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घाट का पत्थर /गुलशन नंदा

सेठ साहब को जब इसकी सूचना मिली तो उन्होंने इसे स्वीकार न किया। फिर मान गए और किसी ने उसे वहां रहने के लिए विशेष जोर नहीं दिया। कल उसे वहां से चले जाना था। वह कमरे में अकेला खड़ा खिड़की से बाहर झांक रहा था। रात के ग्यारह का समय होगा। चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। हवा के हल्के-हल्के झोंके खिड़की से आ-आकर उसे निद्रा देवी का संदेश सुना रहे थे। परंतु आज उसकी आंखों में नींद कहां? वह चिंतित था। कल वह डॉली से दूर हो जाएगा। आखिर वह डॉली के लिए इतना चिंतित क्यों है? यह वह स्वयं भी न समझ पाता था। राज ने बत्ती जलाई और एक पुस्तक पढ़ने लगा। कुछ समय वह इसी प्रकार पढ़ता रहा परंतु उसके हृदय की विकलता शांत न हुई।

अकस्मात् उसे किसी के पैरों की आहट सुनाई दी। उसने मुड़कर देखा। डॉली खिड़की में खड़ी थी। 'डॉली तुम... इस समय... यहां!' राज के मुंह से अकस्मात् निकल गया।

'पानी पीने के लिए उठी थी। बत्ती जली देखकर मैंने सोचा, देखू महाशय इतनी रात गए तक क्यों जाग रहे हैं या बत्ती बुझाना तो नहीं भूल गए।' उसने अपनी ओढ़नी संभालते हुए कहा।

'नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं। नींद नहीं आ रही थी और आज इस कमरे में अंतिम रात है। सोचा जी भरकर देख लूं।'

'क्या सचमुच ही आपको कल जाना है?'

'जी, मन तो नहीं करता पर विवश ह।'

"विवशता कैसी? देखिए आप मेरी एक बात मानेंगे?'

'क्यों नहीं!' राज ने डॉली के सामने झुकते हुए कहा।

'आप हमारे यहां से न जाइए।'

'क्या? यह तुम क्या कह रही हो।'

"क्यों, इसमें आश्चर्य की क्या बात है?'

'कुछ नहीं, अंदर आ जाओ, मैं दरवाजा खोलता हूं।'

'नहीं जल्दी कहो क्या कहना चाहते हो। रात बहुत बीत चुकी है।

'मुझे एक दिन तो जाना ही है। जितनी देर से जाऊंगा दिल उतना ही उदास होगा। फिर 'डैडी' ने भी तो आज्ञा दे दी है।'

'वह तो सब कुछ आप ही की हठ के कारण हुआ, नहीं तो हम दोनों की इच्छा तो तुम्हें अपने पास रखने की थी।'

'जैसा भी आप समझ लें।'

'अच्छा चलती हूं।'

'यह सब तुम अपने हृदय से कह रहे हो या केवल दिखावे के लिए?'

'थोड़ी-सी देर तो और रुक जाओ।'

'नहीं, बहुत देर हो रही है। सवेरे मिलूंगी।' यह कहकर वह चली गई।

'डॉली, तुम कितनी अच्छी हो।' राज के यह शब्द कदाचित् डॉली के कानों तक न पहुंच सके। प्रातः होते ही डॉली के कहने से सेठ राज के पास पहुंच गए और उसका वहां से जाना स्थगित कर दिया। अंधे को क्या चाहिए, दो आंखें और वह मिल गई। राज के चेहरे पर एकदम रौनक-सी आ गई। उसका दिल बल्लियों उछलने लगा।

