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चलते पुर्जे ( विजय विकास सीरीज़ )

"एक बार ओर ट्रैगर दबाओ तुगलक बहन ।"

“क्यों ?"

"गोलियों की आवाज अच्छी लगती है…तड़ातड़ तड़ातड । जैसे आज़ भी अपनी शादी मेँ शरीक हो रहा होऊं ।"

"जानता भी है, किस रेट की गोलियां हैं इस एकै सैंतालिस में !"

"हमें क्या खरीदनी पढ़त्ती हैं ! सरकारी माल है साला ।"

"ज्यादा चपड़ चूं मत कर । आ अब ठंडे ठंडे निकल लें यहां से । वो साला अंतर्राष्टीय घपड़चुल्लू यहां यानी बुर्ज पर आ गया तो मुंह छुपाना भारी हो जाएगा ।”

"क्यों ? हम मुह क्यों छुपाएंगे उससे ?'"

"साला ऐसे ऐसे सवाल करेगा जिनके जवाब देने कै अभी हम मूड में नहीँ हैं । जैसे पूछ सकता हे…हमने ये फायरिग क्यों की ? '"

"बता देंगें-ताकि वे जावेद और मंत्री का पीछा न कर सकें ।"

"धीवट है क्या ? "

“क्यों ?"

"बताया न, अभी हम अपना प्लान समझाने के मूड में नहीं हैं ।”

"पर इतने से ज़वाब से उसकी समझ में हमारा पूरा प्लान कैसे आ सकता है ! बल्कि मैँ तो कहता हू…खोपडी चकरघिन्नी बन जाएगी उसकी और मेरे ख्याल से हमें ऐसा कर ही देना चाहिए । मुझे लोगों की खोपडी क्रो चकरधिन्नी बनाने में बहुत मजा आता । "

“और मुझें किश्तों में मजा लेने में मजा नहीँ आता ।"'

"मतलब? "

"असली मजा तो तब आएगा जब इन सारे धुरंधरों क्रो यह पता लगेगा कि ये जो उछलकूद करते फिर रहे हैं, असल में ये नहीं कर रहे बल्कि हम करा रहे हैं । हर घटना कै पीछे हमारी ओर सिर्फ हमारी ही खोपडी है । ये सब तो कठपुतलियां हैं ।"

"ज्यादा मत बोल मुर्गी की औलाद । किसी ने सुन लिया तो पूरा प्लान न केवल यहीँ धराशायी हो जाएगा बल्कि हमारी खोपडी भी आसपास ही खुली पडी होंगी ।"

"ठीक कहा तूने ।"'

"तो निकलें ।"

“निकल लेने में ही भलाई हे ।" कहने कै साथ नुसरत ने एकै सैंतालिस कंधे पर लटकाई और बुर्ज से उतरने लगा ।

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"मै जाना चाहता था आरती. . .बागडी में गिरने के बाद भी मैं वहां वापस जाना चाहता था मगर नौशाद चाचूने नहीं जाने दिया ।"' तड़प तढ़पकर कहते जावेद की आंखों से आंसूबह रहे थे…"इसकै लिए मैं कभी इन्हें माफ नहीं करूंगा ।”

"इन्होंने जो किया, ठीक किया जावेद ।" कहते वक्त आरती की आंखें डबडबाई हुइ' थीं…"मुझे मालूम है कि गुस्से में तेरा दिमाग काम नहीं करता । पूरी बात सुनने के बाद मुझें भी लगता है कि वहीँ किया जाना चाहिए था जो नौशाद चाचा किया ।"'

“मगर मुझे वहां जाना था ।"

इस बार नोशाद ने पूछा… "आखिर क्या करता तूवहां जाकर ? "

"कम से कम अपने चाचा की लाश तो उठा लाता । अपने हाथ से अग्नि तो दे देता मैं उन्हें ! क्यों आरती, तुम्हारे मज़हब में माना जाता है न कि जिसे उसका बेटा अग्नि नहीं देता उसे ज़न्नत में भी जगह नहीं मिलती !” कहने कै बाद वह फूट फूटकर लगा था ।

उसकी बात सुनकर रो तो नौशाद भी पड़ा था और. . .आरती से ज्यादा रोने की इच्छा भला किसकी हुई होगी ! बहरहाल, मरने बाला उसका पिता था मगर अपने दिल को मजबूत किया उसने । आखों में मौजूद आसुओं क्रो सीमाएं न तोड़ने दीं क्योकि आगे बढ़कर उसने जार जार रो रहे जावेद के सिर पर हाथ रखकर कहा था…"बच्चों की तरह क्यों रो रहे हो जावेद ! हमारे मजहब में तो यह भी लिखा हे कि जो शख्स अपने बच्चों के लिए प्राण त्यागता है उसे वेठने के लिए जन्नत में सबसे उच्ची कुर्सी दीं जाती है । मेरे पापा ने दिखा दिया कि उनसे बड़ा हाकीबाज न पेदा हुआ है, न होगा । हमें तो उन पर गर्व करना चाहिए जावेद । हमेँ अपना आशीर्वाद दे गए हैँ वे ।"'

जावेद की हालत ऐसी थी जैसे कुछ सुना ही न हो । आसुओं से तर आंखे उसकी तरफ उठाकर बोला…"मुझे माफ कर दे आरती । मै तेरे पापा को न बचा सका । इतना कायर हूमैं कि उन्हें वहीँ छोड़ आया । अपने साथ तक न ला सका ।”

अब...आरत्ती के धैर्य के भी सभी बांध टूट गए । वह भी जावेद से लिपटकर फूट फूटकर रो पडी जबकि उसका रुदन जावेद को किसी ओर ही दुनिया में ले गया । आंसुओं से भरी आंखों में खून भी नज़र आने लगा । शून्य में स्थिर हो गई वे । दायां हाथ स्वत: आरती के सिर पर पहुंच गया था ओर मुंह से लफ्जों के रूप में आग निकलने लगी…"में तेरी कसम खाकर कहता हूंआरती. ..तेरी कसम खाकर कहता हूंमें कि गिरधर चाचा के हत्यारे की हत्या मै अपने हाथों से करूंगा । अपने हाथों से मौत के घाट उतारूंगा उसे । जब तक उसकी लाश तेरे कदमों मे नहीं डाल दूगा तब तक चेन से नहीं वेठूंगा ।"'

"ऐसा मत बोल बेटे, ऐसा मत बोल ।"' नोशाद कह उठा-"ये काम आसान नहीं हे क्योंकि वह इंडिया का सबसे बडा जासूस है।"

"तुम्हारे बेटे ने भी आसान काम करने नहीं सीखे चाचू ।" जावेद कै दांत भिच गए थे-“आज में आपसे वादा करता हूं कि भले दुनिया के चाहे जिस कोने में जा छुपे, मैं वहीँ पहुंचकर उसे मोत कै घाट उतारूगा । चाचा कें कत्ल की कीमत उसे चुकानी होगी । ”

आरती का रुदन तेज हो गया था ।

'शाने पाकिस्तान' नाम के अखबार में छपे एक छोटे से इश्तिहार को पढकर जावेद इतनी बुरी तरह चौंका जितनी वुरी तरह जीवन में पहले कभी नहीं चौंका था ।

इश्तिहार बस इतना सा था-"मैं पाकिस्तान में हू…नाज़नीन ।"

उसके बाद एक मोबाइल नंबर दिया गया था ।

जावेद के जेहन में सवाल कौंधा-क्या यह बही नाजनीन हो सकती हैं? मेरी नाजनीन । नहीं…ऐसा नहीं हो सकता । हो भी कैसे सकता हे ।

मेरी नाजनीन तो अब इस दुनिया में ही नहीं है । मेरी आंखों कै सामने उसके जिस्म को उठाकर ले जाया गया था ।

मगर, अस्पताल ही तो ले जाया गया था !

उस वक्त मरी कहां थी वह?

पर बाद में तो उसकी मौत की खबर आ गई थी । तभी, जब वह हवालात में था । सब इंस्पेक्टर देवांश ने बताया था कि भरपूर कोशिश के बावजूद डाक्टर नाजनीन को न बचा सकै ।

भला वह झूठ क्यों बोलेगा ?

नाजनीन नाम की इस दुनिया में क्या एक ही लडकी थी ? सैकडों नाजनीन होंगी । मुमकिन है हजारों हों ।

किसी और नाजनीन का नंबर होगा यह।

ऐसा सोचकर जावेद कश्मीरी ने विज्ञापन से ध्यान हटाना चाहा मगर, दिमाग में विचार उठा-बड़ा अनोखा विज्ञापन हे यह । केवल इतना कहा गया है कि में पाकिस्तान मेँ हू आर नंबर दिया गया है ।

ये अंदाज़ तो ऐसा हे जेसे विज्ञापन किसी एक ही व्यक्ति क्रो लक्ष्य करके दिया गया हों । जैसे नाजनीन अपने किसी खास को बता रही हो कि वह पाकिस्तान में हे ओर उसका नंबर ये है ।

अगर मेरी नाजनीन आज इस दुनिया में होती तो वह भी तो मुझे इसी त्तरह सांकेतिक अंदाज़ में ढूंढने की कोशिश करती !

जावेद कै जेहन में वहुत से विचार आए लेकिन अतत: वह खुद को अखबार मेँ दिए गए नंबर को मिलाने से न रोक सका ।

पहली ही रिंग पर काल रिसीव की गइ, जैसे किसी के फोन का इंतजार किया जा रहा था ओर आवाज उभरी-"यस ।"

जावेद के समूचे जिस्म में तरंगं सी नाच उठों ।

ये तो नाजनीन की आवाज है-मेरी नाजनीन की ।

उसने धीरे से पूछा-"कौन बोल रही है' ?”

"अ.....अरे ! " दूसरी तरफ से बोलने वाली नाजनीन जैसे उछल पडी, रोमाचित हो गई-"त...तुम जावेद हो न ! जावेद ही हो न तुम .' मैं तुम्हारी आवाज लाखों में पहचान सकती हूं जावेद । में नाजनीन हू । '"

अब तो जावेद को जेसे यकीन हो गया कि दूसरी तरफ उसी की नाजनीन है ।

जिस्म में दोढ़ रहे लहू कीं रफ्तार दुगनी तिगुनी हो गई थी ।

ज़ज़वातों की ज्यादती के कारण हाथ पैर कांपने लगे थे उसके ।

चेहरा सुर्ख हो गया मगर, इस सबके वावजूद उसने अपने जज्वातों को काबूमेँ किया और संतुलित लहजे में सवाल करने की कोशिश की…"मैँ पहचान नहीं सका कि तुम कौनसी नाजमीन हो ? "

"त तुम जावेद ही हो न !” आवाज बता रही थी कि उस तरफ भी ज़ज्बातों की आंधी चल रही है ।

शब्द मानो उसके मुंह से फिसले-"ह हां।"

“तो फिर पहचान क्यों नहीं रहे मुझे !" व्यग्रता पूर्वक कहा गया था-“क्या तुम मेरी आवाज भी भूल गए जावेद?”

"मैं यकीन नहीँ कर पा रहा हूकि तुम...

"कि मैं जिंदा हू ।"

"हां । "

"ठ ठीक ही है । इतनी आसानी से तुम्हें यकीन आ भी कैसे सकता है जावेद । मेरा इस दुनिया में होना चमत्कार ही तो है ! कईं बार डाक्टरों ने कहा कि में मर चुकी हूंक्योकि मेरी सांसें रूक चुकी थीं, मगर तभी, कुछ देर वाद फिर चल जातीं ओर डाक्टरों क्रो कहना पड़ता कि मेँ जिंदा हू । वे फिर से मेरी सांसों को विस्तार देने में जुट जाते और अंतत: वे कामयाब हो गए या यूं कहू तो ज्यादा मुनासिब होगा कुदरत कें चमत्कार के आगे नतमस्तक होना पड़ा उन्हें । उस कुदरत के चमत्कार के आगे जिसने मुझे बेड ही पर कइ बार मारा फिर जिला दिया था ।"

आवाज से, अंदाज से…जावेद को दूसरी तरफ से बोलने वाली हर तरह से नाजनीन लग रही थी मगर, इस बीच उसके जेहन में दूसरा विचार भी आ चुका था ।

यह कि-कहीँ यह कोई षड्यंत्र तो नहीँ है ? मुझे फंसाने की किसी की कोइ चाल तो नहीं है यह ?

इसलिए, इस वार थोड़े सतर्क लहजे में सवाल किया-"अगर तुम नाजनीन हो तो बताओ-हम पहली बार कहां मिले थे ?"

"तुम्हारे चाचू के बंगले पर । तब, जब मेंने तुम्हारे सिर पर अपनी एकै सेंत्तालीस से हमला किया था लेकिन नहीं, उसे मुलाकात नहीं कहा जा सकता । मुलाकात तो वह थी जब मोगली के किडनैप कें वाद तुम्हारे सामने आइ थी, वहीँ, मंत्री जी कें बंगले पर । मैँने सोचा था मोगली के किडनैप कें बारे में जानकर तुम प्रेशर में आ जाओगे लेकिन तुमने तो मेरी ही हवा उडा दी ।"

"उसके बाद क्या हुआ ?" जावेद ने पूछा ।

वह संक्षेप मेँ, एक ही सांस में सबकुछ बता गई ।

अंत में बोली-"वस एक ही बात का अफसोस है, यह कि उन तीनों हरामजादों को अपनी आंखों के सामने देखकर मैं जरूरत से कुछ ज्यादा उत्तेजित हो गइ थी । इतनी ज्यादा कि बगैर अंजाम की परवाह किए उन पर झपट पडी और उन्होंने मुझे गोली मार दी।

"गोली किसने मारी थी तुम्हें ?"'

"शिवालकर ने, हालांकि में झपटी गजेंद्र पर थी ।" एक ही सांस में कहा गया…"जावेद, अपनी उस वक्त की उत्तेजना पर मुझे इस लिए अफसोस है क्योंकि उसी उत्तेजना की वजह से खुद अपने अब्बा, अम्मी और अब्बास के हत्यारों पर गोली न चला सकी मगर तसल्ली इस बात की है कि यह काम तुमने किया । तुम भी तो मैं ही हूं?"

"तुम्हें कैसे पता कि मैंने उन तीनों को..

"एसएसपी साहब ने बताया ।"

"ब बलविंदर सिंह जी ने?"

"हां । ”

"कब ? "

"घटना के एक महीने बाद । जब मैँ काफी ठीक हो गई थी ।"

जावेद कश्मीरी क्रो जेसे जेसे यकीन होता जा रहा था कि यह कोई षडयंत्र नहीं डै बल्कि दूसरी तरफ नाजनीन ही है, वैसे ही वेसे वह रोमांचित होता जा रहा था…“ओर क्या बताया उन्होने ?”

"बताया-कि तुम्हारे साथियों ने उसी रात हवालात पर हमला करके तुम्हें निकाल लिया था ।"

“ तुमने क्या कहा ? "
 
“ कहा-सर, आपको फिर कोई गलतफ़हमी हो रही है । न जावेद आतंकी था, न ही आतंकवादियों से उसका कोई संबंध था । शुरू में वे मेरी बातों पर बिश्वास नहीँ कर रहे थे । मगर, तुमने ठीक ही कहा था जावेद ,, एसएसपी साहब दिल कै बहुत अच्छे हैं । मै जव बार-वार वे ही शब्द दोहराती रही जो सच्चाई थी तो लगा, उन्हें मुझ पर विश्वास हो रहा हे । उनकी आंखों में अपने लिए हमदर्दी के भाव दखने लगी थी मै और फिर, उन्होने ही तो यह कहा कि मेरे खिलाफ काईं पुख्ता सबूत नहीं है । तभी तो मै छुट सकी !”

