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Thriller इंसाफ

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इंसाफ

मैं अपने अशोक भवन स्थित आफिस में मौजूद था और सोच रहा था कि मेज का दाईं ओर का नीचे का दराज अभी खोलूं या थोड़ी देर बार खोलूं ।

उस दराज में रेमी मार्टिन की बोतल थी ।

जनवरी का महीना था, दोपहर हो चुकी थी लेकिन अभी तक सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हुए थे । जनवरी के महीने में दिल्ली में कड़ाके की ठण्ड पड़ती थी और अगर कोहरा न छंटा हो और सूरज न निकला हो तो ऐसे माहौल में कोनियाक शैम्पेन - वी.एस.ओ.पी. का एक नीट घूंट ही स्वर्ग की अनुभूति कराने के लिये काफी था ।

लेकिन सवा बारह बजे ही !

बोतल की तरफ से ध्यान हटाने के लिये मैंने डनहिल का एक सिग्रेट सुलगा लिया और बड़े तृप्तिपूर्ण भाव से उसके कश लगाने लगा ।

उम्मीद है कि खाकसार को आप भूले नहीं होंगे । फिर भी मैं समझता हूं कि अपना तआरुफ दोहराने में कोई हर्ज तो न होगा ! बंदे को राज शर्मा कहते हैं और दिल्ली के प्राइवेट डिटेक्टिव सर्विसिज के धंधे में मेरी हैसियत अंधों में काना राजा जैसी है । यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस के नाम से अशोक भवन के एक बहुमंजिला आफिस काम्प्लेक्स में उसकी चौथी मंजिल पर मेरा छोटा सा दफ्तर है जिस में मैं यूं कभी कभार पाया जाता हूं जैसे हमारे माननीय प्रथानमंत्री जी भारत में कभी कभार पाये जाते हैं । बन्दे को तब से पीडी के कम में शिरकत का फख्र हासिल है जब कि ये धंधा भारत में अभी ठीक से पहचाना नहीं जाता था लेकिन अब ऐसी बात नहीं थी, अब वकीलों की तरह पीडीज की भी दिल्ली में भरमार थी इसलिये वो ऐसे काम भी करते थे जो तरीके से इस कारोबार के स्कोप में नहीं आते थे - जैसे मैट्रीमोनियल कनफर्मेशंस, कैरेक्टर वैरीफिकेशन, सिक्योरिटी सर्विस वगैरह - लेकिन युअर्स ट्रूली ने कभी ऐसे - अब क्या कहूं - टुच्चे कामों में दिलचस्पी नहीं ली थी ।

वजह !

शेर घास नहीं खाता ।

लिहाजा आपके खादिम को वही असाइनमेंट कबूल होती थी जिसमें कोई चैलेंज हो और जिस की बाबत क्लायंट का ये विश्वास पुख्ता हो भी चुका हो कि उस चैलेंज का कोई सामना कर सकता था तो वो था राज शर्मा, दि ओनली वन । इसी वजह से कई बार कई कई दिन मुझे खाली बैठना पड़ता था ।

जैसा कि आजकल हो रहा था ।

.....................

मेरा सिग्रेट खत्म हुआ तो बीच का दरवाजा खुला और चौखट पर रजनी प्रकट हुई ।

रजनी शर्मा मेरी सैक्रेट्री थी और मेरी गैरहाजिरी में फ्रंट आफिस सम्भालती थी । निहायत खूबसूरत होने के अलावा उसमें और भी कई खूबियां थीं लेकिन उन सब पर हावी एक खामी थी :

शरीफ लड़की थी ।

और भी कई खामियां थीं । जैसे :

एम्प्लायर की गोद में नहीं बैठती थी ।

उसे पप्पी नहीं देती थी ।

उसे अपने पर आशिक करवाने की कोशिश नहीं करती थी ।

‘वगैरह वगैरह’ नहीं करती थी ।

बहरहाल होशियार थी, वफादार थी, दुख सुख की साथी थी और शरीफ होने की वजह से ही चील के घौंसले में मांस थी, फिर भी सेफ थी ।

“क्या है ?” - मैं बोला ।

“मुझे क्या पता क्या है ?” - उसने तुनक कर जवाब दिया ।

“अरे, मेरा मतलब है किसलिये दर्शन दिये ? मेरे अंगने में क्या काम है तेरा ?”

“अच्छा वो ?”

“हां, वो । अब बोल !”

“कल जो क्लायंट बनने से बाल बाल बच गया था, उसका अभी फोन आया था ।”

“वकील का ? क्या नाम था ? कहीं नोट तो किया था मैंने ! देखता हूं ।”

“विवेक महाजन ।”

“हां, विवेक महाजन । एडवोकेट सैशन एण्ड हाईकोर्ट । अब क्या कहता था ?”

“एक केस डिसकस करने के लिये कल वो आपको अपने आफिस बुलाता था लेकिन आपको राजेन्द्रा प्लेस जाना कबूल नहीं हुआ था जहां कि उसका आफिस है । आप ने उसे यहां आने को बोला था तो उसने कहा था कि वो इतना मसरूफ था कि नहीं आ सकता था...”

“जैसे मैं खाली बैठा था !”

“था तो ऐसा ही !”

“क्या बोला ?”

“टेबल के खुले दराज में दोनों पांव टिका के कुर्सी पर ढ़ेर हुए ऊंघ रहे थे” - वो एक क्षण ठिठकी फिर कुटिल भाव से बोली - “सुबह से ही ।”

“जो कि टेलीफोन पर उस वकील के घोड़े को दिखाई दे रहा था !”

“आप को दिखाई दे रहा था । खाली बैठे थे । महीना होने को आ रहा है । फिर भी नखरा किया और ठोक दिया आप उससे ज्यादा बिजी थे, राजेन्द्रा प्लेस नहीं जा सकते थे ।”

“अरे, कारोबार की बेहतरी के लिये आन बान शान बना कर रखनी पड़ती है ।”

“झूठ बोल कर ?”

“झूठ बोल कर भी ।”

“ये खयाल न किया कि प्यासा कुएं के पास जाता है, कुआं प्यासे के पास नहीं जाता ।”

“तेरे को क्या पता प्यासा कौन है, कुआं कौन है !”

“पता तो है ! अब तो बिल्कुल ही पता है ।”

“क्या मतलब ?”

“वो यहां आ रहा है ।”

“देखा !” - मैं विजेता के से स्वर में बोला - “अब बोल प्यासा कौन और कुआं कौन ?”

“आधे घंटे में पहुंचने को बोल रहा था ।”

“फोन कब आया था ?”

“बीस मिनट पहले ?”

“फिर तो अभी पूरे दस मिनट बाकी हैं ।”

“तो ?”

“पूछती है तो ! अरे तेरे को नहीं पता ?”

“नहीं, नहीं पता ।”

“दरवाजा बंद कर और आ के मेरी गोद में बैठ ।”

वो निचला होंठ दबाकर हंसी ।

“अरी, कम्बख्त, समय का सदउपयोग करना सीख !”

वो और हंसी । दिलकश, दिलफरेब हंसी ।
 
“आ के एक हाई स्पीड, हाई वोल्टेज, नान फैटनिंग, लो कैलरी विटामिन एनरिच्ड पप्पी दे ।”

वो अपनी जगह से हिली भी नहीं ।

“अरी कुछ दे नहीं सकती तो कुछ ले ही ले ।”

“क्या ?”

“पप्पी ।”

“फिर पहुंच गये एक आने वाली जगह पर !”

“अच्छा, ऐसा करते हैं, एक पप्पी आधी आथी कर लेते हैं । शेयर एण्ड शेयर अलाइक । उसमें तो कोई फांसी नहीं लग रही तेरे को !”

“जाती हूं । आप उठिये, जाके मुंह धोइये, बालों में कंघी फिराइये, टाई ठीक कीजिये और स्मार्ट, मुस्तैद दिखने की कोशिश कीजिये वर्ना...”

“वर्ना क्या ?”

“क्लायंट समझेगा खैराती धर्मशाला के केयरटेकर के रूबरू था ।”

“ठहर जा, कम्बख्त !”

वो चली गयी । बीच का दरवाजा बदस्तूर बंद हो गया ।

******************************************************************

क्लायंट पहुंचा ।

वो कोई पचपन साल का, अच्छी तन्दुरुस्ती और अधपके बालों वाला क्लीनशेव्ड व्यक्ति था जिसने सूरत ऐसी पाई थी कि वकील न होता तो - दो जहां का मालिक झूठ न बुलवाये - या पिम्प होता या जेबकतरा होता ।

मैंने उठ कर उससे हाथ मिलाया और विराजने को बोला ।

“आई एम एडवोकेट महाजन” - वो सुसंयत स्वर में बोला - “एण्ड यू आर राज शर्मा दि फेमस पीडी, आई परज्यूम !”

“यू परज्यूम करैक्ट । क्या खिदमत कर सकता हूं मैं आपकी ?”

“खिदमत ! वही कर सकते हो जिसमें माहिर बताये जाते हो ! सुना है इस धंधे में तुम्हारे से आगे कोई नहीं !”

