• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

चलते पुर्जे ( विजय विकास सीरीज़ )

बात उस वक्त की है जब शोफर ने लिमोजीन उस बिल्डिंग की पार्किग में पार्क कीं जिसमेँ गजाला का फ्लैट था और बिजय क्रो लेने लिफ्ट की तरफ चला गया ।

अलफांसे मानो किसी ऐसे ही मौके की तलाश में वहां पहले से छुपा हुआ था ।

मोका लगते ही वह लिमोजीन की पिछली सीट के पीछे जा छुपा ।

पुराने ओर 'घिसे हुए' पाठक जानते हैँ कि अंतर्राष्टीय शातिर कै लिए ऐसे काम चुटकी बजाने जितने आसान होते हैँ । लिमोजीन के ताले की बिसात क्या थी, दुनिया के किसी भी ताले को खोल देने वाली मास्टर की हमेशा उसकी जेब में रहती है ।

करीब सात मिनट बाद शोफर विजय को उठाए लिमोजीन तक आया । उसे पिछली सीट पर बैठाया और गाडी आगे बढाई ।

विजय उठकर शोफर की बगल वाली सीट पर जा बैठा और बातों बातों में उससे कइ काम की बात निकलवाने क्री काशिश करता रहा पर शोफर था कि यह कहने के बाद चुप हो गया कि उसके मालिकों ने किसी भी सवाल का जवाब न देने का हुक्म दिया हे और तब, जब लिमोजीन कुतुबमीनार जेसी इमारत के पोर्च में रुकी, अलफासे रोमांचित हो उठा क्योंकि जानता था कि यह इमारत हाजी गल्ला का हेडक्वार्टर हे । बही हेडक्वाटर जिसका जिक्र उसने विजय से किया या । जिसके बारे में कहा था कि परिंदे ने भी घुसने की कोशिश की तो पंख जला बैठेगा।

........................

शोफर विजय को लेकर इमारत कै अंदर चला गया । अलफांसे ने काफी देर वाद खुलकर अंगडाई ली क्योंकि एक पोज में पडे पडे जिस्म अकड गया था,,,,,

.....बल्कि सीट की पुश्त कें पीछे से निकलकर सीट पर बैठ गया क्योंकि काले कांच के कारण वह भले ही गाडी से बाहर का नजारा कर सकता हो परंतु बाहर से उसे कोइ नहीं देख सकता था । गाडी कै आसपास और दूर दूर तक सशस्त्र गार्डस तैनात थे-इतने ज्यादा कि उनकी नजरों से छुपकर वाहर निकलना नामुमकिन था और उनमे से किसी कै द्वारा देख लिए जाने का मतलब था-राम नाम सत्य ।

अपने एक्सपीरिएंस कै आधार पर अलफांसे जानता था कि विजय क्रो अब इमारत से बाहर निकालकर नहीं लाया जाएगा जबकि कुछ ही देर बाद शोफर का आना निश्चित हे ।

वह लिमोजीन को यहां से हटाएगा ।

इमारत की वाऊंड्री वाल से वाहर भी ले जा सकता है ।

ऐसा हो गया तो...उसका छुपकर यहा तक आना बेकार हो जाएगा ।

अत: शोफर के आने से पहले गाडी से निकलकर कहीं और छुप जाना ज़रूरी था परंतु ऐसा होना असंभव नज़र आ रहा था।

ओर...असंभव ही साबित हुआ क्याकि भरपूर दिमाग लगाने के बावजूद अलफांसे शोफर के लौटने तक भी कोई तरकीब न सोच सका ।

जेसा कि था…शौफर आते ही अपनी सीट पर बेठा, गाडी स्टार्ट की और वेक करनी शुरू कर दी।

शोफर कें गाडी में आने से पहले ही अलफासे पुरानी जगह पर उकडूं होकर छूप चुका था ।

थोडी वेक होने कै वाद गाडी सामने की तरफ बढी और कुतुबमीनार जेसी इमारत का चक्कर लगाकर उसके पीछे की त्तरफ पहुच गइ ।

सशस्त्र गाड वहा भी तैनात थे । अलफासे ने उचककर देखा…लिमोजीन एक गेराज के शटर की तरफ मुंह किए खडी थी । शोफर ने गाडी कै डेशबोड पर पड़ा रिमोट उठाकर कोई बटन दबाया ।

शटर ऊपर उठ गया ।

शोफर गाडी को गैराज में ले गया ।

रिमोट से शटर वापस बंद किया ।

अब सूर्य की किरणे गैराज के अंदर नहीं आ रही थीं परंतु वहां एक बल्ब रोशन था ।

शोफर बाहर निकला ।

गाडी लाक की और गेराज में माजूद एक अन्य दरवाजे की तरफ बढ़ गया ।

जेब से चाबी निकालकर दरवाजे का लाक खोला तथा दूसरी तरफ चला गया ।

उसके तुरंत बाद, दूसरी तरफ से लाक में चाबी घूमी यानी...लाक वापस लाक हो गया था । गेराज को रोशन करता एकमात्र बल्ब आफ ।

अंधेरा छा गया वहां.......मगर हमारा अंतरर्राष्ट्रीय शातिर खुशी की ज्यादती के कारण बल्लियों उछल रहा था क्योंकि गाडी को बाऊड्री वाल से बाहर नहीं ले जाया गया था ।

उसे यह समझते देर न लगी थ्री कि सुरक्षा कारणों से शोफर कै रेजिडेंस का दरवाजा इसी गैराज से दिया गया है और वह कुतुबमीनार जेसी इमारत के अंदर ही हे ।

अब वह 'एक्शन' कर सकता था । मगर उसके ख्याल से किसी भी एक्शन के लिए अभी उचित समय न था............अत: आराम से पिछली सीट पर लेट गया और रात होने का इंतजार करने लगा ।

कुछ देर बाद जेब से पिंग पिंग की आवाज़ आइ । उसने वह यंत्र निकालकर देखा जिसे बिजय ने गजाला कें फ्लेट की खिडकी से बाहर फेंका था ।

उसकी छोटी सी स्क्रीन पर कुछ लिखा था ।

उसे पढकर अलफासे के होठों पर बडी ही बिचित्र मुस्कान उभरी ।

यंत्र पर कुछ टाइप किया ओर पुन: आराम से लेट गया । रेडियम डायल रिस्टवाच ने जब बारह बजाए तो आहिस्ता से दरवाजा खोलकर लिमोजीन से बाहर आया ।

जेब से पेंसिल टार्च निकालकर आन की और उस दरवाजे के करीब पहुंचा जिसके पीछे शौफ़र गुम हुआ था ।

अगले पल उसने मास्टर की से लाक रब्रोल लिया था मगर इस तरह से कि ज़रा भी आवाज़ न हो । किवाड़ खोलने पर उसने खुद क्रो एक गेलरी में पाया ।

गेलरी तीन फुट चोडी और करीब दस फुट लंबी थी । टार्च हाथ में लिए, उसकी कमजोर रोशनी की मदद से दबे पांव आगे बढा ।

गेलरी एक छोटी सी लावी मेँ खत्म हुइ । लाबी के एक तरफ दो दरवाजे थे, दूसरी त्तरफ़ एक ।

सामने की तरफ पांच फुट चौडी गेलरी थी । गेलरी के अंतिम छोर पर दरवाजा ।

वह अंदर की तरफ से बंद था ।

अलफांसे को समझते देर न लगी कि वह इस छोटे से फ्लैट का मुख्यद्वार है । दाई तरफ कें बंद दरवाजे के पीछे से किसी के खर्राटों की आवाज आ रही थी ।

अलफासें ने अनुमान लगाया कि खर्राटे शोफर की नाक से निकल रहे हें ।

दबे पांव दरवाजे के नजदीक पहुंचा ।

किवाढ़ को धक्का देकर खोलने की कोशिश क्री मगर वह अंदर से बंद था ।

अब. . रिस्क लेने का वक्त आ गया था और आप तो जानते ही हैं…अलफासे नाम ही उसका है जिसे रिस्क लेने में मजा आता है।

अत: बंद दरवाजे पर हौले से दस्तक दी ।

पहली और इतनी हल्की दस्तक से कुछ न हुआ । वह तीसरी और जोर से दी गई दस्तक थी जिसके बाद अंदर से थोडी झल्लाईं हुईं आवाज आई…“कौन है?"

अलफांसे पहचान गया…आबाज़ शोफर की ही थी मगर मुंह से जवाब देने की जगह पुन: दस्तक दी ।

"बोलता क्यों नहीँ, कौन है?" ज्यादा झल्लाकर कहा गया ।

अलफांसे बोला अब भी कुछ नहीं, बस दस्तक दे दी ।

जाहिर अंदर वाले की झल्लाहट चर्म पर पहुंच गई । उसने भन्नाए हुए अंदाज में दरवाजा खोला और...खोलते ही कुछ और ज्यादा भन्ना उठा क्योकि एक रिवाल्वर की नाल अपनी कनपटी पर महसूस की थी ।

इस वक्त उसके चेहरे पर हवाइयां उड़नी चाहिए थीं मगर उसकी जगह होठों पर अजीब सी मुस्कान नजर आई ।

इस मुस्कान पर उसने अलफांसे की नजर नहीं पड़ने दी थी ।

जिस्म पर केंवल अंडरवियर और बनियान था ।

अलफांसे ने रिवाल्वर से टोहते हुए कहा-“अंदर चल ।"

वह बेक गेयर में डल गया ।

कमरे कै अंदर पहुंचते ही अलफांसे ने दरवाजा वापस बंद कर लिया और बोला-"ज्यादा हैरान होने की ज़रूरत नहीं है । मैँ उस शख्स का साथी हूजिसे आज दिन में तूयहा लाया था ।"

"प पर तुम यहां कैसे पहुच गए ? "

"तुम्हारी लिमोजीन की पिछली सीट के पीछे छुपकर ।"

शोफर चुप ।

"मेरे ख्याल से तूसमझ गया होगा कि यदि तूने मेरा कहा नहीं माना तो मैँ तुझे मार डालूँगा ।"

उसके चेहरे पर कत्थक करती मौत साफ नजर आ रही थी । ऐसा लगा जैसे बडी मुश्किल से पूछ सका हो-“क्या चाहते हो ?"

“मुझें मेरे साथी कै पास ले चल ।"

"य ये कैसे हो सकता हे ! ”

"रास्ता तुझे निकालना होगा ।"

“रास्ता तो मालुम है मगर...

"मगर ? "

"र रास्ते में अनेक गार्ड तैनात हैं । वे मुझे तो जाने दे सकते हैँ मगर तुम्हें नहीं । तुम्हारे साथ मैं भी पकड़ा जाऊंगा ।”

“कोइ तरीका निकाल ।"

"ऐसा कोई तरीका नहीं है ।”

“तो मरने कै लिए तैयार हो जा ।”

“ज.....जी ! "

"क्या तू अभी नहीं समझा कि या तो मेरे साथी के पास ले जाएगा या मेरे रिवॉल्वर की गोली से मारा जाएगा ! दोनों में से एक काम होना निश्चित हे ।"

उसे बुरी तरह डरा देने वाले लहजे में कहा था ओर...वह बेचारा डर भी गया ।

चेहरे पर मंडराते खाफ कें साए साफ नज़र आरहे थे । बुरी तरह हकलाती आवाज में कहता चला गया-"म मुझे नहीं मालूम आप कौन हें मगर मुझ पर रहम कीजिए । कोशिश कीजिए समझने कौ कि अगर मैें आपको वहां ले जा सकता तो ज़रूर ले जाता । जब मेरे हाथ में ही कुछ नहीं है तो...प्लीज, मुझे मत मारिए ।"

उसे डराने कै लिए अगली धमकी देता-देता अलफांसे खुद ही रुक गया । कारण गार्डं की वह वर्दी थी जो दीवार में गढी कील में लटकें हैंगर मेँ लटक रही थी ।

उस पर नजरें टिकाए अलफांसे ने पूछा-"वो किसकी है ?'"

