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गर्ल'स स्कूल compleet

गर्ल्स स्कूल पार्ट --31

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा गर्ल्स स्कूल पार्ट 31 लेकर आपके लिए हाजिर हूँ दोस्तो जैसा कि आप जानते है ये कहानी कुछ ज़्यादा ही लंबी हो गयी है इसलिए प्रत्येक किरदार के साथ कहानी को लेकर चलना पड़ता है जैसे दिशा , गौरी और वाणी को हम नही भूल सकते इसलिए इस पार्ट मैं इन्ही तीनो की कहानी है दोस्तो जिन दोस्तो ने इस कहानी के इस पार्ट को पहली बार पढ़ा है उनकी समझ मैं ये कहानी नही आएगी इसलिए आप इस कहानी को पहले पार्ट से पढ़े

तब आप इस कहानी का पूरा मज़ा उठा पाएँगे आप पूरी कहानी मेरे ब्लॉग -कामुक-कहानियाँब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम पर पढ़ सकते है अगर आपको लिंक मिलने मैं कोई समस्या हो तो आप बेहिचक मुझे मेल कर सकते हैं अब आप कहानी पढ़ें

काफ़ी देर तक सोच विचार करने के बाद दिशा को एक बात सूझी.. क्यूँ ना दोनो बहने चल कर प्रिन्सिपल मेडम के घर सो जायें.. दोनो को खाना खिला कर सुलाने के बाद चलने में क्या हर्ज़ है.. सुबह सुबह आ जाएँगे वापस..

दिशा आकर चुप चाप बैठे मनु और अमित के पास बैठ गयी," तुम दोनो चुप कैसे हो गये? मैं खाना बनती हूँ.. तब तक तुम टीवी देख लो.." दिशा के चेहरे पर चिंता की लकीरें सॉफ दिखाई देने लगी थी...

"नही.. कुच्छ नही दीदी! वो... हम सोच रहे थे की हमें चलना चाहिए.. सारा आधे घंटे का तो रास्ता है.. पहुँच जाएँगे आराम से!" मनु ने उठ'ते हुए कहा..

मनु की बात सुनकर दिशा शर्मिंदा सी हो गयी.. उसको लगा उन्न दोनो ने उनकी बातें सुन ली हैं," अरे नही नही... अब तो देर भी काफ़ी हो चुकी है.. फिर यहाँ रुकने में क्या बुराई है.. तुम आराम से टीवी देखो.. मैं खाना बना लेती हूँ...!" कह कर दिशा उठी ही थी की वाणी ने एक नये अवतार में कमरे के अंदर प्रवेश किया...

निसचीत तौर पर वाणी का वो नया अवतार ही था.. क्रीम कलर का मखमली लोवर और खुली सी उसी कपड़े की बनी टी-शर्ट पहन कर वो बाहर निकली तो मनु की साँस बीच में ही अटक गयी.. पल भर के लिए उपर से नीचे तक वाणी का कातिलाना अंदाज देखकर ही मनु के माथे पर पसीना छलक आया.. वह वापस वहीं का वहीं बैठ गया और अपने संवेगो को काबू करने की कोशिश करने लगा.. लोवर घुटनो तक उसकी मांसल चिकनी जांघों से चिपका हुआ था.. वाणी की जांघें केले का चिकना तना मालूम हो रही थी.. टी-शर्ट छ्होटी होने के कारण वाणी के पुस्त क़ातिल नितंबों को पूरा ढक नही पा रही थी, जिस'से उनकी मोटाई के बीचों बीच अनंत खाई स्पस्ट द्रिस्तिगोचर हो रही थी.. बिना बाजू की टी-शर्ट के नीचे शायद वाणी ने कुच्छ भी नही पहना हुआ था.. संतरे के आकर में सीधे तने हुए दोनो फलों के बीचों बीच महसूस हो रहे पैनी नोक वाले दाने इश्स बात का ज्वलंत सबूत थे... वाणी प्रणय की देवी बनकर प्रकट हुई थी.... सच में.. आज

कयामत आने से कोई रोक नही सकता था....

मनु को अपनी और इश्स तरह घूरता देखकर वाणी पानी पानी हो गयी और अंदर टीवी चलकर सोफे पर बैठ गयी...

"तुम दोनो भी अंदर जाकर टी.वी. देख लो.. बस में अभी खाना बना देती हूँ..." कहकर दिशा किचन में चली गयी..

"मनु!" दिशा ने अंदर जा रहे मनु को किचन से आवाज़ लगाई तो मनु को लगा उसका चोरी चोरी लार टपकाना पकड़ा गया.. थूक अंदर गटक'ते हुए मनु ने वापस मूड कर कहा," ज्जई.... दीदी!"

"एक बार फोन देना!"

"ओह्ह्ह.. ये लो!" मनु ने राहत की साँस ली और फोन दिशा को पकड़ा कर अंदर चला गया..

दिशा ने गौरी के पास फोन मिलाया..

उधर से मीठी सी आवाज़ आई.. यक़ीनन गौरी ही थी..

"गौरी.. मैं बोल रही हूँ.. दिशा!"

"हां.. दिशा.. ये आज नये नये नंबर. से फोन कैसे मिला रही हो.. जीजा जी आ गये हैं क्या?"

"नही यार.. दरअसल वो वाणी की सहेली के भैया बारिश की वजह से वापस नही जा पाए.. उनके ही फोन से फोन कर रही हूँ..."

"अच्च्छा.. और सुना.. केयी दीनो से तू आई नही हमारे घर..?"

"इन्न बातों को छ्चोड़ यार.. ये बता आज हमारे घर आ सकती है क्या?" दिशा ने मतलब की बात पर आते हुए कहा..

"उम्म्म.. आज? ..... क्या हुआ...?"

"कुच्छ नही यार.. वो मैने बताया ना.. 2 लड़के आए हुए हैं और मामा मामी शायद आज ना आ पायें... तो कुच्छ अजीब सा लग रहा है.. हम दोनो बहनो को.. सोचा 2 से भले तीन!"

"कौन? वही जो सुबह बाइक पर आए थे...? गौरी के मंन में उस नौजवान की तस्वीर उभर आई जो बेबाकी से उस'से बात कर रहा था....

"तू इन्न बातों को छ्चोड़ यार.. बोल आ सकती है या नही?" दिशा को खाना भी बनाना था...

"हुम्म आ सकती हूँ.. अगर तू मुझे लेने आ जाए तो.. बारिश हो रही है.. और अंधेरा भी हो गया है.. ऐसे में अकेली आने में डर लगेगा..!"

"पर.. मैं भी अकेली कैसे आउन्गि..?..... चल

ठीक है.. मैं आती हूँ.. उनमें से किसी एक को लेकर.."

"ओके! मैं तुम्हे तैयार मिलूँगी... पर मम्मी को मत बताना तुम दोनो अकेली हो..."

"ठीक है.. मगर क्यूँ...?"

"तू सब समझती है यार.. मम्मी क्या सोचेगी?"

"चल ठीक है.. मैं आ रही हूँ!" कहकर दिशा ने फोन काट दिया...

अंदर आकर दिशा ने मनु से कहा," मनु! एक बार तुम्हे मेरे साथ चलना पड़ेगा.. गौरी के घर..."

"गौरी का नाम सुन'ते ही अमित बिना कोई पल गँवाए खड़ा हो गया," मैं हूँ ना दीदी.. मैं चलता हूँ!"

दिशा उसकी बात सुनकर हंस पड़ी," ठीक है.. तुम चलो!" और एक छतरी उठा कर दोनो बाहर निकल गये...

कुच्छ पलों तक कमरे में टी.वी. की आवाज़ गूँजती रही.. अचानक वाणी ने टी.वी. मूट कर दिया..," इतना क्यूँ भाव खा रहे हो..? बोल नही सकते...

मनु का ध्यान तो पहले ही वाणी पर टीका हुआ था.. गला सॉफ करके बोला," क्या नही बोल सकता.. क्या बोलूं?

"क्या बोलू का क्या मतलब... बस बोलो.. कुच्छ भी!" वाणी ने उसकी नज़रों को खुद में भटक'ते हुए देखा तो इतराते हुए उसके स्वर में नारिसूलभ पैनापन आ गया..

"कुच्छ भी क्या बोलूं.. मुझे बोलना ही नही आता." मनु ने सच ही कहा था.. बोलना आता होता तो कब का बोल ही ना देता!

वाणी बात करते हुए अपने लंबे बालों को पिछे बाँधने लगी.. ऐसा करने से उसके उभारों में आगे की और कामुक उभर आ गया.. वाणी जानती थी.. मनु की नज़र कहाँ है.. आख़िरकार पहल वाणी को ही करनी पड़ी," मैने किचन से तुम दोनो की बातें सुनी थी..."

"का...कैसी बातें?"

"वही जो अमित कह रहा था.. की अगर तुझमें हिम्मत नही है तो मैं जाकर बोल देता हूँ वाणी को!"

मनु बिना बोले ये अंदाज़ा लगाने की कोशिश करता रहा की वाणी ने सिर्फ़ इतना ही सुना है या और भी कुच्छ...

मनु को चुप बैठे देख वाणी को ही एक बार फिर बोलना पड़ा," क्या तुम'मे सच में ही हिम्मत नही है..?"

"किस बात की हिम्मत..?"

"मुझसे बोलने की... और क्या?"

"क्या बोलने की..!" मनु के दिल में आ रहा था की जैसे अभी बोल दे.. होंठो से... होंठो को ही.. कानो को नही!

खीज उठी वाणी ने सोफे पर रखा तकिया उठाया और मनु की तरफ फैंक दिया.. मनु ने तकिया लपक लिया....

"बोल दो ना प्लीज़..." वाणी सामने से उठकर उसके साथ वाले सोफे पर जा बैठी..

" तुम बहुत प्यारी हो वाणी... तुम्हारे जैसी मैने आज तक सपने में भी नही देखी!" मनु ने उसका हाथ अपने हाथ में लेने की कोशिश की तो वाणी शर्मकार वहाँ से उठ गयी.. और वापस पहले वाली जगह पर जाकर अपनी आँखें बंद कर ली...

"अब बोल रहा हूँ तो कोई सुन नही रहा.." कितनी हिम्मत करके मनु ने अपने दिल के अरमानों को ज़ुबान दी थी...

"फिर बोलते रहना था ना.. तुम तो मुझे छू रहे थे.." वाणी के शब्दों में हया का मिश्रण था..

"तुम्हे मेरा छूना बुरा लगा वाणी!" मनु उठकर वाणी के पास घुटने टेक कर बैठ गया.. और फिर से उसका हाथ पकड़ लिया..

वाणी की आँखें बंद हो गयी.. उसके शरीर में मीठी सी हुलचल सी हुई.. उसके अरमानों ने अंगड़ाई सी ली..," नही.. मुझे डर लग रहा है.." वाणी का शरीर भारी सा होकर उसके काबू से बाहर होता जा रहा था.. लग रहा था.. जैसे बदन अभी टूट कर मनु के आगोश में जा गिरेगा!

"डर???? ... मुझसे..." मनु उसके हाथ को अपने हाथ से सहलाने लगा..

"नही.. खुद से.. कहीं बहक ना जाऊं.." वाणी ने अपना शरीर ढीला छ्चोड़ कर नियती के हवाले कर दिया था... अपने मनु के हवाले!

"मैने सपने मैं भी नही सोचा था...." मनु की बात अधूरी ही रह गयी.. बाहर दरवाजा खुलने की आवाज़ के साथ ही वाणी ने अपना हाथ वापस खींच लिया और मनु संभालने की कोशिश करता हुआ वापस अपने स्थान पर जा बैठा.........

तीनो जब अंदर आए तो गौरी का चेहरा तमतमाया हुआ था.. हमेशा रहने वाली मधुर मुस्कान उसके चेहरे से गायब थी.. वो आई और दिशा के साथ सीधे किचन में चली गयी.

"क्या हुआ गौरी? तुम्हारा मूड अचानक खराब क्यूँ हो गया?" दिशा ने चुप चाप आकर आलू छील'ने में लग गयी गौरी की और हैरानी से देखती हुई बोली..

"कुच्छ नही हुआ.." गौरी रोनी सूरत बना कर काम में लगी रही...

"कुच्छ तो ज़रूर हुआ है.. घर से चली तब तो तू बहुत खुश थी.. अचानक तेरे बारह कैसे बज गये.." दिशा ने उसका चाकू वाला हाथ पकड़ लिया," यहाँ आकर खुश नही है क्या?"

"ऐसा कुच्छ नही है दिशा.. बस यूँ ही.. कुच्छ याद आ गया था!.. मैं ठीक हूँ!" गौरी ने अपने आपको सामान्य बना'ने की कोशिश करते हुए कहा...

तभी वाणी वहाँ आ धमकी.. उसके चेहरे से बेकरारी और प्यार की खुमारी पहचान'ना मुश्किल नही था," मैं भी हेल्प करती हूँ.. मनु को भूख लगी है.. जल्दी खाना तैयार करते हैं..."

"अच्च्छाा.. मनु को भूख लगी है.. बाकी किसी को नही!" दिशा ने चटकारे लेते हुए कहा...

वाणी किचन में बैठ कर आता गूँथ रही दिशा के पीछे से उसके गले में बाहें डाल कर लगभग उस पर बैठ ही गयी," नही दीदी.. उसने बोला है ऐसा.. की उसको भूख लगी है.."

"ठीक है ठीक है.. तू ऐसे मत लटका कर.. पता है तू कितनी भारी होती जा रही है.." दिशा का इशारा उसके वजन की और नही.. बल्कि आकर में बढ़ते जा रहे 'संतरों' की और था..

"उम्म्म 46 किलो की ही तो हूँ.." कहते हुए वाणी ने दिशा के उपर अपना वजन और बढ़ा दिया...

"ये अमित करता क्या है?" चुपचाप बैठी गौरी आख़िरकार अमित के प्रति अपनी उत्सुकता दर्शा ही बैठी..

"मैं पूच्छ कर आती हूँ..." कहकर वाणी अंदर भाग गयी...," अमित.. आप करते क्या हो.. दीदी पूच्छ रही हैं..."

"कुच्छ नही करता.. बस ऐश करता हूँ.." अमित ने शरारती मुस्कान फैंकते हुए कहा...

"अरे.. खुशख़बरी देना तो में भूल ही गया था.. हम दोनो का आइआइटी में सेलेक्षन हो गया है.. पिच्छले महीने ही रिज़ल्ट आ गया था.." मनु को अचानक याद आया...

"ये कोई खुशख़बरी हुई.. आइटीआइ तो हमारे गाओं का कल्लू भी करता है.." वाणी ने

जीभ निकाल कर मनु को चिड़ाते हुए कहा....

"पागल वो आइटीआइ है.. मैं आइआइटी की बात कर रहा हूँ.. आइआइटी की.. समझी.."

"सब पता है जी.. ज़्यादा भाव मत खाओ.. मेरा भी सेलेक्षन हो जाएगा आइआइटी में.. एक बार 12थ हो जाने दो.. और तुमसे अच्च्छा रॅंक भी आएगा.." कहकर वाणी वापस किचन में भाग गयी...

"यार ये गौरी तो बहुत गरम माल है.. दिल कर रहा है..आज रात में इसका रेप कर दूं?" अमित ने मनु के कान में फुसफुसाया..

"तुझे.. हर समय यही बातें सूझती हैं क्या?" मनु ने उसको मज़ाक में झिड़का.

"हां भाई.. हम तो ऐसी ही बातें सोच ते हैं.. हम ऐसे आशिक़ नही हैं जो अपने प्यार को सीने में च्छुपाए तड़प्ते रहें.. और मौका मिलने पर भी गँवा

दें.. ये 21वी सदी है दोस्त.. गन्ना उखाड़ो और खेत से बाहर.. समझा.. खैर मेरी छ्चोड़.. अपनी सुना.. तुझे अकेला छ्चोड़ कर गया था.. कुच्छ शुरू किया या नही.." अमित ने मनु को मॉडर्न प्यार का पुराण पढ़ाते हुए पूचछा...

"मैं तेरे जैसा बेशर्म नही हूँ.. प्यार की कदर करना जानता हूँ..." मनु अब

भी अपने विचारों पर कायम था..

" करता रह भाई.. और तब तक करते रहना जब तक वो तुझसे उम्मीद छ्चोड़ कर किसी दूसरे को ना पसंद करने लगे... फिर हिलाना अपना घंटा" दरअसल अमित उसको उकसाना चाह रहा था... अपने जिगरी दोस्त का अंदर ही अंदर कुढना उस'से देखा नही जा रहा था..

" देखते हैं.. अंजाम-ए-इश्क़ क्या होता है.." और मनु मुस्कुराता हुआ आँखें बंद करके अकेले में वाणी के साथ बिताए सुखद पलों को याद करने लगा..

"तुझे पता है मैने गौरी को क्या किया..?" अमित ने मनु को हिलाया..

"क्या किया.. कब?" मनु ने आँखें खोलते हुए उत्सुकता से पूचछा..

"जब हम वापस आ रहे थे तो उसने अंधेरे में मेरे पेट में घूसा मारा

था.. मैने उसकी वो दबा दी..." मनु ने मुस्कुराते हुए कहा...," सच में यार ऐसा लगा मानो पिघल ही जाउन्गा.. बहुत गरम चीज़ है यार.."

" 'वो'? .... क्या मतलब.." मनु ने चौकते हुए पूचछा..

"अरे अब हिन्दी में बुलवाएगा क्या?.. 'वो' मतलब उसकी गा....."

"बस बस... तू तो बहुत ही जालिम चीज़ है यार..." टीवी का वॉल्यूम बढ़ाते हुए मनु ने चेहरा उसकी और घुमा लिया...," पर उसने पहले घूँसा क्यूँ मारा..."

"मैने हौले से उसके कान में कह दिया था कुच्छ..." मनु ने कुच्छ को रहस्या ही रखा..

"कुच्छ क्या.. पूरी बता ना!" मनु उत्तेजित सा होने लगा था.. जान ना पहचान.. पहली ही मुलाकात में गान्ड पकड़ ली...

अमित ने गर्व से अपने कॉलर उपर करते हुए कहा.. "हम तो बंदे ही ऐसे हैं भाई.. फ़ैसला ऑन दा स्पॉट..."

"तू बता ना.. कहा क्या था तूने.." मनु जान'ने के लिए तड़प रहा था..

"बस यही की तुमसे ज़्यादा सेक्सी लड़की मैने आज तक नही देखी.." अमित ने बता ही दिया..

"दिशा ने नही सुना...?" मनु उसको आँखें फाड़ कर देख रहा था..

"नही.. दिशा अलग च्छतरी लेकर चल रही थी.. मैं जान बूझ कर उसकी च्छतरी में आया था... धीरे से कहा था.. उसके कान में"

"साले.. पर तेरी इतनी हिम्मत कैसे हो गयी..?" मनु हैरत में था.. अब तक..

"तभी तो कह रहा हूँ.. अपना गुरु बना ले.. सब कुच्छ सीखा दूँगा.. वो मुझे देखकर मुस्कुराइ थी... और बंदे के लिए इतना काफ़ी था.. उसका हाल-ए-दिल जान'ने के लिए.. वो प्यार की मारी हुई लड़की है जानी.. और हमसे अच्च्छा प्यार आख़िर कौन दे सकता है.. बहुत गरम छ्होरी है यार.. जान भी दे दूँगा.. 'उसकी' लेने के लिए.....

दोनो के बीच काम शस्त्रा पर जिरह जारी थी की दिशा, वाणी, और गौरी खाना लेकर अंदर आ गये...," चलो.. टेबल आगे खेंच लो.. खाना खाते हैं..."

और पाँचों आमने सामने बैठ गये.. वाणी 'अपने' मनु के सामने बैठी थी.. पर गौरी जानबूझ कर वाणी और मनु के बीच अमित के सामने ना बैठकर मनु के पास वाली सीट पर बैठ गयी.. दिशा अमित के सामने थी..

"अब पूच्छ लो दीदी.. इन्न दोनो का आइआइटी में सेलेक्षन हो गया है.." वाणी ने रोटी उठाकर अपनी प्लेट में रखते हुए गौरी से कहा...

"कॉनग्रेटबोथ ऑफ योउ!" दिशा ने दोनो की और मुश्कूराते हुए बधाई दी...

"थॅंक्स.. तुम बधाई नही दोगि गौरी जी!" अमित गौरी के अब तक लाल चेहरे को देखकर मुस्कुराया...

"कॉनग्रेट्स मनु!" गौरी की बधाई मनु तक ही सीमित रही...

"और मुझे...?" अमित ने गौरी की प्लेट से रोटी उठा ली..

एक बार तो गौरी ने अपनी रोटी वापस छ्चीन'ने की कोशिश की पर जब दोनो की आँखें चार हुई तो वो शर्मा गयी...अपने गोरे गालों को पिचकाते हुए दूसरी रोटी उठाते हुए बोली..," भीखरियों को कैसी मुबारकबाद...!"

दिशा ने गौरी की बात पर आसचर्या से उसकी और देखा," तुम्हारा 36 का आँकड़ा कैसे बन गया...?"

"36 का नही.. हमारा 69 का आँकड़ा है..." अमित सच में ही बेबाक और बिंदास था..

गौरी ने किसी अश्लील किताब में '69' पोज़िशन के बारे में पढ़ा था.. बात सुनते ही उसके गाल लाल हो गये.. जांघों के बीच पनिया सी गयी और चेहरे की हालत तो देखते ही बनती थी.. बड़ी मुश्किल से खाने का नीवाला गले के नीचे उतरा..

" '69' का आकड़ा...?" दिशा और वाणी दोनो एक साथ बोल पड़ी..,"वो क्या होता है..?"

"क्कुच्छ नही.. मैं भीखारी हूँ ना... '69' का आकड़ा देने लेने वालों के......"

"खाना खाने दे ना यार.. " मनु को डर था.. अमित का कोई भरोसा नही.. कब क्या बोल दे...!"

"कोई खाने देगा तब ना...." अमित का इशारा गौरी की और था...

"हां हां.. रोटी तो मेरी उठा ही ली..तुम्हे अपने हाथ से खिलवँगी अब..." गौरी तब तक संभाल चुकी थी और फिर से मैदान में थी...

"सच.. मैं धन्य हो जवँगा.. अगर एक बार खाली चखा भी दी तो.." अमित पिछे हटने वालों में से नही था...

दिशा और वाणी दोनो इश्स मीठी झड़प का आनंद ले रहे थे.. वो समझ नही पाई थी की रह रह कर अमित बात को कहाँ लेकर जा रहा है..

"ये ले....!" अमित की हर बात का मतलब समझ रही गौरी के लिए वहाँ बैठना सहन नही हो रहा था... वह उठकर जाने लगी तो वाणी ने उसका हाथ पकड़ लिया..," बैठो ना दीदी.. ऐसे मज़ाक में भी कोई रोता है...!"

दिशा के और कहने पर बड़ी मुश्किल से गौरी वापस वही बैठ गयी...

"अगर तुम्हे मेरी बात से बुरा लगा है तो.... सॉरी" अमित ने उसका हाथ ही तो पकड़ लिया..

गौरी की हालत बिन जल मच्चली की तरह होती जा रही थी.... हाथ छुड़ाने की हल्की सी कोशिश के बाद उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान तेर गयी," अच्च्छा बाबा! अब हाथ तो छ्चोड़ दो.. खाना तो खाने दो!"..

"ये लो.. मैने कौनसा जीवन भर के लिए पकड़ा है.." अमित ने उसके हाथ को ज़ोर से दबाया और छ्चोड़ दिया...

अमित की इश्स बात पर सभी ज़ोर ज़ोर से हंस पड़े....

सकपकाई हुई गौरी ने फिर अमित पर ताना मारा," जीवन भर के लिए कोई बेवकूफ़ ही अपना हाथ तुम्हे सौपेगी..." बहस अब गरम होती जा रही थी.. पर अमित एकदम ठंडा था.. कूल मॅन!

" और तुम्हे वो लेवेल अचीव करने के लिए काई जनम लग जाएँगे... इतनी बेवकूफ़ होने तक की कोई तुम्हारा हाथ पकड़ने की सोचे... जीवन भर के लिए...! तुम्हारा तो चेहरा देखते ही मैं समझ गया था... " अमित को पता था.. उसकी आख़िरी लाइन गजब का असर करेगी.. किसी भी लड़की पर..

"क्या समझ गये थे.. मेरा चेहरा देखते ही..." गौरी ने खाना छ्चोड़ कर उस'से पूचछा.. उसके स्वर में नर्मी थी.. इश्स बार.

"कुच्छ नही.. खाना खा लो!" कहते ही अमित अपना खाना ख़तम करके उठ गया.....

"तुम अंदर बेड पर सोना पसंद करोगे या तुम्हारी भी बाहर चारपाई डालूं.. बारिश थम गयी है.. बाहर बहुत अच्छि हवा चल रही है..." दिशा ने बर्तन सॉफ करके अंदर आते ही मनु और अमित से सवाल किया...

"हां.." मनु आगे बोलने ही वाला था की अमित ने उसका हाथ दबा दिया,"हम अंदर ही सो जाएँगे.. मेरी तबीयत कुच्छ ढीली सी है..!"

मनु कुच्छ ना बोला.. उसने सच में ही अमित को अपना लवगुरु मान लिया था...

"जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.. हम लड़कियाँ तो बाहर मज़े से सोएंगी..."दिशा ने अपनी राय जाहिर की..

"हम भी यहीं सो जाते हैं ना दीदी... अभी तो बहुत बातें भी करेंगे.. अमित और गौरी दी की लड़ाई भी देखनी है..!" वाणी की आखरी लाइन से शरारत भले ही झलक रही हो.. पर उसकी आँखों के भाव मनु से वियोग ना सह सकने की तड़प बयान कर रहे थे...

"तुझे पता भी है.. 11:30 हो गये हैं.. सुबह उठ कर ही बातें करना अब.. देख लो गौरी.. कितने मज़े ले रहे हैं लोग.. तुम दोनो की लड़ाई के!"

गौरी भले ही उपर से अमित से चिडने का दिखावा कर रही हो.. पर अमित ने उसके पहले असफल प्यार की याद ताज़ा करा दी थी.. कुच्छ पलों के दरमियाँ ही उसको अमित में अपनापन सा झलकने लगा था.. नौकझौंक भी तो अपनो में ही होती है.. फिर अमित की आँखों में उसको अपने लिए काफ़ी आकर्षण देखा था.. सुंदर सजीला तो वो था ही.. हाज़िर जवाबी भी कमाल की थी.. और बेबाकी के तो क्या कहने.. गौरी उसकी उस बात को कैसे भूल सकती थी जो उसने उसके कानो में कही थी," तुम बड़ी सेक्सी हो..!" और फिर जहाँ पर उसने हाथ मारा था.. उसकी तो जान ही निकल गयी होती.. उस सुखद अनुभूति को याद करके रह रह कर उसकी जांघों के बीच उफान आ रहा था..," पर दिशा.. मुझे लगता है हमें भी अंदर ही सो जाना चाहिए.. रात को बारिश फिर आ सकती है.. बेवजह नींद खराब होगी.."

"ठीक है.. फिर बरामदे में डाल लेते हैं... ठीक है?" दिशा ऊँच नीच को समझती थी..

अब इश्स बात को काटने के लिए गौरी क्या तर्क लाती...," ठीक है.. पर कुच्छ देर तक तो टी.वी. देख ही लेते हैं..."

"जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.. मैं तो सोने जा रही हूँ.. जब नींद आए तब आकर सो जाना.. बिस्तेर लगा देती हूँ" कहकर दिशा बाहर निकल गयी....

मनु और अमित बेड पर जाकर पसार गये.. वाणी की खुशी का कोई ठिकाना नही था.. अब वो कम से कम कुच्छ समय और मनु का प्यारा चेहरा देख सकती है.. वो सामने वाले सोफे पर जाकर बैठ गयी.. टी.वी. देखना तो एक बहाना था.. रह रह कर उनकी नज़रें मिलती और दिल झंझणा उठते.. आँखों ही आँखों में वो बातें भी हो रही थी.. जिस डर में दिशा ने चारपाई बाहर डाली थी!

"अब बताओ.. तुमने ऐसा क्यूँ बोला था!" गौरी ने अमित को फिर ललकारा.. वजह सिर्फ़ एक ही

थी.. उस'से बातें करने में गौरी को मज़ा आ रहा था...

"क्या बोला था?" अमित ने ऐसा नाटक किया मानो वा सब कुच्छ भूल चुका हो..

"यही की तुम्हारा हाथ पकड़ने के लिए मुझ जैसी लड़की को काई जनम लग जाएँगे..!" गौरी की आँखों में एक आग्रह सा था.. की कड़वा जवाब ना दे.. वो इश्स जुंग को ख़तम करके एक नयी शुरुआत करना चाहती थी.

"मैने ऐसा तो नही बोला?" अमित भी और ज़्यादा बात बढ़ाने के मूड में नही था..

"जो कुच्छ भी बोला था.. पर मतलब तो यही था ना?"

मनु और वाणी को उनकी बहस से अब कोई मतलब नही था.. वो तो अब एक दूसरे में ही खोए हुए थे....

"कुच्छ भी कहो.. पर सच वो था जो मैने तुमसे रास्ते में कहा था.. वो भी तुम्हे बुरा लगा...!" अमित ने करवट लेकर उसकी और चेहरा कर लिया...

"गौरी एक पल के लिए शर्मा सी गयी.. अपने गुलाबी होंठों पर जीभ घुमाई और फिर नज़रें मिलते हुए बोली," पर तुमने हाथ क्यूँ मारा.?"

"कहाँ?" अमित शरारती ढंग से मुस्कुराया..

"तुम सब जानते हो?"

"तुमने भी तो घूँसा मारा था!"

"पर मैने तो पेट में मारा था.. हूल्का सा!" गौरी ने उस पल को याद करके अपनी टाँगें भींच ली... जब अमित ने मजबूती से उसके शरीर के सबसे मस्त हिस्से को एक पल के लिए मजबूती से जाकड़ लिया था..

"आगे पीछे में क्या फ़र्क़ है..?"

"अच्च्छा जी.. कुच्छ फ़र्क़ ही नही है..!" गौरी ने उस'से नज़रें मिलाई पर लज्जावाश तुरंत ही नज़रें हटा ली.. उसके शारीरिक हाव भाव से अमित को पता चल चुका था की वो क्या चाहती है...

"बहुत हो गया.. अब दोस्ती कर लेते हैं.." अमित ने अपना हाथ लेटे लेटे ही उसकी ओर फैला दिया..

"दोस्ती का मतलब समझते हो..?" गौरी की बेकरारी बढ़ती जा रही थी..

"हां.. लड़कियों के मामले में.. गन्ना उखाड़ो और खेत से बाहर!"

"मतलब?" गौरी सच में ही इश्स देसी मुहावरे का मतलब समझ नही पाई...

"कुच्छ नही बस ऐसे ही बोल दिया.. जाओ अब सोने दो!" अमित जान'ता था.. अब वो बात को बीच में नही छ्चोड़ेगी...

"सच में नींद आ रही है क्या?" गौरी का अच्च्छा सा नही लगा..," क्या मैं बहुत बोरिंग हूँ?"

"मैने बताया तो था.. तुम कैसी हो?"

"अब आ भी जाओ.. वाणी.. सुबह उठना भी है.." बाहर से दिशा की आवाज़ आई..

गौरी मायूस होकर उठ गयी.. जाने कैसी ऊटपटांग बातें करती रही.. क्यूँ नही कह पाई अपने दिल की बात.. की.. उसको अमित बहुत अच्च्छा लगा...

बाहर निकलते हुए अचानक वह कुच्छ सोच कर वापस मूडी और अपना हाथ बढ़ा दिया..," दोस्ती?"

अमित ने लपक कर उसका हाथ पकड़ लिया..,"पक्की!"

"एक बात कहूँ?.. मुझे वो बात बुरी नही लगी थी.." कहते हुए गौरी की आँखें लज्जावाश अपने आप ही झुक गयी..

"कौनसी बात?" अमित ने अंजान बनते हुए कहा..

"वही.. जो तुमने रास्ते में कही थी.. और तुम भी वैसे ही हो!" कहकर गौरी ने अपना हाथ झटक लिया और बाहर भाग गयी.. शर्माकर!

वाणी ने अपनी आँखें बंद करके सोने की आक्टिंग कर ली.. उसको पता था.. की सोती हुई 'छुटकी' को दीदी कभी तंग नही करेगी.. वरना उसका मनु से दूर होना तय था.. रात भर के लिए....

"वाणी.. जल्दी बाहर आ जाओ.. सोना नही है क्या?" दिशा ने एक बार फिर पुकारा..

"ये तो सोफे पर ही पसारकार सो गयी.." मनु ने अपनी आवाज़ तेज़ रखी ताकि उसकी झूठ पकड़ी ना जाए..

"ये भी ना.." दिशा उठकर अंदर आ गयी," वाणी.. वाणी!.. उठ रही है या पानी डालूं?" दिशा ने वाणी को पकड़ कर हिलाया..

पर वाणी तो प्रेमसागर में डुबकी लगा रही थी.. पानी की कैसी धमकी.. वो हिली तक नही..

"दिशा को जाने क्यूँ अहसास था की ये नौटंकी हो सकती है.. और जब उसने पेट पर पसरे हाथ को उठाकर गुदगुदी की तो सच सामने आ गया.. वाणी से गुदगुदी सहन नही होती थी.. वह खिलखिलकर अपने को हँसने से ना रोक पाई.. फिर आँखें खोल कर मिन्नत सी की..," सोने दो ना दीदी.. प्लीज़.. मैं यहीं सो जवँगी.. सोफे पर ही.."

अगर मनु अकेला होता तो शायद एक पल के लिए वह अपनी जान को उसकी जान के साथ ही छ्चोड़ भी देती.. पर अमित भी तो साथ था..," नही! चलो बाहर.." आँखें दिखाते हुए दिशा ने वाणी को डाँट लगाई..

मायूस वाणी उठी और रुनवासी सी होकर पैर पटकती कमरे से बाहर जाकर चारपाई पर पसर गयी.. जाने क्या अरमान थे जो खाक हो गये...

"लाइट ऑफ कर दूँ...?" दिशा ने मनु की और देखते हुए कहा..

बेचारे मनु की तो बत्ती गुल हो ही चुकी थी.. जवाब अमित ने दिया..," हां कर दो!"

और अंदर की लाइट ऑफ हो गयी.....

करीब आधा घंटा बाद....

वाणी रो धोकर सो चुकी थी.. दिशा भी गहरी नींद में थी.. पर अमित, मनु और गौरी... तीनो की आँखों से नींद गायब थी.. किस्मत से मिले इश्स मौके को कोई गँवाना नही चाहता था..

"तूने अंदर सोने को क्यूँ कहा.. कम से कम बात तो करते ही रहते..!" मनु को अमित पर गुस्सा आ रहा था..

"थोड़ी देर में अपने आप पता चल जाएगा.. जागता रह.. बस एक काम करना.. कोई भी अगर अब अंदर आए तो हम में से एक बाहर चला जाएगा.. बाकी अपनी अपनी किस्मत..!" अमित ने गुरुमन्तरा मनु को दिया..

"कोई आए मतलब..? तुझे कोई भ्रम है क्या प्यारे!" हालाँकि मनु को उसकी ये आस बहुत प्यारी लगी थी..

"भ्रम नही है बेटा.. पूरा यकीन है.. मैने तो गौरी को इशारा भी किया था.. पता नही समझी की नही.. अगर कोई नही भी आया तो मैं पक्का बाहर जाउन्गा.. तू बता देना.. वाणी को अंदर भेजना हो तो..!" अमित की इश्स बात ने मनु को चौकने पर विवश कर दिया...

"मतलब.. तू.. ?"

"हां.. बिल्कुल ठीक समझा... मैं और गौरी.. अकेले..! तू क्या समझता है.. इतनी मेहनत में यूँही बेकार होने दूँगा... कभी नही..

बस एक बात याद रखना.. अगर गौरी यहाँ आ जाए तो नींद की आक्टिंग किए रहना.. और जब में उसको पूरी तरह तैयार कर दूँ तो एकदम से उठकर बाहर चले जाना.. फिर बाहर चाहे अपनी किस्मत पे रोना या वाणी के साथ सोना.." कहकर अमित मुस्कुराया..

"आइ कान'ट बिलीव यार.. वो नही आएगी.. हाँ अगर राज शर्मा ये कहता तो मैं ज़रूर मान लेता" मनु की पॅंट जांघों पर से बुरी तरह टाइट हो गयी थी..

"तो मैं कब शर्त लगा रहा हूँ.. आ गयी तो ठीक वरना मैं बाहर जाकर उसको जगा लूँगा"

इंतज़ार करते करते जाने कब मनु गहरी नींद में खो गया; पता ही ना चला..

अचानक अंधेरे कमरे के बाहर मद्धयम प्रकाश में एक साया सा उभरा

अमित दम साध कर ये अंदाज़ा लगाने में जुट गया की आख़िर किसकी किस्मत चमकी है.....

अचानक बाहर की लाइट ऑफ हो गयी.. और जो कुच्छ थोड़ा बहुत नज़र आ रहा था वो भी बंद हो गया.. घुपप अंधेरा!

अमित दीवार की और लेटा था.. अब किसी को मालूम नही था की जो साया उनको दिखाई दिया था.. उसने कमरे में प्रवेश किया भी या नही.. मनु गहरी नींद में खो चुका था पर अमित को यकीन था की आने वाली गौरी ही है.. और वो पूरी तरह तैयार था...

पैर दबा कर चलने की हुई हुल्की सी आहट से अमित को अहसास हुआ की दोनो में से एक अंदर आ चुकी है..

अचानक अमित के पैरों पर कोमल हाथ के स्पर्श ने उसके खून को एकदम से गरम कर दिया.. एक पल को उसके दिल में ख़याल आया की उठ कर गौरी को लपक ले.. पर वा जल्दबाज़ी नही करना चाहता था.. सो चुपचाप लेटा रहा..

गौरी का हाथ धीरे धीरे बिना ज़्यादा हुलचल किए उपर की और आता जा रहा था और इसके साथ ही अमित के साँसों में से उसके उबाल चुके खून की गर्मी बढ़ती जा रही थी..

अचानक गौरी ने अपना हाथ वापस खींच लिया और खड़ी हो गयी.. फिर धीरे से फुसफुसाई.. "मनु!"

अमित का दिमाग़ ठनका.. तो क्या ये वाणी है??? पर ऐसा कैसे हो सकता है.. दोनो को हमारी पोज़िशन का पता था.. वह बोलने ही वाला था की अचानक वही फुसफुसाहट अमित के लिए उभरी..," अमित!"

अमित फिर भी कुच्छ ना बोला.. क्या पता जो कोई भी है.. पहले यकीन कर लेना चाहती होगी की दूसरा जाग तो नही रहा.. ये सोचकर अमित ने चुप्पी ही साधे रहना ठीक समझा.. या फिर क्या पता अमित के मॅन में पाप आ गया हो.. गौरी जैसी तो कोईमिल भी जाए.. पर वाणी जैसी तो कोई दूसरी हो ही नही सकती.. भले ही एक दिन के लिए ही क्यूँ ना हो.. भगवान जाने! पर अमित ने निस्चय कर लिया की वो अपनी सोने की आक्टिंग जारी रखेगा और एक बार झड़ने के बाद ही कुच्छ सोचेगा....

जब साए को यकीन हो गया की दोनो सो रहे हैं तो अमित को भी यकीन हो गया की वो गौरी ही है.. पर फिर भी उसको ये देखने में मज़ा आ रहा था की गौरी को सेक्स ज्ञान कितना है और वो क्या क्या करती है...

गौरी आकर अमित के पैरों के पास धीरे से बैठ गयी.. फिर से उसने उसी तरह अपने हाथों को पैरों पर उपर की तरफ चलना शुरू कर दिया.. घुटनों के पास अपना हाथ लाकर गौरी ने हुल्के हुल्के अपने हाथों का दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया.. अमित ने अब भी कोई हुलचल नही दिखाई.. हालाँकि उसकी साँसें ना चाहते हुए भी तेज़ होती जा रही थी..

कुच्छ सोच कर गौरी ने अमित के घुटनो से थोड़ी उपर चट'की काट ली.. पर जीन्स पहने होने की वजह से अमित को ज़्यादा दर्द नही हुआ इसीलिए वह सोते रहने का नाटक करने में कामयाब रहा...

गौरी अपना हाथ थोड़ी उपर और ले गयी.. अब उसका हाथ अमित की पॅंट के सख्ती से उभरे हुए हिस्से पर रखा था.. जब उसने उसको हल्क से सहलाना शुरू किया तो अमित को खुद पर काबू रख पाना मुश्किल हो गया.. उसको लगा की या तो अब पॅंट फट जाएगी या फिर उसका लंड टूट जाएगा..

खैर जल्दी ही उसको इश्स असमन्झस से छुटकारा मिल गया... 'चिर्र्ररर' की आवाज़ के साथ थोड़ी थोड़ी करके गौरी ने उसकी जीप खोल दी.. जीप खुलते ही उसका लंड फंफनता हुआ अंडरवेर के कपड़े में लिपटा खुद ही अपना रास्ता बना कर बाहर निकल आया...

गौरी भी इतनी पागल तो नही थी की उसके लंड की बेकरारी और उसकी लगातार तेज़ हो रही साँसों के बाद भी उसको नींद में ही समझे.. लंड को अपने हाथ में दबाए वह बिस्तेर पर अमित की बराबर में सीधी लेट गयी और उसकी मादक साँसों के अपने चेहरे पर इतनी करीब से इनायत बक्शने से अमित का रोम रोम खिल उठा.. अब वह इश्स बात के लिए तड़प रहा था की कब गौरी उसके लंड को उसके अंडरवेर से निजात दिलाकर सीधे अपने कोमल हाथों में उसको पकड़ेगी....

"आइ लव यू अमित!" अमित के कानो में मस्ती भारी फुसफुसाहट हुई.. अब इसमें कोई शक नही था की सोते हुए पर कहर बरपाने वाली और कोई नही.. बुल्की गौरी ही थी.. फिर भी जितना मज़ा अमित को अब आ रहा था.. इतना उसको जाग कर भी नही मिलता.. इसीलिए उसने गौरी की बात का कोई उत्तर नही दिया..

"मुझे पता है.. तुम जाग रहे हो.. प्लीज़ बाहर आ जाओ.. बाथरूम में.." अमित के कान में इतनी धीरे से बोला गया की कहीं मनु ना जाग जाए.. पर अमित को डर थोड़े ही था.. वह सोया पड़ा रहा.. हर लम्हें को अपनी साँसों में समाने की कोशिश करता हुआ..

कोई जवाब ना मिलने पर गौरी ने अपनी जीभ निकाल और अमित के कान के अंदर डाल कर घुमाने लगी.. उफफफफ्फ़.. हालाँकि अमित का ये पहला सेक्स नही था पर उसको लगा की वो इतना हूल्का हो गया है की अभी आसमान में ही उड़ जाएगा.. अमित हद से ज़्यादा बेचैन हो गया.. ये लंड को आज़ाद क्यूँ नही करती.. उसको भी तो खुलकर मज़े लेने का अधिकार है..

आख़िरकार भगवान ने उसकी सुन ली.. या यूँ कहें की गौरी ने... गौरी उठ बैठी और अंडरवेर में से उस बेमिसाल हथियार को बाहर निकालने का रास्ता खोजने लगी.. गौरी की उंगलियों ने इशारा सा दिया और 6" लंड 'फुक्कक' की आवाज़ के साथ अंडरवेर से बाहर.. अंडरवेर के अंदर कितना रह गया ये अंदाज़ा गौरी लगा नही पाई.. उसके लिए इतना काफ़ी भी था..

कोमल उंगलियाँ कुच्छ पलों तक लंड पर लहराती हुई उसकी मोटाई का जायज़ा लेती रही.. अमित पसीने से तरृ हो गया.. उसको अहसास हो गया की दुनिया का सबसे मुस्किल काम उस वक़्त अपने जज्बातों को काबू में रखना है.. गौरी को अहसास था की वो जाग चुका है और वो मूर्ख खुद को धोखे में रखता हुआ निढाल पड़े रहने की कोशिश करता रहा..

लंड के सूपदे पर उंगलियों की हुलचल ने तो उसका दम ही उखाड़ दिया.. लंड गौरी के छ्होटे हाथों में पूरा नही समा रहा था.. पर सारा दोष उसके हाथों के साइज़ को भी नही दे सकते.. वो फूल कर मोटा ही इतना हो गया था...

कुच्छ देर बाद उंगलियाँ नीचे सरक गयी और सूपदे को किसी गीले मुलायम फंदे ने कस लिया.. ओह माइ गॉड! ये तो गौरी के होन्ट थे..

"ऊऊऊऊष्ह!" इश्स हरकत ने अमित का व्रत आख़िरकार तोड़ ही दिया और वो सिसकारी भर बैठा... लगातार धीरे धीरे उपर से आधे तक लंड का रसमयी होंटो ने नाप लेना शुरू किया तो अमित की सिसकारियाँ अविचल शुरू हो गयी...

"ओह.. माइ गॉड.. क्या चीज़ हो तूमम्म.. थॅंक्स जान.. धीरे करो.. मैं मार जवँगा.. सहन नही.." अमित की आवाज़ जब ऊँची होने लगी तो गौरी के दूसरे हाथ ने उसका मुँह बंद कर दिया..

"आवाज़ मत करो जान.. मनु उठ जाएगा...

अमित का दिल किया की मनु को उठाकर बाहर भेज दे और खुलकर अपनी मर्दानगी पर गौरी को नचाए.. पर उसको डर था की कहीं मनु के जाग जाने पर गौरी हिचक कर चली ना जाए या खुलकर साथ ना दे.. उसने कम से कम एक बार तो ऐसे ही जन्नत की सैर करते रहने का मॅन पक्का कर लिया..

गौरी ने अपने रसीले होंठो से अमित के होंठों को क़ैद कर लिया.. उम्म्म्ममम.. इतने नरम होंठ आज तक कभी अमित ने चखे नही थे..

अमित ने गौरी का चेहरा दोनो हाथो में पकड़ा और कम से कम हुलचल करने की कोशिश करता हुआ अपने और गौरी के तूफान को भड़काता रहा..

करीब 5 मिनिट बाद गौरी ने अमित के कानो में फुसफुसाया.. बाहर आ जाओ ना प्लीज़.. बाथरूम में.."

"नही.. यहीं ठीक है जान.. मनु की नींद गहरी है.. नही खुलेगी.. एक बार यहीं कर लो.. मैं इस्सको बीच में छ्चोड़ना नही चाहता.. और अमित ने अपने हाथों में कपड़ों में क़ैद गौरी की गोलाइयों को भर लिया.....

"ओके. बस एक मिनिट.. मैं कपड़े निकाल कर आती हूँ.. तुम भी तब तक.. कहकर गौरी उठी और दबे पाँव कमरे से बाहर निकल गयी...

कुच्छ ही मिनिट बाद जब गौरी वापस आई तो वो चादर में लिपटी हुई थी.. अगर चादर नही भी होती तो कोई फ़र्क़ नही पड़ना था.. क्यूंकी कमरे में घुपप अंधेरा पसरा हुआ था..

तब तक अमित भी अपनी जान के आदेशानुसर बिल्कुल नंगा हो चुका था.. आते ही गौरी खून की प्यासी जोंक की तरह अमित के नंगे बदन से चिपक गयी.... दो जवान जिस्म नंगे टकराए तो जोश का सैलाब सा दोनो में उमड़ पड़ा.. अमित ने पलक झपकते ही गौरी की चूचियों को हाथों में लपकते हुए उन्न पर बने बड़े अनारदानो से रस निकालने की कोशिश करने लगा.. गौरी भी बहक चुकी थी.. अब उस'से एक पल का भी इंतजार नही हो रहा था....

मैं तुम्हे अपने अंदर लेना चाहती हूँ अमित.. प्लीज़!"

अमित तो कब से यही माला रट रहा था..,"उपर आ जाओ!"

"नही.. मनु जाग जाएगा.. बाथरूम में चलो ना प्लीज़....." धीरे से गौरी उसके कान में फुसफुसाई....

"ठीक है.. चलो.. कहकर अमित ने गौरी को छ्चोड़ दिया..

गौरी उठकर धीरे धीरे चलती हुई बाथरूम में चली गयी.. अमित उसके पिछे पिछे....

अमित ने गौरी को अपनी बाहों मैं भर लिया उसने एक हाथ से बाथरूम की लाइट ऑन कर दी जब लाइट की चमक उसकी आंखों पर पड़ी तो उसने अपनी बंद आँखें खोल दी अमित ने देखा वह तो एक सपना था लकिन सपना कितना प्यारा था अब अमित ने फ़िर से अपनी आँखे बंद कर ली और जल्दी ही वह सपने मैं खो गया
 
गर्ल्स स्कूल--32

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा आपके लिए गर्ल्स स्कूल पार्ट 32 लेकर आपके सामने हाजिर हूँ दोस्तो जिन दोस्तो ने इस कहानी के इस पार्ट को पहली बार पढ़ा है उनकी समझ मैं ये कहानी नही आएगी इसलिए आप इस कहानी को पहले पार्ट से पढ़े

तब आप इस कहानी का पूरा मज़ा उठा पाएँगे आप पूरी कहानी मेरे ब्लॉग -कामुक-कहानियाँब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम पर पढ़ सकते है अगर आपको लिंक मिलने मैं कोई समस्या हो तो आप बेहिचक मुझे मेल कर सकते हैं अब आप कहानी पढ़ें.दोस्तो जैसा की मैं पहले पार्ट मैं बता चुका हूँ अमित गोरी को सपने मैं चोदने के लिए बाथरूम मैं ले जाता है ओर जैसे लाइट जलता है उसकी नींद खुल जाती है अब आगे की कहानी

रात के करीब 11:30 बज चुके थे.. आसमान में फैली सावनी घटायें अपनी ज़िद छ्चोड़ने को कतयि तैयार नही दिखाई दे रही थी.. ऐसे में बूँदों का च्चामच्छां संगीत तड़पति जवान धड़कानों को कैसे ना भड़काने पर मजबूर करता.. वाणी के सपने भी अब मनु-मिलाप से ही जुड़े हुए थे.. सो रही वाणी को अहसास हुआ जैसे किसी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा हो.. मनु के अलावा और हो ही कौन सकता था.. वाणी अपने में ही सिमट गयी.. मनु का हाथ उसके सिर से फिसल कर उसके माथे पर आया और उसने वाणी की शरमाई कुम्हलाई आँखों को अपने हाथ से ढक दिया.. बंद आँखों में हज़ारों सपने जीवंत हो उठे.. होंठों पर मुस्कान तेर उठी.. धड़कने तेज होना शुरू हो गयी..

अचानक मनु झुका और वाणी के सुर्ख गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों की नज़ाकत को अपने तड़प रहे होंठों से इज़्ज़त बक्श दी.. होंठों से होंठों का मिलन इतनी सुखद अनुभूति देने वाला था की वाणी के हाथ अपने आप ही उपर उठ कर मनु के सिर को बलों से पकड़ कर अपनी सहमति और समर्पण प्रकट करने विवश हो गये.. हाथ कुच्छ ना आने पर वाणी बेचैन हो गयी और हड़बड़कर जाग गयी.. क्या ये सिर्फ़ सपना था.. नही.. कैसे हो सकता है.. अगर ऐसा था तो फिर कैसे उसके होंठों में अब तक चुंबन की मिठास कायम थी.. उसकी मांसल चूचियों में कसाव का कारण क्या था..

वाणी ने अपनी आँखें खोली और अपने दाई तरफ चारपाइयों पर निसचिंत होकर सो रही दिशा और गौरी को देखा.. दबे पाँव उठी और बिना चप्पल पहने ही अंदर कमरे के दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो गयी.... अंधेरे के कारण कुच्छ भी दिखाई ना दिया..

दरवाजे पर उभर आए साए को देख कर अमित की बाँछे खिल गयी.. उसने अपनी आँखें एक पल को भी झपकाई नही थी.. दिल-ए-गुलजार गौरी के आने की उम्मीद में...

वाणी को काफ़ी देर तक वहीं खड़ी देख कर अमित उसको गौरी समझ कर खुद को रोक नही पाया," आ जाओ ना.. जाने मॅन.. और कितना तदपाओगि.."

बात धीरे से ही कही थी.. मगर वाणी को हर अक्सर सपस्ट सुनाई दिया.. वो सकपका गयी.. आवाज़ अमित की थी.. मनु तो इतना बेशर्म हो ही नही सकता की अपने दिल के अरमानो को यूँ सीधे शब्दों में डाल कर बोल सके.. तो क्या????

पकड़ी जाने की ज़िल्लत सी महसूस करते हुए वाणी उल्टे पाँव दौड़ गयी और वापस अपनी चारपाई पर जाकर चादर ओढ़ ली...

अमित को पक्का यकीन था की आने वाली और कोई नही बुल्की गौरी ही है जो उसको बताने आई है की वो भी उसके लिए अब तक जाग रही है.. ये निमंत्रण नही तो और क्या है? अमित का रोम रोम खुशी से पागल हो उठा..," मनु.. देखा मैने कहा था ना.. गौरी ज़रूर आएगी...!"

"मनु!.... मनु? अबे ये सोने की रात नही है.. उठ"

मनु आँखें मलते हुए उठ बैठा..," क्या हुआ?"

"गौरी आई थी यार.. वापस भाग गयी.. अगर तू नही होता तो.. आज पक्का.."

"क्या??? सच...!"

"और नही तो क्या.. मैने कोई सपना देखा था.. अरे एक पल के लिए भी पलकें नही झपकाई.. मुझे विस्वास था.. मैने उसकी आँखों में वो सब देख लिया था.. उसकी आँखों में प्यार की तड़प थी.. वासना की महक उसके बदन से आ रही थी.... यार एक काम करेगा..???"

"क्या?" मनु की नींद खुल गयी थी..

"तू बाहर चला जा यार.. मुझे यकीन है.. वो तेरी वजह से ही अंदर नही आई.. वरना.....!!! मुझे यकीन है.. वो फिर आएगी!"

"पर यार रात में अब बाहर कैसे जाऊं... बारिश भी हो रही है.. अभी भी..!"

"प्लीज़ यार.. मान जा.. तू उपर चला जा घंटे भर के लिए.. उपर बरामदा भी है.. " अमित ने मनु की और अनुनय की द्रिस्ति से देखा...

"ठीक है यार.. चला जाता हूँ.. पर मुझे डर लग रहा है.. अगर दिशा दीदी जाग गयी तो मुँह दिखाने के लायक नही

रहूँगा मैं.. देख लेना..!" मनु बेड से नीचे चप्पल ढ़हूँढने लगा..

"नही जागेगी यार.. मैं तेरा अहसान भूल नही पाउन्गा...

मनु एक पल के लिए वाणी की चारपाई के पास रुका.. मुँह पर चादर नही होने के कारण उसको हल्क अंधेरे में पहचान'ने में मनु को कोई दिक्कत ना हुई..

वाणी ने भी मनु को देख लिया था.. अब आँखें बंद करके अपनी सदाबहार मुस्कान को चेहरे पर ले आई थी.. वो समझ रही थी की मनु उसको देखकर ही बाहर आया है.. ऐसे में प्यार की तड़प से भरे अपने दिल को काबू में रख पाना उसके बस का कहाँ था..

मनु ने वाणी का चेहरा गौर से देखा.. सोने का नाटक कर रही वाणी के चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश करता हुआ मनु दोनो पर नज़र डालने के बाद उसके पास बैठने को हुआ.. पर उसको पता था की गौरी जाग रही है.. मन मसोस कर अपनी हसरत को दिल में दबाया और टहलते हुए उपर चला गया..

वाणी सोच में पड़ गयी.. क्या मनु उसको उपर आने का इशारा करके गया है... या फिर यूँ ही... बाथरूम तो बरामदे के साथ ही है.. फिर उपर जाने का मतलब इसके अलावा और क्या हो सकता है... मुझे उपर जाना चाहिए या नही.. कहीं किसी ने देख लिया तो.. कहीं दीदी जाग गयी तो..

वाणी अभी तक इसी उधेड़बुन में थी की अमित को कमरे से बाहर आते देख वह चौंक गयी.. अधखुली आँखों से वो ये देखने में जुट गयी की आख़िर ये सब हो क्या रहा है...?

अमित दरवाजे पर ही खड़े होकर माहौल का जयजा लिया.. अंधेरे में वो समझ नही पा रहा था की कौन कहाँ लेटा है.. कुच्छ पल उसने वहीं खड़े होकर इश्स बात के लिए इंतज़ार किया की गौरी खुद ही उसको देख कर उठ जाए.. पर गौरी कहाँ उठती.. चोरों की तरह वो दो चार कदम चल कर उनके पास आया..

पहली चारपाई पर जब वह झुका.. वाणी ने अपनी आँखें बंद करके साँस रोक ली..

वहाँ वाणी को देखकर वह दूसरी चारपाई की और चला.. गौरी को वहाँ पाकर वह उसके सिर की तरफ ज़मीन पर बैठ गया.. क्या मस्ती से सोने का नाटक कर रही है.. सोचकर अमित ने माथे पर रखे उसके हाथ को हुल्के से पकड़ा और धीरे से आवाज़ निकाली..," गौरी!"