“दुश्मन कहते तो हैं ऐसा ।”

“दुश्मन ?”

“दोस्त भी ।”

“खुद क्या कहते हो ?”

“हीरा मुख से न कहै, लाख हमारा मोल ।”

“गुड । कबीर जी को कोट किया । यानी काबिल ही नहीं, ज्ञानी भी हो । गुड, इनडीड । चार्ज कैसे करते हो ?”

“केस पर, उसकी टाइप पर, इनवैस्टिगेशन की ड्यूरेशन पर डिपेंड करता है ।”

“केस गम्भीर है, कत्ल का है और इनवैस्टिगेशन की ऐसी दरकार है कि जितनी जल्दी कोई मुफीद, कारआमद नतीजा हासिल हो, उतना ही अच्छा होगा ।”

“कत्ल का केस ?”

“हां । कातिल गिरफ्तार है । पुलिस का दावा है कि उनके पास उसके खिलाफ ओपन एण्ड शट केस है । कथित कातिल का दावा है कि वो बेगुनाह है ।”

“हमेशा ही होता है ।”

“हां, लेकिन हमेशा ही झूठ नहीं होता; अक्सर सच भी होता है ।”

“आपको सच लगता है ?”

“हां ।”

“आपका केस से, कथित कातिल से क्या रिश्ता है ?”

“वो मेरा क्लायंट है । मैं उसका वकील हूं ।”

“सुना है आप बड़े वकील हैं ?”

“लोग कहते तो हैं ऐसा !”

“क्लायंट आपकी फीस भर सकता है ?”

“भर सकता है ।”

“मेरी ?”

“तुम्हारी फीस मैं भरूंगा । आगे क्लायंट से चार्ज करूंगा । फीस बोलो ।”

“पहले केस बोलिये, फिर मैं मुर्दे के नाप का कफन या कफन के नाप का मुर्दा पेश करूंगा ।”

“क्या !”

“फीस बोलूंगा ।”

“ओह ! क्लायंट का नाम सार्थक बराल है ।” - उसने ठिठक कर अपलक मुझे देखा - “नाम से कोई घंटी बजी ?”

“बजी तो सही ! ‘सार्थक को इंसाफ दो’ । वही ?”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

सार्थक बराल अपनी पत्नी के कत्ल का अपराधी था और गिरफ्तार था लेकिन आम धारणा यह थी कि उसने कत्ल नहीं किया था, वो केवल विपरीत परिस्थितियों का शिकार हुआ था और पुलिस की जल्दबाजी की वजह से, केस की तह तक पहुंचने की कोशिश न करने की पुख्ता हो चुकी आदत की वजह से थाम लिया गया था । दिल्ली पुलिस का ऐसे केसों में काम करने का स्थापित तरीका था कि जो सस्पैक्ट ऐन नाक के आगे लहराता दिखाई देता था, उसे थाम लेते थे और फिर बिना दायें बायें झांके उसी को अपराधी सिद्ध करने के अभियान पर अपना सारा जोर लगा देते थे । सार्थक बराल के सिलसिले में दिल्ली की नौजवान पीढी को ये बात हज्म नहीं हुई थी और उन्होंने एकजुट होकर सार्थक बराल को बेगुनाह साबित करने का अभियान शुरू कर दिया था । आये दिन उसके नाम पर कैंडल लाइट मार्च होती थी और ‘सार्थक को इंसाफ दो’ के नारे लगाये जाते थे और बैनर लगाये जाते थे । जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन का पक्का ठिकाना खड़ा कर लिया गया था जहां वीकएण्ड पर तो इतनी भीड़ हो जाती थी कि पुलिस को बन्दोबस्त के लिये अतिरिक्त बल तलब करना पड़ता था । सार्थक को कानूनी सहायता मुहैया कराने के लिये और नौबत आने पर उसकी नकद जमानत जमा कराने के लिये चन्दा इकट्ठा किया जा रहा था जिसकी सुना था कि बहुत उम्दा रिस्पांस थी ।
 
इतनी बातें तो मुझे बाजरिया डेली पेपर्स और टीवी की न्यूज चैनल्स मालूम थीं, बाकी, तफसील से वकील ने बयान कीं जो कि इस प्रकार थीं:

पिछले महीने शुक्रवार, सोलह दिसम्बर की आधी रात को जब सार्थक बराल मोतीबाग स्थित अपने आवास पर लौटा तो उसने अपनी इक्कीस साला शरीकेहयात श्यामला को ड्राईंगरूम के फर्श पर मरी पड़ी पाया ।

एक नेक और जिम्मेदार शहरी की तरह फौरन उसने पुलिस को फोन किया और वारदात की खबर दी । पुलिस आयी, उसने मौकायवारदात का मुआयना किया, हालात का जायजा लिया और पूरी मुस्तैदी दिखाते हुए पति को, यानी सार्थक बराल को, कत्ल के इलजाम में ताजीरातेहिन्द दफा तीन सौ दो के तहत गिरफ्तार कर लिया ।

“सार्थक मेरा क्लायंट है ।” - वकील विवेक महाजन संजीदगी से बोला - “जब वो कहता है कि वो बेगुनाह है तो उसकी बेगुनाही पर ऐतबार लाना मेरा फर्ज है । पुलिस के साथ दिक्कत ये है कि एक बार गिरफ्तारी को अंजाम दे चुकने के बाद वो मुलजिम की जिम्मेदारी मानती है कि वो खुद को बेगुनाह साबित करके दिखाये । मुसीबत का मारा मुलजिम जब ऐसी कोई कोशिश करता है तो उसके कहे पर कान नहीं देती और अपनी जिद पर अड़ी रहती है कि वो ही गुनहगार है । वकील अपने क्लायंट से ऐसे पेश नहीं आता, नहीं आ सकता । कोई क्लायंट अपने वकील से झूठ नहीं बोलता । जब मेरा क्लायंट कहता है कि वो बेगुनाह है तो वो बेगुनाह है, भले ही पुलिस कुछ भी कहे ।”

“ठीक ! आप को किसने ऐंगेज किया है ? सार्थक ने ?”

“हां ।”

“आप हाईप्राइस्ड वकील हैं, वो आपकी फीस भर सकता है ?”

वो हिचकिचाया ।

मैं खामोशी से जवाब की प्रतीक्षा करता रहा ।

“इस बाबत कोई खुलासा नहीं हुआ” - आखिर वो बोला - “कोई खुल कर बात नहीं हुई क्योंकि उसकी जरूरत न पड़ी । वो क्या है कि मेरा क्लायंट सार्थक बराल है, वकालतनामा उसने साइन किया है, लेकिन फीस का अश्वासन और समुचित एडवांस मुझे ‘सार्थक को इंसाफ दो’ कमेटी से हासिल हुआ है ।”

“फीस चन्दे में से आयेगी ?”

“हां ।”

“चन्दे में गुंजायश है ?”

“है । अब तक लाखों रुपया इकट्ठा हो चुका है और अभी और हो रहा है । तुमने केस कबूल किया तो तुम्हारी फीस भी वहीं से आयेगी ।”

“फिर तो खुशकिस्मत है सार्थक बराल ।”

“इसलिये क्योंकि हर किसी को उसकी बेगुनाही पर ऐतबार है और उससे गहरी हमदर्दी है ।”

हमदर्दी अपनी जगह थी - ऐसी हमदर्दियां दिल्ली वालों को होती ही रहती थीं - लेकिन अगर बेतहाशा चन्दा जमा हो रहा था तो उसका एक ही मतलब था :

अन्धे के पीछे अन्धा लग रहा था जो कि इस शहर की खासियत थी ।

‘मर्जी हुई फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक’ वाली किस्म की ।

मंगता क्रासिंग की रैडलाइट पर एक रुपया मांग ले तो उसको ‘माफ करो, बाबा’ बोलेंगे लेकिन ऐसी लहर में शरीक होने के लिये जेबें खाली कर देने से गुरेज नहीं करेंगे । आखिर मीडिया कवरेज होती थी, टीवी पर जुलूस की, धरना-प्रदर्शन की क्लिप्स दिखाई जाती थीं ।

अभी कल तो पड़ोसी बोला था कि ‘मैं उसे जंतर मंतर की भीड़ के एक कोने में बिजली के एक खम्बे के पीछे खड़ा दिखाई दिया था, हमारे मोंटू ने, हमारी पिंकी ने साफ पहचाना था’ ।

“आप कहते हैं आपको अपने क्लायंट की बेगुनाही पर ऐतबार है” - प्रत्यक्षत: मैं बोला - “ऐसा उसूलन कहते हैं या इस ऐतबार की कोई बुनियाद भी है ?”

“बुनियाद भी है ।” - वकील आश्वासनपूर्ण स्वर में बोला ।

“क्या ?”

“उसके पास पुख्ता एलीबाई है जो कहती है कि कत्ल के वक्त के दौरान वो मौकायवारदात से बहुत दूर कहीं और था ।”

“हे भगवान ! तो वो इस बाबत इतने अरसे से खामोश क्यों है ?”

