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एक अनोखा बंधन**:-कि नई शुरुआत (2) complete

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Sukriya Dost .....//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f339.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49e.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f496.svg
 
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दोपहर दो बजे पिताजी, माँ और बच्चे आये...माँ मेरे लिए खाना पैक कर के लाईन थी पर मेरी खाने की जा भी इच्छा नहीं थी| फिर भी माँ के जोर देने पर मैंने खाना खाया.... खाना खाने के बाद पिताजी ने मुझे थोड़ी चिंता जनक बात बताई; "बेटी आज नेहा के स्कूल से फ़ोन आया था| उसकी क्लास टीचर ने बताया की नेहा आज सारा दिन रो रही थी| जब तेअच्छेर ने उससे कारन पूछा तो उसने टीचर को सब बताया| नेहा टीचर से जिद्द करने लगी की उसे एक महीने की छुट्टी चाहिए| जब तक उसके पापा की तबियत ठीक नहीं होती...वो स्कूल नहीं आएगी| टीचर ने बहुत समझाया पर इसने जिद्द पकड़ ली की मैं कल से स्कूल नहीं आऊँगी| हार कर टीचर ने मुझे फ़ोन किया| हमने तो इसे खूब समझाया ...अब तू ही समझा इसे कुछ!"

"मैंने जब नेहा को देखा तो वो नजरें झुकाये सा सुन रही थी| वो वैसे भी मुझसे बात नहीं कर रही थी...तो ऐसे में जल्दबाजी दिखाना जर्रुरी नहीं था| मैंने बस इतना कहा; "पिताजी ठीक ही तो है... कल से मैं और नेहा दोनों मिल के यहाँ इनका (मेरे पति और नेहा के पापा) का ख्याल रखेंगे|" पिताजी ये सुन के चौंक गए पर अगले ही पल जब उन्हें मेरी बात समझ आई तो वो कुछ नहीं बोले| मुझे नेहा को अपने अनुसार समझाना था..पर ये समय उसके लिए सही नहीं था|

अब आगे .....

रात के आठ बजे तो पिताजी ने क बार फिर मुझे समझाना चाहा की मैं माँ के साथ घर चली जाऊं पर मैंने इनसे फिर से रेक़ूस्त की तो उन्होंने मेरी बात मान ली| जब पिताजी ने नेहा को साथ जाने को कहा तो उसने जाने से साफ़ मना कर दिया| मैंने माँ को इशारे से कहा की आज की रात इसे यहीं रहने दो तो माँ ने कहा; "कोई बात नहीं जी ..आज इसे यहीं अपनी माँ के पास रहने दो| पर नेहा बेटी तेरे बिना मुझे नींद नहीं आती ...मैं कैसे सोऊँगी?" माँ ने एक बार कोशिश की कि शायद नेहा मान जाए और उनके साथ घर चले पर नेहा ने तपाक से जवाब दिया; "दादी जी..आयुष है ना| जब पापा ठीक हो जायेंगे तब मैं रोज आपके पास सोऊँगी… Promise" माँ ने और कुछ नहीं कहा और उसके सर पे हाथ रख के आशीर्वाद दिया और आयुष को साथ ले के चली गईं| माँ के जाने के बाद मैंने कमरे का दरवाजा लॉक किया और नेहा के सोने के लिए सोफे को ठीक करने लगी| पर सोफे इतना छोटा था की उसपे सिर्फ एक इंसान ही सो सकता था, तो मैंने सोचा की मैं जमीन पर लेट जाऊँगी पर नेहा बोली; "मैं नीचे सोऊँगी आप ऊपर सो जाओ|" चलो इसी बहाने से वो मुझसे कुछ बोली तो सही| मैं करीब 2 घंटों से नहीं सोई थी और सारा दिन एक ही जगह बैठे रहने से थकावट मुझ पे असर दिखाने लगी थी| लेटने के कुछ देर बाद मेरी आँख लग गई.... रात के बारह बजे होंगे ..कि मुझे लगा कि कोई कुछ बोल रहा है मैं ख़ुशी से उठ बैठी कि इन्हें (मेरे पति को) होश आ गया! पर जब मैंने थोड़ा ध्यान से आवाज सुनी तो पता चला की ये तो नेहा है जो अपने पापा से बात कर रही है| मैं चुप-चाप लेट गई और उसकी बातें सुनने लगी; "पापा आप मुझसे नाराज हो??? आप मम्मी से बात नहीं कर रहे ..ठीक है... पर मैंने क्या किया? आप तो मुझसे सब से ज्यादा प्यार करते हो ना? फिर मुझसे बात क्यों नहीं करते? देखो अभी मम्मी सो रही हैं तो हम आराम से बात कर सकते हैं... I Promise मैं किसी को कुछ नहीं कहूँगी... it'll be our secret!!! ओके आप मेरे कान में बोलो..." नेहा के बचपने को देख मेरी आँखें भर आई..मैं जानती थी की वो अपने पापा को मुझसे ज्यादा प्यार करती है.... पर ये सब सुन मुझे लगा की कहीं उसके दिल को कोई सदमा ना लगे इसलिए मैं उठ बैठी और कमरे की लाइट ओन की| लाइट ओन होते ही नेहा की नजर मुझ पे पड़ी और वो हैरानी से मेरी तरफ देखने लगी|

"नही...बेटी इधर आ.." नेहा सर झुकाये मेरे पास आ कर कड़ी हो गई|

"बेटी.... आप कल से मुझसे बात नहीं कर रहे हो! I'm really sorry कल मैंने आपको डाँटा... seriously sorry.... अब क्या जिंदगी भर आप मुझसे नाराज रहोगे?"

"मैं उस वजह से आप से नाराज नहीं हूँ|" नेहा ने सर झुकाये हुए कहा|

"तो?"

"आपकी वजह से पापा की तबियत ख़राब हुई...सब आपकी वजह से हुआ है... आपने कभी पापा को प्यार किया ही नहीं| वो आपसे इतना प्यार करते हैं... उस दिन वो उससे (चन्दर) से लड़ पड़े..सिर्फ आपके लिए और आपको उनकी कोई कदर ही नहीं| सात साल पहले भी आपे उन्हें खुद से ददोर कर दिया था!"

ये सुन के मेरे पाँव तले जमीन खिसक गई थी| उस समय नेहा बहुत छोटी थी...तो उसे ये बात कैसे पता? मेरी परेशानी देख वो खुद बोली; "उस दिन जब आप और पापा बात कर रहे थे तब मैंने आप दोनों की सारी बात सुन ली थी|" "बेटी....." मैंने उसे समझाना चाहा पर उसने मेरी बात काट दी|

"आपने....आपने पापा को एक दम से isolate कर दिया! उन्होंने आपसे क्या माँगा था जो आप नहीं दे सकते थे? बस आपको खुश रहने को ही तो कह रहे थे.... आपकी वजह से दादा जी दादी जी सब परेशान थे और just आपका डर खत्म करने के लिए अगर पापा दुबई में सेटल होने की बात कह रहे थे तो कौन सी गलत बात कह दी उन्होंने? कम से कम आपका डर तो खत्म हो जाता पर नहीं ...आपको तो पापा को तकलीफ देने में मजा आता है ना?

