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गीता चाची -Geeta chachi complete

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इस आसन में वे नीचे लेट जातीं और मैं उनके खुले मुंह में जड़ तक लंड उतार देता. फ़िर उनपर लेट कर हाथों से उनके सिर को पकड़कर उसे घचाघच चोदता. चाची के गले तक मेरा लंड उतर जाता और उस कोमल गीले गले में सुपाड़ा चलता तो बिलकुल ऐसा लगता जैसे किसी सकरी चूत को चोद रहा हूं.

झड़ने पर वीर्य भी सीधा उनके हलक में जाता. इसीलिये यह आसन वे कम करने देती थीं. एक तो उनका गला भी थोड़ा दुखता, दूसरे वीर्य सीधा पेट में जाने से वे उसका स्वाद नहीं ले पाती थीं जबकि जीभ पर वीर्य लेकर उसे स्वाद ले लेकर धीरे धीरे खाना उन्हें बहुत अच्छा लगता था.

चूत चूसने के तो कई मस्त आसन थे. पहला यह कि चाची को पलंग पर लिटा कर उनकी निचली जांघ का तकिया बनाकर मैं चूत चूसता. वे ऊपरी जांघ मेरे सिर पर रखकर मेरे सिर को दोनों जांघों में दबोच लेतीं और हाथों से मेरा सिर पकड़कर अपनी चूत पर दबा कर मुझसे चुसवातीं. इस आसन में वे अक्सर अपनी टांगें ऐसे फ़टकारतीं जैसे साइकिल चला रही हों. उनकी सशक्त जांघे कभी कभी इतनी जोर से मेरे सिर को जकड़ लेतीं कि जैसे कुचल डालेंगी. दर्द भी होता पर उन मदमस्त चिकनी जांघों में गिरफ्त होने का सुख इतना प्यारा था कि मैं दर्द को सहन कर लेता.

कभी कभी वे कुर्सी में बैठ कर टांगें पसार देतीं और मैं जमीन पर उनके सामने बैठ कर चूत चूसता. मेरे बालों में वे प्यार से उंगलियां फेरती रहतीं. यह बड़ा आराम का आसन था. खड़े खड़े चुसवाने में भी उन्हें मजा आता था. वे टांगें फैलाकर दीवार से टिककर खड़ी हो जातीं और मैं उनके बीच बैठकर मुंह उठाकर उनकी बुर चूसता रहता.

हर आसन में मैं उनकी बुर में अक्सर जीभ डालता. पर जब उन्हें जीभ से चुदने का शौक चर्राता, वे एक खास आसन का इस्तेमाल करती थीं. मैं पलंग पर लेटकर जीभ जितनी हो सकती थी उतनी बाहर निकाल देता और कड़ी कर लेता. मेरे सिर पर बैठकर वे जीभ बुर में ले लेतीं और फ़िर ऊपर नीचे होकर उसे लंड सा चोदतीं. पांच मिनिट से ज्यादा मैं नहीं यह कर पाता था क्योंकि जीभ दुखने लगती थी. पर चाची को इतना मजा आता था कि एक दो मिनिट को जीभ को आराम देकर मैं फ़िर उसमें जुट जाता. इस आसन में रस खून निकलता था जो सीधा मेरी जीभ पर टपकता था.

और जब चाची मुझे हस्तमैथुन करके दिखातीं तो मैं तो वासना से पागल हो जाता. यहां तक कि एक दो बार न रहकर मैंने मुट्ठ मार ली और चाची नाराज होकर लाल पीली हो गयीं. उसके बाद वे पहले मेरे हाथ पैर बांध देतीं और फ़िर बाद में अपनी हस्तमैथुन कला मुझे दिखातीं. इसकी शुरुवात एक दिन दोपहर को तब हुई जब चाची ने दो उंगलियां अपनी बुर में घुसेड़ कर मुठ्ठ मार कर मुझे दिखायी. मेरी खुशी देखकर उन्हें और तैश आया. "रुक लल्ला, अभी आती हूँ" कहकर वे रसोई में चली गईं.

