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एक दूसरे की बीबीयों के रसभरे होंठ

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कहानी लाइक करने के लिए बहुत बहुत
 
मेरी छाती और मेरे स्तन समीर के मुख से सटे हुए थे। मेरे बदन में सिहरन सी दौड़ गयी जब मैंने देखा की समीर अधखुली तन्द्रा में एकटक मेरे फले फुले हुए स्तनों को बिलकुल अपनी आखों के सामने लगभग स्पर्श करते हुए देख रहे थे। समीर को शायद यह एहसास हो रहा था की वह उनकी बीबी रुखसार के नहीं बल्कि मेरे स्तन थे। कभी वह मेरे स्तनों को तो कभी वो मुझे देख रहे थे। ऐसे लग रहा था जैसे वह मेरे स्तनों को छूने और चूमने के लिए मेरी इजाजत चाहते हों। मैं चाह रही थी की वह मेरे दोनों स्तनों को मेरी नाइटी हटाकर नंगा कर दे और पकडे और जोर से मसल दे और अपने मुंह में लेकर उन्हें चूसे और काटे।

मेरे मन में बड़ी अजीब सी चहल पहल हो रही थी। समीर से इतनी करीबी के कारण मेरे मनमें एक अजीबो गरीब सिहरन हो रही थी। मेरी छाती तेजी से धड़क रही थी। समीर से इतनी करीबी मुझे अज्ञात भावावेश के तरंगों में झूला रही थी। मेरे मन में ऐसे हलचल मची थी के शायद मैं चाहती थी की समीर मुझे जबरदस्ती खिंच कर मुझे चुम्बन करे और मुझे अपनी विशाल छाती से लगाले।

मुझे ऐसा लगा जैसे समीर कुछ कहने की कोशिश कर रहे थे । ठीक से सुनने के लिए, मैं झुककर उनके मुंह के पास अपने कान ले गयी। तब समीर ने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया और मेरी ठुड्डी ऊपर उठाकर मेरी आँखों में गहराई से झाँकने लगे। समीर की आँखों में वासना भरी प्यास नजर आ रही थी। मैं जानती थी की समीर मेरे लिए बहुत तड़पते थे। मैं मेरी छाती में मशीन की तरह धड़कती हुई तेज धड़कनों को जैसे सुन रही थी। मेरी छाती इतनी तेज धड़क रही थी की शायद समीर को भी मेरी धड़कन सुनाई पड़ रही थी। मैं समीर की आँखों में आँखें डाल न सकी।

समीर मुझे पाना चाहते थे। मुझे काफी पक्का अंदेशा था की उस समय मेरे पति शायद उनकी बीबी रुखसार से शारीरिक सम्बन्ध बना चुके थे। मेरे पति ने भी बात बात में मुझे यह इंगित तो किया ही था। रुखसार ने खुद ने यह बात इशारों इशारों में मुझे कह दी थी। शायद समीर को भी यह पता था। शायद समीर को राज और रुखसार के शारीरिक सम्बन्ध से कोई आपत्ति नहीं थी। कई बातें ऐसी थी जिसका मुझे काफी अच्छा अंदेशा तो था पर मैं मेरे पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था और ना ही मैंने उस पर ज्यादा विचार किया था।

उस समय तो मैं अपने बदन की आग में झुलस रही थी और देख रही थी की समीर भी उसी आग में तड़प रहा था। मैं भी समीर की और आकर्षित थी और शायद मेरे मन में भी समीर को पाने की कामना की आग भड़क रही थी। मैं उसे अनदेखा करनेकी कोशिश में लगी हुई थी। पर उस दिन जब समीर ने मेरी आँखों में देखा तो मैं पागल से हो गयी।

मेरे हर एक अंग में उत्तेजक काम वासना की अग्नि भड़कने लगी। मैं समीर की ऋणी थी। समीर ने मेरे लिए अपना जीवन दाँव पर लगा दिया था और वह मेरे कारण उस रात को मुश्किल से मौत के मुंह में से बच निकला था। मेरे ह्रदय में एक भूचाल सा उठ रहा था। मेरी नैतिकता और निष्ठा की नींव हील रही थी, कमजोर हो रही थी। उसके लिए मेरे पति का भी तो बड़ा योगदान था।

मेरा पति राज मुझे उकसा रहा था की मैं समीर से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करूँ। एक अजीब सी स्थिति बन रही थी। अगर मैं यह कहूँ की सब मेरी मर्जी के खिलाफ हो रहाथा तो वह सच नहीं था। मैं समीर को अपना सर्वस्व देना चाह तो रही थी पर सामाजिक बंधनों और प्रणालीयोंके बंधन में बंधा हुआ मेरा मस्तिष्क इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। पर मन मष्तिष्क की बात कहाँ सुनता है। इसी कारण जब मेरे पति मुझे उकसा रहे थे तो मेरे पॉंवों के बीच मेरी योनि से जैसे मेरे स्त्री रस की धार बह रही थी।

अचानक समीर ने अपना एक हाथ मेरे गाउन के ऊपर मेरी छाती पर रखा। मैं अज्ञात डरके मारे काँप उठी। समीर मेरे स्तनों को हलके से सहलाने की कोशिश कर रहे थे। वह डरते थे की कहीं मैं कोई विरोध न कर बैठूं। पर मेरे हाल ही कहाँ थे की मैं कुछ करूँ। मेरे पॉंव एकदम ढीले पड़ गए। मैं कुछ भी बोल न सकी। मेरी बुद्धि कह रही थी की मैं समीर का हाथ हटा दूँ, और मन कह रहा थी की बस अब जो हो चुका वह हो चूका। अगर मैं चाहती तो समीर का हाथ हटा सकती थी। पर मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।

जब समीर ने देखा की मैं उसके स्पर्श पर कोई विरोध नहीं कर रही हूँ तो उन्होंने पहली बार स्पष्ट रूप से मेरे स्तनों को अपनी हथेली में थोड़े दबाये। पुरे बदन में उठी मेरी कम्पन शायद समीर ने भी महसूस की। मैं समीर के सर पर झुकी और मेरे स्तनों को मैंने समीर के नाक पर रगड़ा। अनजानेमें (क्या वाकई में? या फिर जान बूझकर?) ही मैंने समीर को यह संकेत किया की मैं भी चाहती थी की वह मेरे स्तनों को स्पर्श करे।