गौरी नींद में हड़बड़कर उठ बैठी.. गनीमत थी की अमित ने उसके मुँह पर हाथ रख लिया वरना वा चिल्ला ही देती शायद..

"आवाज़ मत निकलना.. दीदी जाग जाएँगी.. अंदर आ जाओ.."

"क्यूँ???" गौरी पर अभी भी नींद की खुमारी च्छाई हुई थी.. उसने 'क्यूँ' कहा और फिर से लेट गयी...

वाणी बड़े गौर से अमित को देख रही थी.. अमित उसके कान के पास अपने होंठ लेकर गया और फुसफुसाया..," अंदर आ जाओ.. सब बताता हूँ.."

अबकी बार ही जैसे असलियत में गौरी की नींद खुली.. उसका एक बार फिर चौंक कर बैठना और अजीबो ग़रीब प्रतिक्रिया देना इसी बात की पुस्ती कर रहा था.. हालाँकि वा भी बहुत ही धीरे बोली थी..," क्या है.. मरवाओगे क्या.? भागो यहाँ से..!"

"प्लीज़ एक बार अंदर आ जाओ.. मुझे बहुत ज़रूरी बात करनी है.. अभी तुम आई तो थी दरवाजे पर.. क्यूँ आक्टिंग कर रही हो.." अमित की दिलेरी देखकर वाणी सच में हैरान थी.. उस बात पर तो उसने मुश्किल से अपनी हँसी रोकी की गौरी दरवाजे पर गयी थी..

"क्या बकवास कर रहे हो.. मैं तो सो रही हूँ.. अभी भाग जाओ अंदर वरना में दिशा को जगा दूँगी ." गौरी ने अपनी शर्ट को ठीक करते हुए कहा...

"मैं नही जाउन्गा.. चाहे किसी को जगा दो.. तुम्हे एक बार अंदर आना ही पड़ेगा.." अमित को यकीन था की गौरी सब नाटक कर रही है..

"प्लीज़.. मुझे नींद आ रही है.. सोने दो ना!" हालाँकि अब तक नींद गौरी की आँखों से कोसो दूर जा चुकी थी...

"प्लीज़ सिर्फ़ एक बार आ जाओ.. मुझे तुमसे कुच्छ कहना है...."

"नही.. यहीं कह लो.. अंदर मनु होगा..!" गौरी लाइन पर आती दिखाई दी...

"मनु अंदर नही है.. और मैं अंदर जा रहा हूँ.. दो मिनिट के अंदर आ जाना.. नही तो मैं वापस आ जाउन्गा.." कहकर बिना गौरी की बात सुने अमित अंदर चला गया...

"अजीब ब्लॅकमेलिंग है!" नींद की खुमारी से निकल कर 'अब क्या होगा?' की सुखद जिगयसा में गौरी ने दोनो तरफ करवट ली; ये सुनिसचीत किया की कोई जाग तो नही रहा है..... और उठकर बाथरूम में चली गयी..

करीब 5 मिनिट बाद चौकसी से दिशा और वाणी पर एक सरसरी नज़र डाल कर गौरी अंदर वाले कमरे के दरवाजे से 2 फीट अंदर जाकर खड़ी हो गयी,"क्या है? जल्दी बोलो...

"ज़रा इधर तो आओ!" बेड पर बेताबी से गौरी के आने की उम्मीद में बैठे अमित की ख़ुसी का ठिकाना ना रहा...

"नाहही.. मैं और अंदर नही आउन्गि!" गौरी को भी तो नखरे आते थे आख़िर.. हर लड़की की तरह..

"सुनो तो... सुनो ना एक बार.. प्लीज़.. यहाँ आओ!" अमित उसको हासिल करने के लिए अधीर हो रहा था...

"क्या है? यहाँ आने से क्या हो जाएगा.... लो आ गयी.. बोलो!" अमित की मंशाओं से अंजान और नादान बन'ने का नाटक करती हुई गौरी बेड के करीब जाकर खड़ी हो गयी...

"बैठो तो सही.. मैं तुम्हे खा तो नही जाउन्गा!" अब दोनो को एक दूसरे का चेहरा कुच्छ कुच्छ दिखाई दे रहा था...

"तुम बता रहे हो या मैं जाउ.. मुझे डर लग रहा है...!" गौरी ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा..

"मुझसे? .... मुझसे कैसा डर... बैठो ना प्लीज़!" अमित बेड पर उसकी तरफ सरक आया.. गौरी ने पिछे हट'ने की कोई कोशिश नही की...

"तुमसे नही.. मुझे डर लग रहा है की कहीं दिशा जाग ना जाए..." बीत'ने वाले हर पल के साथ गौरी पिघलती जा रही थी... ,"कहीं मनु ना आ जाए.. वो किसलिए गया है उपर..."

अमित ने आगे बढ़कर उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया," तुम सच में बहुत सेक्सी हो गौरी... तुम जैसी लड़की मैने आज तक नही देखी..!"

"आज तक कितनी लड़कियों को बोली है ये बात..!" गौरी ने अपना हाथ छुड़ाने की आधी अधूरी सी कोशिश की... पर सफल ना हुई...

"सिर्फ़ तीन को.. तुम्हारी कसम.. पर मैं भी क्या करूँ.. तब तक मैने तुम्हे नही देखा था..." अमित ने उसका हाथ दबाते हुए खीँसे निपोरी....

गौरी अमित का जवाब सुनकर हँसे बिना ना रह सकी...,"मैने तुम्हारे जैसा पागल आज तक नही देखा..."

"बैठो ना.. अभी सारी रात पड़ी है.. मेरा पागलपन देखने के लिए..." कहते हुए अमित ने उसका हाथ दबाया तो अपने कपड़े ठीक करती हुई गौरी बेड के कोने पर बैठ गयी..," तुम कुच्छ कह रहे थे.. जल्दी बोलो ना.. मुझे नींद आ रही है.."

"तो यहीं लेट जाओ.. सुबह उठा दूँगा.. दिशा के उठने से पहले!" अमित मुस्कुराया..

"तुम तो सच में ही पागल हो.. मैं यहाँ तुम्हारे साथ सोऊगी.." गौरी ने बन'ने की कोशिश की...

"क्यूँ?.. मुझमें से बदबू आती है क्या?" अमित कौनसा कम था..

"मैं ऐसा नही कह रही..... तुम सब समझ रहे हो..." ज़रूर गौरी इश्स वक़्त तक पसीज चुकी होगी.. अंधेरे की वजह से अमित उसके चेहरे के भाव पढ़ नही पा रहा था...

"समझती तो तुम भी सब कुच्छ हो.. है ना..."

गौरी ने इश्स बात पर सिर झुका लिया.. शायद वो मुस्कुरा रही थी...

"बताओ ना.. सब समझती हो ना...!"अमित धीरे धीरे करके उसके और करीब आता जा रहा था...अब अमित ने उसका दूसरा हाथ भी अपने हाथ में पकड़ लिया..

"तुम बोलो ना .. क्या कह रहे थे.. क्यूँ बुलाया मुझे.." गौरी जानती तो सब कुच्छ थी.... तैयार भी थी.. पर पहल कैसे करती...

"वो तुमने सोने जाते हुए मुझसे हाथ मिलाकर एक बात कही थी.. याद है?" अमित ने उसकी उंगलियों को अपने हाथों में लेकर दबाना शुरू कर दिया था.. गौरी की साँसों में तीव्रता आना स्वाभाविक था...,"क्या?"

"यही की जो कुच्छ मैने रास्ते में किया.. वो तुम्हे बुरा नही लगा था..."

"हां.. उस वक़्त लगा था.. पर बाद में नही...!" गौरी ने अपना चेहरा एक तरफ कर लिया...

"क्क्या मैं एक बार तुम्हे छू सकता हूँ..!" अमित का कहने का तरीका निहायत ही रोमॅंटिक था...

"छ्छू तो रखा है.. और कैसे च्छुओगे..!" गौरी ने अमित द्वारा पकड़े दोनो हाथों की तरफ इशारा करते हुए कहा..

"नही.. ज़रा और करीब से.. ज़रा और मर्दानगी से... ज़रा और दीवानगी से!" अमित ने हाथों को छ्चोड़ कर उसका चेहरा अपने हाथों में ले लिया.. अमित के अंगूठे गौरी के लबों पर जाकर टिक गये...

"वो कैसे?" शर्म और उत्तेजना की अग्नि में तप रही गौरी अपनी सुध बुध खोती जा रही थी.. अब उसकी साँसे सीधे अमित के नथुनो से टकरा रही थी... क्या मादक गंध थी गौरी की...

"ऐसे..." अमित ने कोई ज़बरदस्ती या जल्दबाज़ी नही की... हौले हौले से अपने होंठों को उन्न बेमिसाल होंठों के पास ले गया.. हालाँकि गौरी की नज़रें झुक गयी और वो काँपने सी लगी थी.. पर किसी तरह का प्रतिरोध उसने नही किया.. और अमित ने आँखें बंद करके अपने होंठों से उसकी गरम साँसे अंदर ही दफ़न कर दी.. दोनो के शरीर में अजीब सी लहर उठी.. गौरी की आँखें बंद थी.. हाथ अब तक नीचे ही टीके हुए थे... और वो अपनी तरफ से कोई हरकत नही कर रही थी.. यहाँ तक भी उसके होंठ तक उसने नही हिलाए...

करीब 3-4 मिनिट बाद जब अमित अमृतपान करके हटा तो गौरी का बुरा हाल था.. लंबी लंबी साँसे ले रही थी.. मदमस्त चूचियों के आकर में हूल्का सा उभार आ गया था.. और बदहवास सी नीचे की और देख रही थी..

गौरी के लबों को चूसने से अमित को इतना आनंद आया था की जब हटा तो पागलों की तरह उसके होंठ ही देखता रहा..

गौरी ने ही चुप्पी तोड़ी," छ्छू लिया हो तो मैं जाउ..!"

"अभी कहाँ.... अभी तो पता नही क्या क्या छ्छूना बाकी है.... मैं लाइट जला देता हूँ.. दरवाजा बंद करके....

"लाइट मत जलाओ प्लीज़....!"

"कुच्छ नही होता! एक मिनिट..." कहते हुए अमित ने दरवाजा बंद करके लाइट ऑन कर दी...

"गौरी का सुर्ख लाल हो चुका चेहरा दूधिया रोशनी में नहा गया.. उसकी आँखें झुकी हुई थी.. छ्चातियाँ फेडक रही थी.. दिल के ज़ोर ज़ोर से धड़कने के साथ ही....

अमित आकर उसके सामने बैठ गया और भगवान की दी इस नियामत को सच में ही पागलों की तरह निहारने लगा........

गौरी के अंदर जाने के बाद वाणी खुद को ज़्यादा देर तक रोक नही पाई.. अमित ने किए तरह बेबाक तरीके से गौरी को अंदर आने को कह दिया.. दोनो को एक दूसरे से मिले अभी चाँद घंटे ही तो हुए थे.. फिर वह और मनु तो एक दूसरे के जज्बातों से वाकिफ़ हैं.. वो ही क्यूँ दूर दूर तड़प्ते रहें.. वाणी ने दम साध कर दिशा की साँसों का मुआयना किया.. वो घर में चल रही हलचलों से निसचिंत दूसरी और मुँह करके सो रही थी...

वाणी को अपनी चारपाई पर पड़े दोनो तकियों को तरीके से चारपाई पर लिटाया और उन्न पर चादर ढक दी.. अगर ध्यान से नज़र ना डाली जाए तो यही आभास होता था की कोई सो रहा है..

एक बार फिर उसने अपनी दीदी पर सरसरी नज़र डाली और दो चार कदम सावधानी से बरामदे से बाहर की और रखे.. और सीधा उपर की और रुख़ कर लिया...

"कौन है...?" सीढ़ियों में दिखाई दे रहे मानव धड़ को देख को देख कर मनु चौंक गया..

"मैं हूँ... तुम.... उपर क्या कर रहे हो?" वाणी की कशिश भारी आवाज़ भी उस वक़्त मनु को उत्साहित ना कर पाई...

".. मैं तो बस ऐसे ही आ गया था.. नींद नही आ रही थी.. पर तुम.. तुम कैसे जाग गयी..?"

"मैं भी बस ऐसे ही आ गयी.. जैसे तुम आ गये.. मुझे भी नींद नही आ रही थी! मैं तुम्हे देखने अंदर भी गयी थी.. पर वो अमित अजीब तरीके से मुझे अंदर बुलाने लगा" वाणी अब मनु के करीब आकर बरामदे में खड़ी हो गयी थी.. दो दिलों के बीच अब दो कदम का ही फासला था.. और कोई अड़चन भी नही थी.. दूरियाँ कभी भी जवानी की रो में बह सकती थी.. मिट सकती थी..

"क्या कब आई थी तुम अंदर... तो क्या वो तुम थी..? हे भगवान.."

"क्या हुआ? क्या तुम भी जाग रहे थे.. तब.. जब में दरवाजे पर आई थी.." दिल में जाने कितने अरमान धधक रहे थे.. पर वाणी औपचारिकताओं से आगे बढ़ नही पा रही थी..

"न..नही.. पर मुझे नीचे जाना होगा.. नही तो अनर्थ हो जाएगा...!" मनु को याद आया की दरवाजे पर खड़ी वाणी को अमित ने गौरी समझ लिया था.. कहीं वो उसको जाकर च्छेद ना दे और कोई पंगा ना हो जाए..

वाणी ने कदम बढ़ा रहे मनु के हाथ को अपने दोनो हाथों की हथकड़ी बना कर पकड़ लिया.. उसकी इश्स अदा पर कौन ना कुर्बान ना हो जाए,"क्या अनर्थ हो जाएगा.. मैं इतनी भी मनहूस नही हूँ.." वाणी की आँखों में आज की रात को 'पहली रात' बना देने की बेकरारी को समझना कोई बड़ा काम नही था...

"न..नही.. वो ऐसी बात नही है...तुम नही समझोगी.. मुझे जाने दो.." मनु को लग ही रहा था की आज तो बचना मुश्किल है.. बड़ी किरकिरी होगी..

"क्यूँ नही समझूंगी.. मैं कोई बच्ची हूँ क्या..?" वाणी ने कहते हुए अपनी कातिल मस्तियों की और झुक कर देखा.. सबूत बहुत ही सॉलिड था की वो अब बच्ची नही बल्कि बड़े बड़ों के होश ख़स्ता करने का दम रखती है...

"न्नाही.. दर-असल.. ववो अमित कह रहा था की दरवाजे पर.. गौरी आई थी.. उसके लिए..कहीं वो.... " मनु वाणी की दिलफैंक अदा से अपनी आवाज़ पर काबू सा खो बैठा..

"वो तो गौरी को उठा कर ले भी गया.. अंदर!" वाणी की आँखों में सम्मोहित करने की ताक़त थी.. उसको भी उठा ले जाने का निमंत्रण था..

"उठा ले गया.. मतलब?" मनु को अमित की जानलेवा दिलेरी पर एक पल को यकीन नही हुआ..

"अमित ने उसको बुलाया और वो अंदर चली गयी.. इश्स'से ज़्यादा मुझे कुच्छ नही पता.. मतलब..!" वाणी मनु को इधर उधर ही दिमाग़ को पटकते देख नाराज़ हो गयी.. मुँह फूला लिया और जाकर बारिश में खड़ी हो गयी...

"वहाँ कहाँ जा रही हो.. भीग जाओगी..!" मनु ने बरामदे से ही उसको हल्क से पुकारा...

"भीगने दो.. तुम्हे क्या है? तुम्हे तो बस अमित की पड़ी है.. मैं तो पागल हूँ जो दीदी का डर छ्चोड़ कर बिन बुलाए तुम्हारे पास आ गयी.." नखरे में अपनेपन की मिठास थी.. और बारिश में भीग रहे कुंवारे बदन की प्यास भी..

"तुम तो नाराज़ हो गयी... मैं... हां क्या कह रही थी तुम.. तुम बच्ची नही हो!" मनु भी बाहर निकल कर छत की मुंडेर पर हाथ रखे खड़ी वाणी से एक कदम पिछे खड़ा हो गया.. वाणी की टी-शर्ट भीग कर उसकी कमर से चिपक गयी थी.. हल्क अंधेरे में जैसे वाणी के बदन से प्रकाश फुट रहा हो.. पतली कमर जैसे बहुत ही नाज़ुक रेशे की बनी थी.. कमर से उपर और नीचे की चौड़ाई समान लगती थी.. 34" की होंगी.. पिच्छली गोलाइयों का तो कोई जवाब शायद अब भगवान के पास भी नही होगा.. मानो नारी-अंगों की श्रेष्टा मापने के पैमाने की सुई भी

उनको मापने की कोशिश में टूट जाए.. इतनी गोल.. इतनी मादक.. इतनी चिकनी... इतनी उत्तेजक.. और इतनी शानदार की अगर 'रस' का कोई कवि कल्पना में उनका वर्णन करे तो आप कह उठे.. 'असंभव है..'.... पर्फेक्ट आस.. टू ... टू टच.. टू लीक.. टू लव... टू फक!!!!!

मनु वाणी के इश्स काम रूप को देख कर पागल सा हो उठा.. अंदर वाली 'बात' बाहर निकल आने को फड़कने लगी.. पॅंट में मनु के 'मन' का दम निकालने लगा.. अगर कुच्छ और देर वाणी इसी स्थिति में खड़ी रहती तो 'कुच्छ और' ही हो जाना था..

मनु को अपने पास खड़े होने का अहसास पाकर वाणी पलट गयी,"और नही तो क्या.. दिखाई नही देता.. मैं कोई बच्ची हूँ...?"

उफफफ्फ़.. क्या कयामत ढा गयी थी वाणी पलटने के साथ ही.. मनु का बचा खुचा संयम भी दम तोड़'ने वाला था.. हुल्की रिमझिम बारिश आग में घी डाल रही थी.. मुलायम सा कपड़ा उसके रोम रोम से चिपका हुआ था.. 'रोम-रोम' से.. मनु की नज़र वाणी के योवन की दहलीज से आगे निकल जाने का प्रमाण बने दोनो वक्षों की धारदार गोलाइयों पर जाकर जम सी गयी.. यूँ तो वाणी को बिना कपड़ों के भी मनु देख चुका था.. पर वो सब विवस'ता वश हुआ था.. आज कपड़े के झीने आवरण से ढाकी वाणी का अंग अंग फेडक रहा था.. भीगे हुए उसके गुलाबी होंठों से लेकर चौड़े कुल्हों तक.. गोल लंबी जांघों तक.. और जांघों के बीच उनके मिलन बिंदु पर फुदाक रही चिड़िया तक.. वाणी का क़तरा कतरा छ्छूने लायक था... चूमने लायक

था.. और उन्न पर पागलों की तरह च्छा जाने लायक था.. मंतरा मुग्ध सा मनु कुच्छ भी बोल ना सका.. हुष्ण के मारे आशिक की तरह घूरता ही रहा.. घूरता ही रहा.. घूरता ही रहा...

मनु को मजनू की तरह एकटक उसकी और देखते पाकर वाणी बाहर से शर्मा गयी और अंदर से गद्रा गयी.. वापस पिछे घूम कर वाणी ने अपनी छातियों को देखा.. लग रहा था मानो उन्न पर कपड़ा हो ही ना.. कसमसा रही गोलाइयाँ घुटन सी महसूस कर रही थी.. छातियों के बीच में 'मोती' अपना सिर उठाए खड़े थे.. उनका पैनापन बढ़ गया था.. वाणी अपनी ही 'अनमोल जागीर' को देखकर सिहर सी गयी.. फिर कब से उनको पाने की हसरत लिए मनु का क्या हाल हुआ होगा.. ये समझना वाणी के लिए कोई कठिन काम नही होगा.. काम-कल्पना के सागर में ही मनु को इश्स कदर डूबा देखकर वाणी 'गीली' हो गयी... उसने अपनी जांघों को ज़ोर से भींच लिया.. मानो मनु के कहर से अभी बचना चाह रही हो.. पर ऐसा हो ना सका.. हो कैसे सकता था.. पिच्छवाड़ा पागलपन को और बढ़ा गया.. मनु एक कदम आगे बढ़ा और वाणी के दोनो और से अपने हाथ सीधे करके दीवार पर टीका दिए...," सचमुच! ...... तुम... बच्ची नही रही वाणी.." कहते हुए मनु के होंठ काँप उठे.. शरीर की अकड़न बढ़ गयी.. दोनो के बीच जो झिर्री भर का फासला रह गया था; उसको मनु की बढ़ती 'लंबाई' ने माप लिया..

"आआह.." इश्स 'च्छुअन' से वाणी अंजान नही थी.. महीनों पहले अंजाने में ही सही.. पर वो शमशेर की 'टाँग' से मिलने वाले इश्स अभूतपूर्व अहसास को महसूस कर चुकी थी...

आसमनझास में खड़ी वाणी ने कुच्छ समझ ना आने पर अपने अंगों को इसी हालत

में तड़प्ते रहने के लिए छ्चोड़ दिया.. 'मनु' को महसूस करते रहने के लिए..

"एक बात पूच्छू..?" मनु ने वाणी की मादक 'आह' को सुन'ने पर कहा..

"हूंम्म्म.." वाणी तो जन्नत की सैर कर रही थी.. आधी होश में थी.. आधी मदहोश.. लगातार उसकी 'दरारों' से छ्छू रहे 'मनु' के कारण वा पल पल उत्तेजित होती जा रही थी.. उपर से बरस रहे बादल उसकी हालत को और बिगड़ रहे थे...

"डू यू लव मी?"( दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा ये समझता हूँ ये आशिक भी बिल्कुल पागल होते हेँ अब इस मनु को ही लीजिए अँग्रेज़ी में पूच्छने सेशरम शायद कुच्छ कूम हो जाती होगी.. नही तो हिन्दी में ही ना पूच्छ लेता..)

वाणी कुच्छ ना बोली.. पूछते हुए मनु थोड़ा आगे की और झुका था.. 'रगड़' अति आनंदकरी थी.. शायद इसी 'रगड़ को वह फिर महसूस करना चाहती थी...

"तुमने जवाब नही दिया!" एक बार फिर मनु आगे की और झुका.. इश्स बार कुच्छ ज़्यादा..

वाणी की जांघों का कसाव बढ़ गया.. हूल्का सा खोलने के बावजूद...

"जवाब देना ज़रूरी है क्या?" वाणी ने गर्दन उपर उठाकर अंगड़ाई सी ली.. अंग अंग चटक उठा.. अंग अंग 'हां' कह उठा.. वाणी की कमर मनु की छाती से चिपक गयी...

"हां.. बहुत ज़रूरी है.. तुम नही जानती.. मैं..." मनु ने अपने हाथों से दीवार पर रखी वाणी की हथेलिया दबा ली.. थोड़ा सा और आगे होकर..

और वाणी की आवाज़ निकल ही गयी..,"मैं मर जाउन्गि!" वह अब प्रोक्श चुभन को सहन करने की स्थिति में नही थी...

बारिश की बूँदें मनु के बालों से होकर वाणी के गालों पर टपक रही थी.. जैसे कोई संदेश दे रही हों.. मिलन का.. जैसे वो भी इश्स 'उत्सव' का आनंद उठाने के लिए तरस कर बरस रही हों...

"बुरा लग रहा है क्या?" मनु थोड़ा पिछे हट गया.. कितना नालयक था 'प्रेम-गेम' में.. समझ ही नही पाया.. वाणी ने क्यूँ कहा की वो मर जाएगी...

मनु का पिछे हटना वाणी की जवानी को नागवार गुजरा.. यहाँ तक आने के बाद पिछे हटना.. सच में ही जानलेवा हो सकता था..

तुम..? तुम करते हो हमसे प्यार?" मनु के पिछे हटने से बेकरार वाणी ने अपने को और आगे की और झुका लिया.. प्रेमरस और सावन की फुहारों से वाणी की जांघें तर होकर टपक रही थी...

ये सुनकर मनु के दम तोड़ रहे हौसलों में फिर से जान आ गयी,"हां.. बहुत प्यार करता हूँ.. जब से तुम्हे देखा है.. कुच्छ और देखने का मॅन ही नही करता.. समझ नही आता.. क्या करूँ?"

जज्बातों और अरमानों के भंवर में भी ऐसा चुलबुलापन वाणी ही दिखा सकती थी..,"फिर तो पढ़ाई के 12 बज गये होंगे..!" कहकर वाणी हौले से खिलखिला पड़ी...

वाणी को 'मूड' में पाकर मनु के हौसले बढ़ गये..," आइआइटी हूँ.. समझी!" कहते हुए मनु ने अपना एक हाथ दीवार से उठा कर वाणी के कमसिन पेट पर ला रखा..

वाणी उच्छल पड़ी,"ओई मम्मी.. गुदगुदी होती है.." इसी च्चटपटाहट में मनु का हाथ उपर उठ गया.. वाणी को अपने सन्तरेनुमा अंगों में झंझनाहट सी महसूस हुई.. ये झंझनाहट का असर उसके सुगढ़ नितंबों और उनमें च्चिपी बैठी छ्होटी सी अद्भुत तितली तक अपने आप पहुँच गया.. राम जाने क्या कनेक्षन होता है.. इनमें!

मनुको लगा उस'से कोई ग़लती हो गयी.. आख़िर बिना पर्मिशन के 'नो एंट्री ज़ोन तक जो पहुँच गया था..," सॉरी! वाणी.. मैं वो..!"

"अपने आशिक की इश्स अदा पर वाणी बिना शरारत किए ना रही.. बेकरार तो वो थी ही..," तुम्हारे जितना तो लड़कियाँ भी नही शरमाती...!" कहकर वो पलट कर खड़ी हो गयी..

सच ही तो था.. लड़कियाँ भी कहाँ शरमाती हैं इतना.. वरना जिस वाणी के चेहरे भर की एक झलक पाने को लाखों दीवाने कतार में रहते थे.. वो खुद उसके आगोश में आना चाहती थी.. छ्छूने पर भी कोई शिकायत नही की.. फिर वो इंतजार किस बात का कर रहा था.. मैं होता तो..

बरसात में टपक रही वाणी का अंग अंग जैसे पारदर्शी हो चुका था.. ऐसे में वाणी से ज़्यादा लाल मनु का चेहरा था.. पर मर्दानगी का ढोल अभी भी हकलाए स्वर में पीट रहा था..,"म्म..? मैं कब.. शर्मा रहा हूँ...!"

"और नही तो क्या.. फिर सॉरी किसलिए बोला..?" वाणी को मनु की आँखों से बेताबी टपकती दिखाई दे रही थी..

"व... वो.. ग़लती से वहाँ छ्छू गया था..." मनु वाणी से नज़रें नही मिला पा रहा था...

लज्जा तो वाणी की आँखों में भी थी.. पर इतनी नही की उस लल्लू को प्यार का सबक ना सीखा सके..," तो इसमें क्या है.. लो मैने छ्छू ली.. तुम्हारी!" वाणी ने अपना हाथ उठाकर मनु की छाती पर रख दिया.. मनु का दिल ज़ोर से धड़क रहा था.. वाणी के हाथ की आँच से और तेज़ हो गया.. मनु को लगा.. अब वा अपने छिपे हुए शैतान को मैदान में कूदने से रोक नही पाएगा.. पॅंट की सिलाई उधड़ने वाली थी..

"तुझमें और मुझमें फ़र्क़ है वाणी..."

"क्यूँ क्या फ़र्क़ है? लड़कियों की तो ऐसी ही होती हैं.." नज़रें नज़ाकत से नज़रें झुकाए वाणी ने कहा... वह भी शर्मा गयी थी.. 'उनके' बारे में बोलते हुए...

"हां...... पर..... क्या मैं फिर से छ्छू लूँ?" मनु के मुँह में पानी आ गया.. नज़र भर कर उनको देखते ही...

वाणी के हाथ अनायास ही उपर उठ गये.. और दोनो संतरों को अपने ही हाथों में च्छूपा लिया.. तब जाने कैसे वह बोल गयी थी..,"इनमें क्या है?"

संसार भर का सुरूर इन्ही में तो छिपा हुआ है...

"बोलो ना वाणी.. एक बार और छ्छू लूँ क्या..?" अजीब जोड़ा था.. एक तैयार तो दूजा बीमार... अब वाणी पानी में थी...

वाणी क्या बोलती.. ये भी कोई कहने सुन'ने की बातें होती हैं...

"बोलो ना प्लीज़.. बस एक बार.." मनु ने वाणी को कंधों से पकड़ा और हूल्का सा उसकी और झुक गया..

वाणी को लगा वो अभी टूट कर गिर जाएगी.. मरती क्या ना करती.. जब मनु ने कोई पहल नही की तो अपने हाथ नीचे सरका दिए.. अपने पेट पर.. और नज़रें झुकाए साँसों को काबू करने का जतन करने लगी..

कमसिन उमर की वाणी के दोनो संतरे साँसों की उठापटक के साथ हुल्के हुल्के हिल रहे थे.. उपर.. नीचे... उपर... नीचे.. क्या मस्त नज़ारा था..

आख़िरकार मनु ने शर्म का चोला उतार ही फैंका.. अपना एक हाथ उपर उठाया और वाणी के गले से थोड़ा नीचे रख दिया जहाँ से उनकी जड़ें शुरू होती थी...," अया!"

यकीन मानिए.. ये सिसकी मनु के मुँह से निकली थी.. जितने आनंद की वह कभी कल्पना तक नही कर सकता था.. इतना आनद उसको कपड़ों के उपर से ही वाणी को छूने से मिल गया... वानिकी तो ज़ुबान जैसे जम ही गयी थी... सीने को महसूस हुई इतनी ठंडक को पाकर...

"थोड़ा और नीचे कर लूँ.. अपना हाथ!" मनु ने मनमानी जैसे सीखी ही ना थी..

वाणी ने छिड़ कर हूल्का सा घूँसा उसके पेट में मारा..,"मुझे नही पता.. जो मर्ज़ी कर लो..."

"जो मर्ज़ी!" मनु को ऐसा लगा मानो जन्नत की पॉवेर ऑफ अटयर्नी ही उसको मिल गयी हो...

वाणी के ऐसा कहने के साथ ही मनु का हाथ जैसे वरदान साबित हो रही उन्न बूँदों के साथ ही फिसल कर धक धक कर रहे बायें वक्ष पर आकर जम गया.. अब की बार सिसकी वाणी की ही निकलनी थी.. सो निकली,"आआआः.. मॅन्यूयूयूयुयूवयू"

'बड़ी' होने का अहसास होने के बाद पहली बार किसी ने उन्न फड़कते अंगों के अरमानो की अग्नि को हवा दी थी.. कामग्नी जो पहले ही सुलग रही थी; अब दहकने लगी..

वाणी के दोनो हाथ बिना एक भी पल गँवायें मनु का साथ देने पहुँच गये.. एक हाथ मनु के हाथ के उपर था.. ताकि और कसावट के साथ वो आनंद के अतिरेक में डूब सके.. दूसरा हाथ 'दूसरे' को सांत्वना दे रहा था.. ताकि उसको वहाँ सूनापन महसूस ना हो...

"हाए.. तुम तो कमाल हो वाणी.. कितना मज़ा आ रहा है.. इनको छूने से.." मनु ने यूयेसेस हाथ की जकड़न को कुच्छ और बढ़ाते हुए दूसरा हाथ वाणी की कमर में पहुँचा दिया...

वाणी का सख़्त हो चुका 'दाना' मनु के हाथों में गुदगुदी सी कर रहा था..," सच में वाणी.. मुझे नही पता था.. चूचियाँ छ्छूने में इतनी प्यारी होती हैं..

"छ्हि.. छ्ही.. इनका नाम मत लो.. मुझे शर्म आती है.." क्या बात कही थी वाणी ने.. मनु का खून उबाल खा गया..,"पर मुझे मज़ा आ रहा है.. तुम्हारी चूचियाँ संतरे जैसी हैं.. आकर में भी.. छ्छूने में भी..!"

"धात..!" और शर्मकार वाणी आगे बढ़कर मनु की छाती में दुबक गयी.. और 'संतरे' पिचके नही.. बढ़िया कंपनी की टेन्निस बॉल की तरह मनु के सीने में गड़कर अपनी गर्मी छ्चोड़ने लगे.....

"और छ्छूने दो ना प्लीज़.. इतना मज़ा आ रहा है की बता नही सकता.. तुम लाजवाब हो वाणी.." अपने बदन से शर्माकर लिपटी वाणी कामुक नज़रों से छेड़ता मनु बोला..

"अपने अंगों की इतनी प्रसंशा सुनकर वाणी ने भावुक होकर अपनी नज़रें उठाई और अपने यार की आँखों में देखा.. आँखें सब कह देती हैं.. दोनो एक दूसरे के मंतव्या को समझ गये और होंठों से होंठ जाम की तरह टकरा गये... चियर्स फॉर लव..

दोनो ही जवान थे.. और अब तक प्यार की ऊँचाइयों से अंजान थे.. अब उन्हे सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही चीज़ दिखाई दे रही थी.. एक दूसरे का बदन..

जी भर कर एक दूसरे के मुँह में 'जीभ कबड्डी' खेल कर वो हटे तो हट-ते ही मनु ने वाणी के दिल की बात कह दी,"प्यार करें?"

"कर तो रहे हैं.. और कैसे करें?" वाणी प्यार के इश्स खेल के हर भाग को जानती थी.. अपने कानो से सुन भी चुकी थी और आँखों से देख भी चुकी थी.. उसको वो मंज़र याद आ गया जब शमशेर दिशा में पूरा समा गया था और उसकी बेहन लहूलुहान हो गयी थी.. पर उसने वो पल भी देखा था जब खेल के आख़िरी पलों में उसकी दीदी धक्के मारने में शमशेर पर भी हावी हो गयी थी..

पर वह चाहती थी की मनु सब कुच्छ अपने तरीके से करे.. इसीलिए अंजान बनी रही..

"सिर्फ़ यही नही वाणी.. मैं सब कुच्छ करना चाहता हूँ.. सब कुच्छ.." मनु ने वाणी को अपने साथ मजबूती से बाँध लिया..

"और कैसे करते हैं.. सब कुच्छ.. मुझे नही पता.. पर तुम बता दो.. कर लूँगी.." मनु के सीने से अपने गाल सटाये वाणी सब कुच्छ करने को बेचैन थी....

"ठीक है.. अपने कपड़े उतारो.." अब मनु जल्दबाज़ी मैं दिखाई दे रहा था.....

उधर नीचे भी कामदेव मेहरबान तहे... गौरी के अरमान आज पुर होने जा रहे तहे.. अमित की साँसों की गंध अब तक महसूस कर रही गौरी जाना नही चाह रही थी.. पर लाइट जलने पर रोशन हो चुके कमरे में अमित के साथ वो असहज महसूस कर आयी थी..,"तुमने जवाब नही दिया.. मैं अब जाउ क्या?"

"जाना होता तो उसको रोक ही कौन सकता था.. अमित इश्स बात को जानता था," तुम्हारी मर्ज़ी है.. पर मैं तो लेना चाहता हूँ..."

"क्या?" हालाँकि मतलब वह समझ गयी थी.. उसके चेहरे के भावों और नज़रें झुका कर पूच्छे गये 'क्या' से सॉफ पता चलता था..

"तुम्हे सब पता है.. लड़की के पास एक बेचारे लड़के को देने के लिए 'क्या' होता है.." अमित ने गौरी की जांघपर अपना हाथ रख दिया..

"माहौल फालतू बातों की इजाज़त नही दे रहा था.. अन्यथा गौरी लड़कों को बेचारा कहने पर उस'से भिड़ने को तैयार हो जाती.. नज़रें झुकाए हुए ही उसने जवाब दिया," मुझे डर लग रहा है.."

'ग्रीन सिग्नल!' भला इश्स बात को अमित क्यूँ ना समझता.. जांघों से सरकता हुआ उसका हाथ गौरी की मच्चली के बिल्कुल करीब से होता हुआ उसकी 26" कमर और फिर वहीं जाकर थम गया.. जहाँ लड़की मा बन'ने से पहले इतराती हैं और बाद में घबराती हैं..' कहीं ढीले ना हो जायें...'

प्रतिरोध ना के बराबर ही था.. वहाँ से उसका हाथ हटाकर गौरी ने अपने हाथ में ले लिया..," तुम्हे में सच में अच्छि लगती हूँ क्या?"

"ये भी कोई पूच्छने की बात है.. क्या कभी आईने ने नही बताया?" अमित का हाथ लाख संयम बरतने की कोशिश के बाद भी अपनी जाँघ में उच्छल रहे 'शिकारी' को खुरचने चला गया.. साइज़ गौरी के लिए विस्मयकारी था.. उसकी मच्चली में कुलबुलाहट सी होने लगी..,"धोका तो नही दोगे?"

"अगर मौका नही मिला तो...." अमित का मजाकिया और बेबाक लहज़ा ही अब तक गौरी को वहाँ बैठा रहने पर विवस कर रहा था..

"तुम भी ना.. चलो बताओ क्या लेना चाहते हो.. मुझसे!" गौरी ने शर्मीली मुस्कुराहट के साथ अमित को वापस लाइन पर लाने के लिए सवाल किया...

"नाम बताऊं क्या?"

"नही.. ऐसे ही बता दो.." गौरी झेंप गयी..

"ठीक है.. अपने कपड़े निकाल दो.."

"नही.. पहले लाइट ऑफ!"

"लाइट बंद करने पर क्या फ़ायदा.. अगर देख ही ना पाए.."

"पर मुझे शर्म आ रही है.." गौरी अमित से नज़रें नही मिला पा रही थी..

"ठीक है.. तुम आँखें बंद कर लेना.. शरम भाग जाएगी..

"पर...." गौरी कुच्छ कहना चाह ही रही थी की अमित घुटनो के बल बैठा और उसकी टी-शर्ट नीचे कोनों से पकड़ कर उपर सरका दी.. ट्यूब-लाइट की रोशनी में गौरी के दूधिया कबूतर फड़फने लगे.. उनका आकर इतना मादक था की अमित पूरी शर्ट निकलना ही भूल गया और उसके गले में ही छ्चोड़ कर उसके गोल गोल अनारों को अपने हाथों में दबोच लिया...

"इष्हशह!" गौरी की कामुक सिसकी भी उसके बदन की तरह ही पागल कर देने वाली थी.. अमित के होंठों ने जैसे ही उसकी चूचियों से दूध निकालने की नाकामयाब कोशिश की.. गौरी का अंग अंग लहरा उठा.. वह मदहोश होकर बिस्तेर पर आ गिरी.. "आआआअह प्लस्ससस्स.. शियरट्ट तो.. आआह ...निकालने दो.."

"एक मिनिट!" कहते हुए अमित ने गौरी की चूचियों को चूस्ते हुए ही एक हाथ से उसकी शर्ट निकलवाने में मदद की.. वह इतनी मदहोश हो चुकी थी.. की सिसकिया लेते हुए बड़बड़ाने लगी,"आआह.. मुझे भी कुच्छ लेना है.."

नेकी और पूच्छ पूच्छ.. पलक झपकते ही अमित ने अपनी पॅंट अंडरवेर के साथ ही उतार फैंकी.. गौरी के लिए उसका ख़तनाक खिलौना तैयार खड़ा था.. तनटनाता हुआ..,"ये लो मेरी जान!" और घुटनो के बल होते हुए अमित ने अपना 'शेरू' गौरी के हाथों में पकड़ा दिया..

"यहाँ नही.. वहाँ.." गौरी का हाथ उसकी लोवर के उपर से ही मानो कुच्छ ढूँढ सा रहा था..

"जल्दी है क्या..?"

"हां.. दिशा और वाणी में से कोई उठ गयी तो.."

"ठीक है.. पूरा मज़ा फिर कभी.. पूरी जिंदगी पड़ी है.. चलो.. उल्टी लेट जाओ.."

"उल्टी क्यूँ.. ऐसे ही ठीक नही है क्या?"

"या तो तुम इनस्टरक्टर बन जाओ.. या फिर मेरी बात मान लो.." अमित ने धोंस सी दिखाई..

"ठीक है.. " गौरी ने कहा और अपनी छातियों के नीचे तकिया रखकर उल्टी होकर लेट गयी....

अमित ने एक पल भी ना लगाया और उसका लोवर और पॅंटी नीचे खींच कर नितंबों को आवरण हीन कर दिया...

"ओह माइ गॉड!... म्‍म्म्मममममहा!" गौर के गोरे गोरे मोटे मस्त नितंबों की सुंदरता और सुगधा देख कर अमित यही कह पाया.. "क्या माल हो यार तुम भी.."

दोनो फांकों के बीच की दरार अच्छि ख़ासी चौड़ी लग रही थी.. पर जब अमित ने उंगली घुसाने की कोशिश की तो अहसास हुआ.. कितनी टाइट है.. गहरी भी.. अमित ने फांको को अलग करके जहाँ तक अमित की नज़र गयी.. सब कुच्छ कोरा और गोरा था..

अमित ने बेड पर पड़ा तकिया उठाया और गौरी को अपने नितंब उपर उठाने का इशारा किया.. ज्यों ही गौरी उपर को हुई.. अमित ने तकिया उसके नीचे सेट कर दिया.. नितंबों की उँचाई और बढ़ गयी.. दरार और फैल गयी.. दरार के बीचों बीच दूधिया सफेद रंग की हल्के बालों वाली मच्चली मुस्कुरा रही थी.. अमित ने उपर से ही उसका दाना ढ़हूँढने की कोशिश की तो गौरी अंदर तक हिल गयी.. इतना आनंद उसको अपनी उंगली से कभी नही आया था..," प्लीज़ जल्दी करो.. मैं 2 बार तो पहले ही हो चुकी हूँ.."

"हूंम्म.. वो तो दिख ही रहा है.. रस से सनी अपनी उंगली बाहर निकालकर देखते हुए अमित ने फिदा हो चुकी नज़रों से उसको देखा.. बड़ी मादक गंध थी..

अमित ने उसकी टाँगों को थोड़ा दूर करके योनि चिद्रा को देखकर कहा..," तो पहली बार है.. नही?"

"क्या मतलब?" गौरी ने सच में उसका मतलब नही समझा..

"सेक्स.. और क्या?"

बात सुनकर गौरी को धक्का सा लगा.. अचानक पलटी खाकर बैठ गयी और अपने हर अंग को च्छुपाने की कोशिश करती हुई रोना सा मुँह बना लिया..

"क्या हुआ?"

"तो क्या तुम मुझे..." गौरी सच में रोने लगी...

"सॉरी जानू.. आइ वाज़ जस्ट जोकिंग.. मज़ाक कर रहा था यार.."

"नही.. मुझे नही करना.."

"प्लीज़ गौरी.. ऐसा मत करो.. छ्होटे से मज़ाक से ही रूठह गयी. तुम्हे तो पता है.. मेरी मज़ाक करने की आदत है.. रियली सॉरी यार.. प्लीज़" अमित ने उसको अपनी बाहों में भर लिया.. बड़ी मुश्किल से गौरी शांत हुई..

गौरी वापस उसी हालत में लेटने लगी तो अमित ने एकद्ूम शरीफों की तरह कहा," यहाँ से और उपर उठ जाओ ना.. प्लीज़.. घुटने बेड पर रख कर.. हां हां.. ऐसे ही.. अपना चेहरा बेड पर ही रखो.. यस यस ऐसे ही.. थॅंक यू!"

किसी ने सच ही कहा है..

"बिस्तेर पर तो रानी ही राजा होती है.. और राजा उसका सेवक" जाने कितनी ही सभ्यता एक ही घुड़की से अमित के बोल में आ गयी थी..

अमित ने जब इश्स अवस्था में गौरी के पिच्छवाड़े को देखा तो पागलपन में कोई कमी ना रही.. अमित ने एक से बढ़कर एक को देखा था पर गौरी के आगे तो सब पानी भरती ही लगी..

अमित के होंठ गौरी की चूत से खेलने लगे.. गौरी भी इश्स 'टच' से बदहवास सी सिसकिया ले लेकर अपने आपको ज़्यादा से ज़्यादा खोलने में लगी थी..

जी भर कर अमित ने रसास्वादन किया... चूत फूल कर और भी स्वदिस्त और सुंदर हो गयी थी...

ज़्यादा देर किस भी लिहाज से अब ठीक नही थी..

अमित ने उसके पिछे पोज़िशन ली और लंड का सूपड़ा गौरी की चिकनी चूत के मुंहने पर लगा दिया..," थोड़ा दर्द होगा.. एक बार.. सहन कर लेना प्लीज़.."

गौरी इश्स बात को समझती थी.. उसने अपना मुँह तकिये में दबा लिया और 'काम' कर्ण का इशारा किया..

'चिरर्र' की आवाज़ के साथ ही गौरी के गौरांग का श्री गणेश हो गया.. खून नही आया पर हालत खून ख़राबे से बदतर थी.. लंड कुच्छ दूरी तय करके जैसे जाम सा हो गया.. तकिये के अंदर से गौरी की घुटि हुई सी चीखें रह रह कर अमित को अभियान रोक देने पर विवश कर रही थी..

"चलो हो गया" की अनुभूति अमित को गौरी के उस अंदाज से हुई जब उसने तकिये से मुँह उठाकर एक लंबी साँस ली.. लंड भी तक तक गौरी की जड़ों तक 2-4 बार हो आया था.. अब गौरी के चेहरे पर असीम सुख और आनंद के भाव थे.. गौरी ने अपनी टाँगों को और ज़्यादा खोल दिया..

कसी हुई योनि में अब उसका लंड सररर सररर की आवाज़ के साथ अंदर बाहर हो रहा था.. अमित को करीब 15 मिनिट हो चुके थे बिना रुके बिना थके लगे हुए.. पर गौरी इश्स दौरान 2 बार स्वर्ग लोक हो आई थी..

अंत में जब अमित को अहसास हुआ की अब टिकना मुश्किल है तो उसने ढकधक धक्कों की गति तेज़ कर दी.. गौरी तीसरी बार 'आ' गयी..

गौरी की इश्स बार की लुंबी साँस के साथ ही अमित ने अपना हथियार बाहर खींच लिया.. अच्च्छा ही किया वरना सब कुच्छ अंदर ही हो जाता.. जस्न का जोश जारी था.. गाढ़े वीरया की पिचकारी पसारकार उल्टी लेट चुकी गौरी के नितंबों को निहाल करने लगी...

गौरी को जैसे इसी बात का इंतजार था.. झट से उठी और अपने को सॉफ करके कपड़े पहनती हुई बोली... "अगली बार देखूँगी तुमको.." कहते हुए अमित के होंठों का एक करारा चुंबन लिया और कपड़े पहेनकर चुपके से बाहर निकली.. और अपनी खाट पर जाकर इश्स प्रथम अनुभव की मिठास को अपने मॅन में महसूस करने लगी...

अंदर बैठा अमित खुद ब खुद मुस्कुरा रहा था,"क्या गन्ना था.. कसम से!"

पर उसका तो यही तराना था.. गन्ना उखाड़ो और खेत से बाहर!
 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --33

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा गर्ल्स स्कूल पार्ट 33 लेकर आपकी अदालत मैं हाजिर हूँ ।दोस्तो जिन दोस्तो ने इस कहानी के इस पार्ट को पहली बार पढ़ा है उनकी समझ मैं ये कहानी नही आएगी इसलिए आप इस कहानी को पहले पार्ट से पढ़े

तब आप इस कहानी का पूरा मज़ा उठा पाएँगे आप पूरी कहानी मेरे ब्लॉग -कामुक-कहानियाँब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम पर पढ़ सकते है अगर आपको लिंक मिलने मैं कोई समस्या हो तो आप बेहिचक मुझे मेल कर सकते हैं अब आप कहानी पढ़ें प्रिय पाठाको पार्ट 33 मैं गौरी की चुदाई तो सपने मैं पूरी हो गयी ।उसने तो अमित का गन्ना चूस लिया था लॅकिन अपनी वाणी की कहानी अधूरी रह गयी थी ।अब आगे ...............

"कपड़े... नही.. मैं कपड़े नही निकालूंगी...." वाणी की साँसें हर गुजरें पल के साथ बहकति ही जा रही थी.. उसका पूरा बदन थरथराने वाला था..

"क्यूँ..? क्या प्यार करने का मंन नही करता.." मनु ने उसको और सख्ती के साथ जाकड़ लिया.. अपनी बाहों में..

"करता है.. बहुत करता है.. जाने कितने दीनो से मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी.. जाने कितने युगों से.." वाणी कसमसाते हुए अपनी जाँघ मनु के शरीर से रगड़ने लगी..

"तो फिर शरम कैसी.. कपड़े निकल दो ना.." मनु झुक कर उसकी गर्दन पर अपने दाँत गाड़ने लगा..

"तुम्ही निकल दो ना.. कह तो रही हून.... सब कुच्छ तुम्हारा ही है.." वाणी ने अंगड़ाई लेते हुए अपनी बाहें उपर उठा दी.. वाणी के दिल के उपर उठने के साथ ही मनु का कलेजा बाहर निकालने को हो गया... वाणी का यौवन छलक्ने को बेताब था.. अपने यार के पहलू में...

"ओह.. हमें अंदर चलना पड़ेगा.. बारिश तेज़ हो गयी है.." मनु ने वाणी को कहा..

"नही.. मैं कहीं नही जाउन्गि.. लेकर चलना है तो उठा लो.. मुझे तो यहीं मज़ा आ रहा है.." वाणी पूरी मस्ती में थी.. आँखें चाह कर भी खुल नही पा रही थी..

"वाणी! उठो जल्दी.. बारिश तेज़ हो गयी है.. फुहारें तुम तक आ रही है.. उठो अंदर चलो.." दिशा ने ज़बरदस्ती उसको उठा कर बैठा दिया..

"दीदी.....???????.. व्व.. वो.. मैं तो सो रही थी.. गौरी.. दी...."

"तो कौन कह रहा है.. की तुम नाच रही थी.. जल्दी चलो.. देखो सारी भीग गयी हो.."

"ओह्ह्ह.. म्‍म्म.. मैं सपना......"

"हां.. हाँ.. सपने अंदर लेटकर देख लेना.. ओह्हो.. अब उठो भी.."

"कितना अच्च्छा सपना आ रहा था दीदी.. ख्हाम्खा जगा दिया.. पैर पटकते हुए वाणी नींद में ही जाकर अंदर सोफे पर पसर गयी... इश्स उम्मीद में की सपना जारी रहे....

उसके बाद सारी रात वाणी सो ना सकी.. सपने के मिलन की अधूरी प्यास वह पल पल अपनी छ्होटी सी अनखुली योनि की चिपचिपाहट में महसूस करती रही.. गीली हो होकर भी वह कितनी प्यासी थी... मनु-रस की..

मनु अपनी जान की हालत से बेख़बर किन्ही दूसरे ही सपनो में खोया हुआ था.. उसको तो ये अहसास भी नही था की किसी को आज उसकी बड़ी तलब लगी हुई थी..

अमित का भी यही हाल था.. कोई आधा घंटा इंतज़ार करने के बाद ही वह सोया था.. पर गौरी को उसके दिए इशारे का आभास नही हुआ था.. नही तो.. क्या पता?

अगली सुबह वाणी की आँखें लाल थी.. कम सोने के कारण.. सभी इकट्ठे बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे... अमित और गौरी में शुरू हुई नोक झोंक उठते ही फिर से जारी हो गयी,"ऐसे क्या देख रहे हो? कभी लड़की देखी नही क्या?" गौरी ने माथे पर लटक आई जुल्फ को हाथ का इशारा दिया..

"देखी क्यूँ नही.. पर तुम्हारे जैसी..." तभी कमरे में दिशा आ गयी और अमित के होंठ सील गये...

"क्या मेरे जैसी.. बोलो ना.. बात पूरी क्यूँ नही करते...?" गौरी को दिशा से क्या शरम.. उनमें तो बहुत से राज सांझे हुए थे...

"नही कुच्छ नही.... मैं कह रहा था.. तुम्हारे जैसी झगड़ालु लड़की आज तक नही देखी..." अमित ने बात का रुख़ पलट दिया..

"ओये.. मुझे झगड़ालु मत कहना.. खा जाउन्गि..!" गौरी कुच्छ और ही सुन'ना चाहती थी..

"ये लो! प्रत्यक्ष को प्रमाण कैसा.. देख लो दीदी.. कह रही है.. मुझे खा जाएगी.." अमित दिशा से मुखातिब हुआ..

दिशा हँसने लगी..," एक अच्च्ची खबर है.. गौरी पढ़ने के लिए भिवानी आ रही है.. और हमारे साथ ही रहेगी... क्यूँ गौरी?"

अमित की आँखें चमक उठी..

"अभी क्या पता.. मम्मी इश्स बार पापा से मिलकर आएँगी तभी फाइनल होगा..." कहते हुए गौरी ने एक नज़र अमित को देखा.. उसके हाव भाव जान'ने के लिए.. अमित ने

उसकी ओर आँख मार दी..

"तूमम्म!" गौरी एक पल के लिए लपक कर उसकी और बढ़ी.. पर तुरंत ही उसको अपने लड़की होने की मर्यादायें याद आ गयी... और वह शर्मकार वापस सोफे पर जा बैठी..

"अब हम चलेंगे दीदी.. जल्दी ही पहुँचना होगा...." मनु उठते हुए दिशा से बोला..

"ठीक है.. मिलते हैं फिर भिवानी में.. आज कल में हम भी आ ही रहे हैं..." दिशा भी उसके साथ ही खड़ी हो गयी...

"पर.... मम्मी पापा को तो आने दो!" कुच्छ देर ही सही.. पर वाणी का दिल मनु को अपने से जुदा होते नही देखना चाह रहा था...

"सॉरी.. वाणी.. मुझे थोड़ी जल्दी है.. " अमित ने जवाब दिया.. मनु तो वाणी की दबदबाई हुई आँखें भी देख नही पाया...

दोनो ने मोटरसाइकल स्टार्ट की और उन्न तीनो की आँखों से ओझल हो गये...

दोस्तो मैं यानी आपका राज शर्मा .दोस्तो मेरा मन भी इस कहानी इस कहानी मैं दुबारा एंट्री लेने को कर रहा है

आप तो जानते हैं जहाँ आपका राज शर्मा हो उस कहानी का मज़ा कुछ ओर बढ़ जाता है दोस्तो मैने सोचा मैं भी कुछ दीनो के लिए अपने दोस्त सुरेश के गाँव जाकर उससे मिल आउ .इस समय हम दोनो सुरेश के बाग मैं बैठे थे . अब आगे आप खुद ही देखिए यहाँ क्या हो रहा है .

"आ लौंडिया!" सड़क के साथ सटे बाग में शहर से आए अपने दोस्त के साथ बैठकर दारू गटक रहे सुरेश ने सड़क पर जा रही दो लड़कियों में से एक को टोका.. मौसम था भी पीने लायक..

सुर्सेश राकेश और सरिता का बड़ा भाई था.. ताउ का लड़का!!

"जी बाबू जी!" लड़कियों में से एक ने सड़क किनारे सिड्दत से खड़े होते हुए कहा.. कमसिन उमर की उस लड़की का रंग ज़रूर सांवला था.. पर नयन नक्स इतने काटिले की खड़ा करने के लिए 'और कुच्छ' देखने की ज़रूरत ही ना पड़े.. शीरत से भोली लगती थी.. और सूरत से 'ब्लॅकबेरी'; चूचियाँ अभी उठान पर ही थी... पर बिना 'सहारे' के नाच सी रही थी.. हिलते हुए! वस्त्रा फटे पुराने ही थे.. यूँ कह लीजिए.. जैसे तैसे शरीर को ढक रखा था बस!

"तू तेजू की छ्छोकरी है ना?" दोनो को टुकूर टुकूर देखते हुए सुरेश ने पूचछा...

"जी बाब..उ!" अपने शरीर में घुसी जा रही नज़रों से सिहर सी उठी लड़की ने मारे शरम के अपना सिर झुका लिया..

"तेरे बापू को कितनी बार बोला है हवेली में आने को.. आता क्यूँ नही है साला हरामी!" सुरेश की आँखों में उस भेड़िए

के समान वहशीपान छलक उठा जो मासूम मेम्ने के शिकार के लिए कोई भी रास्ता ढूँढ लेना चाहता है..

लड़की ने नज़रें झुका ली.. अब उसको बड़ों के लेनदेन का क्या पता..!

"तू तो पूरी जवान हो गयी है..कल तक तो नंगी घुमा करती थी.. क्या नाम है तेरा?" सुरेश ने अपने बोलने को पूरा 'गब्बरी' अंदाज दे दिया था..

"ज्जई.. क्कामिनी!" इश्स बात ने तो उसको पानी पानी ही कर दिया था..

उसके साथ खड़ी दूसरी लड़की को सब नागनवार लग रहा था.. उसने कामिनी का हाथ पकड़ कर खींचा," चल ना.. चलते हैं!"

"ये छिप्कलि कौन है?" सुरेशको इतनी बेबाकी से बोलते देख उसका दोस्त हैरान था..

"बाबू जी ये मेरी मासी की लड़की है, चंचल!.. हूमें देरी हो रही है.... हम जायें..?" कामिनी को ऐसी नज़रों की आदत पड़ी हुई थी.. वो कहते हैं ना.. ग़रीब की बहू.. सबकी भाभी!

