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शाम हो रही थी ।
सूर्य पश्चिम की तरफ़ सरकता जा रहा था । पेडों के साए लम्बे होते जा रहे थे । हल्की-हल्की ठडी हवा चलनी शुरू हो गई थी । दिन-भर की गमी से अब कुछ राहत मिलनी शुरू हुई थी ।
वो चालीस-बयालीस बरस का व्यक्ति था, जो कि आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक था । यूं उसकी कद-काठी पतली ही थी ।
शरीर पर काली पैट और सफेद कमीज पहन रखी थी । वो इस वक्त सामान्य गति से कार चला रहा था । उसका चेहरा इस कदर सपाट था कि वहां कोई भी भाव नहीं था । पास रखा रुमाल उठाकर चेहरे पर बहते पसीने को साफ किया ।
दो दिन से कार का एसी खराब था, परंतु ठीक करवाने का वक्त न मिला था ।
तभी उसके मोबाइल फोन की वेल बजी ।
पास की सीट पर रखा मोबाइल उठाकर स्कीन पर आया नम्बर देखा, फिर कॉलिंग स्विच दबाकर कान से लगाकर कह उटा ।
"पहुंच रहा हूं !"
"तुमने बहुत देर......!"
"बस पांच मिनट.. !!" कहकर उसने फोन बंद किया और पास की सीट पर रख लिया ।
सतपाल नाम् था उस व्यक्ति का । जानने वाले बाखूबी जानते थे कि ये व्यक्ति आत्माओं से बात करने, उसे पकड़ने और उन्हे भगाने का काम करता था । जरूरत पड़ने पर ये मृत लोगों की आत्माओं से भी बात कर लेता था । सतपाल नाम के इस व्यक्ति की वजह से जाने कितने लोग चैन से शात जिन्दगी बिता रहे थे, जिनकी जिन्दगी बुरी आत्माओं ने नर्क जैसी बना दी थी ।
सतपाल अपने काम में माहिर था । परंतु पैसा भी तगडा लेता था ।
जो लोग गरीब होते या पैसा देने की स्थिति में न होते, उनके काम ये मुफ्त में कर देता था । ये काम इसे विरासत में मिला था । सतपाल के पिता गिरधारी लाल ये ही काम किया करते थे और अपने पिता से ही इसने ये सव सीखा था । दो भाई और थे राजन और मिथलेश । वे दोनों भी यही काम करते थे, परंतु पुर्ण रूप से मास्टर न वन पाए थे । जितनी कि सतपाल ने इस विद्या मे महारथ हासिल कर ली थी ।
सतपाल ने एक मकान कै सामने कार रोकी और इजन बंद करके बाहर निकला ।
मकान के गेट पर पाच-सात लोग मौजूद थे । उन्हें में से एक उसका भाई राजन था ।
“ओह ।” राजन उसे देखते ही उसकी तरफ लपका…“मैं उसे नहीं संभाल पा रहा हु, वो बहुत ताकतवर है ।”
सतपाल उसके साथ मकान के भीतर बढ गया ।
"क्या कहता है वो?” सतपाल ने पूछा ।
"कुछ नहीं कहता । बात भी नहीं कर रहा । कई बार मुझें मारने की चेष्टा की ।"
" तुमने नहीं मारा उसे !"
"उसे नहीं भगा पा रहा हूं । अपने बस से बाहर की बात पाकर तुम्हें फोन किया ।"
“अब क्या स्थिति है?"
