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एक अनोखा बंधन**:-कि नई शुरुआत (2) complete

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मैं सोफे पे बैठा था और आँखें बंद किये हुए उन शब्दों में छुपे दर्द को महसूस कर रहा था| अनदर ही अंदर ये चुभन मेरी जान ले रही थी और उस दिन का हर एक दृश्य मेरे सामने आने लगा| खून उबलने लगा... इस कदर गुस्सा बढ़ गया की मैं बड़े जोश से उठ खड़ा हुआ पर अगले ही पल मुझे एक जोरदार चक्कर आया और मैं जमीन पे गिर गया और उसके आगे मुझे होश नहीं की क्या हुआ|

जैसे ही ये गिरे मैं भागती हुई आई और इन्हें उठाया और माँ को पुकारा; "माँ..माँ..जल्दी आइए!!!" माँ उस समय अंदर के कमरे में थी| पिताजी बाहर किसी काम से गए थे| माँ ने जब इन्हें जमीन पे गिरा हुआ पाया तो वो भी घबरा गईं और मुझसे पूछने लगीं; "बहु...मानु को क्या हुआ बहु?" मैं खुद नहीं जानती थी की इन्हें क्या हुआ है? मैं बहुत ज्यादा घबरा रही थी और इनका गाल थप-थापा रही थी और माँ इनके हाथ घिसने लगी थी| इतने में नेहा भी आ गई; "नेहा जल्दी डॉक्टर सरिता को फ़ोन मिला और जल्दी यहाँ बुला, बोल पापा बेहोश हो गए हैं|" नेहा ने तुरंत फ़ोन मिलाया पर उसके चेहरे को देख के आगा की बात कुछ और है और ये देख मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू हो गईं!

"माँ...डॉक्टर सरिता ने कहा की वो इस वक़्त क्लिनिक में नहीं हैं| उन्होंने कहा की हम पापा को हॉस्पिटल ले जाएं|"

मेरे कुछ कहने से पहले ही माँ बोल पड़ीं; " बेटा जल्दी से अपने दादा जी को फ़ोन मिला वो एम्बुलेंस ले के आ जायेंगे|"

नेहा ने ठीक वैसा ही किया और करीब पंद्रह मिनट में एम्बुलेंस आ गई, पिताजी नॉएडा में थे इसलिए अगर हम उनके आने का इन्तेजार करते तो काफी देर हो जाती, इसलिए उन्होंने फ़ोन कर के बताया की हम हॉस्पिटल पहुंचें और साथ ही साथ उन्होंने कुछ पड़ोसियों को भी फ़ोन मिलाया ताकि वो हमारी मदद करें| ..(दरअसल ये एक प्राइवेट एम्बुलेंस थी) सब ने मिलके इन्हें (मेरे पति) स्ट्रेचर पे लिटाया और चूँकि हमारा घर गली में पड़ता है तो हमें एम्बुलेंस तक इन्हें ले जाना पड़ा| मैं, माँ, आयुष और नेहा एम्बुलेंस में बैठ गए| सारे रास्ते मैं रोये जा रही थी और माँ मुझे ढांढस बंधा रही थी यह कह की; "बेटी कुछ नहीं होगा मानु को| तू चिंता मत कर ...सब ठीक हो जायेगा|" अगले बीस मिनट में हम हॉस्पिटल पहुँच गए| डॉक्टर सरिता ने हॉस्पिटल में अपने जानने वाले को पहले ही फ़ोन कर दिया और वो हमें गेट पर ही मिल गईं|सरिता जी ने इनकी केस हिस्ट्री डॉक्टर रूचि को पहले ही बता दी थी इसलिए तुरंत इन्हें admit कर के उपचार शुरू हो गया| करीब-करीब बीस मिनट बाद डॉक्टर सरिता भी आ गईं और वो सीधा प्राइवेट वार्ड में चली गईं जहाँ हम बैठे थे| अगले आधे घंटे में पिताजी भी आ गए और फिर सरिता जी ने माँ- और पिताजी को अपने साथ केबिन में बुलाया और मुझे वहीँ बैठे रहने को कहा| मैं स्टूल ले के इनके पास बैठ गई इस उम्मीद में की ये अब आँखें खोलेंगे ...अब आँखें खोलेंगे! दस मिनट बाद माँ अंदर आईं और मुझसे पूछने लगी; "बेटा...मानु ने दवाई खाई थी?" मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था, इसलिए मैं अवाक सी उन्हें देख रही थी और फिर मेरे मुँह से निकला; "पता नहीं माँ..." मेरा जवाब सुन के माँ को ये एहसास तो हो गया होगा की हमारे बीच में कुछ सही नहीं चल रहा था...पर उन्हें ये नहीं पता होगा की ये सब मेरी गलती थी! माँ पलट की जाने लगी तो अचानक से नेहा बोल पड़ी; दादीजी... पापा ने दवाई नहीं ली| मैंने कल रात को उन्हें याद दिलाया था पर उन्होंने कहा की मैं ठीक हूँ|" माँ ने उसके सर पे हाथ फेरा और वापस सरिता जी के केबिन में चली गईं| हैरानी की बात थी की नेहा को मुझसे ज्यादा उनकी फ़िक्र थी...शायद इलिये की ये उसे ज्यादा प्यार करते थे...मुझसे भी ज्यादा!

