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कामवाली की मस्त बहु

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Guest
मेरा नाम अभिनव है, मेरी आयु पच्चीस वर्ष की है और मेरा शरीर बहुत हृष्ट-पुष्ट एवम् तंदरुस्त है क्योंकि मैं स्कूल और कालेज में खेल कूद में बहुत भाग लेता था.

मैं अब भी प्रतिदिन घर पर व्यायाम करता हूँ और कभी कभी व्यायामशाला में जा कर भी भार-उत्तोलन तथा विभिन्न प्रकार की कसरतें इत्यादि करता हूँ.

मैं मूल रूप से देहली का निवासी हूँ तथा मेरा पूरा परिवार वहीं रहता है, लेकिन आई-टी में इंजीनियरिंग करने के बाद पिछले तीन वर्षों से बैंगलोर में नौकरी कर रहा हूँ.

तीन वर्ष पहले जब मैं बैंगलोर में आया था तब मैं पन्द्रह दिनों के लिए एक पेइंग गेस्ट-हाउस में रहा था लेकिन उसके बाद कंपनी ने मुझे रहने के लिए एक फ्लैट दिला दिया. मेरा फ्लैट एक बहुमंजिली इमारत के दसवें तल पर है और उसमें एक बैठक, एक बैडरूम, एक छोटा स्टोर कमरा, एक रसोई तथा एक बाथरूम है.

मैं अधिकतर बैठक, बैडरूम, रसोई और बाथरूम को ही प्रयोग में लाता हूँ और छोटा स्टोर कमरे में एक फोल्डिंग चारपाई, दो खाली अटैची तथा कुछ फ़ालतू का सामान आदि पड़े रहते हैं.

उस फ्लैट में स्थानांतरण के बाद जब मुझे खाने पीने और घर के रख-रखाव की समस्या आई तब मैंने उसी इमारत के अन्य फ्लैट में काम करने वाली एक पचास वर्षीय वृद्ध महिला को घर का काम करने के लिए रख लिया.

वह महिला जिसे सभी अम्मा कहते थी सुबह छह बजे ही आ जाती और मुझे चाय दे कर चौका बर्तन करती तथा मेरे लिए नाश्ता बनाती.

मेरे तैयार होकर ऑफिस जाने के बाद वह दूसरे फ्लैट में काम निपटा कर फिर मेरे घर की सफाई आदि करती तथा मेरे कपड़े आदि धो कर सुखाने डाल देती.

क्योंकि वह मेरे ऑफिस जाने के बाद तक घर का काम करती थी इसलिए उसकी सुविधा के लिए मैंने उसे अपने फ्लैट की एक चाबी भी दे रखी थी. वह शाम को मेरे आने से पहले ही धुले हुए सूखे कपड़ों को प्रेस करने के लिए धोबी को दे आती थी और मेरे घर आते ही मुझे चाय बना कर देती तथा रात के लिए मेरा खाना बना कर अपने घर चली जाती.

क्योंकि मुझे अच्छा वेतन मिलता था इसलिए मैं उस वृद्ध महिला को उसके काम के लिए पाँच हज़ार प्रति माह देता था जिस कारण वह बहुत ही लग्न और ईमानदारी से मेरा काम करती थी.

लगभग छह माह तक ऐसे ही लगन से काम करते रहने के बाद एक दिन उस वृद्ध महिला ने मुझसे कहा- साहिब, मेरी सबसे छोटी बहू के घर बालक होने वाला है इसलिए मुझे तीन-चार माह के लिए उसके पास जाना पड़ेगा. आप काम के लिए किसी दूसरी कामवाली को रख लीजिये अथवा अगर आप सहमत हों तो मैं अपनी मंझली बहू को आपके यहाँ काम के लिए लगा देती हूँ.

उसकी बात सुन कर मुझे एक बार तो झटका लगा लेकिन अपने को सम्हालते हुए मैंने कहा- अम्मा, आप यह क्या कह रही हो. आप तो मेरे घर का सभी काम अच्छे से जानती हो और उसे बहुत निपुणता से संभाल भी रखा है. अगर आप नहीं आओगी तो मेरा काम कैसे होगा? मैं किसी दूसरी कामवाली को कहाँ से ढूँढ कर लाऊं? आप अपनी जगह अपनी मंझली बहू को ही छोटी बहू के पास को क्यों नहीं भेज देती?

मेरी बात सुन कर वह बोली- साहिब, यह जच्चा और बच्चा संभालने की बात है कोई सैर-सपाटा करने की बात नहीं है. आजकल की लड़कियाँ तो ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकती. साथ में वह लड़की जो खुद अभी तक माँ नहीं बनी हो उसे तो पता ही नहीं होगा कि गर्भावस्था में एक जच्चा को क्या खाना पीना है. उसे तो यह भी नहीं पता है कि प्रसव के समय क्या करना होता है.

उसकी बात सुन कर मैंने कहा- अम्मा, तुम जैसा ठीक समझो वैसा ही प्रबंध कर दो. क्या जो घर का काम आप करती हो वह सब तुम्हारी मंझली बहू कर लेगी?

मेरी बात सुन कर अम्मा बोली- आप चिंता नहीं करें, तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा. मैं जाने से दो सप्ताह पहले ही उसे रोज़ अपने साथ ले कर आऊंगी और उन दो सप्ताह में घर का सभी काम सिखा दूंगी.

उस माह के दूसरे सप्ताह में अम्मा रोजाना की तरह सुबह छह जब बजे काम पर आई तब वह अपनी मंझली बहू माला को भी साथ लेकर आई.

माला बहुत ही सुन्दर एवम् आकर्षक नैन नक्श वाली स्त्री थी जिसका वर्ण बहुत हल्का गेहुँआ था, शरीर पतला और कद लम्बा था, उठे हुए उरोज और बाहर निकले हुए नितम्ब मध्यम नाप के थे, गर्दन लम्बी तथा पेट समतल था.

उसने हरे रंग की सूती साड़ी में अपना पूरा बदन छुपा रखा था और घर में घुसते ही मुझे बैठक में अख़बार पढ़ते हुए देख कर दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया.

उत्तर में जैसे ही मैंने उसके प्रणाम का उत्तर दिया तभी अम्मा बोली- साहिब, यह मेरी मंझली बहू माला है जिसके बारे में मैंने आपसे बात करी थी. अब दो सप्ताह तक यह रोज़ मेरे साथ आएगी और यहाँ का सभी काम सीख लेगी ताकि दो सप्ताह के बाद जब मैं चली जाऊँगी तब यह आपकी अपेक्षा के अनुसार ही सभी कार्य करेगी.

 
उत्तर में मैंने कहा- ठीक है अम्मा, इसे मेरी पसंद एवम् सभी आवश्यकताओं के बारे में अच्छे से समझा देना और क्या कैसे करना है यह भी सिखा देना!

उसके बाद मैं अख़बार पढ़ने लगा और वे दोनों रसोई में जा कर चौका एवम् बर्तन और सफाई आदि में व्यस्त हो गई.

लगभग सात बजे रोज़ की तरह अम्मा ने मुझे चाय दी और कहा- साहिब, इस माह की तीस तारीख को मैं छोटी बहू के पास जाऊंगी इसलिए अगर मुझे मेरी इस माह की पगार कल मिल जाती तो मैंने जो खरीदारी करनी है वह कर सकूँगी.