"ज़रा एक मटका पानी तो लाकर रख दो.. उस ट्यूबिवेल से.. फिर चली जाना..!" सुरेश ने खड़ा होकर अपनी जांघों के बीच

खुजलाते हुए कहा..

"चल ला देते हैं.. नही तो बापू धमकाएँगे बाद में.." कामिनी ने हौले से चंचल को कहा और सड़क से नीचे उतर गयी.. चंचल ने उनको देखते हुए अपनी कड़वाहट प्रदर्शित की और कामिनी के पिछे चल पड़ी.. टुबेवेल्ल करीब आधा कीलोमेटेर दूर था...

"यार.. तुमने तो हद कर दी.. क्या गाँव में ऐसे बोलने को सहन कर लेती हैं लड़कियाँ.." अब तक चुप बैठे दोस्त ने सुरेश को ताज्जुब से देखा..

"ये ज़मीन देख रहे हो राज.. जहाँ तक भी तेरी नज़र जा रही है.. सब अपनी है.. आधे से ज़्यादा गाँव हमारे टुकड़ों पर पलता है.. यहाँ के हम राजा हैं राजा...! इसके बाप ने एक लाख रुपए लिए थे बड़ी लौंडिया की शादी में.. अब तक नही चुकाए हैं साले ने.. इसको तो मैं चाहू तो हमारे सामने सलवार खोलकर मुतवा सकता हूँ.. चल छ्चोड़.. एक पैग लेकर तो देख यार.." सुरेश ने अपना सीना चौड़ा करते हुए राज की तरफ गिलास बढ़ाया..

"तुझे पता है ना यार.. मैं नही लेता..!" राज ने रास्ते में ही सुरेश का हाथ थाम दिया..

"कोई बात नही प्यारे.. तेरे नाम का एक और सही.." कहकर अकेले सुरेश ने अद्ढा ख़तम कर दिया.. अकेले ही..

"एक बात तो है यार.. गाँवों में अब भी बहुत कुच्छ होना बाकी है..." राज को शायद सब कुच्छ पसंद नही आया था..

सुरेश को उसकी बात समझ नही आई..,"तेरे को एक तमाशा दिखाऊँ...?"

"कैसा तमाशा?" राज समझ नही पाया..

"आने दे.. इंतज़ार कर..."

"कमाल है कामिनी.. वो तुझसे इतनी बेशर्मी से बात कर रहा था और तू पानी भरने चली आई उनका.. तेरी जगह अगर मैं होती तो.." चंचल गुस्से से उबाल रही थी...

"तुझे नही पता.. एक बार मुम्मी ने इनका कोई काम करने से मना कर दिया था.. बापू ने इतनी पिटाई की थी की.. बस पूच्छ मत.. वैसे भी पानी पिलाना तो धरम का काम है.." कहते हुए कामिनी ने जैसे ही घड़े का मुँह ट्यूबिवेल के आगे किया.. पानी की एक तेज़ बौच्हर से दोनो नहा गयी...

"ऊयीई.. ये क्या किया..? सारी भिगो दी..मैं भी.." टपकती हुई चंचल ने कामिनी को देखा...

"क्या करूँ.. बातों में सही तरह से घड़े का मुँह नही लगा पाई.. कोई बात नही.. घर जाते जाते सब सूख जाएगा..

"हूंम्म कोई बात नही.. अपनी छाती तो देख ज़रा.. तूने क्या नीचे कुच्छ भी नही पहना..?" चंचल ने कामिनी को कमीज़ में से नज़र आ रहे चूचियों पर चवँनी जैसे धब्बे से दिखाते हुए कहा...

"ओई माआ.. अब क्या करूँ..? इसमें से तो सब दिख रहा है...

"तू क़ोठरे ( खेतों में बना हुआ कमरा) में चल.. और मेरा समीज़ पहन ले.. मेरी छाती सूखी हुई है..." चंचल ने रास्ता निकाला...

"हाँ ये ठीक रहेगा.. चल.. अंदर आजा..!" कहकर कामिनी चंचल को लेकर ट्यूबिवेल के साथ ही बने एक कोठरे में चली गयी...

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उधर पता नही कौनसा तमाशा दिखना चाह रहे सुरेश से इतना इंतज़ार सहन नही हुआ..," चल यार.. ट्यूबिवेल पर ही चलते हैं.."

"छ्चोड़ ना यार.. सही बैठहे हैं यहीं.." राज ने कहा..

"आबे तू उठ तो सही.. वहाँ और मज़ा आएगा.. चल" कहकर सुरेश ने राजका हाथ पकड़ कर खींच लिया...

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"पर.. मैं तेरे सामने कपड़े निकालू क्या?" कामिनी ने अपने साथ कोठरे में खड़ी चंचल से कहा..

"और क्या करें.. मजबूरी है.. तू मेरी तरफ कमर करके निकाल दे.. मैं तुझे अपना समीज़ निकाल कर देती हूँ.." चंचल थोड़ी सी खुले विचारों की थी..

"नही... मुझसे नही होगा.. मैने तो कभी मम्मी के सामने भी नही बदले.." कामिनी शर्मकार हँसने लगी....

"ओये होये.. बड़ी आई शरमाने वाली.. ठीक है.. तू बाहर जा.. मैं समीज़ निकाल कर यहाँ रख देती हूँ.. फिर पहन लेना.. अब तो ठीक है ना मेरी शर्मीली.."

"हां.. ये ठीक है.. कहते हुए कामिनी बाहर निकल कर खड़ी हो गयी..

"अरे.. इसमें तो कोई कुण्डी ही नही है.." चंचल ने दरवाजा अंदर से बंद करने की सोची थी..." खैर तू जा बाहर.. ध्यान रखना.."

"ठीक है.. जल्दी कर.." कहकर कामिनी बाहर निकली ही थी की मानो उसको साँप सूंघ गया.. उसकी ज़ुबान हिली तक नही.. दरवाजे के बाहर खड़े सुरेश और राज शायद सब सुन रहे थे..

"वववो... कपड़े..." बड़ी मुश्किल से कामिनी इतना ही बोल पाई थी की सुरेश ने दरवाजा खोल दिया.. चंचल अचानक हुए इश्स 'हादसे' के कारण सहम गयी.. वह अपना समीज़ निकाल चुकी थी और कमीज़ डालने की तैयारी में थी.. घुटनों के बल बैठ कर उसने अपनी सौगातों को छिपाने की कोशिश की.. इस'से उसके उभार तो छिप गये पर उनके बीच की खाई और गहरी होकर सुरेश को ललचाने लगी.. शराब के साथ ही शबाब का सुरूर भी उस पर छाने लगा..

झट से अपना मोबाइल निकाला और चंचल की 2-4 तस्वीरें उतार ली....

"याइयीई.. क्क्या कर रहे हो?.. कामिनियैयियी...." चंचल बुरी तरह सहम गयी थी.. रोने लगी....

राज जो अब तक मौन ही खड़ा था.. अपने आपको 'नारी-दर्शन' से रोक ना सका.. वा भी अंदर आ गया.. चंचल का शरीर देखने लायक था भी...,"ये क्या कर रही हो तुम?"

"लड़की लड़की खेल रहे थे.. और क्या?" कहकर सुरेश ने दाँत निकाल दिए..," अरे कामिनी.. तू तो सच्ची में ही जवान लौंडिया हो गयी रे..." कामिनी के उभारों के उपर नज़र आ रहे नन्हे उभारों पर नज़र गड़ाए सुरेश बोला..," कोई लड़का नही मिल रहा क्या तुम्हारे को.. हम हैं ना.." कहते हुए सुरेश ने चंचल से उसके दोनो कपड़े झपट लिए....

"नही नही.. प्लीज़.. हमारे कपड़े दे दो.. वो इसका कमीज़ भीग गया था.. इसलिए.." कक्कर चंचल बिलख पड़ी...

"देख लौंडिया.. कपड़े तो माखन चोर भी चुराते थे... देखने के लिए.. फिर ये कोठरा किसी के बाप की जागीर नही.. हमारा है... यहाँ मेरी मर्ज़ी चलेगी.. मैं अभी गाँव वालों को इकट्ठा करता हूँ.. यहीं पर.. और उनको बताता हूँ की तेजू की छ्छोकरी यहाँ 'लड़की-लड़की' खेल रही थी.." कहते हुए सुरेश का जबड़ा भिच गया..

"नही नही.. बाबूजी..ऐसा ना करो.. हम आपके पाँव पकड़ते हैं.." मासूम कामिनी घुटनो के बल आ गयी...

"क्यूँ ना करूँ छ्होरी.. तुझे याद है ना.. 2 साल पहले कीही बात हैं.. गाँव का एक लड़का रात में तुम्हारे घर घुस गया था.. याद है ना.. तब क्या हुआ था..!" सुरेश गुस्से का झूठहा दिखावा कर रहा था..

"याद है बाबू जी.. हमें माफ़ कर दो.. कपड़े दे दो हमारे.. हम चले जाएँगे.."

"उस बख़त (वक़्त) तू कौनसी क्लास में थी..?" सुरेश ने उसकी बात पर ध्यान नही दिया..

"जी सातवी (सेवेंत) में.." कामिनी सूबक रही थी..

"अब नवी 9थ में होगी...है ना?"

"जी..."

"क्या कुसूर था.. उस लड़के का.. तेरी मा बेहन ने बुलाया होगा.. तभी गया होगा ना.... और पंचायत ने उसको 5 जूते मारे.. क्यूँ? तेरी मा बेहन को क्यूँ नही मारे..? क्यूंकी लड़का तुम्हारे घर फँस गया था.. वैसे ही जैसे ये हमारे यहाँ फँस गयी है.. मैं अभी गाँव वालों को बुलाता हूँ.." कहते हुए सुरेश ने बिना कॉल किए ही फोन कान से लगा लिया..

ये सब देख कर चंचल अपना नन्गपन भूल कर खड़ी हुई और सुरेश से फोने छ्चीन'ने की नाकामयाब कोशिश करने लगी.. उसका बदन कमाल का था..एक दम छरहरा बदन पर चूचियाँ काफ़ी सुडौल और मस्ती भरी थी.. फोने छ्चीन'ने की कोशिश में जब वो रह रह कर सुरेश की छाती से टकराई तो वो निहाल हो गया.. खून उबाल खाने लगा..

अलग थलग खड़े राज को अब इसमें मज़ा आने लगा था...

"ठीक है.. नही बुलाउन्गा.. पर एक शर्त पर.." चंचल से अलग हट कर उसने 2-4 बार और कैमरे का बटन क्लिक कर दिया.. और चंचल फिर से घुटनो के बल आ गयी..

"क्कैसी शर्त.. बाबूजी.. बताइए..." किसी उम्मीद में कामिनी भी खड़ी हो गयी..

"मैं तुमसे कुच्छ पूच्हूंगा.. बताउन्गा?" सुरेश के मॅन में जाने क्या सूझा..

"पूच्हिए बाबूजी.. हम बताएँगे.. पर किसी को ना बुलाना.. हुमारी बड़ी बेइज़्ज़ती होगी.....

"वो लड़का तुम्हारे घर में किसके पास आता था.. तुम्हारी बेहन के.. या तुम्हारी मा के..?" सुरेश शायद अब भी सीधे मतलब की बात पर आने से हिचक रहा था..

"किसी के पास नही आता था.. वो तो चोरी करने आया था.. हमारे घर.." कामिनी ने नज़रें चुराते हुए कहा..

"तू मुझे चूतिया समझती है क्या?" सुरेश ने बालों के नीचे उसकी गर्दन में हाथ फेरा... कामुकता की अंजनी सी तरंग एक दम से कामिनी के पूरे बदन में दौड़ गयी.. संभवतया सर्वप्रथम!

चंचल ने अपने आपको एक कोने में दुब्का लिया था.. शर्म से और अनहोनी के डर से...

"बुलाऊं अभी फोने करके.. गाँव वालों को.. ?" सुरेश ने बंदर घुड़की दी...

"मेरी बेहन के पास..." चंचल के आगे इश्स स्वीकारोक्ति से लज्जित सी हो गयी कामिनी अपने दोनो हाथ आगे बँधे सिर झुकाए खड़ी थी..

"रहने दो ना यार.. बहुत हो गया.. अब जाने दो बेचारियों को.." राज से उनके आँसू देखे नही जा रहे थे...

"तुम बीच में मत बोलो राज.. तुम्हे नही पता.. वो लड़का मेरा गहरा दोस्त था.. आज मौका मिला है मुझे.. कुच्छ साबित करने का.. मैं तुम्हे बाद में समझा दूँगा..."

"पर यार.. कम से कम उस बेचारी के कपड़े तो दे दो.. उसका क्या कुसूर है..?" इन्ही अवसरों पर पहचान होती है.. इंसान की.. और हैवान की.. मर्द तो सभी होते हैं.. राज भी था

"चलो.. दे देता हूँ.. पर याद रखना.. मैने फोटो खींच ली हैं.. ज़्यादा नखरे किए तो.. समझ गयी ना.." कहते हुए सुरेश ने उसकी और कपड़े उच्छल दिए..

चंचल की नज़रों में राज के लिए अतः क्रितग्यता झलक रही थी.. जाने कैसे वह बदला चुका पाएगी....

सुरेश फिर से कामिनी की और घूम गया," वहाँ आ जाओ दोनो..." और कहकर दीवार के साथ लगे फोल्डिंग पर बैठ गया.. दोनो चुपचाप जाकर उसके सामने खड़ी हो गयी..

"मैं बाहर बैठता हूँ यार.. तू कर ले अपनी इन्वेस्टिगेशन.. जल्दी जाने देना यार.." कहकर राज बाहर निकल गया...

"हां तो किसके पास आता था सन्नी.." सुरेश फिर से टॉपिक पर आ गया..

".... बेहन!" कामिनी ने हौले से बुदबुडाया.. इश्स वक़्त चंचल को इश्स बात पर चौंकने से ज़्यादा अपनी जान के लाले पड़े हुए थे..

"क्यूँ आता था..?"

"पता नही बाबूजी.. हमें जाने दो ना प्लीज़.. मम्मी बहुत मारेंगी.." कामिनी ने गिडगीडा कर एक आख़िरी कोशिश की.. पिच्छा छुड़ाने की..

सुरेश ने पास पड़ी एक लुंबी सी च्छड़ी उठाई और उसकी नोक को कामिनी के गले पर रख दिया.. फिर धीरे धीरे उसको उसकी चुचियों के उपर से लहराता हुआ उसके पाते और फिर जांघों पर जाकर रोक दिया," नही पता..?"

"ज्जई.. गंदा काम करने....... आता था.." बिल्कुल सही जगह के करीब च्छड़ी रखने से उत्तेजना की जो लहर कामिनी के बदन में उपजी.. उसने सवाल का जवाब देना थोड़ा आसान कर दिया..

"क्या गंदा काम करने...? सीधे जवाब नही दोगि तो मैं सवाल पूच्छना बंद करके फोन घुमा दूँगा..." सुरेश इश्स हथियार को अचूक मान रहा था.. और बदक़िस्मती ये की.. लड़कियाँ भी!

"जी.. वो कपड़े निकाल कर...." आगे कामिनी बोलने की हिम्मत ना जुटा पाई....

"जैसे अभी तुम निकाल रही थी.. है ना..!" सुरेश ने फिर से उनको याद दिलाया की उनको उसने क्या करते पकड़ा था...

"नही बाबू जी.. हम तो बस... बदल रहे थे..." आगे कामिनी का बोल अटक गया.. सुरेश ने च्छड़ी का दबाव उसकी जांघों के बीच बढ़ा दिया था.. चुलबुलाहट सी हुई.. कामिनी के बदन में.. और वो पिछे हट गयी..

"वहीं खड़ी रहो.. हिलो मत.. आगे आओ.. क्या कह रही थी तुम..?"

"कामिनी ने अक्षरष: सुरेश की आग्या का पालन किया.. वो आगे आ गयी.. च्छड़ी उसकी सलवार और पॅंटी पर अपना दबाव बढाने लगी...," जी.. हम तो बस कपड़े बदल रहे थे...

"तो वो क्या करते थे.. कपड़े निकाल कर.. बोलो..?" सुरेश च्छड़ी को वहीं पर टिकाए घुमा रहा था.. कामिनी को अजीब सा अहसास हो रहा था.. उसकी पॅंटी के अंदर.. पहली बार.. चीटियाँ सी रैंग रही थी.. और लग रहा था..च्छड़ी में से वो चीटियाँ निकल निकल कर उसके 'वहाँ' से उसके सारे शरीर में फैल रही हैं...

"ज्जई.. वो.. प्यार करते थे.." जाने कहाँ से कामिनी ने सुना था.. ' इसे प्यार कहते हैं..

"अच्च्छा.. और कैसे करते हैं प्यार..?" सुरेश के 'औजार' को शायद अहसास हो गया था की उसका इस्तेमाल होने वाला है.. रह रह कर वो पयज़ामे में फुनफना रहा था.. और इश्स फंफनहट से हुई बेचैनी चंचल को अपने शरीर में भी महसूस होने लगी थी..

"ज्जई... वो कपड़े निकाल कर... " कामिनी फिर अटक गयी..

"हां हां.. बोलो.. कपड़े निकाल कर.. क्या करते थे बोलो!" सुरेश ने उकसाया..

"जी.... वो.. सू.. सू.. में.." लगता था जैसे किसी ने कामिनी की ज़ुबान को बाँध रखा हो.. हर शब्द अटक अटक कर बाहर आ रहा था....

"आख़िरी बार पूचहता हूँ.. सीधे सीधे बता रही हो या नही.." अब सुरेश से भी ये अनोखा साक्षात्कार सहन नही हो रहा था..

" ज्जजई.. वो च.. चुदाई.. करते थे.." बोलते हुए कामिनी का अंग अंग सिहर उठा...

"अच्च्छा चुदाई करते थे.. ऐसे बोलो ना.. इसमें मुझसे शरमाने की क्या बात है.. मैने भी बहुतों की चुदाई की है.. अपने लंड से.. जब चूत में लंड डालता है तो लड़कियाँ पागल हो जाती हैं.. तुमने डलवाया है कभी लंड.." जाने क्या क्या सुरेश एक ही साँस में बोल गया था..

दोनो लड़कियाँ सिर नीचे झुकायं ज़मीन में गाड़ि जा रही थी.. शर्म के मारे..

"बताओ ना.. तुम्हे चोदा है कभी.. किसी ने... तुम्हारी चूत को फाडा है कभी..?"

चंचल का सिर ना में हिल गया.. पर कामिनी तो जैसे सुन्न हो गयी थी...

"इसका मतलब कामिनी को चोदा है.. कामिनी.. तू तो छुपि रुस्तम निकली.. तू तो सच में ही जवान है रानी.. किसने चोदा है तुझे.." सुरेश को इश्स कामुक वार्तालाप में अत्यधिक आनंद आ रहा था..

अनायास ही कामिनी के मुँह से निकल पड़ा,"मैने तो आज तक देखा भी नही बाबूजी.. देवी मैया की कसम..!" फिर ये सोचकर की क्या बोल गयी.. शरम से हाथों में अपना मुँह छिपा लिया..

"चूचूचूचु.. आज तक देखा भी नही.. आजा.. इधर आ .. दिखाता हूँ...... आती है की नही..." सुरेश ने जब धमकी सी दी तो कामिनी की हिम्मत ना रही की उसके आदेश का पालन ना करे.. वह आगे आकर उसकी टाँगों के पास खड़ी हो गयी...

"बैठ जा..." सुरेश के कहते ही वह घुटनों के बल ज़मीन पर आ गयी..

"ले..! मेरा नाडा (स्ट्रिंग टू होल्ड पयज़ामा) खोल.." सुरेश ने अपनी टाँगें चौड़ी करके अपना कुर्ता उपर उठा दिया... पयज़ामा जांघों के बीच में एक पोल की तरह उठा हुआ था..,"जल्दी खोल.." सुरेश के इश्स आदेश में उत्तेजना और अधीरता दोनो थे..

मरती क्या ना करती.. अभागन मासूम कामिनी ने नाडे को पकड़ा और आँखें बंद करके खींच लिया.. अंदर बैठा अजगर शायद इसी इंतज़ार में था.. कामिनी की आँखें बंद थी.. लेकिन चंचल जो इश्स सारे घटनाक्रम को बड़ी उत्सुकता से देखने लगी थी.. उसका कलेजा लंड का आकर देखकर मुँह को आ गया.. हैरत से उसने अपने होंठों पर हाथ रख लिया.. नही तो शायद चीख निकल जाती..

सुरेश का ध्यान चंचल की और गया.. जिस तरह की प्रतिक्रिया चंचल ने दी थी.. उस'से सपस्ट था की उसको बहकाना कामिनी के मुक़ाबले ज़्यादा आसान है..

"तुम भी इधर आकर बैठ... इसको हाथ में लो.."

चाहते हुए या ना चाहते हुए.. पर चंचल को 'उस' के करीब आने में कामिनी से कम समय लगा... आहिस्ता से डरती सी हुई चंचल ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया और उसको एक उंगली से च्छुने लगी.. मानो चेक कर रही हो.. कहीं गरम तो नही..

"ऐसे क्या कर रही हो.. मुट्ठी में पाकड़ो ना.." सुरेश उत्तेजना के मारे अकड़ सा गया था...

और चंचल ने अपने हाथ को सीधा करके लंड पर रखा और मुट्ही बंद करने की कोशिश करने लगी.. बहुत गरम था.. बहुत ठोस था.. और बहुत मोटा भी.. मुट्ही बंद नही हुई..

चंचल बड़े गौर से 'उसको' देख रही थी.. जैसे कभी पहले ना देखा हो.. देखा भी होगा तो ऐसा नही देखा होगा.. जाने अंजाने जीभ बाहर निकाल कर उसके होंठों को तर करने लगी..

"तुम भी पाकड़ो ना.. देखो इसने पकड़ लिया है.. मज़ा आ रहा है ना" नशे और उत्तेजना में रह रह कर सुरेश की आँखें बंद हो रही थी..

कामिनी ने धीरे से पलकें खोली.. आधे से थोडे ज़्यादा लंड पर अपनी बेहन के कोमल हाथों का घेरा देखा.. और फिर तिर्छि नज़रों से सम्मोहित सी हो चुकी चंचल को देखा.. कामिनी को पता हो ना हो.. की लंड बहुत कमाल का है.. पर उसकी चूत एक नज़र देखते ही समझ गयी.. एक दम से पानी छ्चोड़ दिया.. आनंद के मारे.. एक बार फिर कामिनी ने आँखें बंद करके अपनी जांघें भीच ली..

सुरेश तो निहाल हो गया था," इसको अपने मुँह में लेकर देखो.. सच में बड़ा मज़ा आता है.. सारी लड़कियाँ लेती हैं.." सुरेश के आदेश अब प्रार्थना सी में तब्दील होते जा रहे थे..

पहल चंचल ने ही की.. अपने गुलाबी होंठ खोले और झुक कर उसके सूपदे पर रख दिए.. सुरेश आनंद के मारे सिसकार उठा..

समा ही कुच्छ ऐसा बन गया था.. डर की जगह अब उत्सुकता और आनंद ने ले ली थी.. कामिनी का हाथ अपने आप उठकर चंचल के हाथ के नीचे लंड पर जाकर जाम गया.. अब भी सूपड़ा बाहर झाँक रहा था.. दो कमसिन कलियों के पाश में बँधा हुआ..

चंचल तो अब इश्स काद्रा बदहवास हो गयी थी की अगर उसको रोका भी जाता तो शायद वह ना रुकती.. अपना हाथ नीचे सरककर उसने कामिनी के हाथ को हटाया और पूरा मुँह खोल कर सूपदे को निगल गयी.. आँखें बंद की और किसी लोलीपोप की तरह मुँह में ही चूसने लगी.. सुरेश पागल सा हो गया.. अपने हाथों को चंचल के सिर पर रखा और नीचे दबाने लगा.. पर जगह थी ह कहाँ.. और अंदर लेने के लिए..

"मुझे भी करने दो..!" और कामिनी का संयम और शर्म एक झटके में ही बिखर गये..

चंचल ने अपना मुँह हटा कर लंड को कामिनी की और घुमा दिया..

अजीब नज़ारा था.. ब्लॅकमेलिंग से शुरू हुआ खेल ग्रुप सेक्स में तब्दील हो जाएगा... खुद सुरेश को भी इतनी उम्मीद ना थी.. रह रह कर तीनों की दबी हुई सी आनंदमयी लपड चापड़ और सिसकियाँ कमरे के माहौल को गरम से गरम करती रही.. इसका पटाक्षेप तब हुआ जब सुरेश दो कलियों के बीच शुरू हुए इश्स आताम्चेट युध को सहन नही कर पाया और छ्चोड़ दिया... ढेर सारा.. दोनो के चेहरों पर गरम वीरा की बूंदे और लकीरें छप गयी.. दोनो तड़प रही थी.. लेने को.. डलवाने को!

दोनो जाने कितनी देर तक ढहीले पड़ गये लंड को उलट पलट कर सीधा करने की कॉसिश करती रही.. पर सुरेश शराब के कारण अपने होश कायम नही रख पाया था.. एक बार के ही इश्स चरमानंद ने उसको गहरी नींद में सुला दिया..

जब कामिनी ने सुरेश के खर्राटे भरने की आवाज़ को सुना तो वो मायूस होकर चंचल से बोली..," पता नही क्या हो रहा है.. मैं मर जवँगी.. कुच्छ करो.."

"जाओ.. बाहर उस दूसरे लड़के को देखकर आओ.. तब तक मैं इसका पयज़ामा उपर करती हूँ..." चंचल का भी यही हाल था..

"वो यहाँ नही है दीदी..! मैं बाहर सड़क तक देख आई.." वापस आकर कामिनी ने बदहवासी सी अपनी जांघों के बीच उंगलियों से खुरचते हुआ कहा..

"तुम एक काम करो.. कपड़े निकालो जल्दी.." चंचल के पास एक रास्ता और था..

जिन कपड़ों को वापस पाने की खातिर वो इतना रोई थी.. इतना गिड़गिडाई थी.. उनकी दुर्गति पूच्छने वाला अब कोई नही था.. दोनो के कपड़े यहाँ वहाँ कमरे में बिखरे पड़े थे..

चंचल ने कामिनी की छ्होटी छ्होटी चुचियों को मुँह में दबाया और उसकी गांद की दरार में अपनी उंगलियाँ घुमाने लगी.. कामिनी आनंद के मारे रह रह कर उच्छल रही थी.. आँखें बंद करके ज़्यादा से ज़्यादा चूची उसके मुँह में घुसेड़ने का प्रयास कर रही थी..

"मुझे कौन करेगा?" चंचल ने अचानक हट'ते हुए गुस्से से कहा..

"क्या?" कामिनी समझी नही...

"वही जो मैं कर रही हूँ बेवकूफ़.. मेरी गांद को सहला.. और ये ले.. अब मेरी चूची को तू चूस.."

बड़ा ही अनोहारी दृश्या था.. पास ही बेड पर सुरेश सोया पड़ा था.. और अब तक इज़्ज़त बचाने की जद्दोजहद से जूझ रही लड़कियाँ एक दूसरी को सांत्वना देने की होड़ में भिड़ी हुई थी.. एक दूसरी की 'इज़्ज़त' को दोनो हाथों से.. और होंठों से चूम रही थी.. चूस रही थी.. फाड़ रही थी.. नोच रही थी और लूट रही थी....

कुच्छ देर बाद चंचल ने कामिनी को ज़मीन पर लिटा और उल्टी तरफ होकर उसके उपर चढ़ गयी.. कामिनी की चूत पड़ी प्यारी थी.. हल्क हल्क बालों वाली.. छ्होटी सी.. चंचल ने अपनी जीभ निकाली और कामिनी की चूत की पतली सी दरार को अपनी उंगलियों से चौड़ा करके उसमें अपनी जीभ घुसेड दी.. कामिनी आनंद के मारे लाल हो उठी..," आआआआअहह मम्मी मैं मरी..."

"अकेली क्यूँ मर रही है रंडी? मेरी भी मार ना.. तेरे मुँह पर रखी है मेरी चूत.. चाट इसको.. उंगली घुसा के पेल.." चंचल की वासना ने रौद्रा रूप धारण कर लिया था.. उसकी साँसे उखड़ी हुई थी.. पर हौंसले बुलंद थे..

कामिनी को अब बारबार सीखने की ज़रूरत नही पड़ी.. बस जैसे जैसे चंचल उसको कर रही थी.. वैसे वैसे ही कामिनी भी करती जा रही थी.. दोनो अब तेज तेज आवाज़ें निकाल रही थी...

अपने भाई को घर बुलाने आया राकेश काफ़ी दीनो के बाद इतना प्यारा मादक संगीत सुनकर भाव विभोर हो गया..

दरवाजे की दरार से झाँक कर देखने की उसने कोशिश की पर सफल ना हुआ.. शब्र का बाँध टूट ही गया तो उसने एक झटके के साथ दरवाजा खोल दिया..

शुरू में लड़कियाँ चौंकी नही.. उनको राज के आने की उम्मीद थी.. पर राकेश को देखकर उनकी घिग्गी बाँध गयी..," वववो.. म्‍म्माइन.... हूंम्म्म.."

"ष्ह.. कुच्छ मत बोलो.. ऐसे ही लेटी रहो.. शोर मचाया तो दोनो को ऐसे ही घसीट'ता गाँव ले जाउन्गा.." और एक दूसरी ब्लॅकमेलिंग शुरू हो गयी.. पर इश्स वक़्त उन्न दोनो को इसकी ही सबसे अधिक ज़रूरत थी...

"इस्सको कहते हैं बिल्ली के भागों छ्चीका टूटना.." राकेश को पका पकाया माल खाने को मिल गया..

"ले मेरा लंड चूस कामिनी.. बहुत दीनो से सूखा ही घूम रहा हूँ.." राकेश ने भी बिना देर किए अपने कपड़े उतार फैंके...

राकेश का लंड मुँह में लेने में कामिनी को ज़्यादा मस्सकत नही करनी पड़ी.. थोड़ी ही कोशिश के बाद राकेश का आधा लंड कामिनी के गले में ठोकरे मार रहा था...

"ये चिकनी चूत कौन है.. पहचान में नही आई..." राकेश ने कामिनी के मुँह के उपर रखी चंचल की चूत में उंगली घुसेड दी.. उंगली घुसेड़ने का तरीका इतना जंगली था की चंचल बिलख पड़ी..," ओई माआ.."

"मा को क्यूँ पुकार रही है.. उसकी भी मर्वानी है क्या..!" मस्ती से भरे राकेश ने 'पुच्छ' की आवाज़ के साथ अपना लंड कामिनी के होंठों से जुदा किया और चंचल की थूक और रस से चिकनी हो चुकी चूत को दो उंगलियों से खोलकर वहाँ टीका दिया..

"कामिनी.. इसकी गांद को दोनो हाथों से कसकर पकड़ ले.. नही तो ये बिलबिलाएगी.. पहली बार लग रहा है.. आई है किसी लंड के सामने.."

कामिनी ने वैसा ही किया.. और वैसा ही हुआ जैसा राकेश ने कहा था.. चंचल चिंहूक उठी.. हालाँकि बिलबिलने वाली बात नही थी... पर अभी सूपड़ा ही अंदर गया था.....

जब एक के साथ एक फ्री मिल रही हो तो कोई दोनो के ही मज़े लेगा.. एक के क्यूँ.. सूपदे को चिकनी कुँवारी चूत का स्वाद चखाकर राकेश ने 'अपना' वापस खींच लिया और फिर से उसको कामिनी ने मुँह पर रख दिया.. कामिनी को इश्स मादक द्रिव्या को चटकार सॉफ करने में चाँद सेकेंड ही लगे.. राकेश ने ऐसा अनोखा मज़ा कभीलिया नही था सो उच्छल उच्छल कर दोनो के मज़े ले रहा था...

एक बार फिर सूपदे समेत लंड आधा चूत द्वार के पार हो गया.. आनंद की पराकास्था में अब चंचल खुद भी धक्के लगा रही थी.. हानफते हुए.. पीछे की ओर..

और चंचल ने वासना के सागर में अंतिम साँस ली.. इसी एक पल में उसने अपनी जीभ गोल करके कामिनी की चूत में घुसा दी और निढाल हो गयी..

राकेश ने जब अपना लंड बाहर निकाला तो वह पहले से ज़्यादा खड़ा, पहले से ज़्यादा चिकना और पहले से ज़्यादा ख़तरनाक लग रहा था...

पाला बदल कर वह चंचल के मुँह की और जा पहुँचा.. कामिनी की चूत की और.. जो उसका बेशबरी से इंतज़ार कर रही थी.. फूल कर मोटी हो चुकीचूत की दरार भी भी अब पहले से चौड़ी लग रही थी.. पर योनि द्वार उतना ही था.. पेन्सिल की नोक भी घुसना असमभव लगता था..

पर इरादे मजबूत थे..," कसकर टाँगें पकड़ना डार्लिंग.. यहाँ मामला मुश्किल लगता है....

"कर दो.. मैने पकड़ रखी हैं.." चंचल कामिनी को ऐसे कैसे जाने देती.. टाँगों को मजबूती से दबाते हुए उन्हे और चौड़ा किया और सुपाडे को अपने होंठों से चूमा.. मानो विजय सूचक तिलक कर रही हो लंड के माथे पर..

च्छेद पर हूल्का सा दबाव बनते ही कामिनी बिलबिला उठी.. लंड को इधर उधर का रास्ता दिखाने की कोशिश के साथ ही कामिनी ने इस जानलेवा प्रहार से बचना चाहा.. पर..

अचानक ऐसी आवाज़ हुई जैसे कोई वाल्व फट गयी हो.. और खून की एक पतली सी धारा राकेश के लंड को वापस खींचने के साथ ही बह निकली..," वाह.. इसको कहते हैं असली कुँवारा माल.. क्या सील टूटी है आज.." राकेश को कामिनी की छट पटाहट से कोई लेना देना नही था... तो बस रोंडता ही चला गया.. घुसता ही चला गया..

कामिनी के आँसू किसी ने पौन्छे नही.. अपने आप ही रुके जब उसको दर्द के असहनीया अहसास के साथ आनंद की मिठास की खुश्बू आने लगी.. फिर ये तो होता ही है.. हाए, आह में बदल जाती है.. वही अब तक कुँवारी कामिनी के साथ भी हो रहा था...

राकेश को अब खूब सहयोग सहयोग दोनो तरफ से मिल रहा था.. जब भी उसका लंड हाँफने के लिए बाहर निकालता.. चंचल के होंठ उसको अपनी गिरफ़्त में ले लेते.. और चूम चाट कर दोबारा तरोताजा करके.. उसके लिए मिन्नटें कर रही कामिनी की चूत में वापस धकेल देते.. कामिनी भी ज़्यादा देर ना ठहरी और एक बार फिर से छ्चोड़ देने के लिए गिड़गिदाने लगी..

अब राकेश का भी वक़्त आ गया था.. उसके बाहर निकलते ही ज्यूँ ही इश्स बार चंचल ने उसको लपका.. राकेश ने लंड उसके मुँह में ही कसकर दबा लिया.. चंचल च्चटपटाने लगी.. लंड उसके गले में फँसा हुआ था..

और वीरया की एक गढ़ी धार चंचल के गले में उतरती चली गयी.. बिना स्वाद का अहसास कराए...

कुच्छ देर बाद जब सब कपड़े पहन कर खड़े हुए तो राकेश ने हंसते हुए कहा," इश्स मूसलचंद को कहाँ फँस गयी थी तुम.. इश्स'से तो 2-2 बच्चों वाली भी डरती हैं.. अगर ये कर देता तो यहाँ से सीधे हॉस्पिटल ही जाती तुम....

खैर जो हुआ.. अच्च्छा ही हुआ!!!!!
 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --34

मोटी सी एक करीब 40 साल की औरत गुस्से से तमतमाति हुई अपने घर से बाहर निकली

"तुम लफंगों को शरम नही आती... भला ये भी कोई तरीका है?"

"सीसी..क्या हुआ आंटी जी?" राज ने जब उस औरत के शब्डबानो को खुद की और आते देखा तो विचलित सा हो गया..

"हुउऊउ.. क्या हो गया आंटी जी?" आंटी जी ने मुँह फुलाते हुए राज की नकल उतारी," यहाँ हमारे घर के बाहर बैठहे तुम्हे आधा घंटा हो गया है.. घर में कोई काम नही है क्या? बेशार्मों की तरह दूसरों के घरों में झाँकते हो....."

"पर.... पर मैने तो कुच्छ नही किया आंटी जी.. आप खामखाँ नाराज़ हो रही हैं..." राज को कुच्छ समझ ना आया...

"तुम चुपचाप यहाँ से दफ़ा होते हो की नही.. अब अगर यहाँ खड़े रहे तो मुझसे बुरा कोई ना होगा... मेरे पति थानेदार हैं.. एक फोन करूँगी ना..!" औरत का गुस्सा शांत होने का नाम नही ले रहा था...

"आ..आप क्या बकवास कर रही हैं... क्या मैं अपने रूम के बाहर भी नही बैठ सकता...!" राज के सब्र का बाँध भी टूट'ता जा रहा था...

सुनकर औरत एक पल के लिए सकपका गयी," तुम्हारा कमरा?"

"हाँ.. कल ही किराए पर लिया है...!" राज ने मुँह फूला लिया...

"तो कमरा ही किराए पर लिया होगा ना.. पूरी कॉलोनी तो नही खरीद ली.. यहाँ बाहर आकर इश्स... नेकर में बैठ गये... कमरा लिया है तो कमरे में ही रहा करो.. यहाँ बेहन बेटियाँ भी रहती हैं.. समझे" हालाँकि औरत को अपनी ग़लती का अहसास हो गया था.. उसने तो सोचा था की कहीं से कोई लफंगा आकर उसकी बेटी पर लाइन मार रहा है.. पर थानेदारनी 'सॉरी' कैसे बोलती...

राज ने गुस्से से पैर पटका और अंदर चला गया..

"यार.. ये कहाँ पागल लोगों के बीच फँसा दिया यार.. ये कोई जगह है.. अब बाहर भी नही बैठ सकते.. हुउन्ह!" राज ने अंदर लेते हुए वीरेंदर को अपना बरमूडा दिखाते हुए कहा..

"क्या हुआ?" वीरेंद्र ने चौंकते हुए कहा...

"हुआ क्या यार.. ये सामने वाली आंटी......." राज ने सारा किस्सा वीरेंद्र को सुना दिया....

"हाहहः... हाहहाहा... हाहहाहा.... तू उसके सामने ऐसे चला गया... " कहकर वीरेंदर पेट पकड़ कर हँसने लगा...

"अब इसमें हँसने वाली क्या बात है..." राज का पहले से ही खराब मूड और खराब हो गया...

"बुरा मत मान'ना यार.. पर इश्स औरत से सम्भल कर रहना.... पर उसकी भी क्या ग़लती हो.. जिसकी पटाखे जैसी 2-2 जवान बेटियाँ हों.. उसका ऐसा व्यवहार लाजिमी ही है.. दोनो मस्त माल हैं यार.. जुड़वा हैं... देखते ही बेहोश ना हो जाओ तो कहना.. एक दम मक्खन के माफिक बदन है.. तू देखना उनको.. पर टोकने की गुस्ताख़ी मत करना.. और आइन्दा ऐसे बाहर मत बैठना कभी..." वीरेंद्र ने सीरीयस होते हुए कहा...

"पर यार.. बेटियाँ हैं तो हैं.. इसमें हमारी नाक में दम कर देना.. ये कहाँ जायज़ है..." राज को बात हजम नही हुई...

"कह तो तू ही ठीक रहा है.. पर एक तो थानेदारनी की चौधर.. दूसरा शक्की मिज़ाज.. बाप भी ऐसा ही है... हालत यहाँ तक है की लड़कियों को स्कूल लाने ले जाने तक के लिए एक बुड्ढे सिपाही की ड्यूटी लगा रखी है.. चल छ्चोड़.. आ खाना खाकर आते हैं....

"क्या हुआ मम्मी..?" बाहर शोर शराबा सुनकर मुम्मी के घर के अंदर आते ही प्रिया ने सवाल किया...

"क्या बताऊं..? आज कल के लड़के भी इतने लुच्छे लफंगे हैं... तेरे पापा देख लेते तो उसकी तो खाल ही खींच लेते.. और ज़ुबान इतनी चलाता है की बस.. हे राम!"

"पर हुआ क्या मम्मी.. कौन था?" प्रिया को जानने की जिगयसा हो उठी..

"अरी.. यहीं.. सामने वाले मकान में रूम लिया होगा.. बाहर बैठा था.. कच्च्छा पहने.. चल तू पढ़ाई कर ले.. छुट्टियों का काम रहता होगा.. देख रिया पढ़ रही है की नही...

"क्या..???? कच्च्छा पहनकर.." प्रिया ने अपने मुँह पर हाथ रखकर अपनी शरम छिपाइ.. बड़ा बदतमीज़ होगा कोई.."

"चल तू अपना काम कर ले.. तेरे पापा आते ही होंगे... उनको मत बताना.. याद है ना.. पिच्छले लड़के को कितना मारा था....

राज की आँखों में कल गाँव वाला मंज़र जीवंत हो उठा.. वो लड़की कैसे अपनी देह को छिपाने की कोशिश कर रही थी.. ना चाहकर भी रह रह कर राज का ध्यान यहाँ वहाँ से छलक रही छातियों पर जा रहा था.. नंगा बदन देख कर कैसे उसके दिलो दिमाग़ में उथल पुथल सी होने लगी थी.. और जब वो अचानक अपने आपको मोबाइल में क़ैद किए जाने पर खड़ी हुई थी... अफ.. कैसे मैस्तियों का जाम सा उसकी नशों को नशे में तर कर गेया था.. भगवान ने भी क्या चीज़ बनाई है.. 'नारी'.. अगर वा वहाँ से बाहर नही जाता तो शायद ज़ज्बात इंसानियत पर हावी हो जाते.. और वह भी अपनी पौरुष्टा को उस लड़की के 'खून' में रंग चुका होता.. उसका कुन्नवारापन भंग हो गया होता...

राज ने अभी तक की अपनी पढ़ाई हिंदू बाय्स स्कूल, सोनीपत में होस्टल में की थी.. इसीलिए लड़कियों के 'सुरूर' से अभी तक अंजान ही था.. पर अब 12थ में उसके दोस्त वीरेंदर ने उसको रोहतक बुला लिया था.. घर वाले भी मान गये.. क्यूंकी होस्टल से कोचैंग क्लासस के लिए बाहर जाने की अनुमति नही थी.. यहाँ का स्कूल को-एड था..

"कहाँ खो गये भाई?" वीरेंद्र ने राज के कंधे को दबाया...

"उउउन्ह.. कहीं नही.. बस ऐसे ही.. यार में कभी लड़कियों के साथ नही पढ़ा हूँ.. हम तो वहाँ खुल कर हंसते खेलते थे.. यहाँ पर तो बड़ी बंदिशें होंगी...." राज ने अपनी किताब निकालते हुए पूचछा....

"अरे यार.. तू भी ना.. खामखाँ की टेन्षन क्यूँ ले रहा है.. को-एड के अपने ही मज़े होते हैं... पढ़ने में भी मज़ा आता है... और.."

"यार.. वो देख.. सामने वाले घर से कोई झाँक रहा है.. खिड़की में से.." राज ने वीरेंद्र को बीच में ही रोक दिया....

"कौन?.. अरे उधर मत देख यार.. नज़रों में चढ़ गये तो बेवजह टेन्षन हो जाएगी.. इधर आ जा... लगता है ये रूम छोड़ना ही पड़ेगा.." वीरेंदर ने राज को खींचने की कोशिश की...

पर राज तो जैसे जड़ सा हो गया था.. सम्मोहित सा.. सामने वाली खिड़की से उन्ही की और देख रहा चेहरा इश्स कदर हसीन था की राज वहाँ से अपनी नज़रें ना हटा पाया.. एक दम ताजे गुलाब जैसी नज़ाकत उस चेहरे से टपक रही थी.. रसीलापन इतना की फलों का राजा 'आम' भी शर्मा जाए.. आँखों में तूफान को भी अपने अंदर समा लेने की तड़प थी.. होंठ ऐसे की जैसे गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगा रखी हो...

"आई मम्मी!" कहकर वह नीचे भाग गयी..

आवाज़ भी इश्स कदर सुरीली थी जैसे सातों सुर स्वारबद्ध होकर अपना जादू बिखेरने लगे हों.. वह करीब 10 सेकेंड खिड़की पर रही.. इतने में ही जाने सुंदरता के जाने कितने अलंकरण राज ने अपने दिल से उसको दे दिए..

"यह लड़की तो बड़ी प्यारी है यार..!" राज ने खिड़की पर से नज़र हटा'ते हुए कहा. उसकी की आँखों से सौंड्राया दर्शन की तृप्ति झलक रही थी..

"तो मैं क्या दोपहर को बीन बजा रहा था.. बताया तो था.. दोनो बहनें लाखों में एक हैं..." वीरेंदर किताब उठा कर पढ़ने बैठ गया..

"ये कौनसी थी..? बड़े वाली की छ्होटी.."

"यार.. दोनो जुड़वा हैं.. मैं तो आज तक पहचान नही पाया हूँ.. तू पहचान सके तो पहचान लेना.. पर यहाँ नही.. कल स्कूल में.. अब पढ़ने दे..!" वीरेंदर बोला..

"सच... क्या ये हमारे ही स्कूल में प्पढ़ती हैं.. यकीन नही होता यार.. यकीन नही होता..."

"अरे ओ भाई.. माफ़ कर.. ये लड़किया दूर से ही प्यारी दिखाई देती हैं.. तू कभी साथ रहा नही ना.. धीरे धीरे सब समझ आ जाएगा.. कम से कम इनके चक्कर में मत पड़ना.. लेने के देने पड़ जाएँगे..."

"मैं तो बस ऐसे ही पूच्छ रहा था यार..." राज ने मायूस होते हुए जवाब दिया..

"चल ठीक है.. आजा.. अब खिड़की बंद कर... और पढ़ ले!"

और उस रात राज पढ़ ना पाया.. दिमाग़ में खिड़की में खड़ी होकर झाँक रही वही दो आँखें घूमती रही.... खुमारी भर देने वाली आँखें....

नये स्कूल का पहला दिन... राज बहुत रोमांचित था पर अंदर ही अंदर झिझक की एक हुल्की सी मेहराब उसको उसके फुदकते दिल को काबू में रखने की नसीहत दे रही थी... जैसे ही उसने स्कूल के गेट से प्रवेश किया.. हज़ारों की संख्या में यहाँ वहाँ मंडरा रही 'तितलियों' के हृदयस्पर्शी दृश्यों ने उसका स्वागत किया.. 'आ.. लड़कियाँ कितनी प्यारी होती हैं.. कितनी स्वप्निल, कितनी कातिल.. नज़र के ही एक वार से घायल कर दें.. '

पर राज की आँखें तो उसी चेहरे को ढ़हूंढ रही थी जो उसको कल खिड़की में से नज़र आया था.. और फिर सारी रात निकल ही नही पाया.. उसके ख़यालों से..

"चल यार.. क्या ढूँढ रहा है..? आरती मेडम की क्लास है प्रेयर से पहले.. अगर आ गयी होंगी तो दरवाजे पर ही क्लास ले लेंगी..." वीरेंद्र ने राज के बॅग को पकड़ कर खींचा...

"आन....हाँ.. चल!" राज की नज़रें फिर भी उसके कदमों का साथ नही दे रही थी...

"श.. लगता है मेडम आ गयी.. अब देखना..."

"मे आइ कम इन मेडम?" वीरेंद्र ने एक हाथ में राज का हाथ पकड़े दूसरा हाथ आगे बढ़ाया...

"ये लो भाई... हाइह्कोर्ट ने 'गे ऑर्डर' क्या पास कर दिया.. लोगों ने तो हम लॅडीस को नोटीस करना ही छ्चोड़ दिया.. अब तक कहाँ रंगरलियाँ माना रहे थे..?" और क्लास में ठहाका गूँज उठा... आरती मेडम की तीखी आवाज़ वीरेंद्र के कानों में मिर्ची की तरह पड़ी...

"नही.. मेडम.. वो.. इसने अभी अड्मिशन लिया है.. आज पहला दिन था.. सो...." वीरेंद्र ने बच्चों के ठहाकों पर ध्यान नही दिया..

"ओह्ह्हो.. नया लड़का...! गॅल्स.. देखो..! नया लड़का आया है.... तो क्या आरती उतारें इसकी.. स्कूल के टाइम का नही पता क्या तुम लोगों को.." आख़िरी लाइन बोलते बोलते आरती मेडम चीख सी पड़ी थी..

"सॉरी मेडम.. वो.. आगे से ऐसा नही होगा..! प्लीज़ लेट अस कम इन..!"

"नो! नो वे.. जस्ट स्टे आउटसाइड..!" कहकर आरती ने क्लास की और रुख़ कर लिया..

मायूस वीरेंदर और राज कॅंटीन में आकर बैठ गये...

"यार यहाँ तो बड़ा स्ट्रिक्ट माहौल है.. पहले ही दिन किरकिरी हो गयी.." राज ने भावपूर्ण तरीके से वीरेंदर की और देखा...

"नही यार.. सब ऐसे नही हैं.. बस यही एक खड़ूस मेडम है जो बच्चों की नाक में दम रखती है.. पता नही कब रिटाइर होगी... " वीरेंदर ने उसको दिलासा दी...

"यार.. वो लड़की भी इसी स्कूल में है.. तू कह रहा था..?" राज मतलब की बात पर आ गया...

"यार तू आदमी है की बंदर.. एक बात के पिछे ही चिपक गया.. इसी स्कूल में ही नही.. इसी क्लास में भी है.. पर यार.. तू उसका चक्कर छ्चोड़ दे.. मरवा देगी.. देखा नही.. कैसे दाँत निकल कर हंस रही थी अभी.. क'मिनी!"

"क्या? अपन ही क्लास में है.. " और राज की आँखें चमक उठी....

प्रेयर की बेल होते ही सभी ग्राउंड में जाकर कक्षानुसार पंक्तिबद्ध होना शुरू

हो गये.. लड़कियाँ एक तरफ खड़ी थी.. लड़के दूसरी तरफ.. राज और वीरेंद्र कक्षा के सबसे लंबे लड़के थे सो वो दोनो सबसे पिछे खड़े थे...

"ओये राज.. वो देख प्रिया!" वीरेंदर ने अपनी कोहनी से राज के पेट पर टच किया..

"कहाँ?" राज के दिल में घंटियाँ सी बज उठी..

"वहाँ... सामने मंच पर.. पाँचों लड़कियों के बीच में खड़ी है.. अब जी भर कर देख लेना... " वीरेंदर हल्क से फुसफुसाया...

"ओह... " सिर्फ़ यही वो शब्द थे जो राज के मुँह से प्रतिक्रिया के रूप में निकले.. उसका मुँह खुला का खुला रह गया.. धरीदार स्कर्ट और जगमगाती हुई सफेद शर्ट पहने प्रिया को सिर से पाँव तक देखकर राज की साँसे सीने में ही अटक गयी..

प्रिया हाथ जोड़े नज़रें झुकाए प्रेयर करने लगी.. नख से सिख तक उसके शरीर का कतरा कतरा शरबती मिठास संजोए हुए था.. कपड़ों में से झाँकते संतरी उभारों में मानो नयन चुंबक लगा हो.. नज़रें चिपक जायें.. जैसे राज की चिपकी हुई थी.. लंबा छरहरा वक्राकार बदन किस को पागल ना बना दे.. सो राज भी हो गया.. पहली नज़र में ही घायल... उसकी आँखें बंद ही ना हुई.. प्रेयर के लिए.. उसको लगा जैसे प्रिया उसी के लिए गा रही है.. 'प्रेम-गीत'

उसका ये सुखद अहसास प्रेयर के ख़तम होने के बाद भी जारी रहा और उसकी नज़रें प्रेयर के बाद अपनी लाइन में जाकर खड़ी हुई प्रिया का पिच्छा करते हुए लगभग 90 डिग्री पर घूम गयी.. उसके चेहरे के साथ...

"हे यू! लास्ट बॉय इन 12थ.. वॉट'स अप?" आगे खड़ा एक टीचर गुस्से में गुर्राया..

वीरेंद्र ने कोहनी मार कर राज का ध्यान भंग किया..," तू तो गया यार...!"

"सस्स्सोररी सर.." कहकर राज ने सीधा खड़ा होकर नज़रें झुका ली...

प्रेयर के बाद राज क्लास में घुसा ही था की एक लड़की ने उसका रास्ता रोक लिया," नये हो..?"

"हाँ.." जब आगे जाने का रास्ता नही मिला तो राज ने वही खड़े होकर एक शब्द में उत्तर दिया....

"सुनो! सुनो! सुनो! ये नया है.. अभी बनकर आया है.." लड़की के ऐसा कहते ही क्लास में हँसी का ठहाका गूँज उठा...

"आ स्वाती! माइंड उर लॅंग्वेज.. जस्ट श्युटप आंड पुट डाउन युवर..." वीरेंदर का रुतबा ही ऐसा था की लड़कियाँ तो उसके नाम से ही बिदक्ति थी.... शानदार गठीले बदन का जवान होने के कारण लड़कियाँ उस पर जान तो छिदक्ति थी पर जान जाने का डर भी उनके मॅन में रहता था.. सुनते हैं की एक लड़की के प्रपोज़ करने पर वीरेंदर ने उसको खींच कर एक तमाचा दे दिया था.. पाँचों उंगलियाँ उसके चेहरे पर छप गयी थी.. तब से ही लड़कियाँ.. बस दूर से ही आ भर कर काम चला रही थी..

"मैं तुमको क्या कह रही हूँ.. " और लड़की की आँखों में आँसू उतर आए.. वह वापस अपनी बेंच पर जा बैठी..

"यार... लड़की को ऐसे नही डांटना चाहिए.." राज ने वीरेंदर के साथ अपनी बेंच पर

बैठते हुए कहा..

"हाँ.. नही कहना चाहिए.. मैं भी मानता हूँ.. पर लड़की को भी तो अपनी मर्यादायें याद रखनी चाहियें...

"यार.. उसने मज़ाक ही तो किया था.. मैं सॉरी बोलकर आता हूँ.." इससे पहले की वीरेंद्र कुच्छ बोलता.. राज उसके बेंच तक पहुँच गया था..

उसने वहाँ जाकर 'सॉरी' बोला ही था की दरवाजे से वही सुरीली आवाज़ आई जो उसने रात को सुनी थी.."नया लड़का कौन है?"

और एक बार फिर पूरी क्लास में ठहाके गूँज उठे... 'नया लड़का!'

"इसमें हँसने वाली क्या बात है.. मैने कोई जोक सुनाया है.." प्रिया को एक मिनिट पहले हुए तमाशे की जानकारी नही थी...

राज पलट गया.. उसका दिल एक बार फिर धड़कना भूल गया..,"मैं हूँ.. राज!" राज का हाथ अपने आप ही उसकी तरफ बढ़ गया..

"तुम्हे गौड़ सर बुला रहे हैं.. स्टाफ रूम में..!" प्रिया ने बढ़े हुए हाथ को नही थामा..

"पर ... मुझे स्टाफ रूम का पता नही है..!" राज ने शर्मकार हाथ वापस खींच लिया...

"चलो.. मैं लेकर चलती हूँ.." कहकर प्रिया बाहर निकल गयी.. राज की आँखों में पनप रहे अपने पन को उसने कोई तवज्जो नही दी.. शायद सुन्दर लड़कियों को इसकी आदत होती है..

बिना एक भी शब्द बोले दोनो स्टॅफरुम पहुँच गये...

"कम इन सर?" प्रिया और राज पर्मिशन लेकर गौड़ सर की चेर के पास जा पहुँचे.. ये वही थे जिन्होने राज को प्रेयर में टोका था...

"क्या बात है सर..?" राज को लगा प्रिया के सामने ही उसकी किरकिरी होगी..

"हूंम्म...! मिस्टर. हॅंडसम, यहाँ पढ़ने आए हो की तान्क झाँक करने..?"

"सर.. मैं समझा नही.. " राज ने भोलेपन से कहा..

"समझ तो तुम सब गये हो बेटा.. तुम दिखने में सुंदर हो.. इसका मतलब ये नही की.. खैर छ्चोड़ो.. 10थ में कितने मार्क्स आए हैं..?"

"सर.. 95%!" बोलते हुए राज की आँखों में चमक थी.. गर्व था.."

"हाउ मच?!!!!" प्रिया ने ऐसा रिक्ट किया मानो उसको विस्वास ना हुआ हो..

"95%!"

"हूंम्म.. थ्ट्स लाइक ए गुड बॉय.. शायद मुझसे ही कोई चूक हो गयी होगी.. जाओ.. एंजाय युवर स्टडीस!" और गौड़ सर ने राज की कमर पर थ्हप्कि देकर उसको वापस भेज दिया..

क्लास की और जाते हुए राज मन ही मन उच्छल रहा था.. प्रिया ने उसकी स्कोरिंग पर आसचर्या व्यक्त किया था.. प्रभावित ज़रूर हुई होगी.. उसने साथ चुपचाप चल रही प्रिया के मॅन को सरसरी नज़र से पढ़ने की कोशिश की.. पर कुच्छ खास अब लगा नही..,"आ.. आपके कितने मार्क्स हैं.. 10थ मैं.."

