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एक नया संसार

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उधर रितू के फार्महाउस पर भी सुबह हो गई थी। अपने कमरे के अटैच बाथरूम में नहाने के बाद रितू कपड़े पहन रही थी जब उसके कमरे का दरवाजा बाहर से कुण्डी के दवारा बजाया गया था। रितू ने पूछा कौन है तो बाहर से नैना की आवाज़ आई थी कि मैं हूॅ बेटा जल्दी से दरवाज़ा खोलो। बस, उसके बाद रितू ने आनन फानन में अपने कपड़े पहने और फिर जाकर कमरे का दरवाज़ा खोला। दरवाज़ा खुलते ही नैना बुवा पर नज़र पड़ी तो वह हल्के से चौंकी।

"क्या बात है बुआ?" रितू ने शशंक भाव से पूछा__"आप इस तरह? सब ठीक तो है न?"

"ये ले।" नैना ने जल्दी से अपना दाहिना हाथ रितू की तरफ बढ़ाया___"ये अख़बार पढ़। इसमें ऐसी ख़बर छपी है छिसे पढ़ कर तेरे होश न उड़ जाएॅ तो कहना।"

"अच्छा।" रितू ने अख़बार अपने हाॅथ में लेते हुए कहा___"भला ऐसी क्या ख़बर छपी है इस अख़बार में जिसे पढ़ने पर मेरे होश ही उड़ जाएॅगे?"

"तू पढ़ तो सही।" नैना कहने के साथ ही दरवाजे के अंदर रितू को खींचते हुए ले आई, बोली___"बताने में वो बात नहीं होगी जितना कि खुद ख़बर पढ़ने से होगी।"

नैना, रितू को खींचते हुए बेड के क़रीब आई और उसमें रितू को बैठा कर खुद भी बैठ गई और रितू के चेहरे के भावों को बारीकी से देखने लगी। रितू ने अख़बार की फ्रंट पेज़ पर छपी ख़बर पर अपनी दृष्टि डाली और ख़बर की हेड लाईन पढ़ते ही वो बुरी तरह उछल पड़ी। अख़बार में छपी ख़बर कुछ इस प्रकार थी।

*शहर के मशहूर कपड़ा ब्यापारी अजय सिंह के मकान से करोड़ों का ग़ैर कानूनी सामान बरामद*

(गुनगुन): हल्दीपुर के रहने वाले ठाकुर अजय सिंह बघेल वल्द गजेन्द्र सिंह बघेल जो कि एक मशहूर कपड़ा ब्यापारी हैं उनके गुनगुन स्थित मकान पर कल शाम को सीबीआई वालों ने छापा मारा। मकान के अंदर से भारी मात्रा में चरस अफीम ड्रग्स आदि जानलेवा चीज़ें सीबीआई के हाथ लगी। ग़ौरतलब बात ये है कि गुनगुन स्थित ठाकुर अजय सिंह का वो मकान कुछ समय से खाली पड़ा था, इस लिए ये स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता कि ग़ैर कानूनी चीज़ों का इतना बड़ा ज़खीरा उनके मकान में कहाॅ से आ गया? ऐसा इस लिए क्योंकि ठाकुर अजय सिंह जैसे मशहूर कारोबारी से ऐसे संगीन धंधे की बात सोची नहीं जा सकती जो कि जुर्म कहलाता है। इस लिए संभव है कि ये सब उनके किसी दुश्मन की सोची समझी साजिश का ही नतीजा हो। ख़ैर, अब देखना ये होगा कि सीबीआई वालों की जाॅच पड़ताड़ से क्या सच्चाई सामने आती है? अब ये तो निश्चित बात है कि ठाकुर अजय सिंह के मकान से मिले इतने सारे ग़र कानूनी सामान के तहत सीबीआई वाले बहुत जल्द ठाकुर अजय सिंह को अपनी हिरासत में लेकर इस बारे में पूछताॅछ करेंगे। किन्तु अगर सीबीआई की जाॅच में ये बात सामने आई कि वो सब ग़ैर कानूनी सामान ठाकुर अजय सिंह का ही है तो यकीनन ठाकुर अजय सिंह को इस संगीन जुर्म में कानून के द्वारा शख्तसे शख्त सज़ा मिलेगी।

अख़बार में छपी इस ख़बर को पढ़ कर यकीनन रितू के होश उड़ ही गए थे। उसके दिमाग़ की बत्ती बड़ी तेज़ी से जली थी और साथ ही उसे विराज की वो बात याद आई जब उसने गुनगुन रेलवे स्टेशन पर रितू से कहा था कि बहुत जल्द अजय सिंह को एक झटका लगने वाला है। ये भी कि उसकी सेफ्टी के लिए वह भी ऐसा करेगा कि अजय सिंह या उसका कोई आदमी उस तक पहुॅच ही नहीं पाएगा।

"इसका मतलब तो यही हुआ बुआ कि अब तक डैड को सीबीआई वाले गिरफ्तार कर लिए होंगे।" रितू ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"और अगर ऐसा हो गया होगा तो यकीनन डैड लम्बे से नप जाएॅगे। एक ही झटके में वो कानून की ऐसी चपेट में आ जाएॅगे जहाॅ से निकल पाना असंभव नहीं तो नामुमकिन ज़रूर है।"

"ये तो अच्छा ही हुआ न रितू।" नैना ने कहा___"बुरे काम करने का ये अंजाम तो होना ही था। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि ये सब हुआ कैसे?

"ये सब राज की वजह से हुआ है बुआ।" रितू ने बताया___"उसने कल रेलवे स्टेशन में मुझसे कहा था कि वो कुछ ऐसा करेगा जिससे डैड मुझ तक पहुॅच ही नहीं पाएॅगे। ये तो सच है बुआ कि डैड ग़ैर कानूनी धंधा करते थे और फैक्ट्री में मौजूद तहखाने में उनका ये सब ग़ैर कानूनी सामान भी था जिसे राज ने ही गायब किया था। ऐसा उसने इस लिए किया था ताकि वह उस सामान के आधार पर जब चाहे डैड को कानून की गिरफ्त में डलवा सके। इस लिए उसने ऐसा ही किया है बुआ लेकिन मुझे लगता है कि ये सब महज डैड को डराने और मौजूदा हालात से निपटने के लिए राज ने किया है। क्योंकि राज उन्हें अपने हाॅथों से उनके अपराधों की सज़ा देगा, नाकि कानून द्वारा उन्हें किसी तरह की सज़ा दिलवाएगा।"

"लेकिन बेटा।" नैना ने तर्क सा दिया___"कानून की चपेट में आने के बाद बड़े भइया भला कानून की गिरफ्त से कैसे बाहर आएॅगे और फिर कैसे राज उन्हें अपने हाॅथों से सज़ा देगा?"

"उसका भी इंतजाम राज ने किया ही होगा बुआ।" रितू ने कहा___"आज के इस अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार ग़ैर कानूनी सामान डैड के मकान से बरामद ज़रूर हुआ है लेकिन ये भी बताया गया है कि चूॅकि गुनगुन स्थित मकान काफी समय से खाली था इस लिए संभव है कि डैड को फॅसाने के लिए उनके किसी दुश्मन ने ऐसा किया होगा। इस लिए सीबीआई वाले इस बारे में सिर्फ पूॅछताछ करेंगे। अब आप खुद समझ सकती हैं बुआ कि राज ने केस को इतना कमज़ोर क्यों बनाया हुआ है कि डैड कानून की गिरफ्त से मामूली पूछताछ के बाद छूट जाएॅ?।"

"लेकिन ये सवाल तो अपनी जगह खड़ा ही रहेगा न रितू कि बड़े भइया के मकान में वो ग़ैर कानूनी सामान कैसे पाया गया?" नैना ने कहा___"इस लिए इस सवाल के साल्व हुए बिना बड़े भइया इस केस से कैसे छूट जाएॅगे भला?"

"बहुत आसान है बुआ।" रितू ने कहा___"पैसों के लिए आजकल लोग बहुत कुछ कर जाते हैं। कहने का मतलब ये कि वो किसी ऐसे ब्यक्ति को ढूॅढ़ लेंगे जो पैसों के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाए। वो ब्यक्ति इस बात को खुद स्वीकार करेगा कि वो सारा ग़ैर कानूनी सामान उसका खुद का है और उसने डैड के मकान में उसे इस लिये छुपाया हुआ था क्योंकि वो मकान काफी समय से खाली था तथा उसके लिए एक सुरक्षित जगह की तरह था।"

"चलो ये तो मान लिया कि ऐसा हो सकता है।" नैना ने मानो तर्क किया___"किन्तु सबसे बड़ा सवाल ये ये है कि तुम्हारे डैड ऐसे किसी ब्यक्ति को लाएॅगे कहाॅ से? जबकि वो खुद ही सीबीआई वालों की निगरानी में रहेंगे और उनके पास किसी से संपर्क स्थापित करने के लिए कीई ज़रिया ही नहीं होगा।"

"सवाल बहुत अच्छा है बुआ।" रितू ने कुछ सोचते हुए कहा__"किन्तु अगर हम ये सोच कर देखें कि ये सब राज का ही किया धरा है तो ये भी निश्चित बात है कि वो खुद ही ऐसा कुछ करेगा जिससे डैड सीबीआई या कानून के चंगुल से बाहर आ जाएॅ।"

"ऐसे मामलों में कानून के चंगुल से किसी का बाहर आ जाना नामुमकिन तो नहीं होता रितू।" नैना ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"किन्तु अगर तू ये कह रही है कि राज तेरे डैड को किसी हैरतअंगेज कारनामे की वजह से बाहर निकाल ही लेगा तो सवाल ये उठता है कि ऐसा क्या करेगा राज? दूसरी बात, जब उसे कानून की गिरफ्त से निकाल ही लेना है तो फिर तेरे डैड की कानून की चपेट में लाने का मतलब ही क्या था?"

"खजूर पर चढ़े इंसान को ज़मीन पर पटकने का मकसद था उसका।" रितू ने कहा___"वो कहते हैं न कि जब तक ऊॅट पहाड़ के सामने नहीं आता तब तक उसे यही लगता है कि उससे ऊॅचा कोई है ही नहीं। यही हाल मेरे डैड का था बुआ। राज का मकसद कदाचित यही है कि वो डैड को एहसास दिलाना चाहता है कि इस दुनियाॅ में उनसे भी बड़े बड़े ख़लीफा मौजूद हैं। वो चाहे तो उन्हें एक पल में चुटकियों में मसल सकता है। आज के इस वाक्ये के बाद संभव है कि डैड की विचारधारा में कुछ तो परिवर्तन ज़रूर आया होगा।"

"ये तो सच कहा तूने।" नैना ने कहा___"अगर सीबीआई वाले बड़े भइया को अपने साथ ले गए होंगे तो ये सच है कि बड़े भइया को आज आटे दाल के भाव का पता चल जाएगा।"

"हाॅ बुआ।" रितू ने कहा___"राज को मौजूदा हालातों का बखूबी एहसास था। कदाचित उसे ये अंदेशा था कि इतनी नाकामियों के बाद डैड अब खुद मैदान में उतरेंगे और हमें खोज कर हमारा क्रिया कर्म करेंगे। इसी लिए राज ने ये क़दम उठाया कि जब डैड ही कानून की गिरफ़्त में रहेंगे तो भला हम पर किसी तरह का उनकी तरफ से कोई संकट आएगा ही कैसे?"

"तो इसका मतलब ये हुआ कि बड़े भइया को राज ने कानून की गिरफ्त में फॅसाया।" नैना को जैसे सारी बात समझ में आ गई थी, बोली___"सिर्फ इस लिए कि वो तेरे डैड को एहसास दिला सके कि वो जिसे पिद्दी का शोरबा समझते हैं वो दरअसल ऐसा है कि उनको छठी का दूध याद दिला सकता है। ख़ैर, इन बातों से ये भी एक बात समझ में आती है कि राज ने तुझको सेफ करने के लिए भी तेरे डैड को कुछ दिनों के लिए कानून की गिरफ्त में फॅसाया है। दो दिन बाद तो वो खुद ही यहाॅ आ जाएगा और संभव है ऐसा कुछ कर दे जिससे उसका शिकार कानून की चपेट से बाहर आ जाए।"

"यू आर अब्सोल्यूटली राइट बुआ।" रितू ने कहा___"राज का यकीनन यही प्लान हो सकता है। ख़ैर, अब तो इस बात की फिक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि डैड या उनके किसी आदमी से हमें कोई ख़तरा है।"

"लेकिन एक बात सोचने वाली है रितू।" नैना ने सोचने वाले भाव से चहा___"तेरे डैड की इस गिरफ्तारी से तेरी माॅ और तेरे भाई पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा होगा। प्रतिमा भाभी ने खुद भी वकालत की पढ़ाई की है इस लिए संभव है कि वो तेरे डैड को कानून की गिरफ्त से निकालने का कोई जुगाड़ लगाएॅ।"

"कोई फायदा नहीं होने वाला बुआ।" रितू ने कहा__"जिसे जितना ज़ोर लगाना है लगा ले मगर हाॅथ कुछ नहीं आएगा। क्योंकि एक तो मामला ही इतना संगीन है दूसरे इस सबमें राज का हाॅथ है। उसकी पहुॅच काफी लम्बी है, इस लिए उसकी पहुॅच के आगे इन लोगों का कोई भी पैंतरा काम नहीं करने वाला। ये तो पक्की बात है कि होगा वहीं जो राज चाहेगा।"

"हाॅ ये तो है।" नैना ने कहा___"ख़ैर देखते हैं क्या होता है? वैसे इस बारे में क्या अभी तक तुमने राज से बात नहीं की??"

"अभी तो नहीं की बुआ।" रितू ने कहा___"पर अब जल्द ही उससे बात करूॅगी। वास्तव में उसने बड़ा हैरतअंगेज काम किया है। मुझे तो उससे ये उम्मीद ही नहीं थी।"

"वक्त और हालात एक इंसान को कहाॅ से कहाॅ पहुॅचा देते हैं और उससे क्या क्या करवा देते हैं ये सब उस तरह का समय आने पर ही पता चलता है।" नैना ने जाने क्या सोच कर कहा___"सोचने वाली बात है कि राज जो एक बेहद ही सीधा सादा लड़का हुआ करता था आज वो इतना जहीन तथा इतना शातिर दिमाग़ का भी हो गया है।"

"इसमें उसकी कोई ग़लती नहीं है बुआ।" रितू ने भारी मन से कहा___"उसे इस तरह का बनाने वाले भी मेरे ही पैरेंट्स हैं। इंसान अपनों का हर कहा मानता है और उसका जुल्म भी सह लेता है लेकिन उसकी भी एक समय सीमा होती है। इतना कुछ जिसके साथ हुआ हो वो ऐसा भी न बन सके तो फिर कैसा इंसान है वो?"

नैना, रितू की बात सुन कर उसे देखती रह गई। कुछ देर और ऐसी ही बातों के बाद वो दोनो ही कमरे से बाहर आ गईं और नीचे नास्ते की टेबल पर आकर बैठ गईं। जहाॅ पर करुणा का भाई हेमराज पहले से ही मौजूद था। रितू अपनी नैना बुआ के साथ अलग अलग कुर्सियों पर बैठी ही थी कि उसका आई फोन बज उठा। उसने मोबाइल की स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे "माॅम" नाम को देखा तो उसके होठों पर अनायास ही नफ़रत व घृणा से भरी मुस्कान फैल गई। कुछ सेकण्ड तक वो मोबाइल की स्क्रीन को देखती रही फिर उसने आ रही काल को कट कर दिया। काल कट करते वक्त उसके चेहरे पर बेहद कठोरता के भाव थे।

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उधर मुम्बई में!

सुबह हुई!

अजय सिंह व प्रतिमा की दूसरी बेटी नीलम की ऑखें गहरी नींद से खुल तो गईं थी मगर वो खुद बेड से न उठी थी अभी तक। हॅसती मुस्कुराती हुई रहने वाली मासूम सी नीलम एकाएक ही जैसे बेहद गुमसुम सी रहने लगी थी। काॅलेज में हुई उस घटना को आज हप्ता से ज्यादा दिन गुज़र गया था किन्तु उस घटना की ताज़गी आज भी उसके ज़हन में बनी हुई थी। उसे अपनी इज्ज़त के तार तार हो जाने का इतना दुख न होता जितना आज उसे इस बात पर हो रहा था कि उसका चचेरा भाई उसे नफ़रत और घृणा की दृष्टि से देख कर इस तरह उसके सामने से मुह फेर कर चला गया था जैसे वो उसे पहचानता ही न था। नीलम और विराज दोनो ही हमउमर थे किन्तु नीलम का बिहैवियर भी रितू की तरह रहा था विराज के साथ।

उस दिन की घटना ने नीलम के मुकम्मल वजूद को हिला कर रख दिया था। उसने इस घटना के बारे में अपने खुद के पैरेंट्स को बिलकुल भी नहीं बताया था। मौसी की लड़की को बस बताया था किन्तु उसने उससे भी वादा ले लिया था कि वो उसके घरवालों को ये बात न बताए कभी।

उस दिन की घटना के बाद पहले तो दो दिन नीलम काॅलेज नहीं गई थी किन्तु फिर तीसरे दिन से जाने लगी थी। काॅलेज में हर जगह उसकी नज़रें बस अपने चचेरे भाई विराज को ही ढूॅढ़तीं मगर पिछले कई दिनों से उसे अपना वो चचेरा भाई काॅलेज में कहीं न दिखा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर विराज काॅलेज क्यों नहीं आ रहा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी वजह से उसने ये काॅलेज ही छोंड़ दिया हो। ये सोच कर ही नीलम की जान उसके हलक में आकर फॅस जाती। वो सोचती कि अगर विराज ने सच में उसकी ही वजह से काॅलेज छोंड़ दिया होगा तो ये कितनी बड़ी बात है। मतलब कि आज के समय में विराज उससे इतनी नफ़रत करता है कि वो उसे देखना तक गवाॅरा नहीं करता। ये सब बातें नीलम को रात दिन किसी ज़हरीले सर्प की भाॅति डसती रहती थी।

"बस एक बार।" नीलम के मुख से हर बार बस यही बात निकलती____"सिर्फ एक बार फिर से मुझे मिल जाओ मेरे भाई। तुमसे मिल कर मैं अपने किये की माफ़ी माॅगना चाहती हूॅ। मुझे एहसास है कि मेरे भाई कि मैने बचपन से लेकर अब तक तुम्हें सिर्फ दुख दिया है। तुम्हें तरह तरह की बातों से जलील किया था। मगर एक तुम थे कि मेरी उन कड़वी बातों का कभी भी बुरा नहीं मानते थे। जबकि कोई और होता तो जीवन भर मुझे देखना तक पसंद न करता। मुझे सब कुछ अच्छी तरह से याद है भाई। मेरे माॅम डैड ने हमेशा हम भाई बहनों को यही सिखाया था कि तुम सब बुरे लोग हो इस लिए हम तुमसे दूर रहें और कभी भी किसी तरह का कोई मेल मिलाप न रखें। हम बच्चे ही तो थे भाई, जैसा माॅ बाप सिखाते थे उसी को सच मान लेते थे और फिर इस सबकी आदत ही पड़ गई थी। मगर उस दिन तुमने मेरी इज्ज़त बचा कर ये जता दिया कि तुम बुरे नहीं हो सकते। जिस तरह से तुम मुझे देख कर नफ़रत व घृणा से अपना मुह मोड़ कर चले गए थे, उससे मुझे एहसास हो चुका था कि तुमने जो किया वो एक ऊॅचे दर्ज़े का कर्म था और जो मैंने अब तक किया था वो हद से भी ज्यादा निचले दर्ज़े का कर्म था। मुझे बस एक बार मिल जाओ राज। मैं तुमसे अपने गुनाहों की माफ़ी माॅगना चाहती हूॅ। तुम जो भी सज़ा दोगे उस सज़ा को मैं खुशी खुशी कुबूल कर लूॅगी। प्लीज़ राज, बस एक बार मुझे मिल जाओ। तुम काॅलेज क्यों नहीं आ रहे हो? क्या इतनी नफ़रत करते हो तुम अपनी इस बहन से कि जिस काॅलेज में मैं हूॅ वहाॅ तुम पढ़ ही नहीं सकते? ऐसा मत करना मेरे भाई। वरना मैं अपनी ही नज़रों में इस क़दर गिर जाऊॅगी कि फिर उठ पाना मेरे लिए असंभव हो जाएगा।"

ये सब बातें अपने आप से ही करना जैसे नीलम की दिनचर्या में शामिल हो गया था। उसके मौसी की लड़की उसे इस बारे में बहुत समझाती मगर नीलम पर उसकी बातों का कोई असर न होता। काॅलेज में हुई घटना से नीलम थोड़ा गुमसुम सी रहने लगी थी। मगर इसका कारण यही था कि विराज काॅलेज नहीं आ रहा था। वो हर रोज़ समय पर काॅलेज पहुॅच जाती और सारा दिन काॅलेज में रुकती। उसकी नज़रें हर दिन अपने भाई को तलाश करती मगर अंत में उन ऑखों में मायूसी के साथ साथ ऑसू भर आते और फिर वो दुखी भाव से घर लौट जाती। कालेज के बाॅकी स्टूडेंट्स नार्मल ही थे। उस घटना के बाद किसी ने कभी कोई टीका टिप्पणी न की थी।

कुछ देर ऐसे ही सोचो में गुम वह बेड पर पड़ी रही उसके बाद वो उठी और बाथरूम की तरफ बढ़ गई। बाथरूम में फ्रेश होने के बाद वो वापस कमरे में आई और काॅलेज के यूनीफार्म पहन कर तथा कंधे पर एक मध्यम साइज़ का बैग लेकर वो कमरे से बाहर की तरफ बढ़ी ही थी कि उसका मोबाइल बज उठा। उसने बैग के ऊपरी हिस्से की चैन खोला और अपना मोबाइल निकाल कर स्क्रीन पर नज़र आ रहे "माॅम" नाम को देखा तो उसने काल रिसीव कर मोबाइल कानों से लगा लिया।

"............।" उधर से प्रतिमा ने कुछ कहा।

"क्याऽऽऽ????" नीलम के हाॅथ से मोबाइल छूटते छूटते बचा था। उसके हलक से जैसे चीख सी निकल गई थी, बोली___"ये ये आप क्या कह रही हैं माॅम? डैड को सीबीआई वाले ले गए? मगर क्यों??? आख़िर ऐसा क्या किया है डैड ने?"

"............।" उधर से प्रतिमा ने फिर कुछ कहा।

"ओह अब क्या होगा माॅम?" प्रतिमा की बात सुनने के बाद नीलम ने संजीदगी से कहा___"क्या रितू दीदी ने कुछ नहीं किया? वो भी तो एक पुलिस ऑफिसर हैं?"

"..............।" उधर से प्रतिमा ने कुछ देर तक कुछ बात की।

"क्याऽऽ???" नीलम बुरी तरह उछल पड़ी____"ये आप क्या कह रही हैं? दीदी भला ऐसा कैसे कर सकती हैं माॅम? नहीं नहीं, आपको और डैड को ज़रूर कोई ग़लतफहमी हुई है। रितू दीदी ये सब कर ही नहीं सकती हैं। आप तो जानती हैं कि दीदी ने कभी उसकी तरफ देखना तक पसंद नहीं किया था। फिर भला आज वो कैसे उसका साथ देने लगीं? ये तो इम्पाॅसिबल है माॅम।"

"...........।" उधर से प्रतिमा ने फिर कुछ कहा।

"मैं इस बारे में दीदी से बात करूॅगी माॅम।" नीलम ने गंभीरता से कहा___"उनसे पूछूॅगी कि आख़िर वो ये सब क्यों कर रही हैं?"

"............।" उधर से प्रतिमा ने झट से कुछ कहा।

"क्यों नहीं पूॅछ सकती माॅम?" नीलम ने ज़रा चौंकते हुए कहा___"आख़िर पता तो चलना ही चाहिए कि उनके मन में क्या है अपने पैरेंट्स के प्रति? इस लिए मैं उनसे फोन लगा कर ज़रूर इस बारे में बात करूॅगी।"

"..........।" उधर से प्रतिभा ने फिर कुछ कहा।

"मैं भी आ रही हूॅ माॅम।" नीलम ने कहा___"ऐसे समय में में मुझे अपने माॅ डैड के पास ही रहना है। दूसरी बात मैं देखना चाहती हूॅ कि रितू दीदी ये सब कैसे करती हैं अपने ही माॅ बाप और भाई के खिलाफ़?"

"...............।" उधर से प्रतिमा ने कुछ कहा।

"ओके माॅम।" नीलम ने कहा और काल कट कर दिया।

इस वक्त उसके दिलो दिमाग़ में एकाएक ही तूफान सा चालू हो गया था। मन में तरह तरह के सवाल उभरने लगे थे। जिनका जवाब फिलहाल उसके पास न था किन्तु जानना आवश्यक था उसके लिए। दरवाजे की तरफ न जाकर वह वापस पलट कर बेड पर बैठ गई और गहन सोच में डूब गई।

"डैड को सीबीआई वाले अपने साथ ले गए।" नीलम मन ही मन सोच रही थी___"वजह ये कि उनके शहर वाले मकान से भारी मात्रा में चरस अफीम व ड्रग्स जैसी गैर कानूनी चीज़ें सीबीआई वालो को बरामद हुई। सवाल ये उठता है कि क्या सच में डैड इस तरह का कोई ग़ैर कानूनी धंधा करते हैं? वहीं दूसरी तरफ रितू दीदी आज कल अपने ही पैरेंट्स के खिलाफ़ जाकर राज का साथ दे रही हैं। भला ये असंभव काम संभव कैसे हो सकता है? आख़िर ऐसा क्या हुआ है कि दीदी माॅम डैड के सबसे बड़े दुश्मन का साथ देने लगी हैं? माॅम ने बताया कि राज गाॅव आया था, इसका मतलब इसी लिए वो काॅलेज नहीं आ रहा था। मगर वो गाॅव गया किस लिए था? और गाॅव में ऐसा क्या हुआ है कि दीदी अपने उस चचेरे भाई का साथ देने लगीं जिसे वो कभी देखना भी पसंद नहीं करती थीं?"

नीलम के ज़हन में हज़ारों तरह के सवाल इधर उधर घूमने लगे थे मगर नीलम को ये सब बातें हजम नहीं हो रही थी। सोचते सोचते सहसा नीलम के दिमाग़ की बत्ती जली। उसके मन में विचार आया कि वो खुद भी तो कभी राज को अपना भाई नहीं समझती थी जबकि आज हालात ये हैं कि वो अपने उसी भाई से मिल कर अपने उन गुनाहों की उससे माफ़ी माॅगना चाहती है। कहीं न कहीं उसका अपने इस भाई के प्रति हृदय परिवर्तन हुआ था तभी तो उसके दिल में ऐसे भावनात्मक भाव आए थे। दूसरी तरफ रितू दीदी भी राज का साथ दे रही हैं। इसका मतलब कुछ तो ऐसा हुआ है जिसके चलते दीदी का भी राज के प्रति हृदय परिवर्तन हुआ है और वो आज उसका साथ भी दे रही हैं। इतना ही नहीं अपने ही पैरेंट्स के खिलाफ़ राज के साथ लड़ाई लड़ रही हैं।

नीलम को अपना ये विचार जॅचा। उसको एहसास हुआ कि कुछ तो ऐसी बात हुई जिसका उसे इस वक्त कोई पता नहीं है। ये सब सोचने के बाद उसने मोबाइल पर रितू दीदी का नंबर ढूॅढ़ा और काल लगा कर मोबाइल कान से लगा लिया। काल जाने की रिंग बजती सुनाई दी उसे। कुछ ही देर में उधर से रितू ने काल रिसीव किया।

"............।" उधर से रितू ने कुछ कहा।

"मैं तो बिलकुल ठीक हूॅ दीदी।" नीलम ने कहा___"आप बताइये आप कैसी हैं?"

"...........।" उधर से रितू ने फिर कुछ कहा।

"हाॅ दीदी काॅलेज अच्छा चल रहा है और साथ में पढ़ाई भी अच्छी चल रही है।" नीलम ने कहने के साथ ही पहलू बदला___"दीदी, अभी अभी माॅम का फोन आया था मेरे पास। उन्होंने कुछ ऐसा बताया जिसे सुन कर मेरे होश ही उड़ गए हैं। वो कह रही थी कि डैड को सीबीआई वाले ग़ैर कानूनी सामान के चलते अपने साथ ले गए हैं। ये भी कि आप विराज का साथ दे रही हैं। ये सब क्या चक्कर है दीदी? प्लीज़ बताइये न कि ऐसा क्या हो गया है कि आप अपने ही पैरेंट्स के खिलाफ़ हैं? माॅम कह रही थी कि आपने उनका काल भी रिसीव नहीं किया। वो आपको भी डैड के बारे में सूचित करना चाहती थी।"

".............।" उधर से रितू ने काफी देर तक कुछ कहा।

"बातों को गोल गोल मत घुमाइये दीदी।" नीलम ने बुरा सा मुह बनाया____"साफ साफ बताइये न कि आख़िर क्या बात हो गई है जिसकी वजह से आप माॅम डैड के खिलाफ़ हो कर उस विराज का साद दे रही हैं?"

"...........।" उधर से रितू ने फिर कुछ कहा।

"इसका मतलब आप खुद मुझे कुछ भी बताना नहीं चाहती हैं।" नीलम ने कहा___"और ये कह रही हैं कि सच्चाई का पता मैं खुद लगाऊॅ। ठीक है दीदी, मैं आ रही हूॅ। क्या आपसे मिल भी नहीं सकती मैं?"

"............।" उधर से रितू ने कुछ कहा।

"ठीक है दीदी।" नीलम ने कहा___"लेकिन मैं इतना ज़रूर जानती हूॅ कि बात भले ही चाहे जो कुछ भी हुई हो मगर ऐसा नहीं होना चाहिए कि बच्चे अपने माॅ बाप से इस तरह खिलाफ़ हो जाएॅ।"

इतना कहने के बाद नीलम ने काल कट कर दिया और फिर दुखी भाव से बेड पर कुछ देर बैठी जाने क्या सोचती रही। उसके बाद जैसे उसने कोई फैसला किया और फिर उठ कर काॅलेज की यूनिफार्म को उतारने लगी। कुछ ही देर में उसने दूसरे कपड़े पहन लिए और फिर कमरे से बाहर निकल गई।

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इधर विराज एण्ड पार्टी की ट्रेन अपने निर्धारित समय से कुछ ही समय की देरी से आख़िर मुम्बई पहुॅच ही गई थी। सब लोग ट्रेन से बाहर आए और फिर प्लेटफार्म से बाहर की तरफ निकल गए। विराज ने मुम्बई पहुॅचने से पहले ही जगदीश ओबराय को फोन कर दिया था। इस लिए जैसे ही ये लोग स्टेशन से बाहर आए वैसे ही जगदीश ओबराय बाहर मिल गया। उसके साथ एक कार और थी। सब लोग कार मे बैठ कर घर के लिए निकल गए।

रास्ते में जगदीश अंकल ने मुझे बताया कि उन्होंने माॅ से बात कर ली है। पहले तो माॅ मेरी वापसी की बात सुन कर नाराज़ हुईं। मगर जगदीश अंकल ने उन्हें सारी बात तरीके से बताई और ये यकीन दिलाया कि मुझे कुछ नहीं होगा तब जाकर वो राज़ी हुई थी। लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि वो एक बार मुझे देखना चाहती हैं। अतः अब मैं इन लोगों के साथ ही घर तक जा रहा था। वरना मेरा प्लान ये था कि मैं यहाॅ से वापस उसी ट्रेन से लौट जाता।

मुम्बई से वापसी के लिए इसी ट्रेन को लगभग कुछ घण्टे बाद जाना था इस लिए मैं बड़े आराम से गर जाकर माॅ से मिल सकता था। ख़ैर, कुछ ही समय बाद हम सब घर पहुॅच गए। घर पर सब एक दूसरे से मिले। करुणा चाची जब माॅ से मिली तो बहुत रो रही थी और बार बार माॅ से माफ़ियाॅ माॅग रही थी। माॅ ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया था। करुणा चाची को वो हमेशा अपनी छोटी बहन की तरह मानती थी और प्यार करती थी। आशा दीदी और उनकी माॅ से भी मेल मिलाप हुआ। मिलने मिलाने में ही काफी समय ब्यतीत हो गया था।

मैं अपने कमरे में जाकर फ्रेश हो गया था। आदित्य भी फ्रेश हो गया था। उसे मेरे साथ ही वापस गाॅव जाना था। निधी भी सबसे मिली। करुणा चाची ने उसे ढेर सारा प्यार व स्नेह दिया था। दिव्या और शगुन को माॅ ने अपने सीने से ही छुपकाया हुआ था। अभय चाचा खुश थे कि उनके बीवी बच्चे सही सलामत यहाॅ आ गए थे। अब उन्हें उनके लिए कोई फिक्र नहीं थी। शायद यही वजह थी कि वो खुद भी मेरे साथ चलने की बात करने लगे थे। उनका कहना था कि वो खुद भी इस जंग में हिस्सा लेंगे और अपने बड़े भाई से इस सबका बदला लेंगे। मगर मैने और जगदीश अंकल ने उन्हें समझा बुझा कर मना कर दिया था।

मैने एक बात महसूस की थी कि निधी का बिहैवियर मेरे प्रति कुछ अलग ही था। इसके पहले वह हमेशा मेरे पषास में ही रहने की कोशिश करती थी जबकि अब वो मुझसे दूर दूर ही रह रही थी। यहाॅ तक कि मेरी तरफ देख भी नहीं थी वो। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वो ऐसा क्यों कर रही थी। मैने एक दो बार खुद उससे बात करने की कोशिश की मगर वो किसी न किसी बहाने से मेरे पास से चली ही जाती थी। मुझे उसके इस रूखे ब्यवहार से तक़लीफ़ भी हो रही थी। वो मेरी जान थी, मैं उसकी बेरुखी पल भर के लिए भी सह नहीं सकता था मगर सबके सामने भला मैं उससे इस बारे कैसे बात कर सकता था? मेरे पास वक्त नहीं था, इस लिए मैने मन में सोच लिया था कि सब कुछ ठीक करने के बाद मैं उससे बात करूॅगा और उसकी किसी भी प्रकार की नाराज़गी को दूर करूॅगा।

मैं माॅ से मिला तो माॅ मेरी वापसी की बात से भावुक हो गईं। उन्हें पता था कि मैं वापस किस लिए जा रहा हूॅ इस लिए वो मुझे बार बार अपना ख़याल रखने के लिए कह रही थी। ख़ैर मैने उन्हें आश्वस्त कराया कि मैं खुद का ख़याल करूॅगा और मुझे कुछ नहीं होगा।

चलने से पहले मैने सबसे आशीर्वाद लिया और फिर आदित्य के साथ वापसी के लिए चल दिया। मेरे साथ जगदीश अंकल भी थे। पवन और आशा दीदी मुझे अपना ख़याल रखने का कहा और खुशी खुशी मुझे विदा किया। हलाॅकि मैं जानता था कि वो अंदर से मेरे जाने से दुखी हैं। उन्हें मेरी फिक्र थी। अभय चाचा ने मुझे सम्हल कर रहने को कहा। करुणा चाची ने मुझे प्यार दिया और विजयी होने का आशीर्वाद दिया। मैं दिव्या और शगुन को प्यार व स्नेह देकर निधी की तरफ देखा तो वो कहीं नज़र न आई। मैं समझ गया कि वो मुझसे मिलना नहीं चाहती है। इस बात से मुझे तक़लीफ़ तो हुई किन्तु फिर मैंने उस तक़लीफ़ को जज़्ब किया और जगदीश अंकल के साथ कार में बैठ कर वापस रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया।

रेलवे स्टेशन पहुॅच कर मैं और आदित्य कार से उतरे। जगदीश अंकल ने मुझे एक पैकिट दिया और कहा कि मैं उसे अपने बैग में चुपचाप डाल लूॅ। मैने ऐसा ही किया। उसके बाद जगदीश अंकल से मेरी कुछ ज़रूरी बातें हुईं और फिर मैं और आदित्य प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गए। ट्रेन वापसी के लिए बस चलने ही वाली थी। हम दोनो ट्रेन में अपनी अपनी शीट पर बैठ गए। मैने मोबाइल से रितू दीदी को फोन किया और उन्हें बताया कि सब लोगों को मैने सुरक्षित पहुॅचा दिया है और अब मैं वापस आ रहा हूॅ। रितू दीदी इस बात से खुश हो गईं। फिर उन्होंने मुझे अख़बार में छपी ख़बर के बारे में बताया और पूॅछा कि ये सब क्या है तो मैने कहा कि मिल कर बताऊॅगा।

रितू दीदी से बात करने के बाद मैं आदित्य से बातें करने लगा। तभी मेरी नज़र एक ऐसे चेहरे पर पड़ी जिसे देख कर मैं चौंक पड़ा और हैरान भी हुआ। मेरे मन में सवाल उठा कि क्या उसने मुझे देख लिया होगा????? मैने अपनी पैंट की जेब से रुमाल निकाल कर अपने मुख पर बाॅध लिया और फिर आराम से आदित्य से बातें करने लगा। किन्तु मेरी नज़र बार बार उस चेहरे पर चली ही जाती थी। जिस चेहरे पर मैं एक अजीब सी उदासी देख रहा था।

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अपडेट........《 50 》

अब तक,,,,,,,,

मैं माॅ से मिला तो माॅ मेरी वापसी की बात से भावुक हो गईं। उन्हें पता था कि मैं वापस किस लिए जा रहा हूॅ इस लिए वो मुझे बार बार अपना ख़याल रखने के लिए कह रही थी। ख़ैर मैने उन्हें आश्वस्त कराया कि मैं खुद का ख़याल करूॅगा और मुझे कुछ नहीं होगा।

चलने से पहले मैने सबसे आशीर्वाद लिया और फिर आदित्य के साथ वापसी के लिए चल दिया। मेरे साथ जगदीश अंकल भी थे। पवन और आशा दीदी मुझे अपना ख़याल रखने का कहा और खुशी खुशी मुझे विदा किया। हलाॅकि मैं जानता था कि वो अंदर से मेरे जाने से दुखी हैं। उन्हें मेरी फिक्र थी। अभय चाचा ने मुझे सम्हल कर रहने को कहा। करुणा चाची ने मुझे प्यार दिया और विजयी होने का आशीर्वाद दिया। मैं दिव्या और शगुन को प्यार व स्नेह देकर निधी की तरफ देखा तो वो कहीं नज़र न आई। मैं समझ गया कि वो मुझसे मिलना नहीं चाहती है। इस बात से मुझे तक़लीफ़ तो हुई किन्तु फिर मैंने उस तक़लीफ़ को जज़्ब किया और जगदीश अंकल के साथ कार में बैठ कर वापस रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया।

रेलवे स्टेशन पहुॅच कर मैं और आदित्य कार से उतरे। जगदीश अंकल ने मुझे एक पैकिट दिया और कहा कि मैं उसे अपने बैग में चुपचाप डाल लूॅ। मैने ऐसा ही किया। उसके बाद जगदीश अंकल से मेरी कुछ ज़रूरी बातें हुईं और फिर मैं और आदित्य प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गए। ट्रेन वापसी के लिए बस चलने ही वाली थी। हम दोनो ट्रेन में अपनी अपनी शीट पर बैठ गए। मैने मोबाइल से रितू दीदी को फोन किया और उन्हें बताया कि सब लोगों को मैने सुरक्षित पहुॅचा दिया है और अब मैं वापस आ रहा हूॅ। रितू दीदी इस बात से खुश हो गईं। फिर उन्होंने मुझे अख़बार में छपी ख़बर के बारे में बताया और पूॅछा कि ये सब क्या है तो मैने कहा कि मिल कर बताऊॅगा।

रितू दीदी से बात करने के बाद मैं आदित्य से बातें करने लगा। तभी मेरी नज़र एक ऐसे चेहरे पर पड़ी जिसे देख कर मैं चौंक पड़ा और हैरान भी हुआ। मेरे मन में सवाल उठा कि क्या उसने मुझे देख लिया होगा????? मैने अपनी पैंट की जेब से रुमाल निकाल कर अपने मुख पर बाॅध लिया और फिर आराम से आदित्य से बातें करने लगा। किन्तु मेरी नज़र बार बार उस चेहरे पर चली ही जाती थी। जिस चेहरे पर मैं एक अजीब सी उदासी देख रहा था।

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अब आगे,,,,,,,,

उधर रितू के फार्महाउस पर!

सुबह का नास्ता पानी करने के बाद रितू बाहर की तरफ निकल गई। बाहर आकर उसने देखा कि सामने मेन गेट पर हरिया काका और शंकर काका आपस में कुछ बातें कर रहे थे। रितू उन दोनो को देखते ही उनकी तरफ बढ़ चली। कुछ ही समय में वो उन दोनो के पास पहुॅच गई। रितू को अपनी तरफ आता देख उन दोनों ने अपनी बात बंद कर दी और सम्हल कर खड़े हो गए।

"क्या हाल चाल हैं आप दोनो के काका?" रितू ने उन दोनों की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए कहा___"आप दोनों ने नास्ता पानी किया कि नहीं?"

"हम दोनों ने अभी थोड़ी देर पहले ही नास्ता पानी किया है बिटिया।" शंकर ने कहा___"बिंदिया भाभी हमारा काफी बेहतर तरीके से ख़याल रखती हैं।"

"ये तो बहुत अच्छी बात है काका।" रितू ने कहा___"काकी हैं ही इतनी अच्छी कि उन्हें सबकी फिक्र रहती है।"

"हाॅ ये बात तो सच है बिटिया।" शंकर ने कहा___"हरिया बहुत किस्मत वाला है जो इसे बिंदिया भाभी जैसी जोरू मिली हैं।"

"अरे ई का कहथो रे बुड़बक?" हरिया ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"किस्मत वाली ता ऊ है ससुरी जो हमरे जइसन मरद मिल गवा है ऊखा। हम ता पहिले से ही किस्मत वाला हूॅ रे।"

"देखा बिटिया।" शंकर ने रितू से कहा___"ये अपने आपको जाने क्या समझता रहता है? जबकि सच्चाई तो यही है कि जबसे बिंदिया भाभी से इसका ब्याह हुआ है तब से इसके भाग्य खुल गए हैं।"

"खूब समझ रहा हूॅ रे तोहरी बातन का।" हरिया ने सिर हिलाते हुए कहा___"तू ससुरे ऊखर बहुतै बड़ाई करथै रे। तोहरे मन मा का है ई हम बहुतै अच्छी तरह से जानत हूॅ। इतना बुड़बक न हूॅ हम। पर तू ससुरे हमरी एक बात कान खोल के सुन ले, अउर ऊ या के कउनव दिन सारे हमरी मेहरारू का लइके भाग न जइहे समझा का?"

"ओए ये क्या बकवास कर रहा है तू?" शंकर ने एकदम से आवेश में आकर कहा__"ऐसा तू सोच भी कैसे सकता है मेरे बारे में? तू अच्छी तरह जानता है कि मेरे मन में ऐसी बदनीयती नहीं है। मैं तो भाभी की बहुत इज्ज़त करता हूॅ और उन्हें भाभी माॅ जैसा ही मानता हूॅ।"

"ई ता ससुरे तू मुह से बोल रहा है न।" हरिया ने कहा__"केहू के मन मा का है ई कउन जानथै भला, हाॅ?"

"तू जैसा है वैसा ही दूसरे को भी समझता है।" शंकर ने कहा___"इस लिए मुझे अपने लिए सफाई देने की कोई ज़रूरत नहीं है। ईश्वर जानता है कि मेरे अंदर क्या है?"

"मैं जानती हूॅ काका कि आपके मन में किसी के लिए कोई मैल नहीं है।" रितू ने कहा___"हरिया काका तो आपको बस छेड़ रहे हैं लेकिन मैं ये कह रही हूॅ आप भी शादी कर लीजिए और मेरे लिए एक अच्छी सी काकी ले आइये।"

"ये क्या कह रही हो बिटिया?" शंकर हॅसा___"अब भला इस उमर में कौन लड़की मुझसे ब्याह करेगी? अब तो ये जीवन ऐसे ही कटेगा।"

"अरे अभी भी आप शादी कर सकते हैं काका।" रितू ने कहा___"और आपको करना ही पड़ेगा। जब आप शादी कर लेंगे तब हरिया काका आपको ये सब कह कर छेड़ेंगे नहीं।"

"हम ता ई ससुरे का समझाय समझाय के थक गयन बिटिया।" हरिया ने कहा___"पर ई ससुरा हमरी कउनव बात मानतै नाहीं है। कहैं का ता ई हमका आपन बहुतै बड़का पक्का यार मानथै पर ई बात भी सच हाय कि ई हमरी बात भी नाहीं सुनत है।"

"आप समझ नहीं रहे हैं काका।" रितू ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"शंकर काका को दरअसल बिंदिया काकी जैसी बीवी चाहिए। बात भी सही है काका अगर बिंदिया काकी जैसी बीवी शंकर काका को भी मिल जाए तो इनका जीवन और भी ज्यादा सॅवर जाए।"

"कारे ईहै बात हा का?" हरिया काका ने तिरछी नज़र से शंकर की तरफ देखा___"अउर अगर ईहै बात हा ता ससुरे ई बात तै हमका पहिले काहे ना बताए रहे? सरवा बेकार मा अब तक ते रॅडवा घूमत रहे। चल अउनव बात ना हा। हम तोहरे खातिर ऊ ससुरी बिंदिया जइसनै जोरू ढूॅढ़ब। हमरे इहाॅ अइसन मेहरारू केर कउनव कमी ना हा।"

"ये तो अच्छी बात है काका।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा__"आप जल्दी से वधू का इंतजाम कीजिए। उसके बाद चट मॅगनी पट ब्याह हो जाएगा। और हाॅ शंकर काका की शादी का सारा खर्चा मैं करूॅगी।"

"ये तुम क्या कह रही हो बिटिया?" शंकर काका एकदम से चौंक पड़ा__"भला मैं तुमसे कैसे खर्चा करवा सकता हूॅ? अरे तुमको तो मैं अपनी बेटी ही मानता हूॅ और बेटी से इस तरह अपने काम के लिए धन खर्चा करवाना अच्छी बात नहीं है। मुझे पाप लगेगा बिटिया।"

"आप भी कमाल करते हैं काका।" रितू ने कहा__"जीवन भर माॅ बाप अपने बच्चों के ऊपर अपनी पाई पाई खर्च करते रहते हैं तो क्या बच्चों का फर्ज़ नहीं बनता कि वो भी अपने माॅ बाप के ऊपर अपनी कमाई का पाई पाई खर्च कर दें? अगर आप मुझे अपनी बेटी मानते हैं तो मैं भी तो आपको अपने पिता जैसा ही मानती हूॅ। और ये मेरी इच्छा ही नहीं बल्कि खुशी की बात है कि मैं अपने शंकर काका की शादी में खूब पैसा खर्च करूॅ। मैने फैंसला कर लिया है, इस लिए अब आप इस बारे में कुछ भी नहीं कहेंगे? वरना कभी बात नहीं करूॅगी आपसे।"

रितू की बातें सुन कर शंकर हैरत से देखता रह गया उसे। फिर सहसा जाने उसके अंदर कैसा भावनाओं का तूफान उठा कि उसकी ऑखों से झर झर करके ऑसू बह चले। उसके चेहरे पर एकाएक ही गहन पीड़ा और दुख के भाव उभर आए। ये देख कर रितू आगे बढ़ी और उसकी ऑखों से बह रहे ऑसुओं को अपने हाॅथ से पोंछा।

"ये क्या काका?" रितू ने कहा__"आप रों रहे हैं? क्या मुझसे कुछ ग़लती हो गई?"

"नहीं नहीं बिटिया।" शंकर एकदम से कह उठा___"तुमसे भला कोई ग़लती कैसे हो सकती है? तुम तो एक नेक दिल बच्ची हो बिटिया। आज वर्षों बाद इतनी खुशी महसूस हुई कि वो खुशी ऑसू बन कर इन ऑखों से छलक पड़ी। इस दुनियाॅ में इससे पहले बहुत दुख दर्द सहे थे मैने। मगर जबसे यहाॅ आया हूॅ तो ऐसा लगा जैसे मैं अकेला नहीं हूॅ बल्कि मेरा भी कोई अपना है। जिसे मेरी फिक्र है।"

"मैं तो शुरू से ही आपको अपना ही मानती आ रही हूॅ काका।" रितू ने कहा___"मगर आप आज भी मुझे अपना नहीं मानते हैं। अगर मानते तो मेरे और हरिया काका के पूछने पर अपने बारे में वो सब कुछ बताते जिसकी वजह से आप कभी अपने घर नहीं जाते हैं।"

"उस सबको बताने का कोई मतलब नहीं है बिटिया?" शंकर ने कहा___"अतीत किसी का भी हो वो जब भी याद आता है तो हमें दुख और उदासियाॅ ही देता है। मैं उस सबको याद नहीं करना चाहता। क्योंकि बड़ी मुश्किल से मैने खुद को इस हद तक सम्हाला है।"

"अपने अंदर के दर्द को बयाॅ कर देने से मन का बोझ काफी हल्का हो जाता है काका।" रितू ने कहा___"ये तो अच्छी बात है कि आप अपने उस दर्द से उबर कर आज सम्हल चुके हैं। लेकिन ये भी सच है कि अपने अंदर इतने सारे दुख दर्द को दबा के रखना भी अच्छी बात नहीं है। ऐसे में वो दर्द नासूर बन जाता है और हमें एक पल भी सुकून से जीने नहीं देता। इस लिए आप अपने के उस दुख दर्द को बाहर निकाल दीजिए और फिर नये सिरे से अपने जीवन की नई शुरूआत कीजिए।"

"रितू बिटिया बहतै भले की बात करथै शंकरवा।" हरिया ने कहा___"जो बीत गया हा उसे ता भूला दे मा ही भलाई हा। हम सरवा तोसे कब से रहा हूॅ के तू अपना ब्याह करके जीवन मा आगे बढ़। पर तू ससुरा हमरी सुनतै नाहीं है?"