“मेरे रूम पार्टनर की ।"

"इस वक्त कहां हे ?'

"डूयूटी पर ।"

"तो वर्दी यहां क्यों है ? "

"दो जोडी होती हैं न !"

“गुड ।” अलफांसे के दिमाग ने तेजी से काम किया…"मैं इसे पहनकर चलूंगा । शोफर वाली वर्दी कहां है?”

“अलमारी में ।"

"तूउसे पहन ले । "

शोफर का चेहरा ऐसा नज़र आने लगा जैसे किसी ने हल्दी पोत दी हो । बोला…"स समझने की कोशिश कीजिए । रास्ते में तैनात कोई न कोइ गार्ड पहचान लेगा कि आप असलम नहीं हो ।"

अलफांसे समझ गया वर्दी असलम माम के शख्स की हे परंतु बोला…“बिल्डिंग में इतने सारे गार्ड तैनात हें कि यह मुमकिन ही नहीं हे कि सभी एक दूसरे को जानते पहचानते हों ।”

"ये तो ठीक हे मगर. . .

"ज्यादा हुज्जत की तो गोली मार दूंगा ।" अलफांसे उसकी बात पूरी होने से पहले ही गुर्राया…"'अगर मगर की कोई गुंजाइश नहीं है । अपनी वर्दी पहन । मैं गार्ड की वर्दी पहनता हूं ।'"
 
शोफर की हालत मरता क्या न करता वाली नज़र आ रही थी । वेचारा हुक्म का पालन करने कै अलावा क्या कर सकता था । कुछ देर बाद वे गार्ड और शोफर की वर्दी में ऐसी गेलरियों से गुजर रहे थे जिनमें दोनों तरफ हथियारबंद गार्डस तैनात थे । केवल एक गार्ड ने सवाल किया, वह भी उसने जो शोफर को पहले से जानता था…""रहमान, रात के इस वक्त कैसे ?'

वह थोड़ा हड़बड़ाने के बाद वोला…"ऐसा ही हुक्म हुआ हे ।"

गार्ड ने दूसरा सवाल न किया । वेसे भी वे उससे आगे निकल गए थे।

अलफांसे को किसी ने नहीं टोका । उसने कैप का छज्जा आंखों तक गिरा रखा था ।

शोफर का नाम भी उसी वक्त पता लगा था उसे । फिर, उन्होंने लिफ्ट में सफर किया ।

रहमान उसे उससे एक मंजिल नीचे ले गया जिस पर विजय को ले गया था । वेस्मेंट में पैलरियों का जाल सा बिछा हुआ था । कई मोढ़ पार करने के बाद वे ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां कोइ रास्ता न था, स्टील क्री सपाट दीवार नजर आ रही थी ।

रहमान ने ऐसी नज़रों से अलफांसे की और देखा था जेसे अब भी बस चले तो उसके आदेश का पालन न करे जबकि अनुभवी अलफांसे समझ गया था कि स्टील की इस दीवार में कोइ गुप्त रास्ता होना चाहिए । सो बोला…"दीवार में मौजूद रास्ता केसे खुलता है? "'

रहमान दीवार पर लगे ऐसे इलेक्ट्रिक बोर्ड की तरफ बढा जिस पर अनेक स्विच लगे थे ।

सबसे बीच वाले स्वीच को दबाते वक्त न केवल उसका हाथ कांप रहा था बल्कि चेहरे पर मजबूरी की दास्तां लिखी थी ।

स्वीच के दबते ही छ: बाईं तीन का दरवाजा बन गया और उसके पार से बिजय की आवाज उभरी-"आओ लूमड़ मियां, तुम्हारे इंतजार में हम सूखकर कांटा हुए जा रहे थे ।'"

रहस्यमय मुस्कान कै साथ अलफांसे ने कहा…"तुम बीज ही ऐसे बोकर आए थे कि मुझे यहां आना ही था लेकिन...

"लेकिन ? "

"यह कल्पना नहीँ थी कि यहां पहुंचना इतना आसान होगा ।”

"ये वही जगह है न जिसके बारे में तुम्हारा दावा था कि परिंदा भी घुसने की कोशिश करेगा तो पंख जलवा बैठेगा?"

"वहीँ तो !"

"काम भले ही चाहे जितना मुश्किल हो लूमड़ प्यारे लेकिन उसे कायदे से किया जाए तो वेहद आसान साबित होता है । जैसे तुम्हारा यहां आना । हमने तुम्हें पहले ही बता दिया था कि चलते पुर्जे हमें लेने वाहन भेजेंगे । उसमें छुपकर हम तक पहुच सकते हो । '"

"वहीँ किया है ।”

"बो तो इसकी सूरत देखकर ही पता लग रहा है ।'" कहने के साथ विजय ने रहमान की तरफ इशारा किया था ।

उस रहमान की तरफ जिसे कहने तक के लिए कुछ नहीं सूझ रहा था ।

बिजय ने ही कहा-"हाजी गल्ला का काफी विश्वास हासिल हे इसे तभी तो यहां कै हर रास्ते से वाकिफ है। हाजी गल्ला के प्राइवेट बेडरूम से हमेँ इतनी आसानी के साथ नीचे टपकाया जेसे पेड़ पर चढा बंदा किसी फल को ज़पीन पर टपका देता है ।"

रहमान चुप रहा ।

बोलता भी क्या ।

अलफासे ने विजय से कहा-"अब मैँ तुम्हें यहा' से एक ही शर्त पर वापस ले जाऊंगा ।"

"जानते हैं प्यारे ।" विजय ने बुजुर्ग की तरह गर्दन हिलाई ।

"क्या जानते हो ?”

"इंडिया पहुंचकर हमसे एक लाख रुपए लोगे ।"

"तुम अच्छी तरह जानते हो जासूस प्यारे कि अलफांसे कं लिए एक लाख रुपए की कोई वेल्यू नहीं है । वेल्यू इस बात की है कि में जीवन में पहली बार तुमसे कीमत लेकर कोई काम कर रहा हू । वेसे तो मेरा पेशा ही है ये । मै लोगों से कीमत लेकर उनकै लिए काम करता हू । मगर तुम...तुम्हारा कैस ज़रा अलग है । तुम्हारा दावा था कि तुमसे कीमत लेकर कोइ तुम्हारे लिए काम नहीं कर सकता। यह काम मैं तुम्हारे उसी दावे की हवा निकालने के लिए कर रहा हूं । यह भी जानता हूकि काम निकलने के बाद तुम कीमत न अदा करने की पूरी कोशिश करोगे मगर मैंने भी अच्छी तरह सोच लिया हे जासूस प्यारे कि अपने एक लाख तुमसे किस तरह वसूल करने हैँ । मेरा दावा हे कि इस बार मैं तुम्हारी एक नहीं चलने दूंगा । इंडिया पहुचने पर एक लाख देने के बाद तुम्हें मेरी आरती भी उतारनी पडेगी ।"

"तुम बेवजह शक कर रहे हो लूमढ़ मियां, हम तुम्हें एक लाख देने में कोई हुज्जत दिखाने वाले नहीँ हैं । वो काम तो करो जिसकै एवज में वह फीस मिलने वाली है।"

"चलो , मै तुम्हें लेने आया हूं ।'"

"अजी वाह ! खाला जी का घर है जो ऐसे ही चल पडें । " बिजय ने झगड़ालू भटियारिन की तरह हाय नचाए थे…"मिशन तो तभी पूरा होगा जब अपने साथ मंत्री महोदय को भी ले चलेंगे !"

"कहां हे नोशाद अंसारी? ”

"इसे पता है । " कहने के साथ बिजय ने एक बार फिर रहमान की तरफ इशारा किया था ।

"म मैं !" रहमान बौखला गया ।

"हां मियां.. तुम !" बिजय बोला…"यह कहकर चकमा देने की कोशिश न करना कि तुम्हें नहीं मालूम क्योंकि हम जान चुके है कि इस इमारत का एक भी गुप्त रास्ता ऐसा नहीं हे जिसकी जानकारी तुम्हें न हो । तुमने हमेँ वहीँ टपकाया था जहां पहले से म … ।"

रहमान ने एक दीवार की तरफ इशारा करने के साथ कहा-"वे इस दीवार कै उस तरफ हैँ । "

"हां । " बिजय कै कहने के अंदाज से जाहिर था कि इस बात को पहले से जानता था पर रहमान कै मुंह से कहलवाना चाहता था, वह कहता चला गया…"भले ही फर्क सिर्फ एक दीवार का हो प्यारे लेकिन यदि उस दीवार को हटाने की तरकीब न आती हो ती फर्क मीलों में बदल जाता है । कहने का मतलब ये कि जल्दी से दीवार मेँ दरवाजा पेदा करने की तरकीब बताओ ।"

सकपकाया सा रहमान चुप रह गया ।

"मेरे ख्याल से उनमें से किसी स्वीच को दबाने पर हमारा काम हो जाना चाहिए ।” अलफांसे ने ऐसे स्वीच बोर्ड की तरफ इशारा किया जिस पर अनेक स्वीच लगे थे।

"तुम ऐसा कैसे कह सकते हो लूमढ़ प्यारे ?"

"यहां कें गुप्त दरवाजे खोलने के लिए मैंने कुछ ऐसा ही पेट्रन महसूस किया है ।” कहने कै साथ वह बोर्ड की तरफ बढा ।

उसके करीब पहुंचा ही था कि अचानक रहमान इस तरह चीख पड़ा जेसे कयामत आने वाली हो…"नहीँ...उन्हें हाथ मत लगाना । "

"क्यों ?" अलफांसे ने पूछा ।

"सही स्वीच न दबाया तो मुसीबत खडी हो सकती है ।”

"कैसी मुसीबत ? ”

"कुछ भी हो सकता है । अलग अलग स्वीच्स को दबाने से अलग अलग क्रियाएं होंगी । किसी क्रो दबाने से इमारत में खतरे का एलार्म बज सकता हे । किसी को दबाने से आपके पेरों के नीच मोजूद फर्श गायब ही सकता हे । आप एक और मंजिल नीचे जा गिरेंगे । किसी को दबाने से इस कमरे की छत से स्टील की कोई प्लेट आपके सिर पर आकर गिर सकती हे । किसी को दबाने से . . .

"बस बस प्यारे ।" विजय बोला-"सारे स्यीच्स की करामात सुनने लगे तो तमाम उम्र यहीं गुजर जाएगी । बस इतना बताओ कि हमारे काम का स्वीच कौनसा है ?'

"ऊपर से तीसरी लाइन में बाएं से चौथा ।"

"बात कुछ समझ में नहीं आईं ।" अलफांसे को आंखों में रहमान के लिए शंका नज़र आईं…"अगर इसके अलावा किसी अन्य स्वीच को दबाने पर कोइ मुसीबत आने वाली थी तो तुमने हमें रोका क्यों ? दबाने देते । इस तरह हम भी यहीँ र्फस जाते या..

"म मैँ भी तो फंस जाता सर, मैें जानता हू-आपक्रो यहा' तक लाने की सजा मौत से कम नहीं हो सकती ।"

"ओह ।" जैसे एक ही झटके में अलफांसे की समझ में सारी बात आ गई । उसने ऊपर से तीसरी लाइन का बाएं से चौथा स्वीच दबाया । सरसराहट के साथ दीवार में दरवाजा बन गया । उसे पार करके दूसरी तरफ पहुंचने वाला सबसे पहला शख्स बिजय था ।

नौशाद अंसारी सो रहा था ।

विजय ने जगाया । वह हड़बड़ाकर उठा । अलफांसे और रहमान को देखकर कुछ ज्यादा ही हड़बड़ा गया ।

मुंह से निकला…"अआप यहां...ओर ये कौन हैँ?”