"अच्च्चे हैं.. पर तुम्हारे आगे कुच्छ नही.. बस यूँ समझ लो की तुमसे पहले मैं ही स्कूल की टॉपर थी..

"श.." राज ने ऐसे रिक्ट किया मानो प्रिया का रेकॉर्ड खराब करने पर उसको बहुत अफ़सोस हुआ हो.. इश्स'से पहले वो कुच्छ और बोलता.. उसकी आँखें आसचर्या से फट गयी.. वह एक बार सामने से आ रही रिया को देखता तो एक बार साथ चल रही प्रिया को...

"ये मेरी बेहन है.. रिया! मुझसे 8 मिनिट छ्होटी.. रिया! ये हैं मिस्टर..??" प्रिया की प्रशंसूचक नज़रों ने राज के दिल पर कहर सा ढाया..

"मुझे राज कहते हैं.. !"

"तूमम.. तो हमारे घर के सामने ही रहते हो ना...?" रिया ने तपाक से पूचछा...

"क्या???" प्रिया ने आसचर्या व्यक्त किया..

"जी.. मुझे नही पता आप कहाँ रहती हैं.. मैं तो मॉडेल टाउन 82-र मैं रहता हूँ.." राज ने अंजान बन'ने की कोशिश की...

"अच्च्छा.. तो वो तुम्ही हो.. जो..." कुच्छ सोचकर प्रिया आगे की बात खा गयी..

"जी क्या?" राज असमन्झस में पड़ गया..

"कुच्छ नही.. क्लास का टाइम हो रहा है.. " कहकर प्रिया रिया का हाथ पकड़ कर क्लास की और आगे बढ़ गयी..

राज उनके पीछे पीछे चलता हुआ उनको घूरता रहा.. क्या समानता थी.. उनकी हाइट में भी.. उनकी हँसी में भी.. उनकी चाल में भी.. और चलते हुए लचक रहे उनके मादक कुल्हों में भी... 'आ! किस किस को.... '

राज मॅन ही मन मुस्कुराया और क्लास में घुस गया...

"क्या बात थी.. अंदर घुसते ही वीरेंदर ने चिंता से पूचछा " डाँट पड़ी क्या?"

"नही.. शाबाशी मिली.. " राज ने मुस्कुराते हुए कहा..

"सच! किसलिए?

"अब मैं स्कूल का टॉपर हूँ.. इसलिए..!" राज ने सीना तान कर कहा...

---------

"आ तुझे पता है.. राज के 10थ में 95% मार्क्स हैं.." प्रिया ने साथ बैठी रिया के कान में कहा..

"सच... दिखने में तो एकद्ूम भोला.. स्वीट सा लगता है.. इसने चीटिंग कर ली होगी क्या???" रिया शरारत से राज की और देखकर मुस्कुराइ...

"अच्च्छा.. तो तेरे कहने का मतलब ये है की मेरे 91 चीटिंग की वजह से आए हैं.. हे भगवान.. जब टीचर्स को पता चलेगा तो मेरी तो हवा ही खराब हो जाएगी..." प्रिया को अपनी कुर्सी हिलती नज़र आई....

..........

"हे वीरेंद्र! देख.. प्रिया मुझे देखकर मुस्कुरा रही है..." राज ने रिया को अपनी और मुस्कुराते देख वीरेंदर से कहा...

"वो रिया है.. चक्कर में मत आना.. शिकायत करने में भी सबसे आगे रहती है.. मुस्कुराती है बस! सबको पता है..." वीरेंदर ने अपने हाथ से राज की उनकी ओर निकली हुई बतीसि बंद करके उसको सीधा कर दिया..

"पर तुझे कैसे पता.. दोनो एक जैसी हैं.. बिल्कुल! और तूने कहा भी था.. की तू भी उनको नही पहचान पता!" राज ने उत्सुकता से पूचछा..

"ऐसे तो उनकी मा भी उनको नही पहचानेगी.. रिया कान में बाली डालती है.. पर प्लीज़ यार.. ये सब मुझे अच्च्छा नही लगता.. तू पढ़ाई में ध्यान लगा.. बस!" वीरेंद्र ने उसको नसीहत दी...

"बस एक आख़िरी बात.. इनमें से किसी का बाय्फ्रेंड है क्या?"

"क्यूँ? मैं इनका असिस्टेंट हूँ क्या? अब कुच्छ पूच्छना है तो सीधा जा और उनसे पूच्छ ले..."

"बुरा क्यूँ मानता है यार.. मैं तो.." तभी क्लास में सर आ गये और सारी क्लास खड़ी हो गयी....

"क्या हाल हैं.. थानेदार साहब!" विकी घर के अंदर घुसते ही ड्रॉयिंग रूम में पड़े सोफे पर फैल गया...

"कौन?" पर्दे के पिछे से कड़क आवाज़ आई...

"आप कहाँ याद रखेंगे हमें.. हमें ही आकर बार बार आपको शकल दिखानी पड़ती है..." कहकर विकी हँसने लगा....

"ओह विकी भाई.. कैसे हो?" खिसियाए हुए से विजेंदर ने अंदर आकर बैठते हुए कहा..," सुनती हो? कुच्छ ठंडे वनडे का इंतज़ाम करो.."

"इतनी मेहरबानी का शुक्रिया.. वो सेक 4 वाला मल्टिपलेक्स आप कब बिकवा रहे हैं.. हमें जल्द से जल्द कब्जा चाहिए.. झकास जगह है!" विकी ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा..

"इतना आसान नही है भाई... मुरारी की भी पहुँच उपर तक है.. अब अगर सरकार नही बदली तो मेरे गले में फाँसी लटक जाएगी.. पर में देख रहा हूँ..." विजेंदर ने लुंबी साँस छ्चोड़ी.....

"मुरारी की मा का... साला उसके बाप का माल है क्या..?तो पहले मुझे उसकी मा बेहन करनी पड़ेगी पहले.. ये बोल ना.... साले की...." तभी अचानक विकी चुप होकर ड्रॉयिंग रूम में अचानक घुस आए जलवे को निहारने लगा...

"पापा! मुझे स्वेता के घर नोट्स लेने जाना है.. ज़ाउ क्या..?" रिया ने विकी पर धान नही दिया...

"कितनी बार कहा है की ये लेन देन स्कूल में ही किया करो.. चलो! कहीं जाने की ज़रूरत नही है.." विजेंदर ने पसीने के रूप में माथे पर छलक आया अपना गुस्सा पोंच्छा... रिया सहम कर अंदर चली गयी....

"ये... तुम्हारी बेटी है खन्ना?" विकी ना चाहकर भी उस हसीन काली के बारे में पूच्छ ही बैठा..

"यार.. कितनी बार कहा है की इन्न कामों के लिए ऑफीस में ही आ जाया करो.. घर में ऐसे बात करना अच्च्छा नही लगता.."

"कौनसा ऑफीस.. थाना?"

"हां!"

"पर आप वहाँ मिलते ही नही तो क्या करें.. मुझे भी जवान बेटियों वाले घरों में जाना वैसे अच्च्छा नही लगता.." विकी ने अपने होंठों पर जीभ फेरी...

"खैर छ्चोड़ो.. लाला 10 करोड़ माँग रहा है.. कहता है.. इससे कम पर बात ही नही करेगा..." विजेंदर ने बात पलट'ते हुए कहा..

"और मैं उसको 8 करोड़ से ज़्यादा नही दूँगा.."

"पर मुरारी 10 देने को तैयार है..."

" पहले कहे देता हूँ.. खो दूँगा मुरारी को.. इश्स दुनिया से.. बाद में मत कहना बताया नही था.. और बॉडी भी यहीं डाल कर जाउन्गा.. तेरे घर के सामने! चलता हूँ.. जै हो!" कहकर विकी घर से बाहर खड़ी सफ़ारी में जा बैठा..

"यार.. तुम पॉलिटिशियन्स का मैं क्या करूँ.. वो कहता है तुम्हे टपका देगा और तुम कहते हो...." विजेंदर अपनी बात पूरी नही कर पाया.. गाड़ी का शीशा उपर चढ़ा और विजेंदर पिछे हट गया.. गाड़ी सड़क किनारे की धूल उड़ाती हुई वहाँ से गायब हो गयी.....

"यार.. थानेदार की बेटी ने खड़ा कर दिया.. कोई ताज़ा माल है क्या...?" विकी ने जाने किसको फोन मिलया....

"कल तक खड़ा रख सको तो हो जाएगा विकी.. आज कोई चान्स नही है.. नयी का.. कहो तो......." सामने वाले की बात को विकी ने बीच में ही काट दिया...

"मुरारी की भी एक बेटी है ना...."

"तू पागल तो नही हो गया है विकी... क्या बक रहा है? बिज़्नेस अलग चीज़ है.. मस्ती अलग!"

"अरे बिज़्नेस को मारो गोली.. साला मुझे टपकाने की कह रहा है.. तू जल्दी उसका डाटा बता..." विकी के चेहरे पर मुस्कान आ गयी...

"मान जा विकी.. उलझ जाएँगे.. मंत्री भी साथ नही देगा.."

"जो साथ नही देगा उसकी मा की चूत.. तू जल्दी बता.. नही तो.."

"ठीक है भाई.. पर मैं अब इश्स मामले में नही हूँ.. याद रखना.. और ये भी की सरकार आजकल उसी की है... लिख!"

"पेन नही है भोसड़ी के.. मेसेज कर दे.. और सुन.. तूने पक्का सोच लिया है ना तू मामले में नही है..."

"यार! तू समझता नही है.. पंगा हो जाएगा.. अगर उसको ज़रा भी भनक लग गयी तो वो इसका भी राजनीतिक फ़ायदा उठाने की सोचेगा.. फिर मीडीया हमें बकषेगी नही.. करियर चौपट हो जाएगा भाई... मान जा.."

"तू ऐसा कर.. उसकी लड़की की हिस्टरी मेसेज कर और मेरा रेसिग्नेशन लेटर.. टाइप करवा के रख..." कहकर विकी ने फोन काट दिया...

"हेलो!"

"जी मुरारी जी हैं?"

"तू कौन बे?"

"नमस्ते मुरारी जी.. मैं सिटी थाना इंचार्ज विजेंदर बोल रहा हूँ.." विजेंदर की आवाज़ घिघियाई हुई थी...

"हां... खन्ना! तेरी बक्शीश मिली नही क्या..." मुरारी ने लहज़ा नरम किया..

"वो बात नही है भाई साहब.... ववो.. विकी आया था.. काफ़ी बुकबुक करके गया है.. कह रहा था.." विजेंदर की बात अधूरी ही रह गयी...

"उस साले का नाम मेरे सामने मत ले.. अगर उस तरफ नज़र उठा कर भी देखा तो मार दूँगा साले को.. समझा चुका हूँ.. अगर वो ऐसे ही धमकी गिरी करता रहा तो जान से जाएगा.. मैं एलेक्षन्स की वजह से चुप हूँ.. वरना उसकी.. में ठुकवा देता.. समझा उसको.. कल का लौंडा है.. ज़्यादा गर्मी दिखाएगा तो महनगा पड़ेगा.."

"मैने उसको बोल दिया है.. बाकी आप देख लेना... कुच्छ ज़्यादा ही बोल रहा था.. मेरे तो दिल में आया था की उठाकर साले को अंदर कर दूँ.. पर आपकी वजह से ही चुप रहा.. कहीं आप पर बेवजह आरोप ना लगें..."

"तूने ठीक ही किया खन्ना.. एक बार एलेक्षन हो जाने दे.. फिर तू देखना.. मैं उसका क्या करता हूँ... अच्च्छा अब फोन रख.. कोई फोने आ रहा है वेटिंग में..." कहकर मुरारी ने दूसरी कॉल रिसीव की," हां मेरी गुड़िया रानी.. कैसी है मेरी बच्ची...."

"कितनी बार बताउ पापा.. मुझे गुड़िया नाम अच्च्छा नही लगता.. अब में बच्ची नही रही.. 19 की हो चुकी हूँ....!" उधर से कोमल सी आवाज़ आई..

"पर मेरे लिए तो तू गुड़िया ही रहेगी ना.. बोल कैसे याद किया.. पापा को अभी बहुत काम है....

"क्या पापा! मेरी सारी छुट्टियाँ ख़तम हो गयी... आप मुझे घर क्यूँ नही आने देते.. अब फिर स्कूल से बच्चे टूर पर चले गये हैं.. आपने मुझे वहाँ भी नही जाने दिया....मैं यहाँ अकेली बोर हो रही हूँ..."

"बेटा.. तू समझती नही है.. मुझे अक्सर बाहर ही रहना पड़ता है.. और फिर यहाँ भी तुम अकेली बोर ही होवॉगी... चल मैं तेरा पर्सनल तौर का इंतज़ाम करता हूँ.. अब तो खुश!"

"ओह थॅंक्स पापा.. यू आर सो ग्रेट.. उम्म्म्ममचा! कब भेज रहे हो गाड़ी..."

"कल ही भेज देता हूँ.. मेरी बच्ची.."

"ओकी पापा.. बाइ!"

"बाइ बेटा!"

मुरारी ने एक और फोने मिलाया..," हां मोहन!"

"येस सर!"

"कल ही मर्सिडीस लेकर होस्टल पहुँच जाओ.. 5-7 दिन...जहाँ भी वह कहे.. उसको घुमा लाना.. हर तरह का ख्याल रखना..

"ओके सर!"

मुरारी ने कॉल डिसकनेक्ट करते ही वहाँ निर्वस्त्रा लेती उसकी बेटी की ही उमर की लड़की की

चुचियों में सिर घुसा दिया....
 
विकी खिड़की में खड़ा होकर घूमड़ आए बादलों को देख रहा था.. किसी गहरी सोच में.. जो प्लॅनिंग वह कर रहा था.. वह घातक थी.. खुद के लिए भी और उसके करियर के लिए भी.. हालाँकि राजनीति में उसकी गहरी पैठ थी... पर इसकी गलियाँ कितनी बेवफा और हरजाई होती हैं.. विकी को अहसास था.. मुरारी की बेटी को अगवा करना खुद सीयेम को चोट पहुँचाने के बराबर था.. पर नफ़रत की आग होती ही ऐसी है.. इसमें खुद के नुकसान या फ़ायदे के बारे में नही सोचा जाता.. बल्कि दुश्मन की तबाही ही अहम होती है.. फिर चाहे जान ही क्यूँ ना चली जाए..

मुरारी का चेहरा जहाँ में आते ही जैसे उसका मुँह कड़वा हो गया.. अधजाली सिगेरेत्टे को बाहर फैंका और थूक दिया," साला भड़वा! कितनी कुत्ती चीज़ है.."

विकी ने बुदबुडाया...

"भाई.. अगर तू मज़ाक कर रहा है तो बता दे.. वरना मेने तो स्विट्ज़र्लॅंड का टूर प्लान कर लिया है.. मैं ख़ुदकुशी नही कर सकता.. सच्ची बोलता हूँ..." काफ़ी देर से सोफे पर खामोश बैठे माधव ने कहा...

"अबे जा साले! तू भाग जा.. ये गेम तुझ जैसे गांडुओं के लिए नही है.. अब मुरारी 10 करोड़ देगा और मल्टिपलेक्स का मालिक मैं बनूंगा... अब की बार पिच्छला सारा हिसाब चुकता हो जाएगा..." ,विकी ने हंसते हुए कहा...

"पर यार .. तू करेगा कैसे.. क्या तू उसको खुला चलेंज देगा.... किडनॅपिंग की खबर देगा..." माधव अभी तक डिसाइड नही कर पाया था की वो क्या करेगा....

"तुझे अब इस बात से कोई मतलब नही होना चाहिए.. चल फुट ले.."

"मतलब है भाई.. तुझे पता है.. मैं तुझे नही छ्चोड़ सकता.. बता ना.. कैसे करना है..?"

"बैठकर तमाशा देखना है.. और ताली बजानी है.. छक्का कहीं का.. अब तक क्यूँ गान्ड फटी हुई थी साले..." विकी ने उसके कंधे पर हाथ मारा....

"वो बात नही है भाई.. मुझे पता है.. तू दिमाग़ से कम और दिल में उफान रहे जज्बातों से ज़्यादा काम लेता है.. बस इसीलिए.. सिर्फ़ इसी वजह से अपना 'बल्लू' मुरारी से मात खा गया.. तुझे पता है...." माधव के इतना कहते ही विकी की मुत्ठियाँ और जबड़े भिच गये.. आँखों में खून उतर गया..," इश्स बार मुरारी की गाड़ उसके ही हथियार से मारूँगा.. तू देखता रह माधो.. मैं बल्लू भाई का बदला लूँगा.. देखता रह.. अबकी बार दिल नही दिमाग़ चलेगा.. तुझे एक खुशख़बरी मिलने वाली है.. बस थोड़ी देर रुक जा..." विकी ने अपनी बात पूरी भी नही की थी की दरवाजे के पास गेट्कीपर आया," साहब! कोई मोहन आया है..!"

"यस! जल्दी भेज उसको.. " विकी के चेहरे पर कामयाबी की ख़ुसी लहरा गयी.....

"ये मोहन कौन है भाई..?" माधव भी विकी के साथ ही खड़ा हो गया...

"अभी बताता हूँ.. 2 मिनिट सब्र कर..."

"नमस्ते सर..!"

"आओ आओ मोहन कैसे हो..?" विकी ने मोहन की कमर थपथपाई...

"ठीक हूँ साहब.. ये लो गाड़ी की चाबी...! हमें बहुत डर लग रहा है साहेब.." मोहन के बिना बताए ही ये बात झलक रही थी की वो कितना डरा हुआ है...

विकी ने ड्रॉयर से निकाल कर एक थैला उसको थमा दिया..," पैसे गिन ले.. और अपना फोने मुझे दे.. पैसे घर पहुँच जाएँगे तो माधव तुम्हारी बात करा देगा.. जब तक काम पूरा नही होता.. तू यहीं रहेगा... समझा.."

"ठीक है साहब.. पर मेरे घर वालों पर कोई आँच..."

"तू परवाह मत कर.. मैं देख लूँगा.. पीछे वाले कमरे में जा और दारू शारू गटक जी भर कर.. मलिक की तरह रह..! ऐश कर..."

"ठीक है साहब.." बॅग में 500 की गॅडडीया देखकर मोहन की आँखें चमक उठी," साहब.. वहाँ आज ही जाना है.. मॅ'म साहब को लेने..."

"यार.. मेरा एक काम कर देगा..प्लीज़!"... राज ने स्कूल आते हुए वीरेंदर से कहा...

"अगर उन्न छिपकलियो से रिलेटेड कोई काम है तो बिल्कुल नही...." वीरेंदर ने राज को शंका की द्रिस्ति से देखा...

स्कूल का तीसरा दिन था... प्रिया के करारे हुष्ण का सुरूर राज पर चढ़ता ही जा रहा था.. वीरू भी समझा समझा कर पक गया था.. पर ढाक के तो वही तीन पात...

"यार कोई ऐसा वैसा काम नही है... ज़रूरी है.. पढ़ाई से रिलेटेड..." राज के चेहरे पर गिड़गिडाहट सी उभर आई...

"बोल!" रूखा सा जवाब दिया...

"आ.. वो क्या है की.. छुट्टियों से पहले के प्रॅक्टिकल्स कॉपी करने हैं मुझे... अगर तू.... प्रिया से माँग दे तो... प्लीज़.."

"क्यूँ? प्रिया से क्यूँ.. मैं क्या मर गया हूँ साले..." वीरेंदर की आँखों से प्रतीत हो रहा था कि वो भी उस अचानक बने आशिक से हार मान चुका है... मन ही मन मुस्कुरा रहा था..

"समझा कर यार.. उसने अच्छे से लिखा होगा... माँग देगा ना यार.."

"अच्च्छा.. इश्क़ तुम फरमाओ.. और बलि पर मैं चढ़ु.. ना भाई ना.. अगर बोलने तक की हिम्मत नही है तो छ्चोड़ दे मैदान.." वीरेंदर ने राज का मज़ाक ही तो बना लिया...

"अच्च्छा .. तो तू समझता है की मैं खुद नही कर सकता..." राज ने बंदर घुड़की दी...

"तो कर ले ना यार.. मुझ पर क्यूँ चढ़ रहा है.. जा कर ले..!" वो क्लास में घुसे ही थे की वीरेंदर की करतूत ने राज का चेहरा पीला कर दिया," प्रिया! इसको तुमसे कुच्छ चाहिए...."

राज को काटो तो खून नही.. वो इसके लिए कतयि तैयार नही था.. और कोई लड़की होती तो वो बेबाक ही कह देता.. पर यहाँ तो दाढ़ी में तिनका था.. वह कभी अपनी सीट पर जा बैठे वीरेंदर को तो कभी दरवाजे की और देखने लगा....

आकर्षण की आग दूसरी तरफ थी या नही ये तो पता नही.. पर तिनका तो वहाँ भी मिल ही गया.. उठते बैठते रिया प्रिया को याद दिलाती रहती थी की राज उनकी ही और घूर रहा है.... मतलब तो वो भी समझती ही होगी.. पागलों की तरह एकटक देखते रहने का...

प्रिया ने एक बार राज की और देखा.. नज़रें झुकाई.... फिर उठाई और झुका ली... झुकाए ही रही...

"हां.. क्या चाहिए?" रिया बोल पड़ी.. हालाँकि आवाज़ बहुत मीठी थी पर राज के सीने में तीर की तरह चुभि...

"ववो.. केमिस्ट्री क्की.. प्रॅक्टिकल फाइल... एक बार चाहिए थी... एक बार.. बस!" राज को एक लाइन बोलने में इतनी मेहनत करनी पड़ी की पसीने से तर हो गया...

रिया ने प्रिया का बॅग खोला और उसमें से फाइल निकल कर देदी...

राज ने काँपते हाथो से फाइल पकड़ी और अपनी सीट की और रुख़ कर लिया...

"तूने.. मेरी फाइल क्यूँ दी.. अपनी दे देती.." प्रिया रिया के कान में फुसफुसाई...

"मुझसे थोड़े ही माँगी थी.. प्रिया से चाहिए थी ना!" कहकर रिया खिलखिला पड़ी...

राज का चेहरा देखने लायक था.. हालाँकि उसकी मंशा कामयाब हुई.. पर बे-आबरू सा होकर...

फाइल के एक एक पन्ने को राज इश्स तरह पलट रहा था.. जैसे वह गीता हो... बड़े प्यार से.. बड़ी श्रद्धा से..

ना तो प्रिया अपनी फाइल को वापस माँग पाई और ना ही उस दिन राज उसको वापस कर पाया...

चमचमाती हुई मर्सिडीस होस्टल के गेट के बाहर रुकी.. जानबूझ कर विकी ने ड्राइवर वाली ड्रेस नही डाली थी.. ब्लॅक जीन और कॉलर वाली वाइट टी-शर्ट में सरकार बदले बदले नज़र आ रहे थे.. वरना तो सफेद कुर्ता पाजामा उसकी शख्शियत की पहचान बन चुके थे.. बॅक व्यू मिरर को अड्जस्ट करके उसने एक सरसरी सी नज़र अपने ही चेहरे पर डाली.. 'वह क्या लग रहा है तू' ...विकी मॅन ही मॅन बुदबुडाया और कमर के साथ टँगी माउज़र निकाल कर सीट के नीचे सरका दी...

रेबन के पोलेराइज़्ड गॉगल्स पहने जब नीचे उतरा तो गेट्कीपर बिना सल्यूट किए ना रह सका.. वरना तो वहाँ अगर गार्जियन आते भी थे तो बॅक सीट पर बैठकर....

"सलाम साहब! गाड़ी अंदर ले जानी है तो गेट खोल दूं?"

"नही.. मिस स्नेहा को बोलो ड्राइवर आ गया है.. उसको लेने..!" विकी ने बाहें फैलाकर आसमान को निहारते हुए अंगड़ाई ली...

"ड्राइवर?????.... आप?" गेट्कीपर आसचर्या से जूतों से लेकर गॉगल्स तक पॉलिटीशियन विकी से जेंटलमेन विकी में तब्दील हुए शक्ष को घहूरता चला गया...

" 6 फीट 1 इंच!" विकी ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा...

"क्या?"

"मुझे लगा मेरी हाइट माप रहे हो.." विकी मुस्कुराया...

"रूम नंबर. क्या है..?

"247! जल्दी करो..." विकी को जल्दी थी.. चिड़िया को लेकर उड़ जाने की...

गेट्कीपर ने एक नंबर. डाइयल किया..," हेलो मॅ'म! रूम न. 247 से स्नेहा जी को नीचे भेज दो... ड्राइवर जी... सॉरी.. आ.. उनका ड्राइवर लेने आया है.." वह अब भी फटी नज़रों से विकी को निहार रहा था....

"ओ तेरी.. क्या पीस है???" दूर से एक लड़की को आते देख विकी की हड्डियाँ तक जम गयी.. 'नही नही.. ये तो स्नेहा हो ही नही सकती.. कहाँ वो बदसूरत मुरारी.. और कहाँ ये हुश्न की परी... वो तो शायद अपने दोनो हाथ उठाकर भी इसकी उँचाई को नही छ्छू सकता... पर विकी खुदा की उस हसीन कृति से नज़रें ना हटा सका...

ज्यों ज्यों लड़की करीब आती गयी.. उसके छ्होटे कपड़ों में छिपे अनमोल खजाने को विकी अपनी पारखी नज़रों से परखने लगा..

करीब 5'8" की हाइट होगी.. कमर तो मानो थी ही नही.. 26" की कमर भी कोई कमर होती है.. उसकी जैसे दूधिया रंग में पूती जांघों पर फँसी हुई गुलाबी रंग की मिनी स्कर्ट पीछे से उसको मुश्किल से ही ढक पा रही होगी... उपर सफेद रंग की चादर सी सिलवटों से भरी पड़ी थी.. उसको क्या कहते हैं.. विकी को अंदाज़ा नही था.. पर वो सिलवटें भी शानदार उभारों का साइज़ च्छुपाने में सक्षम नही थी.. वहाँ से कपड़ा टाइट था.. एकद्ूम.. चलने के साथ ही उसके लूंबे बॉल इधर उधर लहरा रहे थे.....

अचानक विकी का कलेजा मुँह को आ गया जब उस लड़की की मीठी सी आवाज़ उसके कानो में पड़ी...,"कहाँ है.. ड्राइवर?"

गेट्कीपर बिना कुच्छ बोले विकी की और देखने लगा..

"ड्राइवर??? आप.." लगभग वही प्रतिक्रिया स्नेहा की थी.. जो कुच्छ देर पहले गेट्कीपर प्रदर्शित कर चुका था... फिर संभालते हुए उसने अपनी गाड़ी को पहचाना और बोली," गाड़ी अंदर ले आओ..!"

विकी ने गाड़ी स्नेहा के बताए अनुसार ले जाकर रोक दी और बाहर निकल कर खड़ा हो गया...

"समान कौन रखेगा..??"

"क्या ? ओह सॉरी.." विकी को बात सुनकर एकबार गुस्सा आया पर अगले ही पल वो संभाल गया..," कहाँ है..?"

"लगता है.. एक्सपीरियन्स नही है.. आओ.." और कहकर स्नेहा अंदर से लाकर समान रखवाने में उसकी मदद करने लगी....

"आ.. तुमने कब से नौकरी जाय्न की है..?" स्नेहा ने चहकते हुए पूचछा...

"पैदाइशी नौकर हूँ...!" विकी ने तल्ख़ लहजे में जवाब दिया.... दोनो हॉस्टिल से करीब 5 कि.मी आ चुके थे.. जब स्नेहा से चुप ना रहा गया...

"शकल से लगते नही हो.. अब तक तो पापा खूसट ड्राइवर रखा करते थे...!"

"हूंम्म!" विकी ने उसी रफ़्तार से गाड़ी चलाना जारी रखा...

"वैसे हम जा कहाँ रहे हैं.." स्नेहा ने आगे वाली सीट की और झुकते हुए कहा...

"जहाँ कहो...!" विकी अपने प्लान पर काम कर रहा था.. मंन ही मंन.. उसको यकीन नही हो रहा था की वो इतनी आसानी से पहली सीढ़ी पार कर लेगा...

"माउंट आबू चलो.. हमारे स्कूल की ट्रिप वहीं गयी है.."

"नही.. मुझे वो जगह पसंद नही है... कहीं और बोलो..." विकी भला उसके स्कूल की ट्रिप में उसको शामिल कैसे करता...

"व्हाट डू यू मीन बाइ तुम्हे पसंद नही है.. डोंट फर्गेट यू आर ए ड्राइवर... चलो! हम वहीं चलेंगे..."

"नही.. जहाँ मेरा मॅन नही मानता; वहाँ में नही जाता.. कहो तो वापस हॉस्टिल छ्चोड़ दूं...." विकी ने अपने कंधे उचका कर अपना इरादा बता दिया...

"बड़े ईडियट किस्म के ड्राइवर हो.. अगर पापा कहते तो भी नही जाते क्या..?" स्नेहा के माथे की थयोरियाँ पर बल पड़ गये...

"उस.. उनकी बात और है... मैं उनका ड्राइवर हूँ.." कहते हुए विकी का जबड़ा भिच गया था..

"तो मेरे क्या हो?"

"मोहन... मेरा नाम है.... बाकी जो तुम कहो..!" विकी ने रेस पर से दबाव हटाते हुए बोला....

"हे! तुम्हे नही लगता तुम कुच्छ ज़्यादा ही बोलते हो..... एर्र्ररर.. ये गाड़ी क्यूँ रोक दी..?" स्नेहा को अब हर बात अजीब लग रही थी....

"पेशाब करना है.. तुम भी कर सकती हो.. सुनसान जगह है...!" विकी ने खिड़की खोली और बाहर निकल गया....

स्नेहा निरुत्तर हो गयी.. उस'से इतनी बदतमीज़ी से बात करने की हिम्मत आज तक किसी में नही थी..

विकी सड़क किनारे चलता हुआ करीब 10 ही कदम आगे गया होगा... उसने अपनी ज़िप सर्काई और अपना 'लंबू' बाहर निकाल लिया.. वो तो तब से ही बाहर आने को तड़प रहा था.. जब उसने गेट की तरफ मादक अंदाज में मटकती आ रही स्नेहा को देखा था.. बाहर आते ही 2-3 बार उपर नीचे हुआ..

विकी ने जानबूझ कर अपने आपको इश्स पोज़िशन में खड़ा किया था की अगर चाहे तो आसानी से स्नेहा उस भारी भरकम 'जुगाड़' को देख सके...

विकी वापस आया तो स्नेहा का चेहरा तपते अंगारे की तरह लाल हो चुका था.. मानो उसने कोई अनोखी चीज़ देख ली हो.. नज़रें लजाई हुई थी.. जांघे एक दूसरी के उपर चढ़ि थी.. और होंठ तर हो चुके थे.. शायद जीभ घूमकर गयी

होगी...

विकी ने वापस आने पर हर एक चीज़ नोट की थी.. पर रेप उसके प्लान में नही

था.. स्नेहा को इश्स कदर पागल कर देना था की वो कुँवारी हो या रंडी बन चुकी हो.. पके हुए फल की तरह उसकी गोदी में आ गिरे....

"तो बताया नही.. कहाँ चलें...?" विकी ने सीट पर बैठकर गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा...

"जहन्नुम में..." कहकर स्नेहा ने अपना मुँह बाहर की और कर लिया....

"वो भी मुझे पसंद नही... मैं तो जन्नत में रहता हूँ.. ऐश करता हूँ!"

विकी की इश्स हाज़िरजवाबी पर स्नेहा मुस्कुराए बिना ना रह सकी... ," ठीक है फिर.. वहीं चलो!"

"कहाँ?"

"जन्नत में.. और कहाँ..."

"नही.. तुम अभी उस लायक नही हो...!"

"आ तुम पागल हो क्या? एक भी बात का सीधा जवाब नही देते.. मैं तो खुश हो गयी थी.. तुम्हे देखकर.. की पहली बार कोई ढंग का ड्राइवर भेजा है.... तुम हो की.......," ओईईईई मुंम्मी.... ये यहाँ कैसे...?"

विकी ने गाड़ी रोक दी.... पलटा तो चौंक गया..," ययए मुझे दो..!"

"पर ये गाड़ी में कैसे रह गयी... इसको तो पापा के पास होना चाहिए..." स्नेहा हैरत से माउज़र को देख रही थी...," मैं पापा के पास फोन करती हूँ.."

"न्नाही.. कोई ज़रूरत नही है.. ये मेरी है.. पर तुम्हे कैसे मिली.." विकी ने उसके हाथ से माउज़र ले ली...

"ववो.. मैने अपनी टाँग सीधी की तो मेरी सेंडल सीट में फँस कर निकल गयी.. उसको निकाल रही थी तो... पर तुम्हारे पास माउज़र.. तुम सच में अजीब आदमी हो.. इतने महँगे शौक!" स्नेहा उसको अजीब तरीके से देख रही थी....

"वो दरअसल मैं ड्राइवर नही हूँ.. एस.ओ. हूँ तुम्हारे पापा का...!" विकी तब तक सँभाल गया था...

"श.. ई सी!" स्नेहा के भाव विकी के लिए अचानक बदल गये...," सॉरी.. मैने आपसे ग़लत सुलूक किया हो तो..."

"कहाँ चलें...?" विकी ने सवाल किया...

"कहीं भी.. जहाँ तुम चाहो.. बस मुझे खुली हवा में साँस लेनी है.. आप सच में ही कमाल के हो... उ हूऊऊऊऊओ.." स्नेहा ने शीशा नीचे करके बाहर मुँह निकाला और ज़ोर की चीख मारी.. आनंद और लापरवाही भरी चीख....

विकी कुच्छ ना बोला... उसके प्लान का दूसरा हिस्सा कुच्छ ज़्यादा ही जल्दी कामयाब हो गया... स्नेहा का विस्वास जीतने वाला हिस्सा...

गाड़ी सड़क पर एक बार फिर तेज़ गति से दौड़ पड़ी....

"एक मिनिट रोकोगे प्लीज़.. "

"क्या हुआ..?"

"ओहो.. रोको भी..."

"बताओ तो सही.. हुआ क्या है आख़िर..."

"लड़कियाँ लड़कों की तरह बेशर्म नही होती... जल्दी रोको प्लीज़.." स्नेहा के चेहरे पर बेचैनी सॉफ झलक रही थी...

"श.." कहते हुए विकी ने ब्रेक लगा दिए....

स्नेहा गाड़ी से नीचे उतरते ही तेज कदमों से पास की झाड़ियों की तरफ चल दी.. उसकी गान्ड की लचकान देखकर विकी आह भर उठा.. पर कंट्रोल ज़रूरी था... दिमाग़ से काम लेना था इश्स बार!

नज़रों से औझल होते ही विकी ने उसके पर्स में हाथ मारा.. मोबाइल उपर ही मिल

गया.. विकी ने उसको साइलेंट करके अपनी पॅंट की जेब में डाल लिया...

स्नेहा की पेशाब करने की प्यारी आवाज़ ने विकी की धड़कने और बढ़ा दी.. स्नेहा कुँवारी थी.. बिल्कुल कुँवारी.. विकी पेशाब करने की आवाज़ से ही इश्स बारे में कन्फर्म्ड हो गया.. हाथ के इशारे से उसने पॅंट में कुलबुला रहे यार को शांत रहने की नसीहत दी....

स्नेहा वापस आई तो उसकी आँखों में लज्जा सी थी.. एक अपनापन सा था.. एक चान्स था!

"मैं आगे बैठ जाउ?" पेशाब करके वापस आई स्नेहा के मंन में अब आदेश नही.. आग्रह था...

"क्यूँ नही..!" कहकर विकी ने अगली खिड़की खोल दी..

"श थॅंक्स... एक बात बोलूं?" स्नेहा ने अपने आपको अगली सीट पर अड्जस्ट किया...

"हूंम्म... बोलो!" विकी ने हुल्की सी मुस्कान उसकी और फैंकी.. दरअसल वो उस अधनंगे कमसिन बदन को देखकर बड़ी मुश्किल से अपनी बेकरारी छिपा पा रहा था.. चिकनी जांघें बेपर्दा सी उसकी नज़रों के सामने थी.... एक दूसरी से चिपकी हुई!

"मुझे शुरू में ही शक़ था की तुम ड्राइवर तो कम से कम नही ही हो.. तुम तो एकदम हीरो लगते हो...!" स्नेहा अपनी शर्ट को नीचे खींचती हुई बोली.. जो सिमट कर उसकी नाभि तक पहुँच गयी थी...

"हूंम्म.. बिना हेरोयिन के भी कोई हीरो होता है भला..." जाने विकी बात को कहाँ घुमा रहा था...

"मतलब!" क्या सच में वो मतलब नही समझ पाई होगी...?

"कुच्छ नही.. बस ऐसे ही...!"

"मतलब तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नही है.. है ना?" स्नेहा ने हुल्की सी मुस्कान उसकी तरफ फैंक दी...

गर्ल फ.... सुनते ही अनगिनत सुंदर चेहरों की कतार सी विकी की आँखों में घूम गयी.. पर प्रत्यक्ष में वो कुच्छ और ही बोला..," कुच्छ ऐसा ही समझ लो..! कोई मिलती ही नही...!"

"उदास क्यूँ होते हो.. जब तक हम हैं.. हूमें ही समझ लो.." स्नेहा ने कातिल मुस्कान उसकी और फैंकते हुए कहा...

"सच!" मानो विकी को बिन माँगे ही मोती मिल गया हो.. इतनी देर से उस पर टूट पड़ने को बेताब विकी का हाथ एक दम से उसकी जांघों पर जाकर चिपक गया...

"आएययी.. ऊउउउउ..." स्नेहा ने एक दम से उसका हाथ दूर पटक दिया," स्टॉप दा कार... आइ सेड स्टॉप दा कार...!" अचानक से स्नेहा का चेहरा तमतमा उठा...

विकी के दिल में आया की गाड़ी रोक कर अभी उसको अपनी गोद में बैठकर झूला दे.... उसको लगा मामला तो बिगड़ ही गया है.. पर फिर भी उसने संयम रखा और गाड़ी रोक दी....

"तूमम.. तुम बहुत बदतमीज़ हो.. तुमने किस बात का क्या मतलब निकाल लिया.." कहते हुए स्नेहा ने गुस्से से खिड़की पटकी और पीछे जाकर बैठ गयी... उसकी आँखों में आँसू थे....

उसके बाद करीब 2 मिनिट तक गाड़ी में कोई हुलचल नही हुई... आख़िरकार विकी को ही चुप्पी तोड़नी पड़ी..," चलें?"

स्नेहा कुच्छ ना बोली... अपनी आँखें मसल मसल कर वो लाल कर चुकी थी...

विकी किसी भी तरह बात को संभाल लेना चाहता था..," सॉरी... वो... मैं समझा की........"

"क्या समझे तुम... हां.. क्या समझे..? यही की मैं कोई आवारा लड़की हूँ... यही की लड़की के लिए उसकी इज़्ज़त.. उसकी आबरू कोई मायने नही रखती.. बोलो!" स्नेहा का ये रूप विकी के लिए किसी आठवे अजूबे से कम नही था.. उसकी आँखों से विकी के प्रति क्षणिक घृणा और ग्लानि भभक रही थी," सारे मर्द भेड़िए होते हैं.. मैने हंसकर दो बात क्या कर ली... तुम जैसे लोगों के लिए गर्लफ्रेंड का एक ही मतलब होता है....!" स्नेहा का हर अंग एक ही भाषा बोल रहा था.. तिरस्कार तिरस्कार और तिरस्कार....

विकी की तो बोलती ही बंद हो गयी.. हालाँकि उसकी शरारती आँखें पूच्छ रही थी..," देवी जी! ऐसे कपड़ों में कोई नारी को पूज तो नही सकता!" पर मामला और बिगड़ सकता था.. इसीलिए आँखों की बात ज़ुबान तक वो लेकर नही आया..," मैने बोला ना सॉरी! आक्च्युयली तुम ऐसी... हो की मैं रह ना सका.. मेरे ज़ज्बात काबू में ना रहे.. अब तो माफ़ कर दो...!"

नारी की सबसे बड़ी कमज़ोरी.. खुद को शीशे में देखकर इतराना और खुद की प्रसंशा सुनकर सब कुच्छ भुला देना.. स्नेहा भी अपवाद नही थी.. विकी की इश्स बात से उसके कलेजे को अजीब सी ठंडक पहुँची जिसकी खनक उसके अगले ही बोल में सुनाई दी," अब चलो भी... अंधेरा हो रहा है.. रात भर यहीं पड़े रहोगे क्या...?" स्नेहा ने अपने आँसू पोंच्छ दिए या हुश्न की तारीफ़ की लेहायर उन्हे उड़ा ले गयी.. पता ही नही चला.. आँखों में आँसुओं का स्थान अब चिरपरिचित चमक ने ले लिया था... गाड़ी फिर दौड़ने लगी....

"अब मौन व्रत रख लिया है क्या? कुच्छ बोलते क्यूँ नही..." लड़की थी.. भला चुप कैसे रहती... 10 मिनिट की चुप्पी ने ही स्नेहा को बोर कर दिया...

विकी कुच्छ नही बोला.. नारी की हर दुखती राग को वह पहचानता था...

"श गॉड! लगता है फोन हॉस्टिल में ही रह गया...! मुझे पापा को फोन करना था...!" स्नेहा अपने पर्स को खंगालने लगी... पर फोन मिलना ही नही था.. वो तो विकी की जेब में पड़ा था.. साइलेंट!

"एक बार अपना फोन देना...!" स्नेहा ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया...

विकी ने मोहन वाला फोन निकल कर स्नेहा को पकड़ा दिया.....

करीब 3 बार फोन करने के बाद मुरारी ने फोने उठाया," साले.. पिल्ले के बच्चे.. कितनी बार बोला है..... रंग में भंग मत डाला कर...!"

स्नेहा को उसके पापा के पास दो लड़कियों के हँसने खिलखिलाने की आवाज़ सुनाई दी..," ओह डार्लिंग! यू आर सो हॅंडसम.. मुऊऊउऊन्हा!"

स्वेता का दिल बैठ गया," पापा! ... मैं हूँ...!" अपने पापा का रंगीलापन देख उसका नरित्व शर्मसार हो गया....

"ओह्ह्ह.. मेरी बच्ची! कैसी हो.. मोहन पहुँच गया ना...!"

"हां पापा.. मैं फोने रखती हूँ..." कहकर उसने फोन काटा और गुस्से से पटक दिया....

"क्या हुआ?" विकी ने अचरज भरी नज़रों से मिरर में देखा...

"कुच्छ नही.. बस बात मत करो.. मेरा मूड खराब है!"

"हुआ क्या है?... अगर मुझे बताने लायक हो...." विकी ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी कर दी...

"बोला ना, कुच्छ नही.. पर्सनल बात थी.... तुम बताओ.. तुम कहाँ के हो.. इश्स'से पहले कहाँ थे.. वग़ैरह वग़ैरह...." स्नेहा ने बात को टालते हुए कहा...

"हमारा क्या है मेडम..! रोटी के लिए आज यहाँ कल वहाँ... जिंदगी तो तुम जैसे बड़े लोगों की होती है.. ऐश ही ऐश.. ना कोई चिंता.. ना फिकर.. !" विकी ने अपने पत्ते फैक्ने शुरू कर दिए थे.....

"ऐसा क्यूँ कहते हो...? क्या मेरी एक भी बात से तुम्हे लगा की मुझ में बड़े होने का कोई गुमान है.. मैने तो जब से होश संभाला है.. बस इश्स अनाथाश्रम जैसे हॉस्टिल में ही रह रही हूँ... पापा कभी मुझे घर लेकर ही नही जाते.. ले भी गये तो दिन के दिन वापस..." स्नेहा की आँखें सूनी हो गयी.. मानो अपनेपन की तलास में भटक भटक कर थक गयी हों...

"पर... ये तो बहुत जाना माना हॉस्टिल है.. अनाथाश्रम कैसे?.. और आप भी तो.. एक्दुम परियों के जैसे रहती हो.. बेइंतहा कर..." विकी ने बात को आगे बढ़ाया!

"अनाथ उसी को कहते हैं ना... जो बिना मा-बाप के रहता हो! मम्मी को तो कभी देखा ही नही.. बस पापा हैं... वो भी.." कहते हुए स्नेहा का गला रुंध गया... जिसके अपने 'अपने' नही होते... वह सबको अपना मान'ने लगता है.. किसी को भी!

"आप ऐसा क्यूँ कह रही हैं मॅम साहब!.. आप तो...."

"ये मेमसाहब मेमसाहब क्या लगा रखा है.. मैं स्नेहा हूँ.. मुझे मेरे नाम से बुलाओ!"

विकी जानता था.. लड़कियाँ ऐसा ही बोलती हैं.. जब कोई उनको अच्च्छा लगने लग जाए..," पर मॅम.. सॉरी.. पर मैं तो आपका नौकर हूँ ना!"

"नौकरी गयी तेल लेने... मुझे अब और घुटन नही चाहिए.. मैं जीना चाहती हूँ.. कम से कम.. जब तक तुम्हारे साथ हूँ.. ओके? कॉल मी स्नेहा ओन्ली.. वी आर फ्रेंड्स!" कहकर स्नेहा ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया.. फ्रेंडशिप का प्रपोज़ल देकर...

विकी ने स्नेहा का कोमल हाथ अपने बायें हाथ में लपक सा लिया,"मैं.. अब क्या कहूँ.. आप को समझ ही नही पा रहा.. इतनी जल्दी गुस्सा हो जाती हैं.. तो उतनी ही जल्दी फिर से...!"

"सच बताओ.. मैं तुम्हे गुस्सैल दिखती हूँ... वो.. उस समय तो... खैर.. हम चल कहाँ रहें हैं.. ये तो बताओ..." स्नेहा धीरे धीरे लाइन पर आ रही थी...

"एक मिनिट..." कहते हुए विकी ने गाड़ी रोकी और बाहर निकल गया.. घना अंधेरा असर दिखाने लगा था... रात हो गयी थी...

"हेलो.. माधव!"

"हां भाई..? सब ठीक तो है ना.. कहाँ हो.. तुम्हारा फोन भी ऑफ आ रहा है..." माधव चिंतित लग रहा था...

"अरे मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. और वो मेरे साथ ही है.. सब तरीके से हो रहा है.. किसी बूथ से फोन करवा मुरारी को.. बोल दे की उसकी बेटी किडनॅप हो गयी है.. जल्दी करना.. अब रखता हूँ.. हां.. मोहन को संभाल कर रखना.. उसको टी.वी से दूर रखना...." कहकर विकी ने फोन काट दिया.... और ऑफ कर दिया...!

वापस आया तो स्नेहा बेचैनी से उसकी राह देख रही थी...," कहाँ चले गये थे.. मुझे डर लग रहा था.."

विकी अपनी अनामिका (छ्होटी उंगली) खड़ी करके मुस्कुराया और गाड़ी में बैठ गया...

"तुम भी ना.. इतनी जल्दी!" कहकर स्नेहा खिलखिलाने लगी.. विकी ने भी हँसने में उसका साथ दिया.. सुर मिलने लगे थे.. दूरियाँ कम होने लगी.. एक अपनापन सा अंगड़ाई लेने लगा.....

गाड़ी फिर चल दी.... पता नही कौन्से रोड पर गाड़ी चल रही थी.. स्नेहा को जान'ने की कोई जल्दी नही थी.. पर विकी को फिकर थी.. अब गाड़ी जल्द से जल्द बदलना ज़रूरी हो गया था.....

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always

`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &

(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !

`·.¸.·´ -- raj

Hello dosto main yaani aapka dost raj sharma paart -35 lekar aapke liye lekar haajir hun

Vicky khidki mein khada hokar ghumad aaye badlon ko dekh raha tha.. Kisi gahri soch mein.. Jo planning wah kar raha tha.. Wah Ghatak thi.. Khud ke liye bhi aur uske career ke liye bhi.. Halanki Rajniti mein uski gahri paith thhi... Par iski galiyan kitni bewafa aur harjayi hoti hain.. Vicky ko ahsaas tha.. Murari ki beti ko agwa karna khud CM ko chot pahunchane ke barabar tha.. Par nafrat ki aag hoti hi aisi hai.. Ismein khud ke nuksaan ya fayde ke barey mein nahi socha jata.. Bulki dushman ki tabahi hi aham hoti hai.. Fir chahe jaan hi kyun na chali jaye..

Murari ka chehra jehan mein aate hi jaise uska munh kadwa ho gaya.. Adhjali cigerette ko bahar fainka aur thhook diya," Sala bhadwa! Kitni kutti cheej hai.."

Vicky ne budbudaya...

"bhai.. Agar tu majak kar raha hai toh bata de.. Warna meine toh switzerland ka tour plan kar liya hai.. Main khudkushi nahi kar sakta.. Sachchi bolta hoon..." Kafi der se sofey par khamosh baithhe Madhav ne kaha...

"Abey ja saley! Tu bhag ja.. Ye game tujh jaise gaanduon ke liye nahi hai.. Ab Murari 10 karod dega aur multiplex ka malik main banunga... Ab ki baar pichhla sara hisab chukta ho jayega..." ,Vicky ne hanste huye kaha...

"par yaar .. Tu karega kaise.. Kya tu usko khula chalenge dega.... Kidnapping ki khabar dega..." Madhav abhi tak decide nahi kar paya tha ki wo kya karega....

"Tujhe ab iss baat se koyi matlab nahi hona chahiye.. Chal fut le.."

"matlab hai bhai.. Tujhe pata hai.. Main tujhe nahi chhod sakta.. Bata na.. Kaise karna hai..?"

"Baithkar tamasha dekhna hai.. Aur taali bajani hai.. Chhakka kahin ka.. Ab tak kyun gaand fati huyi thi saaley..." Vicky ne uske kandhe par hath maara....

"Wo baat nahi hai bhai.. Mujhe pata hai.. Tu dimag se kum aur dil mein ufan rahe jajbaton se jyada kaam leta hai.. Bus isiliye.. Sirf isi wajah se Apna 'Ballu' Murari se maat kha gaya.. Tujhe pata hai...." Madhav ke itna kahte hi Vicky k muthhian aur jabde bhich gaye.. Aankhon mein khoon utar gaya..," Iss baar Murari ki Gaand uske hi hathiyaar se maarunga.. Tu dekhta rah madho.. Main ballu bhai ka badla loonga.. Dekhta rah.. Abki baar dil nahi dimag chalega.. Tujhe ek khushkhabri milne wali hai.. Bus thhodi der ruk ja..." Vicky ne apni baat poori bhi nahi ki thi ki darwaje ke paas gatekeeper aaya," Sahab! Koyi Mohan aaya hai..!"

"Yes! Jaldi bhej usko.. " Vicky ke chehre par kamyabi ki khusi lehra gayi.....

"Ye mohan koun hai bhai..?" Madhav bhi vicky ke sath hi khada ho gaya...

"abhi batata hoon.. 2 minute sabra kar..."

"Namastey sir..!"

"aao aao Mohan kaise ho..?" vicky ne mohan ki kamar thhapthapayi...

"Thheek hoon sahab.. Ye lo gadi ki chabi...! Hamein bahut darr lag raha hai saheb.." Mohan ke bina bataye hi Ye baat jhalak rahi thi ki wo kitna dara huaa hai...

Vicky ne drawer se nikal kar ek thhaila usko thhama diya..," Paise gin le.. Aur apna fone mujhe de.. Paise ghar pahunch jayenge toh madhav tumhari baat kara dega.. Jab tak kaam poora nahi hota.. Tu yahin rahega... Samjha.."

"thheek hai sahab.. Par mere ghar walon par koyi aanch..."

"tu parwah mat kar.. Main dekh loonga.. Pichhe waley kamre mein ja aur daru sharu gatak ji bhar kar.. Malik ki tarah rah..! Aish kar..."

"Thheek hai sahab.." bag mein 500 ki gaddiyan dekhkar Mohan ki aankhein chamak uthhi," Sahab.. Wahan aaj hi jana hai.. Ma'm sahab ko lene..."

"Yaar.. Mera ek kaam kar dega..pls!"... Raj ne school aate huye Virender se kaha...

"Agar unn chhipakaliyon se related koyi kaam hai toh bilkul nahi...." Virender ne Raj ko shanka ki dristi se dekha...

School ka teesra din tha... Priya ke karare hushn ka suroor Raj par chadhta hi ja raha tha.. Viru bhi samjha samjha kar pak gaya tha.. Par Dhaak ke toh wahi teen paat...

"Yaar koyi aisa waisa kaam nahi hai... Jaruri hai.. Padhayi se related..." Raj ke chehre par gidgidahat si ubhar aayi...

"Bol!" Rukha sa jawaab diya...

"aa.. Wo kya hai ki.. Chhuttiyon se pahle ke practicals copy karne hain mujhe... Agar tu.... Priya se maang de toh... Pls.."

"kyun? Priya se kyun.. Main kya mar gaya hoon saale..." Virender ki aankhon se prateet ho raha tha k wo bhi uss acyanak baney aashik se haar maan chuka hai... Man hi man muskura raha tha..

"samjha kar yaar.. Usne achchhe se likha hoga... Maang dega na yaar.."

"achchha.. Ishq tum farmaao.. Aur bali par main chadhun.. Na bhai na.. Agar bolne tak ki himmat nahi hai toh chhod de maidan.." Virender ne Raj ka majak hi toh bana liya...

"Achchha .. Toh tu samajhta hai ki main khud nahi kar sakta..." Raj ne bandar ghudki di...

"toh kar le na yaar.. Mujh par kyun chadh raha hai.. Ja kar le..!" wo class mein ghuse hi thhe ki virender ki kartoot ne Raj ka chehra pila kar diya," Priya! Isko tumse kuchh chahiye...."

Raj ko kato toh khhoon nahi.. Wo iske liye katayi taiyaar nahi tha.. Aur koyi ladki hoti toh wo bebaak hi kah deta.. Par yahan toh dadhi mein tinka tha.. Wah kabhi Apni seat par ja baithhe virender ko toh kabhi darwaje ki aur dekhne laga....

Aakarshan ki Aag dusri taraf thi ya nahi ye toh pata nahi.. Par tinka toh wahan bhi mil hi gaya.. Uthhte baithhte Riya priya ko yaad dilati rahti thi ki raj unki hi aur ghoor raha hai.... Matlab toh wo bhi samajhti hi hogi.. Paglon ki tarah ektak dekhte rahne ka...

Priya ne ek baar Raj ki aur dekha.. Najrein jhukayi.... Fir uthhayi aur jhuka li... Jhukaye hi rahi...

"Haan.. Kya chahiye?" Riya bol padi.. Halanki aawaj bahut meethi thi par Raj ke seene mein teer ki tarah chubhi...

"wwo.. Chemistry kki.. Practical file... Ek baar chahiye thhi... Ek baar.. Bus!" Raj ko ek line bolne mein itni mehnat karni padi ki pasine se tar ho gaya...

Riya ne Priya ka Bag khola aur usmein se file nikal kar dedi...

Raj ne kaanpte haathhon se file pakdi aur apni seat ki aur rukh kar liya...

"tuney.. Meri file kyun di.. Apni de deti.." Priya riya ke kaan mein fusfusayi...

"mujhse thhode hi maangi thhi.. Priya se chahiye thhi na!" kahkar Riya khilkhila padi...

Raj ka chehra dekhne layak tha.. Halanki uski mansha kaamyaab huyi.. Par be-aabroo sa hokar...

File ke ek ek panne ko Raj iss tarah palat raha tha.. Jaise wah Geeta ho... Badey pyar se.. Badi shraddha se..

Na toh Priya apni file ko wapas maang payi aur na hi uss din Raj usko wapas kar paya...

Chamchamati huyi Mercedes hostal ke gate ke bahar ruki.. Jaanboojh kar Vicky ne driver wali dress nahi dali thhi.. Black jean aur collar wali white T-shirt mein sarkaar badle badle najar aa rahe thhe.. Warna toh safed kurta pajama uski shakhshiyat ki pahchan ban chuke thhe.. Back view mirror ko adjust karke usne ek sarsari si najar apne hi chehre par dali.. 'Wah kya lag raha hai tu' ...vicky mann hi mann budbudaya aur kamar ke sath tangi mouser nikal kar seat ke neeche sarka di...

Rayban ke polarised goggles pahne jab neeche utara toh Gatekeeper bina salute kiye na rah saka.. Warna toh wahan agar guardian aate bhi thhe toh back seat par baithkar....

"salam sahab! Gadi andar le jani hai toh gate khol doon?"

"Nahi.. Miss Sneha ko bolo Driver aa gaya hai.. usko lene..!" Vicky ne baahein failakar aasman ko niharte huye angdayi li...

"Driver?????.... Aap?" Gatekeeper aascharya se jooton se lekar goggles tak politician vicky se gentleman vicky mein tabdeel huye shaksh ko ghhoorta chala gaya...

" 6 feet 1 inch!" vicky ne uski aankhon mein aankhein daalkar kaha...

"kya?"

"mujhe laga meri height maap rahe ho.." vicky muskuraya...

"room No. kya hai..?

"247! Jaldi karo..." Vicky ko jaldi thhi.. Chidiya ko lekar ud jaane ki...

