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गर्ल'स स्कूल compleet

गर्ल्स स्कूल पार्ट --40

अब आगे .....

थोड़ा सा हिचकते हुए स्नेहा ने अपने हाथ में पकड़े लंड को नीचे झुकाया और अपने होंठो से छुआ दिया.. और फिर होंठों पर जीभ फेरते हुए उसको दूर कर दिया...

"क्या हुआ?" विकी तड़प सा उठा और खुद ही नीचे झुक कर वापस उसके होंठो से भिड़ाने की कोशिश करने लगा..

"कुच्छ नही.. अजीब सा लग रहा है..." अब स्नेहा खुल गयी थी.. पूरी तरह...

" अच्च्छा नही लग रहा क्या..?" बेचैनी से विकी ने पूछा...

बिना कोई जवाब दिए.. स्नेहा ने अपने होंठो को आधा खोला और सुपादे के अगले भाग को होंटो में दबा लिया.. और विकी की और देखने लगी..

विकी को पहली बार इतना आनंद आया था की उसकी आँखें बंद हो गयी..," अयाया.. "

"अच्च्छा लग रहा है...?" अब की बार स्नेहा ने पूचछा...

"हाआँ..." जीभ निकाल कर चाटो ना.. प्लीज़..." विकी कराह उठा.. आनंद के मारे..

स्नेहा को कोई ऐतराज ना हुआ.. उसको ये जानकार बहुत खुशी हुई की विकी को अच्च्छा लग रहा है.. अपनी जीभ निकाली और लंड की जड़ से लेकर सुपादे तक नीचे से चाट'ती चली गयी...

"आआहह.. मार डालोगी.. तुम तो.. ऐसे ही करो.. और इसको मुँह के अंदर लेने की कोशिश करो..."

स्नेहा तो मस्त होती जा रही थी... उसको भी बहुत मज़ा आ रहा था..

विकी ने देखा स्नेहा अपने हाथ को उसकी टाँगों के बीच से निकालकर नीचे ले जाने की कोशिश कर रही है.. विकी को समझते देर ना लगी... वो भी तो तड़प रही होगी," एक मिनिट.. कहकर विकी घूम गया और झुकते हुए अपनी कोहनियाँ स्नेहा की जांघों के बीच टीका दी.. स्नेहा की चिकनी चूत अब उसकी पहुँच में थी..

स्नेहा के लिए भी अब आसान हो गया.. लंड उसके मुँह के उपर सीधा लटक रहा था.. उसने अपने होंठ जितना हो सकता था उतने खोले और सूपदे को मुँह में भर लिया...

दोनो 69 की स्थिति में थे.. स्नेहा तो स्नेहा; विकी भी मानो आनंद के असीम सागर में तेर रहा हो.. बड़ी ही नाज़ूक्ता से उसने स्नेहा की जांघों को अपने हाथो से दबाया.. और एक हाथ की उंगली से उसकी चूत की कुँवारी फांकों को अलग करके उनके बीच छुपे हुए छ्होटे से दाने को देखा.. मस्ती से अकड़ा हुआ था.. चूत का रंग अंदर से स्नेहा के होंठो जैसा ही था.. एकद्ूम गुलाबी रंगत लिए हुए.

वह झुका और स्नेहा के 'दाने' को चूसने लगा..

स्नेहा एकद्ूम उच्छल सी पड़ी और इस उच्छलने में लंड सूपदे से कहीं ज़्यादा दूर उसके मुँह में हो आया...

स्नेहा इतनी उत्तेजित होने के बावजूद उसके सबसे अधिक संवेदनशील अंग के साथ छेड़ छाड सहन नही कर पा रही थी.. मस्ती से वा अपनी गांद को इधर उधर मटकाने लगी.. विकी ने भी उसको कसकर दबोच लिया.. और एक मुश्त कयि मिनूटों तक स्नेहा को जन्नत के प्रॅथम दर्शन कराता रहा...

दोनो ही बावले से हो चुके थे.. दोनो एक दूसरे का भरपूर साथ दे रहे थे.. की अचानक एक बार फिर स्नेहा के साथ वही स्थिति एक बार फिर उभर आई.. उसकी टाँगें काँपने लगी.. सारा बदन अकड़ सा गया और अपनी जांघों में उसने विकी का सिर जाकड़ लिया..

विकी को भी हटने की जल्दी ना थी.. स्नेहा की बूँद बूँद को वह मदहोशी के आलम में ही अपने गले में उतार गया...

उधर स्नेहा भी उसके लंड के साथ अब तक बुरी तरह व्यस्त थी... चाट चाट कर, चूस चूस कर... काट काट कर उसने सूपड़ा लाल कर दिया था...

स्नेहा के ढीली पड़ते ही विकी 'अपना' हाथ में लेकर घुटनो के बाल उसके मुँह के पास बैठ गया," तुम्हे भी पीना पड़ेगा...?"

"क्या?" स्नेहा के चेहरे से असीम तृप्ति झलक रही थी...

"यही.. इसका रस.. जो अभी निकलेगा..." विकी का हाथ बड़ी तेज़ी से चल रहा था..

"नही... रहने दो ना... प्लीज़.." स्नेहा ने रिक्वेस्ट की..

" रहने कैसे दूँ.. मुझे भी तो पीला दिया.. ज़बरदस्ती.. टाँगों में सिर भींच कर.."

उन्न पलों को याद करके स्नेहा बाग बाग हो गयी.. फिर शरारत से मुँह बनाते हुए बोली.. "ठीक है... लाओ पिलाओ.." कह कर उसने अपना मुँह खोल लिया...

उसके बाद तो 2 ही मिनिट हुए होंगे.. अचानक विकी रुका और स्नेहा के खुले होंठो में लंड जितना आ सकता था फँसा दिया.. रस की धारा ने स्नेहा का पूरा मुँह भर दिया.. आख़िर कार जब बाहर ना निकल पाई तो मुस्कुराते हुए गटक लिया...

विकी धन्य हो गया... हटा और बेड पर धदाम से गिर पड़ा.. स्नेहा उठी और अपनी चूचियों को विकी की छाती पर दबा कर उसके होंठों को चूमने लगी.. अजीब सी क्रितग्यता उसके चेहरे से झलक रही थी...

इतनी हसीन और कमसिन लड़की को अपनी बाहों में पाकर नशे में होने के बावजूद तैयार होने में विकी को 3-4 मिनिट ही लगे... वह अचानक उठा और स्नेहा को अपने नीचे दबोच लिया.. उसकी आँखों में फिर से वही भाव देखकर स्नेहा मुस्कुराइ," अब क्या है..?"

"अब अंदर..." कहते हुए. विकी ने फिर उसकी जांघें खोल दी.. और हौले हौले टपक रही चूत पर नज़र गढ़ा दी... और एक बार फिर उसको तैयार करने के लिए उंगली और होंठो को काम पर लगा दिया...

स्नेहा भी जल्द ही फिर से फुफ्कारने लगी... लुंबी लुंबी साँसे और योनि छिद्र में फिर से चिकनाई उतर आना इस बात का सबूत था की वो उस असीम आनंद को दोबारा पाने के लिए पहली बार होने वाले दर्द को झेल सकती है...

विकी पंजों के बल बैठ गया और स्नेहा के घुटनो के नीचे से बेड पर हाथ जमकर उसकी जांघों को उपर उठा सा दिया... चूत हूल्का सी रास्ता दिखाने लगी.. विकी ने सूपड़ा 'सही' सुराख पर सेट किया और स्नेहा के चेहरे की और देखने लगा..," एक बार दर्द होगा.. सह लोगि ना...?"

"तुम्हारे लिए...." स्नेहा हमला झेलने के लिए तैयार हो चुकी थी.. अपने पहले प्यार की खातिर...

विकी के भी अब बात बर्दास्त के बाहर थी.. ज़्यादा इंतज़ार वो कर नही सकता था.. सो स्नेहा की जांघों को पूरी तरह अपने वश में किया.. और दबाव अचानक बढ़ा दिया...

स्नेहा के मुँह से तो चीख भी ना निकल सकी.. एक बार में ही सूपड़ा अपना रास्ता अपने आप बनाता हुआ काफ़ी अंदर तक चला गया था.. स्नेहा ने पहले ही अपने मुँह को अपने ही हाथो से दबा रखा था... लंड सर्दियों में जमें हुए मक्खन में किसी गरम चम्मच की तरह घुस गया था.. कुच्छ देर तक विकी ना खुद हिला और ना ही स्नेहा को हिलने दिया.. और आगे झुक कर स्नेहा की छातियो को दबाते हुए उसको होंठो को भी अपने होंठों की गिरफ़्त में ले लिया..

धीरे धीरे 'चम्मच' की गर्मी से 'चूत' का जमा हुआ 'मक्खन' पिघल कर बहने सा लगा.. इश्स चिकनाहट ने दोनो के अंगों को तर कर दिया.. स्नेहा को लगा.. अब हो सकता है तो उसने अपनी गांद उचका कर विकी को सिग्नल दिया...

विकी ने थोड़ा पिछे हट'ते हुए एक बार और प्रहार किया.. इश्स बार अंदर लेने में स्नेहा को उतनी पीड़ा नही हुई..

करीब 5 मिनिट बाद स्नेहा सामान्य हो गयी और अजीब तरह की आवाज़ें निकालने लगी.. ऐसी आवाज़ें जो कामोत्तेजना को कयि गुना बढ़ा दें...

अब दोनो ही अपनी अपनी तरफ से पूरा सहयोग कर रहे थे.. विकी उपर से आता और आनंद की कस्ति पर सवार स्नेहा की गांद नीचे से उपर की और उच्छलती और दोनो की जड़ें मिल जाती.. दोनो एक साथ आ कर बैठते...

आख़िरकार स्नेहा आज तीसरी बार 'आ' गयी... विकी भी आउट ऑफ कंट्रोल होने ही वाला था.. उसने झट से अपना लंड बाहर निकाला और फिर स्नेहा के मुँह के पास जाकर बैठ गया.. जैसे वहाँ कोई स्पर्म बॅंक खोल रखा हो...

स्नेहा ने शरारत से एक बार अपने कंधे 'ना' करने की तरह उचकाए.. और फिर मुस्कुराते हुए अपने होंठ खोल दिए.. उसकी आँखों में अजीब सी चमक थी... पहले प्यार की चमक!

सुबह विकी उठा तो स्नेहा उसके कंधे पर सिर रखे उसके बलों में हाथ फेरती हुई उसकी ही और देख रही थी.. अपलक!

"तुम कब जागी?" विकी ने हुल्की सी मुस्कान उसकी और फैंकते हुए पूचछा...

"मैं तो सोई ही नही.. नींद ही नही आई..?" नींद और पहले प्यार की खुमारी उसकी आँखों में हुल्की सी लाली के रूप में चमक रही थी.. और उसके चेहरे पर कली से फूल बन'ने का बे-इंतहा नूर था.. विकी ने उसकी आँखों में आँखें डाली तो स्नेहा ने पलकें झुका ली..

"कैसा रहा रात का अनुभव?" विकी ने उसकी और करवट लेते हुए स्नेहा की कमर में हाथ डाल कर अपनी और खींच लिया.. और स्नेहा मुस्कुरा कर उस'से चिपक गयी.....

" हम कहाँ रहेंगे मोहन?" स्नेहा ने उसके गले में अपनी गोरी बाँहें डाल दी..

" मतलब? " विकी ने नज़रें चुरा ली...

"मैं वापस हॉस्टिल नही जाना चाहती.. यहीं रहना चाहती हू.. तुम्हारे साथ.."

विकी ने बात टालने के इरादे से अपने एक हाथ से उसकी चूची को दबाया और उसके होंठो को अपने होंठो में लेने के लिए अपना चेहरा उसकी तरफ बढ़ा दिया..

कामुकता भरे आनंद की लहर स्नेहा के पुर बदन को दावादोल सा कर गयी.. पर वह अगले कदम के बारे में जान'ने को चिंतित थी.. उसने अपना चेहरा सिर झुका कर विकी की छाती में छुपा लिया," बताओ ना मोहन.. अब हम क्या करेंगे.. मुझे वापस तो नही भेजोगे ना? मुझे अब तुमसे दूर नही जाना.."

विकी एक पल के लिए असमन्झस में पड़ गया.. इश्स वक़्त उसको स्नेहा को वादों के जाल में उलझाए ही रखना था.. पर जाने क्यूँ.. स्नेहा के सीधे सवाल का टेढ़ा जवाब देने से वह कतरा रहा था..," पर तुम्हारे पापा.. उनका क्या करोगी..? विकी ने सवाल का जवाब सवाल से ही दिया...

स्नेहा का उम्मीदों से भरा मॅन क्षणिक कड़वाहट से भर उठा..," पापा! हुन्ह... उनकी पैदाइश होने के अलावा हमारा रिश्ता ही क्या रहा है.. मैं 8 साल की तही जब उन्होने मुझे हॉस्टिल में डाल दिया.. आज 11 साल होने को आ गये हैं.. और मुस्किल से 11 बार ही मैने उनका चेहरा देखा है.. मैं उनसे बहुत प्यार करती थी.. हमेशा उनसे मिलने को.. घर जाने को तड़पति रहती थी.. पर उन्होने.. पता नही क्यूँ.. मुझे प्यार दिया ही नही.. कभी हॉस्टिल से घर लेने भी आता तो उनका ड्राइवर.. घर जाकर पता चलता.. देल्ही गये हैं.. बाहर गये हैं.. और मुझे तकरीबन उसी दिन शाम को या अगले दिन वापस भेज हॉस्टिल में फैंक दिया जाता" स्नेहा की आँखों में अतीत में मिली प्यार के अभाव की तड़प के छिपे हुए आँसू जिंदा हो उठे..," सब फ्रेंड्स के मम्मी पापा.. उनसे मिलने आते.. उनको घर लेकर जाते और वो लड़कियाँ आकर घर जाकर की गयी मस्ती को सबको बताती.. सोचो.. मेरे दिल पर क्या बीत-ती होगी.. लड़कियाँ मुझे 'अनाथ' तक कह देती थी.. अगर पापा ऐसे ही होते हैं तो सबके क्यूँ नही होते मोहन.. हम अपने बच्चे को हॉस्टिल नही भेजेंगे.. अपने से कभी दूर नही करेंगे मोहन... मैने महसूस किया है.. बिना अपनों के साथ के जिंदगी कैसी होती है.. फिर भी मैं हमेशा यही सोचती थी की पापा बिज़ी हैं.. पर प्यार तो करते ही होंगे... पर कल तो उन्होने दिखा ही दिया की... मैं सच मैं ही 'अनाथ' हूँ.." कहते हुए स्नेहा का गला बैठ गया.. और दिल की भादास विलाप के रूप में बाहर निकालने लगी...

विकी से उसका रोना देखा ना गया.. चेहरा उपर करके उसके आँसू पौंच्छने लगा... पर दिल उसका भी ज़ोर से धड़क रहा था.. उसके रोने के पिछे असली कारण वही था," अब.. रोने से क्या होगा सानू? सम्भालो अपने आपको... " विकी ने उसको अपनी छाती से चिपका लिया....

" बताओ ना.. हम कहाँ रहेंगे.. कहाँ है अपना घर?" स्नेहा पूरी तरह से विकी के लिए समर्पित हो चुकी थी.. उसके घर को अपना घर मान'ने लगी थी...

" उस'से पहले तुम्हे मेरी मदद करनी पड़ेगी... सानू..!"

" मैं क्या मदद कर सकती हूँ..? मैं खुद अब तुम्हारे हवाले हूँ..!"

" वो तो ठीक है.. पर अगर तुम्हारे पापा को पता चल गया तो मेरी जिंदगी ख़तरे में पड़ जाएगी.. अब तक तो फिर भी हो चुकी होगी... ये पता चलते ही की मैं ठीक ठाक हूँ और तुम मेरे साथ हो.. पोलीस मुझे उठा लेगी.. उसके बाद तुम फिर अकेली हो जाओगी... मुझे जैल मैं भेज देंगे.. और तुम्हारे पापा कभी सच्चाई को सामने नही आने देंगे...." विकी ने अपनी अगले प्लान की भूमिका बाँधी....

स्नेहा सुनकर डर गयी.. उसके पापा 'पॉवेरफूल थे.. और सच में ऐसा कर सकते थे.. स्नेहा के लिए तो विकी उसके बाप का एस.ओ. ही था..," फिर.. अब हम क्या करें मोहन!"

"सिर्फ़ एक ही रास्ता है.. तुम पहले मीडीया में जाकर सच्चाई बता दो.. की तुम्हारे बाप ने ही ये सब किया है.. और ये भी कहना की तुम अब वापस नही जाना चाहती.. फिर कुच्छ दिन तुम्हे छिप कर रहना पड़ेगा..!" विकी ने स्नेहा को वो रास्ता बता दिया जो उसको मंज़िल तक ले जाने के लिए काफ़ी था..

"उसके बाद तो सब ठीक हो जाएगा ना?"स्नेहा को अब भी चिंता सता रही थी..

"हाँ.. उसके बाद हम साथ रह सकते हैं.. खुलकर.." स्नेहा की सहमति जानकर विकी खिल उठा और उसने अपना हाथ स्नेहा की जांघों के बीच फँसा दिया...," पर याद रखना.. तुम्हे मेरा कहीं जिकर नही करना है.. यही कहना की मैं किसी तरह उनके चंगुल से बचकर अपनी किसी सहेली के घर चली गयी थी.. अगर मेरा नाम आया तो वो मुझे ढ़हूंढ लेंगे...!"

"आआहह.. ये मत करो.. मुझे कुच्छ हो रहा है.." अपनी पॅंटी में विकी की उंगलियाँ महसूस करके तड़प उठी...

"तुमने सुन लिया ना..." विकी ने अपना हाथ बाहर निकाल लिया..

"हां.. बाबा! सुन लिया.. कब चलना है.. मीडीया के सामने..?"

"मैं नही जाउन्गा.. तुम्हे किसी दोस्त के साथ भेज दूँगा.. चिंता मत करो.. मैं आसपास ही रहूँगा.." कहकर विकी उठ गया...

"अब कहाँ भाग रहे हो.. मुझे छेड़ कर..!" स्नेहा ने विकी को बेड पर वापस गिरा लिया और उसके उपर आ चढ़ि... अपनी टाँगें विकी की जांघों के दोनो तरफ रखकर 'वहाँ' बैठ गयी और सामने की और झुक कर अपनी चूचियों विकी की छाती पर टीका दी....

नया नया खून मुँह लगा था.. ये तो होना ही था...

कुच्छ ही देर बाद दोनो के कपड़े बेड पर पड़े थे और दोनो एक दूसरे से 'काम-क्रीड़ा' कर रहे थे.. स्नेहा की आँखों में अजीब सी तृप्ति थी.. 'अपनी मंज़िल' को प्राप्त करने की खुशी में वो भाव विभोर हो उठी थी.. प्यार करते हुए भी उसकी आँखों में नमी थी... खुशी की!

"रिया.. आज वो लड़का नही आया ना...!" क्लास में बैठी प्रिया की नज़रें किसी को ढ़हूंढ रही थी...

"ओहूओ... क्या बात है.. आजकल...."

"ज़्यादा बकवास मत्कर.. पहले तो मेरी फाइल दे दी उस घंचक्कर को .. अब मज़ाक सूझ रहे हैं... आज प्रॅक्टिकल है.. केमिस्ट्री का.. अगर नही आया तो मैं क्या करूँगी.." प्रिया ने मुँह बनाकर अपने चेहरे पर उभर आए शर्मीलेपान को छिपाने की कोशिश की...

"हमारे सामने ही तो रहता है.. घर जाकर माँग लाना..!" रिया ने चुटकी ली.. उसको पता था की उसके घर में ये सब नही चलता....

"तू पागल है क्या..? मैं उसके घर जाउन्गि? मरवा दे मुझे!....... तू ले आना अगर हिम्मत है तो!" प्रिया ने रिया को झिड़कते हुए कहा...

"मैं तो कभी ना जाउ? हां.. वीरेंदर को कह सकती थी पर आज तो वो भी नही दिख रहा..

तभी क्लास में सर आ गये और उनकी गुफ्तगू बंद हो गयी

दोस्तो इधर मुरारी का क्या हाल हो रहा है ज़रा इसे भी देंखे ......

" मे आइ कम इन सर?" 22-23 साल की चुलबुली सी एक छर्हरे बदन की युवती ने मुरारी से अंदर आने की इजाज़त माँगी...

"आओ जान ए मंन.." मुरारी खुश लग रहा था..

" सर.. देल्ही से पांडे जी का फोन है.." कहकर वो वापस चली गयी..

"नशे में होने के बावजूद मुरारी खुद को रिसीवर उठाकर खड़ा होने से ना रोक पाया," जैहिन्द सर..!"

" ये क्या तमाशा है मुरारी..? तुम्हारी बेटी तो सही सलामत है..?" उधर से गुर्राती हुई आवाज़ आई..

मुरारी चौंके बिना ना रह सका.. उसने तो स्नेहा को मना किया था.. किसी को भी कुच्छ भी बताने से.. फिर बात देल्ही तक कैसे पहुँच गयी...," हां.. हां सर.. मैं अभी आपको फोन करने ही वाला था.. ववो स्नेहा का फोन ..आया था.. अभी अभी.. बस उस'से ही बात कर रहा था.. वो.. किसी ने अफवाह फैलाई थी.. सर... मैं आपको बताने ही वाला था.."

"अच्च्छा.. अफवाह फैलाई थी.. ज़रा एक बार टीवी ऑन करके इब्न7 देखो.. तुम्हारी अकल ठिकाने आ जाएगी.. हाउ मीन यू आर!" कहकर पांडे ने फोन काट दिया..

टी.वी. तो पहले ही ऑन था.. बस चॅनेल ज़रा दूसरा था.. एफटीवी! मुरारी ने हड़बड़ाहट में चॅनेल सर्च करने शुरू किए.. जैसे ही इब्न& स्क्रीन पर आया.. उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी.. उसकी बेटी जैसी लड़की टीवी पर थी... अर्रे हाँ.. वही तो थी..!

मुरारी को एकदम ऐसा अहसास हुआ मानो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी हो... वो खड़ा ना रह सका और धम्म से सोफे पर आ गिरा...

स्नेहा बार बार टीवी स्क्रीन पर वो बातें कह रही थी.. जिनको वो 100% सच मान रही थी.. उसके बाप का उसको घूमकर आने के लिए कहने से लेकर बाप के गुण्डों से बचकर वहाँ तक आने की.... कुच्छ ही बातों में मिलावट थी.. जैसे उसको नही पता की ड्राइवर कहाँ है.. और वो अब अपनी किसी पुरानी सहेली के पास रह रही है..

"अब मैं आपको वो रेकॉर्डिंग सुनाती हूँ.. जो मेरे फोन में डिफॉल्ट सेट्टिंग होने की वजह से सेव हो गयी.... मेरे पापा ने मेरे पास कॉल की थी.." कहते हुए स्नेहा बीच बीच में सूबक रही थी.. और न्यूज़ रीडर बार बार उसको धैर्य रखने की गुज़ारिश कर रही थी..

रेकॉर्डिंग सुनकर मुरारी का चेहरा लाल हो गया.. उसके द्वारा कही गयी बातें जाने अंजाने मुरारी की और ही उंगली उठा रही थी.. बेशक उसके दिमाग़ में ये ख़याल बहुत बाद में.. विरोधी पार्टियों की तरफ से धमकी भरे फोन आने के झूठे आरोपों को सच साबित करने के उद्देश्या से आया था...

चॅनेल वाले टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में बाल की खाल उतारने में लगे थे.. टीवी स्क्रीन पर नीचे लगातार फ्लश हो रहा था.. " मुरारी या दुराचारी! एक्सक्लूसिव ऑन इब्न7"

" स्नेहा जी.. कहीं इसमें आपका ड्राइवर भी तो शामिल नही है..?" आंकर ने सवाल किया...

"नही.. मैं आपको बता ही चुकी हूँ की उन्होने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी.. मुझे बचाने की.. पर वो उसको भी मेरे साथ ही डाल कर ले गये.. फिर उसने वहाँ से निकालने में भी मेरी मदद की... बाकी रेकॉर्डिंग से सब कुच्छ सॉफ है.."

आंकर ने नहले पर दहला ठोंका..," पर रेकॉर्डिंग मैं तो आप कह रही हैं कि आप ड्राइवर के साथ ही हैं... और अब आप कह रही हैं की आपको ड्राइवर के बारे में नही पता.. वो कहाँ है.. इसकी वजह?"

स्नेहा एक पल को सकपका गयी.. पर जल्द ही संभालते हुए बोली...," वो.. वो मैने तब झूठ बोला था.. ताकि पापा मेरी लोकेशन के बारे में आइडिया ना लगा पायें..!"

" पर अगर गुंडे आपके पापा ने ही भेजे थे.. तो उनको तो मालूम होना चाहिए था कि ड्राइवर उनके गुण्डों के ही पास है.. फिर उन्होने आपसे पूचछा क्यूँ?" आंकर ने एक और बआउन्सर मारा...

ये सवाल सुनकर मुरारी के चेहरे पर हूल्का सा सुकून आया.. ," इश्स लौंडिया को तो सीबीआइ में होना चाहिए.." उसके मुँह से निकला..

" ये सवाल आप मेरे पापा से ही करें.. उन्होने क्यूँ पूचछा..? या फिर हो सकता है.. वो भी मेरे बाद बच निकलने में कामयाब हो गये हों.. इसीलिए उन्होने फोन किया हो..?"

" तो देखा आपने.. हमारे देश की राजनीति किस कदर गिर चुकी है.. चंद वोटों की खातिर जो नेता.. अपनी इतनी प्यारी बेटी तक को दाँव पर लगाने से नही चूकते.. उनके लिए आप और हम जैसे इंसानो की क्या कीमत है.. आप अंदाज़ा लगा सकते हैं.. बहरहाल.. हम मुरारी से कॉंटॅक्ट करने की कोशिश कर रहे हैं.. तब तक लेते हैं एक छ्होटा सा ब्रेक.. आप देखते रहिए.. आज की सबसे सनसनीखेज वारदात.. ' मुरारी या दुराचारी ' सिर्फ़ और सिर्फ़ इब्न पर.. जाइएगा नही.. अभी और भी खुलासे होने बाकी हैं.. मिलते हैं ब्रेक के बाद!"

पागल से हो उठे मुरारी ने टेबल पर रखी बोतल टीवी पर दे मारी.. स्क्रीन टूट कर टीवी से धुंवा निकलने लगा.. हड़बड़ाहट में मुरारी ने पांडे के पास फोन मिलाया...

" प्पंडे जी.. सब बकवास है.. झूठह है.. मेरे खिलाफ बहुत बड़ी साजिस हो रही है.. विरोधियों की और से..."

" व्हाट दा हेल आर यू टॉकिंग अबौट.. ये मुहावरा बहुत पुराना हो गया मुरारी.. मत भूलो की स्क्रीन पर तुम्हारी अपनी बेटी है.. जो तुम्हारे शड्यंत्रा का खुलासा कर रही है... अब हो सके तो जल्दी से अपनी बेटी को अपने कंट्रोल में लो.. वरना आप कल से पार्टी में नही हैं.. आप जैसे आदमी की वजह से हम पार्टी की छवि को नुकसान नही पहुँचा सकते..!" पार्टी आलाकमान का गुस्सा सातवें आसमान पर था..

"सर.. सुनिए तो.. वो.. वो मेरी बेटी नही है... मैं ये बात प्रूव कर सकता हूँ.. मैं वो डीएनए पीएनए के लिए भी तैयार हूँ. सर.. वो मेरी बीवी की नाजायज़ औलाद है.. साली कुतिया.. अपनी मा पर गयी है.. मादर चोद.. बिक गयी! वो मेरा खून नही है सर.." मुरारी अनाप शनाप जाने क्या क्या उगले जा रहा था..

"माइंड उर लॅंग्वेज.. मुरारी! वी हॅव नतिंग टू डू व्ड उर पास्ट ऑर वॉटेवर यू आर टॉकिंग अबौट.. जस्ट ट्राइ टू टेक बॅक उर चाइल्ड इन उर फेवर ओर बी रेडी टू बी किक्ड आउट...!" कहकर पांडे ने पटाक से फोन काट दिया..

काफ़ी देर से वो दरवाजे पर खड़ी मुरारी की कॉल के ख़तम होने का इंतज़ार कर रही थी... जैसे ही कॉल डिसकनेक्ट हुई.. उसने अंदर आने की इजाज़त माँगी," मे आइ कम इन,सर?"

"तू.. साली कुतिया.. यहाँ खड़ी होकर क्या सुन रही है..? बेहन्चोद.. अंदर आ.."

शालिनी डर के मारे काँपने लगी.. 2 दिन पहले ही उसने मुरारी के ऑफीस को जाय्न किया था.. यूँ तो ऑफीस के हर एंप्लायी को मुरारी की चरित्रहीनता का पता था.. पर नौकरी का लालच और सुन्दर और कुँवारी लड़कियों को अच्च्ची तनख़्वाह देने का मुरारी का रेकॉर्ड लड़कियों को वहाँ खींच ही लाता था.. वैसे भी मुरारी ऑफीस में 5-6 महीनों से ज़्यादा किसी लड़की को रखता नही था...," सर्र.. वो.. इब्न7 से बार बार आपके लिए कॉल आ रही है.." शालिनी सूखे पत्ते की तरह थर थर काँपती थोडी सी अंदर आकर खड़ी हो गयी...

" उन्न बेहन के लोड़ों को तो मैं बाद में देख लूँगा.. पहले तू बता.. क्या सुन रही थी.. छिप कर..!" मुरारी खड़ा होकर शालिनी के पास गया और उसका गिरेबान पकड़ कर खींच लिया.. शर्ट का एक बटन टूट कर फर्श पर जा गिरा.. शालिनी की सफेद ब्रा शर्ट में से झलक उठी..

" कुच्छ.. नही सर्र.. मैने कुच्छ नही सुना.. म्म्मै तो अभी आई थी.. प्लीज़ सर.. मुझे माफ़ कर दीजिए.. आइन्दा ऐसी ग़लती नही होगी..." शालिनी ने मुरारी के मुँह से आ रही तेज बदबू से बचने के लिए अपना चेहरा एक तरफ करके अपना हाथ उपर उठाया और.. उसके और मुरारी के चेहरे के बीच में ले आई...

मुरारी ने शालिनी का वही हाथ पकड़ा और उसको मोड़ दिया.. दर्द के मारे वो घूम गयी.. उसकी गांद मुरारी की जांघों से सटी हुई थी..," आ.. छ्चोड़ दीजिए सर.. प्लीज़.. मैं आपके हाथ जोड़ती हूँ...

अब तक शालिनी के कुंवारे और गरम खून की महक पाकर मुरारी की आँखों में वासना के लाल डोरे तैरने लगे थे..," छ्चोड़ दूं.. साली.. कुतिया.. तुझे छ्चोड़ दूँगा तो क्या तेरी मा को चोदुन्गा... च्छुपकर बात सुन'ने की सज़ा तो तुझे मिलेगी ही.." कहते हुए मुरारी ने उसको ज़ोर से धक्का दिया और संभालने की कोशिश करती हुई सी शालिनी बेड के कोने पर जा गिरी..

तुरंत ही उठते हुए उसने जहाँ से बटन टूटा हुआ था.. वहाँ शर्ट को अपने हाथ से पकड़ लिया.. और गिड़गिदाने लगी..," मैं बर्बाद हो जाउन्गि सर्र.. मुझे नही करनी नौकरी.. आप मुझे जाने दीजिए प्लीज़.. जाने दीजिए.." जो कुच्छ होने वाला था.. उसकी कल्पना करके ही शालिनी सिहर उठी.. और फफक कर रोने लगी...

"चुप कर कुतिया.. ज़्यादा नाटक मत कर.. नही तो कभी वापस नही जा पाएगी... तू मेरी बातें सुन्न'ने की हिम्मत करती है.. मुरारी की बातें.." मुरारी ने कहते हुए उसके बालों को पकड़ कर उपर की और खींच लिया.. असहाय सी हो उठी शालिनी की आइडियान दर्द को कम करने की खातिर उपर उठ गयी.. तब भी बात नही बनी तो उसके हाथ उपर उठकर अपने बालों को नीचे की और खींचने लगे...," प्लीज़.. सर.. मैं मर जाउन्गि.. मुझे जाने दो...!"

मुरारी ने एक बार फिर उसकी शर्ट को पकड़ कर खींचा और शर्ट पर उसकी इज़्ज़त के रखवाले बटन दम तोड़ गये.. फटी हुई शर्ट में शालिनी का कमसिन बदन दारू के नशे में और इज़ाफा कर रहा था... बाल खींचे होने की वजह से वो बैठकर अपने आपको छुपा भी नही सकती थी.. असहाय खड़ी थी.. बिलबिलाते हुए.. बिलखते हुए...

"इसको खोल साली..! वरना इसे भी फाड़ दूँगा.." नशे में टन मुरारी ने शालिनी की ब्रा में हाथ डाल दिया... उसकी चूची पर उभरा हुआ मोटा दाना मुरारी की उंगलियों से टकरा कर सहम गया... मुरारी अपनी बेटी का गुस्सा उस बेचारी पर निकाल रहा था....

"प्लीज़ सर.. मेरे बाल छ्चोड़ दीजिए.. बहुत दर्द हो रहा है..." शालिनी चीख सी पड़ी...

"ब्रा निकल पहले.. नही तो उखाड़ दूँगा सारे..?" मुरारी ने बालों को और सख्ती से खींच लिया..

"अया.. निकालती हूँ.. सर.. भगवान के लिए.. प्लीज़.. एक बार छ्चोड़ दीजिए बाल.. अया.."

मुरारी ने झटका सा देते हुए उसके बालों को छ्चोड़ दिया... और जाकर दरवाजा बंद कर दिया..

शालिनी ने एक बार अपनी नज़रें उठाकर मुरारी की तरफ इस तरह देखा जैसे कोई मासूम हिरण शेर के पंजों से घायल होकर उसके पैरों में पड़ा हो और अपनी जिंदगी की भीख माँग रहा हो.. पर मुरारी पर इसका कोई फ़र्क़ नही पड़ा.. वह शेर थोड़े ही था.. वह तो भेड़िया था.. जो बिना भूख लगे भी शिकार करते हैं.. सिर्फ़ शिकार करने के लिए.. अपनी कुत्सित राक्षशी भावनाओ की तृप्ति के लिए..," निकालती है साली या खींच कर फाड़ दूं..."

और कोई रास्ता बचा भी ना था... शालिनी ने पिछे हाथ लेजाकार ब्रा के हुक खोल दिए.. ब्रा ढीली होकर नीचे सरक गयी.. उसने झुक कर 50 साल के राक्षस के सामने नंगे खड़े अपने जिस्म को देखा और फूट फूट कर रोने लगी...

" क्या री शालिनी तेरी चूचियाँ तो बड़ी मस्त हैं.. क्या मसल्ति है इन्न पर!" शालिनी के क्रंदन से बेपरवाह मुरारी ने आगे बढ़कर ब्रा को खींचकर निकाल दिया और उसकी मस्त कबूतरों जैसी गोरी चूचियों को बारी बारी से मसालने लगा... शालिनी को चक्कर आ रहे थे.. मुरारी इतनी कामुकता से उनको मसल रहा था की यदि उसकी जगह उसका 'रोहित' होता तो नज़ारा ही कुच्छ और होता.. जिसको उसने आज तक खुद को उनके पास फटकने तक नही दिया था... शालिनी के लगातार बह 5रहे आँसुओं से उसकी चूचियाँ गीली हो गयी थी...

"चल जीन्स खोल..! तेरी चूत भी इनकी तरह करारी होगी.. शेव कर रखी है या नही.... अगर..." मुरारी का वाक़या अधूरा ही रह गया.. दरवाजे पर जोरों से खटखट होने लगी...

"कौन है मदर्चोद.. किसने हिम्मत की दरवाजे तक आने की.." उसने फोन उठाकर गार्ड को फोन मिलाया.. पर किसी ने फोन नही उठाया..!

" आबे... कहाँ अपनी मा का.. कौन है बे.. चल फुट..." पर दरवाजे पर खटखट की आवाज़ बढ़ती ही गयी...," तू रुक एक बार.. साले बेहन के..." दरवाजे के खुलते ही मुरारी का सारा नशा उतर गया.. उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी...... अधूरी बात उसने अपने गले में थूक के साथ गटक ली.. और दरवाजा बाहर से बंद करते हुए निकल गया...

" वी आर फ्रॉम सी.आइ.ए. भिवानी मिस्टर. मुरारी, दुराचारी और वॉटेवर.. यू आर अंडर अरेस्ट.." 3 सिपाहियों और एक ए.एस.आइ. के साथ खड़े इनस्पेक्टर ने उसका स्वागत किया...

मुरारी फटी आँखों से उसको देखता रहा.. फिर संभालते हुए बोला..," तू जानता तो है ना मैं कौन सू!" मुरारी ने बंदर घुड़की दी...

" हां.. कुच्छ देर पहले टी.वी. पर देखा था.. कुत्ते से भी गया गुजरा है तू.. लानत है 'बाप' के नाम पर.. पर तू शायद मुझे नही जानता.. मुझे टफ कहते हैं.. टफ.. चल थाने.. बाकी की कुंडली वहाँ सुनता हूँ.. डाल लो इसको.." टफ ने सिपाहियों की और इशारा किया....

"एक मिनिट.. तुम तो भिवानी से हो.. तुम मुझे कैसे अरेस्ट कर सकते हो..?" मुरारी उसकी टोन से बुरी तरह डर गया था..

"अबबे चुतिये.. हिन्दी समझता ही नही है.. सालो.. इतने क्राइम करते हो.. तो थोड़ा सा जी.के. भी रखा करो.. किडनॅपिंग वाला नाटक तूने वही रचाया था ना.. तो क्या पोलीस लंडन से आएगी.. भूतनि के..." कहकर टफ ने उसको सिपाहियों की और धकेला.. और जाने के लिए वापिस मूड गया....

"मुझे बचाओ प्लीज़.. मुझे यहाँ से निकालो.." दरवाजा अंदर से थपथपाया गया तो टफ चौंक कर पलटा.. एक पल भी बिना गँवाए उसने दरवाजा खोल दिया.. और अंदर का द्रिस्य देखकर चौंक पड़ा..

फर्श पर शराब की बोतल टूटी पड़ी थी.. टीवी का स्क्रीन टूटा हुआ था... और टफ की आँखों के सामने आँखें झुकाए अपनी फटी हुई शर्ट को अपने बदन पर किसी तरह लपेटे खड़ी शालिनी भी जैसे टूटी हुई ही थी.. उसके बॉल बिखरे पड़े थे और बदहवास सी लगातार बह रहे अपने आँसुओं को अपनी आस्तीन से पौंच्छने की कोशिश कर रही थी..

"ओह्ह्ह.. एक मिनिट.." टफ लगभग भागते हुए अंदर गया और बेड की चादर खींच कर शालिनी के बदन को ढक दिया...

"ये सब क्या है?" टफ ने सिपाहियों के साथ जा रहे मुरारी को आवाज़ लगाकर वापस बुला लिया," अंदर लाओ इसको!"

मुरारी विकी के बिच्छाए जाल, अपनी नियत और नियती के चक्रव्यूह में बुरी तरह से फँस गया था.. हमारी मीडीया आजकल एकमात्र अच्च्छा काम यही कर रही है कि वो मुद्दों को इस तरह उठाती है जैसे इस-से पहले ऐसा कभी नही हुआ... और उनके द्वारा दिखाई गयी खबर पर अगर प्रसाशण तुरंत कार्यवाही नही करता तो वे प्रायोजित करना शुरू कर देते हैं की सब मिले हुए हैं.. बड़ी मछ्लियो के मामले में तो वो खास तौर पर ऐसा करते हैं.. बेशक ऐसा वो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए करते हैं.. पर आज उनके दिखाए टेलएकास्ट से कम से कम जो एक अच्च्छा काम हुआ वो ये.. की बेचारी शालिनी की इज़्ज़त तार तार होने से बच गयी.. देल्ही में बैठे पार्टी के आला नेताओ ने पार्टी की छवि बचाने के लिए अधिकारियों पर तुरंत कार्यवाही का दबाव बनाया और उसका ही नतीजा था.. की भिवानी पोलीस डिपार्टमेंट में हाल ही में प्रमोशन पाकर इनस्पेक्टर बने सबसे काबिल और दबंग टफ को ये काम सौंपा गया....

"ये क्या है मुरारी..?" टफ को लगा शालिनी बात करने की हालत में नही है... इसीलिए मुरारी से ही पूच्छ लिया...

" कुच्छ नही है.. ये.. कुच्छ भी नही.. बस.. वो इसकी शर्ट उलझ कर फट गयी थी.. तो उससे बदलने ये मेरे बाथरूम में गयी होगी... है ना बेटी!"

शालिनी ने आगे बढ़ कर एक जोरदार तमाचा उसके मुँह पर रसीद दिया..और फुट पड़ी," हराम्जादे, कुत्ते.. तुझे पता भी है की बेटी क्या होती है... कामीने.. तुझसे ज़्यादा गिरा हुआ इंसान मैने अपनी जिंदगी मैं नही देखा.. थ्हू..!" शालिनी के मुँह से थ्हूक के रूप में निकली बद्दुआ मुरारी के बदसूरत चेहरे पर जाकर चिपक गयी...

" यहाँ सिटी थाने का नंबर. क्या है.. ज़रा पूच्छ कर बताओ!" टफ क़ानूनी तौर पर इश्स मामले को डील नही कर सकता था.... इसीलिए ए.एस.आइ. को उसने रोहतक सिटी में कॉंटॅक्ट करने को कहा...

कुच्छ देर बाद विकी ने सिटी थाना इंचार्ज को फोन किया..

"सिटी थाना रोहतक से हवलदार ब्रिज्लाल, बताइए क्या सेवा करें.." फोन पर एक रॅटी रटाई सी आवाज़ निकली..

" मैं भिवानी सी.आइ.ए. स्टाफ से इनस्पेक्टर अजीत बोल रहा हूँ.. एस.एच.ओ. साहब से बात करवायें ज़रा..

" जैहिन्द जनाब.. अभी करवाता हूँ.. कहकर ब्रिजलाल ने लाइन फॉर्वर्ड कर दी..

"हेलो!"

" मैं भिवानी सी.आइ.ए. स्टाफ से इनस्पेक्टर अजीत बोल रहा हूँ.. आपके यहाँ से मुरारी जी को अरेस्ट करके ले जा रहा था.. यहाँ कुच्छ और भी पंगा है.. आप आ जाइए ज़रा... लेडी स्टाफ को लाना मत भूलना" टफ ने उसकी पहचान जाने बिना ही अपनी बात पूरी कर दी..

"क्यूँ क्या हुआ..? मुरारी जी अरेस्ट हो गये..?" विजेंदर चौंक कर चेर से खड़ा हो गया..

"हां.. मुरारी जी अरेस्ट हो गये.. और हो सकता है की आज रात इन्हे आप ही की सेवा की ज़रूरत पड़े.. आप आ जाइए..!" टफ ने मुरारी को कड़वाहट से देखते हुए कहा.. वो सहमा हुआ था.. पर विजेंदर के पास रहने की सोच कर उसके चेहरे पर रौनक सी आ गयी... वो तो उसका ही पाला हुआ कुत्ता था...

"ठीक है.. हम अभी आते हैं.. कहकर विजेंदर ने फोन रख दिया और हड़बड़ाहट में चलने की तैयारी करने लगा...

वहाँ पहुँचते ही विजेंदर सारा माजरा समझ गया.. मुरारी रह रह कर उसकी और कुच्छ इशारा सा करने की कोशिश कर रहा था.. पर विजेंदर ने उसकी और देखा ही नही..

पूरी बात सुन्न'ने के बाद विजेंदर बोला..," तब तो आज आपको इसकी कस्टडी हमें देनी होगी.. हम दोनो को लेजाकर लड़की के बयान लिखवा लेते हैं.. अगर ज़रूरत पड़ी तो इसको सुबह कोर्ट में पेश कर देंगे.. आप वहाँ से इनकी कस्टडी ले लेना..

"ओके सर.. हम कल मिलते हैं....!" कहकर टफ ने विजेंदर से हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया ही था कि अब तक चुप चाप खड़ी शालिनी चीख उठी...," नही.. मैं इनके साथ नही जाउन्गि.. ये तो यही पड़े रहते हैं हमेशा.. इस कुत्ते के पास...!"

शरम के मारे विजेंदर की आँखें झुक गयी..," ऐसी बात नही है मेडम.. ड्यूटी ईज़ ड्यूटी.." उसने शालिनी को आसवस्त करने की कोशिश की...

" नही प्लीज़.. मुझे इनके भरोसे छ्चोड़ कर मत जाइए.. मेरे बयान यहीं लिख लीजिए और मुझे जाने दीजिए...

" देखो बेटी. ऐसा हो नही सकता है.. आपको थाने चलना ही पड़ेगा...!" विजेंदर ने अपने गले का थूक गटका..

टफ अब तक स्थिति को समझ गया था," क्यूँ नही हो सकते सर..? यहाँ बयान क्यूँ नही हो सकते..? क्या मैं जान सकता हूँ..?"

"इधर तो आओ यार एक बार.." विजेंदर ने टफ का हाथ पकड़ कर एक तरफ ले जाने की कोशिश की..

"नही.. मैं इधर उधर नही जाता... आप यहीं लड़की के बयान लिखिए और इसको जाने दीजिए.. आज मुरारी आप का मेहमान है.. जी भर कर खातिरदारी करना.. कल इसकी सारी दूध दही मैं बाहर निकाल दूँगा..." टफ ने अपनी पोलीस कॅप सिर पर रखते हुए अपने इरादों का परिचय दिया...

विजेंदर कुच्छ ना बोला.. और मुंशी को जीप से कागजात उठाकर लाने को कहा..," हां बोलिए मेडम.. क्या शिकायत है..." उसके बोल में रूखापन सॉफ झलक रहा था...

शालिनी के बयान लिखवाने के बाद टफ उसकी और मुखातिब हुआ..," तो शालिनी जी.. आप घर जा सकती हैं.. या हम आपको छ्चोड़ कर आयें..."

शालिनी सुबकने लगी... कुच्छ देर बाद संभाल कर बोली..," मेरा घर नही है.. मैं तो महिला आश्रम में रहती हूँ.."

"यार ये सारे किस्मत के मारे रोहतक में ही रहते हैं क्या.." टफ मंन ही मंन बुदबुडाया.. फिर प्रत्यक्ष में बोला," ओह्ह.. आइ मीन.. वहाँ छ्चोड़ देते हैं.. या कोई और प्राब्लम है..?"

" वहाँ से इनके लिए लड़कियाँ और औरतें भेजी जाती हैं.. वहाँ तो ये कुच्छ भी करा सकते हैं.." शालिनी ने नज़रें झुकाए हुए ही जवाब दिया..

टफ के जी मैं आया.. वहीं पर मुरारी का राम नाम कर दे.. पर आजकल वो क़ानून से कुच्छ ज़्यादा ही बँध गया था.. सीमा ने उसको कितना बदल दिया," साला कुत्ता!" कहते हुए टफ ने फोन निकाला और सीमा के पास फोन मिलाया..,"

" मिल गयी फ़ुर्सत तुम्हे.. सुबह से फोन लगा रही हूँ.. उठा क्यूँ नही रहे.." सीमा के बोल में प्यार और गुस्सा.. दोनों महक आ रही थी.. और दोनो बड़ी लाजवाब थी...

" तुम्हारी एक सहेली घर आ रही है.. अपनी तैयारी कर लेना.. बाद में मत कहना बताया नही.." टफ का इंस्पेक्टोरी लहज़ा गायब होकर 'म्याउ' हो गया

" क्या.. कौन.. कब?" सीमा ने चहकति हुई आवाज़ में जाने कितने सवाल दाग दिए...

" अभी रोहतक मैं हूँ.. करीब 2 घंटे लगेंगे.. आने में.. बाकी बाद में..."

"सुनो.. सुनो.. सुनो.." सीमा बोलती रह गयी और टफ ने फोन काट दिया...

" मेरे साथ मेरे घर चलने में तो कोई प्राब्लम नही है ना.. मेरी पत्नी भी यहीं से हैं.. रोहतक से..

शालिनी ने नज़रें उठाकर टफ को क्रितग्यता की द्रिस्ति से देखा.. किस्मत के मारे चेहरे पर खुशी की सहमति की हल्की सी मुस्कान उभर आई...

टफ ने विजेंदर से कंप्लेंट की रिसीविंग ली, कुच्छ और खाना पूर्ति की और ,"अच्च्छा तो जनाब.. हम चलते हैं.. जैहिन्द!" कहकर गाड़ी की और चल पड़ा..... शालिनी उसके पिछे पिछे चल दी और गाड़ी में बैठ गयी....

"यार... तुझसे एक मदद चाहिए थी..." विकी ने स्नेहा से अलग होते हुए टफ को फोन किया...

"बोल मेरे यार... जान दे दूँ???" टफ शालिनी को लेकर घर की और चला ही था...

"वो तूने न्यूज़ तो देखी ही होगी.. मुरारी कांड!" विकी ने अपना सिर खुजलाया... वो समझ नही पा रहा था बात कहाँ से शुरू करे!

"सच में यार.. मुरारी जैसे घटिया लोग कैसे राजनीति में बने रहते हैं.. इतना बकवास आदमी मैने आज तक नही देखा.. कल साले की अकल ठिकाने लगा दूँगा..!" टफ ने कहते हुए कनखियों से शालिनी की और देखा.. हालाँकि कपड़े चेंज करने के बाद वो काफ़ी हद तक नॉर्मल महसूस कर रही थी पर उसकी आँखें अब भी सहमी हुई थी.. दूध का जला छाछ को भी फूँक फूँक कर पीता है..

"अकल ठिकाने लगा देगा मतलब...??? तुम उसको पर्सनली जानते हो क्या?" विकी को उसकी बात कुच्छ अटपटी सी लगी...

"मैं ऐसे कुत्तों से इत्तिफाक नही रखता.... दरअसल उसका केस मुझे ही हॅंडोवर किया हुआ है....." और विकी ने टफ को बीच में ही रोक दिया," क्याअ????"

"हां.. उसकी चाँदी का माप मुझे ही लेना है... खैर छ्चोड़.. तू बता.. किसलिए फोन किया..?" टफ ने काम की बात पर आते हुए कहा...

"नही.. कुच्छ नही.. बस ऐसे ही याद कर लिया था... अच्च्छा अब रखता हूँ... बाहर कोई है शायद..." कहकर विकी ने तुरंत फोन काट दिया...

"अजीब आदमी है.. अब तो कह रहा था की कुच्छ काम है.." मंन ही मंन बड़बड़ाते हुए टफ ने गाड़ी अपने घर की पार्किंग में घुसा दी... वहाँ सीमा उनका बेशबरी से इंतज़ार कर रही थी...

अंदर जाने पर सीमा ने मुस्कुरकर शालिनी का स्वागत किया.. उसकी आँखें अतीत में जाकर सामने खड़ी उस हमउम्र लड़की को पहचान'ने की कोशिश करती रही.. दूसरी और शालिनी दरवाजे से अंदर जाकर नज़रें झुककर खड़ी हो गयी....

"अरे आओ ना.. अंदर आओ.. यहाँ बैठहो.. आराम से...

शालिनी चुपचाप सोफे पर बैठ गयी...

"क्या तुम मुझे जानती हो?" पानी का ग्लास शालिनी की और करते हुए सीमा ने पूचछा.. टफ कपड़े चेंज करने अंदर चला गया था....

शालिनी ने 'ना' में अपना सिर हिला दिया.. और सिर झुकाए ही रही...

सीमा असमन्झस में पड़ गयी.. कुच्छ देर बैठहे रहने के बाद वो 'एक मिनिट' कह कर अंदर चली गयी," हां जी.. मुझे तो ये आपकी सहेली लगती है कोई.. क्या चक्कर है? ना मैं इसको जानती हूँ.. और ना ये मुझे!" सीमा अपने कुल्हों पर हाथ रखकर शरारती अंदाज में मुस्कुराती हुई कपड़े बदल रहे टफ के सामने खड़ी हो गयी...

" बताता हूँ..." कहकर टफ ने अपनी पॅंट उपर की और रोहतक में जो कुच्छ घटा सब सीमा को बता दिया...

"ओह माइ गॉड..! आपने बहुत अच्च्छा किया जो इसको यहाँ ले आए.. कहकर सीमा टफ के गले लग गयी...

"आहा.. आराम से.. आदित्या का कुच्छ ख़याल है की नही.." टफ ने उसको बाहों में भर लिया...

"आदित्या नही.. वैशाली होगी.. मा को ज़्यादा पता होता है.. हां!" कहकर सीमा अलग हट कर नीचे झुक कर अपने हुल्के से उभरे हुए पेट को सहलाने लगी.. और एकद्ूम पलटकर बाहर चली गयी...

"आ अंदर बेडरूम में बैठते हैं.." सीमा ने शालिनी का हाथ पकड़ा और बेडरूम में ले गयी....

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साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always

`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &

(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !

`·.¸.·´ -- raj

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hello dosto main yaani aapka dost raj sharma fi haajir hun vikki our sneha ke pyaar ki aage ki kahani lekar ...... ab aage .....

Thhoda sa hichakte huye sneha ne apne hath mein pakde lund ko neeche jhukaya aur apne honton se chhua diya.. aur fir honton par jeebh ferte huye usko door kar diya...

"kya hua?" vicky tadap sa uthha aur khud hi neeche jhuk kar wapas uske honton se bhidaane ki koshish karne laga..

"kuchh nahi.. ajeeb sa lag raha hai..." ab sneha khul gayi thhi.. poori tarah...

" achchha nahi lag raha kya..?" bechaini se vicky ne poochha...

bina koyi jawab diye.. sneha ne apne honton ko aadha khola aur supade ke agle bhaag ko honto mein daba liya.. aur vicky ki aur dekhne lagi..

vicky ko pahli baar itna aanand aaya thha ki uski aankhein band ho gayi..," aaaah.. "

"achchha lag raha hai...?" ab ki baar sneha ne poochha...

"haaan..." jeebh nikal kar chato na.. pls..." vicky karah uthha.. anand ke maare..

sneha ko koyi aitraaj na hua.. usko ye jaankar bahut khushi huyi ki vicky ko achchha lag raha hai.. apni jeebh nikali aur lund ki jad se lekar supade tak neeche se chaat'ti chali gayi...

"aaaahhhh.. maar daalogi.. tum toh.. aise hi karo.. aur isko munh ke andar lene ki koshish karo..."

sneha toh mast hoti ja rahi thhi... usko bhi bahut maja aa raha thha..

vicky ne dekha sneha apne hath ko uski taangon ke beech se nikalkar neeche le jaane ki koshish kar rahi hai.. vicky ko samajhte der na lagi... wo bhi toh tadap rahi hogi," ek minute.. kahkar vicky ghoom gaya aur jhukte huye apni kohniyan sneha ki jaanghon ke beech tika di.. sneha ki chikni choot ab uski pahunch mein thhi..

sneha ke liye bhi ab aasan ho gaya.. lund uske munh ke upar seedha latak raha tha.. usne apne hont jitna ho sakta tha utne khole aur supade ko munh mein bhar liya...

dono 69 ki sthiti mein thhe.. sneha toh sneha; vicky bhi mano aanand ke aseem sagar mein tair raha ho.. badi hi najukta se usne sneha ki janghon ko apne hathhon se dabaya.. aur ek hath ki ungali se uski choot ki kunwari faankon ko alag karke unke beech chhupe huye chhote se daane ko dekha.. masti se akada hua tha.. choot ka rang andar se sneha ke honton jaisa hi thha.. ekdum gulabi rangat liye huye.

wah jhuka aur sneha ke 'daney' ko choosne laga..

sneha ekdum uchhal si padi aur iss uchhalne mein lund supade se kahin jyada door uske munh mein ho aaya...

sneha itni uttejit hone ke bawjood uske sabse adhik sanwedansheel ang ke saathh chhedchhaad sahan nahi kar pa rahi thi.. masti se wah apni gaand ko idhar udhar matkane lagi.. vicky ne bhi usko kaskar daboch liya.. aur ek musht kayi minuton tak sneha ko jannat ke prathham darshan karata raha...

dono hi baawle se ho chuke thhe.. dono ek dusre ka bharpoor sath de rahe thhe.. ki achanak ek baar fir sneha ke sath wahi sthiti ek baar fir ubhar aayi.. uski taangein kaampne lagi.. sara badan akad sa gaya aur apni jaanghon mein usne vicky ka sir jakad liya..

vicky ko bhi hatne ki jaldi na thhi.. sneha ki boond boond ko wah madhoshi ke aalam mein hi apne gale mein utaar gaya...

udhar sneha bhi uske lund ke sath ab tak buri tarah vyast thi... chaat chaat kar, choos choos kar... kaat kaat kar usne supada laal kar diya tha...

sneha ke dheeli padte hi vicky 'apna' hath mein lekar ghutno ke bal uske munh ke paas baith gaya," tumhe bhi peena padega...?"