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रात्रि का अंधकार दूर हुआ। प्रभात के प्रकाश ने उसका स्थान ले लिया। राज अब मैनेजर के पद पर काम कर रहा था। कछ ही महीनों में उसने सारा भार संभाल लिया और सेठ साहब के बहुत से उत्तरदायित्वों का बोझ हल्का कर दिया। नित्य की भांति आज राज दफ्तर में बैठा काम कर रहा था। सेठ साहब 'टाइपिस्ट' से कुछ चिट्ठियां लिखवा रहे थे। चिट्ठियां समाप्त होते ही उन्होंने फाइल बंद कर दी और टाइपिस्ट दसरे कमरे में चला गया। 'राज जरा सामने का दरवाजा बंद कर दो।' सेठ साहब ने अपनी ऐनक डिबिया में रखते हुए कहा।

राज उठा और दरवाजा बंद कर दिया। 'देखो राज, तुमने जिस तेजी और खूबी से मेरा काम संभाला है, उसकी मुझे आशा न थी। मैं सोचता हूं कि भविष्य में भी तुम इसी प्रकार मन लगाकर पूरे उत्तरदायित्व के साथ काम करते रहोगे।'

'यह सब तो आपकी कृपा है कि आज मैं इस योग्य बन सका।'

'मैंने निश्चय किया है कि भविष्य में तुम्हारा वेतन सौ रुपये और बढ़ा दिया जाए, अर्थात् ढाई सौ के स्थान पर साढ़े तीन सौ।' सेठ साहब मुस्कराते हुए बोले।

'इसकी क्या जल्दी थी।' राज कुर्सी पर बैठते हुए बोला, 'आप जानते हैं, मुझे रुपये-पैसे का तो इतना ख्याल नहीं जितना....।'

'ठीक है।' बात काटते हुए सेठ साहब बोले, वह तो मैं समझता हूं परंतु यह तुम्हारा मूल्य है, पुरस्कार नहीं।

'यह तो आप ही अधिक जानते हैं। मेरा काम तो परिश्रम करना है।'

'मैं अपने कारोबार में कुछ परिवर्तन करना चाहता हूं, यदि तुम चाहो तो इसमें मेरी सहायता कर सकते हो।'

'कहिए, सेवक किस योग्य है?'

'परंतु वचन दो कि यह बात केवल मेरे और तुम्हारे बीच रहेगी।'

'क्या इसकी भी आवश्यकता है? आप कहिए तो।'

'मेरी इच्छा है तुम्हारे नाम से खाता खुलवा दिया जाए और जो सौदे बाहर-ही-बाहर कर दिए जाए, उसमें जमा हो जाएं। इससे बहुत लाभ होगा।'

'कैसे?' राज ने और समीप आते हुए पूछा।

"एक तो लंबे-चौड़े हिसाब रखने की आवश्यकता न होगी, दूसरे इन्कमटैक्स की बचत।'

'ठीक तो है परंतु कोई आपत्ति तो न खड़ी हो जाए।'

'यह मुझ पर छोड़ो, जैसा कहूं करते जाओ परंतु इस बात को किसी से....।'

'आप निश्चिंत रहें। दोनों यह बात कर ही रहे थे कि दरवाजा खुला और डॉली हाथ में पुस्तकें लिए अंदर आई।

'तुम इस समय यहां?' सेठ साहब ने आश्चर्य से डॉली की ओर देखते हुए कहा।

'जान पड़ता है कि आप सवेरे का वायदा भूल गए....।' मेज पर पुस्तक रखते हुए डॉली ने उत्तर दिया।

'ओह! मैं तो बिल्कुल भूल ही गया था। तुमने तो सिनेमा जाने को कहा था ना। कौन-सी पिक्चर?'

'रेंजर्स एज।'

'देखो डॉली, आज काम अधिक है और मैंने सात बजे एक महाशय से मिलने के लिए कह भी दिया है। कल चले चलेंगे।'

'मैंने तो टिकट भी मंगवा लिए हैं। भीड़ बहुत है। पहले ही बहुत कठिनाई से टिकट मिले हैं।' डॉली ने कुछ बिगड़ते हुए कहा।

'तो लाचारी है क्या करू.... तो ऐसा करो आज राज को साथ ले जाओ। आधे घंटे में कारखाना बंद होने वाला है। वह शीघ्र ही काम समाप्त कर लेगा।'