समीर ने अपना सर थोड़ा उठाया और मेरे होंठों को अपने होंठों पर दबा दिए। दूसरी बार समीर मुझे चुम्बन करने की चेष्टा कर रहे थे। पर इस बार मैंने मेरे होठों को समीर के होंठों पर चिपका दिए और पूरी उत्कटता पूर्वक मैंने समीर के चुम्बन को अपनी सकारात्मक सहमति दे डाली। उतना ही नहीं, जब समीर ने अपनी जीभ मेरे मुंह में डाली तो मैंने उसे चूसना शुरू किया। मैं समीर को उस समय कोई नकारात्मक संकेत देने की स्थिति में थी ही नहीं। तब मैं भी समीर के मुंह में अपनी जीभ डालकर उनके मुंह में अपनी लार छोड़ रही थी जिसे समीर ने लपक कर चूसना शुरू कर दिया। अब समीर और मैं एकदूसरे के बाहुपाश में बंध चुके थे और एक दूसरे को पुरे उन्माद से चुम्बन कर रहे थे।

हमारे बीच की मर्यादाओंकी दिवार जैसे ढहनी शुरू हो चुकी थी। अबतक समीर मुझे पुरे सम्मान पूर्वक “डॉली भाभी जान” के नामसे सम्बोधित कर रहे थे और मैं उन्हें कभी समीर तो कभी समीर भाई साब कहती थी। अब समीर ने मुझे चूमते चूमते बीचमें “डॉली, प्यारी डॉली, डार्लिंग तुम्हारे होंठ कितने रसीली और सुन्दर हैं। तुम कितनी प्यारी और सेक्सी हो।” इत्यादि कहना शुरू कर दिया और एक हाथ से मेरे स्तनों के उभार को अपने हाथों और उँगलियों में बड़े प्यार से अनुभव करना और उनको हलके से दबाना शुरू किया।

मेरे जहन में एक बात आयी। प्यार और सम्मान में कितना अंतर है? सम्मान में अपनापन नहीं होता। सम्मान में एक दुरी होती है। प्यार मेंअपनापन होता है। इंसान प्यार में सबकुछ दाँव पर लगा सकता है। पर सम्मान में जो कुछ अपनी मर्यादामें रहकर हो सकता है वह ही करता है। प्यार में “आप” का प्रयोग आवश्यक नहीं। अक्सर प्यार में “आप”, “तुम” अथवा “तू” में बदल जाता है। अब समीर के मन में मेरे लिए और मेरे मन में समीर के लिए एक अपना पन, एक प्यार पैदा हो गया था। जिसमें एक दूसरे के प्रति सम्मान तो था ही पर उसे बाहर से दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। हो सकता है उसका मुख्य हेतु अपनी शारीरिक भूख मिटाने का ही क्यों न हो। आखिर पति बीबी के रिश्ते की नींव भी तो जातीय कामुकता पर ही खड़ी है न?

 
मुझे ऐसा लगा जैसे हमारे बीच की दूरियां उस समय ख़त्म होने जा रहीथी। समीर मुझे अपनी समझ ने लगे थे। मुझे भी अब समीर पर एक तरह का ममत्व और अधिकार का अनुभव होने लगा था। मैंने समीर की प्यासी आँखों में झांका। अब मेरे लिए समीर कोई पराये नहीं रहे थे। मुझे उनकी प्यास बुझानी थी। समीर की प्यास बुझाने पर मेरी प्यास भी तो बुझनी ही थी। यही तो प्यार का दस्तूर है न?

मैंने समीर का हाथ मेरे हाथों में लिया और बड़े प्यार से मेरी गाउन की ज़िप पर रख दिया। मैंने समीर को अपनी दुविधा में से मुक्त किया। समीर ने धीरे से ज़िप का लीवर निचा किया तो मेरे दो पके बड़े फलों के समान स्तन युगल गाउन के आवरण से मुक्त हो कर समीर की आँखों के सामने लहराने लगे। समीर की लोलूप आँखें मेरे चुचियोंको लहराते देख अधिरी लग रही थी। अपने दोनों हाथों में मेरी चूचियों को पकड़ा और उन्हें अपने हाथों में जैसे उनका वजन भाँप रहें हो ऐसे उठा रहे थे।

मेरी लंबी निप्पले कपडे टांगने के हुक की तरह कड़क खड़ी हो गयी थीं। समीर की आँखें उन पर गड़ी हुई थीं। धीरे से समीर ने अपनी दो उँगलियों के बीच मेरी एक निप्पल को दबाना और खेलना शुरू किया। क्या उसे पता था की मेरे स्तनों के स्पर्श मात्र से मैं अपना आपा खो बैठती थी? समीर ने मेरे दोनों स्तनों को आपस में एकदूसरे से साथ जोर से दबाये और उनसे प्यार से खेलने लगे। मुझसे रहा नहीं जारहा था। मेरे स्तनों के स्पर्श से मेरे पुरे बदन में एक तरह का अनोखा अंतःर्स्राव बह रहा था, जिसकी प्रतीति मुझे मेरे पॉंवों के बीचमें हो रही थी। मेरी योनि में से जैसे झरना बह रहा हो ऐसे उत्तेजना के मारे श्राव होने लगा जिसे मुझे छुपाने के लिए परिश्रम करना पड़ रहा था।

समीर ने मुझे अपनी गोद में ऐसे बिठाया जिससे मेरी पीठ समीर की छाती पर हो। उसके दोनों हाथ मेरी बगल में से होते हुए मेर स्तनों को पकडे हुए थे। मैं अपने कूल्हें में समीर के लन्ड की ठोकर अनुभव कर रही थी। बेचारा समीर के पाजामें में से बाहर निकलने के लिए कूद रहा था।

समीर ने अपना सर मेरे कन्धों पर रखा। वह जैसे मेरे कन्धों को चूमने की कोशिश कर रहा था। उसने पूछा, “डॉली, सच बोलो, क्या तुम मुझको पसंद करती हो?”

मुझे समझ नहींआया क्या जवाब दूँ। एक मर्द की गोद में एक स्त्री अगर आधी नंगी बैठकर उससे अपने मम्मों को मसलवाती है तो फिर यह कैसा सवाल हुआ? साफ़ है की वह न सिर्फ उसे पसंद करती है पर उससे चुदवाने के लिए भी तैयार ही होगी न?