कुछ देर बाद माँ, पिताजी और सरिता जी कमरे में आये पर अभी तक मुझे इनकी तबियत के बारे में कुछ नहीं बताया गया| सब मुझसे छुपा रहे थे ... आखिर मैंने ही डॉक्टर सरिता से पूछा; "सरिता जी आखिर इन्हें हुआ क्या है?" पर उनके कुछ कहने से पहले ही पिताजी बोल पड़े; "बेटा मानु को थोड़ी देर में होश आ जायेगा, तू चिंता मत कर|" वो मेरे पिता सामान थे इसलिए मैं कुछ नहीं बोली और ये सोच के खुद को संतुष्ट कर लिया की ये पूरी तरह ठीक हो जाएं ...बस यही काफी है मेरे लिए|

चूँकि हमें एक प्राइवेट रूम allot किया गया था तो पिताजी को बाकी formalities पूरी करने के लिए जाना पड़ा| पंद्रह मिनट बाद पिताजी वापस आये और बोले; "बेटा ...मेरा डेबिट कार्ड का बैलेंस खत्म हो गया है और पैसे अब भी कम पड़ रहे हैं| तेरे पास तेरा डेबिट कार्ड है?" जल्दी-जल्दी में मैं अपना पर्स नहीं लाइ थी; "पिताजी वो मेरे पर्स में है.." पिताजी कुछ सोचने लगे और फिर बोले; "ऐसा करते हैं की हम सब वापस चलते हैं और पैसे ले के मैं वापस आ जाऊँगा| तुम दोनों शाम को आ जाना?" पर मेरा मन वहां से हिलने को नहीं कर रहा था इसलिए मैंने कहा; "पिताजी मैं यहीं रूकती हूँ आप बच्चों को और माँ को ले जाइए|" पिताजी कुछ सोचने लगे और आखिर में उन्होंने बच्चों ओ साथ चलने को कहा पर बहोन ने भी जाने से मन कर दिए और हार कर पिताजी को और माँ को जाना पड़ा| माँ भी जाना नहीं चाहती थी पर चूँकि ज्यादा देर बैठने से उनके पाँव में सूजन बढ़ने लगती है तो मेरे कहने पे माँ चली गईं| उन दिनों घर में पैसों को लेके कुछ परेशानी चल रही थी| पिताजी ने हॉस्पिटल में पैसे जमा करा दिए थे पर उन्हें आगे के बारे में भी सोचना था| पैसे जमा कर के पिताजी वापस आये और मुझे बोले; "बेटा...मैंने पैसे जमा करा दिए हैं| तुम्हें तो पता ही है की हमारी पेमेंट अभी फंसीहुई है| मैं अभी कुछ लोगों से मिल के आता हूँ शायद कोई पेमेंट कर दे! तो तुम और बच्चे यहीं रहो..और अगर डॉक्टर कुछ कहे तो मुझे फोन कर देना| मैं शाम तक तुम्हारी माँ के साथ आ जाऊँगा और तब तक मानु को भी होश आ जायेगा|" मैंने हाँ में सर हिलाया और पिताजी बच्चों को कह गए की अपने मम्मी-पापा का ध्यान रखना|

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पिताजी के जाने के बाद हम तीनों बेसब्री से इन्तेजार करने लगे की अब इन्हें (मेरे पति को) होश आएगा..अब होश आएगा.. और इन्तेजार इन्तेजार करते-करते रात के नौ बज गए थे| घर के किसी भी सदस्य ने कुछ नहीं खाया था| मुझे अपनी चिंता नहीं थी..चिंता थी तो बच्चों की इसलिए मैंने नेहा को आवाज दे के अपने पास बुलाया; "नेहा..बेटा इधर आओ...आप और आयुष जा के कैंटीन से कुछ खा लो| आप दोनों ने दोपहर से कुछ नहीं खाया है|"

"माँ...आपने भी तो कुछ नहीं खाया..और पापा कहते थे की आपको सबसे ज्यादा जर्रूरत है| तो आप भी चलो हमारे साथ" नेहा बोली|

"बेटा ...मेरा मन नहीं है...आप दोनों खा लोगे तो मेरा पेट भी भर जायेगा|"

