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कुदरत का इंसाफ

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कुदरत का इंसाफ

शाम के आठ बज रहे थे ।

डॉली किचन में मशगूल थी, उसके पति राज के आने का समय हो चुका था । किचन में खाने की तैयारी चल रही थी ।

इस फ्लैट में दो ही लोग रहते थे । डॉली और उसका पति राज । अभी तीन महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी । वह सहारनपुर के पास मीरगंज कस्बे के रहने वाले थे लेकिन चूँकि राज सिटी में एक फैक्ट्री में जॉब करता था इसलिए पिछले महीने वे लोग यहाँ शिफ्ट हो गये थे ।

डॉली घर पर ही रहती थी लेकिन अधिक दिन तक उसका हाउस वाइफ बने रहने का इरादा नहीं था । शहर के महंगे खर्चे भी इसकी परमिशन नहीं देते थे । राज की तरफ से भी सिग्नल मिलने लगे थे ।

डॉली के सपने उस कोण से साकार नहीं हुए थे जैसे उसने बुन रखे थे । राज अजब प्रवृति का व्यक्ति था, कई बार समझ में नहीं आता था कि वह चाहता क्या है, उसके हाव-भाव भी ठीक नहीं रहते थे । उसका नेचर लड़कियों से ज्यादा मैच करता था । वह अजीब-अजीब बातें करता था जो कम-से-कम एक ‘पति’ को तो हरगिज शोभा नहीं देती । डॉली को उस तरह की बातें बिल्कुल पसंद नहीं थीं और राज को मानो उसी में रस प्राप्त होता था ।

आज तो अजब घटित होने जा रहा था ।

जो कसर बाकी थी, वह मात्र कुछ क्षणोपरान्त पूरी होने जा रही थी ।

डॉली के पैरों के तले का फर्श बस निकलने ही वाला था ।

वह किचन के कार्य में व्यस्त थी कि उसका मोबाइल बजा ।

किचन के स्लेब पर रखे वाईब्रेट होते मोबाइल पर उसने डोर से ही नजर डाली ।

राज का नंबर था ।

वह जान चुकी थी कि राज दरवाजे पर आ गया है । अलबत्ता दस सेकंड में आ जाने वाला है ।

फ्लैट की कालबेल भी सुचारू थी मगर शायद ही राज कभी उसका उपयोग करता हो, क्योंकि कालबेल घनघनाने के लिए उसे दरवाजे तक आना पड़ेगा और घनघनाने के बाद खुलने तक की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, जो नि:संदेह उसके लिए काबिले बर्दाश्त नहीं था –

यही मोटा कारण था कि राज जब बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित स्टिल्ट में अपनी बाइक स्टैंड करता था तो पहला काम डॉली को फोन करना होता था । जब तक डॉली दरवाजा खोलने आती थी, तब तक राज एक जीना चढ़कर फ्लैट के दरवाजे पर नमूदार हो जाता था ।

अब भी राज का नंबर स्पार्क हो रहा था । कदाचित राज आ चुका था और उसका एक जीना चढ़ना मात्र बाकी था ।

डॉली ने लाल निशान टच कर दिया और स्वयं दरवाजा खोलने के लिए किचन से निकली ।

हस्बे मामूल चूँकि दिन भर की ड्यूटी बजाकर नया नवेला पति घर पर आया है तो डॉली को इस आगमन की अपार ख़ुशी होनी चाहिए लेकिन इस प्रकार का कोई चिन्ह उसके चेहरे पर दृष्टिगोचर नहीं हुआ ।

उसने दरवाजे पर पहुंचकर सिटकनी गिरायी और पट खोल दिया ।

राज अभी जीना ही चढ़ रहा था, पदचाप उसे सुनाई दिए ।

उसने बाहर गर्दन निकालकर झांककर देखा ।

राज जीना चढ़ चुका था ।

मात्र दो सेकंड में वह सामने प्रकट हो गया। रोजमर्रा कीभांति डॉली ने उसके हाथ से हेलमेट लिया । उसका चेहरा सपाट था।

लेकिन न जाने क्यों राज आज चहक रहा था । वे दोनोंजब दरवाजा बंद करके भीतर आये तो राज ने डॉली केगले में हाथ डाला और भीतर चलते हुए बोला –“आज मैं बहुत खुश हूँ सखी।”

डॉली ने गर्दन मोड़कर राज को देखा और चेहरे पर जबर्दस्ती मुस्कान लाती हुई बोली –“ऐसा क्या?”

पहले राज ने होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान समेटी। डॉलीने हेलमेट को फ्रिज के ऊपर रखा।

राज रहस्यपूर्ण मुस्कान के साथ बोला –“कल को मेरेपति आ रहे हैं – ।”

“पति–?”यह शब्द सुनाई तो दिया था परन्तु समझ मेंकुछ नहीं आया था, जैसे सिर के ऊपर से गुजर गया हो।

जबकि राज अजीब बेहयाई वाली मुस्कान में मुस्कुरा रहा था।

डॉली पुनः किचन में प्रविष्ट होने से पहले दो क्षण केलिए रुकी और आशय को स्पष्ट करने के उद्देश्य से बोली –“मैं समझी नहीं, किसके पति आ रहे हैं?”

“मेरे... ।”

फिर डॉली के चेहरे पर एक शून्य स्थापित हो गया।

राज अपना पिट्ठू बैग उतारकर और उसकी चेन खोलकर ताजा खरीदा सामान दिखाते हुए बोला –“देखो, आज यह मैं क्या-क्या खरीदकर लाई हूँ ।”

उसने सामान को डॉली के समक्ष ओपन कर दिया।

डॉली जड़वत रह गयी।

वो लाल ब्रा पेन्टी थी, चूड़ियाँ थी, लेडीज मेकअप का सारा सामान था।

डॉली उस सामान को गौर से देखती हुई बोली –“यह सब किसके लिए लाये हो –?”

“अपने लिए।”

“व्हाट, क्या मजाक है यह?”

“मेरी जान यह मजाक नहीं है, यह मेरी सच्चाई है, जिससेअभी तक तुम वाकिफ नहीं थी लेकिन अब हो जाओगी ।” वह फ्रिज से पानी की बोतल निकालते हुए बोला –“आज मैं बहुत खुश हूँ । तुमसे शादी करके मैं जरा भी खुश नहीं रहा हूँ क्योंकि मुझे तुम्हारी नहीं बल्कि एक पति की जरूरत थी ।”

डॉली फटी आंखों से कभी सामान को तो कभी राजको देख रही थी। उसकी बुद्धि कहीं अंतरिक्ष में तैर रही थी, उसे लग रहा था अभी वह गश खाकर गिर पड़ेगी।

☐☐☐
 
पाँच मिनट बाद डॉली पुनः किचन में थी और राजबेडरूम में समा चुका था।

डॉली की आँखों से आंसू टपक रहे थे । अंतस में भूकंपआ रहे थे, वह राज की हकीकत जान चुकी थी।

राज अच्छे आचार-विचार का नहीं था, लेकिन तब भीवह पति के रूप में स्वीकार्य था । शिकायतें अपनी जगह हैं लेकिन अंततः जिन्दगी को एडजस्ट किया जा सकता था, खटर-पटर करती गाड़ी आगे बढ़ सकती थी लेकिन अब तोसबकुछ स्वाहा हो चुका था।

वह नारी बनने को आतुर था, उसे खुद पति की जरूरत थीतो उसके इस रूप को डॉली किस प्रकार सहन कर सकतीथी ?

वह किचन का काम भी करती जा रही थी, टूट चुके बांधकी तरह आंसू भी बहा रही थी। सैलाब उमड़ पड़ा था, अबनहीं थम रहा था।

उसे सबसे ज्यादा अपनी मम्मी पर गुस्सा आ रहा था।उन्हीं की पसंद था यह। कोहिनूर की तरह संबोधन करती थीं।

मगर किस पर गुस्सा करें, अंततः अपने भाग्य का ही दोष था ।

उसके मस्तिष्क में ख्यालों का बवंडर उठ रहा था।

तभी स्लेब पर रखा उसका मोबाइल घनघनाने लगा।

उसकी मम्मी का नाम स्पार्क हो रहा था। एकाएक उसेबहुत गुस्सा आया, जैसे उसका नसीब बिगाड़ने वाले का फोनआ गया हो।

थोड़ा ठहरकर उसने रिसीव कर लिया। हलक से गुर्राहट सी निकली–“हैलो ।”

“कैसी है लाडो –अब तो दोबारा उल्टी नहीं आई?”