"खुद ही देख लो…मेरे पासे इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं था ।"
मकान के भीतर भी एक-दो औरतें और दो-तीन मर्द मौजूद थे । वो सव सहमे हुए थे । उनकी आखें ही बोलती लग रही थीं । हर तरफ चुप्पी छाई हुई थी ।
राज़न सतपाल को एक बंद दरवाजे के सामने ले गया ।
"इसमें है !" राजन ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए धीमे स्वर में कहा ।
सतपाल ने दरवाजा धकेला और भीतर प्रवेश कर गया ।
राजन ने भी भीतर प्रवेश किया और दरवाजा बंद कर लिया ।
वो बीस-इवक्रीस बरस का युवक था । बैड पर रस्सियों से उसके हाथ-पाव बांध रखे थे । उसकी आखें बंद थी, परंतु होंठों से मद्धिम-सी गुर्राहट निकल रही थी । वो गुर्राहट कमरे में गूंजती-सी महसूस हो रही थी । उसके दात भिचे हुए थे ।
सतपाल ठिठका-सा कठोर निगाहों से उसे देखता रहा ।
"मैंने दूसरों की सहायता से बांधा है इसे । राजन बोला-----“इसके अलावा मेरे पास कोई और रास्ता भी न था । ये उत्पात मचा रडा था ।। ये हिंसक हरकतें करने लगा था । किसी की जान भी ले सकता था ।"
घूं-घूं की मद्धिम-स्री गुर्राहट कमरे में गूज रही थी ।
"कुछ बोला ये?” सतपाल ने गंभीर स्वर में कहा ।
"नहीं लेकिन उत्पात खूव किया है इसने
”
सतपाल की निगाह पूरे कमरे में घूमी । सारा सामान अस्त-व्यस्त पड़ा था । टी.वी. भी टूट चुका था । फर्श पर कई जगह कांच बिखरा हुआ दिखाई दे रहा था । छत पर लटकते पंखे की दो पंखुडियां टेढी हुई पडी थी । सतपाल आगे बढा और वेड के पास पहुंचकर ठिठका ।
बैड पर बंधे युवक के होंठो से मद्धिम-सी गुर्राहट घूं-घूं बराबर निकल रही थी ।।
सतपाल आगे झुका और बंधे युवक के कान के पास मुंह लेजाकर बोला !
"मैं आ गया हूं। मैं तांत्रिक सतपाल ।" उसी पल युवक की आंखें खुली ।
लाल सुर्ख आंखें!
अगले ही क्षण उसके होंठों से दहाड निकली और वो सतपाल पर झपटा।।
सतपाल तुरंत कुछ पीछे हुआ ।
बंधा होने कारण युवक छटपटाकर रह गया । लाल सुर्ख आंखों से वो सतपाल को घूरने लगा । उसके होंठों से बराबर गुर्राहट भरी घू घूं की आबाज निकल रही थी ।।
"कौन है तू?" एकाएक सतपाल ने तीखे स्वर में पूछा ।।
वो रस्सियों से ज़कड़ा आजाद होने के लिए छटपटा उठा ।
"चला जा यहां से । छोड दे इस युवक को, वरना बहुत मारूंगा तुझे !" सतपाल का स्वर पहले जैसा ही था ।
वो बंधनों में फंसा गुर्राया ।
"नहीं जाएगा ।"
वो खूनी सुर्ख नजरों से सतपाल को देखते हुए गुर्रा रहा था ।
"मेरी बात नहीं मानेगा? -नहीं जाएगा?"
वो वेसे ही सतपाल पर नजरे टिकाए गुर्रा रहा था ।
सतपाल एकाएक बैड पर चढा और उसके पेट पर बैठते हुए जेब से 'ऊं' के आकार का छोटा सा यंत्र निकाला तो वो युवक आजाद होने के लिए छटपटा उठा । उसके, होंठों से चीख निकली ।
"पछताएगा तू।" युवक के होठौ से घरघराती आवाज निकली ।
"मैं नहीं…तू पछताएगा ।" सतपाल उसे 'ऊं' का यन्त्र दिखाता बोला-----"अमी भी वक्त है चला जा । नहीं तो वहुत, दर्द होगा !"
"मैं तेरे को मार दूंगा !"
"तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता !" सतपाल कठोर स्वर में बोला…" तू क्यों आया इस शरीर मेँ?तू है कौन?"
"मैं नहीं बताऊंगां ।" उसके होंठों से गुर्राती आवाज निकली ।।
“क्यों ?"