आपको तो मेरी भी परवाह नही थी! क्या सच में आपको याद नही था की मेरी स्कूल जाने की उम्र हो गई है? जितने भी साल मैं गाँव में पढ़ पाई वो सिर्फ पापा की वजह से! मुझे ठीक से तो याद नहीं पर मेरे बचपन का सबसे सुखद समय वही था जब पापा गाँव आये हुए थे और अगर मैं गलत नही तोि आपका भी सबसे सुखद समय वही था| पूरे परिवार में सिवाय पापा के और कोई नही था जिसे पता हो की मुझे 'चिप्स' बहु पसंद हैं...यहाँ तक की आप को भी नहीं! गाँव में मुझे कोई प्यार नही करता था...सिर्फ पापा थे जो मुझे प्यार करते थे| ये सब जानते हुए भी आपने पापा को खुद से और मुझसे दूर कर दिया? अपनी नहीं तो कम से कम मेरी ख़ुशी का ख्याल किया होता? ओह्ह...याद आया...आपने उस दिन पापा को ये सफाई दी थी की आपकी वजह से उनका career ख़राब हो जाता! वाओ !! और अभी जो उनका ये हाल है उसका जिम्मेदार कौन है?

.................................. एक बात कहूँ You Don't DESERVE HIM! इतना Loving Husband आपके लिए नहीं हो सकता! जिस दिन पापा को होश आया उनकी नजर आप पड़ेगी और कहीं आपको देख उनका गुस्सा फूट पड़ा तो उनकी तबियत और ख़राब हो जाएगी, यही कारन है की मैंने अपनी क्लास टीचर से स्कूल न आने की बात की ताकि जब पापा को होश आये तो सबसे पहले मैं उन्हें दिखाई दूँ..आप नहीं! पापा आपसे नाराज हैं and I know वो आपसे कभी बात नही करेंगे| वो सिर्फ और सिर्फ मुझसे बात करेंगे ....सिर्फ और सिर्फ मुझसे! I Hate you mummy!"" इतना कह के वो लेट गई और मैंने उठ के कमरे की लाइट बंद की और सोफे पे बैठी सिसकने लगी| उसने एक भी बात गलत नही बोली थी... और सच में मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया की मेरी बेटी इतनी बड़ी हो गई की अपने मम्मी-पापा की बातें छुप के सुनने लगी है और समझने भी लगी है| हालाँकि इन्होने (मेरे पति ने) कभी बच्चों से कोई बात नही छुपाई ...पर कुछ पर्सनल बातें हम अकेले में किया करते थे जो सब नेहा सुन चुकी थी|

आज मैं अपनी ही बेटी...अपने ही खून की नजरों में दोषी बन चुकी थी...दोषी! अब मुझे इस पाप का प्रायश्चित करना था....किसी भी हाल में! मैं अपने बच्चों के सर से उनके पापा का साया कभी नही उठने देना चाहती थी...और ऐसा कभी नही होगा, कम से कम मेरे जीते जी तो नही! वो सारी रात मैं ने जागते हुए काटी.... सुबह सात बजे माँ और पिताजी आये, आयुष को सीधा स्कूल छोड़ के.... कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था… नेहा अब भी सो रही थी| पिताजी ने मझसे पूछा की क्या मैंने नेहा को समझा दिया तो मैंने कहा; "यहीं पिताजी...कल बात करने का समय नही मिला| थक गई थी इसलिए सो गई...आज बात करुँगी और कल से वो स्कूल भी जाएगी|" मेरी बात से पिताजी को आश्वासन मिला और वो निश्चिन्त हो गए| हम चाय पी रहे थे की नेहा जाग गई..और आँखें मलती हुई अपने पापा के पास गई और उनके गाल पे Kiss किया और फिर बाथरूम चली गई| ये नेहा का रोज का नियम था .... उसे देख-देख के आयुष ने भी ये आदत सीख ली पर वो मुझे और इन्हें (मेरे पति) को kiss करता था| जैसे ही वो बाथरूम से निकली तभी अनिल (मेरा भाई) आ गया| उसने माँ-पिताजी के पाँव छुए और अपने जीजू की तबियत के बारे में पूछने लगा|

"पिताजी...ये सब कैसे हुआ? जीजू तो एकदम भले-चंगे थे?"

पिताजी के जवाब देने से पहले ही नेहा बोल पड़ी; "मम्मी की वजह से...." सब की नजरें नेहा पर थीं और उसकी ऊँगली का इशारा मेरी तरफ था|

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I LOVE YOU MY DEAR HUBBY!❤❤❤
 
आज मैं अपनी ही बेटी...अपने ही खून की नजरों में दोषी बन चुकी थी...दोषी! अब मुझे इस पाप का प्रायश्चित करना था....किसी भी हाल में! मैं अपने बच्चों के सर से उनके पापा का साया कभी नही उठने देना चाहती थी...और ऐसा कभी नही होगा, कम से कम मेरे जीते जी तो नही! वो सारी रात मैं ने जागते हुए काटी.... सुबह सात बजे माँ और पिताजी आये, आयुष को सीधा स्कूल छोड़ के.... कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था… नेहा अब भी सो रही थी| पिताजी ने मझसे पूछा की क्या मैंने नेहा को समझा दिया तो मैंने कहा; "यहीं पिताजी...कल बात करने का समय नही मिला| थक गई थी इसलिए सो गई...आज बात करुँगी और कल से वो स्कूल भी जाएगी|" मेरी बात से पिताजी को आश्वासन मिला और वो निश्चिन्त हो गए| हम चाय पी रहे थे की नेहा जाग गई..और आँखें मलती हुई अपने पापा के पास गई और उनके गाल पे Kiss किया और फिर बाथरूम चली गई| ये नेहा का रोज का नियम था .... उसे देख-देख के आयुष ने भी ये आदत सीख ली पर वो मुझे और इन्हें (मेरे पति) को kiss करता था| जैसे ही वो बाथरूम से निकली तभी अनिल (मेरा भाई) आ गया| उसने माँ-पिताजी के पाँव छुए और अपने जीजू की तबियत के बारे में पूछने लगा|

"पिताजी...ये सब कैसे हुआ? जीजू तो एकदम भले-चंगे थे?"

पिताजी के जवाब देने से पहले ही नेहा बोल पड़ी; "मम्मी की वजह से...." सब की नजरें नेहा पर थीं और उसकी ऊँगली का इशारा मेरी तरफ था|

अब आगे.....