“न ।” जैसे उसने शब्द फेंककर मारा।

“राज आ गये?”

“आ गये ।”

“तूने खुशखबरी सुनाई?”

“न – ।”

“अरेऽऽ–कैसा दिल है तेरा, ऐसी खबर सुनने को तो बापका दिल तरसता है, तुझे तो उनके आते ही सबसे पहले यहखुशखबरी सुनानीथी–।”

“अभी नहीं सुनाई है।”

“लगता है शरमा रही है–हा-हा-हा।” डॉली की मां शन्नो कुमारी अपने स्टाइल में हँसी और बोली–“मगर बतानातो तुझे ही पड़ेगा, बता तो मैं भी देती मगर यह खुशखबरी हरपति अपनी पत्नी के मुंह से सुनना चाहता है–।”

“ठीक है, बता दूंगी।” उसने ठस्स स्वर में कहा।

घंटी की आवाज और बातें सुनकर राज बेडरूम से बाहरआ गया था लेकिन ऐसे भेष में कि उसे देखकर डॉली कीचीख निकलते-निकलते बची।

डॉली फोन पर अंतिम शब्द कह रही थी–“ठीक है मम्मीफिर बात करूंगी, अभी रोटी बेल रही हूँ ।” कहने के साथ उसनेउत्तर की प्रतीक्षा किये बिना लाल निशान टच कर दिया।

तभी आहट पर पीछे मुड़कर देखा।

और उसी के साथ वह भौंचक्की रह गयी। चीखनिकलते-निकलते बची।

सामने राज खड़ा था। ब्रा और पेन्टी पहने।

होंठों पर लिपस्टिक लगाये।

डॉली को बड़ा वीभत्स लग रहा था।

जबकि वह गुर्राकर पूछ रहा था–“किसका फोन था?”

डॉली के कानों में कहीं दूर से ये शब्द पड़े। मानोअंधकूप से शब्द खारिज हुए हों।”

“मैंने पूछा किसका फोन था?”

डॉली सकते वाली स्थिति में थी। आंखें फटी थीं। राजको देख रही थी जबकि वह दृश्य उससे देखा नहीं जा रहा था।

चेहरा सफेद पड़ चुका था।

“किसका फोन था, बताती क्यों नहीं?”

“मम्मी का–।” वह घबराकर कह गयी।

“क्या बताया तूने?”

“कुछ भी नहीं।”

“अभी कुछ बताना मत वरना मुझसे बुरा कोई नहींहोगा–टेंटुवा दबाकर तेरी जान ले लूंगा।”

“नहीं बताऊंगी।” वह पीछा छुड़ाते हुए रोटी बेलने लगी।

राज ने उसे अपनी तरफ मोड़ा और खुद पर नजररखवाते हुए बोला–“कैसी लग रही हूँ ?”

शब्द जैसे पिघला शीशा बनकर कानों में पड़े।

उसका जी चाहा कि कानों पर हाथ रख ले और इस प्रकारका कोई दूसरा शब्द न सुन पाये।

“कैसी लग रही हूँ ? बता न–।”

डॉली पुनः बेलन की तरफ घूम गयी और कार्य मेंमशगूल होने का प्रयत्न करने लगी।

“जल गयी न–औरत के अंदर यही कमी होती है। एकऔरत दूसरी की सुंदरता को बर्दाश्त कर ही नहीं सकती लेकिनइस सुंदरता का भी कद्रदान कल को आ जाएगा जो मुझे फूलोंमें तौलेगा–अभी पूरी तैयार कहाँ हुई हूँ । फिर देखना कैसेबिजली गिराऊंगी–।” कहकर राज वापस पलटा।

मात्र ब्रा और पेंटी में वह अजीब ही लग रहा था। होंठों परलाल लिपस्टिक उसकी वीभत्सता में चार अमावस्या लगा रहीथी।

वह पुनः सजने के लिए वापस पलटा मगर पुनः ठिठकाऔर गर्दन मोड़ते हुए डॉली से बोला–“अभी यह बात किसीको बताना मत –न मम्मी को और न किसी और को वरनामुझसे बुरा कोई नहीं होगा–।”

उसके स्वर में साफ गुर्राहट सुनी जा सकती थी।

डॉली अपने काम में व्यस्त रही, जैसे उसने सुना हीनहीं।

राज सजने-संवरने की जल्दबाजी में चला गया।

☐☐☐
 
आधे घण्टे बाद दोनों डायनिंग टेबल पर जमा थे। चूंकि वहपति-पत्नी थे मगर कोई देखे तो यह कहे कि दो महिलायें बैठी हैं ।

राज ने इस तरह मेकअप कर रखा था कि देखने वाला धोखा ही खा जाए। वह एक सुंदर स्त्री नजर आ रहा था। सिरपर लम्बे बालों की विग लगा रखी थी। सिलेक्स और कुर्तीपहनरखी थी। सीना खासा भरा हुआ था। हाथों में चूड़ियां पहनी थीं।

अलगरज मजहर रूप से वह सौ प्रतिशत महिला नजरआता था। गोल मुखड़े का तो था ही जो उसके महिला बनजाने में सहयोगात्मक था।

डॉली किंकर्तव्यविमूढ़ थी।

जैसे कुर्सी पर फ्रीज होकर बैठ गयी थी।

राज कौर तोड़ते हुए डॉली से बोला–“आज तू मुझे देखकर बहुत हैरान है मगर जितना सुकून मुझे आज मिल रहा है, कभी नहीं मिला–या तो चार दिन चांदनी के आज से आठसाल पहले मेरे तब आये थे जब मैंने सन्नी से शादी रचाईथी–उन दिनों हम बारहवीं में पढ़ते थे–मुझे लड़कियों में शुरूसे कोई दिलचस्पी नहीं थी। लोग जाने क्यों लडकियों को दीदेफाड़कर देखते हैं। मुझे तो कभी आकर्षण नहीं दिखाई दिया ।

लेकिन खूबसूरत लड़के जरूर मेरी सांसों का वेग बढ़ा देते थे–मेरे दोस्त मेरा इस्तेमाल तो दस वर्ष की उम्र से ही लगे थे। लेकिन वे सब दोस्त यूज एण्ड थ्रो वाले थे–मैं स्थायी साथी की तलाश में थी जो मुझे अपनी पार्टनर बना रखे, ऐसे वेश में रहूं, जैसे अब हूं, इसकी मुझे बड़ी तमन्ना थी–रात दिन मैं यही सपने बुनती थी कि लेडीज कपड़े पहनूं और कोई मुझे अपनी पत्नी बनाकर रखे मगर यह सम्भव नहींहो रहा था और मेरी हसरतें राख होती जा रही थीं लेकिन इंटर में मुझे एक साथी मिला–वाऊ! क्या पर्सनैलिटी थी! तू देखेगीतो रश्क करेगी–उसने मेरा यूज भी भरपूर किया और मेरीहसरतों को भी पूरा किया।” उसने विराम लिया।

बोतल से पानी गिलास में उंडेला और दो घूंट पीकर आगेबोला–“हम लोग आठ दिन के लिए आऊटिंग पर गये थे–मैंअपनी सिस्टर के कपड़े बैग में डालकर ले गया था, कुछ सामानखरीदा था। मेरी बड़ी हसरत थी कि मैं सन्नी के साथ विधिवतशादी रचाऊँ –सन्नी केअंदर पॉजिटिव बात यह है कि जैसा मैंकहूं, वो मान जाता है, अपनी हठ नहीं दिखाता।”

राज तो रसास्वादन के साथ अपनी बायोग्राफी सुना रहा था और डॉली किसी पत्थर की शिला में तब्दील बैठी थी।एक-एक शब्द उसके कानों में कोड़े की फटकार की मानिंद पड़ रहा था।

उसका अस्तित्व बिखरता जा रहा था।

वह फूटफूटकर रो लेना चाहती थी मगर रो भी नहीं सकतीथी। राज काफी निर्दयी स्वभाव का था, एकदम आंखें लाल-पीलीकर लेता था। जैसे खा ही जाएगा।

उसे सिर्फ यह अश्रुत गाथा सुनानी थी और वह सुनती जारही थी।

राज आज पूरी तरह नारी के कवच में समा चुका था,उसने पैरहन ही नहीं लिया था बल्कि हाव-भाव भी पूरी तरहमैच करने के प्रयत्नमें था। उसकी एक्टिविटीज उस हाव-भावकी काफी करीबी रही थीं।