“किसी की इज्जत का सवाल है ।”

“इज्जत का सवाल है ! जिसकी हिफाजत उसे अपनी जान दे कर करना भी कबूल है ?”

“ऐसी बात नहीं । जब जान पर आ बनेगी तो बोलेगा ।”

“कब ? जब फांसी का फन्दा गले में होगा ?”

“जब बतौर डिफेंस अटर्नी मैं फेल हो जाऊंगा । जब बतौर पीडी उस के लिये की गयी तुम्हारी कोशिशें किसी काम नहीं आयेंगी ।”

“दिस इज नानसेंस ! शियर नानसेंस !”

वो खामोश रहा ।

“क्या है उसकी एलीबाई ? किस की इज्जत का सवाल है ?”

“ये अभी तुम्हें नहीं बताया जा सकता ।”

“आपको मालूम है ?”

“हं - हां ।”

“फिर मुझे बताने में क्या हर्ज है ? हम तो चोर चोर मौसेरे भाई हुए न !”

“मुझे चोर कह रहे हो ?”

“खुद को भी । लेकिन मुहावरे को तौर पर ।”

“मुहावरे के तौर पर भी मत कहो ।”

“ओके । बतौर वकील आप ही कैसे चुने गये ? सुना है दिल्ली में चालीस हजार चो... वकील हैं ।”

“मेरा उससे पहले से लिंक बना हुआ था । एक केस में पहले भी वास्ता पड़ चुका था ।”

“कैसा केस ?”

“ड्रग्स का केस । मारिजुआना के साथ पकड़ा गया था ।”
 
“मारिजुआना ! मेरे खयाल से गांजा को कहते हैं !”

“तुम्हारा खयाल दुरुस्त है ।”

“कितनी मिकदार ?”

“पचास ग्राम ।”

“मेरा दूसरा खयाल है ये तो काफी होती है लम्बा नपवाने के लिये !”

“हां । इतनी मिकदार के साथ पकड़ा जाने वाला डीलर माना जाता है, ट्रेडर माना जाता है । तीन से पांच साल की लगती ।”

“बचा कैसे ?”

“मैं हूं न !”

“क्या किया ?”

“गिरफ्तारी को अंजाम देने वाली पुलिस टीम को कल्टीवेट किया । नतीजतन बरामदी पचास की जगह एक ग्राम दर्ज की गई । इतनी बरामदी से पकड़ा गया शख्स यूजर कहलाता है । फौरन जमानत हो जाती है । बाद में केस की भी अपने आप ही हवा निकल जाती है ।”

“आई सी । कल्टीवेट कैसे किया ?”

“सोचो । समझो ।”

“नावां चढ़ाया ?”

वो खाली मुस्कराया - धूर्त भाव से - मुंह से कुछ न बोला ।

“ग्रेट ! लिहाजा काफी करतबी, काफी हजरती आदमी हैं आप ?”

“आई गैट रिजल्ट्स ।”

“फिर भी मेरी, एक पीडी की, मदद की जरूरत है ?”

“हां ।”

“किस सिलसिले में ? क्या करना होगा मुझे ?”

जवाब में उसने अपनी विजीटर्स चेयर के पहलू में लगा खड़ा अपना चमड़ा मढ़ा ब्रीफकेस उठा कर मेज पर रखा, उसे खोला और भीतर से पीले रंग का एक ए-फोर साइज का लिफाफा बरामद किया और उसे मेरे सामने मेज पर रखा ।

“इस लिफाफे में केस की मुकम्मल जानकारी है” - वो बोला - “जो कि तुम्हारे काम आयेगी । केस की तफसील एफआईआर की कापी, गवाहों के बयानात की कापीज वगैरह और एक मेरा नोट जो एक्सप्लेन करता है कि तुमसे क्या किया जाना अपेक्षित है । सब इंगलिश में है । पढ़ लेते हो न !”

“जोक मारा ! साबित किया कि आप भी कम हाजिरजवाब नहीं !”

वो हंसा, फिर तत्काल संजीदा हुआ ।

“अब फीस बोलो ।” - वो बोला ।

“आपने तो हर बात का समापन पहले ही कर दिया, मेरी बोली फीस आपको न रास आयी तो ?”

“आयेगी । कोई भी मुनासिब फीस जरूर रास आयेगी ।”

“और गैरमुनासिब ?”

“वो भी ।”

“फिर क्या बात है !”

“इस पर गौर करो” - ब्रीफकेस में से निकाल कर उसने एक चैक मेरे सामने डाला - “और फिर बोलो ये मुनासिब है या गैरमुनासिब !”

मैंने चैक उठा कर निगाह के सामने किया । तत्काल मेरे नेत्र फैले ।

एक लाख ! पेयेबल टु यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस ।

राज शर्मा - मैंने खयालों में खुद अपनी पीठ थपथपाई - दि लक्की बास्टर्ड ।

“मुनासिब ।” - प्रत्यक्षत: मैं बोला - “मुनासिब से ज्यादा मुनासिब । आई एम ग्लैड ।”

“आई एम ग्लैड दैट यू आर ।” - उसने अपने ब्रीफकेस का ढ़क्कन गिराया - “तो अब मैं चलूं ?”

“नहीं” - मैं तनिक हड़बड़ाता सा, जल्दी से बोला - “अभी रुकिये ।”

उसकी भवें उठीं ।

“इस चैक पर आप के साइन हैं ।” - मैं बोला ।

“तो !” - वो बोला - “तुम्हें मेरी क्रेडिबलिटी पर शक है ?”

“नहीं, बिल्कुल भी नहीं । लेकिन आपने तो फरमाया था कि मेरी फीस ‘सार्थक को इंसाफ दो’ कमेटी अदा करेगी !”

“हां । तुम यूं समझो कि कमेटी ने फीस मुझे अदा की और मैंने आगे तुम्हें अदा की ।”

“लिहाजा मेरे क्लायंट आप नहीं, कमेटी है ?”

“यही समझ लो ।”

“या क्लायंट कोई और है, कमेटी पर्दा है !”

“क्या बोला ?”

“खुद आप भी ।”

“मैं भी क्या ?”

“पर्दा हैं ।”

“ये क्या पहेलियां बुझा रहे हो, भई ?”

“वो औरत बहुत खूबसूरत है और शादीशुदा है । ठीक ?”

“कौन औरत ?”

“जिससे सार्थक बराल की आशनाई है, जो उसकी एलीबाई है, जिस की बाबत वो अपनी जुबान खोलने को तैयार नहीं, जो असल में मेरी फीस अदा कर रही है ।”

वो मुंह बाये मुझे देखने लगा ।

“सर, आई एम ए डिटेक्टिव । रिमेम्बर ?”
 
उसका एकाएक लटक आया जबड़ा अपने मुकाम पर पहुंचा और मुंह बन्द हुआ, एक क्षण को उसके होंठ एक रहस्यमयी मुस्कराहट में फैले, फिर वो तत्काल संजीदा हुआ ।

“मुझे खुशी है” - फिर बोला - “कि मैंने ऐन माकूल पीडी चुना है । नाओ आई एम रिलीव्ड । जाता हूं ।”

“रहस्यमयी रमणी का नाम तो बताकर जाइये ।” - मैं व्यग्र भाव से बोला ।

“क्या !”

“उन मैडम का नाम तो बता के जाइये जो कि असल में मेरी क्लायंट है ?”

“यू आर ए डिटेक्टिव । रिमेम्बर ?” - उसने मेरे अल्फाज दोहराये - “पता लगाना ।”

वो चला गया ।

मैं कुछ क्षण बड़े अरमान से चैक को घूरता रहा, फिर उठ कर खड़ा हुआ और उसके साथ बाहरले आफिस में पहुंचा ।

रिसैप्शन पर बैठी रजनी ने आहट पा कर सिर उठाया और आंख भर कर मेरी तरफ देखा ।

“क्या देखती है ?” - मैं बोला ।

“खुदा की कुदरत देखती हूं ।”

“क्या मतलब ?”

“चेहरे पर ऐसी रौनक है जैसे बिलौटे को मलाई में मुंह मारने का मौका मिल गया हो ।”

“मुझे बिलौटा कहती है !”

“लो ! मैं भला क्यों बिलौटे की हैसियत कम करने लगी !”

“ठहर जा, कम्बख्त ।”

“वो तो आप कहते हैं तो ठहर जाती हूं वर्ना मैं तो पिक्चर देखने जाने लगी थी ।”

“क्या बोला ?”

“कुछ नहीं बोला । आपके कान बजे । अब बताइये क्या हुआ ? क्लायंट को सर्र ‘दि ओनली वन’ लगे या नहीं लगे ?”

“लगे । ये देख ।” - मैंने चैक उसके सामने डाल दिया ।

उसने चैक पर निगाह डाली, फिर उसके नेत्र फैले ।

“एक, दो, तीन, चार, पांच बिंदियां ।” - वो बोली - यानी कि लाख रुपये !”

“बिन्दियां गिने बिना नहीं सूझा तेरे को ! बायें वर्ड्स में लाख लिखा नहीं दिखाई दिया ?”