मैंने उत्तर दिया- अरे अम्मा, इसमें अगर की क्या बात है? आप कल क्यों आज ही ले लो.

तब अम्मा ने एक और बात कही- साहिब, मेरा मंझला बेटा दुबई में काम करता है इसलिए मंझली बहू मेरे साथ रहती है. मेरे जाने के बाद वह अकेली रह जायेगी और जिस बस्ती में हम रहते हैं वह एक अकेली औरत के लिए बिल्कुल ही सुरक्षित नहीं है. इसलिए मेरे जाने के पश्चात मुझे मंझली बहू की सुरक्षा की चिंता लगी रहेगी.

अम्मा की बात सुन कर मैंने कहा- आप उसके लिए किसी दूसरी सुरक्षित बस्ती में कोई अच्छा घर किराए पर ले दीजिये.

वह बोली- पिछले दो माह से उसके लिए जगह ढूँढ रही हूँ लेकिन मुझे अभी तक कोई भी सुरक्षित जगह नहीं मिली. अगर कोई है भी तो वह बहुत दूर है या फिर वह ऐसी जगह है जो अवैध रूप से बनी हुई है और कभी भी गिराई जा सकती है.

मैंने कहा- अम्मा, मैं तुम्हारी समस्या को समझता हूँ लेकिन मैं इस बारे में तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ?

अम्मा तुरंत बोली- साहिब आप ही तो सब से अधिक सहायता कर सकते हो. अगर मेरे वापिस आने तक आप माला को इस घर के स्टोर कमरे में रहने की आज्ञा दे देंगे तो आपके द्वारा मेरे ऊपर इससे बड़ा कोई उपकार नहीं हो सकता. इसके लिए आप बेशक हमारी पगार में से जितना चाहे वह काट लीजिये लेकिन एक असहाय को आसरा जरूर दे दीजिये.

मैंने उसके अनुरोध पर अचंभित होते हुए कहा- अम्मा, आप यह क्या कह रही हो? एक अविवाहित पुरुष के घर में उसके साथ एक अकेली विवाहित स्त्री का रहना ठीक नहीं है. अड़ोसी-पड़ोसी और इमारत के बाकी सब लोग क्या कहेंगे?

अम्मा बोली- लोगों का क्या है वे तो जो मन में आएगा वही बोलते रहेंगे. मुझे आप पर बहुत भरोसा है और अगर माला इस घर में रहेगी तो आपको कष्ट नहीं होगा तथा आपका सभी काम आपकी आवश्यकता के अनुसार समय-बद्ध तरीके से हो जाया करेगा. मुझे आशा है की आप इस बात को ध्यान में रखते हुए मना नहीं करेंगे.

पता नहीं अम्मा की बात सुन कर मुझे उन दोनों पर क्यों तरस आ गया और मैंने उन्हें कह दिया- ठीक है अम्मा, ऐसा करो, आप आज ही अपना और माला का सभी सामान ले कर यहाँ आ जाओ. इस तरह आप कुछ दिन साथ में रह कर सब ठीक से समायोजित कर सकोगी और माला को भी हर काम अच्छे से समझा दोगी.

नाश्ता करने के बाद मैं अम्मा को उस माह का वेतन दे कर ऑफिस चला गया और शाम को घर लौटने पर देखा की अम्मा और माला ने अपना सभी सामान लाकर स्टोर में रख दिया था.

मुझे शाम की चाय नाश्ता कराने के बाद अम्मा रात का खाना बनाने लगी और माला स्टोर में समान सजाने लगी.

अम्मा उन दो सप्ताह में माला को घर का काम सिखाती रही और जब माला सारा काम संतोषजनक तरीके से करने लगी तब वह माह के अंतिम दिन अपनी छोटी बहू के पास चली गई.

कुछ ही दिनों में माला ने मेरे घर का काम ऐसे संभाल लिया था जैसे वह वर्षों से काम कर रही हो और अम्मा की तरह मेरे लिए हर काम बड़ी सफलता से समय पर कर देती.

अगले एक सप्ताह तक सब ठीक-ठाक चलता रहा और माला सुबह से रात तक घर काम करती तथा आराम एवम् सोने के लिए स्टोर में चली जाती. अगला दिन शनिवार था तथा छुट्टी होने के कारण मैं देर से उठा और जब रसोई में माला से चाय बना कर देने के लिए कहने गया तो उसे वहाँ नहीं पाया तब मैंने स्टोर में देखा तो वह वहाँ भी नहीं थी.

माला कहाँ गई होगी यह सोचते हुए जब मैं अपने कमरे की ओर लौट रहा था तब मुझे बाथरूम में नल चलने की आवाज़ सुनाई दी.

पानी की आवाज़ को सुन और बाथरूम का खुला दरवाज़ा देख कर मैं समझा कि माला कपड़े धो रही होगी इसलिए मेरे कदम अनायास उस ओर मुड़ गए और मैं यकायक उसमें घुस गया.

 
बाथरूम में कदम रखते ही अंदर का नज़ारा देख कर मेरे पाँव आगे नहीं बढ़ पाये और दो क्षण के लिए माला को देख कर उल्टे पाँव वापिस कमरे में आ गया.

कमरे में जब मैं बिस्तर पर बैठा तब मेरी आँखों के सामने, अपनी योनि से निकले खून को धोती हुई अर्ध-नग्न माला की छवि घूम रही थी.

कुछ क्षणों के बाद जब मुझे झाड़ू की आवाज़ सुने दी तब मैं दोबारा बाथरूम में घुसा तो देखा की माला ने अपनी योनि को ढक लिया था तथा वह फर्श पर बिखरे खून को झाड़ू से साफ़ कर रही थी.

मुझे बाथरूम में देख कर माला बोली- बस मुझे एक मिनट और दीजिये. मैं अभी सब साफ़ कर देती हूँ फिर आप अपने दैनिक क्रिया से निपट लीजियेगा.

मैंने अनजान बनते हुए कहा- अच्छा मैं प्रतीक्षा करता हूँ, लेकिन यह खून कहाँ से आया? क्या तुम्हें कहीं चोट लगी है?

मेरे प्रश्न सुन कर उसने शर्म से सिर झुका लिया तथा उसका चेहरा एवम् कान लाल हो गए और उसने बाथरूम से बाहर जाते हुए कहा- साहिब, सब ठीक है आप निश्चिंत रहिये और मुझे कहीं कोई चोट नहीं लगी है. आज सुबह से मुझे माहवारी शुरू हो गई है और यह उसी का खून था.

माला की बात सुन कर मैं चुप हो गया और सुबह की नित्य क्रिया से निपट कर बैठक में अख़बार पढ़ने बैठा ही था कि वह मेरी चाय दे गई. ऑफिस की छुट्टी होने के कारण मैं पूरा दिन घर पर आराम करता रहा और माला दिन भर रोजाना की तरह घर के काम में व्यस्त रही. रात को मैं तो समय पर खाना खा कर सोने चला गया और मुझे नहीं पता चला कि माला कब सोने गई थी.

उसके बाद अगले पाँच दिन यानि रविवार से बृहस्पतिवार तक बिल्कुल सामान्य निकल गए और कोई भी उल्लेखजनक प्रसंग नहीं हुआ.