 
वापस आयीं तो हाथ में एक मोटा गाजर और दो तीन बैंगन थे. मुस्कराते हुए वे वापस पलंग पर चढ़ीं और फ़िर गाजर अपनी चूत में डाल कर उससे मुठ्ठ मारकर दिखाई. लाल लाल मोटा गाजर उस नरम नरम चूत में अंदर बाहर होता देखकर मैं ऐसा उत्तेजित हुआ कि पूछो मत. मेरी खुशी देखकर वे हंसते हुए बोलीं. "यह तो कुछ नहीं है। लल्ला, अब देखो तमाशा." कहकर उन्होंने बैंगन उठा लिये. वे लंबे वाले बैंगन थे. पर फ़िर भी बहुत मोटे थे. मेरे लंड से दुगने मोटे होंगे. और फुट फुट भर लंबे थे.

"कभी सोचा है लल्ला कि इस घर में बैंगन की सब्जी इतनी क्यों बनती है?" उन्होंने शैतानी से बैंगनों को उलट पलट कर देखते हुए पूछा. मैं वासना से ऐसे सकते में था कि कुछ नहीं कह सका. आखिर चाची ने एक चुना. दूसरे

या तो ज्यादा ही टेढ़े थे या दाग वाले थे. उन्होंने जो चुना वह एकदम चिकना फुट भर लंबा होगा. नीचे से वह एक इंच मोटा था और धीरे धीरे बीच तक उसकी मोटाई तीन इंच हो जाती थी. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि चाची उस मोटे बैंगन को अपने शरीर के अंदर ले लेंगी. मैंने वैसा कहा भी तो गीता चाची हंसने लगीं.

"मैंने कहा था ना लल्ला कि मेरी चूत तो तुझे भी अंदर ले ले. अरे औरत की चूत को तू नहीं जानता. जब बच्चे का सिर निकल जाता है तो इस बैंगन की क्या बात है." कहकर उन्होंने डंठल को पकड़कर धीरे धीरे बैंगन अपनी चूत में घुसेड़ना शुरू किया. तीन चार इंच तो आराम से गया. फ़िर वे रुक गयीं और बड़ी सावधानी से इंच इंच करके उसे और अंदर घुसाने लगीं. मैं आंखें फ़ाड़ कर देखता रह गया. अंत में नौ इंच से ज्यादा बैंगन उन्होंने अंदर ले लिया. चूत अब बिलकुल खुली थी. उसका लाल छल्ला बैंगन को कस कर पकड़ा था. ऐसा लगता था कि फ़ट जायेगी.

पर चाची के चेहरे पर असीमित सुख था. आंखें बंद करके कुछ देर बैठा रहीं. फ़िर धीरे धीरे बैंगन अपनी चूत में अंदर बाहर करने लगीं. कुछ ही देर में उनकी स्पीड बढ़ गयी. चूत भी अब इतनी गीली हो गयी थी कि बैंगन आराम से सरक रहा था. पांच मिनिट बाद तो वे सटासट मुट्ठ मार रही थीं. दूसरे हाथ की उंगली क्लिट को मसल रही थी. यह इतना आकर्षक कामुक नजारा था कि मैं भी मुट्ठ मारने लगा. वहां चाची झड़ीं और यहां मैं.

झड़ने के बाद में वे बहुत नाराज हुईं, यहां तक कि मुझे एक करारा तमाचा भी जड़ दिया. शायद और मार पड़ती पर मैंने कम से कम इतनी होशियारी की थी कि झड़ कर वीर्य को गिरने नहीं दिया था बल्कि अपनी बांयी हथेली में जमा कर लिया था. चाची ने उसे चाट लिया और तब तक उनकी बुर से बैंगन निकालकर उसे मैंने चाट डाला. उस रात उसी बैंगन की सब्जी बनी, यह बात अलग है.

पर उसके बाद चाची मुझे कुरसी में बिठाकर हाथ पैर बांध करके ही सब्जियों और फ़लों से मुठ्ठ मार कर दिखातीं. कोई चीज़ उन्होंने नहीं छोड़ी. ककड़ी, छोटी वाली लौकी, केले, मूली इत्यादि. छिले केले से हस्तमैथुन करने में एक फ़ायदा यह था कि मुठ्ठ मारने के बाद उनकी चूत में से वह मीठा चिपचिपा केला खाने में बड़ा मजा आता था. पर चाची केला ज्यादा इस्तेमाल नहीं करती थीं क्योंकि धीरे धीरे संभल कर हस्तमैथुन करना पड़ता था नहीं तो केला टूट जाने का खतरा रहता था.

