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"एक बार ओर ट्रैगर दबाओ तुगलक बहन ।"
“क्यों ?"
"गोलियों की आवाज अच्छी लगती है…तड़ातड़ तड़ातड । जैसे आज़ भी अपनी शादी मेँ शरीक हो रहा होऊं ।"
"जानता भी है, किस रेट की गोलियां हैं इस एकै सैंतालिस में !"
"हमें क्या खरीदनी पढ़त्ती हैं ! सरकारी माल है साला ।"
"ज्यादा चपड़ चूं मत कर । आ अब ठंडे ठंडे निकल लें यहां से । वो साला अंतर्राष्टीय घपड़चुल्लू यहां यानी बुर्ज पर आ गया तो मुंह छुपाना भारी हो जाएगा ।”
"क्यों ? हम मुह क्यों छुपाएंगे उससे ?'"
"साला ऐसे ऐसे सवाल करेगा जिनके जवाब देने कै अभी हम मूड में नहीँ हैं । जैसे पूछ सकता हे…हमने ये फायरिग क्यों की ? '"
"बता देंगें-ताकि वे जावेद और मंत्री का पीछा न कर सकें ।"
"धीवट है क्या ? "
“क्यों ?"
"बताया न, अभी हम अपना प्लान समझाने के मूड में नहीं हैं ।”
"पर इतने से ज़वाब से उसकी समझ में हमारा पूरा प्लान कैसे आ सकता है ! बल्कि मैँ तो कहता हू…खोपडी चकरघिन्नी बन जाएगी उसकी और मेरे ख्याल से हमें ऐसा कर ही देना चाहिए । मुझे लोगों की खोपडी क्रो चकरधिन्नी बनाने में बहुत मजा आता । "
“और मुझें किश्तों में मजा लेने में मजा नहीँ आता ।"'
"मतलब? "
"असली मजा तो तब आएगा जब इन सारे धुरंधरों क्रो यह पता लगेगा कि ये जो उछलकूद करते फिर रहे हैं, असल में ये नहीं कर रहे बल्कि हम करा रहे हैं । हर घटना कै पीछे हमारी ओर सिर्फ हमारी ही खोपडी है । ये सब तो कठपुतलियां हैं ।"
"ज्यादा मत बोल मुर्गी की औलाद । किसी ने सुन लिया तो पूरा प्लान न केवल यहीँ धराशायी हो जाएगा बल्कि हमारी खोपडी भी आसपास ही खुली पडी होंगी ।"
"ठीक कहा तूने ।"'
"तो निकलें ।"
“निकल लेने में ही भलाई हे ।" कहने कै साथ नुसरत ने एकै सैंतालिस कंधे पर लटकाई और बुर्ज से उतरने लगा ।
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"मै जाना चाहता था आरती. . .बागडी में गिरने के बाद भी मैं वहां वापस जाना चाहता था मगर नौशाद चाचूने नहीं जाने दिया ।"' तड़प तढ़पकर कहते जावेद की आंखों से आंसूबह रहे थे…"इसकै लिए मैं कभी इन्हें माफ नहीं करूंगा ।”
"इन्होंने जो किया, ठीक किया जावेद ।" कहते वक्त आरती की आंखें डबडबाई हुइ' थीं…"मुझे मालूम है कि गुस्से में तेरा दिमाग काम नहीं करता । पूरी बात सुनने के बाद मुझें भी लगता है कि वहीँ किया जाना चाहिए था जो नौशाद चाचा किया ।"'
“मगर मुझे वहां जाना था ।"
इस बार नोशाद ने पूछा… "आखिर क्या करता तूवहां जाकर ? "
"कम से कम अपने चाचा की लाश तो उठा लाता । अपने हाथ से अग्नि तो दे देता मैं उन्हें ! क्यों आरती, तुम्हारे मज़हब में माना जाता है न कि जिसे उसका बेटा अग्नि नहीं देता उसे ज़न्नत में भी जगह नहीं मिलती !” कहने कै बाद वह फूट फूटकर लगा था ।