शुक्रवार सुबह सात बजे जब मैं उठा और मुझे लघु-शंका के लिए जाना था इसलिए बाथरूम की और बढ़ा तो वहाँ पानी चलने की आवाज़ सुन कर थोड़ा ठिठका. लेकिन दरवाज़ा खुला देख कर मैं बाथरूम के दरवाज़े के पास जा कर अंदर झाँका तो देखा पूर्ण नग्न माला कपड़े धो रही थी.

मैं वापिस कमरे में आ गया लेकिन माला ने शायद मुझे देख लिया होगा इसलिए एक मिनट के बाद ही उसकी आवाज़ आई- साहिब, आप अंदर आ जाइए मैंने अपने आप को ढक लिया है.

मैं झिझकते हुए एक बार फिर बाथरूम में घुसा तो देखा की माला ने अपने शरीर को अपनी गीली साड़ी से ढक लिया था जो उसके जिस्म से बिल्कुल चिपकी हुई थी.

माला के बदन से चिपकी साड़ी में से उसका हर अंग मुझे दिख रहा था जिस कारण मेरा लिंग एक नाग की तरह अपना सिर उठाने लगा था. जब माला ने मुझे उस नाग के फन पर हाथ रख कर दबाते हुए देखा तब वह मुस्कराते हुए मेरी तरफ पीठ करते हुए बोली- साहिब, लगता है कि आपको बहुत तेज़ मूत आया है. मैं दूसरी तरह मुंह कर के बैठ जाती हूँ तब तक आप उससे निपट लीजिये.

पिछले शनिवार को हुई घटना के कारण मुझे माला की बात सुन कोई संकोच नहीं हुआ और मैंने भी मुस्कराते हुए झट से अपना लिंग निकाल कर मूतने लगा.

जब मैं मूत्र विसर्जन कर रहा था तब मैंने देखा कि माला मुड़ कर मेरे आठ इंच लम्बे लिंग को बहुत ध्यान से घूर रही थी. जैसे ही मैंने अपना सिर उसकी ओर घुमा कर उसकी आँखों में झाँका तो वह शर्मा गई और झट से मुड़ कर दूसरी तरफ देखने लगी.

मैं मूत्र विसर्जन से निपट कर जब कमरे में जाकर बिस्तर पर लेटा तब माला के नग्न शरीर के हर अंग की छवि मेरी आँखों के आगे एक चलचित्र की तरह घूमने लगी और मेरा मन उसे नहाते हुए देखने की लालसा ने जकड़ लिया.

इतने में जैसे ही मुझे शावर चलने की ध्वनि सुनाई दी, मैं समझ गया कि माला नहा रही होगी इसलिए मैं उठ कर बाथरूम में घुसा और पूछा- माला अभी और कितनी देर लगेगी? ज़रा जल्दी करो मुझे भी ऑफिस जाने के लिए नहाना एवम् तैयार होना है.

 
शावर की फुआर के नीचे नहाती पूर्ण नग्न माला ने जब मुझे उसके नग्न शरीर को घूरते हुए देखा तो अपने गुप्तांगों को हाथों और बाजुओं से छिपाते हुए बोली- बस समझिये नहा चुकी हूँ. अभी दो मिनट में बाहर आती हूँ.

माला के नग्न शरीर के ऊपर से फिसलती हुई पानी की बूँदें ऐसे लग रही थी जैसे सूर्य उदय के समय पेड़ एवम् पौधों की पत्तियों पर से मोती जैसी ओस की बूँदें फिसलती हैं.

मैंने बाथरूम से निकल कर दरवाज़े के पास खड़ा हो कर माला के निकलने की प्रतीक्षा करने लगा.

इस बार बाथरूम में माला के नग्न शरीर के भरपूर दीदार हो जाने के कारण मेरा लिंग तन कर खड़ा हो गया था जिसे ना तो मैंने छिपाने की और ना ही दबाने की चेष्टा करी.

कुछ देर के बाद माला ने अपने पेटीकोट को स्तनों के ऊपर बाँध कर और नीचे के शरीर को उसी से ढक कर बाहर निकली तब मैं दरवाज़े में ही खड़ा था.

अर्ध-नग्न माला जब मेरे पास से बाहर निकलने लगी तब मैंने थोड़ा से आगे सरक कर अपने लोहे जैसे सख्त लिंग को उसके जिस्म के साथ रगड़ने दिया.

मेरे लिंग की रगड़ महसूस होने पर माला पलट कर मुड़ी और मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और मेरे लोअर में बने तंबू को देख कर हंसती हुई वहाँ से भाग गई.

उसके बाद मैंने बाथरूम में जा कर अपने सभी कपड़े उतार कर दरवाज़े के बाहर रख दिए और नहाते हुए माला को आवाज़ लगाईं- माला, मैंने मैले कपड़े बाहर दरवाज़े के पास रख दिए है उन्हें उठा लो और मैं तौलिया लाना भूल गया हूँ वह दे देना.

कुछ ही क्षणों में मैंने गर्दन मोड़ कर देखा की माला अपने हाथ में मेरा तौलिया लिए दरवाज़े पर खड़ी मुझे नहाते हुए देख रही थी तथा उसने मैले कपड़े उसके कंधे पर रखे हुए थे.

उसकी ओर देखते हुए मैंने मुड़ कर अपने शरीर की दिशा को उसकी तरफ कर दिया ताकि वह मेरे तने हुए लिंग को भी अच्छी तरह से देख ले.

मेरे आठ इंच लम्बे तने हुए लिंग को एक बार फिर देख कर उसकी आँखें फट गई और वह अपने खुले मुंह पर हाथ रख कर वहाँ से हट गई.

मेरे नहाने के बाद जैसे ही माला ने शावर के बंद होने की आवाज़ सुनी तो वह मुझे तौलिया देने के लिए एक बार फिर बाथरूम के दरवाज़े मुस्कराते हुए खड़ी हो गई.

माला की मुसकराहट का उत्तर मैंने भी मुस्करा कर दिया और उसके पास आ कर तौलिया लेकर अपने बदन को पौंछता रहा.

जब माला वही खड़ी मुझे देखती रही तब मैंने पूछा- तौलिया तो दे दिया है अब क्या देख रही हो? क्या कुछ चाहिए है या फिर कुछ कहना है?

माला को शायद मुझसे ऐसे प्रश्न की आशा नहीं थी इसलिए शर्माते हुए मुड़ कर रसोई की ओर जाते हुए बोली- नहीं, मुझे अभी कुछ नहीं चाहिए. मैं तो यह कहने आई थी की नाश्ता तैयार है आप जल्दी से तैयार हो कर खाने की मेज़ पर आ जाइये.

मैंने तैयार हो चाय नाश्ता किया और ऑफिस चला गया तथा शाम छह बजे के बाद रोजाना की तरह घर वापिस आया तथा शाम की चाय पी और रात को खाना खाने के बाद सो गया.

रात को लगभग तीन बजे दरवाज़ा खड़कने की आवाज़ से मेरी नींद खुल गई और जब मैंने उठ कर देखा तो पाया की रसोई की ओर वाली बालकनी का खुला दरवाज़ा हवा के तेज़ झोंके से खुल बंद रहा था.

