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गीता चाची -Geeta chachi complete

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एक तो उनपर प्रेक्टिस करके मेरा हाथ एकदम सध गया. दूसरे उनके मुलायम शरीर को गूंधने में उन्हें और मुझे जो मजा आता था वह मानों बोनस था. खास कर जांघों की मालिश करते करते तो मैं ऐसे अपनी उंगलियों से उनके भगोष्ठ हल्के हल्के रगड़ कर उनकी चूत को तड़पाता कि वे चूतड़ उचकाने लगती थीं. "बस ऐसे ही चाचाजी के साथ करना लल्ला, न तुझ पर चढ़ जायें तो फ़िर कहना." अपनी जांघों को मसलवाते हुई वे मुझे कहतीं.

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हमने प्रीति से शुरू में सब छुपा कर रखने का निश्चय किया इसलिये चाचाजी लौटने वाले थे उस दिन उसे हफ़्ते भर के लिये पास के गांव में उसकी दूर की बुआ के यहां भेज दिया. जब चाचाजी वापस आये तो चाची को खुश देखकर बहुत प्रसन्न हुए. समझ गये कि उनके किशोर भतीजे ने उनकी पत्नी की चूत को खूब तृप्त रखा है. मुझे आंख भी मारी कि बहुत अच्छा किया बेटे.

मेरा अब उनकी ओर देखने का ढंग ही बदल गया था इसलिये उनके आंख मारने से मुझे अजीब गुदगुदी सी हुई. उन्होंने भी मेरी आंखों में और ही कुछ देख होगा क्योंकि वे जरा चकरा से गये. जब कपड़े बदलते हुए मैंने उनके सुडौल शरीर और मजबूत बदन पर गौर किया तो मेरा खड़ा होना शुरू हो गया, ठीक वैसे ही जैसे किसी सुंदर स्त्री को देखकर होता है.

मैंने भी उनके सामने सिर्फ जांघिये में घूमने का कोई मौका नहीं छोड़ा, गर्मी का बहाना लेकर या फ़िर जान बूझकर उनके कमरे में कोई चीज़ ढूंढने का बहाना कर के. उनकी आंखें मेरे किशोर शरीर पर बार बार पड़तीं और वे बड़ी मुश्किल से अपनी निगाहें फ़ेरते कि आखिर मैं उनका सगा भतीजा हूं. पर वे मेरी तरफ़ बहुत आकर्षित होने लगे थे यह मैं समझ गया.

दूसरे ही दिन शाम को मैंने अपना प्लान आजमाने का निश्चय कर लिया. चाचाजी को अटपटा न लगे इसलिये हमें अकेले छोड़ कर चाची तीन चार घंटे के लिये पड़ोस में चली गयीं. उधर चाचाजी ने नहाने के लिये अपने सारे कपड़े निकाले और सिर्फ जांघिया पहनकर बाथरूम जाने लगे. उनके कसे जांघिये में से उनके बड़े लंड का आकार साफ़ दिख रहा था. मैं देख कर घबरा भी गया और उत्तेजित भी हुआ. बाप रे, बैठी हालत में इतना बड़ा है तो खड़ा कैसा होगा?

मैंने कहा. "चाचाजी मालिश कर दूं?" वे रुक कर बोले "अरे अनिल बेटे, तुझे आती है क्या?" मैंने बताया कि चाची की तो रोज करता हूं. इस जवाब पर वे मुस्कराने लगे. उनकी आंखें मेरे बदन पर जमी थीं. मैंने भी सिर्फ एक जांघिया पहना था. मुझे मालूम था कि उन्हें अब अपना भतीजा नहीं बल्कि एक चिकना गोरा छरहरे बदन का खूबसूरत लड़का दिख रहा था. पर उनका सगा भतीजा था इसलिये वे अब भी अपने आप पर काबू किये हुए थे. मैंने फ़िर आग्रह किया तो वे तैयार हो गये.

वे जमीन पर एक चटाई पर लेट गये. मैंने दरवाजा लगा लिया और फ़िर हाथ में तेल लेकर उनके पास नीचे बैठकर उनकी मालिश करने लगा.

पहले तो मैंने उनके हाथों और पैरों पर मालिश की. फ़िर सीने और पेट पर उतर आया. चाचाजी का बदन एकदम चिकना था. छाती पर बाल नहीं थे. उनका शरीर अब मुझे उत्तेजित कर रहा था. उन्हें मैंने पलट जाने को कहा. फ़िर उनकी चौड़ी पीठ और कमर पर तेल लगाकर रगड़ने लगा.

चाचाजी के मोटे मजबूत चूतड़ों का आकार जांघिये में से साफ़ दिख रहा था. मैंने अपने हाथ उनके जांघिये की इलास्टिक के नीचे से अंदर डाले और उनके नितंबों की मालिश करने लगा. वे थोड़ा कसमसाये. मैं समझ गया कि उनका लंड अब खड़ा होने लगा होगा. मैने जान बूझ कर बड़े प्यार से नितंबों की खूब मालिश की, एक दो बार मेरी उंगली उनके गुदा पर से भी गयी. उस समय वे सिहर से जाते.

मैंने उन्हें फ़िर पलटने को कहा. वे आनाकानी करने लगे. मैं समझ गया कि लंड खड़ा है. मेरा भी अब तक जोर से खड़ा हो गया था. मौका अब करीब था. मैने जिद करके अपनी मनवा ही ली. वे पलटे तो उनके जांघिये में ये बड़ा तंबू बना था. चाचाजी के चेहरे पर थोड़ी शर्मिंदगी थी पर फ़िर उन्होंने मेरे जांघिये में भी तना हुआ लंड का आकार देखा. मैं चुपचाप उनकी ओर बिना देखे उनकी छाती और फ़िर जांघों की मालिश करता रहा.

