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"7.",अजीत उठा & तभी दिव्या की बाहे अपनेआपखूली & उसने उसे अपने सीने से लगा लिया.अजीत ने भी उसे अपनी बाहो मे कस लिया.बस कुच्छ सेकेंड के लिए दोनो ऐसे रहे,दिव्या & अजीत दोनो जानते थे की दोनो के जिस्म अभी भी 1 दूसरे को नही भूले थे & पास आते ही दोनो ने 1 दूसरे को थाम लिया.गलियारे मे अंधेरा था & उसके आख़िर मे बनी 1 खिड़की से स्ट्रीट लॅंप की हल्की रोशनी आ रही थी.105 नंबर गलियारे का आख़िरी कमरा था & नीचे उतरने की सीढ़ी उस खिड़की के पास थी & उसपे पोलिसेवाले खड़े थे.
बाहर बिल्डिंग छ्चोड़ भागते रंडियो & ग्राहको का शोर था.उपर की मंज़िल से भी लोग उतर के भाग रहे थे मगर 1 पोलिसेवाले ने उपर जाने वाली सीढ़ियो पे पोज़िशन ले ली थी & अब वाहा फँसे लोग शोर मचा रहे थे.
"ओह्ह..!",तभी अजीत की गोद मे बैठी दिव्या की पीठ से कोई आ टकराया.वो झट से उठ खड़ी हुई & लड़खड़ाई तो पीछे से 2 मज़बूत बाजुओ ने उसे थाम लिया & उसकी गंद पे प्रोफेसर के लंड का एहसास 1 दिन मे दूसरी बार हुआ,"..मैं हू,अजिंक्या.ये बिंदिया घबरा रही है."
"अभी सब ठीक हो जाएगा.बिंदिया तू कमरे मे वापस जा & अंदर से कमरा बंद कर ले.जब तक मैं ना काहु नही खोलना."
"पर.."
"पर-वर नही जा!"
"अब मैं इन चूहो को निकालता हू!",अजीत आगे बढ़ा & उसके पीछे दिव्या & प्रोफेसर की तभी ज़ोर की आवाज़.कमरे मे फँसे 6 बदमाशो ने मेज़ उठा ली थी & उसे लिए दिए बाहर दौड़ पड़े थे.1 बार फिर गोलिया चलने लगी.याभी उपरी सीढ़ी पे खड़ा पोलिसेवला चीखा.
"क्या हुआ,सलीम?"
"पैर मे लगी,सर.1 उपर भाग रहा है.",जद्ड़ोजेहाद की आवाज़े आने लगी.बाकी गुंडे दूसरी तरफ बने कमरा नंबर 109 के दरवाज़े की ओट मे खड़े हो गोली चला रहे थे जिसके चलते अजीत,दिव्या & प्रोफेसर आगे नही बढ़ पा रहे थे.
"ऑफीसर,मैं किसी तरह उपर जाता हू & वहाँ से सीढ़ियो से नीचे आ इनको उधर से परेशान करता हू."
"मगर कैसे?",अजीत की गोलिया ख़त्म हो रही थी.
"आप बस यहा लगे रहिए.",प्रोफेसर घूमने लगा तो दिव्या से टकराया & उसने उसे थाम लिया.दिव्या की चूचियाँ उसके सीने से पिस गयी & तभी 1 गुंडे ने उनपे गोलिया चलाई.दिव्या प्रोफेसर को लिए-दिए झुक गयी.प्रोफेसर की बाहो की कसावट मे इस लम्हे जब सबकी जानो पे बनी हुई थी 1 अजीब सी कशिश थी जिसने उसके दिल मे हलचल मचा दी थी.वो समझ नही पाई की इस लम्हे उसे ऐसी बाते कैसे सूझ सकती हैं & तब उसे ट्रैनिंग के दौरान कुच्छ पडाह याद आया....कि जब इंसान को लगे कि उसकी जान जा भी सकती है तो वो उस वक़्त हर एहसास बड़ा सॉफ-2 & शिद्दत से महसूस करता है.उसका दिल किया कि और ख़तरे मे जाते प्रोफेसर को चूम ले & वो आगे झुकी लेकिन तब तक प्रोफेसर उसे छ्चोड़ कमरे मे जा चुका था.
