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औरत जो एक नदी है

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औरत जो एक नदी है

रचनाकार: जयश्री राय

मार्च का महीना - हमेशा की तरह उदास और उलंग... धूल के अनवरत उठते बवंडर के बीच पलाश की निर्वसन डालों पर सुलगते रंगों की अनायास खुलती गाँठें और हवा में उड़ते सेमल के रेशमी फूलों के दिन - सपनों के अँखुआने और निःशब्द झर जाने का वही वेमुरव्वत मौसम... ये सिरे से उदास हो जाने के दिन थे और मैं इसी अहसास में हर साँस जज्ब था जब मैंने उस कौंधती आँखोंवाली औरत को पहली बार देखा था - पतझड़ के अकेले फूल की तरह - मलिन और आँसुओं के नमक में घुली हुई, साथ ही विवर्ण और बेतरह उदास भी... पलकों की गहरी साँवली पाँत के बीच नीली लपटों में धधकती उन आँखों की चावनी में मानों अपरिहार्य मृत्यु का खुला निमंत्रण और जीवन का अंतहीन शोक था।

उसे देखकर मुझे मेरे अंदर की खामोश मुरादों और हवस का खयाल आया था। उन बेशक्ल अहसासों का जैसे जिंदा चेहरा थी वह - सुहाग के गाढ़े रंगों में लिपटी एक उदास जोगन की तरह... मैं उन दिनों जीना चाहता था, इसलिए एकदम से मरने के लिए तैयार हो गया। कुछ जिंदगियाँ मौत की कीमत पर ही मिलती हैं, उस क्षण का एकमात्र सच शायद यही था।

कायदे से मुझे उस सांघातिक क्षण की हर बात शब्द-शब्द याद होनी चाहिए थी, मगर हवा में ओर-छोर पसरे जादू के उस मौसम में बस उसकी वे दो दिपती हुई आँखें थीं और था मेरा पारा-पारा होकर गलता-बहता सर्वस्व... बीच में से लगता था, समय भी गुजरने से रह गया है। समय के कुछ अंश ऐसे ही विलक्षण होते हैं - बीतते हैं, मगर कभी नहीं बीतते, रह जाते हैं हमारे अंदर की किसी महफूज जगह में हमेशा-हमेशा के लिए, हमारे गुजर जाने तक, या शायद उसके बाद भी... हुआ-अनहुआ और तारीखों की लंबी फेहरिस्त के साथ!

एकबार मैंने उससे किसी अतरंग क्षण में पूछा भी था कि क्या उसकी आँखें हमेशा से ऐसे ही कौंधती रही हैं जो उसका नाम दामिनी रखा गया था। वह अपनी हँसी की उजली धूप से भर उठी थी - अरे नहीं, ये आग तो मैंने बहुत बाद में इकट्ठी की है। पहले तो बस आँखों में यकीन और सुकून हुआ करता था। यकीन - हर अच्छी चीज के होने का और सुकून उस कभी न खत्म होनेवाले खूबसूरत अहसास का अटूट हिस्सा होने का!

उसकी बातें ऐसी ही हुआ करती थी - उल्टी-पल्टी चलती हवा की तरह, न जाने किस पल किस तरफ का रुख अख्तियार कर ले। उसे बाँधने की चाह वस्तुतः खुद को बिखरा देने का पागलपन ही था। और एकदिन मैंने समझ लिया था, दामिनी के जीवन में मरने-जीनेवालों को प्रश्न करना छोड़ देना चाहिए। एक-दो बार की गलतियों के बाद मैंने ये कोशिश फिर कभी नहीं की थी।

मैंने जिस क्षण उसे देखा, उसी क्षण मानो मन उसका हो लिया। मेरे लिए अबतक का जहाँ जो कुछ भी था, एकदम से बेमानी होकर रह गया था। उसके पास जाने की अनिवार्यता मैंने अपनी पूरी सत्ता से महसूस ली थी। एक छोटे-से क्षण के सत्य ने अबतक के पूरे जीवन को झूठ में तब्दील कर दिया था। आसपास रिश्ते और चेहरे ताश के पत्तों की तरह ढह रहे थे। जिंदगी के सारे सपने, हलचल और उम्मीदें उस एक चेहरे के आसपास जाकर इकट्ठी हो गई थीं। एक बहुत बड़े शून्य में डूब रहा था मैं। अंदर कुछ शेष था तो बस कल्पना में उसकी मादक देहगंध और मसृन त्वचा का नमकीन स्वाद - मांस के जवान पौधे पर गंधाते बौर का दुनिर्वार निमंत्रण! मैं अंदर तक भीगा था, अपनी ही हवस के निरंतर रिसाव से। एक तटबंध के बँधते ही चाहना की पागल नदी दूसरा किनारा तोड़ देती थी। कैसा जुनून था कि मैं खुद को अपने अबतक के तमाम हासिलों के साथ फूँकने पर आमादा हो गया था! जिसे प्यार कहती है दुनिया, उसकी वास्तविक विडंबनाओं को क्या कोई समझता भी है...

उस पहली मुलाकात के दिन वह समंदर के किनारे शाम की नर्म पड़ती धूप में चुपचाप बैठी हुई थी। मैं उसे देखकर चलते-चलते ठिठक गया था। साथ में सबकुछ। कितना अद्भुत था वह दृश्य - आकाश, समंदर और वह - एक-दूसरे में घुलती हुई, एकाकार होती हुई-सी... मैं मंत्रमुग्ध-सा उसे देखता रह गया था। एक नीला जादू उसकी आँखों, समंदर और आकाश में एक-सा फैला था। मैं उसी की जद में था - नसों के संजाल में उसके हल्के, मादक रिसाव को महसूसते हुए - एकदम डिफेंसलेस और वलनरेवल। मैं जानता था, मैं अब आगे बढ़ नहीं पाऊँगा। मुझे रुकना ही था, न जाने कबतक के लिए... मैं उससे कुछ दूर एक सूखी जगह तलाशकर बैठ गया था। सामने की स्लेटी रेत एकदम गीली थी, उतरते हुए ज्वार के पद-चिह्न! छोटे-छोटे गुलाबी केकड़ों के निरंतर भागकर धँसने से उसमें डिंपल-से पड़ते जा रहे थे।

पीछे, पानी से काफी दूर एक-दूसरे पर आड़े-तिरछे ढंग से टिके ताश के पत्तों की तरह छोटी-छोटी हरी-भरी पहाड़ियों की तलहटी पर नारियल की सघन कतारें तेज हवा में दुहरी हुई जा रही थीं। चारों तरफ हवा में महीन रेत के कण उड़ रहे थे। समंदर के ऊपर जलबिंदुओं का सफेद कुहरा... पारदर्शी बादल की तरह - यह ज्वार का समय था। पानी उफन रहा था धीरे-धीरे। लहरों के शोर में जलपक्षियों की उदास पुकार घुली हुई थी।

न जाने ऐसे क्षणों में क्या होता है। समंदर का हाहाकार अंदर कहीं पछाड़ें खाने लगता है। एक अनाम उदासी से मन घिरने लगता है। मैंने फिर उसे देखा था - हरसिंगार-सी उजली काया - साँझ की ललछौंह धूप में केसर होती हुई... कमर तक लहराते हुए खुले बाल आग की सुनहरी लपटों की तरह बेतरतीब लहरा रहे थे। उन्हें देखकर किसी जंगल में लगी आग की याद हो आती थी - वही कौंध, वही लहक...

हर तरफ से निर्लिप्त और असंपृक्त वह ढलते हुए सूरज की तरफ अपलक देख रही थी - एक न देखती-सी दृष्टि से, शायद दृश्यों के पार कहीं... जाहिर है, वह किसी और दुनिया में थी - अपने आसपास के माहौल से एकदम कटी हुई... किसी एकाकी द्वीप की तरह।

अबतक उसके पाँवों के पास तक लहरें चढ़ आई थीं, पछाड़ें खाते, सिर धुनते हुए। उसकी गहरी चुप्पी को देखकर न जाने क्यों एकपल के लिए मेरे मन में यह पागल-सी इच्छा उत्पन्न हुई थी कि हाथ बढ़ाकर समंदर की लहरों को किनारे पर टूटने से रोक दूँ। उसके चेहरे पर ठहरे हुए उदासी और नीरवता के उस खूबसूरत इंद्रधनुष को मैं इतनी जल्दी टूटने देना नहीं चाहता था। न जाने इसके पीछे कितनी गहरी बारिश होगी, आषाढ़ का मेघिल आकाश होगा, साँवले, मटमैले दिनों की अछोर कतार होगी... उसे देखता हुआ मैं खो-सा गया था। समय का ध्यान तक नहीं रहा था।

इसी बीच सूरज का सिंदूर समंदर के सीने में उतरकर न जाने कब एकदम से घुल गया था। क्षितिज के ठीक पास आकाश का रंग गहरा गेरुआ हो रहा था। घर लौटते हुए पक्षियों की सुनहरी पाँत दूर-दूरतक झिलमिला रही थीं। उनके उजले पंखों में शाम का गहरा काशनी रंग था। अपने कपड़े झाड़कर उठते हुए मैंने सामने की ओर देखा था - दूर समंदर के सीने पर लंगर डाले हुए जहाजों का प्रतिबिंब पानी पर टूटता-बिखरता हुआ लहरों पर काँप रहा था। उनमें जलती हुई बत्तियाँ फिरते हुए दीयों की तरह जल की सतह पर झिलमिला रही थीं।

वह औरत भी अबतक उठ खड़ी हुई थी। हल्के नीले अंधकार में उसका माथा और दो कंधे ही चमक रहे थे। जैसे कुछ उजले कबूतर अँधेरे के सीने में सिमटकर बैठे हों... देह का निचला हिस्सा हवा के लहराते हुए साँवले समंदर में खो-सा गया था। तरल अंधकार में तैरता हुआ वह जैसे कोई गहरा नीला फूल हो... मैं उसे देखता रहा था। वह चलने लगी थी। और फिर कई कदम चलकर यकायक मुड़ी थी और मेरी ओर देखा था। वह मुझे स्पष्ट दिख नहीं रही थी, मगर मुझे उसकी नजरों का अहसास था। कोई अदृश्य उँगली मुझे चुपके से छू गई थी, अनायास देह में सिहरन-सी दौड़ने लगी थी। कितना जीवंत था ये अनुभव - अँगुलियों के पोरों पर धड़कता हुआ-सा...! ...मांसल! मैं जान गया था, हम दोनों के बीच कोई अबोला संवाद घटा है - संवेदना के पारदर्शी स्तर पर। शब्दों और भाषा से परे हम किसी न किसी स्तर पर एक-दूसरे तक पहुँचे है, फिर चाहे हमारे पाँवों ने कोई जमीनी फासला तय किया हो या न हो।

सामने नए चाँद की हल्की रोशनी में समंदर की लहरें झिलमिला रही थीं। किनारे के दृश्य अब एक स्याह, सपाट दीवार में तब्दील हो चुके थे। उसी में डूबा मैं कुछ पलों के लिए खड़ा रह गया था। और फिर चलते हुए उस जगह आ रुका था जहाँ थोड़ी देर पहले वह औरत बैठी हुई थी। रेत पर बड़े-बड़े अक्षरों में एक फोन नंबर लिखा हुआ था!

किसी सम्मोहन के गहरे नीले रंग में डूबता-उतराता उस दिन मैं अपने कमरे में लौटा था - बहुत कुछ खोने के साथ सबकुछ पा जाने की एक परस्पर विरोधी मनोदशा में घिरा हुआ - किसी अनचीन्हे गंध में डूबकर पूरी रात जागने और ख्वाब देखने के लिए...

मुझे याद है, कितनी भारी थी वह रात मुझपर। जैसे जिंदगी यकायक किसी तेज तूफान की जद में आ गई हो। पलभर में सबकुछ अस्त-व्यस्त हो गया था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था, क्या कुछ समेटूँ और किस तरह। मेले में खो गए किसी बच्चे की तरह मेरी हालत थी - परेशान और डरा हुआ!

बिस्तर पर लेटकर मैंने बहुत चुपके से अपनी ख्वाहिशों और मुरादों से उस चेहरे का मिलान किया था जो समुद्र तट से उठकर मेरे साथ मेरे कमरे तक बेआवाज चली आई थी और अब खिड़की पर खड़ी होकर, बिस्तर पर बैठकर मुझे ही अपलक तके जा रही थी। वह हू ब हू वही थी, जिसे मैं जानता न जाने कब से था, बस सिर्फ पहचानता नहीं था। वही आँखों की नीली नदी, वही रंगत की सुनहरी धूप और देहमन के वही अनवरत खिलते सुरभिले अमलतास... उसदिन पहली बार अहसास हुआ था, बेशक्ल-सी ख्वाहिशें हमारे अंदर एक पूरी दुनिया रचती रहती हैं और हम उनसे अनजान ईंट-पत्थरों को जोड़ने-सजाने में अपनी उम्र जाया कर देते हैं। उस रात नींद न जाने कब आई थी।

कमरे के तरल अंधकार में उसका चेहरा एक खिले हुए सूरजमुखी की तरह मुस्कराता रहा था - उसी सुनहली कौंध, गंध और लहक के साथ। एक अजीब-सी कैफियत ने मेरे पूरे वजूद को अपनी जद में ले लिया था। एक हादसा जो अचानक घटा था और अब मेरी जड़ों तक पहुँचते हुए मुझे बेघर कर रहा था। स्वयं पर ढीली पड़ती पकड़ का अहसास लिए मैं अपने आसपास सलाखें खड़ी करता रहा था, लकीरें खींचता रहा था, कितना असुरक्षित महसूस करने लगा था अचानक स्वयं को। बहते हुए साहिल पर ठिकाना बाँधना चाह रहा था, बार-बार बिखर जाने की त्रासदी से तो मुझे गुजरना ही था।

एक आकस्मिक प्रतीति ने मुझे विसन्न कर दिया था - मुझे उसके पास जाना ही पड़ेगा! एक तरफ सारे निषेध थे, वर्जनाएँ और विवेक था और दूसरी तरफ अकेला मन - सब पर भारी पड़ता हुआ, सारी सीमाबद्ध मर्यादाओं से परे... वह क्षण विस्मय और ग्लानि का था, मगर इन सबके बावजूद था - अपन पूरे वजन और शिद्दत के साथ! प्रेम जिस अनुभूति या करिश्मा का नाम है उसकी वास्तविक विडंबनाओं को आज शायद पहली बार इस गहराई से समझ पाया था। इस अनुभूति के घटने के साथ ही टूटने और कमजोर पड़ने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। मुझे प्रेम हुआ था या नहीं, मैं नहीं जानता, मगर एक गहरे असुरक्षा बोध और अव्यक्त पीड़ा ने मुझे रातभर घेरे रखा था। मैं अनचीन्ही खुशियों के बीच बेतरह उदास था, आँसुओं से भरा था, मगर गुनगुनाना चाहता था... बहुत कुछ पाया था, किनारे-किनारे तक भर आया था, मगर साथ ही न जाने क्या कुछ बहुत बेशकीमती हमेशा के लिए खो गया था। मैं लुटकर अमीर हुआ था! अब अपनी तलाश में कहाँ निकलूँ, सोच नहीं पा रहा था। कस्तूरी मृग की-सी दशा थी मेरी।

मैंने बिस्तर के उस खाली हिस्से को टटोला था जो अबतक मेरी पत्नी उमा का हुआ करता था। मगर अब वहाँ कोई नहीं था। मैं रिश्तों की एक भरी-पूरी दुनिया में एकदम से अकेला हो गया था। एक छोटे-से क्षण ने मुझसे मेरा आप, मेरा घर चुरा लिया था। मैं किससे शिकायत करता? सारा गुनाह मेरा - मेरे मन का - था। इल्जाम भी मुझपर आना था। मैं इनकार कैसे करता... मैं जानता था, मुझे उसके पास जाना होगा, मगर कब, ये बस समय की बात थी। इसी समय के कुछ पलों को अपनी मुट्ठी में समेटकर मैं ऊहापोह के एक विशाल सिंधु में डूब-उतर रहा था। किनारा सामने था - बहुत स्पष्ट, मगर मैं हर साँस लहरों की ओर लौट रहा था - सायास, सचेष्ट - कितना विवश था मैं...

उस फोन नंबर को लेकर उसके बाद मैं कई दिनों तक बेतरह परेशान रहा था। दो मन था, दो तरफ का खिंचाव। उसके पास होना चाहता था, उससे मिलना चाहता था। किसी वर्ज्य का दुर्वार आकर्षण हरपल अपनी तरफ बुलाता था तो कहीं एक निषेध बढ़ते कदमों के सामने अडोल चट्टान की तरह खड़ा हो जाता था। घर से सैकड़ों मील दूर होना संयम पर भारी पड़ रहा था। कई बार अपने पर अंकुश लगाने की मंशा से घर पर फोन लगा चुका था, मगर उमा की आवाज सुनते ही फोन रख देता था। उसका - उसकी आवाज का - सामना कर सकूँ, इतना भी ताव नहीं रह गया था अंदर। उमा की आवाज में अपनापन होता है। अपनापन से भी ज्यादा विश्वास... वह मुझपर भारी पड़ जाता है। उसे उठाने में मेरे कंधे असमर्थ हो गए-से लगते थे।

मन की दुविधा उस अनजान परिवेश में और भी भीषण हो उठी थी। इस शहर में आए मुझे मुश्किल से एक महीना ही हुआ था। बच्चों की पढ़ाई की वजह से परिवार को साथ नहीं ला पाया था। नौकरी ज्वाइन करने के बाद दो हफ्ते तक होटल में ही रहना पड़ा था। बाद में मिसेज लोबो के यहाँ पेइंग गेस्ट की जगह मिल गई थी।

एक कमरा और एक बॉल्कनी। बाथरूम, टॉयलेट कमरे के साथ ही संलग्र। दोनों शाम का खाना होटल में ही खाना पड़ता था। सिर्फ सुबह का नाश्ता मिसेज लोबो के यहाँ मिल जाता था। यह किराये में शामिल था।

शुरू-शुरू के दिन काफी उलझन भरे थे। व्यवस्थित होने में थोड़ा समय लगा था। अजनबी माहौल, भाषा और खान-पान को समझने-अपनाने में स्वाभाविक रूप से दिक्कत हो रही थी। ऑफिस में भी सबसे परिचय गहरा नहीं हुआ था।

अधिकतर शामों को ऑफिस के बाद अपने कमरे में लौटकर मैं उदास हो जाया करता था। एक कप चाय पीकर या तो लेट जाता था या बॉल्कनी में बैठकर सामने की सड़क पर लोगों और वाहनों की भागती-दौड़ती आवाजाही देखता रहता था। धीरे-धीरे शाम गहराती जाती और उसी के साथ मेरी उदासी भी। रात को सोने से पहले मैं बच्चों से और उमा से बात जरूर करता था। मैं जानता था, मेरा परिवार भी मुझे मिस कर रहा होगा। खासकर मेरी पत्नी उमा। मेरे पीछे घर, परिवार के उत्तरदायित्व को अकेले सँभालना उसके लिए जरूर काफी मुश्किल हो रहा होगा। वह फोन पर हर बात के लिए मुझसे पूछती रहती थी, मशविरा लेती रहती थी। बच्चों के सोने के बाद मुझे अपने अकेलेपन की बातें बताती थी। सुनकर मैं और भी उदास हो जाता था।

दामिनी को देखने के बाद तो मेरी उदासी की परतें और भी मोटी हो गई थीं। दफ्तर और नींद के बीच बचा रह गया ढेर सारा समय किसी सूरत काटना कठिन हो गया था। अपने परिवार को याद करने के साथ-साथ अब दामिनी को भुलाने की दुश्वार कोशिश भी करनी पड़ रही थी। स्वयं से दूर जाने के लिए, अपना ध्यान भटकाने के लिए जाने मैं क्या-क्या मशक्कतें करता रहता था, कैसी-कैसी वाहियात हरकतें अपनाता रहता था। कोई भी उपाय, कुछ भी उसके खयालों को मन से दूर करने में सफल हो पाया था या नहीं, यह एक अलग बात थी।

इसके बाद मैं शामों को अक्सर समुद्र तट पर जाने लगा था। वहाँ मेरा समय बीत जाता था। गहरे स्लेटी रंग की गीली रेत पर नंगे पाँव चलना और घंटों बैठकर सूर्यास्त देखते रहना। वह एक अलग ही दुनिया थी! पानी का रंग आकाश और समय के साथ बदलता रहता था - कई-कई शेड्स में - हल्के से गहरा, और गहरा... जिंदगी में मैंने पहली बार आकाश और पानी के इतने सारे रंग देखे थे, हर पल बदलते और गहराते हुए - हल्का नीला, फिरोजी, मयूरकंठी... सूरज की सफेदी में पहले हल्के, पीले रेश पड़ते, फिर बासंती रंग में केसर घुलता और अंत में गहरा सिंदूरी, रक्तिम आँच में सूरज का गोला दहक उठता। फिर धीरे-धीरे कुमकुम की बिंदी-सा लाल सूरज ठंडा होकर पानी में बूँद-बूँद पिघलकर पूरी तरह घुल जाता। लहरों का इस्पाती नीला, ताँबई और सुनहरा आँचल चमकते हुए शनैः-शनैः एक शीतल आग में तब्दील हो जाता और फिर म्लान होते-होते आखिर में बुझ जाता - अपने पीछे गहरा गेरुआ, काशनी, प्याजी और न जाने कितने अनाम, अजाने रंग आकाश में छोड़ते हुए।

ऐसे समय में न जाने क्यों मन एक रूमानियत भरी उदासी में डूब जाता है। अपनी निसंगता का बोध और उग्र होकर सालने लगता है। क्षितिज में अपने-अपने नीड़ों की तरफ लौटती हुई पक्षियों की धुँधली कतार को देखकर अपने घर की याद हो आती है। आत्मीयता और निकटता के लिए एक कलप-सी उठती है, कहीं अंदर कुछ टीसने लगता है रह-रहकर।

कितने लोग होते हैं समुद्र तटपर - देशी-विदेशी शैलानी, जिनमें अधिकतर विदेशी ही होते हैं। उन्हें देखकर लगता है, प्रकृति की सुंदरता का उपभोग करना सही अर्थों में उन्हें ही आता है... समंदर का आनंद उठाने के उनके अंदाज अनोखे होते हैं। धूप, हवा, पानी के साथ मिलकर जैसे एक हो जाते हैं। घंटों धूप में सन क्रीम लगाकर अपना रंग साँवला करने के लिए पड़े रहना, लहरों के ऊपर झूले डालकर उसमें लेटकर किताबें पढ़ना... नमकीन पानी में डूब-डूबकर बादामी हो जाते हैं और दिन-दुनिया से बेखबर होकर सबके सामने निःसंकोच आकाश के खुले चँदोवे के नीचे अपने साथी से टूटकर प्रेम करते हैं। यह सबकुछ नया है मेरे लिए। उत्सुकता होती है, देखता रहता हूँ। और इसी तरह कभी-कभी बहुत कुछ भूल जाता हूँ।

एक समय के बाद, देर शाम गए मैं चुपचाप उठकर वहाँ से चला आता हूँ - अपने कमरे के अकेलेपन में! एक और उदास रात बीताने के लिए... उस अनजान औरत की एक झलक ने मुझे कितना अकेला कर दिया था - रिश्तों की एक भरी-पूरी दुनिया में - अपने घर और जीवन में! क्यों किसी का होना या न होना इनसान को इस तरह से निसंग बना देता है? मैं चलता हूँ और हर मोड़पर मुड़कर देखता हूँ, दिन में कई-कई बार अपना मेल चेक करता हूँ, घड़ी की तरफ देखता हूँ, मोबाइल के मैसेज पढ़ता हूँ, कैलेंडर में तारीखों के नीचे निशान लगाता हूँ। न जाने किसकी चिट्ठी, किसका फोन आना है। कौन न जाने कब दरवाजा खटखटानेवाला है... कौन था जो आनेवाला था, मगर नहीं आया! अंदर निराशा के काले बादल घुमड़ते हैं, अँधेरा छा जाता है। अवसाद की एक प्रच्छन्न अनुभूति रातदिन अंदर बनी रहती है, मन मेघिल आकाश-सा अवसन्न, धूसर प्रतीत होता है। इनसे छूट जाना चाहता हूँ, मगर स्वयं से नहीं छूट पाता। हाँ, कुछ ऐसा ही हुआ है। वह मेरे वजूद का हिस्सा हो गई है। ऐसा हिस्सा जिसका मैं नाम तक नहीं जानता।

 
एकदिन देर शाम गए शहर की गलियों में भटकते हुए मैं एक काउंसलर का बोर्ड देखकर अंदर घुस गया था। काउंसलर ने बहुत देर तक बातें करके मेरे अंदर ढेर सारी बीमारियों के लक्षण ढूँढ़ निकाले थे। मैं भी समझ रहा था, मुझमें प्राब्लम्स हैं, मगर इतने सारे... ढेर सारी दवाइयाँ, एक्सरसाइज और लाइफ स्टाइल चेंज के नुस्खे तथा एक अदद बीमारी का नाम लेकर उसदिन वहाँ से दो घंटे बाद मैं निकला था - ऑबसेशन एंड एक्यूट डिप्रेसन... एक भारी-भरकम बिल भी चुकाया था। उस डॉक्टर की क्लीनिक से निकलकर थोड़ी दूर पर एक अँधेरा कोना देखकर मैंने सारी दवाइयाँ फेंक दी थीं। साथ में दवाई की पर्ची भी। खाक डॉक्टर है, इश्क का इलाज करने चला है...!