“सच पूछें तो नहीं ही दिखाई दिया । इतनी बिन्दियों पर ही निगाह अटक कर रह गयी । बधाई हो । नया साल बढ़िया शुरू हुआ आपका !”

“तेरा ।”

“जी !”

“हर वक्त तनखाह का रोना रोती रहती है कि पहली आयेगी तो पता नहीं मिलेगी या नहीं । तनखाह के खाते में एडवांस जान के रख ले ।”

“मैं रख भी लूंगी !”

“रख ले ।”

“लेकिन चैक तो फर्म के नाम है ! इसको रजनी शर्मा के नाम कीजिये ।”

“अरे, कौन से स्कूल की पढ़ी हुई है...”

“कॉलेज की ।”

“...ये कैसे होगा तेरे नाम ! इसको क्लीयरेंस के लिये बैंक में डाल । जब कैश हो जायेगा तो... देखेंगे ।”

“देखेंगे... देखेंगे बोला ! यानी मुकरने की गुंजायश पहले ही रख ली !”

“नहीं रख ली । मैं कल की डेट का तेरे नाम का चैक अभी बना देता हूं ।”

“जाने दीजिये । ये चैक डिसआनर हो गया तो...”

“तेरे मुंह में खाक !”

वो हंसी ।

मैंने बात आगे न बढाई । बस, उसकी दिलकश, दिलफरेब हंसी पर ही निहाल होता रहा ।

******************************************************************
 
वकील द्वारा पीछे छोड़े पीले लिफाफे में इतने कागजात थे कि उन्हें पढ़ते, समझते, उन पर मनन करते शाम हो गयी ।

मोटे तौर पर जो मैंने समझा, वो यूं था :

मकतूला और उसके कथित कातिल की आशनाई और शादी की कहानी किताबी ज्यादा थी, हकीकी कम थी । दो साल पहले उन दोनों की शादी हुई थी जब कि सार्थक बराल इक्कीस साल का और श्यामली परमार उन्नीस साल की थी । सार्थक नेपाली था लेकिन एक अरसे से दिल्ली में बसा हुआ था और नेपालियों के काम आने वाले झोलझाल देशी कायदे कानूनों के तहत अब दिल्ली निवासी ही था । शादी के वक्त उसका मुकाम मजनू का टीला, खैबर पास में स्थित तिब्बती बस्ती थी जिसमें काफी तादाद में नेपाली, भूटानी भी बसते थे और मकतूला श्यामला परमार का तब का मुकाम रईसों का इलाका सैनिक फार्म था जहां कि उसके बिल्डर एण्ड कालोनाइजर पिता अमरनाथ परमार की एक फार्महाउस में बनी विशाल, आलीशान, दोमंजिला कोठी थी । सैनिक फार्म्स में ही रोजुवुड नामक एक फैंसी क्लब थी अमरनाथ परमार जिसका प्रेसीडेंट था और सार्थक जहां बतौर रिसैप्शनिस्ट मुलाजिम था ।

सार्थक और श्यामला की समाजी हैसियत में जमीन आसमान का फर्क था लेकिन जब उन दोनों में दोस्ती स्थापित हुई तो उसमें एक बड़ा रोल इस बात का भी बना कि सार्थक बहुत ही उम्दा पर्सनैलिटी वाला निहायत खूबसूरत नौजवान था जब कि श्यामला शक्ल सूरत और फिगर के लिहाज से वाह वाह थी । लेकिन उसका आकर्षण उसकी ऊंची समाजी हैसियत में था जिससे नीचे सरकना उसको कबूल हुआ और अतिमहत्वाकांक्षी सार्थक तो हमेशा ऊंचा उठने के सपने देखता ही था । लिहाजा बीच में कहीं उनमें सैटिंग हो गयी जिसकी परिणिति शादी में जा कर हुई ।

अमरनाथ परमार बहुत आग बबूला हुआ लेकिन वो क्या करता, शादी की खबर उसे लगी ही तब जब कि शादी हो भी चुकी थी ।

उस शादी को उसने अपनी बेटी की बहुत बड़ी गलती करार दिया था और जो हुआ था, उसके लिये बेटी से ज्यादा अपने जबरदस्ती के दामाद को जिम्मेदार ठहराया था जरूर जिस की निगाह उसकी दौलत पर थी और उस तक पहुंचने के लिये उसने उसकी नादान बेटी को सीढ़ी बनाने का नापाक इरादा किया था जो कि वो कभी पूरा नहीं होने देने वाला था । इसी वजह से शादी के बाद हालात ऐसे बने कि वो दोनों मोतीबाग की एक कोठी में अलग रहने लगे, सार्थक साउथ एक्सटेंशन के एक रेस्टोबार में स्टीवार्ड बन गया और श्यामला गृहिणी बन गयी ।

दो साल वो सिलसिला चला, फिर उसमें कत्ल की सूरत में विघ्न आया और उनके गृहस्थ जीवन के ड्रामे का जैसे पर्दा गिर गया ।

एफआईआर से और केस के बाकी पहलुओं और सबूतों की स्टडी में जान पड़ता था कि पुलिस के पास सार्थक बराल के खिलाफ वाकेई ओपन एण्ड शट केस था । सार्थक का पुरइसरार बयान था कि सोमवार रात को आधी रात के करीब जब वो घर लौटा था तो श्यामला ड्राईंगरूम में फर्श पर पहले ही मरी पड़ी थी । बकौल सार्थक, इत्तफाक से उस वक्त उसका बड़ा भाई शिखर उसके साथ था और उसकी मौजूदगी में सार्थक ने पुलिस को फोन किया था और उन्हें उस हौलनाक वारदात की इत्तला दी थी । उनका कहना था कि उस रात घूंट लगाने के अपने अभियान पर दोनों इकट्ठे निकले हुए थे लेकिन सार्थक की बद्किस्मती कि बाद में ये सामने आया कि शिखर बराल ड्रिंकिंग के अपने लम्बे अभियान पर तो उस रात बराबर था लेकिन - अकेला ।

पुलिस ने नायाब मुस्तैदी दिखाते हुए ऐसे कई गवाह ढूंढ़ निकाले थे जो कहते थे उन्होंने शिखर बराल को सैनिक फार्म के इलाके के एक बार में बराबर देखा था लेकिन तब वो अकेला था, उसका छोटा भाई तो क्या, कोई भी उसके साथ नहीं था । फिर शिखर पर पुलिसिया दबाव पड़ा था तो उसे कुबूल करना पड़ा था कि मोतीबाग की कोठी में वो अपने भाई के साथ नहीं, उसके बुलावे पर उसके बाद अकेला वहां पहुंचा था । तब उन्होंने आपसी मशवरे के तहत कोठी में ऐसी अस्त-व्यस्तता फैलाई थी जिससे लगता कि वहां कोई चोर घुसा था जो कि चोरी के इरादे से घर को खंगालता घर की मालकिन द्वारा रंगे हाथों पकड़ा गया था तो उसने मालकिन पर आक्रमण कर दिया था, जिसके नतीजे के तौर पर मालकिन ठौर मारी गयी थी । बाद में पुलिस ने पड़ोसी के डस्टबिन में से एक पीतल की बनी समाधि की मुद्रा में बैठे चार भुजाओं वाले एक देवता की मूर्ति बरामद की थी जिसकी शिनाख्त मकतूला की कोठी की एक डेकोरेटिव आइटम के तौर पर हुई थी । वो वजनदार मूर्ति किसी नेपाली देवता की थी जिसके पेंदे पर काठमाण्डू के उस एम्पोरियम का नाम भी गुदा हुआ था जिसने कि उसका निर्माण किया था । सार्थक ने इंकार तो किया था लेकिन इंकार करता रह नहीं सका था कि वो ही उसे काठमाण्डू से अपने साथ लाया था ।

पुलिस के लैब एक्सपर्ट्स ने पाया था कि न तो उस मूर्ति पर कहीं खून के धब्बे थे और न किसी प्रकार के - किसी भी प्रकार के - फिंगरप्रिंट्स थे । पुलिस के लिये ये जानना समझना कोई कठिन काम नहीं था कि उस मूर्ति को - जो कि आलायकत्ल थी - तिलांजलि देने से पहले ऐसा करने वाले के द्वारा अच्छी तरह से पोंछ दिया गया था ।

हत्या का उद्देश्य !

