तब मेरे पति राज ने रुखसार को खिंच कर अपनी बाहों में ले लिया और हंसकर बोले, “जब तुमने हमें लम्पट करार कर ही दिया है और फिर अब जब हम एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह जान ही गए हैं, तो तुम वहाँ कपडे पहने हुए क्यों खड़ी हो? मेरी बांहों में आ जाओ। मैं तुम्हें तुम्हारे पति समीर और मेरी बीबी डॉली के सामने ही निर्वस्त्र करने की घृष्टता करता हूँ। आशा है वह मुझे क्षमा करेंगे।“
और राज ने मेरे और समीर के सामने ही कुछ असमंजस में खड़ी हुयी रुखसार को बोलने का मौक़ा न देते हुए, अपनी बाहों में जकड लिया और उसे अपनी और खिंच अपनी गोद में बिठाकर चूमने लगे और उसके कमीज़ के बटन खोलने में लग गए।
मैं मेरे पति की निर्लज्जता से बड़ी दुखी हो गयी। अपने पति के बारे में ऐसी बातें सुनना और उनको अपनी आँखों के सामने किसी और औरत को प्यार करते हुए देखने में बहुत अंतर है यह मैंने तब अनुभव किया। तब तो वह मात्र रुखसार को चूम रहे थे और उसके कपड़ों को हटा ने की चेष्टा कर रहे थे। जब वह उसे चोदेंगे तो मुझ पर क्या बीतेगी यह सोचना भी मेरे लिए मुश्किल था। हालांकि मैं जानती थी की उनका रुखसार को चोदने का यह कोई पहला मौका नहीं था।
फिर क्या था? समीर को तो जैसे खुला लाइसेंस मिल गया। अब तो वह जैसा मेरा पति हो ऐसा अधिकार जताते हुए निःसंकोच मेरे सारे अंगों को चूमने लगे। एक और मैं अपने पति की निर्लज्जता के बारे में सोच रही थी, तो दुसरी और मैं स्वयं भी तो नग्न अवस्था में किसी और मर्द की बाहों में थी न? मैं बड़ी दुविधामें डूबी जा रही थी।
पर कहावत है न की जब सर ओखल में रखा तो फिर मुशल से क्या डरना? एक बार जब मनमें निश्चय कर ही लिया था तो अब पीछे हटने का तो कोई सवाल ही नहीं था, और ना हीं में हटना चाहती थी। मैं भी पूरी तरह अपनी लज्जा का चोला फैंक देते हुए मेरे पति राज से थोड़ी दूर हट कर मेरे पागल भोंदू प्रेमी समीर के साथ लेट गयी। समीर ने मुझे अपनी दो टांगों के बीच में जकड लिया। मैं भी समीर के बटनों के साथ खेलते हुए उन्हें खोलने में लग गयी। समीर अब पूरी तरह नग्न थे। उनकी बालों से भरी हुई छाती मेरे स्तनों से रगड़ रही थी।
मैंने उनको अपने ऊपर चढ़ने को प्रेरित किया और मेरे होंठ को चूमने के लिए मैं अपने होंठ की चूमने की मुद्रा बना ली वह मुझ पर झुक कर मेरे होठों को बड़े दुलार से चूमने लगे। मुझे अब मेरे पति और रुखसार की कोई शर्म न थी और ना ही उनसे कोई जलन। पर स्त्री सहज उत्सुकता जरूर थी।
मैंने जब मुड़कर देखा तो पाया की राज रुखसार को करीब पूरी तरह निर्वस्त्र कर चुके थे। मैं तो रुखसार की नग्न छबि देखती ही रह गयी। उसकी नग्नता में उसका सौन्दर्य इतना निखर रहा था की जैसे स्वर्ग से कोई अप्सरा नीचे उतर आयी हो। मैं मन ही मन मुस्करा ने लगी। भाई इतनी सुन्दर एवं सेक्सी स्त्री को देख कर भी अगर मेरे पति का मन न ललचाता तब तो मुझे भी उनकी पौरुषता पर शक होता। मुझे मेरे पति पर दया आगयी। मैं उनको भली भाँती जान गयी थी। राज इतने रसिक (या फिर लम्पट कह लीजिये) थे की इतने सालोँ से एक मात्र स्त्री के साथ ही सम्भोग करना उनके लिए बहुत कठिन रहा होगा। मैं भी तो उस सम्भोग के नित्यक्रम से ऊब ही गयी थी न? सालों से हररोज रोटी सब्जी खाने वाले को अगर खीर नजर आये तो उसका मन तो लचायेगा ही।
मैंने समीर के कानों में कहा, “एक मिनट” और पलट कर मैं मेरे पति के पास गयी जो के रुखसार के उरोजों और उसके रसीले नितम्ब को कभी सहलाते तो कभी चूंटी भर रहे थे। रुखसार के हाथ में मेरे पति का लन्ड था और उसे वह प्यार से सहला रही थी। मैंने राज को खिंच कर मेरी बाहोंमें लिया और कहा, “राज, प्यारे, तुम मेरे सर्वस्व हो। आज मैं खुश हूँ और मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है। तुम दोनों खुल कर चोदो और सम्भोग का पूरा आनंद लो। पर याद रहे रुखसार तुम्हारी प्रेमिका और शय्या सह भागिनी भले ही हो पर हमेशा के लिए तुम्हारी धर्म बीबी तो मैं ही रहूंगी।”