Gatekeeper ne ek no. dial kiya..," Hello Ma'm! Room No. 247 se sneha ji ko neeche bhej do... Driver Ji... Sorry.. Aa.. Unka Driver lene aaya hai.." wah ab bhi fati najron se vicky ko nihar raha thha....

"O teri.. Kya piece hai???" Door se ek ladki ko aate dekh Vicky ki haddiyan tak jam gayi.. 'nahi nahi.. Ye toh sneha ho hi nahi sakti.. Kahan wo badsoorat murari.. Aur kahan ye hushn ki pari... Wo toh shayad apne dono hath uthakar bhi iski unchayi ko nahi chhoo sakta... Par vicky khuda ki uss haseen kriti se najrein na hata saka...

Jyon jyon ladki kareeb aati gayi.. Uske chhote kapdon mein chhipe anmol khajane ko vicky apni paarkhi najron se parakhne laga..

Kareeb 5'8" ki height hogi.. Kamar toh mano thi hi nahi.. 26" ki kamar bhi koyi kamar hoti hai.. Uski jaise doodhiya rang mein puti jaanghon par fansi huyi gulabi rang ki mini skirt peechhe se usko mushkil se hi dhak pa rahi hogi... Upar safed rang ki chadar si silwaton se bhari padi thi.. Usko kya kahte hain.. Vicky ko andaja nahi tha.. Par wo silwatein bhi Shandaar ubharon ka size chhupane mein saksham nahi thhi.. Wahan se kapda tight tha.. Ekdum.. Chalne ke sath hi uske lumbe baal idhar udhar lehra rahe thhe.....

Achanak vicky ka kaleja munh ko aa gaya jab uss ladki ki meethi si aawaj uske kaano mein padi...,"kahan hai.. Driver?"

Gatekeeper bina kuchh bole vicky ki aur dekhne laga..

"Driver??? Aap.." lagbhag wahi pratikriya Sneha ki thhi.. Jo kuchh der pahle Gatekeeper pradarshit kar chuka tha... Fir sambhalte huye usne apni Gadi ko pahchana aur boli," Gadi andar le aao..!"

Vicky ne Gadi Sneha ke bataye anusar le jakar rok di aur bahar nikal kar khada ho gaya...

"saman koun rakhega..??"

"Kya ? oh Sorry.." vicky ko baat sunkar ekbaar gussa aaya par agle hi pal wo sambual gaya..," Kahan hai..?"

"lagta hai.. Experiance nahi hai.. Aao.." aur kahkar Sneha andar se lakar saman rakhwane mein uski madad karne lagi....

"aa.. Tumne kab se noukri join ki hai..?" Sneha ne chahakte huye poochha...

"Paidayishi noukar hoon...!" Vicky ne talkh lahje mein jawaab diya.... Dono hostel se kareeb 5 km aa chuke thhe.. Jab Sneha se chup na raha gaya...

"Shakal se lagte nahi ho.. Ab tak toh papa khoosat driver rakha karte thhe...!"

"hummm!" vicky ne usi raftaar se gadi chalana jari rakha...

"waise hum jakahan rahe hain.." Sneha ne aagey wali seat ki aur jhukte huye kaha...

"jahan kaho...!" Vicky apne plan par kaam kar raha tha.. Mann hi mann.. Usko yakeen nahi ho raha tha ki wo itniaasani se pahli seedhi paar kar lega...

"Mount abu chalo.. Hamare school ki trip wahin gayi hai.."

"Nahi.. Mujhe wo jagah pasand nahi hai... Kahin aur bolo..." Vicky bhala uske school ki trip mein usko shamil kaise karta...

"what do u mean by tumhe pasand nahi hai.. Dont forget u r a driver... Chalo! Hum wahin chalenge..."

"nahi.. Jahan mera mann nahi maanta; wahan mein nahi jata.. Kaho toh wapas hostel chhod dun...." Vicky ne apne kandhe uchka kar apna irada bata diya...

"Badey idiot kism ke driver ho.. Agar papa kahte toh bhi nahi jatey kya..?" Sneha ke mathhe par tyoriyan par bal pad gaye...

"uss.. Unki baat aur hai... Main unka driver hoon.." Kahte huye Vicky ka jabda bhich gaya tha..

"to mere kya ho?"

"Mohan... Mera naam hai.... Baki jo tum kaho..!" Vicky ne race par se dabav hatate huye bola....

"Hey! Tumhe nahi lagta tum kuchh jyada hi bolte ho..... Errrrr.. Ye Gadi kyun rok di..?" Sneha ko ab har baat ajeeb lag rahi thi....

"Peshab karna hai.. Tum bhi kar sakti ho.. Sunsaan jagah hai...!" Vicky ne Khidki kholi aur bahar nikal gaya....

Sneha niruttar ho gayi.. Uss'se Itni badtameeji se baat karne ki himmat aaj tak kisi mein nahi thi..

Vicky sadak kinare chalta hua kareeb 10 hi kadam aage gaya hoga... Usne apni zip sarkayi aur apna 'lambu' bahar nikal liya.. Wo toh tab se hi bahar aane ko tadap raha tha.. jab usne gate ki taraf madak andaj mein matakti aa rahi Sneha ko dekha thha.. Bahar aate hi 2-3 baar upar neeche huaa..

Vicky ne jaanboojh kar apne aapko iss position mein khada kiya thha ki agar chahe toh aasani se sneha uss bhari bharkam 'jugad' ko dekh sake...

Vicky wapas aaya toh Sneha ka chehra tapte angaare ki tarah laal ho chuka thha.. Mano usne koyi anokhi cheej dekh li ho.. Najrein lajayi huyi thhi.. Jaangheinek dusri ke upar chadhi thhi.. Aur hont tar ho chuke thhe.. Shayad jeebh ghoomkar gayi

hogi...

Vicky ne wapas aane par har ek cheese note ki thi.. Par Rape uske plan mein nahi

tha.. Sneha ko iss kadar pagal kar dena tha ki wo kunwari ho ya randi ban chuki ho.. Pake huye fal ki tarah uski godi mein aa girey....

"toh bataya nahi.. Kahan chalein...?" Vicky ne seat par baithkar gadi start karte huye kaha...

"jahannum mein..." kahkar Sneha ne apna munh bahar ki aur kar liya....

"wo bhi mujhe pasand nahi... Main toh jannat mein rata hoon.. Aish karta hoon!"

Vicky ki iss hazirjawabi par Sneha muskuraye bina na rah saki... ," thheek hai fir.. Wahin chalo!"

"kahan?"

"jannat mein.. Aur kahan..."

"nahi.. Tum abhi uss layak nahi ho...!"

"A tum pagal ho kya? Ek bhi baat ka seedha jawaab nahi dete.. Main toh khush ho gayi thi.. Tumhe dekhkar.. Ki pahli baar koyi dhang ka driver bheja hai.... Tum ho ki.......," Oyiiiiii mummmy.... Ye yahan kaise...?"

Vicky ne gadi rok di.... Palata toh chounk gaya..," yye mujhe do..!"

"par ye gadi mein kaise rah gayi... Isko toh papa ke paas hona chahiye..." Sneha hairat se mouser ko dekh rahi thi...," Main papa ke paas fone karti hoon.."

"nnahi.. Koyi jarurat nahi hai.. Ye meri hai.. Par tumhe kaise mili.." vicky ne uske hath se mouser le li...

"wwo.. Maine apni taang seedhi ki toh meri sendal seat mein fans kar nikal gayi.. Usko nikal rahi thi toh... Par tumhare paas mouser.. Tum sach mein ajeeb aadmi ho.. Itne mahange shouk!" Sneha usko ajeeb tareeke se dekh rahi thhi....

"wo darasal main driver nahi hoon.. S.O. hoon tumhare papa ka...!" vicky tab tak sambhal gaya tha...

"Ohh.. I see!" Sneha ke bhav Vicky ke liye achanak badal gaye...," Sorry.. Maine aapse galat sulook kiya ho toh..."

"kahan chalein...?" vicky ne sawaal kiya...

"kaheen bhi.. Jahan tum chaho.. Bus mujhe khuli hawa mein saans leni hai.. Aap sach mein hi kamaal ke ho... Vu hooooooooooo.." Sneha ne sheesha neeche karke bahar munh nikala aur jor ki cheekh mari.. Anand aur laparwahi bhari cheekh....

Vicky kuchh na bola... Uske plan ka dusra hissa kuchh jyada hi jaldi kaamyab ho gaya... Sneha ka visvas jeetne wala hissa...

Gadi sadak par ek baar fir tez gati se doud padi....

"ek minute rokogey pls.. "

"kya hua..?"

"oho.. Roko bhi..."

"batao toh sahi.. Hua kya hai aakhir..."

"ladkiyan ladkon ki tarah besharm nahi hoti... Jaldi roko pls.." Sneha ke chehre par bechaini saaf jhalak rahi thi...

"ohh.." kahte huye Vicky ne break laga diye....

Sneha Gadi se neeche utarte hi tej kadmon se paas ki jhadiyon ki taraf chal di.. Uski gaand ki lachakan dekhkar Vicky aah bhar uthha.. Par control jaruri tha... Dimag se kaam lena tha iss baar!

Najron se aujhal hote hi Vicky ne uske purse mein hath mara.. mobile upar hi mil

gaya.. Vicky ne usko silent karke apni pant ki jeb mein daal liya...

Sneha ki peshab karne ki pyari aawaj ne Vicky ki dhadkane aur badha di.. Sneha kunwari thi.. Bilkul kunwari.. Vicky peshab karne ki aawaj se hi iss bare mein confirmed ho gaya.. Hath ke ishare se usne pant mein kulbula rahe yaar ko shant rahne ki naseehat di....

Sneha wapas aayi toh uski aankhon mein lajja si thhi.. Ek apnapan sa tha.. Ek chance tha!

"Main aage baith jaaun?" Peshab karke wapas aayi Sneha ke mann mein ab aadesh nahi.. Aagrah tha...

"Kyun nahi..!" kahkar vicky ne agli khidki khol di..

"ohh thanx... Ek baat bolun?" Sneha ne apne aapko agli seat par adjust kiya...

"hummm... Bolo!" Vicky ne hulki si muskaan uski aur fainki.. Darasal wo uss adhnange kamsin badan ko dekhkar badi mushkil se apni bekaraari chhipa pa raha tha.. Chikni jaanghein beparda si uski najron ke saamne thhi.... Ek dusri se chipki huyi!

"mujhe shuru mein hi shaq tha ki tum driver toh kum se kum nahi hi ho.. Tum toh ekdum hero lagte ho...!" Sneha apni shirt ko neeche kheenchti huyi boli.. Jo simat kar uski nabhi tak pahunch gayi thi...

"hummm.. Bina heroine ke bhi koyi hero hota hai bhala..." jane vicky baat ko kahan ghuma raha tha...

"matlab!" kya sach mein wo matlab nahi samajh payi hogi...?

"kuchh nahi.. Bus aise hi...!"

"matlab tumhari koyi girlfriend nahi hai.. Hai na?" Sneha ne hulki si muskan uski taraf faink di...

Girl F.... Sunte hi anginat sundar chehron ki kataar si vicky ki aankhon mein ghoom gayi.. Par pratyax mein wo kuchh aur hi bola..," kuchh aisa hi samajh lo..! Koi milti hi nahi...!"

"udaas kyun hote ho.. Jab tak hum hain.. Humein hi samajh lo.." Sneha ne katil muskaan uski aur fainkte huye kaha...

"Sach!" mano Vicky ko bin maange hi moti mil gaya ho.. Itni der se uss par toot padne ko betaab vicky ka hath ek dum se uski jaanghon par jakar chipak gaya...

"Aeyyyy.. Uuuuu..." Sneha ne ek dum se uska hath door patak diya," Stop the car... I said stop the car...!" achanak se Sneha ka chehra tamtama uthha...

Vicky ke dil mein aaya ki gadi rok kar abhi usko apni god mein baithakar jhula de.... Usko laga maamla toh bigad hi gaya hai.. Par fir bhi usne sanyam rakha aur gadi rok di....

"Tumm.. Tum bahut badtameej ho.. Tumne kis baat ka kya matlab nikal liya.." Kahte huye Sneha ne gusse se Khidki patki aur peechhe jakar baith gayi... Uski aankhon mein aansoo thhe....

Uske baad kareeb 2 minute tak Gadi mein koyi hulchal nahi huyi... Aakhirkaar Vicky ko hi chuppi todni padi..," Chalein?"

Sneha kuchh na boli... Apni aankhein masal masal kar wo laal kar chuki thi...

Vicky kisi bhi tarah baat ko sambhal lena chahta tha..," Sorry... Wo... Main samjha ki........"

"Kya samjhe tum... Haan.. Kya samjhe..? Yahi ki main koyi aawara ladki hoon... Yahi ki ladki ke liye uski ijjat.. Uski aabroo koyi mayne nahi rakhti.. Bolo!" Sneha ka ye roop Vicky ke liye kisi aathhwein ajoobe se kum nahi tha.. Uski aankhon se vicky ke prati kshanik ghrina aur glani bhabhak rahi thhi," sare mard bhediye hote hain.. Maine hanskar do baat kya kar li... Tum jaise logon ke liye Girlfriend ka ek hi matlab hota hai....!" Sneha ka har ang ek hi bhasha bol raha tha.. Tiraskar tiraskar aur tiraskar....

Vicky ki toh bolti hi band ho gayi.. Halanki uski shararati aankhein poochh rahi thhi..," Devi ji! Aise kapdon mein koyi nari ko pooj toh nahi sakta!" par maamla aur bigad sakta tha.. Isiliye aankhon ki baat juban tak wo lekar nahi aaya..," Maine bola na Sorry! Actually tum aisi... Ho ki main rah na saka.. Mere jajbaat kaabu mein na rahe.. Ab toh maaf kar do...!"

Nari ki sabse badi kamjori.. Khud ko sheeshe mein dekhkar itrana aur khud ki prasansha sunkar sab kuchh bhula dena.. Sneha bhi apwaad nahi thi.. Vicky ki iss baa se uske kaleje ko ajeeb si thhandak pahunchi jiski khanak uske agle hi bol mein sunayi di," Ab chalo bhi... Andhera ho raha hai.. Raat bhar yahin pade rahoge kya...?" Sneha ne apne aansoo ponchh diye ya hushn ki taareef ki lehar unhe uda le gayi.. Pata hi nahi chala.. Aankhon mein aansuon ka sthan ab chirprichit chamak ne le liya tha... Gadi fir doudne lagi....

"ab moun vrat rakh liya hai kya? Kuchh bolte kyun nahi..." Ladki thhi.. Bhala chup kaise rahti... 10 minute ki chuppi ne hi Sneha ko bore kar diya...

Vicky kuchh nahi bola.. Nari ki har dukhti rag ko wah pahchaanta tha...

"Ohh God! Lagta hai fone Hostel mein hi rah gaya...! Mujhe papa ko fone karna tha...!" Sneha apne purse ko khangaalne lagi... Par fone milna hi nahi tha.. Wo toh Vicky ki jeb mein pada tha.. Silent!

"Ek baar apna fone dena...!" Sneha ne apna hath aage badha diya...

Vicky ne Mohan wala fone nikal kar Sneha ko pakda diya.....

Kareeb 3 baar fone karne ke baad Murari ne fone uthhaya," Saley.. Pille ke bachche.. Kitni baar bola hai..... Rang mein bhang mat dala kar...!"

Sneha ko uske papa ke paas do ladkiyon ke hansne khilkhilane ki aawaj sunayi di..," Oh Darling! U r so handsome.. Muuuuunha!"

Sweta ka dil baith gaya," Papa! ... Main hoon...!" apne papa ka rangeelapan dekh uska naritva sharmsaar ho gaya....

"ohhh.. Meri bachchi! Kaisi ho.. Mohan pahunch gaya na...!"

"haan papa.. Main Fone rakhti hoon..." kahkar usne fone kaata aur gusse se patak diya....

"kya hua?" vicky ne acharaj bhari najron se Mirror mein dekha...

"kuchh nahi.. Bus baat mat karo.. Mera mood kharaab hai!"

"hua kya hai?... Agar mujhe batane layak ho...." Vicky ne gadi ki raftaar dheemi kar di...

"bola na, kuchh nahi.. Personal baat thhi.... Tum batao.. Tum kahan ke ho.. Iss'se pahle kahan thhe.. Wagairah wagairah...." Sneha ne baat ko taalte huy kaha...

"hamara kya hai madam..! Roti ke liye aaj yahan kal wahan... Jindagi to tum jaise badey logon ki hoti hai.. Aish hi aish.. Na koyi chinta.. Na fikar.. !" vicky ne apne patte faikne shuru kar diye thhe.....

"aisa kyun kahte ho...? Kya meri ek bhi baat se tumhe laga ki mujh mein badey hone ka koyi gumaan hai.. Maine toh jab se hosh sambhala hai.. Bus iss anathasharam jaise hostel mein hi rah rahi hoon... Papa kabhi mujhe ghar lekar hi nahi jatey.. Le bhi gaye toh din ke din wapas..." Sneha ki aankhein sooni ho gayi.. Mano Apnepan ki talaas mein bhatak bhatak kar thak gayi hon...

"par... Ye toh bahut jana mana hostel hai.. Anathasharam kaise?.. Aur aap bhi toh.. Ekdum pariyon ke jaise rahti ho.. Banthhan kar..." vicky ne baat ko aagey badhaya!

"anath usi ko kahte hain na... Jo bina maa-baap ke rahta ho! Mummy ko toh kabhi dekha hi nahi.. Bus papa hain... Wo bhi.." kahte huye Sneha ka gala rundh gaya... jiske apne 'apne' nahi hote... Wah sabko apna maan'ne lagta hai.. Kisi ko bhi!

"aap aisa kyun kah rahi hain mam sahab!.. Aap toh...."

"ye memsahab memsahab kya laga rakha hai.. Main Sneha hoon.. Mujhe mere naam se bulao!"

Vicky jaanta tha.. Ladkiyan aisa hi bolti hain.. Jab koyi unko achchha lagne lag jaye..," Par Mam.. Sorry.. Par main toh aapka noukar hoon na!"

"Noukari gayi tel lene... Mujhe ab aur ghutan nahi chahiye.. Main jeena chahti hoon.. Kum se kum.. Jab tak tumhare sath hoon.. OK? Call me Sneha only.. We r friends!" kahkar Sneha ne apna hath aage badha diya.. Friendship ka proposal dekar...

Vicky ne Sneha ka komal hath apne bayein hath mein lapak sa liya,"Main.. Ab kya kahoon.. Aap ko samajh hi nahi pa raha.. Itni jaldi gussa ho jati hain.. Toh utni hi jaldi fir se...!"

"sach batao.. Main tumhe gussail dikhti hoon... Wo.. Uss samay toh... Khair.. Hum chal kahan rahein hain.. Ye toh batao..." Sneha dheere dheere line par aa rahi thi...

"Ek minute..." Kahte huye Vicky ne Gadi roki aur bahar nikal gaya.. Ghana andhera asar dikhane laga tha... Raat ho gayi thi...

"Hello.. Madhav!"

"haan bhai..? Sab thheek toh hai na.. Kahan ho.. Tumhara fone bhi off aa raha hai..." Madhav chintit lag raha tha...

"arey main bilkul thheek hoon.. Aur Wo mere sath hi hai.. Sab tareeke se ho raha hai.. Kisi booth se fone karwa Murari ko.. Bol de ki uski beti kidnap ho gayi hai.. Jaldi karna.. Ab rakhta hoon.. Haan.. Mohan ko sambhal kar rakhna.. Usko T.V se door rakhna...." kahkar vicky ne fone kaat diya.... Aur off kar diya...!

Wapas aaya toh sneha bechaini se uski raah dekh rahi thi...," kahan chale gaye thhe.. Mujhe Darr lag raha tha.."

Vicky apni anamika (chhoti ungali) khadi karke muskuraya aur Gadi mein baith gaya...

"tum bhi na.. Itni jaldi!" kahkar Sneha khilkhilane lagi.. Vicky ne bhi hansne mein uska sath diya.. Sur milne lage thhe.. Dooriyan kum hone lagi.. Ek apnapan sa angadayi lene laga.....

Gadi fir chal di.... Pata nahi kounse Road par gadi chal rahi thi.. Sneha ko jaan'ne ki koyi jaldi nahi thi.. Par vicky ko fikar thi.. ab Gadi jald se jald badalna jaruri ho gaya tha.....

 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --36

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका राज शर्मा गर्ल्स स्कूल पार्ट 36 लेकर आपके लिए हाजिर हूँ

ये पार्ट आपको कैसा लगा लिखना मत भूलना

" स्नेहा जी.. हमें आगे से दूसरी गाड़ी लेंगे!" विकी ने सहज भाव से कहा...

"क्यूँ?" स्नेहा के पल्ले बात नही पड़ी...

"आपके पापा का आदेश है..." विकी ने बिना कोई भाव चेहरे पर लाए कहा...

"पर क्यूँ.. व्हाई दा हेल वी.... दिस कार इस सो कंफर्टबल यू नो..." स्नेहा को सौ सौ कोस तक भी अंदाज़ा नही था की फिलहाल कुच्छ भी उसके पापा की मर्ज़ी से नही हो

रहा है....

" अब मैं तो पॉलिटिक्स में नही हूँ ना.. स्नेहा जी! उनकी बातें.. वही जाने.."

" तुम्हारी कितनी उमर है....?"

"27 साल!"

"मैं तुमसे 8 साल छ्होटी हूँ.. ये नाम के साथ आप और जी लगाना बंद करो.. नही तो में तुम्हे अंकल जी कहना शुरू कर दूँगी.. समझे!" शरारती मुस्कान पल भर के लिए स्नेहा के कमनीया और मासूम से चेहरे पर दौड़ गयी..

" ओके! तो फिर क्या बोलूं..? तुम ही बता दो..." विकी ने भी स्टाइल मारने में देर नही लगाई...

"स्नेहा! ... चाहो तो सानू भी बोल सकते हो.. मेरी फ्रेंड्स मुझे यही कहती हैं.. मुझे बड़ा अच्च्छा लगता है..." स्नेहा अगली सीट के साथ सर टिका कर विकी को निहारने लगी...

"ओक.. सानू! बहुत प्यारा नाम है.. सच में..." विकी ने नज़र भर कर सानू की और देखा.. और तुरंत गाड़ी एक इमारत के साथ रोक दी...

"क्या हुआ... ?" स्नेहा की आवाज़ में अब कुच्छ ज़्यादा ही मिठास आ गयी थी...

तभी अंधेरे को चीरती हुई एक लंबी सी गाड़ी वहाँ आकर रुकी.. कौनसी थी.. ये दिखाई नही दिया...

स्नेहा के लिए वो जगह बिल्कुल अंजानी थी.. और वो चेहरे भी.. जो गाड़ी से उतरे.. एकद्ूम काले कलूटे.. बेढंगे से.. स्नेहा उनको देखकर सहम सी गयी.. वो तीनो उन्ही की और बढ़े आ रहे थे...

"ये कौन हैं.. ये सब क्या है..?" भय के मारे स्नेहा खिड़की से जा चिपकी...

पर विकी के बोलने से पहले ही स्नेहा को जवाब मिल गया..

उन्न तीनो में से एक ने विकी की खिड़की खोली...," लड़की को उतार दो... तुम्हारा काम ख़तम हुआ..."

स्नेहा को काटो तो खून नही.. इसकी तो उसने कभी कल्पना भी नही की थी...

"सोनू! तुम्हे अब इनके साथ जाना होगा... साहब का यही आदेश था...!" विकी ने पिछे देखते हुए कहा...

"नही.. मैं नही जाउन्गि.. मुझे नही जाना कहीं... मुझे वापस छ्चोड़ आओ.. हॉस्टिल में.." स्नेहा के दिल में उन्न चेहरों को देखकर ही इतना डर समा गया था की उसने अपने दोनो हाथ प्रार्थना की मुद्रा में जोड़ लिए...

" ठीक है.. मैं बात करके देखता हूँ.. " कहकर विकी नीचे उतर गया...

" स्नेहा तुम लोगों के साथ नही जाना चाहती.. मैं उस गाड़ी में ले जाता हूँ.. स्नेहा को.. तुम लोग ये ले जाओ..." विकी की ये बात सुनकर स्नेहा के दिल में हुल्की सी ठंडक पहुँची.. पर वो ज़्यादा देर तक कायम ना रह सकी...

" तुम अपनी नौकरी करो.. और हमें हमारा काम करने दो... हमें लड़की को उठाकर ले जाने के पैसे मिले हैं.. गाड़ी को ले जाने के नही.. अब चलो फूटो यहाँ से..." तीनो में से एक ने कहा...

स्नेहा थर थर काँप रही थी... क्यों हुआ.. कैसे हुआ.. इसकी उसको फिकर नही थी.. बस जान बच जाए; बहुत था.. उसने खिड़की खोली और विकी से जाकर चिपक गयी.. ," नही.. प्लीज़.. मुझे मत भेजना.. छ्चोड़कर मत जाना... मैं मार जाउन्गि..." स्नेहा ने अपनी आँखें बंद कर ली थी...

आआअह... विकी के लिए ये सब किसी हसीन सपने से कम नही था.. स्नेहा के जिस्म का कतरा कतरा अपनी महक विकी में छ्चोड़ रहा था.. सब कुच्छ विकी के प्लान के मुताबिक ही हो रहा था.. पर ये वक़्त कुच्छ करने का था..," नौकरी गयी भाड़ में... अगर सानू कह रही है कि उसको तुम्हारे साथ नही जाना.. तो मैं इसको नही भेजूँगा.. जाकर साहब को बता देना.... कि स्नेहा ने मना कर दिया... चलो अब भागो यहाँ से...."

" ऐसे कैसे भाग जायें.. अभी तो सिर्फ़ पैसे लिए हैं... इसकी भी तो लेनी है अभी.. 7 रातों की बात हुई है हमारी.. इसको कुँवारी थोड़े रहने देंगे.. चोद..." कहते हुए जैसे ही उनमें से एक आदमी ने अपना हाथ स्नेहा की और बढ़ाया.. विकी ने अपनी दाहिनी तरफ सानू को अपने आगोश में समेटे बायें हाथ की मुठ्ठी कसी और ज़ोर से एक दमदार घूँसा उसकी ओर लपक रहे आदमी को जड़ दिया...

नाटक चल रहा था.. पर शायद घूँसा असली था.. उस आदमी के पैर उखड़ गये और अपनी नानी को याद करता हुआ वो शक्श पीठ के बल ज़मीन पर जा गिरा..," आयाययू!"

स्नेहा अब और भी डर गयी.. क्या छाती क्या जांघें.. सब छुप जाना चाहते थे.. विकी में समा जाना चाहते थे..

गिरा हुआ आदमी उठ नही पाया... दूसरे ने चाकू निकाल लिया.. लूंबे फन वाला... धारदार!

"ओह्ह्ह..." ये क्या हुआ.. रिहर्सल की कमी थी.. उस आदमी को चाकू मारना था और विकी को उसको बीच में ही लपकना था... पर बायें हाथ की वजह से वो चूक गया और चाकू करीब एक इंच विकी के कंधे में जा बैठा.....

"साले.. तेरी मा की.. मुझे चाकू मारा.." दर्द से बिलबिला उठा विकी कुच्छ पल के लिए नाटक वाटक सब भूल गया.. स्नेहा को झटके के साथ अपने से दूर किया और उन्न दोनो पर पिल पड़ा.. तीन चार मिनिट में ही उनको इतने ज़्यादा लात घूँसे जमा दिए की उनको लगा अब भाई के सामने ठहरना बेकार है.. तीनो ने अपनी लंगोटी संभाली और नौ दो ग्यारहा हो गये.. गाड़ी वाडी सब वहीं छ्चोड़कर.....

अब जाकर विकी को स्नेहा का ख़याल आया.. वो आँखें फाडे विकी के इश्स प्रेपलन्नेड़ कारनामे को देख रही थी... जैसे ही विकी उसकी और घूमा.. वो दौड़ कर उस'से आ लिपटी.. इश्स बार डर से नही.. खुशी से..!

" जल्दी करो स्नेहा.. हमें अपना सारा समान दूसरी गाड़ी में डालना है...."

"पर... ये सब क्या है मोहन..? मेरी कुच्छ समझ नही आ रहा..."

" बताता हूँ.. अब तो सब कुच्छ बताना ही पड़ेगा... तुम जल्दी उस गाड़ी में बैठो...." विकी ने उसकी कमर सहलाते हुए बोला...

" नही.. मुझे डर लग रहा है.. तुमसे दूर नही जाउन्गि... एक पल के लिए भी....

"ओक.. तुम मेरे साथ ही रहो.." विकी ने स्नेहा के गालों पर हाथ फेरा और उसको बगल में दबाए.. गाड़ी से समान उतारने लगा...

"चलो बैठ जाओ...!" विकी ने पिच्छली खिड़की खोलते हुए स्नेहा को इशारा किया...

स्नेहा की जांघों में चीटियाँ सी रेंग रही थी.. उसको पता नही था की क्यूँ बस दिल कर रहा था की एक बार फिर से वैसे ही अपने 'मोहन' से चिपक जाए.. एक दम से वो उसकी पुजारीन सी बन गयी थी.. कुच्छ पहले तक उसको अपने बाप की जागीर समझने वाली स्नेहा अब खुद को उसकी जागीर बना बैठी थी.. और उसको अपनी तकदीर.. लड़कीपन ने अपना रंग दिखाना शुरू किया..," नही.. मैं भी आगे ही बैठूँगी.. मुझे डर लग रहा है पिछे बैठते हुए..." मानो विकी का साथ अब सबसे सुरक्षित था दुनिया में....

"ओ.के. सोनू मॅ'मसाहब! आ जाओ.." विकी मुस्कुराया...

विकी की मुस्कुराहट का जवाब सानू ने जीभ निकाल कर दिया.. और आगे जा बैठी...

गाड़ी चल चुकी थी.. प्लान के अगले पड़ाव की ओर..

"बताओ ना.. ये सब क्या था.. मुझे तो चक्कर आ रहे हैं... सोचकर ही.." स्नेहा सीट से उचकी और उसकी जांघों को नितंबों तक अनावृत करके पिछे सरक गयी अपनी मिनी स्कर्ट को दुरुस्त किया...

विकी संजीदा अंदाज में इश्स कपोल कल्पित रहस्या पर से परदा उठाने लगा," देखो सानू.. मैने जो कुच्छ भी कर दिया है.. उस'से मेरी नौकरी ही नही..जान भी ख़तरे में पड़ गयी है... और अब में जो कुच्छ बताने जा रहा हूँ.. उस'से पहले तुम्हे एक वादा करना होगा..."

"वादा किया!" सानू ने गियर पर रखे विकी के हाथ पर अपना हाथ रख दिया...

"पहले सुन तो लो.. क्या वादा करना है..?"

"नही.. मैने अभी जो कुच्छ भी देखा है.. उसके बाद तुम पर विस्वास ना करना.. मैं सोच भी नही सकती.. इतना तो कोई किसी अपने के लिए भी नही करता.... मैने वादा किया.. जैसा कहोगे.. वैसा करूँगी.. पर प्लीज़.. मुझे छ्चोड़ कर ना जाना.. अब!" स्नेहभावुक हो गयी...

"कभी भी?" वी की के दिल में गुदगुदी सी होने लगी... उसने एक पल के लिए स्नेहा की और देखा...

स्नेहा की आँखें झुक गयी.. पर झुकने से पहले बहुत कुच्छ कह गयी थी.. विकी के हाथ पर बढ़ गयी उसके हाथ की कसावट आँखों की भाषा को समझने की कोशिश कर रही थी....

"सब तुम्हारे पापा ने करवाया है....! तुम्हारी किडनॅपिंग का नाटक..!" विकी ने एक ही साँस में स्नेहा को बोल दिया...

अजीब सी बात ये रही की स्नेहा को इश्स पर उतना अचरज नही हुआ.. जितना होना चाहिए था," हाँ.. एक पल को सारी बातें मेरे जहाँ में घूम गयी थी.. पापा ने खुद ही मुझे घूम कर आने को कहा.. जबकि उन्होने मुझे स्कूल की लड़कियों के साथ भी जाने नही दिया.. 2 दिन पहले.. मुझसे ढंग से बात तक नही की.. फिर पापा ने गाड़ी बदलने की बात कही.. फिर ये लोग....!"

"... पर ऐसा किया क्यूँ उन्होने.... क्या चाहते हैं वो.. ऐसा करके.."

"पता नही.. पर जहाँ तक मेरा ख़याल है.. वो ऐसा करके एलेक्षन में लोगों की सहानुभूति बटोरना चाहते होंगे.. क्या पता मरवा भी देते..." विकी ने अपना नज़रिया उसको बताया...

सानू का चेहरा पीला पड़ गया... मुत्ठियाँ भिच गयी," पर इश्स'से उनको मिलेगा क्या..? लोगों की सहानुभूति कैसे मिलेगी...?" वो विकी के मुँह से निकली हर बात को पत्थर की लकीर समझ रही थी...

"ये राजनीति चीज़ ही ऐसी है सानू.. जाने क्या क्या करना पड़ता है...! हो सकता है की विरोधी पार्टी के लोगों पर आरोप लगायें.... एक मिनिट.. आगे पोलीस का नाका लगा हुआ है शायद.. तुम कुच्छ भी मत बोलना.. बस अपने चेहरे पर मुस्कान लाए रखना.. ध्यान रखना.. कुच्छ भी मत बोलना...."

"ओके! " कहकर सानू मुस्कुराने लगी.....

पोलीस वाले ने बॅरियर रोड पर आगे सरका दिया. विकी ने गाड़ी पास ले जाकर रोक दी... ," क्या बात है भाई साहब?"

"कुच्छ नही...! कहकर वो गाड़ी के अंदर टॉर्च मार कर आगे पिछे देखने लगा...," ये लड़की कौन है?"

"मेरी बीवी है.. क्यूँ?" विकी ने सानू को आँख मारी.. सानू को अहसास हुआ मानो आज वो सच में ही दुल्हन बन'ने जा रही हो.. अपने 'मोहन' की....

"सही है बॉस.. चलो!" पोलीस वाले ने हाथ बाहर निकाल लिया...

"अरे बताओ तो सही क्या हुआ...?" विकी ने अपना सिर बाहर निकाल कर पूचछा...

"क्या होना है यार.. वो ससुरे मुरारी की लड़की भाग गयी होगी.. कह रहे हैं किडनप हो गयी है.. है भला किसी की इतनी हिम्मत की उस साले की लौंडिया को उठा ले जाए.. हमारी नींद हराम करनी थी .. सो कर रखी है..."

स्नेहा का मुँह खुला का खुला रह गया.. वो बोलना चाहती थी.. पर उसको 'मोहन' की इन्स्ट्रक्षन्स याद आ गयी...

विकी ने गाड़ी चला दी....," सच में.. पॉलिटिक्स बड़ी कुत्ति चीज़ है.. कहकर विकी ने स्नेहा का फोन निकाल कर उसको दे दिया....

"ययए.. तुम्हारे पास...???" सानू चौंक गयी...

"क्या करें सानू जी.. साहब का हुक़ुम जो बजाना था.. उनको लगा होगा की कहीं तुम फोन करके उनकी प्लांनिंग ना बिगाड़ दो.. उन्होने ही बोला था.. तुमसे लेकर फैंक देने के लिए.. पर मैने चुरा लिया.. अब जो तुम्हारे पापा चाहते थे.. वो मेरे दिल को अच्च्छा नही लगा.. भला कोई कैसे अपनी बेटी को बलि की बकरी बना सकता है...!" विकी का हर पैंतरा सही बैठ रहा था..

"मैं उनको अभी मज़ा चखाती हूँ.... कहकर वो पापा का नंबर. निकालने लगी....

"नही सानू.. प्लीज़.. मैने वादा लिया था ना.. यही वो वादा है की मेरे कहे बिना वहाँ फोन नही करोगी... मेरे घर वालों की जान पर बन आएगी.. उनको यही लगना चाहिए की तुम्हे कुच्छ नही पता.... बस.. मेरे कहे बिना तुम किसी को कोई फोन नही करोगी...." विकी ने अपनी बातों के जाल में सानू को उलझा लिया...

"ठीक है.. पर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है...!"

"तुम्हारा गुस्सा जायज़ है.. सानू.. पर उनको सबक सीखना ज़रूरी है.. उनकी इश्स चाल को नाकामयाब करके तुम उन्हे रास्ते पर ला सकती हो.." विकी ने किसी दार्शनिक के अंदाज में कहा...

"सही कहते हो.. पर कैसे.. मैं कैसे नाकामयाब करूँ... आइ हेट हिम!" जाने कब की दबी कड़वाहट सानू के मुँह से निकल ही गयी...

"मेरे पास एक प्लान है.. पर उस'से पहले ये जान'ना ज़रूरी है कि वो अब करते क्या हैं..... फिर देखते हैं...."

सानू ने सहमति में अपना सिर हिलाया... उसको विस्वास हो चुका था.... हर उस बात पर जो विकी के मुँह से निकली थी.....दोस्तो इस पार्ट को यहीं ख़तम करता हूँ फिर मिलेंगे अगले पार्ट के साथ

आपका दोस्त

राज शर्मा

--

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always

`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &

(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !

`·.¸.·´ -- raj

Girls school--part --36

hello dosto main yani aapka raj sharma girls school part 36 lekar aapke liye haajir hun

ye paart aapko kaisa laga likhana mat bhulanaa

" Sneha ji.. Hamein Aagey se dusri gadi lenge!" Vicky ne sahaj bhav se kaha...

"Kyun?" Sneha ke palle baat nahi padi...

"Aapke Papa ka aadesh hai..." Vicky ne bina koyi bhav chehre par laye kaha...

"par kyun.. Why the hell we.... This Car is so comfortable u know..." Sneha ko sou sou kos tak bhi andaja nahi tha ki filhal kuchh bhi Uske papa ki marji se nahi ho

raha hai....

" ab main toh politics mein nahi hoon na.. Sneha Ji! Unki baatein.. Wahi jane.."

" tumhari kitni umar hai....?"

"27 saal!"

"main tumse 8 saal chhoti hoon.. Ye naam ke sath aap aur ji lagana band karo.. Nahi toh mein tumhe uncle ji kahna shuru kar dungi.. Samjhe!" shararati muskaan pal bhar ke liye Sneha ke kamneeya aur masoom se chehre par doud gayi..

" Okay! Toh fir kya bolun..? Tum hi bata do..." Vicky ne bhi style maarne mein der nahi lagaayi...

"Sneha! ... Chaho toh Sanu bhi bol sakte ho.. Meri friends mujhe yahi kahti hain.. Mujhe bada achchha lagta hai..." Sneha agli seat ke sath sar tika kar Vicky ko niharne lagi...

"OK.. Sanu! Bahut pyara naam hai.. Sach mein..." Vicky ne najar bhar kar Sanu ki aur dekha.. Aur turant gadi ek imaarat ke sath rok di...

"kya huaa... ?" Sneha ki aawaj mein ab kuchh jyada hi mithas aa gayi thi...

Tabhi andhere ko cheerti huyi ek lumbi si gadi wahan aakar ruki.. Kounsi thi.. Ye dikhayi nahi diya...

Sneha ke liye wo jagah bilkul anjani thi.. Aur wo chehre bhi.. Jo gadi se utare.. Ekdum kaale kalute.. Bedhange se.. Sneha unko dekhkar saham si gayi.. Wo teeno unhi ki aur badhe aa rahe thhe...

"ye koun hain.. Ye sab kya hai..?" bhay ke maare Sneha khidki se ja chipki...

Par vicky ke bolne se pahle hi sneha ko jawaab mil gaya..

unn teeno mein se ek ne vicky ki khidki kholi...," Ladki ko utaar do... Tumhara kaam khatam hua..."

Sneha ko kato toh khoon nahi.. Iski toh usne kabhi kalpana bhi nahi ki thi...

"Sanu! Tumhe ab inke sarh jana hoga... Sahab ka yahi aadesh tha...!" Vicky ne pichhe dekhte huye kaha...

"Nahi.. Main nahi jaaungi.. Mujhe nahi jana kahin... Mujhe wapas chhod aao.. Hostel mein.." Sneha ke dil mein unn chehron ko dekhkar hi itna darr sama gaya tha ki usne apne dono hath prarthna ki mudra mein jod liye...

" Thheek hai.. Main baat karke dekhta hoon.. " kahkar Vicky neeche utar gaya...

" Sneha tum logon ke sath nahi jana chahti.. Main uss gadi mein le jata hoon.. Sneha ko.. Tum log ye le jao..." Vicky ki ye baat sunkar Sneha ke dil mein hulki si thhandak pahunchi.. Par wo jyada der tak kayam na rah saki...

" Tum apni noukri karo.. Aur hamein hamara kaam karne do... Hamein ladki ko uthakar le jane ke paise mile hain.. Gadi ko le jane ke nahi.. Ab chalo futo yahan se..." teeno mein se ek ne kaha...

Sneha thar thar kaanp rahi thi... Kyon hua.. Kaise hua.. Iski usko fikar nahi thi.. Bus jaan bach jaaye; bahut tha.. Usne khidki kholi aur Vicky se jakar chipak gayi.. ," Nahi.. Pls.. Mujhe mat bhejna.. Chhodkar mat jana... Main mar jaaungi..." Sneha ne apni aankhein band kar li thi...

Aaaah... Vicky ke liye ye sab kisi haseen sapne se kum nahi tha.. Sneha ke jism ka katra katra apni mahak Vicky mein chhod raha tha.. Sab kuchh vicky ke plan ke murabik hi ho raha tha.. Par ye waqt kuchh karne ka tha..," Noukri gayi bhad mein... Agar Sanu kah rahi hai ki usko tumhare sath nahi jana.. Toh main isko nahi bhejunga.. Jakar Sahab ko bata dena.... Ki sneha ne mana kar diya... Chalo ab bhago yahan se...."

" aise kaise bhag jaayein.. Abhi toh sirf paise liye hain... Iski bhi toh leni hai abhi.. 7 raaton ki baat huyi hai hamari.. Isko kunwari thhode rahne denge.. Chode..." kahte huye jaise hi unmein se ek aadmi ne apna hath Sneha ki aur badhaya.. Vicky ne Apni dahini taraf Sanu ko apne aagosh mein sametey baayein hath ki mutthhi kasi aur jor se ek dumdar ghoonsa Uski aur lapak rahe aadmi ko jad diya...

Natak chal raha tha.. Par shayad ghunsa asli tha.. Uss aadmi ke pair ukhad gaye aur apni nani ko yaad karta hua wo shaksh peeth ke bal jameen par ja gira..," aaauuu!"

Sneha ab aur bhi darr gayi.. Kya chhati kya jaanghein.. Sab chhup jana chahte thhe.. Vicky mein sama jana chahte thhe..

Gira huaa aadmi uthh nahi paya... Dusre ne chaku nikal liya.. Lumbe fan wala... Dhardar!

"ohhh..." ye kya hua.. Rehearsal ki kami thi.. Uss aadmi ko chaku maarna tha aur vicky ko usko beech mein hi lapakna tha... Par baayein hath ki wajah se wo chook gaya aur chaku kareeb ek inch vicky ke kandhe mein ja baitha.....

"Saaley.. Teri maa ki.. Mujhe chaku maara.." dard se bilbila uthha Vicky kuchh pal ke liye natak watak sab bhool gaya.. Sneha ko jhatke ke sath apne se door kiya aur unn dono par pil pada.. Teen char minute mein hi unko itne jyada laat ghoonse jama diye ki unko laga ab bhai ke saamne thhaharna bekar hai.. Teeno ne apni langoti sambhali aur nou do gyaraha ho gaye.. gadi wadi sab wahin chhodkar.....

Ab jakar Vicky ko sneha ka khayal aaya.. Wo aankhein fade vicky ke iss preplanned kaarnamein ko dekh rahi thi... Jaise hi vicky uski aur ghooma.. Wo doud kar uss'se aa lipti.. Iss baar darr se nahi.. Khushi se..!

" Jaldi karo Sneha.. Hamein apna sara saman dusri gadi mein daalna hai...."

"par... Ye sab kya hai mohan..? Meri kuchh samajh nahi aa raha..."

" bataata hoon.. Ab toh sab kuchh batana hi padega... Tum jaldi uss gadi mein baitho...." vicky ne uski kamar sahlate huye bola...

" nahi.. Mujhe darr lag raha hai.. Tumse door nahi jaaungi... Ek pal ke liye bhi....

"OK.. Tum mere sath hi raho.." vicky ne sneha ke gaalon par hath fera aur usko bagal mein dabaye.. Gadi se saman utaarne laga...

"Chalo baith jao...!" vicky ne pichhli khidki kholte huye Sneha ko ishara kiya...

Sneha ki janghon mein cheetiyan si reng rahi thi.. Usko pata nahi tha ki kyun bus dil kar raha tha ki ek baar fir se waise hi apne 'Mohan' se chipak jaye.. Ek dum se wo uski pujarin si ban gayi thi.. Kuchh pahle tak usko apne baap ki jageer samajhne wali Sneha ab khud ko uski Jageer bana baithi thi.. Aur usko apni takdeer.. Ladkipaney ne apna rang dikhana shuru kiya..," Nahi.. Main bhi aagey hi baithhungi.. Mujhe darr lag raha hai pichhe baithte huye..." mano Vicky ka saath ab sabse surakshit tha duniya mein....

"O.K. Sanu Ma'msahab! Aa jao.." Vicky muskuraya...

Vicky ki muskurahat ka jawaab Sanu ne jeebh nikal kar diya.. Aur aagey ja baithi...

Gadi chal chuki thi.. Plan ke agle padaav ki aur..

"Batao na.. Ye sab kya tha.. Mujhe toh chakkar aa rahe hain... Sochkar hi.." Sneha seat se uchaki aur uski jaanghon ko nitambon tak anavrit karke pichhe sarak gayi apni mini skirt ko durust kiya...

Vicky sanjeeda andaaj mein iss kapol kalpit rahasya par se parda uthhane laga," Dekho Sanu.. Maine jo kuchh bhi kar diya hai.. Uss'se meri noukri hi nahi..jaan bhi khatre mein pad gayi hai... Aur ab mein jo kuchh batane ja raha hoon.. Uss'se pahle tumhe ek wada karna hoga..."

"Wada kiya!" Sanu ne Gear par rakhe vicky ke hath par apna hath rakh diya...

"pahle sun toh lo.. Kya wada karna hai..?"

"Nahi.. Maine abhi jo kuchh bhi dekha hai.. Uske baad tum par visvas na karna.. Main soch bhi nahi sakti.. Itna toh koyi kisi apne ke liye bhi nahi karta.... Maine wada kiya.. Jaisa kahoge.. Waisa karungi.. Par pls.. Mujhe chhod kar na jana.. Ab!" Snehabhawuk ho gayi...

"kabhi bhi?" Vi ky ke dil mein gudgudi si hone lagi... Usne ek pal ke liye Sneha ki aur dekha...

Sneha ki aankhein jhuk gayi.. Par jhukne se pahle bahut kuchh kah gayi thi.. Vicky ke hath par badh gayi uske hath ki kasawat aankhon ki bhasha ko samjhane ki koshish kar rahi thi....

"Sab tumhare papa ne karwaya hai....! Tumhari kidnapping ka natak..!" vicky ne ek hi saans mein Sneha ko bol diya...

Ajeeb si baat ye rahi ki sneha ko iss par utna achraj nahi hua.. Jitna hona chahiye thha," Haan.. Ek pal ko sari baatein mere jehan mein ghoom gayi thi.. Papa ne khud hi mujhe ghoom kar aane ko kaha.. Jabki unhone mujhe school ki ladkiyon ke sath bhi jane nahi diya.. 2 din pahle.. Mujhse dhang se baat tak nahi ki.. Fir papa ne gadi badalne ki baat kahi.. Fir ye log....!"

"... Par aisa kiya kyun unhone.... Kya chahte hain wo.. Aisa karke.."

"Pata nahi.. Par jahan tak mera khayal hai.. Wo aisa karke election mein logon ki sahanubhuti batorna chahte honge.. Kya pata marwa bhi dete..." vicky ne apna najariya usko bataya...

Sanu ka chehra peela pad gaya... Mutthiyan bhich gayi," Par iss'se unko milega kya..? Logon ki sahanubhuti kaise milegi...?" Wo vicky ke munh se nikli har baat ko patthar ki lakeer samajh rahi thi...

"ye raajniti cheej hi aisi hai sanu.. Jane kya kya karna padta hai...! Ho sakta hai ki virodhi party ke logon par aarop lagaayein.... Ek minute.. Aagey police ka naaka laga huaa hai shayad.. Tum kuchh bhi mat bolna.. Bus apne chehre par muskaan laye rakhna.. Dhyan rakhna.. Kuchh bhi mat bolna...."

"OK! " kahkar Sanu muskurane lagi.....

Police waley ne barrier road par aagey sarka diya. Vicky ne Gadi paas le jakar rok di... ," Kya baat hai bhai sahab?"

"Kuchh nahi...! Kahkar wo gadi ke andar torch maar kar aage pichhe dekhne laga...," ye ladki koun hai?"

"Meri biwi hai.. Kyun?" Vicky ne Sanu k aankh mari.. Sanu ko ahsaas huaa mano aaj wo sach mein hi dulhan ban'ne ja rahi ho.. Apne 'Mohan' ki....

"Sahi hai boss.. Chalo!" Police waley ne hath bahar nikal liya...

"arey batao toh sahi kya huaa...?" vicky ne apna sir bahar nikal kar poochha...

"kya hona hai yaar.. Wo sasure murari ki ladki bhag gayi hogi.. Kah rahe hain kidnaap ho gayi hai.. Hai bhala kisi ki itni himmat ki uss saaley ki loundiya ko utha le jaye.. Hamari neend haraam karni thi .. So kar rakhi hai..."

Sneha ka munh khula ka khula rah gaya.. Wo bolna chahti thi.. Par usko 'mohan' ki instructions yaad aa gayi...

Vicky ne Gadi chala di....," Sach mein.. Politics badi kutti chees hai.. Kahkar Vicky ne Sneha ka fone nikal kar usko de diya....

"yye.. Tumhare paas...???" Sanu chounk gayi...

"kya karein sanu ji.. Sahab ka huqum jo bajana tha.. Unko laga hoga ki kahin tum fone karke unki planning na bigad do.. Unhone hi bola tha.. Tumse lekar faink dene ke liye.. Par maine chura liya.. Ab jo tumhare papa chahte thhe.. Wo mere dil ko achchha nahi laga.. Bhala koyi kaise apni beti ko bali ki bakri bana sakta hai...!" Vicky ka har paintra sahi baith raha thha..

"main unko abhi maja chakhati hoon.... Kahkar wo papa ka no. Nikalne lagi....

"Nahi Sanu.. Pls.. Maine wada liya tha na.. Yahi wo wada hai ki mere kahe bina wahan fone nahi karogi... Mere ghar walon ki jaan par ban aayegi.. Unko yahi lagna chahiye ki tumhe kuchh nahi pata.... Bus.. Mere kahe bina tum kisi ko koyi fone nahi karogi...." vicky ne apni baaton ke jaal mein sanu ko uljha liya...

"Thheek hai.. Par mujhe bahut gussa aa raha hai...!"

"tumhara gussa jayaj hai.. Sanu.. Par unko sabak sikhana jaruri hai.. Unki iss chaal ko nakamyaab karke tum unhe raaste par la sakti ho.." vicky ne kisi darshnik ke andaj mein kaha...

"sahi kahte ho.. Par kaise.. Main kaise nakaamyaab karoon... I hate him!" jaane kab ki dabi kadwahat Sanu ke munh se nikal hi gayi...

"mere paas ek plan hai.. Par uss'se pahle ye jaan'na jaruri hai ki wo ab karte kya hain..... Fir dekhte hain...."

Sanu ne sahmati mein apna sir hilaya... Usko visvas ho chuka tha.... Har uss baat par jo vicky ke munh se nikli thi.....dosto is paart ko yahin khatam kar raha hun fir milenge agale part ke saath

aapka dost

raj sharma
 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --37

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा फिर हाजिर है पार्ट 37 लेकर

"पर्रर.. हमें कैसे पता लगेगा की अब पापा क्या करेंगे..?" स्नेहा ने ठीक ही पूचछा था.. वो ना भी पूछती तो विकी उसको बताने वाला था...

"सिर्फ़ एक ही तरीका है... हूमें किसी होटेल में रुकना पड़ेगा... वहाँ टी.वी. पर हम सब कुच्छ देख सकते हैं.. हरयाणा न्यूज़ पर तो ये खबर च्छाई होगी... क्यूंकी पोलीस वाले की बातों से साफ है कि तुम्हारे पापा ने नाटक शुरू कर दिया है...!" विकी ने तिर्छि नज़रों से उसके मंन के भाव पढ़ने की कोशिश की...

स्नेहा व्यथित थी.. जैसा भी था.. था तो उसका बाप ही.... क्यूँ उसने अपनी ही बेटी को घटिया राजनीति के लिए प्रयोग किया.. रही सही कसर उसने सानू को उन्न दरिंदों के हवाले करने की बात सोच कर पूरी कर दी... 7 दिन! वो 7 दिन उसकी जिंदगी के सबसे बदनसीब दिन होते.. अगर 'मोहन' उसको ना बचाता तो...

"कहा खो गयी सानू!" अब विकी को भी सानू के बदन से ज़्यादा इश्स खेल में मज़ा आने लगा था.. सच में दिल कभी दिमाग़ से नही जीत सकता.. दिल जीत कर भी हमेशा हारता ही है....

"कुच्छ नही.. पर आसपास होटेल कौनसा है..? जहाँ हम रुक सकें.....!" सानू ने रिश्तों के भंवर से निकलते हुए विकी की और देखा....

"होटेल तो बहुत हैं.. पर समस्या ये है कि इन्न कपड़ों में......" विकी ने उसकी स्कर्ट की और देखा....

और सानू शर्मा गयी.. पहली बार उसको अपने जवान होने का और अपने कपड़ों के छ्होटे होने का अहसास हुआ.. नज़रें नीची करके उसने अपनी नंगी जांघों को अपने हाथों से ढकने की कोशिश की... और साथ ही अपनी जांघें भीच ली...

आज तक स्नेहा गर्ल'स हॉस्टिल में रहकर ही पढ़ती आई थी.. और वहाँ रहकर स्वच्छन्द सी हो गयी थी... पर विकी की नज़रों ने उसको नारी होने की मर्यादाओं से अवगत करा दिया था.. और अब उसके इन्न कपड़ों के बारे में सीधे कॉमेंट ने तो उसको सोचने पर मजबूर कर ही दिया था... क्या 'मोहन' के उसकी जांघों पर हाथ रखने में अकेले 'मोहन' की ही ग़लती थी...

"अरे.. मेरे कहने का ये मतलब नही था.. मतलब हम वहाँ अपना रिश्ता क्या बताएँगे..." विकी ने उसके भावों को पढ़ते हुए अपनी बात सपस्ट की...

कुच्छ देर की चुप्पी के बाद स्नेहा बोल ही पड़ी," वही कह देना.. जो वहाँ.. पोलीस वाले को कही थी..." सानू कहते हुए लजा गयी...

"क्या?"

"अंजान मत बनो.. तुमने ही तो कही थी..." सानू सिर नीचे किए मुस्कुरा रही थी...

"कि तुम मेरी वाइफ हो.. यही?"

सानू शर्म से लाल हो गयी... बच्ची थोड़े ही थी जो 'वाइफ' होने का मतलब ना समझती हो... पर उसने 'हाँ' में सिर तो हिला ही दिया...

"वहाँ हम कार में थे.. पर होटेल में लोग किसी की वाइफ को इन्न कपड़ों में दिखने को हजम नही करेंगे.... वैसे भी तुम इन्न कपड़ों में 'वाइफ' नही.. गर्ल फ्रेंड ही लगती हो.." कहकर विकी मुस्कुरा दिया...

"मेरे बॅग में एक डिज़ाइनर सलवार कमीज़ है.... वो चलेंगे?" स्नेहा ने उत्सुकता से विकी की और देखा...

"बिल्कुल.. तुम कपड़े बदल लो.." कहकर विकी ने गाड़ी रोक दी... और स्नेहा के मासूम और कमसिन चेहरे को निहारने लगा...

"उतरोगे तभी तो बदलूँगी.. चलो बाहर निकल कर गाड़ी लॉक कर दो.. मैं बस 10 मिनिट लगाउन्गि..!" कहकर स्नेहा विकी की छाती पर हाथ लगाकर उसको बाहर की और धकेलने लगी...

एक झुरजुरी सी विकी के बदन में दौड़ गयी.. शहद जैसा मीठा हुश्न उसके सामने था.. और वह...

खैर विकी बाहर निकल गया.......

बाहर जाते ही विकी ने अपना फोन ऑन किया और माधव से बात करने लगा," हां.. क्या चल रहा है..?"

"सब ठीक है भाई.. पर उनमें से एक की हालत खराब है.. आपने उसकी जांघों में लात जमा दी.. बेचारा कराह रहा है.. अभी तक!" माधव बोला..

"अरे.. बहनचोड़ ने मुझे असली में ही चाकू बैठा दिया... पता नही कितना खून बह गया है... मैने तो देखा भी नही.. खैर रेस्पॉन्स क्या रहा...?"