"अब तो बिटिया ने अपना फैंसला सुना ही दिया है हरिया।" शंकर ने कहा___"और जिस अपनेपन से सुनाया है उसे अगर मैं ना मानूॅ तो फिर धिक्कार ही होगा मुझ पर। इस लिए अब मैं ज़रूर ब्याह करूॅगा यार।"

"हाॅ लेकिन उससे पहले।" रितू ने कहा___"मैं ये भी जानना चाहती हूॅ काका कि आपके साथ ऐसा क्या हो गया था जिसकी वजह से आप कभी अपने घर नहीं जाते और ना ही अपने घर वालों से कभी कोई मतलब रखते हैं? आप हमें वो सब कुछ अभी बताएॅगे काका।"

"ठीक है बिटिया।" शंकर ने गहरी साॅस ली___"तुम अगर इतना ही ज़ोर दे रही हो तो सब कुछ बताता हूॅ तुम्हें। मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाॅव महोबा का निवासी हूॅ। मैं छोटी जाति का हूॅ। मेरा बाप बल्ली रावत एक मिस्त्री था। जो मकानों में ईंटे की जोड़ाई का काम करता था। हम तीन भाई और दो बहन थे। मेरी माॅ बहुत शान्त स्वभाव की थी। अपने सभी बच्चों को वह बहुत प्यार करती थी। भाई बहनों में मैं सबसे बड़ा था। मैं माॅ पर गया था इस लिए मेरा स्वभाव भी सबके प्रति प्यार भरा ही था। उस वक्त मैं पच्चीस साल का हो गया था और अपने बापू के साथ रह कर मिस्त्रीगीरी पूरी तरह सीख चुका था। इस लिए जहाॅ भी काम मिलता मैं बापू के साथ ही रह कर उनके काम में हाॅथ बटाता था। मेरे सहयोग का असर ये हुआ की घर के आर्थिक हालात पहले की अपेक्षा काफी बेहतर हो गए। हमारी जात बिरादरी के कुछ लोग मेरे बापू से अक्सर मेरा ब्याह कर देने को कहते रहते थे। पर पता नहीं बापू उन सबकी बातों को क्यों अनसुना कर देता था? इधर पास के ही एक गाॅव में हमारी ही जात बिरादरी में एक लड़की थी चंदा। जिसे मैं काफी पसंद करता था। वो भी मुझे बहुत पसंद करती थी। हमें जब भी समय मिलता हम एक दूसरे से ज़रूर मिल लिया करते थे। कहते हैं कि इश्क़ मुश्क़ कभी छुपता नहीं इस लिए इस बात का पता मेरे बापू को भी हो गया था। जिससे बापू मुझे इसके लिए डाॅट भी देता था कभी कभी। ख़ैर सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि एक दिन हर दिन की भाॅति मैं बापू के साथ काम पर गया हुआ था। गाॅव में ही काम चालू था तो दोपहर के समय सहसा मेरी बहन रीना भागते हुए आई और बताया कि अम्मा मर गई है। उसकी बात सुन कर हम दोनो बाप बेटा भौचक्के से रह गए। मुझे तो यकीन ही नहीं हुआ कि अम्मा मर गई है। रीना ने बताया कि अम्मा नहाने के लिए बाल्टी को रस्सी से बाॅध कर कुएॅ से पानी खींच रही थी। तभी जाने कैसे उसका पाॅव फिसल गया और वो कुएॅ में गिर गई। अम्मा को तैरना नहीं आता था इस लिए वो पानी में डूब गई और मर गई। रीना ने बताया कि जब काफी देर तक अम्मा नहा कर न आई तो वह घर के पिछवाड़े पर बने कुएॅ में ये देखने गई कि अम्मा अब तक आई क्यों नहीं? लेकिन कुएॅ में अम्मा को न पा कर रीना कुएॅ के आस पास देखने लगी। फिर सहसा उसकी नज़र कुएॅ के अंदर पड़ी तो अम्मा को पानी की सतह पर औधे मुॅह लेटी पाया। रीना को समझते देर न लगी कि अम्मा मर गई है, बस ये कहानी थी अम्मा के मर जाने की। रीना की सारी बातें सुन कर हम दोनो बाप बेटा काम छोंड़ कर घर आ गए। गाॅव के कुछ लोगों की मदद से मेरे भाईयों ने अम्मा को कुएॅ से निकाल लिया था।

अम्मा के मर जाने का दुख सबसे ज्यादा मुझे था। लेकिन अब हो भी क्या सकता था। अम्मा का क्रिया कर्म किया गया और कुछ दिन में फिर से हमारी दिन चर्या पहले जैसी चलने लगी। अब घर में रोटी पानी मेरी दोनो बहनें ही बनाती थी। मेरे सभी भाई बहन बड़े हो गए थे और जवान भी। अम्मा के मर जाने का दुख मेरे अंदर बना ही रहा पर मैं किसी के सामने उस दुख को दिखाता नहीं था। कुछ दिन बाद एक बदलाव ये हुआ कि बापू अक्सर रात को देसी ठर्रा(शराब) लगा कर घर आने लगा और घर में सबको अनाप शनाप बकने लगा और गालियाॅ भी देने लगा। हम सब बापू के दारू पीने से परेशान से होने लगे। इधर एक बदलाव ये भी हुआ कि बापू मुझे काम पर लगा कर खुद चार चार घंटे के लिए गायब हो जाता। जबकि मैं सारा दिन काम में लगा रहता और फिर दिन ढले ही घर वापस आता। ऐसे ही दिन गुज़रते रहे।

ऐसे ही एक दिन मैं शाम को घर पहुॅचा। हाथ मुह धोकर खाया पिया और फिर घर के बाहर मैदान में चारपाई लगा कर उसमें लेट गया। दिन भर के काम से मैं काफी थक जाता था इस लिए लेटते ही मुझे नींद आ गई। अभी मुझे सोये हुए कुछ ही समय गुज़रा था कि सहसा किसी ने मेरी पीठ पर ज़ोर की लात मारी। जिससे मैं चारपाई के नीचें गिर गया। अचानक हुए इस हमले से पहले तो मुझे कुछ समझ न आया किन्तु फिर तुरंत ही मेरे अंदर गुस्से का उबाल आ गया। मेरी नज़र मुझे लात मारने वाले पर पड़ी। देखा तो चारपाई के उस पार नशे में झूमता बापू खड़ा था।

"बापू तुमने मुझे मारा क्यों?" मैं लगभर नाराज़गी भरे भाव से पूछा___"और ये क्या तुम हर रोज़ देसी दारू चढ़ा के आ जाते हो। ये अच्छी बात नहीं है बापू।"

"बकवास ना कर समझा।" बापू नशे में झूमता हुआ गरजा___"मैं कुछ भी करू तुझे इससे क्या मतलब? मैं अपने पैसों की दारू पीता हूॅ तेरे बाप की नहीं समझा।"

"मेरे बाप तो तुम ही हो बापू।" मैने कहा___"मैं ये नहीं कहता कि तुम दारू न पियों मगर रोज रोज पीना अच्छी बात नहीं है। इससे तुम्हारी तबियत ख़राब हो जाएगी।"

"अरे वो सब छोंड़।" बापू ने हाॅथ को ऊपर से नीचे की तरफ झटकते हुए कहा___"ये बता कि तू अपनी नई नवेली अम्मा से मिला कि नहीं?"

"नई नवेली अम्मा??" मैं एकदम से चकरा गया__"ये तुम क्या बोल रहे हो बापू?"

"ठीक ही तो बोल रहा हूॅ बुड़बक।" बापू लड़खड़ा सा गया___"अरे आज मैं तुम सबके लिए एक नई अम्मा ले आया हूॅ। मैं जानता हूॅ कि अपनी अम्मा के मर जाने से तुम सब बहुत दुखी थे इस लिए मैने फिर से ब्याह कर लिया और तुम सबके लिए एक अम्मा ले आया।"

मैं बापू की बात सुन कर उछल पड़ा था। हैरत से ऑखें फाड़े नशे में झूमते बापू को देखे जा रहा था। किन्तु तभी मुझे एहसास हुआ कि लगता है बापू को दारू ज्यादा चढ़ गई है इस लिए अनाप शनाप बके जा रहा है।

"अंदर जाओ बापू।" फिर मैने कहा___"तुम्हें दारू आज ज्यादा चढ़ गई है। इस लिए अंदर जाओ और जो थोड़ा बहुत खाना खाना हो खाओ और आराम से सो जाओ।"

"तू साले मुझे बता रहा है कि मुझे चढ़ गई है?" बापू एकदम से चीख पड़ा था, बोला___"अरे इतनी सी बार बराबर दारू मुझे नहीं चढ़ती मादरचोद। मैं जो कह रहा हूॅ उसे मानता क्यों नहीं? चल आ मेरे साथ तुझे दिखाता हूॅ कि अंदर तेरी नई अम्मा है कि नहीं।"

बापू मेरा हाॅथ पकड़ कर अंदर की तरफ खींच कर ले जाने लगा। मैं चाहता तो अपना हाॅथ एक झटके में उससे छुड़ा लेता मगर मैं कोई बखेड़ा नहीं करना चाहता था इस लिए उसके खींचने पर उसके पीछे पीछे अंदर की तरफ खिंचता चला गया। अंदर बरामदे में मेरे सभी भाई बहन बैठे थे। घर कच्चे मकान का था। बाहर से आने पर पहले बड़ा सा बरामदा पड़ता था, उसके बाद दो कमरे थे। जिसमे एक कमरे में सामान वगैरा रखा रहता था। जबकि दूसरा कमरा बापू का था। कमरे में जो लकड़ी का दरवाजा था उसमें अंदर की तरफ कुण्डी नहीं थी।

बापू मुझे खींचते हुए उसी कमरे की तरफ बढ़ा और झटके से कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया। जबकि मैंने तुरंत ही अपना हाॅथ छुड़ा लिया था। अंदर दाखिल होते ही बापू ऊॅची आवाज़ में एक तरफ उॅगली का इशारा करते हुए बोला___"ये देख शंकर, ये है तेरी नई अम्मा। अरे देख न बेटीचोद तुझे यकीन नहीं हो रहा था न। देख ये बैठी है तेरी अम्मा चारपाई पर।"

मैंने अंदर की तरफ सिर करके चारपाई की तरफ देखा तो चौंक पड़ा। सच में अंदर रखी चारपाई पर कोई औरत बैठी थी। नई साड़ी में बड़ा सा घूॅघट किये थी वह। इस लिए मैं उसका चेहरा न देख सका। पर इतना काफी था मुझे हैरत में डालने के लिए। मैं उस औरत को देखने के बाद आश्चर्य से बापू की तरफ देखा। मुझे अपनी तरफ देखता देख बापू बड़े अजीब भाव से मुस्कुराया और फिर कमरे से बाहर बरामदे में आ गया।

"क्यों बापू?" मैने भारी आवाज़ में कहा__"क्यों किया ऐसा? हम कोई बच्चे तो नहीं थे जो हम अम्मा के बिरा जी नहीं सकते थे। तुम तो देख ही रहे हो बापू कि तुम्हारे बच्चे खुद अब ब्याह करने लायक हो गए हैं फिर खुद ब्याह करने की क्या ज़रूरत थी तुम्हें?"

"ज़रूरत थी बेटवा।" बापू ने कहा___"बल्कि बहुत ज़रूरत थी मुझे। तेरी अम्मा तो मर गई मगर मेरी जज्ञस्मानी ज़रूरतों को अब कौन पूरी करता? वैसे तेरी अम्मा के रहते हुए भी कुछ नहीं होता था। अच्छा हुआ साली मर गई। मुझ पर और मेरे लौड़े पर ज़रा सा भी तरस नहीं आता था उसे। जब भी उससे कहता कि आज बहुत दिल कर रहा है एक बार दे दो तो साली ऐसी बिदकती थी जैसे दुधारू गाय हो।"

"ये तुम क्या बकवास कर रहे हो बापू?" मैने पूरी शक्ति से चीखते हुए कहा___"शर्म आनी चाहिए तुम्हें अपने बेटे के सामने उसकी अम्मा के लिए ऐसा बोलने पर।"

"इसमें शर्म कैसी बछुवा?" बापू ढिठाई से मुस्कुराया___"जो सच बात है वही तो बोल रहा हूॅ मैं।"

"मुझे नहीं सुनना तुम्हारी ये बेहूदा बातें।" मैने गुस्से से कहा और पलट कर बाहर की तरफ अपनी चारपाई के पास आ गया। मेरा दिमाग़ बहुत ज्यादा ख़राब हो गया था। मगर ये भी सच था कि अब हो भी क्या सकता था?

मैं अपने अंदर हज़ारों तरह की बातें लिए चुपचाप चारपाई पर लेट गया। मुझे बापू पर बहुत गुस्सा आ रहा था। मगर मैं कुछ कर नहीं सकता था। इस लिए अपने गुस्से को बड़ी मुश्किल से काबू किये हुए ऑखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगा था। मगर कम्बख्त ऑखों में नींद का दूर दूर तक कोई आभास भी नहीं हो रहा था।

अभी मुझे लेटे हुए कुछ ही देर हुई थी कि तभी अंदर से किसी औरत की चीख सुनाई दी। मेरी ऑखें खुल गईं मगर मैं उठा नहीं। मैं समझ चुका था कि बापू अपनी नई नवेली जोरू के पास ही होगा और उसके साथ वही कर रहा होगा जो हर शादी शुदा मर्द औरत करते हैं शादी के बाद। इस लिए मैं चुपोआप लेटा रहा। मैं इस बात से हैरान ज़रूर हुआ कि बापू को ज़रा भी शर्म नहीं है कि घर में उसके पाॅ पाॅच जवान बच्चे मौजूद हैं और वो कमरे से क्या सुना रहा है उन्हें।

मैं ये सब सोच ही रहा था कि एक बार फिर से मेरे कानों में औरत की चीख़ सुनाई दी साथ ही बापू की गालियाॅ भी। किन्तु इस बार मैं चीख़ सुन कर बुरी तरह उछल पड़ा था। क्योंकि चीख़ में शामिल मेरा नाम था। उस आवाज़ को मैं लाखों में पहचान सकता था। ये चंदा की चीख़ थी। जी हाॅ, ये चंदा ही थी। मगर मैं चकित इस बात पर था कि वो यहाॅ कैसे? अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि एक बार फिर से ज़ोरदार चीख़ मेरे कानों पर पड़ी। इस बार मुझे स्पष्ट सुनाई दिया और मुझे बिलकुल भी संदेह न हुआ। ये यकीनन चंदा ही थी, मेरी चंदा। ये जान कर कि वो चीख़ मेरी चंदा की ही है मैं एकदम से पागल सा हो गया और चारपाई से उतर कर बिजली की सी तेज़ी से अंदर की तरफ भागा। पलक झपकते ही मैं बरामदे में पहुॅच गया।

मेरी नज़र कमरे के दरवाजे के पास खड़े मेरे मॅझले भाई जगन पर पड़ी। वो अधखुले दरवाजे से कमरे के अंदर की तरफ देख रहा था। ये देख कर मेरा खून खौल गया। मुझे लगा कि वो अंदर वो सब देख रहा है जो कदाचित मेरा बापू मेरी चंदा के साथ करने की कोशिश कर रहा होगा। मैं भला ये कैसे बर्दास्त कर सकता था? मैने देखा कि बरामदे के दाहिनी तरफ मेरी दोनो बहने यानी रीना तथा मीना ज़मीन पर ही एक पुराना चद्दर बिछा कर लेटी हुई थी और उनके बगल से ही मेरा छोटा भाई मदन लेटा हुआ था। बरामदे के बाईं तरफ कोने में रसोई थी।

जगन को इस तरह चोरी छुपे अंदर की तरफ देखते हुए देख कर मैं तेज़ी से उसकी तरफ बढ़ा और पीछे से ही उसकी शर्ट का कालर पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और फिर उसे पलटा कर एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया। उसको इस सबकी उम्मींद हर्गिज़ भी न थी। इधर मैं इतने पर ही न रुका था, बल्कि उसको पकड़ कर पूरी शक्ति से एक तरफ उछाल दिया। वो लड़खड़ाता हुआ दीवार से टकराया और नीचे गिर गया। तभी मेरे कानों में चंदा की चीख़ फिर से पड़ी। मेरा ध्यान उस तरफ गया तो मैं जगन की तरफ न जा कर पलटा और तेज़ी से कमरे के अंदर की तरफ दौड़ गया।

कमरे के अंदर का नज़ारा देख कर मैं गुस्से से पागल हो गया। मेरा बापू चंदा के ऊपर चढ़ा हुआ उसका ब्लाऊज फाड़ रहा था। नशे की हालत में उसे ज़रा भी होश नहीं था कि वो क्या कर रहा है? बापू के नीचे दबी चंदा बुरी तरह छटपटाए जा रही थी और चीखे जा रही थी। ये सब देख कर मैं उस तरफ बिजली की सी तेज़ी से लपका और फिर मैने बापू को पीछे से पकड़ कर पूरी ताकत से अपनी तरफ खींचा और फिर कमरे के फर्श पर लगभग फेंक दिया। बापू नशे में लड़खड़ाता ज़मीन पर लुढ़कता चला गया था।

"तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी चंदा को इस तरह हाॅथ लगाने की?" मैने गुस्से से चीखते हुए झुका और बापू को दोनो हाॅथों से पकड़ कर उठा लिया___"तू इतना गिर गया है कि तुझे ये भी होश नहीं आया कि तू किसके साथ ये नीचता कर रहा है?"

"अबे छोंड़ मादरचोद।" बापू नशे में ज़ोर से चिल्लाया__"मुझे अपनी नई नवेली मेहरिया के साथ सुहागरात मना लेने दे। साला कैसा बेटा है तू कि अपने बाप को उसकी मेहरारू के पास भी नहीं जाने देता?"

 
"ज़ुबान को लगाम दे बापू।" मैने बापू के कालर को पकड़ कर उसे झकझोरते हुए कहा___"वरना यहीं पर ज़िंदा गाड़ दूॅगा तुझे। तुझे पता था न कि मैं चंदा को पसंद करता हूॅ और उसी से शादी करना चाहता हूॅ इसके बावजूद तूने मेरी चंदा से ब्याह कर लिया। ऐसा क्यों किया बापू? चंदा तो तेरी अपनी बेटी के समान ही थी फिर क्यों उससे ब्याह किया तूने? तुझे अपने इस बेटे की खुशियों का ज़रा भी ख़याल नहीं आया?"

"बकवास ना कर हरामखोर।" बापू मुझसे छूटने की कोशिश करते हुए चीखा___"वो तेरी अम्मा है समझे। बार बार मेरी चंदा मेरी चंदा की रट क्यों लगा रहा है तू?"

"क्योंकि चंदा मेरी ही थी बापू।" मैने चीखा___"मैं उससे प्रेम करता था और करता रहूॅगा। तू भी तो जानता था ये सब। फिर क्यों उससे ब्याह रचाया तूने? क्यों अपने बेटे का गर बसने से पहले ही उजाड़ दिया तूने? अरे तुझे अपना ब्याह ही करना था तो किसी दूसरी लड़की से कर लेता बापू। चंदा से ब्याह करके तूने मेरी खुशियों का गला क्यों घोंट दिया?"

"अरे मुझे कुछ नहीं पता था इस बारे में।" बापू ने कहा__"और फिर अगर तू चंदा को पसंद ही करता था और उससे ब्याह ही करना चाहता था तो तुझे बताना चाहिये था न। पर तूने तो कभी बताया ही नहीं। अब अगर मैने उससे ब्याह कर लिया तो इसमे मेरी क्या ग़लती है?"

"सारी ग़लती है तेरी।" मैं पूरी शक्ति से चीखा___"तूने चंदा से उसकी मर्ज़ी के बिना ब्याह किया है। ये बात मैं अच्छी तरह जानता हूॅ। तूने चंदा के बाप को पैसों का लालच दिया होगा। तभी चंदा के बाप ने अपनी बेटी का ब्याह तुझसे किया होगा। उस कसाई को भी अपनी बेटी की खुशियों से कोई लेना देना नहीं था। तभी तो ऑख बंद करके उसने एक बूढ़े से अपनी कम उमर बेटी का ब्याह कर दिया। मुझे पता है कि चंदा इस ब्याह हे खुश नहीं है। अगर खुश होती तो वो इस तरह चीखती नहीं।"

"अरे शुरू शरु में हर औरत थोड़ा बहुत चीखती है उर घबराती है।" बापू ने कहा___"मगर जब एक बार लौड़ा अंदर गया तो सारी घबराहट और सारा चीखना बंद हो जाता है। वही तो करने जा रहा था मैं। मगर ससुरी ज्यादा ही उछल रही थी। लेकिन कोई बात नहीं, सुहागरात तो मैं मना के ही रहूॅगा।"

मैं बापू की इस बात से बुरी तरह तिलमिला गया। मेरे अंदर गुस्से की ज्वाला धधक उठी। मैं बापू को खींच कर कमरे से बाहर लाया और बरामदे में लाकर ज़ोर का झटका दे कर ज़मीन पर पटक दिया। बापू के मुख से दर्द में डूबी चीख निकल गई। वो मुझे गंदी गंदी गालियाॅ बकने लगा। मेरा गुस्सा और बढ़ गया। मैंने उसे उठा कर दीवार से सटा दिया और उसकी गर्दन पर अपने दोनों हाॅथ ताकत से जमा दिये। नतीजा ये हुआ कि बापू बुरी तरह छटपटाने लगा। उसकी ऑखें बाहर को निकलने के लिए आतुर हो उठीं। मुझे गुस्से में अब कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। मैं मजबूती से बापू का गला दबाए जा रहा। तभी पीछे से किसी ने मेरे सिर पर किसी ठोस चीज़ का वार किया। मेरे हलक से चीख़ निकल गई। ऑखों के सामने पहले तो रंग बिरंगे तारे नाचे उसके बाद ऑखों के सामने अॅधेरा सा छाता चला गया। मैं दोनो हाॅथों से अपना सिर थामे लहरा कर वही बरामदे की ज़मीन पर धड़ाम से गिर पड़ा। उसके बाद मुझे याद नहीं कि आगे क्या हुआ?

जब मुझे होश आया और मेरी ऑखें खुलीं तो एकाएक ही तेज़ प्रकाश से मेरी ऑखें चुॅधिया गईं। मैने धीरे धीरे करके अपनी ऑखें खोलीं तो ऑखों के सामने खुला आसमान नज़र आया। पहले तो मुझे कुछ समझ न आया इसके बाद जब मैने ग़ौर से हर चीज़ को देखा तो थोड़ा थोड़ा समझ आया। मैने झटके से उठने की कोशिश की तो मेरे मुख से दर्द भरी कराह निकल गई। सिर के पिछले भाग में तेज़ पीड़ा हुई थी। मेरा एक हाॅथ स्वतः ही उस चोंट वाले हिस्से पर चला गया। मुझे मेरे हाॅथ में कुछ चिपचिपा सा महसूस हुआ। मैं धीरे धीरे करके उठा और वहीं पर बैठ गया।

बैठ कर मैने इधर उधर देखा तो पता चला कि मैं किसी खेत के बीच पर बैठा हुआ हूॅ। एक तरफ लगभग दो सौ गज की दूरी पर गाॅव की आबादी दिख रही थी। किनारे पर बने अपने घर को पहचानने में मुझ ज़रा भी देर न लगी। इसका मतलब मैं अपने घर के पिछवाड़े ही दो सौ गज की दूरी पर था। मेरे दिमाग़ ने काम करना शुरू किया तो मेरी ऑखों के सामने पिछली रात की सारी घटना किसी चलचित्र की भाॅति घूमने लगी।

सब कुछ याद आते ही मुझे सबसे पहले चंदा का ख़याल आया। मेरे मन में विचार उठा कि चंदा कैसी होगी अब? पिछली रात बापू ने क्या किया होगा उसके साथ? कहीं बापू ने चंदा की इज्ज़त तो तार तार तो नहीं कर दिया? हे भगवान, अब क्या होगा? मेरी चंदा लुट गई होगी और मैं अपनी चंदा की सुरक्षा भी न कर सका। ये सब विचार मन में आते ही मैं एकदम से दुखी हो गया और मेरी ऑखों से ऑसू बह चले। मुझे चंदा की बेहद फिक्र होने लगी। इस लिए अपने दर्द की परवाह किये बिना मैं उठा और अपने घर की तरफ तेज़ी से बढ़ चला। मैने महसूस किया कि ये सुबह का वक्त था। आसमान में सूर्य का प्रकाश अभी ज्यादा तेज़ न हुआ था।

मैं अपने घर की तरफ तेज़ी से बढ़ता चला जा रहा था। मेरे मन में बस एक ही बात चल रही थी कि चंदा कैसी होगी अब? मैं भगवान से प्रार्थना भी करता जा रहा था कि चंदा को कुछ न हुआ हो। कुछ ही समय में मैं घर के पिछवाड़े की तरफ पहुॅच गया। एक तरफ वही कुआॅ था जिसमें गिर कर मेरी अम्मा मर गई थी। कुएॅ वाली जगह से कुछ ही दूरी के फाॅसले से चलते हुए मैं घर के पिछवाड़े पर आ गया। पीछे की दीवार से चलते हुए मैं उस हिस्से पर आया जहाॅ पर घर की दीवार खत्म हो जाती थी और फिर लकड़ी की बाउंड्री चारो तरफ से बनाई गई थी। मैं लकड़ी की उस बाउंड्री के शुरूआती हिस्से पर आया ही था कि मेरे कानों में मेरे मॅझले भाई जगन की आवाज़ पड़ी तो मैं रुक गया।

"रीना ने सही वक्त पर शंकर के सिर पर लट्ठ मारी थी बापू।" जगन की आवाज़___"वरना तुम्हारा तो कल्याण ही कर दिया था शंकर ने।"

"हाॅ ये तो सही कहा तूने।" बापू की आवाज़___"सब कुछ वैसा ही करना था जैसा कि हमने तरकीब बनाई थी। मगर तूने अपना काम सही से नहीं किया जगन। वरना शंकर को इतना गुस्सा नहीं आता और ना ही तुझे उससे मार खानी पड़ती।"

"ये दरवाजे से तुम्हारी और चंदा की फिल्म देख रहा था बापू।" मदन कह उठा___"जबकि मैने और रीना ने इसे मना भी किया था कि तरकीब के अनुसार हमें चुपचाप यहीं पर लेटे रहना है। मगर ये नहीं माना और अंदर की फिल्म देखने लगा। उधर जैसे ही चंदा की चीख़ शंकर के कानों में वैसी ही वो दौड़ते हुए यहाॅ आ गया और दरवाजे पर जगन को इस तरह अंदर की तरफ झाॅकते देख उसे क्रोध आ गया। बस फिर तो इसको पिटना ही था बापू।"

"हाॅथ तो मैं भी उठा सकता मदन।" जगन ने तीखे भाव से कहा___"मगर मैने सोचा कि उससे काम न बिगड़ जाए। इस लिए मैने उस कमीने शंकर पर हाॅथ नहीं उठाया। वरना गुस्सा तो मुझे भी भयंकर आ गया था उस पर।"

"अच्छा हुआ कि तुमने हाॅथ नहीं उठाया उस पर।" रीना ने कहा___"वरना कुछ और ही होने लगता और हमारा खेल बिगड़ जाता।"

"ये सब तो ठीक है बापू।" मीना की आवाज़___"मगर मुझे अब तक ये समझ नहीं आया कि ये सब चक्कर क्या है? मतलब ये कि अम्मा के रहने पर भी और उसके मरने के बाद भी तुम्हारी जिस्मानी ज़रूरत तो हम दोनो बहनें मिल कर पूरी कर ही देती थीं। फिर तुम्हें चंदा से ब्याह करने की क्या ज़रूरत पड़ गई? क्या इस लिए कि अब तुम्हारा हमसे दिल भर गया है? दूसरी बात शंकर भाई को इसमें लपेटने का क्या मतलब है?"

"ये सारा चक्कर तो इस जगन की वजह से ही चलाना पड़ा मेरी राॅड बेटी।" बापू की आवाज़___"असल बात ये थी कि इसे भी पता चल गया था कि शंकर चंदा से प्रेम करता है और उससे ब्याह करना चाहता है। अब भला जगन ये कैसे बरदास्त कर लेता कि उसका बड़ा भाई जिसे वो बचपन से ही पसंद नहीं करता है वो किसी वजह से खुश हो जाए? इस लिए शंकर और चंदा के विषय में पता चलते ही ये मेरे पास आया और मुझसे बोला कि शंकर का ब्याह चंदा से किसी भी कीमत पर नहीं होना चाहिए। इसने एक दो बार चंदा को देखा था इस वजह से ये भी उसे पसंद करने लगा था। मगर इसे ये बात अच्छी तरह पता थी कि चंदा इसके प्रेम को स्वीकार नहीं करेगी। इस लिए इसने सोचा कि अगर चंदा इसकी नहीं तो शंकर की भी नहीं होगी। मैने इससे पूछा कि फिर ये चाहता क्या है तो इसने कहा कि कुछ ऐसा करो बापू कि चंदा इस घर में हमेशा के लिए आ जाए और हम सब मिल कर जीवन भर उसे भोगें। बात क्योंकि सबके भले की थी इस लिए मुझे भी इसकी बात पसंद आई। मगर सवाल ये था कि ऐसा होगा कैसे? क्योंकि चंदा तो शंकर से प्रेम करती थी और शंकर उससे ब्याह भी करना चाहता था। मैं भले ही उसे ब्याह से इंकार कर देता मगर उसकी वो सती सावित्री अम्मा उसकी खुशी ही देखती और नतीजा ये होता कि वो शंकर का ब्याह उस चंदा से ज़रूर करा देती। जबकि ऐसा हम चाहते ही नहीं थे। इस लिए हमने सोचा कि सबसे पहले हमें अपने रास्ते से शंकर की उस ससुरी अम्मा को ही हटाना पड़ेगा। वैसे भी वो साली किसी काम की तो थी नहीं। खुद तो मुझे कभी देती नहीं थी ऊपर से उसके डर से हम आपस में भी मज़ा नहीं कर पाते थे। इस लिए उसे अपने रास्ते से हटाने का सोच लिया हमने। ये बात तो तुम सबको पता ही है कि कैसे हम लोगों ने मिल शंकर की अम्मा को अपने रास्ते से हटाया था। वो शंकर साला आज भी यही समजता है कि उसके अम्मा की मौत महज एक हादसा था जो भगवान के विधान के हिसाब से हो गया था। मगर उसे क्या पता कि उसकी अम्मा को हमने कैसे सोच समझ कर अपने रास्ते से हटाया है? हर दिन की तरह उस दिन भी मैं शंकर को लेकर काम पर चला गया था और तुम सबको समझा दिया था कि कब क्या करना है। बस तुम लगों ने वैसा ही किया था। यानी कि जैसे ही शंकर की अम्मा नहाने के लिए कुएॅ में गई तो जगन और मदन भी छुप कर उस तरफ चल दिये। शंकर की अम्मा ने जब बाल्टी को रस्सी से बाॅध कर कुएॅ में डाला और पानी से भरी बाल्टी को खींचना शुरू किया तो तभी जगन और मदन दोनो ने मिल कर अम्मा को पीछे से धक्का दे दिया। जिससे अम्मा रस्सी बाल्टी सहित कुएॅ में जा गिरी। उसको तैरना तो आता नहीं था इस लिए थोड़ी ही देर में साली पानी में डूब गई। कुछ घंटे बाद जब वो वापस पानी की सतह पर आ गई तो जगन और मदन दोनो ही समझ गए कि अम्मा का राम नाम सत्य हो चुका है। इस लिए तुरंत ही अंदर आकर रीना को कह दिया कि अब वो आगे का काम करे। रीना भागती हुई हमारे पास आई और अम्मा के मरने की सूचना हमें दी। बस उसके बाद का तो सबको पता ही है कि क्या कैसे हुआ?"

"अम्मा के मरने का तो पता है बापू।" मीना ने कहा___"मैं चंदा वाले चक्कर का पूछ रही हूॅ। उसके बारे में बताओ।"

"अम्मा के मर जाने से हमारा रास्ता साफ हो गया था।" बापू ने कहा___"मगर शंकर बेचारा ज़रूर अपनी अम्मा के मर जाने से ग़मज़दा हो गया था। जब कुछ दिन उसकी अम्मा को मरे हो गए तो हमने आगे का काम शुरू किया। मैं हर दिन शंकर को काम पर लगा कर चार चार घंटे के लिए गायब हो जाता और सीधा चंदा के गाॅव उसके घर पहुॅच जाता। चंदा का बाप मंगा साकेत थोड़ा लालची किस्म का था और गॅजेड़ी भी था। काम धाम करके जो भी कमाता उसे वह गाॅजा पीकर और देसी चढ़ा कर उड़ा देता था। मैने उसकी इसी आदत का फायदा उठाया और रोज़ उसे देसी दारू पिलाता और खुद भी पीता। कुछ ही दिन में मेरी उससे खूब बनने लगी। एक तरह से मैं उसका पक्का यार बन गया था। ख़ैर, इसी तरह कुछ दिन गुज़र गए। जब मुझे लगने लगा कि अब मुख्य बात आगे बढ़ाने से नुकसान नहीं है तो मैने उससे मुद्दे की बात छेंड़ दी। सबसे पहले तो मैने बस उसके मन और विचार का ही पता लिया। चंदा के ब्याह के बारे में पूछा उससे तो कहने लगा कि उसे चंदा के ब्याह की ही चिंता है। मगर आर्थिक हालत बहुत ज्यादा खराब होने की वजह से वो चंदा का ब्याह कर नहीं पा रहा है। मैंने उसे एक सुझाव दिया कि किसी ऐसे शख्स से वह चंदा का ब्याह कर दे जो उमर में चंदा से थोड़ा बहुत बड़ा हो। इससे उसे ज्यादा दहेज भी नहीं देना पड़ेगा। मेरी बात उसे जॅच गई। आख़िर उसे अपने हालात का तो पता ही था इस लिए बेबसी मे ही सही किन्तु उसे इस बारे में सोचना ही पड़ा। उसने मुझसे पूछा कि ऐसा कौन ब्यक्ति है जो चंदा से उमर में थोड़ा बहुत बड़ा हो और उसे दहेज न देना पड़े तो मैने यूॅ ही मज़ाक में उससे कह दिया कि मेरे साथ ही कर दे अपनी चंदा का ब्याह। मैं दहेज में उससे कुछ नहीं मागूॅगा बल्कि उल्टा उसे ही थोड़ा बहुत रुपया पैसा दे दूॅगा। मैने ये बात उससे बस उसका मन देखने के उद्देष्य से कही थी वो भी हॅसते हुए। वो मेरी ये बात सुन कर हैरान तो हुआ मगर फिर बोला कि यार अगर सच में तुम मेरी चंद से ब्याह कर लो तो मुझे कोई ऐतराज़ न होगा। हाॅ उमर ज़रूर तुम्हारी थोड़ी क्या बहुत ज्यादा है मगर कोई बात नहीं। लड़के बच्चे तो पहले से ही हैं तुम्हारे तो बच्चे के लिए कोई झंझट ही नहीं रहेगी। कहने का मतलब ये कि मज़ाक में कही हुई मेरी बात चल गई। बस फिर क्या था? मैने ज़रा भी देर नहीं की और फटाफट चंदा से ब्याह कर लिया मैने। इस ब्याह में मैने चंदा के बाप को पूरे पचास हज़ार रुपये दिये थे। कुछ ब्याह के खर्च के लिए और कुछ खुशी से। इतने सारे पैसे एक साथ पाकर चंदा का बाप भी खुश हो गया था। इस ब्याह में कोई ताम झाम करने का मैने पहले ही मना कर दिया था। इस लिए किसी को ज्यादा कुछ पता भी नहीं चला। उस दिन भी मैं चंदा के बाप को देसी दारू पिलाकर और पीकर आया था जिस दिन मैने चंदा से ब्याह रचा कर उसे घर लाया था। मुझे पता था कि शंकर को जब ये सब पता चलेगा तो वो पागल सा हो जाएगा। मगर कुछ कर नहीं पाएगा। क्योंकि सबसे बड़ी सच्चाई तो यही बन जाएगी न कि चंदा अब उसकी प्रेमिका नहीं बल्कि अम्मा है। अगर उसमें ज़रा सी भी ग़ैरत होगी तो वो खुद ही इस गर की छोंड़ कर कहीं चला जाएगा या फिर जीवन भर अपनी चंदा को अम्मा के रूप में देख कर अंदर ही अंदर तड़पता रहेगा। जबकि हम सब हर दिन हर रात उसकी चंदा का भोग लगाएॅगे।"

बाहर दीवार की ओट में खड़ा मैं बापू की ये सब बातें सुन रहा था। मेरा चेहरा ऑसुओं से तर था। अपनी जगह पर मैं इस तरह खड़ा रह गया था जैसे किसी ऋषी ने मुझे पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया हो। इतना बड़ा छल, इतना बड़ा अपराध किया था इन लोगों ने मिल कर जिसकी कोई सीमा नहीं थी। एक बाप के अपनी ही बेटी के साथ नाजायज़ संबंध थे और मेरे दोनो भाइयों के अपनी बहनों के साथ। ये एक ऐसी सच्चाई थी जिसे मैं सब कुछ सुन लेने के बावजूद हजम नहीं कर पा रहा था। मेरे अंदर जज़्बातों का भयंकर तूफान चालू था। ऐसा लग रहा था जैसे सारी कायनात को एक झटके में शोलों के हवाले कर दूॅ। मगर ऐसा करना मुझसे संभव न था। जबकि उधर,,,,

"ये सब छोंड़ो बापू।" तभी जगन की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी___"अब तो जो होना था वो तो हो ही गया। हमने कल रात जी भर के चंदा के मज़े लिए। कसम से बापू बड़ा ही कड़क माल थी चंदा। साली ने ग़जब का मज़ा दिया।"

"मज़ा तो हमने ज़बरदस्ती लिया भाई।" मदन ने कहा___"वो तो हमें हाॅथ भी नहीं लगाने दे रही थी। बार बार हमसे रहम की भीख माॅग रही थी और अपनी इज्ज़त की दुहाई दे रही थी। मगर हमने तो मज़ा करना था सो किसी तरह कर ही लिया। बाद में तो उसके भी कस बल ढीले पड़ गए थे। साली ऐसे लेटी रह गई थी जैसे कह रही हो कि आओ और कर लो जो करना हो। हाहाहाहा।"

"नया माल मिल गया तो कल रात हम बहनों की तरफ देखा भी तुम लोगों ने।" रीना की आवाज़ में शिकायत थी, बोली___"सच कहती हैं औरतें कि सब मर्द एक जैसे ही होते हैं। नया और ताज़ा बिल मिल गया तो भोसड़े की तरफ फिर देखते भी नहीं मर्द।"

"अरे ऐसी कोई बात नहीं है मेरी रंडी बेटी।" बापू की आवाज़___"बस कल रात की ज़रा बात ही अलग थी न इस लिए। बाॅकी ये तो तू भी जानती है न कि नया नौ दिन तो पुराना सब दिन। इस लिए चिंता मत कर तुम दोनो हमारी असली माल ही हो।"

"बापू बड़ा दिल कर रहा है।" जगन की आवाज़___"ऐसा लगता है कि फिर से चंदा रानी के पास जाऊॅ और तबीयत से उसकी बजा कर आऊॅ।"

"भाई तूने तो मेरे मुह की बात कह दी।" मदन की आवाज़ सुनाई दी___"मेरा भी बहुत दिल कर रहा है चंदा को पेलने का। चल दोनो एक एक बार तबीयत से पेल कर आते हैं उसे। क्यों बापू तुम्हें भी चलना है???"

"अरे नहीं भई।" बापू की हॅसी की आवाज़___"तुम दोनो ही जाओ। मुझमें अभी इतनी शक्ति नहीं है कि तुम लोगों का साथ दे सकूॅ। साला कल रात दारू के नशे में समझ में ही नहीं आया कितनी मेहनत हो गई मुझसे। अब जब दारू उतरी तो समझ आ रहा है कि टाॅगों में जान ही नहीं है।"

"हाहाहाहाहा ले भाई।" मदन के ठहाकों की आवाज़ गूॅजी___"बापू तो गया काम से। चल हम दोनो ही किला फतह करके आते हैं।"

"हाॅ हाॅ जाओ जाओ।" मीना की आवाज़___"कर लो किला फतह। मगर याद रखना लौट कर हमारे पास ही आओगे।"

"जाने दे मेरी राॅड बिटिया।" बापू बोला___"नया माल है न इस लिए उसकी चुलुक कुछ ज्यादा ही होती है। याद कर जब इन लोगों तुम दोनो के साथ जब किया था तो कैसे सारा दिन तुम दोनो के पीचे पीछे घूमते रहते थे?"

"अच्छी तरह याद है बापू।" मीना के हॅसने की आवाज़ आई___"ये दोनो हम दोनो बहनों के पीछे पीछे लगे ही रहते थे। इन लोगों को तो ये भी होश नहीं रहता था कि अम्मा को अगर पता चल गया तो क्या ग़जब हो जाएगा?"

बाहर खड़ा मैं ये सब सुन रहा था और अंदर ही अंदर गुस्से की आग में जला जा रहा था। मुझे लग रहा था कि अभी जाऊॅ और सबको एक साथ खत्म कर दूॅ। मेरे हाॅथों की दोनों मुट्ठियाॅ कस गईं थी। जबड़े शख्ती से भिंच गए थे। नथुने फूल कर गुब्बारा हुए जा रहे थे। तभी,,,,

"ओएऽऽ बाऽऽऽपू ग़जब हो गया रे।" जगन की लगभग बदहवाशी से भरी आवाज़ सुनाई दी___"सब गड़बड़ हो गया। अब क्या होगा बापू???"

"अरे क्या हुआ?" बापू ने घुड़की सी दी___"क्यों चिल्ला रहा है? क्या गड़बड़ हो गया???"

"बापू वो वो चंदा।" मदन की लड़खड़ाती हुआ आवाज़ सुनाई दी___"अंदर वो चंदा ऐसे पड़ी है जैसे मर गई है।"

"क्या बकता है मादरचोद??" बापू की जैसे चीख ही निकल गई थी, बोला___"बहनचोद साले शुभ शुभ बोल।"

"मदन सच कह रहा है बापू।" जगन की आवाज़__"हम दोनों जब अंदर गए तो देखा चंदा चारपाई पर आधी लटकी हुई पड़ी थी एकदम वैसी ही नंगी हालत में जैसे कल रात हम छोंड़ कर आए थे उसे। मैने उसकी नाॅक के पास उॅगली रखी और उसकी कलाई की नब्ज भी देखी। मगर ना ही उसके नाॅक से साॅस आ जा रही है और ना ही नब्ज चलती हुई महसूस हो रही है। इसी लिए हमें लग रहा है कि चंदा का राम नाम सत्य हो गया है। अब क्या होगा बापू? चंदा अगर सच में मर गई और ये बात गाॅव वालों को पता लग गई तो हम कहीं के न रह जाएॅगे बापू।"

जगन की इन बातों के बाद कुछ देर तक कोई आवाज़ न आई। जैसे उधर सबको साॅप सूॅघ गया हो। बाहर खड़ा मैं भी ये सुन कर जैसे बेजान लाश में तब्दील हो गया था। जिसका डर था वो तो हो ही चुका था किन्तु इस सबका परिणाम ये निकलेगा ये मैने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। मुझे लगा कि मैं दहाड़ें मार कर रो पड़ूॅ मगर मैने अपने अंदर के मचलते हुए जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से दबाया हुआ था। जबकि उधर,

"ये तो सच में बहुत ही बुरा हुआ।" बापू की आवाज़ में डर व भय झलक रहा था___"ये सब हमारी वजह से ही हुआ है। हमने अपने मज़े के चक्कर में ये भी नहीं सोचा कि कच्ची उमर की उस चंदा के साथ इतना कुछ एक ही बार में नहीं करना चाहिए था। वरना उसका परिणाम यकीनन यही निकलेगा। दूसरी बात हमने शंकर को रात में खेतों पर फेंक आए थे। वो उस वक्त बेहोशी हालत में था। संभव है कि उसे अब तक होश भी गया होगा। अब अगर इस परिस्थिति में वो यहाॅ आ गया तो हम सोच भी नहीं सकते हैं कि वो क्या कर डालेगा? चंदा को इस हाल में देखेगा तो वो यकीनन हम सबके लिए काल बन जाएगा।"

"बापू शंकर की इस बात से मेरे दिमाग़ में एक ज़बरदस्त तरकीब आई है।" जगन की आवाज़___"अगर कहो तो उगलूॅ मुख से??"

"अरे तो उगल ना मादरचोद।" बापू चीखा__"क्या तब उगलेगा जब तेरी अम्मा चुद जाएगी साले??"

"मेरी दोनो अम्मा को तो तुमने ही चोद डाला है बापू।" जगन के हॅहने की आवाज़___"ये अलग बात है कि तुमने हमें हमारी पहली अम्मा को पेलने का मौका नहीं दिया जबकि उसको पेलने की हमारी हसरत साली धरी की धरी रह गई।"

"बकवास ना कर बहनचोद।" बापू गुर्राया___"पहले तरकीब उगल मुख से। साला सत्यानाश हो गया हमारा।"

"बापू तरकीब ये है" जगन की आवाज़___"कि चंदा की इस मौत में हम उस मादरचोद शंकर को फॅसा देते हैं।"

"वो कैसे?" बापू का चौंका हुआ स्वर उभरा__"मेरा मतलब कि हम शंकर को चंदा की मौत में कैसे फॅसा सकते हैं?"

"बड़ी सीधी सी बात है बापू।" जगन ने कहा___"हम सबको बताएॅगे कि ये सब शंकर ने ही किया है। हम गाॅव वालों को बताएॅगे कि तुमने जिस चंदा से ब्याह किया उसे शंकर पहले से ही पसंद करता था और उससे ब्याह भी करना चाहता था। जबकि चंदा तो शंकर को जानती भी नहीं थी। शंकर ने जब देखा कि वो जिसे पसंद करता था और जिससे ब्याह करना चाहता था वो तो खुद उसके ही बाप की जोरू बन गई तो शंकर ये सहन न कर सका। उससे ये सहन न हुआ कि जिसे वो खुद अपनी जोरू बनाना चाहता था वो खुद उसके बाप की ही जोरू बन कर उसकी अम्मा बन गई। इस लिए वो रात को देशी दारू पी कर आया और ज़बरदस्ती बापू के कमरे में घुस गया। कमरे में उसने जबरदस्ती चंदा की इज्जत को लूटा और फिर उसकी जान भी ले ली।"

"तरकीब तो अच्छी है बेटवा।" बापू की आवाज़___"पर गाॅव वाले यकीन कैसे करेंगे? वो तो पूछेंगे न कि शंकर ने ये सब हम सबकी मौजूदगी में कैसे कर लिया? तब क्या जवाब देगा तू?"

"हम उनसे कहेंगे कि शंकर ने कमरे के दरवाजे पर इस तरह मोटी सी लकड़ी से टेक लगा दिया था कि उस दरवाजे को लाख कोशिशों के बाद भी हम सब खोल नहीं पाए।" जगह कह रहा था___"कमरे का वो दरवाजा तभी खुला जब शंकर ने चंदा का काम तमाम कर दिया था। उसके बाद वो खुद ही बाहर आ गया था। उसके हाथ में मोटी सी वही लकड़ी थी जिससे उसने दरवाजे पर टेक लगाया हुआ था। हम सब ये डर से कुछ न बोल सके थे कि कहीं वो गुस्से में हम लोगों को मारना न शुरू कर दे। बस इतनी बात काफी है गाॅव के लोगों को यकीन दिलाने के लिए।"

"ऐसा तुझे लग रहा है।" बापू की आवाज़___"जबकि कुछ लोग ये भी पूछ सकते हैं कि जब हमारे घर में ये सब हो रहा था तो हमने शोर शराबा करके गाॅव वालों को क्यों नहीं बुला लिया? तब क्या कहेंगे हम?"

"हम कह देंगे बापू कि हमें उस वक्त कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या करें और क्या न करें?" जगन ने कहा__"बस गाॅव वालों को हमारी बात पर यकीन करना ही पड़ेगा। वैसे भी गाॅव के लोगों को ये उम्मीद भला कहाॅ होगी इस सबकी जो हम लोगों ने किया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये भी हमारी बात को साबित करेगी जब शंकर यहाॅ पर मौजूद नहीं रहेगा। शंकर की ग़ैर मौजूदगी भी गाॅव वालों को यकीन दिलाने में पुख्ता वजह रहेगी।"

"लेकिन शंकर यहाॅ मौजूद क्यों नहीं होगा भला?" बापू की आवाज़___"वो भला कहाॅ चला जाएगा?"

"ग़ौर करने वाली बात है बापू।" जगन ने कहा__"शंकर की जानकारी में और उसके सामने इतना कुछ हो गया है उसकी प्रेमिका के साथ। तो भला वो अब यहाॅ किस वजह से लौट कर आएगा? दिल का मामला बड़ा विचित्र होता है बापू। उसका इस संसार में उसके प्रेमी के अलावा दूसरा कोई नहीं रह जाता और जब उसके रहते उसकी प्रेमिका का ये हाल हो जाए तो भला वो अपना मुह दिखाने के लिए यहाॅ क्यों रहेगा? बल्कि वो तो कहीं पर चुल्लू भर पानी की तलाश करेगा ताकि उसमें डूब कर वो मर सके।"

"वाह भाई वाह क्या लच्छेदार बात कही है मेरे मादरचोद बेटे ने।" बापू की प्रशंशा में डूबी हुई आवाज़__"ये तो कमाल ही हो गया। इतनी बड़ी और इतनी गहरी बात मेरे दिमाग़ में नहीं आई। जबकि तूने साबित कर दिया कि तू इस संसार का सबसे बड़ा वाला कमीना इंसान है।"

"बापू तारीफ़ करने का भला ये कौन सा तरीका है?" मदन ने हॅसते हुए कहा___"जगन ने ग़लत क्या कहा भला? सारी बातों को सोच कर उसने इस सबसे बचने की जो तरकीब बताई है वो यकीनन लाजवाब है। इस लिए अब हमें बिलकुल भी देर नहीं करना चाहिए। बल्कि तुरंत ही जगन की इस तरकीब पर अमल करना चाहिए।"

"सही कह रहा है तू।" बापू की आवाज़___"इसके सिवा दूसरा कोई चारा भी तो नहीं है हमारे पास। अतः अब हम जगन की इस तरकीब के अनुसार ही काम शुरू करते हैं। अब जो होगा देखा जाएगा।"

उधर वो सब तरकीब पर अमल करने की बातें कर रहे थे जबकि इधर मेरे गुस्से की जैसे इंतहां हो गई थी। इतनी घटिया सोच और ऐसे पापी लोगों का इस समाज में जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं रह गया था। मेरे दिलो दिमाग़ उन सबके लिए घृणा और नफ़रत में निरंतर इज़ाफा होता चला गया था। मैं तुरंत ही अपनी जगह से हिला और लकड़ी की उस बाउंड्री के इस पार से चलते हुए घर के सामने की तरफ आया और सामने से अंदर की तरफ बढ़ चला।

बरामदे के बाहरी तरफ दीवार पर टेक लगा कर रखी हुई कुल्हाड़ी पर मेरी नज़र पड़ी। मेरे जिस्म में दौड़ते हुए लहूॅ में जैसे एकदम से उबाल आ गया। मैं तेज़ी से उस कुल्हाड़ी की तरफ बढ़ा और उसे दाहिने हाॅथ से उठा कर बरामदे की तरफ बढ़ा। अंदर दाखिल होते ही मुझे जगन और मदन मेरी तरफ पीठ किये खड़े नज़र आए। इससे पहले कि कोई कुछ महसूस कर पाता मेरा कुल्हाड़ी वाला हाॅथ बिजली की तरह चला और खचाऽऽक से जगन की गर्दन पर पड़ा। कुल्हाड़ी वार लगते ही जगन की गर्दन आगे की तरफ झूल गई। उसके कटे हुए धड़ से खून का मानो फब्बारा सा उठ गया। इधर मैं इतने पर ही नहीं रुका। बल्कि किसी के होश में आने से पहले ही एक बार पुनः मेरा कुल्हाड़ी वाला हाॅथ बिजली की सी तेज़ी से चला और इस बार मदन के सीने में गड़ता चला गया। सीने में इस लिए कि वो ऐन वक्त पर मेरी तरफ घूम गया था।

पल भर में इस सबको देखते ही मेरी दोनो बहनों के हलक से चींखें निकल गई। बापू के सामने ही उसके पैरों के पास जगन मृत अवस्था में खून से लथ पथ पड़ा था। ये देख कर बापू को जैसे लकवा सा मार गया था। उसकी घिग्घी बॅध गई थी। इधर मेरी एक बहन मीना बाहर की तरफ तेजी से भागी। मैने पलट कर तेज़ी से कुल्हाड़ी चला दी। कुल्हाड़ी उड़ते हुए मीना की पीठ पर गड़ती चली गई और वो प्रहार के वेग में मुह के बल ज़मीन पर गिरी। वो मछली की तरह कुछ देर तड़पी और फिर शान्त पड़ गई। मैने आगे बढ़ कर उसकी पीठ से एक ही झटके में कुल्हाड़ी को खींच लिया।

उधर रीना के चिल्लाने से जैहे बापू को होश आया। अतः वो तुरंत उठा और कमरे के अंदर की तरफ शोर मचाते हुए भागा। उसके पीछे ही रीना भी भागी। कमरे के अंदर जा कर दोनो ने दरवाजे को बंद कर अपने अपने हाॅथों से दरवाजे पर ताकत से दबाव बढ़ा दिया।

"दरवाजा खोल बापू।" मैं कुल्हाड़ी लिए शेर की तरह गरज उठा था___"आज मेरे हाॅथों तुम सबकी मौत निश्चित है।"

"ये तूने किया शंकर?" अंदर से बापू की भय से काॅपती हुई आवाज़ आई___"तूने अपने हाॅथों अपने ही भाई और बहन को काट कर मार डाला। आख़िर ऐसा क्या हो गया है तुझे कि तूने ये नरसंघार कर दिया?"

