून से उसकी मुलाकात चैन्नई के एक स्थान पर हुयी थी । और यह तो उसके लिये और भी दिलचस्प था कि कुछ खास स्पेशिलिटी रखने वाले इंसान प्रेतों से सीधा कनेक्ट हो सकते हैं । इसको वह और भी बङा रोमांच मानती थी । दूसरे एक योगी के रूप में प्रसून जैसी दिलचस्प इंटरनेशनल हस्ती को पाकर वह बेहद खुश हुयी थी । और घण्टों बात करती थी । शायद एक ऐसा अकेला इंसान । जिससे वह इंसानी जीवन की भांति बात कर सकती थी । कोई हेल्प भी ले सकती थी ।

- तुम ! वह भी लगभग हैरत से बोला - मगर यहाँ ?

- एराउण्ड द वर्ल्ड ! वह उत्साहित सी बोली । फ़िर उसने तारों की तरफ़ इशारा किया - कभी कभी वहाँ भी जाती हूँ । वो भी बिना प्लेन के । बिना ट्रेन के । यार क्या अनोखी लाइफ़ है । प्रेतों की ।

- यहाँ कब से हो ? वह महुआ बगीची की ओर दृष्टि घुमाता हुआ बोला ।

उसने बताया । वह पिछले 6 महीने से यहाँ थी । प्रसून को एकदम आशा सी बँध गयी । अब उसे फ़ालतू के प्रेतों से माथा पच्ची नहीं करनी थी । अतः वह बोला - अभी पिछले 6 महीनों में यहाँ कोई खास घटना भी हुयी है ।

मैं समझी नहीं । वह उलझकर बोली - खास घटना से तुम्हारा क्या मतलब है । यहाँ तो सभी घटनायें खास ही होती हैं । और फ़िर सभी आम भी ।

प्रसून ने उसकी सहमति में सिर हिलाया । उसका जबाब ही बता रहा था कि वह एक परिपक्व प्रेतनी हो चुकी है । प्रेतजगत से उसका अच्छा परिचय हो चुका था । उसके चेहरे पर चमक आ गयी । उसने घूमकर शालिमपुर की तरफ़ उँगली उठायी । और मधुर स्वर में बोला - मेरा मतलब । उस विलेज से जुङी ।

- ओ या ! वह साधारण स्वर में बोली - परसों ही कुलच्छनी ने वहाँ से.. एक को वहाँ । उसने ऊपर उँगली उठाई - वहाँ रवाना किया है । बङा पहुँचा हुआ हरामी था साला । मैं होती ना.. उसको घसीट घसीटकर मारती । इसकी बङी चर्चा हुयी थी ।

- कुलच्छनी ! वह कुछ सोचता हुआ सा बोला - मतलब ? ये वर्ड तो शायद लूज करेक्टर लेडी के लिये इस्तेमाल करते हैं । या फ़िर किसी अन्य बुरी आदतों वाली ।

- वो सब मुझे नहीं पता । लेकिन यहाँ कुलच्छनी एक पिशाच श्रेणी की गण होती है । वह ऐसी गण कैसे बनती है । ये भी मैं नहीं जानती । पर उसका काम ऐसे लोगों को अटैक कर मारना होता है । जो अपनी दुष्ट आदतों के चलते । अत्यन्त क्रूरता पापमय जीवन के चलते आयु से बहुत पहले ही अपनी आयु समाप्त कर लेते हैं । तब उनको मारने कुलच्छणी ही जाती है । जिसको अभी मारा । साला सुअर पैदायशी हरामी था । दूसरों की जमीन कब्जाना । दुर्बल गरीब औरतों से रेप कर देना । निर्दोष लोगों की हत्या करना । मानों उसके लिये खेल था । अभी अभी कुछ टाइम पहले कमीने ने हँसते खेलते परिवार का नाश कर दिया । कोई बेचारा बहुत सीधा किसान था । उसके दो छोटे बच्चे भी थे । उनको भी मार डाला ।
 
प्रसून लगभग उछल ही पङा - क्या ! उसके मुँह से निकला - वह मर गया ।

- वही तो मैं बोल रही हूँ डियर ! साला बहुत आसान मौत मर गया । लकी अनलकी था साला हरामी ।