"पागला गया है साला..! मुखिया पर इल्ज़ाम लगा रहा है... साला सब टीवी वालों को इंटरव्यू दे रहा है.. उसने तो ये भी कह दिया की 50 करोड़ माँगे हैं.. फिरौती

के...!"

"तू छ्चोड़.. अभी मुखिया को कुच्छ मत बताना.. और सुन.. सूर्या होटेल में फोन करवा दे.. कोई मुझे पहचाने ना.. साला जाते ही पैरों की और भागता है.."

"तू अभी तक यहीं है भाई.. बाहर निकल जा.. प्राब्लम हो सकती है.. तेरा भी नाम ले सकता है साला...!"

"तू चिंता मत कर छ्होटे.. उसकी मा बेहन एक हो जाएगी.. तू एक दो दिन बाद झटका देखना....!" विकी के जबड़े भिच गये...

"ले ली या नही.. उसकी लड़की की!" माधव ने दाँत निकाले होंगे ज़रूर.. कहकर...

"नही यार.. दिल ही नही करता.. बेचारी बहुत भोली है.. मासूम सी.. और तुझे तो पता ही है.. मैं रेप नही करता!" विकी मुस्कुराया..

"क्या हुआ.. थर्ड क्लास आइटम है क्या? आपका दिल नही करता तो मुझे ही चान्स दे दो.. यहाँ भी सूखा पड़ा है..!"

"साले की बत्तीसी निकाल दूँगा.. ज़्यादा बकवास की तो.." विकी खुद हैरान था.. वह ऐसा कह कैसे गया... जाने कितनी ही लड़कियाँ उन्होने आपस में बाँटी थी...

"सॉरी भाई.. हां एक बात और.. सलीम और इरफ़ान पर पोलीस ने 7/15 और 420 लगा दी है... अंदर गये.. उनकी भी जमानत करवानी पड़ेगी.."

"क्यूँ.. उन्होने क्या किया..?"

"वो साले आपकी गाड़ी जाने के बाद वहीं बैठकर दारू पीने लगे.. नाका लगाए हुए.. और असली पोलीस आ गयी.. उनको भी रोक लिया नशे में...."

"चल कोई बात नही.. राणा को फोन कर देना.. अपने आप जमानत करवा लेगा..."

"कर दिया है भाई.. 2 दिन लगेंगें..."

"चल रखता हूँ अब... होटेल में याद करके बोल देना.." कहकर विकी ने फोन काटा और वापस गाड़ी के पास पहुँच गया..

वापस आकर विकी ने स्नेहा को देखा तो उसका मुँह खुला का खुला रह गया," सानू! ये तुम हो?"

और स्नेहा मुस्कुरा पड़ी," क्यूँ? जाँच नही रहा क्या?"

"जाँच नही रहा..? तूने तो मेरी फाड़ ही दी.... " ये क्या बोल गया विकी.. खुद वो भी समझ नही पाया.. अब स्नेहा के कपड़े उसके व्यक्तिताव को सही परिभासित कर रहे थे.. एक दम सौम्या.. अद्भुत रूप से मासूम और एक भारतिया आदर्श लड़की की छवि में.. जिसको कोई भी अपनी जिंदगी से जुदा ना करना चाहे.. अब उसके चेहरे का भोलापन और निखरकर आ रहा था.. हालाँकि खुले कपड़ों में उसके कामुक उतार चढ़ाव और गोलाइयाँ छिप सी गयी थी...

"कैसी लगी.. बताओ ना.. मैने पहली बार ऐसे कपड़े पहने हैं.. मेरी सहेली ने गिफ्ट किए थे..."

विकी ने हाथ बढ़कर उसके गले में लटकी चुननी को सरकाकर उसके सिर पर कर दिया और फिर अंगूठे और उंगली को मिलाकर छल्ला बनाते हुए बोला," पर्फेक्ट! मैने तुम्हे पहले क्यूँ नही देखा!"

"क्या मतलब?" अपनी तारीफ़ सुनकर भावुक हो उठी स्नेहा के अधरों पर आई मुस्कान दिल को घायल करने वाली थी...

"कुच्छ नही.. चलते हैं..." विकी ने गाड़ी स्टार्ट कर दी....

"बताओ ना.. ऊई मा.. ये क्या है.." जैसे ही स्नेहा ने उसके कंधे को पकड़ कर उसको हिलाने की कोशिश की.. वो काँप उठी.... उसकी उंगली कटी शर्ट में से बाहर निकल आए माँस के लोथडे पर जा टिकी... और खून से गीली हो गयी...

"आउच.. कुच्छ नही.. हूल्का सा जखम है.. ठीक हो जाएगा.." स्नेहा की उँगली लगने से उसका दर्द जाग उठा.. पर विकी ने सहन करते हुए उसका हाथ हटा दिया...

"नही.. दिखाओ.. क्या हुआ है..? " कहते हुए स्नेहा ने कार की अंदर की लाइट ऑन कर दी.. और उसके हाथ उसके मुँह पर जा लगे..," ओ गॉड! ये कब हुआ..? तुमने बताया भी नही.. " घाव काफ़ी गहरा प्रतीत होता था.. शर्ट के उपर से ही देखने मात्रा से स्नेहा सिहर उठी...

"कुच्छ नही है.. होटेल में चलकर देखते हैं...!" विकी ने गाड़ी की रफ़्तार और तेज कर दी...

स्नेहा फटी आँखों से विकी के चेहरे और घाव को देखती रही.. विकी के चेहरे से पता ही नही चलता था की उसके शरीर का एक हिस्सा इश्स कदर घायल है.. विकी की मर्दानगी का जादू स्नेहा के सिर चढ़कर बोलने लगा... उसके प्रति स्नेहा के भाव पल पल बदलते जा रहे थे...

करीब 15 मिनिट बाद गाड़ी सूर्या होटेल पहुँच गयी... विकी ने गाड़ी पार्किंग में पार्क की और स्नेहा ने अपना बॅग संभाल लिया..," चलें!" विकी का घाव देखकर उसके चेहरे पर उभरी व्याकुलता अभी तक ज्यों की त्यों थी...

विकी की बाई बाजू खून से सनी पड़ी थी.. हालाँकि वो अब सूख चुका था.. जैसे ही मॅनेजर की नज़र विकी की इश्स हालत पर पड़ी वा दौड़कर उसके पास आने से खुद को ना रोक सका..," ययएए क्या हुआ.. भा.. मतलब... बाहर कुच्छ हुआ क्या.. सर?" वो माधव की दी हुई इन्स्ट्रक्षन को भूल ही गया था.. पर विकी ने जब उसको घूरा तो उसने भाई साहब से बदल कर बाहर कह दिया!

"कुच्छ नही.. हमें सूयीट चाहिए.. रात भर के लिए...!" विकी ने अंजान बनते हुए कहा...

"देखिए सर.. हम आपको रूम प्रवाइड नही करा सकते.. जब तक की साथ आने वाली लड़की आपके फॅमिली रीलेशन में ना पड़ती हो... सॉरी..!" कहते हुए मॅनेजर ने आँखें दूसरी और घुमा ली थी.. भाई की आँखों में आँखें डाल कर नखरे करने की उसमें हिम्मत ना थी...

"ये मेरी वाइफ है...!"

"बट.. हम कैसे माने.. ना इनके मान्थे पर सिंदूर है... ना गले में मंगल सुत्र.. और ना ही....."

"चलो.. हम कहीं और रह लेंगे..!" स्नेहा ने पकड़े जाने के डर से विकी को बोला...

"एक मिनिट.... आप मेरे साथ एक तरफ आएँगे मिस्टर. मॅनेजर...!" गुस्से को छिपाने की कोशिश में विकी एक एक शब्द को दाँत पीस पीस कर बोल रहा था...

"पर्र.....!" मॅनेजर आगे कुच्छ बोल पता.. इश्स'से पहले ही विकी ने उसकी बाँह पकड़ी और लगभग खींचते हुए उसको बाहर ले गया....," साले..!"

"पर भाई साहब.. मैने सोचा लड़की को शक नही होना चाहिए कि हम आपको जानते हैं..." कहकर मॅनेजर ने बतीसि निकाल दी... उसको उम्मीद थी की विकी उसकी पीठ थपथपाएगा..

"तेरी मा तो मैं चोदुन्गा साले.. डरा दिया ना उसको.. अब क्या तेरी मा की चूत में लेकर जाउ उसको..."

"स्स्सोररी.. भाई.. सह.. आप ले लीजिए रूम..."

"ना ना.. मत दे.. चुपचाप चल और एंट्री कर.. मोहन नाम है मेरा.. अपना दिमाग़ मत लगाना फिर से..."

"ओ.के. सिर.. !"

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"अब वह कैसे मान गया...?" लिफ्ट से उपर आते हुए स्नेहा ना विकी से पूचछा...

"कुच्छ नही.. थोड़ी टिप देनी पड़ी..!"

उपर पहुँचे तो वेटर उनकी जी हजूरी के लिए दरवाजे पर खड़ा था... जैसे ही दोनो रूम में घुसे विकी का माथा ठनका गया... अंदर बेड को किसी सुहाग की सेज़ की तरह सजाया हुआ था.. पूरा कमरा फूलों की प्राकृतिक खुश्बू से महक रहा था.. टेबल पर जोह्नी वॉकर की बोटेल, दो गिलास और आइस क्यूब्स रखे थे.. स्नेहा सजावट को देखकर खिल सी गयी थी...

"एक मिनिट.. तुम फ्रेश हो लो.. मैं अभी आया..." कहकर गुस्से से भनभनाया हुआ विकी नीचे चला गया...

"साले.. कुत्ते की पूच्छ.. तुझमें दिमाग़ है या नही.. मेरा बॅंड बजा दिया तूने.." विकी ने 2 झापड़ मॅनेजर को मारे और सोफे पर बैठकर अपना सिर पकड़ लिया....

"पर हुआ क्या भाई साहब.. क्या कमी रह गयी..? मैने तो अपनी तरफ से जी जान लगाई है..."

"यार तू अपन तरफ से जी जान क्यूँ लगाता है.. जितना बोला गया उतना क्यूँ नही करता... तू आदमी है या घंचक्कर... साला.."

"ववो.. माधव भाई ने बोला था की आपको पहचान'ना नही है.. और कोई लड़की साथ आएगी.. तो मैने सोचा खास ही होगी..."

"तू अब दिमाग़ मत खा.. मेरे साथ चल और सॉरी बोल की रूम ग़लती से दे दिया.. और 2 मिनिट में दूसरी अड्जस्टमेंट कर..."

"ठीक है.. भाई साहब.. मैं अभी चलता हूँ..!" मॅनेजर के चेहरे पर 12 बजे लग रहे थे....

"सॉरी.. मेडम.. वो ग़लती से आपको ग़लत नंबर. दे दिया.. आक्च्युयली ये किसी वेड्डिंग कपल के लिए है.. आइए.. आपका सामान शिफ्ट करा देता हूँ..." विकी मॅनेजर के साथ नही आया था.... जानबूझकर!

"वो कहाँ हैं..?" स्नेहा सुनकर मायूस सी हो गयी...

"वो कौन..?" मॅनेजर का दिमाग़ भनना रहा था...

"वो.. मेरे पति! और कौन?" कहते हुए स्नेहा का दिल धड़क रहा था.. कितना प्यारा अहसास था स्नेहा के लिए.. विकी जैसा पति!

"ववो.. आते ही होंगे.... लीजिए आ गये...!"

"क्या बात है..?" विकी ने अंजान बनते हुए कहा...

"आक्च्युयली सर....." और मॅनेजर को स्नेहा ने बीच में ही टोक दिया...," देखिए ना मोहन! ये हमारा रूम नही है.. मुझे भी बिल्कुल ऐसा ही चाहिए.... कह रहे हैं.. ये तो किसी वेड्डिंग कपल के लिए है.. जैसे हम बूढ़े हो गये हों.. जैसे हमारी शादी ही ना हुई हो... मुझे नही पता.. मुझे यही रूम चाहिए..."

विकी को उसकी बातों पर यकीन ही नही हुआ.. वो तो ऐसे बोल रही थी जैसे सचमुच की पत्नी हो.. बिल्कुल वाइफ वाले नखरे दिखा रही थी..

"तुम्हारी प्राब्लम क्या है मॅनेजर.. हमें यही कमरा चाहिए.. समझ गये.." विकी ने तुरंत पाला बदल लिया....

"जी सर.. समझ गया.. सॉरी!" कह कर मॅनेजर स्नेहा की और अदब से झुका और बाहर निकलगया.. जैसे मंदिर से निकला हो!"

"ये हुई ना बात.. हमें निकाल रहा था.. कितना प्यारा रूम है... जैसे...." आगे स्नेहा शर्मा गयी...

"तुम्हे सच में यहाँ कुच्छ ग़लत नही लगा..?" विकी का ध्यान रह रह कर टेबल पर साज़ी बॉटले और गिलासों पर जा रहा था....

"यहाँ क्या ग़लत है..?" स्नेहा ने एक बार और जन्नत की तरह सजे कमरे में नज़रें दौड़ाई....

"ये शराब...?????" विकी ने ललचाई आँखों से बोतल की और देखा.. बहुत दिल कर रहा था....

"नही तो.. आदमी तो पीते ही हैं..." स्नेहा किंचित भी विचलित ना हुई.....

"अच्च्छा.. तुमने किसको देखा है..?"

"पापा को.. वो तो हमेशा ही पिए रहते हैं..... अरे हां.. टी.वी. ऑन करो.. देखें पापा क्या नाटक कर रहे हैं...." स्नेहा एक बार फिर मुरझा गयी....

"तुम तब तक टी.वी. देखो.. मैं इसका कुच्छ करके आता हूँ.." विकी स्विच ऑन करने के लिए टी.वी. की और बढ़ा...

"ओह माइ गॉड! मैं तो भूल ही गयी थी.. सॉरी.. पर इश्स वक़्त डॉक्टर कहाँ

मिलेगा...?" स्नेहा ने सूख चुके खून से सनी शर्ट की और देखते हुए कहा...

"अरे डॉक्टर की क्या ज़रूरत है... नीचे फर्स्ट एड पड़ी होगी.. सफाई करके पट्टी बँधवा लेता हूँ... मैं अभी आया 5-7 मिनिट में..."

"वो तो मैं कर दूँगी.. तुम फर्स्ट एड बॉक्स मंगवा लो.. यहीं पर... तुम्हारे बिना मेरा दिल नही लगेगा... डर सा भी लगता है..." स्नेहा ने प्यार भरी निगाहों से विकी की और देखा...

विकी जाकर बेड पर स्नेहा के पास बैठ गया..," इसमें डरने की क्या बात है..? तुम क्यूँ परेशान होती हो... ज़्यादा टाइम नही लगाउन्गा.. ठीक है..?" विकी को माधव के पास फोन करना था..

स्नेहा ने घुटनो के बाल बैठते हुए विकी की बाँह पकड़ ली..," अच्च्छा.. मैं परेशान हो जाउन्गि.. तुमने जो मेरे लिए इतना किया है.. वो? नही तुम कहीं मत जाओ.. मत जाओ ना प्लीज़.. मुझे ये सब करना आता है.."

इश्स हसीन खावहिश पर कौन ना मार मिटे... विकी ने रूम सर्विस का नो. डाइयल

करके फर्स्ट एड बॉक्स के लिए बोल दिया.. स्नेहा की और वो अजीब सी नज़रों से देख रहा था.. नज़रों में ना तो पूरी वासना झलक रही थी.. और ना ही पूरा प्यार ही..

"मैं तब तक कपड़े चेंज कर लेती हूँ.. कहकर स्नेहा ने बॅग से कुच्छ कपड़े निकाल कर बेड पर फैला दिए..," कौनसा पहनु?"

विकी असमन्झस से स्नेहा को घूर्ने लगा.. जैसे कह रहा हो..' मुझे क्या पता...'

"बताओ ना प्लीज़.. नही तो बाद में कहोगे.. 'ये ऐसे हैं.. ये वैसे..' "

"नही कहूँगा.. पहन लो.. कोई भी.." विकी स्नेहा को देखकर मुस्कुराया और बेड पर रखे एक पिंक कलर के सिंगल पीस स्कर्ट टॉप पर नज़रें जमा ली.. यूँ ही.

"ये पहनु? .. पर ये तो पूरा घुटनो तक भी नही आता.. बाद में बोलना मत..." स्नेहा ने विकी की द्रिस्ति को ताड़ लिया.... कहते हुए लज्जा का महीन आवरण उसके चहरे पर झिलमिला रहा था...

"मुझे नही पता यार.. कुच्छ भी पहन लो..." हालाँकि विकी ये सोच रहा था कि उस ड्रेस में वो कितनी सेक्सी लगेगी...

"ठीक है.. मैं यही डाल लेती हूँ..." स्नेहा ने बोला ही था कि वेटर ने बेल बजाई...

"लगता है.. फर्स्ट एड आ गयी.. ले लो.. मैं बाद मैं चेंज करूँगी.. पहले तुम्हारी पट्टी कर देती हूँ..."

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"शर्ट तो निकाल दो... पहले.." स्नेहा ने बॉक्स खोलते हुए विकी से कहा...

विकी का दिमाग़ भनना रहा था.. आज तक वो लड़कियों को निर्वस्त्रा करता आया था.. पर आज उसकी जिंदगी की सबसे हसीन लड़की उसको खुद शर्ट निकालने को बोल रही है.. क्या वो झिझक रहा था? हां.. उसके चेहरे के भाव यही बता रहे थे...

"तुम तो ऐसे शर्मा रहे हो.. जैसे तुम कोई लड़की हो.. और मैं लड़का..!" कहकर स्नेहा खिलखिला उठी.. अपने चेहरे की शर्म को छिपाने के लिए उसने हाथों से अपना चेहरा ढक लिया.. हंसते हुए.. हमेशा वो ऐसा ही करती थी..

विकी की नज़र उसके हिलने की वजह से फड़फदा रहे कबूतरों पर पड़ी.. बिना सोचे हाथों में पकड़ कर मसल देने लायक थे.. फिर जाने वो क्या सोच रहा था.. और क्यूँ सोच रहा था...

"निकालो!" स्नेहा के बोल में अधिकार भारी मिठास थी.. और कुच्छ नही...

"निकलता हूँ ना...!" कहते हुए विकी ने एक एक करके अपनी शर्ट के सारे बटन खोल दिए.. जैसे ही वो बाई बाजू से शर्ट निकालने की कोशिश करने लगा.. दर्द से बिलबिला उठा..," अयाया...!"

"रूको.. मैं निकलती हूँ.. आराम से..!" कहकर एक बार फिर स्नेहा उसके सामने आ गयी... घुटनो के बल होकर.. बड़ी नाज़ूक्ता से एक हाथ विकी के दूसरे कंधे पर रखा और दूसरे हाथ से धीरे धीरे शर्ट को निकालने लगी," दर्द हो रहा है?"

दर्द तो हो रहा था.. पर उतना नही.. जितना मज़ा आ रहा था.. विकी आँखें बंद किए अपनी जिंदगी के सर्वाधिक कामुक क्षनो को अपनी साँसों में उतारता रहा.. सच इतना मज़ा कभी उसको सेक्स में भी नही आया था.. स्नेहा के कमसिन अंगों की महक निराली थी.. जिसे वो गुलबों की तेज खुश्बू के बीच भी महसूस कर रहा था.. उसकी 'मर्दानगी' अकड़ने लगी... दिल और दिमाग़ में अजेब सा युद्ध छिड़ा हुआ था..

इश्स बार भी दिमाग़ ही जीत गया.. विकी ने अपने तमाम आवेगो को काबू में रखा.. हालाँकि 'काबू' में रखने की इश्स कोशिश में उसके माथे पर पसीना छलक आया.. ए.सी. के बावजूद...

"उफफफफफ्फ़.. घाव तो बहुत गहरा है... मुझसे देखा नही जा रहा.." स्नेहा ने शर्ट निकालते हुए घाव को देखते ही आह भरी...

"लो निकल गयी... ! चलो बाथरूम में.. इसको धो देती हूँ..." स्नेहा का दूसरा हाथ अब भी उसके कंधे पर ही था.. और वो यूँही विकी के चेहरे को एकटक देख रही थी.. प्यार से...

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पट्टी करने के पूरे प्रकरण के दौरान जहाँ भी स्नेहा ने उसको स्पर्श किया.. मानो वही अंग खिल उठा.. आज तक कभी भी विकी को इश्स तरह की अनुभूति नही हुई थी.. वो तो बस आनंद के सागर में गहरी डुबकी लगाकर अपने हिस्से के मोती खोजता रहा....

प्यार और वासना में सदियों से मुकाबला होता आया है.. कुच्छ लोग 'प्यार' होने को सिर्फ़ 'आकर्षण' और 'वासना' मानते हैं.. पर सच तो ये है की वासना प्यार के अनुपम अहसास के आसपास भी कभी फटक नही सकती.. वासना आपको 'खाली' करती है.. वहीं प्यार आपको तृप्त... जहाँ लगातार 'सेक्स' भी हरबार आपको एक सूनेपन और बेचैनी से भर देता है, वहीं आपके यार का प्यार भरा एक हूल्का सा स्पर्श आपको उमर भर के लिए ऐसी मीठी यादें दे जाता है.. जिसके सहारे आप जिंदगी गुज़ार सकते हैं.. यार के इंतज़ार में..

विकी शायद आज पहली बार 'प्यार' के स्पर्श को महसूस कर रहा था.. हॅव यू एवर?

ओके दोस्तो इस पार्ट को यहीं बंद करता हूँ फिर मिलेंगे नेक्स्ट पार्ट के साथ तब तक के लिए विदा

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always

`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &

(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !

`·.¸.·´ -- raj

hello dosto main yaani aapka dost raj sharma fir haajir hai paart 37 lekar

"Parrr.. Hamein kaise pata lagega ki ab papa kya karenge..?" Sneha ne thheek hi poochha tha.. Wo na bhi poochhti toh Vicky usko batane wala tha...

"Sirf ek hi tareeka hai... Humein kisi hotel mein rukna padega... Wahan T.V. par hum sab kuchh dekh sakte hain.. Haryana News par toh ye khabar chhayi hogi... Kyunki police wale ki baaton se saaf hai ki tumhare papa ne natak shuru kar diya hai...!" Vicky ne tirchhi najron se uske mann ke bhav padhne ki koshish ki...

Sneha vyathit thi.. Jaisa bhi tha.. Tha toh uska baap hi.... Kyun usne apni hi beti ko ghatiya rajniti ke liye prayog kiya.. Rahi sahi kasar usne sanu ko unn darindon ke hawale karne ki baat soch kar poori kar di... 7 din! Wo 7 din uski jindagi ke sabse badnaseeb din hote.. Agar 'Mohan' usko na bachata toh...

"kaha kho gayi sanu!" Ab vicky ko bhi Sanu ke badan se jyada iss khel mein maja aane laga tha.. Sach mein Dil kabhi Dimag se nahi jeet sakta.. Dil jeet kar bhi hamesha haarta hi hai....

"Kuchh nahi.. Par Aaspaas hotel kounsa hai..? Jahan hum ruk sakein.....!" Sanu ne rishton ke bhanwar se nikalte huye Vicky ki aur dekha....

"Hotel toh bahut hain.. Par samasya ye hai ki inn kapdon mein......" Vicky ne uski skirt ki aur dekha....

Aur Sanu sharma gayi.. Pahli baar usko apne jawaan hone ka aur apne kapdon ke chhote hone ka ahsaas huaa.. Najrein neechee karke usne apni nangi janghon ko apne hathon se dhakne ki koshish ki... Aur sath hi apni jaanghein bheech li...

Aaj tak Sneha Girl's hostel mein rahkar hi padhti aayi thi.. Aur wahan rahkar swachhand si ho gayi thi... Par Vicky ki najron ne usko nari hone ki maryadon se awagat kara diya tha.. Aur ab uske inn kapdon ke baare mein seedhe comment ne toh usko sochne par majboor kar hi diya tha... Kya 'Mohan' ke uski jaanghon par hath rakhne mein akele 'Mohan' ki hi galati thi...

"Arey.. Mere kahne ka ye matlab nahi tha.. Matlab hum wahan apna rishta kya batayenge..." Vicky ne uske bhavon ko padhte huye apni baat sapast ki...

Kuchh der ki chuppi ke baad sneha bol hi padi," Wahi kah dena.. Jo wahan.. Police wale ko kahi thi..." Sanu kahte huye laja gayi...

"kya?"

"anjaan mat bano.. Tumne hi toh kahi thi..." Sanu sir neeche kiye muskura rahi thi...

"Ki tum meri wife ho.. Yahi?"

Sanu sharm se laal ho gayi... Bachchi thhode hi thi jo 'wife' hone ka matlab na samajhti ho... Par usne 'haan' mein sir toh hila hi diya...

"wahan hum car mein thhe.. Par hotel mein log kisi ki wife ko inn kapdon mein dikhne ko hajam nahi karenge.... Waise bhi tum inn kapdon mein 'wife' nahi.. Girl Friend hi lagti ho.." kahkar vicky muskura diya...

"mere Bag mein ek designer salwar kameej hai.... Wo chalenge?" Sneha ne utsukta se vicky ki aur dekha...

"bilkul.. Tum kapde badal lo.." kahkar vicky ne gadi rok di... aur Sneha ke masoom aur kamsin chehre ko niharne laga...

"utaroge tabhi toh badloongi.. Chalo bahar nikal kar gadi lock kar do.. Main bus 10 minute lagaaungi..!" kahkar Sneha vicky ki chhati par hath lagakar usko bahar ki aur dhakelne lagi...

Ek jhurjhuri si vicky ke badan mein doud gayi.. Shahad jaisa meethha hushn uske saamne thha.. Aur wah...

Khair vicky bahar nikal gaya.......

Bahar jaate hi Vicky ne apna fone on kiya aur madhav se baat karne laga," Haan.. Kya chal raha hai..?"

"sab thheek hai bhai.. Par unmein se ek ki halat kharab hai.. Aapne uski jaanghon mein laat jama di.. Bechara karah raha hai.. Abhi tak!" Madhav bola..

"arey.. Behanchod ne mujhe asli mein hi chaku baitha diya... Pata nahi kitna khon bah gaya hai... Maine toh dekha bhi nahi.. Khair response kya raha...?"

"pagla gaya hai sala..! Mukhiya par iljaam laga raha hai... Sala sab tv walon ko interview de raha hai.. Usne toh ye bhi kah diya ki 50 karod maange hain.. Firouti

Ke...!"

"tu chhod.. Abhi mukhiya ko kuchh mat batana.. Aur sun.. Surya hotel mein fone karwa de.. Koyi mujhe pahcuane na.. Saala jaate hi pairon ki aur bhaagta hai.."

"tu abhi tak yahin hai bhai.. Bahar nikal ja.. Problem ho sakti hai.. Tera bhi naam le sakta hai sala...!"

"tu chinta mat kar chhote.. Uski maa behan ek ho jayegi.. Tu ek do din baad jhatka dekhna....!" vicky ke jabde bhich gaye...

"le li ya nahi.. Uski ladki ki!" Madhav ne daant nikaale honge jaroor.. Kahkar...

"nahi yaar.. Dil hi nahi karta.. Bechari bahut bholi hai.. Masoom si.. Aur tujhe toh pata hi hai.. Main rape nahi karta!" Vicky muskuraya..

"kya huaa.. Third class item hai kya? Aapka dil nahi karta toh mujhe hi chance de do.. Yahan bhi sookha pada hai..!"

"saale ki batteesi nikal dunga.. Jyada bakwas ki toh.." vicky khud hairan tha.. Wah aisa kah kaise gaya... Jaane kitni hi ladkiyan unhone aapas mein share ki thi...

"Sorry bhai.. Haan ek baat aur.. Saleem aur irfaan par police ne 7/15 aur 420 laga di hai... Andar gaye.. Unki bhi jamanat karwani padegi.."

"kyun.. Unhone kya kiya..?"

"Wo saley aapki gadi jaane ke baad wahin baithkar daru peene lage.. Naaka lagaaye huye.. Aur asli police aa gayi.. Unko bhi rok liya nashe mein...."

"chal koyi baat nahi.. Rana ko fone kar dena.. Apne aap jamanat karwa lega..."

"kar diya hai bhai.. 2 din lagengein..."

"chal rakhta hoon ab... Hotel mein yaad karke bol dena.." kahkar vicky ne fone kata aur wapas gadi ke paas pahunch gaya..

Wapas aakar Vicky ne Sneha ko dekha toh uska munh khula ka khula rah gaya," Sanu! Ye tum ho?"

Aur sneha muskura padi," Kyun? Janch nahi raha kya?"

"Janch nahi raha..? Tune toh meri faad hi di.... " ye kya bol gaya vicky.. Khud wo bhi samajh nahi paya.. Ab Sneha ke kapde uske vyaktitav ko sahi paribhasit kar rahe thhe.. Ek dum soumya.. Adbhut roop se masoom aur ek bhartiya aadarsh ladki ki chhavi mein.. Jisko koyi bhi apni jindagi se juda na karna chahe.. Ab uske chehre ka bholapan aur nikharkar aa raha tha.. Halanki khule kapdon mein uske kamuk utaar chadhav aur golaayiyan chhip si gayi thi...

"kaisi lagi.. Batao na.. Maine pahli baar aise kapde pahne hain.. Meri saheli ne gift kiye thhe..."

Vicky ne hath badhakar uske gale mein latki chunni ko sarkakar uske sir par kar diya aur fir angoothhey aur ungali ko milakar chhalla banate huye bola," Perfect! Maine tumhe pahle kyun nahi dekha!"

"kya matlab?" apni taareef sunkar bhawuk ho uthhi sneha ke adhron par aayi muskaan dil ko ghayal karne wali thi...

"kuchh nahi.. Chalte hain..." vicky ne gadi start kar di....

"batao na.. Ooyiii maa.. Ye kya hai.." jaise hi sneha ne uske kandhe ko pakad kar usko hilane ki koshish ki.. Wo kaanp uthhi.... Uski ungali kati shirt mein se bahar nikal aaye maans ke lothhde par ja tiki... aur khoon se geeli ho gayi...

"ouchh.. Kuchh nahi.. Hulka sa jakham hai.. Thheek ho jayega.." Sneha ki ungLi lagne se uska dard jaag uthha.. Par Vicky ne sahan karte huye uska haath hata diya...

"nahi.. Dikhao.. Kya huaa hai..? " kahte huye Sneha ne car ki andar ki light on kar di.. Aur uske haath uske munh par ja lage..," O God! Ye kab hua..? Tumne bataya bhi nahi.. " Ghav kafi gahra prateet hota tha.. Shirt ke upar se hi dekhne matra se Sneha sihar uthhi...

"kuchh nahi hai.. Hotel mein chalkar dekhte hain...!" Vicky ne gadi ki raftaar aur tej kar di...

Sneha fati aankhon se Vicky ke chehre aur ghav ko dekhti rahi.. Vicky ke chehre se pata hi nahi chalta tha ki uske shareer ka ek hissa iss kadar ghayal hai.. Vicky ki mardaangi ka jadu Sneha ke sir chadhkar bolne laga... Uske prati sneha ke bhav pal pal badalte ja rahe thhe...

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Kareeb 15 minute baad gadi Surya hotel pahunch gayi... Vicky ne Gadi parking mein park ki aur sneha ne apna Bag sambhal liya..," Chalein!" vicky ka ghav dekhkar uske chehre par ubhari vyakulta abhi tak jyon ki tyon thi...

Vicky ki bayi baju khoon se sani padi thi.. Halanki wo ab sookh chuka tha.. Jaise hi manager ki najar vicky ki iss halat par padi wah doudkar uske paas aane se khud ko na rok saka..," Yyye kya huaa.. Bha.. Matlab... Bahar kuchh hua kya.. Sir?" wo madhav ki di huyi instruction ko bhool hi gaya tha.. Par vicky ne jab usko ghoora to usne bhai sahab se badal kar bahar kah diya!

"kuchh nahi.. Hamein suite chahiye.. Raat bhar ke liye...!" vicky ne anjaan bante huye kaha...

"Dekhiye sir.. Hum aapko room provide nahi kara sakte.. Jab tak ki sath aane wali ladki aapke family relation mein na padti ho... Sorry..!" kahte huye manager ne aankhein dusri aur ghuma li thi.. Bhai ki aankhon mein aankhein daal kar nakhre karne ki usmein himmat na thi...

"Ye meri wife hai...!"

"but.. Hum kaise maane.. Na inke mathhe par sindoor hai... Na galey mein mangal sutra.. Aur na hi....."

"chalo.. Hum kahin aur rah lenge..!" Sneha ne pakde jane ke dar se vicky ko bola...

"ek minute.... Aap mere sath ek taraf aayenge Mr. Manager...!" gusse ko chhipane ki koshish mein Vicky ek ek shabd ko daant pees pees kar bol raha tha...

"parr.....!" Manager aagey kuchh bol pata.. Iss'se pahle hi vicky ne uski baanh pakdi aur lagbhag kheenchte huye usko bahar le gaya....," Saaley..!"

"par Bhai sahab.. Maine socha ladki ko shak nahi hona chahiye ki hum aapko jaante hain..." kahkar manager ne bateesi nikal di... Usko ummeed thi ki Vicky uski peethh thhapthapayega..

"teri maa toh main chodunga saaley.. Dara diya na usko.. Ab kya teri maa ki choot mein lekar jaau usko..."

"sssorry.. Bhai.. Sah.. Aap le lijiye room..."

"na na.. Mat de.. Chupchap chal aur entry kar.. Mohan naam hai mera.. Apna dimag mat lagana fir se..."

"O.K. Sir.. !"

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"Ab wah kaise maan gaya...?" lift se upar aate huye Sneha na vicky se poochha...

"kuchh nahi.. Thhodi tip deni padi..!"

Upar pahunche toh waiter unki ji hajoori ke liye darwaje par khada tha... Jaise hi dono room mein ghuse vicky ka matha thhanak gaya... andar bed ko kisi suhag ki sez ki tarah sajaya huaa tha.. Poora kamra foolon ki prakritik khushboo se mahak raha tha.. Table par johny walker ki botel, do gilas aur ice cubes rakhe thhe.. Sneha sajawat ko dekhkar khil si gayi thi...

"ek minute.. Tum fresh ho lo.. Main abhi aaya..." kahkar gusse se bhanbhanaya huaa vicky neeche chala gaya...

"Saaley.. Kutte ki poochh.. Tujhmein dimag hai ya nahi.. Mera band baja diya tune.." vicky ne 2 jhapad manager ko maarey aur sofe par baithkar apna sir pakad liya....

"par huaa kya bhai sahab.. Kya kami rah gayi..? Maine toh apni taraf se ji jaan lagayi hai..."

"yaar tu apn taraf se ji jaan kyun lagata hai.. Jitna bola gaya utna kyun nahi karta... Tu aadmi hai ya ghamchakkar... Saala.."

"wwo.. Madhav bhai ne bola tha ki aapko pahchan'na nahi hai.. Aur koyi ladki sath aayegi.. Toh maine socha khas hi hogi..."

"tu ab dimag mat kha.. Mere sath chal aur sorry bol ki room galati se de diya.. Aur 2 minute mein dusri adjustment kar..."

"thheek hai.. Bhai sahab.. Main abhi chalta hoon..!" Manager ke chehre par 12 baje lag rahe thhe....

"Sorry.. Madam.. Wo galati se aapko galat no. de diya.. Actually ye kisi wedding couple ke liye hai.. Aayiye.. Aapka saaman shift kara deta hoon..." vicky manager ke sath nahi aaya tha.... Jaanboojhkar!

"wo kahan hain..?" Sneha sunkar maayus si ho gayi...

"wo koun..?" Manager ka dimag bhanna raha tha...

"wo.. Mere pati! aur koun?" Kahte huye Sneha ka dil dhadak raha tha.. Kitna pyara ahsaas tha sneha ke liye.. Vicky jaisa pati!

"wwo.. Aate hi honge.... Lijiye aa gaye...!"

"kya baat hai..?" vicky ne anjaan bante huye kaha...

"actually sir....." aur manager ko sneha ne beech mein hi tok diya...," Dekhiye na Mohan! Ye hamara room nahi hai.. Mujhe bhi bilkul aisa hi chahiye.... Kah rahe hain.. Ye toh kisi wedding couple ke liye hai.. Jaise hum boodhhe ho gaye hon.. Jaise hamar shadi hi na huyi ho... Mujhe nahi pata.. Mujhe yahi room chahiye..."

Vicky ko uski baaton par yakeen hi nahi huaa.. Wo toh aise bol rahi thi jaise sachmuch ki patni ho.. Bilkul wife wale nakhre dikha rahi thi..

"Tumhari problem kya hai Manager.. Hamein yahi kamra chahiye.. Samajh gaye.." Vicky ne turant pala badal liya....

"ji sir.. Samajh gaya.. Sorry!" kah kar manager Sneha ki aur adab se jhuka aur bahar nikalgaya.. Jaise mandir se nikla ho!"

"ye huyi na baat.. Hamein nikal raha tha.. Kitna pyara room hai... Jaise...." aagey Sneha sharma gayi...

"tumhe sach mein yahan kuchh galat nahi laga..?" Vicky ka dhyan rah rah kar table par sazi botle aur gilason par ja raha thha....

"yahan kya galat hai..?" Sneha ne ek baar aur jannat ki tarah saje kamre mein najrein doudayi....

"ye sharaab...?????" Vicky ne lalchayi aankhon se botal ki aur dekha.. Bahut dil kar raha thha....

"nahi toh.. Aadmi toh peete hi hain..." Sneha kinchit bhi vichlit na huyi.....

"achchha.. Tumne kisko dekha hai..?"

"papa ko.. Wo toh hamesha hi piye rahte hain..... arey haan.. T.V. on karo.. Dekhein papa kya natak kar rahe hain...." Sneha ek baar fir murjha gayi....

"Tum tab tak T.V. dekho.. Main iska kuchh karake aata hoon.." Vicky switch on karne ke liye T.V. Ki aur badha...

"Oh my God! main toh bhool hi gayi thi.. Sorry.. par iss waqt doctor kahan

milega...?" Sneha ne sookh chuke khoon se sani shirt ki aur dekhte huye kaha...

"arey doctor ki kya jarurat hai... Neeche first aid padi hogi.. Safayi karke patti bandhwa leta hoon... Main abhi aaya 5-7 minute mein..."

"wo toh main kar dungi.. Tum first aid box mangwa lo.. Yahin par... Tumhare bina mera dil nahi lagega... Darr sa bhi lagta hai..." Sneha ne pyar bhari nigahon se Vicky ki aur dekha...

Vicky jakar bed par Sneha ke paas baith gaya..," Ismein darne ki kya baat hai..? Tum kyun pareshan hoti ho... Jyada time nahi lagaaunga.. Thheek hai..?" vicky ko Madhav ke paas fone karna tha..

Sneha ne ghutno ke bal baithte huye Vicky ki baanh pakad li..," Achchha.. Main pareshan ho jaaungi.. Tumne jo mere liye itna kiya hai.. Wo? nahi tum kahin mat jao.. Mat jao na pls.. Mujhe ye sab karna aata hai.."

iss haseen khawahish par koun na mar mitey... Vicky ne room service ka no. dial

karke first aid box ke liye bol diya.. Sneha ki aur wo ajeeb si najron se dekh raha tha.. Najron mein na toh poori wasna jhalak rahi thi.. Aur na hi poora pyar hi..

"main tab tak kapde change kar leti hoon.. Kahkar Sneha ne bag se kuchh kapde nikal kar bed par faila diye..," Kounsa pahnu?"

Vicky asamanjhas se sneha ko ghoorne laga.. Jaise kah raha ho..' mujhe kya pata...'

"Batao na pls.. Nahi toh baad mein kahogey.. 'ye aise hain.. Ye waise..' "

"nahi kahunga.. Pahan lo.. Koyi bhi.." Vicky Sneha ko dekhkar muskuraya aur bed par rakhe ek pink colour ke single piece skirt top par najrein jama li.. Yun hi.

"ye pahnu? .. Par ye toh poora ghutno tak bhi nahi aata.. Baad mein bolna mat..." Sneha ne vicky ki dristi ko taad liya.... Kahte huye lajja ka maheen aawran uske chahre par jhilmila raha tha...

"mujhe nahi pata yaar.. Kuchh bhi pahan lo..." Halanki vicky ye soch raha tha ki uss dress mein wo kitni sexy lagegi...

"Thheek hai.. Main yahi daal leti hoon..." sneha ne bola hi tha ki waiter ne bell bajayi...

"lagta hai.. First aid aa gayi.. Le lo.. Main baad main change karoongi.. Pahle tumhari patti kar deti hoon..."

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"shirt toh nikal do... Pahle.." Sneha ne box kholte huye Vicky se kaha...

Vicky ka dimag bhanna raha tha.. Aaj tak wo ladkiyon ko nirvastra karta aaya tha.. Par aaj uski jindagi ki sabse haseen ladki usko khud shirt nikalne ko bol rahi hai.. Kya wo jhijhak raha tha? Haan.. Uske chehre ke bhav yahi bata rahe thhe...

"tum toh aise sharma rahe ho.. Jaise tum koyi ladki ho.. Aur main ladka..!" kahkar Sneha khilkhila uthhi.. Apne chehre ki sharm ko chhipane ke liye usne hathhon se apna chehra dhak liya.. Hanste huye.. Hamesha wo aisa hi karti thi..

Vicky ki najar uske hilne ki wajah se fadfada rahe kabutaron par padi.. Bina soche hathon mein pakad kar masal dene layak thhe.. Fir jane wo kya soch raha tha.. Aur kyun soch raha thha...

"nikalo!" Sneha ke bol mein adhikar bhari mithhas thi.. Aur kuchh nahi...

"nikalt hoon na...!" kahte huye vicky ne ek ek karke apni shirt ke sare button khol diye.. Jaise hi wo bayi baju se shirt nikalne ki koshish karne laga.. Dard se bilbila uthha..," Aaaah...!"

"ruko.. Main nikalti hoon.. Aaram se..!" kahkar ek baar fir Sneha uske saamne aa gayi... Ghutno ke bal hokar.. Badi najukta se ek hath vicky ke dusre kandhe par rakha aur dusre hath se dheere dheere shirt ko nikalne lagi," Dard ho raha hai?"

Dard toh ho raha tha.. Par utna nahi.. Jitna maja aa raha tha.. Vicky aankhein band kiye apni jindagi ke sarwadhik kamuk kshano ko apni saanson mein utaarta raha.. Sach itna maja kabhi usko sex mein bhi nahi aaya tha.. Sneha ke kamsin angon ki mahak nirali thi.. Jise wo gulabon ki tej khushboo ke beech bhi mahsoos kar raha tha.. Uski 'mardaangi' akadne lagi... Dil aur Dimag mein ajeb sa yuddh chhida hua thha..

Iss baar bhi dimag hi jeet gaya.. Vicky ne apne tamaam aawegon ko kaabu mein rakha.. Halanki 'kabu' mein rakhne ki iss koshish mein uske maathhe par pasina chhalak aaya.. A.C. ke bawjood...

"uffffff.. Ghav toh bahut gahra hai... Mujhse dekha nahi ja raha.." Sneha ne shirt nikalte huye ghaav ko dekhte hi aah bhari...

"lo nikal gayi... ! Chalo bathroom mein.. Isko dho deti hoon..." Sneha ka dusra hath ab bhi uske kandhe par hi tha.. Aur wo yunhi vicky ke chehre ko ektak dekh rahi thi.. Pyar se...

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Patti karne ke pure prakaran ke douran jahan bhi Sneha ne usko sparsh kiya.. Mano wahi ang khil uthha.. Aaj tak kabhi bhi vicky ko iss tarah ki anubhuti nahi huyi thi.. Wo toh bus aanand ke sagar mein gahri dubaki lagakar apne hisse ke moti khojta raha....

Pyar aur wasna mein sadiyon se mukabla hota aaya hai.. Kuchh log 'pyar' hone ko sirf 'aakarshan' aur 'wasna' maante hain.. Par sach toh ye hai ki wasna pyar ke anupam ahasaas ke aaspaas bhi kabhi fatak nahi sakti.. Wasna aapko 'khali' karti hai.. Wahin pyar aapko tript... Jahan lagataar 'sex' bhi harbaar aapko ek soonepan aur bechaini se bhar deta hai, wahin aapke yaar ka pyar bhara ek hulka sa sparsh aapko umar bhar ke liye aisi meethi yaadein de jata hai.. Jiske sahare aap jindagi gujar sakte hain.. Yaar ke intzaar mein..

Vicky shayad aaj pahli baar 'pyar' ke sparsh ko mahsoos kar raha tha.. Have u ever?

 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --38

दोस्तो आपका दोस्त राज शर्मा पार्ट 38 लेकर हाजिर है . अब ये तो आप ही बताएँगे की ये पार्ट आपको कैसा लगा दोस्तो कमेंट देना मत भूलना

स्नेहा बाथरूम से नहा धोकर निकली.. विकी भी फोन करके लगभग तभी कमरे में आया था...इश्स नये अवतार में स्नेहा को देखते ही विकी की आँखें उस पर जम सी गयी.. चाहकर भी वो अपनी नज़रों को इश्स कातिल नज़ारे से दूर ना कर सका.. स्नेहा ने शायद अब ब्रा नही पहनी थी.. इसीलिए उसकी सेब जैसी चुचियाँ हल्का सा झुकाव ले आई थी.. पर तनी अब भी हुई थी.. सामने की और.. स्कर्ट नीचे घुटनो से कुच्छ उपर तक था.. मांसल लंबी जांघों का गोरापन और गड्रयापन विकी की सहनशीलता के परखच्चे उड़ाने के लिए काफ़ी था..

स्नेहा ने विकी को घूरते देख एक बार नीचे की और देखा," क्या हुआ.. ? आच्छि नही लग रही क्या..?"

विकी जैसे किसी सपने से बाहर निकला..," श.. नही.. ऐसी बात नही है.. मैं तो बस यूँही.. किसी ख़याल में खोया हुआ था...!"

"सपनो से बाहर निकलो जी और खाने का ऑर्डर दे दो.. बहुत भूख लगी है.." कहकर स्नेहा ने टी.वी. ओन कर दिया और 'हरयाणा न्यूज़' सर्च करने लगी....

जिस बात का अंदेशा विकी ने जताया था.. वही हुआ.. 'हरयाणा न्यूज़' की टीम मुरारी के बंगले के बाहर का कवरेज ले रही थी.. करीब 500 के करीब कार्यकर्ता विरोधी पार्टी के खिलाफ नारे लगाने में अपना पसीना बहा रहे थे... तभी स्क्रीन पर न्यूज़ रीडर की तस्वीर उभरी....

"जैसा की हम आपको बता चुके हैं.. आज शाम पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री. मुरारी लाल की इकलौती बेटी का कथित रूप से अपहरन हो गया.. पोलीस से मिली जानकारी के मुताबिक उस कार को बरामद कर लिया गया है जिसमें स्नेहा जी सवार होकर जा रही थी... घटनास्थल के आसपास खून बिखरा पाया गया है.. इश्स'से पोलीस अंदाज़ा लगा रही है की खून ड्राइवर मोहन का हो सकता है.. पोलीस को आशंका है की कहीं ड्राइवर की हत्या ना कर दी हो.. क्यूंकी उसकी भी अभी तक कोई खबर नही है... इसके अलावा पोलीस इश्स मामले में कुच्छ नही कर पाई है.. श्री मुरारी लाल जी ने आरोप लगाया है की ये

विरोधी पार्टी में उनके कट्टर प्रतिद्विंदी श्री. माखन लाल' और उनके दाहिने हाथ

माने जाने वाले विकी की शाजिस है.... उन्हे तोड़ने के लिए.... ताकि वो आगामी

लोकसभा चुनावों में ना खड़े हों.. कहा ये भी गया है की उनसे 50 करोड़ की

फिरौती माँगी गयी है......"

विकी मामले में अपना नाम सुनकर एक पल को सकपका गया... शुक्रा है उसने अपना नाम 'मोहन' ही बताया था... स्नेहा बेचैनी से खबर में डूबी हुई थी...

रीडर का बोलना जारी था...," हमारे संवाद-दाता ने श्री. मुरारी लाल से संपर्क करने की कोशिश की.. पर वो अवेलबल नही हुए.. हालाँकि फोन पर उनसे बात हुई.. आइए आपको सुनते हैं.. उन्होने क्या कहा:

स्नेहा ने रिमोट फैंकर अपने कान पूरी तरह से टी.वी. पर लगा लिए..

"देखिए.. मैं सबको बार बार बता चुका हूँ कि इश्स घृणित कार्य में माखन और विकी जैसे घटिया आदमी का हाथ है.. विकी ने खुद मुझे फोन करके 50 करोड़ की फिरौती माँगी है... वो लोग मुझे अगले एलेक्षन से हटने की धमकी भी दे रहे हैं.. पर मुझे प्रसाशन पर पूरा यकीन है..मेरी बेटी मुझे जल्द से जल्द वापस मिलेगी.. और जनता इन्न चोर लुटेरों, उठाईगीरों को एलेक्षन में सबक ज़रूर सिखाएगी.."

स्नेहा का सिर फट पड़ने को हो गया... उसके पापा उस वक़्त भी नशे में ही थे.. बातों से सॉफ पता चल रहा था.. अब स्नेहा को यकीन हो गया था की सिर्फ़ अपने राजनीतिक लालच के लिए ही उन्होने इतना घटिया गेम खेला है.... वो सुबकने लगी.. आँखों से अविरल आँसू बहने लगे... विकी ने पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ रख दिया...," तुम रो क्यूँ रही हो.. तुम तो सही सलामत हो ना!"

"क्या सबके पापा ऐसे ही होते हैं...? उन्हे मेरी कोई फिकर नही... सिर्फ़ अपने और अपनी अयाशियों के लिए जीने वाले बाप को क्या 'बाप' कहलाने का हक़ है..." स्नेहा रोती हुई विकी से अपने सवाल का जवाब माँग रही थी...

"हमनें श्री मुररीलाल जी से मिलने की कोशिश की.. पर उन्होने बताया की वो किसी ज़रूरी मीटिंग में व्यस्त हैं... अभी नही मिल सकते...."

"मुझे पता है.. उनकी ज़रूरी मीटिंग क्या होती है.." कहते हुए स्नेहा का क्रंदन और बढ़ गया....

"अब चुप भी हो जाओ.. सब ठीक हो जाएगा..." विकी से स्नेहा का रोना देखा नही जा रहा था..

"क्या ठीक हो जाएगा, मोहन.. क्या? क्या मैं सिर्फ़ इश्स बात की सज़ा भुगत रही हूँ की मेरे पिता एक बड़े पॉलिटीशियन है.. ना मैं घर जा सकती हूँ.. ना मैं खुलकर घूम सकती हूँ.. ना मैं जी सकती और ना ही मर सकती... "

टी.वी. की और देख कर रो रही स्नेहा को अचानक विकी ने अपनी बाजुओं में समेत कर अपनी छाती से चिपका लिया.. और उसके बालों में हाथ फेरता हुआ उसको सहलाने, दुलार्ने लगा...

सहानुभूति की शरण में जाकर स्नेहा और भी भावुक हो गयी और उसकी छाती से चिपक कर ज़ोर ज़ोर से रोने लग गयी....

कारण ये नही था की विकी के ज़ज्बात बहक गये थे.. या कुच्छ और.. बुल्की कारण था.. अचानक टी.वी. की स्क्रीन पर माखन और उसकी तस्वीर का आना... अगर स्नेहा वो तस्वीर देख लेती तो किया धारा सब बेकार हो जाता.....

"हमने इश्स बारे में माखन जी से संपर्क करने की कोशिश की तो उन्होने अपने उपर लगे सभी आरोपों को खारिज करके इसको राजनीति से प्रेरित बताया.. हालाँकि वो इश्स बात का जवाब नही दे पाए की आगामी विधानसभा एलेक्षन

में उनकी पार्टी के उम्मीदवार अचानक विदेश क्यूँ चले गये..."

यही वो पल था जब स्क्रीन पर विकी की क्लोसप फोटो दिखाई गयी थी... जान बची सो लाखों पाए....

विकी ने टी.वी. बंद कर दिया.. तभी खाना आ गया... और स्नेहा को अपने आँसू खुद ही पोंच्छ कर सामानया होना पड़ा... वह विकी की छाती से चिपकने का एक बहुत ही सुखद अहसास लेकर बाथरूम में चली गयी.. और विकी ने दरवाजा खोल दिया....

"मैं क्या करूँ मोहन? कहाँ जाऊं?.. क्या मेरा अलग संसार नही हो सकता...?" हालाँकि खाना खाने के बाद स्नेहा काफ़ी हद तक सामानया हो चुकी थी.. पर वो अपने बदन में विकी की चौड़ी छाती से अलग होने के बाद रह रह कर उठ रही कसक को एक बार फिर से मिटा लेना चाहती थी.. अपनी मनभावनी आँखों से विकी के सीने में अपना संसार ढूँढने की कोशिश कर रही थी... वहीं नज़र गड़ाए हुए...

"सब ठीक हो जाएगा.. सानू! मेरा भी दिमाग़ खराब हो गया है.. तुम कहो तो.. थोड़ी सी पी लूँ?" विकी ने झिझकते हुए स्नेहा से पूचछा...

"क्या?" स्नेहा समझ नही पाई थी.. विकी क्या पीने की इजाज़त माँग रहा है...

"वो..!" विकी ने टेबल पर साज़ी बोटेल की और इशारा किया...

"नहिईए.. तुम बहुत अच्छे हो.. मेरे पापा जैसे मत बनो.. प्लीज़!" सानू ने प्यार से कहा...

"ओके!" पूरे भगत बने विकी ने मुस्कुरकर अपने कंधे उचका दिए....

"मुझे नींद आ रही है.. तुम कहाँ सोवोगे..?" स्नेहा के इश्स प्रशन ने तो विकी को हिला ही दिया.. अगर वो ना पूछती तो बिना सोचे ही विकी को बेड पर ही सोना था.. बिना कहे....

"म्म्मै..? मैं कहाँ सोउंगा..? मतलब यहाँ सो जाउन्गा..." हड़बड़ाते हुए विकी ने टेबल की तरफ हाथ कर दिया...

स्नेहा खिलखिला उठी.. ज़ोर का ठहाका लगाया..," तुम इश्स टेबल पर सोवोगे? काँच की टेबल पर...?"

"नही.. मेरा मतलब है कि इसको एक तरफ करके.. नीचे सो जाउन्गा...!" विकी को कुच्छ बोलते ना बन रहा था..

स्नेहा अभी तक हंस रही थी.. एक दम संजीदा हो गयी," तुम ऐसे नही हो 'मोहन' जैसा मैं लोगों को समझा करती थी... तुम बहुत अच्छे हो.. एक दम पर्फेक्ट!" स्नेहा ने वैसा ही उंगली और अंगूठे का घेरा बनाकर कहा.. जैसा गाड़ी में विकी ने उसको देखकर बोला था...

"थॅंक्स...!" विकी ने ज़बरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की...

"व्हाट थॅंक्स..! हम दोनो यहीं सो सकते हैं.. बेड पर.. काफ़ी चौड़ा है.... आइ मीन.. मुझे कोई प्राब्लम नही है.. तुम्हारे साथ सोने में...!" स्नेहा के बदन में कहते हुए गुदगुदी सी हो रही थी...

"देख लो!" विकी ने चेतावनी दी...

"उम्म्म...देख लिया.. आ जाओ.. सो जाओ!" स्नेहा एक तरफ को हो गयी...," पर चादर तो एक ही है.."

विकी ने बेड पर रखा तकिया ठीक किया और स्नेहा के बाजू में लेट गया.. ," कोई बात नही.. तुम्हारा इतना ही रहम बहुत है..... गुड नाइट!"

"पर मुझे नींद नही आ रही..." स्नेहा उसकी और करवट लेकर लेट गयी...

"अभी तो कह रही थी.. अब क्या हुआ...?"

"हां.. तब आ गयी थी.. अब चली गयी.." ये सब तो होना ही था... पहली बार किसी मर्द के साथ बिस्तेर सांझा हुआ था.. नींद तो भागनी ही थी...

सो तो विकी भी कैसे सकता था.. कयनात का हुश्न जब बाजू में बिखरा पड़ा हो.. समेटने के लिए...

"एक बात पूच्छू.. सच सच बतओगि ना..!" विकी ने भी उसकी तरफ करवट ले ली.. दोनो आमने सामने थे..

"पूच्छो..!"

"तुम्हारा कोई बाय्फ्रेंड नही है क्या..?"

"नही.. उसका क्या करना है...!" स्नेहा शरारत से बोली.. बदन में अरमान अंगड़ाई लेने लगे थे.. बाय्फ्रेंड के लिए...

विकी कुच्छ ना बोला.....

"क्यूँ पूच्छ रहे हो...?"

"बस ऐसे ही पूच्छ लिया... और कोई बात ही नही सूझी....

"क्या अब भी दर्द है!" स्नेहा ने था सा आगे सरक कर विकी के दायें कंधे पर अपना हाथ रख दिया...