मैंने उस दरवाज़े को चिटकनी लगा कर बंद किया और बाकी के दरवाज़े एवम् खिड़कियाँ देखते हुए जब स्टोर में पहुंचा तो देखा की माला सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट पहने हुए सीधा सो रही थी.

माला के ब्लाउज के ऊपर वाले दो बटन ही सिर्फ बंद थे और सोते हुए ऊपर सरक जाने के कारण उसके दोनों उरोज उसमें से बाहर निकल गए थे.

क्योंकि माला एक टाँग सीधी और दूसरी टाँग ऊँची कर के सो रही थी इसलिए उसका पेटीकोट उसके घुटनों के ऊपर हट कर उसकी कमर तक सरक गया था और उसकी योनि और जघन-स्थल का क्षेत्र बिल्कुल नग्न हो रहा था.

 
मैंने कमरे की लाईट जला कर उस कमरे की खुली खिड़की को बंद किया जिसका माला को कुछ पता नहीं चला और वह वैसे ही सोई रही.

कमरे की लाईट की रोशनी में मुझे उसके जघन-स्थल के काले घने बालों के बीच में छुपी ही योनि और उसके गुलाबी होंठ दिखाई दिया.

उस सुबह बाथरूम में घटित घटना और उस समय सोई हुई माला के खुले उरोज और योनि को देख कर मैं उत्तेजित होने लगा और मेरे लिंग ने अपना सिर उठा लिया.

मैं काफी देर तक असमंजस की स्थिति में वहीं खड़ा उसको देखता रहा.

मैं कुछ देर तक असमंजस की स्थिति में वहीं खड़ा माला को देखता रहा. और फिर जब अपने पर नियंत्रण नहीं रख सका तब अपने एक हाथ से उस उरोजों को तथा दूसरे हाथ से योनि को सहलाने लगा.

माला के उरोज पर हाथ रखते ही मैं दंग रह गया क्योंकि वह बहुत हो ठोस एवम् सख्त था लेकिन उनकी त्वचा बहुत ही मुलायम थी. उसके जघन-स्थल के बाल बिल्कुल रेशम की तरह मुलायम थे और उसकी योनि डबल रोटी जैसे फूली हुई थी तथा उसका भगांकुर एक मटर के दाने जितना मोटा था.

मेरे हाथों द्वारा माला के उन अंगों के छूते ही उसने आँखें खोल दी लेकिन बिना हिले डुले वह मेरी ओर बहुत कामुक दृष्टि से देखने लगी. मैं समझ गया कि वह भी वासना की आग में जल रही थी इसलिए मैंने झुक कर अपने होंठ माला के होंठों पर रख दिये और तेज़ी से उसके अंगों को मसलने लगा.

माला ने मेरे होंठों का स्वागत उन पर अपने होंठों का दबाव डालते हुए किया और उन्हें चूसते हुए अपनी जीभ को मेरे मुंह डाल दी. कुछ देर तक होंठों एवम् जीभ के इस आदान प्रदान के बाद मैंने माला को अपनी बाजुओं में उठा कर अपने कमरे में ले जा कर बिस्तर पर लिटा कर पास में लेट गया.

मेरे लेटते ही माला तथा मैं एक दूसरे के होंठों को चूसने लगे और जैसे ही मैंने उसके उरोजों और भगांकुर को सहलाने लगा उसने भी मेरे लोअर के अंदर अपना हाथ डाल कर मेरे लिंग को सहलाने लगी.

अगले दस मिनटों तक इस क्रिया के करते रहने से हम दोनों इतने उत्तेजित हो गए की माला के अंगूर जितने मोटे चूचुक बहुत सख्त हो गए और मेरे लिंग की नस फूलने लगी. तब मैंने माला की चूचुक को मुंह में ले कर चूसने लगा और अपने हाथ की बड़ी उँगली को उसकी योनि में डाल कर अंदर बाहर करने लगा.

माला ने भी मेरे लिंग की त्वचा को पीछे सरका कर लिंग-मुंड को बाहर निकाल लिया और फिर उसके किनारों को अपनी उँगलियों एवम् अंगूठे से सहलाने लगी.

लगभग दस मिनट की इस क्रिया से दोनों ही अत्यंत उत्तेजित हो गए और मेरे लिंग में से पूर्व-रस की कुछ बूँदें निकल गई और माला की योनि में से भी रस का रिसाव होने लगा. उस हालत में जब मैंने माला की आंखों में आँखें डाल कर देखा तब उनकी मदहोशी ने मुझे संसर्ग शुरू करने के लिए प्रेरित कर दिया.

मैंने तुरंत उठ कर माला का ब्लाउज एवम् पेटीकोट उतार कर उसे नग्न किया और फिर अपनी टी-शर्ट एवम् लोअर उतार दिया. फिर मैं पीठ के बल बिस्तर पर लेट गया और माला को मेरे लिंग के ऊपर बैठने का इशारा किया.

मेरा इशारा समझ कर माला मेरी कमर के दोनों ओर टांगें कर के नीचे हुई और मेरे लिंग को हाथ से पकड़ कर अपनी योनि के मुंह की सीध में कर के उस पर बैठ धीरे से दबाव दिया.

कुछ ही क्षणों में जब मेरे लिंग-मुंड ने माला की योनि में प्रवेश किया तब माला के चेहरे कुछ असुविधा एवम् कष्ट की रेखाएं दिखाई दीं और उसके मुंह से उम्म्ह… अहह… हय… याह… की सीत्कार निकली.

उस सीत्कार को सुन कर मैंने पूछा- क्या हुआ? बहुत दर्द हुआ क्या?

माला ने सिर हिलाते हुए कहा- हाँ, बहुत दर्द हुई है. पति के दुबई जाने के बाद पहली बार इसमें कोई लिंग प्रवेश कर रहा है इसलिए.

मैंने कहा- थोड़ी देर ऐसे ही रुकी रहो और जब दर्द कम हो जाए तब आराम से धीरे धीरे अन्दर प्रवेश कराओ.

माला दो मिनट तक वैसे ही बैठी रही और फिर जब कुछ सहज हुई तब उसने एक बार फिर नीचे की ओर दबाव बनाया तो मेरा पूरा लिंग एक झटके से उसकी योनि में घुस गया.

ऐसा होते ही माला जोर से ‘आह्ह.. मर गई’ की चीत्कार मारते हुए मेरे ऊपर लेट गई और मैंने देखा कि उसकी आँखों में आंसू निकल आये थे.

मैंने उसे अपनी बाहुओं में ले कर उसके गालों और होंठों चूमते हुए पूछा- क्या हुआ?

अपनी आँखों से निकले आंसुओं को पोंछती हुई माला बोली- आपका बहुत लम्बा और मोटा है. जब अकस्मात पूरा अंदर चला गया तो बहुत दर्द हुआ.

मैंने पूछा- क्या मेरा लिंग तुम्हारे पति के लिंग से अधिक बड़ा है?

उसने कहा- जी हाँ, आपका बहुत ज्यादा बड़ा है. उनका तो सिर्फ साढ़े चार इंच लम्बा और एक इंच मोटा है. वह तो सिर्फ गर्भाशय के मुंह तक ही जाता है उसके अंदर नहीं. आपका तो मेरे गर्भाशय के अंदर भी घुस गया है तभी तो बहुत ज्यादा दर्द हो रहा है.