"फिर मैं भी नहीं खाऊँगा..." आयुष ने नाराज होते हुए कहा|

ये सुन के तो मुझे गुस्सा आ गया और मैंने आयुष को गुस्से से देखा तो वो सहम गया और जाके नेहा के पीछे छुप गया| नेहा ने मुझसे पैसे लिए जो पिताजी जाते समय मुझे दे गए थे और फिर आयुष का हाथ पकड़ा और बाहर जाने लगी ...मझे एहसास हुआ की नेहा अपने पापा पे गई है| वो खुद कुछ नहीं खायेगी पर आयुष को जर्रूर खिला देगी| इसलिए मैंने उसे आवाज दे के रोक; "नेहा....रुक..मैं भी चलती हूँ तुम दोनों का भरोसा नहीं...कुछ खाओगे नहीं और झूठ बोल दोगे|" मैं उन्हें कैंटीन ले आई और दो सैंडविच और फ्रूटी ले के उन्हें दी| दोनों एक दूसरे की शकल देखने लगे पर कुछ खा नहीं रहे थे; "एक दूसरे की शकल क्या देख रहे हो? जल्दी खाओ...पापा अकेले हैं वहाँ|" आयुष ने तो डर के मारे खाना शुरू किया पर नेहा अब भी वैसे ही खड़ी थी| वो कुनमुनाते हुए बोली; "मैं नहीं खाऊँगी..मुझे भूख नहीं|" और उसने प्लेट मेरी तरफ खिसका दी....मैं जानती थी की वो मेरी वजह से नहीं खा रही...अगर मैं खाती तो वो जर्रूर खा लेती पर मेरा तो दिमाग ख़राब था... मैं उसपे जोर से चिल्ला पड़ी; "नेहा...बहुत हो गया..चुप-चाप ये सैंडविच खा ले|" मेरे गुस्सा करने से उस बेचारी की आँखें भर आईं और आयुष..वो तो दर के मारे रोने लगा| आजक दोनों मेरे गुस्से से बहुत डरते हैं और अगर मैं गुस्सा कर दूँ तो दोनों बहुत घबरा जाते हैं| वो तो ये हैं जो उन्हें संभाल लेते हैं....

खेर मेरे गुस्से के कारन दोनों ने दर के मारे खा लिया...अपर नेहा मुझसे उखड चुकी थी और प्राइवेट वार्ड पहुँचने तक उसने मुझसे कोई बात नहीं की| जब हम कमरे में कहुंचे तो वहाँ डॉक्टरों का जमावड़ा लगा हुआ था! ये देख के तो मेरा दिल दहल गया.... इतने में माँ-पिताजी भी आगये| “ये ....ये सब की हो रहा है?” पिताजी ने मुझसे सवाल पूछा...पर मेरे पास उसका जवाब नहीं था| डर के मारे मेरा बुरा हाल था....मन में गंदे-गंदे ख़याल आ रहे थे| दिमाग कहने लगा था की हमारा साथ छूट गया....पर दिल इसकी गवाही नहीं दे रहा था| तभी डॉक्टर सरिता आईं और माँ-पिताजी को एक तरफ बुला के कुछ कहने लगीं...पर इस बार उत्सुकता वश मैं भी वहाँ जा के उनकी बात सुन्ना चाहती थी पर मुझे अपने पास देख के सब चुपो हो गए| माँ-पिताजी के चेहरे पे गम के बादल साफ़ झलक रहे थे| मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं बोल पड़ी; "सरिता जी..प्लीज...प्लीज बताइये की मेरे पति को क्या हुआ है? आखिर ऐसी कौन सी बात है जो आप सब मुझसे छुपा रहे हैं?" डॉक्टर सरिता पिताजी की तरफ देखने लगीं और जब उन्होंने हाँ में सर हिला के अपनी अनुमति दी तब जा के उन्होंने सारी बात बताई जिसे सुन के मेरे जोश उड़ गए|

उन्होंने बताया; “हमसे यहाँ बहुत बड़ी गलती हो गई! जब आप मानु को यहाँ लाये थे उस समय मैं यहाँ नहीं थी डॉक्टर रूचि ने मानु को एडमिट किया और बेसिक ट्रीटमेंट शुरू कर दिया| शुरू के डायग्नोसिस में हमें यही पता चला की मानु का blood pressure shoot up हुआ था.... हम में से किसी ने उसकी Head Injury पर ध्यान नहीं दिया! अभी कुछ देर पहले sister Blood Pressure check करने गई तब उसे swelling नजर आई| अभी हम मानु को MRI करने के लिए ले जा रहे हैं|We’re hoping for the best! I’m really sorry!”