'परंतु डैडी....।'

'मैं फिर किसी दिन देख लूंगा, आज तुम दोनों देख आओ। राज! शामू से कहना तुम्हें छोड़ आएगा और वापस तुम बस पर आ जाना।'

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सिनेमा आरंभ होने में आधा घंटा था। डॉली और राज बोर्ड पर लगे चित्र देख रहे थे।

'आओ तो जरा रेस्तरां की ओर।' राज ने डॉली का हाथ खींचते हुए बोला।

'क्यों! मुझे तो प्यास नहीं।'

'केवल एक-एक आइसक्रीम।'

'तुम्हें खानी हो तो खा लो, मेरा तो जी नहीं है।'

'चलो रहने दो।' राज ने बिगड़ते हुए कहा।

"तुम्हारी इच्छा।' डॉली ने मुंह चिढ़ाकर उत्तर दिया।

'इसमें मुंह बनाने की क्या आवश्यकता है। शायद तुम्हें मेरा तुम्हारे साथ इस प्रकार जबरदस्ती चला आना पसंद नहीं।'

'नहीं, यह तो कोई बात नहीं, तुम तो व्यर्थ ही छोटी-छोटी बातों को पकड़ लेते हो। अब जी न करे तो कैसे खा लूं।'

"किसी का मन रखने के लिए।'

'यह तो हमसे नहीं हो सकता।'

'तुम किसी का दिल क्या रखोगी! सिनेमा के टिकट तक मंगवा लिए और मुझे पूछना तो एक ओर रहा, बतलाया तक नहीं।'

'तुम भी अजीब इंसान हो। इतना भी नहीं समझते। डैडी का तो केवल एक बहाना था। उनके पास सिनेमा के लिए अवकाश कहां! सोचा था उनके मना करने पर तुमसे प्रार्थना करूगी। उसकी आवश्यकता ही न पड़ी। डैडी ने अपने आप ही तुम्हें भेज दिया।'

'सच कह रही हो डॉली?'

'तो मुझे इसमें झूठ बोलकर लेना ही क्या है।'

"हैलो डॉली! फैशनेबल कपड़े पहने एक युवक ने डॉली के निकट आते हुए कहा।'

'तुम तो कह रहे थे कि सीट बुक नहीं हो सकती।'

'प्रबंध कर ही लिया है।'

'ओह!' डॉली ने राज की ओर देखते हुए कहा। राज तीखी निगाहों से उन दोनों को देख रहा था। डॉली बोली, 'यह है मिस्टर राज, जिनके बारे में मैं बहुत बार आपसे बात करती हूं और यह है मिस्टर जय, जो हमारे सामने वाली कोठी में रहते हैं।'

'बहुत प्रसन्नता हुई आपसे मिलकर।' राज ने जय से हाथ मिलाते हुए कहा, 'देखा तो आपको कई बार है परंतु भेंट नहीं हुई।'

"कदाचित् आप डॉली के साथ पढ़ते हैं।'

'जी कॉलेज तो एक ही है परंतु कक्षा भिन्न हैं। मैं इस वर्ष एम.ए. की तैयारी कर रहा हूं और यह...।'

'वह तो मैं जानता ही हूं।'
 
"डॉली तुम्हारी सीट्स कहां की हैं!' जय ने डॉली से पूछा।

'स्टॉल्स की और तुम?'

'मैं तो बॉलकनी में हूं। जरा एक बात सुनो। राज दो मिनट के लिए क्षमा चाहता हूं।' जय ने डॉली को कुछ दूर ले जाते हुए कहा। 'डॉली, मेरे साथ एक मित्र है। कहो तो उसे नीचे तुम्हारे मैनेजर के पास भेज दें और तुम मेरे साथ...।'

'नहीं जय, ऐसा नहीं हो सकता। तुम्हें मुझे इस प्रकार बुलाना नहीं चाहिए था।' डॉली ने राज की ओर देखते हुए कहा जो इस समय उन्हीं की ओर देख रहा था। दोनों वापस राज के पास आ गए।

'क्यों राज, वापसी कैसे होगी?'

