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काँच की हवेली "kaanch ki haveli" compleet

"मुझे शर्मिंदा ना कीजिए ठाकुर साहब, आप तो देवता स्वरूप इंसान हैं. मैने इतने दिन आपसे आपकी बेटी को दूर रखा इसके लिए हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजिए." सुगना हाथ जोड़ते हुए बोला.

"सुगना, जन्म देने वाले से पालने वाला बड़ा होता है. कंचन पर हमसे अधिक तुम्हारा अधिकार है. हम तुमसे बस एक विनती करना चाहते हैं, अगर तुम्हे ऐतराज़ ना हो तो कंचन को हवेली में रहने की इज़ाज़त दे दो. हम इसलिए नही कह रहे हैं कि तुम्हारे घर में उसे कोई दिक्कत है. नही.....हरगिज़ नही, हम ऐसा सोच भी नही सकते. हम तो बस इतना चाहते हैं कि वो कुच्छ दिन यहाँ रहे, ताकि....जो प्यार जो दुलार हम उसे दे ना सकें. वो फिर से उसे दे सकें. कुच्छ दिन उसके पिता होने का गौरव....हम भी हासिल कर सकें." ये कहने के बाद, ठाकुर साहब उम्मीद की नज़र से सुगना को देखने लगे.

"मुझे और शर्मिंदा मत कीजिए ठाकुर साहब. अभी चलिए और अपनी बेटी को अपने घर ले आइए." सुगना ने खुशी से अपने आँसू छलकाते हुए कहा.

"तुम धन्य हो सुगना, तुम्हारे मूह से ये शब्द सुनने के लिए हमारे कान तरस रहे थे, आओ चलें" ठाकुर साहब ये कहकर आगे बढ़ने को हुए, तभी दीवान जी से नज़र मिलते ही ठिठक गये. वे एक घृणात्मक दृष्टि दीवान जी पर डालते हुए बोले - "दीवान जी, हम आपको आपके उस अपराध के लिए क्षमा करते हैं जो कि आपने स्वार्थ में आकर मेरी बच्ची को मुझसे दूर कर दिया. पर इस अपराध के लिए आपको कभी क्षमा नही करेंगे कि आपने हमारी दूध-मूही बच्ची को जान से मरवाने की कोशिश की. हम ये कभी नही भूलेंगे दीवान जी.......हो सके तो अपनी सूरत फिर कभी हमारे सामने ना लाइयेगा."

दीवान जी की नज़रें अपरड़बोध से ज़मीन पर गढ़ सी गयी. वो कुच्छ देर ज़मीन ताकते रहे फिर काँपते पैरों के साथ हवेली से बाहर निकल गये.

ठाकुर साहब और सुगना के कदम भी बाहर की ओर उठते चले गये. फिर दोनो जीप में बैठकर बस्ती की ओर बढ़ गये.

कमला जी अभी भी पत्थेर की बुत बनी मुख्य द्वार की तरफ देख रही थी. सुगना द्वारा रहस्योदघाटन से वो अभी तक हैरान थी. अचानक वो पलटी और अपने कमरे की तरफ चल दी. जैसे ही उनके कदम सीढ़ियों की तरफ बढ़े उन्हे निक्की खड़ी दिखाई दी. रवि भी दूसरी और खड़ा आश्चर्य में डूबा हुआ था.

कमला जी सीढ़ियाँ चढ़ती हुई निक्की और रवि के पास आई. उन्होने एक व्यंग भरी दृष्टि निक्की पर डाली. कमला जी से नज़र मिलते ही निक्की की नज़रें शर्म से झुक गयी.

"रवि अपने कमरे में चलो. तुमसे कुच्छ बात करनी है." कमला जी रवि से बोली और आगे बढ़ गयी. रवि के कदम खुद ब खुद मा के पिछे हो लिए. पर जैसे ही वो दरवाज़े के अंदर होने को हुआ उसकी नज़र ना चाहते हुए भी निक्की की तरफ घूम गयी. जैसे ही उसकी नज़र निक्की पर पड़ी, वो अंदर तक काँप गया. निक्की उसे ही देख रही थी, किंतु उसके देखने में जो पीड़ा थी वो सीधे रवि के दिल तक आ रही थी. उसने निक्की को इतना उदास कभी नही देखा था. रवि को अपना दिल पिघलता हुआ सा लगा. वो ज़्यादा देर निक्की की पीड़ा भरी नज़रों का सामना ना कर सका. वो तेज़ी से कमरे के अंदर दाखिल हो गया.

उसके अंदर जाते ही निक्की भारी कदमों से सीढ़िया उतरती हुई हवेली से बाहर निकल गयी.

*****

दीवान जी इस वक़्त अपनी पत्नी रुक्मणी के साथ बात विवाद में उलझे हुए थे. रुक्मणी जी क्रोध में दीवान जी को उल्टी सीधी बात सुनाए जा रही थी.

तभी दरवाज़े से निक्की को खड़ा देख वे दोनो ही उसकी तरफ लपके.

दीवान जी उसे देखकर पीड़ा से भर उठे. किंतु रुक्मणी जी खुशी से रो पड़ी थी. आज बरसों बाद रुक्मणी जी निक्की को अपनी छाती से लगा रही थी. किंतु जो निक्की बचपन से मा के वात्सल्य के लिए तड़पति रही थी आज उसे मा का वात्सल्य अच्छा नही लग रहा था. उसके पिता की वजह से उसकी छाती पर जो घाव लगा था उसे ममता का मरहम भी नही भर पा रहा था. उसकी तड़प बढ़ती ही जा रही थी.

निक्की घायल नज़रों से दीवान जी को देखने लगी. -"आपने ऐसा क्यों किया पिताजी?"

"सिर्फ़ तुम्हारी खुशी के लिए निक्की." दीवान जी दुखी स्वर में बोले - "मैं जानता हूँ सच्चाई जान लेने के बाद तुम्हारे दिल को बहुत ठेस पहुँची है, पर ये सब उस नमक-हराम सुगना की वजह से हुआ है. मैं उसे ज़िंदा नही...."

"अपने दोष को किसी और का नाम मत दीजिए पिताजी." निक्की दीवान जी की बात काटे'ते हुए बोली. - "सुगना काका ने तो दूसरे की बेटी को जीवन दान दिया है, लेकिन आपने...... आपने तो अपनी ही बेटी को जीते जी मार डाला"

"ऐसा मत कह निक्की." दीवान जी तड़प कर बोले - "सब ठीक हो जाएगा. अभी ज़्यादा कुच्छ भी नही बिगड़ा है. हां हवेली तुमसे ज़रूर छीन गयी है, पर रवि को तुमसे कोई नही छीन सकता. खुद कमला जी ने ठाकुर साहब के सामने कसम ली है कि वो रवि का विवाह तुमसे करेंगी."

"लेकिन अब मैं रवि से शादी नही कर सकती पिता जी" निक्की एक आह भर कर बोली - "मैं उससे शादी करके ज़िंदगी भर उसके मज़ाक का पात्र नही बन सकती."

 
"निक्की ये क्या कह रही है तू?" दीवान जी आश्चर्य से बोले - "तू चिंता मत कर, मैने कहा ना सब ठीक हो जाएगा. तू आराम कर मैं अभी किसी काम से बाहर जा रहा हूँ, लौटकर आने के बाद इस संबंध में बात करूँगा." दीवान जी बोले और दरवाज़े से बाहर निकल गये.

दीवान जी के जाने के बाद रुक्मणी निक्की को बिठाकर उसे दुलार्ने लगी. मा की ममता से उसका दुख थोड़ा कम तो हुआ पर उसे सुकून नही मिला.

"मैं सोना चाहती हूँ मा." निक्की रुक्मणी से बोली.

रुक्मणी ने उसके लिए कमरा तैयार कर दिया और बिस्तर लगा दिया. निक्की ने बिस्तर पर गिरकर अपनी आँखें मूंद ली. सोना तो बस एक बहाना था....वो असल में एकांत चाहती थी. ताकि वो अपने अतीत और वर्तमान का लेखा जोखा कर सके.

निक्की इस वक़्त बेहद अपमानित महसूस कर रही थी. वो होती भी तो क्यों ना. बचपन से इस अभिमान से जीती आई थी कि वो ठाकुर की बेटी है, पर आज इस सत्य के खुल जाने से उसे गहरा आघात लगा था. हालाँकि वो जानती थी उसके पिता ने जो भी किया उसके भले की सोच कर किया. किंतु ये बात ज़माना तो नही समझेगा. अब वो ज़माने को क्या मूह दिखाएगी. अब लोग क्या कहेंगे, अब सब जान चुके हैं कि वो ठाकुर की नही उसके नौकर दीवान की बेटी है. अब वह कैसे अपना सर उँचा रख सकेगी? दीवान जी की करनी ने ना केवल उसके सपनो को बल्कि उसके पूरे वज़ूद को तोड़कर रख दिया था. उसे इस घर में एक घुटन सी महसूस हो रही थी. उसे समझ में नही आ रहा था कि वो क्या करे कि उसे इस घुटन से मुक्ति मिल सके. ऐसी कौनसी जगह जाए जहाँ उसके मन को थोड़ा सुकून मिल सके.

सहसा ! उसके मानस-पटल पर कल्लू का चित्र उभरा. वह झटके से बिस्तर पर उठ बैठी. फिर कुच्छ सोचते हुए खड़ी हुई और कमरे से बाहर निकली.

हॉल में आकर उसने रुक्मणी की तलाश में अपनी नज़रें दौड़ाई. उसे किचन से कुच्छ आवाज़ें आती सुनाई दी. रुक्मणी शायद किचन में थी. निक्की खड़ी कुच्छ पल सोचती रही फिर धीमे कदमों से बाहर निकल गयी.

उसने अपने पावं का रुख़ कल्लू के घर की तरफ कर दिया.

*****

शांता अभी भी कंचन के सिरहाने बैठी उसके सर को सहलाए जा रही थी. कंचन का रोना तो कब का बंद हो चुका था. पर उसके दिल में उदासी अब भी छाई हुई थी. चिंटू उसकी गोद पर लेटा हुआ था. दिनेश जी बरामदे में बैठे बीड़ी पी रहे थे.

तभी घर के बाहर जीप के रुकने की आवाज़ से सबका ध्यान टूटा. शांता के साथ कंचन और चिंटू भी उठकर कमरे से बाहर निकले. जैसे ही ये लोग बरामदे तक पहुँचे.....उन्हे सुगना के साथ ठाकुर साहब आँगन में प्रविष्ट होते दिखाई दिए.

ये फेली मर्तबा था जब ठाकुर साहब हवेली से निकल कर बस्ती में किसी के घर तक आए हों. कंचन के आश्चर्य की सीमा ना रही.

कंचन पर नज़र पड़ते ही ठाकुर साहब का हृदय वात्सल्य से भर उठा. उनके कदम कंचन के करीब आते गये.

शांता को कुच्छ कुच्छ समझ में आ चुका था, किंतु दिनेश जी और कंचन के लिए ठाकुर साहब का आना अब भी पहेली बना हुआ था.

शांता और दिनेश जी के हाथ एक साथ ठाकुर साहब को नमस्ते करने के लिए उठ खड़े हुए.