"दिमाग पर ज्यादा जोर मत डालो मंत्री महोदय, एकाध पुर्जा हिल गया तो मुसीबत खडी हो जाएगी । फिलहाल बोरिया बिस्तर समेटकर हमारे साथ चलने की तैयारी करो ।"

“क कहा?”

"कैदखाने से बाहर । ”

खुशी से भरी किल्ली सी निकल गई उसके हलक से-…"'आप सच कह रहे हैं !'"

"हमने परमानेंट गीता की कसम खाइ हुई है मंत्री मियां इसलिए सच के अलावा कुछ नहीँ बोलते ।”

“च चलो । किधर चलना है ?' वो खुशी से पागल सा हो गया ।

“पर आप लोग ऐसे कैसे जा सकते हैँ?" ऐसा लगा जेसे बहुत देर से असमंजस मेँ फंसे रहमान ने अंतत: बोलने का फेसला किया हो…"गेलरी मे चप्पे चप्पे पर गार्डस तैनात हैं । '"

उसने अलफांसे की तरफ देखते हुए कहा…“आपकी ओर मेरी बात अलग है आपकं जिस्म पर गार्ड की वर्दी होने कै कारण क्रोइ कुछ नहीं समझा लेकिन अगर ये लोग हमारे साथ होंगे तो...कैसे जाएगे ?"

"ये हैडेक तेरी है । "

"म मेरी ?” वह हकबकाया ।

"क्या समझा था तुमने ! " विजय बोला…"हमारे लूमड़ मियां इस बेस्मेंट को कंपनी गार्डन समझकर टहलने आए हैं ! ये हमें लेने आए हैं प्यारे लाल और तुम्हें इस काम में मदद करनी होगी ।”

"पर इतने सारे गार्डस की नजरों से छुपाकर मैं आप लोगों क्रो बिल्डिंग से बाहर कैसे निकाल सकता हूं?"

"कहा न, ये हेडेक तेरी हे । वेसे भी, तूने खुद ही बताया-हमें यहा तक पहुंचाने के जुर्म में तुझे फांसी से कम सजा नहीं होंगी।" अलफांसे कहता चला गया-"और अब...अगर खुद को फांसी से बचाना हे तो हमारे साथ भी हमेशा के लिए इस बिल्डिंग से ही नहीं बल्कि बिल्डिंग के मालिक गल्ला की नजरों से दूर होना होगा । हाथ आने का मतलब है.......

अलफांसे ने जानबूझकर सेटैंस अधूरा छोड दिया पर रहमान कै चेहरे पर जो भाव उभरे थे, वे बता रहे थे कि वह उसके अधूरे सेटैंस का पूरा मतलब समझ गया है।

मुह से शब्द निकले-"ब बात तो आपकी ठीक हैं ।”

"ठीक है तो सोचो प्यारे ।" विजय तुरंत बोला…"सोचो कि कैसे अपनी जान बचा सकते हो?”

रहमान खामोश रह गया । जेसे कुछ सोच रहा हो बल्कि किसी बडी समस्या पर मंथन कर रहा हो । ज्यादा देर हो गई तो अलफासे गुराया-"क्या सोच रहा है?”

"यदि मैं आपको बाहर निकाल दूंतो उस रास्ते के बारे में किसी को बताओगे तो नहीं ?"

"अमां मियां हमारा क्या दिमाग खराब हुआ है जो इतनी गुप्त वात किसी को बताते फिरेंगे !'" यह महसूस करते ही विजय उछलकर सबसे आगे आ गया था कि इमारत से निकलने का कोइ गुप्त रास्ता भी हे…“तुम्हारी कसम, उस रास्ते को हमेशा के लिए अपने पेट में दफन कर लेंगे । उसकी कब्र पर किसी को फूल तक न चढाने देंगे ।"

रहमान बगैर कुछ कहे स्वीच बोड की तरफ बढ गया । अंदाज ऐसा था जेसे इसके अलावा कोई चारा न हो जबकि असल में उसकै होठों पर रहस्यमय मुस्कान थी ।

ऐसी मुस्कान जिसका अर्थ समझना मुश्किल था ।

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆
 
पाकिस्तान कै सबसे पापुलर टीबी चेनल का नाम था…टी टेन । उसके डायरेक्टर थे-जनाब उस्मान बेग ।

उम्र, करीब पचास साल ।

गोरे चिटटे । फ्रेंचकट दाढी वाले ।

पर्संनाल्टी काफी आकर्षक थी । आई साइड का चश्मा तो चेहरे पर ऐसा फबता था जेसे मां के पेट से लेकर पैदा हुए हौं ।

उस वक्त वे अपने शानदार आफिस में बेठे किसी जरूरी फाईल में मगज मार रहे थे जब चपरासी एक विजिटिंग कार्ड लेकर आया ।

कार्ड पर लिखा था…दिलशान आलम ।

"ओह हां !" उस्मान को तुरंत याद आ गया…“सूबह इन जनाब का फोन आया था । भेजो ।"'

"उनके साथ दो लोग और हैं हुजूर ।" चपरासी ने कहा ।

"तो क्या हुआ । भेजो न ?”

चपरासी वापस चला गया ।

कुछ देर बाद तीन लोग आफिस में दाखिल हुए । उनमें से दो के चेहरों पर खिचडी बालों की लंबी दाढियां थीं, तीसरे को पाठक पहचानते हैं । वे नौशाद अंसारी थे । दाढी वाले दो में एक ने मेज के करीब पहुंचकर हाथ बढाते हुए कहा…"दिलशान।"'

"तशरीफ रखिए ।"'

तीनों मेज़ के इस तरफ पडी कुर्सियों पर बैठ गए ।

उस्मान ने दिलशान से बाकी दोनों के वारे में पूछा…"ये लोग ?'

"इन्हें छोडिए ।" दिलशान बोला…"हम काम की बात करें तो बेहतर होगा क्योकि मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है ।”

उस्मान को उसका जवाब और कहने का अंदाज थोडा अजीब लगा मगर नजरअंदाज करते बोले…"जी कहिए ।"

"मैंने फोन पर फरमाया था कि आपके चेनल को एक बहुत ही एक्सक्लुसिव न्यूज दे सकता हू ।”

"इसीलिए तो मिलने का टाइम दिया था ।"'

"मुझे मालूम है, वेसा न कहता तो आप टाइम न देते ।"'

उस्मान बेग की भृकुंटियां तनी…"मतलब।।"

"चौंकिए मत । मेरे कहने का मतलब ये नहीं है कि मैंने आपसे झूठ बोला था । " दिलशान कहता चला गया-"वाकई मैँ ऐसी एक्सक्लूसिव न्यूज देने वाला हूं जिससे आपके चेनल की टीआरपी दुगनी चौगुनी यहां तक की आठ गुनी भी हो सकती हे । ऐसा भी हो सकता है कि एक टाइम ऐसा आए जब लोग सारे पाकिस्तानी चेनल्स को छोडकर आपके सिर्फ आप ही के चेनल को देख रहे हों । इसके वावजूद मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए । लेकिन...

"लेकिन।।" उस्मान का तरद्दुद दूर न हो पाया था ।

"न्यूज देने का हमारा तरीका जरा अलग होगा ।"

"मतलब ? "

"हम आपको एक फिल्म देंगे । ऐसी, जो अभी, यहीँ आपके आफिस में, आप ही के सामने फित्माई जाएगी, बल्कि उसमें एक किरदार के रूप में आप भी नजर आएंगे । आपको बस इतना करना होगा कि उस फिल्म को अपने चेनल पर बार बार दिखाएंगे । वेसे, जैसा कि मेंने पहले ही फरमाया आप वैसा करेंगे तो यकीन मानिए चेनल की टीआरपी मेँ हैरतअंगेज इजाफा होगा ।"

"मैं अपने चेनल पर वो दिखाता हू...जो मैँ चाहता हूं ।" उस्मान ने नागवारी वाले अंदाज़ में कहा था…"आपके चाहने से.....

"ये फिल्म आप हमारे चाहने से दिखाएंगे।"

"मैं समझा नहीं ।"'

"समझाता हू ।"' दिलशान ने जेब से रिवाल्वर निकालकर उस पर तानते हुए पूछा-"इसे पहचानते हैँ ?'

हकके बक्के रह गए उस्मान बेग ।

काटो तो खून नहीं ।

चीखने की कोशिश जरूर की लेकिन महसूस किया कि मुंह मेँ जुबान नाम की चीज ही नहीं हे । जो कुछ हुआ या हो रहा था उसे मूर्ति वने देखते रह गए । आंखें स्थिर, पलकें तक न झपक रही थीं । ऐसा शायद इसलिए हुआ था क्योंकि रिवाल्वर जैसी चीज को जीवन में पहली वार अपनी तरफ तने पाया था ।

दिलशान के रिवाल्वर निकालते ही दाढी वाला दूसरा शख्स यूंउठा जैसे पहले से जानता हो कि कब क्या करना है । बडी फुर्ती से दरवाजे के नजदीक पहुचा और अंदर से चटकनी चढा दी ।

दिलशान क्रो लगा-इस दुश्य को देखकर उस्मान बेग चीख सकते हैं इसलिए खुरदुरे लहजे में चेतावनी दी-“आवाज नहीं ।"

काश, दिलशान को पता होता कि उस्मान बेग बेचारे कोशिश तो बहुत कर रहे थे परंतु आवाज धी कि हलक से बाहर ही न आ पा रही थी ।
 
दिलशान ने आगे कहा-"इस सबके वावजूद मैें यकीन दिलाता हू कि हम आपको किसी किस्म का नुकसान पहुचाने नहीं आए हें बल्कि वाकइ एक्सक्लूसिव न्यूज देने वाले हे । बस इतना वादा करना है आपको कि-आप हमारी फिल्म दिखाएंगे। "

उस्मान बेग जैसे पत्थर के बन चुके हों ।

"हमें मालूम हे…आप वादा करें, न करें लेकिन हमारी फिल्म दिखाएंगे क्योकि इतना तो आप समझ ही गए होंगे कि ऐसा न किया तो ये रिवाल्वर आपके घर पहुंचकर खांसने लगेगा ।"

उस्मान बेग कै होश फाख्ता ।

दरवाजे की चटकनी अंदर से चढाने के बाद दाढी वाला दूसरा शख्स वापस कुर्सी पर नहीं बैठा बल्कि उसने जेब से छोटा सा मगर पावरफुल वीडियो कमरा निकाला ।

आफिस में ऐसे स्थान पर जाकर खड़ा हुआ जहां से मेज के इर्दगिर्द बेठे तीनों लोगों क्रो कैमरे से कवर कर सके ।

उधर उसने कैमरा स्टार्ट किया इधर दिलशान ने उस्मान बेग से कहा-"जावेद कश्मीरी का नाम सुना आपने ? '"

उस्मान बेग कें मुंह में जुबान हो तो बोलें भी ।

दिलशान गुराया-"जवाब दीजिए ।"

"स सुना हे ।" मुह से खौफ खाए अलफाज़ फूटे ।

"ये उसके चाचा हैं ।" दिलशान ने बगल में बैठे नौशाद अंसारी की तरफ इशारा किया…“ नाम , नौशाद अंसारी । हिंदुस्तान के ला् मिनिस्टर हैं । पिछले दिनों ये वहीं से किडनेप हो गए थे ।"

उस्मान बेग की पुतलियों में पहली बार हलचल हुई ।

"अब लग रहा हे कि आपने मंत्री महोदय को पहचान लिया है । " दिलशान कहता चला गया--“पहचानेंगे क्यों नहीं ? बहरहाल, इस मुल्क के सबसे पापूलर न्यूज चेनल कै डायरेक्टर हें । इनके किडनैप की खबर आपने भी जरूर चलाइ होगी । इसके बावजूद, आप इन्हें न भी पहचाने तो हम पर क्रोइ खास फर्क नहीं पड़ेगा क्योकि जिसे हम पहचानवाना चाहते हैं वो ज़रूर पहचान लेगा । भला अपने चाचा को क्यों नहीँ पहचानेगा जावेद कश्मीरी और अब... ।"'