उस अनजानी, अपरिचित जगह के एकांगी जीवन ने मुझे पहले ही उबा रखा था। सोच रहा था, विनीता की छुट्टियाँ शुरू होते ही उमा को यहाँ बुलवा लूँगा। रहने के लिए अभी तक कोई ढंग का मकान नहीं मिल पाया था, यही सबसे बड़ी दिक्कत थी। अपने घर को मिस कर रहा था। बच्चों का साथ और उमा के सान्निध्य को भी। होटल का खाना खाकर भी ऊब चुका था। एकरस जीवन की बोरियत से छूटने के लिए अंदर-ही-अंदर छटपटाने लगा था।

घूम-फिरकर कहीं बाहर से लौटता हूँ तो उदासी की परछाइयाँ फिर से घनीभूत होकर घेर लेती है। समय काटना एक बड़ी समस्या बन जाता है। सुबह होती है तो रात का इंतजार करने लगता हूँ और रात होते ही सुबह की। इसलिए नहीं कि रात या सुबह में मेरे लिए कुछ खास है। ये तो सुबह की आपाधापी से पीछा छुड़ाने के लिए रात की और रात के एकाकीपन से मुक्ति के लिए सुबह की प्रतीक्षा होती है। कहीं ठहराव नहीं, बस भागना। न जाने किस चीज के लिए, कबतक के लिए...

इन दिनों मैं बहुत सोचने लगा था। फुर्सत में था और अकेला भी। बहुत सारी चीजें, बातें, जिनपर कभी शायद ही गौर कर पाया था कभी, इन दिनों अनायास ध्यान में आने लगी थी। एकदिन एक गाँव के छोटे-से चर्च के पिछवाड़े बने कब्रिस्तान को देखते हुए खयाल आया था, न जाने कितना अर्सा हो गया उमा को ‘आइ लव यू’ कहे हुए। अजीब बात थी। कौन सी बात कहाँ याद आई! सामने मृत्यु का नीरव संसार था और मन जीवन की खुशियाँ अजपाजप की तरह अपनी अदृश्य उँगलियों पर फेर रहा था। शायद ऐसा ही होता है - मौत का सामना होते ही अंदर की जिजीविषा जीवन की ओर मुँह फेर लेना चाहती है, सच की अँगुलियाँ छुड़ाकर भुलावे की झिलमिल दुनिया में खो जाना चाहती है।

कब्रिस्तान में गहरी चुप्पी थी। मैं कब्रों पर जड़े संगमरमर के फलक पर मृत लोगों के नाम, संदेश पढ़ता जा रहा था। एक पर नजर ठिठकी थी - शैरोन डि’सा - 1990-2009। पढ़ते हुए मन में एक तस्वीर बनी थी शैरोन डि’सा की - उन्नीस वर्ष की शैरोन - रूप, रंग और जीवन के उमंग से भरी हुई... न जाने उसने अपने भावी जीवन को लेकर कैसे-कैसे सपने देखे होंगे! सोचते हुए मेरी नजर कब्र पर रखे हुए एक लाल कार्नेशन के फूल पर पड़ी थी। नहीं, तुम एकदम से खत्म नहीं हो गई हो शैरोन, किसी की याद में आज भी जिंदा हो - इस ताजे फूल की तरह... उस सेमिट्री के शांत, उदास माहौल में शायद मैं कुछ ज्यादा ही फलसफाना मूड में होता जा रहा था। समय के बीत गए गलियारे में कहीं बहुत पीछे छूट गई उस युवा लड़की को एकबार देखने की अद्भुत इच्छा मन में अनायास जागती है, जिसके लिए कोई आज भी उसकी कब्र पर कार्नेशन के लाल फूल लेकर आता है, उसकी आत्मा की शांति के लिए जरूर प्रार्थना भी करता होगा। क्या तुम्हें अंततः शांति मिल पाई शैरोन...?

प्रत्युत्तर में तेज धूप में जलते हुए बोगनबेलिया के लाल, चटक फूल मुस्कराते रहते हैं, चंपा की फूली हुई पाँत उसाँसें लेती-सी मौन खड़ी रहती है। मैं मुड़कर देखता हूँ, कब्रिस्तान के एक कोने में कुछ लोग हाथों में फूल लिए खड़े थे। साथ का पादरी गाने के स्वर में शायद कोई मंत्र उच्चार रहा था। उसके चुप होते ही सबने मिलकर एकसाथ ‘आमीन’ कहा था - भँवरे के गुँजार की तरह! पादरी के सफेद चोंगे के ऊपर लाल सैटिन का पट्टा तेज धूप में चमक रहा था। एक सुबकती हुई औरत के कंधे पर उसने कुछ कहते हुए हाथ रखा था। भीड़ धीरे-धीरे तितर-बितर होने लगी थी। कैसा लगता है किसी बहुत अपने को इस तरह से हमेशा के लिए पीछे छोड़ जाना... सोचते हुए अंदर एक शून्य-सा पैदा हो गया था। बहुत उदास होकर वहाँ से लौटा था उस दिन। पूरी शाम उसी अनाम अहसास की मटमैली परछाइयाँ अंदर घिरी रही थीं।

दूसरे दिन सुबह-सुबह टहलने के लिए निकला था। लग रहा था, मुझे व्यस्त होना है, कहीं, किसी तरह खो जाना है, किसी भीड़ में - नामालूम... अपना आप ही एक समस्या हो गया था जैसे। मेरे लिए यह जरूरी हो गया था कि मैं कुछ समय के लिए स्वयं से दूर रहूँ। रविवार का दिन था। लोग सज-धजकर चर्च जा रहे थे सुबह की प्रार्थना के लिए। चर्च का घंटा रह-रहकर बज रहा था। सुबह के शांत माहौल में उसकी ध्वनि-प्रतिध्वनि दूर-दूरतक सुनाई पड़ रही थी। घंटे के बजते ही न जाने क्यों मुहल्ले के सारे कुत्ते एक स्वर में रोने लगते थे। मैं एक बरसाती नाले के ऊपर बनी छोटी-सी पुलिया पर बैठकर आते-जाते लोगों को देखने लगा था। उनके कपड़े, बोलचाल के ढंग - मुझे सभी कुछ अनोखा और इसलिए शायद अच्छा भी लग रहा था। कुछ लोग जाते हुए रुककर मेरा अभिवादन कर रहे थे - अपनी टोपी सर से उतारकर उसे लहराते हुए। मुझे लग रहा था, मैं अपने देश में नहीं, किसी परदेश की धरती में हूँ।

अद्भुत है ये देश। कितनी संस्कृतियाँ, कितनी नस्लें, धर्म यहाँ आकर इस देश की उदार, उदात्त मिट्टी से मिलकर एकाकार हो गए हैं, पूरी तरह अभिन्न, अभिभाज्य हो गए हैं। तभी तो ऐसी समृद्ध, वैविध्यपूर्ण है यहाँ की सभ्यता। कई बार इच्छा हुई थी, चर्च के अंदर जाकर देखूँ कि वहाँ क्या कुछ होता है, मगर संकोचवश नहीं जा पाया था।

एक दिन चर्च का पादरी सुबह-सुबह गाँव के वेकरी में मिल गया था - ताजी, गर्म पावरोटियाँ खरीदते हुए। रंगीन लिबास में था इसलिए अचानक पहचान नहीं पाया था। देरतक मुझसे बातें करता रहा था। पूछा था, मैं किस धर्म का अनुयायी हूँ। उसके कुछ दिनों बाद मेरे लिए मिसेज लोबो के हाथों एक बाइबल भिजवाया था - हिंदी में।

मिसेज लोबो का बर्ताव उसके बाद मेरे प्रति काफी सहृदय हो गया था। न जाने क्यों। शायद चर्च के पादरी के साथ मेरे परिचय के कारण ही। ईसाई समुदाय के लोगों में अपने धर्म के साथ-साथ धर्म गुरुओं के प्रति भी गहरी श्रद्धा-भक्ति के भाव होते हैं। गाँव के लोग अपने चर्च के पादरी के सलाह-मशविरे से ही अधिकतर काम करते हैं। यहाँ के सामाजिक जीवन में उनका गहरा प्रभाव होता है। शादी-ब्याह - सब उन्हीं की स्वीकृति से तय होता है। मुझे यह सब काफी रोचक लग रहा था। धर्म का ऐसा अनुशासन हमारे हिंदू समाज में नहीं होता। शायद तभी इतना बिखराव और उच्छृंखलता है।

कई दिनों तक इधर-उधर भटककर मैंने अपना ध्यान बहुतेरा उस फोन नंबर पर से हटाने का प्रयास किया था। मगर सब व्यर्थ। सारा दिन वह मेरे अवचेतन पर छाया रहता। और रात होते-होते उसके अंक फैलकर जैसे मेरे पूरे अस्तित्व को ही ढँक लेते। सपने में भी वे दिखते - तरह-तरह के रंग और आकार में। कभी पतंग बनकर आकाश में लहराते, मेरे छज्जे के मुँडेर तक उतर आते। उन्हें लूटने के लिए मैं बेतहासा दौड़ता और दौड़ते हुए नीचे गिर पड़ता...! मेरी नींद टूट जाती और मैं जागकर देरतक बैठा रहता। कभी-कभी उठकर बाहर बॉल्कनी में भी आ जाता। रात का शहर सन्नाटे की गहरी नींद में डूबा कितना अलग लगता है। जिन सड़कों पर सारा दिन इतना शोर-गुल, भीड़-भाड़ रहती है, रात के समय वही कैसी वीरानी पसर जाती है। उसपर टहलते हुए या कभी बैठकर अजीब लगता है। ये सड़कें कितने लोगों को कितनी जगह पहुँचाती हैं, मगर खुद कहीं नहीं जातीं। सबको मंजिल तक पहुँचानेवाले की अपनी कोई मंजिल नहीं होती। किसी-किसी की नियति भी कुछ ऐसी ही होती है।

मैं अनझिप आँखों से आकाश की तरफ देखता रहता हूँ। गहरा स्लेटी आकाश दूर मांडवी नदी के पास पीली उजास से भरा रहता है। पणजीम शहर की रोशनी आकाश में ऊपर तक फैलती है। पानी पर ठहरे जहाज, कैसिनो, सैलानी बोट्स की बत्तियाँ - रंगीन लट्टू, नियॉन लाइट्स जलते-बुझते रहते हैं। उनकी नीली, हरी - तरह-तरह के रंगों की रोशनियाँ पानी की गहरी नीली सतह पर काँपती है, दूर तक फिसलती जाती है। एक अद्भुत स्वप्नवत दृश्य उपस्थित होता है, जैसे रंगों की झिलमिलाती परियों का नृत्य लगा हो... कई बार देर रात तक मैं मांडवी के किनारे-किनारे भटका हूँ। चौड़ी, खाली, सुनसान सड़कें, किनारे पर फूलों और क्रोटोन्स की रंग-बिरंगी सघन झाड़ियाँ और पानी पर पूरे चाँद का टूटता-बिखरता प्रतिबिंब... ऐसी आवारगी का एक अपना नशा होता है, घर लौटकर जाने का मन नहीं होता। उस घर में तो हर्गिज नहीं जहाँ मैं इन दिनों रह रहा था।

कई बार पुलिस की गश्ती गाड़ियों ने रोककर मुझसे पूछताछ भी की थी। मेरा परिचय पत्र देखकर तथा मैं शराब के नशे में नहीं हूँ, इस बात की तसल्ली करके मुझे जाने दिया था - कई एक हिदायतों के साथ।

घर लौटते हुए उस दिन जेब से कागज का वह पुर्जा निकल आया था - उस अनजान औरत का मोबाइल नंबर। उसे देखते हुए न जाने क्या हुआ था। अंदर एक तेज घुमेर-सी उठी थी - सिरा दूँ अपनी सारी यंत्रणा, छटपटाहट इस मांडवी में, इसके शीतल जल में शांत हो मेरे अंतस की सारी दाह, संताप! मुक्त हो जाऊँ इस रातदिन की दुविधा से...

एकदम से उस कागज का गोला बनाकर नदी में उछाल दिया था। गोला तेज पानी में डूबता-उतराता बह चला था। दूर से भी वह गहरे बैंजनी पानी में स्पष्ट होकर दिख रहा था। मैं अपनी जगह खड़ा उसे बहता हुआ देखता रहा था कुछ देरतक - बिल्कुल निर्लिप्त और उदासीन भाव से। और फिर हड़बड़ाकर दौड़ पड़ा था, पानी में उतर गया था दूरतक। मुझे वह कागज का टुकड़ा चाहिए - कैसे भी, किसी भी कीमत पर...

अरे रे मैन, क्या करता है?

पास ही पानी में मछली के लिए काँटा डालकर बैठा हुआ एक आदमी चिल्लाया था - सुसाइड करने को माँगता है क्या! तो कहीं और जाओ न बाबा...

किस्मत से कागज का वह गोला एक बँधी हुई नाव से टकराकर वहीं कोने में अटककर रह गया था। उसे मुट्ठी में लेकर मैं पानी से बाहर निकल आया था, पूरी तरह भीगा हुआ। पीछे वह आदमी अब भी बड़बड़ा रहा था -

न जाने ये घाटी लोग किधर-किधर से यहाँ मरने के वास्ते आ जाता है, बेयोरा मारकर एकदम टुन्न हो जाता है...

उसकी बातों पर ध्यान न देकर मैंने स्ट्रीट लाइट के नीचे जाकर उस भीगी हुई पुड़िया को खोलकर देखा था। भीतर का हिस्सा सौभाग्य से पूरी तरह अभी भीगा नहीं था। दो अंक बहरहाल धुँधला गए थे, मगर शुरू के दो अंक, जिन्हें समझना आसान था। एक अनाम खुशी से मैं भर उठा था। घर की तरफ लौटते हुए मैंने मुड़कर उस बड़बड़ाते हुए व्यक्ति की तरफ हवा में एक चुंबन उछाल दिया था - गुडनाइट साहेबा...

‘चल-चल, वचुन घरा नींद (जाओ, अपने घर में जाकर सो जाओ)!

वह व्यक्ति फिर बड़बड़ाया था, मगर इस बार हल्के ढंग से। मैं मुस्कराते हुए अपने कमरे में लौट आया था। न जाने मुझे क्या इतना कीमती दुबारा मिल गया था।

अपने कमरे में लौटकर मैंने उस कागज पर धुँधले पड़ गए अंकों को स्केच पेन से बार-बार गहरा किया था। और एहतियातन तीन-चार जगहों में और भी लिखकर रख लिया था। आज की तरह फिर कभी पागलपन का दौरा पड़ा तो! मैं अब किसी तरह इस नंबर को खोना नहीं चाहता था। इसी में शायद कहीं मेरा पता भी मिलना था। उस रात मुझे अच्छी नींद आई थी। अपने ही अनजाने शायद मैं किसी निर्णय पर पहुँच गया था। कई दिनों से ये दस काले अंक मेरा पीछा कर रहे थे - हर जगह, हर समय! एक अंदरूनी बेचैनी मुझे अपने जद में लिए हुए था। मेरे पाँव रुके हुए थे, मगर मैं एक निरंतर यात्रा में था – यात्रा - अपनी ही तरफ, एकदम अंदरूनी... शायद तभी इतना कठिन भी। ये भीतर के सफर ही होते हैं जो इतना थका देते हैं। मैं स्वयं से भाग रहा था - मगर कैसे भाग सकता था। अब जो यह बचकानी कोशिश छोड़ दी तो जैसे राहत मिल गई। साथ में नींद भी - लंबी, बिना सपनों की - बँधे हुए पत्थरों की तरह - स्याह और गहरी, एकदम तलहीन, अछोर...
 
सुबह उठा तो सबसे पहले घर पर फोन किया। जैसे किसी युद्ध पर जाने की तैयारी में हूँ। उमा की आवाज सुननी थी और उसकी शुभकामनाएँ भी लेनी थी। फोन पर आते ही उमा चहकी थी - किसी ताजे, मीठे पानी के घने होकर बहते सोते की तरह थी उसकी आवाज - राहत और सुकून से भरी हुई। उसने कल रात मुझे सपने में देखा था। हम दोनों एक-दूसरे से प्यार कर रहे थे, बहुत डूबकर, देरतक। मैंने पूछा था - कहो तो पहली फ्लाइट पकड़कर अभी आ जाऊँ... वह शरमाकर हँसती रही थी।

फोन रखकर न जाने क्यों मैं बहुत देर तक वही बैठा रह गया था। आँखों के कोने जल उठे थे। उमा की हँसी के साथ उसका चेहरा भी तैर रहा था मेरे सामने - गुलाबी पतंग की तरह - तेज हवा में चंचल, उन्मुक्त... मगर क्या करता, मेरा मन भी अब कहाँ मेरे अधिकार में था, कटी पतंग की तरह उड़ कर आँखों से ओझल हो गया था, शायद लूट ही लिया गया था! मगर मेरा अवचेतन जानता था उसका पता। मैंने अपनी जेब टटोलकर वह तुड़ा-मुड़ा कागज का टुकड़ा निकाला था - दस अंक - स्याह, लिसरे-से - साँवले फूल की तरह मुस्करा रहे थे। मैंने मोबाइल उठाकर नंबर मिलाया था। दूसरी तरफ फोन की घंटी बजते-बजते मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग उठा था। जैसे ही किसी ने फोन उठाकर हलो कहा था, मैंने फोन मेज पर रख दिया था और फिर दूसरे ही क्षण उठा भी लिया था।

दूसरे दिन उसके घर के लिए निकलते हुए मैं जानता था, मैं आसरे की तलाश में अपने घर से आगे जा रहा हूँ। अनुभव कर सकता था, मेरे पीछे मेरा अबतक का सारा पाया-सहेजा छूटता जा रहा है - शायद हमेशा के लिए। कितने आँसुओं से भीगे चेहरे थे, कितनी जुड़ी हथेलियाँ और अनुनय में बँधे हाथ... मगर कुछ भी - कोई भी तो मुझे उसदिन रोक नहीं पाया था। घर फूँककर निकल पड़ना शायद ऐसे ही किसी जुनून को कहते हैं! जिस समय मैं स्वयं के ही वहाँ होने पर हैरान और एक हदतक शर्मिंदा उसके दरवाजे पर खड़ा हुआ था, वह इस तरह से सहज मुस्कराते हुए दरवाजा खोली थी, जैसे उसे हमेशा से पता हो, मुझे उसदिन उसके पास आना ही है। यहाँ औरत की छठी इंद्रिय काम कर रही थी शायद। वह मेरी हार का पहला दिन था। उसके साथ पराजित होने और निरंतर होते चले जाने की प्रतीति हर पल होती रही है। ये मेरी अपनी चारित्रिक दुर्बलता थी या उसके विलक्षण व्यक्तित्व का सहज परिणाम, मैं अंत तक जान नहीं पाया था।

उसने अपने घर के दरवाजे इस तरह खोले थे जैसे आकाश को विस्तार दे रही हो। जो आकाश उसकी आँखों में था, वही उसके घर में भी ओर-छोर पसरा था। ऐसा प्रतीत होता था जैसे उसका घर सब्ज, हवा और धूप से बना हुआ हो। उस घर की दीवारें ठोस नहीं, बल्कि पारदर्शी थी - हर मौसम को स्वयं से निर्द्वंद्व गुजारती हुई, उसके तमाम तेवर और मिजाज के साथ! - दीवार से दीवार तक जुड़ी हुई काँच की खिड़कियाँ, पेपर के जींस की बनी जापानी दीवारें, खुली बॉल्कनी और बरामदे... हर कोने पर रंग-बिरंगे क्रोटोंस, दीवारों को ढँके मनी प्लांट्स, और नाटी-बौनी बोंसाई की लंबी पाँत... घर के अंदर दाखिल होकर लगा था, खुले में आ गया हूँ।

मुझे उसके घर के गोबर लीपे आँगन और उसके बीचोंबीच खड़े तुलसी चौरे ने सबसे अधिक प्रभावित किया था। एक शहर के शोर-गुल से भरे माहौल में एक छोटे गाँव का-सा शांत वातावरण था वहाँ। दरवाजे पर बँधे चाइम्स की मीठी ठुनक रह-रहकर घर के अंदर पसरे मौन को अपनी मीठी गूँज से तोड़ रही थी। उसने मुझे न जाने किस नजर से देखा था - तुम्हारा इंतजार हमसब को जाने कब से था। पूरे घर को मानो अपनी बाँहों में लेते हुए उसने कहा था, गहरी उछाह से भरी हुई। मैं बिल्कुल अभिभूत था, क्या कहता - अपनी खोई हुई जबान से...