 
उसके बाद माला अगले पाँच मिनट तक मेरे ऊपर लेटी रही और अपने ठोस एवम् सख्त उरोज और चूचुक मेरे सीने में चुभाती रही तथा मैं उसकी पीठ एवम् नितम्बों को सहलाता एवम् मसलता रहा.

पाँच मिनट के बाद उसने मेरे ऊपर उठ कर बैठ कर अपने कूल्हों को हिलाया और जब मेरा लिंग उसकी योनि के अन्दर ठीक से सेट ही गया तब वह उचक उचक कर उसे योनि के अन्दर बाहर करने लगी.

पाँच मिनट तक वह आहिस्ता आहिस्ता ऐसा करती रही और फिर उसके बाद वह बहुत तेज़ी से उछल उछल कर संसर्ग करने लगी.

माला को ऊपर बैठ कर संसर्ग करते हुए अभी दस मिनट ही हुए थे कि उसका शरीर अकड़ गया तथा उसकी योनि में बहुत तेज़ संकुचन हुआ और वह सीत्कार मारते हुए मेरे ऊपर लेट गई.

पसीने से भीग रही माला हाँफते हुए बोली- बस, मैं थक गई हूँ और नहीं कर सकती. अब आप ही ऊपर आ जाइये.

उसकी बात सुन कर मैंने करवट ली और उसे अपने नीचे लिटा लिया और खुद ऊपर चढ़ कर संसर्ग करने लगा. क्योंकि माला की योनि ने अभी तक मेरे लिंग को जकड़ रखा था इसलिए मुझे उसे अन्दर बाहर करने में बहुत अधिक रगड़ लग रही थी.

मैंने माला से कहा- तुम्हारी योनि बहुत कसी हुई है जिससे मुझे संसर्ग करने में काफी दिक्कत हो रही है. थोड़ा ढीली करो ताकि मैं अन्दर बाहर कर सकूं.

मेरी बात सुन कर उसने कहा- मेरी कसी हुई नहीं है बल्कि आपका बहुत फूला हुआ है.

मैंने माला की बात सुन कर जब अपने लिंग को उसकी योनि में से थोड़ा निकाल कर देखा तो वह सचमुच में बहुत फूला हुआ दिखाई दिया.

मैंने उसी हालत में संसर्ग शुरू किया और इस डर से की मेरा शीघ्रपतन न हो जाए मैं आठ-दस धक्के मारने के बाद रुक जाता.

मेरे द्वारा पाँच-छह बार ऐसा करने पर माला ने जो की काफी देर से सिसकारियाँ ले रही थी एक जोर की सीत्कार मारी और उसकी योनि में से गर्म गर्म रस का रिसाव हो गया.

उस रस स्त्राव से माला की योनि में बहुत चिकनापन हो गया जिससे मेरे लिंग पर कम रगड़ लगने लगी और मैं बहुत सहजता से तेज संसर्ग करने लगा.

अगले पन्द्रह मिनट तक मैंने बहुत तेज़ी से धक्के लगाते हुए संसर्ग किया और इस दौरान माला ने तीन बार बहुत जोर से सीत्कार ली तथा उसकी योनि में से रस का स्त्राव हुआ.

इसके बाद मैंने अत्यंत तीव्रता से धक्के लगाये जिस कारण योनि लिंग के संसर्ग से निकली फच.. फच.. की आवाज़ पूरे कमरे में गूंजने लगी.

माला उस आवाज़ को सुन कर अत्यंत उत्तेजित हो गई और अपने कूल्हे उठा उठा कर मेरे हर धक्के का उत्तर देते हुए मेरा साथ देने लगी.

पाँच मिनट की इस अत्यंत तीव्र क्रिया के बाद उसने मुझे बहुत ही जोर से अपनी बाजुओं में जकड़ लिया और अपने हाथों के नाखून मेरी पीठ में गाड़ दिए. मैंने उसके नाखूनों की चुभन को सहते हुए उसी तीव्रता से संसर्ग करता रहा और कुछ ही क्षणों में माला ने बहुत ही ऊँची आवाज़ में एक लम्बी चीत्कार मारते हुए मेरी कूल्हे एवम् कमर को अपनी टांगों से जकड़ लिया.

उसी अत्यंत उत्तेजित स्थिति में माला की योनि में बहुत ज़बरदस्त सिकुड़न हुई और उसमें से निकलने वाले रस के लावा मेरे लिंग को गर्मी पहुँचाने लगा.

उस गर्मी के मिलते ही मेरे लिंग ने उस योनि रस के लावा को ठंडा करने के लिए वीर्य रस की बौछार कर दी. कुछ ही क्षणों में मेरे लिंग से वीर्य रस का इतना विसर्जन हुआ कि उससे माला की योनि पूरी भर गई तथा वह उमसे से रस बाहर निकल कर बहने लगा.

पैंतीस-चालीस मिनट के इस घमासान संसर्ग में हम दोनों पसीने से भीग गए थे और हमारी सांसें फूल गई थी इसलिए अगले दस मिनट तक हम उसी तरह एक दूसरे से चिपक कर लेटे रहे.

इन दस मिनट में माला ने मुझे गालों एवम् होंठों पर लगभग कई बार चूमा और कहा- साहिब, आप में बहुत सहन-शक्ति है. मैंने अब तक के जीवन में पहली बार इतनी देर यौन संसर्ग किया और कई बार स्खलित भी हुई हूँ. मेरे पति तो तीन से पाँच मिनट में निपट जाते है. वह खुद तो स्खलित हो जाते थे लेकिन उन्होंने मुझे एक बार क्या, कभी भी स्खलित नहीं किया था.

उसकी बात सुन कर मैं उसके ऊपर से उठते हुए बोला- तुम्हें तो बिल्कुल नया और बहुत अच्छा अनुभव मिला होगा. क्या तुम्हें आनन्द एवम् संतुष्टि मिली या नहीं?

माला भी उठते हुए बोली- हाँ, यह पहली बार है जो मुझे बहुत अच्छा एवम् एकदम नया अनुभव मिला है और साथ में आनन्द और संतुष्टि किसे कहते है यह भी पता चल गया है. लेकिन एक शिकायत यह है कि आपका लिंग बहुत लम्बा है और जब वह मेरी गर्भाशय की दीवार से टकराता है तो मेरे जिस्म में एक झुरझुरी सी उठती है जिससे पूरे शरीर हलचल मच जाती थी. क्योंकि ऐसा मुझे पहली बार महसूस हुआ है इसलिए मैं नहीं जानती कि उस झुरझुरी एवम् हलचल को क्या कहूँ आनन्द या संतुष्टि या फिर दोनों?

मैंने चुटकी लेते हुए मुस्करा कर माला से कहा- ऐसा करो, इसके बारे में अम्मा जी से पूछ लो.

माला मेरी बात सुन कर हंसते हुए बोली- धत, क्या कोई लड़की अपनी सास सेऐसी बातें पूछती है?

इसके बाद हम दोनों बाथरूम में घुस गए और अपने गुप्तांगों को साफ़ कर के फिर बिस्तर पर एक दूसरे से चिपक कर सो गए.

कामवाली की चुदाई कहानी जारी रहेगी.

 
रात में कामवाली की युवा बहू के साथ सेक्स के बाद हम दोनों सो गए थे.