" चुप रहने का हुक्म है, मैं नहीं.....! "
"तो फिर भुगत.. !" कहने के साथ सतपाल ने 'ऊ' नाम के उस यंत्र को उसकी बांह पर रखकर दबा दिया ।
यंत्र के उसकी बांह से लगने की देर थी कि वो चीख उठा । बांह के जिस हिस्से पर 'ऊं' नामक यंत्र रखा था वहां से हल्का-सा धूंआं उठने लगा ।
वो गला फाड़कर चीखा । अपने को आजाद कराने के लिए भरपूर उछल-कूद की ।
एक तो वो बंधनों में बंधा था, दूसरे सतपाल उसके ऊपर बैठा था।
वो कामयाव न हो-सका।
एकाएक वो शांत पड़ता चला गया ।
आंखें बंद हो गई उसकी ।
सतपाल ने 'ऊं' नामक यंत्र उसकी बांह से हटाया और अपनी जेब में डाल लिया ।
" चला गया?" राजन ने पूछा।
"नहीं नाटक कर रहा है जाने का…गया नहीं ।।" सतपाल ने युवक के चेहरे को देखते तीखे स्वर में कहा ।
युवक अब शात पडा था ।।
सतपाल आगे झुका और कठोर स्वर में बोला ।
"तू मुझे बेवकूफ़ नहीं वना सकता ।।" सतपाल खा जाने वाले कठोर स्वर में बोला---" तू क्या समझता है कि मैं तेरे को छोड़कर यहाँ से चला जाऊंगा । नहीं------मै तो तेरे को भगा के ही दम लूंगा ।।"
एकाएक युवक आखे खोलते हुए गला फाढ़कर चीखते हुए उस पर झपटा ।
सतपाल अपने को फुर्ती से पीछे करके बचा गया ।
युवक इस वक्त दरिंदा लग रहा था ।।
" तू हमारा पुराना दुश्मन है । युवक के होंठों से खरखराती आवाज निकली-“तूने बहुतों को वापस भेजा है, हम तेरे को वहुत बुरी मौत मारेंगे। तेरे को जिन्दा नहीं छोड़ेगे ।"
"कोई भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता । मैं तुम सबसे ज्यादा शक्तिशाली हूं।" सतपाल तेज स्वर में बोला ।
"भवतारा के सामने तेरी औकात ही क्या है ?" उसके होंठों से घरघराती आवाज निकली ।
" भवतारा ?" सतपाल बुरी तरह चौका ।
युवक वहशी अंदाज में सतपाल को घूर रहा था ।
"तुम शेतान के बेटे की बात कर रहे हो ?" सतपाल के होंठों से निकला ।"
"हां !"
"वो तो दो सौ दस साल-पहले इस धरती से वापस लौट चुका था ।"
युवक खामोश रहा ।
"क्या वो फिर. धरती पर आ गया है?"
"मैं नहीं बताऊंगा ।"
" तेरे को बताना, होगा ।" सतपाल चीखा ।।
"नहीं बताऊंगा । तू मेरा क्या कर लेगा ।"
"मैं तेरे को दर्द दूंग़ा । तड़पाऊंगा ।" सतपाल जैसे गुस्से से पागल हो रहा था ।
"भवतारा तेरे को निन्दा नहीं छोड़ेगा । तू वहुत तंग करता है हम लोगों को ।" उसके होंठों से घरघराती आवाज निकली "
“वता-भवतारां कहां है?”
" हा-हा-हा ।" वो वहशी अंदाज में हंसा------"नही बताऊंगा । तेरे को पता ही नहीं चलेगा कुछ.....!"
सतपाल ने जैव से छोटी-भी पुडिया निकाली और उसे खोला ।
पुड्रिया में राख भरी हुई थी, जिसे उसने अपनी हथेली पर उड़ेल लिया ।।
"ये क्या करने जा रहा है तू?" युवक के होंठों से बेचैनी भरी आवाज निकली ।
" तेरे को जलाने जा रहा हूं। ये पवित्र राख तुझे जला देगी ।"
"न . . . नही ।"
उसी पल सतपाल ने वो राख युवक के चेहरे पर फेक दी ।