पहले-पहल उसने कुछ भी नहीं पूछा था मेरे विषय में। न अपने विषय में ही कुछ कहा था। मुस्कराकर बस इतना ही कहा था - ये तुम हो जिसके विषय में जानना चाहती हूँ - तुम्हारी सोच, तुम्हारे खयाल, पसंद-नापसंद... न कि तुम्हारी जात, धर्म, गोत्र, समाज के विषय में! वाट्स इन ए नाम... राम हो या श्याम - क्या फर्क पड़ता है!

मैं उसकी कजलाई आँखों की मीठी चावनी में डूबता बैठा रह गया था। अपने बिखरे बालों को एक ढीले जूड़े में गूँथते हुए वह सामने बैठ गई थी, चेहरे पर अस्त-व्यस्त लापरवाह-सी मुस्कराहट लिए - क्षणों को जियो अशेष, इन्ही से जिंदगी बनती है। जो बीत चुका या आनेवाला है, वह महज फसाना या ख्वाब है। हम हमेशा जिंदगी को जीना छोड़कर जीने की तैयारी में क्यों लगे रहते हैं?

मैंने अपने आने की एक लंबी-चौड़ी भूमिका बाँधनी चाही थी, मगर उसने रोक दिया था - आज यह सब नहीं। जीवन को थोड़ी देर के लिए बिना शर्त, बिना पाबंदियों के जी लेने दो। देखो न कैसा लगता है... उसकी आँखों में चमक आए मोतिया आब को देखकर प्रतीत हुआ था जैसे कोई नटखट-सी बच्ची शरारत के मनसूबे बाँध रही हो।

मुझे खुले बरामदे में बैठाते हुए उसने यकीन से कहा था - तुम अपने घर आ गए हो अशेष! इस घर में सबकुछ था, बस तुम ही नहीं थे। आज आ गए हो तो यह घर घर बन गया है। मुझे आश्चर्य हो रहा था, उसके यकीन पर।

इतना यकीन कैसे कर लेती हो? मुझे उससे एक तरह से ईर्ष्या होने लगी थी।

अविश्वास में जीने से तो अच्छा है, विश्वास के हाथों मारा जाना, नहीं? वह एक बार फिर हँसी थी - अपने पूरे वजूद से। यह उसकी एक और विशेषता थी, हँसती या उदास होती थी अपनी पूरी काया से। बस उसकी आँखें थीं जो मुस्कराकर भी नहीं मुस्कराती थी। वहाँ खूबसूरत वर्क में लिपटा हआ विषाद होता था - बहुत गहरा और अछोर... किसी पत्थर की तरह मजबूत बँधा हुआ। उन्हें देखकर किसी निसंग संध्या तारा की याद हो आती थी - अकेले-अकेले - झिलमिलाहट में लिपटे हुए, मगर बेतरह उदास और अनमन...

मेज पर चिल्ड बीयर के साथ कोल्ड कट्स सजाकर वह तुलसी चौरे पर पानी चढ़ा आई थी। अपनी आँखें बंद किए आकाश के उद्देश्य में उसे एकमन से हाथ जोड़े हुए देखना भी अपने आप में एक अनुभव था। बिना किसी मेकअप का साफ, धुला चेहरा, शरीर पर सिल्क का सफेद गाउन और गले में रूद्राक्ष की माला। गीले बालों का जूड़ा खुलकर पीठ पर फैल गया था। धूप में सूरजमुखी की तरह दपदपाते हुए उसके उजले रूप को मैं अपनी आँखों से समेटकर अंदर सहेज रहा था। कुछ छूटे न, कुछ बचे न। मुझे प्रतीत हो रहा था, मैं किसी दूसरी ही दुनिया में आ गया हूँ, जहाँ सबकुछ खालिस जादू है।

आँगन के ऊपर मड़ैया बँधी थी जिसपर चमेली की लतरें चढ़ाई गईं थीं। हरे पत्तों के बीच से दोपहर का नीला आकाश आईने की तरह कौंध रहा था। हवा में हरसिंगार की बासी, उनींदी गंध थी। शायद आसपास कहीं भोर रात से झड़ता रहा था।

कभी किसी दुर्लभ क्षण में हम समय के गिरफ्त से छूट जाते हैं, अनंत, असीम हो जाते हैं, जीवन, जगत के पार चले जाते हैं... कुछ ऐसा ही घटा था उस रोज - समय की बहती हुई धारा से जैसे हम बिल्कुल अलग हो गए थे। दामिनी का रूप, उसकी हँसी, उसकी बातें... ऐश्वर्य की एक पूरी दुनिया मेरे सामने पसरी थी। दोपहर अपनी अलस, मंथर गति से चुपचाप कटती रही थी। सुख की एक हथेली भर जमीन पर हम समंदर की तरह फैले हुए थे, टूट, बिखर रहे थे - बिल्कुल बेपरवाह।

उसने मुझसे कहा था, वह मुझसे प्यार करती है। मैं चौंक पड़ा था। इतनी जल्दी वह इस निर्णय पर कैसे पहुँच सकती है! बीयर के गिलास के पीछे उसकी फीरोजा नील आँखें पिघले सितारे की तरह फैली हुई थी, बूँद-बूँद टपकती हुई-सी...

- कुछ सोचना या पूछना तो अनिश्चय की स्थिति में होता है अशेष। तुमसे प्यार करती हूँ या नहीं, यह एकबार भी स्वयं से पूछना नहीं पड़ा। जिस क्षण तुम्हें देखा उसी क्षण से जानती हूँ कि मुझे तुमसे प्यार है।

ऐसा कैसे... मैंने पूछना चाहा था, मगर उसने मेरी बात बीच में ही काट दी थी - प्यार तो ऐसे ही होता है अशेष, या फिर होता ही नहीं। उसकी आवाज का यकीन अडोल था। मैं क्या कहता, बस उसे खामोशी से देखता रह गया था। बाहर तेज धूप में दिन का दूसरा पहर जल रहा था। गेट से लेकर घर के पोर्टिको तक गुलमोहर के झरते हुए पीले फूलों से अँटा पड़ा था। गर्म हवा में खिड़की के पर्दे उड़ रहे थे।

मेरा मोबाइल लगातार बज रहा था। मैं जानता था, उमा का फोन होगा। सुबह से वह मेरा नंबर ट्राइ कर रही थी। मगर मेरी हिम्मत नहीं हुई थी कि मैं उसका फोन उठाता। दामिनी ने कुछ देर तक मेरी आँखों में झाँका था और फिर मुझसे बिना पूछे ही मोबाइल बंद कर दिया था - आज का दिन बस हमारा-तुम्हारा है। बीच से यह दुनिया हटा दो और सारी वर्जनाएँ भी... मैं कुछ कह नहीं पाया था। इस क्षण मैं उसके रूप के गहरे सम्मोहन में था - एकदम असक्त, असहाय - जल की तेज धार में बहते हुए तिनके की तरह...

उसदिन मैंने बीयर की कई बोतलें खाली कर दी थीं। दामिनी लिमका में मिलाकर फेनी पीती रही थी। कहा था, गर्मी में अच्छा लगता है...

एक समय के बाद वह मुझे अपने बेडरूम में ले गई थी। वहाँ लगा था कि जैसे समंदर की छत पर हम बैठे हुए हैं- खिड़की से झाँकता हुआ आकाश और समंदर - उसकी ऊँची, झागदार लहरें और अबाध बहती हवा... पूरा कमरा धूप की आसमानी चटक से भरा हुआ था। मुझे कुर्सी पर बिठाकर वह खुद बिस्तर पर लेट गई थी। उसकी आँखों में उस समय नींद और खुमार था। लंबी, सघन बरौनियाँ आँखों पर झँप आईं थीं।

एक खूबसूरत निमंत्रण की तरह वह बिस्तर पर लेटी हुई थी, मेरी तरफ अद्भुत नजर से देखती हुई। मैं जानता था, इस क्षण उसे छुआ तो वह पारे की चमकीली नदी बनकर पिघल जाएगी, बहती रहेगी निरंतर, बहकर निःशेष हो जाएगी मेरी बाँहों में - अपनी आखिरी बूँद तक। हल्के टकोर की प्रतीक्षा में सितार के कसे तार की तरह उसके शरीर के अवयव तने हुए थे - अधीर, साग्रह... या किसी नदी की प्यासी देह की तरह रसमसाती हुई, जिसे धूप और ताप के अंतहीन ऋतु में सावन के एक टुकड़े बादल का इंतजार होता है - फिर से पुरने के लिए, अपने कूल, किनारों तक...

एक लंबे, गहरे मौन के बाद उसने कहा था - मेरी पहली शादी बहुत कम उम्र में ही हो गई थी। ये शादी मैंने खुद ही की थी। लव मैरिज नहीं था, मगर चुनाव मेरा ही था। अपनी माँ की मृत्यु के बाद अपने पापा के साथ एक छत के नीचे मेरा रहना मुश्किल हो गया था। निकल जाना चाहती थी वहाँ के विषाक्त माहौल से - किसी तरह, किसी भी कीमत पर। मगर शादी के तीन महीने बाद ही मैंने अपने पति का भी घर छोड़ दिया था। मुझे जल्दी ही समझ में आ गया था कि एक नरक से छूटने के लिए मैं दूसरे नरक में आ गई हूँ।

एक साँस में इतना कहते हुए ही वह जैसे हाँफ आई थी।

एक छोटे-से विराम के बाद मैंने पूछना चाहा था - तुम्हारी माँ...

ये कहानी फिर कभी... दामिनी ने अपना हाथ उठाकर मुझे टोक दिया था। उसके बाद हमारे बीच फिर से एक लंबा मौन पसर गया था। बहुत देर बाद अपनी आँखें खोलकर उसने अब धीरे से पूछा था, थरथराती हुई आवाज में, जैसे पूछते हुए उसे डर लग रहा हो - घर में कौन-कौन हैं अशेष?

मैं समझ गया था, वह क्षण आ गया है। यह निर्णय की घड़ी है। वह स्वयं को यथार्थ का सामना करने के लिए तैयार कर रही है। अब हमारे संबंध को भी एक नाम, एक चेहरा देने की जरूरत है। हम दुनिया में लौट आए थे। आकाश में कितना भी उड़ लें, रहना तो आखिर इस जमीन पर ही है।

मैंने अपने अंदर की सारी शक्ति को संचित किया था। सच मैं नहीं बोल सकता था - इस क्षण तो बिल्कुल भी नहीं। और झूठ बोलने के लिए जिस अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है, उसे ही शमित करने का प्रयत्न कर रहा था, अपनी पूरी सामर्थ्य से। इस समय मैं जो कहूँगा वही हमारे आगे के संबंध का स्वरूप तय करेगा। मैं नहीं चाहता था, सच कहकर सपनों की इस खूबसूरत और पारदर्शी दुनिया को तोड़ दूँ। यथार्थ की बदसूरत, कठोर और नीरस दुनिया में अब मैं किसी भी तरह लौट जाने को तैयार नहीं था। मैंने वर्जित फल का स्वाद चख लिया था। अब मेरी रिहाई नहीं थी - इस जन्म में तो कतई नहीं। मैंने किसी पराई आवाज में रुक-रुककर कहा था - परिवार है, मगर न होने के बराबर।

अनायास कह तो गया था, मगर अब अपने ही बोझ से दम घुट रहा था। सच कहना चाहता था, मगर हिम्मत नहीं हुई - उसे खो देने की हिम्मत। इस पल मैं अपनी हवस की जद में था। नसों के संजाल में चिनगारी की सुनहरी आँधी उठी हुई थी, लहू आग बनकर दौड़ रही थी। उसकी देह-रस, गंध और स्वाद से गुँथी देह - मेरी आँखों के आगे थी, और कुछ नहीं। वह लेटी हुई थी उस क्षण, एक पारे की उजली नदी की तरह - हल्के-हल्के सरसराती हुई, अपने मायावी आकार की मादक संपूर्णता में - तिलिस्म रचती हुई-सी, मुझमें पूरी तरह उतर आने के लिए, बह आने के लिए उद्धत, आमादा - अपनी आखिरी बूँद तक...! मैं जानता था, वह मेरा होना चाह रही थी, मगर रस्म निभा रही थी - दुनियादारी की रस्म। यह जरूरी हो जाता है, खासकर ऐसे क्षणों में जब हम किसी वर्जित क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हों, अपनी ग्लानि को कम करना जरूरी हो जाता है। दिमाग जिसे नहीं स्वीकारता, मन उसे अस्वीकार नहीं कर पाता। संस्कार... ये हमारे लहू में बहता है, बहुत चुपचाप, मगर हर क्षण। सही समय आने पर मौन तोड़ देता है। हमें उसे सुनना पड़ता है, वर्ना वही विवेक का तीक्ष्ण दंश और अपराधबोध!
 
अपने जिस्म में डूबने से पहले वह अपने मन को हर तरह से समझा लेना चाहती है, साफ कर लेना चाहती है। औरत जो है, उसके लिए यह जरूरी हो जाता है। खालिस जिस्म बनकर जीना कभी उसके लिए संभव नहीं हुआ है। उसके नाजुक कंधों पर बहुत बोझ है। समाज का, संसार का, और सबसे ज्यादा खुद का। धरती की तरह है उसका जीवन, उसकी नियति... मयार्दा तोड़ नहीं पाती, स्वयं टूटती रहती है। संरक्षण उसका स्वभाव भी है और जिम्मेदारी भी। सर्जक होने की यही त्रासदी है शायद, कुछ तोड़ देना, नष्ट कर देना सहज नहीं रह जाता। गढ़ने, सजाने, सँवारने की आदत जो पड़ जाती है। मेरी तरफ बढ़ने से पहले वह भी जान लेना चाहती है, उसके पाँवों के नीचे आकर कुछ कुचल तो नहीं रहा है। मुझे उसे यह विश्वास दिलाना ही पड़ेगा कि ऐसा करते हुए वह किसी के दुख का कारण नहीं बन रही है, वर्ना वह कदम नहीं बढ़ाएगी। लौट जाएगी, मन से न सही, देह से जरूर - शायद हमेशा के लिए...

इस खयाल ने मुझे बेतरह डरा दिया था। एक सच की कीमत मेरी जान होगी! हाँ, मेरी जान! उसकी देह की तिलिस्म में आकंठ डूबा उस पल मेरा एकमात्र सत्य यही था कि मैं उसे पाना चाहता था - किसी भी तरह, किसी भी कीमत पर... मेरे पोर-पोर में उसकी पागल चाह पूरी शिद्दत से समा गई थी। अब चाहकर भी मैं इससे छूट नहीं सकता था। मेरे वश में मेरा आप नहीं रह गया था। अंत में मैंने एक और झू्ठ गढ़ा था - अपनी पत्नी के साथ एक लंबे समय से मेरा कोई शारीरिक संबंध नहीं है! वह शायद यही सुनना और मानना चाहती थी - सो मान गई!

एक असमंजस भरे मौन के बाद उसने कहा था - मैं तुम्हारी दुनिया को बाँटना नहीं चाहती, बस, तुम मुझे इसका एक हिस्सा बना लो, बहुत छोटा, मगर मुकम्मल...

उसदिन सुबह कब दोपहर में ढली और दोपहर शाम में, मैं नहीं जानता। समय थम गया था या हम ही, ये भी कह नहीं सकूँगा। वह थी, मैं था और बस, यही था - और कुछ नहीं... हम क्या कह-सुन रहे थे, इसका कोई माने नहीं था। वह कह रही थी और मैं सुन रहा था, यही बात दीगर थी। बोलते हुए दो आँखों का कौतुक, आश्चर्य और शरारत से पिघलकर कभी समुद्र हो जाना या एक बासंती देह का पारे की उजली नदी में तब्दील हो जाना... सबकुछ विलक्षण, अद्भुत था। वह कभी रोई थी, कभी हँसी थी और कभी नाराज हो गई थी। उसके चेहरे पर क्षण-क्षण बदलते ये भाव धूप-छाँव के अल्हड़ खेल की तरह रोचक थे।

वह एक जादू की तरह आहिस्ता-आहिस्ता खुली थी मेरे सामने - पाँखुरी-पाँखुरी... मेरी समस्त चेतना जैसे खुशबू की एक गहरी, पारदशी झील में डूबकर रह गई थी। बाहर रात का रंग गहरा रहा था, सुरमई से जामुनी, फिर स्लेटी। मौसम का नया चाँद अपनी चमक समेटकर न जाने कब दबे पाँव समंदर की ओर उतर गया था। गर्म हवा चंपा की तेज सुगंध में नहाई हुई निःस्तब्ध पड़ी थी। कोई रात का पक्षी रुक-रुककर बोल रहा था। यह नींद, स्वप्न और इच्छा की महक में डूबी आदिम रात मेरे अंदर गहरे तक उतरकर मुझे वन्य बना रही थी, अबाध्य और उच्छृंखल भी। मैं चाह रहा था, कपड़ों और मुखौटों की सभ्यता से परे आज की रात एकबार - कम से कम एकबार - अपने खालिस मन और देह को जिऊँ, उसकी तमाम हवस और मुरादों के साथ! किसी भी वर्जना और ग्लानि से परे होकर, एकदम उन्मुक्त, स्वच्छंद...

एक कहानी गढ़ते हुए धीरे-धीरे मेरी आँखों के सामने से उमा का चेहरा खो गया था - जल के तल में हिलते हुए सेवार की तरह। दामिनी की देहगंध में डूबा मैं उसे बताता रहा था अपने उस दुख-दर्द की बातें जो शायद ही मेरे जीवन में कहीं थीं। वही पत्नी के रूखे, शुष्क स्वभाव का होना, केयरिंग न होना, मेरा अकेलापन, उदासी, किसी के साथ, स्नेह-परस की चाह... सुनते हुए कितनी आसानी से दामिनी माँ बन गई थी, मुझे अपनी गोद में समेट लिया था। जिस्म में उतार लिया था। औरत कितनी भी बुद्धिमान हो, न जाने क्यों, यह वार कभी खाली नहीं जाता। पुरुष हमेशा स्त्री का मालिक बनना चाहता है, मगर औरत अंततः उसकी माँ ही बनना चाहती है। पिघल जाती है उसके दुख में, उसे अपने आँचल की छाँह में समेट लेना चाहती है। प्रेम देने में भले कंजूसी कर जाय, स्नेह से कभी इनकार नहीं कर पाती। इसी स्नेह की डोर पकड़कर मैं उसके शरीर तक पहुँचा था। उस रात उसने मुझे अपनी गोद में पनाह दिया था, ये बात और है कि मैं उसकी कोख तक पहुँच गया था, अपनी हवस से भर दिया था उसे - आखिरी बूँद तक!

उस रात दामिनी की देह के गर्म सुख में डूबकर मैंने जाना था, इच्छा का चरम और तृप्ति की सीमा क्या हो सकती है... हो ही नहीं सकती...! अब तक जिस शरीर को जी रहा था, वह जीवित ही नहीं था, बस एक खुशफहमी थी - जीने की, भोगने की... अब जब भ्रम टूटा, ठगे जाने की अनुभूति ने आ घेरा - वह भी किस भयावहता से! सुख - देह सुख - की एक नई परिभाषा, एक नया अर्थ मेरे सामने उस रात खुला था, मगर उसे शब्दों में मैं किसी भी तरह बाँधने में अक्षम था - भाषा अभी इतनी समर्थ भी कहाँ हो पाई है जो मन के भाव - ऐसे गहन भाव - को व्यक्त कर सके... जिस सुख को मैं अपने रगो-रेश से जी रहा था उसे शब्दों में व्यक्त करके उसे, उसकी विलक्षणता और अलौकिकता को जाया नहीं करना चाहता था। इसे जीना, जीना और जीना... यही इसकी उपलब्धि और सार्थकता हो सकती थी, और कुछ नहीं...!

बिस्तर में वह कोई और थी - इच्छाओं की एक रसमसाती हुई झील, जिसका कोई तल, थाह नहीं, कूल-किनारा नहीं...एक आसेव की तरह कुछ उतरा था उसमें - सर से पाँव तक आग की एक नदी बन गई थी वह! दपदपाती हुई अग्निशिखा! ईप्सा के चरम में धुआँती, लपटें मारती हुई - अदम्य, आकुल वन्या... मैं जानता था, उस कौंध भरे आलिंगन में सिर्फ मृत्यु है मेरे लिए, मगर क्या करे कि उस रात मेरा वही एकमात्र काम्य था। जीवन का इससे खूबसूरत विकल्प और कुछ नहीं हो सकता था मेरे लिए... मैं उतरा था उसमें - अपने पूरे होशो-हवास में - हमेशा के लिए डूब जाने के लिए - डूबकर उतर जाने के लिए... कैसा आत्महंता कदम था वह! वासना किसी को इतना ही साहसी बना देता है, प्रयोगधर्मी भी!