"kya?" sneha ke chehre se aseem tripti jhalak rahi thhi...

"yahi.. iska ras.. jo abhi nikalega..." vicky ka hath badi tezi se chal raha thha..

"nahi... rahne do na... pls.." sneha ne request ki..

" rahne kaise doon.. mujhe bhi toh pila diya.. jabardasti.. taangon mein sir bheench kar.."

unn palon ko yaad karke sneha baag baag ho gayi.. fir sharaarat se munh banate huye boli.. "thheek hai... lao pilao.." kah kar usne apna munh khol liya...

uske baad toh 2 hi minute huye honge.. achanak vicky ruka aur sneha ke khule honton mein lund jitna aa sakta thha fansa diya.. ras ki dhara ne sneha ka poora munh bhar diya.. aakhir kaar jab bahar na nikal payi toh muskuraate huye gatak liya...

vicky dhanya ho gaya... hata aur bed par dhadam se gir pada.. sneha uthhi aur apni chhatiyon ko vicky ki chhati par daba kar uske honton ko choomne lagi.. ajeeb si kritagyata uske chehre se jhalak rahi thi...

itni haseen aur kamsin ladki ko apni baahon mein pakar nashe mein hone ke bawjood taiyaar hone mein vicky ko 3-4 minute hi lage... wah achanak uthha aur sneha ko apne neeche daboch liya.. uski aankhon mein fir se wahi bhaav dekhkar sneha muskurayi," ab kya hai..?"

"ab andar..." kahte huye. vicky ne fir uski jaanghein khol di.. aur houle houle tapak rahi choot par najar gada di... aur ek baar fir usko taiyaar karne ke liye ungali aur honton ko kaam par laga diya...

Sneha bhi jald hi fir se fufkaarne lagi... lumbi lumbi saanse aur yoni chhidra mein fir se chiknaayi utar aana iss baat ka saboot thha ki wo uss aseem anand ko dobara pane ke liye pahli baar hone waley dard ko jhel sakti hai...

vicky panjon ke bal baith gaya aur sneha ke ghutno ke neeche se bed par hath jamakar uski jaanghon ko upar uthhs diya... choot hulka si raasta dikhane lagi.. vicky ne supada 'sahi' surakh par set kiya aur sneha ke chehre ki aur dekhne laga..," ek baar dard hoga.. sah logi na...?"

"tumhare liye...." Sneha hamla jhelne ke liye taiyaar ho chuki thhi.. apne pahle pyar ki khatir...

Vicky ke bhi ab baat bardaast ke bahar thhi.. jyada intzaar wo kar nahi sakta thha.. so sneha ki jaanghon ko poori tarah apne vash mein kiya.. aur dabav achanak badha diya...

sneha ke munh se toh cheekh bhi na nikal saki.. ek baar mein hi supada apna raasta apne aap banata hua kafi andar tak chala gaya thha.. sneha ne pahle hi apne munh ko apne hi hathhon se daba rakha thha... lund sardiyon mein jamein huye makkhan mein kisi garam chammach ki tarah ghus gaya thha.. kuchh der tak vicky na khud hila aur na hi sneha ko hilne diya.. aur aagey jhuk kar sneha ki chhatiyon ko dabate huye usko honton ko bhi apne honton ki giraft mein le liya..

dheere dheere 'chammach' ki garmi se 'choot' ka jama huaa 'makkhan' pighal kar bahne sa laga.. iss chiknahat ne dono ke angon ko tar kar diya.. sneha ko laga.. ab ho sakta hai toh usne apni gaand uchka kar vicky ko signal diya...

vicky ne thhoda pichhe hat'te huye ek baar aur prahar kiya.. iss baar andar lene mein sneha ko utani peeda nahi huyi..

kareeb 5 minute baad sneha samanya ho gayi aur ajeeb tarah ki aawajein nikaalne lagi.. aisi aawajein jo kaamottejna ko kayi guna badha dein...

ab dono hi apni apni taraf se poora sahyog kar rahe thhe.. vicky upar se aata aur aanand ki kasti par sawar snehaki gaand neeche se upar ki aur uchhalti aur dono ki jadein mil jati.. dono ek sath aah kar baithhte...

aakhirkaar sneha aaj teesri baar 'aa' gayi... vicky bhi out of control hone hi wala thha.. usne jhat se apna lund bahar nikala aur fir sneha ke munh ke paas jakar baith gaya.. jaise wahan koyi sperm bank khol rakha ho...

Sneha ne shararat se ek baar apne kandhe 'na' karne ki tarah uchakaye.. aur fir muskurate huye apne hont khol diye.. uski aankhon mein ajeeb si chamak thhi... pahle pyar ki chamak!

Subah Vicky uthha toh Sneha uske kandhe par sir rakhe uske balon mein hath ferti huyi uski hi aur dekh rahi thi.. apalak!

"tum kab jaagi?" Vicky ne hulki si muskaan uski aur fainkte huye poochha...

"main toh soyi hi nahi.. neend hi nahi aayi..?" Neend aur pahle pyar ki khumari uski aankhon mein hulki si laali ke roop mein chamak rahi thi.. aur uske chehre par kali se phool ban'ne ka be-intha noor thha.. Vicky ne uski aankhon mein aankhein dali toh sneha ne palkein jhuka li..

"kaisa raha raat ka anubhav?" vicky ne uski aur karwat lete huye sneha ki kamar mein hath daal kar apni aur kheench liya.. aur Sneha muskura kar uss'se chipak gayi.....

" hum kahan rahenge Mohan?" Sneha ne uske gale mein apni gori banhein daal di..

" matlab? " vicky ne najrein chura li...

"main wapas hostel nahi jana chahti.. yahin rahna chahti hoon.. tumhare sath.."

Vicky ne baat taalne ke iraade se apne ek hath se uski chhati ko dabaya aur uske honton ko apne honton mein lene ke liye apna chehra uski taraf badha diya..

kamukta bhare aanand ki lehar Sneha ke poore badan ko dawadoul sa kar gayi.. par wah agle kadam ke baare mein jaan'ne ko chintit thhi.. usne apna chehra sir jhuka kar viky ki chhati mein chhupa liya," batao na mohan.. ab hum kya karenge.. mujhe wapas toh nahi bhejoge na? mujhe ab tumse door nahi jana.."

Vicky ek pal ke liye asamanjhas mein pad gaya.. iss waqt usko Sneha ko wadon ke jaal mein uljhaye hi rakhna thha.. par jane kyun.. Sneha ke seedhe sawaal ka tedha jawaab dene se wah katra raha thha..," par tumhare papa.. unka kya karogi..? Vicky ne sawaal ka jawaab sawaal se hi diya...

Sneha ka ummeedon se bhara mann kshanik kadwahat se bhar uthha..," Papa! hunh... unki paidayish hone ke alawa hamara rishta hi kya raha hai.. Main 8 saal ki thhi jab unhone mujhe hostel mein daal diya.. aaj 11 saal hone ko aa gaye hain.. aur muskil se 11 baar hi maine unka chehra dekha hai.. main unse bahut pyar karti thhi.. hamesha unse milne ko.. ghar jaane ko tadapti rahti thhi.. par unhone.. pata nahi kyun.. mujhe pyar diya hi nahi.. kabhi hostel se ghar lene bhi aata toh unka driver.. ghar jakar pata chalta.. Delhi gaye hain.. bahar gaye hain.. aur mujhe takreeban usi din shaam ko ya agle din wapas bhej hostel mein faink diya jata" Sneha ki aankhon mein ateet mein mili pyar ke abhav ki tadap ke chhipe huye aansoon jinda ho uthhe..," Sab friends ke mummy papa.. unse milne aate.. unko ghar lekar jaate aur wo ladkiyan aakar ghar jakar ki gayi masti ko sabko batati.. socho.. mere dil par kya beet-ti hogi.. ladkiyan mujhe 'anaath' tak kah deti thi.. agar papa aise hi hote hain toh sabke kyun nahi hote mohan.. hum apne bachche ko hostel nahi bhejenge.. apne se kabhi door nahi karenge mohan... Maine mahsoos kiya hai.. bina apnon ke sath ke jindagi kaisi hoti hai.. fir bhi main hamesha yahi sochti thhi ki papa busy hain.. par pyar toh karte hi honge... par kal toh unhone dikha hi diya ki... main sach main hi 'anaath' hoon.." kahte huye Sneha ka gala baith gaya.. aur dil ki bhadaas vilap ke roop mein bahar nikalne lagi...

Vicky se uska rona dekha na gaya.. chehra upar karke uske aansoon pounchhne laga... par dil uska bhi jor se dhadak rahah thha.. uske rone ke pichhe asli karan wahi thha," ab.. rone se kya hoga Sanu? Sambhalo apne aapko... " vicky ne usko apni chhati se chipka liya....

" batao na.. hum kahan rahenge.. kahan hai apna ghar?" Sneha puri tarah se vicky ke liye samarpit ho chhuki thhi.. uske ghar ko apna ghar maan'ne lagi thhi...

" uss'se pahle tumhe meri madad karni padegi... Sanu..!"

" main kya madad kar sakti hoon..? main khud ab tumhare hawaale hoon..!"

" wo toh theek hai.. par agar tumhare papa ko pata chal gaya toh meri jindagi khatre mein pad jaayegi.. ab tak toh FIR bhi ho chuki hogi... ye pata chalte hi ki main thheek thhaak hoon aur tum mere sath ho.. police mujhe uthha legi.. uske baad tum fir akeli ho jaaogi... mujhe jail main bhej denge.. aur Tumhare papa kabhi sachchayi ko saamne nahi aane denge...." vicky ne apni agle plan ki bhumika baandhi....

Sneha sunkar darr gayi.. Uske papa 'powerful thhe.. Aur sach mein aisa kar sakte thhe.. Sneha ke liye toh vicky uske baap ka S.O. hi thha..," Fir.. Ab hum kya karein Mohan!"

"sirf ek hi raasta hai.. Tum pahle media mein jakar sachchai bata do.. Ki tumhare baap ne hi ye sab kiya hai.. aur ye bhi kahna ki tum ab wapas nahi jana chahti.. Fir kuchh din tumhe chhip kar rahna padega..!" Vicky ne Sneha ko wo rasta bata diya jo usko manjil tak le jaane ke liye kaafi thha..

"uske baad toh sab thheek ho jayega na?"Sneha ko ab bhi chinta sata rahi thhi..

"haan.. Uske baad hum sath rah sakte hain.. Khulkar.." Sneha ki sahmati jaankar vicky khil uthha aur usne apna hath sneha ki jaanghon ke beech fansa diya...," Par yaad rakhna.. Tumhe mera kahin jikar nahi karna hai.. Yahi kahna ki main kisi tarah unke changul se bachkar apni kisi saheli ke ghar chali gayi thhi.. Agar mera naam aaya toh wo mujhe dhhoondh lenge...!"

"aaaahh.. Ye mat karo.. Mujhe kuchh ho raha hai.." Apni panty mein Vicky ki ungaliyan mahsoos karke tadap uthhi...

"tumne sun liya na..." Vicky ne apna hath bahar nikal liya..

"haan.. Baba! sun liya.. Kab chalna hai.. Media ke saamne..?"

"main nahi jaaunga.. Tumhe kisi dost ke sath bhej doonga.. Chinta mat karo.. Main aaspas hi rahunga.." kahkar vicky uthh gaya...

"ab kahan bhag rahe ho.. Mujhe chhed kar..!" Sneha ne vicky ko bed par wapas gira liya aur uske upar aa chadhi... Apni taangein vicky ki jaanghon ke dono taraf rakhkar 'wahan' baith gayi aur saamne ki aur jhuk kar apni chhatiyan vicky ki chhati par tika di....

Naya naya khoon munh laga thha.. Ye toh hona hi thha...

Kuchh hi der baad dono ke kapde bed par pade thhe aur dono ek dusre se 'kaam-krida' kar rahe thhe.. Sneha ki aankhon mein ajeeb si tripti thhi.. 'Apni Manjil' ko prapt karne ki khushi mein wo bhav vibhor ho uthhi thhi.. Pyar karte huye bhi uski aankhon mein nami thhi... Khushi ki!

"Riya.. aaj wo ladka nahi aaya na...!" Class mein baithhi Priya ki najrein kisi ko dhhoondh rahi thhi...

"ohooo... Kya baat hai.. aajkal...."

"jyada bakwas matkar.. Pahle toh meri file de di uss ghamchakkar ko .. Ab majaak soojh rahe hain... Aaj practical hai.. Chemistry ka.. agar nahi aaya toh main kya karoongi.." Priya ne munh banakar apne chehre par ubhar aaye sharmilepan ko chhipane ki koshish ki...

"hamare saamne hi toh rahta hai.. Ghar jakar maang lana..!" Riya ne chutki li.. Usko pata thha ki uske ghar mein ye sab nahi chalta....

"tu pagal hai kya..? main uske ghar jaaungi? marwa de mujhe!....... Tu le aana agar himmat hai toh!" Priya ne Riya ko jhidakte huye kaha...

"Main toh kabhi na jaaun? Haan.. Virender ko kah sakti thhi par aaj toh wo bhi nahi dikh raha..

Tabhi class mein Sir aa gaye aur unki guftgu band ho gayi

" may i come in Sir?" 22-23 saal ki chulbuli si ek chharhare badan ki yuvati ne Murari se anadar aane ki ijajat maangi...

"aao jaan e mann.." Murari khush lag raha thha..

" Sir.. Delhi si pandey ji ka fone hai.." kahkar wo wapas chali gayi..

"Nashe mein hone ke bawjood Murari khud ko receiver uthhakar kada hone se na rok paya," Jaihind Sir..!"

" ye kya tamasha hai Murari..? tumhari beti toh sahi salamat hai..?" udhar se gurrati huyi aawaj aayi..

Murari chounke bina na rah saka.. usne toh sneha ko mana kiya thha.. kisi ko bhi kuchh bhi batane se.. fir baat Delhi tak kaise pahunch gayi...," haan.. haan sir.. main abhi aapko fone karne hi wala thha.. wwo Sneha ka ffone ..aaya thha.. abhi abhi.. bus uss'se hi baat kar raha thha.. wo.. kisi ne afwah failayi thi.. sir... main aapko batane hi wala thha.."

"achchha.. afwah failayi thhi.. Jara ek baar TV on karke IBN7 dekho.. tumhari akal thhikane aa jaayegi.. How mean u r!" kahkar pandey ne fone kaat diya..

T.V. toh pahle hi on thha.. bus channel jara dusra thha.. Ftv! Murari ne hadbadahat mein channel search karne shuru kiye.. jaise hi IBN& screen par aaya.. uski aankhein fati ki fati rah gayi.. uski beti jaisi ladki TV par thhi... arrey haan.. wahi toh thhi..!

Murari ko ekdum aisa ahsaas hua mano uske pairon tale jameen khisak gayi ho... wo khada na rah saka aur dhamm se sofe par aa gira...

Sneha baar baar TV screen par wo baatein kah rahi thhi.. jinko wo 100% sach maan rahi thhi.. uske baap ka usko ghoomkar aane ke liye kahne se lekar baap ke gundon se bachkar wahan tak aane ki.... kuchh hi baton mein milawat thhi.. jaise usko nahi pata ki driver kahan hai.. aur wo ab apni kisi purani saheli ke paas rah rahi hai..

"ab main aapko wo recording sunati hoon.. jo mere fone mein default setting hone ki wajah se save ho gayi.... mere papa ne mere paas call ki thhi.." kahte huye Sneha beech beech mein subak rahi thhi.. aur news reader baar baar usko dhairya rakhne ki gujarish kar rahi thhi..

Recording sunkar Murari ka chehra laal ho gaya.. uske dwara kahi gayi baatein jaane anjaane Murari ki aur hi ungli uthha rahi thhi.. beshak uske dimag mein ye khayal bahut baad mein.. virodhi partiyon ki taraf se dhamki bhare fone aane ke jhhoothhe aaropon ko sach sabit karne ke uddeshya se aaya thha...

Channel wale TRP badhane ke chakkar mein baal ki khaal utaarne mein lage thhe.. TV screen par neeche lagataar flash ho raha tha.. " Murari ya Durachari! Exclusive on IBN7"

" Sneha ji.. kahin ismein aapka driver bhi toh shamil nahi hai..?" Anchor ne sawaal kiya...

"Nahi.. main aapko bata hi chuki hoon ki unhone apni taraf se poori koshish ki thhi.. mujhe bachane ki.. par wo usko bhi mere sath hi daal kar le gaye.. fir usne wahan se nikalne mein bhi meri madad ki... baki Recording se sab kuchh saaf hai.."

Anchor ne nahle par dahla thhonka..," par recording main toh aap kah rahi hain ki aap driver ke sath hi hain... aur ab aap kah rahi hain ki aapko driver ke baare mein nahi pata.. wo kahan hai.. iski wajah?"

Sneha ek pal ko sakpaka gayi.. par jald hi sambhalte huye boli...," wo.. wo maine tab jhooth bola thha.. taki papa meri location ke bare mein idea na laga paayein..!"

" par agar Gunde aapke papa ne hi bheje thhe.. toh unko toh maloom hona chahiye thha ki Driver unke gundon ke hi paas hai.. fir unhone aapse poochha kyun?" Anchor ne ek aur bouncer mara...

ye sawaal sunkar Murari ke chehre par hulka sa sukoon aaya.. ," iss loundiya ko toh CBI mein hona chahiye.." uske munh se nikla..

" ye sawaal aap mere papa se hi karein.. unhone kyun poochha..? ya fir ho sakta hai.. wo bhi mere baad bach nikalne mein kaamyab ho gaye hon.. isiliye unhone fone kiya ho..?"

" toh dekha aapne.. hamaare desh ki rajniti kis kadar gir chuki hai.. chand voton ki khatir jo neta.. apni itni pyari beti tak ko daanv par lagaane se nahi chookte.. unke liye aap aur hum jaise insaano ki kya keemat hai.. aap andaja laga sakte hain.. beharhaal.. hum Murari se contact karne ki koshish kar rahe hain.. tab tak lete hain ek chhota sa break.. aap dekhte rahiye.. aaj ki sabse sansanikhej wardaat.. ' Murari ya Durachari ' sirf aur sirf IBN par.. jaayiyega nahi.. abhi aur bhi khulaase hone baki hain.. milte hain Break ke baad!"

Pagal se ho uthhe Murari ne table par rakhi Botal TV par de mari.. Screen toot kar TV se dhunwa nikalne laga.. hadbadahat mein Murari ne Pandey ke paas fone milaya...

" ppandey ji.. sab bakwaas hai.. jhoothh hai.. mere khilaf bahut badi sajis ho rahi hai.. virodhiyon ki aur se..."

" what the hell r u talking about.. ye muhawra bahut purana ho gaya Murari.. mat bhhoolo ki Screen par tumhari apni beti hai.. jo tumhare shadyantra ka khulasa kar rahi hai... ab ho sake toh jaldi se apni beti ko apne control mein lo.. warna aap kal se party mein nahi hain.. aap jaise aadmi ki wajah se hum party ki chhavi ko nuksaan nahi pahuncha sakte..!" party aalakamaan ka gussa saatwein aasman par thha..

"ssir.. suniye toh.. wo.. wo meri beti nahi hai... main ye baat prove kar sakta hoon.. Main wo DNA PNA ke liye bhi taiyar hoon. sir.. wo meri biwi ki najayaj aulaad hai.. sali kutia.. apni maa par gayi hai.. madar chod.. bik gayi! wo mera khoon nahi hai sir.." Murari anap shanaap jaane kya kya ugle ja raha thha..

"Mind ur language.. Murari! we have nothing to do wd ur past or whatever u r talking about.. just try to take back ur child in ur favour or be ready to be kicked out...!" kahkar Pandey ne patak se fone kaat diya..

kafi der se wo darwaaje par khadi Murari ki call ke khatam hone ka intzaar kar rahi thi... jaise hi call disconnect huyi.. usne andar aane ki ijaajat maangi," may i come in,Sir?"

"tu.. sali kutiya.. yahan khadi hokar kya sun rahi hai..? behanchod.. andar aa.."

Shalini darr ke maare kaampne lagi.. 2 din pahle hi usne Murari ke office ko join kiya thha.. yun toh office ke har employee ko Murari ki charitraheenta ka pata thha.. par noukri ka laalach aur sunder aur kunwari ladkiyon ko achchhi tankhwah dene ka Murari ka record ladkiyon ko wahan kheench hi lata thha.. waise bhi Murari office mein 5-6 mahinon se jyada kisi ladki ko rakhta nahi thha...," sirr.. wo.. IBN7 se baar baar aapke liye call aa rahi hai.." shalini sukhe patte ki tarah thar thar kaampti thhodi si andar aakar khadi ho gayi...

" unn behan ke lodon ko toh main baad mein dekh loonga.. pahle tu bata.. kya sun rahi thhi.. chhip kar..!" Murari khada hokar Shalini ke paas gaya aur uska girebaan pakad kar kheench liya.. shirt ka ek button toot kar farsh par ja gira.. Shalini ki safed Bra shirt mein se jhalak uthhi..

" kuchh.. nahi sirr.. maine kuchh nahi suna.. mmmain toh abhi aayi thhi.. pls sir.. mujhe maaf kar dijiye.. aayinda aisi galati nahi hogi..." Shalini ne Murari ke munh se aa rahi tej badbu se bachne ke liye apna chehra ek taraf karke apna hath upar uthhaya aur.. uske aur murari ke chehre ke beech mein le aayi...

Murari ne shalini ka wahi hath pakda aur usko mod diya.. dard ke maare wo Ghoom gayi.. uski gaand Murari ki jaanghon se sati huyi thhi..," aah.. chhod dijiye Sir.. pls.. main aapke hath jodti hoon...

Ab tak shalini ke kunware aur garam khoon ki mehak pakar Murari ki aankhon mein waasna ke laal dorey tairne lage thhe..," chhod dun.. sali.. kutiya.. tujhe chhod dunga toh kya teri maa ko chodunga... chhupkar baat sun'ne ki saja toh tujhe milegi hi.." kahte huye murari ne usko jor se dhakka diya aur sambhalne ki koshish karti huyi si shalini Bed ke kone par ja giri..

turant hi uthhte huye ussne jahan se button toota hua thha.. wahan shirt ko apne hath se pakad liya.. aur gidgidaane lagi..," main barbaad ho jaaungi Sirr.. mujhe nahi karni noukri.. aap mujhe jaane dijiye pls.. jaane dijiye.." jo kuchh hone wala thha.. uski kalpana karke hi shalini sihar uthhi.. aur fafak kar rone lagi...

"chup kar kutiya.. jyada natak mat kar.. nahi toh kabhi wapas nahi ja paayegi... tu meri baatein sunn'ne ki himmat karti hai.. Murari ki baatein.." Murari ne kahte huye uske baalon ko pakad kar upar ki aur kheench liya.. asahay si ho uthhi Shalini ki aidiyan dard ko kum karne ki khatir upar uthh gayi.. tab bhi baat nahi bani toh uske hath upar uthhkar apne balon ko neeche ki aur kheenchne lage...," pls.. sir.. main mar jaaungi.. mujhe jaane do...!"

Murari ne ek baar fir uski shirt ko pakad kar kheencha aur shirt par uski ijjat ke rakhwale button dum tod gaye.. fati huyi shirt mein Shalini ka kamsin badan Daru ke nashe mein aur ijaafa kar raha thha... baal kheenche hone ki wajah se wo baithkar apne aapko chhupa bhi nahi sakti thhi.. asahay khadi thhi.. bilbilate huye.. bilakhte huye...

"isko khol sali..! warna ise bhi faad dunga.." nashe mein tunn Murari ne Shalini ki bra mein hath daal diya... uski chhoochi par ubhara huaa mota daana Murari ki ungaliyon se takra kar saham gaya... Murari apni beti ka gussa uss bechari par nikal raha thha....

"pls sir.. mere baal chhod dijiye.. bahut dard ho raha hai..." Shalini cheekh si padi...

"Bra nikal pahle.. nahi toh ukhad dunga saare..?" Murari ne baalon ko aur sakhti se kheench liya..

"aaah.. nikalti hoon.. sir.. bhagwaan ke liye.. pls.. ek baar chhod dijiye baal.. aaah.."

Murari ne jhatka sa dete huye uske balon ko chhod diya... aur jakar darwaja band kar diya..

Shalini ne ek baar apni najarein uthhakar Murari ki taraf iss tarah dekha jaise koyi masoom hiran sher ke panjon se ghayal hokar uske pairon mein pada ho aur apni jindagi ki bheekh maang raha ho.. par Murari par iska koyi farq nahi pada.. wah sher thhode hi thha.. wah toh bhediya thha.. jo bina bhookh lage bhi shikar karte hain.. sirf shikar karne ke liye.. apni kutsit raakshashi bhawnao ki tripti ke liye..," Nikalti hai sali ya kheench kar faad doon..."

aur koyi raasta bacha bhi na thha... shalini ne pichhe hath lejakar bra ke hook khol diye.. bra dheeli hokar neeche sarak gayi.. usne jhuk kar 50 saal ke rakshas ke saamne nange khade apne jism ko dekha aur foot foot kar rone lagi...

" kya ri shalini teri choochiyan toh badi mast hain.. kya masalti hai inn par!" Shalini ke krandan se beparwah Murari ne aage badhkar bra ko kheenchkar nikal diya aur uski mast kabutaron jaisi gori choochiyon ko bari bari se masalne laga... Shalini ko chakkar aa rahe thhe.. Murari itni kamukta se unko masal raha thha ki yadi uski jagah uska 'Rohit' hota toh najara hi kuchh aur hota.. jisko ussne aaj tak khud ko unke paas fatakne tak nahi diya thha... Shalini ke lagataar bah 5rahe aansuon se uski choochiyan geeli ho gayi thi...

"chal jeans khol..! teri choot bhi inki tarah karaari hogi.. shave kar rakhi hai ya nahi.... agar..." Murari ka vakya adhura hi rah gaya.. darwaaje par joron se khatkhat hone lagi...

"koun hai madarchod.. kisne himmat ki darwaaje tak aane ki.." usne fone uthhakar guard ko fone milaya.. par kisi ne fone nahi uthhaya..!

" abey... kahan apni maa ka.. koun hai be.. chal fut..." par darwaje par khatkhat ki aawaj badhti hi gayi...," tu ruk ek baar.. saale behan ke..." darwaaje ke khulte hi Murari ka sara nasha utar gaya.. uski aankhein fati ki fati rah gayi...... adhuri baat usne apne gale mein thhook ke sath gatak li.. aur darwaja bahar se band karte huye nikal gaya...

" We r from C.I.A. Bhiwani Mr. murari, durachari aur whatever.. u r under arrest.." 3 sipahiyon aur ek A.S.I. ke sath khade Inspector ne uska swagat kiya...

Murari fati aankhon se usko dekhta raha.. fir sambhalte huye bola..," tu jaanta toh hai na main koun su!" Murari ne bandar ghudki di...

" haan.. kuchh der pahle T.V. par dekha thha.. kutte se bhi gaya gujra hai tu.. lanat hai 'baap' ke naam par.. par tu shayad mujhe nahi jaanta.. Mujhe Tough kahte hain.. tough.. chal thhane.. baki ki kundli wahan sunata hoon.. Daal lo isko.." tough ne sipahiyon ki aur ishara kiya....

"ek minute.. tum toh bhiwani se ho.. tum mujhe kaise arrest kar sakte ho..?" Murari uski tone se buri tarah darr gaya thha..

"abbey chutiye.. hindi samajhta hi nahi hai.. saaalo.. itne crime karte ho.. toh thhoda sa G.K. bhi rakha karo.. kidnapping wala natak tune wahi rachaya thha na.. toh kya police london se aayegi.. bhootni ke..." kahkar Tough ne usko sipaahiyon ki aur dhakela.. aur jaane ke liye wapis mud gaya....

"Mujhe bachao pls.. mujhe yahan se nikao.." darwaja anadar se thhapthapay gaya toh tough chounk kar palta.. ek pal bhi bina gunwaye usne darwaja khol diya.. aur andar ka drisya dekhkar chounk pada..

Farsh par sharaab ki botal tooti padi thhi.. TV ka screen toota hua thha... aur tough ki aankhon ke saamne aankhein jhukaye apni fati huyi shirt ko apne badan par kisi tarah lapete khadi Shalini bhi jaise tooti huyi hi thi.. uske baal bikhre pade thhe aur badhawaas si lagaatar bah rahe apne aansuon ko apni aasteen se pounchhne ki koshish kar rahi thhi..

"ohhh.. ek minute.." tough lagbhag bhagte huye andar gaya aur bed ki chadar kheench kar Shalini ke badan ko dhak diya...

"ye sab kya hai?" Tough ne sipahiyon ke sath ja rahe Murari ko aawaj lagakar wapas bula liya," andar lao isko!"

Muraari vicky ke bichhaye jaal, apni niyat aur niyati ke chakravyuh mein buri tarah se fans gaya thha.. hamari media aajkal ekmatra achchha kaam yahi kar rahi hai ki wo muddon ko iss tarah uthhati hai jaise iss-se pahle aisa kabhi nahi hua... aur unke dwara dikhayi gayi khabar par agar prasashan turant karyawahi nahi karta toh ve prayojit karna shuru kar dete hain ki sab mile huye hain.. badi machhliyon ke maamle mein toh wo khas tour par aisa karte hain.. beshak aisa wo apni TRP badhane ke liye karte hain.. par aaj unke dikhaye telecast se kum se kum jo ek achchha kaam hua wo ye.. ki bechari Shalini ki ijjat taar taar hone se bach gayi.. Delhi mein baithhe party ke ala netaao ne party ki chhavi bachane ke liye adhikaariyon par turant karyawahi ka dabaav banaya aur uska hi nateeja thha.. ki bhiwani Police Department mein haal hi mein promotion pakar Inspector baney Sabse kaabil aur dabang Tough ko ye kaam sounpa gaya....

"ye kya hai Muraari..?" tough ko laga Shalini baat karne ki halat mein nahi hai... isiliye Murari se hi poochh liya...

" kuchh nahi hai.. ye.. kuchh bhi nahi.. bus.. wo iski shirt ulajh kar fat gayi thhi.. toh usse badlane ye mere bathroom mein gayi hogi... hai na beti!"

Shalini ne aage badh kar ek jordaar tamacha uske munh par raseed diya..aur foot padi," haraamjaade, Kutte.. tujhe pata bhi hai ki beti kya hoti hai... kaminey.. tujhse jyada gira huaa insaan maine apni jindagi main nahi dekha.. thhoo..!" Shalini ke munh se thhook ke roop mein nikli badduaa Murari ke badsoorat chehre par jakar chipak gayi...

" yahan city thhane ka no. kya hai.. jara poochh kar batao!" tough kanooni tour par iss maamle ko deal nahi kar sakta thha.... isiliye A.S.I. ko usne Rohtak City mein contact karne ko kaha...

kuchh Der baad Vicky ne city thhana incharge ko fone kiya..

"city thhana Rohtak se hawaldaar Brijlal, bataayiye kya sewa karein.." fone par ek rati ratayi si aawaj nikli..

" main Bhiwani C.I.A. Staff se Inspector ajeet bol raha hoon.. S.H.O. sahab se baat karwaayein jara..

" jaihind Janaab.. abhi karwata hoon.. kahkar brijlaal ne line forword kar di..

"Hello!"

" main Bhiwani C.I.A. Staff se Inspector ajeet bol raha hoon.. aapke yahan se Muraari ji ko arrest karke le ja raha thha.. yahan kuchh aur bhi panga hai.. aap aa jaayiye jara... lady staff ko lana mat bhoolna" Tough ne uski pahchaan jaane bina hi apni baat poori kar di..

"kyun kya huaa..? Murari ji arrest ho gaye..?" Vijender chounk kar chair se khada ho gaya..

"haan.. muraari ji arrest ho gaye.. aur ho sakta hai ki aaj raat inhe aap hi ki sewa ki jarurat pade.. aap aa jaayiye..!" Tough ne Muraari ko kadwahat se dekhte huye kaha.. wo sahma hua thha.. par vijender ke paas rahne ki soch kar uske chehre par rounak si aa gayi... wo toh uska hi pala huaa kutta thha...

"thheek hai.. hum abhi aate hain.. kahkar vijender ne fone rakh diya aur hadbadahat mein chalne ki taiyaari karne laga...

wahan pahunchte hi Vijender sara maajra samajh gaya.. Murari rah rah kar uski aur kuchh ishara sa karne ki koshish kar raha thha.. par vijender ne uski aur dekha hi nahi..

poori baat sunn'ne ke baad Vijender bola..," tab toh aaj aapko iski custody hamein deni hogi.. hum dono ko lejakar ladki ke bayan likhwa lete hain.. agar jarurat padi toh isko subah court mein pesh kar denge.. aap wahan se inki custody le lena..

"OK Sir.. Hum kal milte hain....!" kahkar Tough ne vijender se hath milane ke liye aage badhaya hi thha ki ab tak chup chap khadi Shalini cheekh uthhi...," nahi.. main inke sath nahi jaaungi.. ye toh yahi pade rahte hain hamesha.. iss kutte ke paas...!"

sharam ke maare vijender ki aankhein jhuk gayi..," aisi baat nahi hai madam.. duty is duty.." usne shalini ko aaswast karne ki koshish ki...

" Nahi pls.. mujhe inke bharose chhod kar mat jaayiye.. mere bayan yahin likh lijiye aur mujhe jaane dijiye...

" dekho beti. aisa ho nahi sakta hai.. aapko thhane chalna hi padega...!" Vijender ne apne gale ka thhook gatka..

Tough ab tak sthiti ko samajh gaya thha," Kyun nahi ho sakte sir..? yahan bayan kyun nahi ho sakte..? kya main jaan sakta hoon..?"

"idhar toh aao yaar ek baar.." vijender ne tough ka hath pakad kar ek taraf le jane ki koshish ki..

"nahi.. main idhar udhar nahi jata... aap yahin ladki ke bayan likhye aur isko jaane dijiye.. aaj Muraari aap ka mehmaan hai.. ji bhar kar khatirdari karna.. kal iski saari doodh dahi main bahar nikal doonga..." Tough ne apni police cap sir par rakhte huye apne iraadon ka parichay diya...

Vijender kuchh na bola.. aur munshi ko Jeep se kaagjaat uthhakar laane ko kaha..," haan boliye madam.. kya shikayat hai..." uske bol mein rukhapan saaf jhalak raha thha...

Shalini ke bayan likhwane ke baad Tough uski aur mukhatib huaa..," toh shivani ji.. aap ghar ja sakti hain.. ya hum aapko chhod kar aayein..."

Shalini subakne lagi... kuchh der baad sambhal kar boli..," mera ghar nahi hai.. main toh mahila aasharam mein rahti hoon.."

"yaar ye saare kismat ke maare rohtak mein hi rahte hain kya.." tough mann hi mann budbudaya.. fir pratyaksh mein bola," ohh.. i mean.. wahan chhod dete hain.. ya koyi aur problem hai..?"

" wahan se inke liye ladkiyan aur aurtein bheji jaati hain.. wahan toh ye kuchh bhi kara sakte hain.." Shalini ne najrein jhukaaye huye hi jawaab diya..

Tough ke ji main aaya.. wahin par Murari ka raam naam kar de.. par aajkal wo kaanoon se kuchh jyada hi bandh gaya thha.. seema ne usko kitna badak diya," sala kutta!" kahte huye tough ne fone nikala aur Seema ke paas fone milaya..,"

" mil gayi fursat tumhe.. subah se fone laga rahi hoon.. uthha kyun nahi rahe.." Seema ke bol mein pyar aur gussa.. donon mehak aa rahi thhi.. aur dono badi laajwaab thhi...

" tumhari ek saheli ghar aa rahi hai.. apni taiyaari kar lena.. baad mein mat kahna bataya nahi.." tough ka inspectory lehja gayab hokar 'myaaun' ho gaya

" kya.. koun.. kab?" Seema ne chahakti huyi aawaj mein jaane kitne sawaal daag diye...

" abhi rohtak main hoon.. kareeb 2 ghante lagenge.. aane mein.. baki baad mein..."

"suno.. suno.. suno.." Seema bolti rah gayi aur tough ne fone kaat diya...

" mere sath mere ghar chalne mein toh koyi problem nahi hai na.. meri patni bhi yahin se hain.. rohtak se..

Shalini ne najrein uthhakar tough ko kritagyata ki dristi se dekha.. kismat ke maare chehre par khushi ki sahmati ki hulki si muskaan ubhar aayi...

tough ne Vijender se complaint ki receiving li, kuchh aur khana poorti ki aur ,"Achchha toh janaab.. hum chalte hain.. Jaihind!" kahkar Gadi ki aur chal pada..... Shalini uske pichhe pichhe chal di aur gadi mein baith gayi....

"yaar... Tujhse ek madad chahiye thhi..." Vicky ne Sneha se alag hote huye tough ko fone kiya...

"Bol mere yaar... Jaan de doon???" Tough Shalini ko lekar ghar ki aur chala hi thha...

"wo tune news toh dekhi hi hogi.. Murari kaand!" Vicky ne apna sir khujlaya... Wo samajh nahi pa raha thha baat kahan se shuru karey!

"sach mein yaar.. Murari jaise ghatiya log kaise rajniti mein baney rahte hain.. Itna bakwas aadmi maine aaj tak nahi dekha.. Kal saale ki akal thhikane laga doonga..!" Tough ne kahte huye kankhiyon se Shalini ki aur dekha.. Halanki kapde change karne ke baad wo kafi had tak normal mahsoos kar rahi thhi par uski aankhein ab bhi sahmi huyi thhi.. Doodh ka jala chhachh ko bhi foonk foonk kar peeta hai..

"akal thhikane laga dega matlab...??? Tum usko personally jaante ho kya?" Vicky ko uski baat kuchh atpati si lagi...

"main aise kutton se ittifak nahi rakhta.... Darasal uska case mujhe hi handover kiya huaa hai....." Aur vicky ne tough ko beech mein hi rok diya," Kyaaa????"

"Haan.. Uski chamdi ka maap mujhe hi lena hai... Khair chhod.. Tu bata.. Kisliye fone kiya..?" Tough ne kaam ki baat par aate huye kaha...

"nahi.. Kuchh nahi.. Bus aise hi yaad kar liya thha... Achchha ab rakhta hoon... Baar koyi hai shayad..." kahkar vicky ne turant fone kaat diya...

"Ajeeb aadmi hai.. Ab toh kah raha thha ki kuchh kaam hai.." Mann hi mann badbadaate huye tough ne Gadi apne ghar ki parking mein ghusa di... Wahan Seema unka beshabri se intzaar kar rahi thhi...

Andar jaane par Seema ne muskurakar Shalini ka swagat kiya.. Uski aankhein ateet mein jakar Saamne khadi uss hamumra ladki ko pahchan'ne ki koshish karti rahi.. Dusri aur Shalini darwaje se andar jakar najrein jhukakar khadi ho gayi....

"arey aao na.. Andar aao.. Yahan baithho.. Aaram se...

Shalini chupchap sofe par baith gayi...

"kya tum mujhe jaanti ho?" pani ka glass Shalini ki aur karte huye Seema ne poochha.. Tough kapde change karne andar chala gaya thha....

Shalini ne 'na' mein apna sir hila diya.. Aur sir jhukaye hi rahi...

Seema asamanjhas mein pad gayi.. Kuchh der baithhe rahne ke baad wo 'ek minute' kah kar andar chali gayi," Haan ji.. Mujhe toh ye aapki saheli lagti hai koyi.. Kya chakkar hai? Na main isko jaanti hoon.. Aur na ye mujhe!" Seema apne kulhon par hath rakhkar shararati andaj mein muskurati huyi kapde badal rahe tough ke saamne khadi ho gayi...

" batata hoon..." kahkar tough ne apni pant upar ki aur Rohtak mein jo kuchh ghata sab Seema ko bata diya...

"oh my God..! Aapne bahut achchha kiya jo isko yahan le aaye.. Kahkar Seema Tough ke gale lag gayi...

"aaha.. Aaram se.. Aaditya ka kuchh khayal hai ki nahi.." Tough ne usko bahon mein bhar liya...

"aaditya nahi.. Vaishali hogi.. Maa ko jyada pata hota hai.. Haan!" kahkar Seema alag hat kar neeche jhuk kar apne hulke se ubhre huye pate ko sahlane lagi.. Aur ekdum palatkar bahar chali gayi...

"aa andar bedroom mein baithhte hain.." Seema ne Shalini ka hath pakda aur bedroom mein le gayi....
 
गर्ल्स स्कूल--42

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा पार्ट 42 लेकर हाजिर हूँ अब आप कहानी का मज़ा लीजिए

विकी ने फोन काट-ते ही शमशेर को फोन लगाया," कहाँ हो भाई? कितने दिन से आपका फोन नही लग रहा..." विकी की आवाज़ में बेचैनी सी थी...

"मैं आउट ऑफ स्टेट हूँ यार.. और मेरा सेल गुम हो गया था.. आज ही नंबर. चालू करवाया है.. दूसरा सेल लेकर.. क्या बात है..?"

"मुझे तुझसे मिलना था यार.. कब तक आ रहे हो वापस..?"

"मुझे तो अभी कम से कम 8-10 दिन और लग जाएँगे.. तू बात तो बता..!" शमशेर ने कहा..

"बात ऐसे बताने की नही है.. मिलकर ही बतानी थी.. बहुत टाइम लग जाएगा... तू बता ना.. कहाँ है? मैं वहीं आ जाता हूँ..."

"ऊटी!... आजा!" शमशेर ने मुस्कुराते हुए कहा....

"भाभी जी साथ ही हैं क्या?"

"ना.. वो तो गाँव में है.. !"

"चल छ्चोड़.. मैं कुच्छ और देखता हूँ... अच्च्छा!"

"अरे तू बता तो सही.. मैं फिलहाल बिल्कुल फ्री हूँ..." शमशेर ने गाड़ी सड़क किनारे रोक ली... उस वक़्त वो अकेला ही था..

"अच्च्छा सुन.. पर लेक्चर मत देना.. बस कुच्छ मदद कर सको तो..."

"अबे तू बोल ना यार.. बोल!"

विकी ने शुरू से आख़िर तक की सारी रामायण सुना दी.. इस दौरान शमशेर कयि बार चौंका.. केयी बार मुस्कुराया और केयी बार कहीं और ही खो जाता.. जब विकी की बात बंद हो गयी तो शमशेर बोला," तू भी ना यार.. पूरा घंचक्कर है.. वो तो तेरी किस्मत साथ देती चली गयी.. वरना.. खैर अब प्राब्लम क्या है?"

"प्राब्लम ये है कि उसको मुझसे प्यार हो गया है.. मुझसे अलग होने को तैयार ही नही है.. कह रही है मर जाएगी..." विकी ने बेचारा सा मुँह बनाया..

विकी की इश्स बात पर शमशेर ज़ोर से हंसा.. ," आख़िर फँस ही गया तू भी..!"

"तुझे पता है यार.. ये 'प्यार व्यार' मेरी समझ से बाहर की बात है.. पर जब तक मुरारी से सौदा नही होता.. तब तक तो इसको ढोना ही पड़ेगा...." विकी ने अपने दिल की बात कही..

"तो उसके बाद क्या करेगा?" शमशेर ने लंबी साँस ली..

"उसके बाद मैने क्या करना है.. वो मुझे मोहन के नाम से जानती है.. एक बार मल्टिपलेक्स मिल गया तो दोनो बाप बेटी कितना ही रो लें.. मेरी सेहत पर कोई असर नही पड़ेगा.. मेरे पास इश्स बात का सॉलिड प्रूफ है की उस दौरान में आउट ऑफ कंट्री था....."

शमशेर ने उसको बीच में ही टोक दिया..," वो सब तो सही है.. मैं पूच्छ रहा हूँ स्नेहा का... उसका क्या करेगा?"

"वो मेरी टेन्षन नही है यार... उसके बाद वो भाड़ में जाए.. तब तक बता ना.. क्या करूँ?"

"देख मुझे पता है.. तू किसी की सुनेगा तो है नही.. पर सब ग़लत है.. किसी के दिल पर चोट नही करनी चाहिए.. तूने वादा किया है उसको..!" शमशेर उसकी बात से आहत था..

"यार.. तू सिर्फ़ मुझे ये बता की तब तक मैं इसका क्या करूँ?" विकी ने सारी बातें गोलमोल कर दी...

"घुमा ला कहीं.. ऊटी लेकर आजा.. फिर साथ ही चल पड़ेंगे.." शमशेर ने राई दी..

"यही तो नही हो सकता यार.. आगे का सारा काम मुझे ही करना है अब ... किसी तरह इस-से पीछा छुड़ाओ यार.."

"मैं क्या बताऊं..? या फिर लोहरू छ्चोड़ दे.. वाणी उसको अपने आप सेट कर लेगी.. पर बाद में लोचा हो सकता है.. अगर तूने उसको छ्चोड़ दिया तो.. उसके बाप के पास!"

"ग्रेट आइडिया बॉस.. गाँव में तो कोई शक करेगा ही नही... और उसका दिल भी लग जाएगा.. वाणी और दिशा के पास... तू बाद की फिकर छ्चोड़ दे.. मुझे पता है मुझे क्या करना है... वो कभी वापस नही जाएगी.. मैं एक तीर से दो शिकार करूँगा...!" विकी स्नेहा का भी शिकार ही करना चाहता था.. काम पूरा होने के बाद...

"ठीक है.. जैसा तू ठीक समझे. मैं दिशा को समझा दूँगा.. तू बेशक आज ही उसको वहाँ छ्चोड़ दे...."

"थॅंक यू बॉस! मुझे यकीन है.. स्नेहा वहाँ से वापस मेरे साथ आने की ज़िद नही करेगी.. मैं उसको समझा दूँगा.. और हां.. टफ से तुझे ही बात करनी पड़ेगी.. ये पोलीस वालों का कुच्छ भरोसा नही होता..."

"ओके, मैं कर लूँगा...." शमशेर हँसने लगा और फोन काट दिया....

"रिया.. यार अब मैं क्या करूँ? तूने तो मेरी ऐसी की तैसी करा दी..!" प्रिया ने राज के ना आने का सारा दोष रिया पर मढ़ दिया..

"क्यूँ? मैने ऐसा क्या किया?" रिया ने हैरान होते हुए पूछा... दोनो पहली मंज़िल पर पिछे की और बने अपने कमरे में पढ़ रही थी..

"मैने ऐसा क्या कर दिया..!" प्रिया ने मुँह बनाकर रिया की नकल की..," तूने ही तो उस ईडियट को फाइल दी थी.. लेते वक़्त तो इतना शरीफ बन रहा था... अब कल 'सर' को क्या तेरा तोबड़ा (फेस) दिखाउन्गि कल..."

"दिखा देना! क्या कमी है... सर दिल दे बैठेंगे.. बुढ़ापे में.. जान दे बैठेंगे अपनी" रिया ने चुलबुलेपन से कहा..

"तू है ना.. बिगड़ती जा रही है... मम्मी को बोलना पड़ेगा.." प्रिया ने रिया को प्यार से झिड़का..

" बोल दे.. वो भी तो कहती हैं.. 'कितनी क्यूट है तू!' रिया ने स्टाइल से अपने लूंबे बलों को पिछे की और झटका दिया...

"ज़्यादा मत बन.. शकल देखी है आईने में कभी...?" प्रिया अपनी किताब को बंद करते हुए बोली....

"हां.. देखी है.. बिल्कुल तेरे जैसी है.. अब बोल" रिया ने भी अपनी किताब बंद कर दी और हँसने लगी...

"तू यार.. ज़्यादा फालतू बातें मत कर... बता ना.. अब मैं क्या करूँ?" प्रिया ने मतलब की बात पर आते हुए बोला...

"यहीं.. खिड़की के पास चिपका बैठा होगा... छत से माँग ले..." रिया ने शरारती मुस्कान फैंकते हुए कहा..

" तू जाकर माँग ले ना.. बड़ी हिम्मत वाली बन'ती है.. छत से माँग लून.. वो भी रात के 9:00 बजे.. पिच्छली बात भूल गयी क्या..?"

रिया एक पल को अतीत में चली गयी...," मुझे उस लड़के की बड़ी दया आई थी.. पापा ने सही नही किया प्रिया..."

"सही नही किया तो कुच्छ खास ग़लत भी नही था.. दिन में हमारे घर के इतने चक्कर लगाता था.. पागल था वो..." प्रिया ने अपना नज़रिया उसको बताया..

" गली में ही घूमता था ना.. हमें कुच्छ कहा तो नही था.. इतना मारने की क्या ज़रूरत तही.. वैसे समझा देते.. देख भाई.. मुझे तो बहुत बुरा लगा था.. उस रात खाना भी नही खा सकी थी.. बेचारे के चेहरे पर कैसे निशान पड़ गये थे..." रिया का मूड ही ऑफ हो गया...

उस दिन को याद करके प्रिया भी सिहर उठी... कोई काला सा लड़का था.. उनकी ही उम्र का.. गली में लगभग हर एक को यकीन हो गया था कि इसका थानेदार की बेटियों के साथ कुच्छ ना कुच्छ चक्कर तो ज़रूर है.. इन्न दोनो की भी आदत सी हो गयी थी.. उसको खिड़की से आते जाते उनकी और चेहरा उठाकर देखते हुए देखना और फिर उसका मज़ाक बना कर खूब हँसना... उस दिन पापा ने उस्स्को खिड़की में से झाँकते देख लिया था.. लड़का मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया.. पर उसकी किस्मत खराब थी.. पापा लगभग भागते हुए उसके पिछे गये थे और उसको घसीट'ते हुए घर के सामने ला पटका... सारी कॉलोनी के लोग बाहर निकल आए.. पर कोई कुच्छ नही बोला तहा.. सब चुपचाप खड़े तमाशा देखते रहे.. उनके पापा ने उसको मार मार कर अधमरा कर दिया था.. बाद में पोलीस जीप उसको ले गयी थी.. दोनो लड़कियाँ अपने दिल पर हाथ रखकर खिड़की से सब कुच्छ देख रही थी... वो दिन था और आज का दिन.. लड़कियाँ कभी भी पैदल स्कूल नही गयी... पोलीस की जीप ही उनको लाती ले जाती थी.....

"कहाँ खो गयी प्रिया...!" रिया ने उसके चेहरे के सामने हाथ हिलाया...

"कहीं नही यार.. सच में; पापा ने सही नही किया था.. मारना नही चाहिए था उसको..." प्रिया ने चेर से उठहते हुए कहा...

"कहाँ जा रही हो..?" रिया ने कमरे से बाहर निकल रही प्रिया को आवाज़ लगाई....

"अभी आती हूँ.. ठंडा पानी ले आऊँ.. नीचे से..." प्रिया ने अगले रूम में जाकर खिड़की से बाहर की और झाँका.. राज खिड़की के सामने ही बेड पर बैठा हुआ पढ़ रहा था.. उसको देखकर प्रिया को जाने क्यूँ.. शांति सी मिली! कुच्छ देर वह यूँही खड़ी रही.. करीब 1 मिनिट बाद ही राज ने चेहरा खिड़की की और उपर उठाया.. और खिड़की में खड़ी प्रिया को देखकर खिल सा गया.. प्रिया उसके बाद वहाँ एक पल के लिए भी ना रुकी.. नीचे भाग गयी.. पता नही क्यूँ?

"ए... रिया.. वो तो खिड़की के पास ही बैठा हुआ है..!"

"अच्च्छा.. उसको ही देखने गयी थी.. मैं सब समझती हूँ डार्लिंग.." रिया खिलखिलाकर हंस पड़ी...

" नही यार.. बाइ गॉड.. मैं पानी लेने ही गयी थी.. वो तो बस ऐसे ही दिख गया...." फिर कुच्छ हिचकिचाते हुए बोली," इधर ही देख रहा था..."

"ये कोई नयी बात है.. मुझे तो वो हमेशा इधर ही सिर उठाए मिलता है..." रिया ने बत्तीसी निकालते हुए कहा...

"तो इसका मतलब तू भी उसको देखती रहती होगी.. है ना.." प्रिया ने उसकी और उत्सुकता से देखा.. राज के बारे में बात करते हुए उसके दिल को अजीब सी तसल्ली मिल रही थी...

"मैं क्यूँ देखूं.. भला उस बंदर को.. मुझे भी ऐसे ही दिख जाता है.. जैसे आज तुझे दिख गया..." रिया बेड पर आकर पालती मारकर बैठ गयी...

"हूंम्म.. बंदर.. तुझे वो बंदर दिखता है.. कितना स्मार्ट तो है.. और कितना इंटेलिजेंट भी.." प्रिया अपने आपको रोक ना पाई..

"देखा.. मैं कह रही थी.. ना.. कुच्छ तो बात ज़रूर है.. मैने तुम्हारे मॅन की बात जान'ने के लिए ही ऐसा कहा था.."

प्रिया ने तकिया उठाकर उसके सिर पर दे मारा..," ज़्यादा डीटेक्टिव मत बन.. मुझे उस'से क्या मतलब.. पर सच तो कहना ही पड़ेगा ना.."

" सबके बाय्फरेंड्स हैं प्रिया.. हमारा क्यूँ नही... कितना मज़ा आता ना अगर कोई होता तो..?" रिया ने ये बात पुर दिल से कही थी.. इसमें कोई शरारत नही थी.. प्रिया भी समझ गयी...

" आचार डालना है क्या?... बाय्फ्रेंड का.. मुझे तो कोई अच्च्छा नही लगता.. सब के सब एक जैसे होते हैं... श्रुति का पता है तुझे.. उसको उसका बाय्फ्रेंड बहलाकर अपने कमरे पर ले गया...." दरवाजा बंद करके वापस आई प्रिया अचानक चुप हो गयी...

"फिर क्या हुआ... बता ना..?" रिया आँखें फाड़ कर उसको देखने लगी... पहली बार प्रिया ने उसके सामने इस तरह की बात की थी...

"होना क्या था... बेचारी रोती हुई वापस आई थी..." प्रिया बीच की बात खा गयी.....

"क्यूँ... तुझे कैसे पता..... बता ना प्लीज़..." रिया उसका हाथ पकड़ कर सहलाने लगी....

"उसी ने बताया था... क्यूँ का मुझे नही पता... अब इश्स टॉपिक को बंद कर... पढ़ ले..." कहकर प्रिया ने किताब उठा ली...

कुच्छ देर दोनो में कोई बात नही हुई.. फिर अचानक खुद प्रिया ही बोल पड़ी.. जाने उस पर आज कैसी मस्ती च्छाई हुई थी," किसी को बताएगी नही ना...?"

"प्रोमिस.. बिल्कुल नही बताउन्गि.." रिया का चेहरा खिल उठा... उस उमर में ऐसी बातें किस को अच्छि नही लगती...

"उसने उसके साथ ज़बरदस्ती.. 'वो' कर दिया..." प्रिया ने बोल ही दिया.. रिया को भी यही सुन'ने की उम्मीद थी...

" वो क्या? मैं समझी नही..." रिया कुरेदने लगी....

" अच्च्छा.. इतना भी नही समझती.. जो शादी के बाद करते हैं..." इतनी सी बात कहने से ही प्रिया का चेहरा लाल हो गया था..

