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मेरा नाम अभिनव है, मेरी आयु पच्चीस वर्ष की है और मेरा शरीर बहुत हृष्ट-पुष्ट एवम् तंदरुस्त है क्योंकि मैं स्कूल और कालेज में खेल कूद में बहुत भाग लेता था.
मैं अब भी प्रतिदिन घर पर व्यायाम करता हूँ और कभी कभी व्यायामशाला में जा कर भी भार-उत्तोलन तथा विभिन्न प्रकार की कसरतें इत्यादि करता हूँ.
मैं मूल रूप से देहली का निवासी हूँ तथा मेरा पूरा परिवार वहीं रहता है, लेकिन आई-टी में इंजीनियरिंग करने के बाद पिछले तीन वर्षों से बैंगलोर में नौकरी कर रहा हूँ.
तीन वर्ष पहले जब मैं बैंगलोर में आया था तब मैं पन्द्रह दिनों के लिए एक पेइंग गेस्ट-हाउस में रहा था लेकिन उसके बाद कंपनी ने मुझे रहने के लिए एक फ्लैट दिला दिया. मेरा फ्लैट एक बहुमंजिली इमारत के दसवें तल पर है और उसमें एक बैठक, एक बैडरूम, एक छोटा स्टोर कमरा, एक रसोई तथा एक बाथरूम है.
मैं अधिकतर बैठक, बैडरूम, रसोई और बाथरूम को ही प्रयोग में लाता हूँ और छोटा स्टोर कमरे में एक फोल्डिंग चारपाई, दो खाली अटैची तथा कुछ फ़ालतू का सामान आदि पड़े रहते हैं.
उस फ्लैट में स्थानांतरण के बाद जब मुझे खाने पीने और घर के रख-रखाव की समस्या आई तब मैंने उसी इमारत के अन्य फ्लैट में काम करने वाली एक पचास वर्षीय वृद्ध महिला को घर का काम करने के लिए रख लिया.
वह महिला जिसे सभी अम्मा कहते थी सुबह छह बजे ही आ जाती और मुझे चाय दे कर चौका बर्तन करती तथा मेरे लिए नाश्ता बनाती.
मेरे तैयार होकर ऑफिस जाने के बाद वह दूसरे फ्लैट में काम निपटा कर फिर मेरे घर की सफाई आदि करती तथा मेरे कपड़े आदि धो कर सुखाने डाल देती.
क्योंकि वह मेरे ऑफिस जाने के बाद तक घर का काम करती थी इसलिए उसकी सुविधा के लिए मैंने उसे अपने फ्लैट की एक चाबी भी दे रखी थी. वह शाम को मेरे आने से पहले ही धुले हुए सूखे कपड़ों को प्रेस करने के लिए धोबी को दे आती थी और मेरे घर आते ही मुझे चाय बना कर देती तथा रात के लिए मेरा खाना बना कर अपने घर चली जाती.
क्योंकि मुझे अच्छा वेतन मिलता था इसलिए मैं उस वृद्ध महिला को उसके काम के लिए पाँच हज़ार प्रति माह देता था जिस कारण वह बहुत ही लग्न और ईमानदारी से मेरा काम करती थी.
लगभग छह माह तक ऐसे ही लगन से काम करते रहने के बाद एक दिन उस वृद्ध महिला ने मुझसे कहा- साहिब, मेरी सबसे छोटी बहू के घर बालक होने वाला है इसलिए मुझे तीन-चार माह के लिए उसके पास जाना पड़ेगा. आप काम के लिए किसी दूसरी कामवाली को रख लीजिये अथवा अगर आप सहमत हों तो मैं अपनी मंझली बहू को आपके यहाँ काम के लिए लगा देती हूँ.
उसकी बात सुन कर मुझे एक बार तो झटका लगा लेकिन अपने को सम्हालते हुए मैंने कहा- अम्मा, आप यह क्या कह रही हो. आप तो मेरे घर का सभी काम अच्छे से जानती हो और उसे बहुत निपुणता से संभाल भी रखा है. अगर आप नहीं आओगी तो मेरा काम कैसे होगा? मैं किसी दूसरी कामवाली को कहाँ से ढूँढ कर लाऊं? आप अपनी जगह अपनी मंझली बहू को ही छोटी बहू के पास को क्यों नहीं भेज देती?