कहने के बाद दाढी वाले ने सीधे उस ऑन कैमरे की तरफ देखा जो दूसरे दाढी वाले के हाथ में था ओर बोला…“जावेद कश्मीरी, अगर तुम मुझे देख रहे हो त्तो कान खोलकर सुनो,,,,,,,मेरा नाम विजय दीं ग्रेट हे । तुम भले ही नकली हो लेकिन मैं असली इंडियन सीेक्रेट एजेंट हूं ।" कहने के साथ उसने चहरे से दाढी ही नहीँ सिर से बिग भी उतार ली थी ।

वाकइ बिजय था वह ।

वह, जो कहता चला गया…"इंडिया से तुम्हें ही गिरफ्तार करने आया हूं । देख ही रहे हो, तुम्हारे चाचूजान मेरे कब्जे में हैं । अपने बयान के आखिर में मैं एक मोबाइल नंबर बताऊंगा । अगर तुमने बीस घटै के अंदर उस नंबर पर फोन नहीं किया तो ये तय समझना कि मैं नौशाद अंसारी की लाश करांची कें किसी चौराहे पर डाल दूगा और इस मोत के जिम्मेदार तुम होगे।”

बस ।

उसके बाद बिजय ने मोबाइल नंबर बताना शुरू कर दिया था । एक बार नहीं, कई बार नंबर बताया उसने ।

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆
 
टी टेन पर दिखाईं जा रही फिल्म क्रो देखकर और विजय द्धारा बताए जा रहे नंबर को सुनकर जावेद का चेहरा भभकने लगा ।

जबड़े कस गए ।

मसल्स फूलने ओर पिचकने लगे थे ।

वह मेज पर पड़ा मोबाइल उठाकर नंबर डायल करने बाला था कि गिरधर ने छीनते हुए कहा… "क्या कर रहा हे जावेद ।”

“फोन कर रहा हू हरामजादे को ।" मुंह से आग निकली ।

"इससे बडी बेवकूफी और क्या होंगी?"

"आपने सुना नहीं चाचा ! सुना नहीं आपने कि उसने क्या कहा ! कहता है नौशाद चाचूक्रो मार डालेगा ! मैं उसे यह बताने के लिए फोन कर रहा हू कि अगर उसने ऐसी हिमाकत की तो जिस्म के इतने टुकड़े करूंगा कि उसकी मां भी गिन नहीं पाएगी।"

"उससे पहले पुलिस आ धमकेगी यहां ?"

" मतलब ? "

“जावेद, बस यहीँ एक कमी है तुझमें । जब गुस्सा आता हे तो तेरा दिमाग काम करना बंद कर देता हे ।" गिरधर पांडे कहता चला गया-“मैं नहीं समझता कि तू इतनी सी बात न समझता होगा कि पुलिस ने उसका नंबर सर्विलांस पर लगा रखा होगा । जैसे ही तूउस पर संपर्क करेगा, उन्हें तेरा नंबर और यहा की लोकेशन पता लग जाएगी ओर वे इस जगह क्रो घेर लेंगे ।”

"म मगर...आप भी तो समझने की क्रोशिश कीजिए चाचा, उन हरामजादों ने मेरे मां बाप को मार डाला, बहन को नहीं छोडा और अब...नौशाद चाचू! उनके अलावा मेरे खानदान मे बचा ही कौन है।नहीं चाचा, मै उन्हें नहीं मरने दे सकता । चाहे जो हो जाए…मैं नौशाद चाचूक्रो खरोंच तक नहीं आने दूंगा । उन्हें कुछ हो गया तो...

"कुछ नहीं होंगा उन्हें. ..कुछ नहीं होगा । '" उसकी बात काटकर गिरधर पांडे उससे ज्यादा ऊंचे लहजे में बोला था…"मैं भी नौशाद भाई को खरोंच तक नहीं आने दूंगा मगर यह काम दिमाग को खुटी पर टांगकर नहीं होगा ।'"

"बिल्कुल ठीक ।'" जावेद से पहले आरती बोल पडी…"बिल्कूल ठीक पापा, इसने अपना दिमाग खुटी पर ही टांग रखा है ।”

"तूबीच में मत बोल ।'" जावद अचकचाया ।

आरती गुराइ…"'चाहे तूजितनी बेवकूफी की बात करे !”

"इसमें ववकूफी की क्या बात हे । वे नौशाद चाचूकौ...

गिरधर ने फिर उसकी बात काटी-"वेवकूफी की बात ये है कि तूजजवातों से काम ले रहा है जबकि जंग ज़ज़बातों से नहीं दिमाग से लडी जाती हे । योद्धा चाहे जितना वडा हो, उस क्षण मारा जाता है जिस क्षण वह भावुक होता है ।'"

इस बार कुछ बोलता बोलता रुक गया जावेद ।

जेसे बात दिमाग को जाकर लगी हो। गिरधर की तरफ देखता रह गया । वह जबकि गिरधर ने आगे कहा… "समझने की कोशिश कर मेरे बेटे, ये चाल तुझे भावुक करने के लिए ही चली गइ हे और अगर तू भावुक हो गया तो उन्हीं के जाल मे फसेगा । '"

जावेद के भभकते चेहरे पर आता परिवर्तन साफ नजर आरहा या ।

इस बार थोड़े शांत लहजे मेँ बोला…"पर चाचा, नौशाद चाचू उनके हाथ कहा से लग गए ! वे तो इंडिया में थे ।"'

"वहीँ तो सोचने के लिए कह रहा हू मै तुझसे ।” गिरधर कहता चला गया…"ज़ब तेरी गिरफ्तारी या खात्मे कै लिए चलाया गया उनका हर तीर नाकाम हो गया तो ये पेतरा लाए हें । तुझे भावुक करने का पैंतरा ओर स्रोच...ये चाल चलने के लिए उन्होंने कितना सोचा होगा ! कहा तक दिमाग दोड़ाया हे उन्होंने ! इंडिया में रह रहे नौशाद अंसारी को ढाल बनाकर लाए हें ।”

"पर मैं ये कह रहा था कि..

"वहीँ आ रहा हूं । या तो तूने ध्यान नहीं दिया या जजबातों में बह जाने के कारण भूल रहा हे…धमकी देने वाले ने साफ़ बताया है कि वह इंडियन सीक्रेट एजेंट हे । नाम भी बता रहा था कुछ...

“बिजय ।" आरती बोली ।

"हा । विजय । पिछले दिनों मेंने कहीं न्यूज पढी थी कि पाक सरकार ने तुझसे निपटने के लिए हिंदुस्तान से मदद मांगी हैं । यह सब मुझे उसी की कडी लग रहा हे ।"'

"क्या कहा आपने ! पाकिस्तान ने मुझसे निपटने के लिए भारत से मदद मांगी ! हद्द हो गई । मैंने जानी दुश्मनों को एक कर दिया ! "

"एक नहीं किया गधे, पाक की कूटनीतिक चाल क्रो समझने की कोशिश कर । तूजो खुद को इंडियन सीक्रेट सर्विस का जासूस बताता फिरता है, उन्होंने इसका फायदा उठाकर दुनिया में भारत को बदनाम करने की मुहिम छेढ़ दी । यह प्रचार शुरू कर दिया कि जावेद पाकिस्तान में जो कुछ कर रहा है, इंडिया के आदेश पर कर रहा हे । अगर ये झूठ हे तो जावेद को इंडिया ही रोके । शायद इसी वजह से तुझे रोकने कै लिए इंडिया से ये जासूस आया हे ।'"

"और साथ मेँ नौशाद चाचूको लाया हे !"

"शायद यह सोचकर कि तुझे ऐसे रोका जा सकता है ।"

"हा...हा...हा ।"' जावेद ठहाक लगा लगाकर हसता चला गया था ।

ऐसी हंसी थी वह जेसे कोई पुरानी मुराद पूरी हुईं हो ।

फिर बोला…"वही हुआ हे गिरधर चाचा, ठीक वही हुआ है जेसा मैं चाहता था । भारत को बदनाम करने के लिए ही तो खुद को सीक्रेट एजेंट बता रहा था मैं । कुछ भी कहा, अब मै ऐसे दो देशों का टार्गेट हू जो आपस में जानी दुश्मन हँ ।'"

"इसमें शक नहीं ।'"

"रहा इस इंडियन जासूस का सवाल जिसने अपना नाम बिजय बताया है, मुझे तो ये भी मर्द का बच्चा नहीँ लगता । होता. ..तो नौशाद चाचू को ढाल बनाकर मेदान में न उतरता ।'"

"सवाल ये नहीं हे जावेद. ..सवाल ये हे कि अब हमें पहले से कई गुना ज्यादा सावधान रहकर काम करना होगा क्योंकि पहले एक था, अब दो मुल्क हमारे खिलाफ उतर आए हैँ ।"'

"फिलहाल तो सबसे पहले मुझे उस हरामजाद से बात करनी हे ।" जावेद ने एक बार फिर टीबी स्कीन पर नज़र आ रहे विजय को देखते हुए भभकते लहजे में कहा था…“इसे चेतावनी देनी हे कि नौशाद चाचू को हाथ न लगा दे ।'"

"तू फिर उसी रौ में वह रहा है ! ""

"नहीं चाचा, उस रौ में बह रहा होता तो अब तक मोबाइल से उसका नंबर मिला दिया होता । मैं जा रहा हू । कहीं बाहर से उसर्के नंबर पर बात करूंगा क्योकिं बात करनी जरूरी है ।"'

"मैं भी चल रही हूं ।" आरती उसकै पीछे लपकीं ।

जावेद गुर्राया"तू कहां ? "

"तेरे साथ ।"

"मैँ बच्चा हू क्या ? "

"बेशक । इतना सा ।"' आरती ने हाथ से इशारा किया तो जावेद की हंसी छुट गई ।

गिरधर क्रो राहत मिली थी । उसने कहा…“ध्यान रखना बेटे, तेरे खिलाफ पाकिस्तान हिंदुस्तान एक हो चुके हें । जो चेहरा टीवी पर नजर आया हे, उसके पीछे और चेहरे भी हो सकते हैँ । पाकिस्तानी जासूसों या पुलिस के चेहरे ।”

“बिजय हीयर ।"

"हम बोल रहे हैँ डीयर ।"'

"ओह । नुसरत भैया । बोलो ।"'

"ये बात तो ठीक नहीं हे । "

"कौनसी बात की बात कर रहे हो मियां?"

"पूरी एक रात के लिए भी हमारी मेहमाननवाजी कबूल न की, उससे पहले ही निकल भागे और साथ में हमारे पुराने मेहमान को भी ले उड़े । ऐसा लगता है जेसे निकल भागने की तयारियां पूरी करने कै बाद ही मेहमाननवाजी कबूल की ।”

"अब समझें तो क्या समझें नुसरत मियां, अब तो चिडिया खेत चुगने के बाद उढ़ भी चुकी है ।"

"यानी साबित कर दिया, आप गुरुओं के गुरु. . .गुरुघंटाल हैँ !"