"और तव तुम यहां, पाकिस्तान आईं ?”

"दो दिन पहले ही तो आइ हू । सूझ नहीं रहा था कि इतने वड़े पाकिस्तान में तुम्हें कहा ढूढूं । फिर इश्तिहार देने वाली तरकीब सूझी और देखो. . .तुम मिल गए । हम बात कर रहे हैं ।”

"तुम पाकिस्तान में कहा हो ?”

"करांची मे।”

"मैं भी कराची में ही हू ।"

“व वॉव तुम करांची मे कहा? हम कव मिल रहे हैं जावेद ?'" इतने सव के बावजूद जावेद ने सतर्क स्वर में कहा…"मिलने से पहले तुम्हें एक काम करना होगा नाज़नीन ।”

“बोलो। "

"एसएसपी साहब का मोबाइल नंबर है तुम्हारे पास?"

“हां हे, मगर...

“मगर ? ”

“वे तो आजकल अमेरिका गए हुए हैँ ।”

“क्या ? ”

"किसी खास पुलिस ट्रेनिंग के लिए ।"

जावेद उलझकर रह गया ।

बलविंदर सिंह का नंबर उसने यह सोचकर मांगा था कि उनसे दुसरी तरफ से बोलने वाली नाज़नीन की वातों की पुष्टि करने के वाद ही मिलेगा लेकिन यहां भी रास्ता ब्लॉक मिला ।

फिर, कुछ देर सोचता रहने कें बाद वाला-“फिर भी, तुम उनका नंबर । "

"ठीक हे, उनका नंबर मैं तुम्हारे मोबाइल पर एसएमएस कर दूंगी । जिससे वात कर रहे हो. यह तुम्हारा ही नंवर है न ।”

"हा । "

“आके । मै एसएमएस करती हू । फिर हम कव मिलेंगे ?"

"फोन करूगा तुम्हें ।” कहने के वाद, जावेद का जी तो नहीं चाह रहा था लेकिन संवंघ विच्छेद कर दिया ।

परंतु वास्तव में संबंध बिच्छद कहां हुआ था । उसके ज़हन के जरें-जर्रे पर तो अभी तक नाज़नीन और केवल नाज़नीन ही परवाज़ कर रही थी ।

उसने वह अखवार उठाया जिसमेँ विज्ञापन पढा था ओर अजीब से जोश में भरा कमरे के दरवाजे की तरफ घूमा...और घूमते ही धक्क-सा रह गया क्योंकि नजर दरवाजे पर खडी आरती पर पडी थी ।

उसी की तरफ देख रही थी वह ।

"अ....आरती...आरती ।” पगलाया-सा वह उसकी तरफ वढ़ता वोला-"जानती हो अभी-अभी मैंने किससे वात की?”

संभालने की लाख चेष्टाओ के वावजूद आरती की आवाज़ लरज गई थी ।

केवल ये शब्द निकल सके उसके मुंह से-"ज़-जानती हू ।"

“बताओ ?” लहजा रोमांचित था…“किससे ?"

“नाज़नीन से ।"

“हां । नाज़नीन से । उससे, जिससे वात करने के वारे में में सोच तक नहीं सकता था । सोच भी कैसे सकता था ! मेरी जानकारी के मुताबिक तो वह मर चुकी थी मगर नहीं आरती...वह मरी नहीं हे । जिंदा हे । अभीअभी मैंने खुद उससे वात की हे ।" जावेद की दीवानगी देखकर आरती की आंखें भर आइ थीं । अपनी आवाज़ का और ज्यादा लरजन सै राकने की कोशिश के साथ उसने कहा-"खुद को संभाल जावेद, कहीँ ऐसा न ही कि खुशी की ज्यादती के कारण तू पागल ही हो जाए ।”

"हां...हां । मेरी यही हालत है आरती ।" जावेद उसक कंधे पकढ़ कर नाचता हुआ सा कहता चला गया था-"सचमुच मैं दुरी के कारण पागल हो सकता हू और हाऊ क्य़ो नहीं, नाज़नीन मेरी जिंदगी है आरती, वही खो गइ थी । जिसकी जिंदगी हीँ खो गई हो वह भला जिंदा कैसे रह सकता हू ! मैं जिंदा था भी कहाँ ? मैं तो प्रतिशोध की आग में सुलगता एक शोला भर था । समझ नहीं पा रहा था कि ये आग जब बुझ जाएगी तो मेरे जीवन का मकसद क्या रह जाएगा ! किसके लिए सांसें लूंगा मै । मगर अब...जवकि मुझ पता है ईक मेरी नाज़नीन इस दुनिया में हे ता मेरी जिदगी क्रो मकसद मिल गया हें ।”

आरती चुप रह गई ।

कोशिश कै वावजूद कुछ न बोल सकी थी वह । दिल में हूक स्री उठी । जी चाह रहा था कि दहाड़े मार मारकर रो पड़े ।

मगर, हालात उसे ऐसा भी तो न करने दे रहे थे । जावेद के पोर पोर से एक्साइटमेंट की चिंगारियां इस कदर फूट रही थीं कि आरती के दिल की हालत की तो बात ही दूर, उसे तो उसकी आंखों में डबडबा रहे आंसू तक नज़र न आ रहे थे । अपनी ही खुशियां के रथ पर सवार वह कहता चला गया था…"हम बहुत ही जल्द नाजनीन से मिलेंगे आरती । तुम भी । तुम्हें भी मिलाऊंगा में उससे । तुम देखना-वो कितनी प्यारी है ।" नौशाद अंसारी ने इस सबाल के साथ कमरे में कदम रखा था…"कौन कितनी प्यारी हे भाइ ?"

"मैँ नाजनीन की बात कर रहा हूँचाचू । उसी नाजनीन की जिसके वारे में तुम्हें विस्तार से बता चुका हू । जिसकी वज़ह से मैंने उन तीनों हरामजादों को मोत के घाट उतारा था ।'"

"पर वो तो.. .

“नहीं चाचू...नहीँ । यो जिंदा है । मैँने अभी अभी उससे बात क्री है । उसने खुद मेरी तलाश के लिए इश्तिहार दिया है ।'" दीवानगी के आलम में अब जावेद वहीँ सबकुछ नौशाद अंसारी से कहता चला गया जो कुछ देर पहले आरती से कहा था और. ..सच्चाइं ये है कि आरती उस सबको सुन न सकी । फूट फूटकर रोने की अपनी इच्छा को पूरी करने कं लिए वह कमरे से बाहर की तरफ भागती चली गई ।

जावेद जो कुछ जिस अंदाज में बता रहा था उसे सुनकर नौशाद अंसारी भी अवाक रह गया क्योकि चार ही दिन में वह समझ चुका था कि आरती जावेद से मुहब्बत करती है । उसे आरती का कमरे से भाग जाना भी समझ में आ गया ।

उस सबके बारे में वह जावेद से कहना चाहता था मगर...जावेद इस वक्त ऐसे नशे में था कि नौशाद को लगा…इस वक्त वेसा कुछ कहना बेकार है । कुछ भी सुनने के मूड में नजर नहीं आ रहा था वह । जब चुप हुआ तो नौशाद वोला…"ये सच हे तो बहुत खुशी की बात है लेकिन हमेँ इस बात पर भी गौर कर लेना चाहिए कि कहीँ यह दुश्मन की चाल न हो ।'"

"कर चुका हूं । बहुत अच्छी तरह से गोर कर चुका हूं ।'" जावेद का एक्साइटमेंट कम होने का नाम न ले रहा था-"अपनी नाजनीन की आवाज पहचानने में में कोइ भूल नहीं कर सकता । फिर भी, मेंने ऐसे अनेक सबाल किए जिनके ज़वाब केवल उसे पता हो सकते थे । सबके जबाब दुरुस्त थे। बलविंदर सिंह आऊट आफ इंडिया हैं । फिर भी मैंने नाजनीन से उनका नंबर एसएमएस करने कै लिए कहा है । वे बाहर हुए तो स्वीच आफ़ आएगा ।"

नौशाद अंसारी खामोश रह गया ।

तभी, जावेद के मोबाइल पर मेसेज आया ।

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नाजनीन से मिलने की कल्पना मात्र से जावेद कै समूचे जिस्म में रोमाच की लहरें दौड़ जाती थीं । उसे बुलाने के लिए उसने भूलभुलैया नाम की जगह चुनी । वह जगह करांची के दक्षिण में, शहर से करीब दस किलोमीटर दूर थी । दूर दूर से लोग उसे केवल इसलिए देखने आते थे क्योकि वह सचमुच की भूलभुलया थी । लोग उसमें खो जाते थे । दो चार मोढ़ पार करने कै बाद ही भूल जाते थे कि किधर से आए हैँ और बाहर निकलने कं लिए किधर जाना है । अंतत: लोग गार्डस की मदद से बाहर निकल पाते थे । यह सावधानी जावेद ने इसलिए बरती थी क्योंकि नौशाद ने बार बार उसके ज़हन में यह बात डाली थी कि विज्ञापन उसे फंसाने कै लिए दुश्मन की चाल भी हो सकता हैं । उसने सोचा था-यदि ऐसा हुआ तो दुश्मन क्रो भूलभुलैया में भटका देगा । इसके लिए उसने पूरा अध्ययन आर मुकम्मल तैयारी की थी बल्कि यह कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा फि नाजनीन को किसी स्पाट पर बुलाने से पहले ही उसने करांची ओर उसके आसपास की खाक छान मारी थी ।

भूलभुलैया का नाम उसकी खुवी और यह जानने कें बाद किया था कि रात के वक्त वहा सिक्यारिटी नहीं रहती । रहती भी क्यों ? चुराने कै वहां था ही क्या ?

वह दिन मेँ वहां टूरिस्ट बनकर आया था और इसमें कोई शक नहीं कि आम टूरिस्ट की तरह वह भी खो गया था ।

गाइड की मदद से ही बाहर निकल सका मगर जिन रास्तों का इस्तेमाल करकै गाइड ने बाहर निकाला था, जावेद ने चालाकी से उन रास्तों पर जेब में पहले ही रखकर लाए गए फास्फोरस के दुकड़े डाल दिए थे ताकि रात के वक्त वे उसे रास्ता बता सकें ।

नाजनीन को रात कै एक बजे बुलाया था जबकि नौशाद अंसारी और आरती के साथ वह बारह बजे ही भूलभुलेया पहुंच गया ।

नौशाद और आरती कें साथ इसलिए क्योंकि दोनों मेँ से किसी ने भी उसे अकेले नहीं आने दिया था । कहा था कि अगर ये दुश्मन की कोई चाल हुईं और उसने किसी किस्म का खतरा उत्पन्न करने की कोशिश की तो वे उसकी मदद करेंगे ।

अर्थात् यह कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा कि मज़बूरी में उन्हें साथ लाना पड़ा था लेकिन दोनों से यह वचन ले लिया था कि बगैर जरूरत कें वे सामने नहीं आएंगे, अपने छुपे हुए स्थान पर ही बने रहेंगे ।

दोनों ने स्वाकृति दी । वे छुप गए जबकि जावेद भूलभुलैया के एंट्री गेट पर खडा होकर नाजनीन का इंतजार करने लगा । करीब साढे बारह बजे किसी ने उसकी कमर पर हल्की सी थपकी दी ।

वह तेजी से पलटा आर...मोगली क्रो देखकर वुरी तरह चौंका ।

मुंह से भले हीँ-"तुम??'" शब्द निकला हो परंतु यह कहा जाए तो जरा भी गलत न होगा कि उसे यकीन न आया कि आंखों के सामने मोगली खडा हे ।

क्षण मात्र में बहुत सारे विचार दिमाग में फिरकनी की मानिंद घूम गए । उनसे घिरा अभी वह कुछ बोल भी न पाया था कि मोगली ने कहा-"देखा जावेद शाब ? हमने आपको ढूंढ ही लिया ।"

"त तुम ! तुम यहां मोगली !" जावेद की जुबान मानो लकवे से बाहर निकली-"य यहां कैसे पहुंच गए तुम?”

'हैरत तो आपकी होनी ही चाहिए क्योंकि आप हमें हिंदुस्तान में छोढ़ आए थे मगर हमने आपकी...

"क्या नाजनीन तुम्हारे ही साथ है?"

इस सवाल का जबाव नहीं दिया मोगली ने । बस देखता रहा जावेद की तरफ़ ।

जबकि जावेद के दिमाग ने तुरंत ही यह कल्पना कर ली थी कि-नाजनीन उसी कै साथ पाकिस्तान आइ होगी ।

"जवाब दो मोगली ।” वह व्यग्र हो उठा…"कहां है नाजनीन?”

"नाजनीन नहीं हे जावेद बेटे ।" भूलभुलैया की एक दीवार के पीछे से किबला निकलकर सामने आया…"हम लोग हैं ।”

"क क्रिबला चाचा !" जावेद अपने हलक से निकलने वाली हेरत से भरी चीख को रोक न सका था…"तुम ! तुम दोनों साथ !"

"हां जावेद शाब ।'" मोगली बोला-“हम दोनों शाथ ।'"

"पर कैसे ? कैसे हो गया ये चमत्कार ?'

“शब बताएंगे, आप आश्चर्य के शागर से तो बाहर आ जाइए !'"

इसमें शक नहीं कि इस सच्चाइ ने उसे निराश किया था कि उसे यहां बुलाने बाली नाजनीन नहीँ थी लेकिन यह हकीकत आश्चर्य कें सागर में डुबोती चली गई कि बुलाने वाले मोगली और किवला थे ।

यह ऐसी बात थी जिस पर वह उन दोनों को सामने देखने के बावजूद न कर पा रहा था । मुंह से शब्द फिसलते चले गए थे…"मैंने तो फोन पर नाजनीन की आवाज सुनी थी !"

"वो मेरी आवाज़ थी ।'" माहोल में नाजनीन की आवाज गूंजी ।

जावेद फिरकनी की मानिंद घूमा ।

एक दीवार की ब्रेक से प्रकट होते हुए विकास ने नाजनीन की ही आवाज में कहा- "मैं अपने कंठ से किसी की भी आवाज बनाकर निकालने में माहिर हू।"

जावेद की जुबान तालु से जा चिपकी ।

विकास को ऐसी नज़रों से देखता रह गया जेसे संसार र्के आठवें आश्चर्य को देख रहा हो ।

काफी देर बाद, बडी मुश्किल से पूछ सका…"त तुम?"

"मुझे विकास कहते हें ।'"

किबला बोला…"ये इंडिया कें शहर राजनगर से आए हैं । शुरू में इन्होने और मोगली ने मुझे अपना गलत परिचय दिया था । कहा था कि ये देवांश और अर्जुन हैं लेकिन गलत परिचय के पीछे इनकी कोई दुर्भावना न थी । केवल इसलिए उन नामों का सहारा लिया था क्योंकि उस वक्त मैं इनकी बात सुनने की मानसिक अवस्था में न था । बाद में असली परिचय दिया ।"

"असती परिचय ?"

"उस पर बाद में बात करेंगे ।'" विकास बोला-"फिलहाल बस इतना बताना है कि पहलगाम में मोगली से वह पता लगा जो तुम्हारे साथ इंडिया में हुआ था । हम दोनों रशीदपुर पहुचे । वहा' किवला से वह सव पता लगा जो पाकिस्तान में हुआ था । हम तीनों तुमसे मिलना चाहते थे मगर नहीं मालूम था कि तुम कहां हो । तुम तक पहुचने के लिए अखबार में नाजनीन के नाम से विज्ञापन देने का आइडिया मेरा ही था।”

“नाजनीन की आवाज की नकल ?"