मेरी बात सुन कर वह बोली- साहिब, यह जच्चा और बच्चा संभालने की बात है कोई सैर-सपाटा करने की बात नहीं है. आजकल की लड़कियाँ तो ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकती. साथ में वह लड़की जो खुद अभी तक माँ नहीं बनी हो उसे तो पता ही नहीं होगा कि गर्भावस्था में एक जच्चा को क्या खाना पीना है. उसे तो यह भी नहीं पता है कि प्रसव के समय क्या करना होता है.
उसकी बात सुन कर मैंने कहा- अम्मा, तुम जैसा ठीक समझो वैसा ही प्रबंध कर दो. क्या जो घर का काम आप करती हो वह सब तुम्हारी मंझली बहू कर लेगी?
मेरी बात सुन कर अम्मा बोली- आप चिंता नहीं करें, तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा. मैं जाने से दो सप्ताह पहले ही उसे रोज़ अपने साथ ले कर आऊंगी और उन दो सप्ताह में घर का सभी काम सिखा दूंगी.
उस माह के दूसरे सप्ताह में अम्मा रोजाना की तरह सुबह छह जब बजे काम पर आई तब वह अपनी मंझली बहू माला को भी साथ लेकर आई.
माला बहुत ही सुन्दर एवम् आकर्षक नैन नक्श वाली स्त्री थी जिसका वर्ण बहुत हल्का गेहुँआ था, शरीर पतला और कद लम्बा था, उठे हुए उरोज और बाहर निकले हुए नितम्ब मध्यम नाप के थे, गर्दन लम्बी तथा पेट समतल था.
उसने हरे रंग की सूती साड़ी में अपना पूरा बदन छुपा रखा था और घर में घुसते ही मुझे बैठक में अख़बार पढ़ते हुए देख कर दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया.
उत्तर में जैसे ही मैंने उसके प्रणाम का उत्तर दिया तभी अम्मा बोली- साहिब, यह मेरी मंझली बहू माला है जिसके बारे में मैंने आपसे बात करी थी. अब दो सप्ताह तक यह रोज़ मेरे साथ आएगी और यहाँ का सभी काम सीख लेगी ताकि दो सप्ताह के बाद जब मैं चली जाऊँगी तब यह आपकी अपेक्षा के अनुसार ही सभी कार्य करेगी.
मैं अब भी प्रतिदिन घर पर व्यायाम करता हूँ और कभी कभी व्यायामशाला में जा कर भी भार-उत्तोलन तथा विभिन्न प्रकार की कसरतें इत्यादि करता हूँ.
मैं मूल रूप से देहली का निवासी हूँ तथा मेरा पूरा परिवार वहीं रहता है, लेकिन आई-टी में इंजीनियरिंग करने के बाद पिछले तीन वर्षों से बैंगलोर में नौकरी कर रहा हूँ.
तीन वर्ष पहले जब मैं बैंगलोर में आया था तब मैं पन्द्रह दिनों के लिए एक पेइंग गेस्ट-हाउस में रहा था लेकिन उसके बाद कंपनी ने मुझे रहने के लिए एक फ्लैट दिला दिया. मेरा फ्लैट एक बहुमंजिली इमारत के दसवें तल पर है और उसमें एक बैठक, एक बैडरूम, एक छोटा स्टोर कमरा, एक रसोई तथा एक बाथरूम है.
मैं अधिकतर बैठक, बैडरूम, रसोई और बाथरूम को ही प्रयोग में लाता हूँ और छोटा स्टोर कमरे में एक फोल्डिंग चारपाई, दो खाली अटैची तथा कुछ फ़ालतू का सामान आदि पड़े रहते हैं.
उस फ्लैट में स्थानांतरण के बाद जब मुझे खाने पीने और घर के रख-रखाव की समस्या आई तब मैंने उसी इमारत के अन्य फ्लैट में काम करने वाली एक पचास वर्षीय वृद्ध महिला को घर का काम करने के लिए रख लिया.
वह महिला जिसे सभी अम्मा कहते थी सुबह छह बजे ही आ जाती और मुझे चाय दे कर चौका बर्तन करती तथा मेरे लिए नाश्ता बनाती.
मेरे तैयार होकर ऑफिस जाने के बाद वह दूसरे फ्लैट में काम निपटा कर फिर मेरे घर की सफाई आदि करती तथा मेरे कपड़े आदि धो कर सुखाने डाल देती.