अपने तटबंधों को गिराते हुए मुझमे किसी बाढ़ चढ़ी नदी की तरह उफन आई थी वह। प्रेम के क्षणों में जितनी कोमल थी वह कभी-कभी उतनी ही आक्रामक भी - एक सीमा तक हिंसक! अपनी देह पर खिले अनवरत टीसते हुए नीले फूलों को देखकर पीड़ा का स्वाद ऐसा मधुमय भी हो सकता है, यह उसी रात महसूस कर पाया था मैं।

उस सारी रात मेरी बाँहों में पिघलते हुए मोम की तरह ऊष्ण और सघन रही थी वह - उसमें उतरना अपने स्व को खोना था, एक पूरे जन्म के लिए ही। मगर इसका कोई मलाल नहीं हो सकता था, जिस मूल्य पर यह घटा था, उस मूल्य पर तो कतई नहीं। बर्फ के गोरे जंगल में आग की एक सुर्ख नदी की तरह थी वह, तुषार कणों में आँच की दहकती हुई अनगिन बूँद समाए, शांत और टलमल... उस रात मैंने जाना था, एक औरत की देह में कितने समंदर, पहाड़ और नदियाँ समाई होती हैं। उनमें डूबते-उतराते, पार करते मैं निःशेष प्रायः हो गया था, चुक गया था, मगर न उसकी थाह पा सका था, न उसकी सीमा... वह रात गहरी तुष्टि और गहरे अभाव की थी, मगर थी अद्भुत, एक तरह से सांघातिक! बीतकर भी न बीतनेवाली, रह जानेवाली - हमेशा के लिए। उसने कहा था, मैं उसके जीवन का पहला पुरुष नहीं था, मगर - था! क्योंकि उसने मेरा वरण अपने मन से किया था। सही अर्थों में वही पुरुष किसी स्त्री के जीवन का पहला पुरुष होता है जिसका वरण स्त्री अपने हृदय से करती है।

दूसरे दिन उसके घर से मैं जब निकला था, कोई और ही बन गया था - एकदम नया, दूसरा ही। साथ में मेरी पूरी दुनिया भी बदल गई थी - सिरे से।

वह सारा दिन मेरा न जाने कैसे व्यतीत हुआ था। मैं हवा के परों पर था, तैरता हुआ - बिल्कुल हल्का-फुल्का... ये हमेशा की पुरानी दुनिया एकदम नई-कोरी हो आई थी यकायक। बहुत दिनों बाद बहुत सुकून और आराम से नहाया था मैं - देर तक - अपनी त्वचा पर दामिनी के रेशम जैसे स्पर्श का अनुभव करते हुए। उसकी देह गंध मेरे नासारंध्र में भरी थी, रात का बासीपन लिए - किसी सूखते हुए फूल की तरह... बाथरूम से बाहर निकलकर अपनी देह पर कोलोन छिडकते हुए मैंने निर्णय लिया था, आज ऑफिस नहीं जाना है। इस निर्णय के साथ ही मैं बेहद रिलैक्सड हो आया था। मन आज किसी बंधन को मानना नहीं चाहता था। उन्मुक्त होकर उड़ते फिरना चाहता था, खुले आकाश में - किसी पक्षी की तरह...

अबतक का जीवन क्या था - एक बंधन ही तो! हर चीज का बंधन - समाज, परिवार, रिश्ते का बंधन... अनुशासन की जंजीरों में जकड़ा हुआ, मर्यादा, सीमाओं के दायरे में संकुचित, आबद्ध... कब मन का किया, अपनी तरह से जिया... बचपन से अच्छा होने का अभिशाप लिए जिए जा रहा था - अशेष अच्छा बेटा है, बड़ों की सुनता है। अशेष हमेशा अपने क्लास में पहला आता है, कभी विद्यालय से अनुपस्थित नहीं रहता। जो दो, खा लेगा। जैसा दो, पहन लेगा। वह झगड़ा नहीं करता, गाली नहीं देता, गुस्सा नहीं करता... कितना अच्छा बेटा है। ‘मेरा राजा बेटा’ माँ बलैयाँ लेते नहीं थकतीं। पापा का सीना उसे लेकर गर्व से फूला रहता है। अपने रिश्तेदारों के बीच वह एक उज्जवल उदाहरण है।

कॉलेज में भी टॉप करने के चक्कर में मैं दिन दुनिया भुलाकर अपनी पढ़ाई में मश्गूल रहा। मेरे दोस्त पिक्चर जाते, लड़कियों के साथ इश्क लड़ाते, मगर मैं - अपने दोस्तों के बीच मिस्टर क्लीन के नाम से मशहूर - अपनी किताबों में पूरे साल सर डाले पड़ा रहता था। धीरे-धीरे मैं किताबी कीड़ा, भोंदू, महाबोर... न जाने किस-किस नाम से मशहूर हो गया। मगर क्या करता, मेरी आँखों के सामने रातदिन मेरे माँ-बाप का चेहरा तैरता रहता। कितनी उम्मीदें थीं उनकी मुझसे। मैं उनका इकलौता बेटा था। अपने सारे सपने उन्होंने मेरे आसपास ही बुने थे। उनकी आशाओं को तोड़ना मेरे वश की बात कदापि नहीं थी।

एकबार अपने दोस्तों के साथ उनकी जिद्द पर शराब पी ली थी और होस्टल के वार्डन के हाथों पकड़ा भी गया था। प्रिंसिपल महोदय ने पापा, मम्मी को ऑफिस बुलाकर ये शिकायत की तो सुनकर माँ वहीं अचेत हो गई। इसके बाद उन्होंने अन्न, जल त्याग दिया और जबतक मैंने उनके सर पर हाथ रखकर फिर कभी शराब न पीने की कसम खाई तबतक मुँह में एक दाना तक नहीं डाला। उस कम उम्र में मन में हजार तरह की इच्छाएँ उठती तो थीं, मगर उन्हें बरबस दबा लेना पड़ता था। हमेशा आँखों के सामने मम्मी-पापा का चेहरा तैर जाता था। बेचारगी से भरे हुए, दयनीय, मिन्नतें करते हुए... उनकी प्रत्याशाओं का बोझ इतना भारी था मेरे कंधों पर कि उनके नीचे दबकर न जाने मेरे अपने सपने कब दम तोड़ चुके थे।

कॉलेज में मेरे क्लास में एक लड़की पढ़ती थी - छंदा! गहरी साँवली मगर सुंदर। किसी तथाकथित नीची जाति की थी। बहुत चुपचाप और गंभीर। न जाने क्यों, मैं उसकी तरफ आकर्षित हो गया था। अधिकतर आँखों ही आँखों में हमारी बातें होती थीं - मौन संवाद... धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी हो गई थी। उस उम्र में अपने विपरीत सेक्स के साथ किसी भी तरह के लगाव या आकर्षण का अर्थ हमारे लिए प्रेम ही होता था। इसलिए मेरे और छंदा के बीच जो भी पनपा, जाहिर है, वह प्यार ही था मेरे लिए। अपनी पढ़ाई पूरी कर घर लौटते हुए छंदा के आँसू देखे तो भावुकतावश उसे शादी का वचन दे दिया।

मगर घर लौटकर उसे एक पत्र भी न लिख सका। लिखता भी तो क्या! अच्छी नौकरी मिलते ही मेरी शादी के लिए एक से बढ़कर एक रिश्ते आने लगे थे। उनमें से मम्मी ने सबसे ज्यादा दहेज लानेवाली लड़की के साथ मेरी शादी पक्की कर दी थी। मुझसे पूछा तक नहीं था। कहा था, मैं जो कर रही हूँ, तेरी ही भलाई के लिए कर रही हूँ। मुझे उनपर यकीन था। उनके फैसले के विरुद्ध जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था। अच्छा बेटा जो था - माँ-बाप का आज्ञाकारी, बकौल सबके, श्रवणकुमार... माँ-बाप का भारी-भरकम काँवर उठाए फिरने के लिए विवश।

दुल्हन लेकर घर लौटते हुए अपने किसी मित्र से सुना था, छंदा ने मेरी शादी की खबर पाकर जहर खा लिया है। अस्पताल में पड़ी हुई है, बचने की कोई उम्मीद नहीं... सुनकर अपनी सुहागरात में दुल्हन को बिस्तर पर छोड़कर टायलेट में कमोड पर बैठकर खूब रोया था - मुँह में रूमाल ठूँसकर। उस रात सचमुच स्वयं से घृणा हुई थी, अपने दब्बूपन पर मन हिकारत से भर उठा था। कैसा मर्द हूँ मैं! अपने मन की कुछ भी नहीं कर पाता...

फिर जैसे ही मम्मी ने दरवाजे पर आकर आवाज लगाई थी, चुपचाप अपने आँसू पोंछकर कमरे में आ गया था और किसी अच्छे बच्चे की तरह दूध पीकर उमा के बगल में लेट गया था।

दूसरे दिन सुबह-सुबह छंदा के मर जाने की खबर मिली थी, मगर तब तक मैं काफी सँभल चुका था। सुहागरात के दौरान मुझे उमा से प्रेम भी हो चुका था। उन दिनों प्रेम का यही हाल था मेरे जीवन में।

अपने खयालों में उभता-चुभता मैंने नाश्ता किया था - पाव-भाजी - यहाँ का मशहूर नाश्ता। मिसेज लोबो ने मेरा अच्छा मूड, धुले हुए कपड़े और देह से उठती कोलोन की तेज खुशबू को पकड़ लिया था, हँसकर पूछा था, क्या मैन, भोत हैपी दिखता है, कोई स्पेशल बात है क्या? मैं क्या कहता, मुस्कराकर रह गया था।

अपने कमरे में आकर बॉल्कनी में बैठा-बैठा सड़क पर आते-जाते हुए लोगों को देरतक तकता रहा था, मगर देखा शायद ही कुछ था। दिमाग में दामिनी का खयाल था, और कुछ नहीं। अपनी देह में दामिनी की देह को महसूस कर पा रहा था। ऐसा होते ही पूरे शरीर में एक झुरझुरी-सी दौड़ जाती थी।

ये जीवन ने यकायक कैसा मोड़ ले लिया था...! सोचकर भी आश्चर्य हो रहा था। शादी के बाद जिंदगी एक बँधी-बधाई लीक पर चल रही थी। जिम्मेदारियों और दुनियादारी के बीच अपने ख्वाहिशों का खयाल ही नहीं रह गया था। शादी के बाद दूसरे ही दिन उमा ने मेरे सामने गरमा-गरम आलू के पराँठे परोसे, मेरी अलमारी दुरुस्त की, अपने दहेज में लाई हुई चीजें यहाँ-वहाँ सलीके से सजाईं तो मेरा मन एकदम प्रसन्न हो गया। मुझे पति होने के फायदे और सुख का स्वाद मिलने लगा था। एक आत्मगौरव, अहम को तुष्टि कि मैं पति हूँ, किसी का मालिक... कोई मेरे लिए करवा चौथ रखती है, मुझपर निर्भर है, मेरी इच्छा और आदेश पर चलती है। शरीर का सुख भी था। दिनभर की सेवा, अच्छा भोजन और रात में बिस्तर पर देह का सुख, वह भी अपनी इच्छानुसार, अपने मन मुताबिक। उम्र की पहली उठान से एक ही इच्छा मन में पैदा होती रही थी, कोई औरत हो बिस्तर पर जो बिना न-नुकुर किए मेरी हर बात मानती चली जाय, मैं जो कहूँ, वही करे, मुझे करने दे।

उमा वैसी ही स्त्री थी। पति की इच्छा उसके लिए सर्वोपरि हुआ करती है। वह बिना किसी तरह का सवाल उठाए आजतक मैं जो कहता हूँ, वह करती आई है। बिस्तर में भी। एक सुंदर स्त्री की जो आम धारणा हमारे देश में बनती है, उमा वैसी ही थी - गोरी, स्वस्थ और भरी-पूरी। मुझे इससे ज्यादा और क्या चाहिए था। मैं स्वयं को खुश मानता था। उमा भी अपना घर-परिवार, बच्चे लेकर संतुष्ट थी। एक आम औरत को जो कुछ भी चाहिए होता है, वह सब उसके पास था। मेरे जैसे एक मध्यमवर्गीय मानसिकता वाले पुरुष के लिए उमा एकदम सही औरत थी।

मैंने इससे पहले कभी कुछ भी, जो वर्जित समझा जाता है, नहीं किया था। मन में इच्छाएँ उठती थीं, मगर उन्हें दबाने की आदत बचपन से पड़ गई थी। संरक्षणशील परिवार से होने के कारण हर सामाजिक नियम-कानून, रीति-नीति मानने की आदत घुट्टी में पिलाकर डाल दी गई थी। हमेशा से जानता था, वासनाएँ मन के एकांत दुनिया के लिए होती हैं। उनसे समाज को कुछ लेना-देना नहीं। वह नियम पहचानता है, इच्छाएँ नहीं। उन्हें लेकर एक-आध सपने देख लेना और ठंडा पानी पीकर स्वयं को शांत कर लेना - यही होता आया है। इसमें कभी कुछ गलत भी नहीं दिखा। जिस तरह बचपन से हमें और बातों का संस्कार मिलता है और हम उन्हें बिना कोई प्रश्न उठाए स्वीकार करते चले आते हैं, उसी तरह से यह बातें भी थीं। इनसे तकलीफ होती थी, मगर कभी कुछ गलत शायद ही लगा।

जिन लड़कियों को लेकर रातभर सपने देखता था, दिन के उजाले में उन्हें बहन कहकर संबोधित करने में कोई संकोच नहीं होता था। इस तरह से हमारी शिक्षा-दीक्षा, संस्कार हमारा अनुकूलन करते हैं, अनुशासित करते हैं। एक तरफ मन होता है, उसकी ख्वाहिशें होती हैं। दूसरी तरफ समाज और उसके नियम। दोनों के बीच सामंजस्य बनाकर चलते रहना पड़ता है। देह सामाजिक बनी रहती है, मन की अराजकता सपनों, कल्पनाओं की दुनिया में छिपी, सिमटी, सुरक्षित रहती है। कुछ चालाक, तेज-तर्रार लोगों की तरह दूसरों की आँखों से काजल चुराने की तरह छिपकर, चुपचाप अपने मन की कर लेने की सद्बुद्धि कभी थी नहीं। पढ़ने-लिखने में तेज होना और जीवन की इन बातों में तेज होना दो अलग-अलग बातें होती हैं। आज इतने वर्षों बाद समझ पाया हूँ, मैं स्मार्ट होकर भी कितना बुद्धू हुआ करता था। न जाने किन बातों और आदर्शों के पीछे अपनी आधी से अधिक जवानी बिता दी।

आज जब वर्ज्य का अतिक्रमण कर इस अजनबी देश में पहुँच गया हूँ, तब खयाल आने लगा है, अबतक क्या-क्या खोया है। कैसे-कैसे सोने-चाँदी के दिन, निशिगंधा-सी महकती रातें...

पूरी तरह से अपनी इच्छाओं के वश में होकर मैंने जैसे स्वयं से ही एक वादा किया था, अबतक जीवन के जिन खूबसूरत अनुभवों को खोया है, उन्हें जरूर जीना है - किसी भी कीमत पर... उस समय आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ दामिनी का चेहरा था - इच्छाओं के बहाव में केसर होता हुआ, साँझ के रंग में रँगी किसी अलस, मंथर नदी की तरह... यकायक मेरी सारी वर्जनाएँ टूट गई थीं। एक तटबंध टूटी तेज धार की तरह मेरा बहना अब अपरिहार्य है, किसी के रोके से न रुक सकूँगा, मैं जानता हूँ, शायद तभी इतना अशांत हूँ। अपने आप का अपने वश में न होना एक भयभीत कर देने वाला अनुभव होता है। प्रेम एक अनिर्वचनीय खुशी के साथ कितनी पीड़ा और संत्रास भी ले आता है जीवन में, टीसता हुआ सुख - हर प्रहर, क्षण-क्षण...

बैठे-बैठे आज मैंने पहली बार दिन के समय एकसाथ बीयर की न जाने कितनी बोतलें पी ली थी। मिसेज लोबो का फ्रिज खाली हो गया था। शाम को मुझे इसकी भरपाई करनी पड़ेगी - बीयर का एक पूरा क्रेट लाकर। हम दोनों के बीच इसी तरह की अंडर स्टैंडिंग थी। वैसे आज मैंने पहली बार अपनी सीमाएँ तोड़ी थी - इतनी पीकर!

नींद खुली तो समझ पाया मैं सो गया था - न जाने कब! बॉल्कनी में बैठ-बैठे, ईजी चेयर पर। शाम की धूप में नीम का पेड़ सुनहरा होकर झिलमिला रहा था। डालों पर पक्षियों की अनवरत कीचिर-मिचिर... आँखें मलते हुए समझ पाया था, मोबाइल की लगातार बजती हुई घंटी ने मेरी नींद तोड़ी थी। फोन पर दामिनी का स्वर था - क्या कर रहे हो?

तुम्हारा खयाल... एक निहायत आम-सा रोमांटिक जवाब - और तुम?
 
तुम्हारा इंतजार... उसका भी वही - एक-सा जवाब। हम दोनों अपने अनजाने एक ही रेखा पर चल रहे थे शायद।

तो फिर देर किस बात की, चले आओ...

उसके निमंत्रण में न जाने कैसे प्रलोभन का आभास था, मेरे अंदर अनायास अनाम इच्छाएँ आँच देने लगी थीं।

हाँ, आता हूँ...

मैंने यह कहते हुए फोन रख दिया था। इसके सिवा मुझे कहना भी क्या था। उसने बुलाया था, मुझे जाना था - जाना ही था। मुझे अपना यह अधैर्य, एक किशोर की तरह की उमंग - सबकुछ आश्चर्य में डाल रहा था। मैं नहीं जानता था, मेरे अंदर जीवन की इतनी सारी इच्छाएँ भरी हुई हैं! कितना शांत, सयंत हुआ करता था मैं - अशेष त्यागी - एक बहुराष्ट्रीय कपंनी में उच्च पदस्थ अधिकारी, दो बच्चों का बाप, पैंतालीस वर्ष की परिपक्व उमर... एक नए-नए प्यार में पड़े किशोर की तरह बेसब्र और बेकरार... तैयार होते हुए मुझसे टाई की गिरह भी ठीक से दुरुस्त नहीं की जा रही थी। आईने में अपना उत्तेजना से लाल पड़ा हुआ चेहरा देखकर मुझे खुद पर ही हँसी आ गई। ये क्या हाल हो रहा है मेरा... क्या मुझे प्यार हो गया है? मैं किसी से पूछना चाहता हूँ। यकायक स्वयं को बहुत असहाय महसूस करता हूँ। किले की मजबूत दीवार पर सेंध पड़ गई है। नींवों में कंपन है, बहुत हल्का, मगर स्पष्ट, अब न जाने क्या कुछ धराशायी होकर रह जाएगा...

इसके बाद मेरी दुनिया बदलती चली गई थी। सबकुछ नया, अलग, अनोखा - सिरे से... मैं पहले की तरह ऑफिस जा रहा था, फोन पर उमा से बातें कर रहा था, घर-परिवार की खैर-खबर ले रहा था, मगर अंदर से मैं मैं नहीं रह गया था। कोई और बन गया था, शायद वह जो हमेशा से था, मगर कभी बन न सका था - जुर्रत ही नहीं हुई थी। मैं एक बेटा बन सकता था। पति और बाप बन सकता था, मगर बस अशेष नहीं बन सकता था - जो मैं वास्तव में था। न जाने कितने पर्तों के नीचे दब गया था, जी रहा था कहीं से, इसका पता भी खुद को नहीं था। आज जब स्वयं के सामने अपना वजूद खुलकर आया है, मैं जैसे स्वयं को ही पहचान नहीं पा रहा हूँ। कितनी इच्छाएँ हैं अंदर, कितने सपने और अभिलाषाएँ - आधी-अधूरी और बेकल... इनकी तड़प का, खामोश सरगोशियों का अहसास कैसे अबतक नहीं था मुझे...!

कलतक की भाग-दौड़, शोर-गुल और परेशानियों से भरी दुनिया एकाएक अच्छी हो गई है - बहुत-बहुत अच्छी। आकाश का गहरा नील मुझे मुग्ध करता है, ढलते हुए सूरज को मैं निष्पलक तकता रहता हूँ। इतनी सुंदरता और मैंने देखी नहीं...! अबतक क्या कर रहा था मैं, कहाँ था...?

