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घाट का पत्थर /गुलशन नंदा

राज ने लिफाफे को ध्यान से देखा। उस पर डॉली लिखा था। उसने सोचा कि हो न हो वह जय का पत्र है। नहीं तो चोरी-चोरी इस समय उसे यह पत्र और कौन भेज सकता है। देखें तो सही क्या लिखा है। यह सोचकर उसने लिफाफा पिन की सहायता से इस प्रकार खोला कि फिर से चिपकाने पर किसी को पता न चले कि किसी ने पत्र खोला है। पत्र खोलने पर सबसे पहले पत्र लिखने वाले का नाम पढ़ा। यह जानकर उसे आश्चर्य हुआ कि वह माला का पत्र था। उसने व्यर्थ ही खोला। परंतु फिर भी पढ़ने में क्या दोष है, यह सोचकर पढ़ने बैठ गया। "प्रिय डॉली, आज पूना से आए छः दिन हो चुके हैं और तुम मुझसे मिलने नहीं आई। मैं यह भली प्रकार जानती हूं कि मैंने जो बात हंसी में राज से पूना में कह दी थी, उसके कारण तुम मुझसे क्रुद्ध हो। मुझे क्या पता था कि मेरी साधारण-सी हंसी राज को तुमसे इतना दूर कर देगी और तुम्हें मुझसे। पहले तो मैंने सोचा कि स्वयं तुम्हारे पास आऊं परंतु साहस न हुआ। मेरी प्रिय सखी, अब जो हो चुका उसे भूल जाओ। सच पूछो तो मेरा इसमें दोष ही क्या है? मुझे क्या पता था कि राज तुमसे प्रेम करता है और तुम... नहीं तो मैं इस प्रकार की हंसी नहीं करती। आशा है तुम इस पत्र के उत्तर में स्वयं राज को साथ लेकर मुझसे मिलने आओगी।

- तुम्हारी माला।

राज ने माथे से पसीना पोंछा। क्या यह सत्य है? क्या माला ने जो कुछ कहा था हंसी में कहा था? परंतु डॉली का जय के साथ इस प्रकार रात के समय अकेले बातें करना, वह भी क्या हंसीमात्र था? उसे इतने शक्की स्वभाव का न होना चाहिए। आखिर वह उसका मित्र है और आधुनिक युग में तो लड़कियों के मित्र होते ही हैं। बुराई भी क्या है? मित्रता, मित्रता है। प्रेम - प्रेम। उसके मुख पर हल्की-सी चमक दौड़ गई। उसने सावधानी से लिफाफा बंद किया और डॉली के कमरे की ओर चल दिया।

वहां पहुंचकर उसने धीरे-से दरवाजा खटखटाया।

'अंदर आजाओ।' डॉली ने आवाज दी। राज धीरे से दरवाजा खोलकर अंदर आ गया। उसे शर्म सी आ रही थी और वह भयभीत हो रहा था कि न जाने डॉली उसे देखते ही किस प्रकार का व्यवहार करेगी। डॉली बिस्तर पर बैठी एक पुस्तक पढ़ रही थी। उसे देखते ही बोली 'आओ राज।'

'यह पत्र कोई यह कहकर दे गया कि डॉली को दे देना।'

'तुमने क्यों कष्ट किया? किशन के हाथ भिजवा देते अथवा मुझे वहीं बुलवा लेते।' उसने पत्र को राज के हाथ से लेते हुए कहा और पत्र खोलकर पढ़ने लगी । पढ़ने के बाद फिर लिफाफे में डालते हुए बोली, 'खड़े क्यों हो, आओ बैठ जाओ।'

राज कुर्सी पर बैठ गया।

'वहां नहीं, मेरे पास।' उसने राज को इशारा करते हुए कहा।

राज डॉली के समीप आकर बैठ गया। डॉली बोली 'माला का पत्र है तुम्हें बुलावा भेजा है।'

'केवल मुझे या तुम्हें भी?'

'यह तुम कैसे जान गए?'

'इसमें जानने की क्या बात है, सहेली तो तुम्हारी है।'

'हां लिखा है कि आकर मुझसे मिल जाओ और राज को भी साथ ले आना। क्यों चलोगे?'

'अवश्य। क्यों नहीं? कब?'

'कल कुछ जल्दी आ जाना, चलेंगे।' इसके बाद दोनों चुपचाप एक-दूसरे को देखने लगे।

'डॉली! एक बात पूछू, तुम मुझसे नाराज तो नहीं?'

'नहीं तो।'

'मैंने सोचा शायद पूना वाली बात से तुम कुछ....।'

'इधर मैं समझ रही थी कि तुम नाराज हो।' डॉली ने बात काटते हुए कहा।

"वास्तव में यह मानव-स्वभाव है कि साधारण-सा भी संदेह उत्पन्न हो जाए तो साधारण घटनाएं भी उस संदेह की पुष्टि करने लगती हैं।'

'जय तो समीप रहने और कॉलेज में एक-साथ पढ़ने के कारण कुछ मेरे साथ घुल-मिल गया है। यदि तुम्हें पसंद न हो तो मैं उससे बोलना छोड़ दूं?'

'नहीं, ऐसा करने की क्या आवश्यकता है और फिर इसमें बुरी बात भी क्या है? क्या थोड़े ही दिनों में मैं माला से घुलमिल नहीं गया?'