अब आगे:

उस दिन सुबह आठ बजे मेरी नींद खुली तो देखा नग्न माला मेरी ओर करवट किये मेरी बाएं बाजू पर सिर रखे सो रही थी और उसके दोनों उरोज मेरे सीने से चिपके हुए थे. उसका बायाँ बाजू मेरे कंधे के ऊपर से मेरी पीठ पर था तथा उसने उससे मुझे जकड़ा हुआ था और उसका दायाँ बाजू हम दोनों के बीच में था तथा उसका वह हाथ मेरे लिंग पर रखा हुआ था. उसकी दाईं टाँग बिल्कुल सीधी मेरी बाईं टाँग से चिपकी हुई थी तथा उसकी बाईं टाँग मुड़ी हुई थी और उसका घुटना मेरी दोनों टांगों के बीच में था.

उसका चेहरा सुबह की रोशनी में चमक रहा था तथा उस पर एक अबोध बच्चे के जैसी मासूमियत थी जिसे मैं बिना हिले डुले चुपचाप निहारते हुए बीती रात के प्रसंग के बारे सोचने लगा.

रात के प्रसंग के बारे में सोचते ही मेरे लिंग में चेतना आने लगी और पूरे शरीर में एक रोमांच की लहरें उठने लगी.

कहते हैं कि उत्तर पश्चिम यूरोप के एक देश में हुए शोध से पता चला है कि पुरुष के लिंग को पूर्ण चेतना में लाने के लिए किसी भी स्त्री को अधिक से अधिक दस सेकंड ही लगते हैं.

लेकिन मेरा लिंग तो बिना किसी स्त्री की सहायता लिए, सिर्फ उसके साथ किये संसर्ग के बारे में सोचने से ही सात सेकंड में उस स्थिति में पहुँच गया.

इससे पहले मैं कोई अगला कदम उठता मुझे मेरे लिंग पर माला के हाथ का दबाव महसूस हुआ और मैंने गर्दन नीची करके उसे देखा तो वह जाग गई थी और मंद मंद मुस्करा रही थी. मेरी गर्दन नीचे झुकने से जैसे ही मेरा चेहरा उसके पास आया उसने अपना सिर ऊँचा करते हुए मेरे होंठों को चूम मुझे कस कर जकड़ लिया.

प्रत्युत्तर में मैंने भी उसे अपनी बांहों में इतनी जोर से भींचा कि उसकी सीत्कार निकल गई और उसके उरोज मेरे सीने में गड़ने से उसे पीड़ा का अनुभव हुआ.

माला की सीत्कार सुन कर मैंने जैसे ही अपनी पकड़ ढीली की, उसने मुझे हल्का धक्का दे कर सीधा किया और मेरे ऊपर चढ़ कर बैठ गई. मैं तुरंत उसके दोनों उरोजों को हाथों से सहलाने लगा और उनकी चूचुक को उंगलियों एवम् अंगूठे के बीच में लेकर मसलने लगा.

मेरा ऐसे करते ही जब उसके शरीर में उत्तेजना की लहरें दौड़ने लगी तब वह थोड़ा पीछे हो कर मेरी जाँघों पर बैठते हुए मेरे लिंग को पकड़ कर सहलाने तथा हिलाने लगी.

जब मैंने अपने एक हाथ को उसके उरोज से हटा कर उसकी जाँघों के बीच में डाल कर उसके भगांकुर को सहलाने लगा तब वह उचक पड़ी. उसने तुरंत पलटी होकर मेरे लिंग को अपने मुंह में भर लिया और अपनी योनि को मेरे मुंह के आगे कर दिया.

मैंने उसका न्योता स्वीकार किया और अपने दोनों हाथों से उसके नितम्बों को पकड़ कर उसे नीचे खींच कर उसकी योनि पर अपना मुंह गाड़ दिया.

जैसे ही मेरी जीभ उसके भगांकुर को छूती, माला का शरीर में कंपकंपी की लहर दौड़ जाती और वह अपनी योनि को मेरे मुंह पर दबा देती. उसके ऐसा करते ही मैं अपनी जीभ को उसकी योनि के डाल देता और उसके अन्दर घुमा कर उसकी उत्तेजना की आग में घी डालने का काम करता.

जब माला के मुंह से सिसकारियाँ निकलती, तब मेरी उत्तेजना बढ़ जाती और उसके मुंह में मेरा लिंग-मुंड फूल जाता जिस से उसकी आवाज़ निकलना बंद हो जाती.

दस मिनट तक इस युगल पूर्व क्रिया करते हुए जब हम बहुत उत्तेजित हो गए तब मैंने माला को उठा कर बिस्तर पर पटक दिया और एक ही झटके में अपने लोहे जैसे सख्त लिंग को उसकी सिकुड़ी हुई योनि में घुसेड़ दिया.

 
पूरे लिंग का एक ही झटके में योनि के घुसते ही माला तडप उठी और पैर पटकती ही बहुत ऊँची एवम् लम्बी चीत्कार मारती हुई बोली- आह्ह… ओह्ह.. मेरी माँ… हाय.. मैं मर गईईई… क्या आप आराम से नहीं कर सकते? बड़ी बेदर्दी से मार डाला मुझे.

मैं समझ गया कि उसे बहुत दर्द हुआ होगा तभी के लिए वह ऐसा बोल रही है इसलिए मैं चुपचाप बिना कुछ उत्तर दिए उसके ऊपर लेट गया.

पाँच मिनट के बाद वह बोली- मैं नीचे दब रही हूँ, मेरा दम घुट रहा है. थोड़ा ऊँचा हो जाइए ताकि मेरे ऊपर वज़न कम हो जाये.

मैंने माला की आँखें डाल कर उसकी ओर देखते ही मैं समझ गया कि उसका दर्द कम हो गया था और वह संसर्ग के लिए तैयार थी. तब मैंने थोड़ा ऊँचा होकर संसर्ग शुरू किया और अपने लिंग के मुंड को उसकी योनि के अंदर ही रखते हुए बाकी का हिस्सा बाहर निकाल कर फिर अंदर धकेलने लगा.

लगभग दस मिनट तक धीरे धीरे धक्के मारने के बाद जब मैंने तेज़ धक्के लगाने शुरू किये तब माला भी अपने कूल्हे ऊपर उठा कर मेरा साथ देने लगी. जब मैं लिंग को योनि से बाहर खींचता तब वह कूल्हे नीचे कर लेती और जब मैं लिंग को योनि के अंदर धकेलता तब वह कूल्हे ऊँचे उठा कर उसका स्वागत करती.

तेज़ संसर्ग को करते हुए पाँच मिनट ही हुए थे जब माला की योनि में से रस का रिसाव होना और उसके मुंह से सिसकारियों का निकलना शुरू हो गया. रस के रिसाव से योनि के अंदर स्नेहन हो जाने से मेरा लिंग बहुत तेज़ी से उसके अंदर बाहर जाने लगा और कमरे में फच फच का स्वर गूंजने लगा.

मैं दस मिनट से तेज़ी से संसर्ग कर रहा था और माला मेरा पूरा साथ दे रही थी तभी उसने कहा- और अधिक तेज़ी से करिए मैं प्रेमोन्माद की चरमसीमा पर पहुँचने वाली हूँ.

