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Guest
दो दिन कैसे गुजर गये पता ही नहीं चला. सोनाली जय को भूलती जा रही थी और समीर की तरफ खींचती जा रही थी. रोज़ समीर का फोन आता और दोनो घंटो घाप-शॅप, हँसी-मज़ाक, चुहलबाज़ी और प्यार भरी बातें करते थे. समीर ने तो एक मोबाइल ही करियर कर के दे दिया था. सोनाली मोबाइल को पाकर इतनी खुश हो गयी थी जैसे सारी दुनिया उसके कदमो में हो.
ज़य की हालत सचमुच मजनू जैसी हो गयी थी. तरह तरह से अपने दिल को संतावना दे रहा था. क्या करे, क्या ना करे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. किताबें खोलता तो उसमें भी सोनाली ही नज़र आ रही थी उसे. खैर जैसे तैसे उसने दो दिन गुज़रे और किसी तरह एग्ज़ॅम्स की तय्यार की.
एग्ज़ॅम्स वाले दिन ज़य आस यूषुयल स्कूल समय से पहले पहुँच गया था इस आशा में कि सोनाली भी जल्दी आएगी उससे मिलने. लेकिन ज़य को निराशा ही हाथ लगी क्यूंकी एक तो सोनाली लेट आई और आई भी तो अपने पापा के साथ. आते ही सोनाली सीधे क्लास में चली गयी और सीट पर जाकर बैठ गयी. ज़य ने आवाज़ भी दी सोनाली को लेकिन उसने अनसुना कर दिया.
ज़य अब भी यही सोच रहा था कि शायद सोनाली ने उसे देखा नहीं होगा. लेकिन मैने तो आवाज़ भी दी. हां वो दूर जो खड़ी थी इसलिए सुन नहीं पाई होगी. लेट तो हो ही गयी है वो इसलिए जल्दबाज़ी में ध्यान नहीं दिया होगा उसने. प्यार में अक्सर आप का साथी, कितना भी ग़लत क्यूँ ना हो, हमेशा सही ही नज़र आता है. ज़य को पता ही नहीं था कि जिसके पीछे वो पागल हो रहा है वो अब उसे भूलने लगी है.
ज़य भी क्लास में आकर अपनी सीट पर बैठ गया. इस बार उसकी सीट सोनाली के बगल वाली रो में लेकिन दो बच्चों के पीछे थी. इस बार भी उसकी किस्मत ने साथ नहीं दिया और वो सोनाली से आँखें मिलाकर बात नहीं कर पाया. उसने सोच ही लिया था कि भले ही पेपर क्यूँ ना छूट जाए वो सोनाली से ज़रूर बात करेगा आज.
किसी तरह उसने पेपर लिखना शुरू किया. करीब ढाई घंटे के बाद सोनाली उठी और एक नज़र ज़य की तरफ देखा. दोनो की नज़रें टकराई लेकिन सोनाली ने ऐसे मूह फेर लिया जैसे वो कोई अजनबी हो. ज़य को उसका ये अंदाज़ अंदर तक घायल कर गया. पेपर में अभी भी कयि क्वेस्चन बाकी थे सॉल्व करने के लिए और वो ज़य को आते भी थे लेकिन जब उसने देखा सोनाली पेपर देके जा रही है तो उसने भी अपना अधूरा पेपर ऐसे ही सब्मिट करा दिया और लगभग दौड़ते हुए बाहर की तरफ भागा.
बाहर आकर उसने चारो तरफ देखा लेकिन सोनाली उसे कहीं दिखाई नहीं दी. उसकी हालत का यह आलम था कि जैसे किसी ने उसके शरीर से उसकी आत्मा को निकाल दिया हो. वो पागलों की तरह यहाँ से वहाँ उसे ढूँढ रहा था. कभी मैन गेट से बाहर जाता तो कभी पार्क में देखता कि कहीं हमेशा की तरह सोनाली उसका पार्क में इंतेज़ार कर रही हो.
तभी उसकी नज़र बाथरूम से निकलती सोनाली पर पड़ी और वो उसकी तरफ दौड़ पड़ा.
ज़य की हालत सचमुच मजनू जैसी हो गयी थी. तरह तरह से अपने दिल को संतावना दे रहा था. क्या करे, क्या ना करे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. किताबें खोलता तो उसमें भी सोनाली ही नज़र आ रही थी उसे. खैर जैसे तैसे उसने दो दिन गुज़रे और किसी तरह एग्ज़ॅम्स की तय्यार की.
एग्ज़ॅम्स वाले दिन ज़य आस यूषुयल स्कूल समय से पहले पहुँच गया था इस आशा में कि सोनाली भी जल्दी आएगी उससे मिलने. लेकिन ज़य को निराशा ही हाथ लगी क्यूंकी एक तो सोनाली लेट आई और आई भी तो अपने पापा के साथ. आते ही सोनाली सीधे क्लास में चली गयी और सीट पर जाकर बैठ गयी. ज़य ने आवाज़ भी दी सोनाली को लेकिन उसने अनसुना कर दिया.
ज़य अब भी यही सोच रहा था कि शायद सोनाली ने उसे देखा नहीं होगा. लेकिन मैने तो आवाज़ भी दी. हां वो दूर जो खड़ी थी इसलिए सुन नहीं पाई होगी. लेट तो हो ही गयी है वो इसलिए जल्दबाज़ी में ध्यान नहीं दिया होगा उसने. प्यार में अक्सर आप का साथी, कितना भी ग़लत क्यूँ ना हो, हमेशा सही ही नज़र आता है. ज़य को पता ही नहीं था कि जिसके पीछे वो पागल हो रहा है वो अब उसे भूलने लगी है.
ज़य भी क्लास में आकर अपनी सीट पर बैठ गया. इस बार उसकी सीट सोनाली के बगल वाली रो में लेकिन दो बच्चों के पीछे थी. इस बार भी उसकी किस्मत ने साथ नहीं दिया और वो सोनाली से आँखें मिलाकर बात नहीं कर पाया. उसने सोच ही लिया था कि भले ही पेपर क्यूँ ना छूट जाए वो सोनाली से ज़रूर बात करेगा आज.
किसी तरह उसने पेपर लिखना शुरू किया. करीब ढाई घंटे के बाद सोनाली उठी और एक नज़र ज़य की तरफ देखा. दोनो की नज़रें टकराई लेकिन सोनाली ने ऐसे मूह फेर लिया जैसे वो कोई अजनबी हो. ज़य को उसका ये अंदाज़ अंदर तक घायल कर गया. पेपर में अभी भी कयि क्वेस्चन बाकी थे सॉल्व करने के लिए और वो ज़य को आते भी थे लेकिन जब उसने देखा सोनाली पेपर देके जा रही है तो उसने भी अपना अधूरा पेपर ऐसे ही सब्मिट करा दिया और लगभग दौड़ते हुए बाहर की तरफ भागा.
बाहर आकर उसने चारो तरफ देखा लेकिन सोनाली उसे कहीं दिखाई नहीं दी. उसकी हालत का यह आलम था कि जैसे किसी ने उसके शरीर से उसकी आत्मा को निकाल दिया हो. वो पागलों की तरह यहाँ से वहाँ उसे ढूँढ रहा था. कभी मैन गेट से बाहर जाता तो कभी पार्क में देखता कि कहीं हमेशा की तरह सोनाली उसका पार्क में इंतेज़ार कर रही हो.
तभी उसकी नज़र बाथरूम से निकलती सोनाली पर पड़ी और वो उसकी तरफ दौड़ पड़ा.