ठाकुर साहब उनके नमस्ते का उत्तर देते हुए कंचन के पास जाकर खड़े हो गये. फिर सजल नेत्रों से उसके उदास चेहरे को देखने लगे.

कंचन के हाथ भी नमस्ते की मुद्रा में जुड़ गये.

"बेटी, इनके पावं छु लो, ये तुम्हारे पिता हैं." सुगना ने हैरान परेशान सी खड़ी कंचन से कहा.

"क....क्या......प......पिता?" कंचन के मूह से अनायास निकला.

दिनेश जी भी सुगना की बात से बुरी तरह चौंक पड़े थे.

"हां बेटी. मैने तो तुम्हे सिर्फ़ पाला है, वास्तव में तुम इनकी संतान हो. ठाकुर साहब ही तुम्हारे असली पिता हैं." सुगना कंचन के सर पर हाथ फेरते हुए बोला.

कंचन आँखों में आश्चर्य लिए ठाकुर साहब को देखने लगी.

 


ठाकुर साहब की आँखें गीली थी. उनके चेहरे पर बेटी को गले से लगाने की गहरी तड़प थी. उन्होने अपनी बाहें खोल दी. कंचन आगे बढ़ी और उनकी बाहों में समा गयी. उनके बाहों में सिमट'ते ही कंचन को वो पल याद आया जब वो छोटी थी और हवेली में निक्की के साथ खेला करती थी. तब ठाकुर साहब को देखते ही निक्की उछल्कर उनकी गोद में बैठ जाती थी. तब कंचन का मन भी होता था कि वो भी ठाकुर साहब की गोद में जाए, पर लज्जावश वो ऐसा नही कर पाती थी. हां ठाकुर साहब कभी कभार प्यार से उसके सर पर हाथ फेर देते थे या कभी कभार झुक कर उसके माथे को चूम लिया करते थे. पर उन्होने कभी निक्की की तरह कंचन को अपनी छाती से भींचा नही था. ना कभी उसे अपनी गोद में उठाए थे. उनकी गोद में चढ़ने की तमन्ना कंचन के दिल में हमेशा रही थी. फिर जैसे जैसे बड़ी होती गयी ये दूरी और बढ़ती गयी. हालाँकि ठाकुर साहब कंचन की इस बाल भावना से अंजान थे अगर वे जानते होते तो निसंदेह वो कंचन को भी अपनी गोद में लेने से नही हिचकिचाते. वे कंचन से भी उतना ही प्यार करते थे जितना की निक्की से.

किंतु आज ठाकुर साहब की छाती से लगकर कंचन को एक असीम सुख का अनुभव हो रहा था. यही दशा ठाकुर साहब की भी थी.

शांता, सुगना और दिनेश जी पिता पुत्री के इस मिलन से भावुक हो उठे थे.

कुच्छ देर बाद ठाकुर साहब कंचन से अलग हुए और शांता से बोले - "शांता तुमने मेरी बेटी को मा जैसा प्यार दिया. इसे तो हवेली में भी वो प्यार वो खुशी नही मिलती जो इस घर से, तुम लोगों से मिला है. हम तुम्हारे अभारी हैं. अब हमें इज़ाज़त दो कि हम कंचन को हवेली ले जा सकें" ये कहते हुए ठाकुर साहब ने शांता के आगे हाथ जोड़ दिए.

उत्तर में शांता ने भी सहमति में सिर हिलाते हुए अपने हाथ जोड़ दिए. फिर कंचन से बोली - "जाओ बेटी, अब अपने असली घर जाओ, पर कुच्छ दिन तक यहाँ आती रहना. हमें तुम्हारी आदत हो चुकी है."

इस घर को छोड़ कर जाने की बात से कंचन का दिल बैठ गया. उसके मन में आया कि वो अभी मना कर दे. पर कर ना सकी.

"दीदी कहाँ जा रही है मा?" अब तक खामोश खड़े चिंटू की समझ में कुच्छ ना आया तो शांता से पुच्छ बैठा.

उसकी बात सुनकर कंचन उसके पास आई और उसे अपनी छाती से लगा लिया. फिर ठाकुर साहब से बोली - "पिताजी, क्या मैं चिंटू को भी अपने साथ लेकर जा सकती हूँ? ये मेरे बगैर नही रह सकेगा."

"बेटी अब से वो घर तुम्हारा है, तुम बेशाक़ अपने भाई को अपने साथ रखो, हम तो चाहते थे कि तुम्हारे साथ साथ इस घर के सारे लोग हमारे साथ रहें. पर हम ऐसा कहकर सुगना के स्वाभिमान को ठेस नही पहुँचाना चाहते."

"हम इस घर में खुश हैं ठाकुर साहब. आपने हमारे लिए इतना सोचा यही काफ़ी है." सुगना ने झेन्प्ते हुए कहा.

ठाकुर साहब आभारपूर्ण दृष्टि सुगना पर डालकर कंचन के साथ बाहर जाने लगे. चिंटू भी कंचन के साथ था.

सुगना शांता और दिनेश जी भी पिछे पिछे बाहर तक आए.

कंचन एक बार सबसे गले मिलकर जीप में बैठ गयी. जीप के आगे बढ़ते ही उसे लगा जैसे वो किसी अंजानी दुनिया में जा रही हो. उसकी नज़रें सुगना पर ही टिकी हुई थी. कंचन का दिल भी वैसे ही रो रहा था जैसे सच्चाई जान लेने के बाद निक्की का दिल रोया था.

दोनो का दुख एक समान था. उनके पिता वो ना थे जिन्हे वे दोनो समझती आई थी. किंतु फिर भी उनके दुख में एक विशेष अंतर था. निक्की इस बात से दुखी थी कि दीवान जी की बेटी होने की वजह से अब वो ज़िंदगी भर सर उठाकर नही जी सकेगी. अब उसे उमर भर ज़माने की चुभती नज़रों का सामना करना पड़ेगा. जिसकी उसे आदत नही थी. किंतु कंचन इस बात से दुखी थी कि जिस सुगना के गोद में वो बचपन से खेलती आई थी. जिसकी छाती से लगकर वो चैन की नींद सो जाया करती थी. जिसके कंधो पर बैठकर वो खुशी से इतराया करती थी. जिसके हाथों से नीवाला खाकर वो बड़ी हुई थी.....वो उसका पिता ना था. कंचन इस बात से दुखी थी कि जो स्नेह जो वात्सल्य जिस व्यक्ति से अब तक वो लेती आई थी वो उसका पिता ना था.

कंचन इस बात से उतनी खुश नही थी कि अब वो ठाकुर साहब की बेटी कही जाएगी, हवेली में मौज से रहेगी, दिन भर नौकर चाकर उसके आगे पिछे घुमा करेंगे. और अब वो बिना किसी बाधा के रवि से शादी कर सकेगी. जितना दुख उसे इस बात से था की सुगना उसका पिता ना था.

फ्रेंड्स आज के लिए इतना ही आगे की कहानी जानने के लिए बने रहिए मेरे साथ...................................................
 
"aisa na kaho sugna. Aisa na kaho." thakur sahab tadap kar bole - "tumhara aur kanchan ka bahut gehra naata hai. Phir mat kehna tum uske kuchh nahi lagte. tum uttam vyakti ho sugna. hamara to dil kar raha hai, hum abhi jhuk kar tumhare paon chhoo lein."

"mujhe sharminda na kijiye thakur sahab, aap to devta swaroop insaan hain. Maine itne din aapse aapki beti ko door rakha iske liye ho sake to mujhe maaf kar dijiye." sugna hath jodte hue bola.

"sugna, janm dene wale se paalne wala bada hota hai. kanchan par hamse adhik tumhara adhikaar hai. Hum tumse Bas ek vinti karna chahte hain, agar tumhe aitraaz na ho to kanchan ko haveli mein rehne ki izazat de do. hum isliye nahi keh rahe hain ki tumhare ghar mein use koi dikkat hai. Nahi.....hargiz nahi, hum aisa soch bhi nahi sakte. hum to bas itna chahte hain ki wo kuchh din yahan rahe, taaki....jo pyar jo dulaar hum use de na sakein. Wo phir se use de sakein. Kuchh din uske peeta hone ka gaurav....hum bhi haasheel kar sakein." ye kehne ke baad, thakur sahab ummid ki nazar se sugna ko dekhne lage.

"mujhe aur sharminda mat kijiye thakur sahab. Abhi chaliye aur apni beti ko apne ghar le aaiye." sugna ne khushi se apne aansu chalkate hue kaha.

"tum dhanya ho sugna, tumhare muh se ye shabd sunne ke liye hamare kaan taras rahe the, Aao chalein" thakur sahab ye kehkar aage badhne ko hue, tabhi deewan ji se nazar milte hi thithak gaye. wey ek ghrunatmak drushti deewan ji par daalte hue bole - "deewan ji, hum aapko aapke us apradh ke liye kshama karte hain jo ki aapne swarth mein aakar meri bachi ko mujhse door kar diya. Par is apradh ke liye aapko kabhi kshama nahi karenge ki aapne hamari doodh-muhi bachi ko jaan se marwane ki koshish ki. Hum ye kabhi nahi bhulenge Deewan ji.......ho sake to apni surat phir kabhi hamare saamne na laiyega."

Deewan ji ki nazren apradhbodh se zameen par gad si gayi. Wo kuchh der zameen taakte rahe phir kaanpte pairon ke sath haveli se bahar nikal gaye.

Thakur sahab aur sugna ke kadam bhi bahar ki aur uthte chale gaye. phir dono jeep mein baithkar basti ki aur badh gaye.

Kamla ji abhi bhi patther ki boot bani Mukhya dwar ki taraf dekh rahi thi. Sugna dwara rahasyodghotan se wo abhi tak hairan thi. Achanak wo palti aur apne kamre ki taraf chal di. Jaise hi unke kadam seedhiyon ki taraf badhe unhe nikki khadi dikhayi di. Ravi bhi dusri aur khada aashcharya mein duba hua tha.

kamla ji seedhiyan chadhti hui nikki aur ravi ke paas aayi. Unhone ek vyang bhari drushti nikki par daali. kamla ji se nazar milte hi nikki ki nazrein sharm se jhuk gayi.

"ravi apne kamre mein chalo. Tumse kuchh baat karni hai." kamla ji ravi se boli aur aage badh gayi. Ravi ke kadam khud ba khud maa ke pichhe ho liye. Par jaise hi wo darwaze ke andar hone ko hua uski nazar na chahte hue bhi nikki ke taraf ghum gayi. Jaise hi uski nazar nikki par padi, wo andar tak kaanp gaya. Nikki use hi dekh rahi thi, kintu uske dekhne mein jo peeda thi wo seedhe ravi ke dil tak aa rahi thi. Usne nikki ko itna udaas kabhi nahi dekha tha. Ravi ko apna dil pighalta hua sa laga. Wo zyada der nikki ki peeda bhari nazron ka saamna na kar saka. Wo tezi se kamre ke andar daakhil ho gaya.

Uske andar jaate hi nikki bhari kadmon se seedhiya utarti hui haveli se bahar nikal gayi.