'पुरुष कुछ अधिक संदेही स्वभाव वाले होते हैं।'

राज सोच रहा था.... यह भी अजीब लड़की है, पल में रुलाती है और पल में हंसाती है। रात में वस्त्रों में वह और भी सुंदर जान पड़ती थी और राज के मन में अजीब गुदगुदी पैदा कर रही थी। किशन पानी का गिलास रखने आया तो डॉली बोली, 'किशन! खाने के कमरे में एक प्लेट में माल्टे रखकर तो ले आओ।'

'अच्छा जी।'

और थोड़ी देर में किशन एक प्लेट में माल्टे लेकर लौट आया। 'यहां रख दो और तुम जाओ।' डॉली ने यह कहते हुए अपनी पुस्तक मेज पर रख दी। 'लो राज, खाओ।'

'इसकी क्या आवश्यकता थी!'
 
'मैं जानती हूं कि खाने के बाद तुमने फल नहीं खाया।'

'जब तुम्हें मेरा इतना ध्यान है तो काटकर भी खिला दो।'

'अवश्य।' और डॉली ने छुरी हाथ में ली। उसने माल्टे काटकर प्लेट में रख दिए और बोली, 'लो खाओ।'

राज ने प्लेट उठाकर उसके आगे बढ़ाते हुए कहा, 'पहले तुम।'

'मैं तो अभी खा चुकी हूं।' 'कोई बात नहीं, मेरा साथ ही सही।' डॉली ने एक टुकड़ा उठाकर चूसना आरंभ कर दिया और फिर राज ने भी। राज की दृष्टि डॉली के मुख पर जमी थी। बड़े प्यार से उसे माल्टे खिला रही थी वह। माल्टे के टुकड़े को चूसते समय राज को ऐसा लगता मानों वह डॉली के होठों का रस चूस रहा है। 'डॉली, एक बात पूछू?' राज ने छिलके प्लेट में रखते हुए कहा।

'पूछो।'

'तुम्हें जय पसंद है या मैं?'

'तुम्हारा मतलब मैं नहीं समझी।'

'मेरा मतलब? तुम्हें दोनों में से एक को चुनना हो तो किसे चुनोगी?'

'अभी तो मुझे तुम अच्छे लगते हो, आगे न जाने ऊंट किस करवट बैठता है। परंतु मेरे इन शब्दों का कोई और अर्थ न निकाल लेना।'

'नहीं, वह तो मैं भली प्रकार समझता हूं। अच्छा अब मैं चलता हूं। देर बहुत हो चुकी है। डैडी न आ जाए।'

'तो डैडी क्या कहेंगे?'

डॉली ने राज के हाथ में कैंची बनाकर कहा। 'यही कि इतनी रात तक तुम यहां क्या कर रहे हो?' 'क्या कुछ चोरी करने आये हो जो....।'

'हो सकता है?'

'क्या चुरा लोगे?'

'तुम्हारा हृदय।'

'जाओ, हटो तुम्हें तो शरारत ही सूझती है।' कहकर डॉली करवट बदलकर बिस्तर पर लेट गई। फिर धीरे-से बोली, "जरा बत्ती बंद करते जाओ। राज ने बत्ती बुझा दी और अपने कमरे की ओर चल दिया।

वह प्रसन्न मन अपने बिस्तर पर जा लेटा। दूसरे दिन वह ठीक समय पर डॉली के पास पहुंच गया। फिर दोनों माला के घर गए। वहां माला ने भी बातों-बातों में राज के मन से अनेक संदेह निकाल दिए। राज सब कुछ मान गया और पुरुष जब सुंदरियों के वश में हो जाए तो वह सब-कुछ मनवा लेती है। राज को डॉली की बातों पर विश्वास हो गया। वह जो कहती वह मान लेता। अभी तो वह उसे जय से अधिक पसंद करती है और लड़कियों को अभी तो... यह सोचकर वह मुस्कराने लगा। परंतु यह दिल-बहलावा और डॉली की बातें अधिक समय तक उसे प्रसन्न न रख पाई। एक रात जब वह सो रहा था तो किसी ने दरवाजा खटखटाया। वह घबराकर उठा। वह किशन था। बोला, 'जरा जल्दी से चलिए, सेठ साहब के पेट में बहुत दर्द हो रहा है।'

'क्यों, क्या बात है?' उसने चप्पलें पहनते हुए कहा।

'पता नहीं, मैं रसोई में बर्तन मांज रहा था। आवाज सुनकर गया तो वह बोले कि जरा राज या डॉली को जगा दो। मेरे पेट में बहुत दर्द है। इसलिए मैं आपके पास....।'

'अच्छा किया तुमने, डॉली की क्या आवश्यकता है। उसकी नींद खराब करने से क्या लाभ? चलों, मैं चलता हूं।' यह कहकर राज जल्दी से सेठ साहब के कमरे में पहुंचा।

'क्यों डैडी क्या बात है?' राज ने घबराकर पूछा।

'न जाने अचानक पेट में कुछ दर्द-सा उठा और बढ़ता ही जा रहा है। अब तो सहन भी नहीं होता। डॉली नहीं आई?'

