• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

कांता की कामपिपासा

मामा: लो इसमे क्या बुराई है भाई………… अब ऐसा तो होगा नही कि तुम ने कभी भी बिल्कुल भी नही पी हो

कांता कभी कभी 1-2 पेग विजय के साथ पी लिया करती थी….. मगर विजय की बात और थी….. मामा जी की बात और थी……. यही सोचकर कांता ने मामा जी को इनकार कर दिया…. अपना प्लेन फैल होता देख कर मामा ने फिर दूसरा पैतरा चला

मामा: तो ठीक है बेटी……….. अगर तुम मेरा साथ नही दोगि तो मैं भी नही लूँगा (और ये कह कर मामा थोड़ा सीरीयस हो गया, कांता ने उसका चेहरा देख कर ताड़ लिया की मामा जी को उसका इनकार करना बुरा लगा, इसलिए कांता मे मामा जी का दिल रखने के लिए कहा)

कांता: ठीक है मामा जी अगर आप इंती ज़िद करते है तो मैं आपका साथ दूँगी…. मगर सिर्फ़ एक पेग लूँगी……… इस से ज़्यादा नही…..

मामा की तो जैसे लॉटरी लग गयी हो उसने अपनी कामना को दबाते हुए कहा……….

मामा: ओके बेटी………. बस एक पेग ही ले लो………..

मामा जी की बात सुनकर कांता किचन मे स्नॅक्स के लिए चली गयी.. चूकि विजय पीने का शौकीन था… इसलिए वो घर मे कई तरह की कीमती शराब की बॉटले रखी हुई थी, मामा ने उसमे से एक स्ट्रॉबेरी फ्लेवर की स्मीरान ऑफ वोड्का की बॉटल निकाल ली

कांता जब किचन मे से आई तो उसके हाथ मे एक ट्रे मे दो शीशे के ग्लास प्लेट मे कुछ स्नॅक्स और भुने हुए काजू के टुकड़े थे…. ट्रे मे आइस क्यूब भी रखा हुआ था… कांता ने वो ट्रे लाकर वहाँ रखे सेंटर टेबल पर रख दिया………

तब तक मामा जी ने भी बॉटल ओपन कर ली थी……… उन्होने कांता को लिम्का की बॉटल लाने के लिए कहा……. कांता जैसे ही लिम्का की बॉटल लेने के लिए किचन की तरफ गयी…… मामा ने झट से उसके ग्लास मे एक बड़ा सा पेग उडेल दिया और उपर से आइस के दो टुकड़े भी डाल दिए… ताकि पेग के बड़ा होने का अंदाज़ा ना लग सके…. और अपने ग्लास मे भी पेग बना लिया और उसमे भी आइस डालने लगे…..

तब तक कांता भी किचन से लिम्का की बॉटल लेकर आ गयी… वहाँ रखे सोफे पर बैठ गयी……….

 
मामा ने कांता के हाथो से लिम्का की बॉटल लेकर उसे ओपन करके कांता के ग्लास को पूरा भर दिया…… और अपने ग्लास मे भी लिम्का उडेल लिया……… मामा ने एक ग्लास कांता की तरफ बढ़ाते हुए एक ग्लास अपने हाथ मे उठा लिया और बोले…

मामा: चेआआआररर्र्र्र्ररर्सस्स्स्स्स्स्स्स्स्सस्स…………. हॅपी होली कांताआ……………………. आज की शाम, तुम्हारे नाम………………………..

कांता: आपको भी होली मुबारक हो मामा जी …………………. चेआआरसस्स्स्स्स्स्स्स्सस्स……..

और फिर दोनो ने अपने जाम को एक दूसरे से होले से टकराया और दोनो ने ही उसे मुँह से लगा लिया……… चुकी मामा ने कांता के ग्लास मे लिम्का ज़्यादा डाल दिया था इसलिए कांता को ये अहसास नही हो पाया कि उसका पेग काफ़ी लार्ज है…………

कांता ने लगभग आधा ग्लास एक ही साँस मे खाली कर दिया……… मामा जी ने भी अपना आधा ग्लास खाली कर दिया था……. फिर काजू के कुछ टुकड़े उठाकर मुँह मे डाल लिया…….. मामा जी ने कांता से पूछा……….

