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इंसाफ
मैं अपने अशोक भवन स्थित आफिस में मौजूद था और सोच रहा था कि मेज का दाईं ओर का नीचे का दराज अभी खोलूं या थोड़ी देर बार खोलूं ।
उस दराज में रेमी मार्टिन की बोतल थी ।
जनवरी का महीना था, दोपहर हो चुकी थी लेकिन अभी तक सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हुए थे । जनवरी के महीने में दिल्ली में कड़ाके की ठण्ड पड़ती थी और अगर कोहरा न छंटा हो और सूरज न निकला हो तो ऐसे माहौल में कोनियाक शैम्पेन - वी.एस.ओ.पी. का एक नीट घूंट ही स्वर्ग की अनुभूति कराने के लिये काफी था ।
लेकिन सवा बारह बजे ही !
बोतल की तरफ से ध्यान हटाने के लिये मैंने डनहिल का एक सिग्रेट सुलगा लिया और बड़े तृप्तिपूर्ण भाव से उसके कश लगाने लगा ।
उम्मीद है कि खाकसार को आप भूले नहीं होंगे । फिर भी मैं समझता हूं कि अपना तआरुफ दोहराने में कोई हर्ज तो न होगा ! बंदे को राज शर्मा कहते हैं और दिल्ली के प्राइवेट डिटेक्टिव सर्विसिज के धंधे में मेरी हैसियत अंधों में काना राजा जैसी है । यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस के नाम से अशोक भवन के एक बहुमंजिला आफिस काम्प्लेक्स में उसकी चौथी मंजिल पर मेरा छोटा सा दफ्तर है जिस में मैं यूं कभी कभार पाया जाता हूं जैसे हमारे माननीय प्रथानमंत्री जी भारत में कभी कभार पाये जाते हैं । बन्दे को तब से पीडी के कम में शिरकत का फख्र हासिल है जब कि ये धंधा भारत में अभी ठीक से पहचाना नहीं जाता था लेकिन अब ऐसी बात नहीं थी, अब वकीलों की तरह पीडीज की भी दिल्ली में भरमार थी इसलिये वो ऐसे काम भी करते थे जो तरीके से इस कारोबार के स्कोप में नहीं आते थे - जैसे मैट्रीमोनियल कनफर्मेशंस, कैरेक्टर वैरीफिकेशन, सिक्योरिटी सर्विस वगैरह - लेकिन युअर्स ट्रूली ने कभी ऐसे - अब क्या कहूं - टुच्चे कामों में दिलचस्पी नहीं ली थी ।
वजह !
शेर घास नहीं खाता ।
लिहाजा आपके खादिम को वही असाइनमेंट कबूल होती थी जिसमें कोई चैलेंज हो और जिस की बाबत क्लायंट का ये विश्वास पुख्ता हो भी चुका हो कि उस चैलेंज का कोई सामना कर सकता था तो वो था राज शर्मा, दि ओनली वन । इसी वजह से कई बार कई कई दिन मुझे खाली बैठना पड़ता था ।
जैसा कि आजकल हो रहा था ।
.....................
मेरा सिग्रेट खत्म हुआ तो बीच का दरवाजा खुला और चौखट पर रजनी प्रकट हुई ।
रजनी शर्मा मेरी सैक्रेट्री थी और मेरी गैरहाजिरी में फ्रंट आफिस सम्भालती थी । निहायत खूबसूरत होने के अलावा उसमें और भी कई खूबियां थीं लेकिन उन सब पर हावी एक खामी थी :
शरीफ लड़की थी ।
और भी कई खामियां थीं । जैसे :
एम्प्लायर की गोद में नहीं बैठती थी ।
उसे पप्पी नहीं देती थी ।
उसे अपने पर आशिक करवाने की कोशिश नहीं करती थी ।
‘वगैरह वगैरह’ नहीं करती थी ।
बहरहाल होशियार थी, वफादार थी, दुख सुख की साथी थी और शरीफ होने की वजह से ही चील के घौंसले में मांस थी, फिर भी सेफ थी ।
“क्या है ?” - मैं बोला ।
“मुझे क्या पता क्या है ?” - उसने तुनक कर जवाब दिया ।
“अरे, मेरा मतलब है किसलिये दर्शन दिये ? मेरे अंगने में क्या काम है तेरा ?”
“अच्छा वो ?”
“हां, वो । अब बोल !”
“कल जो क्लायंट बनने से बाल बाल बच गया था, उसका अभी फोन आया था ।”
“वकील का ? क्या नाम था ? कहीं नोट तो किया था मैंने ! देखता हूं ।”
“विवेक महाजन ।”
“हां, विवेक महाजन । एडवोकेट सैशन एण्ड हाईकोर्ट । अब क्या कहता था ?”
