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चलते पुर्जे ( विजय विकास सीरीज़ )

वही हुआ जैसा बिजय ने कहा था…यानी संसार भर के मीडिया के सामने उसने जावेद को नुसरत तुगलक को सौंपा और उन्होंने उसके लिए विशेष विमान का इंतजाम किया ।

विकास और नौशाद की मौजूदगी मीडिया से छुपाई गई थी ।

बिकास तो खैर बेहोश था ही ।

जो हो रहा था, नौशाद अंसारी को भी उस पर एतराज था ।

उसने विजय से कहा भी…"जावेद न हिंदुस्तान के लिए आतंकी हे, न पाकिस्तान के लिए-इसलिए उसे पाकिस्तान के हवाले नहीँ किया जाना चाहिए ।"

विजय ने यह कहा…"मैं अच्छी तरह जानता हू मंत्री जी कि सच्चाई वहीँ हे जो आप कह रहे हैं लेकिन राष्ट्र के सम्मान को बचाने के लिए कई बार वो करना पढ़ता है जो सही नहीं होता ।"

नौशाद को चुप रह जाना पडा ।

कर भी क्या सकता था वह !

प्रेस कांफ्रेंस के दरम्यान जावेद खामोश रहा । तूफान से पहले क्री सी खामोशी थी उसके चेहरे पर । पत्रकार ने अनेक सवाल किए मगर उसने किसी का ज़वाब न दिया ।

जबड़े कसे बैठा रहा ।

लेकिन जब प्रेस कांफ्रेंस ख़त्म की तरफ थी तो ज्वालामुखी की तरह फटकर बिजय की तरफ दखता हुआ गुर्राया था-"तुझें नहीं छाडूंगा मैं । मैंन तेरी लाश आरती के कदमों में डालने की कसम खाई है । गिरधर चाचा के खून की एक एक बूंद का हिसाब देना होगा तुझे और ये तो तूजानता ही है कि जावेद कै कानुन के मुताबिक खून का बदला खून हे ।"

भले ही उसके शब्दों ने वहां सनसनी फेला दी थी मगर बिजय पर उसकी धमकी का कोई असर नजर न आया ।

वह पूर्ववत: मुस्कराता रहा ।

हालांकि बिजय ने जावेद के साथ आरती, रूबिया, आफ्ताब, मोगली ओर किबला को भी नुसरत तुगलक के हवाले किया था मगर उन्हें मीडिया के सामने पेश नहीं किया गया ।

प्रेस कांफ्रेंस के बाद उधर बिजय, बिकास और नौशाद अंसारी को लेकर विशेष विमान से इंडिया के लिए रवाना हुआ इधर नुसरत तुगलक उन छओ को लेकर कूतूवमीनार जेसी इमारत की तरफ ।

जाहिर है कि उनकी गाडी के लिए हेडक्वार्टर के सारे दरवाजे खुलते चले गए ।

लिफ्ट द्वारा नीचे पहुंचे । दोनों तरफ सशस्त्र गार्डस से सुसज्जित गेलरियों से गुजरते हुए उस कमरे में दाखिल हुए जिसमें किसी समय बिजय को कैद किया गया था ।

वहां बिजय इस वक्त भी था । उन्हें आता देखते ही उसने नारा सा लगाया था…"आओ.....आओ तुगलक मिया और नुसरत महाशय । पूरी बारात लेकर आए तुम । इसका मतलब ये हुआ कि…मुकम्मल फतह कै साथ पधारे हो ?”

“ फ़तह कहां हुजूर ।"

" ये तो शुरुआत हे ।" नुसरत ने बड़े ही लच्छेदार अंदाज में कहा था…"कूछ लोग सोच रहे हें कि किस्सा खत्म हुआ । उस वक्त उनके दिमागों के परखच्व उढ़ जाएंगे जब पता लगेगा कि असली किस्सा तो अब शुरू हुआ हे ।'"

बिजय को, यानी उस शख्स का वहां देखकर जावेद, मोगली, आरती और रुबिया के चेहरों पर आश्चर्य कै भाव नजर आ रहे थे, जिसे उन्होने विकास और नौशाद के साथ बिमान मेँ सवार होकर भारत के लिए रवाना होत्ते देखा था ।

जावेद ने तो कह भी दिया-“ये क्या चक्कर है । इंडियन जासूस तुम हो या या वो जो विकास और चाचूक्रो भारत ले गया ?"