"मोगली ने उसकी आवाज का टेप सुनाया था और मेरे लिए उतना काफी था । मैं तो तुम्हारी आवाज में भी बात कर सकता हूं ।" बिकास ने अंतिम वाक्य जावेद की आवाज में ही बोला था।

जावेद एक बार फिर हैरत से उसकी तरफ देखता रह गया ।

किबला ने कहा-"झेलम की एक भंवर ने मुझे तुमसे अलग कर दिया था जावेद । बाद में घर वापस पहुंचा तो...

जावेद ने कसकर आंखं बंद कर ली। मुटिठयां र्भिचत्ती चली गइ थीं ।

दांतों पर दांत जमाकर कहता चला गया वह-"मैं बेहोश हो गया था । उससे पहले का सबकुछ याद है और उसके बाद का सब कुछ पता है क्योकि आरती और गिरधर चाचा ने बता दिया था । उन्होंने कहा था कि…उन दरिंदों कै चंगुल से असल में मुझे तुम्ही ने बचाया था । तुन्हीं थे जो हथकडी और वेडियों में ज़कड़े मेरे बेहोश जिस्म को उनके बीच से निकालकर टेरेस पर पहुचे थे । बहा पहले से गिरधर चाचा और आरती मोजूद थे। तुम तीनों मुझे लेकर भागे । नदी के तेज़ बहाव ने तुम्हें उनसे जुदा कर दिया ।”

“सच्चाइ यही है ।"

"मुझे बताओ किबला चाचा, घर वापस पहुंचकर तुमने क्या देखा ? अम्मी, अब्बा और सुंरेया की लाशों का क्या हुआ था? "

किबला ने बताया और...सुनते सुनते जावेद की हालत ऐसी हो गई जैसे उसे दुनिया के सबसे दर्दनाक टार्चर से गुजारा जा रहा हो । चेहरा भभकने लगा था उसका । जिस्म का रोंया रोंया ख़ड़ा हो गया और आंखों मेँ लहूगर्दिंश करने लगा था ।

विकास ने कहा-“किबला ने मुझे ओर मोगली को यही सब बताया या । हमने उसी समय तुम्हें ढूंढ निकालने और तुमसे मिलने का निश्चय कर लिया था ।"

जावेद ने मोगली ओर किबला क्री तरफ इशारा करते हुए कहा था…“इन दोनों की बात तो समझ में आती है मगर मैं ये नहीं समझ पा रहा हूकि तुम क्यों मिलना चाहत थे ?'

"बस यूं समझ कि मैं भी तुम्हारे ही मिजाज का हू । बहुत से लोग यह मानते हैं कि आजकल तुम जो कुछ कर रहे हो, ठीक नहीं कर रहे जबकि मेरो समझ के मुताबिक इकरामुद्दीन, गुलहसन और शफ्फाक शाही के साथ ठीक वहीँ होना चाहिए था जो तुमने किया, तुम्हारी जगह मैें होता तो मै भी यही करता और अब...हाजी गल्ला को भी मोत कै घाट उतारने से पहले चैन की सांस नहीं है ।'"

"ये मेरे सवाल का ज़वाब नहीँ हे ।"

"मतलब ? ”

"जो कुछ मैं कर रहा हू कुछ लोग उसे ठीक मान सकते हैं, कुछ लोग नहीं । ये टापिक अलग है मगर मैंने यह पूछा है कि मुझसे मिलने के लिए तुम राजनगर से पहलगाम, पहलगाम से रशीदनगर क्यों पहुचे । मुझे ढूंढने के लिए यह अजीब तरकीब क्यों इस्तेमाल किया ?"

"इतना ही नहीँ जावेद शाब ।'" मोगली बोला…'थे शुनोगे तो हैरत मान जाओगे कि ये हिंदुस्तान शे पाकिस्तान कैशे पहुचे ?”

"कैसे ? "

"झेलम तैरते हुए ।”

"क क्या ?" जावेद को अपने कानों पर विश्वास न हुआ ।

जबकि मोगली बोला…"मैंने जो कहा हंडरेड परशेंट शच है ।"

और इसके बाद…वह अक्षरश: सबकुछ बताता चला गया । वह जैसे जैसे बताता गया, जावेद की आंखें हैरत से फटती चली गई।

उसे इस बात पर यकीन करना मुश्किल हो गया या कि उन्होंने भारत से पाकिस्तान तक का सफर झेलम में तैरकर किया होगा ।

मोगली की बात खत्म होते विकास के लिए उसकी आखों में ऐसे भाव उभर आए थे जेसे लोगों की आंखों में मिस्र के पिरामिडों को देखकर उभर आते हैं ।

बोला-"अब तो इस सवाल का ज़वाब पाना मेरे लिए और भी ज्यादा जरूरी हो गया हे कि तुम मुझसे क्यों मिलना चाहते थे ? आखिर क्या कारण है जिसकी वजह से मुझसे मिलने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली?"

“सच्चाई बताने के लिए तैयार हू मगर एक शर्त पर ।"

"" शर्त ?"

"जो मैं कहुं, उसे सुनकर बिदकना मत । धैर्यपूर्वक सुनना ।"

जावेद उलझ सा गया । मुंह से निकला-"मैं समझा नहीं ।'"

मैं एक जासूस हू ।"

"ज जासूस ।” जावेद की समस्त नसें तन गई ।

विकास बोला-"इंडियन सीक्रेट एजेंट ।'"
 
पलक झपकते ही जावेद के हाथ में रिवाल्वर नजर आने लगा । चेहरे पर चटटानी कठोरता । हलक से आवाज नहीं, गुर्राहट निकली थी-"मतलब मुझे गिरफ्तार करने आए हो ?”

“इसीलिए कहा था कि मेरी बात घैर्यंपूर्वक सुनना । अधूरी बात सुनकर किसी नतीजे पर मत पहुचो । पूरी बात सुनने के बाद फैसला करना कि तुम्हें मेरे साथ कैसे पेश आना है ।'"

"बोलो ।" लहजा बेहद सपाट था ।

"तुम्हारा गुरु ।” जावेद गुर्राया था-“इडियन सीक्रे एजेंट ।”

"क क्या बात कर रहे हो !" बिकास हकला उठा-"वे तुम्हारे शिकार कैसे ओर क्यों हो सकते हैं?”

"क्योकि उसने मेरे गिरधर चाचा को मारा है ।'"

“क्या ?"

इसमें शक नहीँ कि बिकास बहुत बुरी तरह चौंका था-"य ये क्या कह रहे हो तुम ? विजय गुरु ने तुम्हारे गिरधर चाचा क्रो मार डाला ! कैसे हो सकता है ऐसा।। विजय गुरु क्रो तो मै ऐसी कैद में डालकर आया हू कि...

"या तो तुम झूठ बोल रहे हो मिस्टर विकास या तुम्हारा कथित गुरु तुम्हारी कैद से फरार हो चुका हे क्योंकि इन दिनों वह पाक मेँ हे । मै उससे मिल चुका हू । मेरी आंखों के सामने उसने गिरधर चाचा के जिस्म में रिवाल्वर की आग भरी हे ओर अब. .. ।'" जावेद के लहजे से आग बरस रही थी…"मैं किसी हालत यें उसे नहीं छोडूंगा । जितना बड़ा गुनाह गजेंद्र, अविनाश, शिवालकर, गुलहसन, इकरामूद्दीन शफ्फाक शाही आर हाजी गल्ला ने किया हे, उतना ही बडा गुनाह उस विजय का भी हे जिसे तुम अपना गुरु बता रहे हो। उसे मोत कं घाट उतारे वगेर मुझे चेन नहीं मिलेगा ।"

असमंजस में फसे बिकास ने पूछा-"क्रोई भ्रम तो नहीं तुम्हें । पक्के तोर पर जानते हो कि वे बिजय गुरु ही थे ?”

"वह वहीँ था ।'"

"अगर ये सच है जावेद कि उन्होंनै बगैर किसी कुसूर कै गिरधर की हत्या की है तो भले ही वे मेरे गुरु हों मगर मैं तुम्हारा साथ दूंगा । जैसा कि पहले ही बता चुका हू-हम गुरु चेले जरूर हैं लेकिन हमारे विचारों में जमीन आसमान का अंतर है ।"

कुछ देर जावेद बिकास क्रो ऐसी नजरों से देखता रहा जेसे पता लगाने की क्रोशिश कर रहा हो कि वह सच बोल रहा है अथवा उसे भरमाने की कोशिश कर रहा है !

बोला…"इस सबके बावजूद मेरी समझ में अब भी नहीं आया कि तुम मुझसे क्यों मिलना चाह रहे थे ?"

"जो मैं कहूंगा, हो सकता है अभी वह बात तुम्हारी समझ में न आए मगर सच्चाइ' ये है कि इस वक्त तुम भारत और पाक नाम के चक्की के पाटों के बीच मेँ र्फसे हुए हो । जिस मुल्क कै हाथ लग गए वह फांसी से कम सजा नहीं देगा ।”

"मुझे परवाह नहीं है ।"

" मुझे है ।"

"क्यों ?”

"क्योंकि मैं किसी निर्दोष पर जुल्म होते नहीं देख सकता ।"

"मसीहा हो ? "

"इतना पवित्र शब्द मैं अपने लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता ।”

“जिस तरह बात कर रहे हो, हुए तो वही । कितने निर्दोषों पर जुल्म होते हैँ । किस किस कीं गारंटी लोगे?”

"आदमी सिर्फ उनकी गारंटी ले सकता है जो उसकी नालिज मेँ आएं और तुम्हारा मामला मेरी नालिज में आ चुका है ।"

"क्या करने का इरादा रखते हो मेरे लिए ?"

"कहा न…तुम्हें इंसाफ दिलाऊंगा ।'"

"इंसाफ ! "

"जुल्म तो तुम पर पाकिस्तान में भी हुआ है मगर इस मामले में इसलिए कुछ नहीं कर सकता क्योंकि इस मुल्क का नागरिक नहीं हू ...हिंदुस्तान का नागरिक होने के नाते वादा करता हू जावेद कि जो जुल्म तुम पर वहा हुए हैं उनके लिए वहा' की सरकार तुमसे माफी मांगेगी । तुम्हें अपना सम्मानित नागरिक घोषित करेगी ओर पुन: पुलिस इंस्पेक्टर की वर्दी देगी ।'"

"हुंह !" जावेद का अंदाज धिघकारने वाला था-"मै इनमें से किसी भी चीज का ख्वाहिशमंद नहीं हू ।'"

"तुम्हारा गुस्सा और नाराजगी अपनी जगह वाजिब हे लेकिन दोस्त, जव ठंडे दिमाग से सोचोगे तो पाओगे कि अपने देश को माफ करने के अलावा कोइ चारा नहीं है । चंद गंदे लोगों के कारण तुम हमेशा कै लिए उस मुल्क से नाराज़ नहीँ हो सकते जो अर्जुन और देबांश जसे लोगों से भरा पड़ा है ।"

अर्जुन ओर देबांश को याद करके जावेद की आंखें भर आईं थीं लेकिन उसने जल्दी ही खुद को भावुकता कं भंवर से निकालते हुए कहा…"क्या जरूरी हे कि तुम सच ही बोल रहे हो ! ये भी तो हो सकता हे कि ये मीठी मीठी बातें र्फसाने के लिए हों !"

"मेरे ख्याल से ऐसा नहीं है जावेद ।'" इन शब्दों के साथ नौशाद अंसारी छुपे हुए स्थान से बाहर आया ।

"म... मंत्रीजी आप ? '" उसे देखकर विकास चोंका ।

"हा बेटे, हम ही हैं । ”

"आप यहा कैसे? आपको तो...

" इसमें शक नहीं कि अपनी भरपूर कोशिश के बावजूद तुम्हारे पिता हमें किडनेप होने से नहीं रोक सके थे। हमें तो यह तक पता नहीँ लगा कि बेहोशी की अवस्था में हमे पाकिस्तान में लाकर हाजी गल्ला की कैद में डाल दिया गया हे । यह बात हमेँ मिस्टर विजय ने बताई थी । तब, जबकि उन्हें भी कैद करने के लिए वहीँ लाया गया बल्कि कैद कर लिए गए ।"

"विजय गुरु को हाजी गल्ला ने...

"सिर्फ़ हैडक्वाटर उसका था, हमें भी और मिस्टर विजय को भी कैद करने वाले असल में पाकिस्तानी जासूस नुसरत तुगलक थे ।"

"क्या गुरु अब भी उनकी कैद में हैं ? ”

"सच पूछो तो एक रात भी वहां नहीं रहे बल्कि अगर ये कहू तो ज्यादा मुनासिब होगा कि वे वहां गए ही मुझे लेने थे ।"

"मैँ समझा नहीं, ज़रां खुलकर बताइए।”

"जिस दिन मिस्टर बिजय वहां पहुंचे, उसी रात अलफासे उन्हें वहां से निकालने पहुंच गया था ।"

"अ अलफा'से गुरु । वे भी आ फंसे हैं इस झमेले में?”

"अलफांसे ने हाजी गल्ला के रहमान नाम के आदमी को कब्जे मेँ कर लिया था, उसकी मदद से वह वहां पहुचा जहां मिस्टर विजय थे और फिर मिस्टर बिजय मुझे साथ लेकर वहां से फरार हो गए ।"

"क्या उसके हेडक्वार्टर से फरार होना इतना आसान था ?"

नौशाद अंसारी ने कुछ कहने कै लिए मुह खोला ही था कि उसे आगे कुछ भी बताने की मंशा से रोकने हेतु जावेद बोला…"डिटेल में जाने से कोइ फायदा नहीं मिस्टर बिकास, इतना काफी है कि उसके वाद तुम्हारे गुरु ने मुझे धमकाने क्री कोशिश की । कहा कि यदि मैंने खुद को उसके हवाले नहीं किया तो वह चाचूको मार डालेगा । मै वहां पहुच गया जहां उसने बुलाया था और नौशाद चाचूको उसके तथा कथित अलफासे कै चंगुल से निकाल लाया । यह अलग बात है कि उस मिशन में चाचा शहीद हो गए परंतु जेसा कि बता चुका हू…उनकी मौत का बदला में लेकर रहूंगा ।"

"मेरे ख्याल से हम थोड़ा भटक गए हैं जावेद ।" नौशाद अंसारी ने कहा-“छुपी हुईं जगह से हम तुम्हें यह बताने बाहर आए थे कि बिकास ने जो कुछ कहा है, उसमें रत्ती बराबर भी झूठ नहीं हे । यह वैसे ही करेक्टर का लडका है जैसा खुद क्रो बताया है । यकीनन मिस्टर बिजय ओर ये गुरु चेले हैं लेकिन अलग सोचों कै कारण अक्सर इनका टकराव हो जाता हे ।”

"क्या कहना चाहते हो चाचू?"

"बगैर लाग लपेट के यह कि इसे हमेँ अपने साथ रखना चाहिए यह हमें धोखा नहीं देगा बल्कि कुछ मदद ही करेगा और जावेद, गुस्से मेँ इस वक्त तुम्हारी समझ में भले ही न आए मगर अपने मुल्क से रूठकर कभी कोइ खुश नहीँ रह सकता ।"

जावेद की आंखें भर आई ।

यह कहती हुइ आरती भी बाहर आ गई कि-“लगता है कि अब मुझे भी छुपे रहने की जरूरत नहीं है क्योंकि यहां दुश्मन कोई भी नहीं है । सब दोस्त ही दोस्त हैँ । ”

"अ आरती । आरती बेटी ।" किबला ने ज़ज़बाती अंदाज में आगे बढकर उसे गले लगा लिया था ।

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बात सुबह के नौ बजे की हे ।

विकास, जावेद, नोशाद, किबला ओर मोगली एक आलीशान कोठी की बाल्कनी में बैठे थे ।

जावेद के हाथों में आज का अखबार था और विकास दूर तक नजर आने वाले दृश्य को देख रहा था…

कराची शहर के पूर्व में स्थित वह एक अर्धबिकसित कालोनी थी ।

मुश्किल से दस परसेंट मकान बनकर तैयार हुए थे ।

चालीस परसेंट निमाणाधीन थे ओर बाकी प्लाटस की शक्ल में पड़े थे ।

निर्माण कार्य तेजी से चालू था ओर कहा जा सकता था कि एक साल में कालोनी पूरी तरह बस जाएगी ।

"जावेद ।" विकास बोला-“वुरां न मानो तो एक बात पूछू?”