प्रोफेसर कमरे की खिड़की से बाहर नीचे की खिड़की के छज्जे पे उतरा & फिर फुर्ती से दीवार से निकले लेड्ज पे पैर जमा 1 पाइप तक पहुँचा.थोड़ी ही देर मे वो उपरी मंज़िल के कमरे मे था जहा अभी भी रोशनी थी.लकड़ी की बीट पे लगी वाइरिंग बहुत पुरानी थी & प्रोफेसर ने 1 बल्ब के तार को बीट से ऐसे खींचा की ना बल्ब बुझा ना तार मैं वाइरिंग से अलग हुआ फिर उस झूलते लट्तू को हाथो मे ले प्रोफेसर सीढ़ियो की ओर दौड़ा & उस बल्ब को नीचे लटका दिया.
ठीक उसी वक़्त 1 जॅकेट पहना शख्स उपर आया & प्रोफेसर को ज़ोर से कंधे से धक्का दिया.प्रोफेसर गिर पड़ा लेकिन उसने हाथ पीछे ले जा उस भागते शख्स की टांग पकड़ ली & खींचने लगे.उस आदमी की जुराब नीची हुक & प्रोफेसर को वाहा 1 निशान दिखा,2 इंच लंबा & गहरा.वो 1 पल जो प्रोफेसर ने दिमाग़ उस निशान को समझने मे लगाया,वही उस इंसान का मददगार बना.उसने 1 ज़ोर की लात पीछे प्रोफेसर के सर पे मारी & गलियारे की खिड़की को भागा & जब तक प्रोफेसर उस तक पहुचता वो खिड़की से नीचे लेड्ज & फिर निचले छज्जे & वाहा से कूद के सड़क पे था.
प्रोफेसर ने उस भागते शख्स पे गोलिया चलाई लेकिन वो निकल गया.अब वो नीचे का जायज़ा लेने को मुड़ा मगर वाहा सब ख़त्म हो चुका था.प्रोफेसर ने जैसे ही बल्ब नीचे लटकाया था दिव्या & अजीत के साधे निशानो ने या तो गुणडो को मार गिराया था या फिर ज़ख़्मी कर दिया था.
"डॅम इट!",लॉड्ज के बाहर खड़े अजीत ने जीप के बॉनेट पे हाथ मारा,"..फिर निकल गया.",उसने अपने दोनो साथियो को उस हथ्यार के व्यापारी के बारे मे बताया.
"चिंता मत करो,अजीत.नकबंदी हो गयी है & पोलीस पूरे शहर का चप्पा-2 छान रही है वो ज़रूर मिल जाएगा."
नसीबपुरा की गलियो को पोलिसेवाले खंगाल रहे थे.मुर्शिद की जाँघ मे गोली लगी थी & उसके 2 साथी मारे जा चुके थे.वो हथ्यारो का दलाल तो फरार हो चुका था लेकिन उसके साथ आया आदमी मारा जा चुका था.
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क्रमशः...........
बाहर बिल्डिंग छ्चोड़ भागते रंडियो & ग्राहको का शोर था.उपर की मंज़िल से भी लोग उतर के भाग रहे थे मगर 1 पोलिसेवाले ने उपर जाने वाली सीढ़ियो पे पोज़िशन ले ली थी & अब वाहा फँसे लोग शोर मचा रहे थे.
"ओह्ह..!",तभी अजीत की गोद मे बैठी दिव्या की पीठ से कोई आ टकराया.वो झट से उठ खड़ी हुई & लड़खड़ाई तो पीछे से 2 मज़बूत बाजुओ ने उसे थाम लिया & उसकी गंद पे प्रोफेसर के लंड का एहसास 1 दिन मे दूसरी बार हुआ,"..मैं हू,अजिंक्या.ये बिंदिया घबरा रही है."
"अभी सब ठीक हो जाएगा.बिंदिया तू कमरे मे वापस जा & अंदर से कमरा बंद कर ले.जब तक मैं ना काहु नही खोलना."
"पर.."
"पर-वर नही जा!"
"अब मैं इन चूहो को निकालता हू!",अजीत आगे बढ़ा & उसके पीछे दिव्या & प्रोफेसर की तभी ज़ोर की आवाज़.कमरे मे फँसे 6 बदमाशो ने मेज़ उठा ली थी & उसे लिए दिए बाहर दौड़ पड़े थे.1 बार फिर गोलिया चलने लगी.याभी उपरी सीढ़ी पे खड़ा पोलिसेवला चीखा.
"क्या हुआ,सलीम?"
"पैर मे लगी,सर.1 उपर भाग रहा है.",जद्ड़ोजेहाद की आवाज़े आने लगी.बाकी गुंडे दूसरी तरफ बने कमरा नंबर 109 के दरवाज़े की ओट मे खड़े हो गोली चला रहे थे जिसके चलते अजीत,दिव्या & प्रोफेसर आगे नही बढ़ पा रहे थे.