मेरा मन तो किया की मैं लपक कर बोलूं की, “नहीं, मैं तो तुमसे नफ़रत करती हूँ, पर बस मुझे ज़रा खुजली हो रही थी इस लिए मैंने तुमसे मेरी चूचियों को खुजलाने को कहा।” पर मैं जानती थी की उस नाजुक घडी में उसके मन में अजीबो गरीब उथल पुथल चल रही होगी। चूँकि मैं पहले समीर की बाहोँ में से एकबार निकल भागी थी इसी लिए शायद उसे डर था की कहीं मैं उठ कर बिस्तर से भाग न जाऊं। समीर को शायद पता नहीं था की इस नाजुक समय में वह क्या बोले।

मैंने अपना सर हिलाकर हाँ का इशारा किया और कहा, “समीर, तुम एक बहोत अच्छे और बहोत समझदार इंसान हो और मैं तुम्हें बहोत पसंद भी करती हूँ। पर शायद हम जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं है। हमें यह सब नहीं करना चाहिए। यह गलत है।” यह कहते हुए मैं बिस्तर में से उठने की कोशिश करने लगी।

पर उस समय सच तो यह था की मैं अपने बोले हुए शब्दों पर पछता रही थी। मैं चाहती थी की समीर मुझे रोके और जकड कर जाने न दे। और हुआ भी कुछ ऐसा ही। जब मैं उठने लगी तब समीर ने उस रात पहली बार मुझे कस के अपनी बाहों में जकड लिया और मेरे मम्मों को जोर जोर से दबाने लगा और बोला, “यह तुम क्या कह रही हो। यह गलत कैसे है? क्या तुम नहीं जानती की यही तुम्हारा पति राज चाहता है? मैंने कुछ दिन पहले तुम्हें इशारे इशारे में यह बताया था न की तुम्हारे पति राज की इच्छा है की हम दोनों पति तुम और रुखसार को अपनी बीबी जैसे समझें? वैसे ही राज ने क्या तुम्हे नहीं कहा की तुम और रुखसार हम दोनों को अपने पति समझो? क्या तुम नहीं जानती की राज और मैं मिलकर रुखसार के साथ सेक्स कर चुके हैं? क्या तुम जानती हो की तुम्हारा पति और मेरी बीबी एकदूसरे के शयन साथी हो चुके हैं? वह एक दूसरे के साथ सो चुके हैं?” समीर ने जो प्रश्नों की झड़ी लगा दी तो मैं तो बस सुनती ही गयी और वहां जैसे ठिठक गयी और उठ ही न सकी और समीर के बोलने का इन्तेजार करने लगी।

 
हालांकि मुझे पूरा अंदेशा तो था की उस समय तक मेरा पति रुखसार को चोद चूका था। मेरे पतिके और रुखसार के वर्तन से मुझे साफ़ नजर आ तो रहा था; पर मेरा मन यह मानने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। मैं रुक गयी। जाने अनजाने मैं में बिस्तर में आ गयी और थोड़ा सा पलट कर समीर के सामने अपना चेहरा कर प्रश्नात्मक दृष्टि से समीर की और देखने लगी। समीर ने मेरी और देखा और फिर धीरे से बोले, “विश्वास नहीं होता? अब मैं तुम्हें स्पष्ट रूप से बताता हूँ की तुम्हारे पति राज और मैंने मिलकर रुखसार को थोड़ी शराब पिलाकर और काफी मशक्कत करके पटा लिया और हमारे साथ मैथुन के लिए राजी कर लिया। होली की रात को जब तुम दिल्ही गयी थीं तब हम तीनों ने मिलकर आपके घर में इसी पलंग पर खूब सेक्स किया था।”

उस समय मैं कुछ बोलने के लायक ही नहीं रही। मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। पर मेरे मन का एक कोना जैसे टूट गया। यही बात अगर मेरे पति मुझसे कहते तो मुझे इतना बुरा न लगता। हाँ, राज ने मुझे अश्पष्ट रूप से तो कह ही दिया था की मुझे समीर के साथ संभोग करना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ की जब वह रुखसार को चोद ही चुका था तो भला वह मुझे कैसे मना कर सकता था? उस दिन रुखसार ने भी जरूर बातों बातों में इसका संकेत मुझे दे दिया था।

उस समय मैं रुखसार को साफ़ साफ़ पूछ न सकी की क्या वह मेरे पति से चुद चुकी थी? अगर मैं पूछ ने की हिम्मत न रख पायी तो रुखसार मुझे वह बताने की हिम्मत कैसे जुटा पाती?

मेरे मष्तिष्क में जैसे तूफ़ान सा उठ रहा था। क्या समीर मुझे कही फुसलाने के लिए तो यह कहानी नहीं बना रहे थे? मैं जानती थी की समीर सच बोल रहे थे। ऐसी बातों में झूठनहीं बोला जाता अथवा मजाक भी नहीं किया जाता। पर फिर भी मेरा मन मान नहीं रहा था।

मैंने झिझकते हुए पूछ ही लिया, “समीर क्या तुम सच कह रहे हो?”

समीर ने कहा, “मुझे जो कहना था कह दिया, अब आगे तुम सोचो की क्या मैं सच कह रहा हूं या झूठ।” मैं जानती थी की समीर शत प्रतिशत सच बोल रहा था। मैंने तब समीर से पूछा, “क्या तुम मुझे पसंद करते हो?”

समीर मुंह बनाते पूछा, “अब ताने मारने की बारी मेरी है। भाई अगर कोई मर्द आपके स्तनोँ को जोर से दबाये और आपको प्यार भरा चुम्बन करके अपनी इच्छा जताए तो क्या उसे ऐसा सवाल पूछना चाहिए?”

समीर ने तुरन्त ही अपनी पतलून खोली और नीचे खिसका दी। उसने अपने लन्ड को अपनी नीकर से बाहर निकाला और मेरे हाथ में अपना मोटा, लंबा और तना हुआ लन्ड थमा दिया और बोला, “क्या तुम्हें मैं पसंद करता हूँ ऐसा इसे पकड़ने से लगता है?”

समीर के इस अचानक कदम से मैं एकदम सहम गयी। पर क्या करती? मैं अनायास ही मेरे हाथमें आया हुआ समीर का लन्ड सहलाने लगी। वास्तव में उसका लन्ड ऐसे खड़ा हुआ था जैसे एक सैनिक “अटेंशन” का आर्डर सुनकर खड़ा होता है। उसका लन्ड न सिर्फ लंबा और काफी मोटा था बल्कि एकदम कड़ा जैसे कोई लोहे की छड़ हो। और वह ऊपर की और मेरी तरफ देख रहा था जैसे वह मुझे रिझाने के लिए बिनती कर रहा हो।

समीर का लन्ड चिकनाई से लथपथ था। उसका पूर्वद्रव्य धीरे धीरे उसके लन्ड के छिद्र में से निकल कर उसके लन्ड के पुरे घिराव में फ़ैल रहा था। जैसे ही मेरी उंगलियां उसको सहलाने लगीं तो उसके लन्ड के छिद्र में से तो जैसे धारा ही निकल ने लगी। मैंने उसे थोड़े जोर से सहलाना शुरू किया तो समीर के मुंह से “आह..;” निकल पड़ी। मैंने समीर के अंडकोषों को प्यार से सहलाया और मेरी उँगलियों से उसे मैं बड़ी नजाकत से मालिश करने लगी और हलके से दबा कर उसे प्यार से हिलाने लगी।