उसके लकी अनलकी शब्द से प्रसून ने असमंजस से उसकी तरफ़ देखा । तब वह बोली - मेरे भोले राजा ! लकी इसलिये था कि उसे मरने में कोई तकलीफ़ नहीं हुयी । कुलच्छणी एक ब्लू मिक्स ब्लैक कलर बाडी वाली भयंकर गण होती है । वह फ़ुल न्यूड होती है । उसकी हाइट लगभग 4 फ़ुट होती है । और शरीर किसी गठीले आदमी जैसा । अगर उसके अवाउट 28 साइज ब्रेस्ट न हों । तो वह मैन जैसा ही फ़ील देती है । उसके हाथ में हड्डी का बना एक वैपन टायप होता है । उसको लेकर वह सुरेश के घर के पास लगभग थाउजेंड मीटर अप साइड आसमान में गयी होगी । उसने सुरेश को लक्ष्य कर वैपन चलाया होगा । उसकी एक चोट से ही सुरेश को हार्ट पेन और तेज चक्कर सा आया होगा । वह वही जमीन etc पर गिर गया होगा । और इसके बाद डैड । यानी महज 5 मिनटस का खेल । तो ये लकी डैथ ही हुयी ना ।

और अनलकी इसलिये । क्योंकि इसका सिनी मैटर इतना अधिक बना है कि इसको अवाउट 10 lac year hell में जाना होगा । जिसको महा रौरव नरक बोलते हैं । मीन इसकी मर्सी अपील की कोई गुंजाइश नहीं । इसके बाद भी इसको सजा ए काला पानी टायप नीच और गन्दे अँधेरे लोकों में बारबार फ़ेंका जायेगा । तब लाखों वर्ष में इसके पाप धुलेंगे । तब कहीं ये 84 के बाद इंसान होगा ।

प्रसून को मानों गहरी तसल्ली हुयी । उसे एक असीम शान्ति सुख सकून का अनुभव सा हुआ । उसने एक गहरी सांस भरी । मानों उसके सीने से बहुत बङा बोझ उतर गया हो । फ़िर उसने बेहद प्रसंशा से सिल्विया की ओर देखा ।

ओर बोला - कमाल है डियर ! आपने बहुत अच्छा रिसर्च किया है ।

- ओ नो प्रसून ! वह वहाँ से गुजरते दो प्रेतों को हाइ का हाथ हिलाते हुये बोली - इनफ़ेक्ट ये आदमी अपने को छटुर समझटा हय । बट होटा हय साला छूटिया । छटुर छूटिया ।

पिछले चार दिन से उदास और अभी भी बुखार में तपते प्रसून ने उसके इंगलिश टोन में कही बात को समझ लिया । और उसके मुँह से जबरदस्त ठहाका निकला । सिल्विया भी उसके साथ मुक्त भाव से हँसी । प्रसून उसकी तरफ़ हा हा हा के साथ उँगली करता हुआ बोला - यू मीन चतुर ***िया ना । प्लीज इसको एक्सप्लेन भी कर । चतुर ***िया । हा हा हा । ओ माय गाड । व्हाट अ स्पेशल वर्ड चतुर ***िया ।

उसके कहने के अन्दाज और अपनी जिन्दगी में पहली बार सुने इस अदभुत मिश्रित शब्द से प्रसून बहुत देर तक हँसता रहा । उसकी हँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी । सिल्विया बार बार.. ओ प्रसून तुम भी ना डियर .. कहती हुयी उसको हाथ से बारबार चपत सा लगा देती थी । तब बहुत देर में दोनों की हँसी रुकी ।

- चतुर ***िया का मतलब है । वह फ़िर से बोली - ऐसा इंसान जो खुद ही अपने आपको समझता तो बहुत चतुर है । पर होता एकदम ***िया है । इस तरह वह मिलकर चतुर ***िया हो जाता है । जैसे ये साला हरामी सुरेश था । क्या मिला इसे ? जो इसका खुद का लक से मिला था । उससे भी हाथ धो बैठा । और लाखों साल के नरक में गया ।

दूसरे प्रसून इंसान की ये कितनी अजीब सोच है कि प्रेत या देवता etc कुछ अलग चीज होते हैं । जिस प्रकार इन लाइफ़ एक इंसान अपना स्टेंडर्ड बनाकर आफ़्टर बेड टाइम पूअर टू रिच हो जाता है । दैन ये भी आफ़्टर लाइफ़ रिजल्ट कर्मा गति होती है । बट आदमी का स्वभाव नेचर etc वही रहता है । बस जिस प्रकार पूअर से रिच बने आदमी में थोङा ठाठवाठ से रहने एण्ड अदर लाइफ़ स्टायल में चैंज हो जाता है । वही आफ़्टर लाइफ़ भी होता है । एक गरीब आदमी झोंपङे के बजाय महल में रहने लगा । साइकिल के बजाय प्लेन से चलने लगा । ये देवता हुआ । एण्ड प्रेत रिजल्ट में । वह लाइफ़ का गेम हार गया । और दर दर भटकने को मजबूर हो गया । और...
 

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