"तुम्हें चाचूका विश्वास प्राप्त हे ।” जावेद ने अखबार से नजरें हटाकर एक बार नौशाद अंसारी की त्तरफ देखा और फिर मुस्कराते हुए विकास केचेहरे पर दृष्टि गड़ाता बोला…"जो चाहो पूछो ।"

"' ठिकाने कै रूप में तुमने इसी कोठी को क्यों चुना ?'

"कोई बुराई हे इसमें ? "

"जिस लेबल पर पाकिस्तान की सरकार को तुम्हारी तलाश हे, यहां तक कि नुसरत तुगलक जैसे शातिर तुम्हारे पीछे पड़े हैं । उस अवस्था में इस ठिकाने को मै ज्यादा सुरक्षित नहीं समझता । तुम किसी भी समय उनकी नज़रों में आ सकते हो ।"

"मुझें ऐसा नहीं लगता ।" जावेद के होठों पर मुस्कान थी ।

"वजह ? "

"यहां रहने वो कईं फायदे हैँ । पहला-अभी यहा ज्यादा लोग नहीं रहते । मतलब, आप कम से कम लोगों की नज़रों में आते हैं । दूसरा-जिन लोगों का जिक्र तुमने किया यानी जिन लोगों को मेरी तलाश हे, वे सोच भी नहीँ सकते कि मै इस तरह खुलेआम रह रहा होऊंगा । उनकें ख्याल से तो मैंने खुद को चूहे की तरह किसी बिल में छुपा रखा होगा । बस इतनी सावधानी पड़ती है कि जब दिन के वक्त बाहर निकलता हूतो असली सूरत में नहीं होता । उस सूरत में मेरा नाम श्रवण होता है यानी हिंदूहोता हू । आरती को शक्ल चेंज करने की जरुरत नहीं पड़ती । न ही गिरधर चाचा को पढ़ती थी क्योकि इनकी शक्ल टीवी पर नहीं दिखाई गइ है । कोइ पडोसी न होने क कारण भी हम यहीं सुरक्षित हैँ ।"

"इस एंगिल से देखा जाए तो बात में वजन है मगर इतनी बडी कोठी तुम्हारे हाथ कहां से लग गई ?"

“इसे एक पीसीएस अफसर ने अपनी अवैध कमाई से बनवाया हे अथात् वह किसी को भनक नहीं लगने देना चाहता कि उसकी कहीँ कोई कोठी भी है । इन दिनों वह इस्लामाबाद में पोस्टिड है । पंद्रह दिन पहले मैं, गिरधर चाचा और आरती भी वहीं थे । शफ्फाक शाही के बाद हमारे निशाने पर हाजी गल्ला था यानी हमें करांची आना था । सवाल था-करांची में ठिकाना कहां बनाएं । गिरधर चाचा पीसीएस अफसर क्रो पहले से जानते थे इसलिए उससे मिले । कहा कि मेरा बेटा साफ्टवेयर इंजीनियर है । उसका ट्रांसफर करांची हो गया है । वह शादीशुदा है यानी मेरी बहू भी है । करांची में रहने के लिए किराए का मकान चाहिए । चाचा जानते ही थे कि उसे भी किसी ऐसे किराएदार की तलाश है जो इस राज को राज रख सकै कि कोठी किसकी है । सो, बात बन गई । उसने हमारे बारे में ज्यादा पूछताछ नहीं की बल्कि उल्टा यह कहा कि हम किसी क्रो न बताएं कि कोठी उसकी है । हमने उसे तीन महीने का किराया दे दिया ।"

विकास ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि एक ट्रे में छ: मग रखे आरती नमूदार हुईं । मगों से भाप उठ रहीँ थी जो बता रही थी कि उनमें गर्मागर्मं चाय हे ।

वह खुद भी वहीं बेठ गइ और छओं चाय पीने लगे ।

उस पोजीशन मेँ मुश्किल से एक ही मिनट गुजरा था कि एक छोटी सी कार कोठी के लोहे वाले गेट कै बाहर रुकी ।

उससे निकलकर एक ऐसा आदमी गेट पर पहुंचा जिसने अपने चेहरे के आंखों से नीचे के हिस्से को एक रुमाल से ढक रखा था ।

जाहिर हे…छओं चौंके ।

उस शख्स ने कालबेल के स्वीच पर अंगूठा रखा । परिणाम स्वरूप मुकम्मल कोठी में कालबेल क्री आवाज गूंज उठी।

"कोन हे ये ?" क*ई के मुंह से एक साथ निकला ।

जावेद उसे गोर से देख रहा था, जेसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो और फिर, अचानक वह बुरी तरह उछल पड़ा । मुंह से शब्द जैसे खुद फिसलते चले गए थे…"अरे, ये तो आफताब खान है ?"

"कौन आफताब खान?" पांचों ने एकसाथ पूछा ।

"आईएसआइ की इस्लामाबाद ब्रांच का चीफ ।"" वह कहता चला गया…"ब्रिगेडियर गुलहसन की सुरक्षा की जिम्मेदारी इसी की थी । मैं उसे इसी के पंजे से निकालकर वहां ले गया था जहा उसे कत्ल किया । वहीँ है... वही है आरती । भले ही इसने अपने वेहरे पर नकाब ढक रखा हे मगर मैं इसे लाखों में पहचान सकता हू ।"

"यहा क्यों आया है?" एक बार फिर सभी के मुंह से निकला ।

जावेद बोला…"उसे पता कैसे लगा कि मैं यहां हूं?"

एक पल के लिए तो सन्नाटा छा गया वहां ।

सबके दिमागों मेँ खलबली ।

कालबेल की आवाज पुन: गूंजी क्योकिं उसने एक बार फिर स्वीच पर अंगूठा रखा था । कोण ऐसा था कि वे भले ही उसे देख सकते हो लेकिन वह उन्हें नहीँ देख सकता था ।

नौशाद, आरती, किबला और मोगली के चेहरों पर जहां आतंक नजर आने लगा था वहीँ, जावेद के चेहरे पर यह जानने की जिज्ञासा थी कि आफ्ताब आखिर वहा पहुंच कैसे गया । बिकास ने बहुत ही संतुलित लहजे में कहा था-"हम लोगों को आतंकित होने की नहीँ बल्कि सतर्कं हो जाने की जरूरत है । कोइ न कोइ बात तो है जो वह यहां पहुंचा है लेकिन अभी मुझे ख़तरे जैसी कोइ बात नजर नहीं आती क्योंकि वह कालबेल बजा रहा है । मतलब-हमारी जानकारी में अंदर आना चाहता । खतरे वाली बात होती तो वह इस तरह नहीं आता बल्कि रात के अंधेरे में, फोर्स के साथ आता ।"

जावेद ने एक पल सोचा ।

फिर बोला-"बात तो ठीक हे ।”

"तुम सब यहीं रहो । मैं गेट पर जाकर उससे बात करता हू ।"

"क क्या बात करोगे?" नौशाद के मुह से निकला ।

"जानने की कोशिश करूंगा कि वह यहा* क्यों आया है ।"'

"इसमे जानना ही क्या है?" आरती बोली…“दुश्मन है । हमारे ठिकाने पर आया है । इसी से जाहिर है कि...

“नहीं आरती ।" बिकास ने उसकी बात काटी…“हमेँ इस कदर नहीँ डरना चाहिए । वेसे भी, कम से कम अभी तक तो वह अकेला ही नजर आ रहा है और हम छ: हैं । मेँ देखता हूं।" कहने के बाद वह किसी की भी सुनने के लिए वहां रुका नहीं था ।

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बिकास लोहे वाले गेट के करीब पहुचा लेकिन उसे खोला नहीं, इधर ही से गेट कें उस तरफ खड़े आफताब से पूछा… "कहिए ? "

“मेरा नाम आफ्ताब खान हे ।"" उसने सीधे ओर सपाट लहजे मेँ कहा-"कुछ दिन पहले तक मैं आईएसआइ की इस्लामाबाद ब्राच का चीफ था मगर बर्खास्त कर दिया गया हू ।"

उसके शब्द बिकास के जहन में इसलिए तीर की तरह लगे थे क्योंकि उसने बिल्कुल सच बोला था ।

वह बताया था जो उसके ख्याल से उसे छुपाना चाहिए था मगर चेहरे से अपनी मानसिक अवस्था प्रकट न होने दी उसने ।

उतने ही सीधे ओर सपाट लहजे में कहा-“ किससे मिलना है?"

“तुमसे भी और जावेद से भी ।”

“मुझसे ! मतलब ? '"

"मैं जानता हूकि तुम बिकास हो । इंडियन सीक्रेट एजेंट ।”

इसमें शक नहीं कि उसके अलफाजों ने बिकास के दिमाग में विस्फोट सा किया था । उसका अंदाज ही ऐसा था कि यह कहने की कोई गुंजाइश बाकी न बची थी कि-मैं विकास नहीँ हूं । विकास आगे बात करने के लिए शब्द तलाश ही रहा था कि उसने कहा-"मेरे आने ओर बात करने के तरीके से तुम्हें समझ जाना चाहिए कि मैं यहां तुम लोगों को किसी किस्म का नुकसान पहुचाने नहीं आया हूं ।"

"क्यों आए हो?”

"मैं तुम लोगों के काम आ सकता हूं तुम लोग मेरे ।"

"बात समझ में नहीं आईं ।"

"पूरी बात आराम से बैठकर समझा सकता हू । अंदर ले जाने से पहले जैसे चाहो तलाशी ले सकते हो । हथियार के नाम पर मेरे नाखूनों तक को वढ़ा हुआ नहीं पाओगे । विकास, जावेद या किसी और की तो बात ही छोड़ दो । कम से कम तुम्हें तो खुद पर इतना काॅन्फिडेंस है ही कि एक निहत्या आदमी तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता । वो भी तब, जबकि तुम्हारी जेब मे अब भी रिवॉल्वर हे । चाहो तो इसी वक्त मुझे शूट कर सकते हो ।”

"मेरे काॅन्फिडेंस की बात छोडो ।'" विकास ने उसे बहुत ध्यान से देखते हुए कहा था…“फिलहाल तो मुझे तुम्हारे उस काॅन्फिडेंस की तारीफ करनी होगी जिसके तहत तुम यहां आए हो और इतनी बेबाकी से अपना असली परिचय दिया हे ।"

"किसी समझदार आदमी ने कहा कि सबसे ज्यादा ताकत सच में होती है और इस वक्त मैंने उसी का इस्तेमाल किया है ।"

"कैसे जानते हो कि मैं बिकास हू और हम यहां मिलेंगे ।”

“रात मैें भी भूलभूलैया की एक दीवार के पीछे छूपा था ।"

विकास कै तुरंत पूछा-“तुम वहा क्या कर रहे थे ?'

"ब्रिगेडियर गुलहसन की मौत के कुछ दिन बाद से ही मै जावेद से मिलने का ख्वाहिशमंद था ।"

"क्यों ?"

"वो आराम से बताने की बात है ।”

"जो बता रहे थे वो बताओ ।"

"इसे इत्तफाक ही कहा जाएगा कि मैंने नाज़नीन की तरफ़ से अखबार में दिया गया विज्ञापन पढ़ लिया था । उसे पढते ही मैँ समझ गया कि अगर जावेद की नजर इस पर पढ़ गइ तो वह अखवार में दिए गए नंबर पर संपर्क जरूर करेगा । नुसरत ने वर्खास्त जरूर करा दिया है मगर मेरे पुराने संपर्क आज़ भी जिंदा हें । उन्हीं की मदद से अखबार में दिया गया नंबर सर्विलांस पर लगवाया । इस तरह पता लगा कि नाज़नीन ओर जावेद भूलभुलैया पर मिलने वाले हें । मै भी वहां जा छुपा मगर वहां जावेद को नाज़नीन नहीं बल्कि तुम लोग मिले । मेंने न केवल तुम्हारे बीच हुइ सभी बातें सुनीं बल्कि तुम लोगों को फालो करता हुआ यहा तक भी आया ।"

"खुद को उसी समय प्रकट क्यों नही' किया?"

"मैं जानता था ओर गौर से सोचने पर तुम भी मानोगे कि अगर मैंने उस वक्त वो बेवकूफी कर दी होती तो तुममें से कोई बगैर सोचे समझे मुझे गोली से उडा देता । मुझे यह कहने का मौका न मिलता कि मेरे भूलभुलैया क्री दीवार के पीछे छुपने या तुम लोगों को फालो करने के पीछे कोइ दुर्भावना नहीं थी ।"

बिकास चुप रह गया ।।

क्योकि उसकी बात से सहमत था ।

उसी ने कहा-“सुबह होते ही, दिन के उजाले में, यहां आते ही कालबेल इसलिए बजाइ ताकि कम से कम मुझे देखते ही तुममें से क्रोइ गोली से न उड़ा दे । सोचे कि अगर मैँ किसी दुर्भावना से आया होता तो कालबेल न बजाता ओर मुझे अपनी बात कहने का मौका मिले।"

"वही हो रहा है।"

"बेशक । "

"तुम्हें यह डर क्यों था कि कोई तुम्हें देखते ही उड़ा देगा?”

"भले ही तुममें से कोइ ओर न सही लेकिन जावेद मुझे अच्छी तरह पहचानता है । वह मुझे देखते ही...

“उसके लिए तो तुमने आधे चेहरे क्रो रुमाल से ढक रखा है ।'"

"नहीं ।'" उसके लहजे में एक अजीब सी वेदना थी…"अपने चेहरे को मैंने इसलिए नहीँ ढक रखा कि कोई मुझे पहचान न सके। "

"और किसलिए ढक रखा है ?"

"अंदर । सबके बीच बैठकर न केवल बताऊंगा बल्कि इसे हटाकर भी दिखाऊंगा ।"

"मैं अंदर आने दूंगा, तब न ।"

"क्या तुम्हें अब भी नहीं लगता कि मैं अंदर आने लायक हू? मुझे नहीं पता कि और मै किस तरह ये यकीन दिला सक्ता हूंकि मैं यहां किसी दुर्भावना से नहीं आया हू ।'"

"रुमाल हटाकर दिखाओ ।"

""प्लीज.. प्लीज़ बिकास ।'" अगर यह लिखा जाए तो ज़रा भी गलत न होगा कि आफताब खान गिढ़गिड़ा उठा था-"इसके लिए मज़बूर मत करो मुझे । इसके अलावा और चाहे जेसे इस बात की पुष्टि कर लो कि में यहा किसी को नुकसान पहुंचाने नहीं बल्कि एक खास किस्म की मदद हासिल करने आया हूं।"

विकास ने फैसला लेने में केवल दो सेकिड खर्च किए ।

उसने गेट खोला ।

आफताब क्रो अंदर लिया । हालांकि उसे नहीं लग रहा था कि उसकी तलाशी लेने की ज़रूरत है मगर तलाशी ली क्योकि वह जानता था, बाल्कनी से सबकुछ देखा जा रहा है ।

उनकी तसल्ली के लिए यह दृश्य दिखाना जरूरी था ।

ड्राइंगरूम में बैठा आफताब खान जब सबको उतना संतुष्ट कर चुका जितना विकास को किया था त्तो जावेद ने कहा…"अब बताओ कि तुमने आधे चेहरे पर रूमाल क्यों ढक रखा है ?'