नेहा के कुछ बोलने से पहले पिताजी ने उसे झिड़क दिया; "नेहा...आप बहुत बद्तमीज हो गए हो! ऐसे बात करते हैं अपने से बड़ों से?" नेहा का सर झुक गया और उसे अपना सर झुकाये हुए ही माफ़ी मांगी; "sorry दादा जी!" मैं उसके पास गई और उसे अपने सीने से लगा लिया और पुचकारने लगी ... पर वो कुछ नहीं बोली और ना ही रोइ...जैसे उसके आँखों का पानी सूख गया हो! इधर अनिल के मन में उठ रहे सवाल फिर से बाहर उमड़ आये; "पर पिताजी...जीजू को आखिर हुआ क्या है? गाँव से पिताजी का फोन आया तो उन्होंने बस इतना कहा की तेरे जीजू हॉस्पिटल में admit हैं...तू जल्दी से दिल्ली पहुँच और मैं सीधा यहाँ पहुँच गया|"

मैं एक बार फिर से अपना इक़बाले जुर्म करने को तैयार थी..."वो मैं.........." पर मेरे कुछ कहने से माँ ने मेरी बात काट दी; "बेटा काम की वजह से टेंशन चल रही थी... और तुझे तो पता ही है की चन्दर की वजह से क्या हुआ था...इसलिए ये सब हुआ|” माँ ने मेरी तरफ देखा और ना में गर्दन हिला के मुझे कुछ भी कहने से रोक दिया और मैं ने उन्हें सहमति देते हुए अपनी गर्दन झुका ली| पिताजी न उसे घर हल के आराम करने को कहा पर अनिल ने मन कर दिया ये कह के; "पिताजी मैं यहाँ आराम करने नही आया| मैं यहाँ जीजू के पास रुकता हूँ, आप सब घर जाइए और आराम कर लीजिये| अगर कोई जर्रूरत पड़ी तो मैं आपको फ़ोन कर लूँगा|"

"नहीं...मैं यहाँ हूँ...तू जा और कपडे बदल के फ्रेश हो जा और फिर आ...." मैंने उसे हुक्म देते हुए कहा| चूँकि मैं उससे बड़ी थी तो वो बिना किसी बहस के मेरी बात मान लेता था| माँ ने जाते-जाते कहा की वो अनिल के हाथों मेरा और नेहा का नाश्ता भेज देंगी| जब सब चले गए तब मैंने सोचा की मुझे नेहा को प्यार से समझाना चाहिए ताकि वो कल से स्कूल join कर ले| नेहा स्टूल ले के अपने पापा के बाईं तरफ बैठी हुई थी और टकटकी बंधे उन्हें देख रही थी| शायद इस उम्मीद में की वो अब पलकें झपकाएं ...अब पलकें झपकाएं! मैंने उसे पीछे से आवाज दी; "नेहा...बेटा मेरे पास आओ|" वो बेमन से उठ के मेरे पास आई और चुप-चाप खड़ी हो गई| मैंने उसे अपने पास बैठने का इशारा किया और वो सर झुकाये सोफे पे बैठ गई|

"बेटा मुझे आपसे कुछ बात करनी है....|" मेरी बात शुरू होने से पहले ही वो बोल पड़ी; "Sorry .....!" उसका सॉरी सुन के मैं सोच में पड़ गई की भला ये मुझे क्यों सॉरी बोल रही है? पर मुझे उससे कारन पूछने की जर्रूरत नही पड़ी वो खुद ही बोलने लगी; "मैंने आपको सॉरी इसलिए नही बोला की कल मैं ने जो कहा वो गलत था या मैं उसके लिए शर्मिंदा हूँ...बल्कि आपको सॉरी इसलिए बोला की मेरा कल आपसे बात करने का लहज़ा ठीक नही था| आप मेरी माँ हो और मुझे इस तरह अकड़ के आपसे बात नही करनी चाहिए थी| इसलिए I'm really very sorry!"

नेहा की बात सुन के मुझे वो दिन याद आगया जब इन्होने (मेरे पति) ने मेरे लिए पहली बार अपने बड़के दादा से लड़ाई की थी| "बेटा आपको एक बात बताऊँ.... जिस दिन मुझे पता चला की मैं माँ बनने वाली हूँ उस दिन घर में सब खुश थे| क्योंकि उन्हें एक लड़के की आस थी और मुझे और आपके पापा को लड़की की वो भी बिलकुल आपके जैसी तब आपके पापा ने अपने बड़के दादा से इस बात पे लड़ाई की कि लड़का हो या लड़की क्या फर्क पड़ता है| उन्होंने ठीक आपकी तरह ही उनसे बात कि...और फिर बाद में नसे माफ़ी माँगी... इसलिए नही की उन्होंने सच बात बोली, बल्कि इसलिए की उनका लहज़ा गलत था|" ये सुन के नेहा के चेहरे पे मुस्कान आ गई|

"बेटा.... मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ?" नेहा ने हाँ में सर हिला के अपनी अनुमति दी|

"बेटा... I know आप अपने पापा से बहुत प्यार करते हो और उनके देख-रेख करने के लिए आप अपनी studies तक कुर्बान कर रहे हो पर जरा सोचो, जब आपके पापा पूरी तरह ठीक हो जायेंगे और उन्हें ये पता चलेगा की आपने उनके लिए अपनी स्टडीज sacrifice की है तो सोचो उन्हें कैसा लगेगा? उन्हें कितना hurt होगा? वो खुद को ही आपकी studies के नुकसान के लिए blame करेंगे और फिर से उनकी तबियत ख़राब हो सकती है! वहां घर पर आपके दादा-दादी अकेले हैं..उनकी देखभाल करने के लिए आपका वहाँ होना जर्रुरी है? और फिर आयुष...उसका स्कूल का होमोररक कौन करायेगा? और फिर मैं यहाँ हूँ ना आपके पापा की देखभाल करने के लिए|" ये सब सुन के भी नेहा के दिल को तसल्ली नही मिली थी इसलिए मैंने उसके दिल को तसल्ली देने के लिए उसे आश्वासन इया; "बेटा... मैं जानती हूँ की आपको डर है की पपा मुझे देखेंगे तो उनकी तबियत ख़राब हो जाएगी.... तो I promise मैं उनके होश में आते ही उनके सामने से चली जाऊँगी... और जबतक आप नही कहोगे मैं सामने नही आऊँगी|" इतना सुनने के बाद उसस्के इल को चैन मिला और उसने हाँ में सर हिलाया और उठ के बाथरूम चली गई| मुझे लगा की वो रोने के लिए बातरूम गई होगी पर भगवान का शुक्र है की ऐसा नही हुआ| मेरी बेटी अब बड़ी हो चुकी थी...इतनी बड़ी की अगर मुझे कुह हो जाए तो वो घर को संभाल सकती थी| नजाने क्यों ये ख़याल मेरे मन में आया ...खेर कुछ देर बाद अनिल नाश्ता ले कर आया और मैंने और नेहा ने नाश्ता किया| नाश्ता करने के बाद मैने अनिल से एक मदद माँगी; "अनिल...बीटा तुझसे एक मदद चाहिए! कल पिताजी ने बताया था की एक-दो जगह पेमेंट फांसी हुई है और दो दिन पहले इन्होने बताया था की कुछ contracts की deadline नजदीक है| मैं चाहती थी की अगर तू कुह दिन काम संभाल ले तो?"