मामा जी: ……… और बताओ कांता………… क्या चल रहा है……….. मज़े मे तो हो ना………

मामा ने शरारती लहजे मे कहा…………….

कांता: बस मामा जी…………. ठीक हूँ………

मामा: ऐसे अनमने ढंग से क्यो बोल रही हो…….. क्या विजय तुम्हारा ख़याल नही रखता…..

कांता: नही मामा जी……… ऐसी बात तो बिल्कुल नही है…… वो तो मेरा बहुत ध्यान रखते है……. वो तो बस थोड़ा सा ऑफीस के काम की वजह से उलझे रहते है…………….

मामा: एक बात तो है कांता……………… मामा जी थोड़ा रुक कर ग्लास मे दो चुस्की और लगा लिया और फिर बोले……… शादी के बाद तो तुम और भी निखर गयी हो कांता…….. बिल्कुल तंदुरुस्त सी लगने लगी हो………….

 
मामा जी की बात सुनकर कांता थोड़ी शरमा गयी…. और उसने ग्लास को अपने होंठो से लगाया और एक गहरा सीप लिया ………………. मामा जी ने अपना ग्लास खाली कर दिया और कांता से बोले:

मामा.-……….. कांता मैं जानता हूँ कि मल्टिनॅशनल कंपनी मे काम का कितना बोझ होता है……. पर कम्से कम आज के दिन तो विजय को तुम्हारे साथ होना चाहिए था (मामा ने जान बुझ कर कांता को कुरेदा) मामा की ये बात सुनकर कांता ने अपने ग्लास को अपने होंठो से लगाया और उसे खाली कर दिया……. मामा की बात सुनकर कांता थोड़ी मायूस हो गयी थी. उसकी आँखो मे मायूसी सॉफ झलक रही थी……

मामा उसकी हालत को समझ रहा था….. उसने तुरंत बातो का रुख़ बदलते हुए उठकर कांता के बगल मे सोफे पर बैठ गया और अपना हाथ बड़े प्यार से कांता के कंधो पर रख कर बोला:

मामा: अरे बेटी………. तुम इतनी मायूस क्यो होती हो………. मैं हूँ ना………. अरे बेटी….. विजय कंपनी मे एक बड़े पोस्ट पर है…. और जितना बड़ा पोस्ट उतनी बड़ी रेस्पॉन्सिबिलिटीस…….. अब तुम तो खुदी समझ सकती हो इस बात को ये कहकर मामा कांता की पीठ पर हाथ रखकर सांत्वना देने लगे…….

उनकी इस सांत्वना ने कांता के रहे सहे सबर को भी तोड़ दिया…. और लाख कोशिश करने के बाद भी कांता अपनी आँखे गीली होने से ना रोक सकी……. उसकी आँखे नम हो गयी थी…….. मामा ने कांता के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा

मामा: देखो कांता अगर तुम ऐसे सीरीयस हो जाओगी तो मैं चला जाउन्गा……. अब फटाफट मुस्करा दो…… कमओन्न्‍ननननननननननणणन्……………

ऐसा करने से कांता के चेहरे पर थोड़ी सी मुस्कुराहट फैल गयी………..

मामा: ये हुई ना बाआअत्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त्त…………… और अब के छोटा सा पेग और तुम्हारी इस प्यारी सी मुस्कुराहट के नाम………. और ये कह कर मामा फिर से दोनो ग्लास मे पेग बनाने लगे….

कांता: नही मामा जी……… बस अब और नही……… मैं नही लूँगी और…………

मामा: पेग बनाते हुए……… अरे बेटी तुमने लिया ही कहाँ अभी…….. पहले वाले का असर तो तुम्हारे सीरीयस होने पर ख़तम हो गया……. अब इसे धीरे धीरे आराम से सीप कर के ले लो…. उसके बाद और नही दूँगा ………. ये कह कर मामा ने पेग बनाकर कांता की तरफ बढ़ा दिया… और खुद भी एक ग्लास अपने हाथो मे लेकर अपने दूसरे हाथ को सोफे पर ऐसे फैला दिया कि कांता के कंधे उसकी उंगलियो से टच हो जाए………