*****

Deewan ji is waqt apni patni rukmani ke sath baat vivaad mein uljhe hue the. Rukmani ji krodh mein deewan ji ko ulti seedhi baat sunaye ja rahi thi.

tabhi darwaze se nikki ko khada dekh wey dono hi uski taraf lapke.

deewan ji use dekhkar peeda se bhar uthe. Kintu rukmani ji khushi se ro padi thi. Aaj barson baad rukmani ji nikki ko apni chhati se laga rahi thi. Kintu jo nikki banchapn se maa ke vaatsalya ke liye tadapti rahi thi aaj use maa ka vaatsalya acha nahi lag raha tha. Uske peeta ki wajah se uski chhati par jo ghav laga tha use mamta ka marham bhi nahi bhar pa raha tha. Uski tadap badhti hi ja rahi thi.

Nikki ghayal nazron se deewan ji ko dekhne lagi. -"aapne aisa kyon kiya peetaji?"

"sirf tumhari khushi ke liye nikki." deewan ji dukhi swar mein bole - "main jaanta hoon sachai jaan lene ke baad tumhare dil ko bahut thes pahuncha hai, par ye sab us namak-haram sugna ki wajah se hua hai. Main use zinda nahi...."

"apne dosh ko kisi aur ka naam mat dijiye peetaji." nikki deewan ji ki baat kaate'te hue boli. - "sugna kaka ne to dusre ki beti ko jeevan daan diya hai, lekin aapne...... aapne to apni hi beti ko jeete ji maar daala"

"aisa mat keh nikki." deewan ji tadapkar bole - "Sab theek ho jayega. Abhi zyada Kuchh bhi nahi bigda hai. Haan haveli tumse jarur chheen gayi hai, par ravi ko tumse koi nahi cheen sakta. Khud kamla ji ne thakur sahab ke samne kasam lee hai ki wo ravi ka vivaah tumse karengi."

"lekin ab main ravi se shadi nahi kar sakti peeta ji" nikki ek aah bhar kar boli - "main usse shadi karke zindagi bhar uske mazaak ka paatr nahi ban sakti."

"nikki ye kya keh rahi hai tu?" deewan ji aashcharya se bole - "tu chinta mat kar, maine kaha na sab theek ho jaayega. Tu aaram kar main abhi Kisi kaam se bahar ja raha hoon, lautkar aane ke baad is sambandh mein baat karunga." deewan ji bole aur darwaze se bahar nikal gaye.

Deewan ji ke jaane ke baad rukmani nikki ko bithakar use dularne lagi. maa ki mamta se uska dukh thoda kam to hua par use sukun nahi mila.

"main sona chahti hoon maa." nikki rukmani se boli.

Rukmani uske liye kamra taiyar kar di aur bistar laga diya. Nikki bistar par girkar apni aankhein moond li. Sona to bas ek bahana tha....wo asal mein ekaant chahti thi. Taaki wo apne ateet aur vartmaan ka lekhha jokha kar sake.

Nikki is waqt behad apmaanit mehsus kar rahi thi. wo hoti bhi to kyon na. Bachpan se is abhimaan se jeeti aayi thi ki wo thakur ki beti hai, par aaj is satya ke khul jaane se use gehra aghaat laga tha. Halaanki wo jaanti thi uske peeta ne jo bhi kiya uske bhale ki soch kar kiya. Kintu ye baat zamana to nahi samjhega. ab wo zamane ko kya muh dikhayegi. Ab log kya kahenge, ab sab jaan chuke hain ki wo thakur ki nahi uske naukar deewan ki beti hai. ab wah kaise apna sar uncha rakh sakegi? Deewan ji ki karni ne na keval uske sapno ko balki uske pure wazood ko todkar rakh diya tha. Use is ghar mein ek ghutan si mehsus ho rahi thi. Use samajh mein nahi aa raha tha ki wo kya kare ki use is ghutan se mukti mil sake. Aisi kaunsi jagah jaaye jahan uske mann ko thoda sukun mil sake.

Sahsa ! Uske maanas-patal par kallu ka chitr ubhra. Wah jhatke se bistar par uth baithi. Phir kuchh sochte hue khai hui aur kamre se bahar nikli.

Hall mein aakar usne rukmani ki talaash mein apni nazrein daudayi. Use kitchen se kuchh awaazein aati sunayi di. Rukmani shayad kitchen mein thi. Nikki khadi kuchh pal sochti rahi phir dheeme kadmon se bahar nikal gayi.

Usne apne paon ka rukh kallu ke ghar ki taraf kar diya.

*****

 
Shanta abhi bhi kanchan ke sirhaane baithi uske sar ko sehlaye ja rahi thi. Kanchan ka rona to kab ka band ho chuka tha. Par uske dil mein udaasi ab bhi chhai hui thi. Chintu uske god par leta hua tha. Dinesh ji baramde mein baithe bidi pee rahe the.

tabhi ghar ke bahar jeep ke rukne ki awaaz se sabka dhyan toota. Shanta ke sath kanchan aur chintu bhi uthkar kamre se bahar nikle. jaise hi ye log baramde tak pahunche.....unhe sugna ke sath thakur sahab aangam mein parvisht hote dikhayi diye.

Ye pheli martaba tha jab thakur sahab haveli se nikal kar basti mein kisi ke ghar tak aaye hon. Kanchan ke aashcharya ki seema na rahi.

Kanchan par nazar padte hi thakur sahab ka hriday vaatsalya se bhar utha. unke kadam kanchan ke kareeb aate gaye.

Shanta ko kuchh kuchh samajh mein aa chuka tha, kintu dinesh ji aur kanchan ke liye thakur sahab ka aana ab bhi paheli bana hua tha.

Shanta aur dinesh ji ke hath ek sath thakur sahab ko namaste karne ke liye uth khade huye.

Thakur sahab unke namaste ka uttar dete hue kanchan ke paas jaakar khade ho gaye. Phir sajal netron se uske udaas chehre ko dekhne lage.

Kanchan ke hath bhi namste ki mudra mein jud gaye.

"beti, inke paon chhu lo, ye tumhare peeta hain." sugna ne hairan parishan si khadi kanchan se kaha.

"k....kya......p......peeta?" kanchan ke muh se anayas nikla.

Dinesh ji bhi sugna ki baat se buri tarah chaunk pade the.

"haan beti. Maine to tumhe sirf paala hai, vastav mein tum inki santaan ho. Thakur sahab hi tumhare asli peeta hain." sugna kanchan ke sar par hath ferte hue bola.

Kanchan aankhon mein aashcharya liye thakur sahab ko dekhne lagi.

Thakur sahab ki aankhein geeli thi. Unke chehre par beti ko gale se lagane ki gehri tadap thi. Unhone apni baahein khol di. Kanchan aage badhi aur unke bahon mein sama gayi. unke baahon mein simat'te hi kanchan ko wo pal yaad aaya jab wo chhoti thi aur haveli mein nikki ke sath khela karti thi. Tab thakur sahab ko dekhte hi nikki uchhalkar unke god mein baith jati thi. Tab kanchan ka mann bhi hota tha ki wo bhi thakur sahab ki god mein jaaye, par lajjavash wo aisa nahi kar paati thi. Haan thakur sahab kabhi kabhar pyar se uske sar par hath fer dete they ya kabhi kabhar jhuk kar uske mathe ko chum liya karte the. Par unhone kabhi nikki ki tarah kanchan ko apni chhati se bhincha nahi tha. Na kabhi use apni god mein uthaye the. unke god mein chadhne ki tamanna kanchan ke dil mein hamesha rahi thi. Phir jaise jaise badi hoti gayi ye doori aur badhti gayi. halaanki thakur sahab kanchan ke is baal bhavna se anjaan the agar wey jaante hote to nisandeh wo kanchan ko bhi apni god mein lene se nahi hichkichate. Wey kanchan se bhi utna hi pyar karte the jitna ki nikki se.

Kintu aaj thakur sahab ki chhati se lagkar kanchan ko ek aseem sukh ka anubhav ho raha tha. yahi dasha thakur sahab ki bhi thi.

Shanta, sugna aur dinsesh ji peeta putri ke is milan se bhavuk ho uthe the.

Kuchh der baad thakur sahab kanchan se alag hue aur shanta se bole - "shanta tumne meri beti ko maa jaisa pyar diya. ise to haveli mein bhi wo pyar wo khushi nahi milti jo is ghar se, tum logon se mila hai. Hum tumhare abhari hain. Ab hamein izazat do ki hum kanchan ko haveli le ja sakein" ye kehte hue thakur sahab ne shanta ke aage hath jod diye.

Uttar mein shanta ne bhi sahmati mein seer hilate hue apne hath jod diye. Phir kanchan se boli - "jao beti, ab apne asli ghar jao, par kuchh din tak yahan aati rehna. Hamein tumhari aadat ho chuki hai."

Is ghar ko chhodkar jaane ki baat se kanchan ka dil baith gaya. Uske mann mein aaya ki wo abhi mana kar de. Par kar na saki.

"didi kahan ja rahi hai maa?" ab tak khamosh khada chintu ke samajh mein kuchh na aaya to shanta se puchh baitha.

Uski baat sunkar kanchan uske paas aayi aur use apni chhati se laga liya. Phir thakur sahab se boli - "peetaji, kya main chintu ko bhi apne sath lekar ja sakti hoon? Ye mere bagair nahi reh sakega."

"beti ab se wo ghar tumhara hai, tum beshaq apne bhai ko apne sath rakho, hum to chate the ki tumhare sath sath is ghar ke sare log hamare sath rahein. Par hum aisa kehkar sugna ke swabhiman ko thes nahi pahunchana chahte."

"hum is ghar mein khush hain thakur sahab. Aapne hamare liye itna socha yahi kaafi hai." sugna jhenpte hue kaha.

thakur sahab abharpurn drudhti sugna par daalkar kanchan ke sath bahar jaane lage. Chintu bhi kanchan ke sath tha.

Sugna shanta aur dinesh ji bhi pichhe pichhe bahar tak aaye.

Kanchan ek baar sabse gale milkar jeep mein baith gayi. jeep ke aage badhte hi use laga jaise wo kisi anjaani duniya mein ja rahi ho. Uski nazrein sugna par hi tiki hui thi. kanchan ka dil bhi waise hi ro raha tha jaise sachai jaan lene ke baad nikki ka dil roya tha.

Dono ka dukh ek saman tha. Unke peeta wo na the jinhe wey dono samajhti aayi thi. Kintu phir bhi unke dukh mein ek vishesh antar tha. Nikki is baat se dukhi thi ki deewan ji ki beti hone ki wajah se ab wo zindagi bhar sar uthakar nahi jee sakegi. Ab use umar bhar zamane ki chubhti nazron ka saamna karna padega. Jiski use aadat nahi thi. Kintu kanchan is baat se dukhi thi ki jis sugna ke god mein wo bachpan se khelti aayi thi. Jiske chhati se lagkar wo chain ki neend so jaya karti thi. Jiske kandho par baithkar wo khushi se itraya karti thi. Jiske hathon se niwala khakar wo badi hui thi.....wo uska peeta na tha. Kanchan is baat se dukhi thi ki jo sneh jo vaatsalya jis vyakti se ab tak vo leti aayi thi wo uska peeta na tha.

Kanchan is baat se utini khush nahi thi ki ab wo thakur sahab ki beti kahi jayegi, haveli mein mauj se rahegi, din bhar naukar chaakar uske aage pichhe ghuma karenge. Aur ab wo bina kisi baadha ke ravi se shadi kar sakegi. Jitna dukh use is baat se tha ki sugna uska peeta na tha.
 