“समीर मैं एक बात पूछूँ? क्या तुम मुझे सच बताओगे?” मैंने पूछा।

“कहो, मैं सच बताऊंगा।” समीर ने कहा।

“तुम्हारी वाइफ रुखसार से अगर मेरे पति ने सेक्स कर ही लिया है, तो फिर हम क्यों इतना परेशान हो रहे हैं? उनको मज़े करने दो। राज रुखसार पर चढ़ा था तो फिर हम मज़े क्यों न करें? मैं भी तुम्हारे लिए उसी दिन से तैयार थी जिस दिन तुम और मैं मेरे बाथरूम में नलका ठीक कर रहे थे। मैंने उस दिन तुम्हारा उठा हुआ लिंग तुम्हारी निकर में देखा था। अगर उस दिन तुम मुझे पकड़ लेते और कुछ भी करते तो मैं तैयार थी। राज मुझे कई दिनों से उकसा रहे थे मैं भी एक नए पुरुष का मझा लूँ। पर मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी।”

 
समीर मेरी बात ध्यान से सुन रहे थे। उसने थोड़ी झिझक के साथ मुझे पूछा, “क्या मैं एक बात कहूँ? देखो अब हमारा संबंध देवर भाभी जान से आगे निकल चूका है। अब एक दूसरे से फालतू की शर्म रखनी नहीं चाहिए। अब तुम सेक्स, साथ में सोना, लिंग जैसे सभ्य शब्दों का प्रयोग छोडो और चोदना, लन्ड, फुद्दी जैसे शब्द, जो की बिलकुल सही हैं उसे प्रयोग करो।

मैंने समीर के साथ सहमति जताते हुए कहा, “ठीक है बाबा, राज भी मुझे यही कहता है। पर मुझे थोड़ा समय दो। पहले यह बताओ सच में की क्या वाकई तुमने और मेरे पति ने मिलकर रुखसार के साथ सेक्स लिया था?”

तब मेरे पीछे से दो बाहों ने मुझे रजाई के अंदर खिंच कर जकड लिया। मैं इस अचानक आक्रमण से चौंक गयी। समीर तो मेरे सामने कभी मेरे स्तनोँ को तो कभी मेरे मुख को प्यार से निहार रहे थे। उनका एक हाथ मेरी छाती पर और दुसरा हाथ मेरे मस्तिष्क पर था। इसका अर्थ साफ़ था की एक और व्यक्ति मेरे पीछे हमारे बिस्तर में रजाई में घुस गया था। विशाल भुजाओँ और खिंचनेकी ताकत से यह स्पष्ट था की वह कोई पुरुष ही था। मुझे अपनी बाहोंमें कस पर अपने बदन से दबाकर उसने पीछेसे ही मेरे बदन को चूमना शुरू किया।

पर मैं भी ज्यादा देर असमंजस में न रही। मेरे पति के बदन की सुगंध मैं भली भाँती जानती थी। जैसे कोई शेर ने हिरनी को दबोच कर अपने पंजों में जकड रखा हो ऐसे हालात में मैं दबोचे हुए ही बिना मुड़े बोली, “डार्लिंग मैं तुम्हारे शरीर की गंध से पूरी तरह वाकिफ हूँ। मैं जानती हूँ की यह तुम मेरे पति राज ही हो।”

राज ने मेरी पकड़ ढीली की और पीछे से ही मेरे कान में बोला, “जानूँ, समीर सच कह रहा है।

मैं बड़ी ही दुविधा में पड़ गयी। यह सब क्या हो रहा था? मेरा पति तो उस समय ट्रैन में होना चाहिए था। वह कहाँ से मेरे और समीर के बीच आ टपका। कहीं वह मेरी जासूसी तो नहीं कर रहा था? मुझे लगा की मैं तो रँगे हाथोँ पकड़ी ही गयी। समीर के साथ एक ही बिस्तर पर अर्ध नग्नावस्था में सोना, मेरी स्थिति को भली भाँती प्रकट कर रहा था। इसको समझाना अथवा अपना बचाव करना नामुमकिन था। पर मुझे गुनहगार के कटघरे में खड़ा करने के बजाय मेरा पति तो अपना गुनाह कुबूल कर रहा था। मेरी जान में जान आयी। गुनहगार मैं अकेली नहीं थी। मैं तो गुनाह करने वाली थी पर मेरे पति तो गुनाह कर चुके थे।

राज ने मुझे उसी हालात में अपनी बॉहों में जकड़े हुए रखते कहा, “डार्लिंग, समीर जो कह रहा है वह सच है। आज मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ। तुम चाहो वह सजा मुझे दे सकती हो। यह सच है की समीर और मैंने मिलकर रुखसार भाभी जान से जमकर प्यार भरा सेक्स किया है। और मैं चाहता हूँ की आज तुम भी हम दोनों से जम कर सेक्स का पूरा आनंद लो। मैंने तुम्हें जरूर इसके बारेमें स्पष्ट रूप से नहीं बताया, परंतु मैंने तुम्हें आगाह जरूर किया था। फिर भी अगर मुझे तुम सजा दोगी तो मुझे मंजूर है। यदि तुम कहोगी तो मैं आगे से कभी भी रुखसार से नहीं मिलूंगा। यदि तुम कहोगी तो मैं समीर और रुखसार से रिश्ता तोड़ दूंगा। मेरे लिए तुम सबकुछ हो।”

ऐसे कहते हुए मेरे पति भावुक हो गए और उनकी आँखों में आंसू आ गये। मैं एक अजीब दुविधा में फंसी हुई थी। मैं क्या बोलती? एक और मैं स्वयं गुनहगार थी, पर मुझे दोष देने के बजाय मेरे पति अपने आप को गुनहगार बतला रहे थे। हालांकि मेरे पति की इन गतिविधियों से भलीभाँती वाकिफ थी। भला इस हालात मैं एक बीबी क्या कर सकती थी?