चूकि पहले वाला पेग काफ़ी बड़ा था…. जिसका हल्का हल्का सुरूर कांता पर छाने लगा था…. उसकी आँखो मे गुलाबीपन आना शुरू हो गया था……. कांता धीरे धीरे सीप कर रही थी…. मामा ने उसके कंधे को अपनी उंगलियो से हल्के से सहलाते हुए कहा

मामा: एक बात है कांता….. गाँव की होली तो गाँव की ही होती है……. यहाँ शहर मे तो पता ही नही चलता होली का……… गाँव मे तो लोग रंग, पानी, कीचड़ से होली खेलते है… और एक दूसरे को पूरी तरह से लफेड देते है …. मगर यहा पर तो अधितर लोग गुलाल से होली खेलते है….. और वो भी थोड़ा थोड़ा सा गुलाल लगाकर…………. ऐसे भी कोई होली खेलते है?

 
कांता: तो फिर कैसे खेलते है मामा जी? ………. कांता के मुँह से अनायास ही निकल गया….. अब कांता पर शराब का नशा छाने लगा था………….

मामा: अरे बेटी……….. मैं तो जब होली खेलता हूँ तो सारे शरीर मे रगड़ रगड़ कर रंग लगाता हू……. इतना रंग लगाता हूँ कि सामने वाला रंग से नहा जाता है……… मामा जी ने पेग की चुस्की लेते हुए कहा………..

कांता: अच्छा……….. किसको किसको रंग लगाते थे अप्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प्प……….?

मामा समझ गया था कि कांता पर अब नशे का जादू चलने लगा है वो अब धीरे धीरे अपनी झिझक को दर किनार कर रही थी…. ये समझते ही मामा कांता के और कारीब हो गया जिस से कि मामा की जांघे कांता की मांसल जाँघो से टच होने लगी……….. कांता के कंधो पर दवाब को बढ़ाते हुए मामा ने कहा;

मामा: अरे कांता…….. किस किस का नाम लूँ……… होली के दिन तो मेरे सामने जो भी आ जाता था… बस मैं उसी को पकड़ लेता था…….. और शुरू हो जाता था………. उस दिन तो पूरी आज़ादी रहती थी ना……….. चाहे तुम्हारी छोटी मामी हो या बड़ी मामी……. या तुम्हारी मौसी………. सब को रंग से सरॉबार कर देता था…………….. मामा जब ये बाते कर रहा था तब उसका हाथ कांता की अधनंगी पीठ पर चला गया था और वो हौले हौले उसकी मांसल पीठ को सहला रहा था……

कांता की कोई सग़ी मौसी नही थी…. वो उसके छोटे वाले नाना की लड़की थी, जिसके बारे मे मामा ने कहा था………. मामा की बात सुनकर कांता ने अपने ग्लास मे से एक लंबा सा सीप मारा और काजू उठा कर अपने मुँह मे डालती हुई बोली

कांता: आपका कहने का मतलब है कि आप ….. अपनी चचेरी बहेन को भी रंग लगाते थे………..

मामा: अरे बेटी वो तो छोड़ो मैं खुद अपनी सग़ी बहेन शकुंतला (कांता की मदर, जो कि मामा से सिर्फ़ 2 साल बड़ी थी) को भी नही छोड़ता था… उसे भी बड़ी बुरी तरह रंग लगाता था.. ये कहते हुए मामा ने अपने ग्लास को होंठो से लगाया और जब उसे हटाया तो वो खाली हो चुका था……

कांता: अच्छा मामा जी…….. आप मम्मी के साथ भी होली खेल चुके है…… वैसे बताएँगे उनके साथ कैसे होली खेलते थे आप?

 
कांता की बातो ने मामा जी की हिम्मत रूपी आग को और हवा दे दी……… मामा जी ने अपना हाथ कांता की पीठ से हटाकर उसकी मांसल जाँघो पर रख दिया और फिराते हुए बोले….

मामा: मैं उनपर सामने से अटेक नही करता था….. जब मैं देख लेता था कि वो किसी काम मे लगी हुई है , या उनका ध्यान और कही है तब मैं अपने दोनो हाथो मे रंग लगाकर उनको पीछे से दबोच लेता और उनको मुँह पर रंग लगा देता फिर उनके गर्दन और कई बार तो उनके पेट पर भी रंग मल देता था मैं…………

कांता बड़ी ध्यान पूर्वक मामा की बाते सुन रही थी… उसका चंचल मन धीरे धीरे बहकने लगा था……. कांता ने अपने ग्लास को होंठो से लगाया और उसे खाली करते हुए मामा से पूछा…………

कांता: जब आप उन्हे ऐसे दबोच कर रंग लगाते तो वो क्या आराम से लगवाती रहती थी, छूटने की कोशिश नही करती थी क्या?