"आप चिंता मत करो दीदी|" मुझे अनिल की बात सुन के थोड़ी शान्ति हुई की कम से कम पिताजी का बोझ कुछ कम हो जायेगा| दपहर के समय तक पिताजी और माँ आ गए| उनके आने पर अनिल ने काम की बात छेड़ी तो पिताजी बोले; "बेटा..तू यहाँ आया है....कुछ दिन आराम कर... काम-धंदा मैं देख लूँगा|"

"पिताजी...मैं यहाँ आपका हाथ बँटाने आया हूँ, आराम करने नही आया| अगर जीजू को पता लग गया की मैं यहाँ आराम कर रहा था तो वो तो मेरी क्लास ले लेंगे...ही..ही..ही..ही... वैसे जीजू ने कहा था की कुछ contracts deadline पर हैं| प्लीज पिताजी मुझे बताइये ...|"

पिताजी ने डेडलाइन की बात सुनी और मेरी तरफ देख के मुस्कुराये; "ये बात तुझे इसी शैतान ने बताई होगी? ठीक है तू इतनी जिद्द करता है तो चल मेरे साथ मैं तुझे पार्टियों से मिलवा देता हूँ और साइट भी दिखा देता हूँ| वैसे तुझे गाडी चलाना आता है ना?"

अनिल ने हाँ में सर हिलाया और पिताजी ने उसे चाभी दे दी और दोनों निकल गए| आयुष के स्कूल की छुट्टी होने वाली थी इसलिए मैंने सोचा की माँ को क्यों तकलीफ देनी तो मैं ही तैयार होक आई और नेहा को उनके पास बैठा के स्कूल चली गई और आयुष को लेके वापस हॉस्पिटल आ गई| कैंटीन से सैंडविच ला कर हम चारों ने खाए| शाम को सात बजे में पिताजी और अनिल लौटे; "बहु बेटा... तेरा भाई तो बहुत तेज है! आज तो इसने पाँच हजार का फायदा करा दिया| मुझे नहीं पता था की मानु contracts समय से पहले करने पर extra commission लेता था? वो तो अनिल था जिसने मानु की प्रोजेक्ट रिपोर्ट पढ़ी थी और उसे ये clause पता था! खेर मैंने इसे सारा काम समझा दिया है संतोष से मिलवा दिया है औरकल से ये उसके साथ coordinate करेगा|" अपने भाई की तारीफ सुन के मेरा मस्तक गर्व ऊँचा हो गया|

"चलो भाई..अब सब क्या यहीं डेरा डाले रहोगे? घर जाके खाना-वाना नही बनाना? और आयुष बेटा आपने होमवर्क किया या नहीं? यहाँ तो माँ-बेटी रहने वाले हैं!"

"दादा जी... मैंने आयुष का होमवर्क करा दिया है और मैं भी आपके साथ चलूँगी| मुझे कल स्कूल जाना है|" नेहा की बात सुनके पिताजी मुस्कुराये और उसके सर पे हाथ फिरके बोले; "बेटा अपने से बड़ों से हमेशा तमीज़ से बात करते हैं वरना लोगों को लगेगा का आपके मम्मी-पापा ने आपको अच्छे संस्कार नही दिए|"

"सॉरी दादा जी...आगे से ऐसी गलती कभी नही होगी|"

"बिलकुल अपने पापा की तरह...अपनी गलती हमेशा मान जाता था और दुबारा कभी वो गलती नही दोहराता था| खेर...चलो घर चलते हैं और हाँ बहु अनिल तुम्हारा खाना लेके आजायेगा| अपना ख़याल रखना ...|" इतना कह के सब चले गए और finally मैं और ये (मेरे पति) अकेले रह गए| मैं इनके पास स्टूल ले जा के बैठ गई..इनका हाथ अपने हाथों में लिए कुछ पुराने पलों को याद करने लगी और मेरी आँखें भीग गईं|

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Thanks Mitrao....//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49d.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f49e.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f496.svg
 
आयुष के स्कूल की छुट्टी होने वाली थी इसलिए मैंने सोचा की माँ को क्यों तकलीफ देनी तो मैं ही तैयार होक आई और नेहा को उनके पास बैठा के स्कूल चली गई और आयुष को लेके वापस हॉस्पिटल आ गई| कैंटीन से सैंडविच ला कर हम चारों ने खाए| शाम को सात बजे में पिताजी और अनिल लौटे; "बहु बेटा... तेरा भाई तो बहुत तेज है! आज तो इसने पाँच हजार का फायदा करा दिया| मुझे नहीं पता था की मानु contracts समय से पहले करने पर extra commission लेता था? वो तो अनिल था जिसने मानु की प्रोजेक्ट रिपोर्ट पढ़ी थी और उसे ये clause पता था! खेर मैंने इसे सारा काम समझा दिया है संतोष से मिलवा दिया है औरकल से ये उसके साथ coordinate करेगा|" अपने भाई की तारीफ सुन के मेरा मस्तक गर्व ऊँचा हो गया|

"चलो भाई..अब सब क्या यहीं डेरा डाले रहोगे? घर जाके खाना-वाना नही बनाना? और आयुष बेटा आपने होमवर्क किया या नहीं? यहाँ तो माँ-बेटी रहने वाले हैं!"

"दादा जी... मैंने आयुष का होमवर्क करा दिया है और मैं भी आपके साथ चलूँगी| मुझे कल स्कूल जाना है|" नेहा की बात सुनके पिताजी मुस्कुराये और उसके सर पे हाथ फिरके बोले; "बेटा अपने से बड़ों से हमेशा तमीज़ से बात करते हैं वरना लोगों को लगेगा का आपके मम्मी-पापा ने आपको अच्छे संस्कार नही दिए|"

"सॉरी दादा जी...आगे से ऐसी गलती कभी नही होगी|"

"बिलकुल अपने पापा की तरह...अपनी गलती हमेशा मान जाता था और दुबारा कभी वो गलती नही दोहराता था| खेर...चलो घर चलते हैं और हाँ बहु अनिल तुम्हारा खाना लेके आजायेगा| अपना ख़याल रखना ...|" इतना कह के सब चले गए और finally मैं और ये (मेरे पति) अकेले रह गए| मैं इनके पास स्टूल ले जा के बैठ गई..इनका हाथ अपने हाथों में लिए कुछ पुराने पलों को याद करने लगी और मेरी आँखें भीग गईं|

अब आगे............

