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Guest
इतना सुनते ही बंसी की आँखे फटी रह गयी. कुच्छ देर तक कोई नही बोल पाया. ज़ाहिर था जो तीनो सोच रहे तो वो बोलना भारी पड़ रहा था. आख़िर बंसी ने मौन तोड़ा,”भैया क्या हमारे बाबा….?” उसका ये वाक़या अधूरा रह गया, उसकी आँखो मे आँसू बह उठे, गले मे खराश पड़ गयी, मानो गले पर बड़ा सा बोझ पड़ गया हो. किशोरीलाल ने घूमकर आँसुभरी आँखो से बंसी को देखा और बोला,” बंसी दिल तो नही मान रहा लेकिन संजोग यही बता रहे है कि हमारा विक्रम…” कहकर बात अधूरी छ्चोड़ दी. काफ़ी देर तक वे लोग मौन रहे. अंत मे किशोरीलाल ने खामोशी तोड़ी,”देखो मैं इस मामले मे जड़ तक पहुचना चाहता हू. तब तक कोई भी विक्रम से इसका ज़िकरा नही करेगा, बंसी तुम भी नही.” बंसी ने हा मे सिर हिलाया और बोला,”ठीक है भैया लेकिन मेरे बाबा…” “देखो बंसी अभी तो किसी पे शक करना बेकार है, लेकिन विक्रम की चिंता करना तुम्हारा धर्म है तो मेरी बेहन के बारे मे सोचना भी मेरा धर्म है. विक्रम तुम्हारा बाबा ही नही मेरे भी दोस्त है. चिंता मत करो जब तक सच्चाई हमारे सामने नही आती मैं कुच्छ नही करूँगा विक्रम को ये मेरा वादा रहा.” किशोरीलाल की आँखो से आसू निकल आए. बंसी भी रोता हुवा बाहर चला गया और किशोरीलाल फिर विक्रम के कमरे मे आकर एक चेर मे बैठ गया.
वो सोचता रहा, क्या विक्रम ने ही ऐसा किया होगा. उसको दुख ये बात का हो रहा था की ये बात आज उसे मालूम हो रही है. उसने आजतक विक्रम की गहरी दोस्ती पर अँधा विश्वास क्यू किया ? उसे आज शर्म आ रही थी कि वो एकलौता भाई होकर भी उसकी बहन को इस हादसे से नही बचा पाया.
कुच्छ देर सोचने के बाद उसने विक्रम के रूम की तलाशी शुरू की. वैसे विक्रम के रूम मे आने की किसी की भी हिम्मत नही होती थी,. लेकिन किशोरीलाल उसका गहरा दोस्त था इसीलिए उसका यहा आना स्वाभाविक था. उसने सब खास खास जगह ढूंढी. लेकिन कुच्छ नही मिला. ड्रॉयर, कपबोर्ड, बेड, टेबल के ड्रॉयर्स, शोकेस, दीवार जो भी वाहा था सबकुच्छ देख लिया लेकिन कुच्छ नही हाथ आया. आख़िर वो हाथ पे हाथ रखकर चेर मे बैठ गया. सामने अंकल की बड़ी तस्वीर थी. उसे देखकर उसे थोड़ा विचित्र लगा क्यूकी वो तस्वीर कुछ तिर्छि थी. उसे याद आया कि वो तस्वीर तो हमेशा सीधी होती थी आज उसे क्यो थोड़ी तिर्छि लग रही है. मानो किसी ने अभी अभी लगाई हो. वो नज़दीक गया और ध्यान से तस्वीर को देखने लगा. आख़िरकार तस्वीर को हाथ से हटाने की कोशिश की लेकिन तस्वीर वैईसीकि वैसी ही रही और तस्वीर के पिछे से एक बड़ी डाइयरी गिरी. किशोरीलाल ने बड़े ताज्जुब से वो उठाई और चेर पे बैठ गया. डाइयरी मे कुच्छ पेपर्स थे लेकिन उर्दू मे थे. कुच्छ लिखा था वो भी उर्दू मे था. कुच्छ शायरिया लिखी थी. लेकिन डाइयरी के पन्नो के बीच एक तस्वीर गिरी किशोरीलाल के पाव पर. उल्टी तस्वीर का पिछछवाड़ा किशोरीलाल के सामने था. उस पर