"ऊऊऊऊऊ.." रिया ने अपने चेहरे पर आई लालिमा को अपने हाथ से ढक लिया...,"रेप कर दिया?"

"श्ष.... पापा आ गये होंगे.. धीरे बोल.." प्रिया ने अपने मुँह पर उंगली रखकर उसको धीरे बोलने का इशारा किया....

"पर.. वो रोती हुई क्यूँ आई.. मैने तो सुना है की बड़े मज़े आते हैं... पायल बता रही थी... उसने भी किया था... एक बार!" रिया ने धीरे धीरे बोलते हुए कहा...

अंजाने में ही पालती मारकर बैठी प्रिया का हाथ उसके जांघों के बीच पहुँच गया.. और 'वहाँ' दबाव सा बनाने लगा... उसको ऐसा लगा जैसे उसका पेशाब निकलने वाला है...," सुना तो मैने भी है.. पर उसने ज़बरदस्ती की थी.. शायद इसीलिए... मैं बाथरूम जाकर आती हूँ..." कहकर प्रिया उठकर बाथरूम में चली गयी..

वापस आई तो उसके माथे पर पसीना झलक रहा था.. तृप्त होकर भी वह और 'प्यासी' होकर आई थी.. रिया ने अंदाज़ा लगा लिया.. पर बोली कुच्छ नही...

"एक बात बताऊं प्रिया.. अगर किसी से ना कहो तो..?"

" हां बोलो..." प्रिया आज पूरे सुरूर में थी..

" नही.. पहले प्रोमिसे करो...!"

"प्रोमिस किया ना.. बोल तो सही..." प्रिया ने जान'ने के लिए दबाव बनाया...

"मुझे..... वीरेंदर बहुत अच्च्छा लगता है...?" एक बात कहने के लिए रिया को दो बार साँस लेनी पड़ी...

"व्हाट..? और तूने आज तक नही बताया.. कभी बात भी हुई है क्या?" प्रिया को सुनकर बड़ी खुशी हुई.. अब वह भी अपने दिल का राज बता सकती थी...

" कहाँ यार.. बात क्या खाक होंगी.. वो तो सिर उठाकर भी नही देखता किसी की और.. और लड़कियों से तो वो बात ही तभी करता है जब उसको लड़ाई करनी हो....... इसीलिए तो अच्च्छा लगता है.." रिया अपने दिल में करीब एक साल से छिपाइ हुई बात को अपनी बेहन के साथ शेअर करके राहत महसूस कर रही थी.. उसके चेहरे पर सुकून सा था...

"हां यार.. ये तो सच है.. सभी लड़कियाँ उस'से बात करते हुए डरती हैं... बाइ दा वे.. तुम्हारी चाय्स बहुत अच्छि है.. पर इश्स खावहिस को दिल में ही रखना.. पापा का पता है ना...." प्रिया ने बिन माँगे सलाह दे डाली...

रिया मायूस सी हो गयी...," तुम बताओ ना.. क्या तुम्हे कोई अच्च्छा नही लगता..? सच बताना..."

"पता नही...." कहते हुए प्रिया लजा सी गयी.. उसके गुलाबी होंठ अपने आप तर हो गये.. और आँखों में एक अजीब सी चमक उभर आई.....

"ये तो चीटिंग है.. पता नही का क्या मतलब है.. बताओ ना...!" रिया ने उसके कंधे पकड़कर उसको ज़ोर से हिला दिया...

"अब दो दिन में मुझे क्या पता.. आगे क्या होगा.. अगर इसी तरह फाइल माँग माँग कर गायब होता रहा तो मेरी नही बन'ने वाली.." प्रिया ने मुस्कुराते हुए रिया को अपनी बाहों में भर लिया.. छातियो के आपस में टकराने से दिल के अरमान जाग उठे...

"ओह माइ गॉड! इट्स राज.. मैं जानती थी.. वो बिल्कुल तुम्हारे टाइप का है प्रिया.. झेंपू सा.. हे हे हे..!" रिया उस'से अलग होते हुए बोली...," अगर तुम्हारी फाइल अभी मिल जाए.. तो तुम उस'से नाराज़ नही होवॉगी ना...!"

"अभी?.... कैसे...?" वो मेरा काम है.. पर शर्त ये है की कल स्कूल में तुम खुद उस'से बात करोगी... बोलो मंजूर है.." प्रिया की हन से ही तो रिया के रास्ते खुलने तहे.. राज के मद्धयम से वह वीरेंदर के दिल तक जा सकती थी...

"पर बताओ तो कैसे..? आज फाइल कैसे मिल सकती है...?"

"वो मुझ पर छ्चोड़ दो.. तुम सिर्फ़ हां बोलो"

"हां" प्रिया ने बिना सोचे समझे तपाक से हां बोल दिया... आख़िर उसको भी तो बहाना मिल रहा था... 'शर्त' के बहाने तीर चलाने का...

"बस एक मिनिट..!" रिया एक दम से उठकर गयी और एक कॉपी और पेन उठा लाई..

"इसका क्या करोगी...?" प्रिया ने हैरान होते हुए पूचछा..

"तुम अब बोलो मत.. मेरा कमाल देखो.." और रिया लिखने लगी...

"हाई राज!

आप जो फाइल लेकर गये थे.. मुझे उसकी सख़्त ज़रूरत है... वो मुझे चाहिए.. तुम आज स्कूल भी नही आए.. सारा दिन तुम्हारी राह देखती रही... प्लीज़ उसको गेट के नीचे से अंदर सरका देना.. मैं उठा लूँगी...

आज स्कूल क्यूँ नही आए.. कल तो आओगे ना...

तुम्हारी दोस्त,

प्रिया!"

"हे.. तुमने मेरा नाम क्यूँ लिखा.. अपना लिखो ना.. और इसका करोगी क्या अब..?" प्रिया का दिल जोरों से धक धक कर रहा था.. किसी अनहोनी की आशंका से...

"डोंट वरी डार्लिंग.. बस मेरा कमाल देखती जाओ... एक बार पापा को देख आओ.. सो गये या नही......

प्रिया नीचे जाकर आई...," पापा तो आज आए ही नही.. मम्मी कह रही थी.. आज थाने में ही रहेंगे.. वो मुरारी पकड़ा गया है ना..."

"श.. थॅंक्स मुरारी जी! अब कोई डर नही.." रिया खुशी से उच्छल पड़ी....," तुम भी आ रही हो क्या? खिड़की तक..."

"ना.. मुझे तो डर लग रहा है.. तुम्ही जाओ..." प्रिया का दिल गदगद हो उठा था.. कम से कम बेहन से तो अब वो दिल की बात कर सकती है...

रिया करीब 2 मिनिट खिड़की के पास खड़ी रही.. जैसे ही राज ने उसकी और देखा.. रिया ने अपना हाथ हिला दिया..

राज का तो बंद ही बज गया.. उसको अपनी आँखों पर विस्वास ही नही हुआ.. आँखें फाड़ कर खिड़की की और देखने लगा...

रिया वापस छत पर गयी.. एक पत्थर ढूँढा और कागज को उसपर लपेट दिया.. राज को सिर्फ़ रिया दिखाई दे रही थी जिसको वो प्रिया समझ रहा था.. उसके हाथ में पकड़ी चीज़ उसको नज़र नही आई...

रिया ने खिड़की से हाथ बाहर निकाला और निशाना लगाकर दे मारा.. इसके साथ ही वो पिछे हट गयी..

किस्मत का ही खेल कहेंगे.. हवा में फैंकने के साथ ही पत्थर पर लिपटा कागज हवा में ही रह गया और पत्थर जाकर राज वाली खिड़की से जा टकराया...

रिया उपर भाग गयी....

"ओये वीरू.. देख.. प्रिया ने पत्थर फैंका..." राज खुशी से नाच उठा..

"क्यूँ? तेरा सिर फोड़ना चाहती है क्या वो..? तू पागल हो गया है बेटा.. ये तुझे कहीं का नही छ्चोड़ेंगी.. पिच्छली बार टॉप किया है ना.. लगता है अगली बार ड्रॉप करेगा.. चुप चाप पढ़ ले.. तुझे लड़कियों की फ़ितरत का नही पता.. बहुत भोला है..!" वीरू ने फिर से किताब में ध्यान लगा लिया...

"यार, तू तो हमेशा ऐसी बात करता है जैसे दिल पर बहुत से जखम खाए बैठा हो.. इतना भी नही समझता.. वो मुझे परेशान कर रही है.. मतलब वो भी....." राज को वीरेंदर ने बीच में ही टोक दिया," हां हां.. वो भी.. और तू भी.. दिल के जखम तुम्हे ही मुबारक हों बेटा.. ऐसी कोई लड़की बनी ही नही जो मुझे जखम दे सके.. तुम जैसे आशिकों की हालत देखकर ही संभाल गया हूँ.. मैं तो...

राज और वीरेंदर में बहस जारी थी.. उधर प्रिया रिया को 2 बार नीचे भेज चुकी थी.. फाइल देखकर आने के लिए.. एक बार खुद भी आई थी.. पर हर बार राज उन्हे वहीं बैठा मिला.. उसका ध्यान अब भी बार बार खिड़की पर लगा हुआ था..

"ओहो यार.. एक ग़लती हो गयी.. हमने ये लिख दिया की कल तो आओगे ना.. कहीं उसने ये तो नही समझा की अगर कल ना आए तो रखनी है..." रिया ने आइडिया लगाया..

"हां.. मुझे भी यही लगता है.. नही तो अब तक तो रख ही देता.." प्रिया ने भी सुर में सुर मिलाया...

"ठहर.. एक और कागज खराब करना पड़ेगा.. डोंट वरी.. मोहब्बत और जुंग में सब जायज़ है.. हे हे.." और रिया उठकर एक बार फिर से कॉपी और पेन उठा लाई... आज उसकी आँखों में नींद थी ही नही... नही तो कब की लुढ़क चुकी होती...

"राज!

यार मुझे बहुत...."

"आ.. यार काट दे.. दोबारा लिख..." प्रिया ने कहा...

"ओक.. नो प्राब्लम.." रिया ने फिर से लिखना शुरू किया...

"राज!

अभी आ जाओ ना प्लीज़.. बहुत ज़रूरी है.. मैं रिया को नीचे भेज रही हूँ.....

आइ आम वेटिंग

तुम्हारी दोस्त

प्रिया

"पर यार.. तू समझता क्यूँ नही है.. वो ऐसी नही है.. बाकी लड़कियों की तरह... कितनी प्यारी है..!" राज वीरेंदर को किसी भी तरह से सहमत कर लेना चाहता था.. इश्स तनका झाँकी को दोस्ती के रास्ते पर ले जाने के लिए.. ," कुच्छ भी हो जाए.. मैं कल उस'से बात करके रहूँगा.. देख लेना!"

"उस दिन तो तेरी फट रही थी.. फाइल माँगते हुए.. कल कौनसा तीर मारेगा..? फिर कह रहा हूँ.. ये ......"

"ओये.. फिर आ गयी.. लगता है अब फिर पत्थर उठा कर लाई है... आज तो मेरा काम करके रहेगी.." अब की बार राज ने भी खिड़की की ओर हाथ हिला दिया.. बहुत ही खुस था वो...

अब की बार पत्थर सीधा उनके कमरे के अंदर आया.. शुक्रा था राज चौकन्ना था.. वरना सिर पर ही लगता..," अरे.. इससपर तो कागज लिपटा हुआ है.."

"उठा ले.. आ गया लव लेटर.. तेरे लिए... हो गयी तमन्ना पूरी.. अब तू गया काम से...." वीरू ने पत्थर पर लिपटे कागज को गौर से देखा...

तब तक राज कागज को पत्थर समेत लपक चुका था.. जैसे ही उसने कागज को खोला.. उसका दिल धड़क उठा... ये तो कमाल ही हो गया.. उसने तो सीधे सीधे घर पर ही बुला लिया था.. वो भी अभी.. रात को.. ओह माइ गॉड! मुझे नही पता था की 'वो' ऐसी लड़की है.. राज मॅन ही मॅन सोच रहा था...

"क्या हुआ..? ऐसा क्या लिखा है उसने..? कहाँ खो गया?" वीरेंदर ने उत्सुकता से पूचछा...

"क्कुच्छ नही.. ऐसे ही.. ये तो वैसे ही है.. कुच्छ पुराना लिखा हुआ है..!" राज उसको उलट पुलट कर देखने का नाटक करते हुए बोला...

"फिर उसको बीमारी क्या है..? कल स्कूल में देखता हूँ..." वीरेंदर को उसकी बात पर विस्वास हो गया था..

"क्यूँ तुझे क्या प्राब्लम है..? मदद नही कर स्सकता तो कम से कम रोड़ा तो मत बन.." राज ने वीरेंदर को बोला...

"ठीक है बेटा.. ये गधे के दिन सबके आते हैं.. तेरे भी आ गये.. पर रोड़ा मैं नही.. वो रोड़ा फैंकने वाली बन रही है... 2 घंटे से देख रहा हूँ.. तू किताब के उसी पेज को खोले बैठा है....

"तू तो बुरा मान गया यार.. मेरा ये मतलब नही था.. चल ठीक है.. मैं थोड़ा बाहर घूम आता हूँ.. माइंड फ्रेश हो जाएगा.. उसके बाद पढ़ता हूँ..." राज ने बेड से उठहते हुए कहा...

"माइंड फ्रेश तो ठीक है.. पर ये रात को कंघी.. ये क्या चक्कर है..?" वीरू ने उसको घूरते हुए पूचछा....

"थोडा आगे तक जाकर अवँगा.. कोल्डद्रिंक्स भी ले आता हूँ.." शर्ट डालते हुए राज वीरेंदर की और मुस्कुराया....

"चल ठीक है.. दूध भी ले आना.. जल्दी आना.." वीरेंदर को उसकी बात से तसल्ली हो गयी...

"तू कितना प्यारा है यार..? दिल करता है तेरी चुम्मि ले लूँ.. हे हे हे.." राज ने मज़ाक में कहा तो वीरेंदर खिल खिलाकर हंस पड़ा," अब मक्खानबाज़ी मत कर.. जल्दी आना.. सच में यार.. तूने तो पढ़ना ही छ्चोड़ दिया है..."

"डोंट वरी भाई.. मैं सब संभाल लूँगा.." कहकर राज कमरे से बाहर निकल गया...

"ए प्रिया.. वो अब वहाँ नही है.. तेरी फाइल आने ही वाली है.. कल के लिए तैयार हो जाना.. याद है ना.. क्या शर्त थी..." रिया उपर जाकर चहकते हुए प्रिया से बोली...

"हाँ हाँ.. सब याद है.. खाँमखा प्रोमिस कर दिया.. छ्होटी सी बात के लिए.. ये तो मैं ही ना कर देती..." प्रिया मुस्कुराइ... वो बहुत खुश लग रही थी....

रूम से बाहर निकल कर राज ने 'वो' कागज निकाल लिया जिसमें प्रिया ने उसको अपने पास आने का निमंत्रण भेजा था.. वो भी अभी.. रात को... राज के लिए सब कुच्छ सपने जैसा था.. ऐसा सपना जिसमें कोई ना कोई तो 'कड़ी' थी ही.. जो बीच से टूटी हुई थी.. और वहीं पर राज का दिमाग़ अटका हुआ था..

'अगर वो शरीफ लड़की है तो मुझे क्या किसी को भी यूँ बुला नही सकती.. और फिर मेरी और उसकी जान पहचान ही क्या है.. सिर्फ़ 'फाइल' ही तो माँगी थी..' उधेड़बुन में फँसे राज ने वो कागज का टुकड़ा.. एक बार फिर निकाल लिया और दोबारा पढ़ने लगा...

"राज!

अभी आ जाओ ना प्लीज़.. बहुत ज़रूरी है.. मैं रिया को नीचे भेज रही हूँ.....

आइ आम वेटिंग

तुम्हारी दोस्त

प्रिया

'कमाल है.. इसमें ना तो कोई काम ही लिखा हुआ है.. और ना ही कोई वजह बताई गयी है.. फिर वो मेरा इंतजार कर किसलिए रही है.. क्या उसको किसी ने बता दिया है की मैं उसपर मरता हूँ... नही! ये कैसे हो सकता है..? वीरेंदर के अलावा कोई ये बात जानता ही नही.. फिर?????' राज का दिमाग़ चकरा रहा था पर दिल उच्छल रहा था.. दिमाग़ उसको धैर्या रखने को कह रहा था तो दिल कुच्छ कर गुजरने को बावला हुआ जा रहा था...

'क्या किया जाए?' अपने मकान के दरवाजे पर खड़ा होकर राज प्रिया के घर की छत को निहारने लगा... वहाँ काफ़ी अंधेरा था.. इसीलिए वह किसी को भी खड़ा दिखाई नही दे सकता था... प्रिया के घर दरवाजे से अंदर घुसना तो लगभग असंभव ही था.. पर साथ सटे हुए घर की सीढ़हियाँ उसके आँगन से शुरू होकर छत तक जाती थी.. पर उस घर के आँगन में लाइट जल रही थी.. दीवार फांदकर घुसना ख़तरनाक हो सकता था.. 'नही.. नही जा सकता' ऐसा सोचकर राज ने कागज के टुकड़े टुकड़े करके वही फैंक दिया और कोल्डद्रिंक लाने के लिए चल दिया.. एक लंबी गहरी साँस छ्चोड़कर....

हालाँकि राज ने ना जाने का पूरा मॅन बना लिया था.. पर फिर भी जाने क्यूँ वा बार बार पिछे मुड़कर देख रहा था.. छत तक जाने का रास्ता...

कहते हैं.. 'जहाँ चाह; वहाँ राह..' और राह मिल गयी.. थोड़ा सा रिस्क ज़रूर था.. पर मोहब्बत में रिस्क कहाँ नही होता...

साथ वाले घर से आगे निकलते हुए राज को उस घर की चारदीवारी के साथ खाली प्लॉट में एक भैंसा दिखाई दिया.. वो बैठा हुआ मस्ती से जुगली कर रहा था.. उसको क्या पता था की वो आज रात को दो प्यार करने वालों के बीच की 'दीवार' लाँघने का साधन बन'ने वाला है.. उसके उपर बैठ कर राज सीधा 'ज़ीने' में कूद सकता था.. और प्रिया के साथ वाले घर की छत तक बिना किसी रुकावट के पहुँचा जा सकता था... यानी आधी प्राब्लम सॉल्व हो जाने थी...

"चल बेटा.. खड़ा हो जा.." राज ने उसको एक लात मारी.. और बेचारा भैंसा.. बिना किसी लाग-लपेट के खड़ा होकर दीवार के साथ लग गया...

"शाबाश.. आ हैईन्शा.." और राज उसके उपर जा बैठा...

अब तक बिल्कुल शांत खड़े भैंसे को राज की ये हरकत गंवारा नही हुई.. और लहराती हुई उसकी पूंच्छ.. राज के चेहरे पर आ टकराई..

"अफ.. साले.. गोबर चिपका दिया.. क्या जाता है तेरा.. एक मिनिट में.." और फिर एक पल भी ना गँवाए राज ने उच्छल कर अपने हाथो से 'ज़ीने' की दीवार थाम ली.. फिर लटकते हुए उसने ज़ोर लगाया और अगले ही पल वो 'ज़ीने' में था...," श..! राज का दिल कूदने के साथ ही धक धक करने लगा.. यहाँ से अब अगर वो किसी को भी दिख जाता तो बड़ी मुसीबत आ जानी थी...

साथ वाले घर में उपर कोई कमरा वग़ैरह नही था.. राज बिना देर किए फटाफट छत पार करके प्रिया के घर के साथ जा चिपका.. उसकी साँसे बुरी तरह उखड़ गयी थी.. जिस तरह और जिस हालत में वो यहाँ था.. ऐसा होना लाजिमी ही था.. अपनी धड़कनो पर काबू पाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था...

यहाँ से उसको प्रिया और रिया के धीरे धीरे बोलने की आवाज़ें आ रही थी.. वहाँ से आगे करीब 6 फीट ऊँची दीवार को लाँघना 6 फीट के ही राज के लिए कोई मुश्किल काम ना था... राज ने कुच्छ देर ऐसे ही खड़ा रहकर अपनी साँसों को काबू में किया.. और आख़िरी दीवार भी लाँघ गया.. वहाँ से साथ वाले कमरे में ही प्रिया और रिया उसकी ही बातों में व्यस्त थी...

पर बातें सुन'ने का टाइम किसके पास था.. उसका तो 'बुलावा' आया था ना; फिर वो क्यूँ और किस बात का इंतज़ार करता.. बिना एक भी पल गँवायें राज तपाक से कमरे में घुस गया...

अपने सामने यूँ अचानक 'लुटेरों' की शकल बनाए राज को देखकर प्रिया सहम गयी.. डर के मारे उसकी तो साँस ही गले में अटक गयी.. रिया की तो चीख निकल गयी... हंगामा हो जाना था.. अगर प्रिया समय से पहले ही स्थिति भाँप कर उसके मुँह को अपने हाथ से ना दबा देती तो..

"तूमम.. यहाँ.... यहाँ क्या करने आए हो?" सहमी हुई प्रिया के गले से अटक अटक कर बात निकल रही थी...

"तुमने ही तो बुलाया था..." राज गले का थ्हूक गटक कर अपनी शर्ट की आस्तीन नीचे करते हुए बोला.. डरा हुआ वह भी था..

"भाग जाओ जल्दी.. सब मारे जाएँगे.. मम्मी जाग रही है.." प्रिया धीरे से हड़बड़ाहट में बोली...

"अजीब लोग हो तुम भी.. पहले बुलाते हो.. फिर बेइज़्ज़ती करते हो.. पता है कितना जोखिम उठा के आया था.." राज खिसिया सा गया था.." अजीब मज़ाक किया तुम दोनो ने आज मेरे साथ.." कहकर वो वापस पलटा तो अब तक चुपचाप खड़ी रिया बोल पड़ी...," नही, रूको राज... एक मिनिट.. तुम यहीं ठहरो.. मैं मम्मी को देखकर आती हूँ..." कहकर रिया कमरे से बाहर निकली और तुरंत ही वापिस पलटी," इस बेचारे का चेहरा तो धुल्वा दो..!" कहकर अपनी बत्तीसी निकाली और नीचे भाग गयी...

"क्यूँ? मेरे चेहरे को क्या हुआ.." कहते हुए राज ने अपने चेहरे को हाथ लगाया तो चिपका हुआ गोबर उसके हाथो को लग गया..," ओह्ह... वो.. भैंसे की पूंच्छ..." फिर रुक-कर अचानक इधर उधर देखने लगा....

"बाथरूम इधर है.. प्रिया उसकी शकल देखकर मुश्किल से अपनी हँसी रोक पा रही थी.. इश्स कोशिश में उसने अपने निचले होंठ को ही काट खाया था.."

"ओह्ह.. थॅंक्स.." कहकर वह बाथरूम में घुस गया....

बाहर आते ही उसने सीधा सा सवाल किया..," मुझे क्यूँ बुलाया था यहाँ..?"

"हमने?... हमने कब बुलाया था.." सामान्य होने के बाद भी प्रिया की आवाज़ नही निकल पा रही थी.. वह अभी तक एक तरफ खड़ी थी.. अपने हाथ बाँधे हुए.. और लगातार राज से नज़रें चुरा रही थी.. कभी इधर देखती.. कभी उधर.. ना खुद बैठही और ना ही राज को बैठने को कहा...

"तो?.. वो पत्थर क्यूँ मार रहे थे.. तुम.. मेरा सिर फोड़ने के लिए..?" प्रिया को हिचकिचाते देख राज 'शेर' हो गया.. खैर उसका गुस्सा जायज़ भी था.. बेचारा कितने बॉर्डर पार करके जो आया था..

"वो.. वो तो.. हमने फाइल माँगी थी.... गेट के नीचे से डालने को बोला था.. ले आए फाइल..?" प्रिया ने आख़िरी शब्द बोलते हुए एक बार राज को नज़र उठाकर देखा.. पर उसको अपनी ही और देखते पाकर तुरंत ही नज़र फिर से झुका ली...

"कब बोला था.. फाइल के लिए...? मुझे तो यहाँ आने के लिए बोला था... और वो भी अभी!" वैसे तुम रिया हो या प्रिया..?" राज तो प्रिया के लिए ही आया था........

"प्रिया..... तुम्हे कौन चाहिए..?" जाने कितनी हिम्मत जोड़ कर प्रिया ने ये व्यंग्य कर ही दिया...

"मुझे कुच्छ नही चाहिए.. बस ये बताओ.. यहाँ बुलाया क्यूँ?" राज भी अब तक सामान्य हो गया था..

"कहा नाअ..." प्रिया ने अब की बार सीधा उसकी नज़रों में झाँका था.. इसीलिए आगे बोल नही पाई...

राज भी अपने मंन की बात कह ही देना चाहता था.. और आज मौका भी था.. और मौसम भी..," एक बात बोलूं.. प्रिया.. मैने आज तक किसी लड़की से बात तक नही की है.. पर.. तुमने बुलाया तो खुद को रोक ही नही पाया.. तुम मुझे बहुत अच्छि लगती हो.. मेरा तो पढ़ना लिखना ही छ्छूट गया है.. जब से तुम्हे देखा है... कहते हुए राज हूल्का सा उसकी और बढ़ गया.. ऐसा करते ही प्रिया ने भी घबराकर अपने आपको उतना ही पीछे खींच लिया.. राज से दूर..!

"क्या बात है..? मैं तुम्हे अच्च्छा नही लगता क्या?" राज थोड़ा सा और आगे बढ़ गया...

"नही.. म्‍म्मेरा मतलब है.. ऐसी बात नही है.. ववो.. आने ही वाली होगी..!" प्रिया सिमट सी गयी.. अब पिछे हटने की जगह नही बची थी.. वह चाहकर भी उपर नही देख पा रही थी...

राज समझ रहा था कि अगर बुलाया है तो प्यार तो करती ही होगी.. पर बोलने से डर रही है.. 'लड़की' है ना...," मैं तुमसे प्यार करता हूँ प्रिया.. तुम्हारी वजह से इतना बड़ा रिस्क लेकर आया हूँ.. अब तुम भी बता ही दो ना.. तुम्हे मैं अच्च्छा लगता हूँ या नही.. कहते हुए राज थोड़ा और आगे सरक आया..

प्रिया कुच्छ ना बोली.. बस बचाव की मुद्रा में आ गयी.. उसको इस ख़याल से ही इतना डर लग रहा था कि कहीं राज उसको छ्छू ना ले.. कितनी नाज़ुक थी.. बेचारी.. कितनी मासूम!

"बोलती क्यूँ नही..?" राज ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया.. प्रिया थर थर.. काँपने लगी....," मैं प्रिया नही हूँ... रिया हूँ.."

"ओह्ह.. पहले क्यूँ नही बताया.. सॉरी.." राज को जैसे बिजली का झटका लगा हो.. जितनी दूर पहले था.. पालक झपकते ही उस'से भी ज़्यादा दूर जाकर खड़ा हो गया..," सॉरी.. प्लीज़ किसी को मत बताना.. मैने आपसे जो कहा है.. उसकी पिटाई हो जाएगी... वो लेटर भी नही लिखा था उसने.. मैं तो ऐसे ही झूठ बोल रहा था.." राज को लगा इसको लेटर के बारे में शायद पता नही होगा...

राज की ये बातें सुनकर प्रिया मंन ही मंन उच्छल रही थी... कितनी सोचता है.. मेरे बारे में... फिर प्रत्यक्ष में रिया बनकर बोली..," मुझे सब पता है.. वो लेटर हमने मिलकर ही लिखा था.. और उसको तुम अच्छे भी बहुत लगते हो.. पर वो आसानी से ये बात स्वीकार नही करेगी.. वो तुमसे प्यार करती है.. और शायद आज के बाद तो तुम्हे कभी भूल ही नही पाएगी.."

"क्यूँ.. आज ऐसा क्या हुआ..?" राज प्रफुल्लित हो उठा..

"आज तुमने यहाँ आने का इतना बड़ा साहस किया.... तुम बहुत अच्छे हो राज.. बहुत प्यारे हो..." प्रिया एक ही साँस में कह गयी...

"पर मैं अगर उसके मुँह से ये सब सुनता तो बहुत अच्च्छा लगता..." राज ने 'प्रिया' के इंतज़ार में दरवाजे की और देखा...

"अभी तो तुम जाओ.. कल स्कूल में मैं.. मतलब मैं उसको बोल दूँगी.. वो तुमसे बात कर लेगी...."

प्रिया ने अपनी बात पूरी भी नही की थी की रिया नीचे से लगभग भागती हुई वापस आई," मम्मी.. मम्मी आ रही हैं उपर... !"

राज दरवाजे की और बढ़ा तो रिया ने वापस धकेल दिया..," बाथरूम में छिप जाओ.. उपर आ चुकी हैं मम्मी.."

असमन्झस में खड़ा राज यकायक बाहर किसी के कदमों की आहत सुनकर बाथरूम में घुस गया..

"क्या बात है.. आज सोना भी है या नही.. तुम दोनो को.. कब से उपर नीचे भागती फिर रही हो.. चलो नीचे.. चलकर सो जाओ..."

"आ रहे हैं मम्मी.. बस 5 मिनिट और.. आप चलिए..."रिया ने कहा...

"बहुत हो गये 5 मिनिट.. 12 बजने वाले हैं.. जल्दी उठकर नीचे भागो.." मम्मी ने किताबें उठाकर टेबल पर रख दी..," वो तुम्हारे कपड़े कहाँ हैं.. मशीन में डाल देती हूँ.. सुबह धोने हैं.. " कहकर वो बाथरूम की और चल दी...

"मैं देती हूँ मम्मी..." रिया झटके के साथ अपनी मम्मी से आगे बाथरूम में घुस गयी.. दोनो पसीने से भीग गयी थी...

रिया ने कपड़े लेकर चलते हुए राज की और हल्के से मुस्कुरकर देखा तो राज ने उसके नितंबों पर चिकोटी काट ली... रिया ने एकद्ूम घूर कर देखा.. पर वक़्त था नही.. हिसाब बराबर करने का.. सो बाथरूम की चितकनी बंद करते हुए बाहर निकल गयी.. उसको पता था.. वो नही करेगी तो उसकी मम्मी करेगी....

"चलो अब नीचे..!"

"आप चलिए ना मम्मी जी.. हम आ रहे हैं बस..!" प्रिया बोली...

"नही पहले तुम चलो.. 5 मिनिट की कहकर घंटा लगा देती हो.. सुना नही क्या?" मम्मी ने जब घूर कर बेड पर बैठही रिया को देखा तो उनकी हिम्मत ना हुई आगे कुच्छ बोलने की.. दोनो मम्मी के आगे आगे चल दी...

बेचारा राज! बाथरूम से निकालने का रास्ता ढूंढता रह गया....

तो दोस्तो सच मानिए बाथरूम मे मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा फँस कर रह गया वहाँ मेरा यानी राज का क्या हाल हुआ

ये जानने के लिए पार्ट 41 का इंतजार कीजिए

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साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always

`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &

(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !

`·.¸.·´ -- raj

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hello dosto main yaani aapka dost raj sharma paart 41 lekar haajir hun ab aap kahaani ka maja lijiye

Vicky ne fone kaat-te hi Shamsher ko fone lagaya," Kahan ho bhai? Kitne din se aapka fone nahi lag raha..." Vicky ki aawaj mein bechaini si thhi...

"main out of state hoon yaar.. aur mera cell gum ho gaya tha.. Aaj hi no. chalu karwaya hai.. Dusra cell lekar.. Kya baat hai..?"

"Mujhe tujhse milna thha yaar.. Kab tak aa rahe ho wapas..?"

"Mujhe toh abhi kum se kum 8-10 din aur lag jayenge.. Tu baat toh bata..!" Shamsher ne Kaha..

"baat aise batane ki nahi hai.. Milkar hi batani thhi.. Bahut time lag jayega... Tu bata na.. Kahan hai? Main wahin aa jata hoon..."

"ooty!... aaja!" Shamsher ne muskurate huye kaha....

"bhabhi ji sath hi hain kya?"

"na.. Wo toh gaanv mein hai.. !"

"chal chhod.. Main kuchh aur dekhta hoon... Achchha!"

"arey tu bata toh sahi.. main filhal bilkul free hoon..." Shamsher ne Gadi sadak kinare rok li... Uss waqt wo akela hi thha..

"achchha sun.. Par lecture mat dena.. Bus kuchh madad kar sako toh..."

"Abey tu bol na yaar.. Bol!"

Vicky ne shuru se aakhir tak ki sari Ramayan suna di.. Iss douran shamsher kayi baar chounka.. Kayi baar muskuraya aur kayi baar kahin aur hi kho jata.. Jab vicky ki baat band ho gayi toh Shamsher bola," Tu bhi na yaar.. Poora ghamchakkar hai.. Wo toh teri kismat sath deti chali gayi.. Warna.. Khair ab problem kya hai?"

"problem ye hai ki usko mujhse pyar ho gaya hai.. Mujhse alag hone ko taiyaar hi nahi hai.. Kah rahi hai mar jayegi..." Vicky ne bechara sa munh banaya..

Vicky ki iss baat par Shamsher jor se hansa.. ," Aakhir fans hi gaya tu bhi..!"

"tujhe pata hai yaar.. Ye 'pyar vyar' meri samajh se bahar ki baat hai.. Par jab tak Murari se souda nahi hota.. Tab tak toh isko dhhona hi padega...." vicky ne apne dil ki baat kahi..

"Toh uske baad kya karega?" Shamsher ne lumbi saans li..

"uske baad maine kya karna hai.. Wo mujhe Mohan ke naam se jaanti hai.. Ek baar Multiplex mil gaya toh dono baap beti kitna hi ro lein.. Meri sehat par koyi asar nahi padega.. Mere paas iss baat ka solid proof hai ki uss douran mein out of country thha....."

shamsher ne usko beech mein hi tok diya..," wo sab toh sahi hai.. Main poochh raha hoon Sneha ka... Uska kya karega?"

"wo meri tension nahi hai yaar... Uske baad wo bhad mein jaaye.. Tab tak bata na.. Kya karoon?"

"Dekh mujhe pata hai.. Tu kisi ki sunega toh hai nahi.. Par sab galat hai.. Kisi ke dil par chot nahi karni chahiye.. Tune wada kiya hai usko..!" Shamsher uski baat se aahat thha..

"Yaar.. Tu sirf mujhe ye bata ki tab tak main iska kya karoon?" Vicky ne sari baatein golmol kar di...

"ghuma la kahin.. Ooty lekar aaja.. Fir sath hi chal padenge.." Shamsher ne rai di..

"yahi toh nahi ho sakta yaar.. aage ka sara kaam mujhe hi karna hai ab ... Kisi tarah iss-se peechha chhudao yaar.."

"main kya bataoon..? ya fir Loharu chhod de.. Vani usko apne aap set kar legi.. Par baad mein locha ho sakta hai.. Agar tune usko chhod diya toh.. Uske baap ke paas!"

"great idea boss.. Gaanv mein toh koyi shak karega hi nahi... aur uska dil bhi lag jayega.. Vani aur disha ke paas... Tu baad ki fikar chhod de.. Mujhe pata hai mujhe kya karna hai... Wo kabhi wapas nahi jaayegi.. Main ek teer se do shikar karoonga...!" Vicky Sneha ka bhi shikar hi karna chahta thha.. Kaam poora hone ke baad...

"thheek hai.. Jaisa tu thheek samjhe. Main disha ko samjha doonga.. Tu beshak aaj hi usko wahan chhod de...."

"thank u boss! Mujhe yakeen hai.. Sneha wahan se wapas mere sath aane ki jid nahi karegi.. Main usko samjha doonga.. Aur haan.. Tough se tujhe hi baat karni padegi.. Ye police walon ka kuchh bharosa nahi hota..."

"OK, main kar loonga...." shamsher hansne laga aur fone kaat diya....

"Riya.. Yaar ab main kya karoon? Tune toh meri aisi ki taisi kara di..!" Priya ne Raj ke na aane ka sara dosh Riya par madh diya..

"kyun? Maine aisa kya kiya?" Riya ne hairan hote huye poochha... Dono pahli manjil par pichhe ki aur baney apne kamre mein padh rahi thhi..

"Maine aisa kya kar diya..!" Priya ne munh banakar Riya ki nakal ki..," Tune hi toh uss idiot ko file di thhi.. Lete waqt toh itna shareef ban raha thha... Ab kal 'sir' ko kya tera thhobda (face) dikhaaungi kal..."

"Dikha dena! kya kami hai... Sir dil de baithhenge.. Budhape mein.. jaan de baithhenge apni" Riya ne chulbulepan se kaha..

"tu hai na.. bigadti ja rahi hai... mummy ko bolna padega.." Priya ne Riya ko pyar se jhidka..

" bol de.. wo bhi toh kahti hain.. 'kitni cute hai tu!' Riya ne style se apne lumbe balon ko pichhe ki aur jhatka diya...

"jyada mat ban.. shakal dekhi hai aaine mein kabhi...?" Priya apni kitab ko band karte huye boli....

"haan.. dekhi hai.. bilkul tere jaisi hai.. ab bol" Riya ne bhi apni kitab band kar di aur hansne lagi...

"tu yaar.. jyada faaltu baatein mat kar... bata na.. ab main kya karoon?" Priya ne matlab ki baat par aate huye bola...

"yahin.. khidki ke paas chipka baithha hoga... chhat se maang le..." Riya ne sharaarati muskaan fainkte huye kaha..

" tu jakar maang le na.. badi himmat wali ban'ti hai.. chhat se maang loon.. wo bhi raat ke 9:00 baje.. pichhli baat bhool gayi kya..?"

Riya ek pal ko ateet mein chali gayi...," mujhe uss ladke ki badi daya aayi thhi.. papa ne sahi nahi kiya Priya..."

"Sahi nahi kiya toh kuchh khas galat bhi nahi thha.. din mein hamare ghar ke itne chakkar lagata thha.. pagal thha wo..." Priya ne apna najriya usko bataya..

" Gali mein hi ghoomta thha na.. hamein kuchh kaha toh nahi thha.. itna maarne ki kya jarurat thhi.. waise samjha dete.. dekh bhai.. mujhe toh bahut bura laga thha.. uss raat khana bhi nahi kha saki thhi.. bechare ke chehre par kaise nishan pad gaye thhe..." Riya ka mood hi off ho gaya...

Uss din ko yaad karke Priya bhi Sihar uthhi... koyi kala sa ladka thha.. unki hi umra ka.. gali mein lagbhag har ek ko yakeen ho gaya thha ki iska thhanedar ki betiyon ke sath kuchh na kuchh chakkar to jaroor hai.. inn dono ki bhi aadat si ho gayi thhi.. usko khidki se aate jaate unki aur chehra uthhakar dekhte huye dekhna aur fir uska majak bana kar khoob hansna... uss din papa ne ussko khidki mein se jhankte dekh liya thha.. ladka muskurata huaa aage badh gaya.. par uski kismat kharaab thhi.. papa lagbhag bhagte huye uske pichhe gaye thhe aur usko ghaseet'te huye ghar ke saamne la patka... sari colony ke log bahar nikal aaye.. par koyi kuchh nahi bola thha.. sab chupchap khade tamasha dekhte rahe.. unke papa ne usko maar maar kar adhmara kar diya thha.. baad mein police jeep usko le gayi thhi.. Dono ladkiyan apne dil par hath rakhkar khidki se sab kuchh dekh rahi thhi... wo din thha aur aaj ka din.. Ladkiyan kabhi bhi paidal school nahi gayi... Police ki jeep hi unko lati le jati thi.....

"kahan kho gayi Priya...!" Riya ne uske chehre ke saamne hath hilaya...

"kahin nahi yaar.. sach mein; papa ne sahi nahi kiya thha.. maarna nahi chahiye thha usko..." Priya ne chair se uthhte huye kaha...

"kahan ja rahi ho..?" Riya ne kamre se bahar nikal rahi Priya ko aawaj lagayi....

"abhi aati hoon.. thhanda pani le aaoon.. neeche se..." priya ne agle room mein jakar khidki se bahar ki aur jhanka.. Raj khidki ke saamne hi bed par baithha hua padh raha thha.. usko dekhkar Priya ko jaane kyun.. shanti si mili! kuchh der wah yunhi khadi rahi.. kareeb 1 minute baad hi Raj ne chehra khidki ki aur upar uthhaya.. aur khidki mein khadi priya ko dekhkar khil sa gaya.. Priya uske baad wahan ek pal ke liye bhi na ruki.. neeche bhag gayi.. pata nahi kyun?

"A... Riya.. wo toh khidki ke paas hi baithha huaa hai..!"

"achchha.. usko hi dekhne gayi thhi.. main sab samajhti hoon darling.." Riya khilkhilakar hans padi...

" nahi yaar.. by God.. main pani lene hi gayi thhi.. wo toh bus aise hi dikh gaya...." fir kuchh hichkichate huye boli," idhar hi dekh raha thha..."

"ye koyi nayi baat hai.. mujhe toh wo hamesha idhar hi sir uthhaye milta hai..." Riya ne batteesi nikalte huye kaha...

"toh iska matlab tu bhi usko dekhti rahti hogi.. hai na.." Priya ne uski aur utsukta se dekha.. Raj ke baare mein baat karte huye uske dil ko ajeeb si tasalli mil rahi thhi...

"Main kyun dekhoon.. bhala uss bandar ko.. mujhe bhi aise hi dikh jata hai.. jaise aaj tujhe dikh gaya..." Riya bed par aakar paalthi maarkar baith gayi...

"hummm.. bandar.. tujhe wo bandar dikhta hai.. kitna smart toh hai.. aur kitna intelligent bhi.." Priya apne aapko rok na payi..

"Dekha.. main kah rahi thhi.. na.. kuchh toh baat jaroor hai.. maine tumhare mann ki baat jaan'ne ke liye hi aisa kaha thha.."

Priya ne takiya uthhakar uske sir par de mara..," jyada detective mat ban.. mujhe uss'se kya matlab.. par sach toh kahna hi padega na.."

" Sabke boyfriends hain Priya.. hamara kyun nahi... kitna maja aata na agar koyi hota toh..?" Riya ne ye baat poore dil se kahi thhi.. ismein koyi shararat nahi thhi.. Priya bhi samajh gayi...

" Achaar daalna hai kya?... Boyfriend ka.. mujhe toh koyi achchha nahi lagta.. sab ke sab ek jaise hote hain... Shruti ka pata hai tujhe.. usko uska BF bahlakar apne kamre par le gaya...." darwaja band karke wapas aayi priya achanak chup ho gayi...

"fir kya huaa... bata na..?" Riya aankhein faad kar usko dekhne lagi... pahli baar Priya ne uske saamne iss tarah ki baat ki thhi...

"hona kya thha... bechari roti huyi wapas aayi thhi..." Priya beech ki baat kha gayi.....

"kyun... tujhe kaise pata..... bata na please..." Riya uska hath pakad kar sahlane lagi....

"usi ne bataya thha... kyun ka mujhe nahi pata... ab iss topic ko band kar... padh le..." kahkar Priya ne kitab uthha li...

kuchh der dono mein koyi baat nahi huyi.. fir achanak khud priya hi bol padi.. jaane uss par aaj kaisi masti chhayi huyi thhi," kisi ko batayegi nahi na...?"

"promice.. bilkul nahi bataaungi.." Riya ka chehra khil uthha... uss umar mein aisi baatein kis ko achchhi nahi lagti...

"usne uske sath jabardasti.. 'wo' kar diya..." Priya ne bol hi diya.. riya ko bhi yahi sun'ne ki ummeed thhi...

" wo kya? main samjhi nahi..." Riya kuredne lagi....

" achchha.. itna bhi nahi samajhti.. jo shadi ke baad karte hain..." Itni si baat kahne se hi priya ka chehra laal ho gaya thha..

"oooooooooo.." Riya ne apne chehre par aayi lalima ko apne hath se dhak liya...,"Rape kar diyaaaa?"

"Shhhh.... papa aa gaye honge.. Dheere bol.." Priya ne apne munh par ungali rakhkar usko dheere bolne ka ishara kiya....

"par.. wo roti huyi kyun aayi.. maine toh suna hai ki bade maje aate hain... payal bata rahi thhi... usne bhi kiya thha... ek baar!" Riya ne dheere dheere bolte huye kaha...

Anjane mein hi Paalthi maarkar baithhi Priya ka hath uske janghon ke beech pahunch gaya.. aur 'wahan' dabav sa banane laga... usko aisa laga jaise uska peshab nikalne wala hai...," Suna toh maine bhi hai.. par usne jabardasti ki thhi.. shayad isiliye... main bathroom jakar aati hoon..." kahkar Priya uthhkar bathroom mein chali gayi..

wapas aayi toh uske mathhe par pasina jhalak raha thha.. tript hokar bhi wah aur 'pyasi' hokar aayi thhi.. Riya ne andaja laga liya.. par boli kuchh nahi...

"ek baat Bataaoon Priya.. agar kisi se na kaho toh..?"

" haan bolo..." Priya aaj poore suroor mein thhi..

" nahi.. pahle promice karo...!"

"Promice kiya na.. bol toh sahi..." Priya ne jaan'ne ke liye dabav banaya...

"Mujhe..... Virender bahut achchha lagta hai...?" Ek baat kahne ke liye Riya ko do baar saans leni padi...

"whhhaaaat..? aur tune aaj tak nahi bataya.. kabhi baat bhi huyi hai kya?" Priya ko sunkar badi khushi huyi.. ab wah bhi apne dil ka raaj bata sakti thhi...

" kahan yaar.. baat kya khak hongi.. wo toh sir uthhakar bhi nahi dekhta kisi ki aur.. aur ladkiyon se toh wo baat hi tabhi karta hai jab usko ladayi karni ho....... isiliye toh achchha lagta hai.." Riya apne dil mein kareeb ek saal se chhipayi huyi baat ko apni behan ke sath share karke rahat mahsoos kar rahi thhi.. uske chehre par sukoon sa thha...

"haan yaar.. ye toh sach hai.. sabhi ladkiyan uss'se baat karte huye darti hain... by the way.. tumhari choice bahut achchhi hai.. par iss khawahis ko dil mein hi rakhna.. papa ka pata hai na...." Priya ne bin maange salah de daali...

Riya mayus si ho gayi...," tum batao na.. kya tumhe koyi achchha nahi lagta..? sach batana..."

"pata nahi...." kahte huye Priya laja si gayi.. uske gulabi hont apne aap tar ho gaye.. aur aankhon mein ek ajeeb si chamak ubhar aayi.....

"ye toh cheating hai.. pata nahi ka kya matlab hai.. batao na...!" Riya ne uske kandhe pakadkar usko jor se hila diya...

"ab do din mein mujhe kya pata.. aage kya hoga.. agar isi tarah file maang maang kar gayab hota raha toh meri nahi ban'ne wali.." Priya ne muskurate huye Riya ko apni bahon mein bhar liya.. chhatiyon ke aapas mein takraane se dil ke armaan jaag uthhe...

"oh my God! its Raj.. main jaanti thhi.. main jaanti thhi.. wo bilkul tumhare type ka hai Priya.. Jhenpoo sa.. he he he..!" Riya uss'se alag hote huye boli...," agar tumhari file abhi mil jaaye.. toh tum uss'se naraj nahi howogi na...!"

"abhi?.... Kaise...?" wo mera kaam hai.. par shart ye hai ki kal school mein tum khud uss'se baat karogi... bolo manjoor hai.." Priya ki haan se hi toh Riya ke raaste khulne thhe.. Raj ke maddhyam se wah Virender ke dil tak ja sakti thi...

"par batao toh kaise..? aaj file kaise mil sakti hai...?"

"wo mujh par chhod do.. tum sirf haan bolo"

"haan" Priya ne bina soche samjhe tapak se haan bol diya... aakhir usko bhi toh bahana mil raha thha... 'shart' ke bahane teer chalane ka...

"bus ek minute..!" Riya ek dum se uthhkar gayi aur ek copy aur pen uthha layi..

"iska kya karogi...?" Priya ne hairan hote huye poochha..

"tum ab bolo mat.. mera kamaal dekho.." aur Riya likhne lagi...

"Hi Raj!

aap jo file lekar gaye thhe.. mujhe uski sakht jarurat hai... wo mujhe chahiye.. tum aaj school bhi nahi aaye.. sara din tumhari raah dekhti rahi... pls usko gate ke neeche se andar sarka dena.. main uthha loongi...

aaj school kyun nahi aaye.. kal toh aaoge na...

Tumhari dost,

Priya!"

"hey.. tumne mera naam kyun likha.. apna likho na.. aur iska karogi kya ab..?" Priya ka dil joron se dhak dhak kar raha thha.. kisi anhoni ki aashanka se...

"dont worry Darling.. bus mera kamaal dekhti jao... ek baar papa ko dekh aao.. so gaye ya nahi......

Priya neeche jakar aayi...," papa toh aaj aaye hi nahi.. mummy kah rahi thhi.. aaj thhane mein hi rahenge.. wo Murari pakda gaya hai na..."

"ohh.. thanx Murari ji! ab koyi darr nahi.." Riya khushi se uchhal padi....," tum bhi aa rahi ho kya? khidki tak..."

"na.. mujhe toh darr lag raha hai.. tumhi jao..." Priya ka dil gadgad ho uthha thha.. kum se kum behan se toh ab wo dil ki baat kar sakti hai...

Riya kareeb 2 minute khidki ke paas khadi rahi.. jaise hi Raj ne uski aur dekha.. Riya ne apna hath hila diya..

Raj ka toh band hi baj gaya.. usko apni aankhon par visvas hi nahi hua.. aankhein faad kar khidki ki aur dekhne laga...

Riya wapas chhat par gayi.. ek patthar dhoondha aur kagaj ko uspar lapet diya.. Raj ko sirf Riya dikhayi de rahi thi jisko wo Priya samajh raha thha.. uske hath mein pakdi cheej usko najar nahi aayi...

Riya ne khidki se hath bahar nikala aur nishana lagakar de mara.. iske sath hi wo pichhe hat gayi..

Kismat ka hi khel kahenge.. hawa mein fainkne ke sath hi patthar par lipta kagaj hawa mein hi rah gaya aur patthar jakar Raj wali khidki se ja takraya...

Riya upar bhag gayi....

"oye viru.. dekh.. priya ne patthar fainka..." Raj khushi se naach uthha..

"kyun? tera sir fodna chahti hai kya wo..? tu pagal ho gaya hai beta.. ye tujhe kahin ka nahi chhodengi.. pichhli baar top kiya hai na.. lagta hai agli baar drop karega.. chup chap padh le.. tujhe ladkiyon ki fitrat ka nahi pata.. bahut bhola hai..!" Viru ne fir se kitab mein dhyan laga liya...

"yaar, tu toh hamesha aisi baat karta hai jaise dil par bahut se jakham khaye baithha ho.. itna bhi nahi samajhta.. wo mujhe pareshan kar rahi hai.. matlab wo bhi....." Raj ko Virender ne beech mein hi tok diya," haan haan.. wo bhi.. aur tu bhi.. dil ke jakham tumhe hi mubarak hon beta.. aisi koyi ladki bani hi nahi jo mujhe jakham de sake.. tum jaise aashikon ki halat dekhkar hi sambhal gaya hoon.. main toh...

Raj aur virender mein behas jari thhi.. udhar Priya riya ko 2 baar neeche bhej chuki thhi.. file dekhkar aane ke liye.. ek baar khud bhi aayi thhi.. par har baar Raj unhe wahin baithha mila.. uska dhyan ab bhi baar baar khidki par laga huaa thha..

"oho yaar.. ek galati ho gayi.. humne ye likh diya ki kal toh aaoge na.. kahin usne ye toh nahi samjha ki agar kal na aaye toh rakhni hai..." Riya ne idea lagaya..

"haan.. mujhe bhi yahi lagta hai.. nahi toh ab tak toh rakh hi deta.." Priya ne bhi sur mein sur milaya...

"thhahar.. ek aur kagaj kharaab karna padega.. Dont worry.. mohabbat aur jung mein sab jayaj hai.. he he.." aur Riya uthhkar ek baar fir se copy aur pen uthha layi... aaj uski aankhon mein neend thhi hi nahi... nahi toh kab ki ludhak chuki hoti...

"Raj!

Yaar Mujhe bahut...."

"A.. yaar kaat de.. dobara likh..." Priya ne kaha...

"OK.. No Problem.." Riya ne fir se likhna shuru kiya...

"Raj!

Abhi aa jao na pls.. Bahut jaruri hai.. main Riya ko neeche bhej rahi hoon.....

I am waiting

Tumhari Dost

Priya

"par yaar.. Tu samajhta kyun nahi hai.. Wo aisi nahi hai.. Baki ladkiyon ki tarah... Kitni pyari hai..!" Raj Virender ko kisi bhi tarah se sahmat kar lena chahta thha.. Iss tanka jhanki ko Dosti ke raste par le jane ke liye.. ," kuchh bhi ho jaye.. Main kal uss'se baat karke rahunga.. Dekh lena!"

"uss din toh teri fat rahi thhi.. File maangte huye.. Kal kounsa teer maarega..? Fir kah raha hoon.. Ye ......"

"oye.. Fir aa gayi.. Lagta hai ab fir patthar utha kar layi hai... Aaj toh mera kaam karke rahegi.." Ab ki baar Raj ne bhi khidki ki aur hath hila diya.. Bahut hi khus thha wo...

Ab ki baar patthar seedha unke kamre ke andar aaya.. Shukra thha Raj choukanna thha.. Warna Sir par hi lagta..," Arey.. Isspar toh kagaj lipta hua hai.."

"uthha le.. Aa gaya love letter.. Tere liye... Ho gayi tamanna poori.. Ab tu gaya kaam se...." Viru ne patthar par lipte kagaj ko gour se dekha...

Tab tak raj kagaj ko patthar samet lapak chuka thha.. Jaise hi usne kagaj ko khola.. Uska dil dhadak uthha... Ye toh kamaal hi ho gaya.. Usne toh seedhe seedhe ghar par hi bula liya thha.. Wo bhi abhi.. Raat ko.. Oh my God! Mujhe nahi pata thha ki 'wo' aisi ladki hai.. Raj mann hi mann soch raha thha...

"kya huaa..? Aisa kya likha hai usne..? Kahan kho gaya?" Virender ne utsukta se poochha...

"kkuchh nahi.. Aise hi.. Ye toh waise hi hai.. Kuchh purana likha hua hai..!" Raj usko ulat pulat kar dekhne ka natak karte huye bola...

"fir usko bimari kya hai..? Kal school mein dekhta hoon..." Virender ko uski baat par visvas ho gaya tha..

"kyun tujhe kya problem hai..? Madad nahi kar ssakta toh kum se kum roda toh mat ban.." Raj ne Virender ko bola...

"thheek hai beta.. Ye gadhe ke din sabke aate hain.. Tere bhi aa gaye.. Par roda main nahi.. Wo roda fainkne wali ban rahi hai... 2 ghante se dekh raha hoon.. Tu kitab ke usi page ko khole baithha hai....

"tu toh bura maan gaya yaar.. Mera ye matlab nahi thha.. Chal thheek hai.. Main thhoda bahar ghoom aata hoon.. Mind fresh ho jayega.. Uske baad padhta hoon..." Raj ne bed se uthhte huye kaha...

"mind fresh toh thheek hai.. Par ye raat ko kanghi.. Ye kya chakkar hai..?" Viru ne usko ghoorte huye poochha....

"thhoda aagey tak jakar aaunga.. colddrinks bhi le aata hoon.." shirt daalte huye Raj virender ki aur muskuraya....

"chal thheek hai.. Doodh bhi le aana.. Jaldi aana.." Virender ko uski baat se tasalli ho gayi...

"tu kitna pyara hai yaar..? Dil karta hai teri chummi le loon.. He he he.." Raj ne majak mein kaha toh Virender khil khilakar hans pada," ab makkhanbaji mat kar.. Jaldi aana.. Sach mein yaar.. Tune toh padhna hi chhod diya hai..."

"dont worry bhai.. Main sab sambhal loonga.." kahkar Raj kamre se bahar nikal gaya...