वो भी पुलिस ने खोद निकाला हुआ था ।

मालूम पड़ा था कि कोई तीन हफ्ते पहले श्यामला ने अपने पिता को बताया था कि उसने अपने पति से तलाक लेने का फैसला कर लिया था । पिता अमरनाथ परमार ने तसदीक की थी कि कत्ल की रात को वो तलाक की बाबत अपना फैसला सार्थक को सुनाने जा रही थी । उसी बात को लेकर उन दोनों में भीषण तकरार हुई थी जिसका नतीजा कत्ल की सूरत में सामने आया था ।

पुलिस के पास भीषण तकरार का गवाह था ।

पड़ोस की कमला ओसवाल नामक एक महिला की सूरत में जिसकी कोठी के बाहर रखे डस्टबिन में से आलायकत्ल नेपाली चारभुजी मूर्ति बरामद हुई थी ।

पड़ोसन कमला ओसवाल का बयान था कि उसने पहले शाम को भी उन्हें आपस में झगड़ते सुना था । उसने शाम आठ बजे सार्थक को तब घर से निकल कर कहीं जाते देखा था जब कि वो खुद बिग बाजार से शापिंग करने के लिये निकली थी । रात दस बजे वो वापिस लौटा था लेकिन जल्दी ही अपनी कार पर सवार हो कर वो फिर वहां से निकल लिया था । उसकी कार सफेद रंग की एक सैकंडहैण्ड सांत्रो थी जिसे वो अच्छी तरह से पहचानती थी । वो कार को बहुत रैश चला रहा था और ब्रेकों की भीषण चरचराहट की वजह से ही उसकी उसकी तरफ तवज्जो गयी थी ।

फिर सार्थक के खिलाफ कमला ओसवाल ही एक गवाह नहीं था पुलिस के पास ।

सड़क से पार उसकी कोठी के सामने एक कोठी थी जिसके एलीवेटिड फ्रंट में स्थित ड्राईंगरूम की विशाल फ्रेंच विंडोज के पीछे उस रात दस बजे के करीब कोठी का निवासी दर्शन सक्सेना मौजूद था जिसकी निगाह उस घड़ी बाहर सड़क पर थी । बकौल उसके उसने अपनी आंखों से सार्थक को अपनी कोठी में से निकलते और बाजू की कोठी के बाहरले फाटक के पास पड़े कूड़ेदान में कुछ फेंकते देखा था । उसके बाद वो बाहर सड़क पर ही खड़ी अपनी कार में सवार हुआ था और यह जा वह जा । उसकी सान्त्रो कार सड़क पर दर्शन सक्सेना की कार के पीछे खड़ी थी, रवानगी की अफरातफरी में उसने सक्सेना की कार की - जो कि स्विफ्ट थी - दायीं टेललाइट ठोक दी थी । बाद में पुलिस ने जब सार्थक की सान्त्रो का मुआयना किया था तो उन्होंने उसकी बायीं हैडलाइट टूटी पायी थी ।

यानी पुलिस के पास दो दो गवाह थे जो स्थापित करते थे कि वारदात के वक्त - रात दस बजे के आसपास - सार्थक अपनी कोठी पर था जब कि खुद उसका दावा था कि वो आधी रात के करीब अपने भाई के साथ टुन्न हालत में घर लौटा था और भाई शिखर कबूल कर भी चुका था कि रात की तफरीह में वो सार्थक के साथ नहीं था ।

लेकिन वकील कहता था कि सार्थक के पास कोई सीक्रेट एलीबाई थी जो कि उसे निर्विवाद रूप से बेगुनाह साबित कर सकती थी लेकिन अपनी जिद के तहत वो उस एलीबाई को तभी अपने हक में इस्तेमाल में लाने का इरादा रखता था जबकि बचाव की कोई भी सूरत बाकी न बचती ।

और यूअर्स ट्रूली का कहना था कि वो अहमक था जो एक गैरजरूरी मुलाहजे के हवाले अपनी दुश्वारियां बढ़ा रहा था । मेरे को गारंटी थी कि वो प्रेम त्रिकोण का मामला था, उसकी सीक्रेट एलीबाई कोई शादीशुदा औरत थी जिसका कि उसे मुलाहजा था, लिहाज था । जरूर उस औरत की खबर मकतूला को भी लग चुकी थी और वो ही उसके तलाक के इरादे की और कत्ल की रात की तकरार की वजह थी । अब उस औरत के बारे में - अगर मेरा कयास सही था कि ऐसी कोई औरत थी - सार्थक के अलावा कोई नहीं जानता था और सार्थक की गति इसी में थी कि या वो मुंह खोलता या वो औरत मुंह खोलती ।

लिहाजा इतने ‘सैट’ आदमी के लिये ऐसे सबूत खोद निकालना जो कि उसे बेगुनाह साबित कर पाते किसी करिश्मे से कम नहीं था और वो करिश्मा कर दिखाने का जिम्मा अब आपके खादिम के सिर था ।
 
मैंने तमाम कागजात को वापिस लिफाफे के हवाले किया और घड़ी पर निगाह डाली ।

साढ़े पांच बजे थे ।

रजनी छ: बजे छुट्टी करती थी । यानी अभी आफिस में ही थी ।

मैंने फोन का रिसीवर उठा कर कान से लगाया और उसे बजर दिया ।

“यस, सर्र ।” - उसकी आवाज आयी ।

“यहां आ ।” - मैं बोला ।

“यहां कहां है ?”

“भीतर आ के मर, तेरे से कुछ बात करनी है ।”

“मर गयी तो बात कैसे करूंगी ?”

“हर बात में हुज्जत करती है, कम्बख्त ।”

लाइन कट गयी ।

फिर वो चौखट पर प्रकट हुई ।

मैंने संजीदगी से एक विजिटर्स चेयर की तरफ इशारा किया ।

तत्काल उसने हैरान होकर दिखाया ।

‘दिखाया’ बोला मैंने । मैं जानता था वो हैरानी नकली थी ।

“गोद में नहीं ?” - वो बोली ।

“नहीं ।” - मैं पूर्ववत् संजीदगी से बोला ।

“कम्माल है !”

वो आगे बढ़ी और आ कर एक विजिटर्स चेयर पर बैठी ।

“तेरे को दिल्ली की जानकारी ज्यादा है इसलिये...”

“कैसे मालूम ?”

“क्या ? क्या कैसे मालूम ?”

“कि मेरे को दिल्ली की जानकारी ज्यादा है ?”

“निठल्लों को ऐसी जानकारी ज्यादा ही होती है । सारा दिन खाली बैठी करती क्या है ?”

“आपकी गैरहाजिरी में आपका दफ्तर सम्भालती हूं और क्या पीछे दिल्ली भ्रमण के लिये निकल लेती हूं रोज ?”

“रोज न सही, लेकिन वो जो तेरा ब्वायफ्रेंड है...”

“कौन सा ?”

“यानी कई हैं ?”

“है तो ऐसा ही ऊपर वाले की कृपा से । आप कहते नहीं हैं कि मैं बहुत खूबसूरत हूं ?”

“वो तो तू है ?”

“तो फिर ? बहुत खूबसूरत का भी एक ही ब्वायफ्रेंड और किसी काली कलूटी बैंगन लूटी का भी एक ही ब्वायफ्रेंड ! ऐसी नाइंसाफी कहीं होने देता है वो दो जहां का मालिक !”

“अगर सच में तेरे ढ़ेर फ्रेंड हैं तो एक शेर सुन ।”

“इरशाद ।” - वो अदा से बोली ।

“दुआयें हमने मांगी थीं, बहारें गैर ने लूटी; हमें तो ख्वार ही गुजरा तेरा नौजवां होना ।”

वो हंसी, फिर बोली - “मुझे आपसे हमदर्दी है ।” - एक क्षण ठिठकी फिर बोली - “शायर से भी ।”

“ठीक है, ठीक है । बहुत सयानी है । मैं उस फ्रेंड की बात कर रहा हूं जो तू अक्सर कहती है कि तुझे हारले डेविडसन मोटरसाइकल पर बहुत घुमाता है ।”

“अच्छा वो !”

“हां, वो ।”

मैं जानता था उसका कोई ब्वायफ्रेंड नहीं था, अपने फर्जी ब्वायफ्रेंड का हवाला वो मुझे तपाने के लिये देती रहती थी ।

“क्या कहना चाहते हैं उसकी बाबत ?”

“मैं सोच रहा था कि उसकी वजह से हो सकता है तेरे को दिल्ली की किन्हीं उन जगहों की जानकारी हो जिनकी इत्तफाक से मेरे को नहीं है !”

“कोई खास जगह है आपके जेहन में ?”

“हां ।”

“नाम लीजिए ।”

“रोज़वुड क्लब ।”

“वो जो सैनिक फार्म में है ?”

“वही । यानी कि वाकिफ है उससे ?”

“हूं तो सही !”

“कैसे ? मेम्बर है उसकी ?”

“लो ! घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने । अरे, इतनी तनखाह देते हैं आप मुझे कि मैं किसी क्लब की मेम्बर बन सकूं !”

“हर वक्त तनखाह का रोना रोती है । कभी वक्त पर न मिलने के अंदेशे का, कभी न ही मिलने का । अब कम होने का ताना देने लगी...”

“आप विषय से भटक रहे हैं । आप बात रोज़वुड क्लब की कर रहे थे । रिमेम्बर ?”

“रिमेम्बर । कैसे वाकिफ है ?”

“वहां शतरंज का एक नेशनल टूर्नामेंट होने वाला है । मैंने भी फार्म भरा है ।”

“तू... तू शतरंज खेलती है ?”

“बहुत बढ़िया । दो बार लोकल चैम्पियनशिप जीत चुकी हूं ।”

“कमाल है ! और मेरे को खबर ही नहीं !”

