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राजस्थान के सभी प्रेस मे साम,दाम, दंड, भेद की नीति से देखा लेकिन एक भी प्रेस मे पोस्टर्स तैयार नही हुए थे, इसका साफ मतलब था की ये पोस्टर्स राजस्थान की बाहर प्रेस मे छपवाये गये थे. दूसरा अगर बाहर छपवाये गये थे तो कौन सी ट्रांसपोर्ट से अंदर लाए गये. सब ट्रांसपोर्ट ऑफीस से भी ना ही आई. दोनो बाप बेटे और इंस्पेक्टर रवि सोच मे पड़ गये कि तो क्या पोस्टर्स हवाई मार्ग से लाए गये क्या?
आख़िरकार उन लोगो के पास कोई रास्ता नही बचा, सिवा उसी के कि उन पर दूसरा वार किया जाए. आख़िरकार उनलोगो ने तय किया कि अगले वार की राह देखेंगे और फिर देखते है कि क्या हो सकता है ? क्यूकी पोस्टर्स मे उनके चेहरे को बखूबी से च्छुपाया गया था. इसीलिए फिर हाल तो कोई चिंता का विशय नही था.
दोनो तरफ तंगदिली का वातावरण था. क्रांतिकारिओ को राजस्थान की राजकीय स्थिति का अंदाज़ा था ही और उनलोगो को मज़ा भी आ रहा था कि पॉलिटिशियन्स लोग उनके खिलाफ कुच्छ भी नही कर पाए और दूसरी तरफ खेंगरसिंह, रणवीरसींह और इंस्पेक्टर. रवि केपर हाथ घिसते रह गये थे और रोज चर्चा होती थी कि कौन है जो सब कम निपटा के हवा मे च्छू हो गये.
एक तरह से रेवोल्यूशोनीरीज़ का पहला वार सचोट निशाने पर पहुचा था और ये उनकी विजय थी. लेकिन वे लोग भी बड़े आराम से मज़े लूट रहे थे. उनको कोई जल्दी नही थी. बस एक चिंता का विषय था जय के लिए. क्यूकी अब वो बिल्कुल अकेला था. अब तो उदयन भी नज़रे चुराकर भाग जाता था. एक तरफ से जय को आनंद उस बात का था कि नये क्रांतिकारियो की योजना इतनी पवरफुल थी कि किसी के कानो कान तक कुच्छ भी बाते नही पहुचती थी. बिल्कुल फुलप्रूफ मास्टरप्लॅन की तरह काम पर थे. दूसरी तरफ जय की परेशानी क़ी बात भी यही थी कि उसे भी कुच्छ पता नही चलता था.
ईगो की वजह से जय भी इसके बारे मे किसी से बात करना टालता रहा और, और भी किसी ने कभी जय को कुच्छ बताने की ज़रूरत नही समझी थी. जय को आश्चर्या भी उतना ही था कि एक दोस्त भी साले ने ऐसी हरकत नही की थी कि कुच्छ बाते उन तक पहुचे. अगर मिलते थे तो बस बिल्कुल वही मूड मे और वही रूपरंग मे जो पहले हुवा करते थे. बस उनकी महफ़िल मे जय नही होता था. इसका नतीजा ये हुवा की जय ने शौक से शुरू की गयी सिगरेट अब व्यसन बन चुकी थी. दिन मे तीन चार बार वो पीता था.
एक तरफ जय को इंतेज़ार था कि आगे क्या होगा? दूसरी तरफ खेंगरसिंह & कंपनी. को इंतेज़ार था दूसरे वार का. लेकिन ये क्रांतिकारियो को क्या सूझा था कि ऐसे ही दिन पे दिन बीत ते चले जा रहे थे और किसी के पेट का पानी तक नही हिलता था.