 
आखिर मुझ से न रहा गया. मैंने झुक कर उनकी छाती चूम ली और एक हाथ जांघिये में डाल कर लंड पकड़ लिया. मजा आ गया. ऐसा लगता था कि मोटी ककड़ी या लौकी हाथ में आ गयी हो. राजीव चाचा ने मेरी कमर में हाथ डाला और मुझे पास खींच लिया. फ़िर दूसरा हाथ मेरी गर्दन में डाल कर मेरे सिर को नीचे खींचकर अपने होंठ मेरे होंठों पर लगा दिये. एक दूसरे की आंखों में देखते हुए हम बेतहाशा एक दूसरे को चूमने लगे. अब कुछ कहने की भी जरूरत नेहीं थी.

मुझे खींचकर राजीव चाचा ने बाहों में भर लिया और मुझे नीचे चटाई पर पटक कर मेरे ऊपर चढ़ बैठे. ऐसे चूमने लगे जैसे अपनी प्रेमिका को चूम रहे हों. उनके थोड़े खुरदरे होंठ और उनमें भिनी सिगरेट की भीनी खुशबू मुझे बहुत अच्छी लगी. अपनी लंबी जीभ उन्होंने मेरे गले तक उतार दी जिसे मैं जोर से चूसने लगा. अब तक उन्होंने अपने हाथों से मेरी चड्डी खींच कर उतार दी थी. उनका हाथ कभी मेरा लंड सहलाता और कभी नितंब.

बीच में ही वे उठकर बैठ गये और मेरे नग्न शरीर को अलट पलट कर देखने लगे. मेरा गुलाबी किशोर शिश्न और चिकने नितंब देखकर वे सिसक उठे. "मेरे राजा, मेरे बेटे, तू तो बिलकुल स्वर्ग का टुकड़ा है रे, अब तक कहां था रे, अपने चाचाजी से जुदा क्यों था?" कहकर वे झुककर मेरे नितंब चूमने लगे. प्यार से उन्हें सहलाते हुए वासना के आवेश में राजीव चाचा मेरे गुदा को चूसने लगे. जल्द ही उनकी जीभ मेरे गुदा में घुस गयी. सारे समय मेरे लंड को वे अपनी हथेली में पकड़कर प्यार से मुठिया रहे थे.

मैं सुख से सिहर उठा. पहले वार किसी ने मेरी गांड चूसी थी. मैं कराह कर बोला. "राजीव चाचा, मैं झड़ जाऊंगा."

"झड़ जा मेरे लाल पर अपने चाचा के मुंह में झड़, पिला दे मुझे तेरा अमृत" कहकर उन्होंने अपना मुंह खोला और एक ही निवाले में पूरा लंड निगल कर गन्ने जैसा चूसने लगे. उनकी जीभ इस तरह से मेरे सुपाड़े पर थिरक रही थी कि मुझसे न रहा गया और मैंने उनके सिर को पकड़कर कस कर अपने पेट पर सटा लिया. फ़िर मैं हचक हचक कर उनके मुंह को चोदने लगा.

एक हिचकी के साथ जब मैं झड़ा तो उनकी आंखें चमकने लगीं. चूस चूस कर ऐसे उन्होंने मेरा वीर्य पिया कि कोई कैंडी हो. आखिर जब मैं मुरझा कर लस्त पड़ गया तो फ़िर मुझे पलटकर मेरी गांड चूसने लगे.

मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था. झड़ गया था पर वासना शांत नहीं हुई थी. मैं उठ बैठा और जिद करने लगा. "चाचाजी, अब मैं आपका लंड चूसूंगा. निकालिये बाहर." मुझे और कुछ कहने का समय न देकर उन्होंने मेरा मुंह फ़िर अपने होंठों से बंद कर दिया और मुझे बांहों में लेकर प्यार करने लगे. "बेटे, मैं तो निहाल हो गया. अब तुझसे जुदा होना मुश्किल है पर तेरी चाची के सामने कुछ कर भी नहीं सकता. उसे बुरा लगेगा."

"नहीं चाचाजी, चाची को सब पता है. वह भी कह रही थी कि जैसे आपने उनका खयाल रखा वैसे ही वे भी

आपका खयाल रखना चहती हैं. जैसे उन्हें बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ी, वैसे ही वे मुझे कह रही थीं कि घर में मेरे जैसा माल है आपके काम का तो क्यों न उसका उपयोग किया जाय." फ़िर मैंने पिछले दो हफ्तों में हुए सब कर्मों की कहानी उन्हें सुनाई.

अपनी पत्नी, भतीजे और पत्नी की भांजी की कहानी सुन वे इस जोर से उत्तेजित हुए कि उनकी सांसें जोर से चलने लगीं. मैंने टटोल कर देखा तो उनका शिश्न लोहे जैसा कड़ा था. मैं उसे देखने की और चूसने की जिद कर बैठा तो वे आखिर बड़ी अनिच्छा से नीचे लेट गये. शायद इस दुविधा में थे कि मैं उनकी साइज़ देखकर घबरा न जाऊ.

उनका लंड अब इस बुरी तरह से जांघिये में तंबू बना कर खड़ा था कि जांघिया निकल ही नहीं रहा था, फंस गया था. आखिर जब बड़ी मुश्किल से मैने उसे निकाला तो टन्न से वह खड़ा होकर झूमने लगा. मैं उसकी तरफ़ देखता ही रह गया. जरूर आठ नौ इंच का होगा. कम से कम ढाई इंच मोटा. किसी आधे किलो के गोरे गोरे गाजर की तरह लग रहा था. सूजी हुई नसें और ऊपर पाव भर के टमाटर जैसा सुपाड़ा ! लंड की जड़ में घनी काली झांटें थी. राजीव चाचा के पूरे चिकने शरीर पर बालों की कमी उन झांटों ने पूरी कर दी थी. नीचे दो बड़ी बड़ी भरी हुई गोटियां लटक रही थीं. मैं तो निहाल हो गया.