“आपको टाइम कहां है ऐसी बातों की खबर रखने का ! बाकी बहनजियों से फुरसत मिले तो शतरंज वाली बहन जी की खबर लगे न !”

“ये टूर्नामेंट क्लब करवाता है ?”

“क्लब का प्रेसीडेंट अमरनाथ परमार करवाता है ।”

“क्या नाम बोला ?”

“अमरनाथ परमार । कोई जाना पहचाना नाम निकल आया क्या ?”

“हां । बाजरिया एडवोकेट विवेक महाजन मोटी फीस वाला जो केस आज मुझे मिला है, ये शख्स उसकी मकतूला का बाप है ।”

“ओह !”

“तो ये टूर्नामेंट अमरनाथ परमार कराता है और इसका आयोजन रोज़वुड क्लब में होता है जिसका कि वो प्रेसीडेंट है ?”

“हां ।”

“अपनी जाती हैसियत में ?”

“पूरी तरह से तो नहीं ! वैसे चाहे तो खुद भी करा सकता है - आखिर पैसे वाला आदमी है, सुना है बड़ा बिल्डर है, कालोनाइजर है - पर रोज़वुड क्लब को इवेंट पार्टनर बताया जाता है तो जाहिर है कि ईवेंट में उसकी कम्पनी की एक्टिव पार्टीसिपेशन है । वैसे सरकारी दखल भी है ।”

“वो कैसे ?”

“साउथ दिल्ली के रूलिंग पार्टी के सांसद आलोक निगम के सन्दर्भ से जो कि अमरनाथ परमार का साला है ।”

“एमपी की बहन का हसबैंड ?”

“हां । तभी तो साला होगा ।”
 
“सॉरी !”

“दरअसल ये टूर्नामेंट अमरनाथ परमार की दिवंगत पत्नी सुनीता की यादगार में करवाया जाता है ।”

“दिवंगत पत्नी ! लेकिन मेरी जानकारी तो कहती है कि उसकी बीवी सलामत है !”

“ठीक कहती है । अमरनाथ परमार ने दो बार शादी की थी । पहली बीवी एक औलाद छोड़ के टाइफाइड से मर गयी थी । फिर उसने दोबारा शादी कर ली थी । दूसरी बीवी एमपी आलोक निगम की बहन है ।”

“ओह !”

“दूसरी बीवी - दीप्ति निगम - कहते हैं कि डाइवोर्सी थी और शादी के वक्त दो बच्चों की मां थी ।”

“अमरनाथ को बाऔलाद डाइवोर्सी बतौर बीवी कबूल हुई ?”

“जाहिर है कि हुई । इसलिये हुई क्योंकि वो रूलिंग पार्टी के बड़े, पावरफुल नेता की बहन थी जो कि सिटिंग एमपी था । ये भी कहते हैं कि अपने व्यापार में अमरनाथ परमार ने जो भी तरक्की की है, दूसरी शादी के बाद की है और अपने एमपी साले के दम पर की है ।”

“तू तो बहुत कुछ जानती है !”

“मेरा एक ब्वायफ्रेंड ऐसा भी है जो कि नेतागिरी के कारोबार में अप्रेंटिस है । वो मेरे को ऐसी बहुत बातें सुनाता है ।”

“बस, बातें ही सुनाता है ? करता कुछ नहीं ?”

“करता है ।”

“अच्छा, करता है ! और तू करने देती है ?”

“हां ।”

“सत्यानाश हो तेरा । क्या करता है भला ?”

“मेरी इज्जत करता है ।”

“ओह ! इज्जत करता है ।”

“चैन की सांस ली आपने । ऐसा क्यों ?”

“तेरे को मालूम है ऐसा क्यों ? अभी बोल, सच में टूर्नामेंट में पार्टिसिपेंट है ?”

“मैं आपको पार्टीसिपेंट का अपना फोटोकार्ड ला के दिखाती हूं ।”

“बैठी रह । सारा दिन तो तू आफिस में होती है, वहां कब जाती है ?”

“अभी नहीं जाती । बस, फार्म दाखिल करने और कागजी कार्यवाही पूरी करने को एक बार गयी थी । तब इतवार था । दूसरी बार अपना फोटोकार्ड वगैरह कलैक्ट करने गयी थी । तब शाम को यहां से छुट्टी के बाद गयी थी ।”

“खेलने गयी ही नहीं ?”

“अभी नहीं । अभी वहां क्वालीफाईंग राउंड चल रहे हैं जिन में मेरे को शामिल होने की जरूरत नहीं । असल मुकाबले सोमवार सोलह तारीख से शुरू होंगे । तब जब तक हार नहीं जाऊंगी, रोज आधे दिन की छुट्टी लूंगी । एडवांस में - बारह दिन पहले - खबर कर रही हूं ।”

“ऐसा है तो हर इतवार को तेरे को आफिस आना पड़ेगा ।”

“मुझे मंजूर है, पर एक शर्त है ?”

“क्या ?”

“आपको भी आना पड़ेगा । छुट्टी वाले दिन मैं अकेली फांसी नहीं लगूंगी ।”

“ठीक है । क्वालीफाईंग राउंड्स में तेरे को शामिल होने की जरूरत क्यों नहीं ?”

“क्योंकि टूर्नामेंट के लिये क्वालीफाई करने की जरूरत नहीं । मैं दिल्ली स्टेट की चैम्पियन रह चुकी हूं इसलिये टूर्नामेंट में मेरी डायरेक्ट एंट्री है । कम्पीटीटिव राउन्ड्स शुरू होने में अभी टाइम है ।”

“मुझे तो यकीन नहीं आता कि तू शतरंज खेलती है । खेलती ही नहीं है, बढ़िया खेलती है - इतना कि चैम्पियनशिप जीत लेती है ।”

वो हंसी ।

“फीमेल प्लेयर थोड़ी होती होंगी न ! उनमें जीत जाती होगी ! अंधों में कानी रानी की तरह ?”

“जो टूर्नामेंट मैंने खेले हैं, उनमें लड़कियों का अलग सैक्शन नहीं होता । मेल फीमेल प्लेयर्स इकट्ठे कम्पीट करते हैं । सुनीता मेमोरियल चैस टूर्नामेंट में भी ऐसा ही है ।”

“कमाल है !”

“विश्वनाथ आनन्द आने वाले हैं, चीफ गैस्ट के तौर पर पुरुस्कार वितरण उनके हाथों होना है ।”

“पार्टीसिपेट नहीं कर रहे ?”

“नहीं । वो पार्टीसिपेट करेंगे तो दूसरा कोई टूर्नामेंट कैसे जीत पायेगा ?”

“ये बात तो ठीक है !”

“फाइनल राउन्ड्स के करीब और भी बड़े खिलाड़ी बतौर गैस्ट आने वाले हैं ।”

“मसलन कौन ?”

“सूर्याशेखर गांगुली, एस.पी. सेतुरमण, विदित गुजराती, संदीपन चन्दा, हरिका द्रोणावल्ली ।”

मैंने एक भी नाम नहीं सुना था ।

“आखिरी नाम महिला का है ? हरिका ?”

“हां ।”

“बहरहाल तू वहां आती जाती रहती है और आइन्दा भी आती जाती रहने वाली है !”

“हां । आखिर पार्टीसिपेंट हूं । टूर्नामेंट की अवधि के फोटो पास वाली ।”

“वैसे वहां जाने पर पाबन्दी है ?”

“हां । वहां या मेम्बर्स जा सकते हैं या मेम्बर्स के गैस्ट जा सकते हैं ।”

“या तू जा सकती है ।”

“आजकल ।”

“इतना काफी है । कभी मुझे साथ ले जा सकती है ?”

“हां । पार्टीसिपेंट्स को रिश्तेदार साथ लाने की इजाजत है । मैं आपको रिश्तेदार बोलूंगी तो आप जा सकेंगे ।”

“गुड ! क्या बोलेगी ?”

“बाप बोल दूंगी ।”

“पागल हुई है ! मैं लगता हूं बाप तेरा ?”

“भाई बोल दूंगी ।”

“खबरदार !”

“क्या खबरदार ! बाप नहीं बोलूंगी, भाई नहीं बोलूंगी तो क्या खसम बोलूंगी ?”

मेरी हंसी छूट गयी ।

वो भी हंसी ।

“कब चलना चाहेंगे ?” - फिर बोली ।

“बोलूंगा लेकिन अपना और मेरा कोई इज्जतदार रिश्ता सोच के रखना ।”

“वो तो सोचा था ! बाप और भाई से ज्यादा इज्जतदार...”

“फिर शुरू हो गयी !”