नीक्की के कदम कल्लू के घर के बाहर जाकर रुके. उसका घर क्या था बस एक टूटा फूटा झोपड़ा जिसकी दीवारें मिट्टी की बनी हुई थी और छप्पर उजड़ा हुआ था....जिसके उपर प्लास्टिक के टुकड़े जगह जगह पर पेबंद की तरह चिपकाए गये थे.

निक्की कुच्छ देर तक कल्लू के झोपडे को देखती रही फिर आगे बढ़ी और दरवाज़े तक पहुँची. दरवाज़ा खुला था. निक्की ने अंदर झाँका. उसे कल्लू एक मरियल सी चारपाई पर लेटा हुआ दिखाई दिया. वह खेत से आने के बाद चारपाई पर लेटा अपनी थकान मिटा रहा था. वो किसी गहरी सोच में डूबा हुआ लग रहा था. अचानक ही उसे दरवाज़े पर किसी के खड़े होने का एहसास हुआ. उसने अपनी गर्दन घूमाकर दरवाज़े की तरफ देखा. उसे दरवाज़े पर निक्की खड़ी दिखाई दी. निक्की पर नज़र पड़ते ही वह झट से उठ बैठा.

"निक्की जी, आप?" उसके मूह से स्वतः ही निकला.

"क्या मैं अंदर आ सकती हूँ." निक्की ने कल्लू से पुछा.

"कौन है कल्लू? किससे बात कर रहा है तू?" कल्लू निक्की से कुच्छ बोल पाता उससे पहले ही उसकी मा की आवाज़ आई. उसकी मा का नाम झूमकि था. झूमकि चारपाई पर लेटी हुई थी जब कल्लू और निक्की की आवाज़ उसके कानो से टकराई.

"मा, ठाकुर साहब की बेटी निक्की जी आई हैं" कल्लू जब तक अपनी मा को उत्तर देता निक्की अंदर दाखिल हो चुकी थी.

ठाकुर साहब की बेटी उसके घर आई है ये जानकार झूमकि आश्चर्य से भर उठी. वो धीरे से चलती हुई उसके पास आई और प्यार से उसके सर पर हाथ फेरने लगी. निक्की एक सुखद एहसास से भर उठी. कुच्छ देर पहले जो घुटन उसके अंदर थी वो झूमकि के स्नेह से पल भर में दूर हो गयी. वह जिस सुकून की तलाश में घर से निकली थी, वही सुकून उसे झूमकि के स्नेह से मिल रहा था.

झूमकि अपनी बूढ़ी आँखों से एक टक निक्की को देखती जा रही थी. वह सोच रही थी जिस घर में कभी तीज त्योहार में भी लोग मिलने नही आते थे आज उस घर में ठाकुर साहब की बेटी कैसे आ गयी?. उसे वो पल याद आ गया जब कल्लू बारिश से भीगने के बाद घर आया था. उस रात उसे थोड़ी बुखार भी आई थी. वह बेहोशी की हालत में बार बार कंचन का नाम लेकर बड़बड़ाता रहा था. झूमकि उसके मूह से कंचन का नाम सुनते ही सब समझ गयी थी कि कल्लू कंचन से प्यार करने लगा है. उस रात वो कल्लू के भाग्य पर खुद भी रोती रही थी. किंतु उसने उस रात एक निर्णय भी लिया था. वाह तय कर चुकी थी कि एक दो दिन में वो सुगना से मिलकर कल्लू और कंचन के रिश्ते की बात करेगी.

ठीक तीसरे दिन कल्लू के खेत जाने के उपरांत दोपेहर से पहले वो सुगना के घर के लिए निकली. सुगना से उसकी पहचान कुच्छ ज़्यादा नही थी. बस एक गाओं में होने की वजह से जितनी होनी चाहिए उतनी ही थी. कोई विशेष संबंध नही था. गाओं के रिश्ते से सुगना उसका देवेर लगता था.

राह चलते हुए उसके मन में ढेरो शंकाए थी. उसे उम्मीद तो नही थी कि सुगना अपनी फूल सी बेटी का हाथ उसके कल्लू के हाथ में देगा. पर मा तो मा होती है. बेटे के लिए वो एक बार सुगना के आगे झोली फैलाने को भी तैयार हो गयी थी. मन में एक आस थी-शायद सुगना को उसपर तरस आ जाए और इस रिश्ते के लिए हां कह दे.

कुच्छ ही देर में झूमकि आशा-निराशा के झूले में झूलती हुई सुगना की चौखट तक पहुँची. अभी वो अंदर जाने की सोच ही रही थी कि उसे आँगन के खुले दरवाज़े से अंदर का द्रिश्य दिखाई दे गया. बरामदे में सुगना के पूरे परिवार के साथ कोई शहरी औरत बैठी थी. उसका साहस नही हुआ कि वो अंदर जाए. वह नही चाहती थी कि पराई स्त्री के सामने उसे लज्जित होना पड़े. किसी के दिल का हाल कौन जाने...क्या पता सुगना कुच्छ ऐसा बोल दे जो उसे उस औरत के सामने अपमानित कर दे. वह बाहर ही खड़ी उस औरत के बाहर निकलने की प्रतीक्षा करने लगी.

कुच्छ देर खड़ी रहने के बाद वह कान लगाकर अंदर से आती आवाज़ को सुनने का प्रयास करने लगी. सुगना और शांता की आवाज़ तो उसके कानो तक नही आ रही थी. पर कमला जी की उँची आवाज़ उसके कानो तक सॉफ सॉफ आ रही थी. उनके मूह से कंचन और रवि की बात सुनकर वो समझ गयी कि ये स्त्री हवेली में ठकुराइन की इलाज़ करने आए डॉक्टर बाबू की मा है. और इस वक़्त वो अपने बेटे के रिश्ते की बात कर रही है.

पूरी बात जान लेने के बाद उसका दिल बैठ गया. झूमकि जिस मूह गयी थी उसी मूह लौट आई. उस दिन उसे अपने कल्लू के भाग्य पर बहुत रोना आया था. उसने कल्लू की शादी की उम्मीद ही छोड़ दी थी.

किंतु आज निक्की को अपने घर देख उसका मन फिर से वोही कल्पनाए करने लगा था. हालाँकि वो ज़मीन और आसमान के अंतर को समझ रही थी. पर दिल के हाथों ऐसा सोचने पर मजबूर थी.

"बेटी, सच सच बता. तू मेरे घर किस लिए आई है? आज तक इस घर में लोग तीज त्योहार में भी मुश्किल से ही आते हैं. फिर तू तो इतने बड़े बाप की बेटी है." झूमकि जिगयासावस पुछि.

"मा जी सबसे पहले तो मैं ये बता दू कि मैं ठाकुर साहब की बेटी नही. मेरे पिता दीवान जी हैं. उन्होने ही मुझे, जब मैं पैदा हुई थी..... ठाकुर साहब की बेटी से बदल दिया था. किंतु अब ये भेद खुल चुका है कि मेरे असली पिता दीवान जी हैं."

कल्लू और झूमकि के मूह, खुले के खुले रह गये.

"अगर तुम दीवान जी की बेटी हो तो ठाकुर साहब की असली बेटी कौन है?" झूमकि ने अगला सवाल किया.

"कंचन !" निक्की के मूह से धीरे से निकला.

"क्या....?" कल्लू चौंकते हुए बोला.

"हां कल्लू, कंचन ही ठाकुर साहब की असली बेटी है जिसे सुगना बाबा ने पाला है." ये कहने के बाद, निक्की क्षण भर कल्लू को देखती रही. और उसके मनोभाव को पढ़ने की कोशिश करती रही.

इस सत्य को जान लेने के बाद जहाँ कल्लू को इस बात की खुशी थी कि कंचन ठाकुर साहब की बेटी है वहीं उसके दिल में जो रही सही उम्मीद थी कंचन को पाने की, वो भी टूट चुकी थी. अब तो कंचन के बारे में वो कल्पना भी नही कर सकता था. उसका सर पीड़ा भाव से नीचे झुक गया.

"बेटी, ये जानकार बड़ा दुख हुआ कि तुम्हारे साथ ऐसा हुआ. जिस घर को जिस इंसान को बचपन से अपना घर अपना पिता मान कर चली, आज वो पराया हो गया. तुम्हारे मन को तो बहुत ठेस पहुँचा होगा." झूमकि निक्की के दुख का अनुभव कर भावुक हो उठी.

मा की बात से कल्लू का ध्यान भी निक्की के दुख की और गया. सच में....उसने तो निक्की के दुख का अनुभव ही नही किया था. - "निक्की जी, मुझे इस बात का खेद है. आपके साथ जो कुच्छ भी हुआ, अच्छा नही हुआ."

"छोड़ो इन बातों को." निक्की सर झटक कर बोली - "मैं यहाँ किसी और काम से आई हूँ. अगर आप लोग हां कहे तो?"

"हम भला आपके किस काम आ सकते हैं निक्की जी?" कल्लू सवालिया नज़रों से निक्की को देखा.

"मा जी." निक्की झूमकि के तरफ मुड़ती हुई बोली. - "मैं आपके बेटे से शादी करना चाहती हूँ. क्या आप इसकी इज़ाज़त दोगि?"

निक्की की बात सुनकर झूमकि की पथराई हुई बूढ़ी आँखें हैरत से फैल गयी. उसे लगा जैसे वो कोई सपना देख रही है. उसे अपनी कानो सुनी पर अभी भी बिस्वाश नही हो रहा था.

"ये आप क्या कह रही हैं निक्की जी. कहाँ हम कहाँ आप? धरती - आकाश का मिलन कभी नही होता निक्की जी." कल्लू झूमकि के बोलने से पहले बोल उठा.

"मैं भी वहीं हूँ कल्लू जहाँ तुम हो." निक्की कल्लू के तरफ पलटकर बोली - "ध्यान से देखो......मैं भी उसी धरती पर खड़ी हूँ जिस पर तुम खड़े हो. हमारे बीच धरती आकाश का नही बस एक कदम का फासला है. मैं अपने घर से चलकर यहाँ तक आई हूँ, अब एक कदम तुम भी आगे बढ़ जाओ."

"प......पर....!" कल्लू के शब्द उसके अंदर ही घुटकर रह गये. फिर कुच्छ सोचते हुए बोला - "लेकिन निक्की जी, आपके पिता इस रिश्ते के लिए कभी हां नही कहेंगे. दीवान जी ने ना जाने आपके लिए कैसे कैसे सपने देखे होंगे. भला मेरे घर में आपको क्या मिलेगा?"

"मुझे बड़ा घर, गाड़ी, दौलत नही चाहिए कल्लू. मुझे अब इन चीज़ों से नफ़रत हो गयी है. मैं तो बस एक ऐसा साथी चाहती हूँ जो मुझसे सच्चा प्यार करे. मैं प्यार की भूखी हूँ कल्लू......मुझे हर किसी ने ठुकराया है, प्लीज़ तुम इनकार मत करो. मुझे अपना लो. तुम जैसे रखोगे मैं रह लूँगी." निक्की भारी गले से बोली. वह बेहद दुखी थी.