 
राज ने मुझे उसी हालात में अपनी बॉहों में जकड़े हुए रखते कहा, “डार्लिंग, समीर जो कह रहा है वह सच है। आज मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ। तुम चाहो वह सजा मुझे दे सकती हो। यह सच है की समीर और मैंने मिलकर रुखसार भाभी जान से जमकर प्यार भरा सेक्स किया है। और मैं चाहता हूँ की आज तुम भी हम दोनों से जम कर सेक्स का पूरा आनंद लो। मैंने तुम्हें जरूर इसके बारेमें स्पष्ट रूप से नहीं बताया, परंतु मैंने तुम्हें आगाह जरूर किया था। फिर भी अगर मुझे तुम सजा दोगी तो मुझे मंजूर है। यदि तुम कहोगी तो मैं आगे से कभी भी रुखसार से नहीं मिलूंगा। यदि तुम कहोगी तो मैं समीर और रुखसार से रिश्ता तोड़ दूंगा। मेरे लिए तुम सबकुछ हो।”

ऐसे कहते हुए मेरे पति भावुक हो गए और उनकी आँखों में आंसू आ गये। मैं एक अजीब दुविधा में फंसी हुई थी। मैं क्या बोलती? एक और मैं स्वयं गुनहगार थी, पर मुझे दोष देने के बजाय मेरे पति अपने आप को गुनहगार बतला रहे थे। हालांकि मेरे पति की इन गतिविधियों से भलीभाँती वाकिफ थी। भला इस हालात मैं एक बीबी क्या कर सकती थी?

मुझसे मेरे पति की आँखों में आंसू देखे नहीं गए। मैं अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पायी और एकदम रो पड़ी। उस समय मैं इतना रोई की शायद मेरी युवावस्था में विदाई के समय ही मैं उतना रोई थी। मैंने मेरे पति राज को गले लगा लिया और रोते रोते कहा, “डार्लिंग, तुम मेरे सर्वश्व हो। मैं तुम्हारे बगैर अधूरी हूँ। मुझे तुम अति प्रिय हो। तुमने कुछ भी गलत नहीं किया। जो भी किया वह ठीक किया। मैं तो तुम्हारा आधा अंग हूँ। यदि तुम गलत तो मैं गलत। बल्कि मैं अभी अभी समीर के साथ कुछ गलत करने वाली थी. मैं तुम्हारी गुनहगार हूँ।”

मेरी बात सुनकर राज के चेहरे से मायूसी हट गयी और एक अजीब सी शरारत छा गयी। राज अनायास ही मुस्कुराये और बोले, “मेरी भोली पागल बीबी। तुम इतनी परेशान मत हो। मैं हमारे वैवाहिक जीवन में नवीनीकरण लाना चाहता हूँ। जो तुमने समीर के साथ किया वह कुछ भी नहीं है। मैं चाहता हूँ की आज तुम न सिर्फ समीर के साथ परंतु हम दोनों के साथ कस कर, पुरे जोश के साथ सम्भोग करो। डार्लिंग, मैं तुम्हें सच कहूँ? मैं तुम्हें समीर के साथ मिलकर रात भर चोदना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ की तुम आज शर्म और लाज के सारे बंधन तोड़कर हम दोनों को उच्छृंखल हो कर चोदो और हम दोनों से स्वच्छन्दता से चुद्वाओ।

मेरे पति की बात सुनकर मेरे पुरे बदन में एक आग से दौड़ गयी। मेरी काम वासना एकदम से मेरे पुरे बदन में फैलने लगी। मैं हकीकत में समीर से चुदवाना चाहती थी। मेरे पति ने आज न सिर्फ खुली छूट देदी, बल्कि वह भी मेरे साथ शामिल हो गए। मेरी शादी के बाद मन ही मन में बड़ी इच्छा थी की मैं कभी दो मर्दों से चुदवाऊँ। पर लाज और शर्म के अलावा यह बात नामुमकिन थी। पर आज वह मेरी मन की एक विलक्षण कल्पना सच में बदलती नजर आ रही थी।

मै अपने पति राज की बाहोंमें सिमट कर अपनी आँखें झुका कर बोली, “जानूँ मैं तुम्हारी अर्धांगिनी और सह भागिनी हूँ। तुम्हारी इच्छा मेरे लिए आज्ञा के समान है।” वक्त आ गया था की मैं अब सारे सामाजिक बंधनों को दूर दूर फैंक कर वह करूँ जो मेरा मन चाहता है और मेरे पति की इच्छा भी पूरी करूँ। मैं अपने पति को देखने लगी। उनकी आँखों में एक अजीब सा नशा था। मुझे समीर के साथ एक बिस्तर में देख उनको जलन नहीं बल्कि एक तरह की उत्तेजना हो रही थी ऐसा मुझे लगा।

मेरे पति राज ने पलट कर एक झटके में मेरी रजाई को मेरे और समीर के ऊपर से हटा दिया। मेरे स्तन खुले हुए थे और मेरी निप्पले ऐसी तनी हुई थी जैसे धनुष्य में तीर कसके रखा हो। राज ने मेरे एक स्तनको अपनी हथेली में उठाया और समीर की और देखा और बोला, “समीर, दोस्त, मेरी बीबी की चूंचियां भी रुखसार की चूँचियों से कोई कम नहीं हैं। आओ और खुद अनुभव करो।”

समीर हमारे संवाद सुन रहा था। कुछ जिझक और कुछ शर्म के मारे डरते डरते थोड़ा खिसक कर और मेरे दूसरे स्तन पर हलके से हाथ फिराते हुए मेरी निप्पल को अपनी उँगलियों से दबाता हुआ एकदम धीमी आवाज में बोला, बोला, “डॉली वास्तव में तुम्हारे स्तन बहुत सुन्दर और सेक्सी हैं। मेरा मन करता है की मैं इन्हें चूमता और चूसता ही रहूँ।”

न जाने कहाँ से मेरी जबान फिसल गयी और मैं बोल पड़ी, “तो समीर, तुम्हें रोका किसने है?”

बस मेरा इतना ही बोलना था की मेरे दोनों प्रेमी एकदम मुझ पर टूट पड़े। मेरे एक स्तन को समीर और दूसरे को राज जैसे कोई आम चूस रहे हों ऐसे चूसने लगे। मेरे स्तन मेरी बहोत बड़ी कमजोरी है। जब मेरी बेटी भी मेरा स्तन पान करती थी तो मेरी टाँगों के बीच से झरना बहने लगता था। कही भूल से भी बस या ट्रैन में सफर करते हुए या कोई भीड़ वाले इलाके में गुजरते हुए यदि किसी का हाथ मेरे स्तन को छू जाए तो मैं बड़ी विचलित हो जाती थी।

मेरे पुरे बदन में काम की ज्वाला भड़कने लगी। इतेने दिनों की दबी वासना पुरे शरीर में फ़ैल रही थी और अब चूँकि मेरे पति ने भी मुझे पूरी छूट दे छूट दे दी थी जिससे तो मैं जैसे नियत्रण विहीन हो गयी थी। एक वाहन जैसे चालक के नियत्रण से बाहर हो जाए तो रास्ते पर स्वच्छंदता पूर्वक दौड़ने लगता है वैसे ही मेरा हाल था। मेरा मन मेरे नियत्रण के परे हो गया था।