“एक केस डिसकस करने के लिये कल वो आपको अपने आफिस बुलाता था लेकिन आपको राजेन्द्रा प्लेस जाना कबूल नहीं हुआ था जहां कि उसका आफिस है । आप ने उसे यहां आने को बोला था तो उसने कहा था कि वो इतना मसरूफ था कि नहीं आ सकता था...”
“जैसे मैं खाली बैठा था !”
“था तो ऐसा ही !”
“क्या बोला ?”
“टेबल के खुले दराज में दोनों पांव टिका के कुर्सी पर ढ़ेर हुए ऊंघ रहे थे” - वो एक क्षण ठिठकी फिर कुटिल भाव से बोली - “सुबह से ही ।”
“जो कि टेलीफोन पर उस वकील के घोड़े को दिखाई दे रहा था !”
“आप को दिखाई दे रहा था । खाली बैठे थे । महीना होने को आ रहा है । फिर भी नखरा किया और ठोक दिया आप उससे ज्यादा बिजी थे, राजेन्द्रा प्लेस नहीं जा सकते थे ।”
“अरे, कारोबार की बेहतरी के लिये आन बान शान बना कर रखनी पड़ती है ।”
“झूठ बोल कर ?”
“झूठ बोल कर भी ।”
“ये खयाल न किया कि प्यासा कुएं के पास जाता है, कुआं प्यासे के पास नहीं जाता ।”
“तेरे को क्या पता प्यासा कौन है, कुआं कौन है !”
“पता तो है ! अब तो बिल्कुल ही पता है ।”
“क्या मतलब ?”
“वो यहां आ रहा है ।”
“देखा !” - मैं विजेता के से स्वर में बोला - “अब बोल प्यासा कौन और कुआं कौन ?”
“आधे घंटे में पहुंचने को बोल रहा था ।”
“फोन कब आया था ?”
“बीस मिनट पहले ?”
“फिर तो अभी पूरे दस मिनट बाकी हैं ।”
“तो ?”
“पूछती है तो ! अरे तेरे को नहीं पता ?”
“नहीं, नहीं पता ।”
“दरवाजा बंद कर और आ के मेरी गोद में बैठ ।”
वो निचला होंठ दबाकर हंसी ।
“अरी, कम्बख्त, समय का सदउपयोग करना सीख !”
वो और हंसी । दिलकश, दिलफरेब हंसी ।
मैं अपने अशोक भवन स्थित आफिस में मौजूद था और सोच रहा था कि मेज का दाईं ओर का नीचे का दराज अभी खोलूं या थोड़ी देर बार खोलूं ।
उस दराज में रेमी मार्टिन की बोतल थी ।
जनवरी का महीना था, दोपहर हो चुकी थी लेकिन अभी तक सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हुए थे । जनवरी के महीने में दिल्ली में कड़ाके की ठण्ड पड़ती थी और अगर कोहरा न छंटा हो और सूरज न निकला हो तो ऐसे माहौल में कोनियाक शैम्पेन - वी.एस.ओ.पी. का एक नीट घूंट ही स्वर्ग की अनुभूति कराने के लिये काफी था ।
लेकिन सवा बारह बजे ही !
बोतल की तरफ से ध्यान हटाने के लिये मैंने डनहिल का एक सिग्रेट सुलगा लिया और बड़े तृप्तिपूर्ण भाव से उसके कश लगाने लगा ।
उम्मीद है कि खाकसार को आप भूले नहीं होंगे । फिर भी मैं समझता हूं कि अपना तआरुफ दोहराने में कोई हर्ज तो न होगा ! बंदे को राज शर्मा कहते हैं और दिल्ली के प्राइवेट डिटेक्टिव सर्विसिज के धंधे में मेरी हैसियत अंधों में काना राजा जैसी है । यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस के नाम से अशोक भवन के एक बहुमंजिला आफिस काम्प्लेक्स में उसकी चौथी मंजिल पर मेरा छोटा सा दफ्तर है जिस में मैं यूं कभी कभार पाया जाता हूं जैसे हमारे माननीय प्रथानमंत्री जी भारत में कभी कभार पाये जाते हैं । बन्दे को तब से पीडी के कम में शिरकत का फख्र हासिल है जब कि ये धंधा भारत में अभी ठीक से पहचाना नहीं जाता था लेकिन अब ऐसी बात नहीं थी, अब वकीलों की तरह पीडीज की भी दिल्ली में भरमार थी इसलिये वो ऐसे काम भी करते थे जो तरीके से इस कारोबार के स्कोप में नहीं आते थे - जैसे मैट्रीमोनियल कनफर्मेशंस, कैरेक्टर वैरीफिकेशन, सिक्योरिटी सर्विस वगैरह - लेकिन युअर्स ट्रूली ने कभी ऐसे - अब क्या कहूं - टुच्चे कामों में दिलचस्पी नहीं ली थी ।
वजह !