"ऑफीसर,मैं किसी तरह उपर जाता हू & वहाँ से सीढ़ियो से नीचे आ इनको उधर से परेशान करता हू."
"मगर कैसे?",अजीत की गोलिया ख़त्म हो रही थी.
"आप बस यहा लगे रहिए.",प्रोफेसर घूमने लगा तो दिव्या से टकराया & उसने उसे थाम लिया.दिव्या की चूचियाँ उसके सीने से पिस गयी & तभी 1 गुंडे ने उनपे गोलिया चलाई.दिव्या प्रोफेसर को लिए-दिए झुक गयी.प्रोफेसर की बाहो की कसावट मे इस लम्हे जब सबकी जानो पे बनी हुई थी 1 अजीब सी कशिश थी जिसने उसके दिल मे हलचल मचा दी थी.वो समझ नही पाई की इस लम्हे उसे ऐसी बाते कैसे सूझ सकती हैं & तब उसे ट्रैनिंग के दौरान कुच्छ पडाह याद आया....कि जब इंसान को लगे कि उसकी जान जा भी सकती है तो वो उस वक़्त हर एहसास बड़ा सॉफ-2 & शिद्दत से महसूस करता है.उसका दिल किया कि और ख़तरे मे जाते प्रोफेसर को चूम ले & वो आगे झुकी लेकिन तब तक प्रोफेसर उसे छ्चोड़ कमरे मे जा चुका था.
प्रोफेसर कमरे की खिड़की से बाहर नीचे की खिड़की के छज्जे पे उतरा & फिर फुर्ती से दीवार से निकले लेड्ज पे पैर जमा 1 पाइप तक पहुँचा.थोड़ी ही देर मे वो उपरी मंज़िल के कमरे मे था जहा अभी भी रोशनी थी.लकड़ी की बीट पे लगी वाइरिंग बहुत पुरानी थी & प्रोफेसर ने 1 बल्ब के तार को बीट से ऐसे खींचा की ना बल्ब बुझा ना तार मैं वाइरिंग से अलग हुआ फिर उस झूलते लट्तू को हाथो मे ले प्रोफेसर सीढ़ियो की ओर दौड़ा & उस बल्ब को नीचे लटका दिया.
ठीक उसी वक़्त 1 जॅकेट पहना शख्स उपर आया & प्रोफेसर को ज़ोर से कंधे से धक्का दिया.प्रोफेसर गिर पड़ा लेकिन उसने हाथ पीछे ले जा उस भागते शख्स की टांग पकड़ ली & खींचने लगे.उस आदमी की जुराब नीची हुक & प्रोफेसर को वाहा 1 निशान दिखा,2 इंच लंबा & गहरा.वो 1 पल जो प्रोफेसर ने दिमाग़ उस निशान को समझने मे लगाया,वही उस इंसान का मददगार बना.उसने 1 ज़ोर की लात पीछे प्रोफेसर के सर पे मारी & गलियारे की खिड़की को भागा & जब तक प्रोफेसर उस तक पहुचता वो खिड़की से नीचे लेड्ज & फिर निचले छज्जे & वाहा से कूद के सड़क पे था.
प्रोफेसर ने उस भागते शख्स पे गोलिया चलाई लेकिन वो निकल गया.अब वो नीचे का जायज़ा लेने को मुड़ा मगर वाहा सब ख़त्म हो चुका था.प्रोफेसर ने जैसे ही बल्ब नीचे लटकाया था दिव्या & अजीत के साधे निशानो ने या तो गुणडो को मार गिराया था या फिर ज़ख़्मी कर दिया था.
"डॅम इट!",लॉड्ज के बाहर खड़े अजीत ने जीप के बॉनेट पे हाथ मारा,"..फिर निकल गया.",उसने अपने दोनो साथियो को उस हथ्यार के व्यापारी के बारे मे बताया.
"चिंता मत करो,अजीत.नकबंदी हो गयी है & पोलीस पूरे शहर का चप्पा-2 छान रही है वो ज़रूर मिल जाएगा."
नसीबपुरा की गलियो को पोलिसेवाले खंगाल रहे थे.मुर्शिद की जाँघ मे गोली लगी थी & उसके 2 साथी मारे जा चुके थे.वो हथ्यारो का दलाल तो फरार हो चुका था लेकिन उसके साथ आया आदमी मारा जा चुका था.
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