"विजय दी ग्रट तो हम ही है जावेद प्यारे, इन साले चलते पुर्जों ने सबक्रो फुद्दू बना दिया । यो इनके द्वारा तेयार किया गया 'विजय' था जो यहां से तुम्हारे चाचू और लूमड़ के साथ फरार हुआ । तभी तो इतनी आसानी से फरार हो गए वे। इन चलते पुजों क्रो पहले ही पता था कि गजाला के फ्लैट से लूमढ़ मिया' लिमोजीन में सवार हो गए हें । इन्होने जानबूझकर गाडी गैराज में खडी कराई ताकि लूमड़ भाइ को रहमान को कवर करके यहां पहुंचने का मौका मिल जाए । लूमढ़ मियां ने वही किया और समझते रहे कि वे बड़ा ग्रेट काम कर रहे हें । एक बार भी उनके दिमाग में यह बात नहीं आई कि रहमान नाम का ड्राइवर इतनी आसानी से मदद क्यों करता चला गया और उसे समुद्र में खुलने वाले रास्ते कै बारे में कैसे मालूम था । लब्लोलुबाब ये कि उसने इन्हीं की प्लानिंग के मुताबिक तुम्हारे चाचू ओर अपने विजय का यहां से फरार करा दिया ।”

जावेद की समझ में कुछ आया, कुछ नहीं भी आया मगर यह सवाल ज़रूर किया उसने-"इसका मतलब तो ये हुआ कि गिरधर चाचा का हत्यारा भी इनका विजय हे...यानी नकली विजय।"

“हममें किसी की हत्या करने की कूवत कहां हैं जावेद मियां, हम तो गाय के बच्चे है । जब से पाकिस्तान आए हैं, बस इन्हीं की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठा रहे हे । मरखना वैल तो इनका बिजय हे । टी टेन पर मंत्री जी को मार डालने की धमकी हो या सचमुच तुम्हारे चाचा का मार डालना । सबकुछ उसी ने किया हे । तुम लोगां को समुद्र के किनार से बेहाश करके भारतीय दुतावास मे भी उसी ने पहुंचाया और अब...दिलजले और मंत्रीजी को लेकर इंडिया भी गया है। हम तो यहां आराम फरमा रहे हैँ ।""

“कदम कदम पर वही हुआ 'हे मेरे बच्चे जो हमने चाहा ।" कहने कै साथ तुगलक ने गर्व से सीना चोड़ा कर लिया था-"यहां तक कि हाजी गल्ला को भी तुमने हमारी मर्जी से मारा ।"

"म मतलब? ” जावेद की खोपडी घूम गई । गहरी मुस्कान के साथ नुसरत ने आफताब से कहा था…"इसे मतलब समझाओ आफताब मिया' ।"

मारे हैरत के जावेद का बुरा हाल हो गया ।

चौंककर आफताब की तरफ देखा था उसने ।

और. ..उसके हौंठ़ं पर मौजूद धूर्त मुस्कान क्रो देखकर तो मानो दिमाग का फ्यूज ही उढ़ गया ।

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अभी मामले को समझने की कोशिश कर हीँ रहा था कि आफ्ताब ने कहा…“तुम मूर्ख हो जो मेरे झांसे में आए । नाक तो बहुत छोटी चीज़ है, ये लोग मेरे सारे अंग भी काट डालें तो मेँ इनक खिलाफ नहीं हो सकता ।"

"और वो रोना धोना ? बदले की बात कहना ?"

"मुझ खुशी है कि तुम मेरी एक्टिग में फंस गए । मैंने तुम्हें हाजी गल्ला के बेडरूम में पहुंचा दिया । वो भी कितनी आसानी से ! तुम्हें तब भी, बाल बराबर भी शक न हुआ !"

जावेद ने आश्चर्य के साथ नुसरत तुगलक से पूछा…"हाजी गल्ला को मरवाकर तुम्हें क्या फायदा हुआ?”

"हमारे अजीमूश्शानन मुल्क पर बोझ बन गया था गधे का पिल्ला, अमेरिका को पता लग गया था कि आइएसआईं ने उसे कहाँ छूपा रखा हे । देर-सवर व वेसे ही आपरेशन में इस हेडक्वार्टर क्रो ध्वस्त करने वाले थे जैसे में ओसामा बिन लादेन के मकान को किया था । हमने मुल्क की इज्जत भी बचाई और ये हेडक्वार्टर भी ।"

“हम फील्ड में भले ही नजर न आ रहे हों लेकिन सुर्दशन चक्र हमारा ही घूम रहा था । एक तरफ 'विजय' हमारे मिशन को अंजाम दे रहा था, दूसरी तरफ आफताब मियां, ओर देख लो…तुम हमारे पंजे मे हो, बिजय अपने मिशन पर निकल चुका हैं ।'"

"क्या अब भी उस बिजय का कोइ मिशन है?"