"a Priya.. Wo ab wahan nahi hai.. Teri file aane hi wali hai.. Kal ke liye taiyaar ho jana.. Yaad hai na.. Kya shirt thhi..." Riya upar jaakar chahakte huye Priya se boli...

"han han.. Sab yaad hai.. Khamkha promice kar diya.. Chhoti si baat ke liye.. Ye toh main hi na kar deti..." Priya muskurayi... Wo bahut khush lag rahi thhi....

Room se bahar nikal kar Raj ne 'wo' kagaj nikal liya jismein Priya ne usko apne pass aane ka nimantran bheja thha.. wo bhi abhi.. raat ko... Raj ke liye sab kuchh sapne jaisa thha.. aisa sapna jismein koyi na koyi toh 'kadi' thhi hi.. jo beech se tooti huyi thhi.. aur wahin par Raj ka dimag atka huaa thha..

'Agar wo shreef ladki hai toh mujhe kya kisi ko bhi yun bula nahi sakti.. aur fir meri aur uski jaan pahchaan hi kya hai.. sirf 'file' hi toh maangi thhi..' udhedbun mein fanse Raj ne wo kagaj ka tukda.. ek baar fir nikal liya aur Dobara padhne laga...

"Raj!

Abhi aa jao na pls.. Bahut jaruri hai.. main Riya ko neeche bhej rahi hoon.....

I am waiting

Tumhari Dost

Priya

'kamaal hai.. ismein na toh koyi kaam hi likha huaa hai.. aur na hi koyi wajah batayi gayi hai.. fir wo mera intjaar kar kisliye rahi hai.. kya usko kisi ne bata diya hai ki main usspar marta hoon... nahi! ye kaise ho sakta hai..? Virender ke alawa koyi ye baat jaanta hi nahi.. Fir?????' Raj ka dimag chakra raha thha par dil uchhal raha thha.. Dimag usko dhairya rakhne ko kah raha tha toh dil kuchh kar gujarne ko bawla huaa ja raha thha...

'Kya kiya jaye?' apne makaan ke darwaje par khada hokar Raj Priya ke ghar ki chhat ko niharne laga... wahan kafi andhera thha.. isiliye wah kisi ko bhi khada dikhayi nahi de sakta thha... Priya ke ghar Darwaje se andar ghusna toh lagbhag asambhav hi thha.. par sath satey huye ghar ki seedhhiyan uske aangan se shuru hokar chhat tak jati thhi.. par uss ghar ke aangan mein light jal rahi thhi.. deewar faandkar ghusna khatarnaak ho sakta thha.. 'nahi.. nahi ja sakta' aisa sochkar Raj ne kagaj ke tukde tukde karke wahi faink diya aur colddrink lane ke liye chal diya.. ek lumbi gahri saans chhodkar....

Halanki Raj ne na jane ka poora mann bana liya thha.. par fir bhi jane kyun wah baar baar pichhe mudkar dekh raha thha.. chhat tak jane ka rasta...

kahte hain.. 'jahan chah; wahan raah..' aur Rah mil gayi.. thhoda sa risk jaroor thha.. par Mohabbat mein Risk kahan nahi hota...

Sath wale ghar se aage nikalte huye Raj ko uss ghar ki chardiwari ke sath khali plot mein ek bhainsa dikhayi diya.. wo baitha huaa masti se jugali kar raha thha.. usko kya pata thha ki wo aaj raat ko do pyar karne walon ke beech ki 'deewar' laanghne ka sadhan ban'ne wala hai.. uske upar baith kar Raj seedha 'zeene' mein kood sakta tha.. aur Priya ke sath wale ghar ki chhat tak bina kisi rukawat ke pahuncha ja sakta thha... yani aadhi problem solve ho jane thhi...

"chal beta.. khada ho ja.." Raj ne usko ek laat mari.. aur bechara bhainsa.. bina kisi lag-lapet ke khada hokar deewar ke sath lag gaya...

"shabaash.. A haiiinsha.." aur Raj uske upar ja baithha...

ab tak bilkul shant khade bhainse ko Raj ki ye harkat ganwara nahi huyi.. aur lahraati huyi uski poonchh.. Raj ke chehre par aa takraayi..

"uff.. saaley.. Gobar chipak diya.. kya jata hai tera.. ek minute mein.." aur fir ek pal bhi na ganwaaye Raj ne uchhal kar apne haathhon se 'zeene' ki deewar thham li.. fir latakte huye usne jor lagaya aur agle hi pal wo 'zeene' mein thha...," Ohh..! Raj ka dil koodne ke sath hi dhak dhak karne laga.. yahan se ab agar wo kisi ko bhi dikh jata toh badi musibat aa jani thhi...

Sath wale ghar mein upar koyi kamra wagairah nahi thha.. Raj bina der kiye fatafat chhat paar karke Priya ke ghar ke sath ja chipka.. uski saanse buri tarah ukhad gayi thhi.. jis tarah aur jis haalat mein wo yahan thha.. aisa hona lajimi hi thha.. apni dhadkano par kaabu pana uske liye mushkil ho raha thha...

yahan se usko Priya aur Riya ke hulke hulke bolne ki aawaajein aa rahi thhi.. wahan se aage kareeb 6 feet oonchi deewar ko laanghna 6 feet ke hi Raj ke liye koyi mushkil kaam na thha... Raj ne kuchh der aise hi khada rahkar apni saanson ko kaabu mein kiya.. aur aakhiri deewar bhi laangh gaya.. wahan se sath wale kamre mein hi Priya aur Riya uski hi baaton mein vyast thhi...

par baatein sun'ne ka time kiske paas thha.. uska toh 'bulawa' aaya tha na; fir wo kyun aur kis baat ka intzaar karta.. bina ek bhi pal ganwayein Raj tapaak se kamre mein ghus gaya...

apne saamne yun achanak 'luteron' ki shakal banaye Raj ko dekhkar Priya saham gayi.. Darr ke maare uski toh saans hi gale mein atak gayi.. Riya ki toh cheekh nikal gayi... hangama ho jana thha.. agar Priya samay se pahle hi sthiti bhanp kar uske munh ko apne hathh se na daba deti toh..

"tumm.. yahan.... yahan kya karne aaye ho?" Sahmi huyi Priya ke gale se atak atak kar baat nikal rahi thhi...

"Tumne hi toh bulaya thha..." Raj gale ka thhook gatak kar apni shirt ki aasteen neeche karte huye bola.. dara huaa wah bhi thha..

"bhag jao jaldi.. sab maare jaayenge.. mummy jaag rahi hai.." Priya dheere se hadbadahat mein boli...

"ajeeb log ho tum bhi.. pahle bulaate ho.. fir beijjati karte ho.. pata hai kitna jokhim uthha ke aaya thha.." Raj khisiya sa gaya thha.." Ajeeb majak kiya tum dono ne aaj mere sath.." kahkar wo wapas palta toh ab tak chupchap khadi Riya bol padi...," Nahi, Ruko Raj... ek minute.. tum yahin thhahro.. main mummy ko dekhkar aati hoon..." kahkar Riya kamre se bahar nikli aur turant hi wapis palti," Iss bechare ka chehra toh dhulwa do..!" kahkar apni batteesi nikali aur neeche bhag gayi...

"Kyun? mere chehre ko kya huaa.." kahte huye Raj ne apne chehre ko hath lagaya toh chipka hua gobar uske hathhon ko lag gaya..," ohh... wo.. bhainse ki poonchh..." fir ruk-kar achanak idhar udhar dekhne laga....

"Bathroom idhar hai.. Priya uski shakal dekhkar mushkil se apni hansi rok pa rahi thhi.. iss koshish mein usne apne nichle hont ko hi kaat khaya thha.."

"Ohh.. thanx.." kahkar wah bathroom mein ghus gaya....

bahar aate hi usne seedha sa sawaal kiya..," Mujhe kyun bulaya thha yahan..?"

"Humne?... humne kab bulaya thha.." samanya hone ke baad bhi Priya ki aawaj nahi nikal pa rahi thhi.. wah abhi tak ek taraf khadi thhi.. apne hath baandhe huye.. aur lagataar Raj se najrein chura rahi thhi.. kabhi idhar dekhti.. kabhi udhar.. na khud baithhi aur na hi raj ko baithhne ko kaha...

"toh?.. wo patthar kyun maar rahe thhe.. tum.. mera sir fodne ke liye..?" Priya ko hichkichate dekh Raj 'sher' ho gaya.. khair uska gussa jayaj bhi thha.. bechara kitne border paar karke jo aaya thha..

"wo.. wo toh.. humne file maangi thhi.... gate ke neeche se daalne ko bola thha.. le aaye file..?" Priya ne aakhiri shabd bolte huye ek baar Raj ko najar uthhakar dekha.. par usko apni hi aur dekhte pakar turant hi najar fir se jhuka li...

"kab bola thha.. file ke liye...? mujhe toh yahan aane ke liye bola thha... aur wo bhi abhi!" waise tum Riya ho ya priya..?" Raj toh Priya ke liye hi aaya thha........

"Priya..... tumhe koun chahiye..?" jane kitni himmat jod kar Priya ne ye vyangya kar hi diya...

"Mujhe kuchh nahi chahiye.. bus ye batao.. yahan bulaya kyun?" Raj bhi ab tak samanya ho gaya thha..

"kaha naaa..." Priya ne ab ki baar seedha uski najron mein jhanka thha.. isiliye aage bol nahi payi...

Raj bhi apne mann ki baat kah hi dena chahta thha.. aur aaj mouka bhi thha.. aur mousam bhi..," Ek baat boloon.. Priya.. maine aaj tak kisi ladki se baat tak nahi ki hai.. par.. tumne bulaya toh khud ko rok hi nahi paya.. tum mujhe bahut achchhi lagti ho.. mera toh padhna likhna hi chhoot gaya hai.. jab se tumhe dekha hai... kahte huye Raj hulka sa uski aur badh gaya.. aisa karte hi Priya ne bhi ghabrakar apne aapko utna hi peechhe kheench liya.. Raj se door..!

"kya baat hai..? main tumhe achchha nahi lagta kya?" Raj thhoda sa aur aagey badh gaya...

"Nahi.. Mmmera matlab hai.. aisi baat nahi hai.. wwo.. aane hi wali hogi..!" Priya simat si gayi.. ab pichhe hatne ki jagah nahi bachi thhi.. wah chahkar bhi upar nahi dekh pa rahi thhi...

Raj samajh raha thha ki agar bulaya hai toh pyar toh karti hi hogi.. par bolne se darr rahi hai.. 'ladki' hai na...," main tumse pyar karta hoon Priya.. tumhari wajah se itna bada risk lekar aaya hoon.. ab tum bhi bata hi doh na.. tumhe main achchha lagta hoon ya nahi.. kahte huye Raj thhoda aur aage sarak aaya..

Priya kuchh na boli.. bus bachav ki mudra mein aa gayi.. usko iss khayal se hi itna darr lag raha thha ki kahin Raj usko chhoo na le.. kitni najuk thhi.. bechari.. kitni maasoom!

"Bolti kyun nahi..?" Raj ne aage badhkar uska hath pakad liya.. Priya thar thar.. kaanpne lagi....," Mmmain Priya nahi hoon... Riya hoon.."

"ohh.. pahle kyun nahi bataya.. Sorry.." Raj ko jaise bijli ka jhatka laga ho.. jitni door pahle thha.. palak jhapkte hi uss'se bhi jyada door jakar khada ho gaya..," Sorry.. pls kisi ko mat batana.. maine aapse jo kaha hai.. uski pitayi ho jayegi... wo letter bhi nahi likha thha usne.. main toh aise hi jhoothh bol raha thha.." Raj ko laga Isko letter ke baare mein shayad pata nahi hoga...

Raj ki ye baatein sunkar Priya mann hi mann uchhal rahi thhi... kitni sochta hai.. mere baare mein... fir pratyaksh mein Riya bankar boli..," Mujhe sab pata hai.. wo letter humne milkar hi likha thha.. aur usko tum achchhe bhi bahut lagte ho.. par wo aasani se ye baat sweekar nahi karegi.. wo tumse pyar karti hai.. aur shayad aaj ke baad toh tumhe kabhi bhool hi nahi payegi.."

"kyun.. aaj aisa kya huaa..?" Raj prafullit ho uthha..

"Aaj tumne yahan aane ka itna bada sahas kiya.... tum bahut achchhe ho Raaj.. bahut pyare ho..." Priya ek hi saans mein kah gayi...

"par main agar uske munh se ye sab sunta toh bahut achchha lagta..." Raj ne 'Priya' ke intzaar mein darwaje ki aur dekha...

"abhi toh tum jao.. kal school mein main.. matlab main usko bol doongi.. wo tumse baat kar legi...."

Priya ne apni baat poori bhi nahi ki thhi ki Riya neeche se lagbhag bhagti huyi wapas aayi," Mummy.. mummy aa rahi hain upar... !"

Raj darwaje ki aur badha toh Riya ne wapas dhakel diya..," Bathroom mein chhip jaao.. upar aa chuki hain mummy.."

asamanjhas mein khada Raj yakayak bahar kisi ke kadmon ki aahat sunkar bathroom mein ghus gaya..

"Kya baat hai.. aaj sona bhi hai ya nahi.. tum dono ko.. kab se upar neeche bhagti fir rahi ho.. chalo neeche.. chalkar so jao..."

"aa rahe hain mummy.. bus 5 minute aur.. aap chaliye..."Riya ne kaha...

"bahut ho gaye 5 minute.. 12 bajne wale hain.. jaldi uthhkar neeche bhago.." Mummy ne kitabein uthhakar table par rakh di..," wo tumhare kapde kahan hain.. Machine mein daal deti hoon.. subah dhone hain.. " kahkar wo bathroom ki aur chal di...

"Main deti hoon mummy..." Riya jhatke ke sath apni mummy se aage bathroom mein ghus gayi.. dono pasine se bheeg gayi thhi...

Riya ne kapde lekar chalte huye raj ki aur hulke se muskurakar dekha toh Raj ne uske nitambon par chikoti kaat li... Riya ne ekdum ghoor kar dekha.. par waqt thha nahi.. hisab barabar karne ka.. so bathroom ki chitkani band karte huye bahar nikal gayi.. usko pata thha.. wo nahi karegi toh uski mummy karegi....

"chalo ab neeche..!"

"aap chaliye na mummy ji.. hum aa rahe hain bus..!" Priya boli...

"nahi pahle tum chalo.. 5 minute ki kahkar ghanta laga deti ho.. suna nahi kya?" Mummy ne jab ghoor kar bed par baithhi Riya ko dekha toh unki himmat na huyi aage kuchh bolne ki.. dono mummy ke aage aage chal di...

Bechara Raj! Bathroom se nikalne ka raasta dhoondhta rah gaya....

to dosto such maaniye baathroom me main yaani aapka dostraj sharma fans kar rah gaya

tha vahan mera yaani raj ka kya haal hua jaanane ke liye paart 41 ka intjaar kijiye
 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --42

"उफ़.. कहाँ फंस गया? वीरू ने ठीक ही बोला था .. मत पड़ इन चक्करों में.. मारा जाएगा.. हे भगवन! वो मेरी चिंता कर रहा होगा.. क्या करूँ? फ़ोन ही उठा lata ..." जब बाथरूम का दरवाजा नही खुला तोह राज के mathe पर बल पड़ गए...," क्या वो ऊपर नही आ सकती.. एक बार.. कुछ भी बहाना करके.. फंसवा दिया गुसलखाने में.." चिद्चिदेपन में राज ने दीवार पर लात दे मरी.... बाहर निकलने का कोई रास्ता उसको सूझ नही रहा था ...उधर करीब घंटा भर बाद भी जब राज वापस नही आया तोह वीरेंदर को चिंता होने लगी... कुछ देर पहले ही उसने फ़ोन करके देखा था.. पर बेल राज के तकिये के नीचे बजी...वीरू ने और इन्तजार करना ठीक न समझा... अपनी शर्ट पहनी और बाहर निकल गया.. घर के सामने खड़े होकर उसने प्रिया के घर पर निगाह डाली.. कुछ देर पहले तक वहां light जली हुयी थी .. पर अब ऊपर और नीचे सब खामोश था ...," सो गए होंगे.. ये तोह.." वीरू को रत्ती भर भी विस्वास नही था की राज ऐसा कुछ सोचने का दुस्साहस कर सकता है.. कुछ पल खड़ा होने के बाद वह राज की तलाश में मार्केट की और निकल गया..'दुकाने तोह अब तक बंद हो गई होंगी.. कहाँ रह गया कमबख्त?"

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प्रिया और रिया का बुरा हाल था .. दोनों एक दूसरी की और मुंह करके आंखों ही आंखों में राज की हालत पर अफ़सोस प्रकट कर रही थी .. मम्मी पास ही बैठी टी.व्. पर न्यूज़ देख रही थी .. टी.व्. चैनल रह रह कर मुरारी के दोहरे कारनामे की धज्जियाँ उदा रहे थे .."मम्मी.. मेरी एक किताब नही मिल रही.. ऊपर देख आऊँ.. एक बार.." प्रिया ने अचानक बैठते हुए मम्मी से पूछा " तू सोयी नही अभी तक.. फ़िर सुबह उठते हुए वही drama करोगी... सुबह देख लेना.. मैं रूम लाक कर आई हूँ... आजकल चोरों का कुछ भरोसा नही.. जाने कहाँ कहाँ से घुस जाते हैं घर में.." प्रिया के दिल का चोर तोह पहले ही घर में घुसा बैठा था .. उसी को तोह nikaal कर आना था ... सिर्फ़ उस रात के लिए...," पर मम्मी बहुत जरुरी बुक है.. मुझे कल स्कूल लेकर जानी है.. अगर सुबह नही मिली तोह...चाबी दे दो.. मैं अभी देख आती हूँ..""प्रिया.. बेटी... तू इतनी बहादुर कब से हो गई.. तुझे तोह अंधेरे में बाहर आँगन में भी निकलते हुए डर लगता है... ला मुझे बता.. कौनसी किताब है.. मैं देखकर आती हूँ.." उसकी मम्मी ने खड़ी होकर टेबल की drawer से चाबी nikaali ..."नही मम्मी... ममेरा मतलब है.. आपको नही मिलेगी... हम दोनों चली जायेंगी.." प्रिया घबराकर खड़ी हो गई..."अच्छा! तोह मुझे तू anpadh समझती है .. तुझे नही मिली न.. चल नाम बता... २ मिनट में ढूंढ कर laati हूँ.." मम्मी ने हँसते हुए कहा.. प्रिया की बात को वो आत्मसम्मान का प्रशन बना बैठी...

इस बार रिया ने उसकी जान बचा ली," कौनसी किताब ढूंढ रही है तू? जेनेटिक्स वाली..??? वो तोह मेरे बैग में रखी है..."

"हाँ हाँ.. वही ढूंढ रही थी .. तेरे पास कैसे गई.. मेरी किताबों को हाथ मत लगना आज के बाद..!" प्रिया की जान में जान आई.. वरना तोह मुसीबत आने ही वाली थी ..

"अच्छा.. एक तोह बता दी.. वरना क्या होता.. पता है न...?" रिया आँखें matkaati हुयी बोली...

उनकी मम्मी ने चाबी वापस वहीँ रख दी..," अब सो जाओ चुपचाप... बहुत रात हो गई है.." कहकर उसने टीवी और लाइट दोनों बंद कर दी.. और उनके bister के साथ डाली चारपाई पर लेट गई...

"शुक्र है.. चाबी का तोह पता चला.." प्रिया ने मन ही मन कहा और मम्मी के सो जाने का इन्तजार करने लगी... उसका ध्यान अब भी बाथरूम में फंसे राज पर ही था .. 'बेचारा'

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वीरू ने पूरी मार्केट छान दी ... पर राज का कुछ पता न चला.. मार्केट तोह बंद हो चुकी थी ... उसको घोर चिंता सताने लगी... 'गया तोह गया कहाँ?' इसी सोच में डूबा हुआ वीरू जैसे ही रोड पार करने लगा... बिल्कुल नजदीक आ चुकी एक गाड़ी से उसकी आँखें चुन्ध्हिया गई... वह हिल तक नही सका... ड्राईवर के लाख कोशिश करने पर भी गाड़ी सड़क पर रपट-टी हुयी उस-से जा टकराई और divider पर लगी रेलिंग से टकरा कर रोड पर वापस आ गिरा.. गाड़ी के सामने!

गाड़ी में बैठी स्नेहा की चीख निकल गई... उसने आँखें बंद करके कसकर विक्की को पकड़ लिया.."ओह माय गोड !" विक्की ने लाख कोशिश की पर हादसा टाल न सका," तुम गाड़ी से मत निकलना.. मैं देखता हूँ.." कहकर विक्की नीचे उतर गया...वीरू सड़क पर पड़ा कराह रहा था .. उसने उठने की कोशिश की पर उठा न गया.."ठीक तोह हो..?" विक्की ने उसकी टांगें सहलाई और हाथ पकड़ कर पूछा..."आह.. मुझसे खड़ा नही हुआ जा रहा.. ओह्ह्ह्छ.. दर्द हो रहा है.. बहुत ज्यादा.." वीरू ने एक बार फ़िर खड़ा होने की कोशिश की.. पर पैरों ने साथ न दिया...विक्की ने उसके कन्धों के नीचे बांह फंसाई और अपना सहारा देकर खड़ा कर दिया.. बायीं टांग में दर्द बहुत ज्यादा था .."आओ.. गाड़ी में आ जाओ..!" विक्की उसकी बायीं तरफ़ चला गया और उसको धीरे धीरे पिछली सीट की और ले जाने लगा...वीरेंदर ने गाड़ी में बैठते ही पीछे मुड कर देख रही स्नेहा को देखा..," आः.. सॉरी भाई साहब गलती मेरी ही थी ... मेरा ध्यान कहीं और था ..." वीरू अब भी राज के बारे में चिंतित था ...

विक्की कुछ नही बोला॥ जल्दी से आगे बैठकर गाड़ी स्टार्ट की और चल पड़ा..."कहाँ.. ले जा रहे हो भाई साहब? मुझे....." वीरू ने अपनी टांग को हाथ की मदद से सीधा किया..."हॉस्पिटल में... और कहाँ..?" विक्की ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही जवाब दिया..."नही.. मुझे घर तक छोड़ आओ pls.. सुबह अपने आप चला जाऊँगा.. अगर जरुरत पड़ी तोह..""घर कहीं भगा जा रहा है क्या भाई..! तुम्हारा हॉस्पिटल चलना जरुरी है..." विक्की ने हालाँकि गाड़ी की रफ़्तार धीमी कर दी..."नही.. इसको हॉस्पिटल ही ले चलो.. Fracture होगा तोह..?" बार बार पीछे मुड कर देख रही स्नेहा को वीरू के चेहरे पर दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था ...

"ओह्ह्ह.. नही मैडम! मेरा दोस्त बाहर आया था .. मार्केट तक.. वापस ही नही पहुँचा.. आः.. उसी को देखने आया था .. अब अगर वो आ गया होगा तोह वो मेरी चिंता करेगा... वापस ले चलो.. यहीं पास में ही है..."

विक्की ने गाड़ी रोक दी..," घर पर किसी को बोल आते...!"

"दरअसल हम यहाँ रूम लेकर रहते हैं... घर हमारा यहाँ नही है..."

"पड़ोसी तोह होंगे यार...?" विक्की ने गाड़ी वापस घुमा दी...

"हुंह .. पड़ोसी..." वीरू की आंखों के सामने दोनों जुड़वां बहनों का चेहरा आया तोह वो मनन ही मनन बडबड़ा उठा," हो न हो.. पड़ोस में ही कुछ गड़बड़ हुयी है.. कागज भी नही दिखाया साले ने!"

"यहीं.. इसी गली से अन्दर ले लो.. हाँ... अब सीधा... आगे से बायें..."

ये गलियां विक्की की जानी पहचानी tही ... यहाँ वह कई बार thhanedar के घर आ चुका ठा... वो घर पास आते ही विक्की ने गाड़ी की स्पीड तेज कर दी....

"बस.. भाई साहब.. बस.. आगे आ गए.. वो पीछे वाला घर है..." वीरेंदर ने अपने घर की और इशारा किया...

"अब्बे मरवाएगा क्या..?" विक्की मन ही मन बोला और फ़िर प्रत्यक्ष में कहा," क्या खूब जगह घर लिया है... यार..!" और गाड़ी पीछे करके घर के सामने...लगा दी...

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घर के बाहर गाड़ी के रुकने की आवाज सुनते ही प्रिया और रिया का दिल धड़कने लगा... उनको लगा उनके पापा आ गए... जब भी उनके पापा के साथ कोई होता था तोह वो ऊपर जाकर सोते थे ..," हे भगवन.. पापा के साथ कोई नही होना चाहिय्र.." प्रिया ने हाथ जोड़ कर मन्नत मांगी... अब वह उठकर जाने की तैयारी कर ही रही थी की गाड़ी की आवाज ने उसको फ़िर से दुबक जाने पर vivas कर दिया...

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"लगता है तुम्हारा दोस्त आया नही है अभी तक... लाइट बंद है...!" विक्की ने रूम का दरवाजा खोलते हुए कहा...

"स्विच यहाँ हैं.. इस तरफ़...!"

विक्की ने लाइट ओं कर दी.. स्नेहा उसके पीछे पीछे आ गई थी ...

"तुम क्यूँ आ गई... बस चल ही रहे हैं...!" विक्की ने वीरेंदर को बिस्टर पर लिटा दिया...

"पर इसका दोस्त भी नही आया है.. उसके आने तक..." स्नेहा ने विक्की की आंखों में झांकते हुए कहा...

"आ .. हाँ.. वो मुझे तोह कोई प्रॉब्लम नही है.. अगर इसको न हो तोह.. " विक्की ने वीरेंदर को टेढा किया और हाथ लगाकर चोट का मुआयना करने लगा....

"मुझे क्या दिक्कत होगी.. भाई साहब.. पर आपको अगर janaa है तोह भी मुझे कोई इतराज नही है.. मैं रह लूँगा.. अब क्या दिक्कत होनी है...." वीरेंदर ने विक्की से कहा...

विक्की के बोलने से पहले ही स्नेहा ने अपना आदेश सुना दिया.. ," नही.. हम यहीं रुक जाते हैं.. इसके दोस्त के आने तक... ठीक है न..! हमें किस बात की जल्दी है...?"

"ठीक है.. मैं गाड़ी साइड में लगा कर आता हूँ..." और विक्की बाहर निकल गया...

"थंक्स मैडम! पर आपको चाय पानी के लिए नही पूछ सकता.. सॉरी" स्नेहा का व्यव्हार वीरू को पसंद आया था .. बाकि सब लड़कियों से अलग था ....

"ये मैडम क्यूँ बोल रहे हो? मेरा नाम स्नेहा है.. तुम्हारी उम्र की ही तोह हूँ... मुझे आती है चाय बनानी... कहते हुए वो kitchen में घुस गई......

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गाड़ी के चलने की आवाज सुन'ते ही प्रिया और रिया ने चैन की साँस ली... करीब ५ मिनट के बाद प्रिया उठी और धीरे से उसके कान में कहा..," मैं ऊपर जाकर आती हूँ.. हे भगवन.. बचाना..!"

"मैं भी चलूँ क्या?" रिया उसका हाथ पकड़ कर फुसफुसाई...

"न.. यहाँ मम्मी उठ जायें तोह संभाल लेना.. मैं जल्दी ही आती हूँ... " drawer से चाबी उसने पहले ही निकल ली थी ....

"ठीक है.. मेरी तरफ़ से भी सॉरी बोल देना...."

"मैं जाऊं क्या?" काफी देर के बाद जब प्रिया को मम्मी के खर्राटों की आवाज सुनाई देने लगी तोह उसने रिया के कान में धीरे से कहा.. चाबी उसने पहले ही निकल कर अपने पास रख ली थी ..

"मैं भी चलूँ..?" रिया भी जाग रही थी .. दोनों परेशां थी .. राज के मारे..

"उम्म्म्म.. तू रहने दे.. मैं अकेली ही चली जाती हूँ.. मम्मी उठ जाए तोह संभल लेना.." प्रिया दरी हुयी थी ..

"मेरी तरफ़ से भी सॉरी बोल देना.. बेचारा कितना परेशां हो रहा होगा.." रिया फ़िर से खुस्फुसयी..

प्रिया ने कोई जवाब नही दिया और बैठ गई.. करीब एक मिनट तक मम्मी की और देखती रही और जब उसको विस्वास हो गया की मम्मी नही जागेंगी... तोह धीरे से अपना एक पैर फर्श पर रखा और चप्पल ढूँढ़ने लगी...

"चप्पल रहने दे.. मारेगी क्या.? मम्मी की नींद का पता है न.. जरा सी आहात से उठ जायेंगी.. ऐसे ही चली जा.." रिया ने बैठ कर उसके कान में कहा..

प्रिया ने सहमती में सर हिलाया और खड़ी हो गई.. एक एक कदम बाहर की और रखते हुए उसके पाँव काँप रहे थऐ... जैसे ही वह रूम से निकली उसने अपनी चाल तेज कर दी और तेजी से सीध्हियाँ चढ़ने लगी....राज thhak हार कर सीट पर बैठ गया था ... जैसे ही उसने दरवाजे के बहार हलचल सुनी.. वह एकदम चौकन्ना हो गया और बाथरूम के दरवाजे के पीछे इस तरह खड़ा हो गया की अगर कोई बाथरूम के अन्दर आता है तोह वो दरवाजे के पीछे छिपा रहे और निकल भागने का कोई चांस अगर उसके पास हो तोह वो उसका फायदा उठा सके... उसका दिल जोरों से धड़क'ने लगा..प्रिया ने बिना एक पल भी गँवाए जल्दी से कमरे में आते ही बाथरूम का दरवाजा खोल दिया.." निकलो जल्दी.." प्रिया बहुत दरी हुयी थी .. आंखों में डर फैला हुआ था ...

मम्मी या पापा को वहां न पाकर राज ने चैन की साँस ली.. वह दरवाजे के सामने आया और बोला," प्रिया क्यूँ नही आई..?"

"कमाल है.. तुम्हे... मैं ही.. मतलब मैं आ गई न.. अब भागो जल्दी..!" प्रिया के बाल बिखरे हुए थे .. और जागने की वजह से उसकी आँखें लाल हो गई थी ..

राज अब काफी relax महूस कर रहा था .. उसने तोह 'हद से हद क्या हो सकता है '.. ये तक सोच लिया था .. फ़िर मुफ्त में पीछा छूट'ने पर वह मस्त सा गया था ," प्रिया को भेजो.. उसी की वजह से मेरी दुर्गति हुयी है.. मैं उसको सुनाये बिना नही जाऊँगा.. अब चाहे कुछ भी हो जाए.. क्या कर रही है वो..?"

"सो रही है॥ तुम्.. तुम् अपने साथ मुझे भी मरवाओगे.. please जो कुछ कहना सुन'ना है.. कल कह लेना.. स्कूल में... तुम मेरे घर वालों को नही जान'ते.. जाओ please .." प्रिया का चेहरा देखने लायक हो गया था .. उसके गुलाबी होंटों का रंग फीका पड़ गया

"अच्छा.. मुझे यहाँ बाथरूम में रुकवा कर वो मजे से सो रही है.. मैं नही जाता.. सुबह मेरे साथ तुम दोनों को भी मजा आ जाएगा.." राज को जब पता चला की प्रिया सो रही है तोह उसका गुस्सा सांतवें आसमान पर पहुँच गया..

"तुम इतने जिद्दी क्यूँ हो राज... व्वो मैं ही प्रिया हूँ.. और रिया भी जाग रही है.. तुम्हारे कारण.. पता है इतनी देर से मम्मी सोयी ही नही.. हम इंतज़ार कर रहे थे उनके सोने का... अब जाओ please.." प्रिया ने हाथ जोड़कर कहा..

राज उसको कुछ पल गौर से देखता रहा..," क्या कहा? तुम... प्रिया हो.. झूठ क्यूँ बोल रही हो... मुझे भागने के लिए..."

"सच्ची राज तुम्हारी कसम.. उस वक्त मैंने यूँ ही झूठ बोल दिया था .. मैं ही प्रिया हूँ..." प्रिया रह रह कर दरवाजे की और देख रही था .. उसको लग रहा था मम्मी बस आने ही वाली हैं...

"क्यूँ? उस वक्त तुमने झूठ क्यूँ बोला..? मैं नही मानता.. झूठ तुम अब बोल रही हो.." राज बाथरूम से बाहर निकलने को तैयार ही नही था ..

"व..वो मुझे उस वक्त डर लग रहा था .. तुम मेरे पास आ रहे थे .. इसीलिए", कहते हुए प्रिया की नजरें शर्म के मारे जमीन में गड़ गई .. उसके बाद वह कुछ न बोली.. बस अपने हाथ बांधे खड़ी रही..

"पर तुम्हे ऐसा क्यूँ लगा की ख़ुद को रिया कह देने पर मैं तुम्हारी और नही आऊंगा.. ?"

प्रिया कुछ न बोली.. जवाब उसको मालूम था .. उसको मालूम था की राज उस'से प्यार करता है.. वह ऐसे ही नजरें झुकाए खड़ी रही..."अच्छा.. बस एक बात बता दो.. अगर तुम्हे मेरे आगे बढ़ने से इतना ही डर लगता है तो फ़िर मुझे बुलाया क्यूँ..?" राज ने प्रिया को ऊपर से नीचे तक देखा.. वो रात के खुले कपडों में कामुकता का भण्डार लग रही थी ....

" मैंने बोला तोह था .. मैंने तोह अपनी फाइल मंगवाई थी .. तुम समझ क्यूँ नही रहे.. मुसीबत आ जायेगी.. please निकलो यहाँ से..!" प्रिया ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए..

"ठीक है.. चला जाऊँगा... एक बात बता दो.." राज बाथरूम से बाहर आ गया..

"क्या?.. जल्दी बोलो!" प्रिया ने खिन्न होते हुए कहा..

"तुम्हे मैं अच्छा नही लगता क्या?" राज ने उसकी एक तरफ़ देखती हुयी आंखों में झाँका..सुनते ही प्रिया की आँखें उसकी और घूम गई.. कितना अच्छा लगा था .. उसके मुंह से ये सब सुन'ना .. अगले ही पल उसने नजरें हटा कर कुछ बोलने की कोशिश की.. पर जैसे उसकी जुबान पर ताला लग गया.. राज के बारे में वो जितना सोचती थी .. जो सोचती थी .. वो निकल ही नही पाया...

"बोलो न.. मैं तुम्हे अच्छा लगता हूँ या नही... फ़िर मैं चला जाऊँगा.. तुम्हारी कसम.." कहते हुए राज ने आगे बढ़ कर प्रिया का हाथ पकड़ लिया...

"मुझे नही पता.. मैं जा रही हूँ.. तुम्हे जब जाना हो.. चले जाना ..!" प्रिया ने ताला टेबल पर रखा और बाहर की और जाने लगी.. पर राज ने उसका हाथ पकड़ रखा था .. मजबूती से.. प्रिया ने अपना हाथ छुडाने की कोशिश की तोह राज ने उसको अपनी और खींच लिया.. प्रिया को लगा जैसे उसमें जान ही नही बची.. उसने राज के आगोश में आने से बचने की कोशिश तक नही की और अगले ही पल वो उसकी बाहों में थी .."ये क्या बदतमीजी है.. छोडो मुझे.." पता नही प्रिया के मुंह से ये बात निकली कैसे.. और कहाँ से.. न तोह उसका मन ही.. न उसका खूबसूरत और मुलायम बदन उसकी बात के samarthan में था .. प्रिया का कुंवारा बदन.. एक दम खिल सा गया था .. राज की बाँहों में आते ही.. ढीले कपड़े भी छातियों पर टाइट हो गए थे .. जो राज के सीने से छू गई थी ...

"बदतमीजी का क्या मतलब है.. मैं तोह पूछ रहा हूँ.. बता दो.. मैं तुम्हे छोड़ दूंगा... और चला जाऊँगा.." प्रिया के बदन की महक इतनी करीब से महसूस करके राज का रोम रोम बाग़ बाग़ हो गया.. प्रिया को छोड़ने की बजे उसने अपना हाथ उसकी पतली कमर में दाल लिया.. प्रिया की तेज़ हो चुकी गरम साँसों से वह उत्तेजित भी हो गया था .. उसकी आंखों के सामने गाँव वाला दृश्य जीवंत हो उठा.. वह प्रिया को भी उसी तरह देखने को लालायित हो उठा.. जैसे उसने खेतों में कामिनी को देखा था ... बिना कोई कपड़ा तन पर डाले... उसकी उंगलियाँ प्रिया की कमर पर सख्त हो चली थी .. और उसको अपनी और खींच रही थी ...

कमाल की बात तोह ये थी ki प्रिया के शरीर से इन् सबका हल्का सा भी विरोध न होने पर भी प्रिया की जुबान हार मान'ने का नाम तक नही ले रही थी .. अपनी जाँघों से थोड़ा सा ऊपर प्रिया को 'कुछ' चुभ रहा ठा.. प्रिया जानती थी की 'ये' क्या है..? उसको ऐसा लगा जैसे वो आसमान से गिर रही है.. इतना हल्का.. इतना रोमांचक.. और इतना आनंददायी.. दिल चाह रहा था की वह अपना हाथ भी राज की कमर से चिपका ले और उस'से और jyada चिपक जाए.. इस अभ्हूत्पूर्व आनंद को दोगुना करने के लिए.. पर उसकी जुबान कुछ और ही बोल रही थी ..," ये ग़लत है राज.. छोडो मुझे.. मुझे जाने दो.. मुझे डर लग रहा है.. जाने दो मुझे.. छोडो."

कहते हुए उसने प्रतिरोध करने की कोशिश की.. पर उसके बदन ने उसका साथ ही नही दिया.. वह यूँही चिपका रहा.. प्रिया अब राज की आंखों में झांक रही थी .. उसकी आंखों में सहमती भी थी .. और विरोध के भावः भी.. प्यार था और नाराजगी भी.. फंसने का डर भी था और और पास आने की तमन्ना भी... पर राज ने सिर्फ़ वही देखा जो वो देखना चाह रहा था ... इतनी देर से उसके होंटों के पास ही खिले गुलाब की पंखुडियों जैसे प्रिया के गुलाबी होंटों को नजरअंदाज करना वैसे भी असंभव था ... राज ने अपना चेहरा झुकाया और प्रिया की नामुराद जुबान को बंद कर दिया.. प्रिया रोमांच की दुनिया के इस सर्वप्रथम अहसास को sah नही पाई.. कुछ देर तक तोह उसकी समझ में कुछ आया ही नही..

 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --43

. उसकी जांघें भीच गई.. जाँघों के बीच बैठी राज के सपनो की रानी तिलमिला उठी.. chhatpata उठी.. और जैसे ही उसको होश आया अपने होंटों को राज के होंटों से मुक्त किया और बरस पड़ी.. मैं तुम्हे ऐसा नही समझती थी.. राज! तुम भी दूसरो के जैसे हो.. गंदे.. छोडो मुझे..."

अब तक प्रिया के हल्के फुल्के विरोध को नजरअंदाज कर रहा राज हुक्का बक्का रह गया.. प्रिया द्वारा उसको ' दूसरो के जैसा ' बोला जन उसको बिल्कुल गंवारा नही हुआ और प्रिया को अपने बहुपास से आजाद कर दिया... पर हिला नही.. वहीँ खड़ा रहा..

प्रिया को अचानक ऐसा लगा की अभी अभी उसकी जवानी की बगियाँ में बसंती फूल खिले हों.. और अचानक पतझड़ भी आ गया हो... उसकी समझ नही आ रहा था की वो क्या करे.. सॉरी बोलकर उस'से चिपक जाए.. या सॉरी बोलकर नीचे भाग जाए.. उसने najarein उठाकर राज की आंखों में झाँका.. राज की आंखों से अब बे-इज्जत होने का निर्मम भावः टपक रहा ठा.. पर वह फ़िर भी एकटक देखता रहा.. उसकी आंखों में... हड़बड़ी में प्रिया कुछ न बोल पाई.. न 'ऐसे' सॉरी.. न 'वैसे' सॉरी.. अचानक मुडी और भाग गई.. राज को वहीँ छोड़ कर...

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नीचे बेद पर आकर वह गुमसुम सी लेट गई...

"क्या हुआ? इतनी देर क्यूँ लगा दी प्रिया। मैं तोह dari हुयी थी .." रिया प्रिया की और सरक आई...प्रिया कुछ न बोली.. उसकी आँखें नम हो गई थी ...

"प्रिया..!" रिया ने उसको पकड़ कर हिला दिया..,"क्या हुआ..? बता तोह। "

"कुछ नही..!" और प्रिया ने रिया को अपनी बाहों में जकड लिया.. पर वो 'मरदाना' अहसास यहाँ कैसे मिलता.. वो सुबकने लगी...

"बता तोह क्या हुआ..? मैं तेरी बहिन नही हूँ क्या..?" रिया को लगा 'कुछ' न 'कुछ' तोह हुआ ही है.. दोनों में..."

"मैं अभी आई..." कहते ही वह उठकर बाहर भाग गई.. इस बार उसको मम्मी का डर भी रोक नही पाया..ऊपर जाते ही वह कमरे में गई.. वहां कोई नही था .. अब जाकर उसको 'सॉरी' बोलने की akal आई थी .. चिपक कर.. उसको लगा कुछ मिलते ही खो गया.. कोई अपना सा.. कोई प्यारा सा.. वह बाथरूम में गई.. chaaron और देखा और बाहर छत पर आ गई.. और घर की मुंडेर पर खड़ी होकर इस तरह देखने लगी मनो राज दिख गया तोह अभी बुला लेगी... वापस.. कह देगी.. वो सबके जैसा नही है.. वो उसका राज है.. कह देगी की वो उससे प्यार करती है.. कह देगी की उसके शरीर की धड़कने अब सिर्फ़ उसके ही लिए हैं..पर कहीं कुछ नही मिला.. वापस कमरे में आई और तकिये को अपनी छातियों पर जोर से दबाकर उलटी लेट गई.. बेजान तकिया उसकी तड़प कहाँ से समझता....

तब तक रिया भी ऊपर ही आ गई," क्या हुआ प्रिया.. उसने कुछ ग़लत किया क्या?"

प्रिया का रुदन अपनी हमराज को सामने देखते ही सामने आ गया," मैंने ग़लत किया रिया.. मैंने उसको खो दिया.." कहकर प्रिया फ़िर से रिया से जा चिपकी...

"बता न यार.. हुआ क्या?" रिया ने उसके आंसू पौंछते हुए कहा...वह अपने प्यार का इजहार करने आया था .. मैंने ठुकरा दिया.. मैंने उसको बे-इज्जत कर दिया रिया.. मैंने उसको खो दिया..." और प्रिया ने सब-कुछ बता दिया।

"पागल! जब तुझे वो अच्छा लगता है तोह तुने ऐसा किया ही क्यूँ..?" रिया ने राज का पक्ष लिया...

"मुझे डर लग रहा ठा कहीं वो आगे न बढ़ जाए.... मुझे सब कुछ इतना अच्छा लग रहा था की मुझे लगा.. मैं उसको रोक नही पाउंगी.. मैं ख़ुद ही बहकने लगी थी रिया.. उसने पता नही क्या कर दिया था ..." प्रिया रिया के सामने रो रही थी .. अपनी हालत बयां कर रही थी ...

"पर तू आराम से भी तोह कह सकती थी .. उसको इतना बुरा भला कहने की क्या जरुरत थी ..."

"मुझे पता था .. वो नही मानेगा.. आराम से कहने से... इसीलिए.." प्रिया ने सफाई दी....

"चल कोई बात नही... सुबह देखते हैं.. आजा.. मम्मी जाग गई तोह प्रॉब्लम आ जायेगी..." रिया ने प्रिया का हाथ पकड़ कर कहा....

"तू उसको manaa लेगी न pleese ... मेरे लिए.. उसको कह देना.. अब मैं कुछ नही कहूँगी.. चाहे वो कुछ भी कर ले...." प्रिया उठते हुए बोली...

"चिंता मत कर.. तू मेरा कमाल देखना... अगर वो प्यार करता है तोह कहीं जाने वाला नही..." रिया ने बाथरूम का दरवाजा बंद करके कमरे का ताला लगाया और दोनों नीचे चल पड़ी..

नीचे आते हुए दोनों खिड़की के पास रुकी.. राज की खिड़की बंद थी .. प्रिया ने रुन्वासी सी होकर रिया की आंखों में झाँका और नीचे चली गई....

" कहाँ था तू?" राज के रूम में घुस'ते ही वीरू की आँखें एक पल को चमक उठी.. पर अगले ही पल उसको याद आ गया की साडी दुर्गति उसकी ही वजह से हुयी है," तुझे पता है यहाँ क्या हो गया?" विक्की वीरू के पास कुर्सी पर था जबकि स्नेहा उसके बिस्तर पर पालथी मरे बैठी थी.. राज के अन्दर घुसते ही वो खड़ी हो गयी।

राज को माजरा समझ में न आया.. उसके चेहरे पर तोह 12 पहले ही बजे हुए थे.. दो अनजान लोगों को कमरे में पाकर वो भोचक्का सा बारी बारी तीनो की और देखने लगा और कुछ सोचने के बाद उसने विक्की की तरफ हाथ जोड़ दिए," नमस्ते..."

"क्या नमस्ते यार.. कही जाओ तोह बता कर तो जाया करो.. वीरू तुम्हे ढूँढने गया था.. हमारी गाड़ी से इसका एक्सीडेंट हो गया.." विक्की ने सहज भावः से कहा..

"क्या?" राज के पैरों तले की जमीन खिसक गयी...," कब? ... कहाँ..?" उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया.. सचमुच आज का दिन बहुत खराब था..,"क्या हुआ?"

"क्या हुआ के बच्चे.. बात को गोलमोल मत कर... पहले बता.. गया कहाँ था तू इतनी रात को...?" वीरू ने कोहनी का सहारा लेकर उठने की कोशिश की.. पर दर्द बहुत ज्यादा बढ़ गया था.... वह कराह उठा..

"बता दूंगा भाई.. पहले बता तोह क्या हुआ.. ? यहाँ लगी है क्या चोट..?" सड़क पर घिसरने की वजह से वीरू के चेहरे पर भी खरोंच आई थी.. राज ने उस खरोंच के पास हाथ लगाते हुए पूछा...

" इसकी टांग में चोट लगी है... मैं तो कह रही थी हॉस्पिटल चलो.. ये माना ही नही.. कहने लगा राज चिंता करेगा, वापस आने पर.." वीरू के बोलने से पहले ही स्नेहा बोल पड़ी...राज ने देखने के लिए जैसे ही वीरू की जांघ को हिलाने की कोशिश की वो दर्द से बिलबिला उठा," बस कर यार.. अब तोह चैन से पड़ा रहने दे..."

"चल मेडिकल चलते हैं.. यार.. सॉरी.. मुझे बता कर जाना चाहिए था .." राज को कुछ बोलते न बन रहा था...वीरू का दर्द अब कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था.. राज के वापस आने पर अब वीरू को राज की बजाय अपनी चोट की फिकर होने लगी.. उसने नजरें घुमाकर विक्की की और देखा॥"

हाँ हाँ.. चलो यार.. स्नेहा! तुम यही रुक जाओ.. हम इसको ले जाते हैं... अगर वहां ज्यादा टाइम लगा तोह मैं वापस आ जाऊँगा..." विक्की ने स्नेहा की और देखते हुए अपनी बात ख़तम की...

"ठीक है.. ले जाओ!.. मैं तब तक यहीं रूकती हूँ.." स्नेहा को कोई ऐतराज नही था...उसके बाद दोनों वीरू को सहारा देकर गाड़ी में ले गए... स्नेहा ने अपनी ड्रेस change की और लेट गयी...

थाने में मुरारी S.H.O. साहब के शयन कक्ष में उसके बिस्तर पर लेते हुए थे .. और S.H.O. कुर्सी पर बैठा उसकी गालियाँ सुन रहा था.." बिजेंदर.... कैसे रहते हो यहाँ पर.. मेरा तोह दम निकला जा रहा है गर्मी में.. यहाँ A.C. क्यूँ नही लगवाया.. बहिन के लौडे मच्छर खा रहे हैं.. वो अलग... क्या घंटा थाना है ये... लाक up में मुजरिम कैसे रहते होंगे.. आख़िर वो भी तोह इन्सान हैं..." मुरारी के मुंह से इंसानियत का जिक्र कुछ फब नही रहा था... वो भयभीत tha कि कल उसका क्या होगा... tough के थाने में...

"क्या करें सर... ये cooler भी ऊपर की कमाई से चल रहा है... सरकार ने तोह बस ये पंखा दे रखा है..." विजेंदर ने छत की और इशारा करते हुए कहा... पंखा मुश्किल से एक मिनट में 50 चक्कर काट रहा था....

"सरकार के भरोसे रहोगे तोह ये भी नही रहेगा.. कुछ दिन बाद.. मेरे तोह चांस ख़तम ही हो गए.. पता नही किस मादरचोद ने बहलाया है मेरी बेटी को... साला सारे करियर का कबाडा हो गया... चल मेरे ऑफिस चलते हैं.. सुबह आ जायेंगे.." मुरारी ने पेट पर हाथ मारते हुए कहा...

"पर अगर किसी ने देख लिया तोह.. मेरी नौकरी जाती रहेगी.. सर.. आपको मीडिया का पता ही है.. कैसे उछालते हैं मामलों को.. कहीं ले देकर भी मामला सेट नही कर सकते..!"

"बहिन की चूत.. मीडिया वालों की.. सालों ने मेरी माँ चोद दी.. इनको तोह फांसी पर लटका देना चाहिए.. वैसे तुझे क्या लगता है..? किसकी चाल हो सकती है..?" मुरारी बैठ गया था ...

"वैसे पक्का तोह कैसे कहें.. पर हो न हो विक्की इस मामले में हो सकता है.. आजकल वो शहर में नही दिख रहा.. मुझसे मिला था तोह आपको सबक सिखाने कि बात कर रहा था.. वो मुल्तिप्लेक्स वाले इस्सुए पर.... वो हर हल में उसको खरीदना चाहता है.."

"उसकी गांड में दम नही है.. जब तक में जिन्दा हूँ.. उसको कोई नही खरीद सकता... पर वो तोह विदेश में है न.. आजकल.. उसकी पार्टी वाले तोह यही कह रहे हैं..?"

" न जी न.. कम से कम जिस दिन ये घटना हुयी.. उस रात को तोह वो इंडिया में ही था .... किसी लड़की के साथ था.. लम्बी सी.."

"तुझे कैसे पता? पहले क्यूँ नही बताया हराम के....! तेरे पास सबूत है कोई..?" मुरारी बिस्तर से उछल पड़ा...

"सबूत तोह नही है.. पर जिस होटल में वो दोनों रुके थे .. उस दिन वो भी वहीँ था .. जिसने मुझे बताया है.. मैंने सोचा आपकी लड़की लम्बी कहाँ होगी.. इसीलिए नजरंदाज कर दिया..." विजेंदर ने ५ फीट के मुरारी को सर से पाँव तक देखा.

" अबे वो 5'8" की है.. जरूर वही होगी.. कौनसा होटल था...?" मुरारी को लगा कोई रास्ता निकल सकता है...

"कोई फायदा नही.. मैंने निजी तौर पर इंकुइरी की थी.. उनका कोई रिकॉर्ड नही है.. वहां ठहरने का..." विजेंदर ने उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया."

साला.. मैं उसको छोडूंगा नही.. तेरे पास no. है उसका..?"

"मैंने तरी किया था .. switch ऑफ़ आ रहा है.. लगातार..!"

"मेरे ड्राईवर का भी कुछ पता नही.. कहीं वो भी तोह शामिल नही है इस गेम में?" मुरारी का दिमाग भन्ना गया..

"अभी तोह आप कल का सोचिये कुछ.. कल आपको कोर्ट ले जाना पड़ेगा.. वो इंस्पेक्टर वहीँ मिलेगा... उसके बाद में कुछ नही कर पाऊंगा..." विजेंदर ने मुरारी से कहा..

"हाँ यार.. उसका तोह कुछ करना ही पड़ेगा.. कुछ लेने देने की बात कर ले न..?" मुरारी बेचैन हो गया..."

वो तोह मैं देख लूँगा.. पर शालिनी के बयानों का क्या करूँ...?.. ये तोह आपको फंसवा ही देंगे... अगर उसने कोर्ट में बोल दिया तोह.. ले भी तोह अपने साथ ही गया कम्बखत... कुछ सोचते भी तोह.." विजेंदर ने सफाई दी।

"उसको तोह मैं देख लूँगा.. कब तक अपने साथ रखेगा साला... पर कल मेरी पुलिस कस्टडी नही होनी चाहिए... पुलिस की तरफ से.. इस माम'ले में भी.. और उसमें भी....."

"ठीक है सर! मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूँगा... आप बेफिक्र रहे..." विजेंदर ने कहा॥"

विजेंदर.. यहाँ लड़की नही आ सकती है क्या..? रात गुजारने के लिए.. बड़ी खुस्की सी हो रही है यार॥"

विजेंदर ने बुड्ढे की आंखों में गौर से देखा.. कितना कमीना था वो..," यहाँ कुछ नही हो सकता सर... आप वाला मामला न होता तोह जरुर हो जाता.. ऐसे मामलों में मीडिया वाले रात रात भर चिपके रहते हैं आसपास.. की हम कोई गलती करें और वो उसको ब्रेकिंग न्यूज़ बना दें.. कम से कम आज तोह आप काट ही लीजिये......"

मुरारी ने अपने पेट पर हाथ मारा और अपना मोबाइल निकल लिया.... कहीं डायल करके कान से लगा लिया.."हाँ.. मुरारी जी..."

"सुन बांके.. वो साला विक्की इधर ही है.. आसपास हर जगह फ़ोन कर दो.. दिख जाए तोह बिना पूछे ही उठवा लो साले को...." मुरारी ने कहा॥"

उसको तोह मैंने अभी मेडिकल की पार्किंग में देखा था...... मैं वहीँ से आ रहा हूँ.. 2517 टोयोटा थी.. ब्लैक कलर में.. अभी आधे घंटे पहले की तोह बात है... कहो तोह भेज दूँ.. बन्दों को...?"

मुरारी की आँखें चमक उठी...," पहले क्यूँ नही बताया भोस... जल्दी कर.. निकलना नही चाहिए.. कोई और भी था क्या उसके साथ...?"

"किसी और का तोह पता नही.. वो पार्क करके निकल रहा था.." बांके ने कहा.."जल्दी कर.. उस्सपर नजर रखवा कर किसी अच्छे मौके का इंतज़ार करना.. और हाँ.. अपनी लड़की उसके साथ हो सकती है.. ध्यान से.. मजबूत बन्दों को भेजना.. बहुत सख्त जान है साला..! उठवा ले.. और फ़िर मेरे पास फ़ोन करना.. उस'से पहले उसको कुछ मत कहना.. समझा...!"

"ठीक है मुरारी जी.. आप चिंता न करें.. मैं साथ ही जाऊँगा!"

"शाबाश!" कहकर मुरारी ने फ़ोन काट दिया.. वह खिल सा गया था.... की अचानक tough की याद आते ही उसका कुरूप चेहरा फ़िर से मुरझा गया...

 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --44

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा हाजिर हूँ नेक्स्ट पार्ट लेकर

"शुक्र है फ्रॅक्चर नही है! माँस फटने से सूजन आ गयी है.. ठीक होने में 10-15 दिन लग जाएँगे.. मैं कुच्छ दवाइयाँ लिख देती हून.. टाइम से लेते रहना और नेक्स्ट मंडे एक बार आकर चेक करा जाना... ओके?" हॉस्पिटल में लेडी डॉक्टर वीरेंदर और राज के पास खड़ी थी..," करते क्या हो तुम?"

"जी, पढ़ते हैं..10+2 में" दोनो एक साथ बोल पड़े...

"तुम्हारा दोस्त शरमाता बहुत है.." डॉक्टर ने राज को प्रिस्क्रिप्षन पेपर दिया और मुस्कुराते हुए वहाँ से दूसरे पेशेंट के पास चली गयी...