'उसे जगाने की क्या आवश्यकता है, मैं जो हूं।'

'देखो, अलमारी में अमृतधारा रखी होगी, दो-चार बूंदें दे दो।' राज ने अलमारी खोली और शीशियां टटोलने लगा परंतु दवा न मिली।

'न जाने कहां रख दी। सौ बार कहा है कि प्रत्येक वस्तु अपने स्थान पर होनी चाहिए। देखो, सामने दराज में तो नहीं?' सेठ साहब ने कहा। वह दर्द से कराह रहे थे। राज ने दराज खोला और अमृतधारा मिल गई। उसने दो-चार बूंदें पानी में मिलाकर सेठ साहब को पिला दी। दर्द कुछ घटा, पर थोड़ी देर बाद फिर होने लगा। राज ने दो-चार बूंदें अमृतधारा और पिला दी।
 
'राज, मेरा विचार है कि गरम पानी की बोतल करके सेंक लूं।'

'अभी पानी गरम करे देता हूं। बोतल कहां है?'

'तुम्हें कष्ट होगा, जरा डॉली को जगा दो।' राज डॉली के कमरे की ओर गया और वहां पहुंचकर उसने धीरे-से दरवाजा खटखटाया। कोई उत्तर न मिला। उसने कुछ जोर से खटखटाया। उत्तर इस बार भी न मिला। शायद गहरी नींद में सो रही हो, यह सोचकर वह अपने कमरे में गया, टार्च उठाई और बाहर खिड़की से डॉली को आवाज दी। कोई उत्तर न पाकर उसने टार्च की रोशनी डॉली के बिस्तर पर डाली। वह स्तब्ध खड़ा रह गया। डॉली बिस्तर पर न थी। वह जा भी कहां सकती है इतनी रात गए? दरवाजा तो अंदर से बंद है। उसके रक्त की गति मानो बंद हो गई। उसने अपनी उंगली काटी, अपनी आंखों को मला, अपने हाथों को रगड़ा और जब उसे विश्वास हो गया कि वह स्वप्न नहीं देख रहा तो उसने फिर कमरे में टार्च की रोशना डाली। कमरे में कोई न था। उसने घूरकर आगे-पीछे देखा, चारों ओर घना अंधकार था! दूर बाग में उसने किसी के पैरों की आहट सुनी। वह धीरे-धीरे उसी ओर बढ़ा। उसका हृदय धड़क रहा था। कुछ दूरी पर उसको एक छाया-सी दिखाई दी। उसने टार्च की रोशनी उसी ओर डाली। उसके आश्चर्य की सीमा न रही। उसके पैरों के नीचे से मानों जमीन खिसक गई हो। वह देखता क्या है कि डॉली एक युवक के बाहुपाश में बंधी खड़ी है। रोशनी पड़ते ही डॉली संभली। वह घबरा -सी गई।

राज ने देखा वह युवक जय था। राज का अंग-प्रत्यंग क्रोध से फड़कने लगा, पर वह शांत रहा।

'कौन? दी. प. क?'

'डॉली, डैडी बुला रहे हैं।' राज यह कहकर वापस लौट पड़ा। डॉली उसके पीछे-पीछे आ रही थी। वह कांप रही थी। इस समय डैडी ने क्यों बुलाया है? क्या वह यह सब जान गए

दोनों बरामदे में पहुंच गए। राज सीढ़ियों पर रुक गया। डॉली ने समीप पहुंचते हुए धीरे-से कहा, 'कहां है डैडी?'

'अपने कमरे में।' राज का स्वर गंभीर था।

'क्यों? क्या बात है?' डॉली डरते-डरते बोली।

'उनके पेट में बहुत दर्द है। गरम पानी की बोतल मंगवाई है।'

'तुम चलो, मैं आती हूं।' डॉली यह कहकर बाहर गई और खिड़की के रास्ते से अंदर जाकर अपने तकिए के नीचे से तालियां उठाई और शीघ्रता से डैडी के पास पहुंची।

'क्यों, डैडी क्या बात है?'

"पेट में बहुत दर्द है। घोड़े बेचकर सो गई थी जो जगाने में इतनी देर लगी?'

'ऐसे ही जरा नींद आ गई थी।' उसने कनखियों से राज की ओर देखा। वह क्रोध से लाल हो रहा था। डॉली ने सामने का कमरा खोला और बोतल निकालकर राज के हाथ में दे दी। डॉली रसोई से गरम पानी का बर्तन ले आई। राज ने बोतल का कार्क खोला और बोतल आगे कर दी। डॉली ने पानी बोतल में डालना आरंभ किया। उसके हाथ कांप रहे थे। उबलता हुआ राज के हाथ पर जा पड़ा और बोतल उसके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गई।

'होश में हो या सो रही हो?' सेठ साहब ऊंचे स्वर में बोले।

'जी, कोई बात नहीं।' राज ने कहा और बोतल फिर से उठाकर हाथ में ले ली। डॉली ने पानी डाला और बोतल का कार्क बंद करके राज ने बोतल सेठ साहब के हवाले की। सेठ साहब ने उसे लेकर पेट पर रख लिया।

'अब तबियत कैसी है?' थोड़ी देर बाद राज ने पूछा।

'अब तो कुछ आराम है?' 'नहीं, वह तो मामूली....।'

'इधर आओ।'

राज ने अपना हाथ आगे कर दिया। चमड़ी लाल होकर उभर आई थी। उबलता पानी था, जलना तो था ही।