उनकी बात सुन के मुझे बहुत गुस्सा आया .... मन तो किया की इन सब पर केस कर दूँ पर.....मेरे लिए जर्रुरी ये था की ये पूरी तरह ठीक हो जाएं! इस लिए चुप रही…. सरिता जी के जाने के बाद मैंने माँ से पूछा; "माँ ...आप सब ये मुझसे क्यों छुपा रहे थे?" तो माँ ने मेरे सर पे हाथ फिराते हुए कहा; "बेटी...तू माँ बनने वाली है और मानु ने हमें कसम दी थी की हमलोग तुझसे ऐसी कोई भी बात ना करें जिससे तेरे दिल को चोट पहुंचे... इसलिए हम तुझसे ये बात छुपा रहे थे|" माँ की बात सुन के मेरी आँखें भर आईं और मैं माँ के गले लग क रो पड़ी| माँ ने मुझे बहुत पुचकारा और चुप कराया| माँ-पिताजी मुझे हिम्मत बंधाने लगे और हम लोग इन्तेजार करने लगे की MRI रिपोर्ट आये| एक घंटे बाद डॉक्टर सरिता हमारे पास आईं और हमें रिपोर्ट दी; "अंकल जी...रिपोर्ट अच्छी नहीं है| आप ये बताइये की क्या मानु ने खाना-पीना बंद कर रखा था?"

"नहीं तो बेटा...काम की वजह से वो बहुत बिजी था इसलिए वो रात को घर लेट आता था| फिर बहु उसे खाना परोसती थी ....इन में हो सकता है की खाना खाने का उसे टाइम ना मिलता हो पर रात को तो अवश्य खाता था..है ना बहु?" पिताजी ने मुझसे सवाल पूछा ...जिसका जवाब देने के लिए मेरे हलक़ से शब्द नहीं निकल रहे थे|"

"बहु...मानु रात को खाना खाता था ना?" माँ ने भी वही सवाल पूछा और सब की नजरें मेरे जवाब पर टिकी थीं| आखों से आँसूं बह निकले और रोते-रोते मैंने सच बोला; " जब से उन्होंने दुबई जाने के आत कही थी तब से मैं उनसे नाराज थी..बात नहीं कर रही थी...इसलिए गुस्से में आके उन्होंने खाना पीना छोड़ दिया था| कल रात भी जब वो आये तो मैं उन्हें खाना परोस के चली गई पर उन्होंने खाना नहीं खाया और वैसा का वैसा ही फ्रिज में रख दिया| सुबह जब मैंने रोटी का टिफ़िन देखा तो पता चला की इन्होने कुछ नहीं खाया है.... इ सब मेरी गलती है पिताजी....माँ ...मुझे माफ़ कर दीजिये....!" माँ मेरे सर पे हाथ फिरते हुए मुझे चुप कराने लगीं|

"अंकल जी.... आप तो जानते ही हैं की मानु का मेटाबोलिज्म कितना weak है! मैंने आपको शुरू में ही advice किया था की आप मानु को fasting वगैरह ना करने दें! अब हुआ ये है की मानु के खाना-पीना छोड़ने की वजह से और कुछ tensions के कारन उसका Blood Pressure बढ़ गया और उसे आज चक्कर आया, जब वो गिरा तो उसका सर फर्श से टकराया जिससे उसे ब्रेन इंजरी हुई, जिसे हम Anoxic Brain Injury कहते हैं| हमारी गलती से Brain में Swelling बढ़ गई...." बस इतना कहने के बाद वो रूक गईं...और एक लम्बी सांस लेते हुए बोली; "He’s in COMA!” ये सुन के मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं...साँस जैसे थमने को हो गई.... और माँ-पिताजी मेरी तरफ देखने लगे..क्योंकि उन्हें समझ नहीं आया था की सरिता जी ने क्या कहा| उनकी मनोदशा देख सरिता जी ने हिंदी में अपनी बात दोहराई; "मानु कोमा में है!"

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ये खबर ऐसी थी जिसे सुन के हम सब सदमें में थे!!! पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया था..और हम में से कोई नहीं जानता था की पीछे खड़ी नेहा ने सारी बात सुन ली थी और उसकी सिसकियों को सुन हम सब का ध्यान पीछे गया| वो भागी-भागी आई और माँ से लिपट के फुट-फुट के रोने लगी और रोते-रोते पूछने लगी; "दादी जी...पापा कब ठीक होंगे?" पर माँ के पास कोई जवाब नहीं था... बस सरिता जी ने उसे ढांढस बंधने के लिए कहा; "बेटा..आपके पापा जल्दी ठीक हो जायेंगे.... पर इस समय आपको Brave Girl बनना है| पता है आपके पापा ने मुझे आपके आरे में क्या बताया था? उन्होंने कहा था की मेरी बेटी सबसे बहादुर है...कैसी भी situation हो वो सब को संभाल लेती है| I'm Proud of my daughter! और आप ही इस तरह हार मान जाओगे तो कैसे चलेगा? आपको पता है न मम्मी प्रेग्नेंट हैं..तो ऐसे में उन का ध्यान कौन रखेगा? आपके दादा-दादी का ख्याल कौन रखेगा? आयुष तो अभी बहुत छोटा है तो सिर्फ एक आप हो जिससे मुझे उम्मीद है|"

ये बातें सुन के उसने खुद अपने आसूँ पोछे और फिर अपने दादा जी के पास आई और उनके आँसूं पोछे और बोली; " Don't worry दादा जी...पापा जल्दी ठीक हो जायेंगे...!" ये मेरी बेटी की हिम्मत थी जिस पे मुझे बहुत नाज़ है| माँ ने नेहा को किसी बहाने से कमरे से बाहर भेजा और सरिता जी से सवाल पूछा; "बेटी...मानु को कब तक होश आएगा?"