उसकी बात सुनकर रो तो नौशाद भी पड़ा था और. . .आरती से ज्यादा रोने की इच्छा भला किसकी हुई होगी ! बहरहाल, मरने बाला उसका पिता था मगर अपने दिल को मजबूत किया उसने । आखों में मौजूद आसुओं क्रो सीमाएं न तोड़ने दीं क्योकि आगे बढ़कर उसने जार जार रो रहे जावेद के सिर पर हाथ रखकर कहा था…"बच्चों की तरह क्यों रो रहे हो जावेद ! हमारे मजहब में तो यह भी लिखा हे कि जो शख्स अपने बच्चों के लिए प्राण त्यागता है उसे वेठने के लिए जन्नत में सबसे उच्ची कुर्सी दीं जाती है । मेरे पापा ने दिखा दिया कि उनसे बड़ा हाकीबाज न पेदा हुआ है, न होगा । हमें तो उन पर गर्व करना चाहिए जावेद । हमेँ अपना आशीर्वाद दे गए हैँ वे ।"'
जावेद की हालत ऐसी थी जैसे कुछ सुना ही न हो । आसुओं से तर आंखे उसकी तरफ उठाकर बोला…"मुझे माफ कर दे आरती । मै तेरे पापा को न बचा सका । इतना कायर हूमैं कि उन्हें वहीँ छोड़ आया । अपने साथ तक न ला सका ।”
अब...आरत्ती के धैर्य के भी सभी बांध टूट गए । वह भी जावेद से लिपटकर फूट फूटकर रो पडी जबकि उसका रुदन जावेद को किसी ओर ही दुनिया में ले गया । आंसुओं से भरी आंखों में खून भी नज़र आने लगा । शून्य में स्थिर हो गई वे । दायां हाथ स्वत: आरती के सिर पर पहुंच गया था ओर मुंह से लफ्जों के रूप में आग निकलने लगी…"में तेरी कसम खाकर कहता हूंआरती. ..तेरी कसम खाकर कहता हूंमें कि गिरधर चाचा के हत्यारे की हत्या मै अपने हाथों से करूंगा । अपने हाथों से मौत के घाट उतारूंगा उसे । जब तक उसकी लाश तेरे कदमों मे नहीं डाल दूगा तब तक चेन से नहीं वेठूंगा ।"'
"ऐसा मत बोल बेटे, ऐसा मत बोल ।"' नोशाद कह उठा-"ये काम आसान नहीं हे क्योंकि वह इंडिया का सबसे बडा जासूस है।"
"तुम्हारे बेटे ने भी आसान काम करने नहीं सीखे चाचू ।" जावेद कै दांत भिच गए थे-“आज में आपसे वादा करता हूं कि भले दुनिया के चाहे जिस कोने में जा छुपे, मैं वहीँ पहुंचकर उसे मोत कै घाट उतारूगा । चाचा कें कत्ल की कीमत उसे चुकानी होगी । ”
आरती का रुदन तेज हो गया था ।
'शाने पाकिस्तान' नाम के अखबार में छपे एक छोटे से इश्तिहार को पढकर जावेद इतनी बुरी तरह चौंका जितनी वुरी तरह जीवन में पहले कभी नहीं चौंका था ।
इश्तिहार बस इतना सा था-"मैं पाकिस्तान में हू…नाज़नीन ।"
उसके बाद एक मोबाइल नंबर दिया गया था ।
जावेद के जेहन में सवाल कौंधा-क्या यह बही नाजनीन हो सकती हैं? मेरी नाजनीन । नहीं…ऐसा नहीं हो सकता । हो भी कैसे सकता हे ।
मेरी नाजनीन तो अब इस दुनिया में ही नहीं है । मेरी आंखों कै सामने उसके जिस्म को उठाकर ले जाया गया था ।
मगर, अस्पताल ही तो ले जाया गया था !
उस वक्त मरी कहां थी वह?
पर बाद में तो उसकी मौत की खबर आ गई थी । तभी, जब वह हवालात में था । सब इंस्पेक्टर देवांश ने बताया था कि भरपूर कोशिश के बावजूद डाक्टर नाजनीन को न बचा सकै ।
भला वह झूठ क्यों बोलेगा ?