मैने मेरे दोनों प्रेमियों के सर मेरे दोनों बाहों में लिए प्यार से अपने कन्धों पर टिकाकर उन्हें प्यारसे चूमने लगी। मुझे पता नहीं क्या हो रहा था। मैं उस समय अर्ध नग्नावस्था में थी। मेरे परिपक्व लहराते हुए स्तन मेरे दोनों प्रेमियों के हाथों में थे और वह मेरे स्तनों को जोश खरोश से मसल रहे थे।

सामान्यतः हम बीबियों को अपने पति, अपने बच्चों और समाज से अपनी मर्यादा बना कर रखनी पड़ती ही जिससे की हमारे चरित्र पर कोई लांछन न लगे। पर यहां ऐसा कोई भय नहीं था। मेरा पति खुद मुझे किसी और पुरुष से चुदवाने के लिए उकसा रहा था, मेरी छोटी सी बच्ची गहरी नींद में सोई हुई थी और जब मेरा पति ही मेरी ढाल बना हुआ था तो फिर समाज को क्या पता लगना था?

वक्त आगया था की मैं भी अपनी हवस को संतृप्त करूँ। मैंने मेरे दिमाग से सारे असमंजस और दुविधाओं को उखाड़ फेंका और मैं निःसंकोच होगयी। मैंने मेरे पति की नाक पकड़ी और बोली, “डार्लिंग, मुझे यह बताओ की तुम तो टूर पर जा रहे थे और यहां कैसे पहुँच गए? क्या तुम मेरी जासूसी कर रहे थे?”

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब मेरे पति राज ठहाका लगा कर हंस पड़े और बोले, “अरे मेरी नासमझ बीबी, क्या अभी भी नहीं समझी? यह मेरा प्लान था। मैं जान गया था की तुम समीर से आकर्षित तो थी पर लाज और मर्यादा के कारण उसे आगे बढ़ने नहीं दे रही थी। और समीर तो खैर तुम्हारे पीछे पागल था ही। मैं स्वीकार करता हूँ की मैं रुखसार की और आकर्षित था।”

 
मैंने मेरे पति की बात को काटते हुए कहा, “साफ़ साफ़ कहो न की तुम रुखसार को चोदना चाहते थे? तुम्हारा उल्लू सीधा करने के लिए तुमने समीर को मेरे करीब आने का खुला मौक़ा दिया ताकि समीर तुम्हें रुखसार से करीबी बढ़ाने का मौक़ा दे? और मैं यह समझ गयी हूँ की तुमने और समीर ने मिलकर मेरी प्यारी सखी रुखसार को आखिर चोद ही डाला। और यह सब शायद होली की रात को हुआ। सही या गलत?”

मेरे पति की जबान पर तो जैसे ताला लग गया। मेरे सवाल का जवाब देने में मेरे पति की जबान लड़खड़ाने लगी तब मैं ठहाका मारते हुए हंस पड़ी और बोली, “पकड़ लिया न तुम दोनों को? तुम मर्द लोग सोचते हो हम औरतें मंद बुद्धि हैं और तुम्हारी चाल समझ नहीं सकते। अरे हम सब समझते हैं। पर यह गनीमत समझो की तुम इतने सारे हथकंडे अपनाते हो फिर भी हम तुम लोगों को तहे दिल से प्यार करते हैं क्योंकि हम जानते है की मर्द जात बन्दर की तरह होती हैं।

कोई सुन्दर बंदरिया जैसे देखि तो वह कूदने लगते हैं और उस से छेड़ छाड़ करने में और उस को चोदने के लिए उतावले हो जाते हैं। पर जैसे ही वह बंदरिया उसे लात मारती है तो वह फिर कूदते नाचते अपनी बीबी के पास वापस ही आते हैं, और फिर उससे प्यार जता ने लगते हैं। हाँ कभी कभी कोई भोली बंदरिया फँस भी जाती है, जैसे रुखसार और मैं फँस गए हैं तुम दोनों बंदरों की जाल मैं।”

मैंने देखा तो मेरे पति राज और समीर दोनों के मुंह पर हवाइयां उड़ रही थीं। इनके मुंह खुले के खुले रह गए। वह कुछ बोल न पाए। तब मैंने मेरे पति को कोहनी मार कर कहा, “अरे भाई जो हुआ सो हुआ। अब जो तुमने शुरू किया है उसे पूरा भी करो।”

मेरे दो प्रेमियों के हाल देख मुझे बड़ी हँसी आ रही थी। पर सच तो यह था की मैं उस हालात में दो लन्ड से चुदवाने के लियी बेताब हो रही थी। मैंने सोचा नहीं था की जिंदगी में कभी ऐसा मौक़ा मिलेगा जब मैं एकसाथ दो लन्ड से चुदवाऊँगी। मैंने पैर पति की कमर में हाथ डाल कर उनके पाजामे का नाडा खोल दिया और उनका लन्ड अपने हाथ में लिया। उस समय मैं बेबाक हो कर मेरे दोनों प्रेमियों से चुदने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो चुकी थी। अब मुझे किसीसे कुछ भी छुपाने की आवश्यकता नहीं थी। दूसरे हाथ से मैंने समीर के पाजामे का नाडा भी खोल डाला।

मेरे पति का लन्ड तब कडा नहीं हुआ था पर समीर का लन्ड तो देखते ही बनता था। समीर का लन्ड एकदम “अटेंशन” हो कर अकड़ा हुआ था। उसके छिद्र से धीरे धीरे उसका पूर्व रस झर रहा था और उसके खड़े सख्त लन्ड पर फ़ैल रहा था। मैंने समीर के लन्ड को धीरे से अपनी उँगलियों से सहलाना शुरू किया और उसका पूर्व रस उसके पुरे लन्ड पर फैलाने लगी। तो समीर के मुंह से एक सिसकारी सी निकल गयी।

मैं अपनी पीठ पैर लेटी हुई थी। मेरे पति राज ने मेरे नाइट गाउन को नीचे खिसकाया। मैंने मेरे कूल्हे ऊपर किये ताकि वह उसे नीचे से खिसका कर निकाल सके।

मैंने समीर के लन्ड की चमडी को अपनी उँगलियों में कस के दबाया और उस चमड़ी के साथ मैं अपनी उँगलियों से समीर के लन्ड को धीरे प्यार से सहलाने लगी। समीर उत्तेजना से बल खाने लगे। मैं समझ गयी की समीर की यह कमजोरी थी।