 
कल्लू फटी फटी आँखों से निक्की को देख रहा था. जीवन भर वो किसी के प्यार के लिए तरसता रहा था. ये ठीक था की वो कंचन से प्यार करता था. पर कंचन ने कभी उसे इस प्यार की नज़र से नही देखा. किंतु आज निक्की के दिल में खुद के लिए प्यार देखकर उसकी खुशी की सीमा ना रही थी. उसने कभी भी सोचा नही था कि उसके लिए भी कभी कोई लड़की तड़पेगी. कोई उसके आगे भी प्यार की भीख माँगेगी. किंतु ऐसा था. आज निक्की उसके सामने अपने प्यार का इज़हार कर रही थी. कल्लू इस खुशी को बर्दास्त नही कर पा रहा था. उसकी आँखें छल्छला आई. उसके होंठ कुच्छ कहने के लिए खुले पर सिर्फ़ काँप कर रह गये.

"बेटी.....इससे क्या पुच्छ रही है. मैं तुम्हे अपनी बहू स्वीकार करती हूँ. तुझे ईश्वर ने सिर्फ़ मेरे बेटे के लिए ही बनाया है. तू ठहर.....!" झूमकि बोली. और कोने में पड़े एक पुराने संदूक के तरफ बढ़ गयी फिर संदूक में कुच्छ ढूँढने लगी. वह जब लौटी तो उसके हाथ में मंगलसूत्र था.

"ये ले इसे कल्लू के हाथ में दे. ये मेरा मंगलसूत्र है. इसके पिता ने मुझे पहनाया था. मैं बरसो से इसी दिन के लिए संभाल कर रखी थी." झूमकि ने निक्की के हाथ में मंगलसूत्र थमाते हुए कहा.

निक्की झूमकि के हाथ से मंगलसूत्र लेकर कल्लू के आगे बढ़ा दी. - "मुझे अपनी पत्नी होने का दर्ज़ा दे दो कल्लू. मैं तुम्हारा उपकार जीवन भर नही भूलूंगी."

"कल्लू सोच मत.....विधाता ने तुम्हे ये मौक़ा दिया है. इस मौक़े को ठुकरा मत. इसके गले में मगलसूत्र पहना दे बेटा." झूमकि ने कल्लू से कहा.

कल्लू का हाथ आगे बढ़ा और निक्की के हाथ से मंगलसूत्र ले लिया. फिर उसने निक्की को लेकर घर के एक कोने में बने छोटे से मंदिर के पास गया. वहाँ से चुटकी भर सिंदूर लिया और निक्की की माँग भर दिया. तत्पश्चात....उसने निक्की के गले में मंगलसूत्र भी पहना दिया.

झूमकि की आँखें खुशी से गीली हो गयी. वह निक्की की बालाएँ लेने लगी.

निक्की और कल्लू ने झुक कर झूमकि का आशीर्वाद ले लिया.

तभी !

बाहर जीप के रुकने की आवाज़ आई. कल्लू बाहर निकला तो दीवान जी जीप से उतरते दिखाई दिए.

निक्की और झूमकि भी बाहर निकल आए थे. दीवान जी को आते देख झूमकि थोड़ी चिंतित हो गयी थी. किंतु निक्की शांत थी.

"नमस्ते दीवान जी." जैसे ही दीवान जी नज़दीक आए कल्लू हाथ जोड़कर बोला.

किंतु, दीवान जी ने जैसे उसकी बात सुनी ही ना हो. वो सीधे निक्की के पास आए और बोले - "निक्की....तू यहाँ क्या कर रही है बेटी. मैं तुम्हे कहाँ कहाँ ढूंढता फिर रहा हूँ. तूने अपनी मा को भी नही बताया कि तू बस्ती आ रही है. चल घर चल.....तेरी मा परेशान है."

"अब मेरा घर यही है पिताजी. मैं कल्लू से शादी कर चुकी हूँ. अब मेरा घर और मेरा परिवार सब बदल चुका है." निक्की शांत किंतु मजबूत स्वर में बोली.

"क्या बकवास कर रही है तू?" दीवान जी पागलों की तरह चीखे. तभी उनकी नज़र निक्की की माँग पर सजे सिंदूर और गले में पड़े मंगलसूत्र पर पड़ी. - "ये तूने क्या कर दिया बेटी. क्या तुझे मुझपर भरोसा नही था. मेरे रहते तूने अपनी ज़िंदगी नर्क बना ली. ये मुझे किस जुर्म की सज़ा दे रही है तू?"

"जुर्म तो आपने अनगिनत किए हैं पापा. पर सच पुछिये तो मैं इस रिश्ते से खुश हूँ. अब आप आए हैं तो आशीर्वाद देकर जाइए."

"हरगिज़ नही." दीवान जी नथुने फुला कर बोले - "मैं तुम्हारी बर्बादी पर तुम्हे आशीर्वाद दूँ. ये मुझसे हरगिज़ नही होगा. मैं इस रिस्ते को ही नही मानता."

दीवान जी की बात से निक्की के साथ साथ कल्लू और झूमकि भी सकते में आ गये.

"कल्लू......!" दीवान जी आगे बोले. - "तू जितने पैसे चाहे मुझसे ले ले पर निक्की को इस रिश्ते से आज़ाद कर दे."

"ये आप क्या कह रहे हैं दीवान जी?" कल्लू नागवारि से बोला. उसे दीवान जी की बात अच्छी नही लगी थी. - "मैने निक्की जी को शादी के लिए मजबूर नही किया. इन्होने खुद मेरे आगे शादी की इच्छा ज़ाहिर की थी."

"कुच्छ भी हो पर मैं इस शादी को नही मानता. तुम मेरी बेटी को छोड़ दो मैं तुम्हे इतने पैसे दूँगा कि तुम्हारी पूरी ज़िंदगी आराम से गुज़र जाएगी."

"बस कीजिए पिताजी. मेरे पति का और अपमान मत कीजिए. अगर आशीर्वाद नही दे सकते तो आप यहाँ से चले जाइए और हमें सुकून से रहने दीजिए."

"निक्की ये तू कह रही है?" दीवान जी आश्चर्य से निक्की को देखते हुए बोले.

जवाब में निक्की ने अपना चेहरा घुमा लिया.

"ठीक है, मैं जा रहा हूँ. पर एक दिन तुझे अपने फ़ैसले पर अफ़सोस होगा और तब तू लौटकर मेरे ही पास आएगी." दीवान जी बोले और गुस्से से जीप की तरफ बढ़ गये.

उनके बैठते ही जीप मूडी और फ़र्राटे भरते हुए निकल गयी.

दीवान जी अपने घर पहुँचे. उन्हे देखते ही रुक्मणी जी बोली - "निक्की कहाँ है जी? आप तो उसे ढूँढने गये थे."

"वो उस भीखमंगे कल्लू से शादी कर चुकी है." दीवान जी दाँत पीस कर बोले. - "कहती है....अब वही झोपड़ा उसका घर है और वही लोग उसका परिवार. अब हमसे उसका कोई नाता नही."

"ये आप क्या कह रहे हैं जी. शुभ शुभ बोलिए." रुक्मणी पति की बात से घबराकर बोली.

"ये सब उस नमकहराम सुगना की वजह से हुआ है. मैं उसे छोड़ूँगा नही. वो मेरी बेटी की ज़िंदगी बर्बाद करके अपनी बेटी के लिए खुशियाँ खरीदना चाहता है. पर मैं ऐसा होने नही दूँगा." दीवान जी दाँत पीसते हुए बोले और कुच्छ सोचने लगे. अचानक ही उनके होंठो पर एक ज़हरीली मुस्कान थिरक उठी. फिर धीरे धीरे उनके होंठों की मुस्कुराहट गहरी और गहरी होती चली गयी और फिर देखते ही देखते उनके मूह से ठहाके छूटने लगे. वो पागलों की तरह ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे.

पास खड़ी रुक्मणी ने उन्हे इस तरह अट्टहास लगाते देखा तो वो दंग रह गयी, वो दीवान जी को ऐसे देखने लगी. जैसे वो पागल हो गये हों.

"ये क्या हो गया है आपको? आप ऐसे क्यों हंस रहे हैं?" रुक्मणी भय से कांपति हुई बोली.

"रुक्मणी मैं कंचन के भविष्य पर हंस रहा हूँ. वो सुगना सोचता है उसने जंग जीत ली है, मूर्ख है वो. वह सोचता होगा, अब वो आसानी से रवि और कंचन की शादी करा सकेगा. नही हरगिज़ नही." अचानक से दीवान जी की बातों में पत्थर की सख्ती आ गयी. - "वो अपनी कंचन की शादी रवि से कभी नही करा सकेगा. उसकी वजह से मेरी बेटी की ज़िंदगी बर्बाद हुई है. अब मैं कंचन को ऐसा चोट दूँगा जिसका दर्द सुगना की छाती में होगा. उसे कंचन से बहुत प्यार है, उसकी साँसे बस्ती है उसमें. मैं उसी कंचन को ज़िंदगी भर के लिए ना भरने वाला नासूर दूँगा." दीवान जी दाँत चबाते हुए बोले.
 
Niikki ke kadam kallu ke ghar ke bahar jakar ruke. Uska ghar kya tha bas ek toota foota jhopda jiski deewarein mitti ki bani hui thi aur Chappar ujda hua tha....Jiske upar plastic ke tukde jagah jagah par peband ki tarah chipkaye gaye the.

Nikki kuchh der tak kallu ke jhopde ko dekhti rahi phir aage badhi aur darwaze tak pahunchi. Darwaza khula tha. Nikki ne andar jhanka. Use kallu ek mariyal si chaarpai par leta hua dikhai diya. Wah khet se aane ke baad chaarpai par leta apni thakan mita raha tha. Wo kisi gehri soch mein duba hua lag raha tha. Achanak hi use darwaze par kisi ke khade hone ka ehsaas hua. Usne apni gardan ghumakar darwaze ki taraf dekha. use darwaze par nikki khadi dikhai di. nikki par nazar padte hi wah jhat se uth baitha.

"nikki ji, aap?" uske muh se swatah hi nikla.

"kya main andar aa sakti hoon." nikki ne kallu se puchha.

"kaun hai kallu? kisse baat kar raha hai tu?" kallu nikki se kuchh bol paata usse pehle hi uski maa ki awaaz aayee. Uski maa ka naam jhumki tha. Jhumki chaarpayi par leti hui thi jab kallu aur nikki ki awaaz uske kano se takrayi.

"maa, thakur sahab ki beti nikki ji aayee hain" kallu jab tak apni maa ko uttar deta nikki andar daakhil ho chuki thi.

thakur sahab ki beti uske ghar aayi hai ye jaankar jhumki aashcharya se bhar uthi. Wo dheere se chalti hui uske paas aayi aur pyar se uske sar par hath ferne lagi. Nikki ek sukhad ehsaas se bhar uthi. kuchh der pehle jo ghutan uske andar thi wo jhumki ke sneh se pal bhar mein door ho gayi. wah jis sukun ki talaash mein ghar se nikli thi, wahi sukun use jhmki ke sneh se mil raha tha.

jhumki apni budhi aankhon se ek tak nikki ko dekhti ja rahi thi. wah soch rahi thi jis ghar mein kabhi teej tyohaar mein bhi log milne nahi aate the aaj us ghar mein thakur sahab ki beti kaise aa gayi?. Use wo pal yaad aa gaya jab kallu baarish se bhigne ke baad ghar aaya tha. Us raat use thodi bukhar bhi aayi thi. Wah behoshi ki haalat mein baar baar kanchan ka naam lekar badabadata raha tha. jhumki uske muh se kanchan ka naam sunte hi sab samajh gayi thi ki kallu kanchan se pyar karne laga hai. Us raat wo kallu ke bhagya par khud bhi roti rahi thi. Kintu usne us raat ek nirnay bhi liya tha. wah tay kar chuki thi ki ek do din mein wo sugna se milkar kallu aur kanchan ke rishtey ki baat karegi.