मुझे एहसास होने लगा जैसे हम दोनों एक बहुत ही शांत से बगीचे में चल रहे हैं| इन्होने मेरा हाथ थामा हुआ है ...शाम का समय है...ठंडी-ठंडी हवा इनके मस्तक छू रही है .... हम दोनों के चेहरों पे मुस्कराहट है... चैन है...सुकून है.... पर तभी अनिल की आवाज कान में पड़ते ही सब उड़न-छू हो गया! दरअसल मेरी आँख लग गई थी! वो मेरे लिए खाना लाया था.... सच कहूँ तो मैं सिर्फ और सिर्फ इनके लिए खा रही थी| मैं ये नहीं चाहती थी की मेरा बेड भी इनकी बगल में लग जाए! अनिल ने बताया की कल सुबह छः बजे माँ-पिताजी आनंद विहार बस अड्डे पहुँच जायेंगे| "दीदी आप घर चले जाओ...मैं यहाँ रूकता हूँ| आप प्रेग्नेंट हो...थोड़ा अपना ख़याल भी रखो! मैं हूँ ना यहाँ...फिर चिंता क्यों करते हो?"

"बेटा.... मेरा यहाँ रहना बहुत जर्रुरी है... ये सब मेरी वजह से हुआ है ना...तो मुझे ही......." आगे कुह बोलने से पहले पिताजी का फ़ोन आ गया और उन्होंने अनिल को किसी पार्टी से मिलने को कहा जो अभी पेमेंट करने वाली थी| रात के दस बजे थे और उस पार्टी को बाहर जाना था| चूँकि वो लोग जानते थे की इनकी (मेरे पति) की तबियत ठीक नहीं है इसलिए वो जल्दी पेमेंट कर रहे थे| अनिल जल्दी-जल्दी निकल गया और एक बार हम दोनों हम उस कमरे में अकेले रह गए| इनका हाथ थामे हुए कब नींद आ गई पता ही नहीं चला| आँख तब खुली जब नर्से इन्हें चेक करने आई...घडी में बारह बजे थे| उस नर्स का नाम "राजी" था| पिछले दो दिन से वही इन्हें चेक करने आ रही थी| केरल की रहने वाली थी... ईसाई थी... और उसी ने इनके सर में स्वेल्लिंग देखि थी.... खेर आज दो दिन बाद उसने मुझसे बात की; "आप इनका wife है ना?"

मैंने हाँ में सर हिलाया| दरअसल उसकी हिंदी बहुत अच्छी नहीं थी|

“He’s a very luky man! मैं देख रहा है की आप दो दिन से यहीं हैं... इनका बहुत care कर रहा हैं|”

मैंने ना में सर हिलाया और मुसकुरते हुए कहा; "नहीं... मैं बहुत lucky हूँ की ये मेरे husband हैं|"

वो मुस्कुराई और बोली; "ओह! ऐसा है! डॉक्टर सरिता ने बोला की आप प्रेग्नेंट हो... इसलिए आपका B.P. भी चेक करने को बोला|” मैंने हाँ में सर हिला के अनुमति दी| मेरा B.P. चेक करते हुए वो फिर बोली; "आपको अपना care करना चाहिए...आपका husband की care के लिए आपके in-laws हैं|"

"हैं तो... पर सबसे ज्यादा मैं इन्हें प्यार करती हूँ| इसलिए मेरा यहाँ रहना बहुत जर्रुरी है| ऐसा नहीं है की मेरे in-laws को मेरी कोई फ़िक्र नहीं, उन्होंने ने तो मुझे आराम करने को बोला था पर मैं बहुत जिद्दी हूँ...इसलिए उन्होंने मुझे यहाँ 24 hrs रहने की परमिशन दी!"

राजी मुस्कुराई और चली गई| ये तक नहीं बोली की मेरा B.P. कैसा है??? उसके जाने के बाद मैंने दवाजा लॉक किया और वापस स्टूल पे बैठ गई और इनका हाथ थामे मुझे नींद आ गई| सुबह पांह बजे नींद खुली...एक बार इन्हें चेक किया ...वाशरूम गई और वापस आ कर दरवाजा अनलॉक किया और फिर से स्टूल पे बैठ गई| अगले 15 मिनट में आँख फिर से लग गई...और जब आँख खुली तो सामने मेरी माँ खड़ी थी| मैं उनकी कमर पे हाथ डाल के उनसे लिपट गई और मेरे आँसूं निकल पड़े| "बेटी ये सब कैसे हुआ?" पिताजी ने मुझसे सवाल पूछा...और मैंने रोते-रोते उन्हें सारी बात बताई|

"सब मेरी गलती है पिताजी, चन्दर वाले हादसे के बाद मैंने खुद को इनसे काट लिया था| मेरी वजह से घर पे इतनी सारी मुसीबतें आईं.... इतना बवाल हुआ...इसलिए मैं अपना दुःख इनसे छुपाने लगी| कुछ बोलने से डर्टी की कहीं इनको चोट न पहुँचा दूँ...इनका दिल न तोड़ दूँ! और दूसरी तरफ ये जी तोड़ कोशिश करते रहे की मैं पहले की तरह हो जाऊँ... हँसूँ.... बोलूं.... और मैं ना चाहते हुए भी इन्हें दुःख देती गई ...तकलीफ देती गई.... मुझे बार-बार ये डर सता रहा था की मैं आयुष को खो दूँगी... और मुझे इस डर से बाहर निकालने के लिए इन्होने दुबई जा के settle होने का plan बना लिया| इस बात से मुझे इतना गुस्सा आया की मैंने इन से बात करनी बंद कर दी.... इनको मेरी इस हरकत से इतना दुःख हुआ की इन्होने खाना-पीना छोड़ दिया...दिन-रात बस साइट पे रहते थे...जरा भी आराम नही किया...दवाइयाँ तक लेनी बंद कर दी...और नतीजन उस दिन इन्हें हक्कर आया और जब ये गिरे तो इनके सर में छोट आई...जिससे ये कोमा में चले गयी....मुझे माफ़ कर दीजिये पिताजी...प्लीज!" मैं रोती रही और पिताजी..माँ ..अनिल सब खड़े सुनते रहे|