आफताब ने बगैर कुछ कहे, एक झटके से रुमाल हटा लिया और…….ऐसा होते ही वहां एकसाथ कईं चीखें गूँज उठी।

आरती तो अपनी चीख कै बाद दोबारा पलटकर आफताब के बगैर नाक के चेहरे की तरफ देखने तक की हिम्मत न जुटा पाई ।

जावेद भी अवाक रह गया ।

मुंह से निकला-"य ये कैसे हो गया?"

सबने आफ़ताब की आंखों में मचलते आंसूदेखे थे । बहुत ही वेदनायुक्त लहजे में कहा उसने…"नुसरत तुगलक ने किया।” '

"क्यो ?

"क्योंकि मैँ गुलहसन को न बचा सका ।"

"केंवल इसलिए उन्होने तुम्हारी नाक...

"मैंने वहुत कहा. ..बहुत्त कहा उनसे कि मेरी नाकामी की कोई ओर सजा दे दो । फांसी पर चढा दो मुझे । ज़मीन में जिंदा गाड़ दो । जैसे जान ले लो मगर नाक मत काटो ।'" कहता कहता वह फूट फूटकर रोने लगा था…"पर वे नहीं माने । कहने लगे क्रि- तुमने हमारी नाक कटबाइ है, हम तेरी नाक काटेंगे । एक ने मेरे हाथ पेर ज़कढ़ लिए, दूसरे ने चाकूसे नाक काट ली ।” कहने के बाद बहुत देर तक सिसकता रहा वह ।

अपने मुंह से निकलने बाली रोने की आवाज को दबाने के लिए उसी रुमाल को मुह में ठूंसे हुए था जिससे कुछ देर पहले चेहरा छुपा रखा था ।

सिसकियां जब हल्की पडी तो जावेद ने कहा-"मुझे अफसोस है आफ़ताब कि ये सब मेरी वजह से हुआ ।"

"नहीँ, यह सब तुम्हारी वज़ह से नहीं हुआ । जो जुल्म तुम पर और तुम्हारी फैमिली पर हुआ था, उसके बाद तुमने जो कुछ किया, वह तुम्हारा फर्ज था और मेरी डयूटी इस काम पर लगाई गई थी कि तुम अपना फर्ज न निभा पाओ । इसमें कोई शक नहीँ कि पूरी कोशिश कै बावजूद में अपनी डयूटी न निभा पाया । नाकाम हो गया मैं । यह सब होने का असली कारण मेरी नाकामी है । चाहता बस यह था कि भले ही मरी जान ले ली जाए, खुशी-खुशी फांसी पर चढने को 'तैयार था परंतु नाक न काटी जाए. ..मगर उन्होंने मेरी एक न सुनी ।"'

एक बार फिर ऐसा माहौल बन गया कि काफी देर तक कोई कुछ न बोला । फिर, उस खामोशी को बिकास ने यह प्रश्न पूछते हुए तोड़ा-"जावेद से क्यों मिलना चाहते ये?"

"नुसरत तुगलक से बदला लेने कें लिए ।"

सभी चोंकें ।

विकास ने पूछा…"बात समझ में नहीं आईं । कैसा बदला लेना चाहते हो उनसे और उसमें जावेद क्या मदद कर सकता है ?”

आफताब ने जावेद की तरफ दखत्ते हुए कहा था-"मुझे अच्छी तरह मालूम हे कि तुम्हारा अगला टार्गेट हाजी गल्ला है ।"'

" तो ?”

"तुम्हारी सबसे बडी समस्या होगी-उसकै हेडक्वार्टर में घुसना, क्योकिं जब से तुमने शफ्फाक शाही का सफाया किया है तबसे उसने खुद को हेडक्वार्टर में कैद कर लिया है । इस मे से वह बाहर नहीं निकलता कि निकला और तुमने खलास किया । "

“इसमें तुम क्या कर सकते हो?"

“तुम्हें हेडक्वार्टर में, बल्कि उसके बैडरुम में पहुंचा सकता हूं ।"

"क्या वाकइ ? "

"सिफ वहीँ कहूंगा जो कर सकता हू ।”

"कैसे ? "

"मुझे ऐसा गुप्त रास्ता मालूम है जिस पर कोइ सुरक्षागार्ड तैनात नहीं रहता । उसके जरिए उसके बेडरूम तक पहुचा जा सकता है ।"

नौशाद अंसारी बोलने वाला था कि जावेद ने चुप रहने का इशारा करने के साथ कहा…“बड्री अजीब बात कह रहे हो भला ऐसा गेप क्यों _ रखा होगा उसने?"

"अपनी सुरक्षा की खातिर ।"'

"सुरक्षा की खातिर उसने एक ऐसा रास्ता छोड़ रखा है जिस पर एक भी गार्ड नहीं हे यह बात समझ में नहीं आईं । ये क्या कह रहे हो? "

"उसे हमेशा डर सताता रहता है कि एक दिन अमेरिका उसके हेडक्वार्टर पर भी वेसा ही हमला कर सकता हे जेसा ओसामा बिन लादेन के घर पर किया था इसलिए बिशेष रूप स एक ऐसा जोन बनाया हे जहा से ऐन वक्त पर फरार हो जाए ।"

"और वो जोन वो है जहां कोइ गार्ड नहीं होता?"

“हां । '"

“गार्ड न रखने से क्या फायदा?”

"उस रास्ते के बारे में जितने ज्यादा लोगों को पता होगा उसकी गोपनीयता भंग होने की उतनी ही ज्यादा संभावना होगी ।"'

"ओह ।” जावेद के मुंह से निकला-“बात समझ में आइ ।"

“लेकिन गोपनीयता तो उसकी फिर भी भंग है ।” बिकास ने कहा…"जैसे तुम्हें मालूम है ।"'

"क्या तुम्हें पता हे कि उस हेडक्वार्टर का केवल नक्शा हाजी गल्ला के दिमाग की देन है ! असल में उसे बनवाया आईएसआई ने है ! क्योंकि आइंएसआइ ही उसे करांची मेँ पनाह दिए हुए है ।"

“हमेँ इस बारे मेँ क्या मालूम _?"

“हक्रीकत यही है और. .. ।"' आफताब ने गहरी सांस ली…“मैं उस टीम का एक मेंबर हूंजिसकी देख रेख में वह बना था ।"'

"इसका मतलब जो भी टीम मेँ शामिल थे, सबको उस रास्ते के बारे में मालूम होगा !"'

"बेशक । लेकिन वो टीम केंवल दस लोगों की थी । मेरे अलावा नो और थे और…..उन नौ में से कोई भी किसी भी हालत में उस रास्ते के बारे मे जुबान पर नहीं ला सकता । मै भी न लाता । अगर मै आज भी आइएसआइ का मेंबर होता बल्कि...न होता तब भी किसी को इस कै बारे में न बताता मगर मेरे साथ तो हालात ही दूसरे हो गए हैँ । हरामजार्दो ने नाक काट डाली है मेरी ।"

"वो रास्ता समुद्र में खुलता हे न ?" जावेद ने जब यह कहा तो आफ्ताब ने बुरी तरह चोंककर उसकी तरफ देखा । शब्द जेसे मुंह से फिसलते गए-"तुम्हें कैसे मालूम ?”

“चाचू उसी रास्ते कं जरिए वहां से फरार हुए हैँ ।"

"रात, भूलभुलैया पर इनकी ओर बिकास की बातचीत के वक्त मिस्टर विजय और अलफांसे की मदद से इनकै वहां से निकलने का जिक्र तो आया था । यह जिक्र भी आया था कि इस काम में मिस्टर अलफांसे ने किसी रहमान नाम कै आदमी की मदद ली थ्री मगर गुप्त रास्ते के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा था ।"

"उसका जिक्र चाचू करने ही वाले थे कि मैंने इनकी बात काट दी ।" जावेद बोला…“क्योक्रि मैं विकास के सामने उस रास्ते का जिक्र नहीं चाहता था । कुछ देर पहल भी चाचू वही गलती करने वाले थे कि मैंने चुप रहने का इशारा किया क्योंकि पहले तुमसे उगलवाना चाहता था कि तुम क्या जानते हो।""

" ओह !"

"क्या रहमान तुम दस में से था?”

" नहीँ । "

"फिर उसे रास्ते कै बारे में केसे मालूम?”

"इस बारे में में कुछ नहीँ कह सकता । हो सकता है वह कोई हाजी गल्ला का विश्वस्त हो ।”

"फिर भी, चाचू को रास्ता तो पता लग ही गया ।"

"इन्हें समुद्र से लेकर उस जगह तक का रास्ता मालूम होंगा जहां इन्हें कैद किया गया होगा जबकि मुझें उस रास्ते की जानकारी है जो सीधा हाजी गल्ला के बेडरूम में खुलेगा ।"

"ओर तुम हमें वहां पहुंचा सकते हो ?'

"यकीनन । "

"क्यों ।"

'" मतलब ?"

"इसमें तुम्हारा क्या फायदा है ?”

"मेरा फायदा ही समझ में नहीं आया अभी तुम्हारी ?”

"शायद ठीक से नहीं ।" जावेद ने कहा ।

"मैें भी उन हरामजादों की नाक काटना चाहता हू ।" आफताब की आंखों में प्रतिशोध की चिंगारियां नज़र आने लगी थीं…"उन्होंने मेरी नाक इसलिए काटी क्योंकि मैं ब्रिगेडियर गुलहसन को न बचा सका । अब हाजी गल्ला उनकी सरपरस्ती में है । उसे उस हेडक्वार्टर में छुपा रखा हे उन्होंन, जिसे अभेद्य माना जाता हैं । जब तुम उसे उसी के बेडरूम मे मौत कै घाट उतार दोगे तो मैें नुसरत तुगलक नाम कै कुत्तों के सामने जाऊंगा, कहूंगा कि तुम हाजी गल्ला की हिफाजत न कर सकै । अब तुमने मुल्क की नाक कटवाइं हे...मुझे तुम्हारी नाक चाहिए ।"" उसका लहजा वहुत खतरनाक और भावुक होता चला गया था…"मैं अपने दांतों से ही उनकी नाक कतर लूंगा । फिर आइना दिखाऊँगा उन्हें । कहूँगा कि देखो हरामजादो...देखो कि बगैेर नाक के आदमी कैसा लगता है। "

कहने के बाद वह लंबी लंबी सांसें लेने लगा । माहौल एक बार फिर ऐसा हो गया था कि किसी के मुंह से बोल न फूटा ।

सांसें नियंत्रित होते ही उसने पुन: कहा…"एक तरह से यह तुम्हारी मदद होगी क्योंकि तुम्हारा तो मकसद ही हाजी गल्ला का खात्मा है मगर यकीन मानो जावेद, मै यहां तुम्हारी मदद करने नहीं बल्कि तुम्हारी मदद लेने आया हूं । उनकी सरपरस्ती में रहत्ते हाजी गल्ला क्रो मौत कै घाट उतार दो । मेरा प्रतिशोध पूरा हो जाएगा ।"

अकेला जावेद ही क्यों, सभी उसके यहां आने के मकसद को अच्छी तरह समझ चुके थे ।

जावेद बोला-"उस रास्ते से कुछ हो सकता तो हम काफी पहले हाजी गल्ला क्रो खत्म कर चूकै होते ।"

" मतलब ? "

"वे जानते हैं कि विजय, अलफासै ओर चाचू हेडक्वार्टर तक पहुंचने वाले गुप्त रास्ते के बारे मे जान चुके हैं । वे यह भी जानते हैं कि उनमें से एक यानी चाचू मेरे पास हैं । स्वाभाविक सी बात है कि वे समझ गए होंगे कि चाचू ने मुझे उस रास्ते के बारे में बता दिया होगा । ऐसी अवस्था मेँ क्या वे उस रास्ते क्रो यूंही खुला छोड देंगे ?? क्या उन्होने चप्पे चप्पे पर गार्ड तैनात न कर दिए होंगे ? ”

"ये बात तो ठीक है ।"" इन शब्दों के साथ आफ़ताब खान के चेहरे पर निराशा छा गई थी-"उन्होने उस रास्ते पर भी सुरक्षा कै उतने ही पुख्ता इंतजाम कर दिए होंगे जितने बाकी रास्तों पर हैं ।"

एक बार फिर उनके बीच खामोशी छा गई थी ।

यह खामोशी इसलिए थी क्योंकि किसी के पास बोलने के लिए कुछ बचा ही न था ।

सबसे ज्यादा निराश आफताब नजर आ रहा था । उसक चहरे पर साफ लिखा था कि वह बडी उम्मीद लेकर आया था मगर एक ही झटके में उसके सारे प्लान की हवा निकल गई ।

"इतना निराश होने की जरूरत नहीं है आफताब ।" जावेद ने दुढ़तापूर्वक कहा था-"मेरे हाथों से हाजी गल्ला की मौत

निश्चित है । ये रास्ता बंद हो गया तो कोई और रास्ता निकाल लूगा । तुम्हें नुसरत-तुगलक से उनकी नाक मांगने का नौका जरूर मिलेगा । ”

आफताब ने जैसे उसकी बात सुनी ही न थी ।

अपने विचारों मेँ गुम था वह और फिर अचानक उछल पड़ा ।

बोला…“मैं सप्रे का इंतजाम कर सकता हू।""

"कैसा सप्रे ?"

"अरंड कै बीज में पाया जाने वाला रिसिन प्रोटीन इतना जहरीला हे कि यदि उसका छिडकाव किसी भीड भरे स्थान पर कर दिया जाए तो यह श्वसन तंत्र के साथ कोशिकाओं की संरचना क्रो भी प्रभावित कर सकता है । अधिक मात्रा में होने पर यह कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया भी रोक देता है । "

"अचानक तुम ये क्या बड़बड़ाने लगे हो?" जावेद ने पूछा ।

"ये मेरे नहीं, एक वज्ञानिक कै शब्द हैं । उस वैज्ञानिक के जो जैविक हथियारों पर शोद्ध कर रहा है ।" आफताब किसी पागल की मानिंद कहता चला गया था…"मेँ आइएसआइ की लेबोरेट्री की बात कर रहा हू । वो वैज्ञानिक मेरा दोस्त हे । उसने कहा था कि जल्दी ही वे ऐसा जैबिक हथियार बना लेंगे जिससे शहर पर छिडकाव करके शहर के शहरों को मौत की नींद सुलाया जा सकता है।"

“हमें कौनसे शहर को मौत की नींद सुलाना है !”

"वही तो । '" आफताब बोला… "हमें उतनी मात्रा की ज़रूरत नहीँ है क्योंकि गार्डस क्रो बगैर मारे काम चल सकता है । उनका बेहोश हो जाना ही काफी होगा ओर बेहोश होने से एक क्षण पहले भी उन्हें यह पता नहीँ लगेगा कि उनके साथ कुछ होने वाला है । किसी तरह की गंध भी तो नहीं हे उसमें । "'
 
अगर यह लिखा जाए तो जरा भी गलत न होंगा कि इस वक्त केवल विकास समझ रहा था कि आफताब क्या कह ओर सोच रहा है । वही बोला…"उससे तो हम भी बेहोश हो जाएंगे ।”

“मेरा वैज्ञानिक दोस्त एंटी रिसिन प्रोटीन की गोलियां भी बना चुका है । बस यह पूछना पडेगा कि कितनी मात्रा में ली जाएं ।""

"क्या वह बता देगा?"