वह आगे बोला–“मैंने और सन्नी ने वहां विधिवत् शादीरचाई, मैं सजी-संवरी–सच में बहुत मजा आया–मेरा पोर-पोरतृप्त हो गया –इतना खुश मैं कभी नहीं रही थीं–दिल में तरंगेउठ रही थीं, जी चाह रहा था उम्र भर ऐसे ही मेकअप में रहूं,मगर भगवान ने मेरा नसीब इतना अच्छा नहीं बनाया है, बसवह आठ दिन की चांदनी थी–मैंने भरपूर जिया–बाहर घूमनेभी हम हाथों-में-हाथ डालकर जाते थे–वह मुझे शौक से सौन्दर्य प्रसाधन खरीदवाता था, मुझे बहुत अच्छा लगता था मगर मेरेनसीब में पत्थर लिखे थे, वह इंटर के बाद मुझसे बिछुड़गया–दूसरे शहर चला गया पढ़ने के लिए–फिर कभी नहींमिला–उससे कभी सम्पर्क भी नहीं हुआ–उसकी याद में मैं तड़प-तड़पकर जीती रही–दूसरा सन्नी ढूंढना चाहा मगर नहींमिला, बगैर मर्द के मैं नहीं जी सकती, यह दुनिया बहुत बुरीहै–यहाँ कोई किसीकी भावनाओं की कद्र नहीं करता–कोईकिसी को नहीं समझना चाहता–सब खुद में गुम हैं–मुझे दूसरासन्नी नहीं मिला–यूज करने वाले बहुत मिले–शरीर की भूखतो मिटायी मगर मन की भूख को किसी ने नहीं जाना–।” उसने पीड़ा भरी गहरी सांस छोड़ी।

एक प्लेट में चावल लिये और उस पर दाल डालकरनिवाला बनाते हुए बोला–“कुछ रोज पहले अचानक मेरा सन्नीमुझे फेसबुक पर मिल गया–मैंने मैसेन्जर में उसे जुदाई केबदले मिले दर्द की पीड़ा सुनाई, मैं रोई, उससे वापस आ जानेकी गुहार लगाई–वह निष्ठुर तो मेरी क्या ही सुनता मगरभगवान ने मेरी सुन ली–उसका ट्रांसफर इसी शहर में हो गयाहै। जब उसने मुझे यह खुशखबरी सुनाई तो मेरी चारों दिशायेंरंगीन हो गयीं–मैंने उसे अपने घर में रहने का ऑफर दे दिया,उसने खुशी-खुशी कबूल कर लिया और मुझे मेरी खुशनुमाजिंदगी बख्श दी–वह कल आ जाएगा, फिर मैं जिंदगी केहसीन नगमें गाऊंगी–मैं ऐसे ही जीना चाहती हूँ डॉली–मुझेयह कपड़े, ये जिंदगी बहुत रास आती है–मुझे भगवान ने मर्दनहीं बल्कि औरत की आत्मा दी है–मुझे हाथों में चूड़ियांपसंद है, होंठों पर लिपस्टिक पसंद है, ब्रा पसंद है–मुझे उम्मीद है,तुम मेरी भावनाओं को समझोगी और कद्र करोगी–तुमको कद्रकरना होगी।”

चार निवाले बाद ही डॉली का खाना छूट चुका था। वहबस बुत बने बैठी थी।

डॉली बोली–“जब तुम्हें यह सब पसंद है तो तुमने शादीक्यों की?”

“यह सारी गलती मेरे पेरेंट्स की है।” वह सिकिम सैरहोकर खा रहा था–“मैंने बहुत मना किया था मगर वे नहींमाने–।”

“तुम कहते कि मुझे पत्नी की नहीं बल्कि पति की जरूरतहै–तुमने छिपाकर क्यों रखा? कम-से-कम शादी से पहले मुझेबताते–।”

“मैं क्या करता–आनन-फानन सबकुछ कर दिया गया–मैंनेघर में कई बार कहा था कि मैं शादी नहीं करना चाहता मगरमेरी बात नहीं सुनी गयी–कोई नहीं, शादी भी हो गयी तो क्याफर्क पड़ गया–मुझे मेरा सन्नी मिल चुका है, मैं खुश रहूंगी।”

“और मैं...?”

“तुम? तुम्हारा क्या? तुम्हें क्या परेशानी है?”

डॉली ने आंखें बंद करके ठण्डी आह खींची औरबोली–“तुम्हारा मतलब है मुझे कोई समस्या नहीं है, मेरा पति ब्रा और लिपस्टिक लगाये बैठा है तो मुझे कोई समस्या ही नहींहै–जब मेरा पति एक पत्नी बन चुका है तो मेरे लिए पति कहांसे आएगा–?”

“देख तू ज्यादा रंग मत दिखा।” वह घूरकर बोला–“मेरीआदत को अभी जानती नहीं है, तेरा टेंटुवा दबाकर तेरा मर्डरकर दूंगा और सुन, सन्नी बहुत खूबसूरत है, छैल छबीला है,लंबा-चौड़ा है, उसे देखकर नीयत खराब मत करना वरना मुझसेबुरा कोई नहीं होगा–वह सिर्फ मेरा है, उस पर मेरा हक है।”

डॉली की आंखों से आंसू झरने लगे।

लम्बी धारायें गालों पर लुढ़कने लगीं।

“अब तूने अपशगुन शुरू कर दिया–हरामजादी–।” वहउठकर खड़ा हो गया और कुर्सी छोड़कर आंखें निकालता हुआडॉली के पास आया और दोनों हाथों से उसका गला पकड़लिया और कृत्रिम दबाते हुए बोला–“तुझे जान से मार दूंगाअगर रणचन्डी बनी तो –अभी तू मुझे जानती नहीं है–मैंजितना अच्छा हूँ, उतना खतरनाक भी हूँ –बता दे रहा हूँ ।” उसने कृत्रिम रूप से गर्दन दबाकर छोड़ी।

डॉली फफकते हुए रोने लगी और कुर्सी छोड़कर बिस्तरकी तरफ चली गयी।

उसी वक्त डायनिंग टेबल पर रखा, उसका मोबाइल बजा था।

राज ने स्क्रीन देखी। ‘मम्मी’नाम डिस्प्ले हो रहा था।

☐☐☐

राज ने चूड़ियों वाले हाथ से फोन उठा लिया और रिसीवकिया–“नमस्ते मम्मी–।”

“नमस्ते बेटा, कैसे हो–?”

“बहुत अच्छा हूँ मम्मी। आप कैसी हो?”

“मैं तो आज बहुत खुश हूँ –नानी के लिए तो इससे बड़ीकोई खुशखबरी होती ही नहीं है–जब से डॉली ने मुझेबताया है, मेरे तो पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं–।”

“क्या बताया डॉली ने?”राज की आंखें गोल होगयीं।

“क्या तुम्हें नहीं बताया अभी तक?”

“मुझे तो कुछ नहीं बताया।”

“देख तो–कैसी है–हा-हा-हा-हा, दरअसल सीधी बहुत है,शर्मीली है–इतनी बड़ी हो गयी मगर अभी तक इसकी शर्मनहीं गयी है–हा-हा-हा-हा।”

“बात क्या है मम्मी?”

“अरे बेटा, तुम बाप बनने वाले हो।”

“ओह!” बहुत देर से रुकी सांस उसने खारिज की।

शन्नो कुमारी फोन पर कह रही थी–“अब बताओ इतनीबड़ी खुशखबरी कोई भी पति अपनी पत्नी के मुंह से सुननाचाहता है और बताना भी पत्नी को ही चाहिए–मैंने कहा भी था मगर कहने लगी कि मम्मी मुझे शर्म लग रही है–ले बता, यह भी कोई शर्म की बात है–हा हा हा हा, इसमें शर्म की क्याबात है, यह तो खुशी की बात है–मगर अभी उसका बचपना नहीं छूटा है। बहुत सीधी है–एकदम नाक की सीध में चलनेवाली–जब से यह ब्याहकर गयी है–मुहल्ले में यही जिक्र है किडॉली बहुत सीधी, सरल है। पता नहींससुराल में कैसेनिबाह कर पाएगी–मैं मुहल्ले वालों से कहती हूँ कि जितनी वहसरल है, उतने ही उसकी ससुराल वाले भी सरल हैं –राज कररही है ससुराल में और मेरा दामाद तो कोहिनूर है कोहिनूर–पलकोंपर बैठाकर रखता है–।”

“कब पता चला आपको इस बात का?”