"कुबूल करने के लिए शुक्रिया ।”

दूसरी तरफ से तुगलक की आवाज आईं…“तू असल मुद्दे पर बात नहीं कर रहा करेले के छिलके, मुबलिया मुझे दे ।"

बिजय बोला…“मोबाइल अपनी बहना को दे दो नुसरत भैया ।"'

“कोइ भी चीज आजकल किसी को देता कौन है गुरुदेव, छीननी पढ़ती है । वही मैंने किया है ।" तुगलक की आवाज-"और इसलिए किया है क्योंकि ये ढेकचीं का मुुद्दे पर बात करने की जगह आंय बांय शांय गा रहा था ।"'

"तुम कर लो मुद्दे पर बात ।"'

"मेरे पेट में यह जानने के लिए ऐँठन हो रही है हुजुरेआला कि यह अजीमुश्शान काम आपने किया तो किया कैसे? हमने तो पहले नौशाद अंसारी साहब को और बाद में तुम्हें वहां ले जाकर रखा ही इसलिए था क्योंकि हाजी गल्ला का दावा ये था कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता ।"

विजय बोला-"उसी से पूछो केसे हो गया ?"

"'पूछा...ओर धोया भी मगर वह बेचारा तो पहले ही धोबीघाट हुआ पड़ा था । कहता हे…खुद मेरी समझ में नहीं आरहा यह सब कैसे हो गया । रहमान नाम के उस शोफर का हाथ बता रहा है जो आपको गजाला कै फ्लेट से लाया था । कहता है गेलरियों में तैनात गार्डंस ने उसे एक अन्य गार्ड के साथ उधर जाते देखा था जिधर हुजूरेआला की रिहाइश बनाइ गइ थी । उसके बाद उसे ओर उसके साथी गार्ड को किसी ने लौटते नहीं देखा । तभी से रहमान गधे के सींग बना हुआ है । इससे मियां हाजी गल्ला को लगता है कि हुजूर की फरारी में उसी का हाथ हे ।"'

"अगर शोफर किसी गार्ड के साथ उधर गया था तो लोटा क्यों नहीं? कहां गायब हो गया ? "' बिजय ने व्यंग किया था…“क्या वह काला जादू जानता था ? "
 
" फुद्दू मत बनाओ बड़े मियां, हाजी गल्ला हमें उस गुप्त रास्ते कै बारे में बता चुका है जिस पर एक भी गार्ड तैनात नहीँ रहता जिसके बारे में चंद चुनिंदा लोगों को जानकारी है । रहमान उन्हीं चंद चुनिंदा लोगों में से था । उसने उसी रास्ते का इस्तेमाल किया होगा ।"'

"इतना सब जान चुकें हो तो पूछ क्या रहे हो ?"

“असल में हमारे पेट में यह जानने के लिए दर्द हो रहा है कि रहमान के साथ वो गार्डं कौन था?” बिजय ने कार ड्राइव कर रहे अलफासे की तरफ़ देखकर आंख मारी और बोला…“काला चोर ।"

"मतलब गुरुदेव बताने के मूड में नहीं हैं.....?"

"पर हम तुम्हें यह जरूर बताएंगे तुगलक बहन कि तुम जो इस वक्त सर्विलांस कै जरिए हमारी लोकेशन जानने की कोशिश कर रहे हो, उससे कोइ लाभ नहीं होागा क्योकि जब तक तुम्हें हमारे ठिकाने का पता लगेगा, तब तक हम ठिकाना बदल चुके हो । "

"लाहोलविलाकूवत गुरुदेव, आपको हो क्या गया है ? जब से हमारे मदरे वतन में पधारे हैं तब से तोहमत पर तोहमत लगाए जा रहे हें ! भला हम ठिकाने का पता लगाने की कोशिश क्यों करेगे । हमने टीवी पर देखा…काम तो हमारा ही कर रहे हैं आप । वही, जिसके लिए बा इज्जत पाकिस्तान बुलाए गए हैं ।"

"इसके बावजूद तुमने हमें कैद करने की कोशिश की ।"

"ये तोहमत नंबर चार है हुजूर, हमने आपका कैद करने की कोशिश नहीं की बल्कि कुछ वक्त के लिए अपनी मेहमाननवाजी में रखने की कोशिश की थी ताकि तरोताजा होकर जावेद से निपट सकें लेकिन आपको सब कुबूल न हुआ, आपकी मर्जी ।"

"अपनी मेहमाननवाजी में रखते तो जरूर कबूल करते मगर, जैसा कि खुद ही कह चूकै हो, तुमने हमें हाजी गल्ला की मेहमान नवाजी मेँ रखना चाहा, बो हमे कुबूल न था । इसलिए चले आए ।'"

“इतनी सी शिकायत थी तो हमसे कहा होता, हम आपको अपनी मेहमान नवाजी से नवाज देते । वल्कि हम तो कहते हैं, अब आ जाइए और हमारी मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाइए ।"

"आएंगे प्यारे.. .ज़ल्दी ही तुम्हारी बज्म में आएंगे । तुम्हें अपनी मेहमाननवाजी का पूरा मौका देंगे हम और साथ ही तुम्हें ऐसा जलवा दिखाएंगे जेसा पहले कभी नहीं देखा होगा ।"' विजय ने चेतावनी देने जैसे अंदाज में कहा और कनेक्शन आफ करने के बाद अलफांस से बोला-"अगले चौराहे से यू टर्न ले लो लूमड़ प्यारे ।'"

बिजय ने जितने टाइम मोबाइल पर बात की थी, उस पूरे टाइम अलफांसे कें होठों पर ही दिलचस्प मुस्कान थिरकती रही थी । अब.....बिजय के हुक्म के ज़वाब में उसने कहा-""इतनी अक्ल मुझमें हे कि उनकी सर्विलांस क्रो चकमा के लिए क्या क्या करना है । '"

"मेरी समझ में नहीं आ रहा कि तुम क्या कर रहे हो ? " पिछली सीट पर बैठा नौशाद बोला…"एक गाडी चुराते हो, कुछ देर इस्तेमाल करते हो । उसे किसी सुनसान स्थान पर खडी करके दुसरी गाडी चुरा लेते हो । ये चौथी गाडी है और...कहीँ ठहर भी नहीं रहे हो । जब से टी टेन के आफिस से निकले हें तब से इसी तरह धूम रहे हें ।"

"आप क्या वापस हाजी गल्ला कै दड़बे में जाना चाहते हैं ?"

नौशाद अंसारी सकपकाया-"क क्या वात कर रहे हो?”

"तो बगैर कोई ठिकाना बनाए, इसी तरह घूमते रहना होगा ।”

"पर ऐसा कब तक चल सकता हे ?'

"जब तक जावेद मियां का फोन न आ जाए ।'"

"बड़े अजीब आदमी हो तुम । कैद में तुमने कहा था कि उन लोगों ने मुझे जावेद पर प्रेशर बनाने के लिए किडनेप किया था मगर अब वही काम खुद कर रहे हो । मैं टी टेन के आफिस जाने से पहले भी कह चुका हू और फिर कहता हू…मुझे मार डालने की धमकी का जावद पर कोइ असर नहीं होगा क्योंकि इंडिया में जब जावेद को आतंकी घोषित किया गया था तो मेंने उसकी कोइ मदद न की थी । फिर कहां से उसके दिल में मेरे लिए वो जज़बात हो सकते हें जो एक भतीजे के दिल में वाचा के लिए होते....

"हमने तो सुना है किसी कै पास उसकी मदद करने या न करने का मौका ही न था । जिस रात उसने अविनाश, शिवालकर और गजेंद्र को मारा अर्थात् पुलिस को पता लगा कि वह आतंकी है, वह उसी रात हवालात से फरार होकर पाकिस्तान पहुच गया था ! "

"वात तो ठीक हे तुम्हारी मगर बलविंदर सिहे ने उसे गिरफ्तार करते ही मुझे सूचना दे दी थी ओर मैंने कहा था यदि जावेद आतंकी हे तो मुझसे उसका कोइ संबंध नहीं है । यह बात बलविंदर सिह ने जावेद को बताइ होगी तो...

उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही विजय के हाथ में मोजूद मोबाइल बज उठा था । जावेद कश्मीरी के फोन के इंतजार में विजय ने तुरंत उसकी स्क्रीन पर नजर डाली ।

लैंडलाइन नंबर था ।

विजय ने काल रिसीव की…"विजय हीयर । "

“जावेद बोल रहा हू' ।" धीर गंभीर और कढ़क आवाज़ उभरी थी-“जावेद कश्मीरी।”

"हां । बोलो प्यारे । इतने बोलो कि हमारा भी पेट भर जाए और तुम्हारा भी क्योंकि कान फाड़े तुम्हारे ही फोन का इंतजार कर रहे थे । फोन आया तो लैंडलाइन से आया है । जाहिर हे…किसी पीसीओ से बोल रहे हो । समझदार हो, ट्रेस भी होगा तो पीसीओ दूर नंबर ट्रेस होगा । जब तक वे वहां पहुंचेंगे, तुम जाने कहां पहुच चुके होगे । शाबास ! और कहो, कैसे हो ? बाल बच्चे खुश ! '"

कढे ओर खुरदुरे लहजे में कहा गया…"मैंने यह कहने के लिए फोन किया है कि अगर तुमने मेरे चाचूको खरोंच भी पहुंचाई तो मैं तुम्हारे पूरे खानदान का सफाया कर दूंगा ।"

"क्या कहा ! पानदान का सफाया कर दोगे ! बात कुछ समझ में नहीँ आई मियां, हमारे पानदान का सफाया करने से तुम्हें क्या फायदा होगा ! उसे तो रोज़ हमारी बेगम ही साफ कर देती है ।"

अलफांसे विजय कै जवाब पर मुस्करा उठा जबकि दूसरी तरफ से गुराकर कहा गया…"मैं पानदान नहीं खानदान कह रहा हू ।"

“ओह ! अच्छा । खानदान की बात कर रहे हो तुम ! मगर प्यारे, हमारे खानदानी तो पहले ही खुदागंज़ पहुंच चुके हैं । उम्हें खत्म करने के लिए तुम्हें भी वहां जाना पडेगा । बोलो, तेयार हो, भेजें ?'

"ज्यादा समाट बनने को कोशिश मत करो।'"

"आज सुबह लाल मिर्च क्या ज्यादा चबा गए थे मियां ?'"

"मतलब ? ”

"हम प्यार से बात कर रहे हें यार, तुम चिरमिराहट ही दिखाए चले जा रहे हो । जिस तरह हमारे मुह से फूल झड़ रहे हैं, क्या तुम भी उसी तरह मुह से अंगारों की जगह फूल नहीं झाड सकते?"

"तुम मेरे चाचूको मार डालने को धमकी दे रहे हो और मैं प्यार से पेश आऊं ! ऐसी उम्मीद तुम कैसे कर सकते हो?"

"अभी सिर्फ धमकी दी है, बाल तक बांका नहीं किया है तुम्हारे चाचूका । " बिजय सपाट लहजे मेँ कहता चला गया-"मगर कान में घासलेट डालकर सुन लो, अगर तुमने हमारा कहा नहीं माना तो हम इनके सारे बाल उखाड लेंगे ।"'

"और तुम भी कान खोलकर सुन लो ।" जावेद का लहजा पूरी गाडी में सनसनी फेला देने वाला था-'"चाचूक्रो ज़रा भी नुकसान पहुंचाया तो मै सब कुछ भूलकर तुम्हार पीछे पढ़ जाऊंगा ।"

"हम खुद भी यहीँ चाहते हैं कि तुम हमारे पीछे पड़ जाओ ।"'

"मतलब ? ”

"अगर वाकई अपने चाचू का बाल भी बांका न होने देना चाहते हो तो रात ग्यारह बजे हज़रत निजाम के किले के गेट नंबर चार पर पहुंच जाना । बारह बज गए तो उसी गेट पर नोशाद अंसारी की लाश पडी मिलेगी । उसे उठाकर ले जाना और...