 
मेरे चेहरे पर के आनंद के भाव देखकर चाचाजी थोड़े आश्वस्त हुए. प्यार से मेरे बाल सहलाते हुए बोले. "अनिल बेटे, चूस ले अपने चाचा का लंड, इतना गाढ़ा वीर्य पिलाऊंगा कि रबड़ी भी उसके सामने फ़ीकी पड़ जाएगी." और वह अपना सुपाड़ा मेरे गालों और मुंह पर बड़े लाड से रगड़ने लगे.

मैंने पहले उसका चुंबन लिया और फ़िर दोनों मुठ्ठियों में उसका तना पकड़ लिया. इतना बड़ा था कि दोनों मुट्ठियों के ऊपर भी दो तीन इंच और निकला था. मैंने सुपाड़ा पर जीभ फ़िराई तो चाचाजी सिसकने लगे. मेरी जीभ के स्पर्श से लंड ऐसे उछला कि जैसे जिंदा जानवर हो. सुपाड़े की लाल चमड़ी बिलकुल रेशम जैसी मुलायम थी और बुरी तरह तनी हुई थी. सुपाड़े के बीच के छेद से बड़ी भीनी खुशबू आ रही थी और छेद पर एक मोती जैसी बूंद भी चमक रही थी. पास से उसकी घनी झांटें भी बहुत मादक लग रही थीं, एक एक घंघराला बाल साफ़ दिख रहा था. ।

मैं अब और न रुक सका और जीभ निकाल कर उस मस्त चीज़ को चाटने लगा. पहले तो मैने उस अमृत सी बूंद को जीभ से उठा लिया और फ़िर परे लंड को अपनी जीभ से ऐसे चाटने लगा जैसे कि आइसक्रीम की कैंडी हो. राजीव चाचा ने एक सुख की आह भरी और मेरे सिर को पकड़कर अपने पेट पर दबाना शुरू किया. "मजा आ गया मेरे बेटे, बड़ा मस्त चाटता है तू, अब मुंह में ले ले मेरे राजा, चूस ले."

मैं भी उस रसीले लंड की मलाई का स्वाद लेने को उत्सुक था इसलिये मैने अपने होंठ खोले और सुपाड़ा मुंह में लेने की कोशिश की. वह इतना बड़ा था कि पहली बार कोशिश करने पर मुंह में नहीं समा पाया और मेरे दांत उसकी नाजुक चमड़ी में लगने से चाचाजी सिसक उठे.

अधीर होकर राजीव चाचा ने बांये हाथ में अपना लौड़ा पकड़ा और दाहिने से मेरे गालों को दबाते हुए बोले. "लगता है मेरे बेटे ने कभी लंड नहीं चूसा, बिलकुल कुंवारा है इस खेल में. तुझसे चुसवाने में तो और मजा आयेगा, चल तुझे सिखाऊ, पहले तू अपने होंठों से अपने दांत ढक ले. शाब्बा ऽ स. अब मुंह खोल. इतना सा नहीं राजा! और खोल! समझ डेन्टिस्ट के यहां बैठा है."

उनका हाथ मेरे गालों को कस कर पिचका कर मेरा मुंह खोल रहा था और साथ ही मैं भी पूरी शक्ति से मेरा मुंह बा रहा था. ठीक मौके पर राजीव चाचा ने सुपाड़ा थोड़ा दबाया और मेरे मुंह में सरका दिया. पूरा सुपाड़ा ऐसे मेरे मुंह में भर गया जैसे बड़ा लड्डु हो. मुलायम चिकने उस सुपाड़े को मैं प्यार से चूसने लगा.

राजीव चाचा ने अब लंड पर से हाथ हटा लिया था और मेरे बालों में उंगलियां प्यार से चलाते हुए मुझे प्रोत्साहित करने लगे. अपनी जीभ मैने उनके सुपाड़े की सतह पर घुमाई तो चाचाजी हुमक उठे और दोनों हाथों से मेरा सिर पकड़कर अपने पेट पर दबाते हुए बोले. "पूरा ले ले मुंह में अनिल बेटे, निगल ले, पूरा लेकर चूसने में और मजा आयेगा. जैसा मैने किया था" ।

मैने अपना गला ढीला छोड़ा और लंड और अंदर लेने की कोशिश की. बस तीन चार इंच ही ले पाया. मेरा मुंह पूरा भर गया था और सुपाड़ा भी गले में पहुंच कर अटक गया था. राजीव चाचा ने अब अधीर होकर मेरा सिर पकड़ा और अपने पेट पर भींच लिया. वह अपना पूरा लंड मेरे मुंह मे घुसेड़ने की कोशिश कर रहे थे. गले में सुपाड़ा फंसने से मैं गोंगियाने लगा. लंड मुंह में लेकर चूसने में मुझे बहुत मजा आ रहा था पर अब ऐसा लग रहा था जैसे मेरा दम घुट जायेगा.

"चल कोई बात नहीं मेरे लाल, अच्छे अच्छे जवान घबरा जाते हैं इससे, तू तो प्यारा सा बच्चा है और तेरी पहली बार है, अगली बार पूरा ले लेना. अब चल, लेट मेरे पास, मैं आराम से तुझे अपना लंड चुसवाता हूं" कहते हुए चाचाजी चटाई पर अपनी करवट पर लेट गये और मुझे अपने सामने लिटा लिया. उनका लंड अभी भी मैंने मुंह में लिया हुआ था और चूस रहा था.

"देख अब मैं तेरे मुंह में मुठ्ठ मारता हूं, तू चूसता रह, जल्दी नहीं करना मेरे राजा, आराम से चूस, तू भी मजा ले, मैं भी लेता हूं." कहकर उन्होंने मेरे मुंह के बाहर निकले लंड को अपनी मुट्ठी में पकड़ा और मेरे सिर को दूसरे हाथ से थाम के सहारा दिया. फ़िर वे अपना हाथ आगे पीछे करते हुए सटासट सड़का मारने लगे.