“दोपहर को उसका फोन आया था, उसे उल्टियां आ रहीथीं, मैं तो समझ गयी, उसे मैंने सलाह भी दी कि उसे क्याखाना चाहिए, कैसे रहना-सोना चाहिए–बेटा एक बार कल कोडॉक्टर के पास चले जाना–जरूरी होता है ऐसे में, कुछविटामिन और आयरन की गोलियां ली जाती हैं, अल्ट्रासाउण्डभी जरूरी है ताकि बच्चे की पोजिशन पता चले और अब बेटाउसका खास ख्याल रखना, वैसे तो तुम ख्याल रखते ही हो–।”

“ठीक है मम्मी, और ज्यादा ख्याल रखूंगा ।”

“कल एक बार डॉक्टर के पास जरूर चले जाना–खाने-पीनेमें अब बड़ी सावधानी बरतनी पड़ेगी।”

“ओके मम्मी।”

“चलो बेटा, अब मैं सुबह बात करूंगी।”

“ओके–बाय मम्मी।”

“बाय बेटा।”

कॉल ऑफ हो गयी।

राज बड़बड़ाया–“बाय बेटी बोल, बाय बहू बोल–कितनासुकून मिलता है मुझे ऐसे शब्दों से।”

उसने मोबाइल रखा और वाशबेसन पर हाथ धोये तथाबेडरूम की तरफ बढ़ गया।

डॉली तकिये में मुंह दबाये फफक रही थी।

राज ने उसका पैर पकड़कर झंझोड़ा–“यह बर्तन क्या तेरी मां धोएगी आकर–उठ–।” वह बुरी तरह डपटते हुएबोला।

वह फौरन से पेश्तर उठकर बैठ गयी।

उसकी आंखें लाल हो रही थीं।

वह कमरे से बाहर की तरफ चली।

राज ने उसका दामन पकड़कर थाम लिया औरबोला–“किसका पाप लिये घूम रही है पेट में?”

“हाय राम!” उसका हाथ मुंह पर आ गया। कलेजा उछलपड़ा। असहाय दृष्टि से राज को देखने लगी।

“बता किसका पाप है यह ?”

“पागल हो गये हो क्या, कैसी बातें कर रहे हो ?”

“मैं बाप कैसे बन सकता हूँ –मेरे अंदर तो हार्मोन्स मां वाले हैं –।”

“भगवान के लिए चुप हो जाओ वरना मैं फांसी लगाकरजान दे दूंगी।”

धमकी का गहरा असर हुआ राज पर। उसने दामन छोड़दिया और हंसते हुए बोला–“मैं तो मजाक कर रहा थायार–तूने यह खुशखबरी मुझे नहीं सुनाई–?”

“बस चुप हो जाओ।” कहकर वह बाहर निकल गयी।

राज बेड पर गिर पड़ा। लेटता हुआ बड़बड़ाया–“आजआखिरी रात है जुदाई की, कल से मेरा साजन होगा और मैंहोऊंगी। तीसरा कोई नहीं।”

उसने शीत्कारा लिया।

☐☐☐
 
राज को शायद खुशी की बेचैनी थी, यही कारण था किवह बहुत देर तक किसी एक स्थान पर नहीं ठहर पा रहा था।

कभी बिस्तर पर अधलेटा रहता था, कभी उठकर ड्रेसिंगटेबल के समक्ष खड़ा हो जाता और खुद को निहारने लगता था।

कभी मिरर में देखते-देखते हंसने लगता था और हंसते हुएका अपना मुखड़ा देखने लगता था। कभी कृत्रिम लंबे बालों कीएक लट अपने चेहरे पर गिरा लेता और उसे फूंक मारकरघमण्डी लड़की का अभिनय करने लगता था।

कभी ब्रा मुक्त सीने को फुलाकर देखने लगता था।

अजब मानसिक पसोपेश में था।

वहां से हटकर जाता था तो लिविंग हाल में बैठकर मोबाइलचलाने लगता था।

डॉली अपना काम कर रही थी। बर्तन धो रही थी,समेटा-समाटी कर रही थी।

वह फारिग होकर अपने बिस्तर पर औंधी हो गयी। उसनेकमरे की लाइट बंद कर ली थी।

जैसे डॉली को सुकून से देखना ही राज को गवारा नहींथा। उसे लेटा जानकर उसने मोबाइल चलाना छोड़ा और कमरेमें घुस गया।

लाइट ऑन कर दी।

डॉली आंखें बंद किये पड़ी रही।

राज खन-खन करता उसके बराबर में लेट गया। अपनीहथेली डॉली के गाल पर रखी और बोला–“मुझे लगता है,हम लोगों के बीच कन्फ्यूजन पैदा हो गया है–हम एक-दूसरेको समझ नहीं पा रहे हैं, हमें अपने बीच की गलतफहमियां दूरकरनी चाहिए।”

वह कुछ नहीं बोली, बस सपाट चेहरा लिए, आंखें बंद कियेलेटी रही–गुमसुम।

राज आगे बोला–“अच्छा बताओ, तुम इस बारे में क्यासोचती हो, सन्नी यहां रहेगा, तुम्हें कोई प्रॉब्लम?”

वह कुछ नहीं बोलना चाहती थी। सिर्फ चुप रहना चाहतीथी। वह आंखें खोलकर राज की सूरत ही देखना नहीं चाहतीथी लेकिन राज जबर्दस्ती उसे बोलवाने पर तुला था।

उसे अब भी चुप देखकर राज की त्यौरियां चढ़ीं लेकिनउसने अपना गुस्सा कंट्रोल किया। उसका वहशी दिल तो चाहरहा था कि वह गुस्से में आकर इतनी जोर से डॉली के कहींनोच ले कि वह उठकर बैठ जाये और चीख पड़े ।

मगर उसने अपने गुस्से को कंट्रोल किया। अभी-अभी मरनेकी धमकी दे चुकी है और सचमुच अगर उसने ऐसा कदम उठालिया तो गजब हो जाएगा।

लेने के देने पड़ जाएंगे।

यही सोचते हुए राज का गुस्सा अपने आप ठण्डा होजाता था।

वह पुनः उसके गाल को सहलाते हुए बड़े मीठे स्वर मेंबोला–“देखो, डॉली, मैं तुम्हें बिल्कुल दुःखी नहीं देखनाचाहता–तुम मेरी पत्नी बनकर आई हो तो तुम्हें खुश रहने कापूरा अधिकार है–मेरा पहला कर्त्तव्य है कि तुम्हें अधिक-से-अधिकखुश रख सकूँ लेकिन यह तभी सम्भव है, जब हम दोनोंएक-दूसरे को समझें–मैं तुम्हारी कद्र तभी कर सकता हूँ, जबतुम मेरी कद्र करो–देखो, एक हाथ से कभी ताली नहीं बजतीहै–तुम शॉक्ड हो मेरी इस अवस्था को देखकर–अब तुम्हीं बताओ,इसमें मेरा क्या दोष है–बताओ–अच्छा, क्या कोईदोष है इसमें मेरा–?”

डॉली ने आंखें खोलकर बेबस नजरों से राज को देखा और बोली–“तुम यह सब क्यों कर रहे हो? किसी को पताचलेगा, कोई क्या कहेगा–?”

“मुझे परवाह नहीं है चाहे दुनिया को पता चल जाए–वहीबात मैं तुम्हें समझा रहा हूँ कि हम सबको भगवान ने बनायाहै, यहां कोई अपने हाथ से नहीं बना–तुम्हें लड़की बनाया हैतो भगवान ने ही बनाया है न–तुम कोई खुद थोड़े ही बनगयी–उसी तरह मुझे भगवान ने दिखावटी तौर पर तो लड़काबना दिया लेकिन मेरे अंदर एक लड़की परवरिश पा रही है जोएक मर्द का सान्निध्य पाना चाहती है, तो बताओ अब इसमेंमैं क्या करूं–?”

“तो फिर मुझसे शादी क्यों की–तुम्हें शादी ही नहीं करनीचाहिए थी।”

“बस यही तो गलती हो गयी–मुझे यह पता नहीं था कितुम इतना रूठ जाओगी–मैं तो समझ रहा था कि हम लोगएडजस्ट कर लेंगे–आखिर इसमें कोई बुराई भी नहीं है–इसघर में दो कमरे हैं, कभी मैं सन्नी के साथ सोया करूंगा तोकभी तुम्हारे साथ–बस एडजस्ट करने वाली बात है–एडजस्टन करो तो बात का बतंगड़ बना दो, नहीं तो बहुत बड़ी बातभी कोई बात नहीं होती–क्या तुम मुझे खुशदेखना नहींचाहती हो?”