'डॉली, जाओ, गीला आटा इस पर लगा दो, कहीं छाले न पड़ जाएं....' डैडी बोले, 'और देखो, बत्ती बंद कर दो, शायद नींद आ जाए।'

राज ने बत्ती बंद कर दी और दोनों कमरे से बाहर निकल गए। 'कहां जा रहे हो?' डॉली ने राज से पूछा।

'अपने कमरे में।' 'ठहरो, देखती हूं शायद आटा मिल ही जाए।'

'मुझे आवश्यकता नहीं।' राज के स्वर में कठोरता थी।

"देखो तो कितना जल गया है।'

'हाथ जला है तो आटा लगा दोगी, परंतु दिल को....?' और राज ने अपना मुंह फेर लिया।

'राज, मै तुम्हारे सामने बहुत लजित हूं। बात वास्तव में....'

'मुझे किसी सफाई की आवश्यकता नहीं। रात अधिक बीत चुकी है। जाओ सो रहो।' और राज अपने कमरे की ओर बढ़ा।

'बात तो सुनो राज!'

परंतु राज सीधा अपने कमरे में चला गया और उसने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।

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राज और डॉली के बीच अब एक दीवार-सी खड़ी हो गई थी। डॉली को अब वह अपने से दूर समझने लगा। जब डॉली उसे पसंद ही नहीं करती तो वह मूर्ख की भांति उसके पीछे क्यों पड़ा है? डॉली ने कई बार प्रयत्न किया कि राज को बातों में लाकर फिर से मना ले परंतु राज इस बार उससे दूर-दूर ही रहा। निराश होकर डॉली ने भी उपेक्षा प्रकट करनी आरंभ कर दी।

संध्या का समय था। राज घर लौटा तो डॉली बरामदे में रैकेट लिए खड़ी थी। शायद वह खेलने जा रही थी। राज ने चाहा कि उसका सामना न हो। वह दूसरी ओर जाने लगा। 'राज!' डॉली की आवाज ने उसे रोक दिया। वह राज के सामने आकर बोली, 'क्यों, मेरे सामने आते भय लगता है जो सीधा रास्ता छोड़कर टेढ़े रास्ते जाने लगे? भयभीत तो मुझे होना चाहिए।'

'तुम्हारी तरह निर्लज्ज तो नहीं बन सकता।'

'तो बनने को कौन कहता है? तुम तो एक भले आदमी हो और भलाई अपना आभूषण मानते हो, फिर मुझ जैसी निर्लज्ज और चंचल लड़की से तुम क्या आशा रखते हो।'

"तुमसे मुझे क्या-क्या आशाएं थीं परंतु...।' वह मौन हो गया।

डॉली ने बात काटकर कहा, 'परंतु उस रात के दृश्य को देखकर अब जी भर गया और कोई इच्छा नहीं रही... यह कहना चाहते हो ना?'

'मैं तुम्हारा अभिप्राय नहीं समझा।'

'राज, मैं जानती हूं तुम्हें मुझसे घृणा हो गई है, होनी भी चाहिए। तुम मेरी सूरत भी देखना नहीं चाहते। मेरी केवल एक इच्छा है यदि मानो तो....।'

'क्या?'

'तुम मुझसे बोलना न छोड़ो। मैं तुमसे बोले बिना नहीं रह सकती। तुम जिस नाते से मुझे चाहते हो वह पूरा नहीं हो सकता और न अब तुम्हारे हृदय में उसके लिए कोई इच्छा ही शेष है परंतु मित्रता के नाते तुम मुझे नहीं छोड़ोगे।'

'मित्रता! कैसी मित्रता।'

'कम्पेनियनशिप।'

'तुम कैसे जानती हो कि अब मेरे हृदय में तुम्हें पाने की कोई इच्छा नहीं रही?'

'मुझे उस रात उस दशा में देखकर जो कोई भी होता, यही करता। क्या अब भी तुम्हारे हृदय में मेरे प्रति कोई झुकाव

'हो सकता है।'

'फिर तो मैं भाग्यवान हूं जो इतना होने पर भी तुम्हारे हृदय में मेरे लिए कुछ सहानुभूति है।'

"ऐसा ही समझ लो। मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण किसी के मन को ठेस पहुंचे। इस प्रयास में मेरा अपना अस्तित्व ही मिट जाए तो मुझे परवाह नहीं।'

'राज, मुझे तुमसे यही आशा थी। जब तुम मेरा इतना ख्याल रखते हो तो मुझे एक वचन दो।'

'कैसा वचन?'

'कि तुम मेरे और जय के रास्ते में न आओगे।' 'मैं जय से प्रेम करती हूं और मैं....' 'मैं तुम्हारा दिल दुखाना न चाहती थी।'

'बस डॉली, बस! क्या तुम समझती हो कि इन बातों से मेरे हृदय को शांति मिल रही है?'