जैसे उनका हाथ आगे पीछे होता, सुपाड़ा मेरे मुंह में और फूलता और सिकुड़ता जैसे गुब्बारा हो जिसमें बार बार हवा भरी जा रही हो. बड़ा मादक समां था. मैं ऊपर देखता हुआ उनकी आंखों में आंखें डालकर मन लगाकर चूसने लगा. राजीव चाचा बीच बीच में झुककर मेरा गाल चूम लेते. उनकी आंखों में अजब कामुकता और प्यार की खुमारी थी. आधे घंटे तक यह काम चला. जब भी वह झड़ने को होते तो हाथ रोक लेते. बड़ा जबरदस्त कंट्रोल था अपनी वासना पर, मंजे हुए खिलाड़ी थे.

 
वे तो शायद घंटों चुसवाते पर अब चाची के लौटने का समय हो गया था और मैं ही बहुत अधीर हो गया था. मेरा लंड भी फ़िर से खड़ा हो गया था और उस रसीले लंड का वीर्य पीने को मैं आतुर था. आखिर जब फ़िर से वे झड़ने के करीब आये तो मैंने बड़ी याचना भरी नजरों से उनकी ओर देखा.

उन्होंने भी एक हल्की सिसकी के साथ कहा. "ठीक है, चल अब झड़ता हूं, तैयार रहना मेरे बेटे, एक बूंद भी नहीं छोड़ना, मस्त माल है, तू खुशकिस्मत है, सब को नहीं पिलाता मैं." कह कर चाचाजे जोर जोर से हस्तमैथुन करने लगे. अब उनके दूसरे हाथ का दबाव भी मेरे सिर पर बढ़ गया था और लंड मेरे मुंह में गहरा ढूंसते हुए वे सपासप मुट्ठ मार रहे थे.

अचानक उनके मुंह से एक सिसकी निकली और उनका शरीर ऐंठ सा गया. सुपाड़ा अचानक मेरे मुंह में एकदम फूला जैसे गुब्बारा फूलकर फ़टने वाला हो. फ़िर गरम गरम घी जैसी बूंदें मेरे मुंह में बरसने लगी. शुरू में तो ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी ने मलाई का नल खोल दिया हो इसलिये मैं उन्हें मुंह से न निकलने देने के चक्कर में सीधा निगलता गया, जबकि मेरी इच्छा यह हो रही थी कि उन्हें जीभ पर लू और चखें.

जब उछलते लंड का दबाव कुछ कम हुआ तब जाकर मैने अपनी जीभ उनके मूत्रछिद्र पर लगाई और बूंदों को इकट्ठा करने लगा. चम्मच भर माल जमा होने पर मैने उसे चखा. मानों अमृत था. गाढ़ा गाढ़ा पिघले मक्खन सा, खारा और कुछ कसैला. मैने उस चिपचिपे द्रव्य को अपनी जीभ पर खूब घुमाया और जब वह पानी हो गया तो निगल लिया. तब तक राजीव चाचा का लंड एक और चम्मच माल मेरी जीभ पर उगल चुका था.

पांच मिनट लगे मुझे मेरे चाचाजी के इस अमूल्य उपहार को निगलने में. चाचाजी का लंड अब ठंडा होकर सिकुड़ने लगा था पर मैं उसे तब तक मुंह में लेकर प्यार से चूसता रहा जब तक वह बिलकुल नहीं मुरझा गया. आखिर जब मैने उसे मुंह से निकाला तो उन्होंने मुझे खींच कर ऊपर सरका लिया और मेरा चुंबन लेते हुए बोले. "मेरे राजा, मेरी जान, तू तो लंड चूसने में एकदम हीरा है, मालूम है, साले नए नौसिखिये छोकरे शुरू में बहुत सा वीर्य मुंह से निकल जाने देते हैं पर तूने तो एक बूंद नहीं बेकार की." मैं कुछ शरमाया और उन्हें चूमने लगा.

अब हम आपस में लिपटकर अपने हाथों से एक दूसरे के शरीर को सहला रहे थे. चुंबन जारी थे. एक दूसरे के लंड चूसने की प्यास बुझने के बाद हम दोनों ही अब चूमा चाटी के मूड में थे. पहले तो हमने एक दूसरे के होंठों का गहरा चुंबन लिया.

फ़िर हमने अपना मुंह खोला और खुले मुंह वाले चुंबन लेने लगे. अब मजा और बढ़ गया. चाचाजी ने अपनी जीभ मेरे होंठों पर चलाई और फ़िर मेरे मुंह में डाल दी और मेरी जीभ से लड़ाने लगे. मैंने भी जीभ निकाली और कुछ देर हम हंसते हुए सिर्फ जीभ लड़ाते रहे. फ़िर एक दूसरे की जीभ मुंह में लेकर चूसने का सिलसिला शुरू हुआ.

कीमती सिगरेट के धुएं में मिश्रित राजीव चाचा के मुंह के रस का स्वाद पहली बार मुझे ठीक से मिला और मुझे इतना अच्छा लगा कि मैं उनकी जीभ गोली जैसे चूसने लगा. उन्हें भी मेरा मुंह बहुत मीठा लगा होगा क्योंकि वह भी मेरी जीभ बार बार अपने होंठों में दबा कर चूस लेते.

राजीव चाचा ने सहसा प्यार से कहा "अनिल बेटे, मुंह खोल और खुला रख, जब तक मैं बंद करने को न कहूं, खुला रखना" और फ़िर मेरे खुले मुंह में उन्होंने अपनी लंबी जीभ डाली और मेरे दांत, मसूड़े, जीभ, तालू और आखिर में मेरा गला अंदर से चाटने लगे. उन्हें मैने मन भर कर अपने मुंह का स्वाद लेने दिया. फ़िर उन्होंने भी मुझे वही करने दिया.