"आंटी जी...हम कुछ नहीं कह सकते...Brain को Heal होने में थोड़ा समय लगता है.. और हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं... सही दवाइयाँ..आप लोगों की Care ... प्यार और भगवान की कृपा से मानु कभी भी कोमा से बाहर आ सकता है| बस उम्मीद मत छोड़िये|"

अब बस एक उम्मीद ही थी जिसके सहारे ये नाव चलनी थी... खेर हम सब बाहर आ गए| पिताजी ने मेरी तरफ देखा और मेरा मन हल्का करने के लिए कहा; "बेटी..जो हो गया सो हो गया... मैं ये नहीं कहूँगा की सारी गलती तुम्हारी है| कुछ गलती उस पागल की भी है| बचपन से वो ऐसा ही है...जरा सी बात उसके दिल को लग जाती है और फिर वो खाना नहीं खाता| वो तो उसस्की माँ थी जो उसे समझा-बुझा के खाना खिला दिया करती थी| तब वो हर बात अपनी माँ से कहा करता था ...पर अब वो बड़ा हो चूका है हमसे बातें छुपाने लगा है... एक सिर्फ तुम हो जिससे वो बातें साँझा करता है| अब अगर तुम भी उससे बात नहीं करोगी तो वो इसी तरह अंदर ही अंदर कुढ़ता रहेगा| मैं समझ सकता हूँ की तुम्हें दुबई जाने की बात सुन के गुस्सा आया पर ये भी तो सोचो की वो ये सब सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ख़ुशी के लिए कर रहा था| वो तुम्हारी ख़ुशी में अपनी ख़ुशी समझता है और कुछ नहीं... उस ने हमसे एक दिन कहा था की पिताजी संगीता ने अपने जीवन में बहुत दुःख देखे हैं और अब मैं उसे और दुखी नहीं देखना चाहता फिर चाहे उसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े!

बेटा...अब भी समय नहीं गया है... मुझे भगवान पे पूरा विश्वास है वो हमारे साथ कोई अन्याय नहीं करेगा| बस तुम्हें थोड़ा सब्र रखना होगा...धीरज रखना होगा..तुम्हारा प्यार उसे वापस ला सकता है| एक बार वो पूरी तरह ठीक हो जाए तो बस उसे खुश रखना...फिर हम लोग चैन से अपनी आखरी साँस ले सकेंगे|"

मैंने उनके पाँव छू के आशीर्वाद लिया और माँ ने और पिताजी ने अपने हाथ मेरे सर पे रख के "सदा सुहागन" रहने का आशीर्वाद भी दिया| पिताजी बोले; "बेटी तुम, बच्चे और मानु की माँ...आप सब घर जाओ, कुछ खाना खाओ, मैं यहीं रुकता हूँ| कल सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ के यहाँ आ जाना|"

"पर मानु के पिताजी आप भी तो कुछ खा लो...|"

"तुम मेरी चिंता मत करो मानु की माँ ...मैं यहाँ से कुछ खा लूँगा| पहले बच्चों को खिलाओ उन बेचारों ने भी कुछ नहीं खाया है|"

"पिताजी...मैंने दोनों को डाँट-डपट के खिला दिया था...उसी दौरान तो ये सब कुछ हुआ|"

"बेटी...अपने गुस्से पे थोड़ा काबू रख अभी तो मानु भी ठीक नहीं है...ये बच्चे उसी पे गए हैं और तुझ से नाराज होके तुझी से बात-चीत करना बंद कर देंगे! समझी?"

"जी पिताजी...वो नेहा जिद्द करने लगी तो...मैंने थोड़ा डाँट दिया| आगे से ध्यान रखूँगी|" नेहा और आयुष पास ही खड़े थे तो मैंने कान पकड़ के उन्हें सॉरी बोला....आयुष ने तो मुस्कुरा के मुझे माफ़ी दे दी पर नेहा के मुख पे अब भी कोई ख़ुशी नहीं आई थी| वो बोली; "दादा जी... मैं भी आपके साथ रुकूँगी|" पर पिताजी ने उसे समझते हुए कहा; "बेटे..आपको कल स्कूल जाना है और मैं यहाँ हूँ ना? आप सब अब घर जाओ|" कम से कम उस समय तो उसने पिताजी की बात मान ली थी|