मामा: अरे तुम्हारी माँ इतनी आसानी से किसी को नही लगाने देती है, लेकिन मैं भी तो उसी का भाई हूँ ना, वो खूब मचलती….. खूब ज़ोर लगाती छूटने के लिए…… लेकिन इसमे उल्टे मुझे ही फ़ायदा होता था… ये कह कर एक बेशरमी भरी मुस्कान मामा ने कांता की तरफ फेक दी……………….

कांता: आपका फ़ायदा……….. मैं समझी नही कि आप कहना क्या चाह रहे है?.......... कांता ने एक प्रशनवाचक दृष्टि से मामा को देखा……….

मामा: अरे इस ज़ोर ज़बरदस्ती मे वो तो मेरी पकड़ से छूट नही पाती थी, लेकिन मेरा हाथ कई बार उसके ब्लाउस के अंदर चला जाता था…….. और मैं उसकी छातियों पर भी रंग लगा देता था …………….. समझी कांता……….. ये कह कर मामा ने अपनी एक आँख दबा दी……..

कांता: क्या कह रहे है मामा जी…….. आप मम्मी के ब्लाउस मे भी हाथ डाल देते थे, और वो कुछ नही कहती थी……………

मामा: अरे वो कुछ कहती उस से पहले मैं कह देता………….

 
कांता: क्या कह देते थे आप?

मामा: बुरा ना मानो होली है……….. और ये कहते हुए मामा ने कांता की मांसल जाँघो को हल्के से अपनी मुठ्ठी मे भर लिया……

कांता: अरे मामा जी………. आप तो बड़े चालाक है………….. अब तो आप से बच के रहना पड़ेगा….. और ये कहते हुए कांता खिलखिला कर हंस पड़ी……. उसकी हसी से ये सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि अब शराब उसपर हावी होने लगा था……….

मामा इसका फ़ायदा उठाते हुए फिर से दोनो के ग्लास मे पेग बनाने लगा………… इस बार कांता ने भी पेग बनाने से मामा जी को नही रोका………. मामा ने दोनो का पेग बनाकर एक ग्लास को कांता की तरफ बढ़ा दिया…. कांता ने बिना किसी झिझक संकोच के अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर मामा के हाथ से ग्लास ले लिया……..

मामा ने फिर से अपना हाथ सोफे पे इस तरह से रख दिया जिस से कि उनकी उंगिलिया कांता की खुले हुए गर्दन के आस पास मंडराने लगी……. मामा ने सीप लेते हुए कहा………..

मामा: अरे कांताआआआ…………. आज तो तुम्हारा बच पाना बड़ा मुश्क़िल है… और वैसे ज़बरदस्ती डालने का मौका साल मे एक बार ही तो आता है………..?

कांता: डालने का……….? मतलब मैं समझी नही………. कांता ने संकोची भाव मे पुच्छा ……………………..

मामा ने बात को संभालने की गरज से कहा

मामा: अरे भाई रंग डालने का और क्या…………. तुम क्या समझी………. कहीं वो डालने की बात तो नही………. ये कह कर मामा ने एक बेशर्मी का ठहाका लगा दिया……….. मामा की बातो का मतलब समझ कर कांता थोड़ा शरमा गयी…………. अब मामा धीरे धीरे अपने असली रंग मे आने लगा था………. उसकी हथेली अब पूरी तरह से कांता की अधखुली पीठ का जायजा ले रही थी……..

 
कांता की आँखे गुलाबी और नशीली हो गयी थी….. उसकी आँखो मे शराब वो जवानी का शबाब स्पष्ट झलक रहा था……….. अब कांता भी थोड़ी थोड़ी बहकने लगी थी….