गुलाब का चित्रा था और लिखा था लव यू और नीचे विक्रम की साइन थी. किशोरीलाल ने तस्वीर पलटी तो वो तस्वीर सुनंदा की थी. इसे देखकर फिर किशोरीलाल सोच मे पड़ गया की क्या विक्रम सुनंदा को चाहता था ? अगर चाहता था तो कम से कम उसे तो बोल ही पाता. क्या सुनंदा भी विक्रम को चाहती थी ? और अगर विक्रम सुनंदा को चाहता है तो सुनंदा पर किसने अत्याचार किए और अगर किए तो विक्रम ने उसके बारे मे आजतक क्यू किशोरीलाल को नही बताया ? उसे याद आया की नारायनप्रासाद की मृत्यु के बाद विक्रम कभी जूनागढ़ नही आया था.हर वक़्त वो छुट्टी नही मिल रही ऐसा बहाना बनाकर टालता रहा था. क्यू यही वजह थी की वो आना नही चाहता था ?.
किशोरीलाल उठाकर डाइयरी लेकर राजेश्वरी के पास आया और उसे सबकुच्छ दिखाया. राजेश्वरिदेवी की भी वोही सोच थी जो किशोरियालाल सोच रहा था.
दोनो सोच रहे थे की आख़िर माजरा क्या है. वो कौन है जिसने ऐसी हरक़त की थी. विक्रम आख़िर क्यू कोई राज़ अपने दिल मे च्छुपाए रखे बैठा था ? वो कौन है जिसने सुनंदा के साथ बलात्कार किया था या बलात्कार की कोशिश की थी ? वो कौन था, कहा था, जाने कहा ???????
किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी को इंतेज़ार था विक्रम का लौटने का. आज के दिन किशोरीलाल का सबसे खराब दिन था. आज उसकी ज़िंदगी को दो झटके लगे थे. एक आज तक वो विक्रम की दोस्ती को अंधे की तरह निभाता रहा और दूसरा अपनी बहन की मौत के बारे मे जिसे आकस्मात या खून ये समझ मे नही आता था. बड़ी बैचेनी से शाम कटी और रात का खाना भी जैसे तैसे बंसी के बहुत ज़ोर पर दोनो ने खाया और अपने रूम मे चले गये.
रात को करीब 11 बजे बस आख लगी ही थी की ज़ोरो से आवाज़ आई. किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी दोनो फ़ौरन खड़े उठे और रूम के बाहर रवेश मे आए नीचे दीवानखाने मे विक्रम लड़खदाता हुवा खड़ा था, बहुत पी रखी थी उसने और साथ मे गन लेके और धोती पहने एक सावला सा आदमी था और बंसी दोनो हाथ जोड़े विक्रम को सम्हाले खड़ा था. किशोरीलाल दौड़ के नीचे आया, तो विक्रम का ध्यान उस पर पड़ा. उसकी आँखो की चमक देखकर किशोरीलाल को लगा की उसके होश उड़े जा रहे है. फिर भी विक्रम किशोरीलाल को देखते ही उसके गले लग गया और बोले,”आआररीई… डूऊस्त तू ; तू त्त उ उ कब आया” वो अच्छी तरह बोल भी नही पाता था. किशोरीलाल ने उसे सम्हाला और पास की चेर पे बिठा दिया और बंसी को इशारा किया. बंसी दौड़ा चला गया और दो मिनट मे नींबू और पानी लेके चला आया. किशोरीलाल ने बहुत नींबू विक्रम को पिलाया. थोड़ी देर मे विक्रम थोड़ा होश मे आया. उसकी नज़र राजेश्वरिदेवी पर पड़ी जो धीरे धीरे सीडिया नीचे उतर रही थी. विक्रम ने उठाने की कोशिश की,”अरे भाभी आप”, लेकिन फिर वो गिरनेवाला था और किशोरीलाल ने फिर उसको सहारा देके चेर पे बिठा दिया. राजेश्वरिदेवी अब नीचे आ चुकी थी और सामने चेर पे बैठ गयी.