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खेर हम सब बाहर आ गए| पिताजी ने मेरी तरफ देखा और मेरा मन हल्का करने के लिए कहा; "बेटी..जो हो गया सो हो गया... मैं ये नहीं कहूँगा की सारी गलती तुम्हारी है| कुछ गलती उस पागल की भी है| बचपन से वो ऐसा ही है...जरा सी बात उसके दिल को लग जाती है और फिर वो खाना नहीं खाता| वो तो उसस्की माँ थी जो उसे समझा-बुझा के खाना खिला दिया करती थी| तब वो हर बात अपनी माँ से कहा करता था ...पर अब वो बड़ा हो चूका है हमसे बातें छुपाने लगा है... एक सिर्फ तुम हो जिससे वो बातें साँझा करता है| अब अगर तुम भी उससे बात नहीं करोगी तो वो इसी तरह अंदर ही अंदर कुढ़ता रहेगा| मैं समझ सकता हूँ की तुम्हें दुबई जाने की बात सुन के गुस्सा आया पर ये भी तो सोचो की वो ये सब सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी ख़ुशी के लिए कर रहा था| वो तुम्हारी ख़ुशी में अपनी ख़ुशी समझता है और कुछ नहीं... उस ने हमसे एक दिन कहा था की पिताजी संगीता ने अपने जीवन में बहुत दुःख देखे हैं और अब मैं उसे और दुखी नहीं देखना चाहता फिर चाहे उसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े!

बेटा...अब भी समय नहीं गया है... मुझे भगवान पे पूरा विश्वास है वो हमारे साथ कोई अन्याय नहीं करेगा| बस तुम्हें थोड़ा सब्र रखना होगा...धीरज रखना होगा..तुम्हारा प्यार उसे वापस ला सकता है| एक बार वो पूरी तरह ठीक हो जाए तो बस उसे खुश रखना...फिर हम लोग चैन से अपनी आखरी साँस ले सकेंगे|"

मैंने उनके पाँव छू के आशीर्वाद लिया और माँ ने और पिताजी ने अपने हाथ मेरे सर पे रख के "सदा सुहागन" रहने का आशीर्वाद भी दिया| पिताजी बोले; "बेटी तुम, बच्चे और मानु की माँ...आप सब घर जाओ, कुछ खाना खाओ, मैं यहीं रुकता हूँ| कल सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ के यहाँ आ जाना|"

"पर मानु के पिताजी आप भी तो कुछ खा लो...|"

"तुम मेरी चिंता मत करो मानु की माँ ...मैं यहाँ से कुछ खा लूँगा| पहले बच्चों को खिलाओ उन बेचारों ने भी कुछ नहीं खाया है|"

"पिताजी...मैंने दोनों को डाँट-डपट के खिला दिया था...उसी दौरान तो ये सब कुछ हुआ|"

"बेटी...अपने गुस्से पे थोड़ा काबू रख अभी तो मानु भी ठीक नहीं है...ये बच्चे उसी पे गए हैं और तुझ से नाराज होके तुझी से बात-चीत करना बंद कर देंगे! समझी?"

"जी पिताजी...वो नेहा जिद्द करने लगी तो...मैंने थोड़ा डाँट दिया| आगे से ध्यान रखूँगी|" नेहा और आयुष पास ही खड़े थे तो मैंने कान पकड़ के उन्हें सॉरी बोला....आयुष ने तो मुस्कुरा के मुझे माफ़ी दे दी पर नेहा के मुख पे अब भी कोई ख़ुशी नहीं आई थी| वो बोली; "दादा जी... मैं भी आपके साथ रुकूँगी|" पर पिताजी ने उसे समझते हुए कहा; "बेटे..आपको कल स्कूल जाना है और मैं यहाँ हूँ ना? आप सब अब घर जाओ|" कम से कम उस समय तो उसने पिताजी की बात मान ली थी|

अब आगे ....

चलते समय माँ ने पिताजी को एक कप चाय और एक सैंडविच मंगवा दिया था और रास्ते में माँ ने अपने, मेरे और बच्चों के लिए भी सैंडविच ले लिया| हम घर तो आ गए...माँ ने और बच्चों ने सैंडविच खाया और ना चाहते हुए भी मैंने किसी तरह उस सैंडविच को अपने गले से भी उतार लिया... पर दिल बहुत बेचैन था| घडी में बारह बजने को आये थे तो माँ ने सब को सो जाने को कहा| हम सब हमारे वाले बेडरूम में सोने को चल दिये| नेहा का गुस्सा अब भी साफ़ झलक रहा था... वो मुझसे सारे रात नहीं बोली थी| उसने माँ की तरफ करवट की और सो गई| इधर आयुष ने मेरी तरफ करवट की और कुछ देर बाद वो भी सो गया| पर मेरी आँखों से नींद अब भी कोसों दूर थी| रह-रह के उनकी वो बात "मैंने पढ़ा... आप.... क्यों इतना दर्द समेटे हुए हो? क्या आपके दिल में मेरे लिए जरा सी भी जगह नहीं?" मुझे याद आ रही थी और मैं मन ही मन खुद को कोस रही थी| मेरी अपनी बेटी मुझसे नफरत करने लगी थी...यी सब बातें मुझे बेचैन कर रही थी और सारी रात घडी की टिक-टिक सुनते हुए कट गई| सुबह हुई घडी में पाँच बजे और मैं जल्दी से नहा धो के तैयार हो गई और किचन में घुस गई| सात बजते-बजते मैंने खाना बना लिया था और फिर मैं बच्चों को उठाने गई| देखा तो नेहा तैयार हो छुकी थी पर आयुष और माँ अब भी सो रहे थे| मैं आयुष को उठाने लगी तो नेहा ने आगे बढ़ के उसे गॉड में उठाने लगी और उसे ले के तैयार करने लगी| माँ की बी अकनख खुल गईं और ओ भी नहाने चली गईं| आधे घंटे में सब तैयार हो के आ गए| मैंने माँ और बच्चों को नाश्ता कराया और फिर उन्हें स्कूल छोड़ने जाए लगी तो माँ ने रोक दिया; "बेटी तू नाश्ता कर ले तब तक मैं बच्चों को स्टैंड छोड़ आती हूँ|" भूख तो लगी नहीं थी जो मैं कुछ खाती इसलिए मैं कुर्सी पर बैठ के माँ के आने का इन्तेजार करने लगी|