"बताया न, मेरा दोस्त है । विश्वास करता है मुझ पर ।"" वह कहता चला गया-"एल्कोहल का शौकीन है और थोडा बड़बोला भी है । उसे तो पता भी नहीँ लगेगा कि बातों बातों में मैंने क्या जान लिया । मैं ये कर लू'गा...मैें ये काम कर लूगा विकास । मैं रिसिन प्रोटीन भी प्राप्त कर लूगा और एंटी रिसिन प्रोटीन क्री गोलियां भी ।""

“तब तो हम वहां पहुच सकते हैं । " विकास ने कहा ।

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चांदनी रात कै कारण समुद्र कुछ ज्यादा ही जोर-जोर से गर्ज रहा था । खारा पानी दूर दूर से दोड़कर आता और बीस बीस फुट ऊची लहरों में तब्दील होकर हवा में उछल जाता ।

कई बार ऐसा लगा कि लहरों पर सवार रबर की वह छोटी सी नाव समुद्र मेँ अब पलटी कि तब पलटी जिसमें वे सातों सवार थे ।

सातों के जिस्मों पर गोताखोरी का लिबास और सेफ्टी बेल्टस थीं । विकास, आफ्ताब, जावेद और किबला के हाथों में चप्पू थे।।

बिकास और आफताब नाव के अगले हिस्से में बैठे चप्पूचला रहे थे तो जावेद और किबला पिछले हिस्से मेँ । शोर मचाती लहरें नाव को पलटने की पूरी कोशिश कर रहीँ थीं ।

उन्हें नाकाम कर रहे थे तो केवल नाव के चार किनारों पर चार चप्पू।

मोगली, आरती और नौशाद को बीच में इस तरह बैठाया गया था कि बैलेंस बना रहे । एक रस्सी की मदद से वे सातों आपस में बंधे हुए थे ताकि नाव पलटने की अवस्था में भी एक दूसरे से जुदा न हो सकें ।

उनके लिबास पूरी तरह भीग चुके थे ।

आकाश पर चमक रहे पूर्ण चांद के कारण जितना देखा जा सकता था, बस उतना ही देखा जा सकता था ।

उसके अलावा दूर दूर तक कहीं कोइ रोशनी नजर नहीं आ रहीँ थी ।

समुद्र अगर शांत होता तो नाव के ज़रिए उन गगनचुंबी पहाडों तक पहुंचना ज्यादा मुश्किल न था जिनकी जडों से बारम्बार टकरा रही लहरें, उन्हें तोढ़ डालने की नाकाम कोशिशें कर रहीँ थीं, मगर ज्वार भाटे के कारण इस वक्त वह काम बेहद मुश्किल नजर आ रहा था ।

फिर भी, एक घंटे के थका देने वाले प्रयास के बाद वे पहाडों की ज़ड़ में पहुँच गए थे ।

"कहां हे वो गुफा?” विकास ने इतने तेज़ स्वर में पूछा कि आवाज लहरों के शोर को चीरकर आफ़ताब के कानों तक पहुंच जाए ।

आफताब ने भी उत्तने तेज स्तर में जवाब दिया…“सबसे उच्चे पहाढ़ की जढ़ में चलते रहो । एक स्थान पर पहाढ़ में कूब सा निकला नजर आएगा । गुफा उसी के नीच, समुद्र के अंदर है ।"'

वहीँ प्रयास जारी हो गया ।

नाव को कूब के नीचे पहुंचने में बीस मिनट लगे ।

फिर, एक हुक जेसी चीज को पहाढ़ की दीवार में गाड़ने की कोशिश चालूहों गई । पहले हुक पर विकास ने जोर-जोर से हथोड़े बरसाए, फिर आफ़ताब ने और उसके बाद किवला ने ।

समुद्र के खारे पानी पर बार बार दोढ़कर आ रही भारी लहरें उनके जिस्म से पानी की दीवारें बनकर टकरा रही थीं ।

उनके कारण उनका काम और भी ज्यादा मुश्किल होता जा रहा था पर वे तो जेसे आज निकले ही हर मुसीबत से टकराने के लिए थे ।

प्रकृति और इंसानी हौंसलों का ये टकराव सदियों से होता चला आया है । कभी प्रकृति जीतती है, कभी इंसानी हौंसले ।

पंद्रह मिंट ज़रूर लगे लेकिन वह वक्त आया जब आफताब ने पहाढ़ में गड़े हुक को चेक करते हुए कहा-"अब ये नाव को संभाल सकता । "

बिकास ने उस रस्सी के सिरे पर बंधा कांटा पहाड में गाड़े गए हुक में र्फसा दिया जिसका एक सिरा नाव से बंधा था ।

अब नाव लहरों पर उछल-कूद तो मचा सकती थी मगर वहां से कही जा नहीं सकती थी ।

आफताब ने कहा…"अब हमें समुद्र में कूदना हे । सब लोग आक्सीजन मास्क ओर हेलमेट पहन लें ।"'

सबने हुक्म का पालन किया ।

सभी ने करीब करीब एक साथ नाव से मेँ जम्प लगा दी ।

एक दूसरे से बंधे गहराई में उतरते चले गए । सभी ने वे स्वीच आन कर लिए थे जिनके कारण उनके हैल्मेट के अग्रिम भाग में लगी न टार्चे आन हो गई थीं ।

अब वे पानी के अंदर अपने आसपास कै दृश्य को देख सकत थे ।

गहराई में पानी की हलचल भी कम थी मगर चारों तरफ से "घुप्प घुप्प" की आवाजं आ रही थीं ।

आफताब को जल्दी ही पानी से भरी गुफा नजर आई ।

वह उसी में घुस गया । रस्सी से बंधे होने कें कारण सब उसी में समा गए ।

गुफा में पानी भले ही था मगर वहां उसमें जरा भी हलचल न थी इसलिए बगैर किसी खास दिक्कत कै अंदर क्री तरफ तैरते चले गए ।

माहौल इतना डरावना था कि अगर आफताब को उस गुफा के बारे में पता न होता तो कभी उसके अंदर दाखिल न होता ।

शीघ्र ही उसे पानी में डूबी लोहे की सीढी नजर आईं । वह, ओर उसके पीछे छओं सीढी पर चढते चले गए । लोहे के करीब चालीस डंडे चढने के बाद गुफा की छत में दो बाइ दो का एक गोल होल नज़र आया । सीढी उसे क्रास करती हुई ऊपर चली गई थी । आफताब बगैर किसी हिचक के होल को पार कर गया ।

अब वह दस बाइ दस के एक छोटे से पहाडी कमरे में था और वही क्यों, अगले पांच मिनट में सातों वहीँ थे ।

उस कमरे में जहा जरा भी पानी नहीं था ।

पानी उस होल के नीचे था जिसके ज़रिए वे वहां पहुंचे थे । मास्क उतारते हुए मोगली ने कहा था…"मार दिया शाब, मेरी तो हड्रिडयां कीर्तन करने लगी हें ।"'

"वाकई ।"' किबला बोला-"आफताब ने जब इस रास्ते कें बारे में बताया था तब ऐसा नहीं लगा था कि इतना मुश्किल होगा ।"' आरती ने कहा…“थक तो मैं भी गई हू' लेकिन ऐसे अद्भुत रास्ते की मैं कल्पना तक नहीं कर सकती थी ।"'

“मैंने तुम चारों से पहले ही कहा था ।" जावेद नौशाद की तरफ दखता हुआ बोला-"कितनी कोशिश की थी समझाने की इस मिशन में तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है । मैं, बिकास और आफ़ताब ही काफी हैं मगर तुम नहीं माने । किसी ने एक न सुनी। "

"अब भी तेरी कोई सुनने वाला नहीं है ।"' आरती ने कहा ।

जावेद ने कुछ कहने कें लिए मुंह खोला ही था कि नौशाद बोल पडे…"तुझे अकेला छोडने की अब हममें से किसी में हिम्मत न है । ”

"समझ क्यों नहीं रहे चाचू।" जावेद झल्लाया-"ज्यादा भीढ़ समस्या हो सकती है । अब भी कहता हूं तुम लोग यहीँ रुक जाओ, मैं, विकास और आफताब मिशन पूरा करके आते हे । तुम्हें यहीँ से साथ लेकर वापस लोट जाएंगें।"

"तुम्हारी समझ मेँ अभी तक ये बात क्यों नहीं आईं जावेद बेटे कि हम सबकी जान तुममें बसी हैं ।"' किबला ने कहा था…"हम मर तो सकतें हैँ मगर तुम्हें अकेला नहीँ छोढ़ सकते ।”

झल्ताया हुआ जावेद पुन: कूछ कहने वाला था कि उससे पहले आफताब बोला…" मै कोठी पर ही देख चुका हू जावेद, सारी कोशिशें बेकार हैं । इनमें से कोई तुम्हारी बात मानने वाला नहीं हे । बेहतर हे कि टाइम खोटा करने की बजाए आगे बढा जाए ।"'

वह यह सोचकर चुप रह गया कि आफताब ठीक कह रहा हे ।

विकास ने दाई दीवार की तरफ इशारा करते हुए आफताब से कहा-"तुम्हारे बताए मुताबिक इस दीवार में एक दरवाजा है । उसे पार करते ही वह सुरंग जो हमें हेडक्वार्टर तक ले जाएगी और ताजा हालात के मुताबिक उस सुरंग में माइंस हो सकते हैँ जबकि आमतौर पर एक भी गार्ड नहीं रहता था ।"'

"संभावना तो यहीँ है कि अब गार्डस होंगे और हम उनसे निपटने की पूरी तैयारी करने कें बाद ही यहां आए हैं ।" कहने कै साथ उसने गोताखारी लिबास उतारना शुरू कर दिया था ।

सबने उसका अनुसरण किया क्योकि पहले ही तय हो चुका था कि उन्हें अपने गोताखोरी लिबास इस कमरे में छोढ़ देने हैँ ।

कुछ देर बाद उन सभी के जिरमों पर साधारण लिबास थे । सभी ने अपनी जेबों से निकालकर एक एक एंटी रिसिन प्रोटीन की टेब्लट खाइ ।

फिर, उनके हाथों में ऐसी छाटी छोटी पिचकारियाँ नज़र आने लगीं जेसी सलून पर, फेस पर स्प्रे करने के लिए होती हें ।

"दरवाजा यहां उत्पन्न होगा ।" आफताब ने दीवार के एक खास हिस्से की तरफ इशारा किया ।

सबने अपनी नजरें वहीँ गड़ा दीं । साथ ही, हाथों में मौजूद छोटी छोटी पिचकारियाँ इस तरह तान ली थीं जैसे वे एके सैंतालीस हो ।

आफताब कमरे में माजूद एक ऐसे स्वीच बोर्ड क्री तरफ बढा जिस पर अनेक स्वीच थे ।

उंगलियां एक खास स्वीच पर रखता हुआ वोला-"रेडी ।"

"यस ।"' सबने एकसाथ इस तरह कहा जैसे बाहर पर फायरिंग करने के लिए तैयार हों ।

आफताब ने स्वीच दबाया ।

हल्की सी घरघराहट कै साथ दीवार में दरवाजा बना ।

बगैर यह देखे कि दूसरी तरफ कोई हे भी या नहीं, सबने अपनी उंगलियों क्रो हरकत दी और सभी की पिचकारी से स्प्रे हुआ ।

सुरंग करीब दस फुट चौडी थी परंतु लंबाई का अंदाजा कम से कम वहां से नहीं लगाया जा सकता था क्योकि करीब चालीस फुट दूर मोढ़ नज़र आ रहा था । दोनो दीबारो के साथ सशस्त्र गार्ड खड़े थे ।

हर दस फुट पर एक गार्ड था यानी मोढ़ के इस तरफ कुल गार्डस की संख्या चार थी । घरघराहट की आवाज़ सुनकर चारों का ध्यान दीवार की तरफ गया । उसमें दरवाजा उत्पन्न हो चुका था ।

दरवाजे के उस तरफ कुछ इंसानों की झलक पाते ही उन्होंने शस्त्र सीधे करने चाहे थे मगर जाने क्या हुआ कि दिमाग चक्रराए ओर व धाढ़ धाड़ करके पथरीली ज़मीन पर गिर गए । गिरने से पहले वे केवल यह देख पाए थे कि दरवाजे कै पार नजर आने वाले लोगां ने छोटी छोटी पिचकारियाँ से कुछ रुप्रे किया था ।

जो हुआ, पलक झपकते ही हो गया था।

चारों गार्डस की हालत देखकर किवला कह उठा…“कमाल का* स्प्रेे है, इसने तो माइंस को अपने हाथों में मौजूद हथियारों क्रो सीधा तक करने का मोका नहीं दिया ।"'

आफताब ने तुरंत अपने होठों पर उंगली रखकर उसे चुप रहने कै लिए कहा और फिर बहुत ही धीमे स्वर में फुस फुसाया-"मोड के उस तरफ़ भी गार्डस तैनात होंगे । हमारी आवाज उन तक नहीं पहुंचनी चाहिए । एक को भी गोली चलाने का मौका मिल गया तो उसकी आवाज़ दूर दूर तक सबको सतर्क कर देगी । उस अवस्था में यदि ये कहूतो गलत न होगा कि हमारे ये स्प्रे बेकार हो जाएंगें ।”

किवला का चेहरा बताने लगा था कि उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है । मुंह से कुछ नहीं कहा उसने लेकिन आंखों से जरूर कहा कि अब नहीँ बोलगा ।

सातों दब पांव आगे बढ ।

अंधरे ने दस बाइ दस के कमरे तक उनका साथ दिया था ।

सुरंग गें भरपूर रोशनी थी क्योंकि उसकी छत में जगह जगह वल्ब लगे हुए थे और वे सभी रौशन थे ।

नौशाद अंसारी की इच्छा सबको यह बताने की हुइ कि जब वे विजय ओर अलफांस के साथ यहां से गुजरे थे तो कोइ बल्ब रोशन न था । पूरी तरह अंधेरा था यहां और कोई गार्ड भी तैनात न था मगर आफ्ताब कै शब्दों को याद करके इस इच्छा को अपने सीन ही में दफन करना पड़ा ।

वे मोड पर पहुचे।

उस वक्त सबसे आगे विकास था ।

उसने बहुत ही सावधानी से झांककर दूसरी तरफ देखा । एक ही नजर में उसने देख लिया....था कि अगले पोड से पहले केंवल तीन गार्ड थे ।

उसने स्प्रे किया । तीनां गार्ड लुढक गए । रास्ता क्लियर था और. .. इसी तरह रास्ता क्लियर करते वे ज़रा भी आहट पैदा किए बगैर आगे बढते रहे ।

अगर यह कहा जाए तो गलत न होगा कि अनेक मोडो से अटी पडी सुरंग ही सुरंग में उन्होंने करीब एक किलोमीटर सफर जरूर किया होगा ।

उसकै बाद गेलरिया' शुरू हो गईं जो इस बात की द्योतक थी कि अब वे हेडक्वार्टर की सीमा मेँ दाखिल हो चूकै हैं । शायद बताने की ज़रूरत नहीं हे कि गार्डस वहां भी तैनात थे और उन्हें भी रिसिन प्रोटीन के घातक स्प्रे का शिकार होना पड़ा ।

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काफी बड़ा कमरा था वह । करीब पच्चीस वाइ पच्चीस का ।

दीवारों पर नंगी लडकियां की तस्वीरें । कमरे के बीचों बीच पड़ा गोल बैड । हर तरफ से, सुनहरे पारदर्शी पर्दों से घिरा । भारी भरकम जिस्म वाला जो शख्स उस पर पड़ा खर्राटे ले रहा था उसे पाठक अच्छी तरह पहचानते हैँ मगर उस लडकी को जरा भी नहीं जानते जो ठीक उसकी बगल मेँ लेटी थी ।

उम्र-किसी हालत मे बीस से ज्यादा नहीं । आंखों से आंसुओं की जैसे बरसात हो रही थी । सिसकियाँ ले लेकर बुरी तरह रो रही थी वह ।

ओढ़ने वाली चादर का सिरा मुह में ठूंस रखा था । दोनों मे से किसी के भी जिस्म पर कोइ कपडा न था ।

अचानक बेल बजी । दोनों बुरी तरह चौके ।

लडकी रोना भूल गई ।

हाजी गल्ला इस तरह हड़बड़ाकर उठा किसी ने गोली मार दी हो क्योकि यह वेल उसके आदमियों द्वारा किसी एमरजेंसी में ही बजाईं जाने कें लिए थी ।

मुंह से 'क्या हुआ क्या हुआ? की आवाजें निकल रही थीं ।

लडकी उठकर बैठ गई जबकि हाजी गल्ला तो कूदकर फर्श पर पहुच चुका था ।

बेल थी कि बंद होने का नाम ही न ले रही ।

भला हाजी गल्ला को इस वक्त यह होश कहा' कि उसके जिस्म पर एक भी कपड़ा न था !