दोपहर के निर्जन में कोयल कूकती है और मैं अनमन हो उठता हूँ। मीटिंग के बीच से उठकर कहीं निकल पड़ने को मन करता है - सबकुछ छोड़-छाड़ के। बहुत उदार भी हो गया हूँ। भिखारियों को पास बुलाकर खुद भीख देता हूँ। विंडो शॉपिंग करता फिरता हूँ। हर खूबसूरत कपड़े, गहने को देखकर सोच पड़ता हूँ, यह दामिनी पर कितना फबेगा। ढेर सारी खरीददारी करता हूँ, उन उपहारों को पाकर जब दामिनी का चेहरा खुशी से खिल पड़ता है, मैं मुग्ध होकर उसे देखता रह जाता हूँ - यही मेरा प्राप्य है, पुरस्कार है। मैं गहरे, अनाम सुख से भर उठता हूँ। रगो-रेश में सुख मचलता है अल्हड़ नदी की तरह।

इन दिनों दुनियादारी की बातें निरर्थक लगती हैं, सोच उठती है, ये लोग मुझे अकेला क्यों नहीं छोड़ देते - मेरा ही जीवन मेरे लिए - थोड़ी देर के लिए... इतना तो दिया है सबको, मेरा जीवन और ही जीते आए हैं हमेशा! एक कचोट बनी रहती है भीतर, ठग लिए जाने की, अपने मन की न कर पाने की, जीने की। वह समय जो बेआवाज गुजर गया, जवानी की सारी खूबसूरत नियामतों के साथ, उसे वापस लाना है - किसी भी कीमत पर। इन सब की कीमत क्या होगी, मैं समझ सकता हूँ। मगर अब ऊहापोह का समय बीत चुका है, जो होना है वह अवश्यमभावी है।

मैं जीना चाहता हूँ - सचमुच जीना चाहता हूँ। खुलकर - सही अर्थों में। इसलिए मुझे इसकी सारी शर्तें भी मंजूर हैं। मैंने स्वयं को पूरी तरह से हालात के हाथों में सौंप दिया है। जब मैं दामिनी के साथ होता हूँ, सिर्फ उसी के साथ होता हूँ। मेरे लिए उन क्षणों में और कहीं कोई नहीं रह जाता। दामिनी से मेरी दुनिया शुरू होती है और उसी पर खत्म हो जाती है। हम दोनों के बीच तीसरा कोई नहीं होता।

दामिनी कोई साधारण स्त्री नहीं थी मेरे लिए। वह जादू थी - खालिस जादू... उसके साथ मेरा होना सपनों में होना होता था। मैं सच और झूठ के बीच की किसी स्थिति में होता था। बेतरह उलझा हुआ, मगर छूटना नहीं चाहता था किसी तरह इस उलझन से, बना रहना चाहता था इस मायावी लोक में उसके साथ - हमेशा के लिए। ऐसा ही था उसके मोह का बंधन, पक्षी खुद को जाल में लपेटकर निश्चिंत हो जाया करती है। उस बहेलिया के छोटे-से पिंजरे में मुक्ति का एक पूरा आकाश है, यह सच वह पक्षी ही जानता है, तभी तो सलाखों के निर्मम घेरे के बीच रहकर भी उम्मीदों के गीत गा लेता है... कुछ सच पूरी दुनिया के लिए हमेशा झूठ ही बने रहते हैं। यह भी उनमें से एक था।

उसके धूप-छाँव भरे व्यक्तित्व का अनोखापन मुझे भूलभुलैया-सा रोमांचकारी प्रतीत हो रहा था। मैंने उसके पास आना चाहा तो उसने कितनी सहजता से यह होने दिया। कहीं कोई प्रतिरोध नहीं था, बाधा नहीं थी, इसलिए मैं उसमें निर्विरोध धँसता चला गया। आगे क्या बदा है मेरे भाग्य में मैं नहीं जानता - जानना चाहता भी नहीं। कभी-कभी तो यह होता है कि दाना चुगती चिड़िया जाल को निमंत्रण की खुली बाँहें समझकर उसमें निश्चिंत होकर सिमट आती है। मुश्किल तो तब होती है जब वह वापस उड़ना चाहती है। अक्समात उसे ज्ञात होता है कि उसका आकाश तो हमेशा के लिए उससे छिन चुका है! उसके अभागे पंखों के लिए अब कोई उड़ान शेष नहीं।

मगर मैं अपने इस रेशम डोर-से बंधन में खुश था। फिलहाल तो ये दिन तितली के परों की तरह खूबसूरत और रंगीन थे।

मार्च का महीना गोवा में तेज धूप और चटक रंग फूलों का है। समंदर के किनारे छोटी पहाड़ियों की ढलानें काजू के लाल, सुनहरे फलों से दहकती-सी जान पड़ती हैं। पलाश, सेमल के गहरे रक्तिम फूलों से चारों तरफ आग लगी हुई होती है। वन्य हरियाली के बीच यहाँ-वहाँ सौ-पचास घरों की भूरी-कत्थई टाइल्स की छतें रह-रहकर चमकती हैं - चटक रंगों के बोगनबेलिया से घिरे हुए। रास्ते के किनारे फूले कृष्ण चूड़ा के पीले फूल दोपहर की तीखी धूप में अलस झरते रहते हैं। बँगलों के बरामदे में बैठे हुए वयस्क, बुजुर्ग लोग ठंडे उर्राक की चुस्कियाँ लेते हुए गर्मी के आलस्य से ऊँघते हुए-से चुपचाप बैठे रहते हैं। रास्ते पर आने-जानेवालों का हालचाल पूछते हैं।

 


कई बार गाँवों की सँकरी पगडंडीनुमा सड़कों पर निरुदेश्य भटकते हुए हम इन लोगों का हाथ उठाकर अभिवादन किया करते थे। दामिनी उन्हें रश्क से देखकर कहती थी - कितने लकी हैं न ये लोग! कैसे निश्चिंत दिन-दिनभर बैठे रहते हैं... मैं उसकी मधु की रंगतवाली पुतलियों में धूप का फैलना-सिमटना देखता और खो जाता - भँवरे की गुँजार-सी चुप्पी हमारे बीच अनमन डोलती रहती-देर-देर तक। कभी मैं पूछता - और हम नहीं हैं लकी... मेरी उँगलियों में उलझी अपनी तराशी हुई उँगलियों को देखकर वह रंग जाती। कई बार उसके चेहरे पर उसके कपड़ों का रंग प्रतिबिंबित होता, मैं उसकी आँखों पर, माथे और गालों पर रंगभरी तितलियों का उड़ना देखता रहता। वह झेंपी-सी मुस्कराहट होंठों पर लिए जंगली फूल इकट्ठा करती चलती, कभी-कभी तिरछी नजर से मुझे देख लेती, तब, जब मैं कहीं और देखता होता हूँ।

दबी हँसी से उसके होंठों के कोने धीरे-धीरे काँपते रहते थे। उन्हें देखकर मैं न जाने किन अनाम इच्छाओं से घिर आता था। दामिनी मेरी आँखों को समझ लेती थी शायद, तभी अनायास यूँ गुलाबी पड़ जाती थी। मुझे ऐसे क्षणों में लगता था, रंगों को उसका सार्थक अर्थ यही चेहरा देता है। फूल न होते, इंद्रधनुष न होता तो रंगों के क्या और कितने माने रह जाते...

सुनसान दुपहरियों में यूँ भटकते रहना हम दोनों को ही अच्छा लगता था। एकबार जंगल में लगी शराब की एक भट्टी में हमने ताजी उतरी शराब की कई घूँट पी थी, वह भी मिट्टी के कुल्हड़ में। वहाँ कोई गिलास उपलब्ध नहीं था। लगा था, सीने से लेकर पेट तक जलकर राख हो गया है। तेजाब की तरह था उसका स्वाद। भट्टीवाले ने ही बिना पानी मिलाए नीट पीने की सलाह दी थी। दामिनी तो वही सीने पर हाथ रखकर बैठ गई थी। हम दोनों को ही झट् से नशा चढ़ गया था। दामिनी की आँखों में लाल डोरे उग आए थे। उलझे-बिखरे बालों के बीच उसका तमतमाया चेहरा और चढ़ी हुई आँखें कितनी उत्तेजक लग रही थी। अपने अंदर की सनसनाहट को दबाते हुए मैंने उसे सँभालकर उठाया था। मुझसे लगी-लगी वह डगमगाते हुए कदमों से चलती रही थी - अशेष, ये मौसम, ये निर्जन दुपहरी और एक अनजान वीराने में मेरा-तुम्हारा यूँ भटकना... कभी नहीं भूलेगा। सब सहेजकर रखूँगी - यहाँ! उसने अपने बाएँ सीने पर एक उँगली रखी थी। मैंने उसकी एक बाँह अपने गले में डाल ली थी - मुझे भी याद रहेगा...

क्या? उसकी आँखें मुझपर थीं - एक बच्ची की-सी कौतूहलता लिए।

तुम्हारा इस तरह बहकना और मुझसे लगकर चलना... अच्छा, अगर ये रास्ता, ये दोपहर कभी खत्म न हो तो...?

तो, तो बहुत अच्छा होगा, अशेष, कुछ करो न कि ऐसा ही हो... वह मचल गई थी - ठीक वैसे ही, एक बच्ची की तरह।

उस दिन मैं उसे उस सेमिट्री में भी ले गया था, जहाँ शैरोन डिसा की कब्र थी। मैंने दामिनी से कहा था, कुछ-कुछ नाटकीय ढंग से ही - चलो, आज तुम्हें किसी से मिलाता हूँ... दामिनी ने मुझे कौतूहल भरी आँखों से देखा था - तो यहाँ भी तुम्हारे परिचित होने लगे! कल तक तो कोई न था! कौन है?

है कोई... उन्नीस साल की लड़की, जो कभी पतंग बनकर सारे आकाश में उड़ते फिरना चाहती थी...

अच्छा! दामिनी की आँखों में असमंजस के भाव थे। जाहिर है, वह मेरी बातों का अर्थ समझ नहीं पा रही थी। मैं उसे शैरोन के कब्र के पास खींच ले गया था। वहाँ पहुँचकर दामिनी की आँखें तरल हो आई थीं। उसने झुककर सिरहाने पर लगे संगमरमर की पट्टी पर लिखा परिचय और संदेश पढ़ा था। उसकी आँखें कुछ और पिघल आई थीं - एक छोटा-सा जीवन - फूलों की उमर की तरह... एक गहरी साँस में डूबी आवाज थी उसकी। किसी निसंग टिटहरी की तरह भटकी-भटकी, उदास...

मैंने गौर किया था, आज उसपर कार्नेशन का लाल फूल नहीं था। न जाने क्यों मैंने अनायास दामिनी की ओर मुड़कर कहा था - मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा, जीवन के बाद भी नहीं। सुनकर दामिनी हल्के से मुस्कराई थी, मगर उसकी आँखें गीली हो आईं थीं, बह पड़ने को तत्पर...

चारों तरफ तेज धूप में चंपा के हल्के पीले फूल जल-से रहे थे। कब्रिस्तान की दीवारों के साथ-साथ गुलमोहर की लंबी कतार थी। झरते हुए नारंगी फूलों से सफेद संगमरमर के कब्र अँटे पड़े थे। अजीब चुप्पी थी वहाँ - गहरी और शांति से भरी हुई। एक प्रच्छन्न उदासी का अनचीन्हा अहसास भी! सलीबों पर पड़ी फूलों की सूखी मालाओं में, लिपी-पुती दीवारों और झाड़ियों में खिले र्निगंध सफेद फूलों में... हर तरफ मृत्यु का शोक और गुजर गए जीवन का उच्छ्वास... यहाँ हवा उसाँसें लेती-सी गुजरती है, कब्रों के चारों तरफ उगे हुए जंगलातों से उलझ-उलझकर, अजीब सरसराहट भरी आवाज में।।

हम उसदिन वहाँ देरतक बैठे थे - एक जमीन तक झुके हुए गुलमोहर के नीचे। वह मेरी गोद में सर रखकर लेटी हुई थी। हवा के झोंकों से रह-रहकर झरते हुए फूलों से जैसे ढँक-सी गई थी। मैं उन्हें चुनकर हटाता रहा था और फिर उसने मेरा हाथ पकड़कर रोक लिया था - रहने दो, अच्छा लगता है... उसकी आँखों में उस समय दोपहर का गहरा नीला आकाश उतरा हुआ था, खोया हुआ-सा, अपना सारा सूनापन लिए... मुझे उन आँखों को देखकर न जाने ऐसा क्यों खयाल आया था कि दो उजली कश्तियों में पूरा समंदर सिमट आया है! अपनी गहराई और अछोर विस्तार के साथ... उसमें डूबता-उतराता मैं बैठा रहा था, बिना कुछ कहे। हमारे बीच पसरी हुई सुगंध और अनाम उदासी की उस खूबसूरत चुप्पी को मैं तोड़ना नहीं चाहता था। एक पारदर्शी दुपट्टे की तरह उस निर्जन दुपहरी का नीरव सुकून हमें देरतक घेरे रखा था।

उस रात उमा का फोन आया तो उसकी बातों, अनुभूतियों के साथ मैं स्वयं को जोड़ नहीं पा रहा था। कहीं से कुछ बहुत सूक्ष्म टूटकर दरक गया था। अनायास मैंने महसूस किया था हम दोनों के बीच - हमारे और उमा के बीच - दामिनी है! किसी अदृश्य डोर की तरह नहीं, बहुत स्पष्ट और मांसल - एक वास्तविकता जिसे किसी तरह नकारा नहीं जा सकता। मैं पूरे ध्यान से उमा की बातें सुनने की कोशिश कर रहा था। मगर बात करते हुए थोड़ी देर बाद अचानक रुककर उमा ने पूछा था, मन, आपका ध्यान किधर है?

मैं एकदम से सकपका गया। कितनी तीक्ष्ण होती हैं औरतों की नजर, कुछ भी नहीं छूटता इनसे - छोटी-से-छोटी बात भी। मुझे सावधान रहना पड़ेगा... मैंने खुद को चेताया था।
 
फोन रखते हुए मैंने उमा के इस समय के चेहरे की कल्पना करने की कोशिश की थी। उलझे बाल, थका और विरक्त चेहरा... दिनभर के कामों से ऊबी और चिड़चिड़ाई हुई! कभी स्वयं को घर-गृहस्थी की बातों से अलग नहीं कर पाती, अधिकांश हाउस वाइफ की तरह। निजता के चरम क्षणों में भी वही घर बीच में खड़ा रहता है, धुआँए चूल्हे और दाल-चावल के हिसाब-किताब के साथ। उसकी देह से ही नहीं, उसकी बातों और सोचों से भी उसकी रसोई की गंध आती है। उसी में रस-बस गई है इस कदर कि अब उनके बिना उसके वजूद की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बच्चे तो चुहल ही करते रहते हैं - माँ को देखते ही पालक पनीर, आलू-पुरी की याद आती है, भूख लगने लगती है। माँ के शरीर से आज मखनी दाल का फ्लेवर आ रहा है, जरूर मखनी दाल ही बनी होगी...

मैं ये सब इतनी सहजता से नहीं कह सकता। बात घुमा-फिराकर कहनी पड़ती है - तुमने वो नया परफ्युम ट्राई किया? अभी नहाओगी तो लगा लेना...

उमा चिढ़ जाती - अभी नहाऊँ! अरे सुबह-सुबह तो नहा लिया रसोई में घुसने से पहले। तुम्हारी स्वर्गवासी माँ ने ही तो यह अच्छी आदत लगाई है। बिना नहाए रसोई की चीजों को हाथ कहाँ लगाने देती थीं... इसके बाद मैं चुप हो जाने में ही अपनी गनीमत समझता था। मेरी माँ का प्रसंग आते ही उमा के जख्मों के टाँके उधड़ जाते थे। फिर तो वह शुरू ही हो जाती थी। कभी-कभी दिनों तक के लिए। माँ ने उसे शुरू-शुरू में बहुत सताया था, यह कहने में अब संकोच नहीं होता। उन दिनों मैं उमा की इस मामले में कोई मदद नहीं कर सका था। मूक दर्शक होकर सबकुछ देखते रहने के सिवा मेरे पास और कोई दूसरा चारा भी नहीं था। अच्छा बेटा जो था।

न जाने क्यों इन दिनों उमा की शिकायतें बढ़ती ही जा रही है - घर की जिम्मेदारियों की, बच्चों की - अनुशा पढ़ाई ठीक से नहीं करती, विनीता बिगड़ती जा रही है... फिर बीच-बीच में वही सनातन ताना - तुम्हें क्या, तुम तो वहाँ जाकर बैठ गए हो। यहाँ मैं अकेली गृहस्थी के चूल्हे में मर-खप रही हूँ। कई बार उसने मिसेज लोबो की बाबत भी पूछा था। उनकी पचपन साल की उमर सुनकर कुछ आश्वस्त हुई-सी प्रतीत हुई थी। मगर रह-रहकर संदेह का काँटा जरूर कहीं गड़ता रहता था। कभी गोवा की सोसायटी के विषय में पूछती तो कभी यहाँ की लड़कियों के विषय में - सुना है, वहाँ का जीवन बहुत उन्मुक्त है! पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव है... टीवी पर दिखा रहे थे उसदिन, अपनी शादी में दुल्हन घूँघट उठाकर नाच रही थी...

उसकी बातों पर कभी मुझे खीज होती थी तो कभी हँसी भी आ जाती थी। कई बार समझाने की कोशिश की थी - हर संस्कृति की अपनी विशिष्टता होती है। हमें उन्हें सराहना और उनका सम्मान करना चाहिए।

‘हाँ, मगर उनका अंधानुकरण नहीं...’

उमा जिद्दी बच्ची की तरह अपनी बात पर अड़ जाती। पता नहीं, इन बातों से वह क्या साबित करना चाहती थी। शायद यह उसके अंदर का असुरक्षा बोध था जो उसे अतिरिक्त आक्रामक और डिफेंसिव बना रहा था। एक अजनबी कल्चर के प्रति उसके पूर्वाग्रह उसे शक और संदेह की ओर धकेल रहे थे। शायद मेरी उदासीनता और अन्य मनस्कता को उसने सूँघ लिया था। इन दिनों मुझे लेकर वह शंकित और सतर्क थी। उसकी बातों और घुमा-फिराकर किए गए सवालों से यह बात समझ सकता था मैं।

मैं उसके प्रति संवेदनशील बना रहना चाहता था, मगर क्या करूँ कि अन्यमनस्क होता जा रहा था। हर क्षण ध्यान दामिनी की तरफ लगा रहता था। जीवन में सही मायनों में रोमांस अब आया था। दामिनी एक मुकम्मल औरत थी - हर अर्थ में! उसका हर रूप, हर अंदाज मुझे चकित करता था, सुखद ढंग से विस्मित भी। हर बड़ी से बड़ी तथा छोटी से छोटी बात में वह अपना सौ प्रतिशत देती थी। उसके किसी काम में मैंने कोई कमी या उपेक्षा नहीं देखी थी। उसका हर काम सुंदर और सुगढ़ हुआ करता है। वह जिस तल्लीनता से पेंटिंग्स् बनाया करती है, उसी तल्लीनता से चाय भी बनाती है। उसके घर के हर कोने से, हर बात से उसका व्यक्तित्व झलकता है। मैंने अपने आजतक के जीवन में किसी औरत को इतना सुरुचि संपन्न तथा सलीकेदार नहीं देखा था। उसके कॉटेज में पँहुचकर प्रतीत होता था मानो किसी हेल्थ स्पा में पहुँच गया हूँ। उसका चेहरा, उसकी बातें, उसका स्पर्श - सब में लज्जत और सुकून था, जैसे कोई ठंडा फाहा या बाम...

मैंने कभी स्वयं को किसी माने में विशिष्ट नहीं समझा था। एक अच्छी नौकरी, बीवी, बच्चे... कोई खास बात नहीं। स्वयं को बहुत बौद्धिक भी नहीं मानता। पढ़ना पड़ता था इसलिए पढ़ता, मेहनत करता था, अच्छे अंकों में उत्तीर्ण भी हो जाता था, मगर इसमें जीनियस होने जैसी कोई बात नहीं थी।

दामिनी ने मुझे पहली बार विशिष्ट होने का अहसास कराया था। मेरी हर बात में उसे कोई खासियत नजर आती थी। कभी-कभी मैं सोचने लगता था, प्रेम वास्तव में अंधा होता है। मैं आईने के सामने खड़ा होकर स्वयं को देखता - साधारण कद-काठी और सूरत। कोई अनोखी या असाधारण बात नहीं। पता नहीं, दामिनी जैसी खूबसूरत और सुरुचि संपन्न औरत ने मुझमें क्या देखा। हमारी उम्र में भी काफी अंतर था। मैं चालीस पार कर रहा था, वह पच्चीस की थी। जिस खुशी और सुख की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था वह सब अचानक मेरी झोली में आ गिरा था।

मुझे दामिनी का जीवन अनोखा प्रतीत हुआ था। उस जैसी एक युवा और खूबसूरत स्त्री का एकदम अकेली रहकर जीवन यापन करना... सहज-स्वाभाविक बात नहीं लगती थी। हालाँकि गोवा का सामाजिक जीवन देश के अन्य हिस्सों की तुलना में स्त्रियों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जा सकता है, फिर भी...

दामिनी की बातों से एक बात मैं समझ सका था कि उसे अनावश्यक, अतिरिक्त कौतूहल पसंद नहीं। वह मेरे जीवन के व्यवहारिक पक्ष से एक तरह से उदासीन ही रहती थी। न अपने विषय में ज्यादा कुछ बोलना ही पसंद करती थी। कहती थी, ये सब सेकेंडरी बातें हैं, बाद में होती रहेंगी, पहले तो तुम्हें - अशेष को - एक मनुष्य, एक व्यक्ति के रूप में जान लूँ। अगर तुम ही न सही हुए तो फिर तुम्हारी डिग्री, ओहदे का क्या करूँगी... अचार डालूँगी? कहते हुए वह अपनी हँसी के शरीर, इंद्रधनुषी बुलबुलों में फूट पड़ती - प्यार इनसान से किया जाता है अशेष बाबू, शादी खानदान और नौकरी से... जो मैं आपसे कभी करनेवाली नहीं।

अपने विषय में पूछे गए प्रश्नों को भी वह बड़ी चतुराई से टाल जाती थी। एकबार कहा था, अचानक थमककर - अपने घावों को कुरेदने का हौसला हर समय नहीं होता। थोड़ा समय दो...

मैंने इंतजार करना ही उचित समझा था। दामिनी जैसी व्यक्तित्वमयी स्त्री के साथ कुछ भी जबर्दस्ती नहीं किया जा सकता, इतना तो अबतक मैं समझ ही सकता था। कोई गलत हरकत करके उसे खो दूँ, ऐसा मैं कभी नहीं चाहता था, बहुत कीमती थी वह मेरे लिए...

एकदिन उसने मुझसे पूछा था, अच्छा अशेष, एक बात कहो तो, दुनिया की आधी आबादी को नकारकर तुम पुरुष इसे मुकम्मल किस तरह बनाना चाहते हो? जबतक औरत को इसका हिस्सा नहीं बनाओगे, ये दुनिया खूबसूरत कैसे होगी... उसकी बातों से मुझे लगा था, उस बर्फ के गोरे जंगल में कहीं आग की एक गहरी, सुर्ख नदी है। मैने एक कमजोर-सी बहस की थी, ऐसा क्योंकर सोचती हो, इस देश में स्त्रियाँ पूजी जाती हैं - सीता, द्रोपदी...

इनका नाम न लो! इन देवियों से हमें बस आँसुओं की विरासत मिली है। तुम मैत्रेयी, घोषा, जाबाला, गार्गी जैसी स्त्रियों की बात क्यों नहीं करते, जो फूल, पत्थर और अंगार से बनी थीं। मैं चुप हो गया था। वह हँसी थी - औरतें नरक की द्वार होती हैं, मगर इसी नरक के द्वार से सारे संत, पैगंबर और अवतार का आर्विभाव इस दुनिया में होता है। वह शैतान की बेटी है, मगर पैगंबर की माँ भी है, यह बताना लोग क्यों भूल जाते हैं? सच अशेष, जिन औरतों की तुमलोग बातें करते हो, वे पैदा नहीं होतीं, बना दी जाती हैं - मेड इन वर्ल्ड... उन लोगों की मानसिकता सोचो जो कहते हैं स्वतंत्र सिर्फ वेश्याएँ हो सकती हैं। इनसान की सबसे बड़ी रूहानी जरूरत को कैसा गलीज इल्जाम दे दिया...