"क्या बात थी.. तू शर्मा क्यूँ रहा था ओये?" राज ने वीरू के कान के पास मुँह लेजाकार कहा...

"मेरी पॅंट निकलवा ली थी यार.. शरम नही आएगी क्या?" वीरू मुस्कुराया और अचानक बात पलट दी..," चलें.. सुबह होने को है.."

"एक मिनिट.. मैं भाई साहब को देखकर आता हूँ... तू यहीं लेटा रह तब तक.." राज ने वीरू से कहा..

"कहाँ गये वो..?"

"पता नही.. अभी 20 मिनिट पहले यहीं थे.. एक फोन करने की बात कहकर निकले थे.. बाहर ही होंगे.. मैं बुलाकर लाता हूँ.." कहकर राज बाहर निकल गया...

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करीब 10-15 मिनिट बाद राज वापस आया," यार वो तो कहीं दिखाई नही दिए... मैं हर जगह देख आया.."

"चले तो नही गये हैं.. स्नेहा रूम पर अकेली है ना.. वो उसको बोल भी रहे थे की देर लगी तो मैं आ जाउन्गा..!" वीरू ने राज से कहा..

"पर मैं पार्किंग में गाड़ी भी देख आया हूँ... वहीं खड़ी है.. गये होते तो गाड़ी लेकर नही जाते क्या?" राज ने सवाल किया...

"फिर तो यहीं होंगे.. इंतजार करते हैं.. और क्या?" वीरू ने राज की और देखते हुए कहा...

राज ने सहमति में सिर हिलाया और वीरेंदर के पास ही बैठ गया.....

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सवेरा हो गया था.. स्नेहा को सारी रात नींद नही आई.. यूँही करवटें बदलती हुई विकी के बारे में सोचती रही...कितना प्यारा है मोहन.. कितना अपना सा है.. 3 दिन में ही वो उस'से किस कदर जुड़ गयी थी.. उसके दूर जाते ही उसको लगता था की वो फिर से नितांत अकेली हो गयी है... मोहन ने एक साथ ही उसको कितनी सारी खुशियाँ दे दी... मोहन के लिए ही जियूंगी अब... उसके लिए मर भी जाउन्गि... स्नेहा ने मन ही मन सोचा और अंगड़ाई लेते हुए उल्टी लेट गयी.. उसका रूप निखर आया था.. अब हर अंग हर पल जैसे 'मोहन मोहन' ही पुकारता रहता था.. आज गाड़ी में ही उन्होने कितनी मस्ती की थी.. स्नेहा रह रह कर विकी से लिपट जा रही थी.. 'पल' भर की बेचैनी भी स्नेहा से सहन नही हो रही थी... मोहन ने वादा किया था.. रोहतक जाकर एक दोस्त के फ्लॅट पर रुकेंगे और वो उस'से वहाँ पहले दिन वाला ही प्यार फिर से करेगा... जी भर कर.. वो रोहतक आ भी गये थे.. पर स्नेहा से 2 पल का भी इंतज़ार नही हो रहा था.. वो रह रह कर मोहन से लिपटी जा रही थी.....

और शायद इसीलिए 'वो' हादसा हुआ.. अगर वो मोहन को इस तरह 'तंग' ना करती तो शायद मोहन हादसे को टाल भी लेता.. सोचते हुए स्नेहा ने एक लंबी आह भारी.. और करवट बदलकर फिर से सीधी हो गयी...

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करीब 10 मिनिट बाद दरवाजे पर दस्तक हुई.. स्नेहा एक दम से उठी और दरवाजे के पास जाकर पूचछा," कौन है?"

"हम हैं.. दरवाजा खोलो"

आवाज़ वीरू की थी.. स्नेहा ने झट से दरवाजा खोल दिया..," आ गये.. क्या रहा?"

"भैया यहाँ नही आए हैं क्या..?" राज ने उल्टा उसी से सवाल किया..

"क्या मतलब?" स्नेहा का दिल धक से रह गया..," कहाँ हैं वो? यहाँ तो नही आए..

"गाड़ी तो उनकी वहीं पर खड़ी है... फोन करने की कहकर निकले थे.. हमने करीब 1:30 घंटे उनका इंतज़ार किया.. फिर सोचा क्या पता यहीं आ गये हों.. इसीलिए हम आ गये..." राज ने चिंतित स्वर में उत्तर दिया...

स्नेहा बिना कुच्छ सोचे समझे ही रोने लगी...," उन्होने पहले ही कहा था की रोहतक में उनको ख़तरा है.." सुबक्ती हुई स्नेहा के गालों से मोटे मोटे आँसू बहने लगे..

राज ने वीरू को बेड पर लिटा दिया.. दोनो की समझ में नही आ रहा था की वो क्या करें; क्या कहें... कुच्छ देर बाद राज उठकर स्नेहा के पास आया," आ जाएँगे.. आप रो क्यूँ रही हैं.. हम छ्चोड़ आएँगे.. आपको जहाँ जाना है..."

स्नेहा को कहाँ जाना था.. वो अब जा भी कहाँ सकती थी... मोहन के संग सपनों का, अरमानो का जो गुलिस्ताँ स्नेहा ने अपने दिल में सहेज लिया था, उसके आलवा अब इस जहाँ में उसका बचा ही क्या था.. पापा? जिसने महज अपनी राजनीति के लिए शतरंज की बिसात पर मोहरे की तरह से उसका इस्तेमाल किया था.. उसके पास? नही.. कभी नही! अगर वो ऐसा सोचती भी तो किस मुँह से.. वा खुद उसके खिलाफ बग़ावत पर उतर आई थी.. और शालिनी वाला केस सुर्ख़ियों में आने पर तो उसको अपने 'बाप' से नफ़रत सी हो गयी थी....

"चिंता ना करें आप... लीजिए.. आप फोन कर लीजिए..." राज ने अपना फोन उठाकर स्नेहा को दे दिया...

"ओह हां.. पर उसका फोन तो ऑफ ही रहता है.. अक्सर.. चलो ट्राइ करती हूँ..!" उम्मीद की किरण नज़र आने से उसकी सुबाकियाँ कुच्छ कम हुई और उसने विकी का नंबर. डाइयल किया.. पर जैसा स्नेहा ने सोचा था वैसा ही हुआ.. फोन ऑफ था.. स्नेहा को मोहन की भी चिंता हो रही थी और अपनी भी.. वह बेड पर बैठकर अपना सिर पकड़कर रोने लगी....

"तुम रो क्यूँ रही हो.. वो थोड़ी बहुत देर में आ ही जाएँगे.... वैसे तुम्हारे पास घर का नंबर. भी तो होगा ना.. वहाँ पता कर लीजिए अगर उन्होने घर पर फोन किया हो तो.. वैसे वो भाई साहब आपके लगते क्या हैं?" वीरू बेबस था.. उसके पास आकर उसके आँसू नही पोंच्छ सकता था...

क्या बताती स्नेहा.. क्या नाम देती 2 दिन पहले बने इस दिल के रिश्ते को.. उसको डर था की अगर वो सच्चाई बताती है तो कहीं दोनो डर कर कुच्छ उल्टा सीधा ना कर दें.. मसलन पोलीस को फोन वग़ैरह.. प्रत्युत्तर में वो बिलख पड़ी..," मोहन.. कहाँ हो तूमम्म्मममम???"

स्नेहा का वो कारून प्रलाप सुनकर दोनो का दिल दहल गया.. राज उसके पास जाकर बैठ गया," आप ऐसे ना रोयें.. मैं छ्चोड़ आउन्गा आपको जहाँ जाना है... देखिए यहाँ पर हम एज ए स्टूडेंट रह रहे हैं... किसी ने आपका रोना सुन लिया तो लोग तरह तरह की बातें करेंगे.. प्लीज़.. आप सब्र से काम लें.. वो आते ही होंगे..." राज कह तो रहा था की वो आ जाएँगे.. पर चिंता उसको खुद को भी होने लगी थी.. अब तक तो उसको यहीं पर आ जाना चाहिए था.. 3 घंटे के करीब होने वेल थे उसको गायब हुए...

स्नेहा ने जैसे तैसे खुद को संभाला..," क्या मैं यहीं रह सकती हूँ.. जब तक वो नही आता?" उसने अपने आँसू पोंच्छ लिए.. सच में ही उसका रोना उन्न बेचारों को मुसीबत में डाल सकता था.. और खुद उसको भी...

" क्या?.. हां.. पर.. मेरा मतलब है कि..." राज को कोई शब्द ही ना मिला आगे कुच्छ कहने को.. कैसे रह सकती है वो यहाँ.. लड़कों के कमरे में.. राज ने प्रशन सूचक नज़रों से वीरू की और देखा...

"हां.. रह ले बहन.. जब तक तेरा दिल करे तब तक रह यहीं पर.. मैं कह दूँगा.. मेरी बेहन है.. लोगों की ऐसी की तैसी..! लोग तो बोलते ही रहते हैं.." वीरू ने फ़ैसला सुना दिया..

स्नेहा सुनकर चोंक पड़ी.. उसने अपनी जुल्फें पीछे करके नज़रें उठाकर वीरू की और देखा.. कुच्छ पल तो वो विस्मय से अपनी आँखें फाडे हुए उसको देखती रही.. बूझे हुए चेहरे पर एक मद्धय्म सी मुस्कान दौड़ गयी.. और आँसू फिर से बहने लगे.. उसको यकीन ही नही हो रहा था की उसको 'भाई' मिल गया है..

वीरू उसकी तरफ देखकर मुस्कुराने लगा तो स्नेहा से रहा ना गया.. लगभग दौड़ती हुई सी वो उसके बेड की और गयी और घुटने ज़मीन पर रखकर उसकी छाती पर सिर रख लिया.. और सुबक्ती रही...

"अब भी क्यूँ रो रही है तू.. मैं हूँ ना.. तेरा भाई.." वीरू ने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर उपर उठाया...

"रो नही रही भैया.. समेट नही पा रही हूँ.. रक्षा बंधन पर मिली इस अनोखी खुशी को.. मेरा कोई भाई नही था.. आज से पहले.." स्नेहा खिल उठी..

"अब तो है ना.. वीरू!" वीरू की आँखें चमक रही थी...

"मुझे क्यूँ भूल रहे हो.. मैं भी तो हूँ.." राज भी स्नेहा की बराबर में आ बैठा...

"बहती गंगा में हाथ धो रहा है.. क्यूँ? चल आजा तू भी" वीरू ने कहा और दोनो राज के चेहरे को देखकर खिलखिला उठे......

विकी के इंतज़ार में दिन के कब 7 बज गये तीनो को पता ही नही चला.. स्नेहा रह रह कर बेचैन हो जाती थी.. पर अब उसको अपनी नही सिर्फ़ मोहन की चिंता थी.. उसको तो भाई मिल गये थे.. पर मोहन का यूँ अचानक गायब हो जाना उसकी परेशानी का सबब बना हुआ था.. स्नेहा रह रह कर खामोश हो जाती और शून्या में झाँकने लगती...

"चिंता क्यूँ कर रही हो सानू.. वो कोई बच्चे थोड़े ही हैं.. आ जाएँगे.." वीरू ने स्नेहा का हाथ पकड़ कर उसका ध्यान वापस खींचा...

स्नेहा ने हां में सिर हिलाया और अपनी नम हो चली आँखों को पौंच्छ लिया...

"स्नेहा तो है ही अभी.. मैं स्कूल चला जाउ? कल भी नही जा पाए थे.." राज ने खड़े होते हुए पूचछा..

"ठीक है.. तुम नहा लो.. वैसे भी मुझे कोई खास दिक्कत तो होने नही वाली है.. नाश्ता करके नही जाओगे क्या?" वीरू बोला....

"अभी तो मैं लेट हो रहा हूँ.. आकर ही देखूँगा.. स्कूल में खा लूँगा कुच्छ.. तुम्हारे लिए लाकर दे जाता हूँ..." राज बाहर निकलने लगा...

"मेरे लिए तो मेरी बेहन बना देगी.. क्यूँ स्नेहा?" वीरू स्नेहा को देखकर मुस्कुराया....

"पर... मुझे खाना बनाना नही आता है... कभी बनाया ही नही.." स्नेहा ने नज़रें उठाकर वीरू को देखा...

"कोई बात नही.. मैं सीखा दूँगा ना.. बस तुम वैसा करती जाना जैसे में बताउन्गा.. जा राज ब्रेड और बटर ले आ..." वीरेंदर स्नेहा को व्यस्त रखना चाहता था.. जब तक विकी नही आता... उसको पता था की वो खाली रहेगी तो ज़्यादा परेशान रहेगी...

राज ने स्नेहा की और देखा.. स्नेहा मुस्कुरा पड़ी..,"ठीक है.. पर कुच्छ उल्टा सीधा बन गया तो मुझे मत बोलना बाद में.. पहले बोल रही हूँ" और हँसने लगी...

राज उसकी हँसी का जवाब हुल्की मुस्कुराहट से देकर बाहर निकल गया....

"क्या बात है भैया? राज कुच्छ परेशान सा लग रहा है..?" स्नेहा ने राज के जाते ही वीरू से पूचछा..

"हूंम्म.. वही तो मैं भी देख रहा हूँ.. कल से इसको पता नही क्या हो गया है..?" वीरू ने जवाब दिया..

"आपने इस-से पूचछा ये रात को कहाँ गया था...?"

"ना.. पर शायद मुझे पता है ये कहाँ गया होगा..?"

"कहाँ?" स्नेहा को भी उत्सुकता हुई जान'ने की...

"रहने दो.. तुम्हारे मतलब की बात नही है..." कहकर वीरू ने करवट बदल ली..

"बताओ ना भैया.. ऐसे क्यूँ कर रहे हो.. मैं फिर से रो पड़ूँगी..." स्नेहा ने उसकी बाजू पकड़ कर वापस अपनी तरफ खींच लिया....

" ठीक है.. उसको आने दो.. पहले पक्का तो कर लूँ.. मैं जो सोच रहा हूँ.. वो सही भी है या नही.." वीरेंदर ने बात पूरी की भी नही थी की राज आ गया..," ये लो.. और ये खिड़की बंद रखना.. "

"खिड़की के बच्चे.. तूने ये तो बताया ही नही की तू गया कहाँ था.. रात को..?" वीरू ने आते ही सवाल दागा...

"बता दूँगा भाई.. अभी तो लेट हो रहा हूँ...?" कहते हुए राज बाथरूम में घुसने लगा...

"उसकी मा आई थी अभी यहाँ.. तुम्हे पूच्छ रही थी..." वीरू ने पाँसा फैंका..

"क्क्याअ? पर क्यूँ?.. मेरा मतलब कौन आई थी.. किसकी मा?" राज ने हड़बड़ा कर कहा...

"जिसके घर तू रात को गया था.. उसकी मा..? वीरू के ऐसा कहते ही राज का चेहरा सफेद पड़ गया.. उसकी हालत पर दोनो पेट पकड़कर हँसने लगे...

"क्या है भाई.. खंख़्वाह डरा दिया था... तूने स्नेहा को कुच्छ बता दिया क्या?" राज ने उनको हंसता देखकर राहत की साँस ली......

"नही.. अभी तक तो नही.. पर अभी बतावँगा.. तड़का लगाकर.. तू चला जा पहले.." वीरू ने हंसते हुए कहा...

"क्या है ये...? भाई तू भी ना.. मैं नही जाता स्कूल..." राज तौलिए को पटक कर वहीं बैठ गया..

"ठीक है.. मत जा.. जो मुझे नही पता वो तू बता देना..." खिलखिलाते हुए वीरू ने स्नेहा को हाथ दिया.. स्नेहा ने भी ताल से ताल मिलाई...

"प्लीज़ भाई.. तेरे हाथ जोड़ता हूँ.. मेरी इज़्ज़त का फालूदा क्यूँ निकाल रहा है.." राज दोनो हाथ जोड़कर गिड़गिदाने की मुद्रा में आ गया...

"क्यूँ जब मुँह काला करने गया था तब नही निकला इज़्ज़त का फालूदा..." वीरू और स्नेहा ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे.. राज का चेहरा देखने लायक हो गया था...

"ठीक है तो फिर.. तेरी भी बात मैं बताउन्गा वापस आकर.. जितना भोला बन रहा है.. उतना नही है ये.. स्कूल में एक भी लड़की इस'से बात नही करती.. सब को डरा के रखता है.." और राज की बात दोनो की जोरदार हँसी में दब कर रह गयी.. राज को कुच्छ बोलते ना बना तो वापस बाथरूम में घुस गया...

नहा धोकर मुँह फुलाए हुए ही राज स्कूल चला गया...

"चलो.. बताओ.. अब कैसे बनेगा.. नाश्ता..?" स्नेहा ने बटर और ब्रेड उठाए और वीरू के पास आ गयी

"राज! तुम्हे सर बुला रहे हैं..!"

राज आवाज़ से ही पहचान गया.. यह प्रिया थी.. उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास थी... जबकि रिया की आवाज़ में अल्हाड़पन झलकता था....

राज क्लास से बाहर निकला.. प्रिया पहले से ही बाहर थी.. प्रिया को उनदेखा करते हुए वा कुच्छ कदम आगे बढ़ा पर फिर प्रिया की और मूड गया," कौन्से सर?" राज की आवाज़ में रूखापन था...

"ववो.. सॉरी राज.. रियली..!" प्रिया उस'से नज़रें नही मिला पा रही थी..

"कौन्से सर बुला रहे हैं..?" राज ने उसकी बात को अनदेखा करने का दिखावा किया...

"क्या तुम मुझे माफ़ नही करोगे राज? तुम्हे पता है.. मुझे एक पल के लिए भी नींद नही आई... प्लीज़ माफ़ कर दो... कर दो ना.." प्रिया इधर उधर देख रही थी.. कहीं कोई देख तो नही रहा...

"माफ़ तो तुम मुझे कर दो.. मैं भी दूसरों के जैसा हूँ ना.. बदतमीज़..!" राज का गुस्सा तो उसकी पहली रिक्वेस्ट पर ही पिघलने लगा था.. अब तो वह सिर्फ़ दिखावा कर रहा था.. प्रिया को अपने लिए तड़प्ता देख राज को बहुत सुकून मिल रहा था...

"म्मेरा वो मतलब नही था राज.. मैं डर गयी थी.. तुम्हारी कसम... आज के..."

प्रिया ने अपनी बात पूरी की भी नही थी की वहाँ रिया आ धमकी," तुम्हे पता है राज.. ये सारी रात सुबक्ती रही.. मैं भी नही सो सकी.. इसके चक्कर में.. अब इसको माफी दे भी दो..." रिया ने अपना वोट प्रिया के पक्ष में डाला...

"अगर तुम नही बता रही की कौन्से सर बुला रहे हैं.. तो मैं वापस जा रहा हूँ..!" राज ने रिया की बात का कोई जवाब नही दिया...

"मैने झूठ बोला था.. तुमसे बात करने के लिए.. मैं तुम्हारी कसम...." और प्रिया की बात अधूरी ही रह गयी.. राज वापस मूड कर क्लास में चला गया...

" तू चिंता मत कर प्रिया... ये कहीं नही जाने वाला.. मैं सब समझ रही हूँ.. ये तुमसे बदला ले रहा है बस.. चल आ क्लास में चलते हैं.. आ ना!" रिया ने प्रिया का हाथ पकड़ कर क्लास की और खींच लिया...

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" अजीब आदमी है यार तू भी.. उस लड़की को ऐसे ही छ्चोड़ आया.. अंजान लड़कों के पास?" शमशेर को विकी की बात पर बहुत गुस्सा आया...

"चिंता मत कर भाई.. निहायत ही शरीफ लड़के हैं.. उसको प्यार से रखेंगे.. 2-4 दिन की तो बात है.. तब तक मैं मुरारी को निपटा लूँगा..." विकी फोन पर शमशेर से बात कर रहा था," वैसे भी तो उसको लोहरू छ्चोड़कर ऐसा ही करने का प्लान था.. लोहरू छ्चोड़ने पर बाद में टेन्षन आ सकती थी.. उसकी समझ में कुच्छ नही आएगा.. मैने उसको समझा रखा है की मेरी जान को ख़तरा हो सकता है.. अगर कुच्छ हो जाए तो तुम किसी भी सूरत में अपने बयान मत बदलना..."

"यार तुझे बयानो की पड़ी है... वो लड़के स्कूल में पढ़ते हैं यार.. डर जाएँगे.." शमशेर ने विकी से गुस्से में कहा...

"तू चिंता क्यूँ कर रहा है भाई.. स्नेहा बहुत समझदार है.. वो संभाल सकती है अगर कुच्छ उल्टा सीधा हुआ तो..! और मैने अपना एक आदमी भी आसपास जमा रखा है.. अगर कुच्छ होने भी लगा तो वो स्नेहा को मेरा नाम लेकर ले उड़ेगा..." विकी ने शमशेर को तसल्ली देने की कोशिश की..

"पर मान लो तुझे मल्टिपलेक्स मिल भी गया.. बाद में क्या होगा... उस बेचारी का!" शमशेर स्नेहा को लेकर चिंतित था...

"होना क्या है.. ज़्यादा से ज़्यादा उसका बाप उसका खर्चा नही देगा ना.. मैं दे दूँगा.. और बोल?" विकी ने जवाब दिया...

"यार.. तेरी यही बात ग़लत है.. तू सब चीज़ों को पैसे से तोल कर देखता है.. आख़िर वो तुझसे प्यार करती है.." शमशेर के मंन में अभी भी काई सवाल थे..

"तो मैं उस'से प्यार करता रहूँगा ना.. टाइम निकाल कर.. बहुत मस्त है साली.. ऐसी बाला मैने आज तक नही देखी..." विकी ने बत्तीसी निकालते हुए कहा...

"तेरा कुच्छ नही हो सकता भाई.. तू तो पॉलिटिशियन्स से भी एक कदम आगे बढ़ गया है.. खैर जैसा तू ठीक समझे...!" शमशेर ने टॉपिक पर बात करना व्यर्थ समझा..,"वैसे कहाँ रहते हैं.. वो लड़के..?"

"एस.एच.ओ. विजेंदर के घर के ठीक सामने... तू ये बता.. टफ से बात की या नही..."

"हां.. कर ली.. वो तो कह रहा था.. इतनी सी बात मुझे नही बोल सकता था क्या? खैर.. आज रात 8:00 बजे सीधा थाने चला जाना.. टफ और मुरारी वहीं मिलेंगे.. कर लेना जो बात करनी है.. खुलकर.. मैने सब समझा दिया है..." शमशेर ने बुझे मंन से कहा...

"थॅंक यू बॉस! तुस्सी ग्रेट हो.." कहकर विकी ने खुशी खुशी फोन काट दिया था.. वो मन ही मन उच्छल रहा था.. उसके एक ही तीर ने जाने कितने शिकार कर लिए थे... पर हाँ.. एक मासूम भी उसकी चपेट में आ गयी थी... स्नेहा!

" चलो! जनाब बुला रहे हैं?" सी.आइ.ए. थाना भिवानी के एक सिपाही ने ताला खोलते हुए सलाखों के अंदर मुरझाए से बैठे मुरारी से कहा.. शाम के करीब 5 बजे थे..

"देखा.. मैने कहा था ना.. तुम्हारा जनाब ज़्यादा देर तक मुझे ऐसे नही बैठा सकता.. कोई छ्होटा मोटा आदमी नही हूँ मैं.. बाद में उस'से निपाटूंगा भी... ये 'क़ानून' छ्होटे लोगों के लिए बनते हैं... हमारे लिए नही.. आ गया होगा फोन.. उपर से उसके किसी 'बाप' का...." मुरारी ने रुमाल से अपनी गर्दन पर छलक आए पसीने और मैल की पपड़ी सॉफ करते हुए कहा और चौड़ी छाती करके बाहर निकल लिया...

"अब हमें क्या पता साहब.. हम तो हुक़ुम के गुलाम हैं.. जैसा आदेश जनाब करेंगे, मान'ना पड़ेगा.. वैसे मेरी पूरी हुम्दर्दि आपके साथ है.. अगली बार भगवान की दया से जब आप मंत्री होंगे तो मैं आपसे ज़रूर मिलूँगा.. याद रखिएगा मेरा चेहरा..." सिपाही ने मासूमियत से कहते हुए अपने नंबर. बदवा लिए.. मुरारी की नज़र में..

मुरारी ने खुश होकर उसकी पीठ ठोनकी," यहाँ कुच्छ लेन देन नही चलता क्या रे?"

"सब चलता है साहब.. हर जगह चलता है ये तो... पर ना किसी को कुच्छ उपर मिलता.. ना नीचे.. जनाब डीजीपी हरयाणा के भतीजे हैं ना... हम तो बस इंतज़ार ही करते रहते हैं.. की कब दीवाली आएगी और कब बोनस मिलेगा.. साला तनख़्वाह के अलावा एक कप चाय भी नही नसीब होती फोकट में तो... इस थाने में... मेरी बदली ज़रूर करवा देना साहब...." सिपाही ने फिर से लाइन मारी...

"तुम चिंता मत करो बेटा.. मुझे कुर्सी मिलते ही तुम्हारी प्रमोशन पक्की.. पर ये बताओ.. बात किस'से करनी पड़ेगी.. लेन देन की.." मुरारी उसके कान में फुसफुसाया...

सिपाही ने कोई जवाब नही दिया.. टफ के ऑफीस के सामने पहुँच गये थे दोनो..," चलो साहब.. बाकी बातें बाद में..."

मुरारी अंदर घुस गया.. अंदर चल रहे ए.सी. की ठंड में मुरारी को अपना ऑफीस याद आ गया.....

टफ अपनी गद्देदार कुर्सी पर आराम से टेबल के नीचे पैर फैलाए हुए अढ़लेटा सा बैठा था.. उसके सामने 30 की उमर के आसपास के 2 पहलवान से दिखने वाले अच्छे घरों के लोग खड़े थे..

"मुझे बुलाया इनस्पेक्टर?" मुरारी ने गर्दन टेढ़ी करते हुए पूछा.. रस्सी जल चुकी थी.. पर बल अभी तक नही गये थे..

टफ ने जैसे मुरारी को सुना ही नही.. वह टेबल पर आगे की और झुका और सामने खड़े लोगों से बोला," बैठो!"

जैसे ही उन्न दोनो ने बैठने के लिए टेबल के सामने खड़ी कुर्सी खींची; टफ उबाल पड़ा...," सालो.. बैठने के लिए कुर्सी चाहिए तुम्हे.. हां? उधर बैठो.. नीचे!"

"जनाब हमारी भी कोई इज़्ज़त है.. बाहर गाँव वाले आए हुए हैं.. क्यूँ नाक कटवा रहे हो..?" उनमें से एक ने हाथ जोड़कर कहा...

"हूंम्म.. इज़्ज़त.. तुम्हारी भी इज़्ज़त है.. सालो.. जब गाँव की लड़कियों को खेतों में पकड़ते हो तो तब क्या तुम्हारी इज़्ज़त गांद मरवाने चली जाती है... तुम इज़्ज़त की बात करते हो.. बहनचो..." टफ खड़ा हो गया..," कपड़े निकालो... देखता हूँ तुम्हारी इज़्ज़त कितनी गहरी है..!"

"नही.. जनाब.. ये तो पागल है.. लो बैठ गये.. आप तो माई बाप हैं.. आपके सामने नीचे बैठने में भला कैसी शरम..?" कहते हुए दूसरा टपाक से दीवार के साथ साथ कर ज़मीन पर बैठ गया.. और पहले वाले को भी खींच कर बिठा लिया...

"राजेश!" टफ ने सिपाही को आवाज़ लगाई...

"जी.. जनाब.." राजेश तुरंत दरवाजे पर प्रकट हो गया...

"लड़की के बाप को बुलाकर लाओ...!"

"जी जनाब.." राजेश तुरंत गायब हो गया और जब वापस आया तो उसके साथ एक अधेड़ उम्र का आदमी था...

"नमस्ते जनाब!" आदमी ने कहा और अंदर आ गया.. उसकी आँखें भरी हुई थी..

"बोलो ताउ! क्या करना है इनका..?" टफ ने बड़े ही नरम लहजे में बात की..

उस आदमी ने नफ़रत और ग्लानि से ज़मीन पर बैठे दोनो की और देखा और अपनी नज़रें हटा ली..," सब कुच्छ आप पर छ्चोड़ दिया है जनाब.. अब हम तो किसी को मुँह दिखाने लायक रहे नही.. हमारी बेटी.." कह कह कर बुद्धा फूट फूट कर रोने लगा.. उसका गला भर आया...

"ठीक है.. आप जाकर मुंशी के पास बिटिया के बयान दर्ज करवा दो...! मैं कल इनको कोर्ट में प्रोड्यूस कर दूँगा..."

"एक मिनिट जनाब.. क्या हम अकेले में इनसे एक बार बात कर लें... इधर आना ताउ!" दूसरे वाले आदमी ने कहा...

"आप बात करना चाहते हो ताउ?" टफ ने पूचछा..

बुड्ढे ने कोई जवाब ना दिया.. उनके बुलाने पर वो इनकार नही कर सका और बरबस ही उनकी और चला गया....

कुच्छ क्षण दोनो आदमी उसके कान में ख़ुसर फुसर करते रहे.. बुड्ढे के अंदर का स्वाभिमान जाग उठा और कसकर एक तमाचा उनमें से एक को जड़ दिया.. दोनो टफ की वजह से खून का घूँट पीकर रह गये....

"क्या हुआ ताउ? क्या कह रहे हैं ये..." टफ ने दोनो को घूरते हुए कहा..

बुद्धा फफक पड़ा..," कह रहे है.. केस वापस ले लो वरना तुम्हारी छ्होटी बेटी को भी......" इस'से आगे वो ना बोल पाया....

टफ कितनी ही देर से अपने खून में आ रहे उबाल को रोके बैठा था..," कपड़े फाडो इन्न बेहन के लोड़ों के... और नगा करके घूमाओ बाहर.. तब आएगी इनको अकल..!"

टफ के मुँह से निकालने भर की देर थी.. राजेश अपने साथ दो और अपने ही जैसे हत्ते कत्ते पोलीस वालों को लेकर अंदर आ गया...

"हमें माफ़ कर दो साहब.. हमने तो खाली चुम्मि खाई थी.. और चूचियाँ दबाई थी बस..... प्लीज़.. जनाब.. इश्स बार छ्चोड़ दो.. नही.. प्लीज़ फाडो मत.. हम निकाल रहे हैं ना.." टफ का रौद्रा रूप देखकर दोनो अंदर तक दहल गये... और साथ में मुरारी भी.. उसके चेहरे पर पसीना छलक आया था.. और रौन्ग्ते खड़े हो गये थे...

सिपाहियों के कान तो बस अपने जनाब की आवाज़ ही जैसे सुनते थे... 2 मिनिट के बाद ही वो दोनो सिर्फ़ कcचे बनियान में खड़े थे...

"इतनी बे-इज़्ज़ती सहन नही होती जनाब.. हमारी भी पहुँच उपर तक है.. सेंटर में मिनिस्टर है हमारा मौसा...!" पहले वाले आदमी झक मार रहा था..

"एक मंत्री तो ये खड़ा.. तुम्हारे सामने.. इसको भी नंगा करके दिखाऊँ क्या?" टफ ने कहा तो मुरारी को झुर्झुरि सी आ गयी.. उसकी टाँगें काँपने लगी थे खड़े खड़े...

दोनो के मुँह अचानक सिल गये.. अब तक मुरारी पर तो उनका ध्यान गया ही नही था.. मुरारी को इश्स तरह भीगी बिल्ली बने खड़ा देख उनको अपनी औकात का अहसास हो गया....

"दोनो को हवालात में डाल दो.. शाम को इनकी गांद में मिर्ची लगानी है.... चलो ताउ जी.. आप बयान दर्ज करवा दो.." टफ ने कहा और फिर मुरारी की और घूरते हुए बोला..," बैठो.. मैं आता हूँ...!

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) ऑल्वेज़

`·.¸(¨`·.·´¨) कीप लविंग &

(¨`·.·´¨)¸.·´ कीप स्माइलिंग !

`·.¸.·´ -- राज

girls school-44

hello dosto main yaani aapka dost raj sharma haajir hun next paart lekar

"Shukra hai Fracture nahi hai! maans fatne se soojan aa gayi hai.. theek hone mein 10-15 din lag jayenge.. main kuchh dawaiyan likh deti hoon.. time se lete rahna aur next monday ek baar aakar check kara jana... OK?" Hospital mein lady doctor Virender aur Raj ke paas khadi thi..," karte kya ho tum?"

"ji, padhte hain..10+2 mein" dono ek sath bol pade...

"tumhara dost sharmata bahut hai.." Doctor ne Raj ko prescription paper diya aur muskurate huye wahan se dusre patient ke paas chali gayi...

"kya baat thi.. tu sharma kyun raha tha oye?" Raj ne viru ke kaan ke paas munh lejakar kaha...

"meri pant nikalwa li thi yaar.. sharam nahi aayegi kya?" viru muskuraya aur achanak baat palat di..," chalein.. subah hone ko hai.."

"ek minute.. main bhai sahab ko dekhkar aata hoon... tu yahin leta rah tab tak.." Raj ne viru se kaha..

"kahan gaye wo..?"

"pata nahi.. abhi 20 minute pahle yahin thhe.. ek phone karne ki baat kahkar nikle thhe.. bahar hi honge.. main bulakar lata hoon.." kahkar Raj bahar nikal gaya...

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Kareeb 10-15 minute baad Raj wapas aaya," yaar wo to kahin dikhayi nahi diye... main har jagah dekh aaya.."

"chale toh nahi gaye hain.. Sneha room par akeli hai na.. wo usko bol bhi rahe the ki der lagi toh main aa jaunga..!" Viru ne Raj se kaha..

"par main parking mein gadi bhi dekh aaya hoon... wahin khadi hai.. gaye hote toh Gadi lekar nahi jate kya?" Raj ne sawaal kiya...

"fir toh yahin honge.. intjaar karte hain.. aur kya?" Viru ne Raj ki aur dekhte huye kaha...

Raj ne sahmati mein sir hilaya aur Virender ke paas hi baith gaya.....

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Sawera ho gaya tha.. Sneha ko sari raat neend nahi aayi.. yunhi karwate badalti huyi vicky ke baare mein sochti rahi...kitna pyara hai Mohan.. kitna apna sa hai.. 3 din mein hi wo uss'se kis kadar jud gayi thi.. uske door jaate hi usko lagta tha ki wo fir se nitant akeli ho gayi hai... Mohan ne ek sath hi usko kitni sari khushiyan de di... Mohan ke liye hi jiyungi ab... uske liye mar bhi jaaungi... Sneha ne man hi man socha aur angdayi lete huye ulti late gayi.. uska roop nikhar aaya tha.. ab har ang har pal jaise 'Mohan Mohan' hi pukarta rahta tha.. aaj gadi mein hi unhone kitni masti ki thi.. Sneha rah rah kar Vicky se lipat ja rahi thi.. 'pal' bhar ki bechaini bhi Sneha se sahan nahi ho rahi thi... Mohan ne wada kiya tha.. Rohtak jakar ek dost ke flat par rukenge aur wo uss'se wahan pahle din wala hi pyar fir se karega... ji bhar kar.. wo rohtak aa bhi gaye the.. par sneha se 2 pal ka bhi intzaar nahi ho raha tha.. wo rah rah kar Mohan se lipati ja rahi thi.....

aur shayad isiliye 'wo' hadsa hua.. agar wo Mohan ko iss tarah 'tang' na karti toh shayad Mohan haadse ko taal bhi leta.. Sochte huye Sneha ne ek lambi aah bhari.. aur karwat badalkar fir se seedhi ho gayi...

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kareeb 10 minute baad darwaje par dastak huyi.. Sneha ek dum se uthi aur darwaje ke paas jakar poochha," koun hai?"

"hum hain.. Darwaja kholo"

aawaj Viru ki thi.. Sneha ne jhat se darwaja khol diya..," aa gaye.. kya raha?"

"Bhaiya yahan nahi aaye hain kya..?" Raj ne ulta usi se sawaal kiya..

"kya matlab?" Sneha ka dil dhak se rah gaya..," kahan hain wo? yahan toh nahi aaye..

"Gadi toh unki wahin par khadi hai... fone karne ki kahkar nikle thhe.. hamne kareeb 1:30 gahnte unka intzaar kiya.. fir socha kya pata yahin aa gaye hon.. isiliye hum aa gaye..." Raj ne chintit swar mein uttar diya...

Sneha bina kuchh soche samjhe hi rone lagi...," unhone pahle hi kaha tha ki rohtak mein unko khatra hai.." subakti huyi Sneha ke gaalon se mote mote aansoo bahne lage..

Raj ne viru ko Bed par lita diya.. dono ki samajh mein nahi aa raha tha ki wo kya karein; kya kahein... kuchh der baad Raj uthkar Sneha ke paas aaya," aa jayenge.. aap ro kyun rahi hain.. hum chhod aayenge.. aapko jahan jana hai..."

Sneha ko kahan jana tha.. wo ab ja bhi kahan sakti thi... Mohan ke sang sapnon ka, armano ka jo gulistan Sneha ne apne dil mein sahej liya tha, uske aalawa ab iss jahan mein uska bacha hi kya tha.. papa? jisne mehaj apni Rajniti ke liye shatranj ki bisaat par mohre ki tarah se uska istemal kiya tha.. uske paas? nahi.. kabhi nahi! agar wo aisa sochti bhi toh kis munh se.. wah khud uske khilaf bagawat par utar aayi thi.. aur Shalini wala case surkhiyon mein aane par toh usko apne 'baap' se nafrat si ho gayi thi....

"chinta na karein aap... lijiye.. aap fone kar lijiye..." Raj ne apna fone uthakar Sneha ko de diya...

"oh haan.. par uska fone toh off hi rahta hai.. aksar.. chalo try karti hoon..!" ummeed ki kiran najar aane se uski subakiyan kuchh kam huyi aur usne Vicky ka no. dial kiya.. par jaisa Sneha ne socha tha waisa hi huaa.. fone off tha.. Sneha ko Mohan ki bhi chinta ho rahi thi aur apni bhi.. wah bed par baithkar apna sir pakadkar rone lagi....

"tum ro kyun rahi ho.. wo thodi bahut der mein aa hi jayenge.... waise tumhare paas ghar ka no. bhi toh hoga na.. wahan pata kar lijiye agar unhone ghar par fone kiya ho toh.. waise wo bhai sahab aapke lagte kya hain?" Viru bebas tha.. uske paas aakar uske aansoo nahi ponchh sakta tha...

kya batati Sneha.. kya naam deti 2 din pahle bane iss dil ke rishte ko.. usko darr tha ki agar wo sachchayi batati hai toh kahin dono darr kar kuchh ulta seedha na kar dein.. maslan police ko fone wagairah.. pratyuttar mein wo bilakh padi..," Mohan.. kahan ho tummmmmmm???"

Sneha ka wo karun pralaap sunkar dono ka dil dahal gaya.. Raj uske paas jakar baith gaya," aap aise na royein.. main chhod aaunga aapko jahan jana hai... dekhiye yahan par hum as a tudent rah rahe hain... kisi ne aapka rona sun liya toh log tarah tarah ki baatein karenge.. pls.. aap sabra se kaam lein.. wo aate hi honge..." Raj kah toh raha tha ki wo aa jayenge.. par chinta usko khud ko bhi hone lagi thi.. ab tak toh usko yahin par aa jana chahiye tha.. 3 ghante ke kareeb hone wale the usko gayab huye...

Sneha ne jaise taise khud ko sambhala..," kya main yahin rah sakti hoon.. jab tak wo nahi aata?" usne apne aansoo ponchh liye.. sach mein hi uska rona unn becharon ko museebat mein daal sakta tha.. aur khud usko bhi...

" kya?.. haan.. par.. mera matlab hai ki..." Raj ko koyi shabd hi na mila aage kuchh kahne ko.. kaise rah sakti hai wo yahan.. ladkon ke kamre mein.. Raj ne prashan soochak najron se Viru ki aur dekha...

"haan.. rah le behan.. jab tak tera dil kare tab tak rah yahin par.. main kah doonga.. meri behan hai.. logon ki aisi ki taisi..! log toh bolte hi rahte hain.." Viru ne faisla suna diya..

Sneha sunkar chowk padi.. usne apni julfein peechhe karke najrein uthakar Viru ki aur dekha.. kuchh pal toh wo vismay se apni aankhein faade huye usko dekhti rahi.. boojhe huye chehre par ek maddhaym si muskaan doud gayi.. aur aansoon fir se bahne lage.. usko yakin hi nahi ho raha tha ki usko 'bhai' mil gaya hai..

viru uski taraf dekhkar muskurane laga toh sneha se raha na gaya.. lagbhag doudti huyi si wo uske bed ki aur gayi aur ghutne jameen par rakhkar uski chhati par sir rakh liya.. aur subakti rahi...

"ab bhi kyun ro rahi hai tu.. main hoon na.. tera bhai.." Viru ne uska chehra apne haathon mein lekar upar uthaya...

"ro nahi rahi bhaiya.. samet nahi paa rahi hoon.. Raksha bandhan par mile iss anokhi khushi ko.. mera koyi bhai nahi tha.. aaj se pahle.." Sneha khil uthi..

"ab toh hai na.. Viru!" Viru ki aankhein chamak rahi thi...

"mujhe kyun bhool rahe ho.. main bhi toh hoon.." Raj bhi sneha ki barabar mein aa baitha...

"behti ganga mein haath dho raha hai.. kyun? chal aaja tu bhi" Viru ne kaha aur dono Raj ke chehre ko dekhkar khilkhila uthhe......

Vicky ke intzaar mein din kab 7 baj gaye teeno ko pata hi nahi chala.. Sneha rah rah kar bechain ho jati thi.. par ab usko apni nahi sirf Mohan ki chinta thi.. usko toh bhai mil gaye thhe.. par Mohan ka yun achanak gayab ho jana uski pareshani ka sabab bana hua tha.. Sneha rah rah kar khamosh ho jati aur shunya mein jhankne lagti...

"chinta kyun kar rahi ho sanu.. wo koyi bachche thhode hi hain.. aa jayenge.." Viru ne Sneha ka hath pakad kar uska dhyan wapas kheencha...

Sneha ne haan mein sir hilaya aur apni nam ho chali aankhon ko pounchh liya...

"Sneha toh hai hi abhi.. main school chala jaaun? kal bhi nahi ja paye thhe.." Raj ne khade hote huye poochha..

"theek hai.. tum naha lo.. waise bhi mujhe koyi khas dikkat toh hone nahi wali hai.. nashta karke nahi jaaoge kya?" viru bola....

"abhi toh main late ho raha hoon.. aakar hi dekhunga.. school mein kha loonga kuchh.. tumhare liye lakar de jata hoon..." Raj bahar nikalne laga...

"mere liye toh meri behan bana degi.. kyun Sneha?" Viru Sneha ko dekhkar muskuraya....

"par... mujhe khana banana nahi aata hai... kabhi banaya hi nahi.." Sneha ne najrein uthhakar Viru ko dekha...

"koyi baat nahi.. main sikha doonga na.. bus tum waisa karti jana jaise mein bataaunga.. Ja Raj Bread aur butter le aa..." Virender Sneha ko vyast rakhna chahta tha.. jab tak Vicky nahi aata... usko pata tha ki wo khali rahegi toh jyada pareshan rahegi...

Raj ne sneha ki aur dekha.. Sneha muskura padi..,"theek hai.. par kuchh ulta seedha ban gaya toh mujhe mat bolna baad mein.. pahle bol rahi hoon" aur hansne lagi...

Raj uski hansi ka jawaab hulki muskurahat se dekar bahar nikal gaya....

"kya baat hai bhaiya? Raj kuchh pareshan sa lag raha hai..?" Sneha ne Raj ke jate hi viru se poochha..

"hummm.. wahi toh main bhi dekh raha hoon.. kal se isko pata nahi kya ho gaya hai..?" Viru ne jawaab diya..

"aapne iss-se poochha ye rat ko kahan gaya tha...?"

"na.. par shayad mujhe pata hai ye kahan gaya hoga..?"

"kahan?" Sneha ko bhi utsukta huyi jaan'ne ki...

"Rahne do.. tumhare matlab ki baat nahi hai..." kahkar viru ne karwat badal li..

"batao na bhaiya.. aise kyun kar rahe ho.. main fir se ro padoongi..." Sneha ne uski baju pakad kar wapas apni taraf kheench liya....

" theek hai.. usko aane do.. pahle pakka toh kar loon.. main jo soch raha hoon.. wo sahi bhi hai ya nahi.." Virender ne baat poori ki bhi nahi thi ki raj aa gaya..," ye lo.. aur ye khidki band rakhna.. "

"khidki ke bachche.. tune ye toh bataya hi nahi ki tu gaya kahan thha.. Rat ko..?" Viru ne aate hi sawaal daga...

"bata doonga bhai.. abhi toh late ho raha hoon...?" kahte huye Raj bathroom mein ghusne laga...

"uski maa aayi thhi abhi yahan.. tumhe poochh rahi thhi..." Viru ne paansa fainka..

"kkyaaa? par kyun?.. mera matlab koun aayi thi.. kiski maa?" Raj ne hadbada kar kaha...

"jiske ghar tu raat ko gaya tha.. uski maa..? viru ke aisa kahte hi raj ka chehra safed pad gaya.. uski haalat par dono pate pakadkar hansne lage...

"kya hai bhai.. khamkhwah dara diya tha... tune sneha ko kuchh bata diya kya?" Raj ne unko hansta dekhkar raahat ki saans li......

"nahi.. abhi tak toh nahi.. par abhi bataaunga.. tadka lagakar.. tu chala ja pahle.." Viru ne hanste huye kaha...

"kya hai ye...? bhai tu bhi na.. main nahi jata school..." Raj touliye ko patak kar wahin baith gaya..

"theek hai.. mat ja.. jo mujhe nahi pata wo tu bata dena..." khilkhilate huye Viru ne Sneha ko hath diya.. Sneha ne bhi taal se taal milayi...

"pls bhai.. tere hath jodta hoon.. meri ijjat ka falooda kyun nikal raha hai.." Raj dono hath jodkar gidgidane ki mudra mein aa gaya...

"kyun jab munh kala karane gaya tha tab nahi nikla ijjat ka faalooda..." Viru aur Sneha jor jor se hans rahe thhe.. Raj ka chehra dekhne layak ho gaya tha...

"theek hai toh fir.. teri bhi baat main bataungaa wapas aakar.. jitna bhola ban raha hai.. utna nahi hai ye.. school mein ek bhi ladki iss'se baat nahi karti.. sab ko dara ke rakhta hai.." aur Raj ki baat dono ki jordar hansi mein dab kar rah gayi.. Raj ko kuchh bolte na bana toh wapas bathroom mein ghus gaya...

Naha dhokar munh fulaye huye hi Raj School chala gaya...

"chalo.. batao.. ab kaise banega.. nashta..?" Sneha ne butter aur bread uthaye aur viru ke paas aa gayi

"Raj! tumhe Sir bula rahe hain..!"

Raj aawaj se hi pahchan gaya.. yeh priya thi.. uski aawaj mein ek ajeeb si mithas thi... jabki Riya ki aawaj mein alhadpan jhalakta tha....

Raj class se bahar nikla.. Priya pahle se hi bahar thi.. Priya ko undekha karte huye wah kuchh kadam aage badha par fir Priya ki aur mud gaya," kounse Sir?" Raj ki aawaj mein rookhapan tha...

"wwo.. sorry Raj.. Really..!" Priya uss'se najrein nahi mila pa rahi thi..

"kounse sir bula rahe hain..?" Raj ne uski baat ko andekha karne ka dikhawa kiya...

"kya tum mujhe maaf nahi karoge Raj? tumhe pata hai.. mujhe ek pal ke liye bhi neend nahi aayi... plz maaf kar do... kar do na.." Priya idhar udhar dekh rahi thhi.. kahin koyi dekh toh nahi raha...

"maaf to tum mujhe kar do.. main bhi dusron ke jaisa hoon na.. badtameej..!" Raj ka gussa toh uski pahli request par hi pighalne laga tha.. ab toh wah sirf dikhawa kar raha tha.. Priya ko apne liye tadapta dekh Raj ko bahut sukoon mil raha tha...

"mmera wo matlab nahi tha Raj.. main darr gayi thi.. tumhari kasam... aaj ke..."

Priya ne apni baat poori ki bhi nahi thi ki wahan riya aa dhamki," tumhe pata hai Raj.. ye sari Rat subakti rahi.. main bhi nahi so saki.. iske chakkar mein.. ab isko maafi de bhi do..." Riya ne apna vote Priya ke paksh mein dala...

"agar tum nahi bata rahi ki kounse Sir bula rahe hain.. toh main wapas ja raha hoon..!" Raj ne Riya ki baat ka koyi jawab nahi diya...

"maine jhooth bola tha.. tumse baat karne ke liye.. main tumhari kasam...." aur priya ki baat adhoori hi rah gayi.. Raj wapas mud kar class mein chala gaya...

" tu chinta mat kar Priya... ye kahin nahi jane wala.. main sab samajh rahi hoon.. ye tumse badla le raha hai bus.. chal aa class mein chalte hain.. aa naaaa!" riya ne Priya ka hath pakad kar class ki aur kheench liya...

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" Ajeeb aadmi hai yaar tu bhi.. uss ladki ko aise hi chhod aaya.. anjaan ladkon ke paas?" Shamsher ko vicky ki baat par bahut gussa aaya...

"chinta mat kar bhai.. nihayat hi shareef ladke hain.. usko pyar se rakhenge.. 2-4 din ki toh baat hai.. tab tak main Murari ko nipta loonga..." Vicky fone par Shamsher se baat kar raha tha," waise bhi toh usko loharu chhodkar aisa hi karne ka plan tha.. Loharu chhodne par baad mein tension aa sakti thi.. uski samajh mein kuchh nahi aayega.. maine usko samjha rakha hai ki meri jaan ko khatra ho sakta hai.. agar kuchh ho jaye toh tum kisi bhi soorat mein apne bayan mat badalna..."

"yaar tujhe bayano ki padi hai... wo ladke school mein padhte hain yaar.. darr jayenge.." Shamsher ne vicky se gusse mein kaha...

"tu chinta kyun kar raha hai bhai.. Sneha bahut samajhdar hai.. wo sambhal sakti hai agar kuchh ulta seedha huaa toh..! aur maine apna ek aadmi bhi aaspaas jama rakha hai.. agar kuchh hone bhi laga toh wo Sneha ko mera naam lekar le udega..." Vicky ne Shamsher ko tasalli dene ki koshish ki..

"par maan lo tujhe multiplex mil bhi gaya.. baad mein kya hoga... uss bechari ka!" Shamsher Sneha ko lekar chintit tha...

"hona kya hai.. jyada se jyada uska baap uska kharcha nahi dega na.. main de doonga.. aur bol?" Vicky ne jawaab diya...

"yaar.. teri yahi baat galat hai.. tu sab cheejon ko paise se tol kar dekhta hai.. aakhir wo tujhse pyar karti hai.." Shamsher ke mann mein abhi bhi kayi sawaal thhe..

"to main uss'se pyar karta rahunga na.. time nikal kar.. bahut mast hai sali.. aisi bala maine aaj tak nahi dekhi..." Vicky ne batteesi nikalte huye kaha...

"tera kuchh nahi ho sakta bhai.. tu toh politicians se bhi ek kadam aage badh gaya hai.. khair jaisa tu theek samjhe...!" Shamsher ne topic par baat karna vyarth samjha..,"waise kahan rahte hain.. wo ladke..?"

"S.H.O. Vijender ke ghar ke theek saamne... tu ye bata.. Tough se baat ki ya nahi..."

"haan.. kar li.. wo toh kah raha tha.. itni si baat mujhe nahi bol sakta tha kya? khair.. aaj Raat 8:00 baje seedha thhane chala jana.. tough aur murari wahin milenge.. kar lena jo baat karni hai.. khulkar.. maine sab samjha diya hai..." Shamsher ne bujhe mann se kaha...

"thank u boss! tussi great ho.." kahkar vicky ne khushi khushi fone kaat diya tha.. wo man hi man uchhal raha tha.. uske ek hi teer ne jaane kitne shikar kar liye thhe... par haan.. ek maasoom bhi uski chapet mein aa gayi thi... Sneha!

" chalo! janab bula rahe hain?" C.I.A. thana Bhiwani ke ek sipahi ne tala kholte huye salaakhon ke andar murjhaye se baithe Murari se kaha.. Sham ke kareeb 5 baje the..

"Dekha.. maine kaha tha na.. tumhara janab jyada der tak mujhe aise nahi baitha sakta.. koyi chhota mota aadmi nahi hoon main.. baad mein uss'se nipatunga bhi... ye 'kanoon' chhote logon ke liye bante hain... hamare liye nahi.. aa gaya hoga fone.. upar se uske kisi 'baap' ka...." Murari ne Rumal se apni gardan par chhalak aaye pasine aur mail ki papdi saaf karte huye kaha aur choudi chhati karke bahar nikal liya...

"ab hamein kya pata sahab.. hum toh huqum ke gulam hain.. jaisa aadesh janaab karenge, maan'na padega.. waise meri poori humdardi aapke sath hai.. agli baar bhagwan ki daya se jab aap mantri honge toh main aapse jaroor miloonga.. yaad rakhiyega mera chehra..." Sipahi ne masoomiyat se kahte huye apne no. badhwa liye.. Murari ki najar mein..

Murari ne khush hokar uski peeth thonki," yahan kuchh len den nahi chalta kya re?"

"sab chalta hai sahab.. har jagah chalta hai ye toh... par na kisi ko kuchh upar milta.. na neeche.. janab DGP haryana ke bhatije hain na... hum toh bus intzaar hi karte rahte hain.. ki kab diwali aayegi aur kab bonus milega.. sala tankhwah ke alawa ek cup chay bhi nahi naseeb hoti fokat mein toh... iss thane mein... meri badli jaroor karwa dena sahab...." Sipahi ne fir se line mari...

"tum chinta mat karo beta.. mujhe kursi milte hi tumhari promotion pakki.. par ye batao.. baat kiss'se karni padegi.. len den ki.." Murari uske kaan mein fusfusaya...

Sipahi ne koyi jawab nahi diya.. Tough ke office ke saamne pahunch gaye thhe dono..," chalo sahab.. baki baatein baad mein..."

Murari andar ghus gaya.. Andar chal Rahe A.C. ki thand mein murari ko apna office yaad aa gaya.....

Tough apni gaddedar kursi par aaram se table ke neeche pair failaye huye adhleta sa baitha tha.. uske saamne 30 ki umar ke aaspas ke 2 pahalwan se dikhne wale achchhe gharon ke log khade thhe..

"mujhe bulaya inspector?" Murari ne gardan tedhi karte huye poochha.. rassi jal chuki thi.. par bal abhi tak nahi gaye the..

tough ne jaise Murari ko suna hi nahi.. wah table par aage ki aur jhuka aur saamne khade logon se bola," baitho!"

Jaise hi unn dono ne baithne ke liye table ke saamne khadi kursi kheenchi; tough ubal pada...," saalo.. baithne ke liye kursi chahiye tumhe.. haan? udhar baitho.. neeche!"

"janab hamari bhi koyi ijjat hai.. bahar gaanv wale aaye huye hain.. kyun naak katwa rahe ho..?" unmein se ek ne hath jodkar kaha...

"hummm.. ijjat.. tumhari bhi ijjat hai.. saalo.. jab gaanv ki ladkiyon ko kheton mein pakadte ho toh tab kya tumhari ijjat gaand marwane chali jati hai... tum ijjat ki baat karte ho.. behancho..." Tough khada ho gaya..," kapde nikalo... dekhta hoon tumhari ijjat kitni gahri hai..!"

"nahi.. janab.. ye toh pagal hai.. lo baith gaye.. aap toh mayi baap hain.. aapke saamne neeche baithne mein bhala kaisi sharam..?" kahte huye dusra tapak se deewar ke sath sat kar jameen par baith gaya.. aur pahle wale ko bhi kheench kar bitha liya...