 
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चाची ने बस एक जुल्म मुझ पर किया. उन शुरुवात के दिनों में एक भी बार गुदा मैथुन नहीं करने दिया जिसके लिये मैं मरा जा रहा था. उनके गोरे मुलायम मोटे मोटे चूतड़ों ने मुझ पर जादू कर दिया था. अक्सर कामक्रीड़ा के बाद वे जब पट पड़ी आराम करतीं, मैं उनके नितंबों को खूब प्यार करता, उन्हें चूमता, चाटता, मसलता यहां तक कि उनके गुदा पर मुंह लगाकर भी चूसता और कभी कभी जीभ अंदर डाल देता. वह अनोखा स्वाद और सुगंध मुझे मदहोश कर देते.

चाची मेरी गांड पूजा का मजा लेती रहतीं पर जब भी मैं उंगली डालने की भी कोशिश करता, लंड की बात तो दूर रही, वे बिचक जातीं और सीधी होकर हंसने लगतीं. मेरी सारी मिन्नतें बेकार गयीं. बस एक बात पर मेरी आशा बंधी थी, उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि कभी गांड मारने नहीं देंगी. बस यही कहतीं. "अभी नहीं लल्ला, तपस्या करो, इतना बड़ा खजाना ऐसे ही थोड़े दे दूंगी."

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दूसरे दिन हम तीनों नहा धो कर बस दोपहर की राह देख रहे थे कि कब नौकरानी घर जाये और कब हम हमारे खेल शुरू करें. प्रीति बार बार चाची से चिपटने का बहाना देख रही थी. मेरी ओर भी कनखियों से देख रही थी और मुस्करा रही थी. आज वह बला की खूबसूरत लग रही थी. जान बूझकर एक छोटा स्कर्ट और एकदम तंग ब्लाउज़ पहन कर घूम रही थी जिसमें से उसकी टांगें और मम्मे साफ़ दिख रहे थे. चाची ने कई बार आंखें दिखा कर हमें डांटा पर वे भी मंद मंद मुस्करा रही थीं. अब तो उनके भी वारे न्यारे थे. दो एकदम किशोर चाहने वाले, एक लड़का याने मैं और एक लड़की याने प्रीति उनके आगे पीछे घूम रहे थे. खट्टे और मीठे दोनों स्वादों का इंतजाम था उनके लिये.

आखिर नौकरानी घर गयी और हमने दौड़ कर चाची के कमरे में घुस कर दरवाजा लगा लिया. प्रीति तो जाकर चाची की बांहों में समा गयी और दोनों एक दूसरे को बेतहाशा चूमने लगीं. चाची उसे कस कर पकड़े हुए सोफे पर बैठ गयी और मुझे भी अपने पास बैठा लिया. अब वे कभी प्रीति के चुंबन लेतीं कभी मेरे. आखिर पूरा गरम होने के बाद वे उठीं और कपड़े उतारने लगीं. हमें भी उन्होंने नंगे होने का आदेश दिया.

मैं तो तुरंत नंगा हो गया. तन कर खड़े और उछलते मेरे लंड को देखकर प्रीति होंठों पर जीभ फेरने लगी. वह थोड़ी शरमा रही थी इसलिये धीरे धीरे कपड़े उतार रही थी. चाची अब तक साड़ी चोली उतार कर अर्धनग्न हो गयी थीं. उनके ब्रा और पैंटी में लिपटे मांसल बदन को देखकर प्रीति पथरा सी गयी. उनकी ओर घूरती हुई अनजाने में अपने हाथ से अपनी चूत स्कर्ट पर से ही रगड़ने लगी.

चाची उसके पास गयीं और प्यार से धीरे धीरे उसका स्कर्ट और टॉप निकाला. अंदर प्रीति एक बड़ी प्यारी सी कॉटन की सिंपल सफ़ेद ब्रा और चड्डी पहने थी. अधखिले उरोज ब्रा में से झांक रहे थे. उस कच्ची कली के छरहरे गोरे बदन को देखकर हम दोनों ऐसे गरम हुए कि समझ में नहीं आ रहा था कि कौन किसे पहले भोगे. हम दोनों उस लड़की से लिपट गये और उसके बदन को हाथों से सहलाते हुए और दबाते हुए उसे चूमने लगे. कभी मैं उसके लाल होंठ चूसता तो कभी चाची. झुक कर कभी उसका पेट चूम लेते तो कभी गोरी पतली जांघे.

चाची ने आखिर पहल की और अपनी ब्रा और पैंटी उतार फेंकी. बोलीं. "प्रीति बिटिया, तू नयी है इसलिये यहां बैठकर हमारा खेल देख़ अपने आप समझ जायेगी कि कैसे क्या करना है." प्रीति को एक कुर्सी में बिठा कर वे मेरे पास आयीं और हमारी रति लीला आरंभ हो गयी.