मैं अपनी नीरवता की एकमात्र पूँजी सहेजे उसके चेहरे पर घुले केसर को देखता रहा था। अपने आवेश के क्षणों में वह अद्भुत दिखती थी। उसे देख, महसूसकर ही खयाल आया था, औरत खालिस जादू होती है। स्वयं को बूँदभर खर्च किए बगैर पुरुष को पूरी तरह आत्मसात कर लेना अपने आप में एक विलक्षण प्रक्रिया है, जो वह हमेशा करती है।

उसने मेरी सोच को एक नई राह दिखाई थी। अबतक मैं हर चीज को उसी रूप में लेने का अभ्यस्त था जिस रूप में वह मेरे सामने आती थी। मैंने सवाल करना नहीं सीखा था, बस जवाब रट लेता था - वह जो मुझे सिखाया जाता था। क्यों, किसलिए जैसे शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं थे। मगर दामिनी तो स्वयं एक जीता-जागता प्रश्न थी। जिस बात पर यकीन नहीं करती थी, उसे कभी करती भी नहीं थी। करना है, ये बात अहम नहीं होती उसके लिए, क्यों करना है, इस बात को समझना पहले जरूरी है।

उसकी बातें मुझे अक्सर स्तंभित कर जाती थी। उसे समझने का - रुक-रुककर सही, एक सिलसिला जरूर चल पड़ा था। मैं उसे जितना जान-समझ रहा था, उतना ही अभिभूत होता जा रहा था।

‘पहली रात बिस्तर पर गिरे बूँदभर रक्त के धब्बे को देखकर पुरुष अपना विजय परचम लहराता फिरता है, वही स्त्री चुपचाप उसकी खून की रेखा वंशवृक्ष को सींचने में लगा देती है। युगों की धमनियों में यह खून अनंत काल तक दौड़ता रहेगा... ‘नश्वर स्त्री पुरुष को अमर कर देने में भी सक्षम है,’ अपनी कजलाई आँखों में कौंध भरकर उसने एकदिन कहा था। सुनकर उसकी मसृन त्वचा पर मेरी अबाध्य अँगुलियाँ ठगी-सी रह गईं थीं। क्या कहूँ कि उसकी बातें मुझे अक्सर निर्वाक कर जाती थीं।

अधिकतर संभोगरत होने के बाद जहाँ मैं पूरी तरह चुक जाने की मनःस्थिति में हो आता था, वह ज्वार उतरी नदी की तरह शांत, धीर पड़ी रहती थी। उसकी देह की जमीन लश्कर गुजरी फसल की तरह रौंदी हुई दिखती थी, मगर वह प्रकृति की तरह शांत, संयत रहती थी - बार-बार सँभल जाने की अनंत संभावनाओं के साथ। झंझा क्षण के लिए होती है, परंतु सृष्टि सनातन, यही प्रतीति उसके सानिध्य में होती रहती थी।

एकबार मेरी बाँहों में किसी नदी की तरह सरसराते हुए उसने कहा था - औरत नदी की तरह होती है अशेष, कहीं ठहरती नहीं, मगर अपने किनारों में जीवन को ठहराव देती जाती है। सारी महान सभ्यताओं का इतिहास देख लो, किसी न किसी नदी की देन है। दरअसल नदी जहाँ भी जाती है, जिंदगी वहीं चली आती है।

उस समय मैं उसे अपनी बाँहों में न बाँध पाने की विवशता में विक्षुब्ध हो रहा था। उसे पूरी तरह पाने की, जीने की दुर्दांत इच्छा में मैं प्रायः उसे बिस्तर पर बुरी तरह रौंद डालता था, उसमें गहरे तक उतरकर उसकी सीमा थाह लेना चाहता था। मैं कभी कितना नादान हुआ करता था, क्षितिज की धूमिल रेखा को आकाश की सीमा मान बैठा था!

मैं चाहता था, वह एक विग्रह की तरह मुझे अपने अंदर स्थापित कर ले, मुझे साँस-साँस जीए, अपने रगो-रेश से सींचे और और जन्म दे। एक टिपिकल पुरुष की तरह अधिक से अधिक अपने बीज फैलाने की अपनी आदिम प्रवृत्ति में मैं उसे भी अपने औरस से फलीभूत देखना चाहता था शायद। यही मेरे सनातन दंभ की तुष्टि थी - चरम तुष्टि... उसमें स्खलित होकर मैं उसके अंदर इतना फैलना चाहता था कि फिर वह ‘वह’ न रहे, ‘मैं’ बन जाय।

ओह! मेरा वह विवेकहीन अहंकार... औरत को उसके स्त्रीत्व से बेदखल कर देने की पुरुष की ये सनातन साजिश... मैं कहाँ सफल हो पाया, बल्कि कोई भी कब सफल हो पाया! इस आदिम षड्यंत्र की असफलता प्रकृति की सबसे बड़ी सफलता है, जानता कब से था, मानने का नैतिक बल अब कहीं जाकर जुटा पाया हूँ।

दामिनी के संसर्ग में सोचने लगा हूँ, ये असहाय-सी औरतें दरअसल कितनी सक्षम होती हैं। मर्दों को आकंठ लेती हैं, स्वयं में उतरने देती हैं, फिर विधाता की गढ़ी हुई रचना को अपने साँचे में ढाल उसे दुबारा पैदा कर देती है - उसकी कमियों में अपनी पूर्णता का मिश्रण करके! मर्द उसकी देह की कई इंचें नापकर विजय उत्सव मना लेता है, मगर औरत उसे सोखकर, अणु-अणु जीकर फिर वापस उगल देती है। समंदर की तरह का उसका यह व्यवहार, किसी से कुछ न स्वीकारना, लहरों के हाथों सबकुछ किनारे पर लौटा जाना... उसकी गरिमा है या दंभ, स्वयं विधाता को भी मालूम है क्या...

परिचय के न जाने कितने दिनों बाद उसने मेरे सामने अपने निविड़तम मन की गाँठें खोलनी शुरू की थी - बहुत आहिस्ता-आहिस्ता... जैसे कोई तृषित पशु सतर्क होकर पानी की ओर बढ़ता है - एकबार उसने कहा था, शायद न चाहते हुए भी, किसी संवेदनशील क्षण में -

एक समय था जब मुझे लगने लगा था, मेरे अंदर कोई हँसी या खुशी नहीं बची है। कोई पराग अब मुझे फूल नहीं बना सकता। एकदम ऊसर, बंजर बन गई हूँ... मरु की तरह... जानते हो अशेष, मेरी माँ को मेरी पापा की चुप्पी ने मार डाला था। वे उनसे बोलते नहीं थे। यह दुनिया की क्रूरतम सजा है... आखिर तक वे दीवारों से बोलते-बोलते पागल करार दे दी गई थीं!

मैं महसूस कर सकता था, अपने कहे हुए शब्दों के तासीर से वह अंदर तक लरज रही थी, किसी सूखे, पीले पत्ते की तरह - वे सबसे हँसते-बोलते थे - घर की नौकरानी से, ऑफिस के चपरासी से, पड़ोसियों से, यहाँ तक कि घर के कुत्ते, बिल्ली से भी... मगर माँ को देखते ही उनके चेहरे पर मौन पसर जाता था। वे एकदम से चुप हो जाते थे। ये उनका तरीका था - माँ को सजा देने का! मगर किस बात की, माँ आखिर तक जान नहीं पाई।

इस इमोशनल अत्याचार का कोई हल नहीं था उनके पास। वह शिकायत करती भी तो क्या और किससे।

ऐसे अत्याचार के निशान जिस्म पर नहीं पड़ते। न खून बहता है, न जख्म होता है। इनसान समाप्त हो जाता है बिना किसी प्रत्यक्ष आघात के... आदमी जिंदा रहता है, मगर मर जाता है... मनोविज्ञान में इसे नॉन भरवल एग्रेशन कहा जाता है... वह ठहरकर बोली थी - बहुत बाद में यह बात समझ पाई थी, कॉलेज में मनोविज्ञान पढ़ते हुए...

जानते हो, आदिवासियों के एक समुदाय विशेष में कैसा चलन है? जिस पेड़ को वे गिराना चाहते हैं, उसपर कुल्हाड़ी नहीं चलाते, बल्कि उसे चारों तरफ से घेरकर रोज गाली-गलौज करते हैं, अपशब्द बोलते हैं। कहा जाता है, देखते ही देखते वह हरा-भरा पेड़ सूखकर जमीन पर गिर जाता है... ऐसा ही कुछ हुआ था मेरी माँ के साथ, उन्हें बिना छुए सिर्फ अपनी अवज्ञा और चुप्पी से पापा ने उन्हें मार दिया था।

माँ पहले-पहल समझ नहीं पाती थी। आखिर उनके समर्पण और एकनिष्ठ प्रेम का ये तो जवाब हो नहीं सकता था। पापा का मौन माँ को पागल बना देता था। जैसा कि मैंने कहा, अंत तक वे दीवारों से बात करने लगी थीं। एकबार उन्हें पापा की आवाज में बोलते हुए सुनकर मैं बहुत डर गई थी अशेष। लगा था, माँ सचमुच पागल हो गई है। वह अपना ही नाम लेकर बार-बार पुकार रही थी। मेरे उनके झिंझोड़ने पर वे हँसते हुए बोली थी, तेरे पापा मुझे प्यार से इसी नाम से पुकारा करते थे, शादी से पहले... ऐसा कहते हुए उनकी तरल आँखों की चावनी में अजीब उन्माद था। उस रात मैं सो नहीं पाई थी किसी तरह।

उसदिन दामिनी शुरू से उदास थी। कहा था, आज मेरी माँ का जन्मदिन है। उसके घर पर दो-चार लोग आए हुए थे। उसकी कॉलेज के दिनों की सहेली और उसका पति, पति के दो मित्र। मुझसे मिलवाया था सबको। सिंगापुर में रहनेवाले, अलग मिजाज और कल्चर के। बड़ी आसानी से अपने बीच मुझे स्वीकार लिया था। कोई अवांछित प्रश्न नहीं, कौतूहल नहीं... आधुनिक शब्दावली में ‘कूल गाएज’...

सारा दिन सब समंदर के किनारे ऊधम मचाकर आए थे। अब पार्टी थी - एकदम अनौपचारिक और निजी। पीछे लॉन में चारकोल की खुली आग में मुर्गे और टायगर प्रॉन्स भूने जा रहे थे, नीबू के रस और तंदूरी मसाले के मिश्रण के साथ। हवा में उसी की सुगंध है। नरेन भूनते हुए मूर्ग की सुनहरी देह पर बार-बार पिघले हुए मक्खन का ब्रश फेर रहा है। कोयले की आँच में उसका चेहरा लाल भभूका हो रहा है। शायद नीबू के रस के साथ उसने अबतक बकार्डी के तीन-चार गिलसिया चढ़ा लिए हैं। दोपहर को भी उसने फेनी में लिमका मिलाकर पिया था।

दामिनी की सहेली मीता ने पीना कोलाडा बनाया है, नारियल का दूध, पानी, अनन्नास रस, व्हाइट रम, क्रीम मिलाकर। बकौल उसके पति के, वह दुनिया का सबसे अच्छा कॉकटेल बनाती है। मैंने भी पिया था। वाकई स्वादिष्ट था। काँच के लंबे गिलास में अनन्नास के कटे हुए टुकड़े और चेरी से बाकायदा सजाकर वह पेय सर्व कर रही थी - किसी कुशल विमान परिचारिका की-सी पटुता और और ग्रेस के साथ। पूछने पर दामिनी ने बताया था, वह वास्तव में सिंगापुर एयर लाइंस में बतौर एयर होस्टेस काम कर चुकी है। कुछ दिन पहले ही उसने नौकरी छोड़ी थी। उसे बच्चा होनेवाला था। सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ था। छोटी-सी हॉट पैंट और ब्रा में वह कहीं से भी गर्भवती नहीं दिख रही थी - वह भी पाँच महीने से!

मीता थोड़ी देर के लिए मेरे बगल में आ बैठी थी, शायद दामिनी के ही कहने पर। इधर-उधर की बातें होती रही थीं। उसी ने बताया था, उसकी माँ सिंगापुर की है। बाप भारतीय है, मगर सालों पहले उसके माता-पिता का तलाक हो गया है।

एक समय के बाद मुझे लगा था, वह बहक रही है। अपनी हथेलियों के बीच ड्रिंक के गिलास को गोल-गोल घुमाते हुए तंद्रालस आवाज में बोली थी, जैसे गुनगुना रही हो - मैंने गौर किया है कि यहाँ की औरतें समंदर में साड़ी पहनकर नहाने उतरती है। दैट्स वेरी फनी... आप हिंदुस्तानी लोग देह के संदर्भ में इतने कुंठित क्यों होते हो? इसे कोढ़ या पाप की तरह छिपाते हो...

मुझे उसकी बात नागवार लगी थी। मैंने आवेश में भरकर जबाव दिया था - ये शायद आप न समझ सको, हमारी स्त्रियाँ अपनी देह का सम्मान करती हैं, उन्हें नुमाइश का सामान नहीं समझतीं कि जिस-तिस के सामने उघाड़ती फिरें...
 
आई सी... सुनकर वह अजब ढंग से मुस्कराई थी - तुम्हारे देश में औरतें अपनी मर्जी से कपड़े नहीं उतारतीं, मगर दूसरों की मर्जी से भरी सभा में उसके कपड़े उतारे जा सकते हैं... नहीं! ...पढ़ा था कहीं। मेरे चेहरे के कठिन होते भाव को देखकर वह कहते हुए ठिठक-सी गई थी। मगर उसकी बात सुनकर मैं भी गहरे असमंजस में पड़ गया था। क्या कहूँ यकायक सोच नहीं पा रहा था। मुझे चुप देखकर उसने झिझकते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई थी -

लिबास आराम और सुंदरता के लिए पहना जाता है - अपने को कलात्मक ढंग से छिपाने के लिए और दिखाने के लिए भी। कपड़ा तब गलत हो जाता है जब वह इनसान के लिए कैद या कारावास बन जाता है। पर्दे या हिजाब की शक्ल में कपड़ा खालिस गुनाह हो जाता है। ऊपरवाले ने जिस औरत को बड़ी मेहनत से रचा-गढ़ा है, उसे सात पर्दो से ढाँककर हम उसे ग्लानि में बदल देते हैं। क्या हम अपने सर्जक के इस अनुपम सृजन से इतना शर्मिंदा हैं कि उसे एक पाप की तरह छिपाते फिरते हैं? हम मिट्टी-पत्थर की इस दुनिया को खुली नजर से देख सकते हैं, मगर कुदरत की सबसे हसीन तोहफा औरत को नहीं देख सकते। उसे उम्रभर इस दुनिया की चहल-पहल और मेले से फरार रहना पड़ेगा, उस जुर्म के लिए जो उसने खुद किया नहीं है - अपने होने का जुर्म!

आप सोचिए एकबार, यदि ऊपरवाला औरत को इस दुनिया से छिपाकर ही रखना चाहता तो फिर उसे जल्वागर करता ही क्यों? रख लेता उसे अपनी तरह सूक्ष्म, निराकार करके... जो मिट्टी के बुत मालिक ने खुद रचे हैं, उससे नफरत करनेवाले या उसे जमीन से लापता करनेवाले हम बंदे कौन होते हैं।

उसकी बातें अनोखी थीं, एक नया दृष्टिकोण लिए। मगर मैं अब भी हारने के लिए तैयार नहीं था, इसलिए अपने वक्तव्य के पक्ष में कुछ कहना जरूरी हो गया था, मगर क्या, अब भी सोच नहीं पा रहा था। मेरे चेहरे पर अंदरूनी द्वंद्व की छटपटाहट रिस आई थी शायद, जिसे देखकर उसने एक गहरी साँस ली थी - देवी, गृहलक्ष्मी जैसी उपाधियों से लादकर स्त्रियों के दमन और शोषण का इतिहास इस दुनिया में बहुत पुराना है। उस संस्कृति से औरत को क्या मिलने की उम्मीद की जा सकती है भला, जहाँ उसकी देह पर भी - जो उसका अपना प्रकृति प्रदत्त देश है - उसका अधिकार नहीं। अपनी इच्छा से वह अपने मन के पुरुष का वरण तो नहीं कर सकती, मगर दूसरों की आज्ञा से पाँच-पाँच पतियों को झेलने पर विवश जरूर हो जाती है। एक बात कहूँ, यहाँ धर्म की परिभाषा क्या है? एक असहाय स्त्री को जुए के दाँव पर लगा देना? एक औरत का दूसरी औरत को पाँच पुरुषों में बाँट देना? नमक का कर्ज चुकाने के लिए या बचन निभाने के लिए भीष्म जैसे किसी महावीर पुरुष का चुपचाप बैठकर एक अबला का चरम अपमान देखना...

आई फील लॉस्ट वेन आई थिंक...

अचानक मुझे लगा था, उसने हमारे पूरे अतीत को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इस अतीत की विरासत लिए मैं वर्तमान में खड़ा-खड़ा स्वयं को किसी पुराने गुनाह का जिम्मेदार महसूस करने लगा था। इस अप्रिय प्रसंग को बदलने की गरज से मैंने पूछा था - आप यहाँ के विषय में लगता है, बहुत कुछ जानती हैं!

जी, मगर बहुत नहीं, थोड़ा बहुत। पहले पाँच वर्ष भारत में बिता चुकी हूँ। पहले हृषिकेश में दो साल थी, फिर बनारस, वृंदावन और अब आपके गोवा में।

अच्छा...! मुझे सुनकर सचमुच आश्चर्य हुआ था - आप इतने दिनों तक क्या करती रही है यहाँ?

पूरब को समझना चाहती थी, पश्चिम से मोहभंग हो गया था... अपने गिलास में बचे बीयर को उसने एक लंबे घूँट में समाप्त कर दिया था। मैंने फिर गौर किया था, अब उसकी पुतलियों का रंग बीयर की तरह हल्का भूरा हो आया था। कैसे मौसम और मिजाज के साथ क्षण-क्षण रंग बदलती थी उसकी आँखें... और त्वचा भी - उसकी मधु होती रंगत को देखकर मुझे खयाल आया था।

तेज हवा में अपने रूखे, चमकीले बालों को सहेजते हुए अचानक उसने पूछा था - आपकी शादी हो गई है? यहाँ तो शादी यूनिवर्सल यानी अनिवार्य होती है।

हाँ, मगर अब टूट भी रही है - थैंक्स टु योर वेस्टर्न कल्चर! मैं बीयर के हल्के सुरूर में अब कुछ ज्यादा ही तल्ख होने लगा था शायद। पता नहीं, यह आरोप किसपर थोप रहा था और क्यों।

उसकी आँखों में न जाने क्यों यह सुनते ही गहरी चमक भर आई थी। होंठों ही होंठों में मुस्कराते हुए कहा था - हाँ, आपके समाज में बढ़ते हुए तलाक की घटनाओं का ठीकरा पश्चिम के सर पर जरूर फोड़ा जा सकता है, मगर ये किसी फैशन की अंधी नकल नहीं, बल्कि वहाँ से आई चेतना की नई लहर का परिणाम है। यहाँ रिश्ता हमेशा से एक तरफा होता था - स्त्री की तरफ से। इसलिए निभ जाता था। जीवन और परिवार से मिली हर तकलीफ को औरत अपनी नियति मानकर सह लेती थी। मगर अब औरत समझ रही है, उसका भी जीवन और उसकी तमाम खुशियों पर उतना ही हक है जितना किसी और का। रिश्ते के नाम पर आजीवन एक बंधुआ मजदूर बनकर जीना अब उसे मंजूर नहीं। वह जीवन से अपना हिस्सा माँग रही है। उथल-पुथल तो मचेगी ही। इसलिए आपलोगों के समाज का यह सुदृढ़ किले जैसा ढाँचा चरमराने लगा है। अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेना आपलोग अब सीख लीजिए...

अचानक उसकी बातों से मेरे तन-बदन में जैसे आग लग गई थी। अंदर का कोई घाव दगदगा आया था। चोट पहुँचाने की एक हिंस्र इच्छा से भरकर मैंने कहा था - आप बहुत गलत ढंग से चीजों को देख-समझ रही हैं। पश्चिम की रंगीन ऐनक से आप पूरब की सात्विक संस्कृति को समझ नहीं पाएँगी। मेरे लहजे की धार से उसने यकायक मुझे देखा था - आप मेरी बातों का बुरा न मानें। आप के सामने अपने विचार रख रही हूँ। आप पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं... जी बिल्कुल! मैंने स्वयं को संयमित किया था। ‘देखिए आप की सभ्यता में स्त्री को बहुत बड़ी-बड़ी उपाधियों से विभूषित किया गया है, मगर जब यथार्थ को देखती हूँ तो मन में सवाल उठते हैं।।

‘आपके कनफ्यूजन को समझ सकता हूँ, मगर आप को समझना पड़ेगा, यहाँ की औरतें अलग ही मिट्टी की बनी होती हैं। उनकी सोच, प्रकृति और चरित्र बिल्कुल अलग होती है। हमारी औरतें त्याग, प्रेम तथा सहनशीलता की प्रतिमूति होती हैं। एक तरह से उन्हीं के बल पर हमारे देश और समाज का पूरा ढाँचा बँधा और खड़ा हुआ है। इसलिए तो वे यहाँ पूजनीय हैं। ऐसे ही नहीं कहा गया है कि ‘नारी, तुम सिर्फ श्रद्धा हो।’

कहते हुए मैं शायद कुछ ज्यादा ही भावुक हो उठा था। मगर मेरी बात सुनकर उसके चेहरे पर व्यंग्य की तीखी रेखाएँ खिंच गई थीं। मुझे एकबार फिर गुस्सा आने लगा था। मेरी हर बात पर वह तंज से मुस्कराती है! मुझे गंभीर होते देख अब वह भी गंभीर हो गई थी - आपलोगों की संस्कृति में आप लोगों ने स्त्रियों के लिए तरह-तरह के मिथों का निर्माण करके उन्हें उस इमेज के अनुसार जीने के लिए बाध्य कर दिया है। जो औरत उस इमेज की लक्ष्मण रेखा के अंदर जीए वह देवी, वर्ना छिनाल! अपनी आस्था, प्रकृति और मर्जी के अनुरूप जीनेवालों को कैसा सुंदर और सार्थक नाम दिया है आपलोगों ने। अन्याय सहकर चुप रहनेवाली और आँसू बहानेवाली सीता और द्रौपदी जैसी नारियों को आपलोगों ने अपनी औरतों का आदर्श बना दिया, मैत्रेयी, पुष्पा, घोषा, जाबाला जैसी औरतों को नहीं, जो मोम थीं तो पत्थर भी, बोलते हुए उसकी स्लेटी आँखों में कौंध भर आई थी। मुझे लगा, यह दामिनी के ही शब्द हैं - आज की औरत - बहुत जागरूक और आत्मविश्वास से लबरेज!

न चाहते हुए भी उसकी बातों ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया था। क्या उसकी बातें अनर्गल थीं। वह अब भी आवेश में भरकर बोले जा रही थी - देखिए आपके धर्म और समाज ने औरतों को बहुत ऊँचा स्थान दिया है, मगर सिर्फ बातों में, व्यवहार में नहीं। जो स्त्रियाँ वेदों की ऋचाओं तक का निर्माण कर सकती है उसे कभी नरक का द्वार तो कभी ‘ताड़न की अधिकारी समझा गया? औरत को सिर्फ योनि मान लेना अपनी माँ को गाली देना है... सच, बहुत विसंगति है यहाँ की संस्कृति में। जो देवी है, वही बाँदी है...