'परंतु अब मैं तुमसे कुछ छिपाकर रखना नहीं चाहती। तुम विश्वास दिलाओ कि अब मेरा ख्याल छोड़ दोगे।'

'प्रयत्न करूगा, विश्वास नहीं दिला सकता।' यह कहकर राज अंदर चला गया। डॉली भी उसके पीछे-पीछे गई।

'तुम्हारी आंखों में आंसू कैसे?'उसने राज को रोते देखकर कहा।

'अभी हृदय पतथर का नहीं बना। प्रयत्न कर रहा हूं।'

'तुम तो बालकों की भांति रोने लग गए।' डॉली ने अपने रुमाल से उसके आंसू पोंछे।

'तुम जाओ डॉली, मुझे अकेला छोड़ दो। मैं प्रयत्न करूंगा कि जो कुछ हुआ है उसे शीघ्र भूल जाऊं।'

'तुम भी साथ चलो न, कुछ देर खेलकर लौट आएंगे।'

"मेरी इच्छा नहीं. तम जाओ।'

'मेरी बात का बुरा तो नहीं माना तुमने।'

'बुरा क्यों मानने लगा और फिर तुम्हारी बातों का?'

'अच्छा राज!' डॉली ने राज के हाथ को अपने हाथ में दबाते हुए कहा और बाहर चली गई।
 
राज बहुत उदास था। आज उसकी रही-सही आशा भी उसे छोड़ गई। क्या यह सब सत्य था? उसने प्रेम किया है अपने को खोकर... परंतु डॉली का व्यवहार? कभी स्वप्न में भी वह नहीं सोचता था कि डॉली उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार करेगी। इसी प्रकार विचारों में संध्या बीत गई और वह कमरे में ही लेटा हुआ इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयत्न कर रहा था कि किसी ने उसका दरवाजा खटखटाया....| 'कौन है?'

"मैं माला।'

'दरवाजा खुला है, अंदर आ जाओ।' माला ने दरवाजा खोला और अंदर आ गई। राज उठ बैठा और बोला, 'आओ माला।'

'डॉली कहां है?' 'बैडमिन्टन खेलने गई है।'

'अच्छा , क्या तुम सो रहे थे?'

'नहीं तो।'

'आंखों से ऐसा जान पड़ता है कि नींद से उठे हो या रो रहे थे।

अभी आया हूं, थका हुआ था। चलो ड्राइंगरूम में चलकर बैठे।

दोनों उठकर ड्राइंगरूम की ओर चल दिए। राज, तुम कुछ छिपा रहे हो। मेरे आने से पहले तुम अवश्य रो रहे थे।

'नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं। मैं अभी हाथ-मुंह धोकर आता हूं।' यह कहकर राज गुसलखाने में चला गया और माला ड्राइंगरूम में बैठी उसकी प्रतीक्षा करने लगी। थोड़ी ही देर में राज मुंह-हाथ धोकर माला के पास आ गया और दोनों एक साथ चाय पीने लगे।

माला ने पूछा, 'आज चाय इतनी देर से क्यों? डॉली तो कहती थी, आप दोनों शाम की चाय एक साथ पीते हैं। झगड़ा हो गया है?'

'नहीं तो, इसमें झगड़े की क्या बात है? आज मैं कुछ देर से आया। वह पीकर जा चुकी थी।'

'तुम्हें यह कैसे पता चला कि वह बैडमिंटन खेलने गई है?'

"रैकेट उसके हाथ में था।'

'अभी तो तुमने कहा कि वह तुम्हारे आने से पहले ही जा चुकी थी।'

"मेरा मतलब.... वह जा रही थी।'

'हूं। कुछ दाल में काला अवश्य दिखाई देता है। राज, मुझसे क्यों छिपाते हो, हो सकता है कि मैं तुम्हारी कुछ सहायता कर सकू।'

तुमने झूठ क्यों बोला था माला

'मैं समझी नहीं।'

"तुमने पूना में जो कुछ मुझसे कहा था वह सत्य था। फिर न जाने क्यों मैं मूर्ख की भांति डॉली की बातों में आकर सब कुछ भूल गया और विशेषकर मुझे तुम्हारे पत्र में लिखी बातों ने बहुत धोखे में रखा।'

'कौन-सा पत्र?'

'जो तुमने डॉली को लिखा था। भूल से मैंने पढ़ लिया। तुमने अपनी सहेली को मनाने के लिए झूठ लिखा था। परंतु मुझे कहीं का भी न रखा।'

'जब वह तुम्हें नहीं चाहती तो फिर तुम इतने आतुर क्यों हो?'

'तुम क्या जानो माला। परंतु अब ऐसा ही करना होगा। उसने आज साफ-साफ कह दिया कि वह जय को पसंद करती है और मुझसे वचन मांगा है कि मैं उनके रास्ते में न आऊं।'

'मैं तो पहले ही समझती थी कि वह कभी तुम्हारी नहीं हो सकती।'

'कितना अच्छा होता, यदि मैं पहले से ही जान लेता।'

'अच्छा अब चलती हूं।'

'अभी ठहरो ना, डॉली आती होगी।'

'नहीं, पता नहीं कब आए।' यह कहकर माला उठी।
 
'ठहरो, मैं तुम्हें छोड़ आऊं।'

'इतना कष्ट करने की क्या आवश्यकता है?'

"ऐसे ही चलो। सैर ही सही, घर में अकेला बैठे-बैठे भी क्या करूगा।' राज माला को छोड़ने के लिए चल दिया। जब वे दोनों सड़क पर जा पहुंचे तो राज बोला, 'माला एक बात पूंछू?'

'अवश्य।'

'जय में ऐसी क्या विशेषता है जो मुझमें नहीं?'