"जुबान संभालकर बात करो मिस्टर बिजय ।"' दूसरी तरफ़ से बोलने वाला जावेद गुर्रा उठा था-"अगर तुम इंडियन स्रीक्रेंट सर्विस के जासूस हो तो मेरा नाम भी जावेद कश्मीरी हे ।'"

"हमें जो कहना था कह चुके प्यारे लाल ।" एकाएक विजय का लहजा शुष्क हो गया-“अब तुम्हें जो बकना हे…बको ।"

"फोन चाचूको दो ।'"

बिजय ने बगैर कुछ कहे हाथ थोड़ा ऊपर उठा दिया ताकि पीछे बैठा नौशाद मोबाइल ले सके । नौशाद उस वक्त बेहद भावुक नजर आ रहा था । शायद इसलिए क्योंकि उसे वाकइ जावेद की तरफ से इस जवाब की आशा थी कि चाचूक्रो मारते हो तो मार डालो मेरी वला से, मगर. . जावेद का हर जवाब उसकी आशाओं के विपरीत था । उन्होंने मोबाइल पर कहा-“हम बोल रहे हैं नौशाद । ”

"कैसे हो चाचू? " भावुक स्वर ।

"हम ठीक हें बेटे ।'" आंखों से आंसुओं की बाढ आ गई…-"'बस तुमसे शिकायत हे ।'"

"मुझसे क्या शिकायत है चाचू? "

“हम सोच भी नहीं सकते थे कि हमारे खानदान का चिराग उस दुनिया मेँ जा सकता है जिसमेँ तुम पहुच गए हो ।”

“आप कौनसी दुनिया की बात कर रहे हैं चाचू?"

“आतंकवादियों की दुनिया की । "

“ओह ! आपको भी वहीँ गलतफहमी हे जो शिवालकर, गजेंद्र और अविनाश नाम के राक्षसों ने हिंदुस्तान में फैलाइ थी ! मगर नहीं चाचू...आपकी कसम, मेंने अपने खानदान पर कोइ दाग नहीं लगाया है । दुनिया के किसी आतंकी से न मेरा कोइ संबंध था, न है, न होगा । उन्होने ने मेरे साथ जो किया, उस कु्तो ने मुझे बताया कि आपके नहीं वल्कि अब्बा के विचारों में दम था । हिंदुस्तान मुसलमानों का मुल्क हो सकता । वहां से इसीलिए फरार हुआ था मैं मगर...यहां पता लगा…हमारे लिए तो पाकिस्तान भी हमारा मुल्क नही....है । यहां तो मेरे साथ उससे भी ज्यादा बुरा हुआ जैसा हिंदुस्तान में हुआ था ।"'

"क्या हुआ बेटे ? क्या हुआ तेरे साथ? मुझे बता ।"

"कहानी लंबी हे चाचू । रात ग्यारह बजे वहां पहुंचूंगा जहां उस इंडियन जासूस ने बुलाया हे । फोन उसे दो । बता दूंकि अगर तुम्हें साथ न लाया तो मेरे पहुंचने कें बावजूद मुझसे मिल नहीं पाएगा ।"'

"नहीं बेटे, तुम वहां नहीं आना ।" नोशाद अंसारी ने जल्दी से कहा…"ये लोग तुम्हें मार भी सकते हैँ ।"'

"हुंह ।'" जावेद की तरफ से धिक्कारने वाली हंसी की आवाज़ के बाद कहा गया-"आपका जावेद अब वो हलवा नहीँ हे चाचूजिसे कोइ इंडियन जासूस जीभ पर रखे और हज्म कर जाए ।"'

"मेरी बात समझने की कोशिश करो बेटे. . .

बात पूरी न कर सका नौशाद अंसारी । उससे पहले ही विजय ने मोबाइल उसके हाथ से छीना और उसे होल्ड वाले मोड पर डालने के बाद बोला…"ये कौनसा राग अलापने लगे मंत्री महोदय ! हमारे बीच तय हुआ था कि तुम भी यही कहोगे कि वहां पहुंच जाएं जहां हम बुला रहे हें वरना हम लोग तुम्हें मार डालेंगे ।"'

"वो हालात दूसरे थे ।"' नोशाद बोला…"मै भी यह समझ रहा था कि वह गलत रास्ते पर निकल गया है मगर सुना नहीं तुमने ! वह कह रहा है कि वह आतंकी नहीँ है । "

इस बार विजय ने उससे कुछ नहीं कहा क्योंकि मोबाइल से बार बार यह आवाज निकलकर गाडी में गूज रही थी…"चा . ..चाचू क्या हुआ आपको , आप ठीक तो हैं ।" विजय ने होल्ड वाले मोड से हाथ हटाया ओर कहा-“ अब तक तो ठीक ही प्यारे लकिन अगर तुम ग्यारह बजे वहां नहीं पहुचे जहाँ बुलाए गए हो तो ठीक नहीं रहेंगे ।"

कहने के बाद उसने ज़वाब की प्रतीक्षा किए बगेर कनेक्शन ही नहीं काट दिया बल्कि स्वीच आफ कर दिया था । अलफांसे के होठों पर पुन: दिलचस्प मुस्कान नज़र आने लगी थी ।

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆
 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
"नहीं जावेद ।" गिरधर ने कहा था… "तू वहां नहीं जाएगा ।”

"ऐसा हो ही नहीं सकता चाचा ।"' जावेद गुरांया था-"उस हरामजादे ने चाचूको मार डालने की धमकी दी है ।'"

"समझने की कोशिश कर, वो सिर्फ धमकी है जबकि अगर तूएक बार उनके कब्जे में आ गए तो वे तुझे जिंदा. ..

"मुझे अपनी परवाह नहीं हैं ।”

आरती बोली…"हमेँ तो है ।"

"तूचुप रह । "

"तूहमेशा मुझे यह सेंटेंस बोलकर चुप नहीं कर सकता । " इस बार आरती बिफर गई थी-“ऐसा कैसे हो सकता है कि हम तुझे सुसाइड करने के लिए वहां जाने दें !"

“वहाँ जाने को सुसाइड करना कैसे कह सकते हैँ ?'

"वहा जाना सुसाइड करना ही होगा जावेद ।"' पुन: गिरधर कह उठा…"सोच तो सही बेटे, वे तुझे क्यों बुला रहे हैं ?'

"मैँ सब समझता हूं ।"

आरती चिल्लाइ-"क्या समझता हे तू?”

"यह . कि उन्हें जावेद चाहिए-जिंदा या मुर्दा । इंडियन जासूस ने इसी मकसद से पाकिस्तान की धरती पर कदम रखा है । नौशाद चाचूको अपने साथ इसीलिए लाया हे ।"'

"यह सब समझता है तो...

"मुझे आपसे भी वडी लफ्ज दोहराने होंगे जो फोन पर चाचू से कहे ये । यह कि…जावेद वो हलवा नहीं है जिसे कोई इंडियन जासूस जीभ पर रखे ओर हज्म कर जाए । अपना इरादा पूरा करने के लिए उसे लोहे के चने चबाने होंगे । आप देखना-मैं चावू क्रो उनके चंगुल से निकाल लाऊंगा ओर वे मेरा बाल तक बांका न कर सकेंगे । जो भी मेरा रास्ता रोकने की कोशिश करेगा, मेरी गोलियां उसे धराशायी कर देंगी, वह चाहे इंडियन जासूस हो या पाकिस्तानी ।"

"मै यह कहना चाहती हू जावेद कि...

"कुछ मत कह आरती.. कुछ भी मत कह । कोइ फायदा नहीं होगा ।'" उसे बीच में ही रोककर जावेद ने निर्णायक लहजे में कहा था…"मैें रुकने वाला नहीं हू..क्योंकि चाचू की जान को दांव पर नहीं लगा सकता । मैं उनसे वहुत प्यार करता हू ।"'

इस बार आरती तो आरती, गिरधर भी कुछ न बोल सका । दोनों जावेद के चेहरे को देखते रह गए थे ।

उस चेहरे को, जो किसी भटटी की मानिंद दहक रहा था । दृढता केॅ वेसे लक्षण उसके चेहरे पर पहले कभी नहीं देखे गए थे । गिरधर को यह समझते देर न लगी कि उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती तो बोला…"तो फिर ठीक हे । मैं भी तेरे साथ चलूँगा ।"

"अ-आप !" जावेद सकपकाया-"आप क्या करेंगे?"

"वही, जो तू करेगा । "

"ये कैसी बेवकूफी है भला”

"ये बेवकूफी नहीं गधे, सावधानी है । तेरी ये बात मेरी समझ में आ गई है कि नौशाद भाई को उस कसाई के चंगुल में नहीं छोडा जा सकता । उन्हें निकालकर लाना ही होगा ।”

"पर उसमें तुम क्या करोगे ?'

"कहा न ! वही, जो तू करेगा । "

"चाचा, बात को समझने की कोशिश करो ।” जावेद ने सचमुच उसे समझाने वाले लहजे में कहा था…“वहां उनके और मेरे नहीं बल्कि हमारे रिबाल्वरों कै बीच जंग होगी । मैं उनका मुकावला शायद इसलिए कर सकूंगा क्योंकि पुलिस की ट्रेनिंग लेते वक्त यहीँ सब सीखा था परंतु तुम...गोली चलाना तो दूर, मेरे ख्याल से तो तुमने कभी रिवाल्वर को हाथ में लेकर भी न देखा होगा । "

"अपनी हाकी है मेरे पास ।” कहने कै साथ उसने कमरे कै कौने मेँ रखी हाकी उठा ली थी ।

जावेद कें होठों पर ऐसी मुस्कान दौडी जैसी किसी बुजुर्ग कै होठों पर बच्चे को जिद करते देखकर उभरती हे । बोला…"जहां गोलिया' चलने की संभावना हो वहा' हाकी का क्या वजूद होगा चाचा ?""

"ये हाकी यूंही मेरे साथ नहीं रहती बच्चू। जवानी मेँ जब मैं इसे अपने चारों तरफ घुमाया करता था तो इतनी तेजी से घूमती थी कि किसी भी तरफ से चलाई गइ गोली मेरे जिस्म तक नहीं पहुच सकती थी । उसे हर हाल मेँ मेरे चारों तरफ घूमने वाली हॉकी पर ही लगना होता था । तुझे शायद यकीन नहीं आएगा कि…गोली की रफ्तार से तेज रफ्तार होती थी मेरी हाकी की ।"

"वो सब ठीक है चाचा, लेकिन. ..

"कोइ लेकिन वेकिन नहीं ।" गिरधर ने उसे बोलने ही जो नहीं दिया…"'चल, तेरी बात बडी की । कुछ नहीं हो सकेगा मेरी हाकी से मगर तुझे ये बात समझनी पड़ेगी कि एक से भले दो होते हें ।"

आरती तपाक से बोली'-"'और दो से भले तीन ।”

"नहीं आरती । " गिरधर बोला…"तूनहीं जाएगी ।"

"क्यों पापा?”

“आरृगुंमेंटस नहीं. . .बस मैंने कह दिया, इसलिए । ” गिरधर ने भी निर्णायक लहजे में कहा था… "तूयहीं हमारा इंतजार करेगी । "

"चाकूगर्म करके ।" जावेद बीला ।

"मतलब ? "

"जब लौटें, जाने किसे गोली लगी हो ! " उसने शरारती अंदाज में आंख मारी थी"'गोली निकालने वाला भी तो कोई चाहिए ! ”

आरती भुनभुनाकर उसकी तरफ देखती रह गई ।

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

.................
 