"मुझसे क्या पूछता है हरामज़ादे?" मैने दहाड़ते हुए कहा___"इस सबका कारण तो तू ही है। मैने तेरी और तेरे इन पिल्लों की सारी बातें सुन ली हैं। तूने अपने मतलब के लिए मेरी अम्मा को कुएॅ में गिरा कर मार डाला। उसके बाद तूने मेरी मासूम चंदा के भोले भाले बाप को फॅसा कर उसकी बेटी से ब्याह किया। सिर्फ इस लिए कि तू उस मासूम और निर्दोष के साथ मज़े कर सके और ये सब तूने उस मादरचोद जगन के कहने पर किया। ये बता कि तुझे एक बार भी नहीं लगा कि जो ते कहने जा रहा है वो सबसे बड़ा पाप है? अपनी ही बेटियों के साथ तू मुह काला करता है। तेरे दोनो बेटे अपनी ही बहन के साथ नाजायज़ संबंध बनाते हैं। इतना ही नहीं तू खुद भी उन के साथ ये सब करता है। अरे तुझसे बड़ा इस संसार में कौन होगा बापू? तूने दो पल के मज़े के लिए रिश्तों को भी नहीं बक्शा। मेरी देवी जैही माॅ को मार डाला तूने और तेरे इन पिल्लों ने।"

"ये सब झूॅठ है शंकर भाई।" रीना रोते बिलखते हुए चिल्ला पड़ी___"तुम जो समझ रहे हो वैसे कुछ भी नहीं है।"

"तू चुप कर बदजात लड़की।" मैं पूरी शक्ति से चिल्लाया था, बोला___"तुझे तो अपनी बहन कहते हुए भी मुझे शर्म आती है ऐ बेहया। तुझमें इतनी ही हवश की आग भरी हुई थी तो कहीं भाग जाती किसी के साथ। कम से कम रिश्तों पर कलंक तो न लगता। मगर नहीं, तू अपने बाप और भाई की राॅड बन गई न। नहीं छोंड़ूॅगा, किसी को भी ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा। दरवाजा खोल वरना इसी कुल्हाड़ी से इस दरवाजे को काट काट कर टुकड़े टुकड़े कर दूॅगा और फिर वैसे ही टुकड़े तुम दोनो नाली के कीड़ों के करूॅगा।"

"हमें माफ़ कर दे शंकर।" बापू ने रोते गिड़गिड़ाते हुए कहा___"हमसे सच में बहुत बड़ा पाप हो गया है। लेकिन आख़िरी बार माफ़ कर दे हमें। अब दुबारा ऐसा कभी नहीं करेंगे हम। देख तूने अपने ही दो भाई और एक बहन को मार डाला। अब कम से कम हमें तो छोंड़ दे।"

"तू बाहर निकल बेटीचोद।" मैने चिल्लाया___"उसके बाद बताता हूॅ कि कैसे माफ़ करता हूॅ मैं?"

"भगवान के लिए भाई।" रीना बुरी तरह रो रही थी__"बस एक बार माफ़ कर दे। सच कहती हूॅ जीवन भर तेरी टट्टी खाऊॅगी मैं।"

"मैं आख़िरी बार कह रहा हूॅ कि दरवाजा खोल।" मैं गुस्से में चीखा___"वरना दरवाजे को काटने में मुझे ज्यादा समय नहीं लगेगा। उसके बाद मैं तुम दोनो का क्या हस्र करूॅगा तुम सोच भी नहीं सकते।"

"बेटा माफ़ कर दे न।" बापू गिड़गिड़ाया___"अरे मैं तेरा बाप हूॅ रे। तुझे बचपन से पाल पोष कर बड़ा किया है।"

"तो कौन सा बड़ा काम किया है तूने?" मैने कहा__"तू मुजे बचपन में ही मार देता तो अच्छा होता। कम से कम आज ये सब देखने सुनने को तो न मिलता। मेरी मासूम सी चंदा को तुम लोगों ने रौंद रौंद कर मार डाला। मेरी देवी जैसी अम्मा को मार डाला तुम लोगों ने। अगर तुम लोग मेरी अम्मा और चंदा को वापस मुझे लाकर दे दो तो माफ़ कर दूॅगा। वरना भूल जाओ कि मैं माफ़ कर दूॅगा तुम दोनो को।"

अंदर से कोई वाक्य न फूटा उन दोनों के मुख से। बस दोनो के रोने की आवाज़ें गूॅजती रही। मेरा गुस्सा प्रतिपल बढ़ता ही जा रहा था। मुझसे बरदास्त न हुआ तो मैं कुल्हाड़ी का वार दरवाजे पर करने लगा। मेरे ऐसा करते ही रीना और बापू ज़ोर ज़ोर से चीखने लगे और रहम की भीख माॅगने लगे। मगर मैं न रुका बल्कि लगातार कुल्हाड़ी का वार दरवाजे पर करता चला गया। नतीजा ये हुआ कि कुछ ही देर में लकड़ी का वो दरवाजा कट कट कर टुकड़ों में निकलने लगा। थोड़ी ही देर में मुझे रीना का हाॅथ नज़र आया जो दरवाजे पर टिका हुआ था। मैने गुस्से में आव देखा न ताव, कुल्हाड़ी का वार सीधा उसके हाॅथ पर किया। खचाऽऽऽच की आवाज़ के साथ ही रीना का हाॅथ उसकी कलाई से कट गया। खून का तेज़ फब्बारा उछल कर फैल गया। कलाई से हाॅथ कटते ही रीना की हृदय विदारक चीख गूॅज गई। वो दरवाजे से हट कर अपने दूसरे हाॅथ से कटे हुए हाॅथ को पकड़े पीछे हटती चली गई। उसका ये हाल देख कर बापू भी मारे डर के पीछे की तरफ भागा। दोनो के जाते ही दरवाजे पर से उन दोनो का दबाव हट गया।

मैने दरवाजे पर ज़ोर से एक लात मारी तो दरवाजा खुलता चला गया और इसके साथ ही उन दोनो की चीखना चिल्लाना भी बढ़ गया। मैं दरवाजे के अंदर दाखिल हुआ और उन दोनो की तरफ बढ़ने ही वाला था कि मेरी नज़र बगल से रखी चारपाई पर आधी लटकी हुई चंदा की नंगी लाश पर पड़ी। मेरे अंदर पीड़ा की तीब्र लहर दौड़ती चली गई। मेरी मोहब्बत का ये हाल किया था इन लोगों ने। ये देख कर ही मेरे अंदर भयंकर गुस्सा भर गया। मैं तेज़ी से उन दोनो की तरफ बढ़ा।

बापू और रीना रोने और चीखने की मशीन बन गए थे। उन दोनो के चेहरे मौत के डर से पीले ज़र्द पड़ गए थे। कमरे में हर तरफ रीना के कटे हुए हाॅथ का खून फैला हुआ था। मैं आखे बढ़ते हुए बापू के क़रीब गया यो बापू मेरे पैरों में गिर पड़ा। मैने अपने उस पैर को ज़ोर से झटक दिया जिस पैर पर बापू गिरा पड़ा था। झटका खाते ही बापू उछल कर पिछली दीवार से टकराया। मैं आगे बढ़ कर उसके पास गया और एक हाथ से उसके सिर के बालों को पकड़ कर उठा लिया। मैने देखा बापू के चेहरे पर मौत का भय साक्षात ताण्डव करता नज़र आ रहा था।

"अब बता मेरे हरामी बापू।" मैं गुर्राया___"इस कुल्हाड़ी से तेरे कितने टुकड़े करूॅ?"

"नहीं नहीं शंकर।" बुरी तरह काॅपते हुए कहा बापू बिलबिला उठा___"मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं तेरा बाप हूॅ। अपने आस पापी बाप को बस एक बार माफ़ कर दे।"

खचाऽऽऽक! कुल्हाड़ी का वार बिजली की सी तेज़ी से हुआ और कुल्हाड़ी का फल बापू की जाॅघ में घुस गया। बापू के हलक से हलाल होते बकरे जैसी आवाज़ निकली। जाॅघ से भल्ल भल्ल करके खून बहने लगा। तभी एक चीख मुझे अपने पीछे की तरफ सुनाई दी। मैं तेज़ी से पलटा तो देखा अपनी कलाई थामें रीना बाहर की तरफ भागी जा रही थी। उसके बाहर निकलते ही मैं भी पलट कर उसके पीछे भागा किन्तु तभी बाहर से कुछ लोग आ गए और मुझे पकड़ लिए। मैं उन लोगों की पकड़ से छूटने के लिए ज़ोर आजमाईश करने लगा। साथ ही चीखते हुए कहे भी जा रहा था कि___"मुझे छोंड़ दो वरना तुम सबको काट डालूॅगा इस कुल्हाड़ी से।"

मगर वो मुझे छोंड़ नहीं रहे थे। देखते ही देखते मेरे उस घर में लोगों का ताॅता लग गया। हर ब्यक्ति मेरे घर के इस भयानक दृष्य को देख कर आश्चर्यचकित था। उनकी ऑखें हैरत से फटी पड़ी थीं। मुझे पकड़े हुए लोग मुझसे पूछे जा रहे थे कि ये सब क्या है? मैने ये सब क्यों किया? मैने चीखते हुए उन सबको सारी बात संक्षेप में बताई। जिसे सुन कर हर कोई हक्का बक्का रह गया। कुछ लोगों की नज़र कमरे के अंदर कराह रहे बापू पर पड़ी तो वो भागते हुए बापू के पास गए। लोगों को देखते ही बापू की जान में जान आई और वो डर व भय से एक ही बात रटने लगा। वो ये कि मुझे इस लड़के से दूर ले चलो। ये मुझे मार डालेगा, काट डालेगा।

कुछ लोगों ने मिल कर बापू को सहारा देकर उठा लिया और कमरे से बाहर ले गए। इधर मैं काफी देर तक उन लोगों के चंगुल से निकलने की कोशिश करता रहा मगर निकल न सका। थक हार कर मैंने ज़ोर आजमाईश करना बंद कर दिया। ऐसे ही वो दिन गुज़र गया।

उस दिन गाॅव में इतना बड़ा संगीन काण्ड हुआ मगर किसी ने भी इस सबकी सूचना पुलिस को न दी। मैं हैरान भी था कि ऐसा लोगों ने क्यों किया? कुछ लोग रीना के पीछे भी गए थे मगर वो लोग खाली हाॅथ वापस आ गए। उन्हें रीना कहीं भी न मिली थी। बापू को इलाज के लिए तुरंत अस्पताल ले गए थे कुछ लोग। मेरे दोनो भाई और एक बहन मीना की लाश को एक जगह लिटा कर उन्हें सफेद क़फन से ढॅक दिया गया था। कुछ औरतें कमरे के अंदर जाकर चंदा के नंगे जिस्म को किसी तरह ढॅक दिया था।

गाॅव वालों ने मुझसे सबकी चिता को आग देने के लिए कहा तो मैंने सिर्फ चंदा की चिता को आग लगाई जबकि अपने दोनो भाई व बहन को चिताग्नि देने से ये कह कर साफ मना कर दिया कि ये मेरे कोई नहीं थे। मेरे ऐसा कहने पर गाॅव के मेरी ही बिरादरी के एक आदमी ने आग दी थी। उस दिन पूरा दिन मेथे घर में लोगों की भीड़ रही। मैं एक जगह गुमसुम बैठा था। ख़ैर धीरे धीरे सब लोग अपने अपने घरों को चले गए।

उसी रात मैने वो गाॅव और वो घर हमेशा हमेशा के लिए त्याग दिया था। मुझे नहीं पता मैं कहाॅ कहाॅ बेवजह भटकता रहा? धीरे धीरे समय गुज़रा और इस घटना को घटे पाॅच साल गुज़र गए। मैं इन पाॅच सालों में कुछ हद तक सम्हल गया था। दो वक्त की रोटी के लिए जैसा भी काम मिलता तो करता और दो वक्त की रोटी खाकर दिन काटने लगा था।

ऐसे ही एक दिन एक ऐसे आदमी से मेरी मुलाक़ात हुई जो फौज में मेजर की पोस्ट से रिटायर होकर आया था। मुझमें अब तक काफी बदलाव आ गया था। सब कुछ भुला कर मैं अपने मन मर्ज़ी से जी खा रहा था। ख़ैर, उस मेज़र से मुलाक़ात हुई तो मैने उससे काम माॅगा। दरअसल मैं हर जगह भटकते भटकते उकता सा गया था इस लिए चाहता था कि कहीं ऐसी जगह कोई काम मिल जाए जिससे मुझे बार बार जगह न बदलना पड़े। मेरे काम माॅगने पर मेजर ने मेरी तरफ ग़ौर से देखा। मेरी कद काठी ठीक ठाक ही थी। वो मुझे देख कर मुस्कुराया और पूछा क्या काम कर सकते हो? मैने कहा कि मैं दुनियाॅ का हर काम कर लूॅगा लेकिन कोई ग़लत काम तो मैं हर्गिज़ भी न करूॅगा भले ही चाहे भूॅखा मर जाऊॅ।

मेरी इस बात से मेजर प्रभावित हुआ और मुझे अपने घर ले गया। मेजर का घर घर जैसा नहीं बल्कि कोई बॅगला दिख रहा था। मेजर ने मुझसे कहा कि आज से तुम इस बॅगले की देख रेख करोगे। फिर क्या था मैं मेजर के कहे अनुसार बॅगले की देख रेख करने लगा। बॅगले से कुछ दूरी पर सर्वेन्ट क्वार्टर बना हुआ था जहाॅ पर मुझे रहने के लिए मेजर ने कह दिया था। मेजर के अपने परिवार में उसकी एक जवान बेटी बस ही थी। उसकी बीवी कुछ साल पहले भगवान को प्यारी हो गई थी। उसने दूसरी शादी नहीं की थी। उसके लिए उसकी बेटी ही सब कुछ थी। मेजर का और भी परिवार था जैसे कि उसके बड़े भाई वगैरा।

मेजर ने मुझे बंदूख चलाना सिखा दिया था और चूॅकि वो फौजी बंदा था इस लिए उसके नियम कानून भी शख्त और पक्के थे। हर सुबह चार बजे उठना और फिर उसके साथ एक्सरसाइज़ करना, उसके साथ दौड़ लगाना। ये सब जैसे एक रुटीन सा बन गया था। मुझे अपने आप में ऐसा महसूस होता जैसे मैं भी मेजर की तरह एक फौजी आदमी था। मेजर की बेटी बहुत ही प्यारी बच्ची थी। रुपये पैसे का ज़रा भी घमंड नहीं था उसे। मैं भले ही छोटी जाति का था मगर कोई भी मुझे कहीं आने जाने से रोंकता नहीं था। एक तरह से मैं भी उस घर का सदस्य बन गया था। मेजर की बेटी मुझे दिन भर चाचू चाचू कह कर पुकारती रहती थी। पता नहीं उसे मुझमें ऐसा क्या नज़र आता था जिसकी वजह से वो मुझे बहुत स्नेह देती थी। वो बिलकुल किसी गुड़िया की तरह थी। मैं शुरू शुरू में उससे ज्यादा बात नहीं करता था। इसकी वजह ये थी कि मुझे लड़की व औरत जात से नफ़रत सी हो गई थी।

धीरे धीरे ऐसे वक्त गुज़रने लगा और मेजर के यहाॅ रहते हुए मुझे चार साल गुज़र गए। इन चार सालों में मैं मेजर और उसकी बेटी से इतना घुल मिल गया था कि मुझे लगता ही नहीं था कि मैं इनके लिए कोई पराया हूॅ। मेजर की बेटी को मैं अपनी बेटी की तरह मानता था और हर पल उसे खुश रहने की भगवान हे दुवाएॅ करता रहता था। उसे देख कर हर दुख दूर हो जाता था। मैं तो जैसे अपने अतीत का हर किस्सा भूल गया था। मगर फिर से एक बार मेरे नसीब में बुरा दिन आ गया। मेजर के बड़े भाई का लड़का पढ़ाई के सिलसिले में आया और फिर मेजर के ही बॅगले पर रहने लगा। मुझे उसकी शक्ल देख कर अजीब सा एहसास होता। हलाॅकि वो देखने में सुंदर गबरू जवान था किन्तु उसकी ऑखों में जाने ऐसा क्या था कि मुझे वो खटकने लगा था। ख़ैर, कुछ ही दिनों में मुझे समझ आ गया कि मुझे ऐसा क्यों लगता था।

मेजर का भतीजा बड़ा ही शातिर किस्म का लड़का था। वो मेजर के सामने उससे बहुत ही सलीके से बातें करता और ऐसा दर्शाता कि उसके जैसा संस्कारी लड़का दुनियाॅ जहाॅन में कहीं ढूॅढ़ने पर भी नहीं मिलेगा। किन्तु मेजर के न रहने पर वो हमेशा मेजर की बेटी को जो कि खुद उसके सगे चाचा की ही बेटी थी यानी कि उसकी बहन थी तो वो उसे ताड़ता रहता था। उसकी ऑखों में हवस स्पष्ट दिखाई देती थी। मैं दिन में ज्यादातर बॅगले के बाहर मुख्य द्वार पर ही रहता था। बीच बीच में मैं इधर उधर का चक्कर लगाता और कभी कभी बॅगले के अंदर भी घूम आता। यही मेरे काम का तरीका नियम बद्ध था।

मैं मेजर के उस भतीजे के चलते मेजर की बेटी कुमुद के लिए बेहद चिंतित व परेशान होने लगा था। मैं अच्छी तरह समझ चुका था कि उस नामुराद लड़के की नीयत कुमुद बेटिया पर ख़राब हो चुकी थी। मैने इस बारे में मेजर से इस लिए कुछ भी नहीं बताया था क्योंकि मेरे पास उस लड़के के खिलाफ़ कीई सबूत नहीं था। मेजर अपने भतीजे के प्रति मेरी वो सब बातें कभी न मानता बल्कि उल्टा मुझ पर ही गुस्सा करता और मुझे काम से भी निकाल देता। इस लिए मैं बस बेबस हो चुका था किन्तु मेरी पूरी कोशिश थी कि मेरे रहते वो लड़का अपने नापाक़ इरादों कभी कामयाब न हो सके। इस लिए वो जब भी अपने स्कूल या काॅलेज से वापस बॅगले में आता तो मैं कुछ देर के अंतराल में बॅगले के अंदर का चक्कर ज़रूर लगा आता और जाॅच परख लेता कि सब ठीक है कि नहीं।

ऐसे ही एक दिन की बात है कि वो लड़का अपने काॅलेज से जल्दी ही आ गया। मुझे उसके जल्दी आ जाने पर हैरानी तो हुई किन्तु मैं कर भी क्या सकता था। पर मुझे ऐसा आभास ज़रूर हुअ जैसे आज कुछ होने वाला है। ख़ैर, उसके अंदर जाने के कुछ देर बाद ही मैं भी अंदर चला गया। मैने बड़े एहतियात से हर जगह का मुआयना किया। मैं ये महसूस करके चौंका कि लड़का अपने कमरे में नहीं है। ये महसूस होते ही मैं सीधा कुमुद के कमरे की तरफ बढ़ गया। कुमुद के कमरे के पास आकर मैने देखा कि कमरे का दरवाजा हल्का खुला हुआ है। ये देख कर मैं चौंका। आमतौर पर कुमुद के कमरे का दरवाजा बंद ही रहता था। मैने हल्के खुले हुए दरवाजे से अंदर की तरफ झाॅका तो मेरी नज़र उस लड़के पर पड़ी। मैं ये देख कर बुरी तरह चौंका कि वो लड़का कुमुद के कमरे के अटैच बाथरूम के दरवाजे के पास खड़ा है। उसका एक हाॅथ दरवाजे के ऊपरी हिस्से पर था जबकि दूसरा हाथ नीचे की तरफ था। मुझे उसके दूसरे हाॅथ की कुहनी हिलती हुई प्रतीत हो रही थी। मेरे दिमाग़ ने काम किया। मैं समझ गया कि वो कमीना कुमुद बिटिया को नहाते हुए देख रहा है। बस इसके आगे मुझसे बरदास्त न हुआ। मुझे बेहद गुस्सा आ गया उस पर। मैं झटके से दरवाजा खोल कर अंदर की तरफ तेज़ी से बढ़ा।

 
कमरे के अंदर आहट महसूस होते ही वो लड़का बुरी तरह चौंक कर पलटा और मुझे देखते ही हक्का बक्का रह गया। मगर उसकी ये हालत सिर्फ कुछ पलों तक ही रही। उसके बाद उसने इस तरह से अपना रंग बदला कि भला गिरगिट क्या बदलता होगा। यहाॅ पर उसने इस कहावत को पूरी तरह सिद्ध कर दिया कि "उल्टा चोर कोतवाल को डाॅटे"। ऐसे माहौल में उसके साथ जो कुछ मुझे कहना चाहिए था वही सब वो मुझे ऊॅची आवाज़ में कहने लगा था। उसके मुख से अपने लिए ये सब सुन कर मैं भौचक्का सा रह गया। हैरत व अविश्वास से मेरा मुह तथा मेरी फट पड़ी थी। जबकि वो बराबर मुझ गरजे जा रहा था। कुछ ही देर में बाथरूम से कुमुद बिटिया कपड़े पहन कर बाहर निकली। मैने उसकी तरफ देखा तो चौंक गया, उसका चेहरा ऑसुओं से तर था और वो मुझे इस तरह देखे जा रही थी जैसे बिना कुछ बोले ही ऑखों से कह रही हो कि___"क्यों चाचू, ऐसा क्यों किया तुमने? मैं तो आपकी बेटी जैसी ही हूॅ और आपको अपने पिता जैसा ही सम्मान देती हूॅ। फिर आपने मुझ पर गंदी नज़र डाली। क्यों चाचू क्यों? क्या आप हवस में इतने अंधे हो गए कि आपको मुझमें आपकी कुमुद बिटिया की जगह एक ऐसी लड़की दिखने लगी जिसके साथ अपनी हवस को मिटाया जाए?"

उसकी ऑखों ने जैसे सब कुछ कह दिया था मुझे। उसे अपने मुख से कहने की कीई ज़रूरत नहीं रह गई थी और मैं भी जैसे उसकी ऑखों के द्वारा कही हुई हर बात समझ गया था। उसके चेहरे पर तुरंत ही हिकारत के भाव उभरे तथा उसमें शामिल हो गई घृणा। जिसके तहत उसने तुरंत ही अपना मुह फेर लिया जैसे अब वो मुझे देखना भी न चाहती हो। सच कहूॅ तो इन कुछ ही पलों में मेरी सारी दुनियाॅ बरबाद हो गई। चार सालों का मेरा विश्वास मेरा प्यार व स्नेह एक पल में ही जैसे नेस्तनाबूत हो गया था।

ये एहसास होते ही मेरे अंदर तीब्र पीड़ा हुई। मेरी ऑखों से ऑसू छलक पड़े। मैने अपनी सफाई में कुछ भी कहना गवाॅरा न किया और मैं आगे भी कहना नहीं चाहता था। क्योंकि सबसे बड़ा होता है विश्वास। अगर विश्वास ही नहीं रहा तो सफाई देने का कोई मतलब ही नहीं रह गया था। मुझे तक़लीफ इसी बात पर हुई कि उस लड़की ने ये कैसे यकीन कर लिया कि मैंने उस पर गंदी नज़र डाली थी? उसे अपने भाई पर संदेह क्यों न हुआ जिसने सचमुच ही वो काम किया था। क्या सिर्फ इस लिए कि वो उसका भाई था और मैं कोई ग़ैर था?

वो लड़का मुझे ज़बरदस्ती घसीटते हुए कमरे से बाहर लाया और बॅगले से निकल जाने के लिए कह दिया। मैं भी दुखी मन से उठा और अपनी बंदूख सम्हाले बॅगले से बाहर निकल गया। किन्तु मैं बॅगले के मुख्य द्वार से बाहर न गया। मुझे मेजर साहब के आने का इन्तज़ार था। मुझे उनका सामना करना था। मैं ऐसे ही वहाॅ से जाकर ये साबित नहीं करा देना चाहता था कि मैं वास्तव में गुनहगार हूॅ बल्कि उनके सामने जाकर ये दर्शाना चाहता था कि मैं गुनहगार नहीं हूॅ।

शाम के लगभग आठ बजे मेजर साहब बॅगले पर लौट कर आए। मैं सारा दिन भूखों प्यासा मुख्य दरवाजे पर किसी गुलाम की तरह खड़ा रह गया था। रह रह कर मेरे मन में ख़याल आता कि यहाॅ से कहीं ऐसी जगह चला जाऊॅ जहाॅ से कोई इंसान दुबारा वापस नहीं आ पाता। मगर मैं ऐसा भी न कर सका था। मुझे मेजर साहब को अपना चेहरा दिखाना एक बार। मेरे अंदर औरत जात के प्रति जो नफ़रत कहीं खो सी गई थी वो फिर से उभर कर आ गई थी। ख़ैर, मेजर साहब आए और बॅगले के अंदर चले गए। मुझे पता था कि वो लड़का और कुमुद मेजर साहब को मिर्च मशाला लगा कर आज की घटना के बारे में बताएॅगे। लेकिन मुझे परवाह नहीं थी अब। मुझे उम्मीद थी कि मेजर साहब मेरे बारे में ऐसा हर्गिज़ भी नहीं सोच सकते। आख़िर देश दुनियाॅ देखी थी उन्होंने। उनको इंसानों की पहचान थी।

मगर मेरी उम्मीदों पर बिजली उस वक्त गिरी जब मेजर साहब ने मुझे बुलाया और मुझे डाॅटना शुरू किया।

"हमें तुमसे ऐसे गंदे कर्म की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी शंकर।" मेजर साहब ने कड़ी आवाज़ में कहा___"हमें तुम पर कितना भरोसा था। हम तुम्हें कभी ग़ैर नहीं समझते थे। मगर तुमने अपनी ज़ात दिखा दी। शुरू में जब तुमने कहा था कि तुम दुनियाॅ का हर काम कर सकते हो लेकिन कोई ग़लत काम नहीं करोगे भले ही चाहे भूॅखों मर जाओ तो हम तुम्हारी उस बात से बेहद प्रभावित हुए थे। मगर आज जो कुछ तुमने किया है उससे हमें बहुत दुख पहुॅचा है। हमारी बेटी तुम्हें हमारे जैसा ही पिता का सम्मान देती थी और तुमसे लाड प्यार करती मगर तुमने उस पर ही गंदी नज़र डाल दी। मन तो करता है कि तुमसे ये बंदूख छीन कर इसकी सारी गोलियाॅ तुम्हारे सीने में उतार दें मगर नहीं करेंगे ऐसा। इतने साल की वफ़ादारी का अगर यही इनाम लेना तो कोई बात नहीं। मगर अब तुम्हारे लिए यहाॅ कोई जगह नहीं है। निकल जाओ यहाॅ से और दुबारा कभी अपनी शक्ल मत दिखाना हमें वरना हमसे ये उम्मीद न करना कि हम तुम्हें ज़िंदा छोंड़ देंगे।"

बस, मेजर साहब की ये बातें सुन कर मैं बुरी तरह अंदर से टूट कर बिखर गया। मैं अब एक पल भी यहाॅ लुकना नहीं चाहता था। इस लिए घुटनों के बल बैठ कर मैने अपने कंधे से बंदूख निकाली और मेजर साहब के क़दमों में रख दी। उसके बाद मैने उन्हें अपने दोनों हाॅथ जोड़ कर नमस्कार किया और फिर धीरे धीरे खड़ा हो गया। मेरे अंदर ऑधी तूफान मचा हुआ था। मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं दहाड़ें मार कर रोऊॅ मगर मैने अपने मचलते हुए जज़्बातों को शख्ती से काबू किया हुआ था। खड़े होकर मैने एक बार कुमुद बिटिया की तरफ देखा तो उसने जल्दी से अपना मुह फेर लिया। मेरी ऑखों से ऑखू का कतरा टूट कर हाल के फर्श पर गिर गया।

उसके बाद मैं एक पल के लिए भी नहीं रुका। वहाॅ से बाहर आकर मैं सर्वेन्ट क्वार्टर की तरफ अपने कमरे में गया और वहाॅ से अपना सामान एक थैले में भर कर कमरे से बाहर आ गया। बॅगले के मुख्य द्वार से बाहर निकल कर मैं एक तरफ बढ़ता चला गया। उसके बाद बॅगले में क्या हुआ इसका मुझे कुछ पता नहीं। वहाॅ से आने के बाद मैं एक सुनसान जगह पर दिन भर यूॅ ही दुखी मन से बैठा रहा। ये संसार बहुत बड़ा था मगर इस संसार में ऐसा कोई भी नहीं था जिसे मैं अपना कहता। जो मुझे समझता और मेरे दुखों को महसूस करता। वर्षों पहले एक दुख से उबरा था, आज फिर एक दुख ने मुझे वहीं पर ले जाकर पटक दिया था। ख़ैर, समय का काम है बदलना। इस लिए धीरे धीरे समय के साथ मैं भी उस सबको भूलने की कोशिशें करने लगा। ऐसे ही एक साल गुज़र गया। मैं कोई न कोई काम कर लेता जिससे मुजे दो वक्त की रोटी मिल सके और रातों को कहीं भी लेट कर सो जाता। यहीं मेरी ज़िंदगी बन गई थी। ऐसे ही एक दिन हरिया से मेरी मुलाक़ात हो गई। इसने जाने मुझमें ऐसा क्या देखा कि ये मुझे यहाॅ ले आया और फिर मैं तब से यहीं का रह गया। यहाॅ पर हरिया से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई। बिंदिया भाभी में मुझे एक माॅ की झलक दिखने लगी और रितू बिटिया के रूप में एक ऐसी नेक दिल लड़की मिल गई जो मुझे काका कहती है और मेरी आदर सम्मान करती है। मुझे उसमें अपनी बेटी ही नज़र आती है। एक तरह से यहाॅ पर मुझे एक भरपूर परिवार ही मिल गया है। लेकिन हमेशा इस बात का डर बना रहता है कि किसी दिन मेरी किस्मत और सबका वो भगवान फिर से न मुझसे रूठ जाए और मुझे फिर से उसी दुख दर्द में ले जाकर पटक दे जहाॅ से उबरने में मुझे एक युग लग जाता है।"

अपने गुज़रे हुए कल की दुख भरी कहानी बता कर शंकर ने गहरी साॅस ली और अपने गमछे से अपनी ऑखों से बह चले ऑसुओं को पोंछा। उसके सामने ही खड़े हरिया व रितू की ऑखों में भी ऑसू थे। शंकर की कहानी में वो इतना डूब गए थे कि उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सब कुछ उनकी ऑखों के सामने ही वो सब घट रहा था।

हरिया को जाने क्या सूझा कि वो झपट कर शंकर को अपने गले से लगा लिया और फूट फूट कर रो पड़ा। शंकर उसे इस तरह रोता देख मुस्कुराया। ये अलग बात थी कि उसकी ऑखें भी बह चली थी। रितू आगे बढ़ कर उन दोनो को एक दूसरे से अलग किया।

"काका आपने अपने अंदर इतना बड़ा दुख छुपा के रखा हुआ था।" रितू ने दुखी मन से कहा___"जिसका हमें एहसास तक न था। यकीनन आपके साथ जो कुछ हुआ वो बहुत ही दुखदायी था। मगर आप चिंता मत कीजिए। अब इसके आगे ऐसा कुछ भी नहीं होगा। आप हमेशा हमारे साथ ही रहेंगे। मैं कभी भी आपको ऐसे दुख में जाने नहीं दूॅगी जिससे आपको जीने में तक़लीफ हो।"

"भगवान करे ऐसा ही हो बिटिया।" शंकर ने कहा__"मैं भी तुम लोगों को छोंड़ कर कहीं नहीं जाना चाहता। तुम सबसे इतना लगाव हो गया है कि अब अगर ऐसा कुछ हुआ तो यकीनन ये दुख सहन नहीं कर पाऊॅगा मैं।"

"अरे तू फिकर काहे करथै ससुरे?" हरिया ने कहा__"हम अइसन अब कउनव सूरत मा न होंय देब। चल अब ई सब छोंड अउर आपन मन का खुश रख। अउर हाॅ ई हमरा वादा हा कि हम बहुत जल्द तोहरा ब्याह एको सुंदर लड़की से करब जउन तोहरी ऊ ससुरी बिंदिया भौजी जइसनै होई।"

हरिया की ये बात सुन कर शंकर और रितू दोनो ही मुस्कुरा कर रह गए। कुछ देर ऐसी ही कुछ और बातें हुईं उसके बाद सहसा रितू को कुछ याद आया।

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उधर हवेली में!

कई सारी गाड़ियाॅ हवेली के बाहर विसाल मैदान में आकर रुकीं। सभी गाड़ियों के सभी दरवाज़े एक साथ खुले और उनमें से कई सारे अजनबी लोग बाहर निकले। सभी आदमियों में ज्यादातर आदमी हट्टे कट्टे व बाॅडी बिल्डथ टाइप के थे। जबकि कुछ आदमी साधारण कद काठी के थे। वो सब हट्टे कट्टे आदमियों से घिरे हुए थे।

हवेली के बाहर अजय सिंह के कुछ आदमी हाॅथों में बंदूख लिए खड़े थे। उन लोगों ने जब इतने सारे आदमियों को एक साथ हवेली की तरफ आते देखा तो उनके चेहरों का रंग सा उड़ने लगा। उन्हें लगने लगा अब ये कौन सी नई मुसीबत आ गई यहाॅ? सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे थे। जैसे एक दूसरे से पूछ रहे हों कि ये सब क्या है? किन्तु जवाब किसी के पास नहीं था।

"ठाकुर साहब से कहो कि हम लोग उनके कहे अनुसार अपने आदमियों को यहाॅ लेकर आ गए हैं।" एक आदमी ने अजय सिंह के एक आदमी से कहा___"हमारे पास ज्यादा समय नहीं है। इस लिए अभी हमें जाना होगा किन्तु हमारे ये आदमी उनके किसी भी आदेश का पालन करने के लिए पूरी तरह तैयार रहेंगे।"

उस आदमी की ये बात कदाचित गार्ड की समझ में न आई थी। इसी लिए वह मूर्खों की तरह उस आदमी को देखता रह गया। उसके चेहरे पर उलझन के से भाव उभर आए थे।

"अरे भाई ऐसे क्यों देख रहे हो हमें?" आदमी ने चौंकते हुए कहा__"हम सब ठाकुर साहब के बिजनेस वाले फ्रैण्ड्स हैं। अतः जल्दी जाओ और उन्हें बताओ कि मिस्टर कमलनाथ और उनके साथ सभी उनके दोस्त यहाॅ आए हुए हैं।"

गार्ड के चेहरे पर फैले उलझन के भाव कम तो न हुए किन्तु उसने इतना अवश्य किया कि पाॅकिट से मोबाइल निकाल कर किसी को फोन लगाया। उधर से काल रिसीव करते ही उसने कहा___"मालकिन, कुछ लोग मालिक से मिलने आए हैं। कह रहे हैं कि उनके बिजनेस से संबंधित फ्रैण्ड्स हैं। मेरे लिए क्या आदेश है मालिकन?"

"............।" उधर से कुछ कहा गया और इसके साथ ही काल कट हो गई।

"आप कृपया एक मिनट रुकिये।" फिर उस गार्ड ने बड़ी विनम्रता से कहा___"मालकिन आ रही हैं बाहर।"

"ओके नो प्राब्लेम।" उस आदमी ने कहा और दूसरी तरफ पलट कर इधर उधर देखने लगा।

कुछ ही देर में हवेली का दरवाजा खुला और प्रतिमा उसमे से बाहर निकली। उसके पीछे ही उसका बेटा शिवा भी था। हवेली के बाहर इतनी सारी गाड़ियाॅ और इतने सारे लोगों को देख कर वो चौंकी। मनो मस्तिष्क में एक ही बात चकरघिन्नी की तरह नाचने लगी कि 'कहीं फिर से कोई सीबीआई वाले नहीं आ गए यहाॅ'।

प्रतिमा की देखते ही गार्ड ने उस आदमी के पास जाकर उसे बताया कि मालकिन आ गई हैं। वो आदमी पलट कर प्रतिमा के पास आया।

"नमस्कार भाभी जी।" उस आदमी ने खुशदिली से हाॅद जोड़ कर नमस्कार करते हुए बोला__"हम सब ठाकुर साहब के फ्रैण्ड सर्कल के लोग हैं। ठाकुर साहब से कल मीटिंग में हमारी कुछ बातें हुई थी। जिसके तहत उन्होंने हमसे हमारे कुछ बेहतरीन आदमियों की माॅग की थी। सो इस वक्त हम उसी सिलसिले में यहाॅ आए हैं। हमारे पास ज्यादा समय नहीं है इस लिए हम ठाकुर साहब से मिल कर तुरंत ही यहाॅ से जाना चाहेंगे। उसके बाद ये उनका काम है कि वो हमारे इन आदमियों के द्वारा क्या काम लेते हैं?"

प्रतिमा उस आदमी की बातों से समझ गई कि कल अजय सिंह किसी ज़रूरी मीटिंग में था इसी लिए शाम को देर से आया था। तो इसका मतलब मीटिंग इस सबके लिए थी। किन्तु समस्या ये थी कि ये लोग जिससे मिलने आए थे उसे तो सीबीआई वाले सुबह ही अपने साथ ले गए थे। इस लिए अब वो इन्हें क्या जवाब दे यही उसकी समझ में नहीं आ रहा था। सच्चाई बताने पर संभव है कि बात बिगड़ जाती। अगर इन लोगों को अभी पता चल जाए कि अजय सिंह को सीबीआई वाले ले गए हैं तो ये लोग तुरंत ही यहाॅ से रफूचक्कर हो जाएॅगे।

"क्या बात है भाभी जी?" उस आदमी ने कहा___"आप किसी गहरी सोच मे डूबी हुई प्रतीत हो रही हैं। कहिए सब ठीक तो है न? ठाकुर साहब को बुलाइये हम उनसे मिलना चाहते हैं।"

"ठाकुर साहब तो इस वक्त हवेली के अंदर नहीं हैं।" फिर प्रतिमा को बहाना बनाना पड़ा___"सुबह ही कहीं चले गए थे। कहाॅ गए हैं इस बारे में कुछ बताया भी नहीं उन्होंने।"

"ओह आई सी।" उस आदमी ने कहा___"कोई बात नहीं भाभी जी। हम फोन पर बात कर लेंगे उनसे। अच्छा अब हम चलते हैं। हम अपने इन आदमियों कों यहीं पर छोंड़े जा रहे हैं।"

"अरे ऐसे कैसे चले जाएॅगे आप लोग?" प्रतिमा ने औपचारिकता के भाव से कहा___"अंदर आइये और कम से कम चाय या काॅफी तो पीकर ही जाइये। वरना आपके ठाकुर साहब मुझे ही डाॅटेंगे कि मैने आप लोगों को बिना चाय पानी करवाए ही जाने दिया।"

"इसकी ज़रूरत नहीं है भाभी जी।" आदमी ने हॅसते हुए कहा___"आपने कह दिया इतना ही बहुत है हमारे लिए। अच्छा अब हम चलते हैं, नमस्कार।"

"नमस्कार जी।" प्रतिमा ने भी प्रत्युत्तर में अभिवादन किया।

इसके बाद वो जितने भी साधारण कद काठी के आदमी सूट बूट पहने आए थे वो सब गाड़ियों में सवार होकर वहाॅ से चले गए। उनके जाने के बाद प्रतिमा ने बाॅकी बचे हट्टे कट्टे व बाॅडी बिल्डर आदमियों की तरफ देखा।

"बेटा इन सबको सर्वेंट क्वार्टर में ले जाओ।" फिर प्रतिमा ने शिवा से कहा___"और इनके रहने का इंतजाम करो। तब तक मैं सविता(नौकरानी) से कह कर इन लोगों के लिए चाय पानी का उचित बंदोबस्त कराती हूॅ।"

"ओके माॅम।" शिवा ने कहा और हवेली की सीढ़ियाॅ उतर कर नीचे आ गया उन लोगों के पास।

उन सबको लेकर शिवा हवेली के पूर्व दिशा की तरफ बने सर्वेंट क्वार्टर की तरफ बढ़ गया। ये सर्वेंट क्वार्टर अजय सिंह ने साल भर पहले ही बनवाया था। उन लोगों के जाने के बाद प्रतिमा भी अंदर की तरफ चली गई। उसके चेहरे पर सहसा गहन चिंता व परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। उसे पता था कि अजय सिंह के जो बिजनेस संबंधी दोस्त आए थे वो अजय सिंह से फोन पर ज़रूर बात करेंगे। लेकिन जब अजय सिंह का फोन नहीं लगेगा तो वो सब परेशान भी हो जाएॅगे। उस सूरत में उनका क्या रिऐक्शन होगा इसका कुछ भी अंदाज़ा लगाना मुश्किल था।

प्रतिमा को समझ नहीं आ रहा था कि इस परिस्थिति में वो क्या करे? उसने मदद के उद्देश्य से ही अपनी इंस्पेक्टर बेटी रितू को फोन लगाया था किन्तु उसने काल को रिसीव न करके कट कर दिया था। ये प्रतिमा के लिए शायद आख़िरी सबूत था कि उसकी बेटी ने सचमुच ही अपने माॅ बाप के खिलाफ़ बगावत कर दी थी।

अंदर प्रतिमा ने सविता को उन आदमियों के लिए चाय का कह दिया और खुद आकर ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर बैठ गई। उसके चेहरे से चिन्ता व परेशानी के भाव जा ही नहीं रहे थे। वो कुछ भी करके अजय सिंह को सीबीआई के चंगुल से बाहर निकालना चाहती थी। हलाॅकि उसे पता था कि ऐसे मामलों में अपराधी का कानून की गिरफ्त से बाहर आना बेहद मुश्किल काम होता है किन्तु इसके बावजूद प्रतिमा अजय सिंह को बाहर निकालना चाहती थी।

सहसा प्रतिमा को अपने पिता जगमोहन सिंह का ख़याल आया। प्रतिमा का बाप जगमोहन सिंह आज कल इलाहाबाद हाई कोर्ट में बतौर क्रिमिनल लायर था। ऊम्र से ज्यादा अधेड़ नहीं लगता था। कहा जाता है कि जगमोहन सिंह बहुत ही काबिल व तेज़ तर्रार वकील था। चाहे जैसा भी केस हो, मुहमाॅगी फीस मिलने पर वह अपने मुवक्किल को बाइज्ज़त बरी करा लेता था। मगर यहाॅ पर प्रतिमा के लिए सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो अपने बाप से मदद माॅगे तो माॅगे कैसे?

दरअसल, जब प्रतिमा ने अपने बाप को बताया कि वह अजय सिंह से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है तो जगमोहन सिंह बुरी तरह भड़क गया। उसे प्यार शब्द से ही नफ़रत थी। पता नहीं ऐसा क्या था कि प्रेम प्रसंग होने पर वह आपे से बाहर हो जाता था। उसके घर में नियम कानून बड़े शख्त थे। उसकी दो ही बेटियाॅ थी। जिनमें से प्रतिमा छोटी वाली थी। जबकि पहली बेटी मुम्बई में रहती थी, जहाॅ आजकल अजय सिंह की बेटी नीलम रहती है। जगमोहन सिंह को कोई बेटा नहीं था। धन दौलत की शुरू से ही कोई कमी नहीं थी। ख़ैर, बाप के साफ इंकार कर देने पर प्रतिमा ने पहली बार अपने बाप से मुहज़ुबानी की थी और साफ शब्दों में कह दिया था कि वो शादी करेगी तो अजय सिंह से ही वरना वो कभी किसी से शादी नहीं करेगी। जगमोहन को अपनी इस बेटी की धृष्टता पर बेहद गुस्सा आया और उसने उसी वक्त कह दिया उससे कि आज के बाद वो उसके लिए मर गई है। बस प्रतिमा ने आव देखा न ताव, बाप का घर छोंड़ दिया और सीधा अजय सिंह के पास पहुॅच गई। अजय सिंह के साथ ही वह रहने लगी। इस बीच वो प्रग्नेन्ट हो गई तो आनन फानन में अजय सिंह और प्रतिमा ने आपस में कोर्ट मैरिज कर ली थी।

तब से लेकर अब तक प्रतिमा ने कभी भी अपने बाप से कोई मतलब नहीं रखा था और ना ही उसके बाप जगमोहन ने। प्रतिमा की इस बगावत से उसकी बड़ी बहन को धक्का तो ज़रूर लगा था किन्तु वो कर भी क्या सकती थी? ऐसे ही समय गुज़रता गया। प्रतिमा अपनी बड़ी बहन से फोन पर ही हाल समाचार ले लिया करती थी। दोनो बहनें वर्षों से एक दूसरे से न मिली थी।

ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी प्रतिमा इन्हीं सब यादों में खोई थी। उसकी ऑखों में ऑसू भर आए थे। माॅ का साया तो पहले ही उसके सिर से उठ गया था। दोनो बहनों में ये सबसे ज्यादा लाड प्यार में पली पढ़ी थी और शायद यही वजह थी कि जिद्दी हो गई थी। जिसका नतीजा ये हुआ था कि उसने अपने बाप के खिलाफ़ जाकर अजय सिंह से शादी कर ली थी। मगर आज के हालात बहुत और तब के हालात में बहुत फर्क़ हो गया था। आज के हालात में प्रतिमा किसी के भी सामने झुकने और किसी के भी नीचे लेटने को तैयार थी। बदले में उसे अजय सिंह सीबीआई की गिरफ्त से बाहर चाहिए था।

प्रतिमा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो दुबारा अपने बाप से बात कर सके। शादी वाली बात को तो वर्षों हो गए थे। किन्तु इन वर्षों में उसने एक बार भी अपने बाप से बात करना ज़रूरी नहीं समझा था। और आज जब बुरा वक्त आया तो उसे अपने बाप का ख़याल आया और उससे मदद माॅगने का भी। प्रतिमा को पहली बार लगा कि उसे अपने बाप से इस तरह मुहज़ुबानी नहीं करनी चाहिए थी और ना ही तैश में आकर इस तरह बाप के घर की दहलीज़ को छोंड़ देना चाहिए था। मामले को प्यार से और समझा बुझा कर भी सुलझाया जा सकता था। आज अगर ग़ौर किया जाए तो दो दो बेटियाॅ होने के बाद भी उसका बाप घर में अकेला ही था। सोचने वाली बात है कि उतने बड़े घर में उसका बाप पिछले कितने ही वर्षों से अकेला रह रहा है। क्या उसे अपने उस अकेलेपन से दुख नहीं होता होगा? क्या उसे इस बात का दुख नहीं होगा कि उसकी बेटी ने आज तक उसकी सुधि तक न ली। अपनी खुशियों को गले लगा कर अपने बाप को अकेला छोंड़ दिया। तन्हाई इंसान को जीते जी मार डालती है। मगर उसने कभी अपनी इस बेटी को फोन करके उस सबका गिला न किया था।

प्रतिमा को बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ कि उससे कितनी बड़ी भूल हुई है। कहते हैं कि माॅ बापप का गुस्सा या नाराज़गी जीवन भर के लिए नहीं होती। आख़िर बाप को औलाद के आगे हार जाना ही होता है। मगर यहाॅ तो जगमोहन दोनो तरफ से हारा हुआ बाप बन चुका था। प्रतिमा की ऑखों से पश्चाताप के ऑसू बह रहे थे। उसे इस बात का बखूबी एहसास था कि भले ही उसके बाप ने उसे त्याग दिया था मगर आज भी वो अपनी बेटियों के मंगलमय जीवन की कामना करता होगा। ये सब सोच सोच कर प्रतिमा को भारी दुख हो रहा था। उसे अपनी अज्ञानता और अपने छोटेपन का शिद्दत से एहसास हो रहा था मगर अब रोने से क्या हो सकता था? पच्चीस साल का वक्त थोड़ा सा नहीं होता अपने बाप से अनबन किये हुए।

प्रतिमा को लगने लगा कि ये जो कुछ भी आज उसके और उसके परिवार के साथ हो रहा है वो सब उसी का फल है जो उसने इतने वर्षों से बाप को दुखी किया हुआ है। ये सब सोच कर ही प्रतिमा को चक्कर सा आने लगा। उसने अपना सिर दोनो हाॅथों से पकड़ लिया। तभी ड्राइंग रूम में शिवा दाखिल हुआ। अपनी माॅम को इस तरह पीड़ा में देख वह घबरा सा गया। तुरंत ही प्रतिमा के पास पहुॅचा वह और उसे उसके कंधों से पकड़ कर झकझोरा।

"क्या हुआ माॅम?" शिवा ने घबरा कर कहा___"आप ठीक तो हैं न माॅम? प्लीज़ बताइये न क्या हुआ है आपको?"

"कुछ नहीं बेटा।" प्रतिमा ने खुद को सम्हालते हुए कहा___"बस थोड़ा चक्कर सा आ गया था।"

"आप इतना टेंशन क्यों लेती हैं माॅम?" शिवा ने प्रतिमा के चेहरे को दोनो हथेलियों में लेकर कहा___"सब कुछ ठीक हो जाएगा। डैड बहुत जल्द वापस आ जाएॅगे।"

"हाॅ बेटा।" प्रतिमा ने कहीं खोए हुए से कहा___"सब कुछ ठीक हो जाएगा। तेरे डैड जल्द ही हमारे पास वापस आ जाएॅगे।"

"आप चलिये माॅम।" शिवा ने प्रतिमा को उठाते हुए कहा___"अपने कमरे में आराम कीजिए आप और हाॅ ज्यादा सोच विचार मत किया कीजिए।"

शिवा की बात का प्रतिमा ने फीकी सी मुस्कान के साथ जवाब दिया और कमरे की तरफ शिवा के साथ बढ़ गई। कमरे में बेड पर प्रतिमा को लेटा कर शिवा रसोई की तरफ बढ़ गया। रसोई में सविता चाय बनाकर केतली में डाल रही थी। ये देख कर शिवा वापस बाहर की तरफ आया और हवेली से बाहर आ गया। बाहर उसने एक आदमी को बुलाया और अंदर ले गया उसे। अंदर आकर उसने सविता से कहा कि वो चाय नास्ता काका को पकड़ा दे। सविता ने वैसा ही किया। शिवा और वो आदमी दोनो ही चाय नास्ता का सामान लिये सर्वेंट क्वार्टर की तरफ बढ़ गए।

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उधर फार्महाउस पर!