 
हमने सब कुछ किया. मैंने पहले कई तरह से चाची की बुर चूसी और फ़िर उन्हें तरह तरह से चोदा. यह देख देख कर प्रीति सिसकियां भरती हुई अपनी ही छातियां दबाने लगी और पैंटी पर चूत को रगड़ने लगी. आखिर उससे नहीं रहा गया और उसने भी अपने अंतर्वस्त्र उतार दिये. पूर्ण नग्न कमसिन गोरा शरीर ऐसा फ़ब रहा था जैसे रसीली कच्ची गुलाब की कली. लगातार वह अपनी गोरी बुर रगड़ती हुई टांगें हिला हिला कर हस्तमैथुन करने लगी.

पीछे से जब मैं चाची को चोद रहा था तो इस आसन को देख कर तो प्रीति ऐसी तुनकी कि उठकर हमारे पास आ गयी और चाची की लटकती चूचियां दबाती हुई उन्हें जोर जोर से चूमने लगी. बड़ी मुश्किल से चाची ने उसे वापस भेजा नहीं तो भांजी मौसी के उस चुंबन को देखकर मैं जरूर झड़ जाता.

जब मैं झड़ने के करीब आ गया तब चाची ने खेल रोका. वे कई बार स्खलित हो चुकी थीं. मुझे कुर्सी में बिठाकर मेरे चूत रस से गीले लंड को हाथ में लेकर चाटती हुई बोलीं. "अब आ जा बिटिया, तुझे लंड चखाऊ, बड़ा रसीला प्यारा लंड है मेरे भतीजे का, एजदम शिवजी का लिंग समझ ले."

प्रीति झट से पास आकर उनके साथ मेरे सामने बैठ गयी. चाची बड़े प्यार से लंड चूस रही थीं और उस पर लगा अपनी ही बुर का पानी चाट रही थीं. "ले, तू भी चाट, पकड़ ना पगली, काटेगा थोड़े!" उन्होंने हंस कर कहा. प्रीति ने मेरा लौड़ा कांपते हाथों पकड़ा और चाटने लगी. उसकी उस छोटी सी गरम गरम जीभ ने मुझे वह सुख दिया कि मैं और तड़प उठा.

"लड़का बस झड़ने को है रानी. देख, मैं कैसे चूसती हूं, तू भी वैसे ही चूस, मलाई निकलेगी तब देखना क्या स्वाद आता है." कहकर चाची ने मुंह खोला और पूरा लौड़ा निगल कर उसे चूसने लगी. छह सात इंच के मोटे लंड को आसानी से निगला देखकर प्रीति उनकी ओर आश्चर्य से देखने लगी. चाची मुंह से मेरा लंड निकाल कर बोलीं. "ले अब तू चूस. दांत नहीं लगाना"

उसने मुंह पूरा खोला और सुपाड़ा तो अंदर ले लिया पर और नहीं निगल पायी. पर मजे ले लेकर चूसने लगी. "अरे और ले मुंह में" चाची ने कहा पर कोशिश कर के भी वह किशोरी बस दो तीन इंच ही और निगल पायी. फ़िर दम घुटने से गोंगियाने लगी. चाची बोली. "पहली बार है, सिखाना पड़ेगा, चल ऐसे ही चूस"

उसके उस कोमल मुंह ने ऐसा जादू किया कि मैं तड़प उठा. चाची प्रीति को बोलीं. "देख बिटिया, अब अनिल झड़ेगा तो एक भी बूंद बाहर नहीं निकले. पूरा निगल जाना." प्रीति ने समझ कर मुंडी हिलाई और चूसती रही. अगले ही क्षण मैंने हुमक कर उसका सिर पकड़ लिया और उसके मुंह में झड़ गया. पहले तो वह सकपकायी पर फ़िर संभल कर आंख बंद कर के मेरा वीर्य पीने लगी. लगता है कि उसे वह बहुत भा गया क्योंकि एक एक बूंद निचोड़ कर लंड को पूरा शिथिल करके ही उसके मुंह से निकाला.