वो निचला होंठ दबा कर हंसी, फिर उठ खड़ी हुई ।

“ठीक है ।” - वो बोली - “जाती हूं ।”

मैंने मशीनी अन्दाज से सहमति में सिर हिलाया ।

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अगले दिन दोपहर के करीब वकील विवेक महाजन के सौजन्य से तिहाड़ जेल में मेरी सार्थक बराल से मुलाकात हुई ।

उस मुलाकात के इन्तजाम से सिद्ध हुआ कि वो नामी वकील ही नहीं, जुगाड़ू वकील भी था । हमारे लिये कैदी को एक आफिसनुमा कमरे में पेश किया गया जबकि कैदियों से मुलाकात एक बड़े हाल के बीच में लगी स्क्रीन के आरपार से होती थी ।

सार्थक को अभी सजा नहीं हुई थी इसलिये अभी उसके लिये कैदियों वाली वर्दी पहनना जरूरी नहीं था । वो एक नीली जींस और गोल गले का मोटा ऊनी स्वेटर पहने था जिसके नीचे कमीज पता नहीं थी या नहीं थी क्योंकि कालर या कफ दिखाई नहीं दे रहे थे । उसके चेहरे पर मुर्दनी थी और आंखों में उदासी थी जो कि स्वाभाविक थी; सजा पाता तो यकीनन फांसी पर झूलता ।

उसने वकील का अभिवादन किया और प्रश्नसूचक भाव से मेरी तरफ देखा ।

वकील ने उसे मेरा परिचय दिया और बताया कि मुझे उसके लिये एंगेज किया गया था । सुनकर उसके चेहरे पर कोई रौनक न आयी, उसकी कोई उम्मीद न जागी ।

“मैं सीधा कोर्ट से आ रहा हूं ।” - वकील बोला - “जज ने तुम्हें जमानत देना तो जैसे तैसे कबूल कर लिया है लेकिन जमानत राशि बीस लाख मुकर्रर की है ।”

जमानत राशि का साइज सुन कर उसका चेहरा और मुरझा गया । असहाय भाव से गर्दन हिलाते उसने अपने सूखे होंठों पर जुबान फेरी ।

“हौसला रखो ।” - वकील उसे तसल्ली देता बोला - “चिन्ता मत करो । तुम खुशकिस्मत हो कि दिल्ली में तुम्हारे बचाव के लिये एक अभियान चल रहा है जिसके तहत चन्दा भी इकट्ठा किया जा रहा है जिसमें कि दिनों दिन इजाफा हो रहा है । जल्दी ही रकम बीस लाख हो जाएगी और बतौर तुम्हारी जमानत कोर्ट में जमा करा दी जायगी । नाओ चिअर अप ।”

उसने कोशिश की जो कि नाकाम रही ।

वकील ने गहरी सांस ली, फिर बोला - “तुम मिस्टर शर्मा से बातें करो, मैं जा कर वार्डन के पास बैठता हूं ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

“दस मिनट ।” - वकील यूं मेरे से बोला जैसे मुझे आगाह कर रहा हो ।

मैंने भी सहमति में सिर हिलाया ।

वकील चला गया ।

पीछे मैं कैदी की ओर आकर्षित हुआ, मैं बोला - “अगर तुम बेगुनाह हो...”

“मैं हूं ।” - वो गुस्से से बोला ।

“टोको नहीं । भड़को नहीं । तुम्हारी हां न से कुछ होना होता तो अब तक हो चुका होता । नहीं ?”

“हां ।”

“हमें शास्त्रार्थ का वक्त नहीं मिला है, जरूरी बात करने का वक्त मिला है । खाली दस मिनट का । आयी बात समझ में ?”

“आई ।” - वो कठिन स्वर में बोला ।

“शुक्रिया । तो मैं कह रहा था कि अगर तुम बेगुनाह हो तो तुम्हारी गति इसी में है कि तुम्हें बेगुनाह साबित किया जा सके । और ऐसा करने का बेहतरीन तरीका ये ही है कि गुनाहगार का पर्दाफाश हो । ये पता चले कि कातिल तुम नहीं हो तो कौन है ! जमानत बेगुनाही का परवाना नहीं होती, जेल की जहमत से वक्ती राहत होती है । जमा, जमानत के खिलाफ पुलिस अपील कर सकती है, करती है । जमानत हो चुकी होने के बाद वो उसको खारिज किये जाने की नयी अपील लगा सकती है । वो कोई नया चार्ज लगा कर जमानती को फिर गिरफ्तार कर सकती है और उस सूरत में हासिल जमानत की कोई कीमत नहीं रह जाती । पढ़े लिखे जान पड़ते हो, उम्मीद है इन बातों को मेरे कहे बिना भी तुम समझते हो । नो ?”

“यस ।”

“गुड ।”

मैंने वकील से वादा किया था कि मैं सार्थक से उसकी सीक्रेट एलीबाई की बाबत कोई सवाल नहीं करूंगा । उस बड़ी मैंने वादाखिलाफी की ऑप्शन पर विचार किया लेकिन फिर यही फैसला किया कि कोई फायदा नहीं होने वाला था, उस मामले में खामोश रहने की बाबत कैदी वकील से भी ज्यादा दृढ़प्रतिज्ञ हो सकता था ।

मैंने अपलक उसकी तरफ देखा ।

“क्या देखते हो ?” - वो विचलित भाव से बोला ।

मैंने जवाब न दिया । वस्तुत: मैं सोच रहा था कि क्या मैं उस शख्स की सूरत पर से पढ़ा सकता था कि उसके मन में क्या था ! क्या वो शख्स चार भुजाओं वाली वजनी नेपाली मूर्ति का घातक वार अपनी पत्नी की खोपड़ी पर कर सकता था ?

क्या पता लगता था ! मर्द का मिजाज कब किस करवट बैठता था, क्या पता लगता था !

“मैंने तुम्हारा केस स्टडी किया है ।” - प्रत्यक्षत: मैं बोला - “एफआईआर भी पढ़ी है । तुम्हारे विस्तृत बयान की ट्रांसक्रिप्ट भी पढ़ी है । उसमें कुछ इजाफा कर सकते हो तो बोलो ।”

उसकी भवें उठी ।

“भई, तीन हफ्ते होने को आ रहे हैं वारदात हुए । इतने अरसे में हो सकता है कि नया कुछ याद आ गया हो, कोई ऐसी बात जेहन में तरोताजा हो गयी हो जो पहले तवज्जो में न आयी हो । ऐसा कुछ - कुछ भी - अब कहने को हो जो पहले पुलिस को न कहा हो ।”

उसने इंकार में सिर हिलाया ।

“जल्दबाजी में गर्दन न हिलाओ, सोच के जवाब दो ।”

“सोच के जवाब दूंगा तो दस मिनट का हासिल वक्त एक ही जवाब में सर्फ हो जायेगा ।”

मैंने एक आह सी भरी । वो ठीक कह रहा था ।

“अच्छा, छोड़ो वो बात । अपना कातिल की बाबत कोई अन्दाजा बताओ । अगर तुम कातिल नहीं हो तो जाहिर है कि सोचा तो बहुत होगा असल कातिल के बारे में ? कभी आया कोई नाम जेहन में ?”

“आया, बराबर आया ।”

उसके लहजे की मजबूती ने मुझे चौंकाया ।

“कौन ?” - मैंने उत्सुक भाव से पूछा ।

“माधव धीमरे ।”

“वो कौन है ?”

“रोज़वुड क्लब का मैनेजर है ।”

“तुम उस क्लब का नाम ले रहे हो जो कि सैनिक फार्म्स में है और जिसका तुम्हारा ससुरा प्रेसीडेंट है ?”

“हां ।”

“माधव धीमरे भी नेपाली है ?” - मैं एक क्षण ठिठका, फिर मैंने जोड़ा - “तुम्हारी तरह ?”

“हां ।”

“तुम्हारी ही उम्र का ?”

“मेरे से बड़ा । छ: सात साल । ज्यादा भी हो सकता है ।”

तब एक नया खयाल मेरे जेहन में कौंधा । जरूरी तो नहीं था कि प्रेम त्रिकोण का तीसरा कोण - जैसा कि मैंने पहले सोचा था - कोई औरत ही होती, तीसरा कोण कोई मर्द भी तो हो सकता था !

मसलन वो माधव धीमरे जिसका नाम मैं अब सुन रहा था ।

क्या पता मेरे सामने बैठे शख्स को अपनी बीवी के माधव धीमरे से ताल्लुकात की खबर हो और क्या पता इसी वजह से वो बीवी की मौत को कोई ज्यादा अहमियत न दे रहा हो !

बहरहाल उस वक्त कत्ल के लिये जिम्मेदार एक वैकल्पिक कैंडीडेट सुझाया जा रहा था ।

“वो तुम्हारी बीवी का कातिल है” - मैं बोला - “ऐसा सोचने की कोई वजह ?”

“है वो कातिल ।” - वो दृढ़ता से बोला ।

“ठीक ! ठीक ! लेकिन वजह ? वजह बोलो । वजह बोलो कोई ।”

“मैं उसका कर्जाई हूं ।”

“कर्जाई तुम हो, मार उसने तुम्हारी बीवी को डाला ! ऐसा क्यो ?”

उसने जवाब न दिया ।

“कितना कर्जा है ? रकम बोलो ।”

“अस्सी हजार ।”

“क्यों ली ? ली तो कहां गयी ?”

“बताना जरूरी है ?”