जब आग दोनो तरफ लगी हो तो धुआ निकलता ही है और जब आप का विजय होता है तो या तो आप जीत के नशे मे चूर रहेते हो या तो फिर कुच्छ ग़लत कदम उठा लेते हो. लेकिन शायद कोई अलौकिक शक्ति काम कर रही थी इन क्रांतिकारियो के पिछे, जो अपनी पहेली जीत के बावजूद भी बिल्कुल शांत और जैसे कुच्छ हुवा ही नही वैसे जी रहे थे.
दिन बीत ते चले गये, ना तो खेंगरसिंह & कंपनी. को जल्दी थी और ना तो क्रांतिकारियो को कुच्छ पड़ी थी. अगर इस समय मे सब से बड़ी तकलीफ़ हो रही थी तो सिर्फ़ जय को. और आख़िरकार जय से नही रहा गया तो एक रात उसने उदयन से पुच्छ ही लिया कि उनलोगो का दूसरा वार क्या होगा? लेकिन उपर से बुध्धु दिखाई देने वाला उदयन ने बता दिया कि उनमे से किसी को अगले कार्यवाही का पता नही है. क्यूकी बॉस का ऑर्डर नही है. बॉस कौन है ये किसी को पता नही है. बस फुलप्रूफ प्लान है. लेकिन पूरा प्लान क्या है, ये भी किसी को मालूम नही है.
जब उदयन से भी कुच्छ पता नही चला तो जय और व्याकुल हो चला और उसका ध्यान बात गया. उसका दिल पढ़ने मे से भी उखदने लगा. वो ज़्यादा सिगरेट पीने लगा. वो देख रहा था कि खुद के वातावरण, स्वाभाव मे जबरदस्त चेंज आ रहा है. जो चेंज क्रांतिकारियो मे आना चाहिए या तो राजकार्णियो को, वो चेंज जय खुद महसूस कर रहा था. जय समझ गया कि उनसे रहा भी नही जा रहा है और सहा भी नही जा रहा है. उसने फ़ैसला किया कि वो स्वामी रामानंद को ज़रूर बताएगा. नेक्स्ट सनडे उसने स्वामी रामानंद से मिलने का फ़ैसला किया.
लेकिन जय स्वामी रामानंद को मिले और कुच्छ बात बताए उसके पहले सनडे के दो दिन पहले क्रांतिकारियो ने दूसरा वार कर दिया.
हर चीफ मिनिस्टर को फंड अलॉट होता है कि उसके स्टेट मे कुच्छ ना कुच्छ यूज़ कर सकते है. राजस्थान के CM के फंड मे से पूरे राजस्थान मे कई योजनाए बनाई गयी थी. खास कर के राजस्थान के मेन मेन सिटीस मे फ्लाइयूवर (ब्रिड्ज ) बनाने की योजना केन्द्र सरकार ने मंजूर की थी और कई शहरो मे या तो काम पूरा हो चुका था या तो काम चल रहा था. उनमे जो खर्चा किया गया था उसका हिसाब भी स्टेट रोड & ब्लडग डेप्ट्ट रखते है. केंद्र सरकार मे CPWड डिपार्टमेंट होता है (सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट).
ये सरकारी काम है. जो कुच्छ इस तरह आगे बढ़ता है.
जहा पहले टेंडर्स निकले जाते है. जिसका विग्यापन अग्रणी अख़बरो मे आता है. उस विग्यापन के आधार पर एक्सपीरियेन्स्ड और स्टेट गवरमेंट मे जिसने पहले काम किया हुवा है और तजुर्बा है उसी कंपनी. का टेंडर सेलेक्ट किया जाता है. कम से कम तीन टेंडर्स अनिवार्य होते है. वरना बिडिंग प्रक्रिया अपने आप रद्द की जाती है और दूसरी बार विग्यापन देना होता है. कम से कम तीन टेंडर और ज़्यादा से ज़्यादा कोई लिमिट नही होती. टेंडर फॉर्म सब्मिट करते वक़्त कुच्छ अमाउंट तय की गयी होती है जिसे टेंडर को डेपॉज़िट के तौर पर जमा करनी पड़ती है जिसे एंड (अर्नेस्ट मनी डेपॉज़िट) कहते है. बड़ी बड़ी टेंडर मे एंड की अमाउंट भी बड़ी होती है.