समीर ने धीरे से अपना पजामा नीचे उतार दिया और मेरे सामने नंग धड़ंग हो गया। राज ने भी अपना पजामा उतार दिया और हम तीनों सम्पूर्ण रूप से निर्वस्त्र नग्नावस्था में थे। मैं मेरे जीवन में पहली बार मेरे पति के सिवाय किसी और मर्द के सामने नग्नावस्था में उपस्थित थी। मुझे काफी विचित्र तो लगा पर जो होना था वह तो हो गया अब शर्म क्या और लाज क्या।

मेरा पति पीछे से धक्के मार कर अपना लन्ड मेरे पिछवाड़े में घुसेड़नेकी कोशिश में लगे हुए थे और मेरे पोगुमल समीर मेरे सामने बुध्धु की तरह मेरे पहल करने का इन्तेजार कर रहे थे। राज ने जब यह महसूस किया की समीर शायद राज की उपस्थिति के कारण थोड़ा झिझक रहे थे तो वह पलंग पर तकिये को पीठ पीछे दबाकर बैठ गए और मुझे खींचकर अपनी दो टाँगों बीच में बिठा दिया। एक झटका देकर राज ने हम सबको ढँक रही रजाई को एक और फेंक दिया। अब हमारे ऊपर कोई आवरण नहीं था। मेरे पति का मोटा कड़ा लन्ड मेरी गाँड़ की दरार पर टक्कर मार रहा था।

मैं मेरे पति की गोद में बड़े ही असमंजस में थी पर बदन की कामुकता के वशीभूत, समीर के आगे बढ़कर मेरी चूँचियों को दबाने का इन्तेजार करने लगी। तब भी समीर की हिचकिचाहट दूर नहीं हो रही थी। एक बार मेरे स्तनों का अनुभव करने के बाद भी वह मेरे गुप्त अंगों को छूने में झिझक रहे थे, क्योंकि मैं तब मेरे पति गोद मैं थी। जब राज ने समीर को हिचकिचाते हुए देखा तो बोल पड़ा, “कैसा इंसान हे तू यार। इतना मत सोचा कर।”

राज ने समीर का हाथ पकड़ा और उसे खिंच कर मेरे स्तनों पर रख दिया। समीर के मेरे स्तनों के छूटे ही मैं पगला सी गयी और मेरे मुंह से एक सिसकारी निकल गयी। मेरे पुरे बदन में कामुकता की ज्वाला भड़क उठी। मेरे पाँवों के बीच में से मेरे स्त्री रस की धार बहने लगी।

 
मैं मेरे पति की गोद में बड़े ही असमंजस में थी पर बदन की कामुकता के वशीभूत, समीर के आगे बढ़कर मेरी चूँचियों को दबाने का इन्तेजार करने लगी। तब भी समीर की हिचकिचाहट दूर नहीं हो रही थी। एक बार मेरे स्तनों का अनुभव करने के बाद भी वह मेरे गुप्त अंगों को छूने में झिझक रहे थे, क्योंकि मैं तब मेरे पति गोद मैं थी। जब राज ने समीर को हिचकिचाते हुए देखा तो बोल पड़ा, “कैसा इंसान हे तू यार। इतना मत सोचा कर।”

राज ने समीर का हाथ पकड़ा और उसे खिंच कर मेरे स्तनों पर रख दिया। समीर के मेरे स्तनों के छूटे ही मैं पगला सी गयी और मेरे मुंह से एक सिसकारी निकल गयी। मेरे पुरे बदन में कामुकता की ज्वाला भड़क उठी। मेरे पाँवों के बीच में से मेरे स्त्री रस की धार बहने लगी।

समीर को बस इतना ही निमंत्रण चाहये था। समीर की कई महीनों की मेरे बदन की भूख उनके दिमाग पर हावी हो गयी और वह झुक कर मेरी चूँचियों को अपने मुंह में लेकर उन्हें चूमने और चूसने लगे। तब समीर को कोई भी नहीं रोक सकता था। मैं मेरे पति की गोद में आधी लेटी हुई आधी बैठी हुई थी। मेरे पति भी पलंग के सिरहाने पर आधे बैठे आधे लेटे हुए थे और समीर मेरी छाती में अपना मुंह लगा कर नंग धड़ंग अपने लन्ड को गद्दी पर रगड़ते हुए और उनकी सुन्दर गठीली गाँड़ साफ़ साफ दिखाते हुए मेरे स्तनों को एक के बाद एक चूस रहे थे। उन्हों ने अपने दोनों हाथों से मेरी कमर को जकड रखा था।

एक हाथ से मैं समीर के घने बाल को सहला रही थी। दुसरा हाथ मैं समीर की पीठ पर फेर रही थी। मेरे पति जैसे समीर की पीठ पर कोई बाल नहीं थे। मुझे समीर की पीठ पर हाथ फिराना अच्छा लग रहा था ।

राज ने समीर का सर अपने हाथों में लिया और उसे ऊपर अपनी और खींचते हुए उसके बालोंको चूमने लगे। इस कारण समीर का मुंह मेरे स्तनों को छोड़ मेरे होंठों पर आ गया। शायद राज समीर और मुझे होंठ से होंठ मिलाकर चूमते हुए देखने चाहते थे। हमारे होंठ मिलने पर समीर ने एक नजर मेरे पति राज कीऔर देखा।

राज ने समीर के सर पर हाथ फिराकर जैसे उन्हें मेरा होंठ चूमने की इजाजत दे दी। मैं तो इन्तेजार ही कर रही थी। समीर के उष्मा भरे होंठ जब मेरे होंठों से मिले तो मेरे दिमाग में बत्तियां जलने लगीं। मैं चाहती थी की समीर मुझे जोश से चूमे। समीर की गरम गरम साँसे मेरे नाक और आँखों पर टकरा रही थी। हमारे होंठ मिलने पर समीर की धड़कन भी बढ़ ही गयी होगी क्योंकि मेरा ह्रदय तो दुगुनी तेजी से धड़क रहा था। मैं समीर की तेज धड़कन मेरी छाती पर अनुभव कर रही थी। समीर भी मेरे ह्रदय की तेज धड़कन का अनुभव कर रहे होंगे।

मेरे पति राज पलंग पर लेटे थे। मैं उनके ऊपर उनकी और और अपनी गांड किये लेटी हुई थी और समीर मेर ऊपर सवार हो रहे थे। मैं उन दो साँडों के बीच में फँसी हुयी थी। नीचे से मेरे पति का लन्ड मेरी गाँड़ को टक्कर मार रहा था तो ऊपर समीर का तना हुआ लन्ड ऐरी जांघों को दबा रहा था। समीर पूरी तरह मेरे ऊपर चढ़ा नहीं था। अगर वह पूरी तरह चढ़ गया होता तो जरूर एक का लन्ड मेरी गांड में तो दूसरे का मेरी फुद्दी में होता। मैंने कभी मेरे पति से अपनी गांड नहीं मरवाई थी। ना ही मुझे गांड में लन्ड डलवाना अच्छा लगता था। पर उस दिन मैं इतनी ज्यादा उत्तेजित थी कीअगर राज मेरी गांड में अपना लन्ड डाल देते तो मैं ले लेती।