'कोई विशेष बात तो दिखाई नहीं देती।'

"फिर डॉली मुझे छोड़कर उसे क्यों पसंद करती है?'

'राज, तुममें और उसमें एक अंतर है।'

'क्या?'

'वह तुमसे अधिक अमीर है, पढ़ा हुआ है और....।'

'परंतु यह सब तो दिखावे की वस्तुएं हैं, इनका प्रेम से क्या संबंध, प्रेम तो हृदय से होता है।'

'परंतु डॉली की दृष्टि में इन वस्तुओं का मूल्य अधिक है।'

'मुझसे अमीर सही, परंतु मैं भी तो कोई भिखारी नहीं।'

'चाहे भिखारी नहीं हो, लेकिन तुम डॉली के पिता के नौकर तो हो।'

'यह बात तो है, परंतु प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी का नौकर है ही।'

'खैर बहस से क्या लाभ। मैं तो डॉली का दृष्टिकोण तुम्हें बता रही थी।'

'तुम यह सब किस प्रकार कह सकती हो?'

'यह सब बातें डॉली ने ही मुझसे कही थीं।'

'क्या कहा था?'

"कि मुझे अपने जीवन का भविष्य भी देखना है। जय के साथ रहकर मैं जितने आदर और आराम का जीवन बिता सकती हूं, क्या वह राज के साथ रहकर संभव है? इसमें कोई संदेह नहीं कि वह एक अच्छा लड़का है परंतु फिर हमारा नौकर ही है।'

'मेरी अवहेलना केवल इसलिए की जा रही है कि मैं उसे जीवन का सुख और आराम नहीं दे सकता। पर माला, मैं तुम्हें किस प्रकार विश्वास दिलाऊं कि मैं सब प्रकार का सुख और आराम अपनी....।' कहते-कहते राज रुक गया।

'रुक क्यों गए?'

'माला, मैं चलता हूं। बातों-बातों में इतनी दूर पहुंच गया।'

'अच्छा फिर मिलेंगे, मैं तो फिर भी यही कहूंगी कि उसका ध्यान छोड़ दो। जिस राह जाना नहीं उसकी नाप-तोल करने से क्या लाभ?' यह कहकर माला आगे चली गई और राज घर की ओर लौटा।
 
'अच्छा फिर मिलेंगे, मैं तो फिर भी यही कहूंगी कि उसका ध्यान छोड़ दो। जिस राह जाना नहीं उसकी नाप-तोल करने से क्या लाभ?' यह कहकर माला आगे चली गई और राज घर की ओर लौटा।

तो क्या वह उस मार्ग को छोड़ दे? डॉली से बात करते समय तो उसने निश्चय कर ही लिया था कि वह डॉली और जय के रास्ते में कभी नहीं आएगा परंतु माला की बातों ने उसे अपने निश्चय पर फिर से विचार करने को बाध्य कर दिया। इन्हीं विचारों के संघर्ष में डूबा वह घर पहुंचा। डॉली वापस आ चुकी थी। राज को देखते ही बोली, 'कहां गए थे?'

'जरा घूमने। माला आई थी।"

"कब?'

'तुम्हारे जाने के कुछ देर बाद ही।'

'कुछ कहती थी?'

‘ऐसे ही मिलने आई थी।' यह कहकर राज कमरे में चला गया। राज ईर्ष्या की आग में जलने लगा। दिन पर दिन उसे डॉली से खीझ होती जा रही थी। क्या वह उससे घृणा करने लगा था? एक रविवार को जब वह बाहर से लौटकर आया तो सेठ साहब ड्राइंगरूम में बैठकर एक व्यक्ति से बात कर रहे थे। कोई नए महाशय थे। राज ने पहले कभी उन्हें देखा न था। जब वह अंदर आने लगा तो सेठ साहब ने आवाज दी और राज उनके पास जाकर बोला, 'कहिए, क्या आज्ञा है?'

'यह है वह होनहार जिनको मैंने अपना सारा कारोबार सौंप दिया है।'

'तो यह है राज! बहुत प्रसन्नता हुई इनसे मिलकर। आओ बेटा, बैठो।' वे बोले और राज पास ही सोफे पर बैठ गया।

'और राज, यह हैं बैरिस्टर मधुसूदन, जो हमारे सामने वाली कोठी में रहते हैं। जय को तो तुम जानते ही होगे, यह उसके पिता है।' मानो राज को किसी ने डस लिया हो। वह जय का नाम सुनते ही कांप गया। तो यह हैं उसके पिता। सामने रहते-रहते इतना समय बीत गया और अब मेल-जोल बढ़ाना शुरु किया?

'अच्छा मैं चलता हूं। क्या आप खाना खा चुके?' राज ने उठते हुए कहा।

'मैं तो खा चुका हूं। डॉली खा रही होगी। तुम भी खा लो।'

राज सीधा खाने के कमरे में पहुंचा। डॉली खाना खा रही थी परंतु अकेली नहीं जय भी साथ था। उसे देखते ही बोली, 'आओ राज, बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के बाद खाना अभी शुरु किया है।'

'प्रतीक्षा के लिए धन्यवाद!' उसने कुर्सी पर बैठते हुए कहा और प्लेट आगे कर ली।

डॉली ने साग का कटोरा पकड़ाते हुए कहा, 'क्यों, आज कुछ गुस्से में हो, किसी से लड़ाई तो नहीं हुई?'