अपनी प्लार्निग के मुताबितक जावेद और गिरधर उस वक्त हजरत निजाम के किले पर पहुंच गए थे जब अंधेरे ने वातावरण को अपने आगोश में लेना शुरू किया ही था ।

गिरधर की हाकी उसके हाथों में मोजूद थी।

वे टूटे हुए एक ऐसे वुर्ज के पीछे छुपे हुए थे जहा' से टूटे फूटे गेट नंबर चार पर नजर रखी जा सकती थी ।

वक्त के थपेडों ने हजरत निजाम के किले क्रो आज भले ही खंडहर में बदल दिया हो मगर उसे देखकर कोई भी आसानी से अंदाजा लगा सकता था कि किसी ज़माने में वह करांची की शान रहा होगा ।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमी लोग आज भी उसे देखने आते थे । वैसे भी, खंडहर में बदल जाने के बावजूद उसके बहुत दालान, बुर्ज, कमरे, और किले के चारों तरफ खुदी बागडी इस हद तक सुरक्षित थीं कि लोग उन्हें देखकर रोमांचित होते ।

बागडियों में आज भी पानी भरा जाता था क्योंकि दिन कै समय भाट लोग सैलानियों को किले की दीवारों पर से बागडियों में भरे पानी में कूदने का खेल दिखाते थे ।

104

किले के एक तरफ करांची शहर था, दूसरी तरफ समुद्र । जावेद और गिरधर ने वड़े धैर्य से बिजय आर नौशाद का इंतजार किया लेकिन उन्हें ग्यारह बजे तक इंतजार न करना पड़ा । उस वक्त पोने ग्यारह ही बजे थे जब गेट नंबर चार के नजदीक बने एक बड़े से चबूतरे पर दो परछाइयां नज़र आईं । जावेद के मुंह से निकला-"वे आ गए ।"'

“क्या ज़रूरी हे कि वे ही हों ?" गिरधर सतर्क लहजे में बोला ।

"इतनी रात को और कौन आएगा ?"

“मेरा मतलब हे…उनमें से एक तो निश्चत रूप से बिजय होगा मगर दूसरे नौशाद भाई ही हों, ये ज़रूरी नहीं है । मुमकिन है वे हमें धोखा देने की कोशिश कर रहे हों । नौशाद भाइ क्रो लाए ही न हों ।'"

गगन पर वर्योंके अस्सी परसेंट चांद नजर आ रहा था इसलिए वातावरण में चांदनी बिखरी पडी थी लेकिन वह इतनी ज्यादा न थी कि इतनी दूर से उन्हें पहचाना जा सकता ।

"इसकी तस्दीक तो वहां जाकर ही हो सकती है ।”

जावेद ने क्योकि ठीक कहा था इसलिए गिरधर कुछ बोला नहीं, खामोशी कें साथ परछाईंयों क्रो देखता रहा । कुछ देर बाद जावेद ने कहा…"मेँ जा रहा हू चाचा ।'"

"मेरा दिल गवाही नहीं दे रहा बेटे ।”

"किस बात के लिए ?"

"कि तू अकेला वहां जाए । "

"दोनाें के जाने से वेहतर तो मेरा अकेले ही जाना है चाचा, वहां जो भी होने वाला है, तुम यहां से उस पर नजर रखोगे । जरुरत पडी तो मेरी मदद करागे । इसके विपरीत अगर दोनों वहा पहुच गए तो वक्त से पहले पता लग जाएगा कि उन्हें अकेले जावेद से नहीं बल्कि दो लोगों से निपटना हे । यह हमारे फेवर में नहीं होगा ।”

"वात तो ठीक हे तेरी ।"

"तो मैँ चलता हू ।"

"चौकस रहना बेटे ।” जाने क्यों गिरधर की आवाज़ कांपती चली गईं…"हालांकि हमने किसी को देखा नहीँ है लेकिन फिर भी, हो सकता है उनके आदमी किले में उसी तरह छुपे हों जिस तरह मैं यहा छुपा हू । मैं अकेला हूजबकि वे अनेक हो सकते हैँ और उन अनेकों से निपटना हम दो के लिए मुश्किल हो सकता हे ।"

"इस सब पर हमने पहले ही बिचार कर लिया है चाचा, मत भूलो कि घिरने पर हमेँ समुद्र में कूद जाना है ।"

"में कुछ नहीं भूला हू । तुम भी मत भूलना कि तेरी जान सबसे ज्यादा कीमती है । नौशाद भाइ की जान से भी और मेरी जान से भी । फोन पर नोशाद भाई…ने भी यही कहा था कि...

"डरो मत चाचा । '" जावेद ने गिरधर का कंधा थपथपाते हुए उसे सांत्वना देने वाले अंदाज में कहा… "अभी हाजी गल्ला जिंदा है और उसे मोत के घाट उतारने से पहले मैं नहीं मर सकता ।”

कुछ कहने के लिए गिरधर ने मुंह खोला जरूर पर जजवात्तों की ज्यादती के कारण उससे आवाज न निकल सकी जबकि जावेद उस रास्ते की तरफ बढ चुका था । अंतत: उसे गेट नंबर चार कें करीब ले जाने वाला था । जावेद को थोड़ा चक्कर जरूर पड़ा परंतु गेट नंबर चार तक पहुंचते पहुंचते उसने अपनी पोजीशन ऐसी वना ली कि दोनों परछाइयों के पीछे जा पहुंचा ।

अब वह एक थम्ब के पीछे छुपा हुआ था-उनकै इतना नज़दीक कि शक्ल देखने का मौका मिलता तो पहचान सकता था, मगर पीठ दीख रही होने कै कारण ऐसा संभव न हो सका ।

उस वक्त वह दिमाग पर जोर डालकर यह सोचने की कोशिश कर रहा था कि बगैर खुद को प्रकट किए कैसे पता लगाए कि उनमें से एक नौशाद अंसारी हे या नहीं कि कानों मेंवह आवाज पडी जिसे टीबी और फोन पर सुना था, उसने कहा था…"ग्यारह बज गए हैं लकिन वह अभी तक नहीं आया ।”

"मैं तभी से दुआ कर रहा हूं कि वह न आए । '" इस आवाज़ को सुनते ही जावेद की रग रग में रोमांच की लहरें दोढ़ गई क्योकि अपने चाचा की आवाज उसने साफ पहचानी थी…"क्योकि मुझे मालूम हे कि उसे जिंदा नहीं छोडोगे ।"

"ऐसा नहीं हे मंत्री महोदय, मै वो कसाई थोडी हूं जो यहां जावेद नाम के बकरे को हलाल करने आया हू! मैरी कोशिश उसे गिरफ्तार करना होगी । अच्छा होगा कि वह खुद को मेरे हवाले कर दे ।'"

"में सब जान चुका हू । उसे गिरफ्तार करके पाकिस्तान के हवाले करने के मिशन पर यहां आए हो । उसमें कामयाब हो गए तो पाकिस्तान क्या जिंदा छोड देगा ?”

"खुद को इंडियन सीक्रेेट एजेंट बताकर उसने मुकम्मल दुनिया में भारत क्रो बदनाम किया हे । इसकी सजा तो उसे भोगनी होगीं । ”

"समझने की कोशिश करो मिस्टर बिजय, उस वक्त तक मैं भी उसके खिलाफ़ था जब तक यह मालूम था कि वह आतंकी है मगर उसने कहा कि…ऐसा नहीं हे ।"

"कोइ मुजरिम खुद को मुजरिम नहीं कहता ।”

“पाकिस्तान के हवाले करने से पहले हमें उसका वर्जन सुनना तो चाहिए । जानना तो चाहिए कि यहां उसके साथ क्या हुआ??"

जावेद कै दिमाग की उलझन दूर हो चुकी थी । अब उनकी वातों से उसे ज्यादा सरोकार न था इसलिए जेब से रिवाल्वर निकाला ।

दांतों पर दांत जमाए और दबे पांव परछाईंयों की तरफ बढा ।

अब वह अपनी 'शिकार' परछाई के वारे में पूरी तरह स्पष्ट था ।

उस वक्त विजय की परछाई से चार कदम दूर था जिस वक्त शायद बिजय को अपने पीछे किसी कै होने का एहसास हुआ ।

इधर बिजय तेजी से घूमा । उधर से जावेद झपटा और रिवाल्वर क्री नाल उसकी कनपटी पर रखता गुर्राया-"ज़रा भी चालाकी की तो मेरी गोली तुम्हारा भेजा उडा देगी ।"

“ अमां मियां, पीछे से कैसे प्रकट हो गए तुम ! "" बिजय के मुंह से निकला… "हमने तो सुना था शेर की तरह हमेशा अपने शिकार पर सामने से वार करते हो !"

"अघेड़ आदमी की ढाल के पीछे छुपे शख्स को सामने वाले से शेर जैसे व्यवहार की उम्मीद नहीँ करनी चाहिए ।" जावेद ने सपाट लहजे में कहा था…"आओ चाचू मेरी पीठ के पीछे आ जाओ ।"

नौशाद अंसारी ने वेसा ही किया ।

विजय पर नजरें गड़ाए जावेद ने नौशाद से पूछा…"इसने तुम्हारे साथ कोई ज्यादती तो नहीँ की चाचू? ”

"नहीं बेटे, इसने कोई ज्यादती नहीं की । ज्यादती तो नुसरत तुगलक और हाजी गल्ला ने की थी । इसने तो मुझे उनकी कैद से निकाला हे पर ये तुम्हें गिरफ्तार करके पाकिस्तान को सौंपने के मिशन पर यहां आया है ओर पाकिस्तान तुम्हें..

"मुझे मालूम है पाकिस्तान मेरा क्या करेगा मगर उसके मंसूबे सिर्फ मंसूबे रह जाएंगे।। हकीकत में कभी नहीं बदलेंगे वे । भले ही इंडियन जासूस क्री जगह सीआइए क्रो मदद कै लिए बुला तें ।”

विजय ने उसे उक्साने वाले अंदाज़ में कहा…"सामने वाले क्रो रिवाल्वर की धार पर रखकर तो कोई भी र्डीगें मार सकता हे प्यारे, बात तो तब है जब बराबरी के स्तर पर अखाडे में उतरा जाए ।" जावेद ने दात्तों पर दांत जमाकर कहा…"इस वक्त मेरा मकसद चाचूको तुम्हारे चंगुल से निकालकर ले जाना है पर फिक्र मत करो, तुम्हारी इस चुनौती का जवाब भी मै जल्दी ही... धांय ! जाने किस दिशा से एक गोली चली । गोली चलाने वाले का निशाना इतना सधा हुआ था कि वह सीधी जावेद के हाथ में दबे रिवाल्वर पर लगी थी ।

परिणाम स्वरूप-रिवाल्वर दूर जा गिरा ।

जावेद का हाथ झनझनाता रह गया था और अभी वह कुछ समझ भी न पाया था कि विजय का जोरदार घूंसा जबड़े पर पड़ा ।

एक चीख के साथ वह भी रिवाल्वर की तरह दूर जा गिरा मगर पलक भी नहीँ झपकी थी कि वापस खडा हो गया ।

भन्नाए हुए अंदाज में वह बिजय पर जम्प लगाने ही वाला था कि गेट नंबर चार की बेक से अलफांसे बाहर आया ।

उसके हाथ में मोजूद रिवाल्वर की नाल से अभी तक धुवां निकल रहा था ।

अलफांसे के मुहं से निकले इन शब्दों ने जावेद को जहां का तहा ठिठका दिया था…"जरा भी हरकत की तो अगली गोली तुम्हारा भेजा उड़ा देगी जावेद ।"

पलक झपकते ही हालात बदल गए थे । नौशाद अंसारी गिढ़गिड़ाया था…""नहीँ, मारना नहीं जावेद क्रो । इससे बेहतर तो ये है कि इसे गिरफ्तार कर लो ।"

जावेद कसमसा भले ही चाहे जितना रहा हो मगर इस वक्त कर कुछ नहीं सकता था ।

गिरधर की तरफ से भी मदद की कोइ उम्मीद न थी क्योंकि हाकी से भला क्या किया जा सकता था ।

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆
 
गेट नंबर चार कें नजदीक वाले चबूतरे पर जो हो रहा था उसे देखकर गिरधर बुरी तरह बौखला गया । समझ न सका कि इन हालात में उसे क्या करना चाहिए ??

