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क्यूकी आख़िर कुदरत को जो मंजूर था वोही हो गया था. विक्रम के स्पर्म का एक बीज कृष्णा की बच्चेदानी की तरफ बढ़ रहा था और रास्ते मे कृष्णा के अंडकोषो का एक बीज को साथ मे लेकर जैसे पुच्छ रहा था,’’क्यू दोस्ती करोगी? चलो हम्दोनो मिलकर वटवृक्ष बनकर एक बच्चा बनकर बाहर आएँगे’’ और सच मे ये स्पर्म का बीज और अंडकोष का बीज एकदुसरे मे समा गये और कृष्णा की बच्चेदानी को अपना टेंपोररी घर बनाने की तैयारी मे लग गये. उस वक़्त रात को 3 बजे थे.
ये विक्रम और कृष्णा की सुहागरात थी और नये जीवन का सूर्योदय, लेकिन जो खेल अभी इन्दोनो ने खेला था और इस खेल से जो अंजाम होनेवाला था उस अंजाम का फल किसी को पता नही था कि विक्रम के दोस्त किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी के बच्चे जय की ज़िंदगी मे क्या तूफान खड़ा करनेवाला है.
सुबह 6.00 बजे कृष्णा की नींद खुल गयी. देखा तो दोनो बिना कपड़ो मे सोए हुए थे. ठंडी थी फिर भी किसी को ओढ़ने का तक ख़याल नही था, इतनी थकान थी. कृष्णा का तन टूट रहा था, लेकिन वो खड़ी हुई और देखा की विक्रम भी ऐसे ही पड़ा हुवा है और जो रात को तीन चार बार मज़े लूटने की बात कर रहा था, वो नींद मे इतना उलझा हुवा था कि अपने आप के बिल्कुल बाहर था. कृष्णा ने जल्दी जल्दी नाइटी पहनी और रज़ाई विक्रम के बदन पर डाल दी और बाथरूम मे घुस गयी. सुबह के 6.30 बजे नहा धो कर वो रेड कलर की सारी पहनकर रूम से बाहर आई और रूम को अच्छी तरह लॉक किया, क्यूकी अंदर विक्रम ऐसे ही पड़ा था. बाहर निकलते ही किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी की आवाज़ सुनी. वे लोग पूजा कर रहे थे, कृष्णा पिछे जा के बैठ गयी और थोड़ी देर मे पूजा ख़तम हुई तो कृष्णा ने आगे जाकर पहले किशोरीलाल के और बाद मे राजेश्वरिदेवी के पाव च्छुए.
‘’अरे कृष्णा ये क्या कर रही हो?’’ कहकर राजेश्वरिदेवी ने उसको उठाया और कृष्णा बोली,’’भाभी आपलोग ही मेरे भगवान बनकर यहा आए हो. आज जो मे खुशी पा रही हू वो आप लोगो की ही मेहनत है.’’
राजेश्वरिदेवी,’’नही कृष्णा सब का अच्छा नसीब होता है, तूने क्या कम सहा है, ये कुदरत का ही फल है.’’
कृष्णा बोली,’’भाभी मेरे बच्चे ने परेशान तो नही किया ना?’’
‘’अरे नही रे वो तो कल रात से सोया है तो दोनो बच्चे कहा उठे ही है अब तक’’ राजेश्वरिदेवी ने जवाब दिया और आगे बोली,’’तेरे बच्चे का नाम क्या है, कृष्णा. हमने तो आजतक कुच्छ पुचछा ही नही.’’
‘’मैने रखा ही नही अब तक, सोचती थी अगर इसके पापा मानेंगे तो जो वो चाहे वो रखूँगी वरना मैं तो उसे मुन्ना कहकर ही बुलाती हू.’’ कृष्णा ने कहा.
‘’अच्छा, विकी उठ गया है क्या?’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
कृष्णा ने ना मे जवाब दिया और नज़रे नीची कर ली. राजेश्वरिदेवी समझ गयी और बोली,’’ अरे आप भी ना कौन सा सवाल किस को पूच्छते हो? विक्रम भाई थोड़े ही जल्दी से उठते है. लेकिन अब मुझे विश्वास है कृष्णा के आजाने से जल्दी उठना शुरू हो जाएगा.’’
‘’अरे उसे जल्दी उठाओ, फिर हमे जाना है ना.’’ किशोरीलाल ने कहा.
‘’आपलोगो को कहा जाना है?’’ कृष्णा ने पुचछा.
‘’जूनागढ़.’’ राजेश्वरिदेवी ने जवाब दिया.
‘’आप आज ही चले जाओगे. कुच्छ दिन मेरे साथ भी रहिएना. मैं बिल्कुल यहा अकेली हो जाउन्गी भाभी.’’ कृष्णा की आँखे छ्होटी हो गयी.