क्योंकि मैं भी कामोन्माद के समीप पहुँचने वाला था इसलिए मैंने माला की बात मानते हुए अत्यंत तीव्रता से धक्के लगते हुए अपने लिंग को उसकी योनि के अंदर बाहर करने लगा.

मैंने अभी आठ दस तीव्र धक्के ही लगाये थे कि माला चिल्लाई- आह.. ओह्ह… उईईमाँआआ….. मैं गईईई… मैं मर गई… माँआआ….

इसके साथ ही उसकी योनि में गर्म गर्म रस की बाढ़ आ गई जिसमें मेरा लिंग गोते खाने लगा और रस की ऊष्मा लगते ही लिंग ने अपनी पिचकारी चला कर ढेर सारा वीर्य रस उगल दिया.

हम दोनों पसीने से लथपथ थे तथा बुरी तरह से थके हुए हांफ रहे थे इसलिए मैं माला के ऊपर ही लेट गया और अगले दस मिनट हम वैसे ही लेटे रहे.

जब हमारी साँस में सांस वापिस आई तब माला मेरे होंठों को अपने होंठों में लेकर उन्हें चूसने लगी और मेरे सिर तथा पीठ पर बहुत प्यार से हाथ फेरने लगी.

मैं अभी कुछ देर और उसके ऊपर ही लेटा रहना चाहता था लेकिन मेरे लिंग के सिकुड़ कर माला की योनि से बाहर निकल जाने के कारण योनि में से निकल रहा दोनों का मिश्रित रस बिस्तर गीला करने लगा था.

जैसे ही माला को गीलापन महसूस हुआ उसने झट से अपनी योनि पर हाथ रख कर रस को बहने से रोका और मुझे धक्का दे कर अलग करते हुए उठी और बाथरूम में भाग गई.

मैं भी अपने ढीले लिंग को हाथ में पकड़े जब उसके पीछे बाथरूम में गया तब देखा कि माला अपनी योनि साफ़ करने वाली ही थी.

मैं झट से उसके पास जा कर खड़ा हो गया तथा अपने लिंग को उसकी ओर बढ़ा दिया तब माला ने अपनी योनि को धोना छोड़ कर मेरे लिंग को पकड़ कर पहले तो चूमा और फिर उसे चूस एवम् चाट कर बिल्कुल साफ़ कर दिया.

उसके बाद जब माला नीचे बैठी अपनी योनि को पानी से धो रही थी तब मैंने शावर खोल दिया और माला को खींचते हुए उसके नीचे अपने साथ नहलाने लगा. शावर के नीचे दोनों ने एक दूसरे के शरीर को अच्छे से मल कर नहलाया और फिर बदन पोंछ एवम् कपड़े पहन लिए.

उस दिन के बाद अम्मा के वापिस आने तक माला रात हो या दिन मेरे ही साथ मेरे बिस्तर पर नग्न सोती थी और हम दोनों हर रात एक बार तथा अवकाश के दिनों में तो दो से तीन बार संभोग करते थे.

 
अम्मा ने वापिस आते ही माला के साथ अलग रहने के लिए घर का प्रबंध किया और उसको लेकर चली गई तथा उसके बाद अगले आठ माह तक माला कभी भी मेरे घर नहीं आई.

मैंने अम्मा से कई बार माला के बारे में पूछा कि वह कैसी है और कहाँ है तो उसने हर बार सिर्फ इतना ही बताया कि वह बिल्कुल ठीक है और घर पर ही है.

लगभग सात माह तक सब कार्य सामान्य चलता रहा.

तब एक दिन अम्मा काम पर नहीं आई और उसने अपनी जगह एक दूसरी काम वाली को काम करने के लिए भेज दिया. जब मैंने उस कामवाली से अम्मा के बारे में पूछा तो उसने सिर्फ इतना ही बताया कि मंझली बहू की तबीयत ठीक नहीं होने के कारण वह उसे अस्पताल ले कर गई हुई है.

उसके बाद के अगले तीन दिन भी अम्मा काम पर नहीं आई और दूसरी कामवाली ही काम पर आती रही.

चार दिनों के बाद जब अम्मा काम पर आई तब मैंने उनसे पूछा- अम्मा, क्या बात है पिछले चार दिन आप काम करने नहीं आई? वह दूसरी कामवाली कह रही थी कि माला की तबीयत ठीक नहीं थी और आप उसे अस्पताल ले कर गई थी. उसे क्या हुआ है और वह अब कैसी है?

उत्तर में अम्मा ने कहा- ऐसी कोई बात नहीं है और अब वह बिल्कुल ठीक है.

उस समय तो वह बात वहीं समाप्त हो गई लेकिन एक माह सामान्य प्रकार से गुज़र जाने के बाद एक शाम को जब मैं ऑफिस से आया तब अम्मा घर का काम कर रही थी.

मेरे ऑफिस से घर आते ही अम्मा ने जब मुझे चाय के साथ खाने के लिए मिठाई दी तब मैंने पूछा- अम्मा, मैं तो कभी मिठाई लाया नहीं तो फिर यह मिठाई कहाँ से आई?

अम्मा मेरे पास आकर बोली- मेरा दूसरा पोता हुआ है इसलिए आपका मुंह मीठा कराने के लिए मिठाई मैं लेकर आई हूँ.

मैंने अचंभित होते हुए कहा- अम्मा, दूसरा पोता!!! मैं समझा नहीं आप क्या कह रही हैं? क्या तुम्हारी बड़ी बहू या फिर छोटी बहू के एक और बालक पैदा हुआ है?

अम्मा ने हँसते हुए कहा- नहीं साहब, इस बार बड़ी या छोटी के नहीं बल्कि मंझली बहू के बेटा पैदा हुआ है.

मैंने हैरान होते हुए पूछा- आपका मतलब माला के बेटा हुआ है? कब हुआ और अब दोनों कैसे हैं?

अम्मा ने उत्तर दिया- चालीस दिन पहले हुआ था जब मैं उसे अस्पताल में ले कर गई थी. अब तो वह दोनों घर पर हैं और बिल्कुल ठीक हैं.

मैंने चौंकते हुए प्रश्न किया- चालीस दिन पहले और आप मुझे आज बता रही हैं? लेकिन अम्मा, उसका पति तो पिछले दो वर्ष से दुबई गया हुआ है फिर माला को यह बालक कैसे हो गया?

अम्मा ने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखते हुए कहा- साहिब, अब आप अधिक अनजान मत बनिए. यह बालक आपका और माला का है.

मैंने हैरानी से उसके ओर देखते हुए कहा- अम्मा, आप यह क्या कह रही हैं? यह बालक मेरा और माला का कैसे हो सकता है?

अम्मा बोली- साहिब, जब मैं छोटी बहू के पास गई हुई थी तब आपके और माला के बीच जो रास-लीला चलती रही उसके बारे में मुझे सब पता है. क्योंकि यह हमारी एक सोची समझी योजना थी इसलिए माला फ़ोन पर मुझे सब कुछ बताती रहती थी. मेरे वापिस आने पर तो उसने मुझे सभी कुछ विस्तार से बता दिया था.

मैं अम्मा की बात सुन कर पूछा- अम्मा, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि आप कौन सी योजना के बारे में बात कर रही हैं. क्या इस बारे में आप मुझे विस्तार से बता सकती हैं?