शंकर काका की कहानी से माहौल थोड़ा गंभीर सा हो गया था किन्तु हरिया काका की मज़ेदार बातों से फिर से खुशनुमा हो गया था। रितू को सहसा कुछ याद आया तो उसने हरिया काका की तरफ देखा।

"अरे काका।" फिर उसने कहा___"इन सब बातों के बीच हम ये तो भूल ही गए कि तहखाने में मंत्री की बेटी कैद है और वो कल से भूखी प्यासी भी होगी।"

"हाॅ बिटिया।" हरिया काका के चेहरे पर चौंकने वाले भाव उभरे___"ई ता सही मा हम भुलाय दीन्हें रहे। ऊ ससुरी मंत्रीवा की छोकरिया अबे तक ता ज़रूरै भूख पियास से मरत होई।"

"आप भी कमाल करते है काका।" रितू ने कहा___"ऐसा लगता है जैसे आप उस बेचारी को ऐसे ही मार देंगे। जबकि अभी तो मुझे उसके अंदर की गर्मी निकालनी है। चलिये देखें तो सही क्या हाल चाल हैं उसके?"

"हाॅ हाॅ चला बिटिया।" हरिया काका ने बंदूख को शंकर के हाथ में थमाते हुए कहा___"अब ता देखहिन का पड़ी कि ऊ ससुरी अबे ज़िंदा बा के मर गईल है।"

रितू हरिया की बात पर मुस्कुराती हुई तहखाने की तरब बढ़ गई। उसके पीछे पीछे हरिया भी चल रहा था। कुछ ही देर में वो दोनो तहखाने के दरवाजे के पास खड़े थे। हरिया ने चाभी हे तहखाने का दरवाजा खोला और एक साइड हट गया। रितू दरवाजे के अंदर की तरफ दाखिल हो गई। अभी वो दो तीन सीढ़ियाॅ ही नीचे उतरी थी कि सहसा उसे रुक जाना पड़ा और जल्दी से पैन्ट की जेब से रुमाल निकाल कर अपने मुह व नाॅक पर रखना पड़ा।

तहखाने में तेज़ दुर्गंध फैली हुई थी। मतलब साफ था अंदर मौजूद सूरज और उसके दोस्त या फिर सूरज की बहन में से किसी का टट्टी पेशाब छूट गया था जिसकी वजह हे अंदर दुर्गंध फैली हुई थी। रितू से बर्दास्त न हुआ तो वो वापस तहखाने से बाहर आ गई।

"काका इन लोगों ने तो यहाॅ गंध फैला रखी है।" रितू ने बुरा सा मुह बनाते हुए कहा___"ऐसे में अंदर जाया नहीं जाएगा। इस लिए सबसे पहले आप तहखाने का हाल सही करवाइये। उसके बाद ही आगे का कार्यक्रम होगा।"

"ठीक है बिटिया।" हरिया ने कहा___"हम इहाॅ की सफाई करवाता हूॅ तब तक तू बाहर रहा।"

"ठीक है काका।" रितू ने कहा___"मैं कुछ देर के लिए कमरे में जा रही हूॅ। जब यहाॅ का सब ठीक हो जाए तो आप मुझे बुला लीजिएगा।"

ये कह कर रितू वहाॅ से बाहर आकर इस तरफ से अंदर गई और अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे में आकर रितू बेड पर लेट गई। अभी वह लेटी ही थी कि नैना बुआ भी कमरे में आ गई और बेड के किनारे भाग में बैठ गई।

"आइये बुआ।" रितू ने अधलेटी अवस्था में कहा__"आप भी आराम से लेट जाइये।"

"चल ठीक है तू कहती है तो लेट जाती हूॅ।" नैना ने रितू के इस तरफ आते हुए कहा___"अच्छा ये बता कि तेरे इस फार्महाउस पर और क्या क्या होता है?"

"क्या मतलब??" रितू बुरी तरह चौंकी___"यहाॅ क्या क्या होता है से आपका क्या मतलब है?"

"इतनी नासमझ व बुद्धू नहीं हूॅ मैं जितना तू समझ रही है मुझे।" नैना ने कहा___"यहाॅ आए मुझे कुछ समय तो हो ही गया है। मैने महसूस किया है कि ये फार्महाउस असल में मुजरिम लोगों के लिए एक ऐसी जेल की तरह है जिसकी कैद से मुजरिम का निकल पाना नामुमकिन ही नहीं बल्कि असंभव है। कह दे भला कि मैं झूॅठ कह रही हूॅ?"

रितू चकित भाव से देखती रह गई अपनी बुआ को। किन्तु फिर तुरंत ही सम्हल भी गई। चेहरे पर शशंक भाव लाते हुए बोली___"ये सब आपने खुद महसूस किया है या ये सब बातें किसी के द्वारा पता चली है आपको?"

"बात अगर सच है तो इस बात से कोई मतलब ही नहीं रह जाता मेरी बच्ची कि मुझे ये सब कैसे पता चला?" नैना ने स्पष्ट भाव से कहा___"दूसरी बात मुझे इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं है कि तू इस फार्महाउस पर क्या कर रही है। बल्कि खुशी है कि मुजरिमों को उचित सज़ा दे रही है तू। मगर मैं बस यही कहूॅगी कि ऐसे कामों में अपनी जान का ख़तरा भी बहुत होता है इस लिए अपना भी ख़याल रखना।"

"ख़तरा तो हर इंसान के जीवन में होता है बुआ।" रितू ने कहा___"चाहे वो कोई आम इंसान हो या फिर कोई ऐसा इंसान जो हर वक्त ख़तरों के बीच ही रहता है। मैं इस फार्महाउस पर इसके पहले कभी भी किसी मुज़रिम को कानून अपने हाॅथ में लेकर नहीं आई बुआ और नाही ऐसा करने का मैने कभी सोचा था। मगर ये सब तो मैने तब किया जब विधी का मामला आया। हमारे देश में किसी मुजरिम को उसके संगीन से भी संगीन अपराध के लिए कोई शख्त सज़ा नहीं हो पाती। इसकी कई सारी वजहें हैं मगर मुख्य वजहें ये हैं कि हमारा कानूनी सिस्टम बहुत कमज़ोर व ढीला है। कोर्ट में आज भी लाखों ऐसे संगीन अपराधों के केस फाइलों के नीचे दबे हुए हैं जिनकी समयावधी का पता चलते ही हमारा कानून पर से विश्वास उठने लगता है। दूसरी बात हमारा यही कानूनी सिस्टम बड़े लोगों और मंत्री मिनिस्टरों के हाॅथ की कठपुतली बना हुआ है। जबकि सच्चाई ये है कि कानून की नज़र में कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता। अगर अपराध देश के सबसे बड़े ब्यक्ति ने किया है तो उसे भी वैसी ही सज़ा मिलनी चाहिए जो किसी आम मुजरिम को मिलती है। मगर ये सब कहने की बातें हैं बुआ, हकीक़त में ऐसा होता नहीं है। कानून के इसी कमज़ोर सिस्टम की वजह से एक शरीफ आदमी मजबूरीवश जुर्म का दामन थाम बैठता है।"

"तुम जिन चीज़ों की बात कर रही हो बेटा।" नैना ने गहरी साॅस ली___"वो हमेशा ऐसी ही रहेंगी। बल्कि अगर ये कहूॅ तो ग़लत न होगा कि इससे भी बदतर बन जाएॅगी। इस लिए इस विषय पर बात करने का कोई मतलब नहीं है। तुमने कहा कि विधी का मामला जब सामने आया तब तुमने ऐसा क़दम उठाया। विधी के बारे में भी तुमने ही मुझे बताया था कि उसके साथ चार ऐसे लड़कों ने घिनौना कुकर्म किया था जो बड़े बाप की पैदाईश हैं। मैं ये कहना चाहती हूॅ कि ऐसे बड़े बाप की औलादों को यहाॅ लाकर और उनको सज़ा देने से कहीं तुम पर तो कोई ख़तरा नहीं आ जाएगा। आख़िर सवाल तो बड़े लोगों का है न। जिनके ये बच्चे हैं उन्हें अगर पता चल जाए कि उनके बच्चों को तुमने क्या और कैसे सज़ा दी है तो यकीनन वो बड़े लोग तुझ पर बिजली बन कर गिरेंगे।"

"फिक्र मत कीजिए बुआ।" रितू ने सहसा कठोर भाव से कहा___"मैंने उन सबका अच्छा खासा इंतजाम किया हुआ है। आप यूॅ समझिये कि उन बड़े बड़े खलीफाओं की जान मेरी मुट्ठी में कैद है। आज की डेट में वो सब ऐसी कठपुतलियाॅ बने हुए हैं जो सिर्फ मेरे ही इशारे पर नाचने के लिए मजबूर हैं। वो अपनी मर्ज़ी से ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जो मुझे पसंद ही न आए।"

"ऐसा तेरे पास उनके खिलाफ क्या है?" नैना ने चकित भाव से पूछा___"जिसकी वजह से वो सब बड़े बड़े सूरमा तेरे इशारों पर नाचने के लिए मजबूर बन गए हैं?"

नैना के पूछने पर रितू ने कुछ पल सोचा और फिर उसने वीडियो वाली सारी बात बता दी उसे। ये भी बताया कि उसने खुद मर्द की आवाज़ में फोन पर मंत्री से बात भी की थी और कल तो वो मंत्री की बिगड़ैल बेटी को भी पकड़ कर ले आई है जो इस वक्त तहखाने में बंद है। सारी बातें जानने के बाद नैना का मुह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया।

"हे भगवान!।" फिर उसके मुख से निकला___"ये तू क्या कर रही है रितू? लड़कों की बात तक तो ठीक था और लड़कों के बापों तक भी ठीक था किन्तु लड़की को क्यों कैद कर किया तूने? ये ठीक नहीं है मेरी बच्ची। उन लोगों ने घृणित कर्म किया क्योंकि वो उनकी फितरत थी मगर तेरी फितरत तो ऐसी नहीं है न बेटा? इस लिए मेरी बात मान और मंत्री की बेटी को छोंड़ दे तू।"

"आपने बहुत दूर तक का सोच लिया बुआ।" रितू ने मुस्कुरा कर कहा___"जबकि मेरा ऐसा करने का कोई इरादा ही नहीं है। मेरा मकसद तो बस ये है कि मैं उन्हें भी उस चीज़ का एहसास कराऊॅ जिस चीज़ को करने में उन्हें सबसे ज्यादा मज़ा आता है। मैं उन्हें दिखाना चाहती हूॅ बुआ कि जब वैसा ही सब कुछ अपने साथ होता है तब कैसा प्रतीत होता है? जब अपने ऊपर वैसा जुल्म होता है तो कितनी तक़लीफ़ होती है? हाॅ बुआ यही, बस यही एहसास कराना चाहती हूॅ मैं उन सबको।"

"अगर ऐसी बात है तो फिर ठीक है।" नैना ने सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"जो भी करना इस बात का ख़याल रखते हुए करना कि तुम एक अच्छे संस्कारों वाली लड़की हो जो किसी का भी बुरा नहीं कर सकती।"

"अच्छा अब आप आराम कीजिए बुआ।" रितू ने बेड से उतरते हुए कहा___"मैं ज़रा तहखाने में उन सबका हाल चाल देख लूॅ।"

"ठीक है जाओ।" नैना ने कहा और आराम से लेट गई।

रितू कमरे से निकल कर बाहर आ गई। उसने अपने आईफोन के बाईब्रेशन को महसूस किया था। वो समझ गई थी कि हरिया काका ने ही उसे मिस काल दिया था। मतलब साफ था कि उसने तहखाने की गंदगी को साफ कर दिया था। ख़ैर, कुछ ही देर में रितू तहखाने में पहुॅच गई। अब वहाॅ पर कोई गंध नहीं थी। बल्कि सबकुछ एकदम से साफ सुथरा हो गया था।

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उधर मंत्री दिवाकर चौधरी की तरफ!

इस वक्त मंत्री के सभी साथी ड्राइंगरूम में जमा हुए बैठे थे। सबके बीच ब्लेड की धार की मानिन्द पैना सन्नाटा फैला हुआ था। अभी थोड़ी देर पहले ही मंत्री दिवाकर चौधरी अपने आवास पर अपने साथियों के साथ आया था। दिवाकर चौधरी कल शाम से चिंतित व परेशान था। कल शाम को ही आया ने बताया था कि रचना बेटी जिम से नहीं लौटी है। चौधरी को पहले इस बात पर ज्यादा चिंता की बात नज़र नहीं आई थी। उसे लगा था कि रचना अपनी फ्रैण्ड्स के साथ होगी। किन्तु जब आधी रात गुज़र जाने पर भी रचना न आई तो चौधरी को चिंता सताने लगी। उसने रचना की जान पहचान वाली सभी लड़कियों को फोन लगा कर रचना के बारे में पूॅछा था। मगर सबने यही कहा कि रचना उनके पास नहीं है। एक लड़की ने बताया कि शाम को जिम से बाहर आते समय रचना उसके साथ ही थी किन्तु फिर वो अपनी स्कूटी लेकर घर के लिए निकल गई थी।

दिवाकर चौधरी को कल सारी रात नींद नहीं आई थी। अपनी बेटी के लौटने के इंतज़ार में वह जागता ही रहा था। मगर रात गुज़र गई और अब ये दूसरा दिन शुरू होकर दोपहर भी हो रही थी। फिर भी रचना के बारे में कोई ख़बर न मिली थी उसे। चौधरी के लिए चिंता वाली सबसे ज्यादा बात ये थी कि रचना का मोबाइल फोन कल से लगातार बंद बता रहा था। दिवाकर चौधरी को अब अपनी बेटी की बहुत ज्यादा चिंता सता रही थी। उसने अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर ली थी मगर रचना को ढूॅढ़ पाने में वह नाकाम रहा था। दूसरी चिंता की बात ये थी कि उसका बेटा और बेटे के तीनों दोस्तों का भी कहीं कोई पता नहीं चल रहा था। ये सब बातें चौधरी की रातों की नींद उड़ाए हुई थी।

"बड़ी हैरत की बात है चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव कह उठा___"पहले हम अपने बच्चों के लिए चिंतित व परेशान थे। उसके बाद हम अपने लिए परेशान हो गए उन वीडियोज़ की वजह से और अब रचना बेटी के लिए परेशान हो गए हैं। पिछले कुछ समय से ये सब हमारे साथ क्या होने लगा है इसका अंदाज़ा भी है किसी को?"

"हमसे सबसे बड़ी ग़लती ये हुई कि हमने हर चीज़ को तुच्छ व ग़ैरमामूली समझा।" अशोक मेहरा ने कहा__"पर अब हमें गंभीरता से इस सबके बारे में सोचना पड़ेगा चौधरी साहब। हमें शुरू से हर घटना पर ग़ौर करना होगा। हमारे साथ राहू कुतू का ये चक्कर तब से शुरू हुआ जबसे हमारे बच्चों ने उस लड़की का रेप किया था। उस रेप के बाद से ही हमारे बच्चे गायब हुए हैं और अब तक हमें उनकी कोई खोज ख़बर नहीं लगी है। उसके बाद उस अंजान ब्यक्ति का हमें वो वीडियोज़ भेजना, साथ ही उसकी वो धमकी भरी बात। और अब रचना बेटी का अकस्मात गायब हो जाना। ये सारी घटनाएॅ इस बात की तरफ स्पष्ट रूप से इशारा करती हैं कि इन सभी घटनाओं का कर्ता धर्ता एक ही ब्यक्ति है। दूसरा कोई शख्स ऐसा करने का सोच भी नहीं सकता है।"

"मैं अशोक की इन बातों से पूरी तरह सहमत हूॅ चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"ये सच है कि सारी घटनाओं का केन्द्र बिन्दु उस लड़की के रेप वाली वो घटना ही है। ऐसे मामलों में आम तौर पर वही होता है जो ऐसे हर रेपिस्ट के साथ होता है। यानी रेप पीड़िता के घरवाले पुलिस में एफआईआर दर्ज़ करवाते हैं और अदालत से इंसाफ की गुहार लगाते हैं। हलाॅकि ऐसा कम ही होता है क्योंकि कोई भी शरीफ ब्यक्ति अपनी बदनामी नहीं कराना चाहता इस लिए केस को रफा दफा करवा लेता है किन्तु कुछ ऐसे भी होते हैं जो बदनामी से नहीं डरते और इंसाफ के लिए सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा पार कर जाते हैं। मगर हैरत की बात है कि जिस लड़की के साथ हमारे बच्चों ने रेप किया उस पर किसी ने कोई ऐक्शन ही नहीं लिया। जबकि कानून के ही डर से हमारे बच्चे शायद कहीं छुप गए और आज तक लौट कर घर नहीं आए। दूसरी बात ये कि हमने भी ये जानने की कोशिश नहीं की कि रेप के बाद उस लड़की का क्या हुआ? जबकि हमें ऐसे मामले की पल पल की ख़बर रखनी चाहिए थी। आज उस घटना को घटे क़रीब क़रीब दो हप्ते हो गए होंगे।"

"ये सच है कि हमने हर चीज़ को मामूली ही नहीं समझा बल्कि उसे नज़रअंदाज़ भी किया।" दिवाकर चौधरी ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"जिसका नतीजा आज हमें इस रूप में देखने को मिल रहा है। मगर, अब भी शायद कुछ नहीं बिगड़ा है। हमें इस मामले में अपनी तरफ से जाॅच पड़ताल करनी चाहिए। सबसे ज्यादा उस लड़की के बारे में, क्योंकि घटनाओं का सिलहिला उस रेप से ही शुरू हुआ है। संभव है कि हमें कोई ऐसा सुराग़ मिल जाए जिससे हमें सारी बातों का पता चल जाए। हलाॅकि हमने उस दिन पुलिस कमिश्नर से फोन पर पूॅछा था कि हमारे बच्चों के लापता होने में अगर पुलिस का हाॅथ हुआ तो अच्छा नहीं होगा। इस पर कमिश्नर ने साफ साफ कहा था कि हमारे बच्चों पर कानून का हाॅथ तभी पड़ सकता था जबकि रेप पीड़िता के घरवालों ने थाने में एफआईआर दर्ज़ करवाया होता। इस लिए जब ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है तो हमारे बच्चों पर कानून कोई कार्यवाही कैसे कर देगा? इस लिए ये तो साफ है कि हमारे बच्चों के गायब होने में नुलिस या कानून का कोई हाॅथ नहीं है। मगर बच्चे गायब हैं ये सच बात है। इस लिए अब इसका पता लगाना बेहद ज़रूरी है कि ये सब किसने किया है हमारे बच्चों के साथ? दूसरा मामला वो वीडियो भेजने वाला है। वीडियो भेजने वाले ने उस दिन फोन पर स्पष्ट कहा था कि उसके पास हमारे खिलाफ ऐसे ऐसे सबूत हैं जिनके बेस पर वो हमें जब चाहे बीच चौराहे पर नंगा दौड़ा सकता है। उसकी इस बात पर हमने ये निष्कर्श निकाला था कि संभव है कि उसी ने हमारे बच्चों को पकड़ा हो और फिर उन्हें टार्चर करके उनसे हमारे खिलाफ़ उन वीडियो के रूप में सबूत प्राप्त किया होगा।"

"फिर तो ये साबित हो गया चौधरी साहब कि इन सभी घटनाओं का कर्ता धर्ता एक ही ब्यक्ति है।" अशोक मेहरा बीच में बोल पड़ा___"आपकी बातों में यकीनन ठोस सच्चाई है। यकीनन हमारे बच्चे उस वीडियों भेजना वाले के पास ही हैं। इस बात से ये भी सोचा जा सकता है कि रचना बेटी को भी उसी ने किडनैप किया होगा।"

"बिलकुल ऐसा हो सकता है चौधरी साहब।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"अभी तक हमें वस्तुस्थित का ज़रा भी एहसास नहीं था किन्तु अब हो रहा है और समझ में भी आ रहा है कि वोडियो भेजने वाला हमसे चाहता क्या है?"

"क्या चाहता है वह??" दिवाकर चौधरी फिरकिनी की मानिंद अवधेश की तरफ घूम कर पूछा था।

"हो सकता है कि इन मामलों के तहत उस वीडियो भेजने वाले के संबंध में जो थ्यौरी मेरे दिमाग़ में बनी है वो ग़लत भी हो।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"किन्तु फिर भी प्रकट कर रहा हूॅ। बात उस लड़की के रेप से ही शुरू हुई। रेप पीड़िता के घरवालों को जब इस बात का पता चला होगा कि रेप करने वाले लड़के बड़े बाप की औलाद हैं तो वो समझ गए कि पुलिस में एफआईआर दर्ज़ कराने का कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि बड़े लोगों के प्रभाव से सीघ्र ही इस केस को इतना कमज़ोर बना दिया जाएगा कि उसमें कोई दम नहीं रह जाएगा। बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि उल्टा लड़की को ही कोर्ट में चरित्रहीन और बदचलन साबित कर दिया जाए। उस सूरत में इंसाफ तो मिलने से रहा ही ऊपर से समाज के बीच उनकी जो इज्ज़त खाक़ में मिलेगी उसकी भरपाई इस जन्म में तो संभव नहीं हो सकती थी। इस लिए लड़की के घरवालों ने अपनी बेटी के साथ हुए रेप का बदला लेने के लिए दूसरा तरीका अपनाया। दूसरा तरीका ये था कि किसी तरह वो हमारे बच्चों को पकड़ लें और फिर अपने तरीके से जो चाहे सज़ा दें उन्हें। अब तक वो इसी लिए अपने हर काम में सफल रहे क्योंकि हमने इन सब चीज़ों की तरफ ध्यान ही न दिया था। ध्यान तो तब आया जब मामला हमारे हाॅथ से निकल गया। हाॅ चौधरी साहब, मामला हमारे हाॅथ से निकल ही तो गया है। क्योंकि उस ब्यक्ति के पास हमारे खिलाफ जो सबूत है वो हमें किसी भी पल बीच चौराहे पर नंगा होकर दौड़ने पर मजबूर कर देगा।"

"तो तुम्हारे हिसाब से ये सब लड़की के घरवालों ने किया है?" चौधरी ने कहा___"मतलब कि उन लोगों ने हमारे बच्चों को पकड़ा और उनसे हमारे खिलाफ़ सबूत भी प्राप्त कर लिए?"

"जी बिलकुल।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"आप खुद सोचिए कि ऐसा करने की उनके सिवा भला किसके पास वजह थी? ये तो एक यथार्थ सच्चाई है न चौधरी साहब कि बेवजह कभी कुछ नहीं होता है। इस लिए ये सब करने की वजह सिर्फ और सिर्फ रेप पीड़िता के घरवालों के पास थी। दूसरा ब्यक्ति ऐसा करने का शौक तो नहीं रख सकता न?"

"चलो मान लिया कि ये सब उस रेप पीड़िता लड़की के घरवालों ने किया है।" चौधरी ने कहा___"किन्तु सवाल ये है कि उन्हें हमारी बेटी को भी किडनैप या पकड़ने की क्या ज़रूरत थी? हमारी बेटी ने तो कोई गुनाह नहीं किया था न? फिर क्यों उसे पकड़ा उन्होंने?"

"संभव है कि रचना बेटी के ज़रिये।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"वो हमें ये एहसास दिलाना चाहते हों कि जब वैसा ही रेप केस हमारे साथ हो तो हमें कैसा लगेगा? हमें उससे कितनी तक़लीफ़ होगी?"

अवधेश श्रीवास्तव के इस तर्क से दिवाकर चौधरी कुछ बोल न सका। जैसे निरुत्तर हो गया था वह या फिर कदाचित उसे बात समझ में आ गई थी कि अवधेश का तर्क बिलकुल सही था। ख़ैर, अवधेश श्रीवास्तव की उस बात से कुछ देर सन्नाटा छाया रहा।

"तो अब क्या किया जाए?" सहसा अशोक मेहरा ने उस सन्नाटे को चीरते हुए कहा___"अगर हम सही लाइन पर हैं तो हमारा अगला क़दम अब क्या होना चाहिए?"

"बड़ा सीधा व सरल जवाब है अशोक।" अवधेश श्रीवास्तव ने कहा___"हमारा अगला क़दम ये होना चाहिए कि हमें जल्द से जल्द उस रेप पीड़िता लड़की के घरवालों को धर लेना चाहिए। उसके बाद खुद ही हम अपने तरीके से उनका क्रिया कर्म करेंगे।"

"तुम तो ऐसे कह रहे हो अवधेश जैसे कि ये सब वैसा ही आसान काम हो जैसे थाली से दाल चावल का निवाला बना कर उसे खा लेना आसान होता है।" अशोक ने कहा___"जबकि हमें इस बात पर भी ज़रा ग़ौर कर लेना चाहिए कि जिस ब्यक्ति को हम धर लेने के लिए अपने क़दम बढ़ाने जा रहे हैं उसने क्या इस सबके बारे में नहीं सोचा होगा? बल्कि ज़रूर सोचा होगा भाई, उसे भी इस बात का अच्छी तरह से पता है कि हम क्या चीज़ हैं। अगर वो हमारे बच्चों को धर लेगा तो सबसे पहले हमारा शक़ उसी पर ही जाएगा। उस सूरत में हम उसकी उस धृष्टता के लिए उसका क्या हस्र करेंगे ये बात भी उसने ज़रूर सोची होगी। अब सोचने वाली बात ये है कि जब उसने ये सब सोचा होगा तो अपने बचाव का कोई न कोई रास्ता भी सोचा होगा। ऐसे ही तो नहीं कोई साॅप के बिल में अपना हाॅथ डाल देता है।"

"यकीनन तुम्हारी बात में दम है।" अवधेश श्रीवास्तव ने जैसे स्वीकार किया__"और उसके जिस बचाव वाले रास्ते की तुम बात कर रहे हो वो यकीनन यही हो सकता है कि आज की डेट में उसके पास हमारे खिलाफ़ सबूत के रूप में वो वीडियो रूपी ब्रम्हास्र है।"

"बिलकुल ठीक समझे।" अशोक ने कहा__"इस लिए अब हम अगर कोई क़दम भी उठाएॅ तो ज़रा सोच समझ कर उठाएॅ। क्योंकि अगर उसे पता चल गया कि हम उसके खिलाफ़ कुछ करने जा रहे हैं तो संभव है कि अगले ही पल वो हम पर क़यामत बरपा दे।"

"इसका मतलब तो ये हुआ कि हम कुछ कर ही नहीं सकते।" सहसा चौधरी आवेश में कह उठा__"उस साले ने हमें पंगु बना कर रख दिया है। मगर ऐसा कब तक चलेगा यार? हमें कुछ तो करना ही पड़ेगा न? वरना वो दिन दूर नहीं जबकि हम चारों किसी चौराहे पर नंगे दौड़ लगा रहे होंगे।"

"कुछ तो करना ही पड़ेगा चौधरी साहब?" अशोक ने कहा___"साला नुकसान तो दोनो तरफ से होना ही है। इस लिए कुछ करके ही नुकसान झेलते हैं। शायद ऐसा भी हो जाए कि सारा खेल हमारे हक़ में हो जाए।"

"बात तो सच कही तुमने।" चौधरी ने कहा___"मगर सवाल ये है कि हम करेंगे क्या?"

"वही जो करने का सजेशन थोड़ी देर पहले अवधेश भाई ने दिया था।" अशोक ने कहा___"मगर उसमें थोड़ा चेंज करना पड़ेगा। वो ये कि लड़की के घरवालों को पहले हम दिलेरी से धरने जा रहे थे जबकि अब वही काम हम इस तरीके से करने की कोशिश करेंगे कि उस कम्बख्त को इसकी भनक तक न लग सके।"

"ओह आई सी।" अवधेश श्रीवास्तव बोला__"मगर मुझे लगता है कि हमें एक बार ये सब करने से पहले फिर से इस बारे में सोच लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम खुद ही धर लिए जाएॅ।"

"कायर व डरपोंक जैसी बातें मत करो अवधेश।" चौधरी ने कठोरता से कहा___"अब हम चुप भी नहीं बैटना चाहते हैं। साला हिंजड़ा बना कर रख दिया है उसने हमें। मगर अब और नहीं। अब जो होगा देखा जाएगा।"

बस चौधरी की इस बात ने जैसे फैंसला सुना दिया था। किसी में भी इस फैंसले के खिलाफ़ जाने की हिम्मत न थी। इस लिए अब इस काम को अंजाम देने की समय सीमा पर विचार विमर्ष किया गया और उसके बाद अशोक और अवधेश अपने अपने घर चले गए। मगर आगे किसके साथ क्या होने वाला है ये किसी को कुछ पता न था।

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अपडेट........《 57 》

अब तक,,,,,,,,

"अपने भगवान को याद कर ले बच्चे।" फिर उसने मेरी तरफ खतरनाक भाव से बढ़ते हुए कहा___"उनसे दुवा कर कि तेरे जिस्म की हड्डियाॅ सलामत रहें।"

"ये डाॅयालग मैं भी बोल सकता हूॅ तुम्हारे लिए।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"पर ये सोच कर नहीं बोला कि फालतू की डींगें मारना मेरी फितरत नहीं है।"

मेरी ये बात सुन कर वो जैसे बुरी तरह तिलमिला गया था। मुझे पता था कि उसके सामने मैं कुछ भी नहीं हूॅ। अगर मैं एक बार भी उसके फौलादी शिकंजे में फॅस गया तो फिर शायद भगवान ही मालिक होगा मेरा। मगर मुझे खुद पर और अपने गुरू की सिखाई हुई कला पर पूर्ण विश्वास था।

वो पूरे वेग से मेरी तरफ बढ़ा और अपने दाहिने हाॅथ को भी उसी वेग से मुझ पर चलाया था। मैं फुर्ती से नीचे झुका मगर झुकते ही मेरे हलक से चीख निकल गई। कारण उसने हाॅथ चलाने के बाद ही अपने दाहिने पैर को उठाकर उसका घुटना भी चला दिया था जो सीधा मेरे झुके हुए चेहरे से टकराया था। मैं उछलते हुए सीधा हुआ ही था कि उसने बिजली की सी फुर्ती से घूम कर मेरे सीने पर फ्लाइंग किक जमा दी। नतीजा ये हुआ कि मेरे हलक से ज़ोर की हिचकी निकली और मैं पीछे की तरफ हवा में लहराते हुए ही नीचे कच्ची ज़मीन पर चारो खाने चित्त जा गिरा। गिरते ही मेरी ऑखों के सामने अनगिनत तारे नाॅच गए। कुछ पल के लिए तो ऑखों के सामने अॅधेरा भी छा गया। प्रहार इतना ज़बरदस्त था कि मुझसे तुरंत उठा न गया। सीने में बड़ी असहनीय पीड़ा महसूस हुई मुझे। मेरे कानो में नीलम व सोनम की चीखें भी टकराई। कदाचित मुझे इस तरह गिरते देख वो बेहर डर गई थी और मुझे कुछ हो जाने की आशंका से वो बुरी तरह चीखी थीं।

सहसा मेरी नज़र मेरे नज़दीक ही पहुॅच चुके उस आदमी पर पड़ी। मेरे क़रीब पहुॅचते ही उसने अपने पैर को उठाया और ज़मीन पर चित्त गिरे मेरे पेट की तरफ तीब्र वेग से चलाया। मैं बिजली की सी फुर्ती से कई पलटा खाते हुए दूसरी तरफ हो गया तथा साथ ही उछल कर खड़ा भी हो गया। ये अलग बात है इस तरह उछल कर खड़े होने से अचानक ही मुझे अपने सीने पर पीड़ा का एहसास हुआ। मैं समझ चुका था कि अगर ये आदमी इसी तरह मुझ पर और दो चार प्रहार करने में सफल हो गया तो यकीनन मेरा काम तमाम हो जाना है। अतः अब मैं उससे पूरी तरह सतर्कता से मुकाबला करने के लिए तैयार हो गया।

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अब आगे,,,,,,,

मंत्री दिवाकर चौधरी इस वक्त गुनगुन में ही एक ऐसी जगह पर था जहाॅ पर उसके ही किसी खास जान पहचान वाले के माल का उद्घाटन समारोह था। माल का मालिक या यूॅ कहिए कि मंत्री के उस जान पहचान वाले खास आदमी का नाम शैलेन्द्र बंसल था। जो मुख्य रूप से आगरा का रहने वाला था। बहुत पहले ही उसकी मुलाक़ात मंत्री से हुई थी। कहते हैं कि जो जैसा होता है उसे वैसा मिल ही जाता है फिर चाहे वो दुनियाॅ के किसी भी कोने में चला जाए।

शैलेन्द्र बंसल और मंत्री के बीच क्या मंत्रणा हुई थी इस बारे में तो ख़ैर वो दोनो ही बता सकते थे किन्तु मंत्री के कैरेक्टर के हिसाब से सोचने पर पता चलता था कि शैलेन्द्र बंसल भी मंत्री के ही जैसे कैरेक्टर का आदमी था। इसका खुलासा तब हुआ जब मंत्री ने शैलेन्द्र को अपने यहाॅ कारोबार के रूप में एक बड़ा सा माॅल स्थापित करने का प्रस्ताव दिया था। मंत्री के ही सहयोग से तथा उसके ही निर्देशन पर गुनगुन में अच्छी खासी ज़मीन पर ग़ैर कानूनी रूप से कब्जा कर उस स्थान पर बहुत ही कम समय में एक बड़ा सा माॅल बन कर तैयार हो गया था जिसका उद्घाटन आज खुद मंत्री के द्वारा हुआ था।

मंत्री के निर्देशन में बना ये माॅल सबकी नज़र में माॅल ही था जहाॅ पर हर तरह का उपयोगी सामान लोगों को ख़रीदने पर मिल जाता मगर कोई नहीं जानता था इसी माॅल के बेसमेन्ट में दरअसल मंत्री व शैलेन्द्र बंसल ग़ैर कानूनी धंधे को अंजाम देने की बुनियाद भी रख चुके थे।

माॅल का उद्घाटन तथा वहाॅ पर कुछ ज़रूरी मीटिंग करने के बाद मंत्री माॅल से बाहर आकर अपने सुरक्षा कर्मियों से घिरा अपनी कार के पास पहुॅचा ही था कि सहसा उसकी कोट की जेब में मौजूद मोबाइल बज उठा। एक हाॅथ से मोबाइल को निकालने के साथ ही मंत्री अपनी कार की पिछली सीट पर बैठ गया। उसके बाद उसने बज रहे मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखा। उसके बैठते ही उसके साथ आगे पीछे उसके सुरक्षा गार्ड भी बैठ गए। इसके बाद कार आगे बढ़ चली।

"हाॅ कहो राणे।" मोबाइल की स्क्रीन पर डिटेक्टिव राणे का नाम देख कर मंत्री ने फौरन ही काल को रिसीव कर मोबाइल को कान से लगाने के साथ ही कहा___"क्या बात है? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने उस सारे काम को कर लिया है जिस काम को करने के लिए हमने तुम्हें लगाया था? अगर ऐसा है तो भाई मान गए तुम्हें। इतने कम समय में तो दुनियाॅ का कोई भी जासूस काम को अंजाम नहीं दे सकता। अभी कल ही तो लगे थे तुम काम में।"

"आप ग़लत समझ रहे हैं चौधरी साहब।" उधर से राणे का स्वर उभरा___"जिस काम के लिए आपने मुझे लगाया है वो काम भला इतना जल्दी कैसे हो जाएगा?"

"ओह ऐसा क्या।" मंत्री ने बुरा सा मुह बनाया___"हम तो मियाॅ खांमखां ही तुम्हें जेम्स बाण्ड का बाप नहीं बल्कि दादा समझ बैठे थे। ख़ैर, ये बताओ कि अगर काम नहीं हुआ है तो तुमने हमें फोन किस बात के लिए किया है?"

"दरअसल मैने।" उधर से राणे ने कहा___"बहुत ही ज़रूरी बात बताने के लिए आपको फोन किया है।"

"अरे तो मियाॅ।" मंत्री तपाक से बोला___"बात क्यों बढ़ा रहे हो? ज़रूरी बात तो तुमें अतिसीघ्र बताना चाहिए न। ख़ैर जल्दी बताओ कौन सी ज़रूरी बात है?"

"कल आपके यहाॅ से जाने के बाद।" उधर से राणे कह रहा था___"मैने अजय सिंह का पता किया और उसके पीछे लग गया। मैं देखना चाहता था कि उसने जो कुछ आपसे कहा था उसमें कितनी सच्चाई थी तथा वो आपके प्रति कितना वफ़ादार है?"

"ओह।" मंत्री के कान खड़े हो गए___"तो क्या देखा और क्या जाना तुमने?"

"कल तो उसने कुछ खास नहीं किया था।" हरीश राणे ने कहा___"किन्तु आज सुबह नौ या दस बजे के क़रीब वह अपनी कार में किसी आदमी को लिए गुनगुन के रेलवे स्टेशन आया था। स्टेशन से बाहर वो अकेला निकला था। मतलब कि उसके साथ जो दूसरा आदमी था उसे वो शायद रेलवे स्टेशन छोंड़ने आया था। स्टेशन के बाहर जब वह आया तो उसी समय उसके मोबाइल पर किसी का काल आया तथा उसने किसी से कुछ देर तक बातें की। बात करने के बाद ही एकदम से उसके हाव भाव बदले से नज़र आए जिसके तहत वो अपनी कार में बैठ कर फौरन स्टेशन से बंदूख से छूटी गोली की तरह हवा हो गया। मैं उसके पीछे ही था कि अचानक कुछ देर बाद उसके पास तीन अलग अलग जीपों में ढेर सारे आदमी हथियारों से लैश आए। उनमें से एक आदमी अजय सिंह की कार में बैठ गया। उसके बाद अजय सिंह की कार के चलते ही बाॅकी तीनों जीपों में सवार आदमी भी अजय सिंह के पीछे पीछे चल पड़े।"

"अब बस भी करो मियाॅ।" सहसा मंत्री राणे की बात बीच में ही काटते हुए किन्तु परेशान भाव से कह उठा___"तुम तो इस तरह शुरू हो गए जैसे कोई टेप रिकार्डर शुरू हो जाता है। मुख्य बात बताओ कि मामला क्या हुआ है बस।"

"मुख्य बात ये है कि।" उधर से राणे ने कहा___"इस वक्त जहाॅ पर मैं हूॅ वहाॅ पर एक से बढ़ कर एक धुरंधर लोगों की पूरी फौज आई हुई है। इतना ही नहीं यहाॅ पर एक मंदिर है जिसके सामने कई सारे हट्टे कट्टे लोग खड़े हैं। एक हट्टा कट्टा आदमी एक मामूली से लड़के से ज़बरदस्त लड़ाई कर रहा है। अजय सिंह तथा उसके साथ आए सब लोग लड़ाई देख रहे हैं। मैने तो अजय सिंह को ये भी कहते सुना है कि इस हराम के पिल्ले को इतना मारो कि हगने मूतने के भी काबिल न बचे। मंदिर के पास ही दो लड़कियाॅ दो आदमियों से घिरी खड़ी हैं तथा बुरी तरह रोये जा रही हैं। उनके मुख से बार बार एक ही बात निकल रही है कि प्लीज उसे कुछ मत करो। इसका मतलब ये हुआ चौधरी साहब कि ये वही लड़का है जिसका नाम विराज है। अजय सिंह ने कदाचित उसे घेर लिया है और अब वह उसके आदमियों के रहमो करम पर है।"

"ओह तो ये बात है।" मंत्री के जिस्म में जाने क्या सोच कर झुरझुरी सी हुई, बोला___"चलो अच्छा ही हुआ कि वो साला ठाकुर की पकड़ में आ गया है। अब सब कुछ सही हो जाएगा राणे।"

"यकीनन।" उधर से राणे ने कहा___"आपका दुश्मन अजय सिंह की पकड़ में आ चुका है। अब आप अगर चाहें तो इस मौके का फायदा उठा सकते हैं। यानी आप भी यहाॅ आ जाइये और बहती गंगा में डुबकी लगा कर अपना काम भी कर लीजिए।"

"अब हमें वहाॅ आने की ज़रूरत नहीं है राणे।" मंत्री ने कहा___"वो लड़का तो अब अजय सिंह की पकड़ में आ ही गया है। अतः अजय सिंह अपने वादे के अनुसार उसे हमारे हवाले भी कर देगा। उसके बाद तो उसे हमारी हर चीज़ लौटानी ही पड़ेगी। फिर हम उसका क्या हस्र करेंगे इसके बारे में उसने सोचा भी न होगा।"

"तो फिर मेरे लिए क्या आदेश है चौधरी साहब?" उधर से हरीश राणे ने कहा___"मुझे नहीं लगता कि अब इसके बाद भी मेरा कोई काम है यहाॅ। यानी आपका दुश्मन ठाकुर अजय सिंह से देर सवेर आपको मिल ही जाएगा और फिर आप उससे जैसे चाहेंगे वैसे अपने वो वीडियोज तथा अपने बच्चे वापस ले सकेंगे।"

"ठीक कह रहे हो तुम राणे।" मंत्री ने कहा___"अगर यही आलम है वहाॅ का तो फिर अब रह ही क्या गया है तुम्हारे कुछ करने के लिए? इस लिए अगर तुम चाहो तो वापस आ सकते हो या फिर ऐसा करो कि अभी फिलहाल तुम वहीं पर रहो और देखते रहो कि नतीजा क्या निकलता है? जैसा कि इस सबके बारे में ठाकुर ने हमें सूचना तक नहीं दी है इस लिए संभव है कि उसके मन में हमारे प्रति कोई खोट हो। इस लिए तुम ठाकुर की कार्यवाही के बारे में अंत तक देखते रहो। अगर ठाकुर इसके बाद भी हमें उस सबके बारे में नहीं बताता है तो हम उसे भी देख लेंगे। तुम ये ज़रूर देखना कि ठाकुर उस लड़के को तथा अपनी बेटी को कहाॅ कैद करके रखता है?"

"ठीक है चौधरी साहब।" उधर से हरीश राणे के ऐसा कहने के साथ ही मंत्री ने काल कट कर दी। हरीश राणे से बात करने के बाद मंत्री इस सबके बारे में सोचने लगा। उसे उम्मीद तो थी कि ठाकुर उससे गद्दारी नहीं करेगा किन्तु उसे इस बात का भी एहसास था कि ठाकुर साला जब अपनों का ही नहीं हुआ तो भला उसका क्या होगा?

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रितू और आदित्य इस वक्त दो अलग अलग पेड़ों पर चढ़े हुए थे। जहाॅ से उन दोनों को मंदिर के सामने का नज़ारा स्पष्ट दिख रहा था। विराज के साथ क्या क्या हुआ था ये उन दोनो ने अपनी ऑखों से देखा था। दोनो ही विराज के लिए बेहद चिंतित व परेशान थे। उन दोनो को उम्मीद नहीं थी कि अचानक ही ऐसा कुछ हो सकता है।

विराज को इस तरह मार खाते देख आदित्य तुरंत पेड़ की शाखा से नीचे कूदने ही वाला था कि रितू ने उसे रुकने का इशारा किया था। उसे उसने समझाया था कि उसके जाने से भी इस वक्त कुछ नहीं हो सकता था। उल्टा वो खुद भी विराज की तरह पकड़ में आ सकता है। आदित्य को रितू से ये उम्मीद नहीं थी किन्तु फिर उसे भी लगा कि रितू सही कह रही है। इस वक्त वहाॅ पर जाना खतरे से खाली नहीं था। संभव था विराज उसकी वजह से कमज़ोर ही पड़ जाता।

दोनो के पास अब कोई दूसरा चारा नहीं था। हलाॅकि रितू के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वो इस सिचुएशन पर ज्यादा गंभीर नहीं हुई है। कदाचित उसे बस समय का इंतज़ार था।

आदित्य की नज़र सहसा शेखर के मौसा यानी केशव की तरफ पड़ी। केशव जी के साथ तीन जीपों में आदमी थे जिनके हाॅथों में बंदूख, लट्ठ तथा हाॅकी जैसे हथियार नज़र आ रहे थे। जिन पेड़ों पर ये दोनो चढ़े हुए थे उन्हीं पेड़ों के बीच से होते हुए केशव और उसके आदमियों की जीपें गुज़री थीं। ये देख कर आदित्य ने रितू की तरफ देखा। रितू ने भी आदित्य की तरफ देखा मगर उसने कोई रिएक्शन नहीं दिया। पता नहीं क्या चल रहा था उसके मन में??

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इधर मेरी तरफ।

मैं समझ गया था कि मेरा प्रतिद्वंदी ताकत के मामले में मुझसे कहीं ज्यादा है। अतः अब ताकत के साथ साथ दिमाग़ से भी काम लेना ज़रूरी था। उधर वो आदमी मेरी तरफ इस तरह देख देख कर मुस्कुरा रहा था जैसे वो मुझे सचमुच में चींटी ही समझ रहा हो और जब चाहे मुझे मसल कर रख दे किन्तु अभी वो मुझे जैसे खिला रहा था।

"क्यों बच्चे दर्द तो नहीं हो रहा न?" उस आदमी ने ब्यंगात्मक लहजे में मुस्कुरा कर कहा___"वैसे अभी तो मैने तुम पर ताकत से कोई वार ही नहीं किया है। वरना तुम इस तरह सही सलामत खड़े न रहते बल्कि अपने हाॅथ पैर की हड्डियाॅ तुड़वाए ज़मीन पर पड़े रहते।"

"मैं भी अभी तक सिर्फ देख ही रहा था कि।" मैने कहा___"भाड़े के कुत्तों में कितना दम होता है?"

"अच्छा।" वह तिलमिलाया तो ज़रूर मगर फिर भी मुस्कुरा कर ही बोला___"तो क्या देखा और क्या समझ आया तुझे?"

"यही कि।" मैने मुस्कुरा कर कहा___"कुत्ते तो कुत्ते ही होते हैं वो कभी शेर का शिकार नहीं कर सकते।"

"यू बास्टर्ड।" वो बुरी तरह क्रोध में आते हुए मेरी तरफ बढ़ा और गुस्से में आग बबूला होते हुए मुझ पर हमला कर दिया।

मैं तो अब पूरी तरह से सतर्क हो चुका था और उसके किसी भी हमले के लिए पूरी तरह से तैयार था। जैसे ही उसने मेरी नाॅक में अपने दाहिने हाॅथ का पंच मारा मैं फुर्ती से एक तरफ हुआ और बिजली की सी स्पीड से पलट कर उसकी तरफ पीठ करते हुए उसके उस हाॅथ को दोनो हाॅथों से पकड़ कर अपने दाहिने कंधे पर रखा और फिर पूरी ताकत से नीचे की तरफ ज़ोर का झटका दिया। परिणामस्वरूप कड़कड़ की आवाज़ के साथ ही उसका हाॅथ बीच से टूट गया। हाॅथ के टूटते ही वह हलाल होते बकरे की तरह चिल्लाया। जबकि मैंने इतने पर ही बस नहीं किया बल्कि फुर्ती से घूम कर उसके पीछे आया और इससे पहले कि वो कुछ समझ पाता मैने फुर्ती से उसके सिर को दोनो हाथों से पकड़ा और ज़ोर से बाॅई तरफ को झटक दिया। नतीजा ये हुआ कि एक बार पुनः फिज़ा में कड़कड़ की आवाज़ हुई और उसकी गर्दन एक तरफ को झूल गई, साथ ही वह लहराते हुए ज़मीन पर गिरा और शान्त पड़ गया। उसे देख कर अब कोई भी कह सकता था कि वो मर चुका है।

आस पास खड़े उसके सभी हट्टे कट्टे आदमी ये नज़ारा देख कर आश्चर्यचकित रह गए। किसी को भी इस सब पर यकीन न आया कि ये दो पल में अचानक क्या हो गया है? अपनी अपनी जगह पर खड़े सबके सब बुत से बन गए थे। ऊपर मंदिर के दरवाजे के जस्ट सामने ही दोनो तरफ से एक एक आदमी से घिरी नीलम व सोनम दीदी भी ये सब देख कर हक्का बक्का रह गई थी।

"ओये मारो रे इस हरामज़ादे को।" सहसा फिज़ा में छा चुके सन्नाटे को एक आदमी ने ज़ोर से चिल्लाते हुए भंग किया, बोला___"इसने अब्दुल को जान से मार दिया। इस साले की हड्डी पसली तोड़ डालो सब।"

उस आदमी की इस बात से सब जैसे होशो हवाश में आए और फिर चारो तरफ से मेरी तरफ दौड़ पड़े। मैं जानता था कि सबके सब साले साॅड हैं। इस वक्त गुस्से में ये सब सचमुच मेरी हड्डियाॅ तोड़ सकते थे। अभी वो सब मेरे नज़दीक पहुॅचे भी नहीं थे कि तभी बहुत सारे आदमी हाॅथों में बंदूख, लट्ठ व हाॅकी जैसे हथियार लिए चारो तरफ से उन सब आदमियों पर टूट पड़े। मैं समझ गया कि ये सब केशव जी के आदमी हैं। ये देख कर मैने राहत की साॅस ली।

केशव जी के वो आदमी बिना कुछ सोचे समझे तथा बिना कुछ बोले एकदम से टूट पड़े थे उन हट्टे कट्टे आदमियों पर। नतीजा ये हुआ कि वो सब जिन जिन के निशाने पर आए वो सब देखते ही देखते लहू लुहान नज़र आने लगे। मंदिर के बाहर इतने सारे आदमी और उनके शोर से वातावरण गूॅज उठा। अभी ये सब हंगामा मचा ही हुआ था कि तभी अलग अलग दिशाओं से एक बार पुनः वैसे ही हट्टे कट्टे आदमी निकल कर आए और केशव जी के उन आदमियों पर पिल पड़े। हलाॅकि उन सबके हाॅथ खाली थे किन्तु जल्द ही उनके हाॅथों में भी हथियार नज़र आने लगे। उन लोगों ने केशव जी के आदमियों से उनके ही हथियार छीन कर उन पर प्रहार करना शुरू कर दिया था।

केशव जी के जिन आदमियों के पास बंदूखें थी वो गोलियाॅ बरसाए जा रहे थे। जिसका नतीजा ये हो रहा था कि जिन पर भी गोली लगती वो सीधा यमलोक ही पहुॅच रहा था। इधर मैं आस पास देख रहा था कि आदित्य व रितू दीदी कहाॅ हैं? मैं हैरान था कि वो दोनो अभी तक आए क्यों नहीं? मैं खुद भी इस मुठभेड़ में किसी न किसी से लड़े जा रहा था।

"सबके सब अपनी अपनी जगह रुक जाओ।" सहसा इस आवाज़ की गर्जना को सुन कर मैं चौंक गया। पलट कर देखा तो ऊपर जहाॅ पर नीलम व सोनम दीदी खड़ी थी उनके पास ही बड़े पापा यानी अजय सिंह खड़े थे। उनके हाॅथ में रिवाल्वर थी जिसे वो सोनम की कनपटी पर लगाए खड़े थे। उन आदमियों का पता ही नहीं था जो इसके पहले नीलम व सोनम दीदी को कवर किये खड़े थे। शायद सबके आते ही वो भी लड़ाई में शामिल हो गए थे।

अजय सिंह की ज़ोरदार आवाज़ को सुन कर सबके सब जहाॅ के तहाॅ रुक गए। उन सब के रुकते ही अजय सिंह के साथ आए फिरोज़ खान के सभी आदमियों ने केशव तथा उनके आदमियों को गन प्वाइंट पर ले लिया। सब कुछ एकदम से बदल गया। अभी कुछ ही देर पहले तो हालात हमारे हक़ नज़र आए थे किन्तु अब बाज़ी फिर से पलट गई थी।

"तुम लोगों ने बहुत तमाशा कर लिया है।" शान्त पड़ गए माहौल में अजय सिंह की आवाज़ गूॅजी___"अब ज़रा मेरी बात कान खोल कर सुनो सबके सब। अगर मेरे आदमियों के अलावा कोई दूसरा आदमी अपनी जगह से हिला तो समझ लो वो अपनी मौत का जिम्मेदार खुद होगा।"

अजय सिंह की इस बात से कोई कुछ न बोला। कुछ देर की ख़ामोशी के बाद सहसा अजय सिंह ने मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुरा कर कहा___"तो आख़िर तुम मेरी पकड़ में आ ही गए भतीजे? बहुत सताया तुमने और बहुत ज्यादा तड़पाया भी मुझे। मगर कोई बात नहीं, मैं उस सबका ब्याज सहित हिसाब ले ही लूॅगा। मगर उससे पहले मैं ज़रा अपनी बेटियों से तो मिल लूॅ।"

कहने के साथ ही अजय सिंह ने एक हाॅथ बढ़ा कर नीलम को उसके सिर के बालों से पकड़ कर ज़ोर से अपनी तरफ खींचा। नीलम के हलक से दर्द में डूबी चीख़ निकल गई। हलाॅकि उसकी व सोनम दीदी दोनो की ही हालत बहुत ख़राब हो चुकी थी। उनके चेहरों पर मौत जैसा ख़ौफ़ मानो ताण्डव सा कर रहा था।

"क्यों बिटिया रानी।" अजय सिंह ने दाॅत पीसते हुए नीलम के चेहरे के पास अपना चेहरा लाते हुए कहा___"तुम्हारे इस बाप के लौड़े में ऐसी क्या कमी नज़र आ गई थी जो तुम दोनो बहनों ने अपने इस भाई के लौड़े को थाम लिया?"