दांत भिचते चले गए ।

हाथों में मोजूद हाकी पर पकड़ मज़बूत होती चली गई लेकिन इतनी दूर से हाकी से क्या कर सकता था वह ?

एकाएक नज़र अपने नजदीक पड़े पत्थर पर पडी ।

बगैर सोचे समझे पत्थर उठाया और उधर खींच मारा, जिधर जावेद, नौशाद, विजय और अलफांसे थे।

पत्थर उनमें से किसी क्रो लगा नहीं था, बस उनके बीच जा गिरा और. ..सबके साथ साथ अलफासे का ध्यान भी भंग हुआ ।

उस वक्त उसकी नज़र जमीन पर लुढ़क्रते पत्थर पर थी जब जावेद ने उस पर जम्प लगा दी बल्कि यह कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा कि अलफांसे क्रो लिए वह जमीन पर जा गिरा था ।

इधर, हाथों में हाकी ज़कड़े गिरधर को गेट नंबर चार की तरफ दौढ़ लगाने कें अलावा कुछ न सूझा ।

उस वक्त अलफांसे ने जावेद क्रो अपने पैरों पर रखकर हवा मेँ उछाला था जिस वक्त हाकी ताने और मुंह से आदिवासियों जैसी जोरदार आवाज निकालता गिरधर वहां पहुंचा ।

उसका अंदाज वेहद जुनूनी था ।

इतना ज्यादा कि विजय ओर अलफासे बौखला गए । कुछ करते न बन पड़ा उन पर क्योंकि पगलाया सा गिरधर अपने चारों तरफ बगेर किसी को लक्ष्य किए हॉकी घुमाए चला जा रहा था ।

बचने की लाख चेष्टाओं कै बावजूद कालदूत बनकर घूम रही हाकी का अगला सिरा विजय के कंधे से टकराया ।

एक चीख कै साथ वह दूर जा गिरा ।

हकीकत यह थी कि खुद गिरधर क्रो मालूम न था कि उसकी हाकी की जद मेँ कौन आ रहा है ।

वह उसे पागलों की तरह घुमाता हुआ चीखा था…“तू नौशाद थाइ को लेकर निक्ल जा जावेद, मै इन कुतों को देखता हू ।”

गिरधर हाकी क्रो अपने चारों तरफ घुमाता मुकम्मल चबूतरे पर इस कदर चकरा रहा था जैसे खुद एक फिरकनी हो ।

जिस तरह हाकी विजय के कंघे से टकराई थी ठीक उसी तरह अलफांसे ही नहीँ बल्कि नोशाद या जावेद के जिस्म से भी टकरा सकती थी । इस वक्त...हालात ऐसे थे कि सबको एक ही काम था, अंधे की लाठी की मानिंद घूम रही गिरधर की हाकी से बचना ।

उससे बचते हुए जावेद ने नौशाद की कलाई पकडी और अर्ध टूटे दरवाजे कें दूसरी तरफ जम्प लगा दी ।

दरवाजे के पीछे पहुचते ही उसने चीखकर कहा…"बस गिरधर चाचा, इधर आ जाओ । दरवाजे कै पीछे ।”

मगर, गिरधर को होश कहा !

हाकी को अपने चारों तरफ घुमाना जारी रखे चिल्लाया… "तू निकल जावेद, मैँ इन्हें तेरे करीब नहीं आने दूंगा ।"

अलफासे को पहली बार एहसास हुआ था कि एक साधारण आदमी का जुनून शातिर से शातिर आदमी क्रो किस तरह मात दे सकता है । यह हकीकत हे कि गिरधर की घूमती हुइ हॉकी से वह खुद को वडी मुश्किल से वचा पा रहा था ।

उधर, हाकी की चोट से बुरी तरह तिलमिलाए, जमीन पर पड़े बिजय ने जेब से रिवाल्वर निकाला ओर गिरधर पर गोली चला दी ।

गोली गिरधर के पेट मेँ लगी ।

एक चीख कै साथ हवा में उछलकर वह गेट के नजदीक जाकर गिरा, मगर हौंसले पस्त नहीं हुए थे उसके ।

हाकी हाथों से न निकलने दी थी ।

उस वक्त वह जमीन से खड़ा होने की कोशिश कर रहा था जब गेट के उस तरफ मोजूद जावेद ने उसका वाजू पकडकर गेट के पीछे की तरफ खींच लिया । बुरी तरह जजवाती अंदाज में चिल्ला उठा था वह-"तुम्हें गोली लगी है चाचा, गोली लगी हे तुम्हें ।"

गिरधर चीखा…"फिक्र मत कर । अब भी मेँ इन्हें तेरे पीछे नहीं आने दूगा । तू नोशाद भाई को लेकर भाग जा यहां से ।"

“तुम पागल हो गए हो चाचा, मैं ऐसे कसे जा सकता हू?”

"तुझे जाना होगा ।" दर्द से छटपटाता हुआ वह चीखा…"मत भूल जावेद कि तेरी जान हम सबसे ज्यादा कीमती है ।”

उधर, विजय के हाथ में तो रिवाल्वर था ही ।

अलफांसे ने भी ज़मीन पर पड़ा रिवाल्वर उठा लिया ।

दोनों कें रिवाल्वर दरवाजे की तरफ तने हुए थे ।

जावेद, गिरधर और नौशाद दरवाजे की बैक में थे ।

विजय और अलफांसे उस तरफ बढे । दोनों की नजरें दरवाजे पर स्थिर थीं । कदम नाप तौलकर बढा रहे थे ।

यह सच्चाई हे कि इस वक्त उनमें से किसी के दिल में जावेद का खौफ न था बल्कि गिरधर की हाकी छाईं थी…वह हॉकी जो इस वक्त भी दरवाजे कै पीछे से घूमती हुइ उन तक पहुंच सकती थी ।

टूटे फूटे दरवाजे की बैक में छुपे जावेद ने इतने धीमे स्वर में कहा था कि आवाज विज़य अलफासे तक न पहुच सकै क्या आप वाले ढलान पर उतरने की हालत में हैं चाचा ?'

"म मतलब ......!!" दर्द से कराहते गिरधर ने पूछा ।

"पीछे ढलान हे, वह सीधा वागडी में जाकर खत्म होता हे ओर बागड्री समुद्र से मिली है । तैरते हुए हम समुद्र में पहुच जाएंगे ।”

"गुड ।। ऐसा ही करो । नौशाद भाइ को साथ ले जाओ ।"

"हो क्या गया है तुम्हें ! क्या वार बार एक ही राग अलापे जा रहे हो ?” यह परवाह किए बगैर वह चिढे हुए और भावुक लहजे में चीखता चला गया था कि उसकी आवाज़ विजय अलफांसे के कानों में ही नहीं बल्कि मुकम्मल किले में गूंजी थी…“इस बात को क्यों नहीं समझ रहे कि मेँ तुम्हें छोडकर नहीं जा सकता ।"

" तुझे मेरी कसम जावेद, आरती की कसम, नाज़नीन की कसम, नौशाद भाई को महफूज निकालकर ले जा यहां से । देख. ..ये बहुत करीब आ गए हैं । " कहने के तुरंत बाद गिरधर बगेर किसी की सुने हाकी ताने दरवाजे के दूसरी तरफ कूद चुका था क्योकि रिवाल्वर ताने बिजय अलफांसे वाकई काफी नज़दीक आ चुके थे ।

गिरधर की हरकत ने इधर जावेद और नौशाद को हैरान किया तो उधर, बिजय अलफासे को तो बौखला ही दिया था ।

अलफांसे को संभलने तक का मौका न मिला ।

हाकी का अगला सिरा उसकी पसलियों से टकराया था ।

चीख के साथ वह हवा में ऐसा उछला कि चबूतरे के दूसरे सिरे पर जाकर गिरा ।

जुनूनी अवस्था में हाकी घुमाता गिरधर विजय की तरफ बढा, अगर यह लिखा जाए तो जरा भी गलत न होगा कि विजय ने बडी मुश्किल से खुद को हाकी से बचाते हुए गोली चलाइ । यह गोली गिरधर क्री कपाल क्रिया करती हुई आर पार निकल गई थी ।

अंतिम चीख के साथ जहां का तहां ढेर हो गया वह ।

जावेद आर्तनाद कर उठा-"च चाचा !" उसकी चीख किले की सीमाएं लांघकर दूर दूर तक गूंजती चली गई लेकिन केवल चीखकर नहीं रह गया था वह बल्कि जुनूनी अवस्था में यह चिल्लाते हुए बिजय पर जम्प लगा दी थी कि…"में तुझे जिंदा नहीं छोडूंगा कुत्ते !"

बिजय कॅ हाथ में रिवाल्वर था मगर उसने उसका इस्तेमाल नहीं किया बल्कि बूट की जोरदार ठोकर जावेद के पेट में जमाई ।

एक चीख के साथ वह दूर जा गिरां मगर तुरंत ही उठकर खडा होता हुआ दहाड़ा-“चाचा को मारकर तूने अपनी मोत के परवाने पर दस्तखत कर लिए हैं हरामजादे । मैं तुझे छोडूंगा नहीं ।" रिवाल्वर ताने विजय ने शात लहजे मेँ कहा…"यूंहीँ उखाड पछाड़ करता रहा तो तेरी लाश भी तेरे चाचा की लाश के आसपास ही पडी होगी । जिंदा रहने की एक ही शर्त हे...सरेंडर कर दे ।”

पर जावेद गुस्से में था ओर गिरधर की यह बात दुरुस्त थी कि गुस्से में उसका दिमाग काम नहीं करता था ।

इसीलिए, विजय कै हाथ में मौजूद रिवॉल्वर की ज़रा भी परवाह किए बगेर उसने उस पर जम्प लगा दी परंतु अब भी, विजय ने उस पर गोली नहीं चलाई बल्कि एक ओर ठोकर उसके पेट मेँ रसीद की ।

इस बार वह दरवाजे कै नजदीक जाकर गिरा ।

तब तक संभल चुका अलकांसे उस पर गोली चलाने वाला था बल्कि चला ही चुका था कि बिजय ने झपटकर ऐन वक्त पर उसकी कलाइ का रुख आसमान की तरफ करते हुए कहा…"नहीं लूमड़ मियां, हम उसे मार नहीं सकते ।”

"क्यों ??" अलफांसे ने रहस्यमय मुस्कान कं साथ पूछा ।

"पाकिस्तान साला हमारे देश पर यह आरोप मंढ देगा कि ऐसा हमने सबूत मिटाने के लिए किया है ।”

"पकडो ।" अलफांसे चीखा क्योंकि मोकै का फायदा उठाते हुए दरवाजे कॅ पीछे छुपे नौशाद ने न केवल जावेद क्रो अपनी तरफ खींच लिया था बल्कि उसे लिए ढलान पर लुढ़कता चला गया ।

विजय और अलफांसे एक ही जम्प में दरवाजे के दूसरी तरफ पहुंच गए थे और उनका पीछा करने के लिए रवुद भी ढलान पर कूदने वाले थे कि…सामने वाले बुर्ज से अंधाधुंध गोलियां चलीं ।

ऐसी...कि पूरा इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठा । यकीनन वे गोलियां मशीनगन से चली थीं ।

पलक झपकते ही खुद को बचाने कै लिए विज़य अलफासे ने वापस चबूतरे की तरफ जम्प लगाई परंतु शीघ्र ही यह बात समझ मेँ आ गई थी कि वे गोलिया' उन पर नहीं चलाईं गई थीं ।

वे गोलियां जावेद और नौशाद पर भी नहीं चलाई गइ थीं ।

फिर क्यों चलाइ गइ थीं वे गोलियां?

विजय ने बुर्ज की तरफ देखा-क्रोई नजर न आया ।

विजय अलफासे ने बुर्ज की तरफ देखा-क्रोई नजर न आया ।

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆

∆∆∆∆∆
 
Back
Top