विकी की समझ में नही आ रहा था की वह अब अपने दिल की सुने या दिमाग़ की.. घायल होने को बेकरार हुश्न उसकी पहुँच में था.. सिर्फ़ करीब एक फुट का ही फासला था.. दोनो के बीच.. कसंकस में उलझा हुआ बेचारा दिल को लाख समझाने की कोशिश बार बार कर रहा था.. पर सानू के 'हाथ' ने सारी कोशिशों को सरेआम कतल कर ही दिया था.. उसके हाथ की च्छुअन उसको अपनी जांघों के बीच तक महसूस हुई.... पर प्लान की कामयाबी के लिए ज़रूरी था की उन्न दोनो में कोई संबंध ना बने.. क्यूंकी अगर बाद में अगर स्नेहा के विचार सच का पता लगने के बाद बदल जाते हैं.. तो उसका मेडिकल एग्ज़ॅमिनेशन हर झूठह से परदा उठा सकता है..," सोने दो स्नेहा.. नींद आ रही है...!"

"अरे.. यहाँ मेरा किडनॅप हो गया है.. और तुम्हे सोने की पड़ी है..." शरारती स्नेहा ने अपना हाथ कंधे से आगे सरका कर उसकी छाती पर रख दिया...

झटके तो विकी को पहले से ही लग रहे थे.. इश्स बार वाला 440 वॉल्ट का था.. स्नेहा थोड़ी और आगे की और झुक गयी थी.. और उसका हाथ विकी की छाती पर किसी नागिन की तरह रेंग रहा था... उसकी मर्दानगी को चुनौती देता हुआ.. स्नेहा की साँसों में रमाइ हुई उसकी कुंवारेपन की बू.. विकी के फेफड़ों से होती हुई सारे शरीर में हुलचल मचा रही थी..

विकी ने अचानक उसकी कमर में हाथ डालकर उसको अपनी तरफ खींच लिया..," आख़िर चाहती क्या हो अब.. सोने भी नही दोगि क्या..? प्राब्लम क्या है?..... सोने दो ना यार.. प्लीज़!"

विकी द्वारा रूखी आवाज़ में कही गयी पहले वाली पंक्तियाँ स्नेहा के दिल में गहरे तक चुभ गयी.. उसने आख़िर ऐसा किया ही क्या था.. सिर्फ़ छाती पर हाथ ही तो रखा था.. उसके चेहरे के भाव अचानक बदल गये.. खुद को बे-इज़्ज़त सा महसूस करके स्नेहा की आँखें नम हो गयी.. उसकी छाती में धड़क रहे 'कुंवारे' दिल की धड़कन विकी को अपनी छाती में महसूस हो रही थी.. स्नेहा की छातियाँ विकी की छाती में गढ़ी हुई थी.. उस बेचारी को कुच्छ और ना सूझा.. सिवाय अपने को छुड़ाकर करवट बदलने और रोना शुरू कर देने के..

"सॉरी सानू! मेरा ये मतलब नही था.. सच में....!" विकी ने करवट लेकर रो रही सानू के हाथ पर हूल्का सा अपने हाथ से स्पर्श किया...

स्नेहा ने झटका मार कर अपना हाथ आगे कर लिया.. और और तेज़ी से सूबक'ने लगी.....

"ये क्या है स्नेहा.. मैने तो बस सोने के लिए रिक्वेस्ट्की थी.... सॉरी बोला ना..." विकी का दिल पिघल रहा था.. और जांघों के बीच वाला 'दिल' जम कर ठोस होता जा रहा था.. और अधिक ठोस...

"हाँ हाँ.. तुमने तो बस सोने की रिक्वेस्ट की है.. अगर सोना ही था तो जाने देते मुझे.. उन्न दरिंदों के साथ.. तब क्यूँ बचाया था.." स्नेहा अपनी आँखें पोंचछते हुए फिर से करवट लेकर सीधी हो गयी.. उसके कातिल उभार कपड़ा फाड़ कर बाहर छलक्ने को बेताब लग रहे थे... और खास बात ये थी की अपनी दाई और करवट लेकर कोहनी के बल सर रखकर अधलेटे विकी के 'खूनी' जबड़े से सिर्फ़ इशारा करने भर की दूरी पर थे... उसके उभार..

"वो.. दरअसल.. स्नेहा.. बुरा मत मान'ना.. पर जब तुम्हारा हाथ.. मेरी छाती पा लगा तो पता नही अचानक मुझे क्या हुआ.. लगा जैसे मैं बहक रहा हूँ.. सॉरी..!"

"अच्च्छा! तुमने जो मेरे यहाँ पर हाथ रख दिया था... गाड़ी में.. सिर्फ़ तुम्ही बहक सकते हो क्या..?" स्नेहा ने रोना छ्चोड़ खुलकर बहस करने की ठान ली...

"पर... हाँ.. पर मुझे तुम बहुत अच्च्ची लगी थी यार..." सानू ने उसके रेशमी बालों में हाथ फेरा....

"मुझे भी तो तुम अच्छे लगते हो.... तो क्या मैं तुम्हे नही छ्छू सकती...!" स्नेहा ने कहते हुए.. झिझक के मारे अपनी आँखें बंद कर ली...

स्नेहा के मुँह से ऐसी बात सुनकर विकी का सारा खून उबाल खा गया..," सच.. तुम्हे में अच्च्छा लगता हूँ क्या...?"

अब की बार स्नेहा बोल ना पाई.. जाने कैसे बोल गयी थी...

"बोलो ना सानू.. प्लीज़!" विकी ने स्नेहा की दूसरी और वाली बाजू अपने हाथ में पकड़ ली.. उसका हाथ सानू के पेट को हल्का सा छ्छू रहा था.. जो आग भड़काने को काफ़ी था...

कुच्छ देर बाद की चुप्पी के बाद अचानक स्नेहा पलटी और लगभग उसकी पूरी जवानी विकी की बाहों में समा गयी...," और नही तो क्या.. अगर अच्छे नही लगते तो क्या मैं किडनॅपिंग का खुलासा होने के बाद भी तुम्हारे साथ आने को राज़ी होती.... तुम बहुत अच्छे हो 'मोहन' बहुत अच्छे... दिल करता है.. हमेशा तुम्हारी छाती से लिपटी रहू.. मैं वापस नही जाना चाहती.. मुझे अपने घर ले चलो... अपने पास..." कहते हुए स्नेहा अपने बदन में हुलचल महसूस कर रही थी.. वह विस्मयकारी थी.. उसकी जांघों के पास.. कोई ठोस सी चीज़ उसके बदन में गढ़ी जा रही थी.. पर हैरानी की बात ये थी की ये चुभन स्नेहा को बहुत अच्च्ची लग रही थी.. वह सरक कर विकी के और ज़्यादा करीब हो गयी.. उसकी साँसें धौकनी के माफिक चल रही थी.. तेज तेज... गरम गरम....

शब्र रखने की भी तो कोई हद होती है ना.. विकी की हद टूट चुकी थी.. स्नेहा का चेहरा अपने हाथों में पकड़ा और होंठो पर एक रसीला चुंबन रसीद कर दिया...," तुम.. तुम मुझे छ्चोड़ कर तो नही जाओगी ना..."

रठाने मनाने तक तो सब ठीक था.. पर इश्स चुंबन की गरमाहट कच्ची उमर की स्नेहा सहन ना कर सकी.. बदहवास सी होकर अचानक पलट गयी और दूसरी और मुँह करके और लंबी साँसे लेने लगी... उसके गुलाबी होंठ खुले थे.. शायद विकी की दी हुई छाप को एक दूसरे से चिपक कर मिटाना नही चाहते थे...

मुँह फेर कर लेटी स्नेहा के नितंबों का उभार वासना की चर्बी चढ़कर इतना उभर चुका था की बीच रास्ते वापस लौटना किसी 'ब्रह्मचारी' के लिए भी असंभव था.. सारा प्लान विकी को ध्वस्त होता नज़र आने लगा... विकी को लगा ... अगर 2 और पल दूरी रही तो वह फट जाएगा... जांघों के बीच से...

बिना देर किए विकी थोड़ा खुद आगे हुआ और थोड़ा सा स्नेहा की कमर से चिपके पेट पर हाथ रखकर उसको अपनी और खींच लिया.. रोमांच और पहले अनुभव के कामुक धागे से बँधी स्नेहा खींची चली आई.. और दोनो अर्धनारीश्वर का रूप हो गये.. बीच में हवा तक को स्थान नही मिला.. अंग से अंग चिपका हुआ था..

"अब क्या हुआ..?" विकी ने उसके गालों पर जा बिखरे बालों को अपने बायें हाथ से ही जैसे तैसे हटा कर उसके गालों को च्छुआ...

अपने नरित्व में मर्दानी चुभन को महसूस करके स्नेहा पागल सी हो गयी थी.. आँखें जैसे पथरा सी गयी थी.. आधी खुली हुई... लगता था.. वह यहाँ है ही नही.. मॅन सांतवें आसमान में कुलाचें भर रहा था......

हसीन अदाओ का जब जाल बिछ जायेगा

तेरा पूरा वजूद जलवों के जाल में फस जायेगा

कातिल निगाहों का जादू काली घटा बन कर

तेरी अखियों के रस्ते तेरी रग-रग में असीम नशा भर जायेगा

बाहों की सलाखों का मखमली पिंजरा जब बदन पे कब्जा जमायेगा

शरीर का कतरा-कतरा भूकम्प के झटके खायेगा

तू लाख कोशिश कर ले मर्दानगी का हर जज्बा दम तोड़ जायेगा

हर लम्हा अरे पगले वही दफन हो जायेगा

कब्र में दफन एहसास को केवल यही याद आयेगा

जान मेरी कर दो रहम इस बीमार पर

ये उबलता ज्वालामुखी बिना फटे नही रह पायेगा

जिन्दगी वीरान है बिन तेरे

हूँ गुलाम तेरे प्रेम का तेरे अहसासों के सजदे करता चला जायेगा

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साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always

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`·.¸.·´ -- raj

girls school--part --38

dosto aapka dost raj sharma paart 38 lekar haajir hai . ab ye to aap hi bataayenge ki ye paart aapko kaisa laga dosto kament dena mat bhulana

Sneha bathroom se naha dhokar nikli.. Vicky bhi fone karke lagbhag tabhi kamre mein aaya tha...Iss naye avtaar mein Sneha ko dekhte hi Vicky ki aankhein Uss par jam si gayi.. Chahkar bhi wo apni najron ko iss katil najare se door na kar saka.. Sneha ne shayad ab bra nahi pahni thi.. Isiliye uski seb jaisi chuchiyan halka sa jhukav le aayi thi.. Par tani ab bhi huyi thi.. Saamne ki aur.. Skirt neeche ghutno se kuchh upar tak tha.. Mansal lambi jaanghon ka gorapan aur gadrayapan vicky ki sahansheelta ke parkhachche udane ke liye kafi tha..

Sneha ne vicky ko ghoorte dekh ek baar neeche ki aur dekha," Kya hua.. ? Achchhi nahi lag rahi kya..?"

Vicky jaise kisi sapne se bahar nikla..," ohh.. Nahi.. Aisi baat nahi hai.. Main toh bus yunhi.. Kisi khayal mein khoya huaa tha...!"

"sapno se bahar niklo ji aur khane ka order de do.. Bahut bhookh lagi hai.." kahkar sneha ne T.V. On kar diya aur 'Haryana News' search karne lagi....

jis baat ka andesha vicky ne jataya tha.. Wahi hua.. 'Haryana News' ki team Murari ke bangle ke bahar ka coverage le rahi thi.. Kareeb 500 ke kareeb karyakarta virodhi party ke khilaf naare lagane mein apna pasina baha rahe thhe... Tabhi screen par news reader ki tasvir ubhari....

"jaisa ki hum aapko bata chuke hain.. Aaj sham party ke varisth neta sh. Murari lal ki iklouti beti ka kathit roop se apharan ho gaya.. Police se mili jankari ke mutabik uss car ko baramad kar liya gaya hai jismein Sneha ji sawar hokar ja rahi thi... Ghatnasthal ke aaspas khoon bikhra paya gaya hai.. Iss'se police andaja laga rahi hai ki khoon Driver mohan ka ho sakta hai.. Police ko aashanka hai ki kahin driver ki hatya na kar di ho.. Kyunki uski bhi abhi tak koyi khabar nahi hai... Iske alawa police iss mamle mein kuchh nahi kar payi hai.. Shri Murari lal ji ne aarop lagaya hai ki ye

virodhi party mein unke kattar pratidwindi Sh. Makhan Lal' aur unke dahine haath

maane jane wale Vicky ki sazis hai.... Unhe todne ke liye.... taki wo aagami

loksabha chunavon mein na khade hon.. Kaha ye bhi gaya hai ki unse 50 karod ki

firouti maangi gayi hai......"

Vicky mamle mein apna naam sunkar ek pal ko sakpaka gaya... Shukra hai usne apna naam 'Mohan' hi bataya tha... Sneha bechaini se khabar mein doobi huyi thi...

Reader ka bolna jari tha...," hamare sanwad-data ne Sh. Murari laal se sampark karne ki koshish ki.. Par wo available nahi huye.. Halanki fone par unse baat huyi.. Aayiye aapko sunate hain.. Unhone kya kaha:

Sneha ne remote fainkar apne kaan poori tarah se T.V. Par gada liye..

"Dekhiye.. Main sabko baar baar bata chuka hoon ki iss ghrinit karya mein Makhan aur vicky jaise ghatiya aadmi ka hath hai.. Vicky ne khud mujhe fone karke 50 karod ki firouti maangi hai... Wo log mujhe agle election se hatne ki dhamki bhi de rahe hain.. Par mujhe prasashan par poora yakeen hai..meri beti mujhe jald se jald wapas milegi.. Aur janta inn chor luteron, uthhayigiron ko election mein sabak jaroor sikhayegi.."

Sneha ka sir fat padne ko ho gaya... Uske papa uss waqt bhi nashe mein hi thhe.. Baton se saaf pata chal raha tha.. Ab sneha ko yakeen ho gaya tha ki sirf apne rajnitik lalach ke liye hi unhone itna ghatiya game khela hai.... Wo subakne lagi.. Aankhon se aviral aasoon bahne lage... Vicky ne paas baithkar uske kandhe par hath rakh diya...," tum ro kyun rahi ho.. Tum toh sahi salamat ho na!"

"kya sabke papa aise hi hote hain...? Unhe meri koyi fikar nahi... Sirf apne aur apni aiyaashiyon ke liye jeene wale baap ko kya 'baap' kahlane ka haq hai..." Sneha roti huyi Vicky se apne sawaal ka jawaab maang rahi thi...

"hamnein Shri Murarilal ji se milne ki koshish ki.. Par unhone bataya ki wo kisi jaruri meeting mein vyast hain... Abhi nahi mil sakte...."

"mujhe pata hai.. Unki jaruri meeting kya hoti hai.." kahte huye Sneha ka krandan aur badh gaya....

"ab chup bhi ho jao.. Sab thheek ho jayega..." vicky se Sneha ka rona dekha nahi ja raha tha..

"kya thheek ho jayega, Mohan.. Kya? Kya main sirf iss baat ki saja bhugat rahi hoon ki mere pita ek bade politician hai.. Na main ghar ja sakti hoon.. Na main khulkar ghoom sakti hoon.. Na main ji sakti aur na hi mar sakti... "

T.V. Ki aur dekh kar ro rahi Sneha ko achanak Vicky ne apni bajuon mein samet kar apni chhati se chipka liya.. Aur uske balon mein hath ferta hua usko sahlane, dularne laga...

Sahanubhuti ki sharan mein jakar Sneha aur bhi bhawuk ho gayi aur uski chhati se chipak kar jor jor se rone lag gayi....

Karan ye nahi tha ki Vicky ke jajbaat behak gaye thhe.. Ya kuchh aur.. Bulki karan tha.. Achanak t.v. Ki screen par makhan aur uski tasvir ka aana... Agar sneha wo tasvir dekh leti toh kiya dhara sab bekar ho jata.....

"Humne iss baarey mein makhan ji se sampark karne ki koshish ki toh unhone apne upar lage sabhi aaropon ko kharij karke isko raajniti se prerit bataya.. Halanki wo iss baat ka jawaab nahi de paye ki aagami vidhansabha election

mein unki party ke ummeedwar achanak videsh kyun chale gaye..."

Yahi wo pal tha jab screen par vicky ki closeup foto dikhayi gayi thi... Jaan bachi so laakhon paye....

Vicky ne T.V. Band kar diya.. Tabhi khana aa gaya... aur Sneha ko apne aansoo khud hi ponchh kar samanya hona pada... Wah vicky ki chhati se chipakne ka ek bahut hi sukhad ahsaas lekar bathroom mein chali gayi.. Aur vicky ne darwaja khol diya....

"Main kya karoon vicky? Kahan jaaoon?.. Kya mera alag sansaar nahi ho sakta...?" halanki khana khane ke baad Sneha kafi had tak samanya ho chuki thhi.. Par wo apne badan mein Vicky ki chodi chhati se alag hone ke baad rah rah kar uthh rahi kasak ko ek baar fir se mita lena chahti thi.. Apni manbhawni aankhon se Vicky ke seene mein apna sansaar dhoonshne ki koshish kar rahi thi... Wahin najar gadaye huye...

"sab thheek ho jayega.. Sanu! Mera bhi dimag kharaab ho gaya hai.. Tum kaho toh.. Thhodi si pi loon?" vicky ne jhijhakte huye Sneha se poochha...

"kya?" Sneha samajh nahi payi thi.. Vicky kya pine ki ijajat maang raha hai...

"wo..!" Vicky ne table par sazi botel ki aur ishara kiya...

"nahieee.. Tum bahut achchhe ho.. Mere papa jaise mat bano.. Pls!" Sanu ne pyar se kaha...

"OK!" poorey bhagat bane Vicky ne muskurakar apne kandhe uchaka diye....

"Mujhe neend aa rahi hai.. Tum kahan sowoge..?" Sneha ke iss prashan ne toh vicky ko hila hi diya.. Agar wo na poochhti toh bina soche hi vicky ko bed par hi sona tha.. Bina kahe....

"mmmain..? Main kahan sounga..? Matlab yahan so jaaunga..." hadbadate huye vicky ne table ki taraf hath kar diya...

Sneha khilkhila uthhi.. Jor ka thhahaka lagaya..," tum iss table par sowoge? Kaanch ki table par...?"

"nahi.. Mera matlab hai ki isko ek taraf karke.. Neeche so jaaunga...!" Vicky ko kuchh bolte na ban raha tha..

sneha abhi tak hans rahi thi.. Ek dum sanjeeda ho gayi," Tum aise nahi ho 'Mohan' jaisa main logon ko samjha karti thi... Tum bahut achchhe ho.. Ek dum perfect!" sneha ne waisa hi ungali aur angoothhe ka ghera banakar kaha.. Jaisa gadi mein vicky ne usko dekhkar bola tha...

"thanx...!" Vicky ne jabardasti muskurane ki koshish ki...

"what Thanx..! Hum dono yahin so sakte hain.. Bed par.. Kafi chouda hai.... I mean.. Mujhe koyi problem nahi hai.. Tumhare sath sone mein...!" Sneha ke badan mein kahte huye gudgudi si ho rahi thi...

"Dekh lo!" Vicky ne chetawani di...

"ummm...dekh liya.. Aa jao.. So jao!" Sneha ek taraf ko ho gayi...," par chadar toh ek hi hai.."

Vicky ne bed par rakha takiya thheek kiya aur sneha ke baju mein Late gaya.. ," Koyi baat nahi.. Tumhara itna hi raham bahut hai..... Gud Night!"

"par mujhe neend nahi aa rahi..." Sneha uski aur karwat lekar late gayi...

"abhi toh kah rahi thi.. Ab kya huaa...?"

"haan.. Tab aa gayi thi.. Ab chali gayi.." ye sab toh hona hi tha... Pahli baar kisi mard ke sath bister saanjha huaa tha.. Neend toh bhagni hi thi...

So toh vicky bhi kaise sakta tha.. Kaynaat ka hushn jab baaju mein bikhra pada ho.. Sametne ke liye...

"ek baat poochhoon.. Sach sach bataogi na..!" Vicky ne bhi uski taraf karwat le li.. Dono aamne saamne thhe..

"poochho..!"

"tumhara koyi boyfriend nahi hai kya..?"

"Nahi.. Uska kya karna hai...!" Sneha sharaarat se boli.. Badan mein armaan angdayi lene lagey thhe.. BoyFriend ke liye...

vicky kuchh na bola.....

"kyun poochh rahe ho...?"

"bus aise hi poochh liya... Aur koyi baat hi nahi soojhi....

"kya ab bhi dard hai!" Sneha ne thhoda sa aage sarak kar Vicky ke dayein kandhe par apna hath rakh diya...

Vicky ki samajh mein nahi aa raha tha ki wah ab apne dil ki sune ya dimag ki.. Ghayal hone ko bekraar hushn uski pahunch mein tha.. Sirf kareeb ek foot ka hi faasla tha.. Dono ke beech.. Kasamkas mein uljha hua bechara dil ko lakh samjhane ki koshish baar baar kar raha tha.. Par Sanu ke 'hath' ne sari koshishon ko sareaam katal kar hi diya tha.. Uske hath ki chhuan usko apni jaanghon ke beech tak mahsoos huyi.... Par plan ki kaamyabi ke liye jaruri tha ki unn dono mein koyi sambandh na baney.. Kyunki agar baad mein agar sneha ke vichar sach ka pata lagne ke baad badal jate hain.. To uska medical examination har jhoothh se parda utha sakta hai..," Sone do sneha.. Neend aa rahi hai...!"

"arey.. Yahan mera kidnap ho gaya hai.. Aur tumhe sone ki padi hai..." shararati sneha ne apna hath kandhe se aagey sarka kar usk chhati par rakh diya...

jhatke toh Vicky ko pahle se hi lag rahe thhe.. Iss baar wala 440 volt ka tha.. Sneha thhodi aur aagey ki aur jhuk gayi thi.. Aur uska hath Vicky ki chhati par kisi nagin ki tarah reng raha tha... Uski mardanagi ko chunouti deta huaa.. Sneha ki sanson mein rami huyi uski kunwarepan ki boo.. Vicky ke fefdon se hoti huyi sare shareer mein hulchal macha rahi thi..

Vicky ne achanak uski kamar mein hath daalkar usko apni taraf kheench liya..," Aakhir chahti kya ho ab.. Sone bhi nahi dogi kya..? Problem kya hai?..... Sone do na yaar.. Pls!"

Vicky dwara rookhi aawaj mein kahi gayi pahle wali panktiyan Sneha ke dil mein gahre tak chubh gayi.. Usne aakhir aisa kiya hi kya tha.. Sirf chhati par hath hi toh rakha tha.. Uske chehre ke bhav achanak badal gaye.. Khud ko be-ijjat sa mahsoos karke Sneha ki aankhein nam ho gayi.. Uski chhati mein dhadak rahe 'kunware' dil ki dhadkan vicky ko apni chhati mein mahsoos ho rahi thhi.. Sneha ki chhatiyan vicky ki chhati mein gadi huyi thi.. Uss bechari ko kuchh aur na soojha.. Sivay apne ko chhudakar karwat badalne aur Rona shuru kar dene ke..

"sorry Sanu! Mera ye matlab nahi tha.. Sach mein....!" vicky ne karwat lekar ro rahi sanu ke hath par hulka sa apne hath se sparsh kiya...

Sneha ne jhatka maar kar apna hath aagey kar liya.. Aur aur tezi se subak'ne lagi.....

"ye kya hai Sneha.. Maine toh bus sone ke liye requestki thi.... Sorry bola na..." vicky ka dil pighal raha tha.. Aur janghon ke beech wala 'dil' jam kar thhos hota ja raha tha.. Aur adhik thhos...

"haan haan.. Tumne toh bus sone ki request ki hai.. Agar sona hi tha toh jaane dete mujhe.. Unn darindon ke sath.. Tab kyun bachaya tha.." Sneha apni aankhein ponchhte huye fir se karwat lekar seedhi ho gayi.. Uske katil ubhar kapda fad kar bahar chhalakne ko betaab lag rahe thhe... Aur khas baat ye thi ki apni dayi aur karwat lekar kohni ke bal sar rakhkar adhlete Vicky ke 'khooni' jabde se sirf ishara karne bhar ki doori par thhe... Uske ubhaar..

"wo.. Darasal.. Sneha.. Bura mat maan'na.. Par jab tumhara hath.. Meri chhati pa laga toh pata nahi achanak mujhe kya huaa.. Laga jaise main bahak raha hoon.. Sorry..!"

"achchha! Tumne jo mere yahan par haath rakh diya thha... Gadi mein.. Sirf tumhi behak sakte ho kya..?" Sneha ne rona chhod khulkar behas karne ki thhan li...

"par... Haan.. Par mujhe tum bahut achchhi lagi thhi yaar..." Sanu ne uske reshami balon mein hath fera....

"mujhe bhi toh tum achchhe lagte ho.... Toh kya main tumhe nahi chhoo sakti...!" Sneha ne kahte huye.. Jhijhak ke marey apni aankhein band kar li...

sneha ke munh se aisi baat sunkar Vicky ka sara khoon ubaal kha gaya..," Sach.. Tumhe mein achchha lagta hoon kya...?"

Ab ki baar sneha bol na payi.. Jane kaise bol gayi thi...

"bolo na sanu.. Pls!" Vicky ne sneha ki dusri aur wali baju apne hath mein pakad li.. Uska hath sanu ke pate ko halka sa chhoo raha thha.. Jo aag bhadkane ko kafi thha...

Kuchh der baad ki chuppi ke baad achanak Sneha palti aur lagbhag uski poori jawani vicky ki bahon mein sama gayi...," aur nahi toh kya.. Agar achchhe nahi lagte to kya main kidnapping ka khulasa hone ke baad bhi tumhare sath aane ko raji hoti.... Tum bahut achchhe ho 'Mohan' bahut achchhe... Dil karta hai.. Hamesha tumhari chhati se lipti rahu.. Main wapas nahi jana chahti.. Mujhe apne ghar le chalo... Apne paas..." kahte huye Sneha apne badan mein hulchal mahsoos kar rahi thi.. Wah vismaykari thi.. Uski jaanghon ke paas.. Koyi thhos si cheej uske badan mein gadi ja rahi thi.. Par hairani ki baat ye thhi ki ye chubhan Sneha ko bahut achchhi lag rahi thhi.. Wah sarak kar vicky ke aur jyada kareeb ho gayi.. Uski saansein dhoukni ke mafik chal rahi thhi.. Tej tej... Garam garam....

Sabra rakhne ki bhi toh koyi had hoti hai na.. Vicky ki had toot chuki thi.. Sneha ka chehra apne haathhon mein pakda aur honton par ek rasila chumban raseed kar diya...," tum.. Tum mujhe chhod kar toh nahi jaogi na..."

Ruthhne manane tak toh sab thheek tha.. Par iss chumban ki garamahat kachchi umar ki sneha sahan na kar saki.. Badhawas si hokar achanak palat gayi aur dusri aur munh karke aur lambi saanse lene lagi... Usk gulabi hont khule thhe.. Shayad vicky ki di huyi chhap ko ek dusre se chipak kar mitana nahi chahte thhe...

Munh fer kar leti sneha ke nitambon ka ubhar wasna ki charbi chadhkar itna ubhar chuka tha ki beech raaste wapas loutna kisi 'brahmchari' ke liye bhi asambhav tha.. Sara plan vicky ko dhwast hota najar aane laga... Vicky ko laga ... Agar 2 aur pal doori rahi toh wah fat jayega... Jaanghon ke beech se...

Bina der kiye Vicky thhoda khud aage hua aur thhoda sa sneha ke kamar se chipke pate par hath rakhkar usko apni aur kheench liya.. Romanch aur pahle anubhav ke kamuk dhagey se bandhi Sneha kheenchi chali aayi.. Aur dono ardhnarishwar ka roop ho gaye.. Beech mein hawa tak ko sthan nahi mila.. Ang se ang chipka hua tha..

"ab kya huaa..?" Vicky ne uske galon par ja bikhre balon ko apne bayein hath se hi jaise taise hata kar uske galon ko chhuaa...

Apne naritva mein mardani chubhan ko mahsoos karke Snahe pagal si ho gayi thi.. Aankhein jaise pathra si gayi thi.. Aadhi khuli huyi... Lagta tha.. Wah yahan hai hi nahi.. Mann saantwein aasmaan mein kulaachein bhar raha thaa......

 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --39

स्नेहा की जगह उसकी मादक साँसों से जवाब मिलता देख विकी बेकाबू हो गया," अगर मैं तुम्हे छू लूँ तो तुम्हे कोई दिक्कत तो नही है.....

छ्छू तो रखा था.. और कैसे च्छुना चाहता है.. सुनकर स्नेहा का अंग अंग चरमरा उठा... बोली कुच्छ नही; बस अपने हाथ से उपर सरकती जा रही स्कर्ट की सिलवटें दूर की और शरम से निहाल होकर अपना चेहरा तकिये में च्छूपा लिया... ये अदा... इशारा ही तो था!

"बोल ना... अब क्यूँ शर्मा रही है... मैं तुम्हे पसंद हूँ ना?" सब कुच्छ जानते हुए भी विकी अभी तक भी संयम का परिचय दे रहा था...

"मुझे नही पता... गुदगुदी हो रही है...!" लज्जा और शुकून की गहरी साँस छ्चोड़ते हुए सानू एक दम सिमट सी गयी और अपनी उपर वाली टाँग घुटने से मोड़ कर आगे की तरफ खींच ली...

उफफफफ्फ़... ऐसा करने से एक अच्छे ख्हासे तरबूज के बीच की एक फाँक निकाल देने जैसे आकर के उसके गोलाकार नितंब उभर आए... 2 मिनिट पहले ही खींच कर ज़बरदस्ती नीचे की गयी उसकी स्कर्ट फिर से सिकुड गयी... विकी का दमदार हथ्हियार सही जगह से थोड़ा सा पिछे बुरी तरह तननाया हुआ तैनात था...

विकी उसकी गोरी जांघों से और उपर का दीदार करने को लालायित हो उठा... तरीका एक ही था.. अपना तकिया उठाया और स्नेहा के पैरों की और रखकर लेट गया..," मैं उस तरफ लेट रहा हूँ... इधर बाजू में दर्द हो रहा है..."

उस वक़्त विकी के दूसरी और सिर करके लेटने का असली कारण स्नेहा ना समझ पाई... चुभन का मीठा सा अहसास अचानक गायब होने से स्नेहा तड़प सी उठी.. सिर उठाकर एक बार विकी को घूर कर देखा; फिर गुस्सा सा दिखाती हुई अपने सिर को झटक कर वापस लेट गयी.....

स्कर्ट के नीचे से लुंबी, गड्राई, गोरी और मांसल जांघों की गहराई में झाँकते ही विकी के चेहरे पर जो भाव उभरे वो अनायास ही किसी अंधे को दिखने लग जाए; ऐसे थे.. आँखें बाहर निकल कर गिरने को हो गयी..," उम्म्म्म.. मैं इसको छ्चोड़ने की सोच रहा था.. हे राम!" विकी मंन ही मंन बुदबुडाया...

घुटना मुड़ा होने की वजह से स्नेहा की स्कर्ट के नीचे पहनी हुई सफेद पॅंटी का सपस्ट दीदार हो रहा था.. जांघों से चिपकी हुई पॅंटी पर बीचों बीच एक छ्होटा सा गुलाबी फूल बना हुआ था.. जो गीला होकर और भी गाढ़ी रंगत पा चुका था.. निचले हिस्से में पॅंटी योनि की फांकों का हूबहू आकर प्रद्राशित कर रही थी... उत्तेजना के कारण दोनो फाँकें आकड़ी हुई सी थी... और पॅंटी उनके बीच हुल्की सी गहराई लिए हुए थी...

" स्नेहा!" विकी लरजती हुई सी आवाज़ में बोला...

स्नेहा ने कोई उत्तर ना दिया...

विकी पॅंटी के उतार चाढ़वों में इतना उलझा हुआ था की दोबारा पुकारना ही भ्हूल गया....

"क्या है?" विकी की तरफ से फिर आवाज़ आने की प्रतीक्षा करके करीब 3-4 मिनिट के बाद अचानक स्नेहा बैठ गयी," बोलो ना.. क्यूँ परेशान कर रहे हो...

"क्कुच्छ नही... क्या..." विकी को लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो.... जैसे अभी डाँट पड़ेगी... प्यार भरी...

"क्यूँ.. अभी तो पुकारा था.. मेरा नाम...!" थोड़े से झिझकते हुए स्नेहा ने भी अपना सिर विकी की और ही कर लिया और लेट गयी.......

"बोलो ना! क्या कह रहे थे मोहन?" स्नेहा ने अपना हाथ विकी के हाथ पर रख दिया..

"कुच्छ नही... बस... पता नही क्यूँ बेचैनी सी हो रही है... नींद नही आ रही.." विकी ने अपने हाथ को छुड़ाने की इस बार कतई कोशिश नही की..

"हूंम्म्म.. मैं कुच्छ करूँ...?" विकी की नज़रों को अपने अंदर घुसने की कोशिश करते देख स्नेहा बाग बाग हो गयी..," आइ मीन... सिर दबा दूं.. या कुच्छ और"

बातों ही बातों में स्नेहा ने अपना घुटना आगे करके विकी की जाँघ से सटा दिया... घुटने से करीब 4 इंच उपर स्नेहा की जाँघ पर काला सा तिल था...

"नही.. कुच्छ नही.. एक बात बोलूं सानू!" विकी की आवाज़ में अजीब सी खुमारी भर गयी थी...

"पुछ्ते क्यूँ हो? कुच्छ भी बोलो ना...!" स्नेहा की हालत भी बस डाँवाडोल ही थी.. बस इशारा करने की देर थी...

"उम्म्म्मम..." विकी ने बात कहने से पहले पूरा समय लिया," तुम्हारी जांघें बहुत सुंदर हैं... अब मेरी क्या ग़लती है जो मैं वहाँ इनको छ्छूने से अपने आपको रोक नही पाया...

दिल में तो स्नेहा के भी कुच्छ ऐसे ही अरमान थे.. पर विकी को सीधा हमला करते देख वो हड़बड़ा गयी... बिना वक़्त गँवायें हाथ नीचे ले जाकर अपनी स्कर्ट को नीचे खींचने की कोशिश की.. पर वह तो थी ही छ्होटी... अपनी अमानत को च्छूपा पाने में सफल ना होने पर स्नेहा ने अपना हाथ उपर लाकर विकी की आँखों पर रख दिया," ऐसे क्यूँ देख रहे हो! मुझे शरम आ रही है..." और अपना हाथ वहीं रखे रही.. विकी ने भी हटाने की कोशिश ना की.. उसके होंठो पर अजीब सी मुस्कान तेर गयी.....

"क्या है?" विकी को हंसते देख स्नेहा पूच्छ बैठही," अब हंस क्यूँ रहे हो?"

"मैं तुम्हे समझ नही पाया सानू.. एक तरफ तो तुम इतनी बोल्ड हो.. और दूसरी तरफ इतनी शर्मीली.. इतनी....." विकी बोला....

"आए.. मैं कोई शर्मीली वारमीली नही हूँ.. हाआअँ! मैं तो बड़ी मुँहफट हूँ.. जो जी मैं आए कह देती हूँ.. जो जी मैं आए कर लेती हूँ... मैं किसी बात से नही डरती... समझे मिस्टर्र्र्ररर..!"

"अच्च्छा.. ऐसा है तो मेरे लिप्स पर किस करके दिखाओ... मान लूँगा की तुम शर्मीली नही हो..!" विकी ने पासा फैंका...

स्नेहा को तो मानो मॅन माँगी मुराद मिल गयी.. कितनी देर से उसके होंठ अपनी मिठास बाँटने को व्याकुल थे.. प्यासे थे.. पर उसके लिए पहल करना आसान भी नही था....," यूँ मैं इतनी बेशर्म भी नही हूँ...!" विकी की आँखों पर उसके कोमल हाथो का परदा होने के बावजूद वह अपनी आँखें खुली ना रख पाई.. पर आवेश में उसके दाँतों ने नीचे वाले होंठ को काट खाया....

"इसमें बेशरम होने वाली क्या बात है.. अगर मैं तुम्हे अच्च्छा लगता हूँ.. और तुम इतनी बोल्ड हो तो इतना तो कर ही सकती हो.." विकी के होंठो पर अब भी शरारती मुस्कान तेर रही थी....

"तूमम्म.... तुम कर लो.. बात तो एक ही है..!" कहकर स्नेहा ने विकी के चेहरे से हाथ हटाया और शरम से गुलाबी हो चुके अपने चेहरे को ढक लिया...

"मैं.. मैं तो कुच्छ भी कर सकता हूँ.. मेरा क्या है.. मैं तो मर्द हूँ...!" विकी ने कहा और अपने हाथ से पकड़कर उसके हाथो को चेहरे से जुदा कर दिया...

स्नेहा की साँसों में गर्मी आनी एक बार फिर शुरू हो गयी थी... आँखें बंद थी.. और होंठ धीरे धीरे काँप रहे थे," तो कर के दिखाओ ना.."

अब विकी कहाँ शरमाता.. झट से अपना चेहरा आगे किया और स्नेहा का उपर वाला होंठ अपने होंठो में दबा लिया.. और चूसने लगा.. स्नेहा की हालत खराब हो गयी.. साँसे धौकनी की तरह चलने लगी.. आख़िर में जब शरम और संयम की सारी हदें पार हो गयी तो स्नेहा के हाथ अपने आप विकी के चेहरे पर चले गये और उसने विकी के नीचे वाले होंठ को अपने होंठो में दबा लिया... और अपनी पकड़ मजबूत करती चली गयी...

बहुत ही रसभरा दृश्या था.. होंठो को एक दूसरे की क़ैद में लिए विकी और स्नेहा हर पल पागल से होते चले गये.. जैसे सब कुच्छ आज ही निचोड़ लेंगे.. स्नेहा की टाँग किसी अनेइछिक मांसपेशी की तरह काम करती हुई विकी की कमर पर चढ़ गयी.. दोनो एक दूसरे से जोंक की माफिक चिपके हुए थे.. स्नेहा की चूचियाँ विकी की ठोस छाती में गढ़ी हुई थी.. पर इश्स वक़्त किसी को होंठों से ही फ़ुर्सत नही थी...

अचानक स्नेहा को लगा जैसे वह कहीं उँचाई से नीचे गिर रही है.. उसका सारा बदन सूखे पत्ते की तरह काँप उठा और महसूस हुआ जैसे उसका पेशाब निकल गया...

कहीं दूसरे लोक की सैर करके वापस आई स्नेहा एकदम से ढीली पड़ गयी और एक झटके के साथ विकी से दूर हो गयी...

वह सीधी हो गयी थी.. टाँगों को एक दूसरी के उपर चढ़हा लिया था.. और अपनी चूचियों पर हाथ रखकर उनको शांत करने की कोशिश कर रही थी...

वह कुच्छ ना बोली.. 4-5 मिनिट के असीम लूंबे इंतज़ार के बाद विकी को ही चुप्पी तोड़नी पड़ी..," क्या हुआ..?"

"कुच्छ नही..एक मिनिट" स्नेहा ने कहा और उठकर बाथरूम में चली गयी...

विकी इसी ताक में था.. झट से अपना फोन वीडियो रेकॉर्डिंग पर सेट किया और बेड की तरफ अड्जस्ट करके टेबल पर अश्-ट्रे के साथ रख दिया...

स्नेहा करीब 7-8 मिनिट बाद वापस आई... बाहर निकली तो विकी उसको देखकर मुस्कुरा रहा था...

"क्या है.. ? क्यूँ हंस रहे हो?" स्नेहा ने अपने बॅग को टटोलते हुए पूचछा...

बॅग से 'कुच्छ' निकल कर वापस जा रही स्नेहा का विकी ने हाथ पकड़ लिया," क्या ले जा रही हो.. यूँ छुपा कर"

"कुच्छ नही.. छ्चोड़ो ना.." स्नेहा ने दूसरा हाथ अपनी कमर के पिछे छुपा लिया..," छ्चोड़ो ना.. प्लीज़!"

"बताओ तो सही.. ऐसा क्या है..?" विकी ने उसको अपनी तरफ खींच कर उसके दूसरे हाथ को पकड़ने की कोशिश की...

"आआह.." सिसकारी स्नेहा के मुख से निकली थी.. विकी ने उसके हाथ को पकड़ने की कोशिश में अंजाने में ही नितंब पकड़ लिया.. पहले से ही कमतूर स्नेहा के नितंब थिरक उठे.. वासना उसके चेहरे पर उसकी आ के साथ छलक उठी.. गीली हो चुकी पॅंटी को वो बाथरूम में निकल आई थी.. इसलिए स्पर्श और भी अधिक आनंदकारी रहा... हाथों में जैसे जान बची ही नही और पहन-ने के लिए लेकर जा रही 'दूसरी' पनटी उसके हाथ से छूट कर फर्श पर जा गिरी...

"श.. सॉरी!" कहकर विकी ने अपना हाथ एक दम वापस खींच लिया.. पर करारे नितंब की गर्मी उसको अब भी महसूस हो रही थी... फर्श पर पड़ी पॅंटी को देखते ही उसको माजरा समझने में देर ना लगी..," सॉरी.. वो.. मैं..."

आगे स्नेहा ने उसकी कुच्छ ना सुनी.. शरमाई और सकूचाई सी स्नेहा ने झुक कर अपनी पॅंटी उठाई और बाथरूम में भाग गयी...

वापस आने पर भी वह लज़ाई हुई थी.. दोनो को पता था.. अब सब कुच्छ होकर रहेगा.. पर विकी इन्न पलों को रेकॉर्ड कर रहे होने की वजह से स्नेहा की पहल का इंतजार कर रहा था... और स्नेहा शर्म की चादर में लिपटी विकी का इंतजार करती रही... अपना 'घूँघट' उठ वाने के लिए.. यूँही करीब 15 मिनिट और बीत गये...

"तुमने आज से पहले किसी लड़की को ऐसे किया है?" स्नेहा से ना रहा गया...

"कैसा?" विकी ने भोला बनते हुए कहा..

"ऐसा.. जैसा आज मेरे साथ किया है...!" स्नेहा ने अपना चेहरा दूसरी और घुमा लिया...

"उम्म्म.. नही..! कभी नही.." क्या झूठ बोला विकी ने!

"पता नही.. मुझे कैसा लग रहा है.. शरीर में कुच्छ अजीब सा महसूस हो रहा है.." स्नेहा अब भी नज़रें च्छुपाए हुए थी...

"कैसा.. कुच्छ गड़बड़ है क्या.. ? क्या हो गया सानू..?" विकी ने भोला बनते हुए कहा..." कहते हुए विकी ने उसके कंधे पर हाथ रख लिया...

" पता नही.. पर जब भी तुम मुझे छूते हो तो पता नही कैसा महसूस होता है....?"

"कहाँ..?"

"हर जगह... जहाँ भी छूते हो.. कहीं भी हाथ लगाते हो तो लगता है जैसे..." स्नेहा बीच में ही चुप हो गयी..

"कैसा लगता है? बताओ ना.. मुझे भी बहुत मज़ा मिलता है तुम्हे छ्छू कर.. तुम्हे भी मज़ा आता है क्या..?" विकी ने उसके कहने के मतलब को शब्द देने की कोशिश की....

"हूंम्म..." दूसरी और मुँह किए लेटी स्नेहा ने अपनी चिकनी जांघों के बीच जैसे कुच्छ ढ़हूंढा और अपनी जांघें कसकर भीच ली...

"छुओ ना एक बार और..! मज़ा आता है.. बहुत!"

"कहाँ पर.. बताओ...... बोलो ना..?" विकी ने कंधे पर रखा अपना हाथ सरका कर उसकी कमर पर रख दिया...

"जहाँ तब लगाया था...!"

"कब..?"

"अब बनो मत... जब मैं खड़ी थी.. अभी.. बाथरूम जाने से पहले..!" स्नेहा के मुँह से एक एक शब्द हया की चासनी में से छन कर बाहर निकल रहा था..

"यहाँ..?" कहकर विकी ने अपना हाथ कमर से उठाकर उसके गोल नितंब पर जमा दिया... उसकी हथेली स्नेहा की पॅंटी के किनारों को महसूस कर रही थी.. और उंगलियाँ हाथ लगते ही कस सी गयी उसकी मस्त गान्ड की दरारों के उपर थी...

"आआआः.... हाआँ.. " स्नेहा एकद्ूम से उचक कर कसमसा उठी...

"तुम्हारी 'ये' बहुत प्यारी है सानू!"

"क्या?" मुस्किल से अपने को संभालती हुई स्नेहा पूच्छ बैठी.. पता होने के बावजूद...

विकी समझा नाम पूच्छ रही है..," तुम्हारी.. गान्ड!"

"छ्ह्ही.. क्या बोल रहे हो..? मैने कोई नाम लेने को थोड़े ही बोला था..." नाम में भी क्या जादू था.. सुनते ही स्नेहा पिघलने सी लगी...

"सॉरी.. ये.." कहते हुए विकी ने उसके मोटे खरबूजे जैसे दायें नितंब पर अपने हाथ की जकड़न बढ़ा दी... रसीले आनंद की मीठी सी लहर स्नेहा में दौड़ गयी.. आनंद से दोहरी सी होकर उसने अपने नितंबों को कस लिया.. और ढीला छ्चोड़ दिया...

"अयाया.. बहुत मज़ा आ रहा है.. और करो ना..!" स्नेहा धीरे धीरे खुलती जा रही थी....

"मज़ा तो मुझे भी बहुत आ रहा है... तुम लोग इसको क्या बोलते हो???

"नही.. में नही लूँगी.. मुझे शरम आ रही है....!"

"शरम करने से क्या मिलेगा.. अगर नाम लोगि तो और मज़ा आएगा.. लेकर तो देखो.." विकी ने पॅंट के अंदर फदक रहे अपने 'यार' को मसल कर 'प्लान' की खातिर कुच्छ देर और सब्र करने की दुहाई दी..

"नही.. मुझसे नही होगा.. तुम ले लो.. मैं नही रोकूंगी.."

"क्या ले लूँ... इसका नाम?" कहते हुए विकी ने उंगलियों को कपड़ों के उपर से ही उसकी गांद की दरार में फँसा सा दिया.. और वहाँ पर हल्क हल्क कुच्छ कुरेदने सा लगा...

"अयाया.. बहुत मज़ा आ रहा है.. मैं तो मर ही जाउन्गि.. " कहते हुए स्नेहा ने अपनी गांद को और बाहर की और निकाल दिया.. लग रहा था जैसे वह बिस्तेर से उठाए हुए है...

"नाम लेकर तो देखो.. कितना मज़ा आएगा.." अब विकी का हाथ शरारत करते हुए स्कर्ट के नीचे घुस गया और पॅंटी के उपर से बारी बारी 'दोनो' को सहलाने लगा.. रह रह कर उसका हाथ स्नेहा की नंगी रानो को स्पर्श कर रहा था...

"ले लूँ..?" स्नेहा की साँसें फिर से तेज हो चली थी..," हँसना मत..!"

"हँसूँगा क्यूँ.. देखना फिर तुम्हे मैं एक सर्प्राइज़ दूँगा...!"

"उम्म्म.. हम होस्टल में इसको वो नही कहते.. हम तो......" स्नेहा की साँसे तेज होती जा रही थी...

"तो क्या कहती हो...?"

"बट्स!" स्नेहा ने बावली सी होकर अपनी गांद को पिछे सरका दिया.. विकी की तरफ.. वह हाथ को और भी अंदर महसूस करना चाहती थी...

"नही.. हिन्दी में बताओ..!" विकी का हाथ अब खुल चुकी जांघों के बीच खुला घूम रहा था.. पर पॅंटी के उपर से ही...

"वो.. हम बोलते नही हैं.. पर मुझे एक और नाम पता है.... हाई राम!" स्नेहा की जांघों में लगातार हुलचल हो रही थी...

"बताओ ना.. मज़ा आ रहा है ना..?"

"हां.. बहुत! इनको चू.. ताड़ भी कहते हैं ना...." स्नेहा नाम लेते हुए उस हालत में भी हिचक रही थी....

"हाए सानू.. मज़ा आया ना.. तुम्हारे मुँह से नाम सुनकर मुझे तो बहुत आया.." कहते हुए विकी अपनी एक उंगली को पॅंटी के उपर से ही योनि पर रगड़ने लगा...

"आ.. बहुत.. मज़ा आ रहा है... करते रहो.... आअहह.. मुंम्म्मी!"

"पर मज़ा तो आगे है.. अगर तुम इजाज़त दो तो!" विकी अपना हर शब्द नाप तौल कर बोल रहा था...

"हां.. करो ना.. प्लीज़.. मुझे और भी मज़ा चाहिए... कुच्छ भी करो.. मेरी जान ले लो चाहे.. पर ये तड़प सहन नही होती.. आआअहह.. तेज नही.. सहन नही होती.." स्नेहा बावरी सी हो गयी थी.... अचानक पलट कर विकी की छाती से चिपक गयी...

"चलो.. निकालो कपड़े..." विकी ने लोहा गरम देखकर चोट की...

"पर...........!" स्नेहा सब समझती थी.. हॉस्टिल में लड़कियों में अक्सर ऐसे किससे बड़े चाव से सुने सुनाए जाते थे.. पर ये राज उसने ना उगला,".. पर कपड़े निकाल कर क्या करोगे.. मुझे शरम आ रही है...!"

"शरमाने से क्या होगा?",विकी ने स्नेहा का हसीन चेहरा अपने हाथो में ले लिया," जब उपर से इतना आनंद आ रहा है तो सोच कर देखो... जब हमारे बदन बिना किसी पर्दे के एक दूसरे के शरीर से चिपकेंगे तो क्या होगा... शरम करोगी तो बाद में हम दोनो पछ्तायेन्गे... ना ही तुम्हे और ना ही मुझे फिर कभी ऐसा मौका मिलेगा... सोच लो.. मर्ज़ी तुम्हारी ही है...!"

स्नेहा पलकें झुकाए विकी की हर बात को अपने दिल के तराजू में तौल रही थी..," पर कुच्छ हो गया तो??"

"क्या होगा? कुच्छ नही.. तुम खम्ख्वह घबरा रही हो....!"

"बच्चा...!" कहते हुए स्नेहा की धड़कन तेज हो गयी...

"अरे.. बच्चा ऐसे थोड़े ही हो जाता है... तुम भी ना सानू....!" विकी मरा जा रहा था....

"पर मैने तो सुना है की जब लड़का और लड़की नंगे होकर 'कुच्छ' करते हैं तो बच्चा हो जाता है..." स्नेहा ने एक बार अपनी पलकें उठाकर विकी की आँखों के भाव परखे...

"हे भगवान.. कितनी भोली है तू... जब तक हम नही चाहेंगे.. बच्चा थोड़े ही होगा.. वो तो 'करने' से होता है..."

"क्या करने.. ओह.. लगता है मेरा मोबाइल बज रहा है... बॅग में..!" स्नेहा ने उतने की कोशिश की तो विकी ने उसको पकड़ लिया," रहने दे सानू.. बाद में देख लेंगे...

"नही... पापा का फोन हो सकता है.. मैं एक बार देखती हूँ..." कहकर स्नेहा उठकर टेबल के पास चली गयी," अरे हां.. पापा का ही है... क्या करूँ...?"

"फोन मत उठाना.. देख लो सानू.. मैने पहले ही कहा था.."

पर असमन्झस में खड़ी स्नेहा ने फोन उठा ही लिया और कान से लगा लिया," पापा...!" उसकी आँखों में कड़वाहट भरे आँसू आ गये.... उसने मुँह पर उंगली रख कर विकी को चुप रहने का इशारा किया.... और रूम से बाहर निकल गयी....

विकी का तो एकदम मूड ही ऑफ हो गया.. अब उसकी पोल खुलनी तय थी... ' साली का रेप ही करना पड़ेगा अब तो..' मन ही मन विकी उबल पड़ा.. जल्दी जल्दी में एक पटियाला पैग बनाया और अपने गले में उतार लिया...

"बेटी... कहाँ हो तुम... ठीक तो हो ना... मेरी तो जान ही निकाल दी तूने बेटी....." मुरारी की आवाज़ लड़खड़ा सी रही थी.. दारू के नशे में....

"जहाँ.. आपने भेजा है.. वहीं हूँ पापा... आपने एक बार भी ये नही सोचा...." स्नेहा की आवाज़ में रूखापन भी जायज़ था.. और गुस्सा भी....

"क्या??? तुम मोहन के साथ हो..... सच!" मुरारी के आसचर्या का ठिकाना ना रहा..

"मुझे 'किडनॅप' करने वालों ने तो बहुत कोशिश की.. पर मेरा 'मोहन' ही था जो मुझे सही सलामत बचा लाया..." स्नेहा ने 'किडनॅप' और 'मेरा मोहन' शब्दों पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिया.. पर मुरारी उसके व्यंगया को समझ ना पाया...

अपनी जवान बेटी के मुँह से ड्राइवर के नाम के साथ 'मेरा' शब्द जोड़ना मुरारी को गंवारा नही हुआ... किसी भी बाप को ना होता.. अपने दाँत पीसते हुए गुर्राया," कहाँ है वो हरामजादा.. बात कराना मेरी.. फोन भी ऑफ कर रखा है... मादार.. तू मेरी बात करा उस'से..."

स्नेहा खून का घूँट पीकर रह गयी.. उसको अपने पापा का गुस्सा अपनी असफलता पर खीज का परिणाम लगा..," वो इश्स वक़्त यहाँ नही है...? उसके फोन की बॅटरी ऑफ है..."

"पर तुमने भी फोन नही उठाया बेटी.. मैं यहाँ कितना परेशान हो रहा था.. "

"हां.. मेरा फोन साइलेंट पर था..." स्नेहा ने रूखा सा जवाब दिया...

"मेरी तो जान में जान आ गयी बेटी.. पर जो होता है अच्छे के लिए ही होता है.. तू कहाँ है अभी..?" मुरारी के दिमाग़ में भी इश्स 'किडनॅपिंग' की झूठी खबर से फ़ायदा उठाने की उठापटक चल पड़ी... उसने मीडीया को दिए अपने बयानों में मुखिया और विकी पर जो अनाप-शनाप आरोप लगाए थे.. अब उसकी किरकिरी होने वाली थी... अगर ये बात सामने आ गयी की किडनॅपिंग हुई ही नही...," बता ना बेटी.. कहाँ है अभी तू..."

"जहाँ पर भी हूँ... ठीक ही हूँ.. आप चिंता ना करें.. आपकी बेटी अब बड़ी हो गयी है.. सब समझती है..." स्नेहा के हर बोल में बग़ावत थी...

मुरारी को स्नेहा का अंदाज अजीब सा लगा.. पर इश्स वक़्त तो वो किन्ही और ही ख़यालों में खोया हुआ था...," ओके बेटा.. जहाँ भी है.. ऐश कर... बस एक बात का ध्यान रखना.. जब तक मैं ना कहूँ.. वापस मत आना.. और अपनी पहचान च्छूपा कर रखना..."

"आपने ऐसा क्यूँ किया पापा.. अपनी अयाशियों के लिए मुझे हमेशा घर से दूर रखा और अब कुर्सी के लिए मुझे ही दाँव पर लगा दिया..." स्नेहा कहते हुए भभक कर रो पड़ी...

मुरारी एक पल के लिए शर्मिंदा हो गया... पर राजनीति के उल्टे घड़े पर शरम का पानी कब तक ठहरता....," बेटी.... मैं तुम्हे सब समझा दूँगा.. बस ध्यान रखना मेरे कहे बिना वापस मत आना.. कहीं दूर निकल जा...!"

"मैं वापस कभी नही आउन्गि पापा..!" स्नेहा ने रोते हुए कहा और गुस्से में अपना फोन ज़मीन पर दे मारा... फोन टूट गया....

अपने आँसू पौंचछते हुए स्नेहा अंदर घुसी ही थी की विकी को देखकर चौंक पड़ी," ये... ये क्या कर रहे हो...?"

विकी जल्दी जल्दी आधी बोतल गटक चुका था.. अब वो अपना प्लान बदलने की तैयारी में था.. फोन से की गयी रेकॉर्डिंग उसने डेलीट कर दी थी...," दिखता नही क्या? शराब पी रहा हूँ..." स्नेहा को अब वह ऐसे घूर रहा था जैसे भाड़े पर लाया हो.....

स्नेहा को लगा वो नशे में बहक गया है.. ऐसा में उसको विकी का अजीबोगरीब जवाब भी बड़ा प्यारा लगा.. वह अपने आपको खिलखिलाकर हँसने से ना रोक सकी...

"हंस क्यूँ रही है...?" विकी को अब उस'से किसी अपनेपन की उम्मीद ना थी.. इसीलिए हैरान होना लाजिमी ही था... वह गिलास रखकर खड़ा हो गया...

"तुम्हारी शकल देखकर हंस रही हूँ.. लग ही नही रहा की तुम पहले वाले 'मोहन' हो.. ऐसे क्या देख रहे हो अब...? मैने पापा को नही बताया की हम कहाँ है.. और ना ही ये की मुझे तुमने सब कुच्छ बता दिया है... नाराज़ क्यूँ हो रहे हो.." कहते हुए स्नेहा अपने दोनो हाथ बाँधकर उसके सामने जाकर खड़ी हो गयी...