विक्रम चारो और देख रहा था मानो वो किसी से नज़रे नही मिला पा रहा था. उसे अंदाज़ा नही था की उसका जिगरी दोस्त यू अचानक उसे इतनी बुरी हालत मे देख लेगा खामोशी तोड़ते हुवे किशोरीलाल बोला,”विकी अभी खाना ख़ाके सो जाओ सुबह बाते करेंगे, तुम्हारी हालत अभी ठीक नही है, वैसे रात भी बहुत हो चुकी है.”. विक्रम बोला,”नही केपी अब ठीक है”. विक्रम किशोरीलाल को केपी बुलाता था और किशोरीलाल उसको विकी.
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क्रमशः................
वो सोचता रहा, क्या विक्रम ने ही ऐसा किया होगा. उसको दुख ये बात का हो रहा था की ये बात आज उसे मालूम हो रही है. उसने आजतक विक्रम की गहरी दोस्ती पर अँधा विश्वास क्यू किया ? उसे आज शर्म आ रही थी कि वो एकलौता भाई होकर भी उसकी बहन को इस हादसे से नही बचा पाया.
कुच्छ देर सोचने के बाद उसने विक्रम के रूम की तलाशी शुरू की. वैसे विक्रम के रूम मे आने की किसी की भी हिम्मत नही होती थी,. लेकिन किशोरीलाल उसका गहरा दोस्त था इसीलिए उसका यहा आना स्वाभाविक था. उसने सब खास खास जगह ढूंढी. लेकिन कुच्छ नही मिला. ड्रॉयर, कपबोर्ड, बेड, टेबल के ड्रॉयर्स, शोकेस, दीवार जो भी वाहा था सबकुच्छ देख लिया लेकिन कुच्छ नही हाथ आया. आख़िर वो हाथ पे हाथ रखकर चेर मे बैठ गया. सामने अंकल की बड़ी तस्वीर थी. उसे देखकर उसे थोड़ा विचित्र लगा क्यूकी वो तस्वीर कुछ तिर्छि थी. उसे याद आया कि वो तस्वीर तो हमेशा सीधी होती थी आज उसे क्यो थोड़ी तिर्छि लग रही है. मानो किसी ने अभी अभी लगाई हो. वो नज़दीक गया और ध्यान से तस्वीर को देखने लगा. आख़िरकार तस्वीर को हाथ से हटाने की कोशिश की लेकिन तस्वीर वैईसीकि वैसी ही रही और तस्वीर के पिछे से एक बड़ी डाइयरी गिरी. किशोरीलाल ने बड़े ताज्जुब से वो उठाई और चेर पे बैठ गया. डाइयरी मे कुच्छ पेपर्स थे लेकिन उर्दू मे थे. कुच्छ लिखा था वो भी उर्दू मे था. कुच्छ शायरिया लिखी थी. लेकिन डाइयरी के पन्नो के बीच एक तस्वीर गिरी किशोरीलाल के पाव पर. उल्टी तस्वीर का पिछछवाड़ा किशोरीलाल के सामने था. उस पर गुलाब का चित्रा था और लिखा था लव यू और नीचे विक्रम की साइन थी. किशोरीलाल ने तस्वीर पलटी तो वो तस्वीर सुनंदा की थी. इसे देखकर फिर किशोरीलाल सोच मे पड़ गया की क्या विक्रम सुनंदा को चाहता था ? अगर चाहता था तो कम से कम उसे तो बोल ही पाता. क्या सुनंदा भी विक्रम को चाहती थी ? और अगर विक्रम सुनंदा को चाहता है तो सुनंदा पर किसने अत्याचार किए और अगर किए तो विक्रम ने उसके बारे मे आजतक क्यू किशोरीलाल को नही बताया ? उसे याद आया की नारायनप्रासाद की मृत्यु के बाद विक्रम कभी जूनागढ़ नही आया था.हर वक़्त वो छुट्टी नही मिल रही ऐसा बहाना बनाकर टालता रहा था. क्यू यही वजह थी की वो आना नही चाहता था ?.