अब हम दोनों के लंड फ़िर तन कर खड़े हो गये थे. एक दूसरे के लंडों को मुठ्ठी में पकड़कर हम मुठिया रहे थे. बड़ा मजा आ रहा था. तभी दरवाजा खुला और चाची अंदर आयीं.

 
चाचाजी थोड़े सकपका गये और उठने लगे. मैं वैसा ही उन्हें लिपटा पड़ा रहा. चाची मुस्कराकर अपने पतिदेव से बोलीं. "क्यों जी, कैसा लगा मेरा उपहार?" चाचाजी भाव विभोर हो गये. "मेरी जान, तुमने तो मुझे निहाल कर दिया. इतना खूबसूरत बच्चा, वह भी घर का माल, मेरा सगा भतीजा, मैने तो कल्पना भी नहीं की थी. कैसे तुम्हारा कर्ज़ चुकाऊ

चाची उनके सिर पर हाथ रखकर बोलीं. "तुमने भी तो मेरा इतना खयाल रखा, अनिल को मेरी चुदासी बुझाने को भेज दिया." चाचाजी अब भी मुझसे लिपटे हुए थे और अनजाने में मेरे नितंबों को सहलाते हुए मेरे गुदा पर एक उंगली धीरे धीरे दबा रहे थे. मेरा छेद ऐसा टाइट था कि वह अंदर नहीं जा रही थी.

चाची मजाक करते हुए बोलीं. "बड़ा सकरा है स्वर्ग का यह द्वार डार्लिंग . मैंने आजमा कर देखा है, एक उंगली भी मुश्किल से जाती है. मैंने अनिल से कहा कि चाचाजी के आने के पहले इसमें गाजर घुसेड़ कर थोड़ा ढीला कर ले तो माना ही नहीं. कहता था कि चाचाजी को अपनी कसी कुंवारी गांड दूंगा. जैसे सुहागरात को नववधू अनचुदी बुर पेश करती है अपने पति को"

चाचाजी झूम उठे. वे कल्पना कर रहे होंगे कि मेरी उस कुंवारी गांड को चोदने में क्या आनंद आयेगा. चाचीजी बोलीं. "मैं भी तुम्हारी सुहागरात करवा दूंगी इस मतवाले लड़के के साथ. एक बड़ा प्यारा खेल है मेरे मन में, अनिल को लड़कियों के कपड़े पहना कर बिलकुल दुल्हन जैसी तैयार करूंगी. है भी चिकना छोकरा, मेरे मेकप के बाद कोई कह नहीं सकेगा कि लड़का है. घर में ही उससे शादी रचाऊंगी तुम्हारी. अपनी सौत उसे बनाऊंगी, और फ़िर मेरी सौत को तुम चोदना मेरे ही सामने, सुहाग रात मनाना प्यार से."

सुन सुन कर चाचाजी गरमा रहे थे. अपनी पत्नी के इस प्लान को सुनकर उनका लंड उछलने लगा था. तभी चाची फ़िर बोलीं. "पर एक शर्त है जी. अपने भतीजे को भोगने के पहले मुझे भोगना होगा. अपने इस मतवाले लंड से मेरी प्यास बुझाना होगी. तीन चार दिन मुझे मन भर के चोदो तो फ़िर अगले हफ़्ते अनिल से तुम्हारी सुहागरात मनवा दूंगी. तब तक तुम उससे चूमाचाटी कर सकते हो, लंड भी चूस और चुसवा सकते हो पर उसकी गांड नहीं मार सकते. "

चाचाजी विवश होकर हाथ मलते हुए बोले."मैं तो तैयार हूं भागवान पर कैसे करू, तुम जानती हो औरतों को देखकर मेरा नहीं खड़ा होता."

मैं बोला. "चाचाजी, मैं आपको हेल्प करूगा. हम सब साथ ही सोएंगे रोज, देखिये कैसे चाची को आपसे चुदवाता हूं." चाचाजी तैयार हो गये. चाची सच कह रही थीं. मेरे किशोर शरीर की उन्हें इतनी चाह थी कि वे सब कुछ करने को तैयार थे.

हमारा प्रयोग अति सफ़ल रहा. पहली ही रात में गीता चाची ने राजीव चाचा का लंड अपने शरीर में घुसा ही लिया, भले ही पति पत्नी का पहला संभोग चाची की गांड में हुआ.

उस रात छत पर हम तीनों मच्छरदानी के नीचे साथ सोये. चाची चाचाजी का लौड़ा चूसना चाहती थीं. "अपने पतिदेव का प्रसाद तो पा लू एक भारतीय नारी की तरह." वे बोलीं.

शुरू में कठिनायी हुई. पक्के गे चाचाजी का लंड चाची के चूसने से खड़ा ही नहीं हुआ. आखिर मैं उनके काम आया. चाचाजी के मुंह में मैंने अपना लंड दिया. खुद कुछ देर उनका लंड चूसा. जब वे मस्त हो गये तो उन्हें कहा कि आंखें बंद कर लें और सोचें कि मैं या कोई सजीला जवान चूस रहा है. फ़िर धीरे से मेरी जगह चाची ने ले ली.

चाची लंड चूसने में माहिर थीं हीं. इतना बड़ा लंड भी वे पूरा निगल गयीं. ऐसे मस्त कर के चूसा कि आखिर चाचाजी भी मान गये और चाचीके सिर को पकड़कर उनके मुंह को चोदने लगे. जब झड़े तो उनका वीर्य पान करके चाची खुशी से रो दीं. चाची के कहने पर इनाम के बतौर चाचाजी को मैंने अपना लंड चुसवाया और उनके मुंह में अपना वीर्य झड़ाया जिसे उन्होंने खूब चटखारे ले लेकर खाया.