समीर के साथ जैसे ही मैं एक गहरे चुम्बन में जुड़ गयी की उनके शरीर के दबाव से मुझे नीचे की और खिसकना पड़ा। मेरा वजन उस समय मेरे पति लन्ड पर पड़ रहा होगा। उनका तना हुआ खड़ा लन्ड मेरी पीठ से रगड़ रहा था। मेरे पति राज ने भी मुझे जगह दी जिससे मैं उनकी गोद में से हट कर बिस्तरे के ऊपर सीधी लेट गयी। समीर ने मुझ पर सवार हो कर अपना चुम्बन जारी रखते हुए अपने हाथोंसे मेरे पुरे नंगे बदन को बड़े प्यार से सहलाने लगे। उनका हाथ मेरे बदन की एक एक गहराईयों को छूने लगा। उनकी उंगलीयाँ मेरी नाभि, मेरी गर्दन, मेरी नाक, मेरी आँखों इत्यादि को प्यार से छूने लगी।

समीर की महीनों की मेरे नग्न बदन को देखने एवं स्पर्श करने की कामना आज पूरी हो रही थी। मैंने मेरे दोनों हाथों में समीरका सर पकड़ा और ताकत से उसे मेरे सर पर दबाया। वह समीर को मेरी उत्कटता दिखाने का एक प्रयास था। समीर के मुंह से मेरे मेरे मुंह में समीर की लार की जैसे धार बह रही थी। मैं समीर की लार को बड़े चाव से निगल रही थी। वहीँ समीर भी मेरी जीभ को चाटकर और चूस कर मेरी लार का आस्वादन ले रहे थे।

 
समीर की महीनों की मेरे नग्न बदन को देखने एवं स्पर्श करने की कामना आज पूरी हो रही थी। मैंने मेरे दोनों हाथों में समीरका सर पकड़ा और ताकत से उसे मेरे सर पर दबाया। वह समीर को मेरी उत्कटता दिखाने का एक प्रयास था। समीर के मुंह से मेरे मेरे मुंह में समीर की लार की जैसे धार बह रही थी। मैं समीर की लार को बड़े चाव से निगल रही थी। वहीँ समीर भी मेरी जीभ को चाटकर और चूस कर मेरी लार का आस्वादन ले रहे थे।

मैंने मेरे एक हाथ में मेरे पति राज का लन्ड पकड़ा और उसे हिलाने लगी। राज भी काफी उत्तेजित हो रहे थे। उनके जीवन की एक इच्छा उस दिन पूरी जो हो रही थी। समीर अपनी जीभ से मेरे बदन को चाटने लगे। उन्होंने पहले मेरे नाक पर अपनी जीभ लगाई और धीरे धीरे मेरे गालों को चाटते हुए वह मेरी गर्दन पहुंच गए। उनका यह कार्यकलाप मुझे उन्मादित करने के लिए पर्याप्त था।

मैंने दूसरे हाथ से समीर का लन्ड पकड़ा। समीर का लन्ड लोहे की छड़ की तरह सख्त हुआ पड़ा था। मैंने समीर के अंडकोष को अपने हाथों में लिया। समीर के अंडकोश बड़े थे। मैंने हलके से उसकी गोलियां दबायीं। मैं उन्हें प्यार से सहलाने और लाड लड़ाने लगी। मैं जानती थी की आदमियों को अपने अंडकोषों को सेहेलवाना बहुत भाता है। राज हमेशा मेरे इस तरह प्यार करने के लिए उत्सुक रहते थे।

मेरी ऐसी प्यारी हरकतों से समीर के लन्ड का तापमान बढ़ता जा रहा था। उस दिन मेरा समीर से चुदना तय था। मेरे पति ही जब मुझे चुदवाने को अधीर हो रहे थे तो भला मैं क्यों पीछे हटती? मैंने उस दिन तक किसी गैर मर्द से चुदवाना तो दूर, किसी गैर मर्द का लन्ड भी नहीं देखा था। हाँ, उस दिन जरूर पानी के फव्वारे में समीर का खड़ा लन्ड उसके कपड़ों की पारदर्शिता के कारण देखा था। उसी लन्ड को मैं प्यार से सहला कर मुझे चोदने के लिए मैं उकसा रही थी। और इस काम में मेरे पति मेरे सहभागी थे। मेरे पति ने मुझे खिसका कर वह एक साइड में लेट गए और मुझे उनके और अपने दोस्त समीर के बीच में लिटा दिया और अपना हाथ लंबा कर मेरी फुद्दी की सपाटी पर प्यार से मसलने लगे।

जब अचानक ही मेरे बैडरूम की बत्ती जल उठी। हम तीनों की आँखें चौंधियाँ गयीं। अचानक ही एकदम करीब से एक स्त्री की आवाज आयी, “यह क्या हो रहा है? डॉली, यह क्या है?”

एक दूसरे से लिपटे हुए हम तीनों चौंक उठे। कुछ देर बाद जब हमारी आँखें तेज रौशनी से ठीक से समायोजित हुई तो हमने रुखसार को पलंग के सिरे पर खड़ा पाया। वह हम तीनों को अर्ध नग्न हालात में सरसरी नजर से देख रही थी। तब भौंचक्का होनी की बारी मेरी थी। उस समय रुखसार तो शहर में थी ही नहीं ऐसा समीर ने कहा था। फिर वह अचानक कैसे प्रकट हुई? मैं अपने आपको इस हालात में मेरी सखी के प्रत्यक्ष होने पर बड़ा सकुचाई।

मैं तो रँगेहाथ पकड़ी गयी थी। पर रुखसार भी तो इन दोनों मर्दों से चुदवा चुकी थी। फिर उसे मुझे लताड़ने का क्या अधिकार था? पर मैं कुछ बोलूं उसके पहले ही रुखसार एक ठहाका मार कर हंसने लगी और आगे बढ़कर मुझसे मेरी उसी अर्ध नग्न अवस्था में ही लिपट गयी और बोली, “वाह, मेरी छोटी बहिन डॉली। आज मैंने अपने पति को माफ़ किया क्योंकि तुझे और तेरी यह कामोद्दीपक कमसिन सुन्दरता देख कर तो मेरा मन भी ललचा गया है।

 
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