बेसब्री से मेरा बुरा हाल था.... मन उन्हें देखना चाहता था| थोड़ी देर बाद माँ भी आ गईं और मेरी बसब्री देख के बोली; "बेटी...तू चिंता मत कर...मुझे पूरा यक़ीन है की सब कुछ ठीक हो चूका होगा...मानु को होश आ चूका होगा और वो तेरा इन्तेजार कर रहा होगा| चल जल्दी....|"

मन में एक उमंग से भर उठा और मैं माँ की बातों में विश्वास कर बैठी| एक आस जो मुझे जिन्दा रखने के लिए काफी थी...जिसके सहारे में अपनी जिंदगी काट सकती थी|अपनी बेकरारी की पोटली लिए मैं माँ के साथ हॉस्पिटल आई| इस आस में की जैसे ही मैं कमरे का दरवाजा खोलूँगी ये (मेरे पति) मेरे सामने बैठे होंगे और मुझे अपने गले लगा लेंगे| पर किस्मत को मुझ पे जरा भी रहम नहीं आया ...आएगा भी क्यों..मैंने अपने देवता जैसे पति को इतने दुःख जो दिए थे| मुझे तो माफ़ी मांगने का भी मौका नहीं दिया!

जब कमरे का दरवाजा खुला, तो वैसा कुछ भी नहीं हुआ जिसकी उम्मीद थी| ये (मेरे पति) अब भी उसी हालत में थे जैसा कल मैं इन्हें छोड़ गई थी| मैंने जा के पिताजी के पाँव छुए..और तब उन्होंने बताया की कुछ देर पहले उनकी बात मेरे पिताजी से हुई थी और वे कल सुबह बस से दिल्ली आ रहे हैं| अभी पिताजी ये सब बता ही रहे थे की अनिल का फ़ोन पिताजी के मोबाइल पे आया| अनिल शाम की गाडी से दिल्ली आ रहा था.... वो कल सुबह पहुँचने वाला था| सच कहूँ तो मुझे याद नहीं रहा की मुझे अपने मायके ये खबर दे देनी चाहिए| खेर अब मुझे पिताजी से अपने दिल की बात करनी थी ...इसलिए मैंने बहुत हिम्मत जुटा के उनसे कहा; "पिताजी....मैंने आज तक आपसे कुछ नहीं माँगा...आजतक कुछ माँगने की जर्रूरत ही नहीं पड़ी| पर आज आपसे कुछ माँगना चाहती हूँ और आशा करती हूँ आप मना नहीं करेंगे|"

"बोल बेटी.... मैं कतई मना नहीं करूँगा|" उन्होंने मुझ पे पूरा विश्वास जताते हुए कहा|

"पिताजी... आज से इनकी देख-रेख करने की जिम्मेदारी आप मुझे दे दीजिये| मैं सब कुछ संभाल लूँगी...मुझसे इनसे दूर रहा नहीं जाता...प्लीज पिताजी!" मैंने पिताजी और माँ से हाथ जोड़ के विनती की|

पिताजी ने चिंता जताते हुए कहा; "पर बेटा... तू माँ बनने वाली है...और ऐसे में......बेटी कुछ उञ्च०नॆच हो गई तो हम आमनु को क्या जवाब देंगे?"