डॉली चुप रही, उसने पुनः आंखें बंद कर ली थीं।

राज फिर बोला–“मैं तो तुम्हें बहुत खुश देखना चाहता हूँ । तुम्हारी खुशी के लिए कुछ भी कर सकता हूँ, मगर तुम्हें भीमेरी खुशी में खुश होना चाहिए।”

डॉली चुप रही।

“और तुमने इतनी बड़ी खुशखबरी मुझे सुनाई भी नहीं, वोतो मम्मी ने बताया।”

डॉली बोली–“तुम मुझे खश देखना चाहते हो तो यहसबकुछ छोड़ दो।”

“यह सम्भव नहीं है।” वह दो टूक बोला–“मैं दुनिया छोड़सकता हूँ मगर यह सबकुछ नहीं छोड़ सकता–फिर वही बातआ गयी जो मैं समझा रहा था, अरे भई हम दोनों को एक-दूसरेको समझना पड़ेगा–तुम इस बात को क्यों नहीं समझतीं –जबतक तुम मुझे समझोगीनहीं तो मुझसे अच्छे व्यवहार की उम्मीदकैसे कर लोगी–जब मेरे हार्मोन्स चेंज हैं, मेरा मानसिक स्तरही अलग है तो तुम इस सबको कैसे इग्नोर कर सकती हो–?”

डॉली फिर से खामोश रह गयी।

“मैं वही समझा रहा हूँ कि पति-पत्नी एक गाड़ी के दोपहिए होते हैं, दोनों को एक-दूसरे का ख्याल रखना होता हैक्योंकि दोनों एक ही धुरी पर होते हैं। मैं तुम्हें हर खुशी दूंगा,तुम्हारी हर बात मानूंगा लेकिन तुम्हें भी मेरी बातें माननापड़ेंगी।”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी और दूसरी तरफ को करवट लेली।

“शायद मेरी लाडोको नींद आ रही है।” वह पालथी मारकर उसके सिरहाने बैठ गया और उसका सिर दबाने लगा। वह मिश्री घुलित स्वर में कह रहा था–“मैं अपनी लाडो सेबहुत प्यार करता हूँ –बहुत खुश रखना चाहता हूँ अपनी लाडोको–तुम सो जाओ, मैं सिर दबाता रहूँगा ।”

वह सिर और हाथ दबाता रहा लेकिन घूरकर देख रहा था।

☐☐☐
 
रात से ही भूचाल उठ रहे थे डॉली के अंतस में।

रात के पहले पहर तो वह जैसे-तैसे सो गयी थी लेकिनतीसरे पहर उसकी जब आंख खुली तो फिर उसे नींद नहींआई।

रह-रहकर आंखों में आंसू आ रहे थे।

उसे आज ऋषभ बहुत याद आ रहा था। तेरा दिल कोईजब भी दुखाएगा, याद तुझको यह मेरा प्यार आएगा।

वह तो ऋषभ के बिना जीने की कल्पना भी नहीं करसकती थी। उसे नहीं याद पड़ता था कि जितनी वह प्रेमदीवानी रही थी, उसका उदाहरण कहीं दुनिया में मिल भीसकता हो।

मगर ऋषभ हरजाई निकला। उसने कोशिश ही नहीं की।उधर डॉली की मम्मी शन्नो कुमारी भी अड़ियल रुख कीमहिला साबित हुई।

जो कह दिया पत्थर की लकीर हो गयी। दुनिया इधर-से-उधरहो जाए मगर कौल नहीं बदल सकता।

अंततः विवशतावश डॉली ने खुद को किस्मत के हवालेकर दिया था लेकिन किस्मत इतना भयावह रुख इख्तियार करलेगी, इसकी तो सहज कल्पना भी नामुमकिन थी।

रात के तीसरे पहर जब उसकी आंख खुली तो फिर उसेनींद नहीं आई। वह रोती रही। तकिया भिगोती रही।

राज उसी के बराबर में लेटा था। बेसुध सो रहा था।अपना मनपसंद परिधान पहने जो डॉली को हलकान किये देरहा था।

उसे देख देखकर डॉली को रोना आ रहा था। जीवन नेकिस दोराहे पर ला खड़ा किया था। उसने कौन-सी ऐसीगलती, कौन-सा ऐसा गुनाह किया था जो प्रकृति ने इतनीभयानक सजा दी थी।

प्रकृति को उस पर जरा भी तरस नहीं आया। वह तोपरिस्थितियों के आगे खुद को पेश करती चली गयी थी, जीवनधारा में अपनी नाव को मुक्त छोड़ दिया था। कहाँ उसनेजीवन में हठ दिखाई थी? तो क्या उसका यह ईनाम मिला?एक पति भी मिला तो वह चूड़ियां पहनने वाला।

उसे सबसे ज्यादा गुस्सा अपनी मम्मी पर आ रहा था। उसीने उसका जीवन नर्क बनाया था, दूसरा कोई उत्तरदायी नहींथा। इतना अड़ियल रुख! तौबा-तौबा। घर में तूफान बरपा करदिया था उसकी मम्मी ने। शादी होगी तो बस उसी के साथजिसको शन्नो कुमारी पसंद करेगी वरना नहीं।

और अंततः शन्नो कुमारी की जीत हुई।

डॉली के अरमान कड़कती बिजलियों की नज्र हो गये।

बस बेबस नजरों से बेसुध सो रहे राज को देख रही थी।आखिर इस मति के मारे आदमी को कैसे समझाया जाए? कैसेइसकी बुद्धि को ठिकाने पर लाया जाये?

आखिर किस बात का अभाव है इसे? यह सब करने कीक्या जरूरत है?

एक पति के तौर पर तो यह पहले दिन से फेल्यर साबितहुआ है लेकिन तब भी डॉली निबाह करती चली जा रही थीऔर अंततः निबाह करती चली जाती। सारे जुल्म बर्दाश्त थे,लेकिन इस रूप को कैसे स्वीकार करे?

एक पति के तौर पर उस जालिम प्रवृत्ति के व्यक्ति ने डॉली को अंततः क्षुब्ध ही किया था। पहले रोज से जोशोषण शुरू किया था तो वो आज तक अनवरत जारी था मगर डॉली ने इसको अपनी नियति मान लिया था।

अपनी नहीं बल्कि एक औरत की नियति मान लिया था।औरत की किस्मत इन्हीं काली रेखाओं से अंकित होती है। यह सब बर्दाश्त करते हुए ही जीवन पथ पर आगे बढ़ना होता है।

वो सब तो स्वीकार्य था क्योंकि एक स्त्री के भाग्य में वोसब सौगातवश प्राप्त होता है जैसे फल के अंदर गुठली याबीज।

मगर पति के इस रूप पर कैसे धैर्य किया जाए जो राजने बना रखा था।

आज जैसे सबकुछ उसका लुट चुका था। अब कुछ भी शेषनहीं था। अब जीने का कोई बहाना नहीं मिल रहा था।

☐☐☐
 
सुबह साढ़े नौ तक राज अपनी ड्यूटी के लिए निकलजाता था, आज भी निकल गया।

उसके जाते ही डॉली सोफे पर निढाल हो गयी।

कोई काम करने को मन नहीं हो रहा था। शरीर इतनीथकान बता रहा था कि मानो उसने कितनी हाड़तोड़ मेहनतकर रखी हो ।

दिल में एक अजीब सी दहशत व्याप्त थी। चेहरा निचुड़ाजा रहा था।

अपनी कोई भी सुधबुध शेष नहीं थी।

उसकी सारी रचनात्मकता और कलात्मकता राख हो गयीथी।

सच तो यह था कि मन में जीने की इच्छा समाप्त हो चुकीथी। उसके कनेक्शन में कुछ भी ऐसा नहीं था जिसकी खातिरजीवन के दिन गुजारे जायें।

जीने के लिए कहीं-न-कहीं आधार की जरूरत होती है।कोई बेस चाहिए होता है जिस पर जीवन का तंबू स्थिर रहसके। आज डॉली के पास कोई बेस नहीं था। कोई आशानहीं थी।

तदुपरान्त भी जीवन को नष्ट करना बड़ा दुरूह कार्य है। लाख मरने के ख्याल उत्पन्न होने के उपरान्त भी जान देने केनाम से जान निकलती है।