"कैसा लगा रानी" चाची ने आंख मार कर पूछा. प्रीति आंखें मटकाती हुई बोली. "वाह मौसी, मजा आ गया. तभी तुम इतनी खुश लग रही थीं. अकेले इस मलाई पर ताव मारती रहीं. अब सिर्फ़ में पिऊंगी." "चल हट पगली, दोनों मिल कर चखेंगे, पर अब पहले पूरा मुंह में लेना सिखाती हूं चल." कहकर चाची उठकर एक बड़ा केला ले आई. उसे छीलते हुए प्रीति को सोफ़े पर बिठाया और उसके पास बैठकर मुझे बोलीं. "लल्ला, मैं इसे सिखाती हूं तब तक तू भी इसकी कुंवारी बुर का स्वाद ले ले. मैंने तो कल रात भर चखी है, बहुत मस्त माल है राजा."

मुझे और क्या चाहिये था. तुरंत जमीन पर प्रीति के सामने बैठकर मैने उसकी गोरी जांघे अलग कीं और उन्हें प्यार से चूम लिया. फ़िर मन भर कर उस गुलाबी गोरी कमसिन चूत को पास से देखा. उंगली से फैला कर पूरा मुआयना किया, उसके जरा से मटर के दाने जैसे क्लिट पर जीभ लगाकर उसे हुमकाया और फ़िर मुंह लगाकर उस कच्ची चूत को चूसने लगा. रस पहले ही चू रहा था, मुझे ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा, जल्द ही वह कुंवारी कन्या मेरे मुंह में स्खलित हो गयी और उसकी बुर अपना अमृत मेरे मुंह में फेंकने लगी.

 
उधर चाची ने उसे पूरा मुंह खोलने को खा और धीरे धीरे पूरा केला उसके मुंह में डाल दिया. "पूरा गले तक ले अंदर बिटिया. दांत नहीं लगना चाहिये." पहली बार आधा केला ही प्रीति ले पायी और फ़िर खांसने लगी. केला बाहर निकाल कर उसे शांत करके चाची ने फ़िर उसे प्रीति के गले गले में उतारा. इधर मैं लगातार उसकी चूत चूस कर रसपान कर रहा था.

दस मिनिट में ही लड़की सीख गयी. आराम से आठ इंच का केला गले तक निगलकर जब बिना रुके पांच मिनिट चूसती रही तब चाची ने आखिर उसे निकाला और अपनी शिश्या को शाबासी दी. "बहुत अच्छे प्रीति, अब अगली बार ऐसा ही करना, देख कितना मजा आयेगा."

प्रीति के थूक से केला गीला और चिपचिपा हो गया था. मेरे मुंह में पानी भर आया. मेरी ललचायी आंखें देखकर चाची हंसने लगीं. "घबरा मत, यह मिठाई दोनों मिलकर खायेंगे." और हम दोनों ने प्रीति के मुखरस से सराबोर वह केला बड़े चाव से बांट कर खाया. मेरा लंड अब तक फ़िर खड़ा हो गया था. मैं मन ही मन सोच रहा था कि इस कच्ची कली को चोदने मिले तो मजा आ जाये. पर मैं कुछ न बोला. डरता था कि कन्या कहीं बिचक न जाये.

प्रीति अब गीता चाची से लिपट कर उनका एक निपल चूसते हुए उनका स्तन दबाने लगी. "गीता मौसी, अब चलो ना, अपनी चूत तो चुसवाओ, देखो मैं कब से प्यासी हूं." "अरे अनिल से चुसवा कर अभी मन नहीं भरा तेरा?" चाची ने उसके बाल चूमते हुए कहा. "अनिल भैया ने तो मुझे और गरम कर दिया है. आपके आगोश में ही अब यह आग बुझेगी." उस चुदासी से भरी कली ने फ़िल्मी डायलांग मारा.

मैं समझ गया कि चुपचाप बैठने की बारी मेरी थी. चाची मुझे बोलीं. "तू अब आराम से बैठ. इस प्यारी बच्ची को जरा दिखा दें कि मौसी का प्यार क्या होता है." कुर्सी में बैठ कर अपने सोंटे को सहलाता हुआ मौसी-भांजी की रति क्रीड़ा देखने लगा. दोनों आपस में लिपट कर पलंग पर लेट गईं.

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अगले एक घंटे में मानों मैंने जन्नत का नजारा देख लिया. गीता चाची की भरी पूरी परिपक्व जवानी और उस किशोर कमसिन लड़की का अधखिला लड़कपन, दोनों मिलकर कामदेव की पूजा करने लगे. हर तरह के खेल उन्होंने खेले. चुंबन, जीभ लड़ाना, स्तन मर्दन, चूत चुसाई इत्यादि इत्यादि.