'कार तो डैडी को चाहिए थी, बस में चले जायेंगे।' राज ने फीकी मुस्कराहट होंठों पर लाकर कहा।

'वह सामने मेरी कार खड़ी है। वहां प्रतीक्षा करना। सब साथ ही चलेंगे।' जय ने कहा और डॉली की ओर देखकर फिर बोला 'आओ, एक-एक आइसक्रीम हो जाए।'

'कोई आवश्यकता तो नहीं।'

'ऐसी भी क्या बात है?' जय ने डॉली का हाथ खींचकर उसे बाहर की ओर ले जाते हुए कहा। डॉली राज की ओर देखकर मुस्कराने लगी और बोली, 'चलो राज।' तीनों ने बैठकर आइसक्रीम खाई।

खेल आरंभ होने में थोड़ी देर अभी बाकी थी। जय उनसे आज्ञा लेकर चला गया और वे दोनों जाकर हॉल में बैठ गए। राज चुप बैठा था।

'सिनेमा देखने आये हो या किसी जंगल में तपस्या करने?'डॉली ने राज की बांह पर चिकोटी भरते हुए कहा।

'तपस्या तो नहीं। जरा आइसक्रीम खाने से कलेजा ठंडा हो गया है। उसे गर्म करने के प्रयत्न में हूं।'

'गुस्सा तो तुम्हें हवा के चलने से आ जाता है। मेरी और तुम्हारी बात तो अपने घर की सी है। जब दूसरा आदमी अनुरोध करे तो इंकार किस प्रकार हो!'

'ठीक है और वे प्राइवेट बातें क्या हो रही थीं?'

डॉली हंस पड़ी, 'अरे वह तो वैसे ही कॉलेज की एक लड़की की बात थी जिसे तुम्हारे सामने कहना अच्छा न लगा।'

'शायद शर्म आती होगी! देखो डॉली, खेल समाप्त होते ही हम सीधे बस पर वापस चलेंगे, जय के साथ जाना मुझे पसंद नहीं।'

'तो इसमें डर क्या है? मैं अकेली तो हूं नहीं, तुम भी तो मेरे साथ हो।'

'कुछ भी हो, मैं नहीं जाऊंगा।'

'अच्छा बाबा, जैसा कहोगे वैसा ही करेंगे। अब पिक्चर का मजा किरकिरा न करो। देखो, बत्तियां बंद हो गई। अब उधर ध्यान दो।'

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खेल समाप्त होते ही दोनों बस स्टैंड की ओर बढ़े। आकाश पर काले बादल छाए हुए थे और हल्की-हल्की बूंदें भी पड़ रही थी। वर्षा के कारण अधिक भीड़ न थी। दादर की बस आई। राज ने सोचा कि वर्षा में भीगने से तो अच्छा है कि दादर पहुंच जाए और वहां से थोड़ा पैदल चल लेना। संभवतः सीधी जाने वाली बस में स्थान ही न मिले। दोनों शीघ्रता से बस की ऊपर वाली मंजिल में अगली सीटों पर जा बैठे। सड़क पर लगी हुई बिजली का प्रकाश बस के शीशों में से आकर डॉली के मुख पर अपनी छाया डालता। भीगी हुई पक्की सड़क शीशे की भांति चमक रही थी और वर्षा का जल थोड़ा-थोड़ा बस की खिड़की से टपक रहा था। 'देखो, कहीं तुम्हारे कपड़े न भीग जाएं।' राज ने डॉली को अपने समीप खींचते हुए कहा।

डॉली उसके समीप हो आई और बोली, 'क्यों? तुम्हें पिक्चर पसंद आई?'

'बहुत! क्या नॉवेल तुमने पढ़ा हुआ है?'

'नहीं तो। किसका लिखा हुआ है?'