मरते नहीं बनता।

जीवन को जीने की उत्कंठा व्यक्ति में इतनी बलवती पाईजाती है कि मरने का उपक्रम छक्के छुड़ा देता है और व्यक्तिअंततः जीवन का ही रास्ता चुनने को विवश रहता है। भले हीवो रास्ता कितना कंटीला हो, कितना दुश्वार हो।

डॉली सोफे पर गिर पड़ी थी। अब तो आंसू भी सूख चुकेथे। रोते नहीं बन रहा था। आंसू पोंछते-पोंछते हाथ थक गयेथे।

किसे अपनी व्यथा सुनाये? कौन चारागर है यहां जो इलाजकर सके? मम्मी को? उस निष्ठुर औरत को क्या सुनाया जाए?वह तो जैसे बोलने के अलावा कुछ जानती ही नहीं। इस भ्रांतिकी शिकार है वह कि उसकी जुबान से निकले चंद शब्द जैसेहर समस्या को समाप्त करने के लिए काफी हैं।

आज तक वह शब्दों का ही इस्तेमाल करती आई है। उसेइसका भान ही नहीं है कि उसके शब्दों ने डॉली की समस्याको गुणात्मकता प्रदान की है। जीवनपथ को स्याह किया है।

दूसराफिर कौन है जो उसकी व्यथा को सुन और समझसके ?

ऋषभ?

वह भी हरजाई निकला।

जमाने के रंग वाला।

बड़े-बड़े दम भरता था। कौल भरने पर आता था तो जैसेसारी कायनात को अपनी मुट्ठी में जकड़ लेने की कला में माहिर हो, मगर जब अमल का दौर आया तो भगौड़ा साबित हुआ।

दूर-दूर तक भी नजर नहीं आया।

वह अगर साबित कदम रह पाता तो जीवन की धारा अलगबह रही होती मगर उसने जीवनपथ की तदबीर बनाना गवारानहीं किया।

शादी के बाद से भी तो उसने एक बार भी फोन नहींकिया। तीन महीने हो गये शादी को। हालांकि शुरू के दोमहीने तक उसने फोन नहीं किया, ये अच्छा ही किया। वहअगर कर भी लेता तो डॉली रिसीव करने नहीं बैठी थी।

बहुत नाराज थी उससे। जैसे कोई फिलस्तीनी इजरायली सेहोता है। उसका फोन देखते ही सुलग जाती।

मगर सुलग कैसे जाती, हो सकता है धोखे से रिसीव कर हीलेती। क्योंकि उसने तो उसके नम्बर ही डिलीट मार रखे थेइसलिए अननोन नम्बर देखकर हो सकता है गच्चा खा जाती।

मगर तब भी गच्चा नहीं खाती। उसके नम्बर कहां भूली है वह अभी तक। दिल के जाने कौन-से कोने में सेव हो गये हैंकि डिलीट के सारे फंक्शन ही नकारा साबित हुए हैं।

दो महीने पश्चात् जरूर डॉली के ख्यालों में चेंजिंग आईथी। अब इतना गुस्सा नहीं रह गया था। फिर तो शायद बातकर लेती और ऋषभ से उसके हालचाल भी पूछ लेती मगर तबभी वह यही सोचती थी कि अच्छा ही है जो वह फोन नहींकरता। अच्छा ही है जो वह अपनी दुनिया में मस्त है। अच्छाही है जो वह खुश है।

भगवान उसे खुश रखे।

मगर डॉली को आज वह बहुत याद आ रहा था। बल्किडॉली को खुद से जुड़ा एक-एक शख्स बहुत याद आ रहाथा। जैसे व्यक्ति को अपने अंतिम समय में खुद से जुड़ा हरव्यक्ति शिद्दत के साथ याद आता है।

दिल पर अजब बरबादी का माहौल अयां था।

उसने फोन उठाया।

और कहीं रिंग छोड़ दी।

☐☐☐
 
दूसरी तरफ से रिसीव किये जाते ही कहा गया–“हैलो, मेरीजान, कैसी है?”

“मैं तो ठीक हूँ, तू सुना।”

“ठीक क्या है, मजे मार रही है, यह क्यों नहीं बोलती–हायवो कौन सा दिन होगा, जब हमें भी साजन की बांहें मिलेंगी।”

“वो दिन न आये तो अच्छा है।”

“हाय, ऐसी बद्दुआ क्यों दे रही है मुझे–खुद चांदी काटरही है और हमसे ऐसी दुश्मनी।”

“बस दर के ढोल सुहाने हैं ऋचा–जितने दिन मां-बाप केघरगुजार लो वही दिन सुकून के होते हैं–ससुराल तो कांटों की सेज है।”

“ये कांटे भी भोगकर देखेंगे, इन कांटों के बगैर तो जियानहीं जाता और सुना जीजू के कैसे हाल हैं।”

“वह जीजू नहीं, जीजी है।”

“मतलब?”

डॉली न चाहते हुए भी बात बनाने को हंस दी, तुरंत ही आगेबोली–“ऐसे ही मजाक कर रही थी, बहुत अच्छे हैं मगर अभी तूउनका जिक्र मत कर –ससुराल की कांटों की चुभन मिटाने को तोतुझे फोन किया और तू उन्हीं का जिक्र छेड़ने लगी।”

“फिर किसका जिक्र छेडूं ?”

“अपनी बता, क्या चल रहा है आजकल ?”

“आज तो कुछ नहीं चल रहा है मगर कल जरूर ऋषभमिला था।”

“ऋषभ– ?”

“हां–।”

डॉली एकाएक चुप्पी साध गयी। न जाने क्यों उसकेदिल का माहौल अचानक बदल गया था।

होंठों पर खुश्की सी उतरी।

ऋषभ के नाम में ही पता नहीं क्या कमाल था।

उसके चुप रहते ऋचा बोल रही थी–“बहुत देर तक बातकरता रहा, बड़ा उदास था–।”

“क्या कह रहा था?”

“तेरे बारे में पूछ रहा था कि डॉली कैसी है, जितनी देररहा तेरी ही बातें करता रहा।”

“क्यों, उसके फोन में रीचार्ज नहीं है या बैटरी नहीं है?”

“मैंने पूछा था कि तूने कभी बात नहीं की तो बोला अबयह सही नहीं है, मैं अपनी डॉली की जिंदगी में हलचल पैदानहीं करना चाहता–अब इसका कोई फायदा नहीं है, जैसे भीहो डॉली खुश रहे–।”

डॉली ने धिक्कार वाली सांस छोड़ी।

और बोली–“वह क्या बात करेगा, किस मुंह से बातकरेगा, वह बात करने के लायक है ही नहीं, उसने सिर्फ मुझेआंसू दिये हैं।”

“अब क्यों नाटक कर रही है?”ऋचा बोली–“पति कीबांहों में मजे मार रही है और आंसूओं की बात कर रहीहै–हाय क्या जबरदस्त नसीब है तेरा।”

“भगवान करे तेरा नसीब मेरी तरह न हो।”

“मतलब तू मुझे खुश देखना नहीं चाहती?”

एक क्षण ठहरकर डॉली बोली–“और क्या कह रहा थावो?”

“बस–अपने दिल के छाले दिखा रहा था, जितनी देर रहा,तेरी ही बातें करता रहा।”

“और उसके जीवन में एक खुशी भी आई है।”

“क्या?”

“किसी बैंक में उसकी नौकरी लग गयी है, अभी ज्वॉयनिंगनहीं की है लेकिन बता रहा था कि दो-चार रोज में ज्वाइनिंग है ।”

“चलो, अच्छी बात है –और क्या कह रहा था?”

“बोला डॉली से तो बात होती होगी, मैंने कहा कि हांदो-चार दिन के गैप पर होती रहती है। यही पूछ रहा था किखुश तो है वो–।”

“तो क्या सीधे नहीं पूछ सकता है?”

“इसीलिए फोन नहीं करता है कि कहीं पुरानी ज्वाला नजाग उठे।”

“उसकी ज्वाला तो पहले ही ठण्डी थी–उसने क्या कोशिशकी? कोई भी तो नहीं। अपने मां-बाप के सामने तो भीगीबिल्ली बना रहता है–क्या बात करूं उसकी, सिर में दर्द होता है ।”

“अब बात करने से क्या फायदा है–यह तुझे एकाएकउसका बुखार क्यों चढ़ गया? पहले तो कभी इतना कुरेदकरबात नहीं करतीथी।”

“आज मुझे सुबह से उस पर और मम्मी, दोनों पर बहुतगुस्सा आ रहा है–इन दोनों ने मेरी जिंदगी बरबाद की है।”

“कैसी बातें कर रही है मेरी जान, इतना चॉकलेटी चेहरेवाला मेरा जीजू है और तू कहती है कि तेरी जिंदगी बरबाद होगयी...या मुझे बहला रही है?”