‘’अरे अब तू कहा अकेली है ?’’ राजेश्वरिदेवी ने उसका चेहरा पकड़कर कहा और आगे बोली,’’देखो कृष्णा, बहुत दिन हो गये हमे भी तो काम पूरा करना है ना और इनको (किशोरीलाल के सामने इशारा कर के बोली) फिर विक्रम भाई के साथ वो अग्रीमेंट चेंज करना है और इसके पहले एक बार कन्याकुमारी जाना होगा. वो जल्दी ही ख़तम हो जाए तो आपलोग आज़ाद हो जाओगे ना.’’
क्रमशः..............
ये विक्रम और कृष्णा की सुहागरात थी और नये जीवन का सूर्योदय, लेकिन जो खेल अभी इन्दोनो ने खेला था और इस खेल से जो अंजाम होनेवाला था उस अंजाम का फल किसी को पता नही था कि विक्रम के दोस्त किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी के बच्चे जय की ज़िंदगी मे क्या तूफान खड़ा करनेवाला है.
सुबह 6.00 बजे कृष्णा की नींद खुल गयी. देखा तो दोनो बिना कपड़ो मे सोए हुए थे. ठंडी थी फिर भी किसी को ओढ़ने का तक ख़याल नही था, इतनी थकान थी. कृष्णा का तन टूट रहा था, लेकिन वो खड़ी हुई और देखा की विक्रम भी ऐसे ही पड़ा हुवा है और जो रात को तीन चार बार मज़े लूटने की बात कर रहा था, वो नींद मे इतना उलझा हुवा था कि अपने आप के बिल्कुल बाहर था. कृष्णा ने जल्दी जल्दी नाइटी पहनी और रज़ाई विक्रम के बदन पर डाल दी और बाथरूम मे घुस गयी. सुबह के 6.30 बजे नहा धो कर वो रेड कलर की सारी पहनकर रूम से बाहर आई और रूम को अच्छी तरह लॉक किया, क्यूकी अंदर विक्रम ऐसे ही पड़ा था. बाहर निकलते ही किशोरीलाल और राजेश्वरिदेवी की आवाज़ सुनी. वे लोग पूजा कर रहे थे, कृष्णा पिछे जा के बैठ गयी और थोड़ी देर मे पूजा ख़तम हुई तो कृष्णा ने आगे जाकर पहले किशोरीलाल के और बाद मे राजेश्वरिदेवी के पाव च्छुए.
‘’अरे कृष्णा ये क्या कर रही हो?’’ कहकर राजेश्वरिदेवी ने उसको उठाया और कृष्णा बोली,’’भाभी आपलोग ही मेरे भगवान बनकर यहा आए हो. आज जो मे खुशी पा रही हू वो आप लोगो की ही मेहनत है.’’
राजेश्वरिदेवी,’’नही कृष्णा सब का अच्छा नसीब होता है, तूने क्या कम सहा है, ये कुदरत का ही फल है.’’
कृष्णा बोली,’’भाभी मेरे बच्चे ने परेशान तो नही किया ना?’’
‘’अरे नही रे वो तो कल रात से सोया है तो दोनो बच्चे कहा उठे ही है अब तक’’ राजेश्वरिदेवी ने जवाब दिया और आगे बोली,’’तेरे बच्चे का नाम क्या है, कृष्णा. हमने तो आजतक कुच्छ पुचछा ही नही.’’
‘’मैने रखा ही नही अब तक, सोचती थी अगर इसके पापा मानेंगे तो जो वो चाहे वो रखूँगी वरना मैं तो उसे मुन्ना कहकर ही बुलाती हू.’’ कृष्णा ने कहा.
‘’अच्छा, विकी उठ गया है क्या?’’ किशोरीलाल ने पुचछा.
कृष्णा ने ना मे जवाब दिया और नज़रे नीची कर ली. राजेश्वरिदेवी समझ गयी और बोली,’’ अरे आप भी ना कौन सा सवाल किस को पूच्छते हो? विक्रम भाई थोड़े ही जल्दी से उठते है. लेकिन अब मुझे विश्वास है कृष्णा के आजाने से जल्दी उठना शुरू हो जाएगा.’’
‘’अरे उसे जल्दी उठाओ, फिर हमे जाना है ना.’’ किशोरीलाल ने कहा.
‘’आपलोगो को कहा जाना है?’’ कृष्णा ने पुचछा.
‘’जूनागढ़.’’ राजेश्वरिदेवी ने जवाब दिया.
‘’आप आज ही चले जाओगे. कुच्छ दिन मेरे साथ भी रहिएना. मैं बिल्कुल यहा अकेली हो जाउन्गी भाभी.’’ कृष्णा की आँखे छ्होटी हो गयी.
‘’अरे अब तू कहा अकेली है ?’’ राजेश्वरिदेवी ने उसका चेहरा पकड़कर कहा और आगे बोली,’’देखो कृष्णा, बहुत दिन हो गये हमे भी तो काम पूरा करना है ना और इनको (किशोरीलाल के सामने इशारा कर के बोली) फिर विक्रम भाई के साथ वो अग्रीमेंट चेंज करना है और इसके पहले एक बार कन्याकुमारी जाना होगा. वो जल्दी ही ख़तम हो जाए तो आपलोग आज़ाद हो जाओगे ना.’’
क्रमशः..............