"क्या?.. बात हो गयी तुम्हारे पापा से... क्या कह रहे थे...?" विकी की जान में जान आ गयी..

स्नेहा मायूस हो गयी.. कुच्छ देर चुप रहकर बोली," कहना क्या था.. कह रहे थे.. जब तक मैं ना कहूँ.. वापस मत आना... तुम्हारा सोचना सही निकला मोहन.. वो मुझे 'यूज़' कर रहे हैं...."

" तो... तुमने क्या सोचा है फिर...?" विकी मॅन ही मॅन उच्छल पड़ा...

" मैं कभी वापस नही जाउन्गि... ?" स्नेहा ने अपने इरादे जता दिए....

" तो फिर?..... और कहाँ जाओगी..?" विकी ने उसको हैरानी से देखा...

स्नेहा कुच्छ ना बोली.. बस पलकें उठाकर विकी की आँखों में आँखें गढ़ा ली.. और जाने किस गहराई में उतर गयी... जैसे वहीं अपना संसार ढ़हूंढ रही हो...

काश विकी उसके दिल के इरादे जान गया होता," अब क्या हुआ...?"

" कुच्छ नही...!" स्नेहा ने हौले से कहा और आगे बढ़कर विकी की छाती से लिपट गयी.. अपनी दोनो बाहें उसकी कमर में डालकर...

शराब और शबाब से मस्त हो चुका विकी अब कहाँ चुप रहने वाला था.. अपने हाथो को स्नेहा के पिछे ले जाकर उसकी मस्त गांद को सहलाने लगा... स्नेहा ने सिर उठाकर विकी की आँखों में आँखें डाल ली... विकी भी बिना पालक झपकाए स्नेहा को देखते हुए उसकी गांद को दबाता हुआ उसको अपनी तरफ खींचने लगा... स्नेहा की साँसे विकी के फैफ़ड़ों से होती हुई उसके खून को गरम करने लगी.. स्नेहा पर एक बार फिर से मस्ती छाने लगी.. आँखें बंद होने लगी... जैसे ही विकी ने अपना सिर थोड़ा सा नीचे झुकाया; स्नेहा अपनी आइडियों के बल खड़ी हो गयी और होंठो के बीच की दूरी को नाप दिया....

अपने रसीले होंठों को विकी के होंठों में और 38" की उन्छुयि गांद को उसके हाथो बेदर्दी से रगडे जाने पर स्नेहा ज़्यादा देर तक आपे में ना रह सकी," उम्म्म्मम... आआआआहह!" अपने होंठों को बड़ी मुश्किल से विकी की 'क़ैद' से आज़ाद करा स्नेहा ने लुंबी और गहरी सिसकारी ल्ली.. विकी के हाथ उसकी स्कर्ट को उपर उठा उसकी पॅंटी में घुस चुके थे.. और विकी लगातार अपनी उंगलियों का जादू उसकी गांद की दरार में गहराई तक दिखा रहा था.. स्नेहा की टाँगें अपने आप ही खुल गयी थी..

अगले हिस्से में विकी के हथ्हियार की लंबाई को अपनी जांघों के बीच महसूस करके तो स्नेहा फिर से सातवें आसमान पर जा बैठही... वह उस'से 'खुद को बचाना भी चाहती थी.. और दूर भी नही होने देना चाहती थी.. विकी ने जैसे ही पिछे से उसकी गांद की फांकों में अपने हाथ फँसा कर उसको उपर खींचा तो वह फिर से एडियीया उठाने को मजबूर हो गयी... साँसों की गर्माहट और सिसकियों की कसमसाहट बढ़ती ही जा रही थी... विकी ने उसको इसी हालत में उपर उठा लिया और ले जाकर बेड पर लिटा दिया.. स्नेहा की आँखें खुल ही नही पा रही थी.. बेड पर गिरते ही उससने अपने हाथ पीछे फैला दिए .. स्कर्ट उपर उठी हुई थी और नीले रंग की पॅंटी में छिपि कामुक तितली का मादक आकार उपर से ही स्पस्ट दिखाई दे रहा था...

"मज़ा आ रहा है ना.." विकी अपने हाथ से स्नेहा की जांघों को सहलाने लगा..

बदहवास सी स्नेहा के होंठों पर तेर गयी कमसिन मुस्कुराहट ने जवाब दिया.. स्नेहा ने टाँगें चौड़ी करके जांघें खोल दी.. खुला निमंत्रण था....

विकी उसकी जांघों पर झुक गया और अपने होंठ पॅंटी के किनारे जाँघ पर टीका दिए....

"उफफफफफ्फ़... क्या.. कर्रहे.. हो.. मैं मर जाउन्गि..." स्नेहा तड़प उठी... स्नेहा बीच भंवर में फाँसी हुई थी... हर पल में इतना आनंद था की पिछे हटने के बारे में सोचा ही नही जा सकता था... और पहली बार के इश्स अनोखे आनंद को समेटना भी मुश्किल था... स्नेहा ने सिसकते हुए अपनी जांघें कसकर भींच ली....

पर विकी कहाँ मान'ने वाला था.. हूल्का सा ज़ोर लगाकर उसने स्नेहा की जांघों को पहले से भी ज़्यादा खोल दिया.. पॅंटी फैल गयी और उसके साथ ही स्नेहा की चिकनी पतली उँच्छुई चूत के आकर में भी परिवर्तन सा आ गया.. चूत के होंठ थोड़े से फैल गये लगते थे...," आह मम्मी.. मर गयी.."

लगभग मर ही तो गयी थी स्नेहा.. जालिम विकी ने पॅंटी के उपर से ही चूत के होंठों पर अपने होंठ रख कर जैसे उसके शरीर के अंग अंग को फड़कने पर मजबूर कर दिया... स्नेहा की साँसे जैसे रुक सी गयी.. आँखें पथ्राने सी लगी.. पर जांघें और ज़्यादा खुल गयी... अपनी मर्ज़ी से! और एक लुंबी साँस के साथ उसके होंठों से निकले," हयीईएय्य्ये मोहाआन्न्न्न्न्न.. मार गेयीयियीयियी मुम्म्म्म्म..."

आँखों और होंठों से पहले विकी की उंगली ने उस लज़ीज़ रसीली और हुल्के बालों वाली रस से सराबोर योनि को छुआ... विकी ने एक उंगली पॅंटी में घुसा दी.. स्नेहा की चूत गीली होकर भी प्यासी लग रही थी.. मर्द की च्छुअन से स्नेहा के रौन्ग्ते खड़े हो गये.. इतना आनंद.. !

"निकाल दूं..?" विकी ने उपर उठकर स्नेहा के चेहरे की और देखा..

नेकी और पूच्छ पूच्छ.. स्नेहा तो कब से नंगी होने को तैयार हो चुकी थी.. बिना कुच्छ बोले ही उसने अपनी फैली हुई जांघों को समेटकर अपने 'चूतड़' उपर उठा दिए.. इस'से बेहतर जवाब वो क्या देती..

विकी ने भी एक पल की भी देरी ना की.. दोनो हाथों से पॅंटी को निकल कर उसको अनावृत कर दिया...

लड़कियों के मामले में रेकॉर्ड बना चुके विकी के लिए यह पहला अनुभव था.. स्नेहा को बाहर से देखकर उसने उसके अंगों की जो कीमत आँकी थी.. उस'से कयि गुना लाजवाब थी.. स्नेहा की.....! इतनी करारी चूत को देखते ही विकी मर मिटा. स्नेहा को आगे खींच कर उसकी जांघों को बेड के किनारे लेकर आया और फर्श पर घुटने टेक दिए और वहाँ..... अपने होंठ!

स्नेहा का तो बुरा हाल पहले ही हो चुका था.. अब तो उसकी होश खोने की बारी थी... नीचे की सिहरन उसकी रसीली चुचियों तक जा पहुँची.. मस्त मस्त आवाज़ें निकालती हुई स्नेहा अपनी चूचियों को अपने ही हाथो से मसल्ने लगी...

"हाए.. मैं इनको कैसे भ्हूल गया..." कहते हुए विकी ने स्नेहा को फर्श पर खड़ी कर दिया और पूरी 10 सेकेंड भी नही लगाई उसको जनम्जात जैसी करने में.. अपने पैरों पर स्नेहा उतने टाइम भी खड़ी ना रह सकी... विकी की बाहों में झहूल गयी...

"ओह्ह्ह.. कितनी प्यारी हैं..." विकी के मुँह से अनायास ही निकल गया.. जब उसने स्नेहा की चूचियों को छ्छू कर देखा.... उनका आकार नागपुरी संतरों जैसा था.. मोटी मोटी.. नरम नरम.. तनी तनी!

विकी ने स्नेहा को फिर से उसी अंदाज में लिटा दिया.. लिटाने पर भी उभार ज्यों के त्यों थे.. अपने हाथो से उन्न फलों को हूल्का हूल्का मसल्ते हुए वो उस कच्ची कली का रस चूसने लगा...

सब कुच्छ स्नेहा के बर्दास्त से बाहर हो चुका था.. वह रह रह कर अपनी गांद को उचका रही थी.. और रह रह कर अपनी जांघों को भींच लेती.. जब सहन करना मुश्किल हो जाता...

जी भरकर जीभ से चूत को चाटने के बाद विकी फिर से उंगली को उसकी फांकों के बीच लेकर आया.. और उनके बीच उंगली को आगे पिछे करके योनि छिद्रा तलाशने लगा...

हर पल स्नेहा को एक नया अनुभव हो रहा था.. पहले से ज़्यादा मीठा.. और पहले से ज़्यादा मस्ती भरा.. अचानक स्नेहा हूल्का सा उच्छली.. उसने सिर उठाकर देखा.. उंगली ने 'ओम गणेशाय नमः:' कर दिया था.. आधी उंगली बाहर थी.. आनंद के मारे पागल सी हो चुकी स्नेहा कोहनी बेड पर टीका कर उपर उठ गयी और बड़े चाव से उंगली को धीरे धीरे आते जाते देखने लगी... उसका सारा बदन साथ ही झटके खा रहा था.. चूचियाँ..दायें बायें और उपर नीचे हो रही थी.. स्नेहा की आँखों में उसके बदन की बढ़ती प्यास आसानी से महसूस की जा सकती थी..

चूचियों को इश्स कदर मस्ती से झ्हूम्ते देख विकी खुद को रोक ना पाया.. उंगली को 'अंदर' ही रखते हुए वह आगे झुका और उसकी बाई चूची के नन्हे से गुलाबी निप्पल को अपनी जीभ से एक बार चाटा और होंठो में दबा लिया...

"आआआअहह... मुझे... इतने.. मज़े क्यूँ. आअ रहे हैं... मोहन.. तुम्हे भी आ रहे हैं क्या... मुझे पता नही क्या हो रहा है.. "

" हाँ जान.. मुझे भी हो रहा है... तुम सच में सबसे निराली हो... सबसे प्यारी.." विकी ने अपनी उंगली निकाल ली.. और अपनी शर्ट निकाल कर अपनी पॅंट उतारने लगा...

स्नेहा शर्मा गयी और लेट कर अपनी आँखें बंद कर ली.. उसको पहली बार उसका दीदार होने वाला था.. जिसके बारे में अक्सर लड़कियों में चर्चा होती थी... होस्टल में... स्नेहा को आज 'उसका हिस्सा' मिलने वाला था...

"क्या हुआ..?" विकी ने मुस्कुराते हुए शर्मकार आँखें बंद किए और जांघों को भीचे लेटी हुई स्नेहा से पूचछा..

पोच्छने पर स्नेहा और भी शर्मा गयी और पलट कर उल्टी लेट गयी...

क्या सीन था.. पतली नाज़ुक सी कमर से नीचे किसी गुंबद की तरह उठी हुई गांद की फाँकें और उनके बीच कसी हुई सी आकर्षक दरार.. पहले ही 7.5" हो चुके विकी के लंड ने एक और अंगड़ाई ली.. और अंडरवेर का एलास्टिक उसके पेट से दूर हो गया.. वो तना ही इतना हुआ था की अगर अंडरवेर को चीर भी देता तो कोई ताज्जुब की बात नही होती...

विकी ने उसकी जांघों पर हाथ रखकर प्यार से सहलाते हुए उसकी गांद पर ले आया और फिर आगे झुकते हुए स्नेहा की गर्दन पर एक चुंबन देकर उसके साथ लेट गया.. स्नेहा के स्मनान्तर..

" क्या हुआ.. शर्मा क्यूँ रही हो.." विकी ने उसके कान के पास अपने होंठ लेजाकार कामुकता से कहा..

स्नेहा ने जवाब फिर भी नही दिया.. अचानक पलटी और विकी की छाती में अपना चेहरा घुसा दिया.. और सिमट कर अपने आपको विकी में ही छिपाने की कोशिश करने लगी...

"आँखें खोलो... देखो तो सही.. क्या दिखाता हूँ..." विकी ने हंसते हुए स्नेहा से कहा...

"नही.. मुझे नही देखना..." स्नेहा को मानो डर लग रहा हो.. इश्स अंदाज में बोली..

"अब ये तो चीटिंग है... मैं कब से तुम्हारी सेवा कर रहा हूँ.. और तुम देख भी नही सकती...." विकी ने उलाहना सा दिया..

"पर्ररर... तुम्हे पता है ना.. मुझे शरम आ रही है...." स्नेहा हल्के से बुदबुदाई...

"ऐसे शरमाती रहोगी तो... बाद में पछ्ताओगि... सोच लो..."

"ओकके.. हुन्हु... क्या देखना है.. बताओ...?" शरारत भरी आवाज़ में स्नेहा ने आँखें खोलकर विकी की आँखों में झाँका...

"यही.. जो तुम्हे प्यार सिखाएगा... और मज़े भी देगा..." विकी ने स्नेहा का हाथ पकड़ कर अंडरवेर की साइड से अंदर घुस्वा दिया....

" ओह्ह गॉड.. इतना मोटा!" लाजाते हुए भी स्नेहा अपने आपको ना रोक पाई.. अपने आसचर्या को ज़ुबान तक लाने में...

" इतनी हैरान क्यूँ हो.. लगता है.. तुम्हे पता है.. इसका क्या करते हैं... एक्सपीरियन्स है क्या..?" विकी ने यूँही मज़ाक में कह दिया...

स्नेहा ने गुस्सा सा दिखाते हुए अपने कोमल हाथ का घूँसा बनाकर विकी की छाती में दे मारा..," ओये.. मेरी कौनसा शादी हुई है...?"

"शादी तो अब भी नही हुई है..... फिर?" विकी ने उसकी चूची को अपने हाथ में दबा लिया....

" हो जाएगी...! तुम मुझे जानते नही हो.." स्नेहा ने तो यही सोचा होगा की मोहन तो उस'से शादी करके अपने आपको खुशकिस्मत ही समझेगा....

जाने क्यूँ विकी इश्स बात पर अपनी नज़रें चुराने लगा.. उसने बात बदल दी," तो तुम्हे पता है.. इसका क्या करते हैं..."

"हूंम्म!" स्नेहा अब अपने आपको थोड़ा सहज पा रही थी.. अपने दिल की बात कह कर... वह बड़े प्यार से बिना शरमाये अंडरवेर के अंदर ही विकी के लंड को सहला रही थी...

"इसको इसमें डालते हैं" स्नेहा ने दूसरा हाथ अपनी जांघों पर रख दिया...

"तो डालूं...?" विकी ने जैसे ही अपना अंडरवेर निकाला.. 'लंड' तन्ना कर स्नेहा के हाथ से छ्छूट गया...

" नही.. अभी नही.. बच्चा हो जाएगा.. मुझे पता है.. इसमें डालने से ही बच्चा बनता है......"

" ये भी कोई बात हुई.. तुम्हे आधा पता है.. और आधा नही..." विकी घुटनो के बल बैठ गया..उसका लंड अब ठीक स्नेहा की आँखों के सामने हिलौरे ले रहा था.... स्नेहा ने आँखें बंद करके उसको फिर हाथ में पकड़ लिया," अच्च्छा जी.. क्या नही पता...?"

"सिर्फ़ डालने से बच्चा नही होता.. खैर छ्चोड़ो.. मुँह में ले सकती हो ?"

"मुँह में.... ये कोई कुलफी है जो मैं मुँह में लूँगी... कहकर स्नेहा हुँसने लगी... उसने आँखें खोल दी थी.. और बड़े प्यार से लंड के चिकने सूपदे को देख रही थी....

"लेकर तो देखो... अगर अच्च्छा ना लगे तो कहना..."

"तुम्हे कैसे पता.. कोई एक्सपीरियन्स है क्या?" स्नेहा ने हंसते हुए उसी की टोन में पूचछा...

"न्न्नाही.. ववो.. दोस्त बता देते हैं ना.. लड़कियों को क्या क्या अच्च्छा लगता है...."

"पर मुझे तो नही बताया.. मेरी सहेलियों ने..." हालाँकि उसकी तरफ निहारते हुए स्नेहा के मुँह में पानी आ चुका था...

" यार.. तुम लेकर तो देखो.. कह तो रहा हूँ.. निकाल देना.. अगर अच्च्छा ना लगे तो.." कहकर विकी उसकी छाती के दोनो ओर पैर करके आगे की और झुक कर बैठ गया.. अब स्नेहा के होंठों और विकी के 'औजार' में इंच भर का फ़र्क था

...

 


hello dosto main yani aapka dost raj sharma fir haajir hun part -39 lekar ab aage ki kahaani .......

Sneha ki jagah uski madak saanson se jawaab milta dekh Vicky bekaabu ho gaya," agar main tumhe chhoo loon toh tumhe koyi dikkat toh nahi hai.....

Chhoo toh rakha tha.. aur kaise chhuna chahta hai.. sunkar Sneha ka ang ang charmara uthha... boli kuchh nahi; bus apne hath se upar sarkati ja rahi skirt ki silwatein door ki aur sharam se nihal hokar apna chehra takiye mein chhupa liya... ye adaa... ishara hi toh tha!

"bol na... ab kyun sharma rahi hai... main tumhe pasand hoon na?" sab kuchh jaante huye bhi Vicky abhi tak bhi sanyam ka parichay de raha thha...

"Mujhe nahi pata... gudgudi ho rahi hai...!" lajja aur shukoon ki gahri saans chhodte huye Sanu ek dum simat si gayi aur apni upar wali taang ghutne se mod kar aagey ki taraf kheench li...

ufffff... aisa karne se ek achchhe khhase tarbooj ke beech ki ek faank nikal dene jaise aakar ke uske golakar nitamb ubhar aaye... 2 minute pahle hi kheench kar jabardasti neeche ki gayi uski skirt fir se sikud gayi... vicky ka dumdaar hathhiyaar sahi jagah se thhoda sa pichhe buri tarah tannaya huaa tainaat thha...

vicky uski gori jaanghon se aur upar ka didar karne ko lalayit ho uthha... tarika ek hi tha.. apna takiya uthhaya aur Sneha ke pairon ki aur rakhkar late gaya..," main uss taraf late raha hoon... idhar baju mein dard ho raha hai..."

uss waqt Vicky ke dusri aur sir karke laitne ka asli karan Sneha na samajh payi... chubhan ka meethha ahsaas achanak gayab hone se Sneha tadap si uthhi.. sir uthhakar ek baar vicky ko ghoor kar dekha; fir gussa sa dikhati huyi apne sir ko jhatak kar wapas late gayi.....

Skirt ke neeche se lumbi, gadraayi, gori aur mansal jaanghon ki gahraayi mein jhankte hi vicky ke chehre par jo bhav ubhare wo anayas hi kisi andhhe ko dikhne lag jaye; aise thhe.. aankhein bahar nikal kar girne ko ho gayi..," ummmm.. main isko chhodne ki soch raha thha.. hey ram!" Vicky mann hi mann budbudaya...

ghutna muda hone ki wajah se Sneha ki skirt ke neeche pahni huyi safed panty ka sapast deedar ho raha tha.. janghon se chipki huyi panty par beechon beech ek chhota sa gulabi fool bana hua thha.. jo geela hokar aur bhi gadhi rangat pa chuka tha.. nichle hisse mein panty yoni ki faankon ka hubahu aakar pradrashit kar rahi thi... uttejna ke karan dono faankein akadi huyi si thhi... aur panty unke beech hulki si gahrayi liye huye thhi...

" Sneha!" Vicky larajti huyi si aawaj mein bola...

Sneha ne koyi uttar na dia...

Vicky panty ke utaar chaadhvon mein itna uljha huaa thha ki dobara pukaarna hi bhhool gaya....

"kya hai?" vicky ki taraf se fir aawaj aane ki prateeksha karke kareeb 3-4 minute ke baad achanak Sneha baith gayi," Bolo na.. kyun pareshan kar rahe ho...

"kkuchh nahi... kya..." Vicky ko laga jaise uski chori pakdi gayi ho.... jaise abhi daant padegi... pyar bhari...

"kyun.. abhi toh pukara thha.. mera naam...!" thhode se jhijhakte huye Sneha ne bhi apna sir vicky ki aur hi kar liya aur late gayi.......

"Bolo na! Kya kah rahe thhe mohan?" Sneha ne apna hathh vicky ke hath par rakh diya..

"kuchh nahi... Bus... Pata nahi kyun bechaini si ho rahi hai... Neend nahi aa rahi.." Vicky ne apne hath ko chhudane ki iss baar katai koshish nahi ki..

"hummmm.. Main kuchh karoon...?" Vicky ki najron ko apne andar ghusne ki koshish karte dekh Sneha baag baag ho gayi..," i mean... Sir daba doon.. Ya kuchh aur"

Baton hi baton mein sneha ne apna ghutna aagey karke vicky ki jaangh se sata diya... Ghutne se kareeb 4 inch upar Sneha ki jaangh par kala sa til thha...

"nahi.. Kuchh nahi.. Ek baat bolun Sanu!" vicky ki aawaj mein ajeeb si khumari bhar gayi thhi...

"puchhte kyun ho? Kuchh bhi bolo na...!" Sneha ki halat bhi bus dawadoul hi thi.. Bus ishara karne ki der thhi...

"ummmmm..." vicky ne baat kahne se pahle poora samay liya," tumhari jaanghein bahut sundar hain... Ab meri kya galati hai jo main wahan inko chhoone se apne aapko rok nahi paya...

Dil mein toh Sneha ke bhi kuchh aise hi armaan thhe.. Par Vicky ko seedha hamla karte dekh wo hadbada gayi... Bina waqt ganwayein hath neeche le jakar apni skirt ko neeche kheenchne ki koshish ki.. Par wah toh thhi hi chhoti... Apni amanat ko chhupa pane mein safal na hone par Sneha ne apna hath upar lakar Vicky ki aankhon par rakh diya," Aise kyun dekh rahe ho! Mujhe sharam aa rahi hai..." aur apna hath wahin rakhe rahi.. Vicky ne bhi hatan ki koshish na ki.. Uske honton par ajeeb si muskaan tair gayi.....

"kya hai?" vicky ko hanste dekh sneha poochh baithhi," ab hans kyun rahe ho?"

"main tumhe samajh nahi paya Sanu.. Ek taraf toh tum itni bold ho.. Aur dusri taraf itni sharmili.. Itni....." Vicky bola....

"aey.. Main koyi sharmili warmili nahi hoon.. Haaaaan! Main toh badi munhfat hoon.. Jo ji main aaye kah deti hoon.. Jo ji main aaye kar leti hoon... Main kisi baat se nahi darti... Samjhe misterrrrrr..!"

"achchha.. Aisa hai toh mere lips par kiss karke dikhao... Maan loonga ki tum sharmili nahi ho..!" vicky ne pasa fainka...

Sneha ko toh maano mann maangi murad mil gayi.. Kitni der se uske hont apni mithhas baantne ko vyakul thhe.. Pyaasey thhe.. Par uske liye pahal karna aasan bhi nahi thha....," Yun main itni besharm bhi nahi hoon...!" Vicky ki aankhon par uske komal hathhon ka parda hone ke bawjood wah apni aankhein khuli na rakh payi.. Par aawesh mein uske daanton ne neeche wale hont ko kaat khaya....

"ismein besharam hone wali kya baat hai.. Agar main tumhe achchha lagta hoon.. Aur tum itni bold ho toh itna toh kar hi sakti ho.." vicky ke honton par ab bhi shararati muskaan tair rahi thhi....

"Tummm.... Tum kar lo.. Baat toh ek hi hai..!" kahkar Sneha ne vicky ke chehre se hath hataya aur sharam se gulabi ho chuke apne chehre ko dhak liya...

"Main.. Main toh kuchh bhi kar sakta hoon.. Mera kya hai.. Main toh mard hoon...!" vicky ne kaha aur apne hath se pakadkar uske haathhon ko chehre se juda kar diya...

Sneha ki saanson mein garmi aani ek baar fir shuru ho gayi thhi... Aankhein band thhi.. Aur hont dhheere dhheere kaanp rahe thhe," Toh kar ke dikhao na.."

Ab Vicky kahan sharmata.. Jhat se apna chehra aagey kiya aur Sneha ka upar wala hont apne honton mein daba liya.. Aur choosne laga.. Sneha ki halat kharaab ho gayi.. Saanse dhhoukni ki tarah chalne lagi.. Aakhir mein jab sharam aur sanyam ki sari hadein paar ho gayi toh sneha ke hath apne aap Vicky ke chehre par chale gaye aur usne Vicky ke neeche wale hont ko apne honton mein daba liya... aur apni pakad majboot karti chali gayi...

Bahut hi rasbhara drishya thha.. Honton ko ek dusre ki kaid mein liye vicky aur sneha har pal pagal se hote chale gaye.. Jaise sab kuchh aaj hi nichod lenge.. Sneha ki taang kisi aneichhik maanspeshi ki tarah kaam karti huyi Vicky ki kamar par chadh gayi.. Dono ek dusre se jonk ki mafik chipke huye thhe.. Sneha ki chhatiyan vicky ki thhos chhati mein gadi huyi thi.. Par iss waqt kisi ko honton se hi fursat nahi thhi...

Achanak Sneha ko laga jaise wah kahin unchayi se neeche gir rahi hai.. Uska sara badan sukhe patte ki tarah kaanp uthha aur mahsoos hua jaise uska peshab nikal gaya...

Kahin dusre lok ki sair karke wapas aayi Sneha ekdum se dheeli pad gayi aur ek jhatke ke sath vicky se door ho gayi...

Wah seedhi ho gayi thhi.. Taangon ko ek dusri ke upar chadhha liya thha.. Aur apni chhatiyon par hath rakhkar unko shant karne ki koshish kar rahi thhi...

Wah kuchh na boli.. 4-5 minute ke aseem lumbe intzaar ke baad Vicky ko hi chuppi todni padi..," Kya huaa..?"

"kuchh nahi..ek minute" Sneha ne kaha aur uthhkar bathroom mein chali gayi...

Vicky isi taak mein thha.. Jhat se apna fone video recording par set kiya aur bed ki taraf adjust karke table par ash-tray ke sath rakh diya...

Sneha kareeb 7-8 minute baad wapas aayi... Bahar nikli toh vicky usko dekhkar muskura raha thha...

"Kya hai.. ? Kyun hans rahe ho?" Sneha ne apne bag ko tatoltey huye poochha...

Bag se 'kuchh' nikal kar wapas ja rahi Sneha ka vicky ne hath pakad liya," Kya le ja rahi ho.. Yun chhupa kar"

"kuchh nahi.. Chhodo na.." Sneha ne dusra hath apni kamar ke pichhe chhupa liya..," Chhodo na.. Pls!"

"Batao toh sahi.. Aisa kya hai..?" Vicky ne usko apni taraf kheench kar uske dusre hath ko pakadne ki koshish ki...

"aaah.." siskari Sneha ke mukh se nikli thi.. Vicky ne uske hath ko pakdne ki koshish mein anjane mein hi nitamb pakad liya.. Pahle se hi kamatur Sneha ke nitamb thhirak uthhe.. Wasna uske chehre par uski aah ke sath chhalak uthhi.. Geeli ho chuki panty ko wo bathroom mein nikal aayi thhi.. Isliye sparsh aur bhi adhik anandkari raha... Hathon mein jaise jaan bachi hi nahi aur pahan-ne ke liye lekar ja rahi 'dusri' panty uske hath se chhut kar farsh par ja giri...

"ohh.. Sorry!" kahkar Vicky ne apna hath ek dum wapas kheench liya.. Par karaare nitamb ki garmi usko ab bhi mahsoos ho rahi thi... Farsh par padi panty ko dekhte hi usko majra samajhne mein der na lagi..," Sorry.. Wo.. Main..."

Aagey Sneha ne uski kuchh na suni.. Sharmayi aur sakuchayi si sneha ne jhuk kar apni panty uthhayi aur bathroom mein bhag gayi...

Wapas aane par bhi wah lajayi huyi thi.. Dono ko pata tha.. Ab sab kuchh hokar rahega.. Par Vicky inn palon ko record kar rahe hone ki wajah se sneha ki pahal ka intjaar kar raha thha... Aur Sneha sharm ki chadar mein lipti Vicky ka intjaar karti rahi... Apna 'ghoonghat' uthhwane ke liye.. Yunhi kareeb 15 minute aur beet gaye...

"Tumne aaj se pahle kisi ladki ko aise kiya hai?" Sneha se na raha gaya...

"Kaisa?" Vicky ne bhola bante huye kaha..

"Aisa.. Jaisa aaj mere sath kiya hai...!" Sneha ne apna chehra dusri aur ghuma liya...

"ummm.. Nahi..! Kabhi nahi.." Kya jhoothh boli vicky ne!

"Pata nahi.. Mujhe kaisa lag raha hai.. Shareer mein kuchh ajeeb sa mahsoos ho raha hai.." Sneha ab bhi najrein chhupaye huye thhi...

"Kaisa.. Kuchh gadbad hai kya.. ? Kya ho gaya sanu..?" Vicky ne bhola bante huye kaha..." kahte huye Vicky ne uske kandhe par hath rakh liya...

" pata nahi.. Par jab bhi tum mujhe chhoote ho toh pata nahi kaisa mahsoos hota hai....?"

"kahan..?"

"har jagah... Jahan bhi chhoote ho.. Kahin bhi hath lagate ho toh lagta hai jaise..." Sneha beech mein hi chup ho gayi..

"kaisa lagta hai? Batao na.. Mujhe bhi bahut maja milta hai tumhe chhoo kar.. Tumhe bhi maja aata hai kya..?" vicky ne uske kahne ke matlab ko shabd dene ki koshish ki....

"hummm..." dusri aur munh kiye leti Sneha ne apni chikni janghon ke beech jaise kuchh dhhoondha aur apni jaanghein kaskar bheech li...

"chhuo na ek baar aur..! Maja aata hai.. Bahut!"

"Kahan par.. Batao...... Bolo na..?" Vicky ne kandhe par rakha apna hath sarka kar uski kamar par rakh diya...

"jahan tab lagaya thha...!"

"kab..?"

"ab bano mat... Jab main khadi thhi.. Abhi.. Bathroom jane se pahle..!" Sneha ke munh se ek ek shabd haya ki chasni mein se chhan kar bahar nikal raha thha..

"Yahan..?" Kahkar Vicky ne apna hath kamar se uthhakar uske gol nitamb par jama diya... Uski hathheli Sneha ki panty ke kinaron ko mahsoos kar rahi thhi.. Aur ungaliyan haath lagate hi kas si gayi uski mast gaand ki daraaron ke upar thhi...

"aaaaah.... Haaan.. " Sneha ekdum se uchak kar kasmasa uthhi...

"Tumhari 'ye' bahut pyari hai Sanu!"

"kya?" Muskil se apne ko sambhalti huyi Sneha poochh baithhi.. Pata hone ke bawjood...

Vicky samjha naam poochh rahi hai..," Tumhari.. Gaand!"

"Chhhii.. Kya bol rahe ho..? Maine koyi naam lene ko thhode hi bola thha..." naam mein bhi kya jaadu thha.. Sunte hi Sneha pighalne si lagi...

"Sorry.. Ye.." kahte huye Vicky ne uske motey kharbooje jaise dayein nitamb par apne hath ki jakadan badha di... Rasiley aanand ki meethhi si lehar Sneha mein doud gayi.. Anand se dohri si hokar usne apne nitambon ko kas liya.. Aur dheela chhod diya...

"aaaah.. Bahut maja aa raha hai.. Aur karo na..!" Sneha dheere dhheere khulti ja rahi thhi....

"Maja toh mujhe bhi bahut aa raha hai... Tum log isko kya bolte ho???

"nahi.. mein nahi loongi.. Mujhe sharam aa rahi hai....!"

"Sharam karne se kya milega.. Agar naam logi toh aur maja aayega.. Lekar toh dekho.." Vicky ne pant ke andar fadak rahe apne 'yaar' ko masal kar 'plan' ki khatir kuchh der aur sabra karne ki duhayi di..

"nahi.. Mujhse nahi hoga.. Tum le lo.. Main nahi rokungi.."

"kya le loon... Iska naam?" kahte huye Vicky ne ungaliyon ko kapdon ke upar se hi uski gaand ki daraar mein fansa sa diya.. aur wahan par hulke hulke kuchh kuradne sa laga...

"aaaah.. Bahut maja aa raha hai.. Main toh mar hi jaaungi.. " kahte huye Sneha ne apni gaand ko aur bahar ki aur nikal diya.. Lag raha thha jaise wah bister se uthhaye huye hai...

"Naam lekar toh dekho.. Kitna maja aayega.." ab vicky ka hath sharaarat karte huye skirt ke neeche ghus gaya aur panty ke upar se bari bari 'dono' ko sahlaane laga.. Rah rah kar uska hath sneha ki nangi raano ko sparsh kar raha thha...

"le loon..?" Sneha ki saansein fir se tej ho chali thhi..," Hansna mat..!"

"Hansoonga kyun.. Dekhna fir tumhe main ek surprise doonga...!"

"ummm.. Hum hostal mein isko wo nahi kahte.. Hum toh......" Sneha ki saanse tej hoti ja rahi thhi...

"toh kya kahti ho...?"

"butts!" Sneha ne bawli si hokar apni gaand ko pichhe sarka diya.. Vicky ki taraf.. Wah hath ko aur bhi andar mahsoos karna chahti thhi...

"nahi.. Hindi mein batao..!" Vicky ka hath ab khul chuki jaanghon ke beech khula ghhoom raha thha.. Par panty ke upar se hi...

"Wo.. Hum bolte nahi hain.. Par mujhe ek aur naam pata hai.... hai raam!" Sneha ki jaanghon mein lagataar hulchal ho rahi thhi...

"batao na.. Maja aa raha hai na..?"

"Haan.. Bahut! Inko chu.. tad bhi kahte hain na...." Sneha naam lete huye uss halat mein bhi hichak rahi thhi....

"haye Sanu.. Maja aaya na.. Tumhare munh se naam sunkar mujhe toh bahut aaya.." kahte huye Vicky apni ek ungali ko panty ke upar se hi yoni par ragadne laga...

"aah.. Bahut.. Maja aa raha hai... Karte raho.... Aaahhhh.. Mummmmy!"

"par maja toh aagey hai.. Agar tum ijajat do toh!" Vicky apna har shabd naap toul kar bol raha thha...

"haan.. Karo na.. Pls.. Mujhe aur bhi maja chahiye... kuchh bhi karo.. Meri jaan le lo chahe.. Par ye tadap sahan nahi hoti.. Aaaaahhh.. Tej nahi.. Sahan nahi hoti.." sneha bawri si ho gayi thhi.... Achanak palat kar vicky ki chhati se chipak gayi...

"chalo.. Nikalo kapde..." Vicky ne loha garam dekhkar chot ki...

"par...........!" Sneha sab samajhati thhi.. Hostel mein ladkiyon mein aksar aise kisse bade chav se sune sunaye jaate thhe.. Par ye raaj usne na ugla,".. Par kapde nikal kar kya karoge.. Mujhe sharam aa rahi hai...!"

"Sharmaane se kya hoga?",Vicky ne Sneha ka haseen chehra apne hathhon mein le liya," Jab upar se itna aanand aa raha hai toh soch kar dekho... Jab hamare badan bina kisi pardey ke ek dusre ke shareer se chipkenge toh kya hoga... Sharam karogi toh baad mein hum dono pachhtaayenge... Na hi tumhe aur na hi mujhe fir kabhi aisa mouka milga... Soch lo.. Marzi tumhari hi hai...!"

Sneha palkein jhukaye Vicky ki har baat ko apne dil ke taraaju mein toul rahi thhi..," par kuchh ho gaya toh??"

"kya hoga? Kuchh nahi.. Tum khamkhwah ghabra rahi ho....!"

"bachcha...!" Kahte huye Sneha ki dhadkan tej ho gayi...

"arey.. Bachcha aise thhode hi ho jata hai... Tum bhi na sanu....!" Vicky mara ja raha thha....

"par maine toh suna hai ki jab ladka aur ladki nangey hokar 'kuchh' karte hain toh bachcha ho jata hai..." Sneha ne ek baar apni palkein uthhakar vicky ki aankhon ke bhav parkhe...

"Hey bhagwan.. Kitni bholi hai tu... Jab tak hum nahi chahenge.. Bachcha thhode hi hoga.. Wo toh 'karne' se hota hai..."

"kya karne.. Oh.. Lagta hai mera mobile baj raha hai... Bag mein..!" Sneha ne uthhne ki koshish ki toh Vicky ne usko pakad liya," Rahne de Sanu.. Baad mein dekh lenge...

"nahi... Papa ka fone ho sakta hai.. Main ek baar dekhti hoon..." kahkar Sneha uthhkar table ke paas chali gayi," Arey haan.. Papa ka hi hai... Kya karoon...?"

"Fone mat uthhana.. Dekh lo sanu.. Maine pahle hi kaha thha.."

Par asamanjhas mein khadi Sneha ne fone uthha hi liya aur kaan se laga liya," Papa...!" Uski aankhon mein kadwahat bhare aansoo aa gaye.... Usne munh par ungali rakh kar Vicky ko chup rahne ka ishara kiya.... aur room se bahar nikal gayi....

Vicky ka toh ekdum mood hi off ho gaya.. Ab uski pol khulni tay thhi... ' sali ka rape hi karna padega ab toh..' man hi man Vicky ubal pada.. Jaldi jaldi mein ek patiyala paig banaya aur apne gale mein utaar liya...

"Beti... Kahan ho tum... Thheek toh ho na... Meri toh jaan hi nikal di tune beti....." Murari ki aawaj ladkhada si rahi thhi.. Daru ke nashe mein....

"Jahan.. Aapne bheja hai.. Wahin hoon papa... Aapne ek baar bhi ye nahi socha...." Sneha ki aawaj mein rukhapan bhi jayaj thha.. Aur gussa bhi....

"Kya??? Tum Mohan ke sath ho..... Sach!" Murari ke aascharya ka thhikana na raha..

"Mujhe 'Kidnap' karne walon ne toh bahut koshish ki.. Par mera 'Mohan' hi tha jo mujhe sahi salamat bacha laya..." Sneha ne 'kidnap' aur 'mera mohan' shabdon par jarurat se jyada jor diya.. Par Murari uske vyangya ko samajh na paya...

Apni jawan beti ke munh se driver ke naam ke sath 'mera' shabd jodna Murari ko ganwara nahi hua... Kisi bhi baap ko na hota.. Apne daant peeste huye gurraya," kahan hai wo haramjada.. Baat karana meri.. Fone bhi off kar rakha hai... Maadar.. Tu meri baat kara uss'se..."

Sneha khoon ka ghoont peekar rah gayi.. Usko apne papa ka gussa Apni asafalta par kheej ka parinam laga..," Wo iss waqt yahan nahi hai...? Uske fone ki battery off hai..."

"par tumne bhi fone nahi uthhaya beti.. Main yahan kitna pareshan ho raha thha.. "

"haan.. Mera fone silent par thha..." Sneha ne rukha sa jawaab diya...

"meri toh jaan mein jaan aa gayi beti.. Par jo hota hai achchhe ke liye hi hota hai.. Tu kahan hai abhi..?" Murari ke dimag mein bhi iss 'kidnapping' ki jhhoothhi khabar se fayda uthhane ki uthhapatak chal padi... Usne media ko diye apne bayanon mein mukhiya aur Vicky par jo anaap-shanaap aarop lagaye thhe.. Ab uski kirkiri hone wali thhi... Agar ye baat saamne aa gayi ki kidnapping huyi hi nahi...," Bata na beti.. Kahan hai abhi tu..."

"jahan par bhi hoon... Thheek hi hoon.. Aap chinta na karein.. Aapki beti ab badi ho gayi hai.. Sab samajhti hai..." Sneha ke har bol mein bagawat thhi...

Murari ko Sneha ka andaaj ajeeb sa laga.. Par iss waqt toh wo kinhi aur hi khayalon mein khoya huaa thha...," ok beta.. Jahan bhi hai.. Aish kar... Bus ek baat ka dhyan rakhna.. Jab tak main na kahoon.. Wapas mat aana.. Aur apni pahchan chhupa kar rakhna..."

"Aapne aisa kyun kiya papa.. Apni aiyaashiyon ke liye mujhe hamesha ghar se door rakha aur ab kursi ke liye mujhe hi daanv par laga diya..." Sneha kahte huye bhabhak kar ro padi...

Murari ek pal ke liye sharminda ho gaya... Par Rajniti ke ulte ghade par sharam ka pani kab tak thhaharta....," Beti.... Main tumhe sab samjha dunga.. Bus dhyan rakhna mere kahe bina wapas mat aana.. Kahin door nikal ja...!"

"Main wapas kabhi nahi aaungi papa..!" Sneha ne rote huye kaha aur gusse mein apna fone jameen par de mara... Fone toot gaya....

apne aansoo pounchhte huye Sneha andar ghusi hi thhi ki vicky ko dekhkar chounk padi," ye... ye kya kar rahe ho...?"

Vicky jaldi jaldi aadhi botal gatak chuka tha.. ab wo apna plan badalne ki taiyaari mein thha.. fone se ki gayi recording usne delete kar di thi...," Dikhta nahi kya? sharaab pi raha hoon..." Sneha ko ab wah aise ghoor raha thha jaise bhade par laya ho.....

Sneha ko laga wo nashe mein behak gaya hai.. aisa mein usko vicky ka ajeebogareeb jawaab bhi bada pyara laga.. wah apne aapko khilkhilakar hansne se na rok saki...

"hans kyun rahi hai...?" Vicky ko ab uss'se kisi apnepan ki ummeed na thhi.. isiliye hairaan hona lajimi hi thha... wah gilas rakhkar khada ho gaya...

"Tumhari shakal dekhkar hans rahi hoon.. lag hi nahi raha ki tum pahle wale 'mohan' ho.. aise kya dekh rahe ho ab...? maine papa ko nahi bataya ki hum kahan hai.. aur na hi ye ki mujhe tumne sab kuchh bata diya hai... Naraj kyun ho rahe ho.." kahte huye Sneha apne dono hath bandhkar uske saamne jakar khadi ho gayi...

"kya?.. baat ho gayi tumhare papa se... kya kah rahe thhe...?" vicky ki jaan mein jaan aa gayi..

Sneha mayus ho gayi.. kuchh der chup rahkar boli," kahna kya thha.. kah rahe thhe.. jab tak main na kahoon.. wapas mat aana... tumhara sochna sahi nikla Mohan.. wo mujhe 'use' kar rahe hain...."

" toh... tumne kya socha hai fir...?" vicky mann hi mann uchhal pada...

" main kabhi wapas nahi jaaungi... ?" Sneha ne apne iraade jata diye....

" toh fir?..... aur kahan jaaogi..?" Vicky ne usko hairani se dekha...

Sneha kuchh na boli.. bus palkein uthhakar vicky ki aankhon mein aankhein gada li.. aur jaane kis gahraayi mein utar gayi... jaise wahin apna sansaar dhhoondh rahi ho...

kash vicky uske dil ke iraade jaan gaya hota," ab kya huaa...?"

" kuchh nahi...!" Sneha ne houle se kaha aur aagey badhkar vicky ki chhati se lipat gayi.. apni dono baahein uski kamar mein daalkar...

Sharaab aur shabaab se mast ho chuka vicky ab kahan chup rahne wala thha.. apne haathhon ko Sneha ke pichhe le jakar uski mast gaand ko sahlaane laga... Sneha ne sir uthhakar vicky ki aankhon mein aankhein daal li... Vicky bhi bina palak jhapakaaye sneha ko dekhte huye uski gaand ko dabata hua usko apni taraf kheenchne laga... Sneha ki saanse Vicky ke faifdon se hoti huyi uske khoon ko garam karne lagi.. Sneha par ek baar fir se masti chhane lagi.. aankhein band hone lagi... jaise hi vicky ne apna sir thhoda sa neeche jhukaya; Sneha apni aidiyon ke bal khadi ho gayi aur honton ke beech ki doori ko naap diya....

apne rasile honton ko vicky ke honton mein aur 38" ki unchhuyi gaand ko uske hathhon bedardi se ragde jaane par Sneha jyada der tak aape mein na rah saki," ummmmm... aaaaaaaahhhhhhh!" apne honton ko badi mushkil se vicky ki 'kaid' se aajad kara Sneha ne lumbi aur gahri siskari lli.. vicky ke haath uski skirt ko upar uthha uski panty mein ghus chuke thhe.. aur vicky lagaataar apni ungaliyon ka jaadu uski gaand ki daraar mein gahrayi tak dikha raha thha.. Sneha ki taangein apne aap hi khul gayi thhi..

agle hisse mein vicky ke hathhiyaar ki lambayi ko apni jaanghon ke beech mahsoos karke toh sneha fir se saatwein aasman par ja baithhi... wah uss'se 'khud ko bachana bhi chahti thhi.. aur door bhi nahi hone dena chahti thhi.. vicky ne jaise hi pichhe se uski gaand ki faankon mein apne haath fansa kar usko upar kheencha toh wah fir se aidiyan uthhane ko majboor ho gayi... saanson ki garmahat aur siskiyon ki kasmasahat badhti hi ja rahi thhi... vicky ne usko isi halat mein upar uthha liya aur le jakar bed par lita diya.. Sneha ki aankhein khul hi nahi pa rahi thhi.. bed par girte hi ussne apne haath peechhe faila diye .. skirt upar uthhi huyi thhi aur neele rang ki panty mein chhipi kamuk titli ka madak aakar upar se hi spast dikhayi de raha thha...

"maja aa raha hai na.." Vicky apne hath se sneha ki jaanghon ko sahlaane laga..

badhawaas si sneha ke honton par tair gayi kamsin muskurahat ne jawaab diya.. Sneha ne taangein choudi karke jaanghein khol di.. khula nimantran thha....

vicky uski jaanghon par jhuk gaya aur apne hont panty ke kinaare jaangh par tika diye....

"uffffff... kyaa.. karrahe.. ho.. main mar jaaungi..." Sneha tadap uthhi... Sneha beech bhanwar mein fansi huyi thhi... har pal mein itna aanand thha ki pichhe hatne ke baare mein socha hi nahi ja sakta thha... aur pahli baar ke iss anokhe aanand ko sametna bhi mushkil thha... sneha ne sisakte huye apni jaanghein kaskar bheench li....

par vicky kahan maan'ne wala thha.. hulka sa jor lagakar usne Sneha ki jaanghon ko pahle se bhi jyada khol diya.. panty fail gayi aur uske sath hi Sneha ki chikni patli unchhuyi choot ke aakar mein bhi parivartan sa aa gaya.. choot ke hont thhode se fail gaye lagte thhe...," aah mummy.. mar gayi.."

lagbhag mar hi toh gayi thi sneha.. jalim vicky ne panty ke upar se hi choot ke honton par apne hont rakh kar jaise uske shareer ke ang ang ko fadakne par majboor kar diya... Sneha ki saanse jaise ruk si gayi.. aankhein pathraane si lagi.. par jaanghein aur jyada khul gayi... apni marji se! aur ek lumbi saans ke sath uske honton se nikle," hayeeeeeyyye mohaaaannnnnn.. mar gayiiiiii mummmmm..."

aankhon aur honton se pahle vicky ki ungali ne uss lajeej rasili aur hulke balon wali ras se sarabor yoni ko chhua... vicky ne ek ungali panty mein ghusa di.. Sneha ki choot geeli hokar bhi pyasi lag rahi thhi.. mard ki chhuan se sneha ke roungte khade ho gaye.. itna aanand.. !

"nikal doon..?" Vicky ne upar uthhkar sneha ke chehre ki aur dekha..

neki aur poochh poochh.. Sneha toh kab se nangi hone ko taiyaar ho chuki thhi.. bina kuchh bole hi usne apni faily huyi jaanghon ko sametkar apne 'chutad' upar uthha diye.. iss'se behatar jawaab wo kya deti..

vicky ne bhi ek pal ki bhi deri na ki.. dono hathon se panty ko nikal kar usko anawrit kar diya...

ladkiyon ke maamle mein record bana chuke vicky ke liye yeh pahla anubhav thha.. Sneha ko bahar se dekhkar usne uske angon ki jo keemat aanki thhi.. uss'se kayi guna lajawaab thhi.. sneha ki.....! itni karari choot ko dekhte hi vicky mar mita. Sneha ko aagey kheench kar uski jaanghon ko bed ke kinare lekar aaya aur farsh par ghutne tek diye aur wahan..... apne hont!

Sneha ka toh bura haal pahle hi ho chuka thha.. ab toh uski hosh khone ki baari thhi... neeche ki siharan uski rasili chuchiyon tak ja pahunchi.. mast mast aawajein nikaalti huyi Sneha apni chhatiyon ko apne hi haathhon se masalne lagi...

"haye.. main inko kaise bhhool gaya..." kahte huye vicky ne sneha ko farsh par khadi kar diya aur puri 10 second bhi nahi lagayi usko janamjaat jaisi karne mein.. apne pairon par sneha utne time bhi khadi na rah saki... vicky ki bahon mein jhhool gayi...

"ohhh.. kitni pyari hain..." vicky ke munh se anayas hi nikal gaya.. jab usne sneha ki choochiyon ko chhoo kar dekha.... unka aakar naagpuri santron jaisa thha.. moti moti.. naram naram.. tani tani!

vicky ne sneha ko fir se usi andaaj mein lita diya.. litaane par bhi ubhaar jyon ke tyon thhe.. apne haathhon se unn falon ko hulka hulka masalte huye wo uss kachchi kali ka ras choosne laga...

Sab kuchh sneha ke bardaast se bahar ho chuka thha.. wah rah rah kar apni gaand ko uchka rahi thhi.. aur rah rah kar apni jaanghon ko bheench leti.. jab sahan karna mushkil ho jata...

ji bharkar jeebh se choot ko chaatne ke baad vicky fir se ungali ko uski faankon ke beech lekar aaya.. aur unke beech ungali ko aage pichhe karke yoni chhidra talaashne laga...

har pal sneha ko ek naya anubhav ho raha thha.. pahle se jyada meetha.. aur pahle se jyada masti bhara.. achanak sneha hulka sa uchhli.. usne sir uthhakar dekha.. ungli ne 'om ganeshay namah:' kar diya thha.. aadhi ungali bahar thhi.. aanand ke maare pagal si ho chuki sneha kohni bed par tika kar upar uthh gayi aur bade chav se ungli ko dheere dheere aate jaate dekhne lagi... uska sara badan sath hi jhatke kha raha thha.. choochiyan..daayein baayein aur upar neeche ho rahi thhi.. sneha ki aankhon mein uske badan ki badhti pyas aasani se mahsoos ki ja sakti thi..

choochiyon ko iss kadar masti se jhhoomte dekh vicky khud ko rok na paya.. ungli ko 'andar' hi rakhte huye wah aagey jhuka aur uski baayi choochi ke nanhe se gulabi nippal ko apni jeebh se ek baar chata aur honton mein daba liyaa...

"aaaaaaahhh... mujhe... itne.. majey kyun. aaa rahe hain... mohan.. tumhe bhi aa rahe hain kya... mujhe pata nahi kya ho raha hai.. "

" haan jaan.. mujhe bhi ho raha hai... tum sach mein sabse nirali ho... sabse pyari.." vicky ne apni ungali nikal li.. aur apni shirt nikal kar apni pant utaarne laga...

Sneha sharma gayi aur late kar apni aankhein band kar li.. usko pahli baar uska deedar hone wala thha.. jiske baare mein aksar ladkiyon mein charcha hoti thhi... hostal mein... Sneha ko aaj 'uska hissa' milne wala thha...

"kya hua..?" vicky ne muskurate huye sharmakar aankhein band kiye aur jaanghon ko bheeche leti huyi Sneha se poochha..

pochhne par sneha aur bhi sharma gayi aur palat kar ulti late gayi...

kya scene thha.. patli najuk si kamar se neeche kisi gumbad ki tarah uthhi huyi gaand ki faankein aur unke beech kasi huyi si aakarshak daraar.. pahle hi 7.5" ho chuke vicky ke lund ne ek aur angdayi li.. aur underwear ka elastic uske pate se door ho gaya.. wo tana hi itna hua thha ki agar underwear ko cheer bhi deta toh koi taajjub ki baat nahi hoti...

Vicky ne uski jaanghon par hath rakhkar pyar se sahlate huye uski gaand par le aaya aur fir aagey jhukte huye sneha ki gardan par ek chumban dekar uske sath late gaya.. sneha ke smanantar..

" kya hua.. sharma kyun rahi ho.." vicky ne uske kaan ke paas apne hont lejakar kaamukta se kaha..

sneha ne jawaab fir bhi nahi diya.. achanak palti aur vicky ki chhati mein apna chehra ghusa diya.. aur simat kar apne aapko vicky mein hi chhipane ki koshish karne lagi...

"aankhein kholo... dekho toh sahi.. kya dikhata hoon..." vicky ne hanste huye sneha se kaha...

"nahi.. mujhe nahi dekhna..." Sneha ko mano darr lag raha ho.. iss andaaj mein boli..

"ab ye toh cheating hai... main kab se tumhari sewa kar raha hoon.. aur tum dekh bhi nahi sakti...." vicky ne ulahna sa diya..

"parrrr... tumhe pata hai na.. mujhe sharam aa rahi hai...." Sneha hulke se budbudayi...

"aise sharmaati rahogi toh... baad mein pachhtaaogi... soch lo..."

"okkay.. hunhu... kya dekhna hai.. batao...?" shararat bhari aawaj mein sneha ne aankhein kholkar vicky ki aankhon mein jhanka...

"yahi.. jo tumhe pyar sikhayega... aur maje bhi dega..." vicky ne sneha ka hath pakad kar underwear ki side se andar ghuswa diya....

" ohh god.. itna mota!" lajaate huye bhi sneha apne aapko na rok paayi.. apne aascharya ko juban tak laane mein...

" itni hairan kyun ho.. lagta hai.. tumhe pata hai.. iska kya karte hain... experiance hai kya..?" vicky ne yunhi majak mein kah diya...

Sneha ne gussa sa dikhate huye apne komal hath ka ghoonsa banakar vicky ki chhati mein de mara..," oye.. meri kounsa shadi huyi hai...?"

"shadi toh ab bhi nahi huyi hai..... fir?" vicky ne uski choochi ko apne hathh mein daba liya....

" ho jaayegi...! tum mujhe jaante nahi ho.." sneha ne toh yahi socha hoga ki mohan toh uss'se shadi karke apne aapko khushkismat hi samjhega....

jaane kyun vicky iss baat par apni najrein churane laga.. usne baat badal di," toh tumhe pata hai.. iska kya karte hain..."

"hummm!" sneha ab apne aapko thhoda sahaj pa rahi thhi.. apne dil ki baat kah kar... wah wah bade pyar se bina sharmaye underwear ke andar hi vicky ke lund ko sahla rahi thhi...

"isko ismein daalte hain" sneha ne dusra hath apni jaanghon par rakh diya...

"toh daaloon...?" vicky ne jaise hi apna underwear nikala.. 'lund' tanna kar sneha ke hath se chhoot gaya...

" nahi.. abhi nahi.. bachcha ho jayega.. mujhe pata hai.. ismein daalne se hi bachcha banta hai......"

" ye bhi koyi baat huyi.. tumhe aadha pata hai.. aur aadha nahi..." vicky ghutno ke bal baith gaya..uska lund ab thheek sneha ki aankhon ke saamne hiloure le raha thha.... Sneha ne aankhein band karke usko fir hath mein pakad liya," achchha ji.. kya nahi pata...?"

"sirf daalne se bachcha nahi hota.. khair chhodo.. munh mein le sakti ho ?"

"munh mein.... ye koyi kulfi hai jo main munh mein loongi... kahkar sneha hunsne lagi... usne aankhein khol di thhi.. aur bade pyar se lund ke chikne supade ko dekh rahi thhi....

"lekar toh dekho... agar achchha na lage toh kahna..."

"tumhe kaise pata.. koyi experiance hai kya?" sneha ne hanste huye usi ki tone mein poochha...

"nnnahi.. wwo.. dost bata dete hain na.. ladkiyon ko kya kya achchha lagta hai...."

"par mujhe toh nahi bataya.. meri saheliyon ne..." halanki uski taraf nihaarte huye sneha ke munh mein pani aa chuka thha...

" yaar.. tum lekar toh dekho.. kah toh raha hoon.. nikal dena.. agar achchha na lage toh.." kahkar vicky uski chhati ke dono aur pair karke aage ki aur jhuk kar baith gaya.. ab sneha ke honton aur vicky ke 'aujaar' mein inch bhar ka fark thha...
 
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