कांता: वो सब तो ठीक है मामा जी……….. लेकिन मैं आपको कुछ नही डालने दूँगी (कांता भी मामा के सुर मे सुर मिलाने लगी थी)

मामा: बेटी…. तुमने खुद ने ही मुझसे कहा था कि मामा जी आप मेरे साथ तो होली खेल सकते है . मैं हूँ ना होली खेलने के लिए………. तो फिर अब मना क्यो कर रही हो……… मामा मे स्नॅक खाते हुए कहा………………

कांता: वो तो ठीक है मगर आप की बाते सुनकर आप से डर लगने लगा है ………. कही रंग डालने के बहाने आप कुछ और ना करने लगो………………. कांता ने कुछ और शब्द पर ज़्यादा ज़ोर डाल दिया जिस से कि पूरी बात का मतलब ही बदल गया…………

मामा: अरे नही. नही बेटी ऐसी बात नही है……….. तो तो खामोखा इतना घबरा रही हो…. अगर तुम आराम से लगवाओगी तो मैं कुछ और नही करूँगा………. ये कह कर मामा मुस्करा दिया……….

कांता: तो ठीक है मामा जी…….. अगर आप कुछ और नही करने का वादा कर रहे है तो मैं आपकी साथ होली ज़रूर खेलूँगी……. ये कह कर कांता ने अपने ग्लास मे से दो घूट अपने गले मे उडेल दिया……..

कांता की रज़ामंदी से मामा मंन ही मंन बहुत खुश हो गया…… उसने अपने आप से कहा “अरे एक बार हाथ तो लगाने दे कांताआ………. उपर की तो छोड़…….. तेरे अंदर अपनी पिचकारी डालकर होली खेलूँगा तेरे से” ये ख़याल आते ही मामा के लंड मे खून इकट्ठा होने लगा………….

 
कांता: तो ठीक है मामा जी…….. अगर आप कुछ और नही करने का वादा कर रहे है तो मैं आपकी साथ होली ज़रूर खेलूँगी……. ये कह कर कांता ने अपने ग्लास मे से दो घूट अपने गले मे उडेल दिया……..

कांता की रज़ामंदी से मामा मंन ही मंन बहुत खुश हो गया…… उसने अपने आप से कहा “अरे एक बार हाथ तो लगाने दे कांताआ………. उपर की तो छोड़…….. तेरे अंदर अपनी पिचकारी डालकर होली खेलूँगा तेरे से” ये ख़याल आते ही मामा के लंड मे खून इकट्ठा होने लगा………….

दोनो के पेग ख़तम हो चुके थे…… 3-3 पेग का असर दोनो के चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था…. मामा ने कांता की पीठ को सहलाते हुए कहा……….

मामा: तो तैयार हो जाओ कांता…….. होली के लिए………….. फिर कुछ सोचकर बोला…… कांता ऐसा करो तुम दूसरे कपड़े बदल लो………. आक्च्युयली ये कपड़ा खराब हो जाएँगे…………

मामा की बात कांता को भी सही लगी…….. और वो उठकर झूमती हुई अपने बेड रूम की तरफ चली गयी………. लगभग 10 मिनट के बाद कांता वापस आई…………..

कांता ने इस वक्त एक साफ़ेद रंग की साड़ी पहनी हुई थी…… जो कि काफ़ी झीनी थी……. इस वजह से उसका पेट और गले के आस पास का व्यू झलक रहा था……… कांता ने जो ब्लाउस पहनी हुई थी……… वो शायद पुरानी थी क्योकि कांता के स्तन उस ब्लाउस मे बिल्कुल दब से गये थे जिसकी वजह से वो उठ गये थे और उनका उपरी हिस्सा काफ़ी कुछ नज़र आने लगा था…. कांता का ब्लाउस हाफ स्लीव्स का था…. कांता की आँखो मे नशा ही नशा भरा था……. या तो कांता जवानी के नशे मे वैसे हो चूर थी उपर से वोद्का के तीन पेग उसे बहकने पर मजबूर करने लगे थे…….. कांता की आखे किसी हिरनी की तरह नशीली हो रही थी.

एक तो कांता की कातिल और गदराई हुई जवानी और उसके उपर शराब का नशा कांता पूरी काम देवी नज़र आ रही थी. मामा का तो जैसे गला ही सूख गया था कांता की गरम जवानी देख कर………

मामा: (एक कुटिल आवाज़ मे) तो क्यो कांता………… डलवाने के लिए तैयार हो ना…………. अब तो डाल दूँ ना………………..