नाजनीन नाम की इस दुनिया में क्या एक ही लडकी थी ? सैकडों नाजनीन होंगी । मुमकिन है हजारों हों ।
किसी और नाजनीन का नंबर होगा यह।
ऐसा सोचकर जावेद कश्मीरी ने विज्ञापन से ध्यान हटाना चाहा मगर, दिमाग में विचार उठा-बड़ा अनोखा विज्ञापन हे यह । केवल इतना कहा गया है कि में पाकिस्तान मेँ हू आर नंबर दिया गया है ।
ये अंदाज़ तो ऐसा हे जेसे विज्ञापन किसी एक ही व्यक्ति क्रो लक्ष्य करके दिया गया हों । जैसे नाजनीन अपने किसी खास को बता रही हो कि वह पाकिस्तान में हे ओर उसका नंबर ये है ।
अगर मेरी नाजनीन आज इस दुनिया में होती तो वह भी तो मुझे इसी त्तरह सांकेतिक अंदाज़ में ढूंढने की कोशिश करती !
जावेद कै जेहन में वहुत से विचार आए लेकिन अतत: वह खुद को अखबार मेँ दिए गए नंबर को मिलाने से न रोक सका ।
पहली ही रिंग पर काल रिसीव की गइ, जैसे किसी के फोन का इंतजार किया जा रहा था ओर आवाज उभरी-"यस ।"
जावेद के समूचे जिस्म में तरंगं सी नाच उठों ।
ये तो नाजनीन की आवाज है-मेरी नाजनीन की ।
उसने धीरे से पूछा-"कौन बोल रही है' ?”
"अ.....अरे ! " दूसरी तरफ से बोलने वाली नाजनीन जैसे उछल पडी, रोमाचित हो गई-"त...तुम जावेद हो न ! जावेद ही हो न तुम .' मैं तुम्हारी आवाज लाखों में पहचान सकती हूं जावेद । में नाजनीन हू । '"
अब तो जावेद को जेसे यकीन हो गया कि दूसरी तरफ उसी की नाजनीन है ।
जिस्म में दोढ़ रहे लहू कीं रफ्तार दुगनी तिगुनी हो गई थी ।
ज़ज़वातों की ज्यादती के कारण हाथ पैर कांपने लगे थे उसके ।
चेहरा सुर्ख हो गया मगर, इस सबके वावजूद उसने अपने जज्वातों को काबूमेँ किया और संतुलित लहजे में सवाल करने की कोशिश की…"मैँ पहचान नहीं सका कि तुम कौनसी नाजमीन हो ? "
"त तुम जावेद ही हो न !” आवाज बता रही थी कि उस तरफ भी ज़ज्बातों की आंधी चल रही है ।
शब्द मानो उसके मुंह से फिसले-"ह हां।"
“तो फिर पहचान क्यों नहीं रहे मुझे !" व्यग्रता पूर्वक कहा गया था-“क्या तुम मेरी आवाज भी भूल गए जावेद?”
"मैं यकीन नहीँ कर पा रहा हूकि तुम...
"कि मैं जिंदा हू ।"
"हां । "
"ठ ठीक ही है । इतनी आसानी से तुम्हें यकीन आ भी कैसे सकता है जावेद । मेरा इस दुनिया में होना चमत्कार ही तो है ! कईं बार डाक्टरों ने कहा कि में मर चुकी हूंक्योकि मेरी सांसें रूक चुकी थीं, मगर तभी, कुछ देर वाद फिर चल जातीं ओर डाक्टरों क्रो कहना पड़ता कि मेँ जिंदा हू । वे फिर से मेरी सांसों को विस्तार देने में जुट जाते और अंतत: वे कामयाब हो गए या यूं कहू तो ज्यादा मुनासिब होगा कुदरत कें चमत्कार के आगे नतमस्तक होना पड़ा उन्हें । उस कुदरत के चमत्कार के आगे जिसने मुझे बेड ही पर कइ बार मारा फिर जिला दिया था ।"
आवाज से, अंदाज से…जावेद को दूसरी तरफ से बोलने वाली हर तरह से नाजनीन लग रही थी मगर, इस बीच उसके जेहन में दूसरा विचार भी आ चुका था ।
यह कि-कहीँ यह कोई षड्यंत्र तो नहीँ है ? मुझे फंसाने की किसी की कोइ चाल तो नहीं है यह ?
इसलिए, इस वार थोड़े सतर्क लहजे में सवाल किया-"अगर तुम नाजनीन हो तो बताओ-हम पहली बार कहां मिले थे ?"