डॉली ने एक लम्बी सांस खींची और बोली–“अरे क्याबताऊं तुझे यार, कुछ समझ में नहीं आ रहा, अच्छा एक बातबता, किसी दिन अचानक तुझे मेरे मरने की खबर मिल जायेतो तुझे कैसा लगेगा?”

“कैसी बातें कर रही है? पागल हो गयी है क्या?”

“अरे यार, एक दिन तो मरना ही है–मरने की बात तो तबनहीं की जाती, जब मरना ही नहीं होता–जब एक दिन मरनाही है तो क्यों घुट-घुटकर जिया जाये–क्यों न अच्छा हो किपहले ही मर लिया जाये?”

“तुझे हो क्या गया है–जब से बात कर रही है अजीब-अजीबबातें कर रही है –आज तुझे हुआ क्या है?”

“अच्छा एक बात बता, अगर मरा जाये तो कौन-साविकल्प सबसे बेहतरीन है?”

“भाई मैं तो कभी मरी नहीं हूँ, मैंने तो कोई विकल्प प्रयोगकरके देखा नहीं है।”

डॉली की सहसा हंसी छूटी–“तो क्या तू मुझे मरने केबाद बताएगी कि कैसे मरना आसान है।” कहने के बाद वहपुनः हंसी।

“और क्या, जिस रास्ते चले ही नहीं, उसका बखान कैसेकरें?”

“यार मरने के मेरे बड़े अरमान हैं, इस तमन्ना को कैसे पूरीकरूं?”

“तू पागल तो नहीं हो गयी है–यह सब तू सीरियसली कहरही है या फिर मुझे मूर्ख बना रही है?”

डॉली कृत्रिम हंसी, हंसी और बोली–“तुझे क्या लग रहाहै–।”

“देख, मैंने दो रोज पहले अखबार में एक मनोविज्ञान पररिपोर्ट पढ़ी है, उसमें साफ लिखा था कि अपने आसपास यदिकिसी व्यक्ति की हरकतें एब्नार्मल मालूम पड़ें तो उस व्यक्तिको इग्नोर न करें बल्कि उसे समझने की कोशिश करें, वो मूडडिसआर्डर का शिकार हो सकता है, उसके परिवार कोसंज्ञान दें और शीघ्रताशीघ्र उसे मनोचिकित्सक के पास लेकरजाएं।”

“क्या करेगा मनोचिकित्सक?”

“दिमाग का जो स्क्रू ढीला हो गया है उसे कस देगा।”

“सब बकवास है–समस्या कहीं और है समाधान कहींऔर–।”

“तुझे क्या समस्या है भाई?”

“अब है तो है, तुझे क्या बताऊं, तू उसमें क्या करेगी?”

“कर तो बहुत कुछ सकती हूँ, तुझे समझा सकती हूँ, जीजूके कान मरोड़ सकती हूँ –वैसे मजाक से हटकर बता बात क्याहै–?”

“कोई भी बात नहीं है और अगर कोई बात होगी तो वहतुझे नोट में मिल जाएगी।”

“नोट...? कैसा नोट?”

डॉली धीमे से बोली–“सुसाइड नोट–।” कहकर हंसनेकी कोशिश के साथ हंसी।

“तुझे जरूर कोई-न-कोई समस्या है, मैं समझ गयी–लगताहै पुराने इश्क का भूत फिर सवार हो गया–ओह समझी–शादीको तीन महीने हो गये, जीजू से अब तक दिल भर गया, अबफिर से ऋषभ याद आने लगा–है न ऐसी बात?”

डॉली हंसते हुए बोली–“तूने सही पहचाना, यही बात है –।”

“तो इसमें क्या बुराई है, आखिर वह तेरा पुराना प्यारहै–अगर फिर से पींगे बढ़ा लेगी तो कौन-सा बुरा है–आखिरवह एक अच्छा दोस्त तो है ही–दोस्त से बात करना कोई गलत नहीं होता।”
 
“मगर वह सितमगर बात तो करे।”

“कर लेगा, तू उसकी चिंता मत कर। मगर एक बात बतायार–।”

“क्या?”

“तेरी तीन महीने की मेहनत कहां चली गयी?”

“नौ महीने बाद सामने आ जाएगी।”

“रीयली?”

“रीयली।”

“ओ मेरे लाले की जान–वो मारा छक्का–यह ब्रह्माण्ड कबरचा?”

“कल–।”

“देख तो कलमुंही, छिपाये पड़ी है, कब तक छिपाती, वहतो बाहर आकर दम लेता–।”

डॉली खिलखिलाकर हंस पड़ी।

“ठीक है बेटा, दिखा ले रंग तू भी, कोई दिन हमारे भीआएंगे।”

कुछ भी कहने से पहले डॉली की आह छूटी।

☐☐☐
 
आज डॉली के जीवन में वो घटना घटित होनी थी किफिर उसका जीवन एक दोराहे पर आ खड़ा होना था।

और यह हुआ रात के ठीक आठ बजे।

आज उसने फोन की घण्टी से दरवाजा नहीं खुलवाया थाबल्कि डोरबेल बजायी थी।

जैसे आज वह पूरी फुर्सत में हो।

डॉली ने दरवाजा खोला।

राज सामने खड़ा था और उसके पीछे खड़ा था एकहट्टा-कट्टा नौजवान।

राज से थोड़ा निकलता हुआ। छः फीट लंबाई रही होगीउसकी। चमकदार टी-शर्ट पहने था। काली टी शर्ट पर गोल्डनरंग की चमक थी।

चेहरे पर बढ़ी हुई शेव थी। एक हाथ में कड़ा पड़ा था।टांगों में जींस पहन रखी थी।

नाम था–सन्नी।

पीछे खड़े युवक को देखकर डॉली का दिल धक से रहगया। बरबादी की खबर उसे पिछली रात से हो गयी थी,तदुपरान्त कहीं-न-कहीं विश्वास था कि भगवान मामले कोसम्भाल लेगा और सबकुछ पटरी पर आ सकता है।

मगर ऐसा नहीं हुआ।

जो नहीं होना चाहिए था, वो हो गया।

दिल कहीं सदमाग्रस्त हुआ।

डॉली ने एक तरफ हटकर उन्हें भीतर आने का रास्ता दिया।

सन्नी बड़ी दिलचस्प नजरों से डॉली को देख रहा था।विशेषकर उसकी देह को। सुंदर भी तो बहुत थी डॉली।दैहिक तौर पर तो एक ही शब्द की भूमिका बांधी जा सकतीहै–लाजवाब।

सन्नी उसका नजारा करता रह गया था।

उसकी आंखों में विशेष चमक उभर आई थी। वह डॉली की देह से नजरें ही नहीं हटा पा रहा था। उसकी नजरों कीचुभन ने डॉली को परेशान कर दिया।

वे लोग लिविंग हाल में आये।

और जैसे इस मुलाकात में राज को पहली बार मौकामिला हो सन्नी से अंतरंग होने का। दरवाजा बंद होते ही औरलिविंग हाल में आते ही राज ने हेलमेट और बैग एक तरफरखा और सन्नी के सीने से चिपट गया।

और शिकवा करने लगा–“मुझे छोड़कर कहां चले गये थेतुम–?”