पिताजी ने जोर से अपना सर पीट लिया और मुझ पर बरस पड़े; "पागल हो गई है क्या? तू उससे अपन दर्द छुपा रही थी? अपने पति से? ...... तुझे पता है ना वो तुझसे कितना प्यार करता है? तेरे लिए सबसे लड्ड चूका है? मैं पूछता हूँ उसने क्या गलत कर दिया? तेरी ख़ुशी ही तो चाही थी? हे भगवान!!! जिस इंसान से हमारा दर्द ना छुपा तू उससे अपना दर्द छुपा रही थी!" ये सुन के मैं थोड़ा हैरान हुई....और आगे की बात सुनके मेरे होश उड़ गए; "जब मानु बेटा पंचायत क काम से गांव आया था तब वापसी में हम से मिल के गया था| वो तो बस हुमा लोगों का हाल-छाल पूछने आया था और मेरी परेशानी देख उसने मुझसे बहुत जोर देके कारन पूछा तो मैंने उसे सब बता दिया| ”

दरअसल अनिल को MBA कराने के लिए पिताजी को अपनी ज़मीन और घर गिरवी रख के बैंक से लोन लेना पड़ा था| बैंक ने घर और ज़मीन की value बहुत कम लगाईं थी इस कारन हमें सिर्फ 3.5 लाख ही लोन मिला बाकी का 1.5 लाख कम पड़ रहा था| हमारी दूसरी ज़मीन से घर का गुजर-बसर हो जाय करता था बस! पिताजी की उम्मीद थी की MBA के बाद अनिल को अच्छी नौकरी मिल जायेगी और वो धीरे-धीरे कर के लोन की किश्त उतारता जायेगा| पर ऐसा ना हो सका..... financially हमारे घर की हालत बहुत कमजोर हो गई थी और बैंक को अपना पिसा डूबता नजर आया तो उसने पिताजी को नोटिस भेज दिया...... सच पूछो तो मैं अपनी इस नई जिंदगी में इस कदर डूब गई की मैं ये बात भूल ही गई थी...और मुझे ये तब याद आया जब आज पिताजी ने ये बात दोहराई!

" जब मानु को ये बात पता चली तो उसने बिना कुछ सोचे मुझे दस लाख का चेक फाड़ के दे दिया..... और बस इतना कहा की संगीता को कुछ मत बताना| " ये सुन के मेरे चेहरे पे हवाइयां उड़ने लगीं...क्योंकि मुझे इन्होने कुछ नहीं बताया था| "हाँ...तूने सही सुना...तेरे पति ने...जबकि तुझे तो शायद याद ही नहीं होगा की तेरा बाप कर्जे तले दबा हुआ है! पर मैंने आजतक तुझसे कुछ शिकायत नही की.... पर आज तूने एक देवता सामान इंसान को इस कदर दुखी किया की आज उसकी ये हालत हो गई! और तुझे अगर इतनी ही तकलीफ थी तो क्यों शादी की? ..क्यों मानु की और अपने सास-ससुर की जिंदगी में जहर घोल दिया?क्या तुझे पता नहीं था की जो कदम तू उठाने के लिए उसे मजबूर कर रही है उसका अंजाम क्या होगा? उसने बिना पूछे बिना कहे हर मोड़ पे हमारे परिवार की मदद की...सिर्फ इसलिए की वो तुझे खुश देखना चाहता था और तू....तू उसका मन रखने के लिए खुश होने का दिखावा तक ना कर सकी? मैं पूछता हूँ उसने कौन सा तुझसे सोना-चांदी माँगा था जो तू दे ना पाई? ………. उसके बहुत एहसान हैं हम पर...जिन्हें मैं कभी नही उतार सकता| दिल को लगता था की कम से कम तुझे पा कर वो खुश है...पर तूने तो उससे वो ख़ुशी भी छीन ली! .मुझे शर्म आती है तुझे अपनी बेटी कहते हुए! " ये सब सुनने के बाद मेरे पाँव तले की जमीन खिसक चुकी थी...और मुझे खुद से घिन्न आने लगी थी....नफरत हो गई थी खुद से.... मन इस कदर कचोटने लगा की अगर मैं मर जाती तो अच्छा था!

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दरअसल अनिल को MBA कराने के लिए पिताजी को अपनी ज़मीन और घर गिरवी रख के बैंक से लोन लेना पड़ा था| बैंक ने घर और ज़मीन की value बहुत कम लगाईं थी इस कारन हमें सिर्फ 3.5 लाख ही लोन मिला बाकी का 1.5 लाख कम पड़ रहा था| हमारी दूसरी ज़मीन से घर का गुजर-बसर हो जाय करता था बस! पिताजी की उम्मीद थी की MBA के बाद अनिल को अच्छी नौकरी मिल जायेगी और वो धीरे-धीरे कर के लोन की किश्त उतारता जायेगा| पर ऐसा ना हो सका..... financially हमारे घर की हालत बहुत कमजोर हो गई थी और बैंक को अपना पिसा डूबता नजर आया तो उसने पिताजी को नोटिस भेज दिया...... सच पूछो तो मैं अपनी इस नई जिंदगी में इस कदर डूब गई की मैं ये बात भूल ही गई थी...और मुझे ये तब याद आया जब आज पिताजी ने ये बात दोहराई!

"जब मानु को ये बात पता चली तो उसने बिना कुछ सोचे मुझे दस लाख का चेक फाड़ के दे दिया..... और बस इतना कहा की संगीता को कुछ मत बताना| " ये सुन के मेरे चेहरे पे हवाइयां उड़ने लगीं...क्योंकि मुझे इन्होने कुछ नहीं बताया था| "हाँ...तूने सही सुना...तेरे पति ने...जबकि तुझे तो शायद याद ही नहीं होगा की तेरा बाप कर्जे तले दबा हुआ है! पर मैंने आजतक तुझसे कुछ शिकायत नही की.... पर आज तूने एक देवता सामान इंसान को इस कदर दुखी किया की आज उसकी ये हालत हो गई! और तुझे अगर इतनी ही तकलीफ थी तो क्यों शादी की? ..क्यों मानु की और अपने सास-ससुर की जिंदगी में जहर घोल दिया?क्या तुझे पता नहीं था की जो कदम तू उठाने के लिए उसे मजबूर कर रही है उसका अंजाम क्या होगा? उसने बिना पूछे बिना कहे हर मोड़ पे हमारे परिवार की मदद की...सिर्फ इसलिए की वो तुझे खुश देखना चाहता था और तू....तू उसका मन रखने के लिए खुश होने का दिखावा तक ना कर सकी? मैं पूछता हूँ उसने कौन सा तुझसे सोना-चांदी माँगा था जो तू दे ना पाई? ………. उसके बहुत एहसान हैं हम पर...जिन्हें मैं कभी नही उतार सकता| दिल को लगता था की कम से कम तुझे पा कर वो खुश है...पर तूने तो उससे वो ख़ुशी भी छीन ली! .मुझे शर्म आती है तुझे अपनी बेटी कहते हुए!" ये सब सुनने के बाद मेरे पाँव तले की जमीन खिसक चुकी थी...और मुझे खुद से घिन्न आने लगी थी....नफरत हो गई थी खुद से.... मन इस कदर कचोटने लगा की अगर मैं मर जाती तो अच्छा था!