वह बाज की तरह स्वीच बोर्ड की तरफ लपका ।

एक स्वीच दबाया ।

कमरे का मुख्य दरवाजा खुल गया और...उसकें खुलते ही जैसे कयामत आ गई ।

इधर, हाजी गल्ला गैलरी में खड़े सात लोगों को देखकर हक्का बक्का था तो उधर, वे सातों पहाढ़ जेसे जिस्म वाले हाजी गल्ला को पूरी तरह नंगा देखकर ।

"क...क...कौन हो तु...म.. .म. .." हाजी गल्ला के हलक से निकलने वाले आखिरी शब्द जोरदार चीख में तब्दील हो गए क्योंकि सेंटेंस पूरा होने से पहले ही बिकास के बूट की ठोकर उसके पेट पर पडी थी ।

भैंसे क्री तरह डकराता हाजी गल्ला कमरे के फर्श पर जा गिरा ।

सातों कमरे के अंदर आए ।

इस वक्त उन सभी कै हाथों में पिचकारियों की जगह रिवाल्वर थे।

आफ्ताब स्वीच बोर्ड की तरफ लपका । उसने एक स्वीच दबाया ओर... कमरे का खुला हुआ मुख्य दरवाजा बंद हो गया ।

वेसा होते ही आफताब ने कहा…“अब कोइ चिंता नहीं जावेद,यह कमरा साऊंडप्रूफ़ हे ।"'

जावेद के चेहरे पर कहर बरपाने वाले भाव थे ।

आंखें दहककर अंगारा बन गई थीं ।

हाजी गल्ला उछलकर फर्श पर खडा हो चुका था ।

वह हालात को समझने की कोशिश कर रहा था जबकि उस देखकर जावेद की आंखां में ऐसे भाव उभरे थे जेसे नागिन के हत्यारे क्रो देखकर नाग की आंखों में उभरत हांगे ।

लड़क्री अपने जिस्म को समेटकर गठरी सी बन गइ थी ।

चेहरे पर आतंक लिए खुद को बैड के एक कौने में छुपाने का प्रयत्न करने लगी ।

ओढ़ने वाली चादर से उसने अपने जिस्म को ढांप रखा था ।

"तुम ।" जावेद को पहचानते ही हाजी गल्ला गुर्रा उठा था…""तू यहां? और नेता...तूभी !" कहने के साथ उसने नौशाद अंसारी को देखा था ।

फिर, बाकी पांचों क्रो देखता हुआ बोला…"तुम सब, इतने सारे लोग यहां कैंसे घुस आए?"

"तूने कहावत सुनी होगी हाजी गल्ला कि मौत जब आती हे तो सात ताले तौढ़कर आ जाती हे ।"' जावेद ने दांतपीसे-"जरूरत से ज्यादा सुरक्षित ये हैडक्वार्टर तूने खुद को अमरिका कै शील कमांडोज से बचाने कें लिए बनवाया था मगर यहां तो में ही आ घुसा ।"

“घुस तो आया है बेवकूफ लेकिन तूयहां से जिंदा वापस न जा सकेगा ।” हाजी गल्ला अंदर ही अंदर भले ही डरा हुआ हो मगर प्रगट मेँ पूरी दंबंगईं के साथ पेश आया…"तेरी जिंदगी की आखरी भूल साबित होगी यह ।"'

"जब तू जीत्ते जी मुझे अंदर आने से न रोक सका, तो तेरे मरने के बाद बाहर निकलने से कौन रोक लेगा?”

“तू मुझे इतने सारे लोगों से घेरकर मारेगा ?"

"हुंह ।। तू भी अकेला नहीं आया था मेरे घर ! याद है…त्तेरे साथ इकरामुद्दीन था, शफ्फाक शाही था और जब मुझे हथकडी और बेडियों में जकढ़कर ले जाया गया था तो ब्रिगेडियर गुलहसन भी था । वेचारे? एक भी नहीँ रहा उनमें से ! कुछ दर बाद तू भी नहीं रहेगा । तू उनके बूते पर मेरी वहन को गंदी नजरों से देखता था । तेरी खूंखार नज़रों से मेरी बहन ही नहीं, अब्बू और अम्मी तक सहम जाते थे । हाथ जोढ़-जोड़कर रहम की भीख मांगते थे तुझसे मगर तुझे रहम नहीं आता था दरिंदे । मुझें हथकडी बेडी मेँ ज़कड़कर मेरी बहन के जिस्म से कपड़े नोंचने की बहादुरी दिखाइ थी तूने मगर मै आज भी अपने साथियों के साथ आया ज़रूर हू लेकिन तुझे मौत कै घाट अकेला ही उतारूगा । इनमें कोई मदद नहीँ करेगा मेरी । आज तुझे मेरे हाथों अपने हर गुनाह की सजा मिलेगी।”

“हाथ में रिवाल्वर लेकर तो कोई भी किसी को धमका सकता है । मर्द का बच्चा हैं तो...

"तूमुझें नहीं, खुद क्रो गाली दे रहा हे हाजी गल्ला ।" जावेद उसकी बात काटकर कह उठा…"क्योंकि जब तूने मेरे घर में अपनी मर्दानगी दिखाईं थी तो मैं निहत्था ही नहीं था बल्कि हथकडी बेडी में ज़कड़ा हुआ था । हकदार तो नहीं है तू सब कहने का लेकिन तू. .तू था और जावद कश्मीरी. ..जावेद कश्मीरी हे । इसमें शक नहीं कि इस वक्त मरी सिर्फ एक उंगली की हल्की सी जुबिश तुझे मौत के घाट उतार देगी मगर तेरी उस मौत से मुझे सुकून नहीं मिलेगा । इसलिए, ये ले. .. रिवाल्वर जेब मे रख लिया ।” कहने के साथ उसने सचमुच रिवाल्वर जेब में रख लिया था ।

विकास का यह ठीक न लगा । उसने तेज स्वर में कहा-"ऐसे मौकों पर जजबाती नहीं होना चाहिए जावेद । ये तुम्हें उक्साने की कोशिश कर रहा है और तुम्हें......

"तुम जासूस हो मिस्टर मगर मैं जासूस नहीं हूं ।"' जावेद उसकी बात काटकर कहता चला गया था…"मैँ वो भाई हूं जिसकी आंखां कै सामने इसने उसकी बहन के कपडे तार तार किए थे । मैं वो बेटा हूं जिसकी आंखों के सामने उसके अब्बा गोली मारी गइ और मैं वो अभागा हूंजिसने उस कोख में चाकू घुसते देखा जिसमेँ नौ महीने गुजारे थे । मेरे कानों में उन सबकी चीखं गूंज रही हें । अपनी जासूसी मत झाड़ो । सीख देने की कोशिश मत करो मुझे और सब अपने अपने रिवाल्वर जेब मेँ रख लौ । मै यहा' इसका कत्ल करने नहीं अपने दिल को करार देने आया हूं ओर वह तब मिलेगा जब मैं इसे तढ़प तड़पकर मरता देखूंगा।"'

सब पर सन्नाटा छा गया था ।

"सुना नहीं तुमने !" इस बार जावेद के हलक से किसी हिंसक पशु जैसी गुर्राहट निकली थी…“रिवाल्वर जेब में रखो ।”

उस गुर्राहट में जरूर क्रोइ ऐसी बात थी कि दूसरों कीं तो बात ही छोड़ो, विकास जैसा लडका अपने हाथ को जेब की तरफ़ बढने से न रोक सका जबकि जावेद ने अपनी जेब से एक नहीँ, ठीक एक जेसे दो चाकू निकाले थे । दोनों उसके दोनों हाथों मेँ थे और...एक झटके से दानों क्रो एक साथ खोला ।

"ले ।"" कहने के साथ बाएं हाथ का चाकू हाजी गल्ला की तरफ़ उछाला ।

हाजी गल्ला ने उसे लपक लिया था । जावेद ने अपनी बात पूरी की…"अब हम बराबर हें । इनमें से कोई बीच में नहीं आएगा । तूने मौका नहीं दिया था मुझे मगर मैं तुझे मोका देता हूं… कहर से बचन की ताकत हे तो बच ।"' कहन के साथ दाएं हाथ में मोजूद चाकू को ताने उसने हाजी गल्ला पर जम्प लगा दी थी।

हाजी गल्ला एक तरफ हट गया ।

परिणाम स्वरूप-जावेद फर्श से जा टकराया ।

सभी के दिलों की धडकनें आशंकाओं से घिर गई थीं । यहां तक कि विकास के दृष्टिकोण से भी जावेद ने समझदारी का परिचय नहीं दिया था क्योकि जाहिर तौर पर हाजी गल्ला जिस्मानी रूप से जावेद से कइ गुना ज्यादा ताकतवर था।

वही हुआ ।

जावेद अभी फर्श से उठ भी नहीँ पाया था कि हाजी गल्ला कै हाथ में दबा चाकूघूमा और वह जावेद के बाजूको चीरता निकल गया । कमरे मेँ जावेद की चीख गूंजी, खून उछला ।

भन्नाए हुए किबला का हाथ जेब की तरफ रेंगा मगर तभी, जावेद चीख पड़ा-"नहीँ, कोई मेरी मदद नहीं करेगा।”

हाथ जहा का तहा रुक गया ।

हाजी गल्ला ने जावेद पर दूसरा वार करने की कोशिश की थी मगर इस बार वह झोंक में कमरे की एक दीवार से टकराकर रह गया क्योंकि जावेद ने ऐन वक्त पर अपनी जगह बदल दी थी ।

उसके वाद...उन सवने ताकत ओर जुनून की टक्कर देखी ।

यकीनन जिस्मानी ताकत हाजी गल्ला में ज्यादा थी मगर जावेद के रोम-रोम में जुनून सवार था और. ..ज्यादा वक्त नहीं लगा, केवल पांच मिनट वाद बिकास जेसे लड़के को मानना पड़ा कि जुनून के सामने ताकत की कोई हैसियत नहीं होती ।

जावेद के जिस्म पर हाजी गल्ला के चाकू के कवल तीन ज़ख्म वने थे जबकि हाजी गल्ला के जिस्म पर वने जख्मों को कोई गिन नहीं सकता था और...वे लगातार वढ़ते ही जा रह थे क्योंकि जावेद अपने हाथ में दवे चाकू से वार-वार उस पर बार कर रहा था ।

लहूलुहान अवस्था में हाजी गल्ला फर्श पर गिर चुका था । चाकू हाथ में होने कें वावजूद उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था वह और न ही अपने हलक से निकलन वाली चीखौं को रोक पा रहा था ।

यह कहा जाए तो ज़रा भी गलत न होगा कि सिर्फ हाजी गल्ला ही अपने खून से नहाया हुआ नहीं था वल्कि जावेद भी उसके खून से नहा गया था । दीबारौं पर जगह-जगह खून लगा था तो फर्शं पर तो वह ही रहा था ।

बार बार उसके जिस्म पर चाकू से वार करता जावेद जुनूनी अवस्था में चीखे चला जा रहा था-“मेरी वहन को गंदी नज़रों से देखेगा कुत्ते ! कपढे फाडे़गा उसके रेप करेगा उससे । आज सुरैया जिंदा होती तो उसी के हाथों खात्मा कराता तेरा।। चाकू मेरे नहीं, उसके हाथ में होता ओर तुझ...

" रूक जाओ भैया...रुक जाओ ।" कमरे में एक आबाज गूंजी ।

हवा में उठा जावेद का हाथ जहां का तहां रूक गया ।

उस अकेले की नहीं, वाकी छओं की नज़रं भी उस लडकी क्री तरफ घूम गई थीं जो वेड से खडी हो चुकी थी । जिसे इस वक्त इस वात की जरा भी परवाह न थी कि उसके जिस्म पर कपढे के नाम पर एक रशा तक नहीं है । उसकी आंखों मं आंसू*थे लेकिन चेहर पर चटटानी कठोरता । उसने कहा था-"लगता हैं भैया इसने तुम्हारी वहन को वहुत सताया था !”

"सताया ही नहीं था, इस राक्षस ने रेप करने की काशिश की थी उससे।” दहाड़ने के साथ जावद ने हलाल होते बकरे की तरह मिमिया रहे हाजी गल्ला के जिस्म पर एक और वार किया ।

“और मेरे तो पिता को ही गोली मार दी इसने।" कहन कें साथ लडकी रो पडी थी-"पिता को ही नहीँ, भाई क्रो भी गोली से उड़ा दिया । केवल दस साल का था वह ओर उसका कुसूर केवल यह था कि उसने मेरी अस्मत वचाने की गुस्ताखी की थी । फिर भी वह मासूम अपनी वहन को बचा न सका । मुझे यहां उठा लाया था । कहने लगा-इसे छटपटाती मछलियां पसंद हें ओर. ..ओर...क्या तुम मुझ मोका दोगे भैया ! क्या मै इसे मौत के घाट उतारकर अपने कलेजे को ठंडक पहुंचा सकती हूं?”

“ज़रूर सुरैया...जरूर । तुम्हारा ही तो इंतजार कर रहा था मै।" दीवाना-सा जावेद कहता चला गया…"यहां आओ...लो, ये चाकू लो ओर उधेड़ दो इस दरिंदें का जिस्म ।"

लडकी यूं झपटी जेस कई दिन का भूखा थाली पर झपटा हो ।

जावेद के हाथ से चाकू लिया उसनेे और इस तरह हाजी गल्ला के जिस्म पर वार पर वार करती चली गई जैसे वह हाड मांस का नहीं वल्कि रुई का वना इंसान हो ।

हर बार के साथ खून उछलता रहा ।

लड़क्री भी जावद की तरह उसकै खून मेँ नहाती चली गई । यहां तक कि हाजी गल्ला के हलक से चीखें निकलनी बंद हो गई पर वह एक के बाद दूसरा वार करती हुई चीखती चली जा रही थी…"ये मेरे अब्बा की तरफ से...ये मेरे भैया की तरफ से...ये मेरी तरफ से ।"

बिकास ने आगे वढ़कर उसकी चाकूबाली कलाई पकडी और बोला-"'बस...वस कर वहन, वो तो कव का मर चुका है ।”

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अव वे आठ थे, क्योकि वह लडकी भी साथ थी जिसने अपना नाम रुबिया बताया था ।

उसी रास्ते से वापस निकले जिससे आए थे ।

गैलरियां' ओर सुरंग में सभी गार्डस पूर्ववत: बेहोश पड़े थे ।

दस वाइ दस के कमरे में पहुंचने पर एक सवाल खड़ा हो गया, यह कि-गोताखोरी का आठवां लिबास कहां से आएगा?