पहले तो प्रीति मचली कि ठीक से अपनी मौसी की बुर देखेगी और चूसेगी. गीता चाची टांगें फैलाकर लेट गई और प्रीति झुक कर बड़े चाव से उनकी रिसती चूत को पास से देखने और चाटने लगी. "हाय मौसी, कितना गाढ़ा है तेरा पानी, शहद जैसा लगता है."

यहां यह बता दें कि चाची की बुर से जो रस बहता है वह अक्सर सफ़ेद रंग का और गाढ़ा चिपचिपा होता है. प्रीति भी उस पर फ़िदा हो गयी थी. मन भर कर उसने अपनी मौसी की चूत चाटी और चाची के सिखाने पर मुंह में भगोष्ठ लेकर आम जैसा चूसा. चूत सेवा करते हुए वह लगातार चाची की घनी काली झांटों से खेल रही थी. एक बार मुंह उठ कर पूछा भी. "मौसी, मेरी झांटें तो हैं ही नहीं, कब तेरे जैसी होंगी?"

फ़िर अपनी लाड़ली भांजी की टांगें फैलाकर चाची ने उसकी कुंवारी चूत की पूजा की, अपनी जीभ और होंठों से. उसे समझाया "बस तीन चार सालों में देख तेरी झांटें कैसी हो जायेंगी मेरी रानी. डर मत, हमारे यहां सब औरतों की घनी झांटें हैं, यह हमारे खून में ही है. मेरी बड़ी बहन की, अपनी मां की नहीं देखीं कभी? मैंने तो बचपन में खूब देखी हैं नहाते वक्त" नटखट सवाल किया चाची ने और फ़िर कुंवारी पूजा में लग गयी.

 
दोस्तो १० - १५ लोगों से ज़्यादा कोई कमेंट नहीं देता इसका मतलब तीन चार लोगो को छोड़कर जो दोस्त ये कहानियाँ पोस्ट करते हैं वही एक दूसरे की पीठ थपथपा लेते हैं

मैने पहले भी कई बार रिक्वेस्ट की है और कल एक बार फिर से आप सभी पढ़ने वाले और इस साइट के चाहने वालों से प्रार्थना की थी कि आप सब कहानी पोस्ट करने वालों की सराहना करें ताकि वो आपके लिए और भी अच्छी अच्छी कहानियाँ लाए जिससे आपका और ज़्यादा मनोरंजन हो .

दोस्तो कल से मैं किसी भी कहानी में पोस्ट नही करूँगा सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लेखक बंधुओं की हॉंसलाहफजाई करूँगा ताकि उनके काम की सराहना करने वालों मे एक श्रोता की बढ़ोत्तरी हो . और जब तक कुछ और लोग कमेंट करने के लिए आगे नही आते तब तक मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ कहानियों पर कमेंट करूँगा
 
धन्यवाद दोस्तो

अपने साइलेंट पाठकों के लिए दुआ कि वो जल्दी से ठीक होकर कमेंट करने लग जाएँ और हमारा ये परिवार ( आरएसएस) आदर्श परिवार बन जाए

आपका दोस्त
 
दोस्तो आप सब ने बचपन में दादी नानी से कहानियाँ ज़रूर सुनी होंगी आपको कहानी सुनने के लिए हुंकारा भरना पड़ता था तभी वो आपको कहानियाँ सुनाती थी . मेरा मतलब भी इसी से है जब कोई बंदा स्टोरी पोस्ट करता है चाहे वो उसने खुद लिखी हो या उस कहानी का अनुवाद किया हो या कहीं से कॉपी करके पोस्ट की हो दोस्तो इन तीनों ही सूरतेहाल मे वो बंदा आप सब पढ़ने वालों के लिए ही मेहनत कर रहा है ना दोस्तो इसमें कहानी पोस्ट करने वाले को कोई पैसा तो मिल नही रहा वो बस अपने काम की मज़दूरी के रूप में आपसे अपने लिए या कहानी के बारे में दो शब्द ही तो माँगता है तो इसमें ग़लत क्या है मैं बस ये चाहता हूँ कि हम सब यहाँ मनोरंजन के लिए आते हैं अगर हम सभी कहानी पोस्ट करने वालों के योगदान को याद करते हुए उनकी प्रशंसा भी करें तो इसमे बुराई क्या है . दोस्तो जब कोई नया यूज़र अपनी कहानी शुरू करता है तो हम उसका साथ ही नही देते तो वो बिचारा कुछ दिन बाद ही अपनी कहानी अधूरी छोड़ कर गायब हो जाता है . अगर हम स्टोरी पोस्ट करने वालों का साथ देते रहें तो वो भी दिल से और मेहनत से अच्छी कहानियाँ पोस्ट करेंगे इसमे हम सबका ही तो फ़ायदा है