"Rajesh!" Tough ne sipahi ko aawaj lagayi...

"ji.. janab.." Rajesh turant darwaje par prakat ho gaya...

"ladki ke baap ko bulakar laao...!"

"ji janab.." Rajesh turant gayab ho gaya aur jab wapas aaya toh uske sath ek adhed umra ka aadmi tha...

"namaste janaab!" aadmi ne kaha aur andar aa gaya.. uski aankhein bhari huyi thi..

"bolo taau! kya karna hai inka..?" Tough ne bade hi naram lahje mein baat ki..

uss aadmi ne nafrat aur glani se jameen par baithe dono ki aur dekha aur apni najrein hata li..," sab kuchh aap par chhod diya hai janaab.. ab hum toh kisi ko munh dikhane layak rahe nahi.. hamari beti.." kah kah kar buddha foot foot kar rone laga.. uska gala bhar aaya...

"theek hai.. aap jakar munshi ke paas bitiya ke bayan darj karwa do...! main kal inko court mein produce kar doonga..."

"ek minute janaab.. kya hum akele mein inse ek baar baat kar lein... idhar aana taau!" dusre wale aadmi ne kaha...

"aap baat karna chahte ho taau?" Tough ne poochha..

buddhe ne koyi jawab na diya.. unke bulane par wo inkar nahi kar saka aur barbas hi unki aur chala gaya....

kuchh kshan dono aadmi uske kaan mein khusar fusar karte rahe.. buddhe ke andar ka swabhiman jaag utha aur kaskar ek tamacha unmein se ek ko jad diya.. dono tough ki wajah se khoon ka ghoont peekar rah gaye....

"kya hua taau? kya kah rahe hain ye..." Tough ne dono ko ghoorte huye kaha..

Buddha fafak pada..," kah rahe hai.. case wapas le lo warna tumhari chhoti beti ko bhi......" iss'se aage wo na bol paya....

Tough kitni hi der se apne khoon mein aa rahe ubaal ko roke baitha tha..," kapde faado inn behan ke lodon ke... aur naga karke ghumaao bahar.. tab aayegi inko akkal..!"

Tough ke munh se nikalne bhar ki der thi.. Rajesh apne sath do aur apne hi jaise hatte katte police walon ko lekar andar aa gaya...

"hamein maaf kar do sahab.. hamne toh khali chummi khayi thi.. aur choochiyan dabayi thi bus..... pls.. janaab.. iss baar chhod do.. nahi.. pls fado mat.. hum nikal rahe hain na.." Tough ka roudra roop dekhkar dono andar tak dahal gaye... aur sath mein Murari bhi.. uske chehre par pasina chhalak aaya tha.. aur roungte khade ho gaye thhe...

Sipahiyon ke kaan toh bus apne janaab ki aawaj hi jaise sunte thhe... 2 minute ke baad hi wo dono sirf kachchhe baniyan mein khade thhe...

"itni be-ijjati sahan nahi hoti janab.. hamari bhi pahunch upar tak hai.. centre mein minister hai hamara mousa...!" Pahle wale aadmi jhak maar raha tha..

"ek mantri toh ye khada.. tumhare saamne.. isko bhi nanga karke dikhaaoon kya?" Tough ne kaha toh Murari ko jhurjhuri si aa gayi.. uski taangein kaanpne lagi thhi khade khade...

Dono ke munh achanak sil gaye.. ab tak murari par toh unka dhyan gaya hi nahi tha.. Murari ko iss tarah bheegi billi bane khada dekh unko apni aukat ka ahsaas ho gaya....

"dono ko hawalat mein daal do.. sham ko inki gaand mein mirchi lagani hai.... chalo taau ji.. aap bayan darj karwa do.." tough ne kaha aur fir Murari ki aur ghoorte huye bola..," baitho.. main aata hoon...!

 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --44

"शुक्र है फ्रॅक्चर नही है! माँस फटने से सूजन आ गयी है.. ठीक होने में 10-15 दिन लग जाएँगे.. मैं कुच्छ दवाइयाँ लिख देती हून.. टाइम से लेते रहना और नेक्स्ट मंडे एक बार आकर चेक करा जाना... ओके?" हॉस्पिटल में लेडी डॉक्टर वीरेंदर और राज के पास खड़ी थी..," करते क्या हो तुम?"

"जी, पढ़ते हैं..10+2 में" दोनो एक साथ बोल पड़े...

"तुम्हारा दोस्त शरमाता बहुत है.." डॉक्टर ने राज को प्रिस्क्रिप्षन पेपर दिया और मुस्कुराते हुए वहाँ से दूसरे पेशेंट के पास चली गयी...

"क्या बात थी.. तू शर्मा क्यूँ रहा था ओये?" राज ने वीरू के कान के पास मुँह लेजाकार कहा...

"मेरी पॅंट निकलवा ली थी यार.. शरम नही आएगी क्या?" वीरू मुस्कुराया और अचानक बात पलट दी..," चलें.. सुबह होने को है.."

"एक मिनिट.. मैं भाई साहब को देखकर आता हूँ... तू यहीं लेटा रह तब तक.." राज ने वीरू से कहा..

"कहाँ गये वो..?"

"पता नही.. अभी 20 मिनिट पहले यहीं थे.. एक फोन करने की बात कहकर निकले थे.. बाहर ही होंगे.. मैं बुलाकर लाता हूँ.." कहकर राज बाहर निकल गया...

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करीब 10-15 मिनिट बाद राज वापस आया," यार वो तो कहीं दिखाई नही दिए... मैं हर जगह देख आया.."

"चले तो नही गये हैं.. स्नेहा रूम पर अकेली है ना.. वो उसको बोल भी रहे थे की देर लगी तो मैं आ जाउन्गा..!" वीरू ने राज से कहा..

"पर मैं पार्किंग में गाड़ी भी देख आया हूँ... वहीं खड़ी है.. गये होते तो गाड़ी लेकर नही जाते क्या?" राज ने सवाल किया...

"फिर तो यहीं होंगे.. इंतजार करते हैं.. और क्या?" वीरू ने राज की और देखते हुए कहा...

राज ने सहमति में सिर हिलाया और वीरेंदर के पास ही बैठ गया.....

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सवेरा हो गया था.. स्नेहा को सारी रात नींद नही आई.. यूँही करवटें बदलती हुई विकी के बारे में सोचती रही...कितना प्यारा है मोहन.. कितना अपना सा है.. 3 दिन में ही वो उस'से किस कदर जुड़ गयी थी.. उसके दूर जाते ही उसको लगता था की वो फिर से नितांत अकेली हो गयी है... मोहन ने एक साथ ही उसको कितनी सारी खुशियाँ दे दी... मोहन के लिए ही जियूंगी अब... उसके लिए मर भी जाउन्गि... स्नेहा ने मन ही मन सोचा और अंगड़ाई लेते हुए उल्टी लेट गयी.. उसका रूप निखर आया था.. अब हर अंग हर पल जैसे 'मोहन मोहन' ही पुकारता रहता था.. आज गाड़ी में ही उन्होने कितनी मस्ती की थी.. स्नेहा रह रह कर विकी से लिपट जा रही थी.. 'पल' भर की बेचैनी भी स्नेहा से सहन नही हो रही थी... मोहन ने वादा किया था.. रोहतक जाकर एक दोस्त के फ्लॅट पर रुकेंगे और वो उस'से वहाँ पहले दिन वाला ही प्यार फिर से करेगा... जी भर कर.. वो रोहतक आ भी गये थे.. पर स्नेहा से 2 पल का भी इंतज़ार नही हो रहा था.. वो रह रह कर मोहन से लिपटी जा रही थी.....

और शायद इसीलिए 'वो' हादसा हुआ.. अगर वो मोहन को इस तरह 'तंग' ना करती तो शायद मोहन हादसे को टाल भी लेता.. सोचते हुए स्नेहा ने एक लंबी आह भारी.. और करवट बदलकर फिर से सीधी हो गयी...

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करीब 10 मिनिट बाद दरवाजे पर दस्तक हुई.. स्नेहा एक दम से उठी और दरवाजे के पास जाकर पूचछा," कौन है?"

"हम हैं.. दरवाजा खोलो"

आवाज़ वीरू की थी.. स्नेहा ने झट से दरवाजा खोल दिया..," आ गये.. क्या रहा?"

"भैया यहाँ नही आए हैं क्या..?" राज ने उल्टा उसी से सवाल किया..

"क्या मतलब?" स्नेहा का दिल धक से रह गया..," कहाँ हैं वो? यहाँ तो नही आए..

"गाड़ी तो उनकी वहीं पर खड़ी है... फोन करने की कहकर निकले थे.. हमने करीब 1:30 घंटे उनका इंतज़ार किया.. फिर सोचा क्या पता यहीं आ गये हों.. इसीलिए हम आ गये..." राज ने चिंतित स्वर में उत्तर दिया...

स्नेहा बिना कुच्छ सोचे समझे ही रोने लगी...," उन्होने पहले ही कहा था की रोहतक में उनको ख़तरा है.." सुबक्ती हुई स्नेहा के गालों से मोटे मोटे आँसू बहने लगे..

राज ने वीरू को बेड पर लिटा दिया.. दोनो की समझ में नही आ रहा था की वो क्या करें; क्या कहें... कुच्छ देर बाद राज उठकर स्नेहा के पास आया," आ जाएँगे.. आप रो क्यूँ रही हैं.. हम छ्चोड़ आएँगे.. आपको जहाँ जाना है..."

स्नेहा को कहाँ जाना था.. वो अब जा भी कहाँ सकती थी... मोहन के संग सपनों का, अरमानो का जो गुलिस्ताँ स्नेहा ने अपने दिल में सहेज लिया था, उसके आलवा अब इस जहाँ में उसका बचा ही क्या था.. पापा? जिसने महज अपनी राजनीति के लिए शतरंज की बिसात पर मोहरे की तरह से उसका इस्तेमाल किया था.. उसके पास? नही.. कभी नही! अगर वो ऐसा सोचती भी तो किस मुँह से.. वा खुद उसके खिलाफ बग़ावत पर उतर आई थी.. और शालिनी वाला केस सुर्ख़ियों में आने पर तो उसको अपने 'बाप' से नफ़रत सी हो गयी थी....

"चिंता ना करें आप... लीजिए.. आप फोन कर लीजिए..." राज ने अपना फोन उठाकर स्नेहा को दे दिया...

"ओह हां.. पर उसका फोन तो ऑफ ही रहता है.. अक्सर.. चलो ट्राइ करती हूँ..!" उम्मीद की किरण नज़र आने से उसकी सुबाकियाँ कुच्छ कम हुई और उसने विकी का नंबर. डाइयल किया.. पर जैसा स्नेहा ने सोचा था वैसा ही हुआ.. फोन ऑफ था.. स्नेहा को मोहन की भी चिंता हो रही थी और अपनी भी.. वह बेड पर बैठकर अपना सिर पकड़कर रोने लगी....

"तुम रो क्यूँ रही हो.. वो थोड़ी बहुत देर में आ ही जाएँगे.... वैसे तुम्हारे पास घर का नंबर. भी तो होगा ना.. वहाँ पता कर लीजिए अगर उन्होने घर पर फोन किया हो तो.. वैसे वो भाई साहब आपके लगते क्या हैं?" वीरू बेबस था.. उसके पास आकर उसके आँसू नही पोंच्छ सकता था...

क्या बताती स्नेहा.. क्या नाम देती 2 दिन पहले बने इस दिल के रिश्ते को.. उसको डर था की अगर वो सच्चाई बताती है तो कहीं दोनो डर कर कुच्छ उल्टा सीधा ना कर दें.. मसलन पोलीस को फोन वग़ैरह.. प्रत्युत्तर में वो बिलख पड़ी..," मोहन.. कहाँ हो तूमम्म्मममम???"

स्नेहा का वो कारून प्रलाप सुनकर दोनो का दिल दहल गया.. राज उसके पास जाकर बैठ गया," आप ऐसे ना रोयें.. मैं छ्चोड़ आउन्गा आपको जहाँ जाना है... देखिए यहाँ पर हम एज ए स्टूडेंट रह रहे हैं... किसी ने आपका रोना सुन लिया तो लोग तरह तरह की बातें करेंगे.. प्लीज़.. आप सब्र से काम लें.. वो आते ही होंगे..." राज कह तो रहा था की वो आ जाएँगे.. पर चिंता उसको खुद को भी होने लगी थी.. अब तक तो उसको यहीं पर आ जाना चाहिए था.. 3 घंटे के करीब होने वेल थे उसको गायब हुए...

स्नेहा ने जैसे तैसे खुद को संभाला..," क्या मैं यहीं रह सकती हूँ.. जब तक वो नही आता?" उसने अपने आँसू पोंच्छ लिए.. सच में ही उसका रोना उन्न बेचारों को मुसीबत में डाल सकता था.. और खुद उसको भी...

" क्या?.. हां.. पर.. मेरा मतलब है कि..." राज को कोई शब्द ही ना मिला आगे कुच्छ कहने को.. कैसे रह सकती है वो यहाँ.. लड़कों के कमरे में.. राज ने प्रशन सूचक नज़रों से वीरू की और देखा...

"हां.. रह ले बहन.. जब तक तेरा दिल करे तब तक रह यहीं पर.. मैं कह दूँगा.. मेरी बेहन है.. लोगों की ऐसी की तैसी..! लोग तो बोलते ही रहते हैं.." वीरू ने फ़ैसला सुना दिया..

स्नेहा सुनकर चोंक पड़ी.. उसने अपनी जुल्फें पीछे करके नज़रें उठाकर वीरू की और देखा.. कुच्छ पल तो वो विस्मय से अपनी आँखें फाडे हुए उसको देखती रही.. बूझे हुए चेहरे पर एक मद्धय्म सी मुस्कान दौड़ गयी.. और आँसू फिर से बहने लगे.. उसको यकीन ही नही हो रहा था की उसको 'भाई' मिल गया है..

वीरू उसकी तरफ देखकर मुस्कुराने लगा तो स्नेहा से रहा ना गया.. लगभग दौड़ती हुई सी वो उसके बेड की और गयी और घुटने ज़मीन पर रखकर उसकी छाती पर सिर रख लिया.. और सुबक्ती रही...

"अब भी क्यूँ रो रही है तू.. मैं हूँ ना.. तेरा भाई.." वीरू ने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर उपर उठाया...

"रो नही रही भैया.. समेट नही पा रही हूँ.. रक्षा बंधन पर मिली इस अनोखी खुशी को.. मेरा कोई भाई नही था.. आज से पहले.." स्नेहा खिल उठी..

"अब तो है ना.. वीरू!" वीरू की आँखें चमक रही थी...

"मुझे क्यूँ भूल रहे हो.. मैं भी तो हूँ.." राज भी स्नेहा की बराबर में आ बैठा...

"बहती गंगा में हाथ धो रहा है.. क्यूँ? चल आजा तू भी" वीरू ने कहा और दोनो राज के चेहरे को देखकर खिलखिला उठे......

विकी के इंतज़ार में दिन के कब 7 बज गये तीनो को पता ही नही चला.. स्नेहा रह रह कर बेचैन हो जाती थी.. पर अब उसको अपनी नही सिर्फ़ मोहन की चिंता थी.. उसको तो भाई मिल गये थे.. पर मोहन का यूँ अचानक गायब हो जाना उसकी परेशानी का सबब बना हुआ था.. स्नेहा रह रह कर खामोश हो जाती और शून्या में झाँकने लगती...

"चिंता क्यूँ कर रही हो सानू.. वो कोई बच्चे थोड़े ही हैं.. आ जाएँगे.." वीरू ने स्नेहा का हाथ पकड़ कर उसका ध्यान वापस खींचा...

स्नेहा ने हां में सिर हिलाया और अपनी नम हो चली आँखों को पौंच्छ लिया...

"स्नेहा तो है ही अभी.. मैं स्कूल चला जाउ? कल भी नही जा पाए थे.." राज ने खड़े होते हुए पूचछा..

"ठीक है.. तुम नहा लो.. वैसे भी मुझे कोई खास दिक्कत तो होने नही वाली है.. नाश्ता करके नही जाओगे क्या?" वीरू बोला....

"अभी तो मैं लेट हो रहा हूँ.. आकर ही देखूँगा.. स्कूल में खा लूँगा कुच्छ.. तुम्हारे लिए लाकर दे जाता हूँ..." राज बाहर निकलने लगा...

"मेरे लिए तो मेरी बेहन बना देगी.. क्यूँ स्नेहा?" वीरू स्नेहा को देखकर मुस्कुराया....

"पर... मुझे खाना बनाना नही आता है... कभी बनाया ही नही.." स्नेहा ने नज़रें उठाकर वीरू को देखा...

"कोई बात नही.. मैं सीखा दूँगा ना.. बस तुम वैसा करती जाना जैसे में बताउन्गा.. जा राज ब्रेड और बटर ले आ..." वीरेंदर स्नेहा को व्यस्त रखना चाहता था.. जब तक विकी नही आता... उसको पता था की वो खाली रहेगी तो ज़्यादा परेशान रहेगी...

राज ने स्नेहा की और देखा.. स्नेहा मुस्कुरा पड़ी..,"ठीक है.. पर कुच्छ उल्टा सीधा बन गया तो मुझे मत बोलना बाद में.. पहले बोल रही हूँ" और हँसने लगी...

राज उसकी हँसी का जवाब हुल्की मुस्कुराहट से देकर बाहर निकल गया....

"क्या बात है भैया? राज कुच्छ परेशान सा लग रहा है..?" स्नेहा ने राज के जाते ही वीरू से पूचछा..

"हूंम्म.. वही तो मैं भी देख रहा हूँ.. कल से इसको पता नही क्या हो गया है..?" वीरू ने जवाब दिया..

"आपने इस-से पूचछा ये रात को कहाँ गया था...?"

"ना.. पर शायद मुझे पता है ये कहाँ गया होगा..?"

"कहाँ?" स्नेहा को भी उत्सुकता हुई जान'ने की...

"रहने दो.. तुम्हारे मतलब की बात नही है..." कहकर वीरू ने करवट बदल ली..

"बताओ ना भैया.. ऐसे क्यूँ कर रहे हो.. मैं फिर से रो पड़ूँगी..." स्नेहा ने उसकी बाजू पकड़ कर वापस अपनी तरफ खींच लिया....

" ठीक है.. उसको आने दो.. पहले पक्का तो कर लूँ.. मैं जो सोच रहा हूँ.. वो सही भी है या नही.." वीरेंदर ने बात पूरी की भी नही थी की राज आ गया..," ये लो.. और ये खिड़की बंद रखना.. "

"खिड़की के बच्चे.. तूने ये तो बताया ही नही की तू गया कहाँ था.. रात को..?" वीरू ने आते ही सवाल दागा...

"बता दूँगा भाई.. अभी तो लेट हो रहा हूँ...?" कहते हुए राज बाथरूम में घुसने लगा...

"उसकी मा आई थी अभी यहाँ.. तुम्हे पूच्छ रही थी..." वीरू ने पाँसा फैंका..

"क्क्याअ? पर क्यूँ?.. मेरा मतलब कौन आई थी.. किसकी मा?" राज ने हड़बड़ा कर कहा...

"जिसके घर तू रात को गया था.. उसकी मा..? वीरू के ऐसा कहते ही राज का चेहरा सफेद पड़ गया.. उसकी हालत पर दोनो पेट पकड़कर हँसने लगे...

"क्या है भाई.. खंख़्वाह डरा दिया था... तूने स्नेहा को कुच्छ बता दिया क्या?" राज ने उनको हंसता देखकर राहत की साँस ली......

"नही.. अभी तक तो नही.. पर अभी बतावँगा.. तड़का लगाकर.. तू चला जा पहले.." वीरू ने हंसते हुए कहा...

"क्या है ये...? भाई तू भी ना.. मैं नही जाता स्कूल..." राज तौलिए को पटक कर वहीं बैठ गया..

"ठीक है.. मत जा.. जो मुझे नही पता वो तू बता देना..." खिलखिलाते हुए वीरू ने स्नेहा को हाथ दिया.. स्नेहा ने भी ताल से ताल मिलाई...

"प्लीज़ भाई.. तेरे हाथ जोड़ता हूँ.. मेरी इज़्ज़त का फालूदा क्यूँ निकाल रहा है.." राज दोनो हाथ जोड़कर गिड़गिदाने की मुद्रा में आ गया...

"क्यूँ जब मुँह काला करने गया था तब नही निकला इज़्ज़त का फालूदा..." वीरू और स्नेहा ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे.. राज का चेहरा देखने लायक हो गया था...

"ठीक है तो फिर.. तेरी भी बात मैं बताउन्गा वापस आकर.. जितना भोला बन रहा है.. उतना नही है ये.. स्कूल में एक भी लड़की इस'से बात नही करती.. सब को डरा के रखता है.." और राज की बात दोनो की जोरदार हँसी में दब कर रह गयी.. राज को कुच्छ बोलते ना बना तो वापस बाथरूम में घुस गया...

नहा धोकर मुँह फुलाए हुए ही राज स्कूल चला गया...

"चलो.. बताओ.. अब कैसे बनेगा.. नाश्ता..?" स्नेहा ने बटर और ब्रेड उठाए और वीरू के पास आ गयी

"राज! तुम्हे सर बुला रहे हैं..!"

राज आवाज़ से ही पहचान गया.. यह प्रिया थी.. उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास थी... जबकि रिया की आवाज़ में अल्हाड़पन झलकता था....

राज क्लास से बाहर निकला.. प्रिया पहले से ही बाहर थी.. प्रिया को उनदेखा करते हुए वा कुच्छ कदम आगे बढ़ा पर फिर प्रिया की और मूड गया," कौन्से सर?" राज की आवाज़ में रूखापन था...

"ववो.. सॉरी राज.. रियली..!" प्रिया उस'से नज़रें नही मिला पा रही थी..

"कौन्से सर बुला रहे हैं..?" राज ने उसकी बात को अनदेखा करने का दिखावा किया...

"क्या तुम मुझे माफ़ नही करोगे राज? तुम्हे पता है.. मुझे एक पल के लिए भी नींद नही आई... प्लीज़ माफ़ कर दो... कर दो ना.." प्रिया इधर उधर देख रही थी.. कहीं कोई देख तो नही रहा...

"माफ़ तो तुम मुझे कर दो.. मैं भी दूसरों के जैसा हूँ ना.. बदतमीज़..!" राज का गुस्सा तो उसकी पहली रिक्वेस्ट पर ही पिघलने लगा था.. अब तो वह सिर्फ़ दिखावा कर रहा था.. प्रिया को अपने लिए तड़प्ता देख राज को बहुत सुकून मिल रहा था...

"म्मेरा वो मतलब नही था राज.. मैं डर गयी थी.. तुम्हारी कसम... आज के..."

प्रिया ने अपनी बात पूरी की भी नही थी की वहाँ रिया आ धमकी," तुम्हे पता है राज.. ये सारी रात सुबक्ती रही.. मैं भी नही सो सकी.. इसके चक्कर में.. अब इसको माफी दे भी दो..." रिया ने अपना वोट प्रिया के पक्ष में डाला...

"अगर तुम नही बता रही की कौन्से सर बुला रहे हैं.. तो मैं वापस जा रहा हूँ..!" राज ने रिया की बात का कोई जवाब नही दिया...

"मैने झूठ बोला था.. तुमसे बात करने के लिए.. मैं तुम्हारी कसम...." और प्रिया की बात अधूरी ही रह गयी.. राज वापस मूड कर क्लास में चला गया...

" तू चिंता मत कर प्रिया... ये कहीं नही जाने वाला.. मैं सब समझ रही हूँ.. ये तुमसे बदला ले रहा है बस.. चल आ क्लास में चलते हैं.. आ ना!" रिया ने प्रिया का हाथ पकड़ कर क्लास की और खींच लिया...

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" अजीब आदमी है यार तू भी.. उस लड़की को ऐसे ही छ्चोड़ आया.. अंजान लड़कों के पास?" शमशेर को विकी की बात पर बहुत गुस्सा आया...

"चिंता मत कर भाई.. निहायत ही शरीफ लड़के हैं.. उसको प्यार से रखेंगे.. 2-4 दिन की तो बात है.. तब तक मैं मुरारी को निपटा लूँगा..." विकी फोन पर शमशेर से बात कर रहा था," वैसे भी तो उसको लोहरू छ्चोड़कर ऐसा ही करने का प्लान था.. लोहरू छ्चोड़ने पर बाद में टेन्षन आ सकती थी.. उसकी समझ में कुच्छ नही आएगा.. मैने उसको समझा रखा है की मेरी जान को ख़तरा हो सकता है.. अगर कुच्छ हो जाए तो तुम किसी भी सूरत में अपने बयान मत बदलना..."

"यार तुझे बयानो की पड़ी है... वो लड़के स्कूल में पढ़ते हैं यार.. डर जाएँगे.." शमशेर ने विकी से गुस्से में कहा...

"तू चिंता क्यूँ कर रहा है भाई.. स्नेहा बहुत समझदार है.. वो संभाल सकती है अगर कुच्छ उल्टा सीधा हुआ तो..! और मैने अपना एक आदमी भी आसपास जमा रखा है.. अगर कुच्छ होने भी लगा तो वो स्नेहा को मेरा नाम लेकर ले उड़ेगा..." विकी ने शमशेर को तसल्ली देने की कोशिश की..

"पर मान लो तुझे मल्टिपलेक्स मिल भी गया.. बाद में क्या होगा... उस बेचारी का!" शमशेर स्नेहा को लेकर चिंतित था...

"होना क्या है.. ज़्यादा से ज़्यादा उसका बाप उसका खर्चा नही देगा ना.. मैं दे दूँगा.. और बोल?" विकी ने जवाब दिया...

"यार.. तेरी यही बात ग़लत है.. तू सब चीज़ों को पैसे से तोल कर देखता है.. आख़िर वो तुझसे प्यार करती है.." शमशेर के मंन में अभी भी काई सवाल थे..

"तो मैं उस'से प्यार करता रहूँगा ना.. टाइम निकाल कर.. बहुत मस्त है साली.. ऐसी बाला मैने आज तक नही देखी..." विकी ने बत्तीसी निकालते हुए कहा...

"तेरा कुच्छ नही हो सकता भाई.. तू तो पॉलिटिशियन्स से भी एक कदम आगे बढ़ गया है.. खैर जैसा तू ठीक समझे...!" शमशेर ने टॉपिक पर बात करना व्यर्थ समझा..,"वैसे कहाँ रहते हैं.. वो लड़के..?"

"एस.एच.ओ. विजेंदर के घर के ठीक सामने... तू ये बता.. टफ से बात की या नही..."

"हां.. कर ली.. वो तो कह रहा था.. इतनी सी बात मुझे नही बोल सकता था क्या? खैर.. आज रात 8:00 बजे सीधा थाने चला जाना.. टफ और मुरारी वहीं मिलेंगे.. कर लेना जो बात करनी है.. खुलकर.. मैने सब समझा दिया है..." शमशेर ने बुझे मंन से कहा...

"थॅंक यू बॉस! तुस्सी ग्रेट हो.." कहकर विकी ने खुशी खुशी फोन काट दिया था.. वो मन ही मन उच्छल रहा था.. उसके एक ही तीर ने जाने कितने शिकार कर लिए थे... पर हाँ.. एक मासूम भी उसकी चपेट में आ गयी थी... स्नेहा!

" चलो! जनाब बुला रहे हैं?" सी.आइ.ए. थाना भिवानी के एक सिपाही ने ताला खोलते हुए सलाखों के अंदर मुरझाए से बैठे मुरारी से कहा.. शाम के करीब 5 बजे थे..

"देखा.. मैने कहा था ना.. तुम्हारा जनाब ज़्यादा देर तक मुझे ऐसे नही बैठा सकता.. कोई छ्होटा मोटा आदमी नही हूँ मैं.. बाद में उस'से निपाटूंगा भी... ये 'क़ानून' छ्होटे लोगों के लिए बनते हैं... हमारे लिए नही.. आ गया होगा फोन.. उपर से उसके किसी 'बाप' का...." मुरारी ने रुमाल से अपनी गर्दन पर छलक आए पसीने और मैल की पपड़ी सॉफ करते हुए कहा और चौड़ी छाती करके बाहर निकल लिया...

"अब हमें क्या पता साहब.. हम तो हुक़ुम के गुलाम हैं.. जैसा आदेश जनाब करेंगे, मान'ना पड़ेगा.. वैसे मेरी पूरी हुम्दर्दि आपके साथ है.. अगली बार भगवान की दया से जब आप मंत्री होंगे तो मैं आपसे ज़रूर मिलूँगा.. याद रखिएगा मेरा चेहरा..." सिपाही ने मासूमियत से कहते हुए अपने नंबर. बदवा लिए.. मुरारी की नज़र में..

मुरारी ने खुश होकर उसकी पीठ ठोनकी," यहाँ कुच्छ लेन देन नही चलता क्या रे?"

"सब चलता है साहब.. हर जगह चलता है ये तो... पर ना किसी को कुच्छ उपर मिलता.. ना नीचे.. जनाब डीजीपी हरयाणा के भतीजे हैं ना... हम तो बस इंतज़ार ही करते रहते हैं.. की कब दीवाली आएगी और कब बोनस मिलेगा.. साला तनख़्वाह के अलावा एक कप चाय भी नही नसीब होती फोकट में तो... इस थाने में... मेरी बदली ज़रूर करवा देना साहब...." सिपाही ने फिर से लाइन मारी...

"तुम चिंता मत करो बेटा.. मुझे कुर्सी मिलते ही तुम्हारी प्रमोशन पक्की.. पर ये बताओ.. बात किस'से करनी पड़ेगी.. लेन देन की.." मुरारी उसके कान में फुसफुसाया...

सिपाही ने कोई जवाब नही दिया.. टफ के ऑफीस के सामने पहुँच गये थे दोनो..," चलो साहब.. बाकी बातें बाद में..."

मुरारी अंदर घुस गया.. अंदर चल रहे ए.सी. की ठंड में मुरारी को अपना ऑफीस याद आ गया.....

टफ अपनी गद्देदार कुर्सी पर आराम से टेबल के नीचे पैर फैलाए हुए अढ़लेटा सा बैठा था.. उसके सामने 30 की उमर के आसपास के 2 पहलवान से दिखने वाले अच्छे घरों के लोग खड़े थे..

"मुझे बुलाया इनस्पेक्टर?" मुरारी ने गर्दन टेढ़ी करते हुए पूछा.. रस्सी जल चुकी थी.. पर बल अभी तक नही गये थे..

टफ ने जैसे मुरारी को सुना ही नही.. वह टेबल पर आगे की और झुका और सामने खड़े लोगों से बोला," बैठो!"

जैसे ही उन्न दोनो ने बैठने के लिए टेबल के सामने खड़ी कुर्सी खींची; टफ उबाल पड़ा...," सालो.. बैठने के लिए कुर्सी चाहिए तुम्हे.. हां? उधर बैठो.. नीचे!"

"जनाब हमारी भी कोई इज़्ज़त है.. बाहर गाँव वाले आए हुए हैं.. क्यूँ नाक कटवा रहे हो..?" उनमें से एक ने हाथ जोड़कर कहा...

"हूंम्म.. इज़्ज़त.. तुम्हारी भी इज़्ज़त है.. सालो.. जब गाँव की लड़कियों को खेतों में पकड़ते हो तो तब क्या तुम्हारी इज़्ज़त गांद मरवाने चली जाती है... तुम इज़्ज़त की बात करते हो.. बहनचो..." टफ खड़ा हो गया..," कपड़े निकालो... देखता हूँ तुम्हारी इज़्ज़त कितनी गहरी है..!"

"नही.. जनाब.. ये तो पागल है.. लो बैठ गये.. आप तो माई बाप हैं.. आपके सामने नीचे बैठने में भला कैसी शरम..?" कहते हुए दूसरा टपाक से दीवार के साथ साथ कर ज़मीन पर बैठ गया.. और पहले वाले को भी खींच कर बिठा लिया...

"राजेश!" टफ ने सिपाही को आवाज़ लगाई...

"जी.. जनाब.." राजेश तुरंत दरवाजे पर प्रकट हो गया...

"लड़की के बाप को बुलाकर लाओ...!"

"जी जनाब.." राजेश तुरंत गायब हो गया और जब वापस आया तो उसके साथ एक अधेड़ उम्र का आदमी था...

"नमस्ते जनाब!" आदमी ने कहा और अंदर आ गया.. उसकी आँखें भरी हुई थी..

"बोलो ताउ! क्या करना है इनका..?" टफ ने बड़े ही नरम लहजे में बात की..

उस आदमी ने नफ़रत और ग्लानि से ज़मीन पर बैठे दोनो की और देखा और अपनी नज़रें हटा ली..," सब कुच्छ आप पर छ्चोड़ दिया है जनाब.. अब हम तो किसी को मुँह दिखाने लायक रहे नही.. हमारी बेटी.." कह कह कर बुद्धा फूट फूट कर रोने लगा.. उसका गला भर आया...

"ठीक है.. आप जाकर मुंशी के पास बिटिया के बयान दर्ज करवा दो...! मैं कल इनको कोर्ट में प्रोड्यूस कर दूँगा..."

"एक मिनिट जनाब.. क्या हम अकेले में इनसे एक बार बात कर लें... इधर आना ताउ!" दूसरे वाले आदमी ने कहा...

"आप बात करना चाहते हो ताउ?" टफ ने पूचछा..

बुड्ढे ने कोई जवाब ना दिया.. उनके बुलाने पर वो इनकार नही कर सका और बरबस ही उनकी और चला गया....

कुच्छ क्षण दोनो आदमी उसके कान में ख़ुसर फुसर करते रहे.. बुड्ढे के अंदर का स्वाभिमान जाग उठा और कसकर एक तमाचा उनमें से एक को जड़ दिया.. दोनो टफ की वजह से खून का घूँट पीकर रह गये....

"क्या हुआ ताउ? क्या कह रहे हैं ये..." टफ ने दोनो को घूरते हुए कहा..

बुद्धा फफक पड़ा..," कह रहे है.. केस वापस ले लो वरना तुम्हारी छ्होटी बेटी को भी......" इस'से आगे वो ना बोल पाया....

टफ कितनी ही देर से अपने खून में आ रहे उबाल को रोके बैठा था..," कपड़े फाडो इन्न बेहन के लोड़ों के... और नगा करके घूमाओ बाहर.. तब आएगी इनको अकल..!"

टफ के मुँह से निकालने भर की देर थी.. राजेश अपने साथ दो और अपने ही जैसे हत्ते कत्ते पोलीस वालों को लेकर अंदर आ गया...

"हमें माफ़ कर दो साहब.. हमने तो खाली चुम्मि खाई थी.. और चूचियाँ दबाई थी बस..... प्लीज़.. जनाब.. इश्स बार छ्चोड़ दो.. नही.. प्लीज़ फाडो मत.. हम निकाल रहे हैं ना.." टफ का रौद्रा रूप देखकर दोनो अंदर तक दहल गये... और साथ में मुरारी भी.. उसके चेहरे पर पसीना छलक आया था.. और रौन्ग्ते खड़े हो गये थे...

सिपाहियों के कान तो बस अपने जनाब की आवाज़ ही जैसे सुनते थे... 2 मिनिट के बाद ही वो दोनो सिर्फ़ कcचे बनियान में खड़े थे...

"इतनी बे-इज़्ज़ती सहन नही होती जनाब.. हमारी भी पहुँच उपर तक है.. सेंटर में मिनिस्टर है हमारा मौसा...!" पहले वाले आदमी झक मार रहा था..

"एक मंत्री तो ये खड़ा.. तुम्हारे सामने.. इसको भी नंगा करके दिखाऊँ क्या?" टफ ने कहा तो मुरारी को झुर्झुरि सी आ गयी.. उसकी टाँगें काँपने लगी थे खड़े खड़े...

दोनो के मुँह अचानक सिल गये.. अब तक मुरारी पर तो उनका ध्यान गया ही नही था.. मुरारी को इश्स तरह भीगी बिल्ली बने खड़ा देख उनको अपनी औकात का अहसास हो गया....

"दोनो को हवालात में डाल दो.. शाम को इनकी गांद में मिर्ची लगानी है.... चलो ताउ जी.. आप बयान दर्ज करवा दो.." टफ ने कहा और फिर मुरारी की और घूरते हुए बोला..," बैठो.. मैं आता हूँ...!

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,

मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..

मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,

बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ

आपका दोस्त

राज शर्मा

(¨`·.·´¨) ऑल्वेज़

`·.¸(¨`·.·´¨) कीप लविंग &

(¨`·.·´¨)¸.·´ कीप स्माइलिंग !

`·.¸.·´ -- राज

girls school-44

hello dosto main yaani aapka dost raj sharma haajir hun next paart lekar

"Shukra hai Fracture nahi hai! maans fatne se soojan aa gayi hai.. theek hone mein 10-15 din lag jayenge.. main kuchh dawaiyan likh deti hoon.. time se lete rahna aur next monday ek baar aakar check kara jana... OK?" Hospital mein lady doctor Virender aur Raj ke paas khadi thi..," karte kya ho tum?"

"ji, padhte hain..10+2 mein" dono ek sath bol pade...

"tumhara dost sharmata bahut hai.." Doctor ne Raj ko prescription paper diya aur muskurate huye wahan se dusre patient ke paas chali gayi...

"kya baat thi.. tu sharma kyun raha tha oye?" Raj ne viru ke kaan ke paas munh lejakar kaha...

"meri pant nikalwa li thi yaar.. sharam nahi aayegi kya?" viru muskuraya aur achanak baat palat di..," chalein.. subah hone ko hai.."

"ek minute.. main bhai sahab ko dekhkar aata hoon... tu yahin leta rah tab tak.." Raj ne viru se kaha..

"kahan gaye wo..?"

"pata nahi.. abhi 20 minute pahle yahin thhe.. ek phone karne ki baat kahkar nikle thhe.. bahar hi honge.. main bulakar lata hoon.." kahkar Raj bahar nikal gaya...

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Kareeb 10-15 minute baad Raj wapas aaya," yaar wo to kahin dikhayi nahi diye... main har jagah dekh aaya.."

"chale toh nahi gaye hain.. Sneha room par akeli hai na.. wo usko bol bhi rahe the ki der lagi toh main aa jaunga..!" Viru ne Raj se kaha..

"par main parking mein gadi bhi dekh aaya hoon... wahin khadi hai.. gaye hote toh Gadi lekar nahi jate kya?" Raj ne sawaal kiya...

"fir toh yahin honge.. intjaar karte hain.. aur kya?" Viru ne Raj ki aur dekhte huye kaha...

Raj ne sahmati mein sir hilaya aur Virender ke paas hi baith gaya.....

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Sawera ho gaya tha.. Sneha ko sari raat neend nahi aayi.. yunhi karwate badalti huyi vicky ke baare mein sochti rahi...kitna pyara hai Mohan.. kitna apna sa hai.. 3 din mein hi wo uss'se kis kadar jud gayi thi.. uske door jaate hi usko lagta tha ki wo fir se nitant akeli ho gayi hai... Mohan ne ek sath hi usko kitni sari khushiyan de di... Mohan ke liye hi jiyungi ab... uske liye mar bhi jaaungi... Sneha ne man hi man socha aur angdayi lete huye ulti late gayi.. uska roop nikhar aaya tha.. ab har ang har pal jaise 'Mohan Mohan' hi pukarta rahta tha.. aaj gadi mein hi unhone kitni masti ki thi.. Sneha rah rah kar Vicky se lipat ja rahi thi.. 'pal' bhar ki bechaini bhi Sneha se sahan nahi ho rahi thi... Mohan ne wada kiya tha.. Rohtak jakar ek dost ke flat par rukenge aur wo uss'se wahan pahle din wala hi pyar fir se karega... ji bhar kar.. wo rohtak aa bhi gaye the.. par sneha se 2 pal ka bhi intzaar nahi ho raha tha.. wo rah rah kar Mohan se lipati ja rahi thi.....

aur shayad isiliye 'wo' hadsa hua.. agar wo Mohan ko iss tarah 'tang' na karti toh shayad Mohan haadse ko taal bhi leta.. Sochte huye Sneha ne ek lambi aah bhari.. aur karwat badalkar fir se seedhi ho gayi...

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kareeb 10 minute baad darwaje par dastak huyi.. Sneha ek dum se uthi aur darwaje ke paas jakar poochha," koun hai?"

"hum hain.. Darwaja kholo"

aawaj Viru ki thi.. Sneha ne jhat se darwaja khol diya..," aa gaye.. kya raha?"

"Bhaiya yahan nahi aaye hain kya..?" Raj ne ulta usi se sawaal kiya..

"kya matlab?" Sneha ka dil dhak se rah gaya..," kahan hain wo? yahan toh nahi aaye..

"Gadi toh unki wahin par khadi hai... fone karne ki kahkar nikle thhe.. hamne kareeb 1:30 gahnte unka intzaar kiya.. fir socha kya pata yahin aa gaye hon.. isiliye hum aa gaye..." Raj ne chintit swar mein uttar diya...

Sneha bina kuchh soche samjhe hi rone lagi...," unhone pahle hi kaha tha ki rohtak mein unko khatra hai.." subakti huyi Sneha ke gaalon se mote mote aansoo bahne lage..

Raj ne viru ko Bed par lita diya.. dono ki samajh mein nahi aa raha tha ki wo kya karein; kya kahein... kuchh der baad Raj uthkar Sneha ke paas aaya," aa jayenge.. aap ro kyun rahi hain.. hum chhod aayenge.. aapko jahan jana hai..."

Sneha ko kahan jana tha.. wo ab ja bhi kahan sakti thi... Mohan ke sang sapnon ka, armano ka jo gulistan Sneha ne apne dil mein sahej liya tha, uske aalawa ab iss jahan mein uska bacha hi kya tha.. papa? jisne mehaj apni Rajniti ke liye shatranj ki bisaat par mohre ki tarah se uska istemal kiya tha.. uske paas? nahi.. kabhi nahi! agar wo aisa sochti bhi toh kis munh se.. wah khud uske khilaf bagawat par utar aayi thi.. aur Shalini wala case surkhiyon mein aane par toh usko apne 'baap' se nafrat si ho gayi thi....

"chinta na karein aap... lijiye.. aap fone kar lijiye..." Raj ne apna fone uthakar Sneha ko de diya...

"oh haan.. par uska fone toh off hi rahta hai.. aksar.. chalo try karti hoon..!" ummeed ki kiran najar aane se uski subakiyan kuchh kam huyi aur usne Vicky ka no. dial kiya.. par jaisa Sneha ne socha tha waisa hi huaa.. fone off tha.. Sneha ko Mohan ki bhi chinta ho rahi thi aur apni bhi.. wah bed par baithkar apna sir pakadkar rone lagi....

"tum ro kyun rahi ho.. wo thodi bahut der mein aa hi jayenge.... waise tumhare paas ghar ka no. bhi toh hoga na.. wahan pata kar lijiye agar unhone ghar par fone kiya ho toh.. waise wo bhai sahab aapke lagte kya hain?" Viru bebas tha.. uske paas aakar uske aansoo nahi ponchh sakta tha...

kya batati Sneha.. kya naam deti 2 din pahle bane iss dil ke rishte ko.. usko darr tha ki agar wo sachchayi batati hai toh kahin dono darr kar kuchh ulta seedha na kar dein.. maslan police ko fone wagairah.. pratyuttar mein wo bilakh padi..," Mohan.. kahan ho tummmmmmm???"

Sneha ka wo karun pralaap sunkar dono ka dil dahal gaya.. Raj uske paas jakar baith gaya," aap aise na royein.. main chhod aaunga aapko jahan jana hai... dekhiye yahan par hum as a tudent rah rahe hain... kisi ne aapka rona sun liya toh log tarah tarah ki baatein karenge.. pls.. aap sabra se kaam lein.. wo aate hi honge..." Raj kah toh raha tha ki wo aa jayenge.. par chinta usko khud ko bhi hone lagi thi.. ab tak toh usko yahin par aa jana chahiye tha.. 3 ghante ke kareeb hone wale the usko gayab huye...

Sneha ne jaise taise khud ko sambhala..," kya main yahin rah sakti hoon.. jab tak wo nahi aata?" usne apne aansoo ponchh liye.. sach mein hi uska rona unn becharon ko museebat mein daal sakta tha.. aur khud usko bhi...

" kya?.. haan.. par.. mera matlab hai ki..." Raj ko koyi shabd hi na mila aage kuchh kahne ko.. kaise rah sakti hai wo yahan.. ladkon ke kamre mein.. Raj ne prashan soochak najron se Viru ki aur dekha...

"haan.. rah le behan.. jab tak tera dil kare tab tak rah yahin par.. main kah doonga.. meri behan hai.. logon ki aisi ki taisi..! log toh bolte hi rahte hain.." Viru ne faisla suna diya..

Sneha sunkar chowk padi.. usne apni julfein peechhe karke najrein uthakar Viru ki aur dekha.. kuchh pal toh wo vismay se apni aankhein faade huye usko dekhti rahi.. boojhe huye chehre par ek maddhaym si muskaan doud gayi.. aur aansoon fir se bahne lage.. usko yakin hi nahi ho raha tha ki usko 'bhai' mil gaya hai..

viru uski taraf dekhkar muskurane laga toh sneha se raha na gaya.. lagbhag doudti huyi si wo uske bed ki aur gayi aur ghutne jameen par rakhkar uski chhati par sir rakh liya.. aur subakti rahi...

"ab bhi kyun ro rahi hai tu.. main hoon na.. tera bhai.." Viru ne uska chehra apne haathon mein lekar upar uthaya...

"ro nahi rahi bhaiya.. samet nahi paa rahi hoon.. Raksha bandhan par mile iss anokhi khushi ko.. mera koyi bhai nahi tha.. aaj se pahle.." Sneha khil uthi..

"ab toh hai na.. Viru!" Viru ki aankhein chamak rahi thi...

"mujhe kyun bhool rahe ho.. main bhi toh hoon.." Raj bhi sneha ki barabar mein aa baitha...

"behti ganga mein haath dho raha hai.. kyun? chal aaja tu bhi" Viru ne kaha aur dono Raj ke chehre ko dekhkar khilkhila uthhe......

Vicky ke intzaar mein din kab 7 baj gaye teeno ko pata hi nahi chala.. Sneha rah rah kar bechain ho jati thi.. par ab usko apni nahi sirf Mohan ki chinta thi.. usko toh bhai mil gaye thhe.. par Mohan ka yun achanak gayab ho jana uski pareshani ka sabab bana hua tha.. Sneha rah rah kar khamosh ho jati aur shunya mein jhankne lagti...

"chinta kyun kar rahi ho sanu.. wo koyi bachche thhode hi hain.. aa jayenge.." Viru ne Sneha ka hath pakad kar uska dhyan wapas kheencha...

Sneha ne haan mein sir hilaya aur apni nam ho chali aankhon ko pounchh liya...

"Sneha toh hai hi abhi.. main school chala jaaun? kal bhi nahi ja paye thhe.." Raj ne khade hote huye poochha..

"theek hai.. tum naha lo.. waise bhi mujhe koyi khas dikkat toh hone nahi wali hai.. nashta karke nahi jaaoge kya?" viru bola....

"abhi toh main late ho raha hoon.. aakar hi dekhunga.. school mein kha loonga kuchh.. tumhare liye lakar de jata hoon..." Raj bahar nikalne laga...

"mere liye toh meri behan bana degi.. kyun Sneha?" Viru Sneha ko dekhkar muskuraya....

"par... mujhe khana banana nahi aata hai... kabhi banaya hi nahi.." Sneha ne najrein uthhakar Viru ko dekha...

"koyi baat nahi.. main sikha doonga na.. bus tum waisa karti jana jaise mein bataaunga.. Ja Raj Bread aur butter le aa..." Virender Sneha ko vyast rakhna chahta tha.. jab tak Vicky nahi aata... usko pata tha ki wo khali rahegi toh jyada pareshan rahegi...

Raj ne sneha ki aur dekha.. Sneha muskura padi..,"theek hai.. par kuchh ulta seedha ban gaya toh mujhe mat bolna baad mein.. pahle bol rahi hoon" aur hansne lagi...

Raj uski hansi ka jawaab hulki muskurahat se dekar bahar nikal gaya....

"kya baat hai bhaiya? Raj kuchh pareshan sa lag raha hai..?" Sneha ne Raj ke jate hi viru se poochha..

"hummm.. wahi toh main bhi dekh raha hoon.. kal se isko pata nahi kya ho gaya hai..?" Viru ne jawaab diya..

"aapne iss-se poochha ye rat ko kahan gaya tha...?"

"na.. par shayad mujhe pata hai ye kahan gaya hoga..?"

"kahan?" Sneha ko bhi utsukta huyi jaan'ne ki...

"Rahne do.. tumhare matlab ki baat nahi hai..." kahkar viru ne karwat badal li..

"batao na bhaiya.. aise kyun kar rahe ho.. main fir se ro padoongi..." Sneha ne uski baju pakad kar wapas apni taraf kheench liya....

" theek hai.. usko aane do.. pahle pakka toh kar loon.. main jo soch raha hoon.. wo sahi bhi hai ya nahi.." Virender ne baat poori ki bhi nahi thi ki raj aa gaya..," ye lo.. aur ye khidki band rakhna.. "

"khidki ke bachche.. tune ye toh bataya hi nahi ki tu gaya kahan thha.. Rat ko..?" Viru ne aate hi sawaal daga...

"bata doonga bhai.. abhi toh late ho raha hoon...?" kahte huye Raj bathroom mein ghusne laga...

"uski maa aayi thhi abhi yahan.. tumhe poochh rahi thhi..." Viru ne paansa fainka..

"kkyaaa? par kyun?.. mera matlab koun aayi thi.. kiski maa?" Raj ne hadbada kar kaha...

"jiske ghar tu raat ko gaya tha.. uski maa..? viru ke aisa kahte hi raj ka chehra safed pad gaya.. uski haalat par dono pate pakadkar hansne lage...

"kya hai bhai.. khamkhwah dara diya tha... tune sneha ko kuchh bata diya kya?" Raj ne unko hansta dekhkar raahat ki saans li......

"nahi.. abhi tak toh nahi.. par abhi bataaunga.. tadka lagakar.. tu chala ja pahle.." Viru ne hanste huye kaha...

"kya hai ye...? bhai tu bhi na.. main nahi jata school..." Raj touliye ko patak kar wahin baith gaya..

"theek hai.. mat ja.. jo mujhe nahi pata wo tu bata dena..." khilkhilate huye Viru ne Sneha ko hath diya.. Sneha ne bhi taal se taal milayi...

"pls bhai.. tere hath jodta hoon.. meri ijjat ka falooda kyun nikal raha hai.." Raj dono hath jodkar gidgidane ki mudra mein aa gaya...

"kyun jab munh kala karane gaya tha tab nahi nikla ijjat ka faalooda..." Viru aur Sneha jor jor se hans rahe thhe.. Raj ka chehra dekhne layak ho gaya tha...

"theek hai toh fir.. teri bhi baat main bataungaa wapas aakar.. jitna bhola ban raha hai.. utna nahi hai ye.. school mein ek bhi ladki iss'se baat nahi karti.. sab ko dara ke rakhta hai.." aur Raj ki baat dono ki jordar hansi mein dab kar rah gayi.. Raj ko kuchh bolte na bana toh wapas bathroom mein ghus gaya...

Naha dhokar munh fulaye huye hi Raj School chala gaya...

"chalo.. batao.. ab kaise banega.. nashta..?" Sneha ne butter aur bread uthaye aur viru ke paas aa gayi

"Raj! tumhe Sir bula rahe hain..!"

Raj aawaj se hi pahchan gaya.. yeh priya thi.. uski aawaj mein ek ajeeb si mithas thi... jabki Riya ki aawaj mein alhadpan jhalakta tha....

Raj class se bahar nikla.. Priya pahle se hi bahar thi.. Priya ko undekha karte huye wah kuchh kadam aage badha par fir Priya ki aur mud gaya," kounse Sir?" Raj ki aawaj mein rookhapan tha...

"wwo.. sorry Raj.. Really..!" Priya uss'se najrein nahi mila pa rahi thi..

"kounse sir bula rahe hain..?" Raj ne uski baat ko andekha karne ka dikhawa kiya...

"kya tum mujhe maaf nahi karoge Raj? tumhe pata hai.. mujhe ek pal ke liye bhi neend nahi aayi... plz maaf kar do... kar do na.." Priya idhar udhar dekh rahi thhi.. kahin koyi dekh toh nahi raha...

"maaf to tum mujhe kar do.. main bhi dusron ke jaisa hoon na.. badtameej..!" Raj ka gussa toh uski pahli request par hi pighalne laga tha.. ab toh wah sirf dikhawa kar raha tha.. Priya ko apne liye tadapta dekh Raj ko bahut sukoon mil raha tha...

"mmera wo matlab nahi tha Raj.. main darr gayi thi.. tumhari kasam... aaj ke..."

Priya ne apni baat poori ki bhi nahi thi ki wahan riya aa dhamki," tumhe pata hai Raj.. ye sari Rat subakti rahi.. main bhi nahi so saki.. iske chakkar mein.. ab isko maafi de bhi do..." Riya ne apna vote Priya ke paksh mein dala...

"agar tum nahi bata rahi ki kounse Sir bula rahe hain.. toh main wapas ja raha hoon..!" Raj ne Riya ki baat ka koyi jawab nahi diya...

"maine jhooth bola tha.. tumse baat karne ke liye.. main tumhari kasam...." aur priya ki baat adhoori hi rah gayi.. Raj wapas mud kar class mein chala gaya...

" tu chinta mat kar Priya... ye kahin nahi jane wala.. main sab samajh rahi hoon.. ye tumse badla le raha hai bus.. chal aa class mein chalte hain.. aa naaaa!" riya ne Priya ka hath pakad kar class ki aur kheench liya...

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" Ajeeb aadmi hai yaar tu bhi.. uss ladki ko aise hi chhod aaya.. anjaan ladkon ke paas?" Shamsher ko vicky ki baat par bahut gussa aaya...

"chinta mat kar bhai.. nihayat hi shareef ladke hain.. usko pyar se rakhenge.. 2-4 din ki toh baat hai.. tab tak main Murari ko nipta loonga..." Vicky fone par Shamsher se baat kar raha tha," waise bhi toh usko loharu chhodkar aisa hi karne ka plan tha.. Loharu chhodne par baad mein tension aa sakti thi.. uski samajh mein kuchh nahi aayega.. maine usko samjha rakha hai ki meri jaan ko khatra ho sakta hai.. agar kuchh ho jaye toh tum kisi bhi soorat mein apne bayan mat badalna..."

"yaar tujhe bayano ki padi hai... wo ladke school mein padhte hain yaar.. darr jayenge.." Shamsher ne vicky se gusse mein kaha...

"tu chinta kyun kar raha hai bhai.. Sneha bahut samajhdar hai.. wo sambhal sakti hai agar kuchh ulta seedha huaa toh..! aur maine apna ek aadmi bhi aaspaas jama rakha hai.. agar kuchh hone bhi laga toh wo Sneha ko mera naam lekar le udega..." Vicky ne Shamsher ko tasalli dene ki koshish ki..

"par maan lo tujhe multiplex mil bhi gaya.. baad mein kya hoga... uss bechari ka!" Shamsher Sneha ko lekar chintit tha...

"hona kya hai.. jyada se jyada uska baap uska kharcha nahi dega na.. main de doonga.. aur bol?" Vicky ne jawaab diya...

"yaar.. teri yahi baat galat hai.. tu sab cheejon ko paise se tol kar dekhta hai.. aakhir wo tujhse pyar karti hai.." Shamsher ke mann mein abhi bhi kayi sawaal thhe..

"to main uss'se pyar karta rahunga na.. time nikal kar.. bahut mast hai sali.. aisi bala maine aaj tak nahi dekhi..." Vicky ne batteesi nikalte huye kaha...

"tera kuchh nahi ho sakta bhai.. tu toh politicians se bhi ek kadam aage badh gaya hai.. khair jaisa tu theek samjhe...!" Shamsher ne topic par baat karna vyarth samjha..,"waise kahan rahte hain.. wo ladke..?"