“हां, जरूरी है ।”

“जुए में गयी । रेस खेली । घोड़ा न लगा । कभी भी ।”

“माधव धीमरे की बाबत पुलिस को बोला ? बोला कि तुम्हारे खयाल से...”

“मेरे यकीन से ।”

“...तुम्हारी बीवी का कातिल वो था ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“किसी ने पूछा नहीं ।”

“ऐसी बात तो बिना पूछे बतानी चाहिये । पुरजोर बतानी चाहिये ! पुरइसरार बतानी चाहिये !”

वो खामोश रहा ।

“जवाब दो, भई !”

वो फिर भी खामोश रहा ।

“रिहाई के कोई खास इच्छुक नहीं लगते ! जेल में दिल लग गया जान पड़ता है ?”

इस बार उसने जवाब देने के लिये मुंह खोला लेकिन तभी दरवाजा खुला और चौखट पर एक हवलदार प्रकट हुआ । उसने मुझे दिखाकर अर्थपूर्ण भाव से अपनी कलाई घड़ी का डायल ठकठकाया ।

मैंने सहमति में सिर हिलाया और वापिस कैदी की ओर आकर्षित हुआ ।

“एक आखिरी सवाल ।” - मैं जल्दी से बोला - “अपनी कार की हैडलाइट कैसे तोड़ी ?”

“तुम्हारा माधव धीमरे से मिलने का इरादा है ?”

“है तो सही !”

“मेरा भी यही खयाल था । जब मिलो तो ये सवाल उससे पूछना ।”

“कार तुम्हारी, हैडलाइट तुम्हारी टूटी, इस बाबत सवाल उससे करूं ?”

“हां ।”

“कमाल है ! और क्या करूं ? उसे बोलूं कि तुम उसे याद करते थे ?”

“हां, बोलना । और ये भी बोलना कि सार्थक बहुत जल्द उससे मिलेगा ।”

“मिलोगे ? कहां ?”

उसने छत की तरफ उंगली उठा दी ।

“ओह ! तो दे इरादे हैं ?”

उसने जवाब न दिया, एकाएक वो उठा और हवलदार की तरफ बढ़ चला ।
 
मुझे नजरअंदाज करता हवलदार कैदी को ले कर वहां से रुखसत हो गया ।

मैं भी उठा और भारी कदमों से बाहर की ओर बढ़ा ।

गलियारे में मुझे वकील मिल गया ।

“क्या हुआ ?” - मेरे साथ कदम-ब-कदम चलता वो उत्सुक भाव से बोला ।

मैंने बताया - माधव धीमरे के नाम पर खास जोर देकर बताया - क्या हुआ !

“कमाल है !” - वकील हैरान होता बोला - “इतनी अहम बात मेरे को क्यों न बोली ?”

“अरे, वकील साहब, बड़ा कमाल है कि इतनी अहम बात पुलिस को न बोली । उस पर कत्ल का इलजाम है । ऐसा शख्स आल्टरनेट कैण्डीडेट दौड़ दौड़ कर सुझाता है ! किसी दूसरे की तरफ पुलिस की तवज्जो जायेगी तो उसकी तरफ से हटेगी न !”

“मैं... बात करूंगा उससे ।”

“अभी करो ।”

“अब मुमकिन नहीं । मैं फिर बात करूंगा । जल्दी ही फिर उससे मिलूंगा ।”

“वकील साहब, आपने हाथ कंगन को आरसी क्या वाली मसल नहीं सुनी मालूम होती !”

“अब छोड़ो न, यार ! ये कोई बड़ा मसला नहीं । कुछ करूंगा मैं ।”

“अच्छी बात है । उसकी सीक्रेट एलीबाई के बारे में क्या कहते हो ? अब बताते हो कि उसका खुफिया गवाह कौन है ?”

उसने मजबूती से इंकार में सिर हिलाया ।

“मेरे अंदाजे पर तो कनफर्मेशन की मोहर लगाओ कि वो कोई इश्कियाई हुई औरत है ! शादीशुदा औरत है !”

उसने पहले से ज्यादा मजबूती से इंकार में सिर हिलाया ।

“सर, आई डिमांड एन आनसर ।”

“यू गॉट इट आलरेडी । एण्ड ट्वाइस ऐट दैट । आई सजेस्ट यू गो अर्न युअर फी एण्ड प्रूव दैट यू आर ए ग्रेट डिटेक्टिव । फाइंड आउट फार यूअरसैल्फ हू शी इज... दैट इज इफ देयर इज वन सच वुमैन ! गो अहेड एण्ड गिव मी ए सरप्राइस आफ माई लाइफ !”

अपनी अप्रसन्नता जताने के लिये वो मेरा साथ छोड़ कर मेरे से आगे चलने लगा ।

हकबकाया सा मैं उसके पीछे हो लिया ।

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मैं मोतीबाग पहुंचा ।

मौकायवारदात कोठी तलाश करने में मुझे कोई दिक्कत न हुई । मकतूला का बाप बड़ा बिल्डर और कॉलोनाइजर बताया जाता था, उस लिहाज से वो कोठी बहुत मामूली थी; यानी न भव्य थी, न विशाल थी । कोठी मजबूती से बन्द थी । उसके फ्रंट के आयरन गेट को भी ताला लगा हुआ था ।

मैंने उसके पहलू की उस कोठी की तरफ तवज्जो दी जिसमें पुलिस का खास गवाह कमला ओसवाल रहती बताई जाती थी, जिसके डस्टबिन में से पुलिस ने अलायकत्ल चारभुजी नेपाली मूर्ति बरामद की थी । मैं उसके गेट पर पहुंचा और उसके बाजू में पिलर पर लगी कालबैल का बटन दबाया ।

बरामदे में खुलने वाली एक विशाल खिड़की के पीछे हलचल हुई, भीतर से एक पर्दा एक बाजू सरकाया गया और शीशे में से एक महिला ने बाहर झांका, फिर खिड़की का एक पल्ला खुला ।

“कुछ नहीं चाहिये ।” - वो गुस्से से बोली - “गेट पर लगा स्टिकर नहीं देखा जिस पर लिखा है सेल्समैन घंटी न बजाये ।”

“नहीं देखा ।” - मैं धीरज से बोला ।

“क्यों नहीं देखा ? निगाह में नुक्स है ?”

“निगाह ठीक है । स्टिकर नहीं है ।”

“क्या ! कम्बख्त छोकरे फिर उखाड़ के ले गये ! खैर, कोई बात नहीं । अभी बोला न, कुछ नहीं चाहिये ।”

“मैं सेल्समैन नहीं हूं ।”

“अड़ोस पड़ोस का कोई पता पूछना है तो वो भी कहीं और जा के पूछो ।”

“लेकिन मैं...”

“नो ! टलो, नहीं तो मैं पुलिस को काल करती हूं ।”

“मैं पुलिस हूं ।”

खामोशी छा गयी ।

फिर खिड़की पर से चेहरा हटा, दरवाजा खुला और एक कोई पैंतीस साल की, कदरन भारी बदन वाली, अच्छे नयन नक्श वाली, कटे बालों वाली, शलवार कमीजधारी महिला गेट पर पहुंची । उसने संदिग्ध भाव से ऊपर से नीचे तक मेरा मुआयना किया ।

“क्या हो पुलिस में ?” - वो पूर्ववत् रुखाई से बोली ।

“डिटेक्टिव ।”

“आई-कार्ड दिखाओ ।”

मैंने उसे अपने आई-कार्ड की एक झलक यूं दिखाई कि उसे उस पर लगी मेरी फोटो ही दिखाई देती, एक शब्द ‘डिटेक्टिव’ ही दिखाई देता, उससे पहले के शब्द ‘प्राइवेट’ पर मैंने अंगूठा रख लिया था ।

उसकी त्योरी में फर्क आया ।

“क्या चाहते हो ?” - वो अपेक्षाकृत नम्र स्वर में बोली ।

“कुछ पूछताछ करनी है ।” - मैं बोला ।

“अभी कोई कसर रह गयी है पूछताछ में ?”

“हां ।”

वो हड़बड़ाई, फिर बोली - “दाता ! मैं तो अजिज आ गयी गवाह बन के । मुझे क्या पता था गवाह से एक एक बात दस दस बार पूछी जाती थी !”

मैं खामोश रहा ।

“वर्दी में क्यों नहीं हो ?” - वो सन्दिग्ध भाव से बोली ।

“मैं डिटेक्टिव हूं । थाने से नहीं हूं सीआईडी के महकमे से हूं । सीआईडी डिटेक्टिव के लिये वर्दी पहनना जरूरी नहीं होता ।”

“लाइक टीवी सीरियल ? सीआईडी ?”

“यस ।”

“नाम बोलो ।”

“राज शर्मा ।”

“पूछो, क्या पूछना है ?”

तब पहली बार मैंने अपने पंजाबी जलाल की झलक दिखाते हुए उसे घूरकर देखा जिसका तत्काल उस पर असर दिखाई दिया । वो हड़बड़ाई, फिर उसने गेट खोला और बोली - “आओ ।”

“शुक्रिया ।” - मैं जानबूझकर शुष्क स्वर में बोला ।
 
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