और सबसे ख़ास बात आपने देखा ही है कहानी पोस्ट करने वाले जितना टाइम एक दूसरे की कहानियों मे कमेंट पोस्ट करने में टाइम लगाते हैं उतना टाइम अगर और कहानी पोस्ट करने में लगाएँ तो बताइए फ़ायदा किसका होगा .

मैं यानी आपका दोस्त राजशर्मा आपसे लास्ट बार ये रिक्वेस्ट कर रहा हूँ नही तो वो दिन दूर नही जब ये साइट भी बंद हो जाएगी क्योंकि कोई भी नया बंदा यहाँ अपनी कहानी शुरू करने से पहले सोचता है कि क्या कोई उसका साथ देगा . दोस्तो ऐसा तो है ही नही कि इस साइट के चाहने वाले और पढ़ने वाले कम हैं दोस्तो आप सब की वजह से ये साइट पिछले चार साल में अपना एक अच्छा मुकाम बना चुकी है . और ज़्यादा क्या कहूँ आप सब समझदार हैं आगे जैसी आपकी मर्ज़ी


मैं आप से सहमत हुँ।......राज भाई
 
चाची जैसी सधी और एक्सपर्ट चुदैल के सामने उस बच्ची की क्या चलती. इतना झड़ी कि किलकारियां मारने लगी. बाद में तो असहनीय सुख से रोने ही लगी. चाची भी कच्ची रसीली चूत पाकर खुश थी. ऐसे चूसती रही कि जनम जनम की प्यासी हो. बीच में बहुत देर सिक्सटी नाइन भी हुआ.

बाद में प्रीति को गोद में बिठाकर स्तनपान कराते हुए हस्तमैथुन के तरीके सिखलाये. अपनी भांजी की तीन उंगलियों से अपनी मुट्ठ मरवायी. अपने दाने को रगड़ना सिखाया और खुद भी उस किशोरी बालिका के जरा से दाने को उंगली से घिस कर एक मिनिट में झड़ाया, प्रीति तो बस सिसक सिसक कर रह गयी क्योंकि उसके मुंह में चाची की चूची आधी से ज्यादा ठुसी हुई थी.

बीच बीच में चाची मुझे डांट लगाती जाती थी अगर मुझे हस्तमैथुन करते देख लेतीं. मैंने बड़ी देर सब्र किया पर जब चाची ने एक उंगली प्रीति की कसी बुर में घुसेड़ी और वह दर्द से चिहुक उठी तो मुझसे न रहा गया. इतनी कसी कच्ची बुर, उसमें लंड डालकर कैसा लगेगा यह विचार मुझे पागल करने लगा. और वह किशोर गांड? उसे चोदने में क्या स्वर्ग का मजा नहीं आयेगा? मैं सिसककर सड़का लगाने लगा.

चाची को उठकर मेरे हाथ पैर कुर्सी से बांधना पड़े तब मैं रुका. मुझे वैसा ही प्यासा रखकर फ़िर वह अपनी लाड़ली भांजी से रति में जुट गयी.

आखिर दो घंटे बाद मुझे छुटकारा मिला जब चाची ने मेरे हाथ पैर खोले. मैंने तो तुरंत उन्हें वहीं जमीन पर पटककर चोद डाला. वे "अरे रुक, क्या करता है, ऐसे नहीं" कहती रहीं पर मैं न माना. झड़ कर ही रुका. बीच में प्रीति जो पास आकर बैठ गयी थी, उसे भी मैंने खूब चूमा. जब चाची ने देख लिया कि मैं बिना चोदे उन्हें नहीं छोडूंगा तो उन्होंने भी हार मान ली. पर प्रीति को अपने मुंह पर बिठा लिया और सारे समय उसकी बुर चूसती रहीं.

जब झड़ कर एक अपूर्व तृप्ति के बाद मैं अपना झड़ा लंड उनकी बहती चूत से निकाल कर लुढ़क गया तब प्रीति ने अपनी मौसी के कहने पर मेरा लंड चूस कर साफ़ किया और फ़िर उनकी बुर चाट चाट कर साफ़ की. चाची ने उससे कहा कि ऐसा मस्त मिश्रण, वीर्य और चूत के पानी का उसने कभी नहीं पिया होगा.