किशोरीलाल उठाकर डाइयरी लेकर राजेश्वरी के पास आया और उसे सबकुच्छ दिखाया. राजेश्वरिदेवी की भी वोही सोच थी जो किशोरियालाल सोच रहा था.
दोनो सोच रहे थे की आख़िर माजरा क्या है. वो कौन है जिसने ऐसी हरक़त की थी. विक्रम आख़िर क्यू कोई राज़ अपने दिल मे च्छुपाए रखे बैठा था ? वो कौन है जिसने सुनंदा के साथ बलात्कार किया था या बलात्कार की कोशिश की थी ? वो कौन था, कहा था, जाने कहा ???????
किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी को इंतेज़ार था विक्रम का लौटने का. आज के दिन किशोरीलाल का सबसे खराब दिन था. आज उसकी ज़िंदगी को दो झटके लगे थे. एक आज तक वो विक्रम की दोस्ती को अंधे की तरह निभाता रहा और दूसरा अपनी बहन की मौत के बारे मे जिसे आकस्मात या खून ये समझ मे नही आता था. बड़ी बैचेनी से शाम कटी और रात का खाना भी जैसे तैसे बंसी के बहुत ज़ोर पर दोनो ने खाया और अपने रूम मे चले गये.
रात को करीब 11 बजे बस आख लगी ही थी की ज़ोरो से आवाज़ आई. किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी दोनो फ़ौरन खड़े उठे और रूम के बाहर रवेश मे आए नीचे दीवानखाने मे विक्रम लड़खदाता हुवा खड़ा था, बहुत पी रखी थी उसने और साथ मे गन लेके और धोती पहने एक सावला सा आदमी था और बंसी दोनो हाथ जोड़े विक्रम को सम्हाले खड़ा था. किशोरीलाल दौड़ के नीचे आया, तो विक्रम का ध्यान उस पर पड़ा. उसकी आँखो की चमक देखकर किशोरीलाल को लगा की उसके होश उड़े जा रहे है. फिर भी विक्रम किशोरीलाल को देखते ही उसके गले लग गया और बोले,”आआररीई… डूऊस्त तू ; तू त्त उ उ कब आया” वो अच्छी तरह बोल भी नही पाता था. किशोरीलाल ने उसे सम्हाला और पास की चेर पे बिठा दिया और बंसी को इशारा किया. बंसी दौड़ा चला गया और दो मिनट मे नींबू और पानी लेके चला आया. किशोरीलाल ने बहुत नींबू विक्रम को पिलाया. थोड़ी देर मे विक्रम थोड़ा होश मे आया. उसकी नज़र राजेश्वरिदेवी पर पड़ी जो धीरे धीरे सीडिया नीचे उतर रही थी. विक्रम ने उठाने की कोशिश की,”अरे भाभी आप”, लेकिन फिर वो गिरनेवाला था और किशोरीलाल ने फिर उसको सहारा देके चेर पे बिठा दिया. राजेश्वरिदेवी अब नीचे आ चुकी थी और सामने चेर पे बैठ गयी.
विक्रम चारो और देख रहा था मानो वो किसी से नज़रे नही मिला पा रहा था. उसे अंदाज़ा नही था की उसका जिगरी दोस्त यू अचानक उसे इतनी बुरी हालत मे देख लेगा खामोशी तोड़ते हुवे किशोरीलाल बोला,”विकी अभी खाना ख़ाके सो जाओ सुबह बाते करेंगे, तुम्हारी हालत अभी ठीक नही है, वैसे रात भी बहुत हो चुकी है.”. विक्रम बोला,”नही केपी अब ठीक है”. विक्रम किशोरीलाल को केपी बुलाता था और किशोरीलाल उसको विकी.
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क्रमशः................