"अजय सिंह।" मैं पूरी शक्ति से चिल्लाया___"ज़ुबान सम्हाल कर बात कर। ये मत भूल कि जिससे तू इस घिनौने तरीके से बात कर रहा है वो खुद तेरी ही बेटी है। मेरे दिलो दिमाग़ में तेरे लिए जो इज्ज़त बाॅकी थी उसे भी आज तूने ये घिनौनी बात बोल कर खत्म कर ली है। यकीनन तू इस संसार का सबसे गंदा और सबसे पापी इंसान है, बल्कि इंसान ही नहीं है तू, राक्षस है राक्षस।"

"मैं चाहूॅ तो इसी वक्त तेरी इस कड़वी ज़ुबान को तेरे हलक से निकाल कर चील कौवों को खिला दूॅ।" मेरी बातों से तिलमिलाया हुआ अजय सिंह गुर्राया___"मगर जैसा कि मैने कहा न कि पहले मैं अपनी बिटियों से मिल लूॅ, उसके बाद तुझसे भी अच्छे से मिलूॅगा।"

"आप सच में बहुत गंदे हैं डैड।" नीलम ने बुरी तरह रोते हुए कहा___"काश ये सब सच न होता। अच्छा होता कि इस सबके बारे में मुझे पता ही न चलता। रितू दीदी ने बहुत अच्छा किया था जो उन्होंने आप जैसे गंदे व पापी माॅ बाप को ठुकरा दिया है और अभी जिस तरीके से आपने मुझे वो शब्द कहे हैं उससे आपने बता दिया कि आपके मन में अपनी ही बहू बेटियों के प्रति क्या है?"

"इन सब बातों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है बिटिया रानी।" अजय सिंह ने अजीब भाव से कहा___"ये सच है कि मैंने हमेशा अपने ही घर की औरतों व बेटियों को अपने नीचे सुलाने की ख्वाहिश की है। मगर इसमें बुरा क्या किया है मैने ? हर इंसान को अपनी इच्छा पूरी करने का हक़ होता है। मैने भी अपनी इच्छाओं को पूरा ही तो करना चाहा है। ख़ैर छोंड़, ये बता कि तुझे यहीं पर नंगा करूॅ या हवेली ले जाकर आराम से तुझे लड़की से औरत बनाऊॅ?"

"तू कुत्ते की मौत मरेगा अजय सिंह।" मैं पूरी शक्ति से दहाड़ते हुए बोला___"तेरे जिस्म में कीड़े पड़ेंगे। तू सड़ सड़ कर मरेगा। तू वासना और हवश में इतना अंधा हो चुका है कि तुझे रिश्ते नाते भी नज़र नहीं आ रहे हैं।"

"कुत्ते की मौत तो मैं तुझे मारूॅगा भतीजे।" अजय सिंह ने कहा___"लेकिन उससे पहले मैं तेरी माॅ गौरी, तेरी बहन निधी, व तेरी चाची करुणा इन तीनो को जी भर के तेरे ही सामने पेलूॅगा, वो भी आगे पीछे दोनो तरफ से। उसके बाद उन सबको रंडी बज़ार में बेंचूॅगा भी, तब तुझे मारूॅगा।"

"अपने जैसे ही हिजड़ों की फौज ले कर आया है।" मैने कहा___"और इन्हीं हिजड़ों की फौज के बलबूते पर तू इतना कुछ बोल पा रहा है। तुझमें अगर दम है तो मुझसे खुद मुकाबला कर।"

"इसे मारो रे।" अजय सिंह ज़ोर से चिल्लाया___"इस हराम के पिल्ले को इतना मारो कि हगने मूतने के भी काबिल न बचे। बहुत देर से ये हरामज़ादा बड़ बड़ किये जा रहा है। पहले इसकी ही हड्डियाॅ तोड़ो।"

अजय सिंह के कहने की देर थी। चारो तरफ से वही हट्टे कट्टे आदमी मेरी तरफ बढ़ते हुए आ गए। वो चार थे और मैं अकेला। मैं अजय सिंह की उन अश्लीलतापूर्ण बातों से बुरी तरह क्रोध व गुस्से से भन्ना उठा था। जैसे ही एक मेरी तरफ झपटा मैने बिजली की तरह फुर्ती दिखाई और उछल कर एक ज़बरदस्त फ्लाइंग किक उसकी गर्दन पर जड़ दी। उसके मुख से घुटी घुटी सी चीख निकली साथ ही कड़कड़ की आवाज़ भी हुई। ज़मीन पर औंधे मुह जब वह गिरा तो फिर उठ न सका।

ये देख कर नीलम को उसके बालों से पकड़े अजय सिंह हक्का बक्का रह गया। कदाचित उसे मुझसे ऐसे किसी चमत्कार की स्वप्न में भी उम्मीद नहीं थी। वो ऑखें फाड़े मुझे देखने लगा था। इधर उस आदमी के गिर कर शान्त पड़ते ही बाॅकी तीन थोड़ी देर के लिए ठिठके और फिर एक साथ मेरी तरफ झपटे। मैंने अपनी जगह से ऊॅची छलांग लगाई तथा हवा में ही कलाबाज़ी खाते हुए उन तीनों के बीच से बाहर उनके पीछे आ खड़ा हुआ। जबकि वो तीनों ही झोंक में आकर आपस में ही टकरा गए।

"रुक जा सुअर की औलाद।" तभी अजय सिंह चिल्लाया___"वरना मेरे एक ही इशारे पर मेरे साथ आए मेरे ये सब हथियारों से लैश आदमी तुझे पल भर में गोलियों से भून कर छलनी कर देंगे।"

"तू मुझे गोलियों से छलनी नहीं कर सकता कुत्ते।" मैने कहने के साथ ही अपनी टाॅग चला दी एक की पीठ पर। जिसकी पीठ पर लात का प्रहार पड़ा था वो अपने साथ दूसरे को साथ लिए ही ज़मीन पर गिर गया, जबकि तीसरा अभी पलटा ही था कि मैने पैर के घुटने का वार उसके पेट में किया तो वो बिलबिला उठा। साथ ही बोलता भी जा रहा था ज़ोर से____"तेरे लिए तो मैं एक तुरुप के इक्के की तरह हूॅ न। मुझे बंधक बना कर ही तो तू बाॅकी सबको मुम्बई से यहाॅ बुलाएगा। अगर मैं ही मर गया तो तू कैसे बुला सकेगा उन सबको?"

"ज्यादा बकवास न कर समझा।" अजय सिंह पहले तो सकपकाया, फिर चिल्लाया___"मैं कहता हूॅ ये उछलना कूदना बंद कर वरना मैं नीलम को यहीं पर नंगा कर दूॅगा।"

"नहींऽऽऽ।" अपने बाप की ये बात सुन कर नीलम तो बुरी तरह रोते हुए चीखी ही उसके साथ में सोनम भी चीख पड़ी थी। इधर अजय सिंह का वाक्य जैसे ही मेरे कानों से टकराया मैं एकदम से रुक गया। मैं जानता था कि अजय सिंह ये ज़रूर कर सकता था। उसे इस वक्त अपनी व अपनी बेटी की इज्ज़त की कोई परवाह नहीं थी।

"तुम मेरी इज्ज़त की परवाह मत करो राज।" सहसा नीलम रोते हुए चिल्लाई___"वैसे भी मुझे इस नीच आदमी की ऐसी बेहूदा बातें अपने लिए सुन कर जीने की इच्छा मर गई है। इस लिए तुम मेरी चिन्ता मत करो और इन सारे राक्षसों का वध कर दो।"

"ओहो क्या बात है।" अजय सिंह चमका___"देखो तो क्या इज्ज़त दी है मेरी बिटिया रानी ने मुझे। ख़ैर कोई बात नहीं, पर हाॅ मरना तो है ही तुझे और तुझे ही बस क्यों बल्कि तेरी बड़ी बहन को भी मरना होगा। मुझे ऐसी औलाद के जीने मरने से अब कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा जो अपने ही माॅ बाप के मौत का सामान करती फिरे। बचपन से अब तक मैंने तुम दोनो को हर चीज़ दी है। जिस चीज़ पर तुम दोनो ने हाॅथ रखा उस चीज़ को मैने तुम दोनो के नाम कर दी। मगर बदले में दिया क्या तुम दोनो ने?? अरे देने की तो बात दूर बल्कि मेरे दुश्मन का साथ देकर मेरी मौत चाही तुम दोनो ने। अरे माॅ बाप जैसे भी हों माॅ बाप ही होते हैं। ख़ैर जाने दो, मुझे इस बात का दुख नहीं है कि इस लड़के ने मेरा इतना ज्यादा नुकसान करके मेरा जीना हराम किया है बल्कि इस बात का दुख है कि मेरी अपनी बेटियाॅ मुझे और अपनी माॅ तथा भाई को त्याग कर इसका साथ दिया। इस लिए इसकी सज़ा तो मिलेगी तुम दोनो को। मगर उससे पहले तुम दोनो के साथ मैं वो करूॅगा जो दुनियाॅ में किसी भी बाप ने न किया होगा।"

"तुझ जैसे इंसान से और किसी बात की उम्मीद भी क्या की जा सकती है।" नीलम ने सहसा ज़हरीले भाव से कहा___"जो अपनी ही औलाद को अपने नीचे सुलाना चाहता हो उसके जैसा नीच व पापी दूसरा कौन होगा? उस दिन सोचते सोचते मेरा बुरा हाल हो गया था कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से दीदी ने अपने ही माॅ बाप को त्याग दिया है, मगर उस रात जब मैने अपने कानों से सब कुछ सुना तो मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। इतना बड़ा धोखा, इतना बड़ा कुकर्म किया तूने जिसके बारे में अगर किसी को पता चल जाए तो तुझ पर थूॅकना तक पसंद न करे।"

"हरामज़ादी कुतिया।" अजय सिंह बुरी तरह तमतमा गया, और फिर दो तीन थप्पड़ जल्दी जल्दी नीलम के गालों पर जड़ दिया उसने। ये देख कर सोनम उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ी तो सहसा वहीं पर आ गए फिरोज़ खान ने उसे गन प्वाइंट पर रख लिया। इधर नीलम के गालों पर थप्पड़ पड़ते ही मेरा खून भी खौल गया।

"लड़की पर क्या हाॅथ उठाता है नीच इंसान?" मैने दहाड़ते हुए कहा___"असली मर्द है तो इधर आ और मुझसे दो दो हाॅथ कर। कसम पैदा करने वाले की तेरे जिस्म की एक एक हड्डियों को न तोड़ा तो अपने बाप ठाकुर विजय सिंह की औलाद नहीं।"

"तेरी गर्मी का इलाज अब करना ही पड़ेगा।" अजय सिंह पलट कर गुर्राया, फिर उन्हीं हट्टे कट्टे आदमियों की तरफ देखते हुए कहा___"खड़े क्या हो तुम लोग? इस साले को इतना मारो कि इसकी सारी हेकड़ी निकल जाए।"

बस फिर क्या था? उन तीनों ने मुझे धोना शुरू कर दिया। मैं कुछ करने की हालत में नहीं था। अगर कुछ करता तो अजय सिंह फिर से नीलम के साथ कुछ उल्टा सीधा करने लगता। अभी मैं मार खा ही रहा था कि सहसा मेरे अलावा किसी और की भी चीख गूॅजी वहाॅ। मैने सिर उठा कर देखा तो चौंक गया। आदित्य एक आदमी को बुरी तरह मारे जा रहा था। आदित्य के अचानक ही इस तरह आ जाने से बाॅकी खड़े सब भौचक्के से रह गए।

"तुम यहाॅ क्यों आ गए आदी?" मैंने सहसा हतास भाव से कहा___"तुम्हें यहाॅ नहीं आना चाहिए था।"

"ज्यादा बकवास मत करो समझे।" आदित्य ने तीखे भाव से कहा___"मैं कायर नहीं हूॅ जो इतनी देर से चुपचाप तुम्हें इस तरह मार खाते देखता रहता। बहुत देर से रितू के कहने पर रुका हुआ था मगर अब और नहीं रुक सकता था मेरे यार। तेरा साथ भी न दिया तो साला धिक्कार है मुझ पर।"

मैं अब क्या कहता उसे। उधर आदित्य के आ जाने से अजय सिंह भी चौंका था। उसे नहीं पता था कि आदित्य कौन है, किन्तु इतना तो वो समझ ही गया था कि आदित्य कदाचित मेरा ही साथी है। अतः उसने सीघ्र ही ऊॅची आवाज़ में मुझसे कहा___"अपने साथी को बोल भतीजे कि ज्यादा उछल कूद न करे। अगर यहाॅ पर ये तेरी तरह मार खाने ही आया है तो चुपचाप अब ये भी मार खाए।"

"तुझे तो मैं कुत्ते की तरह मारूॅगा हरामज़ादे।" आदित्य चीखा___"इतनी देर से देख रहा हूॅ कि तू भाड़े के इन टट्टुओं की वजह से ही शेर बना हुआ है, जबकि खुद तुझमें कितनी मर्दानगी है वो तो तू भी जानता ही होगा साले। कितनी बार मेरे दोस्त ने तुझे लड़ने के लिए ललकारा मगर तू इससे लड़ने नहीं आया। मतलब साफ है कि तू इससे डरता है और खुद भी जानता है कि तू अपने भतीजे से टक्कर नहीं ले सकता। हाहाहाहा राज यार, तेरा ये ताऊ तो कायर और डरपोंक निकला।"

"ठाकुर साहब।" सहसा फिरोज़ खान बोल पड़ा___"आप कहें तो एक ही झटके में इस आदमी का काम तमाम कर दूॅ। इसकी हिम्मत कैसे हुई आपसे ऐसे बात करने की?"

"कोई बात नहीं खान।" अजय सिंह बोला___"इसे भी खुजली हो रखी है। इस लिए इसकी भी धुनाई शुरू करवा दो। कुछ देर में ही हमसे रहम की भीख माॅगने लगेगा।"

"ठीक है ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने कहा और फिर अपने आदमियों को हुक्म दिया।

कुछ ही देर में हम दोनो की धुनाई शुरू हो गई। ये देख कर नीलम व सोनम दीदी बुरी तरह रोये जा रही थी और साथ ही अजय सिंह से हमें ना मारने के लिए कहे भी जा रही थी। मगर उनके कहने का अजय सिंह पर कोई असर न हुआ।

अभी ये सब हो ही रहा था कि एकाएक ही संपूर्ण वातावरण में पुलिस सायरन की आवाज़ें आने लगी। इन आवाज़ों को सुन कर अजय सिंह व फिरोज़ खान बुरी तरह चौंक पड़े। उन्हें समझ न आया कि यहाॅ पुलिस कैसे आ गई? देखते ही देखते मंदिर के चारो तरफ से ढेर सारे पुलिस वालों का हुजूम उमड़ पड़ा।

"तुम सबको पुलिस ने चारो तरफ से घेर लिया है।" सहसा तभी माइक पर किसी की आवाज़ गूॅजी___"इस लिए सब अपने अपने हथियार नीचे रख कर अपने आपको पुलिस के हवाले कर दो। वरना हमें तुम सब पर गोलियाॅ चलाने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं होगी।"

"ठाकुर साहब।" सहसा बुरी तरह घबराया हुआ फिरोज खान कह उठा___"ये पुलिस वाले यहाॅ कैसे आ गए? अब हम सब पुलिस के द्वारा पकड़ लिए जाएॅगे। कुछ कीजिए ठाकुर साहब। आप तो जानते हैं कि पुलिस को मेरी और मेरे आदमियों को बड़ी शिद्दत से तलाश है। मैं और मेरे साथी पुलिस के हाॅथ नहीं लगना चाहते। खुदा के लिए कुछ कीजिए।"

"मुझे पता है कि।" अजय सिंह ने सोचने वाले भाव से कहा___"इन पुलिस वालों को यहाॅ किसने बुलाया है? हाॅ खान, ये सब रितू का किया धरा है। उसी कुतिया ने इन पुलिस वालों को बुलाया है। इतनी देर से देख रहा हूॅ वो हरामज़ादी कहीं दिखाई नहीं दे रही है। ज़रूर पुलिस वालों के साथ ही होगी।"

"किसी का भी किया धरा हो ठाकुर साहब।" फिरोज़ खान ने कहा___"मामला तो बिगड़ ही गया है अब। मगर समझदार आदमी वही है जो ऐसे समय पर भी खुद को बचा ले और अपने दुश्मन को मात दे दे।"

"सही कहा तुमने खान।" अजय सिंह ने कहा____"मुझे ऐसा ही कुछ करना होगा। अरे हाॅ एक काम करता हूॅ। इन दोनो को यहाॅ से अपने साथ ले चलते हैं। वो साला इन्हीं दोनो को लेने आया था न। अब जब इन्हें नहीं ले जा पाएगा तो यकीनन ये उसकी ज़बरदस्त हार होगी। अब वो इन दोनो के लिए मेरे पास सिर के बल आएगा।"

"बिलकुल सही कहा आपने।" फिरोज़ खान ने कहा__"किन्तु अब हमें देर नहीं करनी चाहिए। यहाॅ से इन दोनो को लेकर बड़ी होशियारी से खिसक लेना चाहिए।"

"ठीक है।" अजय सिंह ने कहा___"चलो इन दोनो को एक एक करके उठा कर ले चलते हैं। इससे पहले कि पुलिस हम तक पहुॅचे हम पीछे के इस वाले हिस्से से निकल लेते हैं। मुख्य रास्ते की तरफ जाना यकीनन खतरे से खाली नहीं होगा। मेरी कार इसी वाले हिस्से की तरफ है। अच्छा हुआ कि कार ज्यादा पीछे की तरफ उस मुख्य रास्ते की तरफ नहीं खड़ी की थी मैने।"

अजय सिंह की बातें सुन कर नीलम व सोनम दीदी बुरी तरह घबरा गई और उनके चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी थी। मगर कदाचित अजय सिंह को उनसे इसी बात की उम्मीद थी। यही वजह थी कि उसने मजबूती से उन्हें पकड़ा हुआ था। किन्तु अब उसकी बात से फिरोज़ ने भी सोनम दीदी को पकड़ लिया। यानी एक एक को ले कर मंदिर के बगल से सीढ़ियाॅ उतरने लगे वो दोनो।

नीलम व सोनम जब खुद को उनके चंगुल से न छुड़ा पाई तो पूरी शक्ति से चिल्लाने लगीं। इधर पुलिस के आ जाने से मैं और आदित्य पहले तो हैरान हुए उसके बाद तुरंत ही बात समझ में आ गई कि ये सब रितू दीदी का लास्ट बैकअप प्लान था जिसके बारे में उन्होंने सस्पेंस बनाया हुआ था उस समय। ख़ैर पुलिस वालों ने सबको घेर लिया। इधर नीलम व सोनम दीदी के चिल्लाने से मेरा और आदित्य का ध्यान उस तरफ गया तो देखा अजय सिंह व फिरोज़ खान ज़बरदस्ती उन दोनो को अपने साथ लिए सीढ़ियाॅ उतरते चले जा रहे थे।

मैंने आदित्य की तरफ देखा और फिर हम दोनो ही उनकी तरफ तेज़ी से दौड़ पड़े। अभी हम सीढ़ियों के पास भी न पहुॅचे थे कि सहसा वातावरण में गोली चलने की आवाज़ आई और साथ ही चीख़ की भी। हम दोनो ये देख कर चौंके कि सोनम दीदी को साथ लिए उतर रहा फिरोज़ खान का अचानक ही बैलेंस बिगड़ा और उसके हाॅथ से सोनम का हाॅथ छूट गया, साथ ही वह सीढ़ियों पर लुढ़कता हुआ नीचे चला गया। उसके हाॅथ से उसका रिवाल्वर छूट कर जाने कहाॅ गिर कर गुम सा हो गया था। उसके बाएॅ पैर की टाॅग से खून बहता हुआ नज़र आया।

गोली की आवाज़ और फिरोज़ खान को यूॅ लुढ़कते देख अजय सिंह बुरी तरह उछल पड़ा। भौचक्का सा पहले तो उसने फिरोज़ खान को लुढ़कते हुए देखता रहा उसके बाद जैसे उसे होश आया तो फौरन ही इधर उधर नज़र घुमाई उसने। किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। उसी वक्त सीढ़ियों के बगल से ही रितू दीदी मानो प्रगट सी हुई और तेज़ी से अपने बाप के पैर को पकड़ कर झटक दिया। जिसका नतीजा ये हुआ कि बुरी तरह घबरा कर चीखते हुए अजय सिंह भरभरा कर सीढ़ियों पर पिछवाड़े के बल गिर पड़ा। किन्तु उसके साथ ही नीलम भी गिर पड़ी थी। क्योंकि अजय सिंह ने उसका हाॅथ उस वक्त तक छोंड़ा ही नहीं था। छोंड़ा भी तो तब जब उसके साथ ही साथ नीलम भी अनबैलेंस होकर गिर पड़ी थी। नीलम के मुख से दर्द में डूबी कराह निकल गई।

ये सब हो ही रहा था कि हम दोनो भी उनके पास पहुॅच गए। आदित्य ने तो आते ही फिरोज़ खान को धर लिया। जबकि मैने सीढ़ियों पर गिरने के बाद उठ रहे अजय सिंह को उसके कालर से पकड़ कर उठाया और बिना कुछ बोले पैर के घुटने का वार उसके पेट पर जड़ दिया। अजय सिंह दर्द से चीख पड़ा।

"रुक जाओ राज।" सहसा मेरे क़रीब पहुॅचते ही रितू दीदी ने कहा____"ये इंसान यकीनन सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा ही शिकार है मगर, उससे पहले मुझे इस नीच व पापी इंसान से दो चार बातें तो कर लेने दो।"

दीदी की बात सुन कर मैने अजय सिंह को छोंड़ दिया। अजय सिंह इस वक्त अजीब सी हालत में था। ऐसी हालत में कि उसका वर्णन करना भी कठिन था। इधर मेरे एक तरफ हटते ही रितू दीदी अपने बाप के सामने आ कर खड़ी हो गई।

"सुना है कि माॅ बाप से बढ़ कर।" फिर रितू दीदी ने बड़े ही गंभीर भाव से कहा___"संपूर्ण सृष्टि में कोई नहीं होता। यहाॅ तक कि भगवान भी नहीं। इसी लिए माॅ बाप को श्रेस्ठ व महान कहा जाता है। मगर माॅ बाप भी ऐसे ही महान नहीं बन जाते हैं बल्कि अच्छे कर्मों से महान बनते हैं। तुम नीलम से कह रहे थे कि तुमने हमें सब कुछ दिया है बदले में हमने क्या दिया? इसका जवाब ये है कि हर माॅ बाप अपने बच्चों के लिए बहुत कुछ करते हैं, यहाॅ तक कि ज़रूरत पड़ने पर अपना बलिदान भी दे देते हैं। मगर बच्चे सच में उनके लिए कुछ नहीं कर पाते ऐसा। मगर हम ऐसे नहीं थे, हमने बचपन से लेकर अब तक आप दोनो को दुनिया का सबसे अच्छा माता पिता माना मगर जब सच का पता चला तो रूह काॅप गई हमारी। दुनियाॅ में ऐसे कौन माता पिता हैं जो अपनी ही बेटियों को अपने नीचे सुलाने के बारे में सोचते हैं? मुझे अपनी सिर्फ एक अच्छाई के बारे में बता दो अजय सिंह जो कि तुमने अपने आज तक के जीवन में की हो। अगर तुमने अपनी एक भी अच्छाई के बारे में बता दिया तो इसी वक्त तुम्हारी ये बेटी अपने माॅ बाप के पास वापस लौट आएगी।"

रितू दीदी की इस बात पर अजय सिंह कुछ बोल न सका। किन्तु हाॅ कठोर भाव से देख ज़रूर रहा था। जबकि उसकी इस कठोरता से देखने की ज़रा भी परवाह न करते हुए कहा दीदी ने कहा___"तुम वो इंसान हो अजय सिंह जिसने एक हॅसते खेलते, भरे पूरे व खुशहाल परिवार का बेड़ा गर्क कर दिया। इतना तो मैने भी अपनी ऑखों से देखा था कि विजय चाचा कभी भी तुमसे ऑखें मिला कर बात नहीं करते थे। हम इतने भी अबोध व अज्ञानी नहीं थे कि हमें कुछ समझ न आए। सच्चाई का पता चलने के बाद ही सही मगर मुझे पिछली वो सब बातें याद आईं जो मेरे सामने होती थीं। तब उनके बारे में नहीं सोचती थी क्योंकि तब तुम्हारी सिखाई हुई बातें मुझे उनके बारे में सोचने की भी ज़रूरत महसूस नहीं कराती थी। मगर अब सब कुछ खुली किताब की तरह हो गया है। तुमने धन दौलत के लालच में तथा गौरी चाची को हाॅसिल करने के जुनून में अपने देवता जैसे भाई को ज़हरीले सर्प से डसवा कर मौत के घाट उतार दिया। उसके बाद झूठ मूठ कर आरोप लगा कर मेरी देवी समान चाची को चरित्रहीन बना दिया। इतना ही नहीं एक रात तुम दोनों की बातों को जब दादा जी ने सुन लिया और वो जब गुस्से से तुम्हारे कमरे में आ धमके और तुम्हें खरी खोटी सुनाने लगे तो तुमने उन्हें भी जान से मार देने की धमकी दी। ये भी कहा कि अगर उन्होंने किसी के सामने ज्यादा गला फाड़ने की कोशिश की तो तुम उनकी छोटी बेटी यानी कि नैना बुआ को उठवा लोगे। दादा जी उस वक्त ये सोच कर डर गए कि तुम वाकई में ऐसा कर सकते हो। जो अपने भाई का न हुआ वो भला किसका हो जाएगा? दादी जी रोते हुए अपने कमरे में चले गए। उन्होंने दादी से तुम्हारा सारा काला चिट्ठा बताया जिसे सुन कर बेचारी दादी का भी बुरा हाल हो गया। दूसरे दिन अभय चाचा स्कूल पढ़ाने गए हुए थे, उस समय दादा दादी तैयार होकर विजय चाचा की दी हुई कार से जब कहीं जाने लगे तो तुमने पूछा कि वो कहाॅ जा रहे हैं तब उन्होंने एक बार फिर से गुस्सा होते हुए साफ साफ तुमसे कहा कि वो पुलिस स्टेशन जा रहे हैं। ताकि तुम्हारी रिपोर्ट कर सकें। दादा जी की बात सुन कर तुम्हारी हवा निकल गई। तुम फौरन ही माॅम के पास गए और माॅम को सारी बात बताई तब माॅम ने कहा कि इससे बचने का एक ही तरीका है कि दादा दादी को खत्म कर दिया जाए। तुम्हारे पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था। इस लिए फौरन ही अपनी कार लेकर निकल लिये। रास्ते में ही तुमने अपने इसी फिरोज़ खान नाम के साथी को फोन लगाया और इसे दादा दादी को जान से मार देने की सुपारी दी। इसने फौरन ही तुम्हारी बात मान कर रास्ते में ही ट्रक द्वारा दादा जी की कार को टक्कर मार दी। ट्रक की ज़ोरदार टक्कर से दादा जी की कार सड़क पर ही दो तीन पलटियाॅ खाईं। ये देख कर ये खान फौरन ही वहाॅ से ट्रक लेकर फरार हो गया। सुनसान सड़क पर उलटी पड़ी कार के अंदर दादा दादी खून से लथपथ बेहोश पड़े थे। तभी कोई वाहन वाला उसी रास्ते से आया और उसने जब वो सब देखा तो उसने इसकी सूचना पुलिस को दी। पुलिस वहाॅ पहुॅची और कार के अंदर खून से लथपथ पड़े दादा दादी को चेक किया तो वो दोनो ही ज़िंदा थे उस वक्त। अतः फौरन ही उन्हें बेहतर इलाज़ के लिए गुनगुन ले गए। तहकीक़ात में ही पता चला कि जिनका एक्सीडेंट हुआ था वो दरअसल हल्दीपुर के ठाकुर गजेन्द्र सिंह बघेल तथा उनकी धर्मपत्नी इन्द्राणी सिंह बघेल हैं। इस बात का पता चलते ही तुम्हें सूचित किया पुलिस ने। तुम ये जान कर बुरी तरह घबरा गए कि दादा दादी तो ज़िंदा हैं अभी और वो पुलिस को सब कुछ बता भी देंगे। अतः तुम फौरन ही गुनगुन के लिए हवेली से रवाना हो गए। ख़ैर दादा दादी के सिर पर बड़ी गंभीर चोंटें आई थी जिसकी वजह से वो दोनो ही कोमा में चले गए। डाक्टर अब भला क्या कर सकता था। उसने साफ कह दिया था कि अब तो बस समय का ही इन्तज़ार करें कि कब वो दोनो कोमा से बाहर आते हैं। डाक्टर की बात सुन कर तुमने फिलहाल के लिए तो राहत महसूस की मगर तुम भी जानते थे कि कोमा एक ऐसी चीज़ होती है जिसमें गया इंसान कभी भी होश में आ सकता है। यानी तुम्हें डर था कि दादा दादी अगर कोमा से बाहर आ गए तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा। अतः तुमने फिर से माॅम के परामर्श किया और फिर दादा दादी को बेहतर इलाज़ का कह कर एक ऐसी जगह ले गए जहाॅ के बारे में ज्यादा किसी को पता ही नहीं था। ख़ैर छोंड़ो ये सब, तुम्हारे जुर्म की दास्तान तो बहुत लम्बी है मगर मैंने तुमसे ये सब इस लिए कहा है कि तुम जान सको कि मुझे सब कुछ पता है। तुमने इतने अपराध व पाप किये हैं कि इसके लिए शायद भगवान भी माफ़ नहीं करेगा और करना भी नहीं चाहिए।"

रितू दीदी की बात सुन कर अजय सिंह का मुह लटक गया इस बार। उसके चेहरे पर शर्म व अपमान के भाव एकाएक ही उभर आए थे। तभी इस बीच नीलम आई और रितू के गले लग कर सिसक सिसक कर रोने लगी। सोनम दीदी भी सिसक रही थी। उधर आदित्य ने फिरोज़ खान को मार मार कर अधमरा कर दिया था। उसमें अब हिलने तक की शक्ति नहीं बची थी। तभी दो पुलिस वाले आए और फिरोज़ खान को उठा कर ले गए।

फिरोज़ खान के जितने भी आदमी थे तथा प्रतिमा ने जो आदमी भेजे थे उन सबको पुलिस ने पकड़ लिया था। ये सारी पुलिस फोर्स गुनगुन में नये नये आए एसीपी रमाकान्त शुक्ला के द्वारा लाई गई थी। सबको पकड़ने के बाद एसीपी रमाकान्त शुक्ला चल कर अजय सिंह के पास आया।

"अब आपके भी ससुराल चलने का वक्त हो चुका है ठाकुर साहब।" एसीपी ने मुस्कुराते हुए कहा___"उम्मीद करता हूॅ कि ससुराल में आप खुद को बेहतर महसूस करेंगे।"

"नये नये आए लगते हो ऑफिसर।" अजय सिंह ने उसकी तरफ तिरछी नज़र से देखते हुए कहा___"इस लिए इतना अकड़ रहे हो। मगर ज्यादा खुशफहमी में मत रहना कि तुम मुझे सुसराल में ज्यादा देर तक रख पाओगे।"

"जानता हूॅ।" एसीपी पुनः मुस्कुराया___"मगर फिलहाल तो मेरे साथ चलना ही पड़ेगा आपको। बाद का बाद में देखा जाएगा। वैसे भी हम तो यहाॅ फिरोज़ खान जैसे वान्टेड मुजरिम को ही पकड़ने आए थे। हमें सूचना मिली थी कि यहाॅ पर वो मुज़रिम अपने पूरे दलबल के साथ मौजूद है। इस लिए आ धमके यहाॅ। मगर हमें क्या पता था कि उसके साथ साथ मुझे आप जैसी कमीनी शख्सियत को भी धर लेना पड़ेगा।"

"तमीज़ से बात करो ऑफिसर।" अजय सिंह बुरी तरह तिलमिलाते हुए तीखे भाव से बोला___"वरना ऐसा न हो कि इस बददमीजी के लिए तुम्हें बाद में पछताना पड़े।"

"रस्सी जल गई मगर कसबल बाॅकी हैं अभी।" एसीपी ने कठोर भाव से कहा___"वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूॅ कि मैं किसी के बाप से भी नहीं डरता। इस लिए मुझ पर धौंस जमाने की सोचना भी मत। वरना मेरे हाॅथ में आया हुआ मुजरिम मुख से कम बल्कि पिछवाड़े से ज्यादा चिल्लाता है। अब इज्ज़त से चलो मेरे साथ वरना ले जाने के तरीके तो हम पुलिस वालों को बड़े शानदार भी आते हैं।"

एसीपी के गरम होते मिजाज़ को देख कर अजय सिंह अंदर ही अंदर अपमान का कड़वा घूॅट पी कर रह गया। फिर उसने आग उगलती ऑखों से पहले मुझे देखा फिर रितू दीदी को उसके बाद एसीपी रमाकान्त शुक्ला के साथ चल दिया। कुछ दूर जाने के बाद सहसा अजय सिंह रुका और फिर पलट कर बोला___"अभी तो मैं जा रहा हूॅ मगर जल्द ही लौटूॅगा और इस बार जब लौटूॅगा न तो तुम में से किसी को भी ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा।"

अजय सिंह की ये बात सुन कर मैं, आदित्य, रितू दीदी व सोनम दीदी ने तो कुछ न कहा किन्तु नीलम को जाने क्या हुआ कि वो तेज़ी से अपने बाप के पास गई और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता "चटाऽऽक"। अजय सिंह का दाहिना गाल झन्ना गया।

"ये तमाचा मामूली भले ही है।" फिर नीलम ने गुर्राते हुए कहा___"मगर ये तुम्हें इस बात की याद ज़रूर दिलाएगा कि तूने क्या पाप किया है जिसके तहत ये इनाम के रूप में मिला है तुझे तेरी ही बेटी से। अब जा यहाॅ से, मुझे तेरी शक्ल भी देखना अब गवाॅरा नहीं है।"

अजय सिंह से इतना कहने के बाद रोती हुई नीलम हमारे पास आ गई जबकि अपनी ही बेटी से ऐसा इनाम पा कर अजय सिंह मानो गर्त में डूबता चला गया। वह फिर रुका नहीं बल्कि एसीपी के साथ दूर होता चला गया। उसके जाते ही हम सब भी एक तरफ चल पड़े। मगर तभी गज़ब हो गया।

वातारण में धांय से गोली चलने की आवाज़ हुई और फिर फिज़ा में नीलम की चीख भी गूॅज गई। दरअसल नीलम के थप्पड़ मारने पर अजय सिंह अपमान में जल उठा था। वो एसीपी के साथ ही बगल से चल रहा था। तभी उसकी नज़र एसीपी के होलेस्टर में फॅसी उसकी रिवाल्वर पर पड़ी थी। अजय सिंह ने पलक झपकते ही जैसे निर्णय ले लिया था और फिर बेहद फुर्ती से उसने एसीपी के होलेस्टर से रिवाल्वर निकाला और पलट कर उसने नीलम पर गोली चला दी थी। हम में से किसी को भी इसकी उम्मीद नहीं थी। उधर गोली चलने की आवाज़ से एसीपी भी बौखला गया था। उसने जैसे ही पलट कर अजय सिंह की तरफ देखा तो चौंक पड़ा। कारण अजय सिंह ने मुस्कुराते हुए खुद ही उसका रिवाल्वर उसे दे दिया। एसीपी उसके इस बिहैवियर से दंग रह गया था।

गोली नीलम की पीठ के दाहिने भाग के थोड़ा सा नीचे लगी थी। नीलम की पीठ से खून की तेज़ धार बहने लगी थी। वो लहरा कर गिर ही जाती अगर मैने फुर्ती से उसे पकड़ न लिया होता। सिचुएशन एकदम से ही बदल गई थी। नीलम को गोली लगने से हम सब बुरी तरह घबरा गए थे। उसकी प्रतिपल बिगड़ती हालत से हम सब रो पड़े। मैने उसे अपनी गोंद में उठा लिया और तेज़ी से मंदिर के पीछे खड़ी अपनी कार की तरफ भाग चला। मेरे पीछे ही बाॅकी सब दौड़ने लगे थे।

पुलिस और एसीपी ने सबको पकड़ा था किन्तु केशव जी तथा उनके साथ आए लोगों को नहीं पकड़ा था। ये मेरे लिए हैरानी की बात थी। किन्तु इस वक्त उनसे इसके बारे में पूछने का किसी को होश न था। रितू व सोनम दीदी बुरी तरह रोये जा रही थी। सीघ्र ही मैं नीलम को लिए कार के पास पहुॅचा। आदित्य ने जल्दी से कार का पिछला गेट खोला तो मैने नीलम को पिछली सीट पर किसी तरह लेटाया और जगह बनाते हुए खुद भी सीट पर बैठ गया। सीट पर बैठने के बाद मैने नीलम को खुद से छुपका लिया तथा उसकी ठीठ पर हाॅथ रख कर दबा दिया ताकि खून ज्यादा बहने न पाए। मेरे बैठते ही आदित्य ने कार की ड्राइंविंग सीट सम्हाली।

केशव जी ने रितू दीदी से कहा कि वो सोनम दीदी को अपनी कार में बैठा लेंगे। क्योंकि मेरी कार में आगे की सीट पर रितू दीदी बैठ गई थी और पीछे अब जगह ही नहीं थी। किन्तु सोनम दीदी न मानी। वो बुरी तरह रोये जा रही थी और कह रही थी कि वो नीलम के पास ही रहेंगी। मैने भी ज्यादा समय बरबाद न करते हुए गेट की तरफ खिसक लिया। सोनम दीदी दूसरी तरफ से आकर नीलम के पैरों की तरफ सीट पर ही बैठ गईं। ख़ैर सबके बैठते ही आदित्य ने कार को तेज़ी से दौड़ा दिया। हमारे पीछे पीछे ही केशव जी तथा उनके आदमी जीपों में आ रहे थे।

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"ये तुम क्या कह रहे हो राणे?" अपने आवास के ड्राइंग रूम में लैण्डलाइन फोन के रिसीवर को कान से लगाए मंत्री ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा था____"ठाकुर और उसके आदमियों को पुलिस पकड़ कर ले गई?"

"..............।" उधर से हरीश राणे ने कुछ कहा।

"क्या कह रहे हो तुम।" चौधरी हैरान___"वहाॅ पर भारी मात्रा में पुलिस आई हुई थी?? मगर पुलिस वहाॅ आई कैसे? हमारा मतलब है कि पुलिस को वहाॅ पर किसने बुलाया होगा? एक मिनट राणे....एक मिनट, हम सब समझ गए। ये ज़रूर उस थानेदारनी का काम होगा। उसी ने पुलिस को बुलवाया होगा। ठाकुर के इतने सारे आदमियों को पंगु बना देने का यही तो सबसे ज़बरदस्त तरीका था राणे। साली तगड़ा गेम खेल गई। एक ही झटके में सारा खेल ही खत्म कर दिया उसने।"

"............।" उधर से राणे ने फिर कुछ कहा।

"ओह तो ठाकुर ने जाते जाते अपनी ही बेटी को गोली मार कर लहूलुहान कर दिया।" चौधरी के चेहरे पर मौजूद भावों में परिवर्तन हुआ___"और अब विराज एण्ड पार्टी ठाकुर की उस लड़की को मरने से बचाने के लिए फौरन ही हास्पिटल लेकर आ रहे हैं। उन्हें आने दो राणे, वो ज़रूर यहीं आएॅगे। ताकि गुनगुन के ही किसी अच्छे से हास्पिटल में उसे भर्ती करा सकें और उसका बेहतर से बेहतर इलाज़ करा सकें। उन्हें आने दो यहाॅ हम उन सबका बहुत अच्छे से स्वागत करेंगे। तुम बस उनके पीछे ही रहना और हमें हालातों की ख़बर देते रहना।"

"..............।" राणे ने उधर से फिर कुछ कहा।

"वो सब हम देख लेंगे राणे।" चौधरी ने कहा___"हम कमिश्नर से इस बारे में पता करेंगे तथा ठाकुर से भी मिलेंगे। अगर उसने हमसे ये कहा कि वो ये सब करने के बाद ही इस सबके बारे में बताने वाला था तो ज़रूर उसकी ज़मानत करवाएॅगे हम। वरना भला हमें क्या पड़ी है उसे जेल से छुड़ाने की? जिस काम के लिए हमने उससे संपर्क बनाया था वो काम तो तुमने बखूबी कर ही दिया है और अब हमें पल पल की ख़बर भी दे रहे हो कि हमारे दुश्मन कहाॅ आ रहे हैं। इस लिए अब ज्यादा फिक्र की बात ही नहीं है।"

"..............।" उधर से हरीश राणे ने कुछ कहा।

"हाॅ ये भी सही कहा तुमने।" चौधरी ने कहा___"यानी हमें इस वक्त अभी उन पर हाॅथ नहीं डालना चाहिए। बल्कि उनके असल ठिकानों के बारे में पता करना चाहिए। उसके बाद ही हमें उन पर कार्यवाही करनी चाहिए। ये तुमने सही सलाह दी है राणे। बात भी सही है, अभी अगर हमने उन पर हाॅथ डाला तो संभव है कि इससे हम पर या हमारे बच्चों पर ही कोई संकट आ जाए। क्या पता उसका कोई आदमी हमारी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए हो, उस सूरत में वो हमें ही नुकसान पहुॅचा सकता है। अतः ये ज़रूरी है कि हम अभी चुप ही रहें और उसके असल ठिकाने का तुम्हारे द्वारा पता करने की कोशिश करें।"

"..................।" उधर से राणे ने फिर कुछ कहा।

"ठीक है राणे।" फिर चौधरी ने कहा___"अब ऐसा ही करेंगे। तुम बस उनके पीछे ही लगे रहना और हाॅ ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि उनसे ज़रा सावधान रहना।"

इसके साथ ही चौधरी ने रिसीवर वापस केड्रिल पर रख दिया। इस वक्त उसके चेहरे पर राहत के भाव थे। खुशी की एक अलग ही चमक उसके चेहरे पर दिखाई देने लगी थी। रिसीवर रखने के बाद वह आया और फिर से सोफे पर बैठ गया। उसके सामने ही अगल बगल के सोफों पर अवधेश, अशोक व सुनीता आदि बैठे हुए थे।

"हमारे इस काम में उस जासूस के लिए ये सब करना कोई मुश्किल काम नहीं था।" फिर मंत्री ने शिगार सुलगाने के बाद कहा___"और ना ही ये ऐसा केस था जिसमें उसे अपना माथा पच्ची करना पड़ता। ये सब तो हम भी कर सकते थे किन्तु तब जब करने की स्थित में होते। ख़ैर, जो भी हो, अच्छी बात ये है कि हालात अब हमारे हक़ में बहुत हद तक आ चुके हैं।"

"क्या कहा राणे ने?" अशोक के पूछने पर चौधरी ने सबको सब कुछ बता दिया। सारी बातें जानने के बाद उन तीनों के भी चेहरों पर राहत व खुशी के भाव उभर आए।

"हालात तो वाकई हमारे पक्ष में हैं चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"और ये हमारे लिए खुशी की बात भी है। किन्तु ठाकुर के साथ आज जो कुछ भी हुआ वो अगर न होता तो यकीनन आज उसकी गिरफ्त में उसका भतीजा तथा उसकी बेटी होती। उसके बाद वो हमें इस बात की जानकारी देता। कहने का मतलब ये कि इतना कुछ हो जाने के बाद हम अतिसीघ्र ही अपने दुश्मन से मिलते और उसके कब्जे से अपनी हर चीज़ ले भी लेते। लेकिन ऐसा हो नहीं सका, पुलिस ने ऐन मौके पर आकर सारा खेल ही ख़राब कर दिया।"

"इस मामले में पहली बार पुलिस का हाॅथ भी दिखाई दिया है चौधरी साहब।" अवधेश ने कहा____"और जिस तरह से इतनी सारी पुलिस फोर्स को लेकर वो एसीपी वहाॅ पहुॅचा था इससे ज़ाहिर होता है कि कहीं न कहीं पुलिस का भी इस मामले में दखल है। बल्कि ये कहना चाहिए कि शुरू से ही दखल था। ये अलग बात है कि इसके पहले पुलिस ने खुले तौर पर इस बात को ज़ाहिर नहीं किया था।"

"ये बात तो मैने उसी दिन कही थी।" सहसा अशोक ने तपाक से कहा___"कि संभव है कि पुलिस इस सारे मामले में गुप्त रूप से शामिल हो और आज इस बात का सबूत के रूप में पता भी चल गया हमें।"

"हम कमिश्नर से इस बारे में अभी बात करेंगे।" मंत्री ने कहने के साथ ही अपना मोबाइल निकाला____"उसे अब साफ साफ बताना ही पड़ेगा कि माज़रा क्या है तथा उसने हमें धोखे में रखने की हिम्मत कैसे की?"

कहने के साथ ही मंत्री ने पुलिस कमिश्नर को काल लगा कर मोबाइल अपने कान से लगा लिया। दूसरी तरफ काफी देर तक रिंग जाने के बाद काल रिसीव की गई।

"जी कहिए मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर की आवाज़ उभरी___"आज इस नाचीज़ को कैसे याद किया आपने?"

"ये ड्रामेबाज़ी छोंड़ो कमिश्नर।" चौधरी ने सपाट लहजे में कहा___"और ये बताओ कि ये सब क्या चक्कर चला रहे हो तुम?"

"च..चक्कर???" उधर से कमिश्नर का चौंका हुआ स्वर उभरा____"ये आप क्या कह रहे हैं मंत्री जी?"

"देखो कमिश्नर।" चौधरी ने तीखे भाव से कहा___"हमें फालतू की बकवास बिलकुल भी पसंद नहीं है। तुम अच्छी तरह जानते हो और समझते भी हो कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं?"

"बड़ी अजीब बात कर रहे हैं आप मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"भला जिस बात को आप बताएॅगे ही नहीं उस बात के बारे में मैं कैसे कुछ जान पाऊॅगा? आप तो जानते हैं कि इंसान अंतर्यामी तो होता ही नहीं है।"

"हम हल्दीपुर में आधा घंटा पहले घटी घटना के बारे में बात कर रहे हैं।" चौधरी ने मन ही मन दाॅत पीसते हुए कहा___"अब ये मत कहना कि तुम इस घटना के बारे में भी नहीं जानते।"

"ओह तो आप उस घटना की बात कर रहे हैं?" उधर जैसे कमिश्नर की अब बात समझ में आई थी, बोला___"उस घटना के बारे में तो मुझे अच्छी तरह पता है मंत्री जी। लेकिन आपका उस घटना से क्या लेना देना है? जबकि हमारे डिपार्टमेंट के एसीपी ने तो वहाॅ पर एक मोस्ट वान्टेड अपराधी को पकड़ने के लिए घेराबंदी की थी और फिर अपराधी को पकड़ कर अपने साथ ले भी आए।"

"किस अपराधी को पकड़ने गई थी तुम्हारी पुलिस?" मंत्री ने पूछा।

"यूॅ तो शहर कई तरह के मुजरिमों से भरा पड़ा है मंत्री जी मगर।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"हमारी पुलिस फोर्स ने जिस मोस्ट वान्टेड अपराधी को पकड़ने के लिए हल्दीपुर के पास वाले गाॅव माधोपुर में घेराबंदी की थी उसका नाम फिरोज़ खान है। इस नाम के अपराधी के बारे में तो आपने भी काफी सुना होगा। आप तो जानते हैं कि ये अपराधी कब से पुलिस व कानून के लिए सिर का दर्द बना हुआ था। आज हमारे ही एक विश्वासपात्र मुखबिर ने हमें बताया कि फिरोज़ खान अपनी गैंग के साथ इस समय माधोपुर में मौजूद है। बस फिर क्या था, हमने उसे पकड़ने के लिए अभी हाल ही में नये नये आए एसीपी रमाकान्त शुक्ला को भेज दिया। मगर मेरी समझ में ये नहीं आता कि आपको इस मामले से क्या लेना देना हो गया? अगर मुनासिब समझें तो मुझे भी बताइये मंत्री जी।"

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।" चौधरी ने बात को टालने की गरज़ से कहा___"वैसे पता चला है कि तुम्हारी पुलिस ने हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया है। भला ये क्या चक्कर है कमिश्नर? क्या वो ठाकुर भी फिरोज़ खान की तरह मोस्ट वान्टेड अपराधी है?"

"ठाकुर अजय सिंह को तो ज़रूरी पूॅछताॅछ के लिए गिरफ्तार किया गया है मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"दरअसल हमारे मुखबिर ने बताया था कि फिरोज़ खान हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह की कार में ही बैठा हुआ था। इस लिए उन्हें गिरफ्तार करना पड़ा। तहकीक़ात में उनसे पूछा जाएगा कि फिरोज़ खान नाम का खतरनाक अपराधी उनकी कार में उनके साथ क्यों बैठा हुआ था? आख़िर उनका फिरोज़ खान से क्या संबंध है?"