"तुम्हारे चाचू के बंगले पर । तब, जब मेंने तुम्हारे सिर पर अपनी एकै सेंत्तालीस से हमला किया था लेकिन नहीं, उसे मुलाकात नहीं कहा जा सकता । मुलाकात तो वह थी जब मोगली के किडनैप कें वाद तुम्हारे सामने आइ थी, वहीँ, मंत्री जी कें बंगले पर । मैँने सोचा था मोगली के किडनैप कें बारे में जानकर तुम प्रेशर में आ जाओगे लेकिन तुमने तो मेरी ही हवा उडा दी ।"
"उसके बाद क्या हुआ ?" जावेद ने पूछा ।
वह संक्षेप मेँ, एक ही सांस में सबकुछ बता गई ।
अंत में बोली-"वस एक ही बात का अफसोस है, यह कि उन तीनों हरामजादों को अपनी आंखों के सामने देखकर मैं जरूरत से कुछ ज्यादा उत्तेजित हो गइ थी । इतनी ज्यादा कि बगैर अंजाम की परवाह किए उन पर झपट पडी और उन्होंने मुझे गोली मार दी।
"गोली किसने मारी थी तुम्हें ?"'
"शिवालकर ने, हालांकि में झपटी गजेंद्र पर थी ।" एक ही सांस में कहा गया…"जावेद, अपनी उस वक्त की उत्तेजना पर मुझे इस लिए अफसोस है क्योंकि उसी उत्तेजना की वजह से खुद अपने अब्बा, अम्मी और अब्बास के हत्यारों पर गोली न चला सकी मगर तसल्ली इस बात की है कि यह काम तुमने किया । तुम भी तो मैं ही हूं?"
"तुम्हें कैसे पता कि मैंने उन तीनों को..
"एसएसपी साहब ने बताया ।"
"ब बलविंदर सिंह जी ने?"
"हां । ”
"कब ? "
"घटना के एक महीने बाद । जब मैँ काफी ठीक हो गई थी ।"
जावेद कश्मीरी क्रो जेसे जेसे यकीन होता जा रहा था कि यह कोई षडयंत्र नहीं डै बल्कि दूसरी तरफ नाजनीन ही है, वैसे ही वेसे वह रोमांचित होता जा रहा था…“ओर क्या बताया उन्होने ?”
"बताया-कि तुम्हारे साथियों ने उसी रात हवालात पर हमला करके तुम्हें निकाल लिया था ।"
“ तुमने क्या कहा ? "
“क्यों ?"
"गोलियों की आवाज अच्छी लगती है…तड़ातड़ तड़ातड । जैसे आज़ भी अपनी शादी मेँ शरीक हो रहा होऊं ।"
"जानता भी है, किस रेट की गोलियां हैं इस एकै सैंतालिस में !"
"हमें क्या खरीदनी पढ़त्ती हैं ! सरकारी माल है साला ।"
"ज्यादा चपड़ चूं मत कर । आ अब ठंडे ठंडे निकल लें यहां से । वो साला अंतर्राष्टीय घपड़चुल्लू यहां यानी बुर्ज पर आ गया तो मुंह छुपाना भारी हो जाएगा ।”
"क्यों ? हम मुह क्यों छुपाएंगे उससे ?'"
"साला ऐसे ऐसे सवाल करेगा जिनके जवाब देने कै अभी हम मूड में नहीँ हैं । जैसे पूछ सकता हे…हमने ये फायरिग क्यों की ? '"
"बता देंगें-ताकि वे जावेद और मंत्री का पीछा न कर सकें ।"
"धीवट है क्या ? "
“क्यों ?"