मैं निर्वाक था। क्या कह सकता था। उसकी बातें नंगी और तीखी थी, मगर एकदम सच भी। यह एक विदेशी स्त्री का हमारी संस्कृति के प्रति व्यंग्य या कटाक्ष नहीं था, मैं समझ सकता था, बल्कि एक औरत होने की हैसियत से अपने ही दुख और प्रतिरोध वह पूरी संजीदगी से दर्ज करा रही थी।

उसकी बातें अभी खत्म नहीं हुई थीं, कह रही थी - जानते हैं, आज एक और कटु अनुभव हुआ। समुद्र तट पर एक व्यक्ति से परिचय हुआ तो थोड़ी देर में वह बदतमीजी पर उतर आया। मैं उस समय अकेली थी। साथ के लोग दूर पानी में नहा रहे थे। सोचा होगा कि स्वच्छंद विचारों की, देहवादी संस्कृति की उपज है,। आसानी से मान जाएगी...

- प्लीज नो... मैंने सख्ती से कहा था, मगर वह उद्दंड हुआ जा रहा था - वाई नॉट?

नो मींस नो... अचानक मेरी आवाज में इस्पात-सा कुछ कठिन घुल आया था। वह अचकचाकर रुक गया था। मैं उठकर खड़ी हो गई थी - आपलोग किसी स्त्री के खुले व्यवहार को इतना गलत तरीके से क्यों लेते हैं? इसे उसकी चरित्रहीनता का द्योतक मान लेते हैं। अपनी कमजोरियों का आरोपण आप दूसरों पर कैसे कर सकते हैं! हर संबंध का अंत इसी बिंदु पर हो यह जरूरी तो नहीं? सेक्स को लेकर इतनी ग्रंथि, इतनी कुंठा क्यों होती है आपलोगों में!

मगर आपलोग फ्री सेक्स को गलत तो नहीं समझते। अब वह डिंफेसिव होने लगा था - ये सब तो आप के कल्चर में खूब होता है, फिर इनकार क्यों?

हम जो करते हैं अपनी मर्जी से करते हैं, किसी दबाव या मजबूरी में नहीं। उन्मुक्त होने का अर्थ पशु होना नहीं है। हमारी भी पसंद-नापसंद और रुचि होती है... उसका नशा धीरे-धीरे काफूर होता जा रहा था। अब वह काफी सजग दिख रही थी। ‘आप पूरब के लोग खूब चरित्र की बातें करते हैं, मगर सिर्फ स्त्रियों के लिए... ये बहुत बड़ा दोगलापन है। आँकड़े बताते हैं, विश्व में सबसे ज्यादा भारतीय पुरुष ही वेश्यागमन करते हैं, वह भी शादी-शुदा पुरुष...’ तेज-तेज कदमों से चलती हुई मैं होटल की ओर लौटने लगी थी।

- आप ये सब क्यों कह रही हैं, आप पश्चिम की औरतें तो हम पुरुषों से भी ज्यादा आजाद हैं, मैंने भी सुना है, योरोप में हर तीसरा बच्चा नाजायज होता है... न जाने अब वह यह सब कहकर क्या साबित करना चाहता था। उसकी झल्लाहट को समझकर मैं चलते हुए व्यंग्य से मुस्कराई थी - आप को इस बात का ऐतराज नहीं है कि पश्चिम की औरतें इतना स्वच्छंद जीवन बिताती है। आपको इस बात का रश्क है कि पश्चिम में औरतों की देह उसके अपने अधिकार में है और वह सिर्फ अपनी मर्जी से अपना शरीर किसी को सौंपती है और उसका सुख लेती है। आपलोगों का सामंतवादी अहंकार इतना विकट है कि आपलोग स्त्री को भोगना भी अपनी इच्छा से चाहते हैं, उसकी मर्जी या रजामंदी से नहीं। हर जगह आपको अपना वर्चस्व चाहिए - बिस्तर में भी! प्रेम - तथाकथित प्रेम - में भी आधिपत्य की लड़ाई... अहम की अति है ये...

सुनकर मैं शर्मिंदा हो गया था। क्या कहता? एक समय के बाद दामिनी ने ही मुझे बचाया था। मुझे वहाँ से बुला ले गई थी। पीछे मीता जमीन पर लेटकर गाने लगी थी - ओसन ऑफ फैंटसी...

अपना-अपना गिलास लेकर हम कमरे में चले आए थे। दामिनी हल्का चिल करके व्हाइट वाइन पी रही थी। शायद यह उस व्हाइट वाइन का ही असर था कि दामिनी अपनी माँ की बातें करते हुए अनायास इस तरह से भावुक हो उठी थी उसदिन...

अँधेरे में देखे बगैर मैं जानता था, वह रो रही थी, उतना ही धीरे जितना संभव हो सकता था। मेरे उठने का उपक्राम करते ही हाथ बढ़ाकर उसने रोक लिया था - रोशनी मत करना अशेष, यही ठीक है। सोफे पर पड़ा-पड़ा मैं अँधेरे में ही उसे देखने की एक असफल-सी कोशिश करता रहा था। खिड़की पर उड़ते साँझ के रंग न जाने कब पुँछ गए थे। अब वहाँ अंधकार के तरल घोंसले पड़ चुके थे। पिछवाड़े के फूलते चंपा पर कोई रात का पक्षी रह-रहकर बोल रहा था। हवा में माधवी के फूलों की कड़वी-मीठी गंध थी। मैं डूबने-सा लगा था। अंदर उदासी की कोई गहरी नीली नदी बह निकली थी। मैं शायद दामिनी की मनःस्थिति में हो आया था।

अक्सर ऐसा हो जाता था - मैं दामिनी के साथ देह के ही नहीं, भाव के स्तर पर भी एकमेव, एकसार हो जाया करता था। कभी-कभी प्रतीत होता था, मैं उसकी देह की ढूँढ़ में उससे भी आगे चला जा रहा हूँ। ये खयाल मुझे सहमाता था। मैं असुरक्षा की भावना से घिर जाता था। अपनी इस मनःस्थिति को मैंने कभी गंभीरता से लेने का प्रयास भी नहीं किया था। मगर ये अंदर ही अंदर हरदम बना जरूर रहता था।

दामिनी की परछाई धीरे-धीरे हिल रही थी, खिड़की के उड़ते पर्दे की तरह -
 
पापा माँ की बातों का जबाव देना तो दूर, उन्हें सुनने का मर्यादाबोध तक नहीं देते थे। उनकी गहरी उपेक्षा ने माँ के आत्मविश्वास को खत्म कर दिया। वह एकदम असहाय, निर्बल हो गईं। हीन भावना से ग्रस्त। ठुकराई हुई, परित्यक्त... दामिनी उठ खड़ी हुई थी, अँधेरा हिला-डुला था, उसमें भँवर-से पड़े थे। मैं मौन ही रहा था। यही, इसी तरह इस समय उसके साथ होना था।

वह बोलती रही थी - और आखिर एकदिन वही हुआ जो होना था - पापा की चुप्पी ने धीमे जहर की तरह माँ की जान ले ली! वे अपनी निसंगता के कारावास में रातदिन घुटती हुई पापा के मुँह से अपनेपन के दो अदद बोल सुनने के लिए तरस-तरसकर मर गईं...

अपनी बात के अंतिम सिरे तक पहुँचते हुए दामिनी की आवाज पानी होने लगी थी। वह पिघल रही थी, आवाज से देह तक... मैं उसके बहाव में शामिल था, बिल्कुल चुपचाप। अंधकार में पिघले मोम की तरह उसके स्वर की तरलता फैल रही थी - ऊष्ण, आँच देती हुई, रुक-रुककर, मगर निरंतर... मैं जज्ब हो रहा था - सारा का सारा -

'उस दिन शायद पहली बार माँ के न बोलने ने पापा को चौंकाया था। उन्होंने बढ़कर उनका ठंडा पड़ा हाथ छुआ था। पुकारा था - रूप! ...कई बार, बिना रुके - रूपऽ... रूपऽऽ। माँ की पथराई हुई आँखों में अनकहे शब्दों का नीरव जमघट था, मगर स्वर नहीं। वह अपनी सारी कही-अनकही समेटकर चुप्पी के मूक संसार में खो गई थी - इस बार हमेशा के लिए... वह निर्वाक प्रश्न बनी पापा को देखती-सी पड़ी थीं।

उसदिन अचानक माँ के हिस्से का सन्नाटा पापा को मिल गया था। वे बुरी तरह घिर गए थे। और दहल भी। किसी गूँगे के अंदर का मूक हाहाकार उनमें फट पड़ा था। वे खूब रोए थे। अब कोई नहीं था, जिसे पीड़ा पहुँचाकर उन्हें सुख मिलता - अपना परवर्टेड सुख!'

दामिनी की आवाज में अजीब धार आ गई थी, जैसे वह शब्दों के टुकड़े कर रही हो, एक ठंडी घृणा और वितृष्णा से -

'पापा का साम्राज्य छिन गया था, सत्ता चली गई थी। माँ ने हारकर उन्हें सिरे से हरा दिया था। ये हार उनसे बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी। यही तो एक जगह थी जहाँ आकर उनके अहम को तुष्टि मिलती थी। सारी दुनिया का गरल यहीं तो उलीचा जा सकता था। अपने जीवन में वे एक असफल व्यक्ति रह चुके थे - हर अर्थ में, हर संदर्भ में। अब जो माँ नहीं थीं, पापा का कुछ नहीं था, कहीं भी, कोई भी। वे एकदम से कंगाल हो गए थे।

अचानक दामिनी की आवाज सहज हो आई थी। वह स्वयं को समेटने का प्रयत्न कर रही थी। कुछ देर बाद उसने ठहरे लहजे में कहा था - जहाँ से माँ के सन्नाटे का दौर समाप्त हुआ था, पापा का वहीं से शुरू हुआ था। वे दुनिया को क्या, स्वयं को भी भूल गए थे। उनकी आवाज खो गई थी, बोल भी नहीं पाते थे। माँ की तरह दीवारों से बोलने का सुख भी उन्हें नहीं मिला था। उनको अंततः अल्जाइमर हो गया था - भूलने की बीमारी...

कमरे का माहौल बोझिल हो आया था। अनायास, जैसे प्रसंग बदलने के लिए दामिनी उठकर फ्रिज तक गई थी। फ्रिज के अंदर से आती हुई रोशनी की पृष्ठभूमि में उसका पूरा आकार स्पष्ट होकर उभर आया था। मैंने शायद पहली बार गौर किया था, उसकी बाँहें दुबली और कंधे चौड़े हैं। नीचे - पतली कमर से नीचे - उसके कूल्हे भारी और सुडौल थे। यकायक मेरे अंदर आँच की एक सुनहरी नदी-सी फूट आई थी। अपना बीयर का गिलास मेज पर रखकर मैं उठकर पीछे की तरफ से उससे लिपट गया था। मेरे इस तरह अचानक लिपटने से वह चौंक गई थी। उसके हाथ से चेरी का दोना जो उसने अभी-अभी फ्रिज से निकाला था, छूटकर नीचे गिर गया था। वह उन्हें सहेजने के लिए नीचे झुकना चाह रही थी, मगर मैं उसे बिस्तर पर खींच लाया था।

वह हल्के से कसमसाई थी- अशेष...! दूसरे कमरे में गार्गी ने अचानक किसी बात पर जोरदार ठहाका लगाया था। साथ में लायलन रिची का स्वर गूँजा था - सांद्र और हल्की - साँझ की हल्की गर्म हवा में उदास चाहना और कशिश से थरथराती हुई - हलो! इज इट मी यू आर लुकिंग फॉर...।

दामिनी एकबार फिर कसमसाई थी - अशेष, अभी नहीं, घर में इतने सारे लोग हैं...

- कोई नहीं आएगा, सब अपने में खोए हैं... सच, इस तरह से यह ज्यादा एक्साइटिंग होगा... मैंने बेसब्र होकर उसका आँचल खींच लिया था। तरल अंधकार में उसका शरीर किसी कांस्य प्रतिमा की तरह चमक उठा था। मुझमें अब ज्यादा धैर्य नहीं रह गया था। बंधन से मुक्त होते ही उसकी देह की नर्म रेखाएँ सिहरकर कठिन हो आई थीं। अँधेरे में वे हल्के आब से चमकते दो सुडौल मोती की तरह दिख रहे थे। उत्तेजना से थरथराता हुआ मैं उसकी देह की गर्म नदी में उतर गया था... वह भी अब स्वयं को अधिक रोक नहीं पाई थी। हम दोनों के जिस्म की कैफियत उस क्षण एक-सी ही थी... आसपास लोग चल-फिर रहे थे, हँस-बोल रहे थे। कटलरी की ठुनक, काँटे, चम्मच की अनवरत आवाज, संगीत... एकबार मीता कमरे में आकर दरवाजे के पास पड़ी कुर्सी से टटोलकर अपना पर्स भी उठा ले गई थी। मैंने अपनी हथेली से दामिनी के होंठों से बेतरह निकलती सिसकियों को बेरहमी से दबाया था। मगर मेरी साँसें उससे भी तेज होकर सुनाई पड़ रहीं थीं। लेश के उड़ते हुए पर्दे से दूसरे कमरे की रोशनी आकर सीधे दामिनी के अनावृत शरीर पर पड़ रही थी। सुनहरे आलोक में नर्म उठानों की गुलाबी नोंक बँधी कलियों-सी झिलमिला रही थी। ये उभरती आवाजें, कोलाहल... आसपास इतने सारे लोगों का होना और उन सब के बीच बिना दरवाजा बंद किए एक तरह से खुलेआम हम दोनों का एकसार होना मुझे खासा रोमांचकरी लग रहा था। थोड़ी देर के प्रतिरोध के बाद दामिनी ने स्वयं को ढीला छोड़ दिया था।

फीके-से जामुनी अंधकार में उसके होंठों को चूमते हुए मैंने उनपर फैले आँसुओं के गीलेपन और नमक को महसूस किया था। वह निःशब्द रो रही थी। न जाने क्यों उसके आँसुओं से भीगे नमकीन होंठों के स्वाद ने मुझे और भी उत्तेजित कर दिया था। मैं ज्यादा आक्रामक हो उठा था। मेरे प्रहार तेज हो गए थे। साथ में दामिनी की सिसकियाँ भी...

आगे चलकर एकदिन दामिनी ने ही बताया था, उसके पापा की एक अजीब आदत थी। वे माँ से नहीं के बराबर बोलते थे। माँ जब कभी इस बात की शिकायत करते हुए रो पड़ती थीं, वे यकायक उत्तेजित हो उठते थे और माँ को बिस्तर पर उठा ले जाते थे। उन्हें माँ के आँसू एक्साइट कर देते थे। वे अक्सर कहते थे, मधु, रोते हुए तुम्हारी आँखें इतनी खूबसूरत लगती हैं... कई बार तो इसीलिए मैं जानबुझकर तुम्हें रुला देता हूँ। माँ ने अपनी डायरी में लिखा था - न जाने क्यों उन्हें पापा की ये बात सुनकर अच्छा लगा था।

सुनकर मैंने उसके बाल आहिस्ता से खींच लिए थे - चलो, फिर अब मैं तुम्हें रुलाता हूँ... वह सचमुच रोने लगी थी और मैं उत्तेजित हो उठा था! उसदिन हमने दोपहर का खाना भी नहीं खाया था। न जाने कब दिन रात में ढल गया था। दामिनी इस दौरान निरंतर रोती रही थी। मैंने उसे चुप होने नहीं दिया था। इसके बाद कई दिनों तक वह खुश रही थी और हल्की भी - किसी बरसे हुए बादल की तरह... ऐसे में मुझे उसे देखकर खयाल आया था, क्या वास्तव में 'वुमन लाइक ब्रूटस्'...?

एकबार दफ्तर में पार्टी के दौरान हमारा सहकर्मी हेमंत कुलकर्णी औरतों के विषय में अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए बोल रहा था - बालों से पकड़कर औरतों को घसीटो, वे बाध्य रहेगीं...

कौन-सी बात सही थी! दामिनी कहती थी - माँ की कोमलता से रची गई हूँ, इतनी मजबूत तो हूँ ही कि अपने आँसुओं का तटबंध बन सकूँ... मुझे याद है, न जाने किन स्मृतियों में भटककर उसदिन वह रोई थी और फिर अपनी दुर्बलता पर शर्मिंदा हो उठी थी। हँसते हुए अपनी आँखों की नमी को टाला था। ऊपर की तरफ देखते हुए पलकें झपकाती रही थी।

उसकी दुर्बलता के इन क्षणों को मैं अदेखा कर जाता था। जानता था, उसे अपना इस तरह पकड़े जाना पसंद नहीं। हम दोनों शाम की चाय पी रहे थे। उसदिन मैं दफ्तर से सीधे उसके कॉटेज पर पहुँचा था। उसी ने बुलाया था। कह रही थी, अच्छा नहीं लग रहा, बस तुम चले आओ...

चाय का कप मेज पर रखकर वह बॉल्कनी में उठ गई थी। खिड़की पर झुका मौलसिरी का पेड़ फूलों की हल्की, रंगीन मुस्कराहट से भरा हुआ था। हवा पर रह-रहकर झूलती हुई उसकी डाले काँच पर दस्तक-सी देती हुई दुहरी हो रही थीं। आज आकाश का रंग फीका नीला था। वह उसी की तरफ देखती देर तक खड़ी रही थी। और फिर मेरी तरफ मुड़ी थी, अपनी आँखों में वही बचपन और कौतूहल लेकर - अच्छा अशेष, आज हवा में ये कैसी गंध है?... देह का रगो-रेश भीगा जा रहा है। जैसे अंतर में डूब रही हूँ...

मैं मुस्कराकर रह गया था। क्या कहता कि ये तुम हो - इस गंध का उत्स... बिचारी कस्तूरी मृग - अपने ही ऐश्वर्य के तिलिस्म से छली हुई। एक साकार पहेली बनकर वह मेरे सामने खड़ी थी और इतने पास होकर मैं उसकी दुरूह गिरहें सुलझा नहीं पा रहा था। कौन-सी बात इस औरत को छूती है, क्या है जो इसे उदास कर देती है या बहुत-बहुत खुश...

कहते हैं, यदि जानना है कि 'व्हाट टिक्स ए वुमन', उसे बिस्तर पर ले जाओ। बहुत गलत है। एक औरत बिस्तर पर कभी पूरी होती ही कहाँ है! वह तो आधी अपनी रूह में, आधी अपनी मुहब्बत में होती है। बिस्तर पर उसके वजूद का बचा-खुचा हिस्सा ही मिल पाता है, खासकर उनके लिए जो देह की मिट्टी कुरेदने में लगे रहते हैं - उसकी अंदरूनी जरूरत और खूबसूरती से बेखबर... बकौल दामिनी के - ब्लडी स्केभंजर... 'जूठे पत्तल चाटकर पुरुष महाभोज के गफलत में तृप्ति की डकारें लेता रहता है।'

- कभी दामिनी ने ही किस गहरी वितृष्णा से भरकर ये बात कही थी। सुनकर मेरे अंदर का कोई गोपन हिस्सा शून्य हो आया था।

कभी-कभी मुझे शक होता था, दामिनी को पुरुषों से घृणा है। इसके पीछे उसके मन की कोई अनसुलझी ग्रंथि होगी, जिसकी जड़ें शायद उसके बचपन की नर्म जमीन पर गहरे उतरी हुई हैं। अब दामिनी ने स्वयं को मेरे सामने आहिस्ता-आहिस्ता ही सही, खोलना शुरू कर दिया है। उसकी बातों से प्रतीत होता है, उसके अंदर कोई पुराना घाव है जो समय के साथ पुर नहीं पाया है, बल्कि नासूर बन गया है। वह बड़े यत्न से उसे छिपाने की कोशिश करती है, मगर गाहे-बगाहे वह दिख ही जाता हैं। तब महसूस होता है, ये खूबसूरत इमारत वास्तव में एक मकबरा ही है - ताज महल की तरह! ...अपने अंदर मौत की अनंत चुप्पी और नींद समेटे हुए चाँदनी रातों में जागने के लिए युगों से अभिशप्त...

ऐसे मौकों पर कितनी खूबसूरत लगती है सगंमरमर में गुँथी हुई प्रेम की ये उजली कहानी... मगर इस बेपनाह हुस्न के होने की रूहानी विडंबनाओं को कोई समझता भी है! दामिनी की स्थिति भी कुछ-कुछ ऐसी ही थी - एक खूबसूरत जिस्म, एक उदास रूह... अब उसके लिए मेरे लगाव में हमदर्दी भी आ जुड़ी थी। एक अनाथ बच्चे की तरह उसे अपनेपन और प्यार की जरूरत थी। इसी की तलाश में वह मेरे पास आई थी। मुझे पनाह देना ही था। अपने अनजाने ही न जाने कब मैं उसका आश्रय बन गया था। ये एक जिम्मेदारी थी जिसे मैं पूरी ईमानदारी से निभाना चाहता था। एक तरह से यह एक भरपाई थी मेरे लिए, जो मुझे करनी ही थी, बचपन का कोई उधार, अबतक जो रह गया था।

...वर्षों पहले बरसात की एक रात एक बुरी तरह से भीगा हुआ घायल कबूतर हमारे आँगन में आ गिरा था। तब मैं शायद आठ-दस साल का रहा हूँगा। पिताजी ने उसके पैर में दवाई लगाकर पट्टी बाँध दी थी। मैंने एक टोकरी के नीचे उसे ढँककर बरामदे में रख दिया था। सुबह माँ की आवाज सुनकर शायद मेरी आँख खुल गई थी। बाहर आकर देखा था, फर्श पर चारों तरफ उस कबूतर के नुचे हुए पंख पड़े थे। खून के धब्बों पर बिल्ली के पंजों के छोटे-छोटे निशान - नीचे सीढ़ियों की तरफ जाते हुए... रात बारिश के साथ बहती तेज हवा में कमरे की कोई खिड़की खुल गई होगी...

मैं खड़ा रह गया था - एकदम सन्न! एक असहाय, घायल पक्षी हमारी शरण में आया था, मगर हम उसकी रक्षा नहीं कर पाए थे! इस घटना के बाद न जाने कितनी रातों तक मैं सो नहीं पाया था। अपराधबोध के गहरे दंश ने मेरी नींद उड़ा दिया था। बारिश की तूफानी रातों में मुझे पंखों की बेकल छटपटाहट सुनाई पड़ती थी, नींद में रक्त के धब्बे-से बनते-बिगड़ते रहते थे। ओह! कैसा आतंक होता था उन क्षणों का - सनसनाते हुए नीले बवंडर में घिरे हुए...