कांता को भी मामा की द्विअर्थि बातो मे मज़ा आने लगा था, उसने भी मामा की बात सुनकर कहा.

कांता: आरीईईईईईई…….. म्‍म्म्मममाआआमम्म्ममममममाआ जी………….. डालने वाले इजाज़त नही लेते है………………. वो तो ज़बरदस्ती पकड़ कर डाल देते है …………….

कांता की बात सुनकर मामा समझ गया कि कांता अब होली खेलने के लिए पूरी तरह से तैयार हो गयी थी ……….. मामा ने वहाँ पड़ी गुलाल की थाली मे से गुलाल उठया और कांता की तरफ बढ़े….

मामा के हाथो मे गुलाल देख कर कांता उनकी नीयत समझ गयी और पीछे हटने लगी……………….

मामा: कांता………. आज तुम हम से नही बच सकती हो…… आज मैं गुलाल डाल कर ही रहूँगा………..

कांता: (मामा जी से दूरी बरकरार रखते हुए बोली) अरे मामा जी डालने का इतना शौक है तो……. पहले पकड़ के दिखाइए………..

मामा: देखो कांताआ हम तुमसे कह देते है कि………… अगर प्यार से डलवाओगी तो बड़े आराम से डालूँगा……… और अगर ज़यादा नखरे दिखाओगी………. तो बहुत ज़ोर से रगड़ रगड़ कर डालूँगा…………….

कांता: पहले पकड़ के तो दिखाइए मामा जी……… फिर जितना मर्ज़ी उतने ज़ोर से रगड़ कर डाल लीजिएगा ……… कांता की बात मे चॅलेंज सॉफ झलक रहा था ………

 
कांता की चॅलेंज भरी बाते सुनकर मामा को भी अब जोश आ गया और वो बड़े ही फुर्ती से कांता को दबोचने के लिए कांता की तरफ लपका………. लेकिन कांता भी होशियार थी उसने तुरंत ही अपना बचाव कर लिया और मामा की पहुच से दूर हो गयी…….. दोनो का ये पकड़ा पकड़ी का खेल लगभग 5 मिनट तक चलता रहा…….. कांता का जोश पहले से थोड़ा सा कम हो गया था…… मामा इसका फ़ायदा उठाते हुए कांता को पीछे से अपने दोनो मजबूत बाहो मे जकड लिया …….

कांता ने अपने आपको को छुड़ाने का भरसक प्रयास किया किंतु मामा की पकड़ ज़यादा मजबूत थी …. इस बात को समझते हुए कांता ने अपने आपको छुड़ाने की कॉसिश करना बंद कर दिया…. मामा ने कांता के गदराए जिस्म को अपनी दोनो बाहो मे भीच कर दबोच रखा था…….. इस भागम भाग मे कांता का आँचल उसके सीने से लुढ़क गया था……….. चूकि मामा ने कांता को पीछे पकड़ रखा था और मामा की ठोडी भी कांता के कंधो पर रगड़ खा रही थी. इस पोज़िशन मे कांता के छोटे से ब्लाउस मे से उसके दोनो बड़े बड़े स्तन और उसके बीच की गहरी खाई मामा को सॉफ नज़र आ रही थी. ये नज़ारा देख कर मामा के पाजामे मे सुरसुराहट शुरू हो गयी थी……

कांता के विशाल उभारो के दर्शन से तो एक बार नपुंसक का भी लंड खड़ा हो जाता, यहाँ तो महा चोदु मामा जी थे………… उनका लंड पाजामे मे टाइट होने लगा था……. मामा अपनी मुठ्ठी मे लिया गुलाल कांता के चेहरे पर मलने लगा……… जब मामा ने कांता के दोनो गालो पर जम कर गुलाल लगा दिया तो कांता बोली:

कांता: बस……… अब तो आपने रगड़ का लगा लिया ना………. अब तो मुझे छोड़ दीजिए…………

मामा: (अपना एक हाथ बढ़ा का पास रखी थाली मे से एक मुठ्ठी गुलाल उठाते हुए) अरे कांता….. मैने तो पहले ही कहा था कि आराम से डलवाओगी तो प्यार से डालूँगा… लेकिन तुमने कहा था कि पकड़ के दिखाओ……. और रगड़ के डालो………….. और जब अब मैने पकड़ लिया है तो, रगड़ने भी दो……….