'सामरसेट मॉम। खूब लिखता है और नाम भी क्या उचित रखा है।'

'सच पूछो तो मेरी समझ में इस नाम का अर्थ ही नहीं आया।'

'अच्छा तुम ही बताओ कि प्रेम और घृणा में कितना अंतर है?'

राज ने डॉली के बालों को उसके माथे से हटाते हुए पूछा। 'बहुत। ये दोनों तो एकदम विपरीत चीजें हैं।'

'परंतु ये दोनों एक-दूसरे के उतने ही विपरीत हैं जितने कि हम और तुम। यदि दोनों को एक-दूसरे से अलग किया जाए तो भिन्नता की लकीर उतनी ही होगी जितनी उस्तरे की धार।'

'मैं तो यह नहीं मानती। मान लो कि तुम मुझे या तुम्हें मैं तन-मन से प्यार करते हूं, आदर करती हूं क्या अकस्मात् तुम्हें मुझसे इतनी घृणा हो सकती है कि तुम अपने प्यार की हत्या कर दो?'

'मुझे इस प्रकार की बातों का कोई विशेष अनुभव नहीं परंतु मनुष्य का मन बदलते क्या देर लगती है?' बातों ही बातों में बस दादर पहुंच गई। एक बार फिर जोर से बादलों की गड़गड़ाहट का शब्द सुनाई पड़ा और साथ ही डॉली राज के एकदम समीप हो गई। राज ने उसे अपने बाहुपाश में समेट लिया और होंठ उसके जलते हुए होंठों पर रख दिए। दर कहीं बिजली पड़ी। हवा के तेज झोंके मस्ती से पानी बिखेर रहे थे। वर्षा कुछ थमी, अब हल्की-हल्की बौछार पड़ रही थी। दोनों धीरे-धीरे चुपचाप सड़क पर आ गए। दोनों के कपड़ों से अब भी पानी वह रहा था।

"मैंने तो शामू को कार लेकर भेजा था कि बारिश में भीग न जाओ परंतु तुम उसे मिल न सके।' दोनों को देखकर सेठ साहब बोले।

'वर्षा तेज थी। हम शीघ्रता से भागे कि बस पकड़ लें। यदि हम यह जानते कि शामू को वहां पहुंचना है तो हमारी ऐसी दशा क्यों होती?' राज ने सिर के बालों को निचोड़ते हुए उत्तर दिया।

डॉली बिल्कुल चुप खड़ी थी।

'जाओ, जल्दी से कपड़े बदल डालो, सर्दी हो रही है।' सेठजी ने कहा और दोनों अपने-अपने कमरे की ओर चल दिए। खाना खाकर राज बिस्तर पर जा लेटा। सवेरा होते ही राज जल्दी से तैयार होकर चाय की मेज पर जा पहुंचा। नित्य की भांति आज भी डैडी अखबार लिए उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। 'क्यों डैडी, अभी तक डॉली नहीं आई?' उसने आते ही पूछा।

'उसे बुखार आ रहा है। शायद यह सब रात पानी में भीगने के कारण ही हुआ।'

'तो मैं जरा उसे देख आऊं?'

'पहले चाय तो पी लो, ठंडी हो रही है।'
 
'बहुत अच्छा।' राज ने कुर्सी पर बैठते हुए उत्तर दिया और जल्दी चाय का प्याला बनाकर पीना आरंभ किया।

'क्यों, आज बहुत जल्दी में हो क्या? अभी तो केवल आठ ही बजे हैं।' डैडी ने मुस्कराते हुए प्रश्न किया।

'नहीं तो। ओह, आपका प्याला बनाना तो भूल ही गया जल्दी में!'

'कोई बात नहीं।'

राज ने चाय बनाई और प्याला सेठ साहब के आगे रख दिया। सेठ साहब ने अखबार राज के हाथ में देते हुए कहा, 'सरक्युलर लिखता है कि 'इम्पोर्ट' पर फिर से पाबंदियां लगा दी जाएं, यह अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहिए।'

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'क्यों डॉली क्या हुआ?'