'हो सकता है।' उसने जय की ओर देखते हुए उत्तर दिया। जय सिर नीचा किए चुपचाप खाने में तल्लीन था।

'जीता कौन?'

"फिर तो बहुत शूरवीर हो।'

'मैंने हारना नहीं सीखा।'

'फिर तो बहुत भाग्यवान हो।'

'मैं सब-कुछ हूं परंतु निर्लज्ज नहीं।' यह कह उसने कुर्सी छोड़ दी।

'यह आज तुम्हें हुआ क्या है? खाना क्यों छोड़ दिया?'

'भूख नहीं है।'

'अनोखी बात है, अभी तो खाने बैठे और अभी भूख नहीं!'

राज उत्तर दिए बिना ही कमरे से बाहर निकल गया। 'मैं अभी आती हूं जय।' डॉली यह कहकर राज के पीछे-पीछे गई और बोली, 'राज, तुम्हें ऐसा न करना चाहिए था।'

'क्या किया मैंने?'

'खाना क्यों छोड़ दिया? कम-से-कम अतिथि का तो ध्यान रखना चाहिए।'

'क्या अतिथि का ध्यान रखने के लिए तुम कम हो?'

'राज, तुम सीमा से बाहर होते जा रहे हो।'

'तुम जाओ डॉली, जय कहीं प्रतीक्षा में खाना न छोड़ दे। विश्वास रखो, मेरा प्रेम और आदर तुम्हारे लिए किसी प्रकार भी कम न होगा।'

'बहुत आदर करते हो! ढोंगी कहीं के!' और आवेश में भरी डॉली बाहर जाने लगी, परंतु राज ने उसका हाथ पकड़कर उसे रोक लिया और कहा "डॉली, मुझे गलत न समझो।'
 
'छोड़ दो मुझे, यही समझना कि मैं तुम्हारे लिए मर गई हूं।'

'डॉली, यह मेरे जीवन-मरण का प्रश्न है।'

'तो जाकर तेजाब पी लो ना, किस्सा ही समाप्त हो जाए।' डॉली ने जोर से हाथ छुड़ाया और वापस खाने के कमरे में चली गई। राज वहीं खड़ा रहा।।

कुछ देर में जय और डॉली खाना खाकर ड्राइंगरूम में चले गए। बैरिस्टर साहब और जय के चले जाने पर डॉली अपने कमरे में चली गई और सेठ साहब राज के कमरे में।

'डैडी आप....?'

'क्यों क्या बात है, तबियत तो ठीक है। डॉली कह रही थी कि तुमने खाना भी नहीं खाया।' ।

'जी कुछ भूख कम थी, सोचा कुछ देर ठहरकर खा लूंगा।'

'दो तो बज गए हैं और कब खाओगे। चलो खा लो, गरमी हो जाएगी।' राज उठा और जाने लगा। सेठ साहब भी उसके साथ-साथ खाने के कमरे में चले गए और बैठकर बातें करने लगे। 'राज, जानते हो बैरिस्टर साहब क्यों आए थे?'

'किसी कारोबार के बारे में?'

'नहीं, डॉली की सगाई के लिए।'

'किससे?' राज के हाथ का कौर हाथ में ही रह गया।

'जय से।' क्यों राज, लड़का भी तो अच्छा है, घर भी अच्छा है और बैरिस्टर साहब ने आप ही रिश्ता मांगा है।

'परंतु मैं क्या परमर्श दे सकता हूं। आप अधिक समझ सकते हैं।'

'डॉली को तो कोई आपत्ति नहीं होगी?'

'आपके घरेलू मामलों को जितना आप स्वयं समझ सकते हैं, दूसरा क्यों कर समझ सकता है?'

'आखिर तुम भी तो मेरे ही हो। डॉली के चले जाने के बाद मेरा है ही कौन?'

'उसे क्या आपत्ति हो सकती है? लड़का अच्छा है, धन है, मान है और क्या चाहिए उसे?'

'परंतु लड़िकयां अपनी इच्छा की होती हैं। एक बार उससे पूछ तो लेना चाहिए। पर पूछे कौन? घर में मेरे सिवाय है कौन और मैं कैसे पूछू। राज तुम तो डॉली से बहुत खुले हुए हो।'

'आपका मतलब?'

'यही कि बहन-भाई आपस में हंसी करते ही रहते हैं और -हंसी में तुम उससे पूछ सकते हो।'

'और यदि उसे यह स्वीकार न हो तो....?'

'तो मुझे क्या पड़ी है? मुझे तो उसकी प्रसन्नता ही चाहिए।'

'प्रयत्न करूगा।' राज ने उत्तर दिया। सेठ साहब उठकर दूसरे कमरे में चले आए। राज ने जैसे-तैसे एक चपाती खाई और हाथ धोकर अपने कमरे में जाकर लेट गया। तो डॉली की सगाई जय से हो रही है! डॉली को जय पसंद है। यह सब सोचकर वह हंसने लगा। उसका हृदय रो रहा था। उसका संसार उसके सामने ही नष्ट हो रहा था। परंतु वह क्या करता और कर भी क्या सकता था! मनुष्य यदि अपनी इच्छा की वस्तु पा सकता तो पीड़ा का कोई अस्तित्व ही न रहता।

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रात के कोई दो बजे होंगे, चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। सब गहरी नींद का आनंद ले रहे थे। डॉली अपने बिस्तर पर बेहोश सो रही थी कि अचानक किसी की आहट से चौंक-सी गई। 'तुम? इस समय यहां?'