"ओह तो ये बात है।" चौधरी को मानो बात समझ में आ गई, बोला____"वैसे सुना है कि ठाकुर और उसके भतीजे के बीच किसी मामले में तगड़ी रंजिश है। सुना तो ये भी है कि ठाकुर की बेटी खुद तुम्हारे पुलिस डिपार्टमेंट की इंस्पेक्टर है और वो अपने ही माॅ बाप के खिलाफ़ होकर ठाकुर के दुश्मन भतीजे का साथ दे रही है।"

"बाॅकी सारी बातों के बारे में तो मुझे कुछ नहीं पता है मंत्री जी।" उधर से कमिश्नर ने कहा___"लेकिन ये सच है कि ठाकुर अजय सिंह की बेटी हमारे पुलिस डिपार्टमेंट में इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत है। बहुत ही इमानदार तथा बहादुर ऑफीसर है वो।"

"अब इस बारे में तो तुम्हें ही पता होगा कमिश्नर।" चौधरी ने कहा___"आफ्टरआल वो तुम्हारे पुलिस महकमे से है। चलो कोई बात नहीं, अच्छा अब हम फोन रखते हैं।"

इतना कह कर चौधरी ने काल कट कर दी। फिर बुझ चुके शिगार को सामने टेबल पर रखे ऐशट्रे में रखा और दूसरा शिगार निकाल कर सुलगा लिया। शिगार के दो तीन गहरे गहरे कश लेने के बाद उसने ढेर सारा धुआॅ ऊपर की तरफ उछाला।

"क्या कहा कमिश्नर ने चौधरी साहब?" अवधेश श्रीवास्तव पूछे बग़ैर न रह सका था।

"बेवकूफ़ बनाने की कोशिश कर रहा था हमें।" चौधरी ने कहा___"उस साले को ये पता ही नहीं है कि वो किसे बेवकूफ बनाने चला था? साला राजनीति का खेल हम खेलते हैं और वो हमसे राजनीति कर रहा था।"

"ऐसा क्या कह रहा था वो आपसे?" अशोक ने पूछा।

मंत्री ने उसे सारी बातें बता दी, उसके बाद उसने फिर से शिगार का एक कश लिया फिर बोला___"जबकि साफ पता चलता है कि सच्चाई क्या है? डिटेक्टिव राणे के अनुसार विराज एण्ड पार्टी ठाकुर की दूसरी बेटी को लेने गए थे। किसी तरह से इस बात की जानकारी ठाकुर को हुई और वह फिरोज़ खान को उसके गुर्गों के साथ माधोपुर जा धमका, जहाॅ पर उसका आमना सामना विराज एण्ड पार्टी से हुआ। विराज को अंदेशा रहा होगा कि उसका ताऊ उसे पकड़ने का ऐसा ही कुछ इंतजाम करके आएगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए उन लोगों ने भी ठाकुर से बचने का उपाय सोचा होगा। ठाकुर की बेटी क्योंकि अब विराज के साथ ही है इस लिए ठाकुर से बचने के लिए उसने अपने पुलिस महकमें का सहारा लिया। उसे पता था कि पुलिस के आ जाने से अजय सिंह कुछ कर नहीं पाएगा। बात भी सही है कि पुलिस से पंगा करने का कोई मतलब ही नहीं था। यानी वो सब पुलिस की मदद से बड़े आराम से ठाकुर की दूसरी बेटी को ले आएॅगे और ठाकुर कुछ भी नहीं कर पाएगा।"

"यकीनन चौधरी साहब।" अवधेश ने गहरी साॅस लेते हुए कहा___"ठाकुर ने विराज एण्ड पार्टी को घेर कर पकड़ने का ज़बरदस्त प्लान बनाया था। ये अलग बात है कि बदकिस्मती से उसके उस ज़बरदस्त प्लान की खुद उसकी ही बेटी ने धज्जियाॅ उड़ा दी। इतना ही नहीं पुलिस को बुलवा कर वो अपनी छोटी को बहन को तो अपने साथ ले ही गई ऊपर से अपने बाप को भी गिरफ्तार करवा दिया।"

"लेकिन ठाकुर भी कम कमीना नहीं था।" अशोक ने झट से कहा___"पुलिस के साथ जाते जाते भी उसने एसीपी का रिवाल्वर निकाल कर अपनी छोटी बेटी को गोली मार दी। ये इस बात का सबूत है चौधरी साहब कि उस वक्त वह अपनी औलाद से किस क़दर ख़फा था और फिर गुस्से में आकर उसने बेटी को जान से मारने की कोशिश की। अगर समय रहते उसकी बेटी का विराज एण्ड पार्टी ने इलाज़ करवा लिया तब तो ठीक है वरना ठाकुर ने तो अपनी बेटी का काम तमाम कर ही दिया है समझिये।"

"जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है।" मंत्री दिवाकर चौधरी ने कहा___"इस सबकी वजह से हमारा फायदा ये हुआ है कि हमारा दुश्मन हमारे जासूस राणे की नज़र में आ गया है। राणे विराज एण्ड पार्टी के पीछे साये की तरह लगा रहेगा। अभी तो वो सब किसी हाॅस्पिटल में ही गए होंगे क्योंकि ठाकुर की बेटी को मौत से बचाना उन सबकी पहली प्राथमिकता होगी। उसके बाद वो यकीनन उस जगह जाएॅगे जहाॅ पर उन लोगों ने अपना ठिकाना बनाया होगा। राणे को जैसे ही उनके ठिकाने का पता चल जाएगा वैसे ही वो हमें सूचित कर देगा। बस, उसके बाद क्या होगा ये बताने की ज़रूरत नहीं है शायद।"

"ये तो वाकई हमारे ही हक़ में है।" सहसा इस बीच सुनीता बोल पड़ी___"ठाकुर की घटना ने उसे भले ही करारी शिकस्त दी हो मगर इस सबमें हमारा यकीनन फायदा हो गया है। दूसरी बात जासूस राणे को इस काम के लिए बुलाने का भी बहुत अच्छा निर्णय साबित हुआ हमारा।"

"बिलकुल सही कहा तुमने।" चौधरी ने कहा___"अगर राणे को हमने बुलाया न होता तो हमें इतनी बड़ी सफलता हर्गिज़ भी नहीं मिल सकती थी। क्योंकि इस बात का हमें पता ही न चलता कि विराज एण्ड पार्टी और ठाकुर के बीच क्या हुआ है? ठाकुर का भी कोई भरोसा नहीं था कि वो हमें इस बारे में कुछ बताता भी या नहीं।"

"ख़ैर, जो भी हो।" अवधेश ने कहा___"इस सबसे हमें फायदा तो यकीनन ही हुआ है मगर इस बीच हमारे लिए ये सोचना भी महत्वपूर्ण है कि इस मामले में पुलिस का दखल किस उद्देश्य से हुआ है? क्या सचमुच ही वो मोस्ट वान्टेट अपराधी फिरोज़ खान को ही पकड़ने के उद्देश्य से वहाॅ पर पहुॅची थी या फिर इसके पीछे भी पुलिस की कोई ऐसी चाल थी कि वो एक तीर से दो शिकार कर सके। कहने का मतलब ये कि ज़ाहिर तौर पर उसने हमें यही दिखाया हो कि उसका दखल महज फिरोज़ खान को ही पकड़ना था जबकि असल में उसका मकसद कुछ और ही रहा हो, जिसका संबंध हमसे हो।"

"हो सकता है।" चौधरी के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए____"किन्तु कमिश्नर की बातों से भी कुछ ज़ाहिर नहीं हो सका। या तो उसने जान बूझ कर हमें घुमा दिया है या फिर ऐसा कुछ हो ही न। यानी हो सकता है कि हम जिस चीज़ की शंका कर रहे हैं वो बेवजह ही हो।"

"शंका तो शंका ही होती है चौधरी साहब।" अशोक ने कहा___"भले ही वो बेवजह ही हो मगर हमारे मन में शंका तो है न। इस लिए जब तक हमें इस मामले में सच्चाई का पता नहीं चलता तब तक हमारी ये शंका हमारे अंदर से जाएगी भी नहीं।"

"चलो अगर ऐसा है भी।" चौधरी ने कहा___"तो वो आने वाले समय में ज़ाहिर तो हो ही जाएगा। तब हम देख लेंगे कि हमें उस बारे में क्या करना है। अभी के हालात में जो ज़रूरी है, हमे उस पर ज्यादा ध्यान देना है। हमें किसी भी कीमत पर अपने बच्चे तथा हमारे लिए डायनामाइट बने उन वीडियोज को हाॅसिल करना है। मौजूदा हालातों पर ग़ौर करें तो ये स्पष्ट हो चुका है कि बहुत जल्द राणे के द्वारा हमें इस सबमें सफलता मिलेगी।"

चौधरी की बात सुन कर सबके सिर सहमति में हिले। उसके बाद कुछ और इधर उधर की बातें हुई उन लोगों के बीच। फिर सब अपने अपने काम पर चले गए।

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इधर आदित्य ऑधी तूफान की तरह दौड़ाते हुए कार को हास्पिटल की तरफ लिए जा रहा था। नीलम की हालत की वजह से हम सब बेहद दुखी हो गए थे। मैं बार बार नीलम को पुकार रहा था। उसकी पलकें बार बार बंद हो जाती थी। मैने अपने एक हाॅथ की हॅथेली को नीलम की पीठ पर कस के लगाया हुआ था ताकि उसका खून न बहने पाए। नीलम पहले तो दर्द और पीड़ा से कराह रही थी किन्तु अब वो प्रतिपल शान्त पड़ती जा रही थी। उसकी ये हालत देख कर मैं बदहवाश सा था और बार बार उसे पुकार रहा था। मेरे बाएॅ साइड ही नीलम के पैरों के पास बैठी सोनम दीदी अभी भी सिसक रही थीं। वो खुद भी पागलों की तरह नीलम को पुकारे जा रही थी।

रितू दीदी आगे बैठी हुई थी। उनके चेहरे पर भी पीड़ा के भाव उभर आते थे किन्तु उन्होंने खुद को सम्हाला हुआ था। उनके चेहरे पर मौजूद भाव प्रतिपल बदल रहे थे। कभी कभी तो ऐसे भाव उभर आते थे जैसे उन्होंने किसी बात के लिए कठोर फैसला किया हो। आदित्य फुल स्पीड से कार को भगा रहा था। तभी डैश बोर्ड के पास ही रखा मेरा मोबाइल फोन बज उठा। फोन के बजने से जैसे रितू दीदी की तंद्रा टूटी। उन्होंने हाॅथ बढ़ा कर मोबाइल उठाया और स्क्रीन पर फ्लैश कर रहे मौसा जी नाम को देख कर काल रिसीव की उन्होंने।

उधर से मौसा जी ने जाने ऐसा क्या कहा कि रितू दीदी एकदम से चौंक पड़ी, साथ ही कार की खिड़की से इधर उधर देखने भी लगी थी। फिर उन्होंने ये कह कर फोन रख दिया कि___"आपने यकीनन ये बहुत बड़ी ख़बर दी है मौसा जी। किन्तु उसे बोलिए कि अगर संभव हो सके तो उसे पकड़ ले। आप भी जल्दी से उसके पास जाइये और जाकर उसे अपने कब्जे में ले लीजिए।"

"क्या हुआ रितू??" कार चलाते हुए आदित्य ने सहसा एक नज़र रितू दीदी की तरफ डालते हुए पूछा।

"मंत्री मेरी चेतावनी के बावजूद अपनी हरकतों से बाज नहीं आया।" रितू दीदी ने कहा___"उसने जब देखा कि वो खुद कुछ नहीं कर सकता है तो उसने अपने काम के लिए एक जासूस को बुलवाया और उस जासूस को हमारे पीछे लगा दिया।"

"ये क्या कह रही हो तुम?" आदित्य रितू की बात सुन बुरी तरह चौंका था, फिर बोला___"मगर तुम्हें ये सब कैसे पता चला?"

"मुझे नहीं।" रितू दीदी ने कहा___"बल्कि मौसा जी के एक आदमी को पता चला है। उसी ने बताया है मौसा जी को। दरअसल हम सब लोग तो वहाॅ से चले आए मगर मौसा जी का एक आदमी ग़लती से वहीं रह गया। मौसा जी बता रहे थे कि उनका वो आदमी उस वक्त अपना पेट साफ करने चला गया था। इसी बीच हम सब वहाॅ से जल्दबाज़ी में निकल आए। कुछ देर में जब वो अपना पेट साफ करके आया तो हम लोगों को दूर जाते हुए देखा उसने। वो वहाॅ से चलते हुए कुछ दूर आया। फिर उसने अपना मोबाइल निकाल कर मौसा जी को फोन करने ही वाला था कि तभी उसे किसी के बात करने की आवाज़ सुनाई दी। वो आवाज़ की दिशा में गया तो उसने देखा कि मंदिर से लगभग पचास मीटर की दूरी पर एक आदमी पेड़ की ओट में खड़ा किसी से फोन पर बातें कर रहा था। मौसा जी का आदमी उससे कुछ ही दूरी पर था। उसने उस आदमी के कुछ पास जाकर उसकी बातें सुन ली। उसकी बातों में डैड के अलावा हमारा भी ज़िक्र था, साथ ही वह जिससे बात कर रहा था उसे वह चौधरी साहब कह कर संबोधित कर रहा था। मौसा जी के आदमी को उसकी बातों से समझ आ गया कि वो हम सबके पीछे ही लगा हुआ है। अतः उसने तुरंत ही इस बात की सूचना मौसा जी को फोन लगा कर दे दी।"

"ओह तो ये बात है।" आदित्य ने कहा।

"हाॅ, मैने अपने मुखबिरों को मंत्री तथा उसके सभी साथियों के पीछे लगाया हुआ था।" रितू दीदी ने कहा___"उन सबकी रिपोर्ट यही थी कि मंत्री या उसके साथियों ने ऐसा वैसा कुछ नहीं किया है। बल्कि उन सबकी दिन चर्या तथा कार्य सामान्य ही था। मुझे भी उम्मीद नहीं थी कि वो कमीना अपने इस काम के लिए किसी जासूस को हायर कर लेगा। मगर कोई बात नहीं, ये बहुत अच्छा हुआ कि मंत्री के उस जासूस का पता चल गया। कहते हैं कि ईश्वर जो भी करता है उसके पीछे कोई ठोस वजह ज़रूर होती है। वरना सोचने वाली बात है कि मौसा जी जिन आदमियों को अपने साथ लेकर आए थे उन आदमियों में से किसी एक को उस वक्त टायलेट क्यों आता? ये ईश्वर की ही मर्ज़ी थी कि उसे उस वक्त टायलेट आया और वो टायलेट के लिए हमसे दूर चला गया। उसके बाद जब वह आया तो हम सब उस जगह से निकल चुके थे जबकि वो वहीं छूट गया। ईश्वर हमारे साथ है आदित्य, वो नहीं चाहता कि किसी वजह से हम फॅस जाएॅ। हमें नहीं पता था कि मंत्री ने कोई जासूस हमारे पीछे लगाया हुआ है अतः ईश्वर इस सबके द्वारा हमें उस जासूस के बारे में भी बता दिया।"

"सचमुच।" आदित्य कह उठा___"कुदरत का हर काम हैरतअंगेज़ होता है। ख़ैर, अब उस जासूस का क्या करना है?"

"अभी तो फिलहाल उसे किसी भी तरह से पकड़ लेने के लिए मैंने मौसा जी से कहा है।" रितू दीदी ने कहा___"उसका पकड़ में आना भी बेहद ज़रूरी है वरना वो हमारा पीछा करता रहता और अंततः हमारे ठिकाने तक पहुॅच जाता। उसके बाद वो हमारे ठिकाने के बारे में मंत्री को बता देता। बस फिर तो खेल ही खत्म हो जाना था।"

"सचमुच।" आदित्य ने कहा___"बहुत बड़ी मुसीबत में फॅसने वाले थे हम सब।"

"हाॅ आदित्य।" रितू दीदी ने कहा___"मंत्री अपने दलबल के साथ अगर हमारे ठिकाने पर आ धमकता तो हम उस हालात में उस वक्त कुछ कर नहीं पाते और फिर हम सबके साथ मंत्री क्या सुलूक करता इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।"

"शुकर है।" आदित्य ने कहा___"ईश्वर ने हमें बचा लिया। अब तो यही दुवा करो कि वो जासूस मौसा जी की पकड़ में आ ही जाए। वरना अगर वो हाॅथ से निकल गया तो मुसीबत एक बार फिर से हम पर आ जाएगी। ईश्वर बार बार ऐसा संयोग नहीं बनाएगा।"

"सही कहा तुमने।" रितू दीदी ने कहा___"देखते हैं मौसा जी तथा उनके आदमी क्या करते हैं? इस वक्त तो हमें नीलम को बचाना है।"

"वैसे एक बात कहूॅ रितू।" आदित्य ने कहा___"तुम्हारे जैसा कमीना बाप मैने आज तक न कहीं देखा है और ना ही कहीं सुना है। खुद पापों की गठरी लिए फिरता है और अपनी ही बेटी के साथ......छिः..मुझे तो सोच कर ही ऐसे आदमी से घृणा हो रही है।"

"अगर मेरी बहन को कुछ हुआ न आदित्य।" सहसा रितू दीदी के मुख से ज़हर में डूबे शब्द निकले___"तो उस इंसान का मैं वो हाल करूॅगी कि बड़े से बड़ा जल्लाद भी उसका हाल देख कर थर्रा जाएगा।"

"अब तो उसकी नियति ही ऐसी बन चुकी है।" आदित्य ने कहा___"कि उसकी जब भी मौत होगी तो यकीनन बहुत भयानक तरीके से होगी।"

आदित्य की बात पर रितू दीदी कुछ न बोली। किन्तु उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि अपने अंदर के तूफान को उन्होंने कितनी मुश्किल से रोंका हुआ है। मैं उन दोनों की सारी बातें सुन रहा था। तभी रितू दीदी ने किसी को फोन लगाया और उससे कुछ बातें की। आदित्य ने बहुत ही कम समय में कार को हाॅस्पिटल पहुॅचा दिया।

हाॅस्पिटल के सामने कार के रुकते ही मैने जल्दी से गेट खोला और नीलम को सावधानी से निकाल कर अपनी गोंद में लिया और बिना किसी की तरफ देखे हाॅस्पिटल की तरफ लगभग दौड़ते हुए जाने लगा। मेरे पीछे ही बाॅकी सब भी आ रहे थे। कुछ ही देर में मैं नीलम को लिए हाॅस्पिटल के अंदर आ गया। वहाॅ का माहौल देख कर ऐसा लगा जैसे वहाॅ के डाक्टर तथा कर्मचारी हमारा ही इन्तज़ार कर रहे थे। जल्द ही दो आदमी स्ट्रेचल लिये मेरे पास आए। मैने आहिस्ता से नीलम को स्ट्रेचर पर लिटा दिया। मेरे लेटाते ही वो दोनो आदमी स्ट्रेचर को तेज़ी से ठेलते हुए ले जाने लगे। मैं, आदित्य, रितू व सोनम दीदी भी साथ ही साथ चलने लगे थे। थोड़ी ही देर में वो दोनो आदमी नीलम को स्ट्रेचर सहित ओटी में ले गए। डाक्टर ने हम सबको ओटी के बाहर ही रोंक दिया और खुद अंदर चला गया।

हम चारो वहीं पर खड़े रह गए थे। हम चारों के मन में बस एक ही बात थी कि नीलम को कुछ न हो। अभी हम सब वहाॅ पर खड़े ही थे कि तभी वहाॅ पर एसीपी रमाकान्त शुक्ला भी आ गया। उसने आते ही रितू दीदी से नीलम के बारे में पूछा तो दीदी ने बता दिया कि अभी अभी उसे ओटी में ले जाया गया है। एसीपी ने रितू दीदी से कहा कि उसने समूचे हास्पिटल में अंदर बाहर पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में तैनात कर दिये हैं। इस लिए अब किसी का ख़तरा नहीं है। एसीपी की बात सुन कर रितू दीदी ने उसे इसके लिए धन्यवाद किया। कुछ देर बाद एसीपी ये कह कर चला गया कि वो नीलम का हाल चाल लेने फिर आएगा।

एसीपी के जाने के कुछ देर बाद हम चारों वहीं गैलरी पर दीवार से सटी हुई रखी लम्बी चेयर्स पर बैठ गए। कुछ देर बाद मैं उठा और हाॅस्पिटल से बाहर पानी लाने के लिए चला गया। पानी लाकर मैने रितू दीदी व सोनम दीदी को दिया। उसके बाद उसी कुर्सी पर बैठ कर हम सब डाक्टर के बाहर आने का इन्तज़ार करने लगे। हम सबके लबों से बस एक ही दुवा निकल रही कि नीलम को कुछ न हो।

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अपडेट........《 58 》

अब तक,,,,,,,

हाॅस्पिटल के सामने कार के रुकते ही मैने जल्दी से गेट खोला और नीलम को सावधानी से निकाल कर अपनी गोंद में लिया और बिना किसी की तरफ देखे हाॅस्पिटल की तरफ लगभग दौड़ते हुए जाने लगा। मेरे पीछे ही बाॅकी सब भी आ रहे थे। कुछ ही देर में मैं नीलम को लिए हाॅस्पिटल के अंदर आ गया। वहाॅ का माहौल देख कर ऐसा लगा जैसे वहाॅ के डाक्टर तथा कर्मचारी हमारा ही इन्तज़ार कर रहे थे। जल्द ही दो आदमी स्ट्रेचर लिये मेरे पास आए। मैने आहिस्ता से नीलम को स्ट्रेचर पर लिटा दिया। मेरे लेटाते ही वो दोनो आदमी स्ट्रेचर को तेज़ी से ठेलते हुए ले जाने लगे। मैं, आदित्य, रितू दीदी व सोनम दीदी भी साथ ही साथ चलने लगे थे। थोड़ी ही देर में वो दोनो आदमी नीलम को स्ट्रेचर सहित ओटी में ले गए। डाक्टर ने हम सबको ओटी के बाहर ही रोंक दिया और खुद अंदर चला गया।

हम चारो वहीं पर खड़े रह गए थे। हम चारों के मन में बस एक ही बात थी कि नीलम को कुछ न हो। अभी हम सब वहाॅ पर खड़े ही थे कि तभी वहाॅ पर एसीपी रमाकान्त शुक्ला भी आ गया। उसने आते ही रितू दीदी से नीलम के बारे में पूछा तो दीदी ने बता दिया कि अभी अभी उसे ओटी में ले जाया गया है। एसीपी ने रितू दीदी से कहा कि उसने समूचे हास्पिटल में अंदर बाहर पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में तैनात कर दिये हैं। इस लिए अब किसी बात का ख़तरा नहीं है। एसीपी की बात सुन कर रितू दीदी ने उसे इसके लिए धन्यवाद किया। कुछ देर बाद एसीपी ये कह कर चला गया कि वो नीलम का हाल चाल लेने फिर आएगा।

एसीपी के जाने के कुछ देर बाद हम चारों वहीं गैलरी पर दीवार से सटी हुई रखी लम्बी चेयर्स पर बैठ गए। कुछ देर बाद मैं उठा और हाॅस्पिटल से बाहर पानी लाने के लिए चला गया। पानी लाकर मैने रितू दीदी व सोनम दीदी को दिया। उसके बाद उसी कुर्सी पर बैठ कर हम सब डाॅक्टर के बाहर आने का इन्तज़ार करने लगे। हम सबके लबों से बस एक ही दुवा निकल रही कि नीलम को कुछ न हो।

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अब आगे,,,,,,,,

उधर हवेली में।

ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी प्रतिमा अपने मोबाइल से बार बार अपने पति अजय सिंह के मोबाइल पर फोन लगा रही थी किन्तु अजय सिंह का फोन बंद बता रहा था। अजय सिंह का फोन बंद बताने से प्रतिमा को किसी अनहोनी आशंका होने लगी थी। उसके चेहरे पर एकाएक ही गहन चिंता, परेशानी तथा बेचैनी के भाव उभर आए थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अजय ने अपना फोन क्यों बंद कर रखा है? वो अजय सिंह से फोन पर बात करके ये जानना चाहती थी कि वो इस वक्त कहाॅ है तथा बाॅकियों के हालात कैसे हैं? मगर अजय सिंह का फोन बंद बताने से प्रतिमा को अब प्रतिपल बेचैनी सी होने लगी थी। उसके मन में तरह तरह के ख़यालों का आवागमन शुरू हो गया था।

उसके सामने ही दूसरे सोफे पर शिवा किसी और ही दुनियाॅ में खोया हुआ नज़र आ रहा था। उसे जैसे अपने माॅ बाप की कोई ख़बर ही नहीं थी। वो तो बस सोनम के ख़यालों में खोया हुआ था। नीलम व सोनम को अब तक तीन से चार घंटे हो गए थे। मगर वो दोनो अब तक वापस नहीं लौटी थी। किन्तु शिवा को जैसे समय का ख़याल ही नहीं था। वो तो बस अपनी ऑखों के सामने नज़र आ रहे सोनम के खूबसूरत चेहरे को ही अपलक देखे जा रहा था। हलाॅकि जब प्रतिमा ने उसे इस बात से अवगत कराया कि वो दोनो यहाॅ से भागने का सोच कर ही गई हो सकती हैं तो शिवा का दिल एकदम से बैठ सा गया था। बाद में प्रतिमा के ही निर्देश पर उसने कुछ नये आदमियों की मजबूत टीम बना कर उनके पीछे लगा दिया था।

"उफ्फ क्या करूॅ इस इंसान का।" सहसा तभी प्रतिमा की खीझी हुई इस आवाज़ से शिवा हकीक़त की दुनियाॅ में आया, जबकि प्रतिमा कह रही थी____"कभी कोई काम ठीक से नहीं कर सकते हैं। ये तो हद हो गई, इतना लापरवाह इंसान मैने आज तक नहीं देखा।"

"क्या हुआ माॅम?" शिवा ने प्रतिमा के एकाएक ही तमतमा गए चेहरे को देखते हुए कहा____"किस लापरवाह इंसान की बात कर रही हैं आप?"

"तुम्हारे बाप की।" प्रतिमा ने आवेश में कहा___"जो कि हद दर्ज़े का लापरवाह और बेवकूफ इंसान है।"

"अरे ये आप क्या कह रही हैं माॅम?" शिवा अपनी माॅ की बातों से बुरी तरह हैरान रह गया।

"सच ही तो कह रही हूॅ मैं।" प्रतिमा ने कहा___"वरना कौन ऐसा करता है कि इतनी ख़राब सिचुएशन में होकर अपना फोन ही बंद कर दे?"

"क्या मतलब???" शिवा जैसे चकरा सा गया।

"तुम्हारे बाप से फोन द्वारा पूछना चाहती थी कि वहाॅ के हालात कैसे हैं?" प्रतिमा ने कहा___"मगर महाशय का मोबाइल फोन ही ऑफ बता रहा है। अब तुम ही बताओ कि ऐसे हालात में कौन अपना फोन कर बंद करके रखता है?"

"बात तो आपने सही कही माॅम।" शिवा के चेहरे पर एकाएक सोचने वाले भाव उभरे____"ऐसे हालात में कोई भी अपना फोन ऑफ नहीं रख सकता। हाॅ अगर मोबाइल ही डिस्चार्ज़ हो गया हो तो अलग बात है। लेकिन माॅम मुझे यकीन है डैड अपना फोन ऑफ नहीं करेंगे ऐसे वक्त में। ज़रूर कोई बात हो गई होगी।"

"चुप कर तू।" प्रतिमा अंदर ही अंदर जाने क्यों बुरी तरह हिल गई, बोली___"जो मुह में आता है बिना सोचे समझे बोल देता है।"

"ऐसा नहीं है माॅम।" शिवा ने नर्म भाव से कहा___"लेकिन आप खुद सोचिए कि क्या डैड ऐसे वक्त में अपना फोन ऑफ कर सकते हैं, नहीं ना? उन्हें भी पता है कि हालात कितने गंभीर हैं। लेकिन ये भी सच है कि अगर डैड का फोन ऑफ बता रहा है तो ज़रूर कोई ऐसी बात होगी जिसके बारे में फिलहाल हमें कुछ भी पता नहीं है।"

शिवा की इस बात पर प्रतिमा तुरंत कुछ बोल न सकी। उसके चेहरे पर गहन सोचों के भाव ज़रूर उभर आए थे। जैसा सोच रही हो कि क्या सच में ऐसा कुछ हुआ होगा? उधर अपनी माॅम को सोचों में गुम देख कर शिवा पुनः कह उठा____"इस तरह बैठने से कुछ नहीं होगा माॅम। मुझे लगता है कि हमें डैड का पता करना चाहिए। जैसा कि आपने मुझे बताया था कि आज विराज रितू दीदी के साथ नीलम व सोनम को लेने आने वाला है शायद, इसी लिए आपने उनके पीछे अलग से एक मजबूत टीम बना कर मेरे द्वारा भेजवाया था। वहीं दूसरी तरफ से डैड भी अपने साथ कुछ आदमियों को लिए आ रहे हैं। इस बात से यही ज़ाहिर होता है कि अगर विराज सचमुच आ रहा है तो डैड तथा हमारे आदमियों के साथ उसकी भिड़ंत अनिवार्य है। इस भिड़ंत में यकीनन हमारी जीत होगी। यानी कि अंततः विराज रितू दीदी के साथ पकड़ा ही जाएगा। उसके बाद डैड उन सबको फार्महाउस ले जाएॅगे। फार्महाउस पहुॅचने के बाद ही वो हमें फोन करने वाले थे। किन्तु उनके फोन बंद बताने से ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमने जो उम्मीद की थी वो हुआ ही नहीं है।"

"नहीं नहीं।" प्रतिमा ने पूरी मजबूती से इंकार में सिर हिलाया, बोली___"ऐसा नहीं हो सकता बेटा। इस बार मैने और तेरे डैड ने उस विराज की सोच से बहुत आगे बढ़ कर प्लान बनाया था। मुझे उसकी सोच का अब अंदाज़ा हो चुका था, इसी लिए तो डबल बैकअप रखा था हमने। एक हमारे आदमियों का दूसरा तेरे डैड के साथ आए आदमियों का। डबल बैकअप के बाद तो जीत हमारी ही होनी निश्चित थी बेटा।"

"काश! ऐसा ही हुआ हो माॅम।" शिवा ने कहा___"उन सबके साथ साथ नीलम व सोनम भी तो पकड़ ली गई होंगी। उफ्फ! कितना भरोसा था मुझे कि सोनम ये गाॅव तथा हमारे खेते घूम कर वापस यहीं आएगी। मगर कदाचित नीलम ने उसे भी सब कुछ बता दिया था तभी तो दोनो एक साथ चली गईं। मगर अब मैं अपने दिल का क्या करूॅ माॅम? ये तो उसी का होकर रह गया है।"

शिवा की इस बात का प्रतिमा अभी कुछ जवाब देने ही वाली थी सहसा तभी ड्राइंग रूम में बड़े वेग से एक आदमी दाखिल हुआ। उसके चेहरे से ही लग रहा था कि वो कहीं से मैराथन दौड़ लगा कर आया है। बुरी तरह हाॅफ रहा था वह। प्रतिमा व शिवा उसे देख कर बुरी तरह चौंक पड़े।

"क्या बात है हैदर?" शिवा ने उसकी तरफ हैरानी से देखते हुए कहा___"तुम इतना हाॅफ क्यों रहे हो? और...और तुम यहाॅ कैसे, तुम तो टीम के साथ ही गए थे न?"

"हाॅ छोटे ठाकुर।" हैदर नाम के उस आदमी ने हाॅ में सिर हिलाते हुए कहा___"गया तो मैं टीम के साथ ही था। मगर,

"मगर क्या???" शिवा उतावलेपन में पूछ बैठा।

"सब कुछ गड़बड़ हो गया छोटे ठाकुर।" हैदर ने दीनहीन दशा में बोला____"ठाकुर साहब ने तो सबको पकड़ ही लिया था और बाज़ी भी हमारे ही हाॅथ में थी। मगर ऐन वक्त पर वहाॅ पुलिस की पूरी फौज आ गई और फिर एसीपी के निर्देश पर सबको हिरासत में ले लिया गया। यहाॅ तक कि ठाकुर साहब को भी वो एसीपी गिरफ्तार करके ले गया है। मैं किसी तरह छुपता छुपाता वहाॅ से निकल कर ये सब बताने के लिए आपके पास आया हूॅ।"

हैदर की बात सुन कर शिवा तथा प्रतिमा दोनो को ही जैसे साॅप सूॅघ गया। दोनो के ही चेहरों की हालत ऐसे हो गई जैसे कपड़े से पानी निचोड़ लेने पर कपड़े की हो जाती है। प्रतिमा को तो ऐसा लगा जैसे दिल का दौरा पड़ जाएगा। उसकी ऑखों के सामने अॅधेरा सा छा गया। शिवा की नज़र जब प्रतिमा पर पड़ी तो वह अपने सोफे से उठ कर बड़ी तेज़ी से उसके पास आकर उसे सम्हाला। हालत तो उसकी भी ख़राब हो चुकी थी। किन्तु जवान खून था अभी इस लिए हैदर की इस डायनामाइट जैसी बात को हजम कर गया था।

"सब कुछ खत्म हो गया बेटा।" प्रतिमा अपने बेटे की बाहों में सिमटी एकदम से असहाय भाव से बोली___"अब कुछ भी शेष नहीं रहा। तेरी बहन रितू ने अपने महकमे का सहारा ले कर अपने बाप को एक और क्षति पहुॅचा दी। उसने अपने बाप के माथे पर एक और नाकामी की मुहर लगा दी। इस बात से ज़ाहिर होता है कि उसके दिल में अपने माॅ बाप के प्रति ज़रा सी भी जगह नहीं रह गई है।"

"मैं उस कुतिया को ज़िंदा नहीं छोंड़ूॅगा माॅम।" शिवा के मुख से सहसा गुर्राहट निकली___"डैड को जेल भिजवा कर उसने ये अच्छा नहीं किया है। भला उसकी हमसे क्या दुश्मनी है माॅम, दुश्मनी तो विराज से है।"

"मैडम, ठाकुर साहब ने गुस्से में आकर अपनी छोटी बेटी नीलम को गोली भी मार दी है।" सहसा हैदर ने ये कह कर मानो धमाका सा किया____"नीलम की हालत बहुत ही गंभीर है। उसे वो लोग यकीनन हास्पिटल ले गए होंगे।"

"ये क्या कह रहे हो तुम??" प्रतिमा हैदर की ये बात सुन कर सकते में आ गई। चेहरा सफेद फक्क पड़ गया।

"हाॅ मैडम।" हैदर ने कहा___"गुस्से में पागल हुए ठाकुर साहब ने एसीपी का रिवील्वर निकाल कर नीलम पर फायर कर दिया था। गोली नीलम की पीठ पर लगी थी। जहाॅ से खूॅन बहे जा रहा था।"

"हे भगवान!।" प्रतिमा की ऑखें छलक पड़ीं___"ये कैसा दिन दिखा रहे हो हमे? एक बाप अपनी ही बेटियों के खून का प्यासा हो चुका है।"

"लेकिन हैदर।" प्रतिमा के रुदन पर ज़रा भी ध्यान दिये बग़ैर शिवा ने पूछा___"डैड ने नीलम पर गोली क्यों चलाई थी?"

हैदर ना शुरू से लेकर अंत तक की सारी राम कहानी संक्षेप में कह सुनाई। उसकी इस राम कहानी में वो सीन भी था जिसमें अजय सिंह ने अपनी ही बेटी नीलम से अश्लील बातें की थी। ये भी कि अंत में कैसे नीलम ने ठाकुर साहब को थप्पड़ मारा था जिसकी वजह से गुस्से में आकर अजय सिंह ने एसीपी का रिवाल्वर छीन कर नीलम पर गोली चलाई थी। सारी बातें सुनने के बाद शिवा तो बस हैरान ही था किन्तु प्रतिमा एकदम से मानो बुत बन गई थी। उसका चेहरा एकदम से तेज़हीन सा हो गया था।

"अब मेरे लिए क्या आदेश है छोटे ठाकर?" हैदर ने कहा।

"तुम जाओ हैदर।" शिवा ने गंभीरता से कहा___"गेस्ट हाउस में आराम करो। हम सोचते हैं कि अब इसके आगे हमें क्या करना है?"

शिवा के कहने पर हैदर वहाॅ से चला गया। उसके जाने के बाद ड्राइंगरूम में मरघट जैसा सन्नाटा छा गया। काफी देर तक माॅ बेटे के बीच यही आलम रहा। जैसे उनमें से किसी को कुछ सूझ ही न रहा हो कि अब क्या बात करें?

"आख़िर जिस चीज़ की नियति बन चुकी थी।" सहसा प्रतिमा ने कहीं खोये हुए से कहा___"उसका आग़ाज हो ही गया। इस लड़ाई में किसी न किसी को तो शहीद होना ही है। फिर चाहे वो नीलम ही क्यों न हो?"

"आपने बिलकुल सही कहा माॅम।" शिवा ने भी गंभीर भाव से कहा___"किसी न किसी के साथ तो ये होना ही है। मगर एक बात तो मैं भी कहूॅगा, और वो ये कि डैड ने नीलम पर गोली चला कर अच्छा नहीं किया। मैं जानता हूॅ कि आपको मेरी ये बात नागवार लग सकती है। मगर इसके बावजूद कहूॅगा मैं कि डैड को नीलम पर गोली नहीं चलाना चाहिए था। मैं मानता हूॅ कि मेरी दोनो बहनों ने हमसे बगावत करके ग़लत किया है। उन्हें सोचना चाहिए था कि माॅ बाप कैसे भी हों हैं तो अपने ही। वैसे ही डैड को भी सोचना चाहिए था माॅम। हम उन्हें उनके किये की सज़ा ज़रूर देते मगर इस तरह नहीं कि उनको जान से ही मार दें। ये सब उस विराज की वजह हे हुआ है, उसी ने मेरी दोनो बहनों को बहकाया है। उसी ने उन दोनो का ब्रेनवाश किया है, वरना उनके दिलो दिमाग़ में कम से कम ये सोच तो रहती ही कि माॅ बाप जैसे भी हों, वो अपने ही होते हैं।"

प्रतिमा शिवा की ये बातें सुन कर मन ही मन हैरान थी। शिवा का बदला हुआ ये रवैया उसे हजम नहीं हो रहा था। किन्तु उसे ये भी पता था कि शिवा अपने बाप की टूकाॅपी है। यानी सूरज कभी पश्चिम से उदय नहीं हो सकता।

"क्या बात है।" प्रतिमा ने हैरानी से कहा___"आज अपनी बहनों से इतनी हमदर्दी? क्या ये सोनम से हुए इश्क़ का असर है बेटा? जिसने तेरी सोच को इस हद तक बदल दिया है?"

"मुझे खुद पता नहीं है माॅम।" शिवा ने नज़रें चुराते हुए कहा___"मैं सिर्फ इतना समझ रहा हूॅ कि डैड ने नीलम पर गोली चला कर अच्छा नहीं किया। अगर वही गोली वो विराज पर चला देते तो शायद मुझे उनसे कोई शिकायत न रहती।"

"ख़ैर छोंड़।" प्रतिमा ने इस मैटर को ज्यादा न बढ़ाने की गरज़ से कहा___"अब हमें ये सोचना है कि तेरे डैड को पुलिस से कैसे छुड़ाया जाए? उन पर नीलम को जान से मारने की कोशिश का भी केस लग सकता है, और संभव है कि उस एसीपी ने ये केस लगा भी दिया हो उन पर। अतः हमें अब किसी क़ाबिल वकील से मिलना पड़ेगा। ताकि वो उनको जेल से किसी तरह छुड़ा सके।"

"हाॅ ये सच कहा आपने।" शिवा ने कहा___"डैड को जेल से तो छुड़ाना ही पड़ेगा।"

"रुको मैं पता करती हूॅ।" प्रतिमा ने कहा___"मेरी जानकारी में एक क़ाबिल वकील है जो अजय को जेल से छुड़ा सकती है। मेरी एक काॅलेज फ्रैण्ड है। मैने और अनीता ब्यास ने एक साथ ही एलएलबी किया था। उसके बाद उसने वकालत को ही अपना पेशा बना लिया जबकि मैं अजय के साथ घर बसा कर सिर्फ एक हाउसवाइफ बन कर रह गई। हलाॅकि अजय ने मुझे इस बात के लिए कभी भी मना नहीं किया कि मैं वकालत न करूॅ। बल्कि हमने तो साथ में ही इसकी पढ़ाई की थी। अजय तो चाहते थे कि हम दोनो वकील बन जाएॅ। मगर मैने ही इंकार कर दिया था। किन्तु आज सोचती हूॅ कि काश मैं बन ही जाती तो आज अपने अजय को चुटकियों में जेल से छुड़ा लाती।"

"वकालत तो आप आज भी कर सकती हैं माॅम।" शिवा ने कहा___"आपके पास इस सबके राइट्स तो होंगे ही।"

"सब कुछ है बेटा।" प्रतिमा ने कहा___"मगर ये सब अब इतना आसान भी नहीं है। उसके लिए पहले इस सबकी बारीकियों को समझना पड़ता है। कई तरह के केसों का अध्ययन करना पड़ता है। मैं कभी कोर्ट के अंदर वकील का चोंगा पहन कर नहीं गई, इस लिए मुझे इसका तज़ुर्बा भी नहीं है। दूसरी बात अनुभव भी कोई चीज़ होती है। जो कि मुझे नहीं है। हर चीज़ का एक क्रम होता है। अगर आप समय के साथ ही साथ लाइन पर चल रहे हैं तब तो आप सीधी लाइन पर ही बिना किसी रुकावट के चलते रहेंगे पर अगर आपने लाइन को बहुत पहले ही छोंड़ दिया है तो फिर लम्बे समय बाद उसी लाइन पर चलना ज़रा मुश्किल सा हो जाता है। वो फिर तभी अपनी लय पर आएगा जब उसकी नियमित प्रैक्टिस हो। ख़ैर, छोंड़ इस बात को। मैं अनीता को फोन लगा कर उससे बात करती हूॅ। मेरे फ्रैण्ड सर्कल में एक वही है जो अब तक मेरे टच में में है। बाॅकियों का तो कहीं पता ही नहीं है।"

कहने के साथ ही प्रतिमा ने अपने मोबाइल को अनलाॅक करके उस पर अनीता ब्यास का नंबर ढूॅढ़ने लगी। जबकि शिवा ये कह कर सोफे से उठा कि वो कुछ देर में आता है अभी।

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केशव जी के जिस आदमी ने फोन पर उस जासूस के बारे में सूचित किया था उसका नाम निरंजन वर्मा था। रितू ने जब केशव जी से कहा कि वो अपने उस आदमी से कहे कि उसे पकड़ने की कोशिश करे और खुद भी वापस जाएॅ वहाॅ तो केशव ने वैसा ही किया था। उन्होंने निरंजन को फोन करके उससे पूछा था कि क्या वो अकेले उस जासूस को पकड़ सकता है तो निरंजन ने कहा कि वो इस बारे में कुछ कह नहीं सकता है। क्योंकि उसने सुना था कि कोई कोई जासूस लड़ने के मामले में भी काफी निपुण होते हैं। इस लिए बेहतर यही होगा कि वो उस पर सिर्फ नज़र रखे और फिर जब वो सब आ जाएॅगे तो उसे जल्द ही घेर लिया जाएगा। केशव जी को भी निरंजन की बात सही लगी। इस लिए वो फुल स्पीड में अपने आदमियों को लिए आ रहे थे।

इधर निरंजन बड़ी सफाई से हरीश राणे पर नज़र रखे हुए था। किन्तु उसे भी पता था कि ये जासूस यहाॅ पर ज्यादा देर तक रुकने वाला नहीं है। उसके पास काले रंग की एक पल्सर बाइक थी। इस वक्त वह बाइक के ही पास नीचे बैठा बाइक में कुछ कर रहा था। निरंजन को समझ नहीं आ रहा था कि वो बाइक के पास इस तरह बैठ कर क्या कर रहा है? निरंजन उससे बस कुछ ही दूरी पर एक पेड़ की ओट में छुप कर खड़ा था और उस पर नज़र रखे हुए था। उसके पास हथियार के रूप में कुछ भी नहीं था। जबकि उसे पूर्ण विश्वास था कि उस जासूस के पास रिवाल्वर ज़रूर होगा। यही वजह थी कि वो खुल कर उसके सामने नहीं जा रहा था।

निरंजन के चेहरे पर प्रतिपल बेचैनी बढ़ती जा रही थी। क्योंकि उसे पता था कि जासूस अगर यहाॅ से चला गया तो फिर उसे ढूॅढ़ पाना मुश्किल होगा। अतः वह बार बार देवी माॅ से प्रार्थना कर रहा था कि केशव जी सारे आदमियों को लेकर जल्दी आ जाएॅ। उसकी नज़र सामने ही थी। जहाॅ पल्सर बाइक के पास नीचे बैठा वो जासूस कुछ कर रहा था। जासूस का चेहरा उसके बगल से दिख रहा था। निरंजन के मन में कई बार ये ख़याल आया था कि वो चुपके से जाए और उस जासूस को दबोच ले मगर अगले ही पल वो उसके पास जाने का अपना ये ख़याल त्याग देता था। क्योंकि बार बार उसे उसके पास रिवाल्वर होने का बोध करा देता था। उसने आस पास देख भी लिया था। पास में कहीं भी उसे कोई डंडे जैसी वस्तु भी न नज़र आई थी जिसे लेकर वो उस जासूस के पास चला जाता।

अभी निरंजन उस जासूस को देख ही रहा था कि तभी वो जासूस उठ कर खड़ा हुआ और अपने दाहिने पैर को बाइक के आगे वाले पहिये पर रिम में रख कर उस पर ज़ोर से दबाव बनाया। ये देख कर निरंजन के मस्तिष्क में झनाका सा हुआ। एकाएक ही उसके दिमाग़ की बत्ती जल उठी। साला इतनी देर से वो समझ नहीं पा रहा था कि ये जासूस बाइक के पास बैठा कर क्या रहा था? अब उसे समझ आया था। दरअसल बाइक का अगला पहिया पंचर था अथवा उसमें हवा कम थी। पहिये पर निरंजन का ध्यान पहली बार गया था। उसने ग़ौर से देखा पहिये पर जहाॅ पर से हवा भरी जाती है वहाॅ पर कोई पतली सी तार या फिर यू कहें कि पतला सा पाइप लगा हुआ था। जिसका दूसरा सिरा इस वक्त उस जासूस के दाहिने हाॅथ में था।

निरंजन को समझ न आया कि अगर बाइक का अगला पहिया पंचर है या उसमे हवा कम है तो वो जासूस यहाॅ पर उसे ठीक कैसे कर लेगा और ये पतला सा पाइप क्यों लगा रखा है उसने पहिये की निब पर? तभी वो जासूस पुनः बैठ गया। इस बार निरंजन ने भी अपनी जगह बदली और फिर ध्यान से देखा उसने। पाइप का दूसरा सिरा उस जासूस ने अपने होठों पर दबाया और फिर निरंजन ने देखा कि जासूस के दोनो गाल फूल गए। ये देख कर निरंजन की हॅसी छूट ही गई होती अगर उसने जल्दी से अपने मुह को अपने हाथों से भींच न लिया होता तो। दरअसल वो जासूस पाइप लगा कर मुह से हवा भर रहा था पहिये पर। बस यही देख कर निरंजन को बड़ी ज़ोर की हॅसी आ गई थी। उसने सोचा कि इसे जासूस किसने बना दिया? भला मुह से भी कोई बाइक के पहिये पर हवा भरता है? ये तो दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य ही है।

निरंजन ने भी सोचा कि बेचारा यहाॅ पर बाइक में हवा भरवाए भी तो कैसे? किन्तु मुख से हवा तो भरने से रही। कहने का मतलब ये कि जासूस की इस क्रिया पर निरंजन उसे बेवकूफ ही समझ रहा था। मगर वो उस वक्त हैरान रह गया जब वो जासूस पुनः उठा और पहले की भाॅति अपना दाहिना पैर रिम में रख दबाव बनाया। उसके चेहरे से ज़ाहिर हुआ कि अब वो संतुष्ट है। उसने झुक कर तुरंत ही पाइप को पहिये के निब से निकाला। निरंजन ने देखा कि निब के पास लगे पाइप के उस छोर पर कोई चीज़ लगी हुई थी। ये देख कर निरंजन का दिमाग़ घूम गया। चकित होकर वह उस जासूस को देखे जा रहा था। अब उसे समझ आया कि वो जासूस यूॅ ही तो नहीं बन गया होगा। ज़रूर उसमें काबीलियत थी।

अभी निरंजन ये सब सोच ही रहा था कि तभी उसने देखा कि वो जासूस उस पाइप को लिए बाइक के बाएॅ साइड आया और फिर अपनी दाहिनी टाॅग उठा कर बाइक की सीट पर बैठ गया। ये देख कर निरंजन एकदम से हड़बड़ा गया। वो समझ गया कि अब ये जासूस यहाॅ से चला जाएगा। निरंजन को समझ न आया कि वो उसे कैसे यहाॅ से जाने से रोंके? वो खुद निहत्था था वरना वो कोई जोखिम उठाने का सोचता भी। उसे पूरा यकीन था कि उस जासूस के पास पिस्तौल होगी। यही वजह थी कि वो उसके पास खुल कर जा नहीं रहा था। किन्तु अब हालात बदल गए थे। क्योंकि निरंजन की ऑखों के सामने ही वो जासूस बाइक पर बैठ चुका था और अब ये भी तय था कि वो बाइक को स्टार्ट कर यहाॅ से चला ही जाएगा।

निरंजन ने देखा कि बाइक पर बैठा जासूस उस पतले से पाइप को गोल गोल छल्ली की शक्ल देकर समेट रहा था। उसकी पीठ निरंजन की तरफ ही थी। पाइप का दूसरा सिरा जासूस की दाहिनी जाॅघ से थोड़ा ही नीचे झूल रहा था और प्रतिपल ऊपर की तरफ उठता भी जा रहा था। ये देख कर निरंजन के दिमाग़ की बत्ती जली। उसके चेहरे पर एकाएक ही कुछ सोच कर चमक आ गई। वो फुर्ती से अपनी जगह से हिला और फिर बड़ी सावधानी व सतर्कता से लम्बे लम्बे क़दम बढ़ाते हुए जासूस के पीछे पहुॅच गया।

हरीश राणे को सहसा अपने पीछे किसी की मौजूदगी का एहसास हुआ। उसने इस एहसास के तहत ही जल्दी से पीछे मुड़ कर देखना चाहा मगर अगले ही पल जैसे बिजली सी कौंधी। निरंजन ने डर व भय की वजह से बड़ी ही फुर्ती का प्रदर्शन किया था। उसने जासूस के मुड़ने से पहले ही झुक कर जासूस के नीचे जाॅघ के पास झूलते उस पाइप को पकड़ा और फिर तेज़ी से खड़े होकर उसी छोर से दूसरा हाॅथ सरका कर उसने जासूस के सिर से अपनी एक कलाई घुमा कर बड़ी फुर्ती से उस पाइप को जासूस की गर्दन पर कस दिया।

हरीश राणे को ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि उसके साथ पलक झपकते ही ऐसा कुछ हो सकता है। वह एकदम से हकबका कर रह गया था। हलाॅकि उसने खुद को बड़ी तेज़ी से सम्हाला था मगर तब तक उसके गले में निरंजन ने उस पाइप को किसी फाॅसी के फंदे की तरह कस दिया था। निरंजन ये सोच कर जी जान लगाए हुए था कि अगर उसने ज़रा सी भी ढील दी तो ये जासूस उसे जान से मार देगा। निरंजन के दिमाग़ में बस एक यही बात थी, बाॅकी उसे किसी बात का कोई होश ही नहीं था। उसे इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं रह गया था कि उसके द्वारा इतनी ताकत से गले में पाइप को कसने से वो जासूस कुछ ही पलों में मर भी सकता है।

उधर राणे जल बिन मछली की तरह छटपटाए जा रहा था। वो अपने दोनो हाथों से अपने गले में फॅसे पाइप को पकड़ने की कोशिश कर रहा था मगर पाइप में निरंजन की पूरी ताकत लगी हुई थी। जिसकी वजह से राणे उसे हिला भी नहीं पा रहा था। देखते ही देखते राणे का बुरा हाल हो गया। उसका गोरा चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया। चेहरे पर पसीना और तड़प साफ पता चल रही थी। किसी किसी पल वह खाॅसने भी लगता था। उसकी ऑखों की पुतलियाॅ जैसे बाहर कूद पड़ने को आतुर हो उठी थीं।

राणे की हालत प्रतिपल बिगड़ती जा रही थी। बाइक पर बैठा वह बुरी तरह खुद को झटके भी दे रहा था मगर मजाल है कि निरंजन की पकड़ में ज़रा सा भी ढीलापन आया हो। कहते हैं कि मौत से बचने के लिए इंसान अंत तक हर तरह से प्रयास करता है फिर भले ही उसके प्रयास विफल ही होते रहें। निरंजन के सिर पर जुनून सवार था और वो किसी यमराज की तरह राणे के सिर पर आ खड़ा हुआ था। राणे को एहसास हो गया कि अब वो मरने ही वाला है। उसे अब साॅस लेना भी मुश्किल पड़ रहा था। बुरी तरह छटपटाते हुए राणे ने एकाएक अपने एक हाॅथ को गले में फॅसे पाइप से हटा कर उसी हाॅथ की कुहनी का वार बड़ी तेज़ी से पीछे निरंजन के पेट के हल्का ऊपरी भाग पर किया। उसके इस वार से निरंजन के हलक से पीड़ा भरी कराह निकल गई और उसकी पकड़ तथा उसकी ताकत कमज़ोर पड़ गई। हलाॅकि उसने जल्दी से उस दर्द को बर्दास्त करके पुनः पाइप को कसना चाहा मगर तक मानो देर हो गई। क्योंकि जैसे ही निरंजन ने पुनः ताकत लगाई वैसे ही राणे ने कुहनी का वार जल्दी जल्दी कई बार निरंजन के पेट में कर दिया था। नतीजा ये हुआ कि निरंजन की पकड़ काफी ज्यादा ढीली व कमज़ोर पड़ गई। वह बुरी तरह दर्द व पीड़ा से बिलबिला उठा था।

निरंजन के कमज़ोर पड़ते ही हरीश राणे ने बड़ी तेज़ी से अपने गले से उस पाइप को पकड़ कर खींचा और फिर उसे ऊपर करते हुए सिर से निकाल दिया। हालत तो उसकी अब भी बहुत ख़राब थी। बुरी तरह खाॅस रहा था तथा बुरी तरह गहरी गहरी साॅसें भी ले रहा था। गोरा चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया था। चेहरे पर ढेर सारा पसीना उभर आया था। गले से पाइप को निकालते ही वह बाइक से खुद को बाएॅ साइड गिरा लिया था तथा साथ ही कई पलटियाॅ भी खा लिया था। मगर तब तक उसकी पसली में निरंजन के बूट की ज़बरदस्त ठोकर लग चुकी थी। निरंजन जानता था कि अगर वह अब भी उसे सम्हलने का मौका दिया तो वो उसके लिए काल बन सकता है। अतः वह मौत के डर से उस पर वार पे वार किये जा रहा था।

हरीश राणे अभी अभी मौत से बच कर निकला था। इस लिए उसे खुद पर नियंत्रण पाने के लिए कुछ समय चाहिए था मगर निरंजन था कि उस पर प्रहार किये जा रहा था। अचानक ही निरंजन ने देखा कि जासूस ने अपने हाॅथ को पीछे ले जाकर रिवाल्वर निकाल रहा है। ये देख कर निरंजन के समूचे जिस्म में मौत की सिहरन दौड़ गई। जैसे ही राणे ने रिवाल्वर निकाल कर अपने हाॅथ को निरंजन की तरफ उठाना चाहा वैसे ही मौत के डर से निरंजन ने उसकी उस कलाई पर अपनी टाॅग चला दी। नतीजा ये हुआ कि राणे के हाॅथ से रिवाल्वर छूट कर दूर जा गिरा तथा कलाई पर तेज़ ठोकर लगने से वो दर्द से कराह उठा।

निरंजन ने देखा कि रिवाल्वर उसकी पहुॅच में ही है इस लिए वो जल्दी से रिवाल्वर की तरफ लपका मगर तभी वह मुह के बल ज़मीन पर गिरा। गिरते ही उसके मुख से चीख़ निकल गई। राणे ने पलट कर उसका पैर पकड़ कर खींच लिया था जिससे वो अनबैलेंस होकर मुह के बल गिरा था। रिवाल्वर उसकी पहुॅच से लगभग डेढ़ दो हाॅथ ही दूर था। इधर निरंजन का पैर पकड़ कर खींचते ही राणे उसके ऊपर एकदम से आने की कोशिश की तो निरंजन घबरा कर पलट गया। नतीजतन इस बार राणे मुह के बल गिरा। किन्तु उसके एक हाॅथ में निरंजन का पैर अभी भी था।

निरंजन ने अपने पैर को उससे छुड़ाने के लिए ज़ोर से झटका दिया मगर उसका पैर तो न छूटा किन्तु झटकने से उसका पैर राणे की छाती से टकराया। निरंजन आवेश और घबराहट में अपने पैर को झटका देता ही रहा, जिसका नतीजा ये हुए कि बार बार छाती पर उसका पैर ज़ोर से लगने से आख़िर राणे को उसका पैर छोंड़ना ही पड़ा। इधर निरंजन जो कि दोनो हाॅथ पीछे की तरफ ज़मीन पर टिका कर बैठ चुका था वो अपने पाॅव के आज़ाद होते ही तेज़ी से रिवाल्वर की तरफ पलट कर लगभग उस पर कूद सा गया। उसके हाॅथ में रिवाल्वर आ चुका था। अभी वह रिवाल्वर के साथ पलटा ही था कि तभी राणे उसके ऊपर जंप मार कर आ गया।

राणे ने तुरंत ही निरंजन के रिवाल्वर वाले हाॅथ को पकड़ने के लिए अपना एक हाॅथ बढ़या तो निरंजन ने अपने उस हाॅथ को ऊपर अपने सिर के पीछे साइड कर लिया। राणे जैसे ही उसे पकड़ने के लिए उस तरफ झुका वैसे ही निरंजन ने अपना दूसरा हाॅथ छुड़ा कर ज़ोर से एक मुक्का राणे की कनपटी में मारा जिससे राणे उसके ऊपर से दूसरी तरफ पसर गया। इधर राणे के गिरते ही निरंजन लेटे लेटे ही एक साथ तीन चार पलटियाॅ खाता चला गया। जब तक राणे उठ कर उसके पास पहुॅचता तब तक निरंजन उठ कर बैठ चुका था, साथ ही रिवाल्वर वाला हाॅथ भी ऊपर उठा कर उस पर तान चुका था।

"रुक जा मादरजाद।" निरंजन आवेश में जल्दी से चिल्लाया था___"वरना इस रिवाल्वर की सारी गोलियाॅ तेरे सीने में उतार दूॅगा और ये मैं यूॅ ही नहीं कह रहा हूॅ बल्कि सचमुच ऐसा कर भी दूॅगा। क्योंकि तुझे जान से मार देने पर भी मुझे कुछ नहीं वाला। बल्कि इनाम ही मिलेगा मुझे।"

हरीश राणे निरंजन का ये डायलाॅग तथा उसके खतरनाॅक लहजे को देख कर एकदम से अपनी जगह पर गया। उसके चेहरे पर पहली बार डर व भय के चिन्ह नज़र आए। किन्तु उसे ये समझ नहीं आया कि ये आदमी है कौन और उसके पीछे उसकी मौत बन कर कहाॅ से आ गया था? क्या ये विराज व रितू का आदमी है जो उसके पीछे ही लगा हुआ था?