क्योंकि वह मेरे ऑफिस जाने के बाद तक घर का काम करती थी इसलिए उसकी सुविधा के लिए मैंने उसे अपने फ्लैट की एक चाबी भी दे रखी थी. वह शाम को मेरे आने से पहले ही धुले हुए सूखे कपड़ों को प्रेस करने के लिए धोबी को दे आती थी और मेरे घर आते ही मुझे चाय बना कर देती तथा रात के लिए मेरा खाना बना कर अपने घर चली जाती.
क्योंकि मुझे अच्छा वेतन मिलता था इसलिए मैं उस वृद्ध महिला को उसके काम के लिए पाँच हज़ार प्रति माह देता था जिस कारण वह बहुत ही लग्न और ईमानदारी से मेरा काम करती थी.
लगभग छह माह तक ऐसे ही लगन से काम करते रहने के बाद एक दिन उस वृद्ध महिला ने मुझसे कहा- साहिब, मेरी सबसे छोटी बहू के घर बालक होने वाला है इसलिए मुझे तीन-चार माह के लिए उसके पास जाना पड़ेगा. आप काम के लिए किसी दूसरी कामवाली को रख लीजिये अथवा अगर आप सहमत हों तो मैं अपनी मंझली बहू को आपके यहाँ काम के लिए लगा देती हूँ.
उसकी बात सुन कर मुझे एक बार तो झटका लगा लेकिन अपने को सम्हालते हुए मैंने कहा- अम्मा, आप यह क्या कह रही हो. आप तो मेरे घर का सभी काम अच्छे से जानती हो और उसे बहुत निपुणता से संभाल भी रखा है. अगर आप नहीं आओगी तो मेरा काम कैसे होगा? मैं किसी दूसरी कामवाली को कहाँ से ढूँढ कर लाऊं? आप अपनी जगह अपनी मंझली बहू को ही छोटी बहू के पास को क्यों नहीं भेज देती?
मेरी बात सुन कर वह बोली- साहिब, यह जच्चा और बच्चा संभालने की बात है कोई सैर-सपाटा करने की बात नहीं है. आजकल की लड़कियाँ तो ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकती. साथ में वह लड़की जो खुद अभी तक माँ नहीं बनी हो उसे तो पता ही नहीं होगा कि गर्भावस्था में एक जच्चा को क्या खाना पीना है. उसे तो यह भी नहीं पता है कि प्रसव के समय क्या करना होता है.
उसकी बात सुन कर मैंने कहा- अम्मा, तुम जैसा ठीक समझो वैसा ही प्रबंध कर दो. क्या जो घर का काम आप करती हो वह सब तुम्हारी मंझली बहू कर लेगी?
मेरी बात सुन कर अम्मा बोली- आप चिंता नहीं करें, तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा. मैं जाने से दो सप्ताह पहले ही उसे रोज़ अपने साथ ले कर आऊंगी और उन दो सप्ताह में घर का सभी काम सिखा दूंगी.
उस माह के दूसरे सप्ताह में अम्मा रोजाना की तरह सुबह छह जब बजे काम पर आई तब वह अपनी मंझली बहू माला को भी साथ लेकर आई.
माला बहुत ही सुन्दर एवम् आकर्षक नैन नक्श वाली स्त्री थी जिसका वर्ण बहुत हल्का गेहुँआ था, शरीर पतला और कद लम्बा था, उठे हुए उरोज और बाहर निकले हुए नितम्ब मध्यम नाप के थे, गर्दन लम्बी तथा पेट समतल था.
उसने हरे रंग की सूती साड़ी में अपना पूरा बदन छुपा रखा था और घर में घुसते ही मुझे बैठक में अख़बार पढ़ते हुए देख कर दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया.
उत्तर में जैसे ही मैंने उसके प्रणाम का उत्तर दिया तभी अम्मा बोली- साहिब, यह मेरी मंझली बहू माला है जिसके बारे में मैंने आपसे बात करी थी. अब दो सप्ताह तक यह रोज़ मेरे साथ आएगी और यहाँ का सभी काम सीख लेगी ताकि दो सप्ताह के बाद जब मैं चली जाऊँगी तब यह आपकी अपेक्षा के अनुसार ही सभी कार्य करेगी.