'सब आप जैसे हितैषियों की कृपा है।'

'इसमें मेरा क्या दोष? वर्षा तो भगवान की इच्छा से हुई।'

'परंतु आग बरसाने वाले तो तुम थे।' और डॉली की आंखें फर्श पर जा टिकीं।

"डॉली, रात की बातों का कुछ बुरा तो नहीं माना तुमने?'

'जाओ हटो। दुःखी मत करो। तुम्हें बातें बनानी बहुत आ गई हैं।'

'मैं तो तैयार हूं, डैडी भी तो तैयार हैं। वैसे यदि तुम्हें मेरा ठहरना अच्छा नहीं लगता तो चला जाता हूं।' राज यह कहते हुए आवेश में कमरे से बाहर चला गया।

डॉली ने भावपूर्ण मुस्कराहट के साथ कहा 'पागल मनुष्य को क्रोध कितनी जल्दी आ जाता है।'

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फैक्टरी बंद होते ही राज घर पहुंचा। सेठ साहब बरामदे में तैयार खडे थे। कदाचित कहीं बाहर जा रहे थे। राज को देखते ही बोले, 'अच्छा हुआ कि तुम समय पर पहुंच गए। मैं आवश्यक काम से बाहर जा रहा था, डॉली अकेली थी।'

'कैसी तबियत है अब उनको।'

'अब तो कुछ आराम है। दोपहर को कुछ बुखार तेज हो गया था और पेट में भी सख्त दर्द था। डॉक्टर को बुलाया था। दवाई दे गया है।'

'कब तक लौटेंगे आप?'

'प्रयत्न तो शीघ्र आने का करूंगा। दवाई रखी है, दो घंटे तक एक खुराक दे देना।'

'बहुत अच्छा ।' राज डॉली के कमरे में चला गया। डॉली की आंखें बंद थी। शायद सो रही थी। उसे जगाना उचित न समझा और वह दबे पांव लौट पड़ा।

"कौन है! राज तुम आ गए। डॉली ने उसे देखकर पुकारा।

'मैं समझा कि तुम सो रही हो।'

'वैसे ही आंखें बंद थीं, नींद कहां!'

'डैडी कह रहे थे कि दिन में कष्ट अधिक था। अब कैसी हो?'

'अब तो तनिक आराम है।'

'बीमारी भी सुंदरता की उपासक है, नहीं तो मैं तुमसे अधिक भीगा था।'

'तुम्हें तो बस हर समय हंसी ही सूझती है। देखो, सामने मेज पर थर्मामीटर होगा।'

राज ने मेज पर से थर्मामीटर उठाया और धोकर डॉली के मुंह में रख दिया। उसे अब भी सौ डिग्री बुखार था।

'देखो सामने से कुर्सी ले लो और मेरे पास बैठ जाओ।' डॉली ने थर्मामीटर राज के हाथ में पकड़ाते हुए कहा।

राज कुसी लाकर उसके समीप आ बैठा और उसके मख की ओर देखने लगा। कभी-कभी डॉली भी उसकी ओर देख लेती। किसी के पैरों की आहट हुई, राज ने मुड़कर देखा। वह जय था। आते ही बोला, 'हैलो राज' और फिर डॉली को संबोधित करके बोला, 'क्यों डॉली, तबियत तो ठीक है?'

"वैसे ही जरा बुखार आ गया था।'

'मैंने सोचा कि न जाने आज कॉलेज क्यों नहीं आई। रात को तो तुम लोगों ने बहुत प्रतीक्षा कराई। कहां चले गए थे दोनों?'

'वास्तव में बात यह है कि हम लोग खेल समाप्त होने से पहले ही आ गए थे। मेरी तबियत कुछ खराब हो रही थी।'

'तो पूरी पिक्चर भी न देखी, खूब! मैं तो न जाने क्या सोचता रहा।'
 
'क्या सोचते रहे?' डॉली ने व्याकुलता से पूछा।

'जाने दो इन बातों को और सनाओ, मेरे योग्य कोई सेवा?'