"कौन हो तुम?" हरीश राणे ने सतर्क भाव से पूछा___"और इस तरह मुझ पर जानलेवा हमला करने का क्या मतलब है तुम्हारा?"

"जिस तरह तू मंत्री का कुत्ता बन कर हमारे बाॅस के अज़ीज़ लोगों के पीछे लगा हुआ था।" निरंजन ने लहजे को कठोर बनाते हुए कहा___"उसी तरह मैं भी तेरे पीछे लगा हुआ था। ख़ैर, अब तू पकड़ में आ ही चुका है तो ये भी समझ गया होगा कि अब तेरा क्या हस्र होने वाला है?"

"ओह तो तुम्हें ये ग़लतफहमी है।" हरीश राणे ने बड़े अजीब भाव से कहा____"कि तुमने मुझे पकड़ लिया है?"

"ज्यादा शेखी मत झाड़।" निरंजन उसकी बात पर गड़बड़ा सा गया, फिर बोला___"वरना बता ही चुका हूॅ कि तुझे जान से मार देने पर मुझे कुछ नहीं होगा बल्कि इनाम ही मिलेगा।"

"अच्छा।" हरीश राणे सहसा मुस्कुराया___"तो फिर देर किस बात की है प्यारे? तुम्हारे निशाने पर हूॅ, खत्म कर दो मुझे और जल्दी से अपना इनाम भी हाॅसिल कर लो।"

"लगता है।" निरंजन अंदर ही अंदर हैरान___"कि तुझे मरने की बहुत जल्दी है।"

"क्या करें दोस्त?" राणे ने कहा___"अब जब तुमने कह ही दिया है ऐसा तो फिर देर किस बात की करना? मुझे लगता है कि तुम्हें भी अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। अतः मेरी सलाह मानो और जल्दी से मुझे खत्म कर दो।"

निरंजन उसकी इस बात पर समझ न सका कि ये जासूस आख़िर है किस किस्म का ब्यक्ति? मौत सामने खड़ी है और ये ऐसी बातें कर रहा है। इसे ज़रा भी मौत का ख़ौफ नहीं है। जबकि निरंजन तो बस उसे डरा और धमका ही रहा था। ताकि वह कोई बेजा हरकत करने की कोशिश न करे। उसे पता था थोड़ी ही देर में उसके बाॅस यानी कि केशव शर्मा अपने आदमियों सहित यहाॅ पहुॅच ही जाएॅगे। अतः तब तक उसे इस जासूस को रोंके रखना था। मगर उसकी इन ऊल जुलूल बातों ने उसका सिर चकरा कर रख दिया था।

"क्या सोचने लगे प्यारे?" हरीश राणे उसे चुप देख कर कह उठा___"अरे भई चलाओ गोली मुझ पर और खत्म करो मुझे। तुम तो यार लगता है बस डींगे ही मारना जानते हो। जबकि मुझसे अब इन्तज़ार नहीं हो रहा।"

"ओये ज्यादा बकवास न कर समझा।" निरंजन ने उत्तेजित भाव से कहा___"वरना सच में तेरा राम नाम सत्य कर दूॅगा मैं।"

हरीश राणे कोई मामूली इंसान नहीं था। घुटा हुआ जासूस था, उसे समझते देर न लगी कि निरंजन उसे सिर्फ धमका रहा है। अगर उसे जान से मारना ही होता तो इतनी बातें न करता बल्कि कब का उसे यमलोक पहुॅचा दिया होता। अतः उसने पूरी सतर्कता से निरंजन की हर गतिविधी को नोट करते हुए बेख़ौफ निरंजन की तरफ बढ़ने लगा। ये देख कर निरंजन अंदर ही अंदर बुरी तरह घबरा गया। साथ ही उसके दिमाग़ ने काम करना भी बंद कर दिया। उसे समझ न आया कि ये साला अब उसकी तरफ क्यों बढ़ रहा है?

"ये...ये तू क्या कर रहा है मादरजाद?" बुरी तरह बौखलाते हुए निरंजन हकलाते हुए बोल उठा____"मैं कहता हूॅ रुक जा वरना सच में गोली मार दूॅगा तुझे।"

"मैं भी तो यही चाहता हूॅ प्यारे।" हरीश राणे ने मुस्कुराते हुए कहा___"मगर तुम हो कि मुझे जान से मारते ही नहीं। इस लिए अब मैं खुद ही तुमसे रिवाल्वर लेकर खुद को गोली मार लूॅगा। मुझे समझ आ गया है कि तुमसे रिवाल्वर चलाया नहीं जाएगा।"

"तू...तू पागल है क्या रे?" निरंजन हैरान परेशान सा बोल पड़ा___"देख मेरी तरफ मत आ। वरना अगर मेरा भेजा गरम हो गया न तो तू सच में मेरे हाॅथों मारा जाएगा।"

"नहीं प्यारे।" हरीश राणे बोला___"मुझे पता चल गया है कि अब तुम मुझे गोली नहीं मार सकते। क्योंकि तुम्हें मुझसे अचानक ही बेइंतहां मोहब्बत हो गई है। हाय, ये मोहब्बत भी न बहुत बुरी चीज़ होती है कम्बख़्त।"

"साले।" निरंजन उसकी बातों से बुरी तरह भन्ना गया, बोला___"तुझे एक बार में बात समझ में नहीं आती है क्या? अब अगर एक क़दम भी आगे बढ़ाया तूने तो देख लेना यहीं पर ढेर हुआ नज़र आएगा।"

"ऐसा ग़ज़ब मत करना प्यारे।" राणे चहका___"ऐसा लगता है कि तुम्हारी तरह मुझे भी तुमसे मोहब्बत हो रही है। ओह नहीं नहीं....मुझे किसी से भी मोहब्बत नहीं हो सकती। खास कर उससे तो हर्गिज़ भी नहीं जो खुद ही मेरी तरह औज़ार लिए फिरता हो।"

निरंजन बोला तो कुछ नहीं किन्तु उसे एहसास हुआ कि फालतू की बकवास करते हुए ये जासूस उसके काफी पास आ गया है। अभी निरंजन ये सोच ही रहा था कि अचानक ही मानो बिजली सी कौंधी। हरीश राणे ने हैरतअंगेज़ कारनामा किया था। पलक झपकते ही उसका जिस्म हवा में लहराया और इससे पहले की निरंजन कुछ समझ पाता राणे उसको लिए ज़मीन पर कई पलटियाॅ खाता चला गया। निरंजन के हाॅथ से रिवाल्वर जाने कब छूट गया था। अपने ऊपर हुए इस अप्रत्याशित हमले से निरंजन बुरी तरह बौखला गया था। जब तक उसे कुछ होश आया तब तक देर हो चुकी थी।

पलटियाॅ खाने के बाद राणे सबसे पहले उठा और फिर उसने निरंजन को कुछ भी करने का अवसर नहीं दिया। लात घूॅसों की बरसात सी कर दी उसने। निरंजन की चीख़ें फिज़ा में गूॅजती रही।

"हमने कहा था न प्यारे।" हरीश राणे निरंजन की छाती पर बैठा हुआ बोला___"कि तुमसे रिवाल्वर नहीं चलाया जाएगा। हमने तो ये भी कहा था कि हमें खत्म कर दो मगर नहीं तुम्हें तो हमसे मोहब्बत हो गई थी न। अब भुगतो मेरी जान। पीछे से वार करने वाला कायर बुज़दिल व हिंजड़ा होता है और ये सब बातें तुम में हैं, ये तुमने पहले ही साबित कर दिया था।"

अभी राणे ये सब निरंजन को बोल ही रहा था कि तभी वातावरण में वाहनों के आने का शोर गूॅजा। हरीश राणे ये महसूस करते ही बुरी तरह उछल पड़ा। उसने पलट कर देखा ही था कि निरंजन ने तेज़ी से एक मुक्का उसकी गर्दन के पास जड़ दिया। जिससे एक चीख़ के साथ राणे पलट कर नीचे गिर गया। उसके गिरते ही निरंजन उठा और सबसे पहले उसने राणे की पसली में बूट की ज़ोरदार ठोकर मारी। ठोकर लगते ही राणे दर्द से बिलबिला उठा।

इधर देखते ही देखते चारो तरफ से केशव जी ने तथा उनके आदमियों ने दोनो को घेर लिया। कुछ लोग दौड़ते हुए आए और हरीश राणे को पकड़ लिया। हरीश राणे समझ गया कि अब कुछ नहीं हो सकता। अतः उसने भी समझदारी का परिचय दिया और बिना कोई हील हुज्जत किये उनके द्वारा पकड़ कर ले जाने से चला गया। थोड़ी ही देर में वह केशव जी के आदमियों के बीच जीप में बैठा था। उसके दोनो हाॅथ पीछे की तरफ करके रस्सी से बाॅध दिये गए थे। उसका जो रिवाल्वर लड़ते वक्त निरंजन के हाॅथ से छूट कर गिर गया था उसे निरंजन ने फिर से उठा कर अपने पास रख लिया था। हरीश राणे को लिए वो काफिला वापस रेवती के लिए चल पड़ा था। केशव जी राणे को पकड़ कर बेहद खुश थे। उन्होंने निरंजन को इसके लिए शाबाशी दी तथा ये भी कहा कि उसने वास्तव में बहुत बड़ा काम किया है इस लिए उसे इसके लिए इनाम ज़रूर मिलेगा। निरंजन इनाम की बात से बेहद खुश हो गया था। इतना ही नहीं जासूस को पकड़वाने से उसका सिर गर्व से ऊॅचा हो गया था।

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उधर हास्पिटल में।

हम सब बुझे बुझे से बैठे थे। नीलम के लिए हर कोई चिंतित व परेशान था। हम में से किसी को भी ये उम्मीद नहीं थी कि अजय सिंह ऐसा कुछ कर सकता है। वरना ऐसा होता ही नहीं। ख़ैर, लम्बे इन्तज़ार के बाद आख़िर ओटी का दरवाजा खुला और डाॅक्टर बाहर आया। हम सब उसे देख कर एक साथ एक ही झटके से उस लम्बी चेयर से उठ कर खड़े हो गए थे। फिर लगभग एक साथ ही डाॅक्टर की तरफ लपके थे।

"डाॅक्टर साहब।" मैने उतावलेपन से किन्तु बेहद ही अधीर भाव से पूछा___"सब कुछ ठीक तो है न? नीलम ठीक तो है न?"

"डोन्ट वरी यंग मैन।" डाॅक्टर ने कहा___"वो अब ख़तरे से बाहर हैं। शुकर था कि बुलेट उनकी राइट साइड की पीठ पर थोड़ा निचले हिस्से पर लगी थी। अगर लेफ्ट साइड थोड़ा ऊपर लगती तो यकीनन वो गोली उनके दिल को भेद सकती थी। हमने बुलेट निकाल दिया है। अब वो ठीक हैं। थोड़ी देर बाद उन्हें दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया जाएगा तो आप सब उनसे मिल सकेंगे।"

"ओह थैंक्यू डाॅक्टर।" आदित्य बोल पड़ा___"थैंक्यू सो मच। आपने बहुत बड़े संकट से बचा लिया।"

"थैक्यू तो आप लोगों का भी करना चाहिए।" डाॅक्टर ने कहा___"जो आप वक्त रहते उन्हें यहाॅ लाने में कामयाब हो गए। वरना सचमुच कुछ भी हो सकता था। मुझे फोन पर एसीपी साहब ने इस बारे में बता दिया था और कहा भी था कि जैसे ही आप लोग यहाॅ आए वैसे ही हम उनका तुरंत इलाज़ शुरू कर दें।"

थोड़ी देर डाॅक्टर से और बातचीत हुई उसके बाद वो चला गया। हम सब अब खुश थे कि नीलम अब ठीक है। थोड़ी ही देर में एक नर्स आई उसने बताया कि हम नीलम से मिल सकते हैं। अतः उसके कहने के साथ ही हम सब लगभग दौड़ते हुए नर्स के पीछे पीछे गए और उस कमरे में दाखिल हो गए जिसमें नीलम को शिफ्ट किया गया था।

कमरे में पहुॅचते ही हमने देखा कि हास्पिटल वाले बेड पर नीलम करवॅट के बल लेटी हुई थी। उसका चेहरा दरवाजे की तरफ ही था किन्तु ऑखें बंद थी। हम लोगों के आने की आहट पाते ही उसने अपनी ऑखें खोल दी। जैसे ही उसने हमे देखा उसके चेहरे पर एक साथ कई तरह के भाव आए और फिर सहसा उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान फैल गई।

रितू दीदी व सोनम दीदी एक साथ ही उसकी तरफ बढ़ीं और उसके पास खड़ी हो गई। रितू दीदी ने नम ऑखों से उसके माथे से होते हुए सिर पर हाॅथ फेरा और फिर झुक कर उसके माॅथे को चूम लिया। उनके मुख से कोई लफ्ज़ नहीं निकला। कदाचित कुछ कहने की हिम्मत ही न हुई थी उनमें। किन्तु इस क्रिया से ही उन्होंने जता दिया कि उसके ठीक होने पर उन्हें कितनी खुशी हुई है। सोनम दीदी भी नम ऑखों से नीलम को देख रही थी।

"भगवान का लाख लाख शुकर है नील।" सोनम दीदी उसे प्यार से नील कहा करती हैं, बोलीं____"उसने तुझे कुछ नहीं होने दिया वरना जब तुझे गोली लगी थी न तो जैसे हम सबके जिस्मों से प्राण ही निकल गए थे।"

"ये ज़िंदगी उसी गंदे इंसान की दी हुई थी दीदी।" नीलम ने करुण भाव से कहा___"जिसे उसने गोली मार कर अपनी तरफ से अब खत्म कर दिया है। अब ये मेरा दूसरा जन्म है जिसमें अब उसका कोई हक़ नहीं है। बल्कि आप लोगों का है।" कहने के साथ ही नीलम ने रितू दीदी की तरफ देखा फिर बोली___"मुझे आप पर नाज़ है दीदी कि आपने राज का साथ दिया और सच्चाई का साथ दिया। आज आपकी ही वजह से हम सब उस शैतान से बच कर यहाॅ आ गए हैं।"

"साथ तो हमेशा उसी का देना चाहिए नीलम।" रितू दीदी ने कहा___"जिसका साथ देने से हमारे ज़मीर तथा हमारी आत्मा को तक़लीफ न हो बल्कि उन्हें तृप्ति का एहसास हो। माॅ बाप हमेशा वंदनीय होते हैं और वो मेरे लिए भी हमेशा रहेंगे किन्तु वो माॅ बाप जिनकी अच्छी छवि में मन में है ना कि वो जो अपनी ही बहू बेटियों के बारे में ग़लत सोचते हैं। थोड़ा बहुत जो सम्मान बाॅकी था उनके लिए वो आज की इन घटनाओं से पूरी तरह खत्म हो चुका है। अब इस दिल में उनके लिए सिर्फ और सिर्फ नफ़रत व घृणा है। आज अगर तुझे कुछ हो जाता न तो क़सम ऊपर वाले की मैं उस इंसान का वो हाल करती कि दुबारा इस धरती पर पैदा होने से इंकार कर देता।"

"जाने दीजिए दीदी।" नीलम ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा, फिर मुस्कुरा कर बोली____"एक तरह से ये अच्छा ही हुआ। इसी बहाने सही मगर मुझे आज अपने इस भाई का अपने लिए इतना सारा प्यार व तड़प तो देखने को मिल गई। मैं महसूस कर रही थी उस वक्त जब मैं इसकी बाहों में असहाय सी पड़ी थी। मेरे कानों में इसकी हर बात सुनाई दे रही थी। मैं सोच रही थी कि एक मेरा वो भाई था जिसने कभी ये नहीं जताया कि वो अपनी बहनों से कितना प्यार करता है और एक ये भाई है जिसे हमने बचपन से जलील करके दुख दिया आज वो मुझे उस हालत में देख कर ऐसे तड़प रहा था जैसे गोली मुझे नहीं बल्कि इसको लगी थी। ये ख़याल बार बार मन में आता है कि इतना प्यार करने वाले भाई से हमने अब तक इतनी घृणा कैसे की थी?"

"ओये बंदरिया।" मैं एकदम से उसके पास आकर बोल पड़ा____"ये क्या बकवास किये जा रही है तू? तुझसे मैं कोई प्यार, व्यार नहीं करता समझी। उस वक्त तो मैं वो सब नाटक कर रहा था।"

"चल ठीक है भाई।" नीलम ने मुस्कुरा कर कहा___"मान लिया कि वो सब तेरा नाटक था मगर सच कहूॅ तो मुझे वो तेरा नाटक भी बहुत भाया राज। मैं चाहती हूॅ कि तू जीवन भर मेरे साथ ऐसा ही नाटक करता रहे।"

"अब तुम दोनो यहीं पर न शुरू हो जाना।" सहसा सोनम दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा___"जाओ जाकर पता करो डाॅक्टर से कि हम इसे यहाॅ से कब तक ले जा सकते हैं?"

"अरे इसकी क्या ज़रूरत है दीदी?" मैने मुस्कुरा कर कहा___"मैं तो कहता हूॅ कि इसे यहीं पर पड़ी रहने देना चाहिए और हम लोगों को अब घर चलना चाहिए।"

"तू न अब मुझसे पिटेगा सच में।" सोनम दीदी ने ऑखें दिखाते हुए कहा___"अब जा जल्दी यहाॅ से।"

"जो हुकुम आपका।" मैने अदब से सिर झुका कर कहा और फिर कमरे से बाहर चला आया। मेरे पीछे पीछे आदित्य भी मुस्कुराता हुआ चला आया।

"मेरे भाई को इस तरह भगा कर आपने अच्छा नहीं किया दीदी।" सहसा नीलम ने कहा___"जब वो मुझे इस तरह चिढ़ाता है तो मुझे भी बड़ा अच्छा लगता है। मैं भी उसके जैसा ही बर्ताव करने लगती हूॅ। मैं चाहती हूॅ कि जिन चीज़ों के लिए वो बचपन से तरसा था वो उन सभी चीज़ों को आज जी भर के जिए। हमारी वजह से अब तक जितना उसका दिल दुखा है अब वो हमारे साथ ऐसी ही नोंक झोंक करके अपने उस दिल को खुश रखे।"

"मुझे पता है नील।" सोनम दीदी ने कहा___"मुझे भी अच्छा लगता है जब वो तुझे इस तरह बंदरिया कह कर चिढ़ाने लगता है। किन्तु मैं उसे ये सब कह कर इस लिए रोंक देती हूॅ कि मुझे भी बड़े होने का इस तरह से फायदा उठाने में मज़ा आता है। मैं ये देख कर खुश हो जाती हूॅ कि कैसे वो अपने से बड़ों की बात सहजता से मान जाता है। अब रितू से ही पूछ ले, ये तो उसके साथ ही रहती है। संभव है कि ये भी मेरी तरह अपने बड़े होने का फायदा उठाती हो। क्यों रितू सच कहा न मैने?"

"सबकी सोच अलग अलग होती है सोनम।" रितू दीदी ने कहा___"तुम दोनो को ऐसा करके खुशी मिलती है जबकि मेरा कुछ और ही हिसाब है। तुम तो जानती ही हो कि मेरा स्वभाव कैसा है?"

"हाॅ जानती हूॅ।" सोनम दीदी ने कहा___"कि तेरा स्वभाव हिटलर वाला है। मगर कभी खुद को बदल कर भी देख। संभव है कि कुछ नया नज़र आये।"

सोनम दीदी की इस बात पर रितू दीदी मुस्कुराई और कुछ पल के लिए कहीं खो सी गईं फिर जैसे उन्होंने तुरंत ही खुद को सम्हाला और ये कह कर बाहर की तरफ चली गईं कि उसे कुछ ज़रूरी फोन काल करना है। रितू दीदी के जाने के बाद सोनम दीदी ने वापस नीलम की तरफ देखा।

"तो आपको भी राज के साथ ऐसा करने में मज़ा आता है?" नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा।

"अरे नहीं रे।" सोनम दीदी ने अजीब भाव से कहा___"ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो ऐसे ही कह रही थी। ख़ैर छोंड़, अब तू ठीक है न? तुझे पीठ पर पेन तो नहीं हो रहा न अभी?"

"नहीं दीदी।" नीलम ने कहा___"अब अच्छा लग रहा है। बस सीधा लेटने में प्राब्लेम हो रही है।"

"वो तो होगी ही।" सोनम दीदी ने कहा__"अभी नया नया ज़ख्म है। इस लिए तुझे सीधा लेटने में कुछ दिन प्राब्लेम होगी। तुझे भी इस बात का ख़याल रखना होगा और हाॅ राज के साथ ज्यादा उछल कूद मत करने लगना। वरना तेरा ये ज़ख्म फिर से ताज़ा हो जाएगा।"

"ऐसा तो तभी संभव है दीदी।" नीलम ने मुस्कुराते हुए कहा___"जब वो मेरे सामने ही न आए। क्योंकि जैसे ही वो मेरे सामने आएगा। मैं फिर उसे छेंड़ूॅगी और फिर क्या होगा ये तो आप जानती ही हैं।"

"तू नहीं सुधरने वाली।" सोनम दीदी ने हैरानी से देखते हुए कहा___"अरे पागल कुछ दिन तो सबर कर ले।"

"हाय दीदी! कुछ दिन राज से झगड़ा किये बिना कैसे रह पाऊॅगी मैं?" नीलम ने आह सी भरते हुए कहा___"पता नहीं क्यों पर उससे झगड़ा करने का हर पल दिल करता है मेरा। मैं अकेले में सोचा करती हूॅ कि हर वक्त राज को छेंड़ना क्या अच्छी बात है? मगर ये सब सोचने के बावजूद ऐसा हो जाता है। आप ही बताइये मैं क्या करूॅ दीदी?"

सोनम दीदी नीलम की बात सुन कर बस मुस्कुरा कर रह गई। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले गए। जबकि उसकी मनोदशा से अंजान नीलम ने इस बार ज़रा गंभीरता से कहा___"एक बात कहूॅ दीदी??"

"हम्म कहो।" सोनम दीदी ने धीरे से कहा।

"काश! राज मेरा भाई न होता।" नीलम ने धड़कते हुए दिल के साथ कहा।

"ये...ये क्या कह रही हो तुम??" सोनम दीदी उसकी इस बात पर बुरी तरह चौंकी। ऑखों में हैरत के चिन्ह लिए वो बोलीं___"इसके पहले तो कह रही थी कि राज जैसा भाई पा कर तू बहुत खुश है। फिर अब ऐसा क्यों कह रही है?"

"हर लड़की सोचती है कि उसे ऐसा जीवन साथी मिले जो उससे बहुत ही ज्यादा प्यार करे।" नीलम ने कहीं खोये हुए से कहा___"उसकी केयर करे तथा उसे एक पल के लिए भी खुद से दूर न करे। उसे कभी किसी बात पर दुखी न होने दे। ये सारी खूबियाॅ राज में हैं दीदी। मुझे पता है कि वो अपनी बहनों पर अपनी जान छिड़कता है। मगर उसे देख कर ये ख़याल भी मन में आता है कि काश राज के जैसा ही हमें जीवन साथी मिले। मगर आज के समय में ये संभव नहीं है और अगर मान भी लें कि ऐसे इंसान इस दुनियाॅ में मिल भी सकते हैं तो क्या उनमें से कोई हमारा जीवन साथी बनेगा?"

"तो तू कहना क्या चाहती है?" सोनम दीदी के चेहरे पर सशंक भाव उभरे।

"आपको मेरी बातें यकीनन बुरी अथवा ग़लत लगेंगी दीदी।" नीलम ने उसी गंभीरता से कहा___"मगर ये सच है कि मेरे मन में कभी कभी ये ख़याल आता है कि काश राज मेरा भाई न होता तो मैं उसे ही अपना जीवन साथी बना लेती। राज को देखते ही उस पर निसार हो जाने का दिल करता है दीदी। उसे देख कर मैं भूल जाती हूॅ कि वो मेरा भाई है, और फिर जब ख़याल आता है कि वो मेरा भाई है तो जाने क्यों इस बात से दिल में दर्द होने लगता है? अंदर से एक टीस उभरती है और फिर समूचा जिस्म काॅप कर रह जाता है।"

"तू न कुछ भी बोलती रहती है।" सोनम दीदी ने बुरा सा मुह बनाया। ये अलग बात है कि नीलम की इन बातों से उसके अंदर एक अजीब से एहसास की झुरझरी सी दौड़ गई थी, बोली___"चल अब ज्यादा इस बारे में मत सोच। राज आता ही होगा अभी। तुझे यहाॅ से लेकर भी तो चलना है न।"

"आप मेरी बातों को नज़रअंदाज़ कर रही हैं न?" नीलम ने सोनम दीदी के चेहरे को ग़ौर से देखते हुए कहा___"ऐसा मत कीजिए न दीदी। एक आप ही हैं जिनसे मैं अपने दिल की हर बात कर सकती हूॅ। इस लिए मेरी बात सुन लीजिए और उस पर अपनी राय भी दीजिए कि मैं जो कुछ कह रही हूॅ वो सही है या ग़लत?"

"क्या राय दूॅ मैं?" सोनम दीदी ने नीलम की ऑखों में झाॅकते हुए कहा___"तूने तो सब कुछ कह कर ये ज़ाहिर कर ही दिया है कि तेरे मन में राज के प्रति अब क्या है? अब अगर मैं इस पर ये कहूॅ कि ये सब सोचना भी ग़लत है तो क्या फर्क़ पड़ता है उससे? इतना तो मैं समझ ही सकती हूॅ कि अगर राज के प्रति तेरे मन में ऐसे ख़याल आ चुके हैं तो इसका साफ मतलब है कि कहीं न कहीं तेरे दिल में राज के प्रति भाई वाली फीलिंग के अलावा भी एक अलग फीलिंग्स आ चुकी है। अतः ऐसी फीलिंग्स जब एक बार किसी के दिल में आ जाती हैं तो फिर उसकी सोच भी बदल जाती है। वो उसे ही सही मानता है फिर चाहे भले ही वो सबसे ज्यादा अनैतिक अथवा ग़लत हो।"

"मुझे पता है दीदी।" नीलम की ऑखें एकाएक ही सजल हो उठीं, बोली___"राज के प्रति ऐसी फीलिंग्स रखना ग़लत बात है। मगर ये भी सच है कि अब ये फीलिंग्स मेरे दिल से आसानी से जाएगी नहीं। इस लिए मैने अब एक फैंसला किया है।"

"फ..फैंसला???" सोनम दीदी चौंकी___"कैसा फैंसला?"

"यही कि मैं राज के क़रीब नहीं रहूॅगी।" नीलम ने दृढ़ता से कहा___"बल्कि उससे दूर चली जाऊॅगी। इस लड़ाई के बाद ये सच है कि मेरे माॅ बाप व भाई या तो ज़िन्दगी भर जेल की सलाखों के पीछे कैद हो कर रह जाएॅगे या फिर ऐसे भी हालात बन सकते हैं कि वो सब जान से मारे जाएॅ। तब तो हम दोनो बहनें अनाथ ही हो जाएॅगी। हलाॅकि इसके बाद भी मेरे अपनों में गौरी चाची, अभय चाचा और करुणा चाची आदि सब भी होंगे मगर इनके पास रहने से अक्सर मेरा सामना राज से होता ही रहेगा। उस सूरत में मेरे मन में ना चाहते हुए भी उसके प्रति आकर्शण बढ़ेगा जिसे शायद मैं रोंक भी नहीं पाऊॅगी। इस लिए बेहतर है कि इस सबके बाद मैं आपके साथ मुम्बई में मौसी के पास ही रहूॅ। राज से दूर रहने से कम से कम ये तो होगा कि धीरे धीरे मैं अपने दिल से उसे निकाल पाने में सफल हो सकती हूॅ।"

"इसका मतलब।" सोनम दीदी ने कहा___"ये सच है कि तू अपने ही भाई राज को अब एक प्रेमी की दृष्टि से देखने लगी है और उसके प्रति तेरे अंदर चाहत की भावना प्रतिपल बढ़ती ही जा रही है?"

"शायद यही सच है दीदी।" नीलम ने सहसा आहत भाव से कहा___"राज ने मेरी इज्ज़त की रक्षा जिस तरह से की थी उसके बाद से ही मुझे ये महसूस हुआ था कि राज के बारे में अब तक जो कुछ मैं अपने माॅम डैड के द्वारा पढ़ाए गए पाठ के तहत सोचती थी वो सब सिरे से ही ग़लत था। मेरे अंदर इस बात के एहसास होने के साथ ही राज के प्रति कोमल भावनाओं का उदय हुआ था। उसके बाद मुझे नहीं पता कि मैं उसके बारे में सोचते सोचते कब उसे चाहने लगी? जब उसने अचानक ही काॅलेज आना बंद कर दिया था तब मैं यही सोच कर रोती थी कि वो आज के समय में मुझसे कितनी नफ़रत करने लगा है कि अब उसने मेरी वजह से काॅलेज आना भी बंद कर दिया। ये सब सोच सोच कर मुझे अपने आप से घृणा होने लगी थी कि मैने अपने उस भाई का बचपन से दिल दुखाया जिसका कभी कोई दोष था ही नहीं। बल्कि उसके दिल में तो हम दोनों बहनों के लिए वैसा ही प्यार व सम्मान था जैसा उसके दिल में गुड़िया(निधी) के लिए है। उसके बाद जब वो दुबारा मेरी इज्ज़त की रक्षा करते हुए मुझे ट्रेन पर मिला तो एक बार फिर से मेरा अंतर्मन ये सोच कर ज़ार ज़ार रो पड़ा कि उसने एक बार फिर से मेरी इज्ज़त की रक्षा की। यानी उसके दिल में आज भी हम दोनो बहनों के लिए वही प्यार व सम्मान है और चाहता है कि हम दोनों को कभी कोई ऑच तक न आए। बस उसके बाद तो जैसे सब कुछ बदल गया दीदी। जब मैने ये महसूस किया कि वो मुझसे झगड़ा करते हुए फिर से अपने बचपन को जीना चाहता है तो मैंने भी उसकी चाहत में उसका पूरा साथ दिया। मुझे भी उसे खुश देखने में अच्छा लगने लगा। इन्हीं सब बातों के बीच ही शायद ऐसा हुआ है कि मेरे दिल में उसकी अच्छाई और खूबियों को देख कर ऐसी चाहत जागी है। आज जब उसने मुझे अपनी बाहों में समेटे तथा मुझे उस हालत में देख कर पागल हुआ जा रहा था तो मैं उस हालत में भी ये सोच रही थी कि ये इतना अच्छा कैसे हो सकता है? इससे कोई नफ़रत कैसे कर सकता है? बस उसके बाद मैंने पहली बार अपने दिल की आवाज़ को सुना और फिर उसकी हो गई। मुझे पता है कि ये ग़लत है। अगर राज को मेरे दिल की बात पता चल गई तो संभव है कि वो मुझे ग़लत समझ बैठे। वो सोचेगा कि जैसे माॅ बाप थे वैसी ही उसकी औलाद भी है। जो अपने ही सगे रिश्तों के प्रति ऐसी सोच रखती है।"

"अगर यही सब बात है।" सोनम दीदी ने कहा___"और अगर ये भी कि तुम उसकी हो गई हो तो फिर ये अचानक उससे दूर हो जाने का फैंसला क्यों किया तुमने? क्या सिर्फ इस लिए कि राज तुझे ग़लत समझेगा?"

"ये वजह तो है ही दीदी।" नीलम ने सहसा कुछ सोचते हुए कहा___"किन्तु एक दूसरी महत्वपूर्ण वजह और भी है।"

"दूसरी ऐसी कौन सी वजह हो सकती है?" सोनम दीदी के चेहरे पर सोचों के भाव नुमायां हुए।

"आपने शायद ग़ौर नहीं किया दीदी।" नीलम ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"किन्तु मैने बहुत अच्छे से ग़ौर किया है।"

"क्या मतलब??" सोनम दीदी चकरा सी गईं।

"आप और मैं।" नीलम ने कहा___"जिस रितू दीदी को हिटलर समझते हैं, उन्हीं हिटलर दीदी की ऑखों में आज मुझे उस वक्त थोड़ी देर के लिए कुछ खास नज़र आया जब आपने उनसे कहा था कि____'कभी खुद को बदल कर भी देख। संभव है कि कुछ नया नज़र आये।' उस वक्त उनकी ऑखों में पल भर के लिए एक टीस सी नज़र आई थी फिर उन्होंने जल्दी ही खुद को सम्हाल लिया था। कहते हैं कि चोंट के दर्द का एहसास वही कर सकता है जिसे कभी वैसी ह चोंट लगी हो। उस वक्त उनकी ऑखों में जो भाव थे उन भावों ने मुझे बता दिया कि वो दरअसल क्या है?"

"ये तू क्या अनाप शनाप बके जा रही है नील?" सोनम दीदी ने हैरत से कहा___"कहीं तू ये तो नहीं कहना चाहती है कि रितू भी राज से प्यार करती है? ओह माई गाड, ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं नहीं...रितू ऐसा नहीं कर सकती नील। वो एक सुलझी हुई तथा समझदार लड़की है। उसे पता है कि ऐसा सोचना भी पाप होता है।"

"प्यार तो हर मायने में पवित्र ही होता है दीदी।" नीलम ने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा___"फिर चाहे वो किसी से भी हो गया हो। दूसरी बात, जब किसी को किसी से प्यार हो जाता है न तब सबसे पहले उस इंसान का विवेक शून्य हो जाता है। प्यार में पड़ा हुआ इंसान उसी को सही मानता है जिसे आम इंसान अनैतिक व पाप की संज्ञा देता है। मैने रितू दीदी की ऑखों में उस पवित्र प्यार को देखा है दीदी। मुझे नहीं पता कि ये सब कैसे संभव हो सकता है? मगर ऑखें कभी ग़लत नहीं होती हैं। ख़ैर मुझे इससे कोई प्राब्लेम नहीं है बल्कि मैं खुश हूॅ कि मेरी जो दीदी लड़कों की ज़ात से नफ़रत करती थी तथा प्यार व्यार को बकवास कहती थीं आज वो खुद राज की चाहत में गिरफ्तार हैं। यकीनन उनकी सोच बदल गई होगी और अब उनके सीने में एक ऐसा दिल धड़कता होगा जो बहुत ही नाज़ुक हो चुका होगा तथा जिसमें किसी के लिए बेपनाह प्यार का सागर हिलोरें लेता होगा। अब जबकि मुझे इस बात का एहसास हो ही चुका है तो क्यों मैं उनकी राह का रोड़ा बनूॅ दीदी? मेरी दीदी के दिल में जीवन में पहली बार किसी के लिए ऐसी भावनाओं का उदय हुआ है। मैने देखा है कि वो सबसे हट कर रहती थी। उनका स्वभाव बहुत शख्त होता था। प्यार की भाषा से बात करना जैसे उन्हें आता ही नहीं था। मैं और शिवा उनसे बहुत डरते थे। यहाॅ तक कि डैड भी उनसे ज्यादा हॅसी मज़ाक नहीं करते थे। अतः अपनी उस दीदी को खूबसूरत प्यार के एहसास के साथ इस खूबसूरती से बदलता देख कर मैं कैसे उनकी खुशियाॅ छीनने का काम कर दूॅगी? नहीं दीदी, मैं अपनी दीदी की उम्मीदों को चकनाचूर नहीं कर सकती। उनकी पाक़ भावनाओं को नहीं कुचल सकती मैं। वरना वो यकीनन इस सबसे टूट कर बिखर जाएॅगी। इस लिए मैने फैंसला कर लिया है कि मैं इस सबके बाद वापस आपके साथ मुम्बई चली जाऊॅगी।"

"तू इतनी गहरी बातें कर सकती है यकीन नहीं होता नील।" सोनम दीदी की आवाज़ भर्रा गई___"तेरा इतना बड़ा दिल होगा मैने सोचा भी नहीं था। अपनी दीदी के लिए इतना बड़ा त्याग करना कोई मामूली बात नहीं है। इसके पहले मैं तेरी बातों से सचमुच तुझे ग़लत समझ बैठी थी किन्तु आख़िर की तेरी इस बात ने मुझे ये एहसास करा दिया कि ये प्यार भले ही अपने भाई से हो गया हो मगर इसमें कोई गंदगी तथा कोई पाप नहीं है।"

अभी सोनम दीदी ने ये कहा ही था कि तभी कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई और फिर मैं आदित्य के साथ अंदर आ गया। आते ही मैने अपने अंदाज़ में सबसे पहले नीलम को छेंड़ा जिस पर वह बस मुस्कुरा कर रह गई। उसके बाद मैंने उसे कहा कि डाॅक्टर ने कहा है कि हम तुम्हें ले जा सकते हैं। अतः अब चलो यहाॅ से। ख़ैर थोड़ी ही देर में मैं नीलम को लिए हास्पिटल से बाहर आया और कार की पिछली सीट पर उसे वैसे ही लेकर बैठ गया जैसे आते समय लेकर बैठा था। सोनम दीदी भी मेरे दूसरी साइड बैठ गईं। आदित्य कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा ही था कि रितू दीदी भी आ गईं। रितू दीदी के बैठते ही आदित्य ने कार को आगे बढ़ा दिया।

लगभग पंद्रह मिनट में ही हम रेवती में शेखर के घर के सामने पहुॅच गए। हम सब कार से बाहर आये। नीलम ने कहा कि वो अब ठीक है और खुद अपने पैरों पर चल सकती है। अतः मैने उसे सहारा देकर कार से बाहर ले आया। उसके बाद हम सब घर के अंदर आ गए। अंदर ड्राइंगरूम में नैना बुआ तथा बिंदिया काकी थी। नैना बुआ ने जैसे ही हम सबको देखा वो भाग कर आईं और नीलम को अपने गले से लगाया ही था कि नीलम के मुख से कराह निकल गई। दरअसल नैना बुआ ने नीलम की पीठ के उस हिस्से पर अपनी बाॅह का कसाव कर दिया था गलती से, जहाॅ पर उसे गोली लगी थी।

नीलम की कराह सुन कर नैना बुआ जल्दी से नीलम से अलग हुईं और फिर उससे माफ़ी माॅगने लगीं। उनकी ऑखों में ढेर सारे ऑसू थे। कदाचित केशव जी यहाॅ आए थे और उन्होंने बुआ को सब कुछ बता दिया था। यही वजह थी कि नैना बुआ नीलम को देख कर भागते हुए आईं थी। ख़ैर, उसके बाद मैं सोनम के साथ नीलम को सहारा देते हुए उसे उसके रूम में ले आया और बेड पर करवॅट के बल आहिस्ता से लेटा दिया। मेरे पीछे पीछे ही बाॅकी सब आ गए थे। बिंदिया काकी की भी ऑखों में ऑसू थे। रितू दीदी थोड़ी पीछे खड़ी हुई थीं, उनकी ऑखें हल्का सुर्ख नज़र आ रही थीं। ऐसा लगता था जैसे वो रोई हों। मैं उन्हें देख कर चौंका और ऑखों के इशारे से ही पूछा कि क्या हुआ आपको? जवाब में उन्होंने सिर हिला कर बताया कि कुछ नहीं बस ऐसे ही।

इधर नैना बुआ नीलम के पास ही बेड पर बैठ गईं थी और उससे थोड़ी बहुत बातें कर रही थी। साथ ही अपने भाई को बुरा भला भी कहे जा रही थी। मैं कुछ देर तक रूम में रहा और फिर आदित्य के साथ ही बाहर आ गया।

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उधर मंत्री दिवाकर चौधरी के आवास पर।

अजय सिंह इस वक्त उसके पास ही सामने वाले सोफे पर बैठा था। अभी कुछ ही देर पहले चौधरी उसे अपने सोर्स से तथा अपने वकील को लेकर ज़मानत पर छुड़ा कर लाया था। गुनगुन में नया नया आया एसीपी उसे काफी शख्त मिजाज़ लगा था। किन्तु चौधरी का तो ये इलाका ही था अतः वो खुद भी किसी से डरने वाला नहीं था। कहने का मतलब ये कि बड़ी आसानी से वो अजय सिंह को छुड़ा लाया था। इस वक्त अजय सिंह अपना मुह लटकाए बैठा हुआ था। ड्राइंग रूम में इस वक्त वो दोनो ही थे।

"इतनी शातिर दिमाग़ वाली बीवी के रहते हुए भी तुम इतनी बुरी तरह से मात खा गए ठाकुर।" सहसा चौधरी ने अजय सिंह की तरफ देखते हुए कहा___"हैरत की बात है। अच्छा होता कि तुम हमें इस मामले में पहले से बताए होते तो हम इसमें ज़रूर तुम्हारी मदद करते। हमारे दखल पर यहाॅ की पुलिस में इतनी हिम्मत ही नहीं होती कि वहाॅ जा कर तुम सबको गिरफ्तार कर लेती। हम बड़ी आसानी से तुम्हारे उस भतीजे को और तुम्हारी दोनो बेटियों को पकड़ लेते। उसके बाद तो उनका खेल खत्म ही हो जाना था।"

"डबल बैकअप का प्लान भी अपनी जगह कमज़ोर नहीं था चौधरी साहब।" अजय सिंह ने गंभीरता से कहा___"हमने उन सबको लगभग पकड़ ही लिया था। मगर हमारी उम्मीद से परे वहाॅ भारी संख्या में पुलिस फोर्स आ गई और सबकुछ हमारे हाथ से निकल गया।"

"इसमें यकीनन तुम्हारी ग़लती है ठाकुर।" चौधरी ने पुरज़ोर लहजे में कहा___"तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को इस बात पर भी ग़ौर करना चाहिए था कि तुम्हारी बेटी, तुम्हारी बेटी होने के साथ साथ एक पुलिस वाली भी है जो ऐसे हालात पर अपने डिपार्टमेंट से पुलिस फोर्स को भी बुलवा सकती है। उस सूरत में तुम्हें हमसे संपर्क करना चाहिए था। हम इस समस्या का तुरंत समाधान करते। हम मंत्रियों के पास ऐसे हालात में पुलिस फोर्स को मनचाही जगह पर ले जाने का बहुत आसान तरीका आता है। कहने का मतलब ये कि हम आनन फानन में किसी जगह का दौरा करते जहाॅ पर भारी मात्रा में हम पुलिस को अपने पास बुला लेते। पुलिस डिपार्टमेंट को इतना जल्दी इतनी पुलिस फोर्स वहाॅ पर भेजने के लिए सोचना पड़ जाता।"

"मैं मानता हूॅ चौधरी साहब।" अजय सिंह ने नज़रें चुराते हुए कहा___"कि मैने आपको इस बारे में न बता कर भारी ग़लती की है। वरना आज ऐसा नहीं होता। मगर इसमें भी मेरी आपके लिए एक पाक़ भावना ही थी। मैं चाहता था कि ये सब होने के बाद मैं आपके सामने आपके उन दुश्मनों को लाकर आपको सर्प्राइज दूॅगा और यही मेरी दोस्ती व वफ़ादारी का प्रमाण भी होता। मगर अफसोस ऐसा नहीं कर पाया मैं। इसके लिए आप मुझे माफ़ कर दीजिए मंत्री जी। आपने मुझे अपना समझ कर जेल से भी छुड़ा लिया। इसके लिए मैं जीवन भर आपका आभारी और ऋणी रहूॅगा।"

"कोई बात नहीं ठाकुर।" चौधरी ने कहा___"जीवन में हार जीत का खेल तो चलता ही रहता है। इस लिए इसमें ज्यादा चिंता करने की कोई बात नहीं है। इस सबके बाद भी हम उन लोगों को बहुत जल्द पकड़ लेंगे। क्योंकि हमने इस सबके लिए एक जासूस को लगाया हुआ है। आज उसी ने बताया था कि माधोपुर में क्या हो रहा था? उस समय के हालात के अनुसार हमें लगा कि तुम यकीनन उनको पकड़ लोगे और फिर उन्हें हमारे सामने ले आओगे। इसी लिए हमने भी कोई ऐक्शन नहीं लिया। बाद में उस जासूस ने बताया कि वहाॅ पर भारी मात्रा में पुलिस फोर्स आई और तुम सबको पकड़ कर ले भी गई तो हमने सोचा चलो कोई बात नहीं तुम्हें तो हम जेल से छुड़ा ही लेंगे। किन्तु हमने जासूस को ये भी कहा कि ठाकुर की बेटी को गोली लगी है तो वो लोग उसका इलाज कराने हास्पिटल ज़रूर जाएॅगे। उसके बाद वो उस जगह जाएॅगे जहाॅ पर उन लोगों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है। बस उसके ठिकाने का पता चलते ही हम उसे उसके ही ठिकाने पर घेर लेंगे। हम चाहते तो उन लोगों को हास्पिटल में भी घेर सकते थे किन्तु हमने ऐसा नहीं किया। क्योंकि हमें सबसे पहले अपने बच्चों को तलाशना था और ये तभी हो सकता था जब वो लोग हास्पिटल के बाद अपने ठिकाने पर जाते। हमने उस जासूस को इसी का पता लगाने के लिए लगा रखा है। वो हमें बहुत जल्द सूचित करेगा कि उन लोगों का ठिकाना कहाॅ है। उसके बाद हम अपने आदमी लेकर जाएॅगे और उसके ठिकाने पर धावा बोल देंगे।"

"ये तो बहुत ही अच्छा किया है आपने।" अजय सिंह के चेहरे पर एकाएक ही रौनक आ गई___"इसका मतलब ये हुआ कि हम पूरी तरह से हारे नहीं हैं। बल्कि बाज़ी अभी भी हमारे हाॅथ में हैं।"

"बिलकुल।" चौधरी ने मुस्कुरा कर कहा___"बस जासूस के फोन आने की देर है। जैसे ही उसका फोन आया और उसने हमें बताया वैसे ही हम यहाॅ से चल पड़ेंगे।"

"वाह चौधरी साहब।" अजय सिंह के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई___"मानना पड़ेगा आपको। आपने भी ऐसा कारनामा कर रखा है जिसके बारे में वो लोग सोच भी नहीं सकते हैं।"

अजय सिंह की बात पर चौधरी बस मुस्कुरा कर रह गया। कुछ देर उन दोनो के बीच और भी कुछ बातें हुईं उसके बाद अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर उसके आवास से अपने गाॅव हल्दीपुर के लिए निकल लिया। चौधरी ने उसे जाने के लिए अपनी एक जीप दे दी थी।

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अपडेट........《 59 》

अब तक,,,,,,,,

"ये तो बहुत ही अच्छा किया है आपने।" अजय सिंह के चेहरे पर एकाएक ही रौनक आ गई___"इसका मतलब ये हुआ कि हम पूरी तरह से हारे नहीं हैं। बल्कि बाज़ी अभी भी हमारे हाॅथ में हैं।"

"बिलकुल।" चौधरी ने मुस्कुरा कर कहा___"बस जासूस के फोन आने की देर है। जैसे ही उसका फोन आया और उसने हमें बताया वैसे ही हम यहाॅ से चल पड़ेंगे।"

"वाह चौधरी साहब।" अजय सिंह के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई___"मानना पड़ेगा आपको। आपने भी ऐसा कारनामा कर रखा है जिसके बारे में वो लोग सोच भी नहीं सकते हैं।"

अजय सिंह की बात पर चौधरी बस मुस्कुरा कर रह गया। कुछ देर उन दोनो के बीच और भी कुछ बातें हुईं उसके बाद अजय सिंह चौधरी से इजाज़त लेकर उसके आवास से अपने गाॅव हल्दीपुर के लिए निकल लिया। चौधरी ने उसे जाने के लिए अपनी एक जीप दे दी थी।

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अब आगे,,,,,,,

आदित्य के साथ जब मैं नीचे आया तो देखा ड्राइंग रूम में केशव जी बैठे थे। हम दोनो को देखते ही उनके होठों पर मुस्कान उभर आई। उसके बाद उन्होंने मुझसे नीलम के बारे में पूछा तथा ये भी कहा कि वो खुद उसे देखना चाहते हैं। अतः मैं उन्हें अपने साथ ऊपर नीलम के कमरे में ले गया। कमरे में पहुॅच कर उन्होंने सबके सामने ही नीलम को देखा और फिर बड़े प्यार से उससे उसकी तबीयत का पूछा। उनके पूछने पर नीलम ने भी बड़ी शालीनता से अपनी तबीयत के बारे में उन्हें बता दिया। उसके बाद वो कमरे से बाहर आ गए और मेरे साथ ही नीचे आ गए। नीचे आकर मैं आदित्य के साथ बैठा ही था कि रितू दीदी भी आ गईं।

"उस जासूस का क्या हुआ मौसा जी?" नीचे आते ही रितू दीदी ने केशव जी की तरफ देखते हुए भावहीन स्वर में पूछा___"क्या आप उसे पकड़ने में कामयाब हुए?"