"बताया न, अभी हम अपना प्लान समझाने के मूड में नहीं हैं ।”
"पर इतने से ज़वाब से उसकी समझ में हमारा पूरा प्लान कैसे आ सकता है ! बल्कि मैँ तो कहता हू…खोपडी चकरघिन्नी बन जाएगी उसकी और मेरे ख्याल से हमें ऐसा कर ही देना चाहिए । मुझे लोगों की खोपडी क्रो चकरधिन्नी बनाने में बहुत मजा आता । "
“और मुझें किश्तों में मजा लेने में मजा नहीँ आता ।"'
"मतलब? "
"असली मजा तो तब आएगा जब इन सारे धुरंधरों क्रो यह पता लगेगा कि ये जो उछलकूद करते फिर रहे हैं, असल में ये नहीं कर रहे बल्कि हम करा रहे हैं । हर घटना कै पीछे हमारी ओर सिर्फ हमारी ही खोपडी है । ये सब तो कठपुतलियां हैं ।"
"ज्यादा मत बोल मुर्गी की औलाद । किसी ने सुन लिया तो पूरा प्लान न केवल यहीँ धराशायी हो जाएगा बल्कि हमारी खोपडी भी आसपास ही खुली पडी होंगी ।"
"ठीक कहा तूने ।"'
"तो निकलें ।"
“निकल लेने में ही भलाई हे ।" कहने कै साथ नुसरत ने एकै सैंतालिस कंधे पर लटकाई और बुर्ज से उतरने लगा ।
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"मै जाना चाहता था आरती. . .बागडी में गिरने के बाद भी मैं वहां वापस जाना चाहता था मगर नौशाद चाचूने नहीं जाने दिया ।"' तड़प तढ़पकर कहते जावेद की आंखों से आंसूबह रहे थे…"इसकै लिए मैं कभी इन्हें माफ नहीं करूंगा ।”
"इन्होंने जो किया, ठीक किया जावेद ।" कहते वक्त आरती की आंखें डबडबाई हुइ' थीं…"मुझे मालूम है कि गुस्से में तेरा दिमाग काम नहीं करता । पूरी बात सुनने के बाद मुझें भी लगता है कि वहीँ किया जाना चाहिए था जो नौशाद चाचा किया ।"'
“मगर मुझे वहां जाना था ।"
इस बार नोशाद ने पूछा… "आखिर क्या करता तूवहां जाकर ? "
"कम से कम अपने चाचा की लाश तो उठा लाता । अपने हाथ से अग्नि तो दे देता मैं उन्हें ! क्यों आरती, तुम्हारे मज़हब में माना जाता है न कि जिसे उसका बेटा अग्नि नहीं देता उसे ज़न्नत में भी जगह नहीं मिलती !” कहने कै बाद वह फूट फूटकर लगा था ।
उसकी बात सुनकर रो तो नौशाद भी पड़ा था और. . .आरती से ज्यादा रोने की इच्छा भला किसकी हुई होगी ! बहरहाल, मरने बाला उसका पिता था मगर अपने दिल को मजबूत किया उसने । आखों में मौजूद आसुओं क्रो सीमाएं न तोड़ने दीं क्योकि आगे बढ़कर उसने जार जार रो रहे जावेद के सिर पर हाथ रखकर कहा था…"बच्चों की तरह क्यों रो रहे हो जावेद ! हमारे मजहब में तो यह भी लिखा हे कि जो शख्स अपने बच्चों के लिए प्राण त्यागता है उसे वेठने के लिए जन्नत में सबसे उच्ची कुर्सी दीं जाती है । मेरे पापा ने दिखा दिया कि उनसे बड़ा हाकीबाज न पेदा हुआ है, न होगा । हमें तो उन पर गर्व करना चाहिए जावेद । हमेँ अपना आशीर्वाद दे गए हैँ वे ।"'
जावेद की हालत ऐसी थी जैसे कुछ सुना ही न हो । आसुओं से तर आंखे उसकी तरफ उठाकर बोला…"मुझे माफ कर दे आरती । मै तेरे पापा को न बचा सका । इतना कायर हूमैं कि उन्हें वहीँ छोड़ आया । अपने साथ तक न ला सका ।”
अब...आरत्ती के धैर्य के भी सभी बांध टूट गए । वह भी जावेद से लिपटकर फूट फूटकर रो पडी जबकि उसका रुदन जावेद को किसी ओर ही दुनिया में ले गया । आंसुओं से भरी आंखों में खून भी नज़र आने लगा । शून्य में स्थिर हो गई वे । दायां हाथ स्वत: आरती के सिर पर पहुंच गया था ओर मुंह से लफ्जों के रूप में आग निकलने लगी…"में तेरी कसम खाकर कहता हूंआरती. ..तेरी कसम खाकर कहता हूंमें कि गिरधर चाचा के हत्यारे की हत्या मै अपने हाथों से करूंगा । अपने हाथों से मौत के घाट उतारूंगा उसे । जब तक उसकी लाश तेरे कदमों मे नहीं डाल दूगा तब तक चेन से नहीं वेठूंगा ।"'