Theek teesre din kallu ke khet jaane ke upraant dopehar se pehle wo sugna ke ghar ke liye nikli. Sugna se uski pehchan kuchh zyada nahi thi. bas ek gaon mein hone ki wajah se jitni honi chahiye utni hi thi. Koi vishesh sambandh nahi tha. Gaon ke rishtey se sugna uska dever lagta tha.

Raah chalte hue uske mann mein dhero shankayein thi. Use ummid to nahi thi ki sugna apni phool si beti ka hath uske kallu ke hath mein dega. Par maa to maa hoti hai. Bete ke liye wo ek baar sugna ke aage jholi failane ko bhi taiyar ho gayi thi. mann mein ek aas thi-shayad sugna ko uspar taras aa jaye aur is rishtey ke liye haan keh de.

kuchh hi der mein jhumki aasha-nirasha ke jhoole mein jhulti hui sugna ke chaukhat tak pahunchi. Abhi wo andar jaane ki soch hi rahi thi ki use aangan ke khule darwaze se andar ka drishya dikhai de gaya. Baraamde mein sugna ke pure parivaar ke sath kisi shehri aurat baithi thi. Uska saahas nahi hua ki wo andar jaaye. Wah nahi chahti thi ki parayi stri ke saamne use lajjit hona pade. Kisi ke dil ka haal kaun jaane...kya pata sugna kuchh aisa bol de jo use us aurat ke saamne apmanit kar de. Wah bahar hi khadi us aurat ke baahar nikalne ki pratiksha karne lagi.

Kuchh der khadi rehne ke baad wah kaan lagakar andar se aati awaaz ko sunne ka prayaas karne lagi. Sugna aur shanta ki awaaz to uske kaano tak nahi aa rahi thi. Par kamla ji ki unchi awaaz uske kaano tak saaf saaf aa rahi thi. Unke muh se kanchan aur ravi ki baat sunkar wo samajh gayi ki ye stri haveli mein thakurain ki ilaaz karne aaye doctor babu ki maa hai. Aur is waqt wo apne bete ke rishtey ki baat kar rahi hai.

Puri baat jaan lene ke baad uska dil baith gaya. jhumki jis muh gayi thi usi muh laut aayi. Us din use apne kallu ke bhagya par bahut rona aaya tha. Usne kallu ki shadi ki ummid hi chhod di thi.

Kintu Aaj nikki ko apne ghar dekh uska mann phir se wohi kalpanaye karne laga tha. Halaanki wo zameen aur aasman ke antar ko samajh rahi thi. Par dil ke hathon aisa sochne par majboor thi.

"beti, sach sach bata. Tu mere ghar kis liye aayi hai? Aaj tak is ghar mein log teej tyohar mein bhi mushkil se hi aate hain. Phir tu to itne bade baap ki beti hai." jhumki jigyavash puchhi.

"maa ji sabse pehle to main ye bata du ki main thakur sahab ki beti nahi. Mere peeta deewan ji hain. Unhone hi mujhe, jab main paida hui thi..... thakur sahab ki beti se badal diya tha. Kintu ab ye bhed khul chuka hai ki mere asli peeta deewan ji hain."

Kallu aur jhumki ke muh, khule ke khule reh gaye.

"agar tum deewan ji ki beti ho to thakur sahab ki asli beti kaun hai?" jhumki ne agla sawal kiya.

"kanchan !" nikki ke muh se dheere se nikla.

"kya....?" kallu chaukte hue bola.

"haan kallu, kanchan hi thakur sahab ki asli beti hai jise sugna baba ne paala hai." ye kehne ke baad, nikki kshan bhar kallu ko dekhti rahi. Aur uske manobhavo ko padhne ki koshish karti rahi.

is satya ko jaan lene ke baad jahan kallu ko is baat ki khushi thi ki kanchan thakur sahab ki beti hai wahin uske dil mein jo rahi sahi ummid thi kanchan ko paane ki, wo bhi toot chuki thi. Ab to kanchan ke baare mein wo kalpana bhi nahi kar sakta tha. Uska sar peeda bhav se niche jhuk gaya.

"beti, ye jaankar bada dukh hua ki tumhare sath aisa hua. Jis ghar ko jis insaan ko bachpan se apna ghar apna peeta maan kar chali, aaj wo paraya ho gaya. Tumhare mann ko to bahut thes pahuncha hoga." jhumki nikki ke dukh ka anubhav kar bhavuk ho uthi.

Maa ki baat se kallu ka dhyan bhi nikki ke dukh ki aur gaya. Sach mein....usne to nikki ke dukh ka anubhav hi nahi kiya tha. - "nikki ji, mujhe is baat ka khed hai. Aapke sath jo kuchh bhi hua, acha nahi hua."

"chhodo in baaton ko." nikki sar jhatak kar boli - "main yahan kisi aur kaam se aayi hoon. Agar aap log haan kahe to?"

"hum bhala aapke kis kaam aa sakte hain nikki ji?" kallu sawaliya nazron se nikki ko dekha.

"maa ji." nikki jhumki ke taraf mudti hui boli. - "main aapke bete se shadi karna chahti hoon. Kya aap iski izazat dogi?"

nikki ki baat sunkar jhumki ki pthrayi hui boodhi aankhein hairat se fail gayi. use laga jaise wo koi sapna dekh rahi hai. Use apni kaano suni par abhi bhi biswas nahi ho raha tha.

"ye aap kya keh rahi hain nikki ji. Kahan hum kahan aap? Dharti - akaash ka milan kabhi nahi hota nikki ji." kallu jhumki ke bolne se pehle bol utha.

"main bhi wahin hoon kallu jahan tum ho." nikki kallu ke taraf palatkar boli - "dhyan se dekho......main bhi usi dharti par khadi hoon jis par tum khade ho. Hamare beech dharti aaakash ka nahi bas ek kadam ka faasla hai. main apne ghar se chalkar yahan tak aayi hoon, ab ek kadam tum bhi aage badh jao."

"p......par....!" kallu ke shabd uske andar hi ghutkar reh gaye. Phir kuchh sochte huye bola - "lekin nikki ji, aapke peeta is rishtey ke liye kabhi haan nahi kahenge. Deewan ji ne na jaane aapke liye kaise kaise sapne dekhe honge. bhala mere ghar mein aapko kya milega?"

"mujhe bada ghar, gaadi, daulat nahi chahiye kallu. Mujhe ab in cheejon se nafrat ho gayi hai. Main to bas ek aisa sathi chahti hoon jo mujhse sacha pyar kare. Main pyar ki bhukhi hoon kallu......mujhe har kisi ne thukraya hai, plz tum inkaar mat karo. mujhe apna lo. tum jaise rakhoge main reh lungi." nikki bhaari gale se boli. wah behad dukhi thi.

kallu fati fati aankhon se nikki ko dekh raha tha. jeevan bhar wo kisi ke pyar ke liye tarasta raha tha. Ye theek tha ki wo kanchan se pyar karta tha. Par kanchan ne kabhi use is pyar ki nazar se nahi dekha. Kintu aaj nikki ke dil mein khud ke liye pyar dekhkar uski khushi ki seema na rahi thi. Usne kabhi bhi socha nahi tha ki uske liye bhi kabhi koi ladki tadapegi. Koi uske aage bhi pyar ki bheekh mangegi. Kintu aisa tha. Aaj nikki uske saamne apne pyar ka izhaar kar rahi thi. Kallu is khushi ko bardaast nahi kar pa raha tha. Uski aankhein chhalchhala aayi. Uske honth kuchh kehne ke liye khule par sirf kaanp kar reh gaye.

"beti.....isse kya puchh rahi hai. Main tumhe apni bahu swikaar karti hoon. Tujhe ishwar ne sirf mere bete ke liye hi banaya hai. Tu thehar.....!" jhumki boli. Aur kone mein pade ek purane sandook ke taraf badh gayi phir sandook mein kuchh dhundhne lagi. Waj jab lauti to uske hath mein mangalsutra tha.

"ye le ise kallu ke hath mein de. ye mera mangalsutra hai. Iske peeta ne mujhe pehnaya tha. Main barso se isi din ke liye sambhal kar rakhi thi." jhumki ne nikki ke hath mein mangalsutra thamate hue kaha.

Nikki jhumki ke hath se mangalsutra lekar kallu ke aage badha di. - "mujhe apni patni hone ka darza de do kallu. Main tumhara upkaar jeevan bhar nahi bhulungi."

"kallu soch mat.....vidhata ne tumhe ye mauqa diya hai. Is mauqe ko thukra mat. Iske gale mein maglasutra pehna de beta." jhumki ne kallu se kaha.

Kallu ka hath aage badha aur nikki ke hath se mangalsutra le liya. phir usne nikki ko lekar ghar ke ek kone mein bane chhote se mandir ke paas gaya. Wahan se chutki bhar sindoor liya aur nikki ki maang bhar diya. tatpashchat....usne nikki ke gale mein mangalsutra bhi pehna diya.

Jhumki ki aankhein khushi se geeli ho gayi. Wah nikki ki balayen lene lagi.

Nikki aur kallu jhuk kar jhumki ke aashirwaad le liye.

Tabhi !

Bahar jeep ke rukne ki awaaz aayi. Kallu bahar nikla to deewan ji jeep se uatarte dikhai diye.

Nikki aur jhumki bhi bahar nikal aaye the. Deewan ji ko aate dekh jhumki thodi chintit ho gayi thi. Kintu nikki shant thi.

"namaste deewan ji." jaise hi deewan ji nazdeek aaye kallu hath jodkar bola.

Kintu, deewan ji ne jaise uski baat suni hi na ho. Wo seedhe nikki ke paas aaye aur bole - "nikki....tu yahan kya kar rahi hai beti. Main tumhe kahan kahan dhundhta phir raha hoon. Tune apni maa ko bhi nahi bataya ki tu basti aa rahi hai. Chal ghar chal.....teri maa pareshaan hai."

"ab mera ghar yahi hai peetaji. Main kallu se shadi kar chuki hoon. Ab mera ghar aur mera parivaar sab badal chuka hai." nikki shant kintu majboot swar mein boli.

"kya bakwaas kar rahi hai tu?" deewan ji paaglon ki tarah cheekhe. Tabhi unki nazar nikki ki maang par saze sindoor aur gale mein pade mangalsutra par padi. - "ye tune kya kar diya beti. Kya tujhe mujhpar bharosa nahi tha. Mere rehte tune apni zindagi nark bana lee. Ye mujhe kis jurm ki saza de rahi hai tu?"

"jurm to aapne anginat kiye hain papa. Par sach puchhiye to main is rishtey se khush hoon. Ab aap aaye hain to aashirwad dekar jaiye."