इस बार मैं इस पक्षी को मरने नहीं दूँगा... मैंने सोच लिया! इन दिनों मैं प्यार में था, इसलिर जाहिर है, बहुत अच्छा बन गया था, बचपन की तरह... ये जज्बा इनसान के अंदर की अच्छाइयों को ढूँढ़कर जीवित कर देता है, एकबार फिर से, यदि खो गया होता है तो!

दामिनी के शरीर की तरह उसका मन भी सुंदर था। शायद इसलिए कि वह प्यार में थी, बकौल उसके - हमेशा से। कहती थी, स्वयं को मेरे समक्ष ईमानदारी से रखते हुए, किसी गहरे आत्मीय क्षण में - अशेष! मैं प्यार में हूँ और सदा से हूँ, तभी शायद इतनी संवेदनशील और पारदर्शी हूँ कि सारे मौसम मुझसे होकर निर्द्वंद्व गुजर जाते हैं - अपने तमाम मिजाज और तेवर के साथ। मैं आँख मूँदकर फूलों का खिलना और तारों का टूटकर गिरना महसूस कर लेती हूँ, किसी का दुख मेरे लिए पराया दुख नहीं है, न किसी के सुख से ही मैं अनजान, अछूती हूँ। तभी शायद हर खुशी में उदास रहती हूँ और हर उदासी में कोई न कोई खुशी ढूँढ़ लेती हूँ...

दामिनी अपने खयालों की तरह ही खूबसूरत और अनोखी थी - हर अर्थ में! उसकी कौंधती हुई आँखों के नीचे उसकी देह का हर अवयव सुंदर था- किसी चंचल, उत्ताल बहती नदी की तरह! अपने तमाम उतार-चढ़ाव के साथ... उसकी हरी-भरी रगों में जीवन पक्षी की तरह चहचहाता था। नाभि की मादक गहराई कमल पत्ते की तरह जल की ढेर सारी बूँदें अपनेआप में सँभाले रख सकती थी। प्यार का लावण्य उसके चेहरे पर मोतिया आब की तरह टलमलाता था। न जाने क्या था उसके चेहरे में, मगर मेरे लिए सबकुछ- सबकुछ था! कभी उसे तकते हुए मेरी पलकें जम जाती थीं और इसी तरह जैसे सदियाँ बीत जाया करती थीं। मेरा जीना-मरना - जो भी - उन्हीं क्षणों में घटता था।

वह अक्सर कहती थी, तुम्हारे संग बिताया हुआ हर क्षण मैंने अपने अंदर सँजों के रखे हैं। अंतस की दुनिया इन्हीं छोटे-छोटे तिलिस्म से बनी होती हैं। इस दुनिया को कभी मौत नहीं आएगी अशेष! हमारे - हमसब के मर जाने के बाद भी नहीं। कयामत के बाद की जिस मुकम्मल दुनिया की कल्पना की गई है न, ये वही दुनिया है - प्यार के मुकद्दस अहसासों की अमल दुनिया! उसकी बातों को सुनते हुए मै उसे देखता रहता था। वह उन विलक्षण क्षणों में कोई साधारण स्त्री नहीं रह जाती थी - देह के संदर्भ में! खुशबू की पारदर्शी नदी बन जाती थी - अपने जिस्म से परे - भावनाओं के आकुल आवेग में अपने सारे तटबंध तोड़ती हुई, किसी समंदर के आजन्म तलाश में... अहसासों की दुनिया...

दामिनी के सुंदर मन की झलकियाँ मुझे उसके व्यवहार में सहज ही मिल जाया करती थी। जैसे उस दिन आवेग से भरे एक निहायत निजी क्षण में उसने मुझसे अचानक पूछा था - उमा कैसी है अशेष? मैं उसमें डूबा हुआ था। उसी मनःस्थिति में कुछ ताच्छ्लिय से कह गया था - ठीक ही होगी! उसने झट आपत्ति की थी - नहीं, ये ठीक नहीं अशेष - तुम्हारा रवैया... प्यार पर अपना वश नहीं होता, मगर जिम्मेदारी... वह निभानी होती है - हर हाल में! उमा, बच्चे तुम्हारी जिम्मेदारी हैं। मेरे लिए यदि तुम उनकी अवहेलना करने लगे तो मैं स्वयं को दोषी मानने लगूँगी... मैंने अँधेरे में उसका चेहरा देखने का प्रयत्न किया था, उसमें संजीदगी थी - उसके शब्दों की तरह ही...

दामिनी के मेरे जीवन में आने के बाद मुझे गोवा का ये नया जीवन, इसका अनोखा माहौल रास आ गया था। पहले समय रेंगता था, अब उन्हें पंख मिल गए थे - कैसे और कब गुजर जाता था, पता ही नहीं चलता था। मैंने अबतक कोई नया मकान ढूँढ़ने का प्रयत्न भी नहीं किया था। दफ्तर से मुझे कई मकानों की उपलब्धता की सूचना भी दी गई थी, मगर मैंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गईं थीं और उमा कुछ दिनों के लिए यहाँ आना चाहती थी। रोज कोई न कोई बहाना करके मैं उसे टाल रहा था। उसकी आवाज में घुली निराशा को महसूस कर मैं दुखी हो जाता था, मगर क्या कर सकता था, मैं भी निहायत मजबूर हो गया था। इस समय अपने परिवार को यहाँ लाकर मैं दामिनी का साथ खोना नहीं चाहता था। उससे एक पल की दूरी भी मुझसे बर्दाश्त नहीं होती थी। जीवन में पहली बार मैंने जाना था, जीना किसे कहते हैं, कैसे जिया जाता है। मैं जीना चाहता था - हर हाल में - सिर्फ दामिनी के साथ...

भीतर हर समय एक द्वंद्व-सा लगा रहता है - सही-गलत का, पाप-पुण्य का, मगर चलती मन की ही है। हर तर्क, बुद्धि, विवेक को ताक पर रखकर मैं इन दिनों जी रहा था, सिर्फ अपनी इच्छाओं के वश में होकर। इच्छा - दामिनी के साथ होने की, उसी में रस-बसकर खो जाने की, एकदम से निःशेष हो जाने की - हमेशा के लिए... अब मेरे जीवन का सबसे बड़ा सत्य बस दामिनी थी, और कुछ नहीं। कई बार मैं उसे दीवानावार कह चुका हूँ - तुम, बस तुम! और कोई नहीं... मेरे उन क्षणों का सच था ये जब उसकी देह के सुख में मैं उभ-चुभ रहा होता था। उसके पार मुझे कुछ और नहीं सूझता था, सारे नाम, रिश्ते, चेहरे एक गहरी धुंध की चादर में खो गए थे, स्मृति के पार चले गए थे। बच गए थे हम - दामिनी और मैं - और कुछ नहीं...

दामिनी ने मुझे जीवन के न जाने कितने अनजाने, अनछुए पहलुओं से रूबरू करवाया था। न जाने कितने रूप ते उसके, कितने चेहरे... हर बार मैं स्तंभित, अभिभूत रह जाता था। सारे रिश्तों का इकट्ठा रूप थी वह - अकेली ही तमाम रिश्तों की एक मुकम्मल दुनिया। कभी माँ की-सी ममत्व से भरी, कभी बहन की तरह शरीर, चंचल और कभी प्रेमिका की तरह रोमानी, हसीन...
 
उसके साथ मैंने जीवन में पहले कभी न किए गए अनुभव किए थे - कभी वह मुझे तरह-तरह के मसाज देती - हॉट ऑयल मसाज, चिकनी मुलतानी मिट्टी का मसाज, और न जाने क्या-क्या। कभी दफ्तर के काम के बाद बिल्कुल चूर होकर उसकी कॉटेज पहुँचता तो वह मुझे सीधे अपने बाथरूम में खींच ले जाती। वहाँ बाथ टब पहले से तैयार होता - गर्म पानी में समुद्री नमक डला हुआ- हल्की, अनाम सुगंध से वाष्पित। साथ में छोटे-बड़े स्टैंडों में जलती हुई रंगीन, सुगंधित मोम बत्तियाँ, बर्फ में ठंडी होती शैंपेन की बोतल। विभिन्न आकार और रंग के तह किए हुए नर्म, मुलायम टॉवल, फूलों के ताजे गुलदस्ते...

मुझसे कहती थी, अपनी सारी इच्छाएँ बतलाओ, वाइल्ड फैंटेसी भी, मैं उन्हें पूरा करूँगी। मैं जानता था, वह - बल्कि वही - उन्हें पूरा कर सकती थी, कर रही थी... मुझे उसकी काबिलियत पर कोई शक नहीं रह गया था। एकदिन मेरे जिस्म पर बर्फ के टुकड़े फिराते हुए उसने कहा था, अपनी उसी सांद्र आवाज में - हमेशा की तरह उत्तेजक और गहरी - देह की सारी इच्छाएँ पूरी कर लो, वर्ना इसके तिलिस्म से कभी मुक्त नहीं हो पाओगे, भटकते रहोगे जन्म-जन्मांतर तक... इस देह से होकर ही मन का रास्ता जाता है। मन तक पहुँचने के लिए इस से होकर गुजरना ही पड़ेगा।

गुजरना क्यों? मैं तो यहाँ हमेशा के लिए ठहरने को तैयार हूँ... मैंने बर्फ का पिघलता टुकड़ा उसके हाथ से लेकर उसकी खुली बाँह से छुआई थी, मुस्कराते हुए।

यही तो तुम मर्दों की आदत है... रास्ते को अपनी मंजिल मान लेते हो। भूल जाते हो वास्तविक लक्ष्य। उसने आपत्ति की थी, बनावटी गुस्से के साथ।

देह का लक्ष्य देह ही है, और क्या! बर्फ का टुकड़ा उसकी ऊष्ण त्वचा पर अबतक पूरी तरह से पिघल चुका था। मेरी बात पर उसने सिहरते हुए अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया था - नहीं, ये लक्ष्य नहीं, सिर्फ साधन है - अपने साध्य तक पहुँचने के लिए...

मेरे लिए ये सब तुम ही हो, तुम चाहे इन्हें जिस नाम से पुकार लो। मैंने उसदिन उसके पाँव गेरू से रंग दिए थे, अपनी गोद में रखकर - ये है मेरी वाइल्ड फैंटेसी! हमेशा से चाहता था, प्रेम करने से पहले अपनी स्त्री के खूबसूरत, उजले पाँव रंग दूँ - इसी तरह... सबसे बड़ा उद्दीपन है ये मेरे लिए! न जाने क्या इंगित पाया था उसने मेरे कहे हुए शब्दों में, सुनकर उसका चेहरा आरक्त हो उठा था।

उत्तेजना के चरम पर पहुँचकर हम एकाएक रिक्त-से हो आए थे। ज्वार उतरी नदी की तरह शांत, शिथिल पड़े रहे थे देर तक। शिराओं में गुँजारते संगीत की हल्की, मद्धिम धुन सुनते हुए... मधु की अलस धार में आकंठ डूबे हुए... सर्जना का क्षण था ये। हमारे अंदर इच्छाओं की रेशम गाँठे सुलझाते हुए, चमकीला, सुंदर आँचल बुनते हुए... एक खूबसूरत पहेली को जिस्म से सुलझाकर हम उसी की मसृन डोर में अब न जाने कब से उलझे पड़े थे।

बहुत देर बाद दामिनी ने कहा था - उसी सांद्र, थकी हुई आवाज में, जैसे किसी स्वप्न में डूबी हो - पाने के किसी बहुत गहरे क्षण में ही सबकुछ खो जाने का अहसास क्यों होता है। संभोग के चरम सुख के ठीक बाद के गहरे अवसाद को तुमने महसूसा ही होगा... सबकुछ स्वादहीन और फीका लगता है - एकदम गलत, अबूझ ग्लानि से भर जाता है मन। लगता है, फिर कभी इस देह की ओर मन प्रवृत्त नहीं होगा। एक वैराग्य की-सी दशा... ऐसा क्यों होता है कि जब खुशियों के अतर से रूह सराबोर हो उठता है, पलकों में नमक का समंदर उतर आता है। एक मन मुस्कराहट के नन्हें, शरीर बुलबुलों से लबरेज हो इंद्रधनुष के हजार रंगों में फूट पड़ना चाहता है तो दूसरा मन दर्द के कगार पर टूटने-टूटने को हो आता है।

दामिनी का चेहरा गहरी सोच और अनुभूति के इस क्षण में कितना अलग-सा दिख रहा है। ठीक जैसे वह उम्र के कई वर्ष एक ही साथ लाँघ गई हो। चेहरे की रेखाएँ भी गहरी हो रही थीं, आँखों के रंग की तरह। अचानक वह मेरी तरफ मुड़ी थी और फिर एक गहरी साँस लेकर सामने की कुर्सी पर बैठ गई थी - शायद तुम भी जानते हो, सुख और परितृप्ति का क्षण ही वास्तव में गहरी पीड़ा और शोक का क्षण होता है... जीवन की कई विडंबनाओं में से यह भी एक है। जब बहुत खुशी मिलती है, रोने को मन करता है। एक बिंदु पर जाकर सुख-दुख का भेद खत्म हो जाता है। दोनों एक-से लगने लगते हैं, एक-सी प्रतीति कराते हैं...

उसका अंदाज फलसफाना हो गया था। वह अपने में खोई-सी बोली थी - कभी सोचती हूँ कि अपने लिए खुशियों का पीछा करना दरअसल दुखों का पीछा करना ही है - सोने के हिरण की तरह...। हम न जाने किस वहम में क्या जीते चले जाते हैं। बहुत दूर निकलकर पता चलता है, कहीं पहुँचे ही नहीं।।

- कभी-कभी कहीं पहुँचना नहीं, सिर्फ चलना अहम होता है... न जाने मैं उसे क्या समझाने की कोशिश कर रहा था - खासकर तब जब साथ में कोई तुम्हारी तरह हसीन शख्सियत हो... मैंने अब उसका हाथ पकड़ लिया था - तुम हमेशा साथ चलो, मैं मंजिल की ख्वाहिश कभी नहीं करूँगा, सच...

वह यकायक शरमा गई थी। मेरे शब्दों का सुख उसे कहीं से छू गया था शायद। न जाने कैसी इच्छा और स्वप्न भरी आँखों से मुझे देखती रही थी - देरतक। इन लम्हों में वक्त ठहर जाता है, अपनी गति और हलचल के साथ। रह जाते हैं हम और हमारी अनुभूतियाँ... एक-दूसरे के लिए आत्यंतिक - गहरी और निविड़!

न जाने क्यों मैं अनायास पूछता हूँ - प्यार करती हो मुझसे? वह रँग जाती है ओर-छोर - अब ये मत पूछो...

क्यों? मैं पीछा नहीं छोड़ना चाहता।

- कितनी बार तो पूछ चुके हो, और मैं बता भी चुकी हूँ।

- बता भी चुकी हो तो फिर से कहो। बार-बार कहो, तुम्हारे मुँह से सुनना अच्छा लगता है...

- मैं तुमसे प्यार करती हूँ!

- नहीं! कहो, मैं तुमसे प्यार करती हूँ अशेष!

- हाँ, मैं तुमसे प्यार करती हूँ असेष...

- एकबार फिर...

- मैं तुमसे प्यार करती हूँ अशेष!

- फिर से...

- चलो हटो... बिस्तर से तकिया उठाकर उसने मुझपर दे मारा था। प्रत्युत्तर में मैंने उसे दबोचकर चूम लिया था। वह भी छूटने के लिए छटपटाने का स्वाँग भरते हुए मुझसे और अधिक लिपट गई थी। थोड़ी देर बाद जब मैंने कहा था, छोडो, साँस घुट रही है, वह शरमाकर मुझसे अलग हो गई थी।

अपनी शर्ट का ऊपरी बटन खोलते हुए मैं ईजी चेयर पर अधलेटा-सा बैठ गया था, सिगरेट की गहरा कश खींचकर हवा में धुएँ के छल्ले बनाते हुए। वह अपने बाल जूड़े में समेटकर मेरे करीब चली आई थी। मैं जानता था, वह सिगरेट छीनने की कोशिश करेगी, इसलिए परे हट गया था। उससे दूर। वह बुरा मानकर बाथरूम में घुस गई थी और देरतक वहीं घुसी रही थी। मुझे सजा देने का यह भी उसका एक तरीका था। मुझे उसकी इस बचकानी-सी हरकत पर हँसी आती रही थी। इतनी मैच्योर है, दुनिया-जहान की बड़ी-बड़ी गंभीर बातें करती रहती है और कभी इतनी बच्ची बन जाती है। सच, कितने और कैसे-कैसे रूप हैं इसके...

बहुत देर बाद वह बाथरूम से निकली थी, बिल्कुल हल्के-फुल्के मूड में, जैसे कुछ हुआ ही न हो। जाहिर है, वह हमेशा की तरह थोड़ी देर पहले की बातें भूल चुकी थी। आते ही अपने भीगे बालों को मुझपर झटकते हुए मेरे करीब बैठ गई थी -

अशेष। मैं यह कभी नहीं भूलूँगी कि तुमने मुझे फिर से ख्वाब देखना सिखाया है। जानते हो, इनसान सही अर्थों में तभी गरीब होता है जब उसके जीवन में प्रेम नहीं होता। मैं यह प्रार्थना करती हूँ कि हमेशा प्रेम में रह सकूँ, प्रेम देने और लेने में सदैव सक्षम रहूँ। आज की दुनिया की यही सबसे बड़ी जरूरत है...

कहते हुए उसकी आँखें दो गहरी काली झील में तब्दील हो चुकी थीं। मैं उसे देखता रह गया था। कितनी अजीब बात थी, अपने इन्हीं छोटे-छोटे मासूम सपनों से वह मेरे अंदर प्रेम के पौधे रोप देती है, पत्थरों पर फूल उगा देती है। उसकी अँगुलियों में ही नहीं, शब्दों में भी जादू है। गहरे परितोष के किसी क्षण में यह सोचना बहुत अजीब लगता है कि कभी हम तृषित भी थे। एक पल की परितृप्ति युगों की प्यास भुला देती है। ये करिश्मा प्यार का ही हो सकता है।

मैंने उसके भीगे बालों में अँगुलियाँ फिराई थीं - अच्छा दामिनी, तुमने इतने सालों का ये अकेला, उदास सफर कैसे तय कर लिया?

- कर लिया...

वह खामखयाली में मुस्कराई थी, जैसे आँखों में कोई बहुत पुराना बिंब हो - कठिन था, मगर तय कर लिया। उस सफर में मेरे पास कुछ नहीं था, मगर एक सपना था... यही बहुत था - होने के लिए...

मैंने उसकी आँखें चूम ली थीं - काँच के फूल जैसी लगती हैं तुम्हारी आँखें... आज इनसे एक सपना चुराना चाहता हूँ... चुरा लूँ? ...तुम्हारी इजाजत से...

- क्या करोगे उस सपने का?

- उन स्याह रातों के लिए बचाकर रखूँगा, जब चाँद का कंगन बदली में खो जाता है, और धूप का आईना भी चटक जाता है...

- ये तुम्हें क्या हो गया! कविता कर रहे हो, वह भी इस समय... उसने शरारत से मुस्कराकर मेरा माथा छुआ था - वैसे बुखार तो नहीं है...

- देख लो, तुमने मेरा क्या हाल किया है... मैंने उसे अपनी बाँहों में लेना चाहा था, मगर वह दूर सरक गई थी - ये नहीं, कुछ बातें करो - अच्छी-अच्छी, जैसे अभी कर रहे थे...

- तुम पास होगी तब न होगी अच्छी-अच्छी बातें... वह मुस्कराकर कमरे में फैली चीजें समेटती रही थी - तो तुम्हें तरक्की मिल रही है... इतने थोड़े से दिनों में इतनी सफलता... तुम्हारे काम की तारीफ हो रही है, सबकी जुबान पर हो, कैसा लग रहा है?

- बहुत अच्छा... खासकर इसलिए कि तुम मेरे लिए प्रार्थना करती हो। सबकी जुबान पर होना और प्रार्थना में होना एक बात नहीं है। मैं क्या चाहता हूँ, जानती हो दामिनी... कि मैं हर खुली आँख की पुतली में न होकर किसी की बंद आँखों के सपनों में रहूँ - उतना ही चुपचाप जितना कि एक ख्वाब या खयाल हो सकता है... सुनते हुए दामिनी की पलकें मुँद-सी आई थीं। मैंने उनपर धीरे से अँगुलियाँ फिराई थी - कुछ इस तरह... उसने अपनी आँखें नहीं खोली थी, सोती-सी आवाज में बोली थी - अब कभी आँखें खोलने के लिए मुझसे मत कहना।,

- क्यों? मैंने कौतुक में पूछा था।

- इनमें तुम हो। अब वह मुस्करा नहीं रही थी, गंभीर हो चुकी थी।

बाहर साँझ का सूरज निस्तेज होते हुए न जाने कब बुझ गया था। इसी बीच राख होते क्षितिज पर एक अकेला तारा उग आया था - उज्जवल और उदास। कमरे के अंदर सबकुछ शनैः-शनैः साये में तब्दील हो रहा था - रात अपना घोंसला हर कोने में डालने की तैयारी कर चुकी थी।

मैंने दामिनी की ओर देखा था। वह एकदम चुप थी, न जाने क्या सोच रही थी। तरल अंधकार में उसकी उजली त्वचा पारे की तरह चमक रही थी। मैंने उसे अनायास बढ़कर छूने की कोशिश की थी, मगर वह फिसल गई थी, एक शरीर मुस्कराहट के साथ- रेशम के मसृन धागों की तरह... मैंने गहरी साँसों में उसकी गंध बटोरी थी - बहुत हल्की- भीनी-भीनी-सी... सीडी पर देवकी पंडित की उदास आवाज तैर रही थी - नहीं रहना यहाँ, ये देश वीराना लगता है...

मैंने दामिनी की ओर देखा था - वह अलस मुस्कराई थी - ये दुनिया कागज की पुड़िया, बूँद पड़े गल जाना है... न जाने उन शब्दों में क्या था, या दामिनी की पिघले सितारे-सी उन आँखों में, मेरे अंदर का कोई कोना एकदम से भीग आया था... प्रेम में होना दुख में होना है... किसी से सुना था कभी, आज उसकी वास्तविकता में जी रहा हूँ...
 
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