बिकास ने रूबिया को अपना लिबास देकर समस्या हल की ।

जावेद ने जव यह सवाल उठाया कि वह समुद्र कैसे पार करेगा तो उसने हंसते हुए कहा जब मैें बर्फ जेसी झेलम से पाकिस्तान आ सकता हू तो समुद्र का छोटासा हिस्सा पार क्यों नहीं कर सकता ??

फिर भी, सबको चिंता सताती रही मगर विकास ने कर दिखाया ।

उस वक्त रात के तीन बजे थे जब नाव उस किनारे पर लगाईं जहां से समुद्री यात्रा शुरु की थी और चोरी की उस लंबी गाडी की तरफ बढ गए जिसमें कोठी से वहां तक आए थे ।

गाडी को वे समुद्र किनार बनी अनेक झाडियों के बीच छुपाकर खडी कर गए ये । वह ज्यों की त्यों मिली ।

सभी उसमें समा गए ।

ड्राइविंग सीट बिकास ने संभाली थी और स्टार्ट करने के बाद गाडी को आगे बढाने ही वाला था कि एक शख्स ड्राइविंग विंडो के नज़दीक नजर आया, दूसरा बाई तरफ की विंडो के नज़दीक ।

बिकास सहित अभी उनमें से कोई कुछ समझ भी न पाया था कि उन दोनों के हाथों में वैसी ही पिचकारियाँ नजर आईं जैसियों से उन्होने गार्डस को बेहोश किया था ।

गाडी कै अंदर की तरफ से स्प्रे किया गया और उस क्षण. ..उन्हें पता लगा कि गार्डस पलक झपकते ही किस तरह बेहोश हो जाते थे । कुछ करने की तो बात ही दूर, संभलने तक का मौका न मिला ।

"फतह ।" यह आवाज़ बिजय की थी ।

“पर ये फतह उतनी आसानी से नहीं मिली है जितनी आसानी से मिली नजर आ रही है ।” अलफांसे ने कहा…"पूरी रात हो गइ इनके इंतजार करते करते ।"

विजय ने ड्राइविंग सीट पर लूढके बिकास को एक तरफ धकेला और उस पर खुद आसीन होता बोला-“तुम्हारा काम खत्म लूमड़ प्यारे, अपना मेहनताना लेने हमारे दड़बे पर पधार जाना ।"

“मतलब?" अलफांसे थोडा चोंका था ।

“ तुम जानते हो कि अव हमे जहां जाना है, वहां तुम्हारी एंट्री नहीं है ।” उसने गाडी स्टार्ट करते हुए कहा ।

“वो तो ठीक है जासूस प्यार मगर किसी ऐसी जगह तक के लिए तो लिफ्ट दे दो जहां से कोई सवारी मिल जाए !"

“गाडी पहले ही ओवरलोड है । तुम्हारे वेठने की जगह नहीँ है इसमें ।" कहने के बाद विजय ने गाडी आग बढा दी थी।

गाडी रेत उड़ाती सड़क की तरफ चली गइ थी जबकि अलफांसे जहां का तहां खडा रह गया था । उसकी पिछली लाल लाइट्स को देखते वक्त उसके होठों पर बहुत ही विचित्र मुस्कान थी ।

बिजय गाडी को करांची की सुनसान पडी सडकों पर तजी से दौडाता हुआ उस बिल्डिंग पर ले गया जिसके मस्तक पर "भारतीय दूतावास" लिखा था । जाहिर है…दूतावास का भारी भरकम लोहे वाला गेट बंद था मगर, उसे खुलवाने के लिए हार्न तक देना न पड़ा।

गाडी को देखते ही सुरक्षा कर्मियों ने गेट खोल दिया था ।

विजय गाडी क्रो कमान जेसे ड्राइव वे पर दोंड़ाता चला गया और ठीक पोर्चं के नीचे ब्रेक लगाए ।

दूत्तावास क भव्य गेट पर स्वयं राजदूत चार सुरक्षा कर्मियों कै साथ उसका इंतजार करते नजर आए ।

इधर वह गाडी से बाहर निकला उधर वे लपकते से अंदाज में उसकी ओर बढे ओर हाथ मिलाते बोले…“वेलकम मिस्टर बिजय । ”

"वो सब तो ठीक है राजदूत महोदय लेकिन इन सालों ने सारी रात काली कर दी । बहुत जोर से नींद आ रही है हमेँ ।"

“आपने पहले ही कह दिया था कि आपके सोने का इंतजाम कर दिया जाए । सो कर दिया गया है और...

"' और ? '"

“जेसा कि आपने कहा था, उन लोगों का इंतजाम भी कर दिया गया है जिन्हें आप गाडी में लाए हैं ।"

"हमने बताया था कि उनकी संख्या सात होगी मगर आठ हो गई 'हे । क्या करें, दुनिया की आबादी साली बढ ही इतनी तेजी से रही हैं । एक लड़की हे जिसके बारे में हमेँ नहीं पता कि वह कौन हे ।"

"कोइ बात नहीँ, उसका इंतजाम भी हो जाएगा ।" कहने कै बाद राजदूत सुरक्षाकर्मियों को आवश्यक निर्देश देने लगे ।

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अगले दिन, दिन के ग्यारह बजे विजय दूतावास के लैंडलाइन फोन पर कह रहा था…"हम बोल रहे हैँ नुसरत मियां।”

""अरे ,अरे हुजूरआला ।" दूसरी तरफ से नुसरत की आवाज़ उभरी थी-“आप कहां से बोल रह हैँ सरकार ? शक्ल की तो बात ही दूर, हम तो आपकी आवाज तक सुनने को तरस गए । अंतिम बार भी फोन ही पर बात की थी । आखिर कहां हैं आप और जिस काम र्के लिए आपको आमंत्रित गया था उसका क्या हुआ? आपके उस साले एजेंट ने तो तहलका मचा रखा है । सुना है पिछली रात हाजी गल्ला को भी लुढका दिया । यहीं हाल रहा तो हिंदुस्तान पाकिस्तान की जंग छिढ़ जाएगी जनाब, फिर हमसे मत कहना कि ये तुमने क्या कर दिया नुसरत मिया' ।”

“काम हो गया है ।'"

“पहेलियां मत बुझाइए क्योंकि हमने अपनी खोपडी खूंटी पर टांग रखी है । साफ़ साफ बताइए, क्या हुआ है?"

“जावेद मेरे कज्ज में है ।'"

"अरे वाह ! आपने तो एक बार फिर साबित कर दिया कि आप वाकइ गुरुओं के गुरु...गुरु घंटाल हैं । हमें पता भी नहीं लगा जनाब और आपने...कब और कैसे किया ये अजीमुश्शान कारनामा?"

"पेढ़ गिनन की कोशिश मत करो नुसरत मियां, आम पक चुका हैं, उसे खाने की तेयारी करो ।”

"आपने फिर पहेली बुझा दी सरकारे आजम, पहले ही फरमा चुका हूकि मेरी खोपडी खुटी पर टंगी हुई है । लो..तुगलक बहन बात करना चाहती हैं तुमसे । इनकी खोपडी इनके सिर के अंदर मोजूद हे । इन्हीं से पहेलियां में बात करो ।"

विजय ने कुछ कहने कै मुह खोला ही था कि दूसरी तरफ से तुगलक की आवाज़ उभरी-“पांय लामूंगुरुदेव ।"

"पांय बांय तो लगते रहना तुगलक मियां, इस वक्त तो बगैर देर भारतीय दूतावास आने की तैयारी करो ।"

"आपके कहते ही तेयारी शुरू कर दी हे हुजूर, कपडे पहन लिए हैँ, अंडरवियर पहनना बाकी हे । पर ये तो बता दीजिए कि हमेँ वहा' आना किस खुशखबरी में शामिल होने कै लिए है ?"

"ठीक बारह वजे दूतावास की तरफ से एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई गई है । दुनिया भर का मीडिया होगा वहां । उन सबके सामने जावेद क्रो तुम्हारे हवाल किया जाएगा ।”

"ताकि सनद रहे और हम दुनिया के सामने यह कहने लायक न रहें कि इंडियन जासूस ने जावेद को हमारे हवाले नहीं किया है ! "

"समझदार हो ।"

"जब हम पैदा हुए ये तो हमारी अम्मीजान ने भी पहला सेंटैंस यहीँ कहा था । हमें कोई एतराज नहीं है । दुनिया भर के मीडिया के सामने ये सरेमनी करने को तैयार हैं मगर...

“मगर...! ”

“ये तो बता दीजिए कि वह आपके हत्थे चढा कहां से क्योंकि लेटेस्ट इंफारमेशन कै मुताबिक पिछली रात वह...

"मैंने नुसरत से भी यही कहा था ओर तुमसे भी कहता हू कि पेढ़ गिनने की काशिश मत करो । आम पक चुका है, उसे खाओ । "

“चलो, ऐसा कर लेते हैं । "

“बदले मे तुम्हें एक विशेष विमान का इंतजाम करना होगा ।'"

"वो किसलिए जनाब?"

"हमें, नोशाद क्रो और बिकास को भारत ले जाने कै लिए ।"

“आंय !" तुगलक के बुरी तरह चोंकने की आवाज आइ…"ये छटकीं पाकिस्तान में कहां से टपक पडा?”

"फिर कहता हू…आम खाओ, पेड मत गिनो ।"

"पर ये आम तो दस्त कर देने वाले हैं हुजूर, हमें पता तो होना चाहिए कि छटक्री हमारे मुल्क में आया तो कब और कैसे आया ? ओर फिर, एक जावेद के बदले लुभाव में आप दो मांग रहे हैँ-मंत्री महोदय और छटकी । ये तो सरासर नाजायज़ मांग है ।'"

"हम तुम्हें अकेला जावेद , उसके साथ पांच और लोग सोंपने वाले हें । यानी दो के बदले पांच ।'"

"वो क्रोन कोन ? "

"जावेद की पड्रोसन कम लवर-आरती, उसका इंडियन नौकर मोगली, पाकिस्तानी नोकर किबला, रूबिया और आफताब ।'"

"आखिरी वाले दो का पूरा परिचय नहीं दिया हुजूर ने ।"

"रूबिया का तो पूरा परिचय हमें भी नहीं पता मगर आफ्ताब वो है जिसकी तुमने इस खुशी मेँ नाक कतर ली थी क्योंकि वह ब्रिगेडियर गुलहसन को नहीं बचा सका था ।"

"क्या बात कर रहे हैं सरकार ?' आवाज बता रहीँ थी कि हेरत के कारण तुगलक का बुरा हाल हो गया है-“वो नकटा इन लोगों कै साथ क्या कर रहा था?"

“इन लोगों क्रो गुप्त रास्ते से हाजी गल्ला कै बेडरूम तक ले जाने वाला वही है ।'" विजय कहता चला गया-“उसी की मेहरबानी से हाजी गल्ला खुदा को प्यारा हो सका ।'"

“उसने ऐसा क्या किया ?"

"बारह बजे कै बाद तुम्हारी सुपुर्दगी में होगा, खुद पूछ लेना ।"

“आ रहे हैं । हम प्रेस कांफ्रेंस में आ रहे हैं बंदापरवर । ऐसी धमाकेदार न्यूज की उम्मीद नहीँ थी हमें । अब तो आना ही पडेगा । "

"विशेष बिमान का इंतजाम करके आना ।" कहने के बाद उसने रिसीवर केडिल पर रख दिया ओर कमरे में मौजूद विकास की तरफ घूमा ।

उस विकास की तरफ जिसने उसकी एक एक बात ध्यान से सुनी थी ।

फोनवार्ता समाप्त होते ही वह ब्रोला-"वया आप वाकइ वो करने जा रह हैँ जो नुसरत तुगलक से कहा ?"

" मालूम है दितज़ले कि हमारा ज़न्म राजा हरिश्चंद्र कै मरते ही हो गया था । हमारे जिस्म में उन्हीं की रूह विराजमान है, झूठ नहीं बोल सकते ।”

"यानी आप जावेद को पाकिस्तान कै हवाले करने वाले हैं ?"

"आए ही इस मिशन पर थे ।"

जबड़े र्भिच गए थे बिकास के ।

बोला-"और मै इस मिशन पर आया हूं गुरु कि जावेद क्रो अपने साथ भारत लेकर जाऊंगा ।"

"बात को समझने की कोशिश करो दिलजले, यह हमारे देश के हित में नहीं होगा । सारी दुनिया यह मानेगी कि...

"हम भारत पहुंचकर प्रेस कांफ्रंस करेंगे । वहा सारी दुनिया के मीडिया क्रो बुलाएंगे और जावेद की हकीकत बताएंगे । उसके साथ भारत और पाकिस्तान में जो कुछ हुआ उसे क्लियर करेंगें । साबित करेंगे कि जावेद का इंडियन सीक्रे सर्विस से कोई सबध न था ।”

"उससे कुछ नहीं होगा लडके ।"

"उससे सबकुछ होगा गुरु, मै आपको यह नाइंसाफी नहीं करने दूंगा ।"

विकास कै लहजे में जिद उभर आईं थी।

बिजय भी कठोर और निर्णायक लहजे मेँ बोला…"हमेँ वह बिजय ठकुराय मत समझना जिसे तुमने हमारी काठी के लान में बेहोश करने के बाद गुलफाम मियां की कैद में पहुंचा दिया था । उस वक्त भले ही न जानते हो परंतु अब जानते हो कि वह हमारी डमी थी । इसलिए तुम उसे बेहोश कर सकै । हमें शिकस्त देने की कूवत नहीँ हे तुममें इसलिए उठापटक करने की कोशिश मत करना । "

“मैंने जावेद से वादा किया है गुरु कि मैं उसे भारत...

विजय उसकी बात काटकर गुर्राया…“और हिंदुस्तान ने सारी दुनिया के सामने वादा किया हे कि वह जावेद क्रो पाकिस्तान को सौंपेगा । तुम्हारा वादा मुल्क के वादे से बड़ा नहीं है ।”

"आप जानते हें कि इस वक्त आप गलत हैं इसलिए मैं ऐसा नहीँ होने दूंगा ।" कहने के साथ वह दरवाजे की तरफ़ बढा ।

बिजय उसका रास्ता रोकता हुआ बोला…"कहां चले प्यारे ?"

"जावेद को अपनी कस्टडी मे लेने। मैं उसे...

मगर, बिकास अपना वाक्य पूरा न कर सका क्योंकि उससे पहले ही विजय जेब से पिचकारी निकालकर स्प्रे कर चुका था ।

विकास तत्काल बेहोश हो गया । वह फर्श पर लुढकने ही वाला था कि विजय ने अपनी बांहों में संभाला ।

उस दृश्य को कमरे के दरवाजे पर खड़े राजदूत ने देख लिया था । उसक चेहरे पर हेरत कै भाव नज़र आए ।

बोला…“य ये तुमने क्या किया मिस्टर विजय ? "'

"करना पडा राजदूत महोदय, अगर 'ये' न करते तो ये 'वो' कर देता जिसकै बाद बखेडा ही बखेडा था । वेसे जो हुआ है, वह नई बात नहीं हैं । हम दोनों के बीच अक्सर होता रहता है । इसे हमारे काम मेँ तंगडी मारने की आदत हे और हम अक्सर इसकी तंगडी मरोड़ते रहते हें । हमारे और इसके बीच की केमेस्ट्री को समझने की कोशिश करके अपने दिमाग का दिवाला निकालने की जगह प्रेस कांफ्रेंस की तैयारियों में जुट जाओ । इसे इसी हालत में इंडिया ले जाना पडेगा ।"

राजदूत के होठों पर रहस्यमय मुस्कान उभर आईं ।

काश, बिजय ने वह मुस्कान देख ली होती!

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