अब आगे ......

"समधी जी ये आप क्या कह रहे हो? ये बहु है हमारी!" ये कहते हुए मेरी माँ (सासु माँ) तेजी से चल के मेरे पास आईं और मेरे आँसूं पोंछने लगी| "बहुत प्यार करती है ये मानु से! हो गई गलती बच्ची से! ... उसने कुछ जानबुझ के तो नहीं किया? वो भी सिर्फ इसलिए की वो हम लोगों को अकेला छोड़ के नहीं जाना चाहती थी| इसीलिए वो नाराज हुई...मुझे नहीं लगता उसने कुछ गलत किया! आपको पता है मैं और मानु के पिताजी चाहते थे की शादी के बाद ये दोनों अलग settle हो जाएँ इसलिए शादी वाले दिन मैंने बहु को उसके नए घर की चाभी दी तो जानते हैं इसने क्या किया? चाभी मुझे लौटा दी...और बोली माँ मैं इन्हें आप से अलग करने नहीं आई हूँ| हम आपके साथ ही रहेंगे! और तो और अपने हनीमून पर जाने के लिए इसने शर्त राखी की हम सब एक साथ घूमने जाएँ! हर कदम पर इस्सने परिवार को तवज्जो दी है और आप इसकी एक छोटी सी गलती पर....."

"समधन जी...छोटी सी गलती? अगर आप इसे अपनी बेटी मानती हैं तो ये हमारा बेटा है...और आपकी बेटी की वजह से मेरा बेटा इस समय बी बेहोश पड़ा है... सिर्फ और सिर्फ इसकी वजह से!" पिताजी ने मुझ पर गरजते हुए कहा|

"एक बात बताइये समधी जी... अगर यही गलती आपके बेटे ने की होती तो?" माँ ने फिर से मेरा बचाव किया|

"बहनजी.... मानु के बहुत एहसान हैं हम पर...जिसे हम छह के भी नहीं उतार सकते|" पिताजी ने बात को संभालते हुए कहा|

"भाईसाहब.....कैसे एहसान? एहसान तो परायों पर किये जाते हैं और आप तो अपने हैं|" पिताजी (ससुर जी) ने मुस्कुराते हुए कहा| "देखिये जो हुआ सो हुआ...बहु ने कुछ भी जान कर नहीं किया| वो बस मानु को टेंशन नहीं देना चाहती थी| अब आप गुस्सा छोड़िये और अनिल बेटा तुम्हें गुडगाँव दस बजे पहुँचना है| तो मुझे और अपने माँ-पिताजी को घर छोड़ दो| और मानु की माँ..तुम यहीं बहु के पास रहो मैं थोड़ी देर बाद आऊँगा तब तक तुम बहु को नाश्ता करा देना|" बस इतना कह के पिताजी और सब चले गए|

सब के जाने के बाद माँ ने मुझे मुँह-हाथ धो के आने को कहा और फिर नाश्ता परोस दिया| "चल आजा बेटी नाश्ता कर ले! आयुष और नेहा सुबह अपने आप उठ गए और आज खुद तैयार भी हो गए| मैंने सोचा की आज इन्हें स्कूल छोड़ दिया जाए तो आयुष जिद्द करने लगा की पहले पापा से मिलूँगा...उफ्फ्फ्फ़ कितनी मुश्किल से माना वो! खेर तेरे पिताजी (ससुर जी) ने उसे वादा किया की दोनों आज रात यहीं रुकेंगे तब जाके माना वो| अरे! तू वहां कड़ी-कड़ी क्या सोच रही है? चल आजा जल्दी से|" मैं आके उनके सामने बैठ गई पर खाने को हाथ तक नही लगाया और बोली; "माँ...मन नहीं है ...!"

"बेटी..माँ-बाप के कुछ कहने से रूठ थोड़े ही जाते हैं? क्या माँ-बाप को इतना भी हक़ नही की वो अपने बच्चों को डाँट सके?" माँ ने बड़ा सीधा सा सवाल पूछा|

"माँ मैं पिताजी के डाँटने से नही रूठी ... उन्होंने तो कुछ गलत कहा ही नहीं! गलती मेरी थी...सारी की सारी... मुझे तो खुद से घिन्न आ रही है की मैंने इनके साथ ऐसा व्यवहार किया| इन्होने बिना बोले मेरी हर बात समझी.... बिना मेरे कहे पिताजी की ज़मीन बचाई वरना आज वो सब सड़क पे आ जाते और...मैं इनको इस कदर परेशान करती रही!"

"बेटी अगर तेरे खाना ना खाने से मानु की तबियत ठीक हो जाती तो हम सब भूख हड़ताल कर देते और आब तक तो वो भला-चंगा हो जाता| देख तू अपने लिए ना सही उस नए मेहमान के लिए खाना खा ले... अगर उसे कुछ हो गया तो मानु भले ही तुझे माफ़ कर दे पर वो खुद तुझे कभी माफ़ नही करेगा!" इतना कह के माँ ने मुझे जबरदस्ती अपने हाथ से खाना खिलाया|

"बेटी मैं बड़ी किस्मत वाली हूँ.... पहले मानु को अपने हाथ से खिलाती थी.... फिर आयुष को खाना खिलने का मौका मिलाया और आज देख तो किस्मत ने मुझे तुझे भी खिलाने का मौका दिया|"

"इस हिसाब से तो मैं ज्यादा किस्मत वाली हूँ माँ.... बचपन के बाद इतने साल गुजर गए और आज मुझे फिर से अपनी माँ के हाथों खाना खाने का मौका मिल रहा है|"

"अच्छा जी...मानु ने तुझे कभी खाना नहीं खिलाया?" माँ ने जानबूझ के ये शरारती सवाल पूछा, और उनका सवाल सुन के मैं हँस पड़ी! "देखा ....मैं जानती थी!!!" मेरी हँसी छूट गई... और इस तरह हम माँ-बेटी हँस पड़े..... एक मुद्दत बाद!

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सब के जाने के बाद माँ ने मुझे मुँह-हाथ धो के आने को कहा और फिर नाश्ता परोस दिया| "चल आजा बेटी नाश्ता कर ले! आयुष और नेहा सुबह अपने आप उठ गए और आज खुद तैयार भी हो गए| मैंने सोचा की आज इन्हें स्कूल छोड़ दिया जाए तो आयुष जिद्द करने लगा की पहले पापा से मिलूँगा...उफ्फ्फ्फ़ कितनी मुश्किल से माना वो! खेर तेरे पिताजी (ससुर जी) ने उसे वादा किया की दोनों आज रात यहीं रुकेंगे तब जाके माना वो| अरे! तू वहां कड़ी-कड़ी क्या सोच रही है? चल आजा जल्दी से|" मैं आके उनके सामने बैठ गई पर खाने को हाथ तक नही लगाया और बोली; "माँ...मन नहीं है ...!"