उसके बाद चूमा चाटी हुई. बारी बारी से मैंने और चाची ने राजीव चाचा को चुम्मा दिया. पहले तो चाचाजी मुझे बड़े आवेश से चूमते और चाची को बस धीरे से चुंबन दे देते. मैं लगातार उनके लंड से खेलता रहा. फ़िर उनके चूतड़ सहलाये. बड़े मांसल और मजबूत नितंब थे उनके आखिर जब मैंने एक उंगली उनके गुदा में डाली तब उन्हें मजा आना शुरू हुआ. कुछ ही देर में वे चाची से लिपट लिपट कर उन्हें चूमने लगे और मम्मे भी दबाने लगे. फ़िर मैं और चाची ओंधे पलंग पर लेट गये और चाचाजी से हमारी गांड पूजा करने को कहा.

राजीव चाचा को तो मानों खजाना मिल गया. वे कभी मेरे नितंब चूमते और दबाते और कभी चाची के. गांड तो चाची की भी बहुत खूबसूरत थी. इसलिये उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई.

आखिर में जब वे हम दोनों के गुदा चूसने लगे तब मैं समझ गया कि लंड खड़ा हो गया है. अब मैं उठ कर चुपचाप नीचे हो लिया और राजीव चाचा का लौड़ा चूसने लगा. वासना से उफ़नते हुए वे जोर जोर से चाची की गांड चूसने लगे, उनके गुदा में जीभ डालने लगे. चाची भी वासना से कराहने लगीं.

तब मैंने उनसे पूछा."गीता चाची, गांड मरायेंगी चाचाजी से? यही मौका है. दर्द तो होगा पर मजा भी आयेगा." वे तैयार थीं. मैंने चाचाजी से कहा कि चढ़ जायें. लंड और गुदा दोनों गीले थे, फ़िर भी चाची के गुदा में मैंने थोड़ा तेल मल दिया कि बाद में तकलीफ़ न हो.

 
चाचाजी चाची के ऊपर झुक कर तैयार हुए. पहली बार किसी स्त्री से संभोग कर रहे थे चाहे गुदा संभोग ही क्यों न हो. उनका मस्त खड़ा लंड बैठ न जाये इसलिये मैंने झुककर चाचाजी का एक निपल मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया. वे मस्ती में चिहुक उठे. मैंने फ़िर अपने हाथ में उनका लौड़ा पकड़कर सुपाड़ा चाची के गुदा पर रखा. चाची के मुलायम छोटे छेद पर वह मोटा गेंद सा सुपाड़ा देखकर मैं समझ गया कि काम मुश्किल है. चाची रो देंगी.

चाचाजी एक्सपर्ट थे. चाची को प्यार से उन्होंने समझाया "रानी, गुदा ढीला करो जैसा टट्टी के समय करती हो" उधर चाची ने जोर लगाया और उधर चाचाजी ने लौड़ा पेल दिया. एक ही बार में वह अंदर हो गया. चाची की चीख निकल गयी और वे छटपटाने लगीं. कोई सुन न ले और बना बनाया काम न बिगड़ जाये इसलिये मैंने हाथ से चाची

का मुंह कस कर बंद किया और चाचाजी का निपल मुंह से निकाल कर कहा. "पेलिये चाचाजी, जड़ तक उतार दीजिये, यही मौका है." और उनके होंठों पर होंठ रख कर अपनी जीभ उनके मुंह में डाल दी.

उन्हें मजा आ गया. मुझे बेतहाशा चूमते हुए उन्होंने कस के दो चार धक्कों में ही अपना पूरा आठ नौ इंची शिश्न अपनी पत्नी के चूतड़ों के बीच गाड़ दिया. चाची अब ऐसे छटपटा रही थीं जैसे कोई उन्हें हलाल कर रहा हो. उनके मुंह पर कसे मेरे हाथ पर उनके आंसू बहने लगे. जब उनकी तकलीफ़ कुछ कम हुई तो मैंने हाथ उनके मुंह से हटाया. "हा ऽ य मर गई राजा बेटा, इन्होंने तो मेरी गांड फ़ाड़ दी रे." वे बिलबिलाते हुए बोलीं.

चाचाजी को अब काफ़ी मजा आ रहा था. वे चाची के शरीर पर लेट गये और धीरे धीरे दो तीन इंच लंड अंदर बाहर करते हुए अपनी पत्नी की गांड मारने लगे. मैं पास में लेटकर उन दोनों के गाल चूमने लगा. चाची के आंसू मैंने अपनी जीभ से टिप लिये और उनका मुंह चूमने लगा. फ़िर चाचाजी के होंठों का चुंबन लेने लगा. मेरी जीभ उनके मुंह में जाते ही उन्हें और तैश आया और वे घचाघच चाची के चूतड़ों के बीच अपना लौड़ा अंदर बाहर करने लगे.

मेरे साथ उनकी चूमा चाटी जारी थी. मैं समझ गया कि मुझसे चुंबनों का आदान प्रदान करते हुए और नीचे पड़े शरीर की गांड मारते हुए उन्हें ऐसा लग रह होगा कि जैसे वे अपने गे यार दोस्तों के साथ रति कर रहे हों. मैंने अपना एक हाथ चाची की जांघों के बीच डाला और उनका क्लिटोरिस मसलने लगा. दो उंगली अंदर भी डाल दीं. अब गीता चाची को भी कुछ मजा आने लगा. उनका रोना कम हुआ और दो मिनिट में एक दो हिचकियां और लेकर वे चुप हो गयीं. उनके तेल लगे गुदा में अब चाचाजी का लंड भी मस्त फ़िसल रहा था इसलिये दर्द काफ़ी कम हो गया था.