"hargiz nahi." deewan ji nathune fulakar bole - "main tumhari barnbadi par tumhe ashirwad doon. Ye mujhse hargiz nahi hoga. Main is ristey ko hi nahi maanta."

deewan ji ki baat se nikki ke sath sath kallu aur jhumki bhi sakte mein aa gaye.

"kallu......!" deewan ji aage bole. - "tu jitne paise chahe mujhse le le par nikki ko is rishtey se azaad kar de."

"ye aap kya keh rahe hain deewan ji?" kallu naagawari se bola. Use deewan ji ki baat achi nahi lagi thi. - "maine nikki ji ko shadi ke liye majboor nahi kiya. Inhone khud mere aage shaadi ki ichha zaahir ki thi."

"kuchh bhi ho par main is shaadi ko nahi maanta. Tum meri beti ko chhod do main tumhe itne paise dunga ki tumhari puri zindagi aaram se guzar jaayegi."

"bas kijiye peetaji. Mere pati ka aur pamaan mat kijiye. Agar ashirwad nahi de sakte to aap yahan se chale jaiye aur hamein sukun se rahne dijiye."

"nikki ye tu keh rahi hai?" deewan ji aashcharya se nikki ko dekhte hue bole.

Jawab mein nikki ne apna chehra ghuma liya.

"theek hai, main ja raha hoon. Par ek din tujhe apne faisle par afsos hoga aur tab tu lautkar mere hi paas aayegi." deewan ji bole aur gusse se jeep ki taraf badh gaye.

Unke baithte hi jeep mudi aur farrate bharte hue nikal gayi.

Deewan ji apne ghar pahunche. Unhe dekhte hi rukmani ji boli - "nikki kahan hai ji? Aap to use dhundhne gaye the."

"wo us bheekhmange kallu se shadi kar chuki hai." deewan ji daant pees kar bole. - "kehti hai....ab wahi jhopda uska ghar hai aur wahi log uska parivaar. Ab hamse uska koi naata nahi."

"ye aap kya keh rahe hain ji. Shubh shubh boliye." raukmani pati ki baat se ghabrakar boli.

"ye sab us namakharam sugna ki wajah se hua hai. Main use chhodunga nahi. Wo meri beti ki zindagi barbaad karke apni beti ke liye khushiyan kharidna chahta hai. Par main aisa hone nahi dunga." deewan ji daant peeste hue bole aur kuchh schne lage. achanak hi unke hontho par ek zehreeli muskaan thirak uthi. Phir dheere dheere unke honthon ki muskurahat gehri aur gehri hoti chali gayi aur phir dekhte hi dekhte unke muh se thahake chhutne lage. Wo paaglon ki tarah zor zor se hansne lage.

Paas khadi rukmani ne unhe is tarah athaas lagate dekha to wo dang reh gayi, wo deewan ji ko aise dekhne lagi. Jaise wo paagal ho gaye hon.

"ye kya ho gaya hai aapko? Aap aise kyon hans rahe hain?" rukmani bhay se kaanpti hui boli.

"rukmani main kanchan ke bhavishya par hans raha hoon. Wo sugna sochta hai usne jung jeet lee hai, murkh hai wo. wah sochta hoga, ab wo aasani se ravi aur kanchan ki shadi kara sakega. Nahi hargiz nahi." achanak se deewan ji ki baaton mein patthar ki sakhti aa gayi. - "wo apni kanchan ki shadi ravi se kabhi nahi kara sakega. Uski wajah se meri beti ki zindagi barbaad hui hai. Ab main kanchan ko aisa chot dunga jiska dard sugna ki chhati mein hoga. Use kanchan se bahut pyar hai, uski saanse basti hai usmein. Main usi kanchan ko zindagi bhar ke liye na bharne wala naasur dunga." deewan ji daant chabate hue bole.
 
ठाकुर साहब कंचन और चिंटू के साथ हवेली में दाखिल हुए.

ठाकुर साहब के साथ - साथ कंचन और चिंटू भी खुश थे. कंचन के लिए ये किसी सपने से कम नही था. कुच्छ देर पहले सुगना से जुदा होते वक़्त जो मन पीड़ा से भर गया था, हवेली में उसके पावं पड़ते ही इस एहसास से कि अब वो इस हवेली की मालकिन हो गयी है, खुशी से झूम उठा था. बचपन से अब तक कयि बार वो इस हवेली में आ चुकी थी, पर आज उसकी छाती फूली हुई थी. किसी का भय नही, किसी चीज़ का डर नही. आज वो बेखौफ़ होकर हवेली में साँसे ले रही थी. उसके समीप खड़ा चिंटू मूह फाडे एक एक चीज़ को देख रहा था. उसके लिए तो ये बिल्कुल नया अनुभव था, आज उसे पहली बार हवेली आने का मौक़ा मिला था.

ठाकुर साहब सोफे पर बैठ चुके थे, किंतु कंचन अभी भी खड़ी थी. कंचन को आया देख हवेली के सारे नौकर हॉल में एकट्ठा हो गये थे.

ठाकुर साहब सोफे पर बैठे एक मुख कंचन को देखे जा रहे थे. तभी हवेली का एक नौकर ट्रे में दूध का गिलास लेकर आया. दूध में कयि तरह के ड्राइ फ्रूट मिला हुआ था. कंचन और चिंटू ने गतगत दूध का गिलास खाली कर दिया.

सहसा.....कंचन को याद आया कि इस हवेली के किसी कमरे में उसकी मा बंद है. कंचन के मन में अपनी मा को देखने की उससे मिलने की इच्छा जाग उठी.

वह ठाकुर साहब से बोली - "पिताजी.....क्या मैं मा से मिल सकती हूँ?"

उसकी बात सुनकर ठाकुर साहब पीड़ा से भर गये. उनके समझ में नही आया कि वो कंचन को क्या जवाब दें. - "नही....बेटी ! तुम अभी अपनी मा से ना ही मिलो तो अच्छा है, उसकी मानसिक स्थिति अभी ठीक नही हुई है, कुच्छ दिन और रुक जाओ, जब रवि बाबू इज़ाज़त देंगे तभी तुम अपनी मा से मिल लेना. अभी तो वो तुम्हे पहचानेगी भी नही, उसकी नज़र में निक्की उसकी बेटी है." ये कहने के साथ साथ ही ठाकुर साहब को अचानक निक्की का ध्यान हुआ.

सुगना के हवेली में आने के बाद ठाकुर साहब ऐसे उलझ गये थे कि उनका पल भर के लिए भी निक्की की तरफ ध्यान नही गया. किंतु अब उनका ध्यान रह-रहकर निक्की की तरफ जा रहा था, वे सोच रहे थे - "अब तक तो निक्की को सारी सच्चाई का इल्म हो गया होगा. ना जाने क्या बीत रही होगी उसके दिल पर?"

"मंगलू....." उन्होने पास खड़े नौकर से कहा - "ज़रा निक्की बेटा को बुला लाओ." फिर कुच्छ सोचते हुए उठ खड़े हुए - "रूको, हम खुद जाकर देखते हैं."

ठाकुर साहब अभी दो कदम ही चले थे कि मंगलू ने उन्हे टोका - "मालिक....निक्की मेम्साब तो हवेली में नही हैं."

"हवेली में नही है.....तो कहाँ गयी वो?" ठाकुर साहब चौंकते हुए बोले. - "कहीं दीवान जी के घर तो नही चली गयी? शायद दुखी होकर वो वहीं गयी होगी...... जाओ उसे बुला लाओ. कहना हम अभी मिलना चाहते हैं."

मंगलू तेज़ी से बाहर निकला. किंतु जिस तेज़ी से वो गया था उसी तेज़ी से लौट आया.

"निक्की मेम्साब वहाँ भी नही हैं....मालिक, वो तो......कल्लू के घर में हैं." मंगलू ने झिझकते हुए ठाकुर साहब से कहा.

"कल्लू के घर में.....?" ठाकुर साहब ने सवालिया नज़रों से मंगलू को देखा.

"मालिक....निक्की मेम्साब ने कल्लू के साथ शादी कर ली है. दीवान जी इस बात से नाराज़ हुए बैठे हैं और उनकी पत्नी रो रही हैं." मंगलू एक ही साँस में सारा किस्सा ठाकुर साहब के सामने बयान कर दिया.

"क.....क्या?" ठाकुर साहब....आश्चर्य से मंगलू को देखते हुए बोले.

मंगलू ने अपनी गर्दन झुका ली.

"ड्राइवर से कहो जीप निकले, हम अभी निक्की से मिलने जाएँगे." ठाकुर साहब क्रोध में बोले.

"जी मालिक." मंगलू बोला और बाहर भागा.

ठाकुर साहब बेचैनी से टहलने लगे. उनके मुख-मंडल पर चिंता की लकीरें खिच गयी थी.

कंचन भी निक्की के इस अनायास उठाए गये कदम से हत-प्रत थी. वो जानती थी कल्लू अच्छा लड़का है, पर वो किसी भी कीमत पर निक्की के योग्य नही था. - "कहीं निक्की ने इस बात से तो नाराज़ होकर कल्लू से शादी नही की, कि मैं उसकी जगह आ गयी?" कंचन के मन में सवाल उभरा. उसका दिल ज़ोरों से धड़क उठा.

जीप तैयार हो चुकी थी. ठाकुर साहब जैसे ही बाहर को निकले कंचन ने पिछे से उन्हे पुकारा - "पिता जी.....मैं भी आपके साथ निक्की के पास जाना चाहती हूँ, मुझे लगता है निक्की कहीं मुझसे नाराज़ ना हो."

"भला तुमसे.....उसकी क्या नाराज़गी हो सकती है बेटी? खैर तुम चलना चाहती हो तो चलो." ठाकुर साहब बोले और बाहर मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गये.

कंचन चिंटू का हाथ पकड़कर ठाकुर साहब के पिछे हो ली. थोड़ी ही देर में जीप हवेली से बाहर निकल चुकी थी.

*****

एक बार फिर से जीप के रुकने की आवाज़ से कल्लू, निक्की और झूमकि का ध्यान बाहर की ओर गया. वे तीनो दरवाज़े से बाहर निकले.

जीप से ठाकुर साहब के साथ कंचन और चिंटू उतरते हुए दिखाई दिए.

ठाकुर साहब पर नज़र पड़ते ही तीनो के होश उड़ गये. उनकी गुस्से से भरी सूरत देखकर कल्लू और झूमकि के शरीर में भय की मीठी लहर दौड़ गयी.

ठाकुर साहब तेज़ी से झोपडे तक आए. झूमकि और कल्लू के हाथ स्वतः ही उन्हे नमस्ते कहने को जुड़ गये.

ठाकुर साहब गुस्से में थे, फिर भी हाथ जोड़ उनके नमस्ते का उत्तर दिए. फिर निक्की को देखने लगे.

निक्की सर झुकाए खड़ी थी. उसकी माँग में भरा हुआ सिंदूर और गले में मंगलसूत्र उसकी विवाहिता होने का प्रमाण दे रहा था. ठाकुर साहब कुच्छ देर निक्की की दशा को देखते रहे.

निक्की की नज़रें नीचे थी पर फिर भी उसे ठाकुर साहब की चुभती नज़रों का एहसास हो रहा था. उसने अपनी गर्दन उठाई और झिलमिलाती आँखों से ठाकुर साहब को देखा.