अम्मा बोली- ठीक है, मैं आपको सब बताती हूँ, तब तक आप आराम से बैठ कर यह चाय पीजिये और मिठाई खाइए.

इसके बाद अम्मा ने बताया मुझे निम्नलिखित बातें बताई:

उसके मंझले बेटे की शादी माला से तीन वर्ष पहले हुई थी और उनमें से पहले एक वर्ष उसका बेटा यहीं रहा तथा उसके बहुत कोशिश करने के बावजूद भी माला गर्भवती नहीं हुई. जब कई डॉक्टरों और अस्पतालों में जांच कराने के बाद उसे पता चला कि उसके बेटे में शुक्राणु की पैदाइश ही नहीं होती है इसलिए वह माला को कभी भी गर्भवती नहीं कर सकता है. जांच के बाद डॉक्टरों ने यह भी बताया की माला बिल्कुल स्वस्थ है और उसमें कोई कमी नहीं है तथा वह किसी भी स्वस्थ पुरुष से सामान्य सम्भोग करके गर्भवती हो सकती है.

 
जब उसके बेटे को यह पता चला कि कमी उसमें है तो वह बहुत दुखी हुआ और माला को किसी अन्य पुरुष से सम्भोग करके संतान पैदा करने के लिए मनाता रहा. जब माला नहीं मानी तब उसने हताश हो कर दुबई में नौकरी ढूँढी और तब से वहीं गया हुआ है तथा पिछले दो वर्षों में एक बार भी मिलने नहीं आया.

इन दो वर्षों में वह माला को बहुत समझाती रही और किसी पर-पुरुष से सम्भोग करके गर्भवती होने के लिए मिन्नतें भी करती रही लेकिन वह इस विषय पर बात करने को टालती रही.

आगे अम्मा ने बताया एक दिन नीचे वाले घर में कोई समारोह था तब उसने माला को कुछ दिनों के लिए उनके यहाँ काम पर भेजा था. एक दिन काम समाप्त करके रात को घर जाने के समय जब अम्मा को देर हो गई थी तब माला मेरे घर आई और उसने मुझे देखा था.

उन्हीं दिनों अम्मा को छोटी बहू के गर्भवती होने का पता चला और इस समाचार से माला उदास रहने लगी तब अम्मा ने उससे एक बार फिर पर-पुरुष सम्भोग की बात करी. तब माला ने अम्मा की बात मान कर कहा की वह सिर्फ मेरे साथ ही सम्भोग कर के संतान पैदा करना चाहेगी.

उसके बाद ही अम्मा ने मुझसे छुट्टी पर छोटी बहू के पास जाने की बात और अपनी जगह माला को काम पर लगाने की बात करी थी.

अम्मा की सारी बात सुनने के बाद मुझे महसूस हुआ कि उन दोनों ने मेरे साथ संतान पाने के लिए छल किया था. एक बार तो मुझे बहुत गुस्सा आया लेकिन मैंने अपने पर नियंत्रण रखते हुए फिर से सोचा कि उन चार माह में माला ने मुझे कितना प्रेम सुख दिया था.

जब मैंने उस छल की तुलना उस सुख से करी तो मुझे लगा कि उन्होंने मुझसे छल नहीं बल्कि उनकी आगे के जीवन में आने वाली ख़ुशी में सहयोग लिया था.

मेरा गुस्सा ठंडा हो गया और मैंने अम्मा से कहा- अम्मा, ठीक है जो हुआ सो हुआ, लेकिन यह मिठाई इतने दिनों बाद क्यों खिला रही हो? माला और अपने पोते मुझसे कब मिला रही हो?

अम्मा ने कहा- चालीस दिन पूरे होने की पूजा आज सुबह कराई थी और यह मिठाई उसी पूजा का प्रसाद है. मैं कल माला और बालक दोनों को आपसे मिलाने के लिए ले आऊंगी.

रात को जब मैं अम्मा का बनाया हुआ खाना खाकर सोने के लिए बिस्तर पर लेटा तब मेरी आँखों के सामने माला के साथ बिताये चार माह के दृश्य एक चलचित्र की तरह घूमने लगे.

बहुत देर तक उन यादों में खोये रहने के बाद मुझे पता ही नहीं चला कब नींद आ गई और अगला दिन शनिवार होने के कारण मैं देर तक सोता रहा.

रसोई से बर्तन खड़कने की आवाज़ से मेरी नींद खुली तो इस आस से की माला भी आई होगी मैं उठ कर वहाँ गया लेकिन सिर्फ अम्मा को देख कर मायूस हो गया.

अम्मा ने मुझे देखते ही समझ गई कि मैं क्या देखने आया था इसलिए झट से बोली- आप जल्दी से हाथ मुंह धो लो तब तक मैं चाय बना कर लाती हूँ. आपसे मिलाने के लिए माला और बालक को मैं थोड़ी देर बाद घर जा कर ले आऊंगी.

अम्मा की बात सुन कर मैंने हाथ मुंह धोये और बैठक में बैठ गया जहाँ अम्मा मुझे चाय दे कर फिर काम में लग गई.

मैं माला से मिलने के लिए बहुत आतुर था इसलिए अम्मा को काम करते देख कर मुझे मन ही मन उस पर गुस्सा आ रहा था की वह माला को लेने के लिए क्यों नहीं जा रही थी. मुझे परेशान देख कर अम्मा बोली- साहिब, मुझे लगता है कि आप बालक और माला को देखने एवम् मिलने के लिए बहुत व्याकुल हैं. मैंने अभी का सारा काम निपटा लिया है और अब मैं जाकर दोनों को ले आती हूँ.

यह सुनते ही मेरे मुंह से निकल गया- हाँ अम्मा, जल्दी जाओ और उन्हें ले आओ. मैं यहीं बैठा प्रतीक्षा कर रहा हूँ.

लगभग बीस मिनट के बाद जब दरवाज़े की घंटी बजी तब मैंने भाग कर उसे खोला तो वहाँ अम्मा गोदी में एक बालक को लिए खड़ी थी और उसके पीछे माला सिर झुकाए अपने को छिपाने की चेष्टा कर रही थी.

अम्मा ने बालक को मेरी ओर बढ़ाते हुए बोली- लो साहिब, यह है आप के लगाये हुए बीज की उपज.

मैंने उस बालक को अम्मा से लिया और कुछ देर तक निहारता रहा और उसके रंग रूप से मोहित हो कर मैंने उसे चूम लिया.

मुझे बालक को चूमते देख कर अम्मा ने माला की ओर देखा और उनके चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई तथा दोनों मुस्करा पड़ी.

तभी अम्मा मुख्य द्वार की ओर जाती हुए बोली- माला, मुझे अब दूसरे घरों में भी काम करने जाना है इसलिए तुम यहाँ का काम निपटा दो और साहिब से पूछ कर उनकी कोई ज़रूरत हो तो उसे पूरा कर देना.

माला उसके पीछे दरवाज़ा बंद करने के लिए गई तब तक मैं बालक को गोदी में उठाये हुए बैडरूम में चला गया.

कुछ ही क्षणों बाद माला भी मेरे पीछे बैडरूम में आ कर मेरे पैरों को पकड़ लिया तथा मेरे लोअर के ऊपर से ही मेरे लिंग को चूमने लगी.

 
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