फिर निश्चित समय पर टेंडर खुलता है, जिसकी एक समिति बनी होती है. गवर्नमेंट कार्य मे एक सर्व समन्य रूल है की लोवेस्ट विल बी आक्सेटाल. यानी कम कीमत वाला टेंडर हमेशा सेलेक्ट करना होता है. फिर सेलेक्ट हुए टेंडर को वर्क ऑर्डर इश्यू होता है कि फलना कम आप को करना है इस समय मर्यादा मे. इस वर्क ऑर्डर के आधार पर कंपनी. की ओर से स्टेट गवरमेंट को एक लेटर इश्यू होता है कि इस कार्य के लिए इतनी सामग्री चाहिए, जैसे सेमेंट, लोहा, कच्चा माल एट्सेटरा. जिसका अंदाज़ीत खर्चा इतना होगा और मेटीरियल्स का मार्केट रेट और स्टेट गवरमेंट रेट लिखा जाता है. इस रेट के आधार पर स्टेट गवरमेंट कुच्छ अमाउंट रिलीस करती है कि कम शुरू करने से पहले रो-मेटीरियल्स को लाया जाए.
फिर कार्य शुरू हो जाता है और बीच बीच मे कांट्रॅक्ट के मुताबिक स्टेट की ओर से स्चेक इश्यू होता रहेता है और कार्य आगे बढ़ता चला जाता है. कांट्रॅक्ट मे कई शर्ते होती है, उनमे से एक शर्त ये भी होती है कि वर्क शुड बी सॅटिस्फॅक्ट्री आंड व्हिथिन दा टाइम लिमिट.
इसका मतलब वर्क कंप्लीशन के वक़्त स्टेट के ऑफिसर्स वाहा इनस्पेक्षन करते है और रिपोर्ट तैयार करते है कि काम सही हुवा है या नही और टाइम पर हुवा है या नही. अगर नही तो उसके रीज़न भी मेन्षन किए जाते है.
फिर कार्य समाप्त हो जाने पर फाइनल पेमींट बिल तैयार होता है. स्टेट के रोड & ब्ल्ड्ज डिपार्टमेंट एक रिजिस्टर मेनटेन करती है कि कितनी अमाउंट कौन सी डेट मे कहा खर्चा की गयी.
क्रमशः.................
आख़िरकार उन लोगो के पास कोई रास्ता नही बचा, सिवा उसी के कि उन पर दूसरा वार किया जाए. आख़िरकार उनलोगो ने तय किया कि अगले वार की राह देखेंगे और फिर देखते है कि क्या हो सकता है ? क्यूकी पोस्टर्स मे उनके चेहरे को बखूबी से च्छुपाया गया था. इसीलिए फिर हाल तो कोई चिंता का विशय नही था.
दोनो तरफ तंगदिली का वातावरण था. क्रांतिकारिओ को राजस्थान की राजकीय स्थिति का अंदाज़ा था ही और उनलोगो को मज़ा भी आ रहा था कि पॉलिटिशियन्स लोग उनके खिलाफ कुच्छ भी नही कर पाए और दूसरी तरफ खेंगरसिंह, रणवीरसींह और इंस्पेक्टर. रवि केपर हाथ घिसते रह गये थे और रोज चर्चा होती थी कि कौन है जो सब कम निपटा के हवा मे च्छू हो गये.
एक तरह से रेवोल्यूशोनीरीज़ का पहला वार सचोट निशाने पर पहुचा था और ये उनकी विजय थी. लेकिन वे लोग भी बड़े आराम से मज़े लूट रहे थे. उनको कोई जल्दी नही थी. बस एक चिंता का विषय था जय के लिए. क्यूकी अब वो बिल्कुल अकेला था. अब तो उदयन भी नज़रे चुराकर भाग जाता था. एक तरफ से जय को आनंद उस बात का था कि नये क्रांतिकारियो की योजना इतनी पवरफुल थी कि किसी के कानो कान तक कुच्छ भी बाते नही पहुचती थी. बिल्कुल फुलप्रूफ मास्टरप्लॅन की तरह काम पर थे. दूसरी तरफ जय की परेशानी क़ी बात भी यही थी कि उसे भी कुच्छ पता नही चलता था.