कुछ ही देर में वे मचल मचल कर मरवाने लगीं. "मारो जी मेरी, और मारो, फ़ट जाये तो फ़ट जाये आखिर मेरे मर्द हो, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है." मैंने चाचाजी के मुंह से अपना मुंह हटा कर कहा कि असली मजा लेना हो तो अब चाची के स्तन दबाते हुए गांड मारें.

मम्मे दबाने में चाचाजी को वह आनंद आया कि वे अपना मुंह चाची की जुल्फ़ों में छुपाकर उनकी गर्दन चूमते हुए हचक हचक कर लंड पेलने लगे. पति पत्नी में अब घचाघच गुदा संभोग शुरू हो गया. दोनों को बहुत मजा आ रहा था. मेरा काम हो गया था इसलिये मैं अब हटकर अपना लंड मुठियाते हुए तमाशा देखने लगा.

चाचाजी ने मजा ले लेकर आधा घंटा चाची की मारी तव जाकर झड़े. चाची दर्द से कराहते हुए भी मरवाती रहीं, रुकने को नहीं बोलीं, क्योंकि एक तो अब उनकी चूत भी पसीज गयी थी और फ़िर वे आखिर अपने पति से गांड मरवा रही थीं इसका उन्हें संतोष था. जब चाचाजी झड़े तो उनके गरम गरम वीर्य के फुहारे से चाची की चुदी गांड को काफ़ी राहत मिली. अपनी ही बुर में उंगली करके चाची भी झड़ ली थीं.

आज की रात सफ़ल रही थी. मैंने पहले अपना पुरस्कार वसूल किया. चाचाजी का लंड चाची की गांड से निकाल कर चूसा. वीर्य से लिथड़े हुए उस लौड़े का बहुत मजेदार स्वाद था. फ़िर गीता चाची के गुदा से मुंह लगाकर जितना हो सकता था, उतना राजीव चाचा का वीर्य निगल लिया और जीभ अंदर डाल कर खुब चाटा. फ़िर चाची की चूत चूसी. आज उसमें गजब का रस था. उन्होंने भी बड़े प्यार से चुसवाई. "मेरे लाडले, मेरे लल्ला, तूने तो आज निहाल कर दिया अपनी चाची को." मैंने उनकी बुर चूसते हुए कहा. "अभी तो कुछ नहीं हुआ चाची, कल जब चाचाजी तुम्हें चोदेंगे, तब कहना."

 
आज की रात सफ़ल रही थी. मैंने पहले अपना पुरस्कार वसूल किया. चाचाजी का लंड चाची की गांड से निकाल कर चूसा. वीर्य से लिथड़े हुए उस लौड़े का बहुत मजेदार स्वाद था. फ़िर गीता चाची के गुदा से मुंह लगाकर जितना हो सकता था, उतना राजीव चाचा का वीर्य निगल लिया और जीभ अंदर डाल कर खुब चाटा. फ़िर चाची की चूत चूसी. आज उसमें गजब का रस था. उन्होंने भी बड़े प्यार से चुसवाई. "मेरे लाडले, मेरे लल्ला, तूने तो आज निहाल कर दिया अपनी चाची को." मैंने उनकी बुर चूसते हुए कहा. "अभी तो कुछ नहीं हुआ चाची, कल जब चाचाजी तुम्हें चोदेंगे, तब कहना."

फ़िर मैं चाची पर चढ़कर उन्हें चोदने लगा. चाचाजी बड़े इंटरेस्ट से मेरा यह कारनामा देख रहे थे; आखिर कल उन्हें भी करना था. वे बीच बीच में मेरी नितंबों को चूमते और गांड का छेद चूसने लगते जिससे मैं और हचक हचक कर उनकी पत्नी को चोदने लगता. बीच में चुदते चुदते चाची ने मेरे कान में हल्के से पूछा. "लल्ला, ये मेरी बुर कब चूसेंगे? मैं मरी जा रही हूं अपना पानी इन्हें पिलाने को." चाची के कान में फुसफुसा कर मैंने जवाब दिया."आज ही शुरुवात किये देता हूं चाची, तुम देखती जाओ, एक बार तुम्हारे माल का स्वाद लग जाए इनके मुंह में, कल से खुद ही गिड़गिड़ायेंगे तुम्हारे सामने.

झड़ने के बाद जब मैंने लंड चाची की चूत से बाहर निकाला तो उसमें मेरे वीर्य और चाची के शहद का मिश्रण लिपटा हुआ था. चाचाजी कुछ देर देखते रहे और आखिर उनसे न रहा गया. उन्होंने उसे मुंह में लेकर चूस डाला. शायद शुरू में इस लिये हिचकिचा रहे थे कि स्त्री की चूत का रस न जाने कैसा लगे. शायद वह उन्हें भा गया क्योंकि बड़ी देर तक मेरा लंड चूसते रहे.

मैंने उनके बाल प्यार से बिखेर कर कहा. "चाचाजी, और बहुत माल है, यहां देखिये" कह कर मैंने चाची की बुर की

ओर इशारा किया. उसमें से मेरा वीर्य और उनका रस बह रहा था. चाचाजी झट से अपनी पत्नी की टांगों के बीच घुस कर चाची की चूत से बहता मेरा वीर्य चाटने लगे.

चाची सुख से सिहर उठीं. अपने पतिका सिर पकड़कर अपनी जांघों में जकड़ लिया और मुंह बुर पर दबा लिया. "अब नहीं छोड़ेंगे प्राणनाथ, पूरा रस पिलाकर ही रहूंगी." और वे धक्के दे देकर चाचाजी का मुंह चोदने लगीं. मुझे डर लगा कि कहीं चाचाजी बुर के स्वाद से विचक न जाये पर बुर में मेरा वीर्य काफ़ी था. चाचाजी भी उसे चाटने में जो जुटे तो चाची की बुर में से जीभ डाल कर आखरी कतरा तक चूस डाला.