"S.H.O. Vijender ke ghar ke theek saamne... tu ye bata.. Tough se baat ki ya nahi..."

"haan.. kar li.. wo toh kah raha tha.. itni si baat mujhe nahi bol sakta tha kya? khair.. aaj Raat 8:00 baje seedha thhane chala jana.. tough aur murari wahin milenge.. kar lena jo baat karni hai.. khulkar.. maine sab samjha diya hai..." Shamsher ne bujhe mann se kaha...

"thank u boss! tussi great ho.." kahkar vicky ne khushi khushi fone kaat diya tha.. wo man hi man uchhal raha tha.. uske ek hi teer ne jaane kitne shikar kar liye thhe... par haan.. ek maasoom bhi uski chapet mein aa gayi thi... Sneha!

" chalo! janab bula rahe hain?" C.I.A. thana Bhiwani ke ek sipahi ne tala kholte huye salaakhon ke andar murjhaye se baithe Murari se kaha.. Sham ke kareeb 5 baje the..

"Dekha.. maine kaha tha na.. tumhara janab jyada der tak mujhe aise nahi baitha sakta.. koyi chhota mota aadmi nahi hoon main.. baad mein uss'se nipatunga bhi... ye 'kanoon' chhote logon ke liye bante hain... hamare liye nahi.. aa gaya hoga fone.. upar se uske kisi 'baap' ka...." Murari ne Rumal se apni gardan par chhalak aaye pasine aur mail ki papdi saaf karte huye kaha aur choudi chhati karke bahar nikal liya...

"ab hamein kya pata sahab.. hum toh huqum ke gulam hain.. jaisa aadesh janaab karenge, maan'na padega.. waise meri poori humdardi aapke sath hai.. agli baar bhagwan ki daya se jab aap mantri honge toh main aapse jaroor miloonga.. yaad rakhiyega mera chehra..." Sipahi ne masoomiyat se kahte huye apne no. badhwa liye.. Murari ki najar mein..

Murari ne khush hokar uski peeth thonki," yahan kuchh len den nahi chalta kya re?"

"sab chalta hai sahab.. har jagah chalta hai ye toh... par na kisi ko kuchh upar milta.. na neeche.. janab DGP haryana ke bhatije hain na... hum toh bus intzaar hi karte rahte hain.. ki kab diwali aayegi aur kab bonus milega.. sala tankhwah ke alawa ek cup chay bhi nahi naseeb hoti fokat mein toh... iss thane mein... meri badli jaroor karwa dena sahab...." Sipahi ne fir se line mari...

"tum chinta mat karo beta.. mujhe kursi milte hi tumhari promotion pakki.. par ye batao.. baat kiss'se karni padegi.. len den ki.." Murari uske kaan mein fusfusaya...

Sipahi ne koyi jawab nahi diya.. Tough ke office ke saamne pahunch gaye thhe dono..," chalo sahab.. baki baatein baad mein..."

Murari andar ghus gaya.. Andar chal Rahe A.C. ki thand mein murari ko apna office yaad aa gaya.....

Tough apni gaddedar kursi par aaram se table ke neeche pair failaye huye adhleta sa baitha tha.. uske saamne 30 ki umar ke aaspas ke 2 pahalwan se dikhne wale achchhe gharon ke log khade thhe..

"mujhe bulaya inspector?" Murari ne gardan tedhi karte huye poochha.. rassi jal chuki thi.. par bal abhi tak nahi gaye the..

tough ne jaise Murari ko suna hi nahi.. wah table par aage ki aur jhuka aur saamne khade logon se bola," baitho!"

Jaise hi unn dono ne baithne ke liye table ke saamne khadi kursi kheenchi; tough ubal pada...," saalo.. baithne ke liye kursi chahiye tumhe.. haan? udhar baitho.. neeche!"

"janab hamari bhi koyi ijjat hai.. bahar gaanv wale aaye huye hain.. kyun naak katwa rahe ho..?" unmein se ek ne hath jodkar kaha...

"hummm.. ijjat.. tumhari bhi ijjat hai.. saalo.. jab gaanv ki ladkiyon ko kheton mein pakadte ho toh tab kya tumhari ijjat gaand marwane chali jati hai... tum ijjat ki baat karte ho.. behancho..." Tough khada ho gaya..," kapde nikalo... dekhta hoon tumhari ijjat kitni gahri hai..!"

"nahi.. janab.. ye toh pagal hai.. lo baith gaye.. aap toh mayi baap hain.. aapke saamne neeche baithne mein bhala kaisi sharam..?" kahte huye dusra tapak se deewar ke sath sat kar jameen par baith gaya.. aur pahle wale ko bhi kheench kar bitha liya...

"Rajesh!" Tough ne sipahi ko aawaj lagayi...

"ji.. janab.." Rajesh turant darwaje par prakat ho gaya...

"ladki ke baap ko bulakar laao...!"

"ji janab.." Rajesh turant gayab ho gaya aur jab wapas aaya toh uske sath ek adhed umra ka aadmi tha...

"namaste janaab!" aadmi ne kaha aur andar aa gaya.. uski aankhein bhari huyi thi..

"bolo taau! kya karna hai inka..?" Tough ne bade hi naram lahje mein baat ki..

uss aadmi ne nafrat aur glani se jameen par baithe dono ki aur dekha aur apni najrein hata li..," sab kuchh aap par chhod diya hai janaab.. ab hum toh kisi ko munh dikhane layak rahe nahi.. hamari beti.." kah kah kar buddha foot foot kar rone laga.. uska gala bhar aaya...

"theek hai.. aap jakar munshi ke paas bitiya ke bayan darj karwa do...! main kal inko court mein produce kar doonga..."

"ek minute janaab.. kya hum akele mein inse ek baar baat kar lein... idhar aana taau!" dusre wale aadmi ne kaha...

"aap baat karna chahte ho taau?" Tough ne poochha..

buddhe ne koyi jawab na diya.. unke bulane par wo inkar nahi kar saka aur barbas hi unki aur chala gaya....

kuchh kshan dono aadmi uske kaan mein khusar fusar karte rahe.. buddhe ke andar ka swabhiman jaag utha aur kaskar ek tamacha unmein se ek ko jad diya.. dono tough ki wajah se khoon ka ghoont peekar rah gaye....

"kya hua taau? kya kah rahe hain ye..." Tough ne dono ko ghoorte huye kaha..

Buddha fafak pada..," kah rahe hai.. case wapas le lo warna tumhari chhoti beti ko bhi......" iss'se aage wo na bol paya....

Tough kitni hi der se apne khoon mein aa rahe ubaal ko roke baitha tha..," kapde faado inn behan ke lodon ke... aur naga karke ghumaao bahar.. tab aayegi inko akkal..!"

Tough ke munh se nikalne bhar ki der thi.. Rajesh apne sath do aur apne hi jaise hatte katte police walon ko lekar andar aa gaya...

"hamein maaf kar do sahab.. hamne toh khali chummi khayi thi.. aur choochiyan dabayi thi bus..... pls.. janaab.. iss baar chhod do.. nahi.. pls fado mat.. hum nikal rahe hain na.." Tough ka roudra roop dekhkar dono andar tak dahal gaye... aur sath mein Murari bhi.. uske chehre par pasina chhalak aaya tha.. aur roungte khade ho gaye thhe...

Sipahiyon ke kaan toh bus apne janaab ki aawaj hi jaise sunte thhe... 2 minute ke baad hi wo dono sirf kachchhe baniyan mein khade thhe...

"itni be-ijjati sahan nahi hoti janab.. hamari bhi pahunch upar tak hai.. centre mein minister hai hamara mousa...!" Pahle wale aadmi jhak maar raha tha..

"ek mantri toh ye khada.. tumhare saamne.. isko bhi nanga karke dikhaaoon kya?" Tough ne kaha toh Murari ko jhurjhuri si aa gayi.. uski taangein kaanpne lagi thhi khade khade...

Dono ke munh achanak sil gaye.. ab tak murari par toh unka dhyan gaya hi nahi tha.. Murari ko iss tarah bheegi billi bane khada dekh unko apni aukat ka ahsaas ho gaya....

"dono ko hawalat mein daal do.. sham ko inki gaand mein mirchi lagani hai.... chalo taau ji.. aap bayan darj karwa do.." tough ne kaha aur fir Murari ki aur ghoorte huye bola..," baitho.. main aata hoon...!

 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --45

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा हाजिर हूँ नेक्स्ट पार्ट लेकर

टफ जैसे ही वापस ऑफीस में आया, मुरारी की हालत देखकर वो अपनी हँसी नही रोक पाया.. वो मुरारी को बैठने को बोलकर गया था.. और मुरारी ठीक उसी जगह जाकर नीचे बैठा हुआ था जिस जगह पर कुच्छ मिनिट पहले वो दो आदमी बैठे थे.. बिल्कुल उसी अंदाज में.. शरीफ आदमियों की तरह... उसके दोनो हाथ घुटनो पर रखे हुए थे..

" यहाँ आ जाओ.. उपर.. कुर्सी पर.." टफ ने अपनी कुर्सी पर जमाते हुए कहा....

मुरारी की जान में जान आई.. वो तो ये सोच रहा था कि उसके साथ भी अब कुच्छ ऐसा ही होने वाला है.. पर अभी भी उसके दिल को पूरी तसल्ली नही हुई थी..," आप कहो तो मैं तो नीचे भी बैठ जाउन्गा.. इनस्पेक्टर........ साहब! मैं तो ज़मीन से जुड़ा हुआ आदमी हूँ.." मुरारी ने थूक गटका....

"हां.. तुम्हारी ज़मीन कल देख ली थी.. रही सही.. आज रात को देख लेंगे.." टफ ने मुस्कुराते हुए कहा..

"कककक.. क्या मतलब...?" मुरारी सिहर उठा...

"कुच्छ नही.. किसी आदमी का फोन आया था.. कह रहा था..."

मुरारी की आँखें चमक उठी..," देल्ही से आया था क्या फोन????"

"देल्ही वालों को भूल जाओ मुरारी.. दरअसल उनके कहने पर ही आपकी हवा टाइट की गयी है.. पार्टी आपकी वजह से अपनी छवि बदनाम नही करना चाहती.. खैर जिसका भी फोन आया था.. कह रहा था की उसको पता है की इस वक़्त तुम्हारी बेटी कहाँ है..?" टफ ने वहाँ रखे एक गिलास पानी से अपना गला तर किया.. .

"प्लीज़ इनस्पेक्टर साहब.. मुझे उस आदमी से मिलवा देजिये.. मैं भी परेशान हूँ.. अपनी बेटी के लिए... चाहे आप जो भी खर्चा पानी कहें.. मैं देने को तैयार हूँ...

टफ ने उसकी बात को नज़रअंदाज करके अपनी बात जारी रखी...," उसका नाम विकी है.. मैने उसको बुलवाया है.. वो बस आने ही वाला होगा..."

"विकी कौन.. रोहतक वाला.. जो विरोधी पार्टी में वहाँ से टिकेट का दावेदार है..?" मुरारी के दिमाग़ में खलबली मच गयी...

"वो मुझे नही पता.. पर हां.. है वो रोहतक से ही.." टफ ने अंजान बनते हुए कहा..

"वही होगा ज़रूर.. उसकी ही साजिस है ये.. किसी ने मेरी बेटी को उसके साथ देखा भी था.. वारदात वाले दिन.. इनस्पेक्टर साहब.. उसने मेरी बेटी को बहला रखा है.. आप यकीन कीजिए..." मुरारी कुर्सी पर बैठा बैठा हाँफने लगा.. एक ही साँस में वो ये सब बोल गया था....

"मैं तो यकीन कर भी लूँ.. पर कोर्ट तो सबूत माँगेगा.. और तुम्हारी बेटी के बयान तुम्हारे खिलाफ है.. फिर भी चलो.. आने दो.. देखते हैं बात करके..." टफ ने कहा ही था की दरवाजे पर राजेश प्रकट हुआ," जनाब.. कोई विकी आया है.. कह रहा है.. आपसे मिलने का टाइम माँगा है...

"भेज दो उसको अंदर...!" टफ ने कहा... मुरारी का चेहरा तमतमा उठा...

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"नमस्कार जनाब!" विकी ने ऑफीस में दाखिल होते हुए कहा...

"नमस्कार! क्या तुम ही...."

"जी हां जनाब.. मैं ही विकी हूँ.. ये मुझे अच्छि तरह से जानते हैं..! क्यूँ नेता जी..?" विकी ने मुरारी की और आँख दबा दी..

"इनस्पेक्टर साहब..! मुझे 100 प्रतिशत विस्वास है कि यही आदमी मेरी बर्बादी के पिछे ही है.. आप इसको अभी गिरफ्तार कर लीजिए.. मैं बेकसूर हूँ.." रो ही तो पड़ा था मुरारी....

"तुम फ़ैसला सुना रहे हो की राय दे रहे हो...?" टफ ने दीवार के साथ कुर्सी सरकाते हुए कहा.....

"नही इनस्पेक्टर साहब.. मैं फ़ैसला कैसे सुना सकता हूँ.. फ़ैसला करने वाले तो आप हैं.. फिर भी मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ की इसके पीछे इसीका हाथ है.. इसने मेरी बेटी बहका ली.. मुझे बदनाम कर दिया...." मुरारी को टफ ने बीच में ही टोक दिया...

"और शालिनी.. उसके कपड़े भी इसी ने फ़ाडे थे क्या?"

"ववो.. मैं बहक गया था.. गुस्से मैं था मैं.. मुझे माफ़ कर दो इनस्पेक्टर साहेब.. मैं शालिनी बिटिया से भी माफी माँग लूँगा.." मुरारी ने कहा..

विकी मुरारी का ये दब्बु रूप देखकर मुश्किल से अपनी हँसी रोक पा रहा था.. इनस्पेक्टर साहिब को इज़्ज़त जो बख्सनि थी..

"हाँ तो विकी जी.. क्या कहना है आपका..?" टफ विकी से मुखातिब हुआ...

"यही की मुझे पता है की इसकी लड़की इस वक़्त कहाँ है.. वो पोलीस के पास और कोर्ट में अपने बयान देना चाहती है.. इसी सिलसिले में किसी ने मुझसे कॉंटॅक्ट किया था..." विकी बोल ही रहा था की मुरारी बीच में टपक पड़ा..

"नही इनस्पेक्टर साहब.. इसकी सारी बातें झूठी हैं.. इसने खुद ये ड्रामा रचा है और अब यहाँ मुझे ब्लॅकमेल करने आया है..."

"तुम चुप हो जाओगे या मुझे तुम्हे हवालात में भेजना पड़ेगा...?" टफ ने रूखी आवाज़ में मुरारी से कहा," मैं कोई पागल तो नही हूँ.. मैं पूच्छ रहा हूँ ना सब कुच्छ.."

"जी!" मुरारी भीगी बिल्ली बन गया...

"हां तो विकी जी... ये ब्लॅकमेलिंग का क्या फंडा है.." टफ ने विकी से पूचछा...

"कुच्छ नही है जनाब! मैं इसको ब्लॅकमेल क्यूँ करूँगा.. इस जैसे लोगों की तो मैं शकल भी देखना नही चाहता.. मैं तो सिर्फ़ आपको जानकारी देने आया था.. वो भी इसीलिए की खुद इसकी बेटी ऐसा चाहती है..." विकी ने सहज भाव से कहा...

"हूंम्म.. तो कहाँ है लड़की.. चलिए उसके बयान लेकर कोर्ट में पेश कर देते हैं.. ये अपने आप भुगतेगा..!" टफ ने विकी से कहा.. कार्य वाही एक तरफ़ा चल रही थी.. हर तरफ से मुरारी को दबाया और डराया जा रहा था..

"चलिए.. मैं तो इसी काम से आया हूँ..!" विकी खड़ा हो गया...

"एक मिनिट.. दारोगा जी.. क्या मैं विकी से अकेले में बात कर सकता हूँ.." मुरारी को कुच्छ समझ नही आ रहा था.... उसका दिमाग़ खिसक चुका था...

"कर लीजिए.. मुझे क्या है.. हम तो दिलों को जोड़ने का ही काम करते हैं.. बशर्ते.. विकी जी को कोई ऐतराज ना हो तो..." कहकर टफ ने विकी की और देखा...

"नही.. मुझे इस घटिया इंसान से कोई बात नही करनी.. मैं तो रोज दुआ करता था की इसका असली चेहरा दुनिया के सामने आए... इसको 10 साल से कम तो क्या सज़ा होगी अब.. है ना जनाब?" विकी ने तिर्छि नज़रों से मुरारी का चेहरा देखते हुए कहा...

"हां.. अगर इसकी बेटी ने और शालिनी ने कोर्ट में इसके खिलाफ बयान दे दिए तो ये नही बच सकता.. हाँ अगर...!" टफ ने बात अधूरी छ्चोड़ दी...

"अगर क्या.. इनस्पेक्टर साहब.. मैं कुच्छ भी करने को तैयार हूँ.. मुझे बचा लीजिए प्लीज़.. मैं आपके पाँव पड़ता हूँ.. मैं कोई भी कीमत देने को तैयार हूँ..!" मुरारी कुर्सी से उठ गया...

"मैं ना तो आपको सज़ा से बचा सकता हूँ और ना ही सज़ा दिलवा सकता हूँ.. वैसे मेरी आपसे पूरी हुम्दर्दि है.. आख़िर आपके नीचे रहकर ही तो हमें काम करना है सारी उमर.. पर सब कुच्छ उन्न लड़कियों के ही हाथों में है..." टफ ने नकली सहानुभूति दर्शाते हुए कहा...

"पर एक तो आपके पास ही है ना.. कम से कम उसको तो समझा दीजिए.." मुरारी गिड़गिदा उठा था..

"एक से क्या होगा.. सज़ा तो दोनो की एक साथ ही मिलनी है.. अगर तुम्हारी लड़की वाला मामला सुलझता है तो मैं कोशिश कर सकता हूँ.. पर वो मामला तभी सुधार सकता है जब आपकी लड़की बयान ना दे.. या मीडीया को दिए बयानो से मुकर जाए.." टफ ने उसको इस उलझन से बाहर निकालने का रास्ता सुझाया.. और बाहर निकालने की चाबी सिर्फ़ विकी के पास ही थी..

"मैं अपनी बेटी को कैसे भी करके चुप करा दूँगा.. आप मुझे उस'से मिलवा दीजिए.." मुरारी हाथ जोड़कर गिड़गिडया..

"मिलवा दीजिए विकी जी.. अगर आप ठीक समझे.. बेचारे का भला हो जाएगा.. वैसे मुझे कोई दिक्कत नही है...." टफ ने चुटकी ली...

इस'से पहले विकी कुच्छ बोलता.. मुरारी उसके पैरों में गिर पड़ा..," विकी भाई.. एक बार बात कर लो प्लीज़.. मैं तुम्हे कभी हुल्के मैं नज़र नही आउन्गा.. और बोलो..."

विकी अपना मन सा बनाने की आक्टिंग करता हुआ टफ से बोला," ठीक है जनाब.. अगर आपको भी यही सही लगता है तो मैं बात कर लेता हूँ.. अकेले में...!"

"ठीक है.. तुम यहीं बैठो.. मुझे किसी काम से बाहर जाना है.. मैं आधे घंटे में आता हूँ.. " कहकर टफ बाहर निकल गया..

मुरारी भिखारी की तरह विकी के चेहरे को ताकने लगा...

"हां.. बोल मुरारी!" विकी ने मुरारी को घूरा...

"तू तो मुझसे भी बड़ा कमीना निकला रे.. सीधे मतलब की बात पर आजा.. बता.. मेरी बेटी मुझे सौंपने का क्या लेगा?" मुरारी की आवाज़ में गुस्सा और बेबसी सॉफ झलक रही थी...

"वो मल्टिपलेक्स!" विकी ने दो टुक जवाब दिया..

" जा ले ले... बदले में स्नेहा मुझे मिल जाएगी ना...." मुरारी ने कहा..

"मैने क्या उसका आचार डालना है? जहाँ चाहे चली जाए.. मुझे क्या? वैसे भी मैं तो लड़की को एक बार ही यूज़ करता हूँ...." विकी ने सिगरेट्टी निकाल कर सुलगा ली...

"ना.. ना.. मुझे चाहिए.. वो हरम्जदि... मंजूर हो तो बोलो..." मुरारी का चेहरा नफ़रत और कड़वाहट से भर उठा...

" तुझे मैं बता दूँ कि वो तेरे पास रहना नही चाहती.. नफ़रत करती है तुझसे.. तेरी शकल भी देखना नही चाहती... .. बयान में नही होने दूँगा.. मेरी गॅरेंटी..फिर तू क्या करेगा उसका ?" विकी ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा..

मुरारी की आँखें लाल हो गयी.. नथुने फूल गये और किसी भेड़िए की तरह गुर्राने लगा," उसका वही करूँगा जो उसकी मा का किया था.. साली कुतिया... बेहन चोद.. उसको नंगी करके अपने सामने चुदवाउन्गा... फिर जंगली कुत्तों के आगे डाल दूँगा.. उसने सारी दुनिया को बता ही दिया की वो मेरी औलाद नही है... एक बार मुझे सौंप दे बस.. बोल मंजूर है की नही...?"

विकी के जहाँ से एक लंबी साँस आह के रूप में निकली.. कैसा है मुरारी? आदमी है या भेड़िया.. कुच्छ मिनिट के मौन के बाद बोला..," मजूर है.. लड़की तुम्हे मिल जाएगी.. मुझे मल्टिपलेक्स के कागज मिलने के बाद..."

"तो फिर मिलाओ हाथ.. तुम अपना फोन दो.. मैं अभी उसके मलिक को फोन करता हूँ.. तुम चाहो तो कल ही उसको पैसे देकर मल्टिपलेक्स अपने नाम करवा सकते हो..." मुरारी ने विकी का हाथ अपने हाथ मैं पकड़ लिया...

विकी ने अपना हाथ च्छुडवाया और ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा...," तू क्या समझता है.. मैने इतनी मेहनत सिर्फ़ तुझसे नो ऑब्जेक्षन सर्टिफिकेट लेने के लिए की है.. नही! वो तो मैं कभी भी उसकी कनपटी पर रिवॉल्वेर रखकर खरीद सकता था... अब वो मल्टिपलेक्स तू खरीद कर मुझे देगा.. यानी पैसे तेरे होंगे.. और माल मुझे मिलेगा..!"

"मतलब तू समझता है की मैं अपने पास से तुझे 8 करोड़ रुपैया दूँगा... ?" मुरारी ने हैरत से उसकी और देखा...

"8 नही 10 करोड़.. और मुझे पता है की तू देगा.. क्यूंकी 10 करोड़ गँवाने 10 साल जैल में काटने से कहीं ज़्यादा आसान है तेरे लिए.. 10 सालों में तो तू पता नही कितने 10 करोड़ कमा लेगा...!" विकी ने कातिल मुस्कान मुरारी की और फैंकी...

मुरारी ने अपना सिर टेबल पर रख लिया और कुच्छ देर उधेड़बुन में पड़ा रहा... फिर अचानक उठकर बोला," मैं सिर्फ़ 8 करोड़ दूँगा.. और मुझे वो लौंडिया हाथ के हाथ चाहिए.. बोल कब दे सकता है...?"

"जब तुम चाहो.. पर अभी तो तुम्हारी 14 दिन की पोलीस कस्टडी है ना?" विकी ने मुरारी से सवाल किया...

"तुम्हे जब चाहे पैसे मिल जाएँगे.. तुम बताओ.. कब ला सकते हो स्नेहा को..?" मुरारी ने सवाल पर सवाल मारा...

" मैं बांके को बता दूँगा...! सोचकर.." विकी ने अजीब से अंदाज में बांके का नाम लिया...

"बांके... तुम बांके को कैसे जानते हो?" मुरारी चौंक कर उच्छल पड़ा....

"क्यूँ हैरानी हुई ना... मुझे किडनॅप करने कुच्छ चूजो को साथ लेकर आया था.. अभी मेरे गुसलखाने में क़ैद हैं तीनो.. अगर तुम आज नही मानते तो तुम पर एक केस और लगना था.. " विकी ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा....

तभी टफ ने ऑफीस में प्रवेश किया..," लगता है कुच्छ सौदेबाज़ी हो गयी तुम दोनो की...?"

"नही.. इनस्पेक्टर साहब.. हम दोनो में कुच्छ ग़लतफ़हमियाँ थी.. जो आज साथ बैठने से दूर हो गयी.. वैसे विकी जी कह रहे हैं की ये स्नेहा को मनाने की कोशिश करेंगे... अपने बयान वापस लेने के लिए.. क्यूँ विकी जी?" मुरारी ने बात सपस्ट की...

"हां मुरारी जी.. " और कहते हुए विकी ने टफ की और आँख मारी...

"राजेश!" टफ ने आवाज़ लगाई....

"जी जनाब.."

"नेता जी को पूरी इज़्ज़त से हवालात में छ्चोड़ आओ.. सुबह मिलते हैं इनसे.. इनका ख़याल रखना..." टफ ने व्यंग्य किया...

"इनस्पेक्टर साहब.. अगर बुरा ना मानो तो.. मैं यहीं सो जाऊं... वहाँ मच्छर और गर्मी जान निकल देते हैं..."

"आप चिंता ना करें नेता जी.. सरकार कुच्छ ही दिनों में हवालात में भी एसी लगवाने पर विचार कर रही है... तब तक प्लीज़.. किसी तरह से काट लें...!" टफ ने मुस्कुराते हुए कहा...

"कब.. ये कैसे हो सकता है..? मुरारी को विस्वास नही हुआ..

"हो क्यूँ नही सकता नेता जी.. आजकल हवालात में आते ही नेता लोग हैं.. फिर कुच्छ ना कुच्छ तो सरकार को सोचना ही पड़ेगा.." टफ ने कहा और राजेश को उसे वहाँ से ले जाने को कहा....

"तू बुरा फँसेगा किसी दिन..!" मुरारी के जाते ही टफ ने विकी को आगे बढ़कर गले लगा लिया...," हो गया तुम्हारा काम?"

विकी कुच्छ ना बोला.. आँख बंद होते ही उसको स्नेहा का मासूम सा चेहरा दिखाई दिया.. वो बिल्कुल नंगी पड़ी थी.. जंगली कुत्तों के बीच.....

टफ और विकी दोनो थाने से निकल कर टफ के घर की और चल पड़े.. लगभग सारे रास्ते विकी चुप ही रहा...

"क्या बात है.. तुम्हे मल्टिपलेक्स मिल तो गया ना? या कुच्छ अड़चन है.. ?" टफ ने उसको गुम्सुम बैठे देख कहा....

"हूंम्म... हां.. मिल जाएगा!.......... कोई अड़चन नही है..अब!" विकी ने लंबी गहरी साँस छ्चोड़ी...

"फिर भी तू परेशान लग रहा है.. क्या बात है यार...? बता तो!" टफ ने उसका चेहरा देखते हुए पूचछा...

"नही... कुच्छ नही है... कुच्छ भी तो नही.. बस मुरारी का चेहरा देखकर ही उल्टियाँ सी आने लगती हैं.. बहुत कमीना है साला.. सौ कुत्ते मारकर ये 'एक' पैदा हुआ होगा..." विकी के जबड़े भिच गये.. पर वो आधी बात मन में ही पी गया.. कैसे बताता की वो भी इस बार 'उसके' कामीनेपन में हिस्सेदार होने वाला है... स्नेहा को उसे सौंपकर...'" बस! बहुत हो गया.. ये आख़िरी बार है..!" अचानक विकी के मुँह से निकला...

"क्या बहुत हो गया? क्या आख़िरी बार है? कहाँ अटका हुआ है भाई...?" टफ ने गाड़ी रोक दी...

"बस यार.. ये पॉलिटिक्स.. बहुत ही कुत्ति चीज़ है.. सोच रहा हूँ.. छ्चोड़ दूं.. जाने क्या क्या करवाती है साली... बस ये मल्टिपलेक्स मिल जाए.. उसके बाद में अपने बारे में सोचूँगा..." विकी की तबीयत सी खराब हो गयी थी.. उसको अपना शरीर टूट'ता हुआ लग रहा था...

"एक बात तो बता यार.. स्नेहा बयान नही देती ... ठीक है... पर क्या तू उसको सच्चाई बताएगा? क्यूंकी आज नही तो कल उसको वापस जाने पर पता लग ही जाएगा.. सच्चाई का... फिर क्या वो तुझ पर उल्टा केस नही ठोंक देगी....?" टफ को पूरी बात का ज्ञान नही था...

"तू छ्चोड़ ना यार.. स्नेहा को.. गाड़ी चला.. मेरे सिर में दर्द है..." विकी का सिर पहले ही स्नेहा के बारे में सोचकर फटा जा रहा था...

"ऐसे सिर दर्द करने से काम थोड़े ही चलेगा..? आगे का सोचकर तो चलना ही पड़ेगा... तूने सोचा है की अगर उसके बयानो का मुँह तेरी तरफ घूम गया तो क्या होगा? मुरारी की जगह तू मेरे थाने में बैठा होगा.. और मैं कुच्छ कर भी नही पाउन्गा......." टफ ने पते की बात कही थी...

"ऐसा नही होगा याआआर.. तू समझता क्यूँ नही है.... वो कभी ऐसा नही करेगी..?" विकी झल्लाते हुए बोला.. टफ उसको बार बार अंजाने में ही याद दिला रहा था की स्नेहा के साथ क्या होने वाला है...

"क्यूँ.. क्यूँ नही करेगी..?" टफ ने फिर उसके दिल के तारों को छेड़ा..

"हेययय भग्वाआअन... वो मुझसे प्यार करती है.. मेरे लिए मर सकती है.. मर जाएगी...! प्लीज़ तू ये बात बंद कर दे यार..." विकी का अंतर्मन उसको कचोट रहा था...

"और तू..??? तू नही करता क्या उस'से प्यार? तुझे अच्छि नही लगती क्या वो...? अगर तू जिंदगी के बारे में सोच ही रहा है तो वो क्यूँ तेरी जिंदगी का हिस्सा नही हो सकती...? तू ही तो कह रहा था भाई के सामने.. कि ऐसी लड़की तूने आज तक देखी ही नही..." टफ टॉपिक बंद करने को तैयार ही नही था.. उल्टा बात को और ज़्यादा कुरेद रहा था..

विकी झल्लाते हुए गाड़ी से उतर गया.. टफ भी उतर कर उसके पास चला गया...," किस'से भागने की कोशिश कर रहा है तू.. मुझसे? या अपने आप से..? कहाँ तक भाग सकता है भाग ले..

"विकी प्यार नही करता.. बस! मेरी लाइफ में प्यार के कोई मायने नही हैं.. मैं अपने लिए जीता था.. जीता हूँ.. और जियूंगा... ! मुझे वापस छ्चोड़ दे.. मुझे गाड़ी लेकर कहीं जाना है.. अभी.." विकी बिफर उठा.. अपने आप से ही..

"ठीक है.. नो प्राब्लम! चल आ.. वापस छ्चोड़ देता हूँ.." टफ ने उसको एक बार भी रुकने के लिए नही बोला... गाड़ी में बैठे और वापस थाने पहुँच गये..

" एक बात मानेगा?" विकी ने टफ से कहा..

"हां बोल!"

"मुझे एक बार और मुरारी से मिलने दे... अकेले में.. मुझे कुच्छ ज़रूरी बात करनी हैं.. आख़िरी बार.." विकी ने कहा..

"तू एक मिनिट यहीं ठहर.. मैं आता हूँ.." कहकर टफ ऑफीस में गया और कुच्छ देर बाद वापस आया," चल तू ऑफीस में बैठ.. मैं मुरारी को वहीं भेजता हूँ.."

"ठीक है.." कहकर विकी ऑफीस में जाकर बैठ गया...

कुच्छ देर बाद बदहाल मुरारी भी वहीं आ पहुँचा," क्या यार.. तूने मेरी मा चुदवा दी.. देख कितने मच्च्छार काट चुके हैं.."

"काम की बात कर.. स्नेहा तुझे कल ही मिल जाएगी.. बोल पैसे कहाँ दे रहा है..?" विकी ने कहा...

"जहाँ तू मुझे स्नेहा देगा.. वहीं.. टाइम भी तेरा.. जगह भी तेरी..." मुरारी ने दाँत पीसते हुए कहा....

"ठीक है.. कल शाम 6 बजे.. पानीपत से देल्ही की और जो दो नहरें जाती हैं.. बवाना से कुच्छ पहले उन्न दोनो नहरों के बीच मिलते हैं... कैसे करना है.. ये तुम बता दो.." विकी ने कहा..

"ओके! मेरे पास ऐसा प्लान है जिसमें हम में से कोई चीटिंग नही कर सकता.." और मुरारी प्लान बताने लगा...

सच में ही प्लान फुलप्रूफ था.. कहीं चीटिंग करने की गुंजाइश ना थी.. या तो दोनो पार्टियों को अपना अपना 'माल' मिल जाएगा.. या किसी को भी कुच्छ नही...," लाओ.. तुम्हारे फोन से अभी फोन कर दूं.. अपने किसी खास को.. बांके को तो तुम छ्चोड़ ही दोगे ना..." मुरारी ने कहा...

"हां.. जाते ही.."

विकी ने फोन ऑन करके मुरारी को दे दिया......

मुरारी ने फोन करके अपने किसी आदमी को सबकुच्छ समझा दिया.. और बाद में कहा," याद रखना.. मेरी जमानत होने तक किसी को भी खबर नही होनी चाहिए की स्नेहा हमारे पास है.. उसको क़ैद करके रखना है... समझ गये ना...!"

"यस सर..!"

"लो.. हो गयी बात!" मुरारी ने विकी को फोन दे दिया....

विकी बिना कोई शब्द बोले ऑफीस से बाहर निकल गया.. वह जाते हुए टफ से भी नही मिला....

विकी मुश्किल से 5 मिनिट ही चला था की उसका फोन बज उठा..

"ओह! फोन ऑफ करना तो भूल ही गया था.. उसने फोन उठाकर देखा.. कोई अंजान नंबर. था.. विकी ने फोन वापस डॅशबोर्ड पर रख दिया... कॉल स्नेहा की हो सकती थी...

बेल बंद हो जाने के बाद वह फोन को उठाकर ऑफ करने ही वाला था कि फिर से उसी नंबर. से कॉल आ गयी... कुच्छ सोचते हुए उसने फोन उठा लिया," हेलो!"

स्नेहा फोन लेकर बाहर भाग आई," जान! कहाँ रह गये तुम? मैं मर जाती तो?"

अचानक विकी को कुच्छ सूझा ही नही," मैं आकर बतौन्गा सानू.. तुम्हे नही पता मेरे साथ क्या हुआ..?"

"है राम! क्या हुआ.. तुम ठीक तो हो ना..?" स्नेहा ने अपने दिल पर हाथ रखकर पूछा... उसकी धड़कने बढ़ गयी थी...

"हां, अभी मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. तुम चिंता ना करो..!"

"अब आ रहे हो ना मेरे पास..?" स्नेहा का दिल खुशी के मारे धड़क रहा था...

" तुम ठीक तो हो ना..?" विकी को ताज्जुब हुआ.. यूँही उसकी आँखें नम हो गयी थी..

"हां मैं बिल्कुल ठीक हूँ.. वीरू और राज भैया बहुत अच्छे हैं.. पता है.. मैने अपनी जिंदगी मैं पहली बार रक्षाबन्धन मनाया है.. मैने दोनो को राखी बँधी..... कितनी देर में आ रहे हो...?" स्नेहा फूली नही समा रही थी..

"अब नही आ सकता मैं.. कल आउन्गा.. बहुत दूर हूं.. और गाड़ी भी नही है मेरे पास..." विकी ने झूठ बोला..

स्नेहा मायूस हो गयी," हां.. गाड़ी तो मेडिकल में ही खड़ी है ना..?"

"हां.. अब रखूं..?" विकी ने कहा..

"नआईईई.. कुच्छ देर और बात करो ना... प्लीज़.. तुम्हे पता है.. तुमसे बात करते ही 'तुम्हारी चिड़िया' उच्छलने लगी है.. इसका क्या करूँ..?"

"मेरी चिड़िया..? क्या मतलब?? " विकी की कुच्छ समझ में नही आया..

"इसको तुमने चिड़िया ही तो कहा था.. छ्होटी सी..?" स्नेहा ने अपनी जांघें कस ली और उस 'चिड़िया' को फुदकने से रोकने की कोशिश करने लगी..

"श.. अच्च्छा.. हा हा हा" विकी फीकी सी हँसी हंसते हुए बोला..," कल आ रहा हूँ. ना.. अब फोन रख दो... मैं बहुत परेशान हूँ.. इस वक़्त.."

"अच्च्छा.." स्नेहा ने मुँह बना लिया... पर अचानक उसके चेहरे की रौनाक़ लौट आई," याद है ना तुमने क्या वादा किया था..?"

विकी का चेहरा मुरझा गया," हां याद है.. अब रख दो फोन.."

"हां हां रखती हूँ.. पहले बोलो.. आइ लव यू!" स्नेहा फोने रखना ही नही चाह रही थी...

" रखो ना यार फोन.. कह तो रहा हूँ.. कल आ जाउन्गा.." कहकर विकी ने फोन काट दिया....

स्नेहा कुच्छ देर यूँही फोन को देखती रही.. फिर अंदर जाते ही बोली," मोहन बहुत परेशान है.. वो किसी प्राब्लम में है.. अच्छे से बात भी नही कर पाया... आज आएगा भी नही..."

"तुम्हे यहाँ कोई दिक्कत है?" वीरू ने पूचछा...

"नही तो.. मैं तो यहाँ बहुत खुश हूँ.." स्नेहा ने चहकते हुए कहा..

"फिर क्यूँ चपर चपर लगा रखी है... चल आजा शतरंज खेलते हैं.." वीरू ने कहा.. एक ही दिन में वो कितना घुलमिल गये थे...

"अभी लाई.. दिन वाली बाज़ी का बदला भी लेना है मुझे.." कहते हुए स्नेहा ने चेस-बोर्ड उठाया और वीरू के पास बेड पर बाज़ी जमा दी... उसका अहसास तक नही था.. कि कोई उसको भी ऐसे ही चल चुका है.. जिंदगी की बिसात पर.. और वहाँ हारते ही मौत है.. सिर्फ़ मौत...

"जब से मैं स्कूल से आया हूँ.. तुम लोगों ने एक भी अक्षर पढ़ने नही दिया है.. तुम दोनो चाहते क्या हो आख़िर?" राज अपने बिस्तेर पर खीजा हुआ बैठा था.. स्कूल से आने के बाद दोनो ने उसके खूब मज़े लिए थे... प्रिया का जिकर कर कर के!

"ओहो.. राज भैया.. हमें पता है.. आजकल आप पढ़ तो यूँ भी नही रहे.. यहाँ आकर मेरी मदद करो ना.. आपका दिल भी लग जाएगा.." स्नेहा के साथ मिलकर वीरू ने भी ज़ोर का ठहाका लगाया...

"आख़िर तुम लोग चाहते क्या हो यार..? ठीक है.. लो! बंद कर दी किताब.." राज ने किताब बंद करके टेबल पर रखी और उनके साथ ही बेड पर आ बैठा," चल घोड़ा चल... घोड़ाआ चल चुहिया.. मरवाएगी क्या रानी को!!!!!"

स्नेहा को ग़लती का अहसास हो गया," थॅंक यू भैया.. तुम कितने अच्छे हो.. तुम साथ बैठे रहे तो मैं जीत ही जाउन्गि.. पर अपना ध्यान सामने वाली खिड़की मैं मत लगा लेना.." राज को छेड़ने का कोई मौका दोनो हाथ से नही जाने दे रहे थे...

"मैं तुम्हे कितनी बार बता चुका हूँ कि ऐसा कुच्छ नही है... अगर थोडा बहुत कुच्छ था भी तो वो कल ख़तम हो गया.. अब बंद करो यार इश्स टॉपिक को.. और कुच्छ नही है क्या बात करने को..?" राज ने कहा..

"जब तक तुम सच सच नही बता देते की कल रात तुम्हारी कितनी पिटाई हुई, हम तुम्हारा पीछा नही छ्चोड़ने वाले.. क्यूँ स्नेहा?" वीरू ने कहा...

"सही बात है भाई.. बिल्कुल सही बात है ये तो हो हो... हा हा.. और ये गयी तुम्हारी रानी... मैं जीत गयी.. वाउ.." स्नेहा खड़ी होकर कूदने लगी...

"जा मुँह धोकर आ पहले.. हाथी भी कभी टेढ़ा चलता है..?" वीरू ने हंसते हुए कहा...

"मैं नही खेलती.. बकवास गेम है..!" कहते हुए स्नेहा ने सारे प्यादे बिखरा दिए," बताओ ना राज.. क्या हुआ तुम्हारे साथ कल.. प्लीज़ बता दो.. हम हँसेंगे नही.. प्रोमिस! है ना भैया!" स्नेहा ने वीरू की और देखा और दोनो एक बार फिर खिलखिला पड़े...

Tough jaise hi wapas office mein aaya, Murari ki halat dekhkar wo apni hansi nahi rok paya.. wo murari ko baithne ko bolkar gaya tha.. aur murari theek usi jagah jakar neeche baitha huaa tha jis jagah par kuchh minute pahle wo do aadmi baithe thhe.. bilkul usi andal mein.. shareef aadmiyon ki tarah... uske dono hath ghutno par rakhe huye thhe..

" yahan aa jao.. upar.. kursi par.." Tough ne apni kursi par jamte huye kaha....

Murari ki jaan mein jaan aayi.. wo toh ye soch raha tha ki uske sath bhi ab kuchh aisa hi hone wala hai.. par abhi bhi uske dil ko poori tasalli nahi huyi thi..," aap kaho toh main toh neeche bhi baith jaaunga.. inspector........ sahab! main toh jameen se juda huaa aadmi hoon.." Murari ne thhook gatka....

"haan.. tumhari jameen kal dekh li thi.. rahi sahi.. aaj rat ko dekh lenge.." Tough ne muskurate huye kaha..

"kkkk.. kya matlab...?" Murari sihar utha...

"kuchh nahi.. kisi aadmi ka fone aaya tha.. kah raha tha..."

Murari ki aankhein chamak uthhi..," Delhi se aaya tha kya fone????"

"Delhi walon ko bhool jao murari.. darasal unke kahne par hi aapki hawa tight ki gayi hai.. party aapki wajah se apni chhawi badnaam nahi karna chahti.. khair jiska bhi fone aaya tha.. kah raha tha ki usko pata hai ki iss waqt tumhari beti kahan hai..?" Tough ne wahan rakhe ek gilas pani se apna gala tar kiya.. .

"pls inspector sahab.. mujhe uss aadmi se milwa dejiye.. main bhi pareshan hoon.. apni beti ke liye... chahe aap jo bhi kharcha pani kahein.. main dene ko taiyaar hoon...

tough ne uski baat ko najarandaj karke apni baat jari rakhi...," uska naam vicky hai.. maine usko bulwaya hai.. wo bus aane hi wala hoga..."

"Vicky koun.. Rohtak wala.. jo virodhi party mein wahan se ticket ka dawedaar hai..?" Murari ke dimag mein khalbali mach gayi...

"wo mujhe nahi pata.. par haan.. hai wo rohtak se hi.." Tough ne anjan bante huye kaha..

"wahi hoga jaroor.. uski hi sajis hai ye.. kisi ne meri beti ko uske sath dekha bhi tha.. wardaat wale din.. inspector sahab.. usne meri beti ko behla rakha hai.. aap yakin kijiye..." Murari kursi par baitha baitha haanfne laga.. ek hi saans mein wo ye sab bol gaya tha....

"main toh yakeen kar bhi loon.. par court toh saboot maangega.. aur tumhari beti ke bayan tumhare khilaf hai.. fir bhi chalo.. aane do.. dekhte hain baat karke..." tough ne kaha hi tha ki darwaje par Rajesh prakat hua," Janab.. koyi vicky aaya hai.. kah raha hai.. aapse milne ka time maanga hai...

"Bhej do usko andar...!" tough ne kaha... Murari ka chehra tamtama uthha...

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"Namaskar janab!" vicky ne office mein dakhil hote huye kaha...

"namaskar! kya tum hi...."

"ji haan janab.. main hi vicky hoon.. ye mujhe achchhi tarah se jaante hain..! kyun neta ji..?" Vicky ne murari ki aur aankh daba di..

"Inspector sahab..! mujhe 100 pratishat visvash hai ki yahi aadmi meri barbadi ke pichhe hi hai.. aap isko abhi giraftaar kar lijiye.. main bekasoor hoon.." ro hi toh pada tha murari....

"tum faisla suna rahe ho ki rai de rahe ho...?" Tough ne deewar ke sath kursi sarkate huye kaha.....

"nahi inspector sahab.. main faisla kaise suna sakta hoon.. faisla karne wale toh aap hain.. fir bhi main yakeen ke sath kah sakta hoon ki iske peechhe isika hath hai.. isne meri beti behka li.. mujhe badnaam kar diya...." Murari ko tough ne beech mein hi tok diya...

"aur shalini.. uske kapde bhi isi ne faade thhe kya?"

"wwo.. main behak gaya tha.. gusse main tha main.. mujhe maaf kar do inspector saheb.. main shalini bitiya se bhi maafi maang loonga.." Murari ne kaha..

vicky Murari ka ye dabbu roop dekhkar mushkil se apni hansi rok pa raha tha.. inspector sahib ko ijjat jo bakhsani thi..

"haan toh vicky ji.. kya kahna hai aapka..?" tough vicky se mukhatib huaa...

"yahi ki mujhe pata hai ki iski ladki iss waqt kahan hai.. wo police ke paas aur court mein apne bayan dena chahti hai.. isi silsile mein kisi ne mujhse contact kiya tha..." vicky bol hi raha tha ki Murari beech mein tapak pada..

"nahi inspector sahab.. iski sari baatein jhoothi hain.. isne khud ye drama racha hai aur ab yahan mujhe blackmail karne aaya hai..."

"tum chup ho jawoge ya mujhe tumhe hawalat mein bhejna padega...?" tough ne rukhi aawaj mein Murari se kaha," main koyi pagal toh nahi hoon.. main poochh raha hoon na sab kuchh.."

"ji!" murari bheegi billi ban gaya...

"haan toh vicky ji... ye blackmailing ka kya funda hai.." Tough ne vicky se poochha...

"kuchh nahi hai janab! main isko blackmail kyun karunga.. iss jaise logon ki toh main shakal bhi dekhna nahi chahta.. main toh sirf aapko jaankari dene aaya tha.. wo bhi isiliye ki khud iski beti aisa chahti hai..." Vicky ne sahaj bhav se kaha...

"hummm.. to kahan hai ladki.. chaliye uske bayan lekar court mein pesh kar dete hain.. ye apne aap bhugtega..!" Tough ne Vicky se kaha.. karya wahi ek tarfa chal rahi thi.. har taraf se Murari ko dabaya aur daraya ja raha tha..

"chaliye.. main toh isi kaam se aaya hoon..!" Vicky khada ho gaya...

"ek minute.. daroga ji.. kya main vicky se akele mein baat kar sakta hoon.." Murari ko kuchh samajh nahi aa raha tha.... uska dimag khisak chuka tha...

"kar lijiye.. mujhe kya hai.. hum toh dilon ko jodne ka hi kaam karte hain.. basharte.. vicky ji ko koyi aitraj na ho toh..." kahkar Tough ne vicky ki aur dekha...

"nahi.. mujhe iss ghatiya insaan se koyi baat nahi karni.. main toh roj duaa karta tha ki iska asli chehra duniya ke saamne aaye... isko 10 saal se kum toh kya saja hogi ab.. hai na janaab?" vicky ne tirchhi najron se Murari ka chehra dekhte huye kaha...

"haan.. agar iski beti ne aur shalini ne court mein iske khilaf bayan de diye toh ye nahi bach sakta.. haan agar...!" Tough ne baat adhoori chhod di...

"agar kya.. inspector sahab.. main kuchh bhi karne ko taiyar hoon.. mujhe bacha lijiye pls.. main aapke paanv padta hoon.. main koyi bhi keemat dene ko taiyar hoon..!" Murari kursi se uthh gaya...

"Main na toh aapko saja se bacha sakta hoon aur na hi saza dilwa sakta hoon.. waise meri aapse poori humdardi hai.. aakhir aapke neeche rahkar hi toh hamein kaam karna hai sari umar.. par sab kuchh unn ladkiyon ke hi hathon mein hai..." Tough ne nakli sahanubhooti darshate huye kaha...

"par ek toh aapke paas hi hai na.. kum se kum usko toh samjha dijiye.." Murari gidgida utha tha..

"ek se kya hoga.. saja toh dono ki ek sath hi milni hai.. agar tumhari ladki wala maamla sulajhta hai toh main koshish kar sakta hoon.. par wo maamla tabhi sudhar sakta hai jab aapki ladki bayan na de.. ya media ko diye bayano se mukar jaye.." Tough ne usko iss uljhan se bahar nikalne ka raasta sujhaya.. aur bahar nikalne ki chabi sirf Vicky ke paas hi thi..

"main apni beti ko kaise bhi karke chup kara doonga.. aap mujhe uss'se milwa dijiye.." Murari hath jodkar gidgidaya..

"Milwa dijiye Vicky ji.. agar aap theek samjhe.. bechre ka bhala ho jayega.. waise mujhe koyi dikkat nahi hai...." Tough ne chutki li...

iss'se pahle vicky kuchh bolta.. Murari uske pairon mein gir pada..," Vicky bhai.. ek baar baat kar lo pls.. main tumhe kabhi hulke main najar nahi aaunga.. aur bolo..."

vicky apna man sa banane ki acting karta hua tough se bola," Theek hai janab.. agar aapko bhi yahi sahi lagta hai toh main baat kar leta hoon.. akele mein...!"

"theek hai.. tum yahin baitho.. mujhe kisi kaam se bahar jana hai.. main aadhe ghante mein aata hoon.. " kahkar tough bahar nikal gaya..

Murari bhikhari ki tarah vicky ke chehre ko taakne laga...

"haan.. bol Murari!" Vicky ne Murari ko ghoora...

"tu toh mujhse bhi bada kamina nikla re.. seedhe matlab ki baat par aaja.. bata.. meri beti mujhe sounpne ka kya lega?" Murari ki aawaj mein gussa aur bebasi saaf jhalak rahi thi...

"wo multiplex!" vicky ne do took jawab diya..

" ja le le... badle mein Sneha mujhe mil jayegi na...." Murari ne kaha..

"maine kya uska aachar daalna hai? jahan chahe chali jaye.. mujhe kya? waise bhi main toh ladki ko ek baar hi use karta hoon...." Vicky ne cigarettee nikal kar sulga li...

"na.. na.. mujhe chahiye.. wo haramjadi... manjoor ho toh bolo..." Murari ka chehra nafrat aur kadwahat se bhar uthha...

" tujhe main bata doon ki wo tere paas rahna nahi chahti.. nafrat karti hai tujhse.. teri shakal bhi dekhna nahi chahti... .. bayan mein nahi hone doonga.. meri guarantee..fir tu kya karega uska ?" Vicky ne uski aankhon mein jhankte huye kaha..

Murari ki aankhein laal ho gayi.. nathune fool gaye aur kisi bhediye ki tarah gurrane laga," Uska wahi karronga jo uski maa ka kiya tha.. sali kutiya... behan chod.. usko nangi karke apne saamne chudwaaunga... fir jangli kutton ke aage daal dunga.. usne sari duniya ko bata hi diya ki wo meri aulad nahi hai... ek baar mujhe sounp de bus.. bol manjoor hai ki nahi...?"

Vicky ke jahan se ek lambi saans aah ke roop mein nikli.. kaisa hai Murari? Aadmi hai ya bhediya.. kuchh minute ke moun ke baad bola..," majoor hai.. ladki tumhe mil jayegi.. mujhe multiplex ke kagaj milne ke baad..."

"to fir milao hath.. tum apna fone do.. main abhi uske malik ko fone karta hoon.. tum chaho toh kal hi usko paise dekar multiplex apne naam karwa sakte ho..." Murari ne vicky ka hath apne hath main pakad liya...

vicky ne apna hath chhudwaya aur jor jor se hansne laga...," tu kya samajhta hai.. maine itni mehnat sirf tujhse no objection certificate lene ke liye ki hai.. nahi! wo toh main kabhi bhi uski kanpati par rivolver rakhkar khareed sakta tha... ab wo multiplex tu khareed kar mujhe dega.. yani paise tere honge.. aur maal mujhe milega..!"

"matlab tu samajhta hai ki main apne paas se tujhe 8 karod rupaiya doonga... ?" Murari ne hairat se uski aur dekha...

"8 nahi 10 karod.. aur mujhe pata hai ki tu dega.. kyunki 10 karod ganwane 10 saal jail mein kaatne se kahin jyada aasan hai tere liye.. 10 saalon mein toh tu pata nahi kitne 10 karod kama lega...!" Vicky ne katil muskaan Murari ki aur fainki...

Murari ne apna sir table par rakh liya aur kuchh der udhedbun mein pada raha... fir achanak uthkar bola," main sirf 8 karod doonga.. aur mujhe wo loundiya hath ke hath chahiye.. bol kab de sakta hai...?"

"jab tum chaho.. par abhi toh tumhari 14 din ki police custody hai na?" vicky ne Murari se sawaal kiya...

"tumhe jab chahe paise mil jayenge.. tum batao.. kab la sakte ho Sneha ko..?" Murari ne sawaal par sawaal mara...

" main baanke ko bata doonga...! sochkar.." Vicky ne ajjeb se andaj mein baanke ka naam liya...

"baanke... tum baanke ko kaise jaante ho?" Murari chounk kar uchhal pada....

"kyun hairani huyi na... Mujhe kidnap karne kuchh chooson ko sath lekar aaya tha.. abhi mere gusalkhane mein kaid hain teeno.. agar tum aaj nahi maante toh tum par ek case aur lagna tha.. " Vicky jor jor se hansne laga....

tabhi tough ne office mein pravesh kiya..," lagta hai kuchh soudebazi ho gayi tum dono ki...?"

"nahi.. inspector sahab.. hum dono mein kuchh galatfahmiyan thi.. jo aaj sath baithne se door ho gayi.. waise vicky ji kah rahe hain ki ye Sneha ko manane ki koshish karenge... apne bayan wapas lene ke liye.. kyun vicky ji?" Murari ne baat sapast ki...

"haan murari ji.. " aur kahte huye vicky ne tough ki aur aankh mari...

"Rajesh!" Tough ne aawaj lagayi....

"ji janab.."

"neta ji ko poori ijjat se hawalat mein chhod aao.. subah milte hain inse.. inka khayal rakhna..." Tough ne vyangya kiya...

"inspector sahab.. agar bura na mano toh.. main yahin so jaaoon... wahan machchhar aur garmi jaan nikal dete hain..."

"aap chinta na karein neta ji.. sarkaar kuchh hi dinon mein hawalat mein bhi AC lagwane par vichar kar rahi hai... tab tak pls.. kisi tarah se kaat lein...!" tough ne muskurate huye kaha...

"kab.. ye kaise ho sakta hai..? Murari ko visvas nahi hua..

"ho kyun nahi sakta neta ji.. aajkal hawalat mein aate hi neta log hain.. fir kuchh na kuchh toh sarkar ko sochna hi padega.." Tough ne kaha aur Rajesh ko use wahan se le jaane ko kaha....

"tu bura fansega kisi din..!" Murari ke jate hi tough ne vicky ko aage badhkar gale laga liya...," ho gaya tumhara kaam?"

Vicky kuchh na bola.. aankh band hote hi usko Sneha ka masoom sa chehra dikhayi diya.. wo bilkul nangi padi thi.. jangli kutton ke beech.....

Tough aur vicky dono thane se nikal kar tough ke ghar ki aur chal pade.. lagbhag sare raste Vicky chup hi raha...

"kya baat hai.. tumhe multiplex mil toh gaya na? ya kuchh adachan hai.. ?" Tough ne usko gumsum baithe dekh kaha....

"hummm... haan.. mil jayega!.......... koyi adachan nahi hai..ab!" vicky ne lambi gahri saans chhodi...