ईगो की वजह से जय भी इसके बारे मे किसी से बात करना टालता रहा और, और भी किसी ने कभी जय को कुच्छ बताने की ज़रूरत नही समझी थी. जय को आश्चर्या भी उतना ही था कि एक दोस्त भी साले ने ऐसी हरकत नही की थी कि कुच्छ बाते उन तक पहुचे. अगर मिलते थे तो बस बिल्कुल वही मूड मे और वही रूपरंग मे जो पहले हुवा करते थे. बस उनकी महफ़िल मे जय नही होता था. इसका नतीजा ये हुवा की जय ने शौक से शुरू की गयी सिगरेट अब व्यसन बन चुकी थी. दिन मे तीन चार बार वो पीता था.
एक तरफ जय को इंतेज़ार था कि आगे क्या होगा? दूसरी तरफ खेंगरसिंह & कंपनी. को इंतेज़ार था दूसरे वार का. लेकिन ये क्रांतिकारियो को क्या सूझा था कि ऐसे ही दिन पे दिन बीत ते चले जा रहे थे और किसी के पेट का पानी तक नही हिलता था.
जब आग दोनो तरफ लगी हो तो धुआ निकलता ही है और जब आप का विजय होता है तो या तो आप जीत के नशे मे चूर रहेते हो या तो फिर कुच्छ ग़लत कदम उठा लेते हो. लेकिन शायद कोई अलौकिक शक्ति काम कर रही थी इन क्रांतिकारियो के पिछे, जो अपनी पहेली जीत के बावजूद भी बिल्कुल शांत और जैसे कुच्छ हुवा ही नही वैसे जी रहे थे.
दिन बीत ते चले गये, ना तो खेंगरसिंह & कंपनी. को जल्दी थी और ना तो क्रांतिकारियो को कुच्छ पड़ी थी. अगर इस समय मे सब से बड़ी तकलीफ़ हो रही थी तो सिर्फ़ जय को. और आख़िरकार जय से नही रहा गया तो एक रात उसने उदयन से पुच्छ ही लिया कि उनलोगो का दूसरा वार क्या होगा? लेकिन उपर से बुध्धु दिखाई देने वाला उदयन ने बता दिया कि उनमे से किसी को अगले कार्यवाही का पता नही है. क्यूकी बॉस का ऑर्डर नही है. बॉस कौन है ये किसी को पता नही है. बस फुलप्रूफ प्लान है. लेकिन पूरा प्लान क्या है, ये भी किसी को मालूम नही है.
जब उदयन से भी कुच्छ पता नही चला तो जय और व्याकुल हो चला और उसका ध्यान बात गया. उसका दिल पढ़ने मे से भी उखदने लगा. वो ज़्यादा सिगरेट पीने लगा. वो देख रहा था कि खुद के वातावरण, स्वाभाव मे जबरदस्त चेंज आ रहा है. जो चेंज क्रांतिकारियो मे आना चाहिए या तो राजकार्णियो को, वो चेंज जय खुद महसूस कर रहा था. जय समझ गया कि उनसे रहा भी नही जा रहा है और सहा भी नही जा रहा है. उसने फ़ैसला किया कि वो स्वामी रामानंद को ज़रूर बताएगा. नेक्स्ट सनडे उसने स्वामी रामानंद से मिलने का फ़ैसला किया.
लेकिन जय स्वामी रामानंद को मिले और कुच्छ बात बताए उसके पहले सनडे के दो दिन पहले क्रांतिकारियो ने दूसरा वार कर दिया.