"बेटी..माँ-बाप के कुछ कहने से रूठ थोड़े ही जाते हैं? क्या माँ-बाप को इतना भी हक़ नही की वो अपने बच्चों को डाँट सके?" माँ ने बड़ा सीधा सा सवाल पूछा|

"माँ मैं पिताजी के डाँटने से नही रूठी ... उन्होंने तो कुछ गलत कहा ही नहीं! गलती मेरी थी...सारी की सारी... मुझे तो खुद से घिन्न आ रही है की मैंने इनके साथ ऐसा व्यवहार किया| इन्होने बिना बोले मेरी हर बात समझी.... बिना मेरे कहे पिताजी की ज़मीन बचाई वरना आज वो सब सड़क पे आ जाते और...मैं इनको इस कदर परेशान करती रही!"

"बेटी अगर तेरे खाना ना खाने से मानु की तबियत ठीक हो जाती तो हम सब भूख हड़ताल कर देते और आब तक तो वो भला-चंगा हो जाता| देख तू अपने लिए ना सही उस नए मेहमान के लिए खाना खा ले... अगर उसे कुछ हो गया तो मानु भले ही तुझे माफ़ कर दे पर वो खुद तुझे कभी माफ़ नही करेगा!" इतना कह के माँ ने मुझे जबरदस्ती अपने हाथ से खाना खिलाया|

"बेटी मैं बड़ी किस्मत वाली हूँ.... पहले मानु को अपने हाथ से खिलाती थी.... फिर आयुष को खाना खिलने का मौका मिलाया और आज देख तो किस्मत ने मुझे तुझे भी खिलाने का मौका दिया|"

"इस हिसाब से तो मैं ज्यादा किस्मत वाली हूँ माँ.... बचपन के बाद इतने साल गुजर गए और आज मुझे फिर से अपनी माँ के हाथों खाना खाने का मौका मिल रहा है|"

"अच्छा जी...मानु ने तुझे कभी खाना नहीं खिलाया?" माँ ने जानबूझ के ये शरारती सवाल पूछा, और उनका सवाल सुन के मैं हँस पड़ी! "देखा ....मैं जानती थी!!!" मेरी हँसी छूट गई... और इस तरह हम माँ-बेटी हँस पड़े..... एक मुद्दत बाद!

अब आगे ....

मैं जानती तो थी की माँ मुझसे अपनी बेटी जैसा प्यार करती है...पर उसका एक अनोखा एहसास मुझे उस दिन हुआ!

दोपहर को अनिल बच्चों को स्कूल से सीधा हॉस्पिटल ले आया और वापसी में माँ को अपने साथ घर ले गया| आयुष तो आते ही अपने पापा के पास जा बैठा और उनसे बात करने लगा| नेहा सोफे पे बैठ के अपना होमवर्क निकाल के बैठ गई| आयुष कुछ खुसफुसाने लगा और उसकी इस खुसर-फुसर में हम माँ-बेटी दोनों की दिलचस्पी जाग गई| "आयुष...बेटा पापा से क्या बात कर रहे हो?" इतने में नेहा उठ के अपने पापा के पास स्टूल पर बैठ गई| उसे इतने नजदीक बैठा देख वो बोला; "दीदी....आप उधर सोफे पर बैठो...मुझे पापा से बात करनी है|"

"मैं नहीं जाती... तू बोल जो बोलना है|" नेहा ने अकड़ते हुए जवाब दिया|

"प्लीज दीदी ...प्लीज......" आयुष ने बड़ी भोली सी शकल बनाते हुए कहा| पर नेहा टस से मस नहीं हुई आखिर मुझे ही बात संभालनी पड़ी वरना दोनों लड़ाई शुरू कर देते|

"आयुष....जो सीक्रेट बात तुम करने वाले हो मुझे पहले से पता है!" मैंने थोड़ा सा नाटक किया| (Bluffing)

"आपको कैसे पता?.... ये तो पापा और मेरा सीक्रेट है!" उसने बड़ी हैरानी से पूछा|

"बेटा....मैं आपकी माँ हूँ| उस दिन जब आप पापा से बात कर रहे थे ना, तब मैंने सब सुन लिया था|" मैंने फिर से Bluff किया|

"ठीक है.... !" शर्म से उसके गाल लाल हो गए थे! "वो...... आज उसने मुझसे बात की!" बस इतना कह के आयुष रुक गया और अपने पापा की तरफ देखने लगा| 'उसने' सुन के मुझे थोड़ा शक हुआ की जर्रूर ये कोई लड़की है! दरअसल आयुष अपने पापा पर ही गया है| इन्होने भी स्कूल में कभी किसी लड़की से बात करने की कोशिश नही की...हाँ अगर कोई लड़की सामने से बात करे तभी ये उसका जवाब देते थे|

"अच्छा...wow! क्या बोला उसने?" मैंने पूछा तो आयुष शर्मा गया|

"वो....उसने....पूछा की .....क्या मैंने होमवर्क किया है?" आयुष ने अटकते-अटकते हुए कहा, ये सुनते ही मेरी हँसी छूट गई| पर नेहा के चेहरे पर कोई भाव नही थे| वो अब भी मुझसे नाराज थी और मेरी हँसी उसे रास नही आई थी इसलिए वो चिढ़ते हुए बोली; "तो? तू स्कूल पढ़ने जाता है या girlfriends बनाने? पढ़ाई में ध्यान लगा!" आयुष का मुँह लटक गया तो मैंने उसे अपने साथ चलने को बोला और उसे ले के मैं कैंटीन आ गई|

"बेटा ये लो आपका फेवरट मिल्क शेक.... happy!" उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने ही से बात शुरू की; "बेटा....आपकी दीदी पापा को लेके थोड़ा परेशान है| देखो मुझसे भी वो बात नही करती.... जब पापा ठीक हो जायेंगे तब सब ठीक हो जायेगा| तबतक कोशिश करो की आपकी दीदी को गुस्सा ना आये पर उसे अकेला मत छोड़ना, वो आपसे बहुत ज्यादा प्यार करती है...मुझसे भी ज्यादा!" वो प्यार से मुस्कुराया और स्लुर्प...स्लुर्प... कर अपना मिल्क शेक पीने लगा| आज रात को मैं और बच्चे यहीं सोने वाले थे तो खाना खाने के बाद हम सब लेट गए| मैं सोफे पर और बच्चे नीचे| रात के बारह बजे होंगे की मुझे किसी के बोलने की आवाज आई, ये कोई और नहीं नेहा की आवाज थी| वो अपने पापा से कुछ बात कर रही थी|

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