"मुझे माफ़ कर दीजिए अंकल....." निक्की हाथ जोड़ते हुए बोली.

"क......क्या.....?" ठाकुर साहब दो कदम पिछे हटते हुए बोले - "क्या.....क्या कहा तुमने........अंकल.....?"

निक्की उन्हे देखती हुई विवशता में अपने होठ काटने लगी.

"निक्की......हमें दीवान जी के छल से उतना दुख नही हुआ था जितना कि आज तुम्हारे मूह से "अंकल" शब्द सुनकर हुआ है." ठाकुर साहब तड़प कर बोले - "तूने हमारे 20 साल के प्यार का अच्छा सिला दिया है निक्की. हमने तो आज तक कभी कंचन को तुमसे अलग नही समझा फिर तुम्हे कंचन से अलग कैसे समझ सकते हैं, जबकि तुम हमारी गोद में खेली हो"

ठाकुर साहब का दिल निक्की की बात से लहू-लुहान हो गया.. उन्हे निक्की से ऐसी बेरूख़ी की उम्मीद नही थी. उन्होने कभी नही सोचा था कि जिस निक्की को उन्होने अपनी छाती से लगाकर रखा जिसकी मुस्कुराहटो को देखकर वो अब तक जीते रहे थे वोही निक्की उससे मूह फेर लेगी, एक पल में उनसे इस तरह संबंध तोड़ लेगी. निक्की के इस बर्ताव से उनकी आत्मा सिसक उठी थी.

ठाकुर साहब की बात से निक्की का दिल भर आया. वा तो इस एहसास से मरी जा रही थी कि दीवान जी की ग़लतियों की वजह से अब वो कभी ठाकुर साहब से नज़र नही मिला सकेगी. कभी उनका प्यार, उनका स्नेह नही पा सकेगी. किंतु ठाकुर साहब की बात सुनकर उसकी सारी शंका निर्मूल साबित हुई. उसका मन भावुकता से भर गया. उसके होंठ उन्हे पापा कहने के लिए फड़क उठे, उसकी बाहें उनसे लिपटने के लिए मचल उठी. वह आगे बढ़ी - "प....पापा. मुझे माफ़ कर दीजिए. मुझसे भूल हो गयी, मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ पापा. प्लीज़ मुझे अपने गले से लगा लीजिए."

 
ठाकुर साहब गीली आँखों से निक्की को देखने लगे. वो किसी छ्होटी डारी सहमी बची की तरह बिलख उठी थी. उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे.

ठाकुर साहब आयेज बढ़े और निक्की को अपने कलेज़े से लगा लिए. निक्की उनकी छाती पर मूह छिपा कर फफक पड़ी.

वहाँ मौजूद हर-एक इंसान की आँखें नम हो गयी.

निक्की की रुलाई जब तक पूरी तरह से नही रुक गयी.....ठाकुर साहब उसे अपनी छाती से चिपकाए खड़े रहे. कुच्छ देर बाद निक्की ने अपना सर उनकी छाती से अलग किया. ठाकुर साहब उसके आँसू पोछ्ने लगे.

कंचन उसके करीब गयी तो निक्की ठाकुर साहब से अलग होकर कंचन से लिपट गयी. - "दीदी, तुम भी मुझे माफ़ कर दो, जाने अंजाने में मैने भी तुम्हारा दिल दुखाया है."

"क....क्या" कंचन गुस्से से अलग होती हुई बोली. -"क्या कहा तूने? देखा पिताजी आपने? इसने मुझे क्या कहा......अब मैं इसकी दीदी बन गयी." कंचन नाक फुला कर ठाकुर साहब से शिकायत करती हुई बोली

कंचन की बात से ठाकुर साहब ज़ोरों से हंस पड़े. उनके साथ-साथ वहाँ मौजूद सभी के होंठ खिलखिला पड़े.

"अच्छा बाबा, माफ़ कर दे, आइन्दा दीदी नही कहूँगी." निक्की कंचन के हाथ पकड़ती हुई बोली. उसकी बातों में शर्मिंदगी के भाव थे.

"निक्की......पर ये क्या बेटी, तूने शादी कर ली. किसी को बताया तक नही. तुम्हारी शादी के लिए हमने कितने अरमान दिल में बसाए थे. वो सब धरे के धरे रह गये. ऐसा क्यों किया तुमने बेटी" ठाकुर साहब मायूस होकर बोले.

निक्की का सर आत्म्बोध से झुक गया. फिर क्षमायाचना हेतु ठाकुर साहब को देखती हुई बोली - "मुझे माफ़ कर दीजिए पापा. हवेली से निकलने के बाद मैं बहुत निराश हो चुकी थी. ये सब कुच्छ एक दम से हो गया. प्लीज़....मुझे माफ़ कर दीजिए."

ठाकुर साहब प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोले - "तुम्हारी खुशी ही हमारी खुशी है निक्की. तूने कल्लू को पसंद किया है तो हमें भी कल्लू पसंद है. अब हम ये चाहते हैं कि तुम सब हमारे साथ हवेली चलो और वहीं रहो."

"नही पापा. अब मैं इस घर को नही छोड़ सकती. लेकिन मैं एक बेटी की तरह हवेली आती रहूंगी. आप सब से मिलती रहूंगी." निक्की ठाकुर साहब को इनकार करती हुई बोली - "मुझे आशीर्वाद दीजिए पापा कि मैं अपना नया जीवन अपने पति के घर में सुख से जी सकूँ." निक्की ये कहते हुए ठाकुर साहब के चरणो में झुक गयी.

"मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है बेटी." ठाकुर साहब निक्का के सर पर हाथ रखते हुए बोले. - "सदा खुश रहो. तुम्हारा जीवन फूलों की तरह सदा महकता रहे."

निक्की के बाद कल्लू ने भी ठाकुर साहब के पैर छुकर आशीर्वाद लिया. जो आशीर्वाद दीवान जी से ना मिल सका. वो ठाकुर साहब से उन्हे मिल चुका था.

ठाकुर साहब कंचन और चिंटू के साथ हवेली लौट गये.

******

नेक्स्ट डे

सुबह उठते ही कमला जी नहा धोकर मदिर के लिए निकल पड़ी. वो मंदिर पैदल ही जाया करती थी. हवेली से मंदिर का रास्ता 30 मिनिट का था.

आज वो बहुत खुश थी. खुश होती भी तो क्यों ना? उन्हे मनचाही मुराद जो मिल गयी थी. उन्होने एक ही सपना देखा था, रवि को पढ़ा लिखा कर काबिल इंसान बनाना और किसी उँचे-बड़े घर में उसका विवाह रचाना.

2 दिन पहले वो रवि और निक्की के विवाह के सपने पाले हुए थी. किंतु उनके दिल में एक फास थी. और वो फास थी रवि और कंचन की मोहब्बत....! वो निक्की से रवि का विवाह करना चाहती तो थी......किंतु अपने ही हाथों अपने बेटे के अरमानों का खून भी नही करना चाहती थी. किंतु आज परिस्थिति बदल चुकी थी. आज सब कुच्छ उनके मान मुताबिक हो रहा था. आज वो ठाकुर साहब जैसे धनवान व्यक्ति से रिश्ता भी कर रही थी और उसके लिए रवि का दिल भी नही दुखाना पद रहा था. ईश्वर ने सब कुछ उनके अनुरूप ही कर दिया था. इसलिए आज सुबह उठते ही वो नहा-धोकर मंदिर के लिए निकल पड़ी थी.

पूजा कर लेने के पश्चात कमला जी हवेली के लिए लौट पड़ी.

कुच्छ ही देर में उनके कदम हवेली के सीमा के भीतर थे. वो बड़े इतमीनान से हवेली की तरफ बढ़ी जा रही थी कि तभी उनके कानों से दीवान जी की आवाज़ टकराई -"बेहन जी ज़रा रुकिये......"

कमला जी आवाज़ की दिशा में मूडी. दीवान जी अपने घर के बाहर खड़े अपने हाथ उठाकर कमलाजी को रुकने का इशारा कर रहे थे.

कमला जी आश्चर्य से दीवान जी को देखने लगी, वो तेज़ी से कमला जी की तरफ भागे चले आ रहे थे.

"नमस्ते बेहन जी." दीवान जी पास आते हुए बोले - "आप से एक ज़रूरी बात करनी थी. आप थोड़ी देर के लिए हमारे घर आएँगी."

"मैं क्षमा चाहती हूँ दीवान जी. इस वक़्त आपके घर आना संभव नही हो सकेगा." कमला जी शर्मिंदा होती हुई बोली - "आप अच्छी तरह से जानते हैं.....ठाकुर साहब को ये अच्छा नही लगेगा. आख़िर मैं उनकी मेहमान हूँ."

"तो....क्या आप हमारी मेहमान नही हैं?" दीवान जी रुष्ट स्वर में बोले - "आख़िर हम संबंधी बनने वाले हैं कमला जी, आपको हमारे घर आने से इनकार क्यों हो रही है?"

कमला जी चौंक कर दीवान जी को देखने लगी. उनके मूह से सम्बंधी बनने वाली बात सुनकर उन्हे हैरानी हुई थी - "मैं समझी नही दीवान जी......आप किस संबंध की बात कर रहे हैं?"

"ऐसा ना कहिए कमला जी." दीवान जी विचलित होकर बोले - "अभी कल ही तो आपने हवेली में बैठकर मेरी निक्की को अपनी बहू बनाने की बात कही थी. इसके गवाह खुद ठाकुर साहब भी हैं. आप इस तरह अपनी ज़ुबान से मत मुकरिये."

"दीवान जी, आपने शायद ठीक से मेरी बात नही सुनी थी." कमला जी रूखे स्वर में बोली - "मैने ये नही कहा था कि मैं निक्की को ही अपनी बहू बनाउन्गि. मैने कहा था.....ठाकुर साहब की बेटी ही मेरे घर की बहू बनेगी. और आप ये जानते ही हैं कि ठाकुर साहब की बेटी निक्की नही....कंचन है."

"बेहन जी.....शब्दों का अर्थ बदल कर अपने वादे से मत फिरीए. आपके शब्द जो भी रहे हों, पर आपका इरादा निक्की को ही अपनी बहू बनाने का था." दीवान जी बिदककर बोले. उनके चेहरे पर नाराज़गी फैल गयी थी.

"आप जो भी समझना चाहें......समझिए ! पर मेरे घर की बहू कंचन ही बनेगी." कमला जी दीवान जी को दो टुक जवाब देकर आगे बढ़ने को हुई.

"रुकिये......कमला जी." दीवान जी कड़क स्वर में बोले - "जाने से पहले......एक सत्य मेरे मूह से भी सुनते जाइए. शायद उसके बाद आपका इरादा बदल जाए."

"कैसा सत्य.....?" कमला जी की सवालिया निगाहें दीवान जी के चेहरे पर चिपक गयी.

"एक सत्य जिसका सम्बन्ध आपके पति से है." दीवान जी अपने होंठो पर विषैली मुस्कान भरते हुए बोले.

"आ......आप मेरे पति को कैसे जानते हैं?" कमला जी हकलाते हुए बोली - "कहाँ हैं वो? मुझे बताइए दीवान जी.....मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ."

कमला जी की बदहवासी देखकर दीवान जी के होंठों की मुस्कुराहट गहरी हो गयी.
 
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