हर चीफ मिनिस्टर को फंड अलॉट होता है कि उसके स्टेट मे कुच्छ ना कुच्छ यूज़ कर सकते है. राजस्थान के CM के फंड मे से पूरे राजस्थान मे कई योजनाए बनाई गयी थी. खास कर के राजस्थान के मेन मेन सिटीस मे फ्लाइयूवर (ब्रिड्ज ) बनाने की योजना केन्द्र सरकार ने मंजूर की थी और कई शहरो मे या तो काम पूरा हो चुका था या तो काम चल रहा था. उनमे जो खर्चा किया गया था उसका हिसाब भी स्टेट रोड & ब्लडग डेप्ट्ट रखते है. केंद्र सरकार मे CPWड डिपार्टमेंट होता है (सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट).
ये सरकारी काम है. जो कुच्छ इस तरह आगे बढ़ता है.
जहा पहले टेंडर्स निकले जाते है. जिसका विग्यापन अग्रणी अख़बरो मे आता है. उस विग्यापन के आधार पर एक्सपीरियेन्स्ड और स्टेट गवरमेंट मे जिसने पहले काम किया हुवा है और तजुर्बा है उसी कंपनी. का टेंडर सेलेक्ट किया जाता है. कम से कम तीन टेंडर्स अनिवार्य होते है. वरना बिडिंग प्रक्रिया अपने आप रद्द की जाती है और दूसरी बार विग्यापन देना होता है. कम से कम तीन टेंडर और ज़्यादा से ज़्यादा कोई लिमिट नही होती. टेंडर फॉर्म सब्मिट करते वक़्त कुच्छ अमाउंट तय की गयी होती है जिसे टेंडर को डेपॉज़िट के तौर पर जमा करनी पड़ती है जिसे एंड (अर्नेस्ट मनी डेपॉज़िट) कहते है. बड़ी बड़ी टेंडर मे एंड की अमाउंट भी बड़ी होती है.
फिर निश्चित समय पर टेंडर खुलता है, जिसकी एक समिति बनी होती है. गवर्नमेंट कार्य मे एक सर्व समन्य रूल है की लोवेस्ट विल बी आक्सेटाल. यानी कम कीमत वाला टेंडर हमेशा सेलेक्ट करना होता है. फिर सेलेक्ट हुए टेंडर को वर्क ऑर्डर इश्यू होता है कि फलना कम आप को करना है इस समय मर्यादा मे. इस वर्क ऑर्डर के आधार पर कंपनी. की ओर से स्टेट गवरमेंट को एक लेटर इश्यू होता है कि इस कार्य के लिए इतनी सामग्री चाहिए, जैसे सेमेंट, लोहा, कच्चा माल एट्सेटरा. जिसका अंदाज़ीत खर्चा इतना होगा और मेटीरियल्स का मार्केट रेट और स्टेट गवरमेंट रेट लिखा जाता है. इस रेट के आधार पर स्टेट गवरमेंट कुच्छ अमाउंट रिलीस करती है कि कम शुरू करने से पहले रो-मेटीरियल्स को लाया जाए.
फिर कार्य शुरू हो जाता है और बीच बीच मे कांट्रॅक्ट के मुताबिक स्टेट की ओर से स्चेक इश्यू होता रहेता है और कार्य आगे बढ़ता चला जाता है. कांट्रॅक्ट मे कई शर्ते होती है, उनमे से एक शर्त ये भी होती है कि वर्क शुड बी सॅटिस्फॅक्ट्री आंड व्हिथिन दा टाइम लिमिट.
इसका मतलब वर्क कंप्लीशन के वक़्त स्टेट के ऑफिसर्स वाहा इनस्पेक्षन करते है और रिपोर्ट तैयार करते है कि काम सही हुवा है या नही और टाइम पर हुवा है या नही. अगर नही तो उसके रीज़न भी मेन्षन किए जाते है.
फिर कार्य समाप्त हो जाने पर फाइनल पेमींट बिल तैयार होता है. स्टेट के रोड & ब्ल्ड्ज डिपार्टमेंट एक रिजिस्टर मेनटेन करती है कि कितनी अमाउंट कौन सी डेट मे कहा खर्चा की गयी.
क्रमशः.................