"हां, मैं ही तो हूं।'

'इतनी रात गए यहां क्या करने आए हो?'

'घबराओ नहीं चोरी करने नहीं आया।'

'और किसलिए....?'

'डॉली, मैंने सुना है कि जय से तुम्हारी बात पक्की हो रही है?' उसने पास आते हुए पूछा।

'संभव है कि तुमने ठीक सुना हो।'

'इसमें संभव की क्या बात है।' डैडी कह रहे थे।

'क्या डैडी की बात पर विश्वास नहीं जो पूछने आए हो?'

'विश्वास तो है पर तुम्हारे मुंह से भी सुनना चाहता हूं।'

'सुनना चाहते हो तो जो डैडी ने कहा है, ठीक है।'

'तो तुम प्रसन्न हो?'

'इसमें प्रसन्न होने की बात ही क्या है?'

'डॉली, इतनी क्रूर न बनो। मेरे प्रेम को इस तरह न ठुकराओ।'

'मेरा तुम्हारे साथ कोई संबंध नहीं।'

'मेरे प्रेम पर ध्यान दो।'

'मेरे हृदय में तुम्हारे लिए न कभी प्रेम था, न है, न कभी होगा।'

'तो क्या वह सहानुभूति और विश्वास सब मिथ्या थे?'

'यदि मेरी सहानुभूति को तुम गलत समझ लो तो इसमें मेरा क्या दोष है? सहानुभूति तो एक मानवीय कर्त्तव्य है। सहानुभूति तो आवारा कुत्तों से भी की जा सकती है, तुम तो फिर भी....।'

'डॉली संभलकर बात करो, यह न भूलो कि मेरी भी इज्जत है।'

'आज से पहले अवश्य तुम्हारी इज्जत थी, परंतु जब तुम इतने गिर सकते हो कि इतनी रात गए अकेले यहां आकर मेरी बेइज्जती करने लग जाओ तो....'

'यदि तुम आधी रात के समय चोरी से खिड़की फांदकर किसी से मिल सकती हो तो मेरे यहां आने में क्या आपत्ति हो सकती है?'

'आधिक बातें बनाने की आवश्यकता नहीं, नहीं तो अभी डैडी को जगाती हूं। अपनी बेइज्जती अपने-आप ही कराओगे।'

'मुझे धमकी देने की कोई आवश्यकता नहीं। तुम प्रसन्नता से उन्हें जगा सकती हो। मैं कोई चोरी करने के इरादे से नहीं आया, अपना अधिकार समझ कर आया हूं।'

'कैसा अधिकार?'

'तुम पर। सच बताओ डॉली, जय तुम्हें क्या दे सकता है जो नहीं दे सकता?'

'मुझसे बहस करने की आवश्यकता नहीं। मेरा इतना कह देना ही तुम्हारे लिए बहुत है कि मैं तुम्हें पसंद नहीं करती।'

'इसलिए कि मैं किसी बैरिस्टर का लड़का नहीं, इसलिए कि मेरे पास कोठी नहीं है और न ही घूमने के लिए कार है।'

'जब यह समझते हो तो मेरा पीछा छोड़ दो।'

"परंतु डॉली, तुम्हें खरीदने के लिए क्या मेरा दिल पर्याप्त न था।'

'यदि कोई ग्राहक किसी वस्तु का मूल्य न दे सके तो उसका विचार ही छोड़ देना चाहिए।'

'तुम तो कहती थीं कि मैं रुपये से अधिक मनुष्य का आदर करती हूं। यह भी ध्यान रहे कि जिस वस्तु को मनुष्य अधिक पसंद करता है, वह उसे खरीदने की शक्ति न होने पर छीन लेता है।'

'तो वह मनुष्य न होकर लुटेरा हुआ।'

'कभी-कभी मनुष्य को लुटेरा बनना पड़ता है।'

"तुम तो कहते थे कि तुम कोई गिरा हुआ मार्ग न अपनाओगे, जिससे तुम्हारे आचरण पर धब्बा आए।'

'वह एक भ्रम था, यह एक वास्तविकता है।'

'तो इसी प्रकार तुम्हारा प्रेम भी एक धोखा था?'

'और अब तुम्हें पा लेने की धारणा वास्तविकता है।'

'इसका भ्रम भी अपने मन से निकाल दो।'

'तुम पर मेरा अधिकार है।'

'असंभव है।'

'तुम्हें मुझसे कोई छीन नहीं सकता।'

"वह देखा जाएगा। अब आप कृपा करके बाहर चले जाइए।'

"निराश होकर?'

'तो ठहरिए, अभी बताती हूं।' यह कहकर डॉली ने दरवाजा खोला और बाहर जाने लगी।

'कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है, डैडी अपने बिस्तर पर नहीं है।'

'कहां है?' डॉली ने आश्चर्य से पूछा।

"रात को वापस नहीं आए, टेलीफोन आया था कि एक मित्र के घर ठहर गए हैं।'

'क्यों ?'

'शहर में कयूं लग जाने के कारण।'

'अब समझी कि तुममें इतना साहस कैसे हुआ।'
 
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