अगले कुछ दिन तो ऐसे गये जैसे स्वर्ग की सैर चल रही हो. दिन रात हम तीनों संभोग करते. दिन में चाची के कमरे में और रात को छत पर मच्छरदानी के अंदर, बस एक बात को मैं तरस गया. उस खुबसुरत लड़की की चुत मैंने खब चूसी. चूसते समय उसकी मखमली सकरी म्यान के कल्पना अपने लंड के ऊपर कर के मचल उठता. पर चोदने को तरस गया. कई बार चाची से अकेले में कहने पर भी प्रीति को उन्होंने नहीं चोदने दिया. बोलतीं कि यह इनाम तो तभी मिलेगा जब मैं उनका एक कोई बड़ा काम कर दूंगा.

अपनी गांड भी उस एक रात के बाद उन्होंने कई दिन नहीं मारने दी. मैं तरसता रह गया. मिन्नतें करता पर वे मुझे हाथ तक न लगाने देतीं. आखिर एक दिन दोनों ने खूब फुसफुसा कर बातें कीं और मेरी तरफ़ देख कर हंसती रहीं. मेरे खिलाफ़ साजिश हो रही थी. क्या मीठी साजिश थी वह मुझे बात में पता चला.

हुआ यह कि रोज रात की तरह घमासान रति के बाद हम तीनों छत के कोने में नाली में मूतने बैठे. मैं जल्दी से पिशाब करके उठ गया पर चाची और प्रीति बिना मूते बैठी रहीं और एक दूसरे की ओर देख कर हंसते रहीं. असल में मुझे उनका मूतना देखने में बड़ा मजा आता था इसलिये झल्लाकर बोला. "अरे बैठी क्यों हो दोनों मौसी भांजी छिनाल जैसी, मूतो जल्दी और चलो वापस चोदने."

प्रीति बोली. "अनिल भैया, असल में मुझे मालूम है कि चाची आप को गांड क्यों नहीं मारने देतीं." मैंने उत्सुकता से पूछा कि क्यों. "आप उन्हें सच में प्यार नहीं करते." वह बोली. मैंने दुहाई दी कि मैं उन्हें जी जान से चाहता हूं और उनके लिये कुछ भी कर सकता हूं. "उन्हें रात को ऐसे उठ कर मूतने आना पड़ता है, बिस्तर के बाहर खुले में. अच्छा नहीं लगता. कोई उपाय क्यों नहीं करते कि उन्हें उठना ही न पड़े? और यह मत कहना कि कोई बर्तन वर्तन ले आओगे कि उसमें वे मूत दें" वह नटखट आंखें मटकाकर बोली. फ़िर दोनों जोर जोर से हमसने लगीं.

मैं एक क्षण को तो कुछ समझा नहीं पर फ़िर सहसा जैसे दिमाग में बिजली कौंध गयी. लंड अभी अभी झड़ा था पर तुरंत सिर उठाने लगा. उसे देख कर चाची ने कहा, "देख समझ गया मेरा लल्ला, मैं कहती थी ना कि मुझे बहुत प्यार करता है, मेरे लिये कुछ भी करेगा"

मैं जाकर उनके पास नीचे बैठ गया. उनकी आंखों में आंखें डालकर बोला "हां गीता चाची, आप तो मेरी जान हो. आज से आप छत पर नहीं मूतेंगी." फ़िर रुक कर बोला. "इस शरबत के लिये तो मैं कब से मरा जा रहा हूं. पर डरता था कि आप बुरा न मान जायें. मेरे मुंह में मूतिये गीता चाची, एक बूंद नहीं छलकने दूंगा. चलिये बिस्तर पर."

चाची खिल उठीं. "सच कहते हो लल्ला? मेरे दिल की बात कह दी. मैंने भी बहुत किताबों में पढ़ा है और एक दो तस्वीरें भी देखी हैं. मन करता था कि किसी अपने प्यारे के साथ ऐसा करू. इसी बच्ची ने आखिर कहा कि अनिल भैया से कहती क्यों नहीं. बड़ी बदमाश है. कहती है कि उसकी सहेली की बहन तो रोज अपने पति के मुंह में मूतती है. इन दोनों ने कई बार छुपकर देखा है."

 
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