तब तक चाची तीन चार बार झड़ा चुकी थीं. वह सब रस भी उनके पतिदेव के मुंह में गया. लगता है नारी की योनि का रस पसंद आया क्योंकि चाचाजी के चेहरे पर कोई हिचक नहीं थी. आखिर में तो प्यार से वे काफ़ी देर अपनी पत्नी की चूत चाटते रहे.

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चाचाजी और मैं फ़िर मूतने के लिये छत पर चले गये. 'तू भी मूत ले रानी, फ़िर आगे का काम शुरू करते हैं." चाचाजी प्यार से बोले. "मैं बाद में कर लूंगी. तुम लोग हो आओ." वे मुस्कराकर बोलीं.

चाचाजी ने मटके का ठंडा पानी पिया और चाची को भी दिया. जब मुझे दिया तो मैंने मना कर दिया. "तुझे प्यास नहीं लगी बेटे?" उन्होंने पूछा तो मैं चुप रहा. चाची ने बिस्तर से पुकार कर कहा. "अरे वह पानी नहीं सिर्फ शरबत पीता है. आ जा अनिल, तेरा शरबत तैयार है." चाचाजी ने उनसे पूचा. "कौन सा शरबत है जो प्यार से बिस्तर में पिलाती हो? जरा मैं भी तो देखू!" चाची खिलखिलाकर बोलीं. "जल्दी आ अनिल, नहीं तो छलक जायेगा. अब नहीं रहा जाता मुझसे."

चाची बिस्तर पर घुटने टेक कर तैयार थीं. मैं झट से उनकी टांगों के बीच घुस कर लेट गया. अपनी झांटें बाजू में करके चाची ने अपनी बुर मेरे मुंह पर जमायी और मूतने लगी. मैं चटखारे लेकर उनका मूत पीने लगा. चाचाजी के चेहरे पर आश्चर्य और कामवासना के भाव उमड़ आये. "अरे तू तो मूत रही है अनिल के मुंह में?"

चाची हंस कर बोलीं. "यही तो शरबत है मेरे लाड़ले का. दिन भर और रात को भी पिलाती हूं. इसने तो पानी पीना ही छोड़ दिया है. और तुम्हारी कसम, दो हफ्ते से मैंने बाथरूम में मूतना ही छोड़ दिया है. यही है अब मेरा प्यारा मस्त चलता फ़िरता जिंदा बाथरूम.'

चाची का मूतना खतम होते होते मेरा तन कर खड़ा हो गया. इस मतवाली क्रिया को देखकर दो मिनिट में चाचाजी का भी लौड़ा तन्ना गया. चाची ने मौका देखकर तुरंत उनका लंड मुंह में ले लिया और चूसने लगीं. पति की मलाई खाने का इससे अच्छा मौका नहीं था. उधर चाचाजी गरमा कर मेरे ऊपर झुक गये और मेरा लंड मुंह में लेकर चूसने लगे. मैं सुख से सिहर उठा. देखा तो चाची अपनी टांगें खोल कर अपनी बुर मे उंगली करते हुए मुझे इशारे कर रही थीं. मैं समझ गया और किसी तरह सरक कर उनकी टांगों में सिर डालकर उनकी बुर चूसने लगा.

यह मादक त्रिकोण सबकी प्यास बुझा कर ही टूटा. चाची तीन बार मेरे मुंह में झड़ीं. मैंने चाचाजी का सिर पकड़कर खूब धक्के लगाये और उनके मुंह में झड़ कर उन्हें अपनी मलाई खिलाई. चाचाजी आखिर में झड़े और उनके लंड ने ढेर सारा वीर्य अपनी पत्नी के गले में उगल दिया.

उस रात का संभोग यहीं खतम हुआ और हम सो गये. दूसरे दिन दोपहर में आगे कहानी शुरू हुई. मेरे मुंह में चाची के मूतने से कार्यक्रम शुरू हुआ. इससे हम तीनों मस्त गरम हो गये थे. पति पत्नी बातें करने लगे कि आज क्या किया जाए. जवाब सहज था, चाची की चूत चोदना बाकी था .

उसम्मे चाचाजी अब भी थोड़ा हिचक रहे थे. आखिर पक्के गांड मारू जो थे! हमने एक बार कोशिश की पर चाची की चूत में घुसते घुसते उनका बैठ गया. आखिर एक पक्के गे के लिये यह सबसे बड़ी चुनौती थी. चाचाजी भी परेशान थे क्योंकि वे सच में अपनी पत्नी को चोदना चाहते थे.

आखिर मैंने राह निकाली. मैंने कहा, "ऐसा कीजिये चाचाजी, आप ओंधा लेटिये, मैं आपकी गांड में लंड डालता हूं. फ़िर आप चाची पर चढ़ कर उसे चोदिये. मैं ऊपर से आपकी गांड मारूंगा. आप को दोहरा मजा आ जायेगा. उस मजे में आप चाची को मस्त चोद लेंगे."

वे खुश हो गये. मेरे लंड को देखते हुए बोले. "सच बेटे, तू मेरी मारेगा? मुझे तो मजा आ जायेगा मेरे राजा." मैं थोड़ा शरमा कर बोला. "हां चाचाजी, आपकी कसी मोटी ताजी गांड मुझे बहुत अच्छी लगती है. प्यार करने का मन होता है. सोचा मौका अच्छा है, चाची का काम भी हो जायेगा.

चाचाजी ने मुझे चूम लिया. "वाह मेरे शेर, आ जा" कहकर वे झट से ओंधे मुंह के वल बिस्तर पर लेट गये और अपने चूतड़ हिला कर मुझे रिझाते हुए बोले. "देख अब मेरी गांड तेरी है बेटे, जो करना है कर, तेरी गांड तो बहुत प्यारी है मेरे लाल, बिलकुल लौंडियों जैसी, मेरी जरा बड़ी है. देख अच्छी लगती है तुझे या नहीं."

 
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