सन्नी मुस्कराते हुए राज के बाल और पीठ सहला रहा था।

और दृष्टि डॉली की आंखों में डालने की कोशिश कररहा था।

डॉली किंकर्तव्यविमूढ़ थी।

बड़ा असहज महसूस कर रही थी। उसका दिल चाह रहाथा कि फर्श फटे और वह ग्राउण्ड फ्लोर पर गिर जाये।

इस नाटक को वह देख रही थी। असहनीय रूप से।

राज अपने जुदाई के दर्द को विलाप करते हुए बयां कररहा था–“एक पल को सुकून नहीं मिला है मुझे जब से तुमगये हो। जिंदालाश बने घूम रही हूँ –एक बार तो पलटकरदेखते, अब भी तुम्हारा इस शहर में ट्रांसफर नहीं हुआ होता तोनहीं आते–।”

“जरूर आता, मैं भी तुमसे मिलने को छटपटा रहा था मंजूडार्लिंग, तुम्हें नहीं पता, मैं कितना परेशान था, मगर क्याकरता, वक्त के जाल में फंसा था।”

राज ने मुंह उठाकर सन्नी को देखा, उसे सन्नी द्वारा खुदको मंजू पुकारना बहुत पसंद था। राज बोला–“फिर से एकबार मुझे मंजू कहो, अपनी मंजू।”

“मेरी प्यारी मंजू।”

“अब एक बार संगीता कहो–मेरी संगीता–तुम्हें याद है कि मुझे अपने लिए संगीता नाम बहुत पसंद था मगर तुमनेकभी संगीता नहीं कहा, मंजू ही कहा।”

“क्योंकि मुझे तुम्हारा नाम मंजू ही अच्छा लगता है।”

“एक बार संगीता कहो न।”

“मेरी प्यारी संगीता।”

“आहा...कितना संगीत है इस नाम में।”

कहते हुए राज ने उसके दोनों होंठ अपने होंठों में कैदकर लिये और किसी प्यासे की तरह चूसने लगा।

किसी भूखे की तरह।

डॉली बहुत शर्मसार होकर राज की इस हरकत कोदेख रही थी।

वह फ्रीज होकर रह गयी थी। काटो तो खून नहीं।

वे दोनों एक-दूसरे को मानो खाने को तुले थे।

काफी देर बाद राज ने उसे छोड़ा और बोला–“मैं तैयारहोकर आती हूँ –तुम तब तक बैठो और डॉली–तुम खड़ी हो,पानी तक नहीं दे सकती?”

जैसे डॉली की चेतना लौटी।

उसने पलकें झपकाई और तुरंत ही पानी लेने चली गयी।

राज अंदर कमरे में घुस गया।

सन्नी वहां पड़े एक सोफे पर बैठ गया। इधर-उधर देखकरघर का मुआयना करने लगा।

अगले क्षणों में डॉली एक ट्रे में पानी का गिलास लेआई।

डॉली को देख देखकर सन्नी प्रफुल्लित था।

उसका मन मयूर नाच रहा था।

पलकें झुकाये डॉली उसके समक्ष खड़ी हो गयी, हाथ मेंट्रे लिये।

सन्नी बेशरमाई से उसे निहारते हुए मुस्कुराकरबोला–“वाव–मेरी पत्नी की पत्नी कितनी खूबसूरतहै–ब्यूटीफुल–।”

“पानी–।” वह नीची नजरें करे बोली।

सन्नी बोला–“क्या हम दो मिनट बात कर सकते हैं?”

डॉली अंदर ही अंदर सुलग रही थी मगर उसमें इतनीहिम्मत नहीं थी कि इसे जाहिर कर सके।

वह मल्टी पर्सनैलिटी की शिकार हो गयी थी, उसे नहींसमझ आ रहा था कि वह किस पर्सनैलिटी के साथ व्यवहार करे ।

उसे निरंतर एक जगह खड़ा देखकर सन्नी बोला–“प्लीजबैठो।” उसने पास की जगह थपथपाई।
 
डॉली ने सोफे में उसी स्थान पर ट्रे रख दी और तेजी केसाथ वापस चली गयी।

सन्नी उसे वापस जाता हुआ देखता रहा। विशेषकर उसकीदेह को।

और उसे समझने की कोशिश करता रहा।

बाद में उसने पानी का गिलास उठाया और सर्वप्रथमगिलास के उस हिस्से को चूमा जहां पर डॉली ने पकड़ा था।

और पानी गटागट चढ़ा गया।

☐☐☐

आधा घण्टा तक सन्नी यूं ही बैठा रहा। डॉली किचन के हवाले थी और राज एक कमरे में घुस गया था तो मानो वहींस्थायी होकर रह गया था।

सन्नी इस बीच मोबाइल चलाता रहा था, लेकिन उसकीचोर नजरें बराबर किचन की तरफ उठ जाती थीं, उससेडॉली का रूखापन जरा भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था। दिल तोयही चाह रहा था कि वह डॉली से खूब बातें करे और उसेअपने सम्मोहन में फंसाये।

मगर डॉली तो जरा भाव नहीं दे रही थी।

आधा घण्टा बाद राज कमरे से बाहर निकलकर आया।

छम-छम करता।

उफ्–कोई देखे तो शर्त लगाकर भी नहीं बता सकता किवह कोई लड़की नहीं है।

उसका गोल चेहरा एक लड़की के चेहरे का शेप ले चुकाथा।

आज उसने विशेष परिधान पहना था। लाल घाघरा औरटॉप।

सिर पर चुनरी डाल रखी थी, किसी सभ्य महिला की तरह।हाथों में चूड़ियां थीं। आंखों में काजल लगा था। होंठ लाल होरहे थे। लम्बे बालों की विग लगी थी।

ब्रेस्ट इतने उन्नत थे कि कोई फीमेल भी ईर्ष्या से भर उठे।ब्रा की बद्दी कांधे पर दिखाई देती थी।

वह सीधे सन्नी के सामने प्रकट हुआ।

उसे देखते ही सन्नी नाटकीय स्वर में चहक उठा, उठकरखड़ा हो गया–“वाव मेरी जान, मेरी जानेबहार–दिल खुश करदिया।”

राज गर्वोक्ति से भरते हुए कातिल मुस्कान में मुस्करानेकी कोशिश कर रहा था।

सन्नी ने खड़े होकर उसे अपनी बांहों में भींच लिया।

डॉली के सामने वह ज्यादा नौटंकी करना चाह रहा था।

वह उसका मुखड़ा हाथों में भरता हुआ बोला–“मुझे पहलेपता होता कि मेरी प्यारी पत्नी मेरा इस तरह इस्तकबाल करेगी तो मैं तो कब का इस घर में आ चुका होता।”

राज ने सन्नी के सीने में अपना चेहरा छिपा लिया और बोला–“तूने बहुत तरसाया है मुझे, कितने साल मैंने तुम्हारीजुदाई में काटे हैं–कब से मैं तरस रही थी, अपने इस रूपशृंगार के लिए, अब तो मुझे कभी छोड़कर नहीं जाओगे?”

“कभी नहीं मेरी जान।” सन्नी ने उसके होंठ अपने होंठों मेंभर लिये।

राज ने खुद को यूं फ्री छोड़ दिया जैसे परम आनंद कोउपलब्ध हो गया हो।

डॉली–

किचन में खड़ी थी।

उसके हाथों ने जैसे काम करना बंद कर दिया था। उसेखुद नहीं पता वो कर क्या रही है। मसाला उसे सब्जी कीकड़ाही में डालना था और उसने दूसरे चूल्हे पर तवे पर सिकरही रोटी के ऊपर मसाला डाल दिया।

जब डाल दिया तब ध्यान आया, उफ् यह क्या गलती करबैठी।

वह गर्दन मोड़कर इधर देख लेती थी, खासकर राज को,उसके रंग-ढंग को, उसके पहनावे को, उसकी हरकतों को।

वे दोनों एक-दूसरे से चिपटे थे।

राज ने बांहों का हार सन्नी के गले में डाल दिया था औरमदमस्त अवस्था में था।

कुछ देर बाद सन्नी ने उसके होंठों को छोड़ा।

सन्नी बोला–“मजा आ गया–तुम्हें यकीन नहीं होगा मेरीजान, तुम्हारे बिना एक दिन अच्छा नहीं लगा।”

“बना रहे हो, तुम मर्दों की यही आदत होती है, फिर तुम्हेंकिसने रोका था बताओ?”

“इस फूटे नसीब ने, आज नसीब जागे हैं, आज के बाद सारी रातें रंगीन हुआ करेंगी–मैं तुम्हें इतना खुश रखूंगा मंजू कि तुम अपने नसीब पर रश्क करोगी।”

“भगवान से एक तुम्हारे सिवा, मैंने आज तक किसी को नहीं मांगा, सच्ची बोल रही हूँ ।”

“मुझे यकीन है मेरी जान।” उसने राज का गाल पकड़कर हिलाया–“हम दोनों एक-दूसरे के लिए बने हैं, यह अलग बातहै कि भगवान ने तुम्हारे साथ ज्यादती की–तुम्हें वो नहीं दी जोदेना चाहिए थी और वो दे दिया जो नहीं देना चाहिए था।”

“तो क्या हुआ सीजर लगवा देंगे–तुम तो हामी भरो मेरेराजा, भगवान की गलती तो सुधारी जा सकती है।”
 

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