'केवल इतना कि कुर्सी पर बैठ जाओ। खड़े-खड़े कहीं थक न जाओ।'

'यह काम कठिन है। मुझे क्लब जाना है। मैं तो केवल तुम्हें देखने के लिए चला आया था।'

राज दोनों को अकेला छोड़कर चला गया। डॉली तकिए का सहारा लेकर बैठ गई। उसने जय से पूछा, 'तो मेरे पास बैठने से तुम्हारा क्लब जाना अधिक आवश्यक है?'

'तुम कहो तो मैं सारी रात तुम्हारे ही पास बैठा रहू, परंतु मूर्ति बनकर बैठने से तो क्लब ही हो आना अधिक अच्छा है।'

'मूर्ति बनने के लिए किसने कहा है?'

'दिल बहलाने के लिए यहां राज जो है। हम नहीं बैठेंगे तो क्या ....।'

'किसी और ध्यान में न रहिए। बातें तो वह तुमसे भी अधिक दिलचस्प सुना सकता है।'

'तो मैं कब....।' इतने में राज कमरे में लौट आया। 'अच्छा डॉली, अब चलता हूं। टाटा!' और जय कमरे से बाहर चला गया।

जय के चले जाने पर राज फिर डॉली के समीप ही कुर्सी पर आ बैठा। डॉली ने करवट लेकर मुख उसकी ओर कर लिया और पूछा, 'कहां गए थे?'

‘यों ही बाहर तक। परंतु मुझे आज पता चला कि तुम झूठ भी कितनी योग्यता से बोलना जानती हो।'

"कैसा झूठ!' डॉली ने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा।

'यही कि हम आधी पिक्चर छोड़कर आ गए।' डॉली हंस पड़ी, 'तुम्हारा मतलब यह है कि सच बोल देती कि तुम्हें मेरा उसके साथ जाना पसंद नहीं।'

'नहीं तो, मैं स्वयं डर रहा था कि कोई इस प्रकार की बात न कह दो कि वह मुझ पर आए। यह तो अच्छा हुआ कि तुमने हवा का रुख बदल दिया।'

'क्यों! मानते हो गुरु? तुम तो कहा करते हो कि पुरुष अधिक होशियार होते हैं स्त्रियों से!'

'अच्छा भई, हम हारे तुम जीतीं। उठो दवाई पी लो।'

'यह एक और मुसीबत।'

'मुसीबत कैसी?'

'कड़वी इतनी है कि पीते ही नानी याद आ जाए। थोड़ी चीनी ला दो।'

'पगली कहीं की! कोई दवाई से साथ भी चीनी खाता है?'
 
डॉली ने अब आनाकानी नहीं की। दवा पी ली और खाली प्याला राज को पकड़ाते हुए बोली, 'तुम कितने अच्छे हो। इतना तो कोई सगा भी किसी से न करे जितना तुम मुझसे....।'

'तो क्या तुम मुझे पराया समझती हो?'

'नहीं तो, यह बात नहीं। वैसे ही कभी-कभी सोचती हूं कि तुम मेरा इतना ख्याल क्यों रखते हो, मैंने तो कभी तुम्हारा कोई काम नहीं किया।'

'मैं तुम्हारा ध्यान क्यों रखता हूं?' राज मुस्कराने लगा, 'इसलिए कि तुम मुझे अच्छी लगती हो और जो वस्तु किसी को अच्छी लगे उसके लिए मनुष्य क्या-क्या नहीं करता है, यह तो तुम भली प्रकार समझ सकती हो।' ।

'तुम्हारी यह कविता तो मेरी समझ के बाहर है। जरा सामने की खिड़की बंद कर दो, हवा आ रही है।' राज ने उठकर खिड़की बंद कर दी।

'एक काम कहूं, करोगे?'डॉली राज की ओर देखते हुए बोली।

'क्यों नहीं!' उसने समीप आते हुए कहा।

जरा मेरी पीठ सहला दो। न जाने क्यों बहुत देर से जलन हो रही है। डॉली ने पेट के बल लेटते हुए कहा।