कांता: अरे मामा जी रगड़ तो लिए……… और अब कितना रगडोगे?

मामा: अरे कांता अभी तो शुरआत है……. आज तो इतना रगड़ कर डालूँगा कि जिंदगी भर नही भूल पाओगी तुम………. ये कह कर मामा ने अपनी हथेली मे भरा गुलाल कांता के चिकने और स्पाट पेट पर रगड़ना शुरू कर दिया……..

अचानक कांता अपने पेट पर मामा के हाथो का स्पर्श पाकर चौक उठी और उसके हाथो की छुवन को महसूस करते ही अचानक से थोड़ी सी झुक गई जिस से कि कांता गान्ड की दरार मामा को अच्छी तरह महसूस होने लगी. मामा कांता के पेट पर गुलाल मलते हुए बीच बीच मे उसकी मांसल पेट को अपनी मुठ्ठी मे पकड़ का ज़ोर से भीच देते, जिसकी वजह से कांता के मुँह से हल्की सी सिसकारी निकल जाती. मामा की इस हरकत को देख कर कांता बोली:

कांता: अरे मामा जी……… अब छोड़ भी दीजिए ना………. अब कितना गुलाल रगडेंगे……….

 
मामा: अरे कांता अभी तो मैने रगड़ा ही कहाँ है …….. अभी तो तुम्हारा पूरा बदन बाकी ही है…..;. आज तुम्हारे एक एक अंग को मैं रंग दूँगा………

मामा की बाते सुनकर कांता समझा गयी थी कि आज मामा होली का पूरा फ़ायदा उठा रहा है…….. धीरे धीरे कांता को भी मामा की होली मे मज़ा आने लगा था लेकिन वो एक दम समर्पण की बजाय इन सब का मज़ा लेना चाहती थी…….

कांता : (मामा की बात को ना समझने का नाटक करते हुए) अभी तो पूरा बदन बाकी है….. इस बात से आपका क्या मतलब है मामा जी?

मामा ने फिर से अपनी मुठ्ठी मे गुलाल भरा और इस बार कांता की खुली हुई मांसल पीठ पर अपना हाथ फेरते हुए बोले……

मामा: कहने का मतलब ये है कि मैं आज तुम्हारे पूरे शरीर पर रगड़ रगड़ कर गुलाल लगाउन्गा ………….

कांता( थोड़ी घबराए हुए लहजे मे) अरे नही मामा जी मैं आपसे अपने पूरे शरीर पर गुलाल नही डलवाउंगी…………..

मामा: अरे तुम्ही ने तो मुझसे कहा था कि डालने वाले पूछते नही है वो तो बस डाल देते है… अब तुम चाहे कुछ भी कहो मैं तो तुम्हारे पूरे अंग पर रंग मलूँगा….. ये कह कर मामा ने फिर से अपनी दोनो मुठ्ठी मे गुलाल भर लिया और कांता बड़े बड़े जोबन के उपर हिस्से पर अपना अपना हाथ रख दिया……. अपने जोबन पर मामा की उंगलिओ का स्पर्श पाकर कांता भी सिहर उठी….

मामा उसके मदमस्त जोबन अधखुले जोबन पर अपनी दोनो हथेलिया से रगड़ रगड़ का गुलाल लगाने लगा………… कांता मामा के चंगुल से छूटने के लिए कसमसा रही थी मगर मामा के बाहुपाश के ज़ोर के आगे वो बेबस थी….. लेकिन ये भी सच था कि उसे मामा की ये हरकत अंदर ही अंदर रोमांचित भी कर रही थी…..

अनुभवी मामा भी कांता के मन मे चल रही बात को भाप चुका था…. इसलिए उसने अपने एक मुठ्ठी को फिर से गुलाल से भरा और इस बात कांता के ब्लाउस मे उसने अपने हाथ डालकर उसकी चूचियो को गुलाल लगाने के बहाने ज़ोर ज़ोर से मसल्ने लगा….

. कांता को तो जैसे बिजली का झटका लग गया, वो फिर से मामा के बाहुपाश मे कसमसाने लगी …..

 
Back
Top