"ऐसा मत बोल बेटे, ऐसा मत बोल ।"' नोशाद कह उठा-"ये काम आसान नहीं हे क्योंकि वह इंडिया का सबसे बडा जासूस है।"
"तुम्हारे बेटे ने भी आसान काम करने नहीं सीखे चाचू ।" जावेद कै दांत भिच गए थे-“आज में आपसे वादा करता हूं कि भले दुनिया के चाहे जिस कोने में जा छुपे, मैं वहीँ पहुंचकर उसे मोत कै घाट उतारूगा । चाचा कें कत्ल की कीमत उसे चुकानी होगी । ”
आरती का रुदन तेज हो गया था ।
'शाने पाकिस्तान' नाम के अखबार में छपे एक छोटे से इश्तिहार को पढकर जावेद इतनी बुरी तरह चौंका जितनी वुरी तरह जीवन में पहले कभी नहीं चौंका था ।
इश्तिहार बस इतना सा था-"मैं पाकिस्तान में हू…नाज़नीन ।"
उसके बाद एक मोबाइल नंबर दिया गया था ।
जावेद के जेहन में सवाल कौंधा-क्या यह बही नाजनीन हो सकती हैं? मेरी नाजनीन । नहीं…ऐसा नहीं हो सकता । हो भी कैसे सकता हे ।
मेरी नाजनीन तो अब इस दुनिया में ही नहीं है । मेरी आंखों कै सामने उसके जिस्म को उठाकर ले जाया गया था ।
मगर, अस्पताल ही तो ले जाया गया था !
उस वक्त मरी कहां थी वह?
पर बाद में तो उसकी मौत की खबर आ गई थी । तभी, जब वह हवालात में था । सब इंस्पेक्टर देवांश ने बताया था कि भरपूर कोशिश के बावजूद डाक्टर नाजनीन को न बचा सकै ।
भला वह झूठ क्यों बोलेगा ?
नाजनीन नाम की इस दुनिया में क्या एक ही लडकी थी ? सैकडों नाजनीन होंगी । मुमकिन है हजारों हों ।
किसी और नाजनीन का नंबर होगा यह।
ऐसा सोचकर जावेद कश्मीरी ने विज्ञापन से ध्यान हटाना चाहा मगर, दिमाग में विचार उठा-बड़ा अनोखा विज्ञापन हे यह । केवल इतना कहा गया है कि में पाकिस्तान मेँ हू आर नंबर दिया गया है ।
ये अंदाज़ तो ऐसा हे जेसे विज्ञापन किसी एक ही व्यक्ति क्रो लक्ष्य करके दिया गया हों । जैसे नाजनीन अपने किसी खास को बता रही हो कि वह पाकिस्तान में हे ओर उसका नंबर ये है ।
अगर मेरी नाजनीन आज इस दुनिया में होती तो वह भी तो मुझे इसी त्तरह सांकेतिक अंदाज़ में ढूंढने की कोशिश करती !
जावेद कै जेहन में वहुत से विचार आए लेकिन अतत: वह खुद को अखबार मेँ दिए गए नंबर को मिलाने से न रोक सका ।
पहली ही रिंग पर काल रिसीव की गइ, जैसे किसी के फोन का इंतजार किया जा रहा था ओर आवाज उभरी-"यस ।"
जावेद के समूचे जिस्म में तरंगं सी नाच उठों ।
ये तो नाजनीन की आवाज है-मेरी नाजनीन की ।
उसने धीरे से पूछा-"कौन बोल रही है' ?”
"अ.....अरे ! " दूसरी तरफ से बोलने वाली नाजनीन जैसे उछल पडी, रोमाचित हो गई-"त...तुम जावेद हो न ! जावेद ही हो न तुम .' मैं तुम्हारी आवाज लाखों में पहचान सकती हूं जावेद । में नाजनीन हू । '"
अब तो जावेद को जेसे यकीन हो गया कि दूसरी तरफ उसी की नाजनीन है ।
जिस्म में दोढ़ रहे लहू कीं रफ्तार दुगनी तिगुनी हो गई थी ।
ज़ज़वातों की ज्यादती के कारण हाथ पैर कांपने लगे थे उसके ।
चेहरा सुर्ख हो गया मगर, इस सबके वावजूद उसने अपने जज्वातों को काबूमेँ किया और संतुलित लहजे में सवाल करने की कोशिश की…"मैँ पहचान नहीं सका कि तुम कौनसी नाजमीन हो ? "
"त तुम जावेद ही हो न !” आवाज बता रही थी कि उस तरफ भी ज़ज्बातों की आंधी चल रही है ।
शब्द मानो उसके मुंह से फिसले-"ह हां।"
“तो फिर पहचान क्यों नहीं रहे मुझे !" व्यग्रता पूर्वक कहा गया था-“क्या तुम मेरी आवाज भी भूल गए जावेद?”