राज चपचाप उसके बिस्तर पर बैठ गया और धीरे-धीरे उसकी पीठ सहलाने लगा।

डॉली बोली, 'तुम भी कहोगे कि हुक्म चलाए जा रही हूं। करू भी क्या? और घर में है ही कौन। देखो न अब लड़कियों के काम भी तुमसे ले रही हूं।'

राज चुपचाप सुनता रहा।

'जरा और जोर से। तुम तो ऐसे नरम-नरम हाथ लगा रहे हो जैसे शरीर में जान ही न हो।'

राज और जोर से सहलाने लगा। उसका हृदय जोर-जोर से धड़क रहा था। उसके हाथ तेजी से रेशमी वस्त्रों पर चल रहे थे। हाथ और शरीर की रगड़ से एक आग-सी उत्पन्न हो रही थी जिससे उसका हाथ जलने-सा लगा, परंतु इस जलन में भी उसे एक आनंद का अनुभव हो रहा था।

'यदि तुम लड़की होते तो अंदर हाथ डालकर सहलाने को कहती।'

'कुछ समय के लिए मुझे लड़की समझ लो।'

'ऊं ऊं. यह कैसे हो सकता है?'

'क्यों नहीं हो सकता?' राज ने यह कहते ही डॉली का शरीर अपने हाथों पर उलट लिया और उसकी मस्त आंखों में अपनी आंखें डबो दी।

डॉली घबराकर बोली, 'मेरी ओर घूर-घूरकर क्या देख रहे हो? मुझे इस प्रकार अपनी बांहों में क्यों उठा रखा है? तुम्हें ध्यान नहीं कि मैं बीमार हूं?'

राज उसके हृदय की तेज धड़कन स्वयं अनुभव कर रहा था। 'ओह! मैं तो भूल ही गया कि तुम बीमार हो।' उसने डॉली का शरीर ढीला छोड़ते हुए कहा और कुर्सी पर जा बैठा।

डॉली क्रोधित होकर बोली, 'यह कभी-कभी तुम्हें क्या हो जाता है? तुम पढ़े-लिखे मनुष्य हो, फिर न जाने जंगलीपन क्यों कर बैठते हो? कल रात भी....।' यह कहते-कहते वह रुक गई।

'डॉली, मैं एक मनुष्य हूं, देवता नहीं।'

'परंतु यहां तुम्हें देवता बनकर रहना होगा।'

'यह किस प्रकार संभव है कि कोई आग में जल रहा हो और उसके कपड़े न जले।'

'साफ-साफ कहो, तुम कहना क्या चाहते हो?'

राज ने डॉली की ओर देखा। कितनी सुंदर लग रही थी! वह आज अवश्य अपने हृदय के उद्गार उसके सामने उड़ेल देता और वह बोल ही तो पड़ा, 'डॉली, मैं तुमसे प्रेम करता हूं। तुम्हें अपना जीवन-साथी बनाना चाहता हूं।'

'अब तुम्हें हुआ क्या है, होश में तो हो?'

'होश में हूं। बहुत दिनों से प्रयत्न कर रहा था कि तुमसे यह सब कह दूं, परंतु तुम्हारा बचपन का-सा बर्ताव और वह आदर जो मेरे हृदय में तुम्हारे लिए है, मुझे इस अशिष्टता की आज्ञा नहीं देते थे और...।'

'राज मुझे तुमसे यह आशा न थी कि तुम मेरे इस स्वतंत्र बर्ताव को इतना गलत समझोगे। मैं तो तुम्हें एक चरित्रवान व्यक्ति समझती हूं।'

'किसी से प्रेम करना तो कोई पाप नहीं और न ही मैं तुम्हें बहकाने का प्रयत्न कर रहा हूं। वह तो सीधी-सी बात है कि मैं तुम्हें अपना जीवन-साथी बनाना चाहता हूं।'
 
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