"fir bhi tu pareshan lag raha hai.. kya baat hai yaar...? bata toh!" tough ne uska chehra dekhte huye poochha...

"nahi... kuchh nahi hai... kuchh bhi toh nahi.. bus murari ka chehra dekhkar hi ultiyan si aane lagti hain.. bahut kamina hai saala.. sou kutte markar ye 'ek' paida hua hoga..." Vicky ke jabde bhich gaye.. par wo aadhi baat man mein hi pi gaya.. kaise batata ki wo bhi iss baar 'uske' kaminepan mein hissedar hone wala hai... Sneha ko use sounpkar...'" bus! bahut ho gaya.. ye aakhiri baar hai..!" achanak vicky ke munh se nikla...

"kya bahut ho gaya? kya aakhiri baar hai? kahan atka huaa hai bhai...?" Tough ne gadi rok di...

"bus yaar.. ye politics.. bahut hi kutti cheej hai.. soch raha hoon.. chhod doon.. jane kya kya karwati hai sali... Bus ye multiplex mil jaye.. uske baad mein apne baare mein sochunga..." Vicky ki tabiyat si kharaab ho gayi thi.. usko apna shareer toot'ta hua lag raha tha...

"ek baat toh bata yaar.. Sneha bayan nahi deti ... theek hai... par kya tu usko sachchayi batayega? kyunki aaj nahi toh kal usko wapas jane par pata lag hi jayega.. sachchayi ka... fir kya wo tujh par ulta case nahi thhok degi....?" Tough ko poori baat ka gyan nahi tha...

"tu chhod na yaar.. sneha ko.. gadi chala.. mere sir mein dard hai..." Vicky ka sir pahle hi Sneha ke baare mein sochkar fata ja raha tha...

"aise sir dard karne se kaam thode hi chalega..? aage ka sochkar toh chalna hi padega... tune socha hai ki agar uske bayano ka munh teri taraf ghoom gaya toh kya hoga? Murari ki jagah tu mere thane mein baitha hoga.. aur main kuchh kar bhi nahi paaunga......." Tough ne pate ki baat kahi thhi...

"aisaa nahi hoga yaaaaaar.. tu samajhta kyun nahi hai.... wo kabhi aisa nahi karegi..?" Vicky jhallate huye bola.. tough usko baar baar anjane mein hi yaad dila raha tha ki Sneha ke sath kya hone wala hai...

"kyun.. kyun nahi karegi..?" tough ne fir uske dil ke taaron ko chheda..

"heyyy bhagwaaaaan... wo mujhse pyar karti hai.. mere liye mar sakti hai.. mar jayegi...! pls tu ye baat band kar de yaar..." Vicky ka antarman usko kachot raha tha...

"aur tu..??? tu nahi karta kya uss'se pyar? tujhe achchhi nahi lagti kya wo...? agar tu jindagi ke baare mein soch hi raha hai to wo kyun teri jindagi ka hissa nahi ho sakti...? tu hi toh kah raha tha bhai ke saamne.. ki aisi ladki tune aaj tak dekhi hi nahi..." Tough topic band karne ko taiyar hi nahi tha.. ulta baat ko aur jyada kured raha tha..

Vicky jhallate huye gadi se utar gaya.. tough bhi utar kar uske paas chala gaya...," kiss'se bhagne ki koshish kar raha hai tu.. mujhse? ya apne aap se..? kahan tak bhag sakta hai bhag le..

"vicky pyar nahi karta.. bus! meri life mein pyar ke koyi mayne nahi hain.. main apne liye jeeta tha.. jeeta hoon.. aur jiyunga... ! mujhe wapas chhod de.. mujhe gadi lekar kahin jana hai.. abhi.." Vicky bifar utha.. apne aap se hi..

"theek hai.. no problem! chal aa.. wapas chhod deta hoon.." Tough ne usko ek baar bhi rukne ke liye nahi bola... gadi mein baithe aur wapas thane pahunch gaye..

" ek baat maanega?" Vicky ne Tough se kaha..

"haan bol!"

"mujhe ek baar aur murari se milne de... akele mein.. mujhe kuchh jaruri baat karni hain.. aakhiri baar.." Vicky ne kaha..

"tu ek minute yahin thhahar.. main aata hoon.." kahkar tough office mein gaya aur kuchh der baad wapas aaya," chal tu office mein baith.. main murari ko wahin bhejta hoon.."

"theek hai.." kahkar vicky office mein jakar baith gaya...

kuchh der baad badhaal Murari bhi wahin aa pahuncha," kya yaar.. tune meri maa chudwa di.. dekh kitne machchhar kaat chuke hain.."

"kaam ki baat kar.. Sneha tujhe kal hi mil jayegi.. bol paise kahan de raha hai..?" Vicky ne kaha...

"jahan tu mujhe Sneha dega.. wahin.. time bhi tera.. jagah bhi teri..." Murari ne daant peeste huye kaha....

"theek hai.. Kal sham 6 baje.. panipat se delhi ki aur jo do nahrein jati hain.. bawana se kuchh pahle unn dono nahron ke beech milte hain... kaise karna hai.. ye tum bata do.." Vicky ne kaha..

"OK! mere paas aisa plan hai jismein hum mein se koyi cheating nahi kar sakta.." aur murari plan batane laga...

sach mein hi plan fulproof tha.. kahin cheating karne ki gunjayish na thi.. ya toh dono partiyon ko apna apna 'maal' mil jayega.. ya kisi ko bhi kuchh nahi...," lao.. tumhare fone se abhi fone kar doon.. apne kisi khas ko.. Baanke ko toh tum chhod hi doge na..." murari ne kaha...

"haan.. jate hi.."

Vicky ne fone on karke Murari ko de diya......

Murari ne fone karke apne kisi aadmi ko sabkuchh samjha diya.. aur baad mein kaha," yaad rakhana.. meri jamanat hone tak kisi ko bhi khabar nahi honi chahiye ki Sneha hamare paas hai.. usko kaid karke rakhna hai... samajh gaye na...!"

"yes sir..!"

"lo.. ho gayi baat!" Murari ne vicky ko fone de diya....

Vicky bina koyi shabd bole office se bahar nikal gaya.. wah jate huye tough se bhi nahi mila....

vicky mushkil se 5 minute hi chala tha ki uska fone baj uthha..

"oh! fone off karna toh bhool hi gaya tha.. usne fone uthakar dekha.. koyi anjaan no. tha.. vicky ne fone wapas dashboard par rakh diya... call Sneha ki ho sakti thi...

bell band ho jane ke baad wah fone ko uthakar off karne hi wala tha ki fir se usi no. se call aa gayi... kuchh sochte huye usne fone utha liya," Hello!"

Sneha fone lekar bahar bhag aayi," jaan! kahan rah gaye tum? main mar jati toh?"

achanak vicky ko kuchh soojha hi nahi," main aakar bataunga Sanu.. tumhe nahi pata mere sath kya huaa..?"

"hai Ram! kya hua.. tum theek toh ho na..?" Sneha ne apne dil par hath rakhkar poochha... uski dhadkane badh gayi thi...

"haan, abhi main bilkul theek hoon.. tum chinta na karo..!"

"ab aa rahe ho na mere paas..?" Sneha ka dil khushi ke maare dhadak raha thha...

" tum theek toh ho na..?" vicky ko tajjub hua.. yunhi uski aankhein nam ho gayi thi..

"haan main bilkul theek hoon.. Viru aur Raj bhaiya bahut achchhe hain.. pata hai.. maine apni jindagi main pahli baar rakshabandhan manaya hai.. maine dono ko rakhi bandhi..... kitni der mein aa rahe ho...?" Sneha fooli nahi sama rahi thi..

"ab nahi aa sakta main.. kal aaunga.. bahut door hoon.. aur gadi bhi nahi hai mere paas..." Vicky ne jhooth bola..

Sneha mayoos ho gayi," haan.. gadi toh medical mein hi khadi hai na..?"

"haan.. ab rakhoon..?" vicky ne kaha..

"nayiiiii.. kuchh der aur baat karo na... pls.. tumhe pata hai.. tumse baat karte hi 'tumhari chidiya' uchhalne lagi hai.. iska kya karoon..?"

"meri chidiya..? kya matlab?? " vicky ki kuchh samajh mein nahi aaya..

"isko tumne chidiya hi toh kaha tha.. chhoti si..?" Sneha ne apni jaanghein kas li aur uss 'chidiya' ko fudakne se rokne ki koshish karne lagi..

"ohh.. achchha.. ha ha ha" vicky feeki si hansi hanste huye bola..," kal aa raha hoon. na.. ab fone rakh do... main bahut pareshan hoon.. iss waqt.."

"achchha.." Sneha ne munh bana liya... par achanak uske chehre ki rounaq lout aayi," yaad hai na tumne kya wada kiya tha..?"

Vicky ka chehra murjha gaya," haan yaad hai.. ab rakh do fone.."

"haan haan rakhti hoon.. pahle bolo.. I love you!" Sneha fone rakhna hi nahi chah rahi thi...

" rakho na yaar fone.. kah toh raha hoon.. kal aa jaaunga.." kahkar vicky ne fone kaat diya....

Sneha kuchh der yunhi fone ko dekhti rahi.. fir andar jaate hi boli," Mohan bahut pareshan hai.. wo kisi problem mein hai.. achchhe se baat bhi nahi kar paya... aaj aayega bhi nahi..."

"tumhe yahan koyi dikkat hai?" Viru ne poochha...

"nahi toh.. main toh yahan bahut khush hoon.." Sneha ne chahakte huye kaha..

"fir kyun chapar chapar laga rakhi hai... chal aaja shatranj khelte hain.." viru ne kaha.. ek hi din mein wo kitna ghulmil gaye thhe...

"abhi laayi.. din wali baazi ka badla bhi lena hai mujhe.." kahte huye Sneha ne chess-board uthaya aur Viru ke paas bed par baazi jama di... uska ahsaas tak nahi tha.. ki koyi usko bhi aise hi chal chuka hai.. jindagi ki bisaat par.. aur wahan haarte hi mout hai.. sirf mout...

"jab se main school se aaya hoon.. tum logon ne ek bhi aksar padhne nahi diya hai.. tum dono chahte kya ho aakhir?" Raj apne bister par khija huaa baitha tha.. school se aane ke baad dono ne uske khoob maje liye thhe... Priya ka jikar kar kar ke!

"oho.. Raj bhaiya.. hamein pata hai.. aajkal aap padh toh yun bhi nahi rahe.. yahan aakar meri madad karo na.. aapka dil bhi lag jayega.." Sneha ke sath milkar viru ne bhi jor ka thahaka lagaya...

"aakhir tum log chahte kya ho yaar..? theek hai.. lo! band kar di kitab.." Raj ne kitab band karke table par rakhi aur unke sath hi bed par aa baitha," chal ghoda chal... Ghodaaa chal chuhiya.. marwayegi kya Rani ko!!!!!"

Sneha ko galati ka ahsaas ho gaya," thank you bhaiya.. tum kitne achchhe ho.. tum sath baithe rahe toh main jeet hi jaaungi.. par apna dhyan saamne wali khidki main mat laga lena.." Raj ko chhedne ka koyi mouka dono hath se nahi jane de rahe thhe...

"main tumhe kitni baar bata chuka hoon ki aisa kuchh nahi hai... agar thoda bahut kuchh tha bhi toh wo kal khatam ho gaya.. ab band karo yaar iss topic ko.. aur kuchh nahi hai kya baat karne ko..?" Raj ne kaha..

"jab tak tum sach sach nahi bata dete ki kal raat tumhari kitni pitayi huyi, hum tumhara peechha nahi chhodne wale.. kyun Sneha?" Viru ne kaha...

"sahi baat hai bhai.. bilkul sahi baat hai ye toh ho ho... ha ha.. aur ye gayi tumhari Rani... main jeet gayi.. wow.." Sneha khadi hokar koodne lagi...

"ja munh dhokar aa pahle.. hathi bhi kabhi tedha chalta hai..?" viru ne hanste huye kaha...

"main nahi khelti.. bakwas game hai..!" kahte huye Sneha ne sare pyade bikhra diye," batao na Raj.. kya huaa tumhare sath kal.. pls bata do.. hum hansenge nahi.. promice! hai na bhaiya!" Sneha ne viru ki aur dekha aur dono ek baar fir khilkhila pade...
 
गर्ल्स स्कूल पार्ट --46

हेलो दोस्तो उधर रिया ओर प्रिया की बात सुनते है वह दोनो इस टाइम क्या कर रही हैं

" रिया?"

"हूंम्म्म.." रिया ने किताब से नज़र हटा कर प्रिया की और देखा..

"मैने राज के साथ बहुत ग़लत किया ना?" प्रिया सारा दिन उदास बैठी रही थी.. स्कूल में भी.. घर में भी..

"अब भूल भी जा बात को.. कुच्छ नही होगा.. एक दो दिन में सब ठीक हो जाएगा.." रिया ने उसको दिलासा दी...

"मुझे नही लगता! वो मुझसे नफ़रत करने लगा है.. आज मेरी और क्लास में एक बार भी नही देखा.." प्रिया पागल सी हो गयी थी.. राज के लिए..

"अच्च्छा.. तुझे कैसे पता..?" रिया ने सवाल किया....

प्रिया उठकर रिया के पास आकर बैठ गयी," मैं आज सारा दिन उसी को देख रही थी.. एक अक्षर भी नही पढ़ा स्कूल में आज!"

" वीरेंदर आज स्कूल क्यूँ नही आया..?" रिया ने अपने वाले की बात छेड़ दी..

"अब मुझे क्या पता? राज से पूच्छ लेती.." प्रिया ने कहा...

"वो तो तुझे पूच्छना चाहिए था.. एक बात बटाओ?" रिया ने इस अंदाज में अपने होंटो को गोल करके कहा मानो वह बहुत बड़ा राज खोलने वाली है...

"क्या?" प्रिया गौर से उसके चेहरे को देखने लगी...

"वो लड़की जिसको हुमने आज सुबह खिड़की से देखा था... इनमें से किसी की भी बेहन नही हो सकती..!" रिया ने खुलासा किया..

"क्या कह रही हो.. तो फिर कौन हो सकती है..?" प्रिया के दिल पर साँप सा लेट गया..

"ये तो मुझे नही पता.. पर बेहन तो इनमें से किसी की है ही नही.. मुझे आज फॅमिली रेकॉर्ड वाला रिजिस्टर ऑफीस में रखकर आने को बोला था, सैनी सर ने.. मैने दोनो का रेकॉर्ड चेक किया था.. दोनो में से किसी की कोई बेहन नही है..!" रिया ने अपने विस्वास की वजह बताई....

"तुम कहना क्या चाहती हो? प्लीज़ मुझे डराव मत.." प्रिया जाने क्या सोचकर डर गयी थी..

"अच्च्छा हुआ.. जो मैं कहना चाहती हूँ.. तुम बिना कहे ही समझ गयी... जमाना बहुत खराब है प्रिया.. आज कल ये लड़के रूम्स पर गंदी लड़कियों को लाते हैं.." रिया ने तो प्रिया की साँस ही रोक दी..

"पर वो तो बहुत ज़्यादा सुंदर थी?" प्रिया ने भोलेपन से कहा...

"अरे मैं कॅरक्टरवाइज़ 'गंदी' बोल रही हूँ.. शकल सूरत से क्या होता है..? आज कल अच्छे घरों की लड़कियाँ भी उपर के खर्चे के लिए 'ग़लत काम' करती हैं.. तुमने कभी सुना नही क्या?" रिया अपने मन में जाने क्या क्या ख़याली पुलाव पका रही थी...

प्रिया ने सहमति में सिर हिलाया," हां... सुना तो है!... पर राज ऐसा नही हो सकता.. नही.. मैं नही मानती...मेरा राज ऐसा नही हो सकता!" प्रिया ने खुद को दिलासा देने की कोशिश की... पर उसका दिल बैठ गया था..

"तुम क्या कहना चाहती हो? वीरेंदर है ऐसा.. वो तो बिल्कुल नही हो सकता.. वो तो लड़कियों की तरफ देखता भी नही.." रिया ने अपने वाले का पक्ष लिया.. बातों ही बातों में वो भूल चुकी थी की उनकी बात सिर्फ़ शक और कल्पना पर शुरू हुई थी...

" तो राज भी ऐसा नही हो सकता.. उसकी गॅरेंटी मैं लेती हूँ..." प्रिया ने ताल ठोनकी..

"क्यूँ नही हो सकता.. वो इतना शरीफ भी नही है.. जितना तुझे लगता है.. तुझे एक बात बताऊं.. कल रात उसने मुझे चुटकी काटी थी.. यहाँ पर.. मैने तुझे ऐसे ही नही बताया..." रिया ने अपने पिच्छवाड़े पर हाथ लगाकर बताया...

प्रिया ये भूल गयी की कल रात उसने खुद को राज के सामने रिया बताया था..," नही.. तू झूठ बोल रही है.. हो ही नही सकता.. झूठ बोल रही है ना.. सच सच बता प्लीज़!"

रिया ने प्रिया के सिर पर हाथ रख दिया," सच्ची.. तुम्हारी कसम.. काटी थी..!"

"यहीं पर?" प्रिया ने अपने नितंबों को छ्छू कर कहा..

"हां!"

"तो तूने उसको थप्पड़ क्यूँ नही मारा.. मैं उसको छ्चोड़ूँगी नही.." प्रिया जलन के मारे उबल पड़ी....

"मम्मी बाहर खड़ी थी.. मैं बाथरूम में कपड़े लेने गयी.. तब की बात है.. बोल! मैं क्या बोलती..?" रिया ने तो प्रिया को रुला ही दिया... प्रिया बेड पर उल्टी लेट गयी.. और सूबक'ने लगी.. 4 दिन पहले का प्यार जाने कितने मोड़ ले चुका था.. कच्ची उमर का प्यार ऐसा ही होता है!

"चल आ खिड़की में से देखते हैं.. वो अभी भी यहाँ है की नही?" रिया ने प्रिया को उठाते हुए कहा...

"मुझे नही देखना किसी को.. अब क्या देखना रह गया है.. मैं उसको कितना अच्च्छा समझती थी..." प्रिया ने रिया का हाथ झटकते हुए कहा...

"मैं तो देख कर आउन्गि.. तुझे नही चलना तो मत चल..!" रिया ने कहा और ज़ीने में जाकर खड़ी हो गयी.. पर सामने वाली खिड़की बंद थी.. रिया वापस लौटने वाली थी की तभी प्रिया भी पीछे पीछे आ गयी..

"खिड़की बंद है.." रिया ने प्रिया की और मुड़ते हुए धीरे से कहा..

"रुक जा.. मैं खुल्वाति हूँ खिड़की.." गुस्से मैं जली भूनी आई प्रिया उपर से एक मोटा सा पत्थर का टुकड़ा लेकर आई और उसको धुमम से खिड़की पर दे मारा...

अंदर बैठे तीनो इस आवाज़ को सुनकर चोंक गये.. स्नेहा खिलखिलते हुए बोली," लो राज! तुम्हारा फिर से बुलावा आ गया.. आज नही जाओगे क्या..?" राज ने छेड़ छाड़ की बातें छ्चोड़कर सब कुच्छ उनको बता दिया था..

"देखो प्लीज़.. अब तो मेरा मज़ाक मत बनाओ.. तुमको बता दिया सब कुच्छ तो इसका मतलब ये तो नही..." राज उनके मज़ाक सुन सुन कर पक चुका था... वीरू की आँख लग गयी थी...

"सॉरी.. पर मैं देख तो लूं.. कैसी है तुम्हारी गर्लफ्रेंड.." कहते हुए स्नेहा बिस्तेर से उठी और खिड़की के सामने जाकर खिड़की खोल दी...

स्नेहा की दोनो लड़कियों से नज़र मिली.. एक बिना कोई भाव अपनी आँखों में लिए खड़ी थी.. और दूसरी फुफ्कार रही थी.. जैसे ही प्रिया ने स्नेहा को देखा.. उसने खिड़की में से गली की और थूका और उपर भाग गयी.. रिया भी उसके पिछे पिछे निकल ली..

"तुम बिल्कुल सही कह रहे थे राज.. दोनो हूबहू एक जैसी हैं.. तुम्हारी गर्लफ्रेंड कौनसी है.. गरम वाली.. की नरम वाली!" स्नेहा ने खिड़की बंद करते हुए राज से कहा...

"कोई नही है.. मेरी छ्चोड़ो.. तुम अपनी बात पूरी बताओ... गाड़ी बदल'ने के बाद क्या हुआ?" राज बड़े गौर से स्नेहा की कहानी सुन रहा था...

"ठंड रख यार.. ये सिर्फ़ हमारा वहाँ भी तो हो सकता है.. कल पूच्छ लेंगे उस'से..!" रिया ने सुबक्ती हुई प्रिया को दिलासा देते हुए कहा," मैं पूच्छ लूँगी कल.. वैसे भी अगर वो कोई ऐसी वैसी लड़की होती तो सामने थोड़े आती..."

"मैं एक बार चली जाउ?" प्रिया उठ कर बैठ गयी...

"कहाँ?"

प्रिया ने अपने आपको शांत करने की कोशिश करते हुए कहा," राज के पास... उनके कमरे पर.."

"व्हाट.. तुझे पता है तू क्या कह रही है?" रिया बिस्तेर से उच्छल पड़ी...

" हां पता है... वो इसी बात की धोंस जमा रहा है ना की वो मुझसे प्यार करता है... इसीलिए जान जोखिम में डाल कर रात को हमरे घर आ गया... मैं क्या उस'से प्यार नही करती.. मैं क्या जा नही उसके पास.. हिसाब बराबर हो जाएगा.. उसके बाद भी अगर उसने मुझे माफ़ नही किया तो मैं भी कभी उस'से बात नही करूँगी... मैं जाउ ना?" प्रिया ने रिया का हाथ अपने हाथों में लेते हुए पूचछा...

रिया से कुच्छ देर तो कुच्छ बोलते ही ना बना.. वा आँखें फाडे प्रिया को देखती रही.. फिर अचानक संभाल कर बोली," तू पागल है क्या? थोड़ी बहुत भी अकल नही बची क्या अब.. रात को दरवाजे से बाहर पैर रखने का मतलब पता है ना तुझे... काट के रख देंगे पापा.. तुझे भी.. और राज को भी.. ऐसी पागल बातें मत कर.. और आ चल कर सोते हैं.. मम्मी भी आने वाली ही होगी.. चल आजा.." रिया ने प्रिया का हाथ पकड़ कर उसको उठाया और अपने साथ बाहर खींच लिया.. दरवाजे को ताला लगाया और उसको हाथ पकड़े पकड़े ही नीचे ले गयी....

" आ गयी तुम.. मैं बस उपर आने ही वाली थी.. ज़्यादा शोर मत करना.. तुम्हारे पापा कल रात से सोए नही हैं.. उठ गये तो गुस्सा करेंगे...! जल्दी से अपना दूध ख़तम करो और सो जाओ!" मम्मी ने कहा और अपने बेडरूम में चली गयी... उनके पापा के पास!

"देख रिया.. आज पापा भी गहरी नींद में होंगे.. प्लीज़ जाने दे ना! ... मैं बस 5 मिनिट मैं आ जाउन्गि..." प्रिया ने उसके कान में धीरे से कहा...

"तू है ना.. अपने साथ साथ मुझे भी मरवाएगी.. देख प्रिया.. मेरे सामने ऐसी बात मत कर.. मुझे डर लग रहा है... सो जा चुपचाप!" कहकर रिया ने अपना दूध ख़तम किया.. और बिस्तर पर लेट गयी... प्रिया भी क्या करती.. बेचारी.. प्यार का भूत उसके सिर पर बुरी तरह सवार हो चुका था.. वह लेट तो गयी.. पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी.. उसकी आँखों में तो अब राज बस चुका था..

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करीब एक घंटा बीट गया.. घर की सब लाइट्स बंद थी.. प्रिया ने अपना सिर उठाकर रिया को देखा.. वह दूसरी और मुँह किए सो रही थी.. नींद में उसका नाइट स्कर्ट उसकी जांघों से कहीं ज़्यादा उपर उठा हुआ था.. पॅंटी उसके नितंबों से बुरी तरह चिपकी हुई थी.. ,"नालयक!" कहते हुए प्रिया ने उसका स्कर्ट नीचे खींच दिया.. प्रिया को राज के द्वारा रिया के नितंबों पर काटी गयी चुटकी याद आ गयी... वह बेचैन हो उठी.. खड़ी होकर बाथरूम में गयी और फिर बिना कुच्छ किए ही वापस आ गयी.. मम्मी पापा के बेडरूम का दरवाजा आराम से खोल कर देखा.. वो अंदर से बंद था..

प्रिया वापस लौट आई.. वह गहरी असमन्झस में थी.. समझ नही आ रहा था की करे तो क्या करे... अंतत: उसके ज़ज्बात उसके भय पर हावी हो गये.. चुपके से मैं गेट की चाबी उठाई और दबे पाँव बाहर निकल गयी...

आँगन में जाने के बाद उसने आँगन की लाइट्स ऑफ कर दी.. धीरे से ताला खोला और ताला दरवाजे में ही टँगे रहने दिया.. उसके हाथ पैर बुरी तरह काँप रहे थे.. एक पल को वापस मूडी.. राज और फिर भगवान को याद किया.. और सारे समाज और घर वालों के डर को दरकिनार कर देहरी लाँघ गयी.. इज़्ज़त की देहरी..

प्रिया ने घर से बाहर कदम रखा ही था की उसकी मम्मी जमहाई लेते हुए अपने बेडरूम से बाहर निकली... बाथरूम में जाकर आई और फिर प्रिया और रिया के बेडरूम में चली गयी.. देखा बेड पर अकेली रिया ही सो रही है..

"रिया... आ रिया.." मम्मी ने रिया को पकड़कर हिल्या.. रिया गहरी नींद में थी...," उम्म्म्मममममम.. क्या है?" वह कसमसाई और करवट बदलकर फिर से चित्त हो गयी...

"ऱियाआअ!" मम्मी ने उसको ज़ोर से झकझोरा...

" क्या है मम्मी.. सोने दो ना!" रिया ने नींद में ही कहा...

"प्रिया कहाँ है?" उसकी मम्मी चिंतित सी हो गयी थी..

"होगी.. बाथरूम में.. मुझे क्या पता..?" और अचानक ही रिया चोंक कर उठ बैठी.. उसको सोने से पहले की प्रिया की बात याद आ गयी... कहीं..?," बाथरूम में होगी मम्मी.. आप सो जाओ जाकर.." रिया काँप सी उठी.. अब क्या होगा.. अगर... उसने मन ही मन सोचा..

"बाथरूम की तो कुण्डी बंद है बाहर से.. कहाँ गयी कारामजलि.. मुझे तुम्हारे लक्षण अच्छे नही लग रहे कुच्छ दीनो से.. तुम फोन वोन तो नही रखती हो ना..?"

रिया ने मम्मी की बातों पर ध्यान ही नही दिया..," मम्मी.. वो उपर चली गयी होगी पढ़ने.. उसका काफ़ी काम बाकी था.. मैं देखकर आती हूँ.." कहकर रिया उपर भाग गयी.. मम्मी ने उसको रोकने की कोशिश भी की.. पर तब तक तो वो सीढ़ियों पर जा चुकी थी...

" इनको भी पढ़ने का टाइम ही नही पता.. जब देखो किताब खोलकर बैठ जाती हैं... अब देखो ना.. ये भी कोई पढ़ने का टाइम है भला...?" अंगड़ाई लेकर बाहर निकले अपने पति को देखकर वो बोली.... विजेंदर की नींद पूरी हो गयी थी.. शाम 6 बजे से ही सोया हुआ था वो...

"अरे भाई.. आजकल कॉंपिटेशन का जमाना है.. टाइम देखकर पढ़ेंगी तो पिछे नही रह जाएँगी भला....." विजेंदर ने कहा और अपनी बीवी के पास आकर बेड पर बैठ गया," पर इनको कह दो.. रात को उपर पढ़ने की कोई ज़रूरत नही है... अगर पढ़ना है तो यहीं पढ़ें.. नीचे...!"

" मैने तो जाने कितनी बार कहा है जी.. पर माने तब ना! कहती हैं.. टी.वी. की आवाज़ में डिस्टर्ब होती हैं.." मम्मी ने सफाई दी...

" तुम कभी पिछे जाकर देखती भी हो क्या? पढ़ती भी हैं या... चलो उपर चलते हैं..." विजेंदर यही समझ रहा था की दोनो अभी तक उपर पढ़ रही हैं.. उसको ये अहसास भी नही था की प्रिया सोने के बाद गायब हुई है.. और अब रिया उसको देखने गयी है...

" मेरे तो घुटनो में दर्द है जी.. मुझसे नही चढ़ा जाता बार बार उपर...." मम्मी ने कहा ही था की रिया नीचे आ गयी.. और पापा को वहीं बैठा पाकर सहम गयी..," व्व वो.. उपर ही ... है.. मम्मी.. अपना काम कर रही है.. अभी आ जाएगी.. 10 -15 मिनिट में..." रिया ने हकलाते हुए कहा.....

विजेंदर के पॉलिसिया दिमाग़ में रिया की बातों में गड़बड़ की बू आई..कुच्छ सोचते हुए.. वो खड़ा हुआ और बोला," आइन्दा से तुम दोनो नीचे ही पढ़ा करो.. टी.वी. नही चलेगा... और कहकर वापस अपने कमरे में चला गया," कुच्छ खाने को है क्या? भूख लगी है!"

" है जी.. अभी लाती हूँ.. आप बैठो.." कहकर उसकी मम्मी किचन में चली गयी...

"रिया बिस्तर पर बैठी बैठी काँप रही थी.. और दुआ कर रही थी की प्रिया जल्दी आ जाए.. और उसके मम्मी पापा को पता ना चले...

"अरे.. आज मैने दरवाजा खुला ही छ्चोड़ दिया..! किचन से आँगन का बल्ब जलते ही उसकी नज़र दरवाजे पर टँगे ताले पर पड़ी... वह बाहर गयी और दरवाजा लॉक करके वापस आ गयी.. रिया का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा...

उसकी मम्मी ने अंदर आकर चाबी स्लॅब पर रख दी थी.. रिया ने हिम्मत करके चाबी उठाई और मम्मी के बेडरूम में जाते ही ताला फिर खोल आई.. भाग कर...

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उधर राज और वीरू सो गये थे.. स्नेहा अपने मोहन के ख़यालो में खोई हुई थी और जल्दी से सुबह होने का इंतजार कर रही थी.. दरवाजे पर हुई दस्तक से वह चौंक गयी.. बिस्तर से उठी और राज को उठाने की सोची...," इश्स वक़्त यहाँ मोहन के अलावा और कौन आ सकता है.." ये सोचकर वा खिल उठी और एकदम से जाकर दरवाजा खोल दिया....

सामने अपने सिर और चेहरे को चुननी से ढके प्रिया खड़ी थी.. दरवाजा खुलते ही वह भाग कर अंदर आ गयी और चुननी उतार दी... स्नेहा ने पहचान लिया..," प्रिया?"

प्रिया ने सहमति में सिर हिलाया और कमरे में नज़रें दौड़ाई.. राज ज़मीन पर बिस्तर बिच्छाए चैन से सोया पड़ा था..

"तुम कौन हो?" प्रिया सोचकर आई थी की जाते ही उस लड़की तो खबर लेनी ही है.. पर यहाँ तो डर के मारे उसकी आवाज़ ही मुश्किल से निकल पा रही थी...

"मैं इनकी बेहन हूँ.." स्नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा...

"किसकी..?" प्रिया ने कांपति हुई आवाज़ में पूचछा..

"दोनो की.. क्या तुम यही पूच्छने के लिए आई हो.. इतना डरी हुई क्यूँ हो.. आओ बैठहो..." स्नेहा ने प्यार से अपनी होने वाली भाभी के चेहरे को उसकी थोड़ी पर हाथ लगाकर उपर उठाया...

" पर ये तो सगे भाई नही हैं ना.. फिर तुम दोनो की बेहन कैसे हुई..?" प्रिया ने भोलेपन से पूचछा...

"क्या खून का रिश्ता ही रिश्ता होता है... सग़ी तो मैं इनमें से किसी की भी नही हूँ.. पर दोनो मेरे लिए अपनो से कहीं बढ़कर हैं... तुम बैठो ना.. मैं राज भैया को जगाती हूँ..!" स्नेहा ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी और खींचा...

प्रिया के दिल को बड़ी तसल्ली मिली.. ये सब सुनकर.. उसने तो यूँही जान आफ़त में डाल ली थी..," नही.. अब मैं जा रही हूँ.. घर वाले जाग गये तो..."

"प्लीज़.. सिर्फ़ एक मिनिट.." और स्नेहा जाकर राज को जगाने लगी... ," राज.. राज! देखो ना कौन आया है..?

राज हड़बड़ा कर उठ बैठा और जैसे ही उसने प्रिया को अपने कमरे में खड़े देखा वा उच्छल पड़ा.. एक बार को तो उसको अपनी आँखों पर विस्वास ही नही हुआ," तूमम्म????? यहाँ क्यूँ आई हो.. मतलब.. कैसे आ गयी? डर नही लगा..." राज ने खड़े होते हुए अपने कपड़ों को ठीक किया...

प्रिया अपने हाथ बाँधे.. सिर झुकाए.. खड़ी थी.. वह अभी भी काँप ही रही थी.. जाने घर से निकलते हुए उसमें कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी थी..

"बेचारी पहले ही डरी हुई है.. तुम और डरा दो इसको.. तुम्हारे लिए इतनी हिम्मत करके आई है.. अब तो प्यार से बात कर लो..." स्नेहा ने तुनक्ते हुए कहा...

सहमी हुई सी प्रिया राज को इतनी प्यारी लग रही थी की उसका दिल चाह रहा था.. अभी के अभी उसको बाहों में भरकर उसका हर अंग चूम डाले.. उसके रोम रोम को महसूस कर ले.. पर ये सब करना सोचने से कहीं ज़्यादा मुश्किल था...," पूच्छ ही तो रहा हूँ.. घर वाले जाग गये तो क्या होगा?"

" मैं बस सॉरी बोलने आई थी...!" प्रिया ने नज़रें उठाकर रात भर के लिए अपने मन में राज का प्यारा चेहरा क़ैद कर लिया...

"ओहो.. कितनी बार सॉरी बोलॉगी.. बोल तो दी थी.. स्कूल में..!" राज उसके सामने आकर खड़ा हो गया...

प्रिया को लगा राज की नज़रें उसके शरीर में गड़ रही हैं.. उसका बदन अकड़ने सा लगा था.. डर के बावजूद," पर तुमने माफ़ कहाँ किया था!" उसने राज की नज़रों से नज़रें मिलाई.. दिल किया की कल रात की अधूरी हसरत अभी पूरी कर ले.. लिपट जाए राज से.. और अपने बदन को ढीला छ्चोड़कर उसमें समा जाने दे.. पर हिम्मत दोनो में से किसी में नही थी.. स्नेहा जो पास खड़ी थी..

"पागल.. माफ़ क्या करना था.. मैं नाराज़ नही था.. मैं तो यूँही बस..." राज के हाथ प्रिया के चेहरे की और बढ़े.. पर बीच में ही रुक गये... अचानक दरवाजा खुला और रिया बदहवास सी कमरे में घुस आई.. वह इतनी हड़बड़ाहट में थी की उनके उपर गिरते गिरते बची... उसके पैरों में खड़े रहने की हिम्मत बची ही नही थी.. वह अंदर आते ही बेड पर बैठ गयी...," सब कुच्छ ख़तम हो गया प्रिया.. सब कुच्छ ख़तम हो गया... समझ लो मारे गये... ओह माइ गॉड!"

प्रिया उसकी बात का मतलब समझ कर धदाम से ज़मीन पर आ गिरी.. राज ने उसको संभाला और रिया से बोला," क्या हुआ रिया?"

स्नेहा को तो बोलने का भी अवसर नही मिला....

"सब कुच्छ ख़तम हो गया राज.. मैने इसको माना किया था.. पर फिर भी ये आ गयी.. इतना सा भी नही सोचा इसने... पापा जान से मार डालेंगे... छ्चोड़ेंगे नही..." रिया ने हानफते हुए कहा...

प्रिया ने तो ज़ोर ज़ोर से रोना शुरू कर ही दिया था.. अगर राज उसके मुँह पर हाथ रखकर.. उसको चुप रहने के लिए ना कहता तो," साफ साफ बताओ ना रिया.. बात क्या है...?"

कमरे में इतनी फुसफुसाहट सुनकर वीरेंदर की नींद खुल गयी.. आँखें खोलकर उपर देखते हुए जैसे ही उसने प्रिया और रिया को वहाँ देखा.. वह भी चौक पड़ा..," ये क्या तमाशा लगा रखा है? क्या मुसीबत आ गयी आख़िर.. रात को तो चैन से सो जाया करो.. ये कोई इश्क़ फरमाने का टाइम है.."

"चुप हो जाओ वीरू भैया.. बाहर कोई सुन लेगा.." स्नेहा जाकर वीरू के पास बैठ गयी...

"क्या आफ़त आ गयी.. बताओ तो सही..?" वीरू ने इश्स बार धीरे से कहा...

प्रिया ने जैसे तैसे करके अपने आपको संभाला और उठकर रिया के पास जाकर खड़ी हो गयी,"पापा जाग गये क्या..?"

"हां! पापा भी जाग गये और मम्मी भी.. मम्मी ने मुझे उठाया था.. ये पूच्छने के लिए की तुम कहाँ हो.. मैने उपर आकर देखा और वापस जाकर झूठ बोल दिया.. की तुम उपर पढ़ रही हो.. फिर मम्मी पापा के लिए खाना बनाने लगी.. मैने तुम्हारा कितना इंतजार किया.. मम्मी ने वापस ताला लगा दिया था.. वो भी खोला.. पर तुम नही आई प्रिया.." कहते हुए रिया रोने लगी...

" फिर उनको पता लग गया क्या?" प्रिया का दिल बैठ गया...

" खाना खा कर पापा और मम्मी तुम्हे बुलाने उपर चले गये.. अब तक तो उनको पता लग ही गया होगा..." रिया ने रोते रोते ही बताया...

"पर तू क्यूँ यहाँ आई पागल.. अब तू भी फँसेगी.." प्रिया के चेहरे पर मायूसी और डर ने डेरा डाल रखा था...

तीनो उनके बीच हो रही बात को ध्यान से सुन रहे थे....

" तो मैं अब और क्या करती.. तुझे पता नही चलता तो तू वापस चली जाती.. और फिर तेरा क्या होता.. पता है ना...

वीरेंदर काफ़ी देर से चुपचाप बातें सुन रहा था.. जो कुच्छ हुआ.. उस पर वह भी दुखी था.. पर अब किया ही क्या जा सकता है...,"वापस तो अब भी जाना ही पड़ेगा..!"

" नही.. मैं घर वापस नही जाउन्गि..!" प्रिया ने नज़रें उठाकर राज के चेहरे की और देखा...

राज की तो कुच्छ समझ में आ ही नही रहा था.. "अब क्या किया जाए..?"

"एक आइडिया है...!" स्नेहा ने कहा....

"क्या.. जल्दी बताओ ना.." राज तुरंत बोला...

"यहाँ से सभी भाग चलते हैं.... अभी के अभी..." स्नेहा को तो जैसे भागना ही सबसे अच्च्छा लगता था.. स्वच्छन्द आकाश के नीचे खुली हवा मैं.. जहाँ कोई बंधन ना हो.. उसको अहसास नही था शायद की हमारे समाज में लड़की के 'भागने' का क्या मतलब होता है... कहकर उसने चारों के चेहरे की और देखा.. प्रिया और रिया की तरफ से कोई रिक्षन नही आया.. राज भी मुँह बनाए खड़ा रहा.. पर वीरेंदर से ना रुका गया," क्यूँ नही.. बस इसी बात की कमी रह गयी है.. भाग चलो...!" उसने मुँह पिचकाया...

"अरे मैं कोई हमेशा के लिए भागने को थोड़े ही कह रही हूँ.. इनके मम्मी पापा का गुस्सा शांत नही होता.. तब तक.. बाद में फोन करके माफी माँग लेंगे... क्यूँ राज?"

"वैसे हम साधारण लोगों के लिए ये सब इतना आसान नही होता स्नेहा.. जितनी आसानी से तुमने कह दिया.. भागने का मतलब अपने घर परिवार और सारे समाज से कट जाना होता है.. हमेशा के लिए... वापस आना मुमकिन नही.. और कुच्छ सोचो..." राज ने कहा..

"और कुच्छ तो तुम्ही सोचो फिर.." स्नेहा भी मुँह बनाकर रिया और प्रिया की लाइन मैं बैठ गयी...

"जो कुच्छ सोचना है.. ये दोनो सोच लेंगी.. इसको ही फितूर सवार हुआ था ना.. रात में घर से निकलने का.. तुम क्यूँ परेशान हो रहे हो..?" वीरू ने लेटे लेटे ही कहा...

वीरू के मुँह से ऐसी बात सुनकर रिया को रोना आ गया..," ठीक है प्रिया.. चल कहीं और चलें.. अब हमें ही भुगतना पड़ेगा.. ग़लती भी तो हमने ही की है.. "

"रूको! मैं भी साथ चलूँगा..." राज ने रिया का हाथ पकड़ लिया....

" मैं रिया हूँ.. प्रिया नही.." रिया ने सुबक्ते हुए मासूमियत से कहा..

"पता है मुझे..!" राज ने कहा...

स्नेहा ने विचलित होकर वीरू की और देखा... वह भी कहने ही वाली थी.. "मैं भी चालूंगी.." पर वीरू को ऐसे छ्चोड़कर कैसे जाती..?

"राज.. इधर आकर खड़ा होने में मदद कर ज़रा.." वीरू ने हाथ का सहारा लेकर बैठते हुए कहा...

राज उसके पास गया और उसको सहारा देकर खड़ा कर दिया.. वीरू ने चोट वाली जाँघ पर एक दो बार...वजन बना कर देखा," चलो.. 'भाग' कर देखते हैं..."

मुरझाए हुए सभी के चेहरे वीरू के इस अंदाज पर खिलखियाए बिना ना रह सके.. खास तौर से रिया का चेहरा.. वह तो वीरू पर फिदा ही हो गयी थी...

"तुम्हे चोट लगी है क्या? इसीलिए स्कूल में नही आए क्या तुम आज.." रिया ने वीरू को पहली बार टोका...

वीरू ने उसकी बात का कोई जवाब नही दिया," सोच लो.. हम चार लोग हैं.. बाहर का खर्चा बहुत होगा....

" उसकी चिंता मत करो.. मैं हूँ ना.." स्नेहा चाहक उठी थी," और फिर मोहन आकर फोन करेगा ही.. उसको भी वहीं बुला लेंगे.... क्या कहते हो..?"

"फिर ठीक है.. पर निकलेंगे कैसे?" वीरू ने बाहर निकलने की तैयारी शुरू कर दी...

खामोश खड़ी रिया ने सब लोगों को गिना.. वो तो 5 हैं.. फिर वीरू 4 की बात क्यूँ कर रहा है.. हिचकिचाते हुए बोली," मैं भी हूँ!"

" तुम क्या करोगी? तुम तो वापस जा सकती हो ना..." राज ने कहा...

" मैं कैसे जा सकती हूँ अब.. वापस आकर घर वालों ने मुझे भी तो ढूँढा होगा... वैसे भी प्रिया के बिना मैं नही रह सकती.. वो जब वापस आएगी.. मैं भी आ जाउन्गि...!" रिया ने वीरू की और देखते हुए कहा.. उसको विश्वास था की वीरू पक्का टाँग अड़ाएगा...

" फिर तो मम्मी पापा को भी बुला लो ना... उन्होने क्या जुर्म कर दिया ऐसा.. वो भी तुम दोनो के बगैर कैसे रहेंगे.. आख़िर!" वीरू ने टेढ़ी नज़र से रिया पर व्यंग्य किया.. रिया राज के पिछे छिप गयी..

"ले चल यार.. जब उखल में सिर दे ही लिया है तो मूसल से क्या डरना...!" राज ने वीरू से रिक्वेस्ट सी की.....

"अरे मैं तो तेरे भले के लिए ही कह रहा हूँ.. तू कन्फ्यूज़ रहेगा.. कौनसी रिया है और कौन प्रिया? तुझे प्राब्लम नही है तो मुझे क्या.. मुझे कौनसा इसको पीठ पर बैठकर ले जाना है.." वीरू की बात पर सभी मुँह पर हाथ रख कर हँसने लगे...

"तेरी पीठ पर तो चढ़कर रहूंगी बेटा!" रिया मन ही मन सोचकर खिल उठी...

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फिर वही बात, होनी टाली ही नही जा सकती.. वरना भगवान ने तो रिया की कारून फरियाद सुन ही ली थी.. जीने मैं चढ़ते हुए.. विजेंदर का पैर फिसल गया और वो स्लिप करता हुआ 3 स्टेप्स नीचे आकर रुका.. उसका घुटना ज़ख्मी हो गया था...

पिछे पिछे उपर चढ़ रही उनकी मुम्मी ने पहले अपने आपको बचाया और फिर बैठकर विजेंदर को," आप ठीक तो है ना..?"

"आ.. मुझे नीचे ले चलो.. मर गया री मा..!" विजेंदर अपना घुटना पकड़ कर सीढ़ियों पर ही बैठ गया था...

उसकी बीवी उसको सहारा देकर नीचे ले गयी और वापस ले जाकर बेड पर लिटा दिया और रिया को आवाज़ लगाई," रिया.. जल्दी आ.."

रिया वहाँ थी कहाँ जो आती..

" उसको क्यूँ परेशान कर रही हो.. सोने दो बेचारी को.. बेवजह परेशान होगी.. कुच्छ खास चोट नही है.. एक दो दिन में ठीक हो जाएगी.. तुम बस यहाँ पर थोड़ी मालिश कर दो.. बहुत दुख रहा है.." विजेंदर ने पिच्छवाड़े को हाथ लगाते हुए इशारा किया...

"प्रिया को तो बुला लाऊँ.. पहले..?"

"रहने दो.. वो वहीं सो गयी होगी क्या पता.. सुबह अपने आप आ जाएगी..." विजेंदर का पूरा ध्यान अब अपनी चोट पर था...

"ठीक है.." उसने कहा और 'मूव' उठाकर लाई और दरवाजा बंद करके विजेंदर की पॅंट निकाल कर मालिश करने लगी...

"बस बहुत हो गया.. सो जाओ अब..!" विजेंदर ने कहा..

" ठीक है जी.. कुच्छ दिक्कत हो तो उठा लेना.." कहकर उसकी बीवी ने लाइट बंद करी और साथ लेटकर सो गयी.................

वो सब एक एक करके बाहर निकालने की तैयारी कर ही रहे थे की अचानक किसी ने उनका दरवाजा खटखटाया.. लड़कियों समेत सभी सहम गये..," अब क्या करें?" इशारों ही इशारों में सब ने एक दूसरे से पूचछा...

दोबारा फिर दस्तक हुई.. इस बार कुच्छ ज़्यादा ही जोरदार.. डर कर प्रिया और रिया एक दूसरी से चिपक गयी..

"तुम सब बाथरूम में घुस जाओ.. मैं देखता हूँ..!" राज ने तीनो को बाथरूम में बंद कर दिया और नींद में होने का नाटक करता हुआ दरवाजे के पास गया," कूऊउउउन्न है भाई?"

"दरवाजा खोलो!" बाहर से आई आवाज़ एकद्ूम कड़क थी..

"पर बताओ तो तुम हो कौन?" राज आवाज़ सुनकर ही डर गया था...

" मैं विकी.. सॉरी.. मोहन का दोस्त हूँ.. दरवाजा खोलो जल्दी.." बाहर से आवाज़ आई..

मोहन का नाम सुनकर राज को थोड़ी राहत पहुँची.. पर दरवाजा खोलते हुए डर अब भी उसके दिल में कायम था.. कुण्डी खोलकर उसने दरवाजा हूल्का सा खोल दिया.. बाकी काम टफ ने खुद ही कर दिया.. बिना देर किए टफ कमरे के अंदर था..

"स्नेहा तुम्हारे पास है ना!" टफ ने सीधे सीधे सवाल किया...

टफ के डील डौल और उपर से उसकी रफ आवाज़ ने राज को झूठह बोलने पर

विवश कर ही दिया..," क्क्कौन स्नेहा..? हम किसी स्नेहा को नही जानते... क्क्कौन है... आप?"

" देखो भाई.. डरने की कोई ज़रूरत नही है.. मैं मोहन का दोस्त हूँ.. अजीत! उसने ही मुझे स्नेहा को यहाँ से ले जाने को बोला है.. बता दो.. कहाँ है वो..?" टफ ने अपना लहज़ा निहायत ही नरम कर लिया.. फिर भी राज को तसल्ली ना हुई.. वीरू चुपचाप बेड पर बैठा सब कुच्छ देख सुन रहा था...

" ववो.. मोहन का फोन आया था.. वो तो चली गयी.. मोहन ने ही बुला लिया उसको.." राज ने फिर झूठ बोला...

" देखो.. मुझे पूरा यकीन है कि तुम झूठ बोल रहे हो.. पर अगर ये सच है तो स्नेहा की जान ख़तरे में है.. ये जान लो! अगर तुम उस लड़की की जान बचना चाहते हो तो प्लीज़ बता दो.. वो है कहाँ..?" टफ ने कमरे में छान बीन शुरू करने से पहले उस'से आख़िरी बार पूचछा...

राज की नज़रें झुक गयी.. स्नेहा की जान ख़तरे में होने की बात कहकर टफ ने उसको असमन्झस में डाल दिया था... उसको समझ नही आ रहा था.. कि वो क्या करे!

वीरू आख़िरकार बोल ही पड़ा," राज! स्नेहा को निकल लाओ बाथरूम से.." कहते हुए उसने अपने पैर से बेड के नीचे रखी बेसबॉल की स्टिक को आगे सरका लिया.. किसी अनहोनी का मुक़ाबला करने के लिए...

दरवाजा खोलो स्नेहा.. मोहन का दोस्त है कोई.. बाहर आ जाओ!" राज ने बाथरूम का दरवाजा थपथपाया...

स्नेहा दरवाजा खोलकर बाहर निकल आई.. रिया और प्रिया अभी भी बाथरूम में ही छिपि हुई थी..

"तुम्ही हो स्नेहा..?" टफ ने स्नेहा से सवाल किया..

स्नेहा ने अपनी नज़रें उठाकर जवाब दिया," जी.. आप मोहन के दोस्त हैं..?"

"हाँ.. और मैं तुम्हे लेने आया हूँ.. अभी तुम्हे मेरे साथ चलना होगा!"

" पर मैं कैसे मान लूँ.. आप उनके दोस्त हैं.. उनसे बात करा दीजिए मेरी.." स्नेहा ने कहा..

" देखो ज़िद करने का वक़्त नही है.. मैं तुम्हारी बात करा देता.. पर उसका फोन फिलहाल ऑफ है.. ये देखो.. ये उसी का नंबर. है ना.. देखो कितनी बार बात हुई हैं उस'से आज मेरी.. अभी कुच्छ घंटे पहले तक वो मेरे ही साथ था... वो आ नही सकता था.. इसीलिए मुझे भेज दिया.. अब जल्दी चलो.. वरना अनर्थ हो जाएगा..." टफ ने उसको अपनी कॉल डीटेल दिखाई..

" पर इसमें तो आपने नंबर. विकी नाम से सेव किया हुआ है.." स्नेहा ने आशंकित नज़रों से टफ की और देखा

"हां.. वो मैं उसको विकी ही बोलता हूँ.. प्यार से..." टफ को भी टेढ़ी उंगली इस्तेमाल करनी पड़ी...

स्नेहा के पास विश्वास करने के अलावा कोई और चारा बचा ही नही था... मोहन ने एक बार उसको बोला भी था.. की लोहरू छ्चोड़ने के बाद वो उसको लेने के लिए किसी दोस्त को भी भेज सकता है..

" हम कहाँ जाएँगे..अभी..!" स्नेहा ने आख़िरी सवाल किया...

"कहाँ जाना चाहती हो..?"

"लोहरू! वहाँ मोहन के दोस्त शमशेर की ससुराल है.." स्नेहा ने कहा..

टफ ने राहत की साँस ली..," शमशेर से बात कर्वाउ क्या अभी?"

" नही रहने दो.. वैसे भी मैं उन्हे नही जान'ती.. पर..." कहकर स्नेहा ने वीरू की और देखा...

" पर क्या? .... बोलो?" टफ ने कहा..

" मेरे साथ मेरी 2 सहेलियाँ भी जाएँगी.." स्नेहा ने झिझकते हुए कहा...

" कहाँ हैं तुम्हारी सहेलियाँ? ले चलो.. मुझे क्या प्राब्लम है भला? टफ ने कमरे में नज़र दौड़कर बाथरूम के दरवाजे पर नज़र टीका दी..

" एक मिनिट.." स्नेहा ने कहा और बाथरूम से दोनो को बाहर निकल लाई.. दोनो लाइन में खड़ी थी.. प्रिया रिया के पिछे चिपकी खड़ी थी...

"वाह भाई वाह.. ये तो एक दूसरी की फोटोकॉपी हैं.. चलो.. जल्दी चलो..!" टफ ने दोनो को गौर से देखते हुए कहा...

" आप दोनो रहने दो भैया... खंख़्वाह पड़ोस वालों को शक होगा.. अब हम चले तो जाएँगे ही.." स्नेहा ने वीरू और राज की और देखते हुए कहा..

राज का साथ चलने का बहुत मॅन था.. उसके तो सारे अरमान ही धरे के धरे रह गये.. उसने वीरू की और देखा...

"नही स्नेहा! हम भी साथ ही चलेंगे..!" वीरू ने स्टिक उठाई और उसके सहारे खड़ा हो गया.. स्नेहा को किसी भी जोखिम में वो अकेला नही छ्चोड़ना चाह रहा था....

राज के तो बिन बोले ही वारे न्यारे हो गये...

" भाई.. जिसको भी चलना है.. जल्दी से नीचे चलकर गाड़ी में बैठो.. हमारे पास टाइम नही है इतना.." टफ ने झल्लाते हुए कहा...

उसके बाद किसी ने देर नही लगाई.. वहाँ से निकलने की जल्दी तो उन्हे भी थी.. किस्मत से अब उनको रास्तों पर भटकना नही पड़ेगा.. सभी जाकर गाड़ी में बैठ गये..

टफ ने रोड पर निकलते ही शमशेर के पास फोन किया..," हां भाई.. ले आया हूँ.. स्नेहा को.. शुक्रा है.. अभी तक पहुँचा नही था वो..!"

"कौन है.. मोहन है क्या?" स्नेहा ने आगे गर्दन निकालते हुए कहा..

" नही शमशेर है.. लो भाई.. एक बार बात करना..."

" नमस्ते सर!" स्नेहा ने झिझकते हुए कहा.. विकी ने स्नेहा को बता रखा था कि शमशेर टीचर है..

" नमस्ते बेटा..! किसी बात की फिकर मत करना.. ठीक है ना..." शमशेर ने प्यार से कहा...

" जी.. अब सब ठीक है.. मैं तो डर गयी थी.." स्नेहा ने भी उतनी ही विनम्रता से जवाब दिया..

" ओ.के. मेरा नंबर. भी ले लेना.. कोई दिक्कत हो तो फोन कर देना.. वैसे टफ भी हमारा भाई ही है.. उसको फोन देना ज़रा.." शमशेर ने कहा...

" ये लो सर!" स्नेहा की आँखें चमक उठी.. अब उसको कोई फिकर नही थी.. वो सही आदमी के साथ थे...

" विकी कहाँ है अब?" शमशेर ने टफ से पूचछा..

" पता नही भाई.. उसका तो फोन ऑफ आ रहा है..मेरे पास से तो निकल गया था.. 7 8 बजे के आसपास..." टफ ने जवाब दिया..

" पता नही यार.. वो कैसे लाइन पर आएगा.. चल अच्च्छा.. रखता हूँ..!" कहकर शमशेर ने फोन काट दिया....

 
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