"मुझे कुछ नहीं होगा पिताजी...मैं अपना ध्यान रख लूँगी....पर प्लीज पताजी मुझे इनसे अलग मत कीजिये ...मैं हाथ जोड़के आपसे विनती करती हूँ!" ये कहते-कहते मेरी आँखें भर आईं थी| माँ ने मुझे संभाला और पिताजी से बोलीं; "सुनिए...मान जाइए बहु की बात और फिर हम तो हैं ही इक ध्यान रखने के लिए| मैं भी इसे इस तरह तड़पते हुए नहीं देख सकती...अब एक यही तो है ..." इतना कहते हुए माँ रूक गईं..... माँ तो लघभग हिम्मत हार ही चुकी थी... उनकी उम्मीद टूट चुकी थी| पर मैंने माँ को ढांढस बंधाया, "माँ हम ये लड़ाई हारे नहीं हैं...और ना ही हारेंगे| सब कुह ठीक हो जायेगा...थोड़ा सामने लगेगा बस!" ये सुन के माँ की आँखें भर आईं थी|

"पिताजी आप माँ को लेके घर जाइए ...थोड़ा आराम कीजिये...तब तक मैं हूँ यहाँ|" पिताजी जाना नहीं चाहते थे पर वो जानते थे की ज्यादा देर अगर माँ यहाँ रुकी तो वो रो पड़ेंगी| इसलिए पिताजी उन्हें ले कर चले गए और दोपहर को आने का बोल गए| अब कमरे में बस ये (मेरे पति) और मैं ही बचे थे... इतने दिन से मैंने इनसे कोई बात नहीं की थी...और अब जब ये कुछ बोल नहीं सकते थे तो मन बात करने को आतुर हो रहा था| मैं दाहिने तरफ स्टूल ले कर बैठ गई; "मैंने आपको बहुत दुःख दिए है ना? आप मुझे हँसाने की हर नाकाम कोशिश करते रहे और मैं अपने गुस्से और दर्द को छुपाते हुए आपका तिरस्कार करती रही| आपने मुझसे कुछ भी तो नहीं माँगा था ...बस इतना की मैं हँसू..बोलूँ...बात करूँ...आपको प्यार करूँ...घर को सम्भालूँ.... माँ-पिताजी का ख्याल रखूँ...और मुझसे इतना भी नहीं हुआ! आपकी कोई ख़ुशी मैं पूरी नहीं कर सकी... प्लीज ...प्लीज मुझे माफ़ कर दो ...and I promise की मं आज के बाद आपकी हर बात मानूँगी..... कभी उदास नहीं हूँगी...सब को खुश रखूँगी....प्लीज ...प्लीज जानू वापस आ जाओ....प्लीज ....मैं फिर से वो पुरानी वाली संगीता बन जाऊँगी...प्लीज ....प्लीज ..... !!!" पर मेरी इतनी मिन्नतों का रत्ती भर भी असर इन पर नहीं हुआ.... आज मुझे एहसास हो रहा था की कैसा लगता है जब कोई आपसे बात करना चाहता हो और आप उसे दुत्कार दो! हालाँकि इन्होने कभी मुझे दुत्कारा नहीं ...अभी भी इनक शरीर respond नहीं कर रहा था तो मुझे वही आभास हुआ जो इन्हें मैंने कराया था और मुझे इनके दुःख से अवगत होने का मौका मिला|

दोपहर दो बजे पिताजी, माँ और बच्चे आये...माँ मेरे लिए खाना पैक कर के लाईन थी पर मेरी खाने की जा भी इच्छा नहीं थी| फिर भी माँ के जोर देने पर मैंने खाना खाया.... खाना खाने के बाद पिताजी ने मुझे थोड़ी चिंता जनक बात बताई; "बेटी आज नेहा के स्कूल से फ़ोन आया था| उसकी क्लास टीचर ने बताया की नेहा आज सारा दिन रो रही थी| जब तेअच्छेर ने उससे कारन पूछा तो उसने टीचर को सब बताया| नेहा टीचर से जिद्द करने लगी की उसे एक महीने की छुट्टी चाहिए| जब तक उसके पापा की तबियत ठीक नहीं होती...वो स्कूल नहीं आएगी| टीचर ने बहुत समझाया पर इसने जिद्द पकड़ ली की मैं कल से स्कूल नहीं आऊँगी| हार कर टीचर ने मुझे फ़ोन किया| हमने तो इसे खूब समझाया ...अब तू ही समझा इसे कुछ!"

"मैंने जब्ब नेहा को देखा तो वो नजरें झुकाये सा सुन रही थी| वो वैसे भी मुझसे बात नहीं कर रही थी...तो ऐसे में जल्दबाजी दिखाना जर्रुरी नहीं था| मैंने बस इतना कहा; "पिताजी ठीक ही तो है... कल से मैं और नेहा दोनों मिल के यहाँ इनका (मेरे पति और नेहा के पापा) का ख्याल रखेंगे|" पिताजी ये सुन के चौंक गए पर अगले ही पल जब उन्हें मेरी बात समझ आई तो वो कुछ नहीं बोले| मुझे नेहा को अपने अनुसार समझाना था..पर ये समय उसके लिए सही नहीं था|

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I LOVE YOU MY DEAR HUBBY!❤❤❤
 
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