"मैं यकीन नहीँ कर पा रहा हूकि तुम...
"कि मैं जिंदा हू ।"
"हां । "
"ठ ठीक ही है । इतनी आसानी से तुम्हें यकीन आ भी कैसे सकता है जावेद । मेरा इस दुनिया में होना चमत्कार ही तो है ! कईं बार डाक्टरों ने कहा कि में मर चुकी हूंक्योकि मेरी सांसें रूक चुकी थीं, मगर तभी, कुछ देर वाद फिर चल जातीं ओर डाक्टरों क्रो कहना पड़ता कि मेँ जिंदा हू । वे फिर से मेरी सांसों को विस्तार देने में जुट जाते और अंतत: वे कामयाब हो गए या यूं कहू तो ज्यादा मुनासिब होगा कुदरत कें चमत्कार के आगे नतमस्तक होना पड़ा उन्हें । उस कुदरत के चमत्कार के आगे जिसने मुझे बेड ही पर कइ बार मारा फिर जिला दिया था ।"
आवाज से, अंदाज से…जावेद को दूसरी तरफ से बोलने वाली हर तरह से नाजनीन लग रही थी मगर, इस बीच उसके जेहन में दूसरा विचार भी आ चुका था ।
यह कि-कहीँ यह कोई षड्यंत्र तो नहीँ है ? मुझे फंसाने की किसी की कोइ चाल तो नहीं है यह ?
इसलिए, इस वार थोड़े सतर्क लहजे में सवाल किया-"अगर तुम नाजनीन हो तो बताओ-हम पहली बार कहां मिले थे ?"
"तुम्हारे चाचू के बंगले पर । तब, जब मेंने तुम्हारे सिर पर अपनी एकै सेंत्तालीस से हमला किया था लेकिन नहीं, उसे मुलाकात नहीं कहा जा सकता । मुलाकात तो वह थी जब मोगली के किडनैप कें वाद तुम्हारे सामने आइ थी, वहीँ, मंत्री जी कें बंगले पर । मैँने सोचा था मोगली के किडनैप कें बारे में जानकर तुम प्रेशर में आ जाओगे लेकिन तुमने तो मेरी ही हवा उडा दी ।"
"उसके बाद क्या हुआ ?" जावेद ने पूछा ।
वह संक्षेप मेँ, एक ही सांस में सबकुछ बता गई ।
अंत में बोली-"वस एक ही बात का अफसोस है, यह कि उन तीनों हरामजादों को अपनी आंखों के सामने देखकर मैं जरूरत से कुछ ज्यादा उत्तेजित हो गइ थी । इतनी ज्यादा कि बगैर अंजाम की परवाह किए उन पर झपट पडी और उन्होंने मुझे गोली मार दी।
"गोली किसने मारी थी तुम्हें ?"'
"शिवालकर ने, हालांकि में झपटी गजेंद्र पर थी ।" एक ही सांस में कहा गया…"जावेद, अपनी उस वक्त की उत्तेजना पर मुझे इस लिए अफसोस है क्योंकि उसी उत्तेजना की वजह से खुद अपने अब्बा, अम्मी और अब्बास के हत्यारों पर गोली न चला सकी मगर तसल्ली इस बात की है कि यह काम तुमने किया । तुम भी तो मैं ही हूं?"
"तुम्हें कैसे पता कि मैंने उन तीनों को..
"एसएसपी साहब ने बताया ।"
"ब बलविंदर सिंह जी ने?"
"हां । ”
"कब ? "
"घटना के एक महीने बाद । जब मैँ काफी ठीक हो गई थी ।"
जावेद कश्मीरी क्रो जेसे जेसे यकीन होता जा रहा था कि यह कोई षडयंत्र नहीं डै बल्कि दूसरी तरफ नाजनीन ही है, वैसे ही वेसे वह रोमांचित होता जा रहा था…“ओर क्या बताया उन्होने ?”
"बताया-कि तुम्हारे साथियों ने उसी रात हवालात पर हमला करके तुम्हें निकाल लिया था ।"
“ तुमने क्या कहा ? "