"हमारी किस्मत बहुत अच्छी थी रितू बेटा।" केशव जी ने कहा___"जिसके तहत वो हमारे हाॅथ लग गया। मेरा वो आदमी जिसने हमें उसके बारे में फोन पर बताया था उसका नाम निरंजन वर्मा है। उसने बड़ी बहादुरी का काम किया है। उसने मुझे बताया कि अगर उस जासूस की बाइक के अगले पहिये की हवा न निकली होती तो वो हमारे हाथ न लगता।"

"ये आप क्या कह रहे हैं मौसा जी?" रितू दीदी के साथ साथ हम सब भी हैरान हो गए, फिर दीदी ने कहा___"उस जासूस की बाइक की वजह से वो हमारे हाॅथ लगा है?"

रितू की इस बात पर केशव जी ने निरंजन और उस जासूस की सारी राम कहानी बताई। सारी बात सुनने के बाद हम तीनों ही चकित रह गए थे। कुछ देर तक कोई कुछ न बोला।

"ये तो बड़े ही आश्चर्य की बात है मौसा जी।" मैने सोचने वाले भाव से कहा___"उस जासूस की बाइक के अगले पहिए में हवा नहीं थी इस लिए वो उतने समय तक वहाॅ रुका रहा। आपका वो आदमी भी वाकई में बड़ा काम का साबित हुआ। उसने उस जासूस को पकड़ने में अपनी जान तक दाॅव पर लगा दी। वरना अगर वो जासूस हाॅथ से निकल जाता तो यकीनन हमारे लिए बहुत बड़ा संकट हो सकता था।"

"बेशक।" केशव जी ने कहा___"अगर उसके बारे में हमें पता न चलता तो वो हमारा पीछा करता ही रहता और फिर जब उसे तुम लोगों के इस ठिकाने का पता चल जाता तो वह तुरंत ही मंत्री को सब कुछ बता देता। उसके बाद मंत्री क्या करता इसका तुम बखूबी अंदाज़ा लगा सकते हो।"

"अब इस मंत्री का खेल खत्म करना ही पड़ेगा।" सहसा रितू दीदी ने कठोर भाव से कहा___"मेरी चेतावनी के बावजूद इसने इतना बड़ा दुस्साहस किया और हमारे पीछे किसी जासूस को भी लगाया। अब तो इसका किस्सा खत्म करना ही पड़ेगा। बहुत हो गया अब।"

"मेरा भी यही ख़याल है दीदी।" मैने कहा___"कम से कम इससे इसकी तरफ से तो हम बेफिक्र हो जाएॅगे और फिर खुल कर तथा बेझिझक बड़े पापा से मुकाबला कर सकेंगे।"

"सही कहा तूने।" रितू दीदी ने कहा___"किन्तु उससे पहले हमें उस जासूस से मिलना भी होगा। उसे हम ऐसे ही नहीं छोंड़ सकते हैं। उसका भी कोई न कोई इंतजाम करना पड़ेगा हमें।"

"मेरे ख़याल से उसे हम तब तक अपने पास रखते हैं जब तक कि मंत्री का किस्सा खत्म नहीं हो जाता।" सहसा आदित्य कह उठा___"उसके बाद हम उसे छोंड़ सकते हैं। जब मंत्री ही नहीं रहेगा तो वो किसके लिए हमारे पीछे लग कर जासूसी करेगा?"

"आदी की बात एकदम करेक्ट है दीदी।" मैने कहा__"ऐसा ही करना चाहिए हमें।"

"आपका क्या कहना है मौसा जी?" रितू दीदी ने सहसा केशव की तरफ देखते हुए कहा___"ये तो सच है कि हम उस जासूस को मौजूदा हालात में छोंड़ नहीं सकते हैं और ना ही उसे जान से मारने का सोच सकते हैं। क्योंकि वो निर्दोष है। उसने वही किया है जो एक जासूस को करना चाहिए था। ये उसका पेशा ही है, अतः आप भी अपनी राय दीजिए कि क्या किया जाए?"

"देखो मैं तो एक ही बात जानता हूॅ बेटा।" केशव जी ने कहा___"कि ऐसे हर उस आदमी को खत्म कर दो जिससे हमें किसी प्रकार के ख़तरे का अंदेशा हो। किन्तु मामला चूॅकि एक जासूस का है इस लिए उसे खत्म करना ग़लत होगा। अतः मैं भी आदित्य की बात से सहमत हूॅ। यानी कि उसे तब तक यहाॅ कैद करके रखा जाय जब तक कि मंत्री का कल्याण नहीं हो जाता। मगर,

"मगर क्या मौसा जी?" रितू दीदी के माथे पर शिकन उभरी।

"मगर मुझे एक बात समझ नहीं आई।" केशव जी ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा___"और वो ये कि जब मंत्री के खिलाफ़ तुम्हारे पास ऐसा डायनामाइट जैसा सबूत है तो उसे अब तक छोंड़ क्यों रखा था तुमने? जबकि होना तो यही चाहिए था कि उसे तुरंत ही कानून की चपेट में ले लिया जाता।"

"आपका सोचना बिलकुल सही है मौसा जी।" रितू दीदी ने कहा___"किन्तु मंत्री को अब तक छोंड़े रखने के दो कारण थे। पहला ये कि उसे एहसास कराना था कि जब उसके खुद के बच्चों के साथ बहुत बुरा होता है तब कैसा महसूस होता है? दूसरा कारण ये कि उसके संबंध ऐसे ऐसे लोगों से हैं जिनकी पूर्ण जानकारी हमारे पास अभी भी नहीं है। ये तो लगभग सब जानते हैं कि वो कैसे कैसे ग़ैर कानूनी धंधा करता है किन्तु पुलिस के पास उसके खिलाफ़ ऐसे कोई सबूत नहीं हैं जिसकी वजह से उसे गिरफ्तार किया जा सके। मेरे पास भी उन वीडियोज के अलावा और कुछ नहीं है। मैं चाहती थी कि ये वाला मामला निपट जाने के बाद मंत्री के खिलाफ मौजूद उन सबूतों का पता करूॅगी। यही वजह थी कि मंत्री के मैटर को इतना लम्बा खींचना पड़ा। किन्तु अब ऐसा लगता है कि मंत्री को सबक सिखाना ही पड़ेगा। उसके सामने खुल कर जाना ही पड़ेगा और फिर उसकी ऑखों में ऑखें डाल कर उसे बताना पड़ेगा कि वो हमारा कुछ नहीं कर सकता है जबकि हम चाहें तो उसका कुछ भी कर सकते हैं।"

"ओह आई सी।" केशव जी ने कहा___"तो ये बात है। ठीक है फिर, जैसा तुम्हें बेहतर लगे वैसा करो। किन्तु हाॅ उससे पहले चलो उस जासूस से भी तो मिल लो तुम लोग। संभव है कि उससे भी कोई महत्वपूर्ण जानकारी मिल जाए।"

केशव जी की इस बात से हम सब सोफों से उठ कर खड़े हो गए और फिर केशव जी के साथ ही बाहर की तरफ चले गए। बाहर आकर हम सब केशव जी की कार में बैठ गए। आदित्य केशव जी के बगल में आगे की सीट पर बैठ गया था जबकि मैं और रितू दीदी पिछली सीट पर बैठ गए थे। हम सबके बैठते ही केशव जी ने कार को आगे बढ़ा दिया।

लगभग पाॅच मिनट बाद ही केशव जी ने कार को एक मकान के पास ले जाकर रोंका। कार के रुकते ही हम सब कार से बाहर आ गए। हम सबकी नज़र उस मकान पर पड़ी जिसके सामने के पोर्च पर एक लकड़ी का तखत रखा हुआ था और उसमे चार साॅवले रंग के आदमी बैठ कर ताश खेल रहे थे। कार की आवाज़ से ही उनका ध्यान हमारी तरफ गया था। जिससे उन चारों ने ताश खेलना बंद करके तखत से उतर गए थे।

हम तीनों केशव जी के पीछे पीछे मकान के पोर्च में आ गए। पोर्च में रुक कर केशव जी ने अपने एक आदमी से कहा सब ठीक है न? जवाब में आदमी ने बड़े अदब से हाॅ में सिर हिलाया। उस आदमी की हाॅ देख कर केशव जी मकान के अंदर की तरफ बढ़ चले। उनके साथ हम तीनों भी बढ़ चले थे।

ये मकान यूॅ तो पक्का ही था किन्तु इसकी हालत देख कर तथा केशव जी की छवि देख कर यही लगता था कि इस मकान पर केशव जी अपने आदमियों को रखते थे। या फिर उनके रहने की जगह ही यही थी। हलाॅकि सोचने वाली बात तो ये भी थी कि केशव जी का कैरेक्टर ऐसा क्यों था कि उनके अंडर में ऐसे ऐसे लोग थे और उनका हर कहा भी मानते थे? इस बारे में हम सबके दिमाग़ में सवाल तो उभरा था किन्तु केशव जी से इस बारे में पूछने का या तो समय ही नहीं मिला था हमें या फिर हम उनकी निजी ज़िंदगी में कोई हस्ताक्षेप ही नहीं करना चाहते थे। हमारे लिए यही बहुत था कि वो हमारी मदद कर रहे थे।

मकान के अंदर भी कुछ लोग नज़र आए हमें जो कि अलग अलग जगहों पर इस वक्त खड़े दिख रहे थे। बाहर से अंदर आते ही सबसे पहले एक छोटा सा हाल था उसके बाद दोनो तरफ तीन तीन कमरे बने हुए थे। सामने की तरफ ऊपर के फ्लोर में जाने के लिए चौड़ी सीढ़ी थी। उस सीढ़ी के अगल बगल भी एक एक कमरा था। केशव जी के साथ हम तीनो सीढ़ी के दाहिने साइड वाले कमरे की तरफ बढ़ गए।

केशव जी के कहने पर ही एक आदमी ने उस कमरे का ताला खोला और फिर उसके बाद दरवाजा भी खोला। ये देख कर हमें समझते देर न लगी कि केशव जी इस मामले में काफी होशियारी से काम ले रहे थे। ख़ैर कमरे के अंदर हम सब दाखिल हुए तो बाॅए साइड ही दीवार से सट कर खड़े उस जासूस पर हमारी नज़र पड़ी। उसके दोनो हाॅथ ऊपर की तरफ एक साथ मोटी रस्सी से बॅधे थे। इतना ही नहीं उसके मुख पर एक टेप भी चिपका हुआ था ताकि वह चीखे चिल्लाए न। उसके दोनो हाॅथ तो ऊपर की तरफ रस्सी से बॅधे हुए थे ही साथ ही उसके दोनो पैर भी अलग अलग दिशा में फैले हुए रस्सी से बॅधे थे।

ये कमरा अंदर से एकदम खाली था। जासूस की स्थित देख कर ये समझना ज़रा भी मुश्किल नहीं था कि केशव जी ने उसका तगड़ा इंतजाम किया था। उसे इस हालत में देख कर मैं केशव जी की समझदारी का कायल हो गया।

"आपने तो मेहमान का बहुत अच्छे तरीके से स्वागत कर रखा है मौसा जी।" मैंने जासूस की तरफ एक नज़र डालने के बाद केशव जी से कहा___"ख़ैर कोई बात नहीं। इनके मुह से ज़रा ये टेप तो हटाइए। इन महानुभाव की मनमोहक आवाज़ सुनने का बहुत दिल कर रहा है।"

मेरी बात पर केशव जी मुस्कुराए और फिर राणे के मुख से टेप निकाल दिया। टेप के हटते ही राणे गहरी गहरी साॅसें लेने लगा। यद्यपि टेप तो सिर्फ उसके मुख पर ही चिपकाया गया था, साॅस लेने के लिए उसकी नाॅक तो खुली ही थी।

"हाॅ तो मिस्टर डिटेक्टिव।" मैने उस जासूस के बिलकुल पास आते हुए कहा___"आप इज्ज़त से खुद ही सब कुछ बताएॅगे या फिर मुझे आपके मुख से कुछ भी उगलवाने के लिए कोई दूसरा हथकंडा इस्तेमाल करना पड़ेगा? हलाॅकि मुझे उम्मीद है कि आप खुद ही सब कुछ बता देंगे। क्योंकि आप जासूस हैं और आपको पता है कि ऐसी परिस्थितियों में क्या होता है? ख़ैर, मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूॅ कि जिस मंत्री के लिए आप जासूसी कर रहे थे वो इस प्रदेश का निहायत ही घटिया ब्यक्ति है। ऐसा कोई कुकर्म तथा ऐसा कोई जुर्म नहीं है जो वो करता न हो। यहाॅ तक कि दूसरों की बहू बेटियों के साथ ग़लत तो करता ही है साथ ही उनका सौदा भी करता है। मैं ये सब बातें आपसे इस लिए बता रहा हूॅ ताकि आपको भी पता होना चाहिए कि आप जिसके लिए हमारा बेड़ा गर्क करने चले हैं वो कैसा इंसान है? अपने ज़मीर को जगाइये जासूस महोदय। जीवन में रुपया पैसा कमाने के लिए और भी कई अच्छे रास्ते हैं। जासूस का मतलब ये नहीं होता कि आप किसी के लिए भी काम करना शुरू कर दें। बल्कि उस ब्यक्ति के लिए काम करें जिसे आप समझते हों कि ये अच्छा ब्यक्ति है तथा इसे किसी बुरे इंसान ने सताया है।"

मेरी ये बातें सुन कर वो जासूस कुछ न बोला। बस मेरी तरफ देखता रहा। उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए थे जैसे एकाएक ही वह किन्हीं विचारों के आधीन हो गया हो। मैं कुछ देर तक उसे देखता रहा।

"आपको पता है ये कौन हैं?" मैने रितू दीदी की तरफ इशारा करके उस जासूस से कहा___"ये मेरी बड़ी बहन हैं और पुलिस में इंस्पेक्टर हैं। इन्होंने जब ये जाना कि कानूनन ये मंत्री के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकती हैं तो इन्होंने कानून को अपने हाॅथ में ले लिया।इन्होंने इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं की कि इसके लिए इन्हें कानून खुद कठोर सज़ा दे सकता है तथा अगर ये मंत्री जैसे राक्षस इंसान के पकड़ में आ गईं तो मंत्री इनका क्या हस्र कर सकता है। कहने का मतलब ये कि अपनी जान को जोखिम में डाल कर इन्होंने मंत्री के खिलाफ बिगुल बजाया हुआ है। सिर्फ इस लिए कि इस प्रदेश से मंत्री दिवाकर चौधरी जैसे लोगों की गंदगी दूर हो सके तथा ऐसे लोगों से मासूम व निर्दोष जनता को निजात मिल सके। रुपया पैसा सबकी ज़रूरत है जासूस महोदय किन्तु उससे बढ़ कर अपनी जान भी प्यारी होती है। हम सब सच्चाई की राह पर चलने वाले वो इंसान हैं जिनके सिर पर क़फन बॅधा हुआ है।"

"ये सब तुम क्या बातें सुना रहे हो दोस्त।" सहसा आदित्य ने कहा___"क्या तुम समझते हो कि तुम्हारी इन बातों से इस जासूस के विचार बदल जाएॅगे। नहीं भाई, इन्हें तो सिर्फ पैसों से मतलब हैं। इन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि प्रदेश में आम इंसानों के साथ क्या अत्याचार हो रहा है? मैं तो कहता हूॅ कि इससे कुछ पूछना ही बेकार है। हमारे पास जो भी सबूत मंत्री के खिलाफ है उसी के आधार पर हम उसे धर लेंगे।"

"आप लोग क्या जानना चाहते हैं मुझसे?" सहसा जासूस गंभीर भाव से बोल पड़ा___"पूछो, मैं सब कुछ बताने को तैयार हूॅ। मुझे भी इस बात का अंदेशा है कि मंत्री के खिलाफ़ खुद पुलिस विभाग गुप्त रूप से लगा हुआ है। मुझे पता है कि मंत्री तथा उसके साथी बहुत ही अपराधी किस्म के इंसान हैं। तुमने मुझे एहसास करा दिया है कि वाकई मैं ग़लत ब्यक्तियों का साथ दे रहा था। तुमने बिलकुल सही कहा भाई कि जीवन में पैसा ही सब कुछ नहीं होता है।"

"तो फिर बताइये।" मैने मन ही मन हैरान होते हुए कहा___"कि मंत्री ने आपको किस किस काम के लिए हमारे पीछे लगाया था?"

"आप लोगों ने मंत्री को तथा उसके साथियों को इस लायक छोंड़ा ही नहीं है कि वो खुद इस मामले में कोई ऐक्शन ले सके।" जासूस ने कहा___"इस लिए उसने इस काम के लिए मुझे हायर किया। एक और महत्वपूर्ण बात है जो कि तुम्हारे लिए जानना बेहद ज़रूरी है। वो बात ये है कि मंत्री आपके ताऊ अजय सिंह के साथ भी मिला हुआ है। मैं अजय सिंह के ही पीछे लगा था और उसी का पीछा करते हुए मैं आज उस जगह पहुॅचा था जहाॅ तुम्हारा और अजय सिंह का आमना सामना हो रहा था। मैने उस सबकी सूचना फोन द्वारा मंत्री को दी थी। मंत्री को मैने कहा भी था कि वो अगर चाहें तो इस मौके पर खुद भी आकर तुम लोगों के साथ कुछ भी कर सकते हैं। मगर मंत्री ने शायद ये सोच कर इसके लिए बाद में मना कर दिया कि संभव है कि उस सूरत में तुम्हारे द्वारा उसके बच्चों का कुछ अहित हो जाता। इस लिए उसने मुझसे बस यही कहा कि मैं तुम लोगों के पीछे लग कर तुम्हारे ठिकाने का पता करूॅ। जैसे ही मेरे द्वारा उसे तुम लोगों के ठिकाने का पता चल जाता वैसे ही वो अपने दलबल के साथ तुम लोगों के ठिकाने पर धावा बोल देता।"

हरीश राणे की बात सुन कर हम सब बुरी तरह हैरान रह गए थे। हम सब ये जान कर चौंके थे कि अजय सिंह मंत्री से मिला हुआ है। इस तरफ तो हमने सोचा ही नहीं था और यकीनन ये हमारी सबसे बड़ी ग़लती भी थी। ख़ैर अब तो जासूस द्वारा हमें इस बात का पता चल ही चुका था।

"एक और बात।" तभी राणे ने फिर कहा___"जब मैने मंत्री से फोन पर बात की थी तो ये सवाल भी उभरा था कि संभव है कि अजय सिंह उसे धोखा दे रहा हो। क्योंकि उसने मंत्री को बताए बिना ही तुम सबको पकड़ने के लिए वो सब किया था। जबकि मंत्री से हुई दोस्ती के अनुसार उसे उस सबके बारे में मंत्री से बताना चाहिए था। इस बात पर मंत्री ने कहा था कि अगर अजय सिंह सचमुच उसे धोखा दे रहा है तो वो उसे इसके लिए सज़ा ज़रूर देगा। किन्तु अगर उसने ये सब ये सोच कर किया है कि बाद में वो हमें अपने भतीजे को तथा अपनी बेटी को हमारे सामने ले आएगा और अपनी दोस्ती का प्रमाण देगा तो यकीनन हम उसे जेल से भी छुड़ाएॅगे। मंत्री की इस बात से तुम लोग समझ सकते हो कि अजय सिंह जेल से उसके द्वारा छूट भी सकता है। अगर ये कहूॅ तो भी ग़लत न होगा कि वो अब तक छूट ही गया होगा।"

"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम?" केशव जी ने पूछा।

"सीधी सी बात है।" राणे ने कहा___"बात चाहे जो भी हो किन्तु मंत्री एक बार अजय सिंह से मिलना ज़रूर चाहेगा और मिल कर ये भी जानना चाहेगा कि उसने वो सब कारनामा उसको बिना बताए कैसे अंजाम दिया था? क्या इसके पीछे उसकी गद्दारी थी या फिर कुछ और? मंत्री की इस बात पर अजय सिंह ज़रूर यही कहेगा कि वो ये सब करके अपने भतीजे और अपनी बेटी को उसके सामने ले आकर उसे सरप्राइज के रूप में तोहफा देना चाहता था। किन्तु ऐसा हो न सका। अजय सिंह की ये बात सुन कर मंत्री को भी लगेगा कि अजय सिंह वास्तव में उसके लिए ये सब पाक़ भावना से करना चाहता था। अतः ये सोच कर मंत्री उसे जेल से ज़रूर छुड़ाएगा। जिस समय मैने उसे फोन पर अजय सिंह को पुलिस द्वारा ले जाने के बारे में बताया था। उस समय और अब के समय के बीच कई घंटों का फर्क़ हो चुका है। इस लिए ये संभव है कि अब तक मंत्री ने अजय सिंह को जेल से छुड़ा ही लिया होगा।"

"हम भी तो यही चाहते हैं जासूस महोदय।" मैने मुस्कुराते हुए कहा___"कि वो जेल से छूट कर फिर से बाहर आ जाए और इसी लिए रितू दीदी ने उसके छूट जाने का इंतजाम भी किया हुआ था।"

"क्या मतलब।" हरीश राणे बुरी तरह चौंका___"भला तुम लोग ऐसा क्यों चाहते हो? बात कुछ समझ में नहीं आई। ये सब क्या चक्कर है?"

"मंत्री को और अजय सिंह को अगर जेल में सड़ाना ही होता।" मैने कहा___"तो ये काम तो हम बहुत पहले ही कर चुके होते। मगर ऐसा किया नहीं क्योंकि इनके गुनाहों की सज़ा हम अपने तरीके से ही देना चाहते हैं। रितू दीदी ने पुलिस कमिश्नर से जब पुलिस प्रोटेक्शन की बात की तभी ये तय हो गया था कि अजय सिंह को सबके साथ पकड़ कर ले तो जाएॅगे मगर उस पर कोई केस नहीं बनाया जाएगा। केस न बनने से अजय सिंह का जेल से छूट जाना आसान ही हो जाना था। वरना आप खुद सोचिए जासूस महोदय कि उसने तो अपनी ही बेटी को जान से मारने की कोशिश की थी वो भी एसीपी के रिवाल्वर से। उस सूरत में तो वो लम्बे से नप सकता था। एसीपी रमाकान्त शुक्ला तो गुस्से में आकर अजय सिंह पर केस बनाने के लिए तैयार भी हो गया था किन्तु कमिश्नर साहब ने इसके लिए उसे मना कर दिया। वरना अगर केस बन जाता तो मंत्री इतनी सहजता से अजय सिंह को छुड़ा न पाता। उसकी पहुॅच का भी कोई असर न होता। क्योंकि एसीपी कोई मामूली ब्यक्ति नहीं था। उसे केन्द्र से भेजा गया है, इस लिए उसके काम में किसी की भी दखलअंदाज़ी नहीं चलती।"

"अगर ऐसी बात है।" राणे ने कहा___"तो फिर वो इस सबके लिए राज़ी कैसे हो गया? मेरे कहने का मतलब ये है कि जैसा कि तुमने कहा कि एसीपी को केन्द्र सरकार ने भेजा है तथा उसके काम में कोई हस्ताक्षेप भी नहीं कर सकता तो फिर ये कैसे हो गया कि उसने अजय सिंह पर कमिश्नर के मना कर देने पर केस ही नहीं बनाया? जबकि उसे तो इस मामले में शख्त से शख्त कार्यवाही ही करनी चाहिए थी।"

"वो यहाॅ शख्त कार्यवाही के लिए ही आया था।" रितू दीदी ने हस्ताक्षेप किया___"किन्तु कमिश्नर साहब ने उसे यहाॅ के सारे हालातों के बारे में बताया, ये भी कि कैसे मैं अपने ही माॅ बाप के खिलाफ हूॅ और कैसे मंत्री का काम तमाम करने के काम पर लगी हुई हूॅ? सारे हालातों पर ग़ौर करने के बाद वो इसके लिए तैयार हो ही गया। दूसरी बात ये भी थी कि उसे यहाॅ भेजा ही इस लिए गया है कि वो मंत्री जैसे लोगों की गंदगी को इस प्रदेश से मिटा सके और ये काम तो मैं कर ही रही हूॅ। उसे तो इस प्रदेश की गंदगी मिटाने से मतलब है फिर चाहे वो किसी भी तरीके से मिटाई जाए।"

"ओह तो ये बात है।" राणे को जैसे सब कुछ समझ आ गया था, फिर बोला___"किन्तु शुरू में मैने महसूस किया था कि मैने जब मंत्री और अजय सिंह के एक होने की बात बताई तो तुम सब उस बात से हैरान हो गए थे। इसका मतलब ये हुआ कि तुम लोगों को इस बात का अंदेशा तक नहीं था कि अजय सिंह और मंत्री आपस में मिले भी हो सकते हैं?"

"कमिश्नर साहब ने फोन पर मुझे ये ज़रूर बताया था।" रितू दीदी ने कहा___"कि मंत्री ने उन्हें फोन किया था तथा फोन पर वो ऐसे सवाल जवाब कर रहा था जैसे ये जानना चाहता हो कि पुलिस गुप्त रूप से कहीं उसके पीछे तो नहीं लगी हुई है। उसने बातों बातों में इस बात को भी पूछा था कि हल्दीपुर के ठाकुर अजय सिंह को पुलिस पकड़ कर ले गई है तो ये सब क्या चक्कर है? उसने कमिश्नर से घुमा फिरा कर ये भी कहा कि सुना है कि अजय सिंह की बेटी पुलिस में है और अपने बाप के खिलाफ भी है। मंत्री के पूछने पर कमिश्नर साहब ने यही कहा कि ये सब पारिवारिक मामला है अतः उन्हें इस बारे में ज्यादा पता नहीं है। कहने का मतलब ये कि ये तो समझ में आया कि मंत्री ने कमिश्नर से अजय सिंह का ज़िक्र किया मगर उसकी बातें ऐसी थी कि उससे इस बात का अंदेशा उस वक्त मुझे न हो पाया था कि वो अजय सिंह से वास्तव में मिला हुआ ही हो सकता है। दूसरी बात ये कि मेरे मुखबिरों ने भी ऐसी किसी बात का ज़िक्र नहीं किया। जबकि मैने तो दोनो के ही पीछे मुखबिर लगाए हुए थे।"

"कमाल की बात है।" राणे मुस्कराया___"कैसे मुखबिर थे जो ये भी न पता लगा सके कि अजय सिंह और मंत्री कब कहाॅ किससे मिलते हैं? जैसा कि तुमने बताया कि तुमने इन दोनो के पीछे मुखबिर लगाया हुआ था तो ये कैसे हो सकता है कि तुम्हारे मुखबिरों को इन दोनो की गतिविधियों का पता ही न चल सके? अजय सिंह के पीछे लगा हुआ मुखबिर बड़ी आसानी से पता लगा सकता था कि वह कब कहाॅ जाता है? यानी अगर वो मंत्री से मिलने उसके आवास पर जाता तो क्या ये सब उस मुखबिर ने अपनी ऑखों से नहीं देखा होता? इसका तो यही मतलब हुआ कि तुम्हारे मुखबिरों ने अपना काम इमानदारी से किया ही नहीं बल्कि तुम्हें धोखे में ही रखा।"

राणे की इस बात से रितू दीदी तुरंत कुछ बोल न सकीं थी। मैने भी हैरानी से उनकी तरफ देखा था। रितू दीदी के चेहरे पर कई तरह के भाव आए और चले भी गए। सहसा उनके चेहरे पर कठोर भाव उभर आए।

"यकीनन ऐसा ही है।" फिर उन्होंने गहरी साॅस लेकर कहा___"मेरे मुखबिरों ने अपना काम सही से नहीं किया। इसके लिए उन्हें कठोर दंड ज़रूर मिलेगा। दोनो तरफ की घटनाओं से इस बात की तरफ मेरा ध्यान भी नहीं गया। दूसरी बात मुझे अपने मुखबिरों से इस बात की उम्मीद भी नहीं थी कि वो कमीने ऐसी लापरवाही करेंगे।"

"चलो कोई बात नहीं रितू बेटा।" सहसा केशव जी ने कहा___"माना कि तुम्हारे मुखबिरों ने इस काम में थोड़ी नहीं बल्कि बहुत ही ज्यादा लापरवाही दिखाई किन्तु इससे हमें नुकसान तो नहीं हुआ न? अतः इस बात को छोंड़ो और अब ये सोचो की आगे क्या करना है?"

"मैं भी ये कहना चाहता हूॅ कि।" रितू दीदी के बोलने से पहले ही राणे बोल पड़ा____"अब आप लोगों को भी मुझे यहाॅ से जाने देना चाहिए। आप लोगों को मैने पूरी इमानदारी से सारी बातें सच सच बता दी हैं। अतः अब मुझे इस तरह यहाॅ कैद करके रखने का तो कोई मतलब नहीं बनता न।"

"ज्यादा होशियारी दिखाने की कोशिश मत करो जासूस महोदय।" मैने कहा___"माना कि आपने हमें सारी बातें सच सच बता दी हैं। मगर मौजूदा हालात में इसके बावजूद हम आपको यहाॅ से जाने नहीं दे सकते। क्योंकि इतना तो हम भी सोच सकते हैं कि आपने ये सब ये सोच कर बता दिया हमे कि सब कुछ सुनने के बाद हमें यही लगे कि अब आप हमारे ही हक़ में हैं और हमारा किसी भी तरह का नुकसान नहीं कर सकते हैं। इस लिए हम आपको छोंड़ देंगे। जबकि यहाॅ से छूटते ही आप पुनः अपना रंग बदल सकते हैं और हमारा काम तमाम करवा सकते हैं। इस लिए जासूस महोदय आपको छोंड़ देने का काम तो फिलहाल हम किसी भी सूरत में नहीं कर सकते। अतः आप अपने दिमाग़ से छूटने का ख़याल निकाल दें। किन्तु हाॅ हम ये वादा करते हैं कि यहाॅ आपको कोई तक़लीफ नहीं होने देंगे और जैसे ही मंत्री का काम तमाम हो जाएगा वैसे ही आपको भी यहाॅ से आज़ाद कर दिया जाएगा।"

"सबसे पहली बात तो तुम मुझे जासूस महोदय कहना बंद करो।" राणे ने कहा___"मेरा नाम हरीश राणे है। अतः मुझे राणे कह कर संबोधित कर सकते हो। दूसरी बात तुम बेवजह ही ये शक कर रहे हो कि यहाॅ से चूटते ही मैं ऐसा वैसा कुछ कर दूॅगा। मेरा यकीन करो यंग मैन, मुझे रियलाइज हो चुका है कि मैं जो कुछ भी अब तक मंत्री के लिए कर रहा था वो उचित नहीं था। मुझे पता है कि मंत्री और उसके सभी साथी जुर्म व अपराध करने वाले महान पापी हैं। इस लिए अब मैं उनके लिए कोई काम नहीं करूॅगा। बल्कि यहाॅ से छूटने के बाद मैं वापस अपने शहर लौट जाऊॅगा।"

"हो सकता है कि आपकी बातें सच ही हों मिस्टर राणे।" मैने कहा___"मगर चूॅकि आप एक जासूस हैं अतः आप भी समझ सकते हैं कि मौजूदा हालात मैं हम आपको छोंड़ देने का जोखिम नहीं उठा सकते। इस लिए आप इसके लिए हमे माफ़ करें और यहीं रहें।"

मेरी बात सुन कर राणे बेबस भाव से मुझे देखता रह गया। फिर एकाएक ही उसके होठों पर मुस्कान उभर आई, बोला___"सही कहते हो भाई। मैं समझ सकता हूॅ कि ऐसे हालात में तुम मुझे यकीनन छोंड़ देने का जोखिम नहीं उठा सकते। ख़ैर कोई बात नहीं, जैसा तुम्हें अच्छा लगे करो। और हाॅ मेरी तरफ से बेस्ट ऑफ लक इसके लिए।"

राणे की ये बात सुन कर हम सब मुस्कुराए और फिर केशव जी के इशारे पर एक आदमी ने पुनः राणे के मुख में टेप चिपका दिया। उसके बाद सभी आदमियों को कुछ ज़रूरी हिदायतें दे कर हम सब वहाॅ से बाहर की तरफ चल पड़े।

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उधर अजय सिंह जब हवेली पहुॅचा तो शाम के चार बज चुके थे। अजय सिंह को प्रतिमा ड्राइंग रूम में ही बैठी मिली थी। उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वो अपने पति के लिए कितनी चिंतित व परेशान थी। उसने अपनी वकील दोस्त अनीता ब्यास से फोन पर बात की थी। अनीता के पूछने पर उसने संक्षेप में कुछ बातें बताई थी उसे। उसकी उस दोस्त ने उसे आश्वस्त किया था कि वो चिंता न करे, वो उसके पति को छुड़ाने की पूरी कोशिश करेगी। उसने प्रतिमा से कहा था कि वो शाम को उससे मिलने भी आएगी।

इधर अजय सिंह जैसे ही ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ तथा प्रतिमा के बगल वाले सोफे पर बैठा वैसे ही कहीं खोई हुई प्रतिमा का ध्यान अजय सिंह की तरफ गया। उसे पहले तो यकीन नहीं हुआ किन्तु फिर एकाएक ही उसके चेहरे पर पहले हैरानी के भाव उभरे उसके बाद तुरंत ही खुशी के भावों ने उसका मुरझाया हुआ चेहरा ताज़े खिले गुलाब की मानिन्द खिला दिया।

"ओह अजय तुम आ गए।" खुशी से फूली न समाती हुई प्रतिमा ने मुस्कुराते हुए कहा था किन्तु तुरंत ही उसके चेहरे पर हैरानी व उलझन के भाव भी उभर आए, बोली___"मगर तुम वहाॅ से आ कैसे गए अजय? तुम्हें तो पुलिस का वो एसीपी गिरफ्तार करके ले गया था न? फिर तुम पुलिस से छूट कर आ कैसे गए? क्या पुलिस ने तुम्हें यूॅ ही छोंड़ दिया या फिर तुमने कुछ ऐसा वैसा किया है?"

"मैने कुछ भी ऐसा वैसा नहीं किया है प्रतिमा।" अजय सिंह ने सपाट लहजे में कहा___"बल्कि मुझे मंत्री जी ने पुलिस से ज़मानत पर छुड़ाया है। मगर...।"

"मगर क्या अजय??" प्रतिमा के माॅथे पर बल पड़ा।

"यही कि मंत्री का तो नाम ही है कि उसने मुझे पुलिस से छुड़ाया है।" अजय सिंह ने सोचने वाले भाव से कहा___"सच तो ये कि पुलिस मुझे खुद ही छोंड़ देना चाहती थी।"

"ये..ये क्या कह रहे हो तुम?" प्रतिमा हैरान___"भला पुलिस तुम्हें क्यों छोंड़ना चाहेगी? और....और ऐसा भला तुम कैसे कह सकते हो?"

"बेवकूफी भरे सवाल मत करो प्रतिमा।" अजय सिंह ने नाराज़गी के साथ कहा___"साधारण मामला होता तो सोचा भी जा सकता था कि पुलिस ने मामूली बात पर पकड़ा और फिर छोंड़ भी दिया। किन्तु ये मामला साधारण नहीं था। मैने एसीपी का रिवाल्वर छीन कर उसके सामने ही नीलम को गोली मारी थी। इस लिए इस अपराध के लिए तो मुझे लम्बे से नप जाना चाहिए था। मुझ पर साफ साफ अटेम्प्ट टू मर्डर का केस लगता। तुम अच्छी तरह जानती हो कि इस केस के तहत मेरा कानून से छूटना उस सूरत में तो नामुमकिन ही था जबकि उस संगीन अपराध का चश्मदीद गवाह खुद एसीपी ही था। इतने बड़े अपराध के बावजूद वो मंत्री मुझे बड़ी आसानी से छुड़ा लाया। वो साला समझता होगा कि ये सब उसके रुतबे तथा दबदबे का कमाल है जबकि ऐसा है नहीं। बल्कि सच्चाई यही है कि पुलिस खुद चाहती थी कि मैं सहजता से छूट जाऊॅ। इसका मतलब ये भी हुआ कि उस संगीन अपराध के लिए एसीपी ने मुझ पर कोई केस ही नहीं बनाया है।"

"बात तो तुम्हारी यकीनन सौ पर्शेन्ट सही है।" प्रतिमा के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभरे___"किन्तु सवाल ये है कि पुलिस ऐसा क्यों चाहेगी कि तुम उसकी गिरफ्त से आसानी से छूट जाओ? दूसरी बात, अगर पुलिस को तुम्हें इस तरह सहजता से छोंड़ ही देना था तो उस वक्त उसने तुम्हें गिरफ्तार ही क्यों किया था?"

"कमाल है।" अजय सिंह ने हैरानी से प्रतिमा की तरफ देखा, फिर बोला___"ये सब तुम पूछ रही हो प्रतिमा? जबकि तुम तो छोटी सी छोटी बात को पकड़ कर उलझी हुई बातों को सुलझाने में माहिर हो।"

"हाॅ मगर।" प्रतिमा ने कहा___"तब जब मन में तुम्हारे प्रति ऐसी चिंता नहीं होती। हलाॅकि सोच तो मैं अभी भी सकती हूॅ। किन्तु तुम खुद ही बता दो तो क्या बुराई है?"

"ये तो साबित हो चुका है कि।" अजय सिंह ने कहा___"विराज मुझसे कानूनी रूप से कोई बदला नहीं लेना चाहता। क्योंकि अगर उसे इस तरीके से लेना ही होता तो वो ये काम पहले ही कर लेता। यानी कि मेरे खिलाफ उसके पास जो सामान है उसे वो पुलिस को सौंप देता और बता देता कि ये सब उसके ताऊ यानी कि मेरा है। बस खेल खत्म। किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। मतलब साफ है कि वो जो कुछ भी करेगा अपने तरीके से तथा अपने बलबूते पर करेगा। नीलम व सोनम को यहाॅ से ले जाने वाला वाक्या जब सामने आया तो उसे बखूबी पता था कि हम उसके मंसूबों को नाकाम करने की जी तोड़ कोशिश करेंगे। ये सोच कर उसने भी अपने पक्ष को मजबूत किया। रितू ने उसे सुझाव दिया होगा कि अगर इसके बावजूद उसका पलड़ा कमज़ोर पड़ता है तो उस सूरत में वो पुलिस का सहारा लेगी। पुलिस फोर्स के आ जाने से सारा मामला ही उलट जाएगा और फिर वो बड़ी आसानी से नीलम व सोनम को अपने साथ ले जाएॅगे और कोई कुछ कर भी नहीं पाता। ऐसा हुआ भी। किन्तु उसे ये उम्मीद नहीं थी कि इस सबके बीच नीलम को मेरे द्वारा गोली भी मार दी जाएगी। उनका मकसद तो इतना ही था कि पुलिस के आने के आने के बाद जब मैं और मेरे आदमी कुछ नहीं कर पाएॅगे तो वो बड़े आराम से नीलम व सोनम को ले जाएॅगे और मेरे माॅथे पर एक और हार व नाकामी की मुहर लगा जाएॅगे। किन्तु नीलम को गोली लगने से मामला थोड़ा बिगड़ गया। उसे लगा कि सबके साथ मुझे गिरफ्तार तो होना ही था और फिर बाद मुझे छोंड़ ही दिया जाना था, किन्तु नीलम को गोली मार देने से केस बन जाने वाली बात हो गई थी। केस बन जाने की सूरत में मेरा पुलिस से छूटना मुश्किल हो जाता। जो कि विराज हर्गिज़ भी नहीं चाहता था। तब उसने रितू से कहा होगा कि वो कुछ ऐसा करे कि मुझ पर कोई केस ही न बने। उस सूरत में फिर जब कोई मुझे ज़मानत पर छुड़ाने आएगा तो मैं आसानी से छूट जाऊॅगा। विराज के इस सुझाव को या यूॅ कहो कि उसकी इस इच्छा को रितू ने तुरंत मान लिया होगा और फिर उसने ऐसा ही कोई इंतजाम कर दिया होगा। जिसका नतीजा ये निकला कि बाद में मंत्री मुझे बड़ी आसानी से छुड़ाने में कामयाब हो गया। दैट्स आल।"

"ओह तो ये बात है।" प्रतिमा ने कहा___"वैसे कमाल की बात है कि आज तुम्हारा दिमाग़ भी काफी शार्प साबित हुआ जो इतनी बारीकी से ये सब सोचा और इस सबका जूस निकाल कर भी रख दिया। मगर....।"

"अब क्या हुआ??" अजय सिंह बोल पड़ा।

"तुमने नीलम को जान से मारने की कोशिश क्यों की अजय?" प्रतिमा ने सहसा गंभीर होकर कहा___"उसने तो हमारे साथ ऐसा वैसा कुछ भी नहीं किया था। उस वक्त भी उसने तुमसे उस लहजे में सिर्फ इसी लिए बात की क्योंकि तुमने उससे बात ही ऐसे गंदे तरीके से की थी। तुम खुद सोचो अजय कि तुमने जीत के अहंकार तथा आवेश में आकर कितना ग़लत ब्यौहार किया था। सबके सामने तुम्हें अपनी ही बेटी से उस तरीके से बात नहीं करनी चाहिए थी। क्योंकि इसका असर हमारे ही आदमियों पर पड़ेगा। वो सोचेंगे कि जो इंसान सबके सामने अपनी ही बेटी के साथ ऐसी अश्लीलता और ऐसी कूरता कर सकता है वो वास्तव में कितना घटिया होगा। हाॅ अजय, इससे हमारी ही इमेज ख़राब होती है। कोई भी सभ्य लड़की ये बर्दाश्त नहीं कर पाएगी कि सबके सामने उसका ही बाप उससे ऐसी अश्लीलता से बात करके उसे जलील व शर्मसार करे।"

"यकीनन सच कह रही हो तुम।" अजय सिंह ने गहरी साॅस लेकर कहा___"बाद में मुझे भी एहसास हुआ कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मगर उस वक्त हालात ही ऐसे बन गए थे कि मैं आपे से बाहर हो गया था। एक तो मैं उस हरामज़ादे की बातों से तथा उसे देख कर पागल हुआ जा रहा था जिसने अब तक मुझे शिकस्त ही दी थी। साला ऐसे ऐसे डाॅयलाग बोल रहा था कि मेरे अंदर उन डायलाग को सुनकर उन्हें सहने की शक्ति ही नहीं बची थी। मुझे लग रहा था कि उस हराम के पिल्ले को कैसे भी करके खत्म कर दूॅ और ऐसा होता भी अगर वहाॅ पुलिस फोर्स न आ गई होती तो। मैं अंदर ही अंदर एक और हार व नाकामी से पागल व ब्यथित हुआ जा रहा था ऊपर से मेरी दोनो बेटियों ने सामने आकर जो कुछ कहा उसने मेरे गुस्से को और भी बढ़ा दिया था। रही सही कसर नीलम ने सबके सामने मुझे थप्पड़ मार कर पूरी कर दी थी। बस उसके बाद मैंने अपना आपा खो दिया और वो सब कर बैठा। तुम खुद अंदाज़ा लगा सकती हो प्रतिमा कि उस वक्त मैं किस मानसिक हालत में रहा होऊॅगा?"

"चलो ये सुन कर अच्छा लगा कि तुम्हें नीलम को गोली मारने वाली बात पर अपनी ग़लती का एहसास हुआ।" प्रतिमा ने कहा___"किन्तु क्या तुम्हारे मन में ये विचार भी उठा है कि तुम्हें एक बार नीलम का हाल चाल जान लेना चाहिए? कुछ भी हो आख़िर वो है तो हमारी बेटी ही।"

"नहीं प्रतिमा।" अजय सिंह का चेहरा एकाएक कठोर हो गया, बोला___"मेरे लिए मेरी दोनो बेटियाॅ अब मर चुकी हैं। इस दुनियाॅ में अब तुम्हारे और हमारे बेटे के अलावा मेरा कोई नहीं है। एक बात और आज के बाद तुम मुझसे उन दोनो के बारे में कोई भी बात नहीं करोगी। ये मेरी पहली और आख़िरी वार्निंग है।"

"मर्द कभी नहीं समझ सकता एक औरत की पीड़ा को।" प्रतिमा ने सहसा भारी स्वर में कहा___"मगर मुझे तुमसे उम्मीद थी अजय कि तुम मेरी पीड़ा को समझोगे।"

"कहना क्या चाहती हो तुम?" अजय सिंह ने अजीब भाव से प्रतिमा की तरफ देखा।

"तुम जानते हो अजय कि मैं आज भी तुमसे उतना ही प्यार करती हूॅ जितना पहले करती थी।" प्रतिमा ने कहा___"और मैं जाने कितनी बार तुम्हें अपने बेपनाह प्यार का सबूत भी दे चुकी हूॅ। तुम्हारे सिर्फ एक इशारे पर मैं पराए मर्द के नीचे खुशी खुशी लेट गई। कभी इसके लिए तुमसे शिकायत नहीं की और ना ही तुमसे नाराज़ हुई। तुम्हारी हर खुशी में मैने अपनी खुशी देखी। तुम्हारी तरह सबके लिए कठोर भी बन गई। मगर मैं एक औरत के साथ साथ एक माॅ भी हूॅ अजय। औलाद चाहे जैसी भी हो वो अपनी माॅ के लिए सबसे सुंदर व सबसे अनमोल होती है। मुझे अब तक इतनी ज्यादा तकलीफ़ नहीं हुई थी किन्तु इस हादसे से हुई है। मैं मानती हूॅ कि मेरी दोनो बेटियों ने हमारे खिलाफ जा कर ग़लत किया है मगर जब ये सोचती हूॅ कि उन दोनो ने ऐसा क्यों किया तब इस क्यों के जवाब को सोच कर ही दिल दहल जाता है। आख़िर अपने सामने तो इस सच्चाई को हमें भी मानना ही पड़ेगा न कि हमने अपनी ही बेटियों के साथ तथा बाॅकी सबके साथ ग़लत सोचा और ग़लत किया भी।"

"इन सब बातों को कहने का क्या मतलब है?" अजय सिंह ने कहा___"और....और आज अचानक ये बातें ही क्यों? नहीं प्रतिमा, अब इन सब बातों को सोचने का कोई मतलब नहीं है और सोचना भी नहीं। क्योंकि अब बात बहुत आगे निकल चुकी है। अब तो इसका फैसला दो पक्षों में से किसी एक पक्ष के खत्म हो जाने पर ही होगा। उसके पहले तो कुछ हो ही नहीं सकता। इसके पहले तो ये था कि मैंने ये सब अपने बीवी बच्चों के लिए किया किन्तु अब ये भी है कि जिन चीज़ों की ख्वाहिश थी उसे हर हाल में पूरा करना है। अगर मेरे द्वारा वो सब बरबाद हुए हैं तो उनके द्वारा मेरा भी तो बहुत कुछ नुकसान हुआ। इस लिए अब ऐसी बातें अपने ज़हन में मत लाओ। ख़ैर छोंड़ो, मुझे भी ज़रा फ्रेश होना है। एक बात और, चिंता की कोई बात नहीं है। विराज भले ही मुझे शिकस्त देकर चला गया है मगर बहुत जल्द उसका भी किस्सा खत्म होने वाला है। क्योंकि मंत्री ने उसके पीछे जासूस लगाया हुआ है। वो जासूस बहुत जल्द उसके ठिकाने का पता मंत्री जी को देगा उसके बाद मंत्री विराज के ठिकाने पर धावा बोल देगा। उस साले विराज के साथ साथ तुम्हारी दोनो बेटियों का भी खेल खत्म हो जाएगा।"

ये सब कहने के बाद अजय सिंह उठा और अंदर कमरे की तरफ बढ़ गया। जबकि उसकी बातें सुनने के बाद प्रतिमा पहले तो हैरान हुई फिर सामान्य हो कर बैठी रही। चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते रहे।

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