शेर घास नहीं खाता ।
लिहाजा आपके खादिम को वही असाइनमेंट कबूल होती थी जिसमें कोई चैलेंज हो और जिस की बाबत क्लायंट का ये विश्वास पुख्ता हो भी चुका हो कि उस चैलेंज का कोई सामना कर सकता था तो वो था राज शर्मा, दि ओनली वन । इसी वजह से कई बार कई कई दिन मुझे खाली बैठना पड़ता था ।
जैसा कि आजकल हो रहा था ।
.....................
मेरा सिग्रेट खत्म हुआ तो बीच का दरवाजा खुला और चौखट पर रजनी प्रकट हुई ।
रजनी शर्मा मेरी सैक्रेट्री थी और मेरी गैरहाजिरी में फ्रंट आफिस सम्भालती थी । निहायत खूबसूरत होने के अलावा उसमें और भी कई खूबियां थीं लेकिन उन सब पर हावी एक खामी थी :
शरीफ लड़की थी ।
और भी कई खामियां थीं । जैसे :
एम्प्लायर की गोद में नहीं बैठती थी ।
उसे पप्पी नहीं देती थी ।
उसे अपने पर आशिक करवाने की कोशिश नहीं करती थी ।
‘वगैरह वगैरह’ नहीं करती थी ।
बहरहाल होशियार थी, वफादार थी, दुख सुख की साथी थी और शरीफ होने की वजह से ही चील के घौंसले में मांस थी, फिर भी सेफ थी ।
“क्या है ?” - मैं बोला ।
“मुझे क्या पता क्या है ?” - उसने तुनक कर जवाब दिया ।
“अरे, मेरा मतलब है किसलिये दर्शन दिये ? मेरे अंगने में क्या काम है तेरा ?”
“अच्छा वो ?”
“हां, वो । अब बोल !”
“कल जो क्लायंट बनने से बाल बाल बच गया था, उसका अभी फोन आया था ।”
“वकील का ? क्या नाम था ? कहीं नोट तो किया था मैंने ! देखता हूं ।”
“विवेक महाजन ।”
“हां, विवेक महाजन । एडवोकेट सैशन एण्ड हाईकोर्ट । अब क्या कहता था ?”
“एक केस डिसकस करने के लिये कल वो आपको अपने आफिस बुलाता था लेकिन आपको राजेन्द्रा प्लेस जाना कबूल नहीं हुआ था जहां कि उसका आफिस है । आप ने उसे यहां आने को बोला था तो उसने कहा था कि वो इतना मसरूफ था कि नहीं आ सकता था...”
“जैसे मैं खाली बैठा था !”
“था तो ऐसा ही !”
“क्या बोला ?”
“टेबल के खुले दराज में दोनों पांव टिका के कुर्सी पर ढ़ेर हुए ऊंघ रहे थे” - वो एक क्षण ठिठकी फिर कुटिल भाव से बोली - “सुबह से ही ।”
“जो कि टेलीफोन पर उस वकील के घोड़े को दिखाई दे रहा था !”
“आप को दिखाई दे रहा था । खाली बैठे थे । महीना होने को आ रहा है । फिर भी नखरा किया और ठोक दिया आप उससे ज्यादा बिजी थे, राजेन्द्रा प्लेस नहीं जा सकते थे ।”
“अरे, कारोबार की बेहतरी के लिये आन बान शान बना कर रखनी पड़ती है ।”
“झूठ बोल कर ?”
“झूठ बोल कर भी ।”
“ये खयाल न किया कि प्यासा कुएं के पास जाता है, कुआं प्यासे के पास नहीं जाता ।”
“तेरे को क्या पता प्यासा कौन है, कुआं कौन है !”
“पता तो है ! अब तो बिल्कुल ही पता है ।”
“क्या मतलब ?”
“वो यहां आ रहा है ।”
“देखा !” - मैं विजेता के से स्वर में बोला - “अब बोल प्यासा कौन और कुआं कौन ?”
“आधे घंटे में पहुंचने को बोल रहा था ।”
“फोन कब आया था ?”
“बीस मिनट पहले ?”
“फिर तो अभी पूरे दस मिनट बाकी हैं ।”
“तो ?”
“पूछती है तो ! अरे तेरे को नहीं पता ?”
“नहीं, नहीं पता ।”
“दरवाजा बंद कर और आ के मेरी गोद में बैठ ।”
वो निचला होंठ दबाकर हंसी ।
“अरी, कम्बख्त, समय का सदउपयोग करना सीख !”
वो और हंसी । दिलकश, दिलफरेब हंसी ।