"इसीलिए तो कहा था हुजूर, इसीलिए तो कहा था कि किस्सा अभी खत्म नहीं हुआ है बल्कि किस्सा तो अब शुरू हुआ है । लोग साले "मिशन जावेद" में ही उलझे रहे ओर हमने खेल कुछ और ही खेल दिया…उससे बहुत ज्यादा ऊंचा खेल जितना लोग इसे समझ रहे थे । तुम हमारे लिए इतनी बडी प्राब्लम नहीं कि हमेँ इंडिया के सामने मदद की गुहार लगानी पढ़ती । तुम तो हमारे सामने बकरी के मेमने जैसे थे जावेद मियां, जिसे जब चाहते दबोच लेते । तुम्हारे बहाने से, हमने तो खेल ही कुछ और खेला । वो खेल जिस पर काफी पहले से काम कर रहे थे ।'"

"काफी पहले से ! क्या मतलब?"

"तो तुम क्या यह समझ रहे हो कि वह बिजय एकाध दिन या महीने में तैयार हो गया जो अलफांसे और विकास जैसी हस्तियों को धोखा दे सकै । कम से कम एक साल पहले से काम चल रहा था उस पर । गुरुओं के गुरु.. गुरुघंटाल की वीडियोज दिखा दिखाकर, इनके बारीक से बारीक हाव भावों को उसमें भरा जा रहा था और जब तैयार हो गया तो सवाल उठा…उसे कैसे असली बिजय से एक्सचेंज किया जाए ! तभी तुम सामने आए । तुम्हारी उठा पटक सामने आइ । हमें बहाना मिल गया । इंडिया से बिजय दी ग्रेट को भेजने के लिए कहा और प्रेस कांफ्रेंस कै जरिए सारी दुनिया ने देखा कि वे अपने मिशन में पूरी तरह कामयाब होकर इंडिया लौट गए हें । इधर हमारा काम हो गया उधर इंडिया की इज्जत रह गइ ।"

"उसके इंडिया जाने से क्या फायदा हुआ तुम्हें ?"

"बताओ गुरुदेव । " तुगलक ने बिजय से कहा-“इस सवाल का जवाब देते तुम्हीं अच्छे लगोगे । बहरहाल, हम तुम्हें पहले ही सबकुछ बता चुके हैं ।'"

अचानक पता नहीं विजय किस मूड में आ गया । बोला-"मैं तुम्हें एक खेल दिखाना चाहता हू ।”

"खेल ?”

"उसे देखकर तबियत झक्क हो जाएगी तुम्हारी । "

"कहना क्या चाहते हो बंदापरवर?"

"सुना मत, देखो।'" कहने के बाद वह उस वेड पर लेट गया जो उसके सोने के लिए ही उस हाल जैसे कमरे में डाला गया था । लेटने के बाद उसने कहा-"गौर से मेरे दाएं पैर क्रो देखो ।"

सबकी नज़रं उसके दाएं पैर मेँ मोजूद जूते पर जम गई ।

सिर्फ किबला था जिसके होठों पर रहस्यमय मुस्कान थिरक रही थी, जैसे जानता हो कि विजय क्या कर रहा हे ।

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इंडिया पहुंचने के, बल्कि विजय की कोठी पर पहुंचने कै करीब पंद्रह मिनट बाद विकास को होश आया ।

उछलकर खडा हो गया वह ।

सोफ पर पसरे पड़े बिजय ने कहा-"वेलकम दिलजले ।”

"ओह आप मुझे यहा ले आए । इसका मतलब आपने वहीँ किया जो फोन पर नुसरत-तुगलक से कहा था ! ”

"उसके अलावा कोइ चारा नहीं था दिलजले ।"

"आपने अपनी मर्जी कर ली ।'" भन्नाए हुए लहजे में विकास कहता चला गया-“अब में वो करूगा जो मैं चाहूगा ।'"

"क्या चाहोगे तुम ?"

"वापस पाकिस्तान जाऊंगा । जावेद को लेकर आऊंगा । मैंने उससे वादा किया था गुरु, मेरा वादा झूठा नहीं हो सकता ।” वह कहता चला गया…"ठीक है, मीडिया के सामने, दुनिया की नज़र में आप उसे वहां छाड़ आए मगर अब मैं उसे नंबर दो में लाऊंगा । इसमें तो आपको कोइ आपति नहीं होगी ।"

"तुम पागल हो गए हो लड़के, ये दीवानगी ठीक नहीं है ।”

"आप जानते हैं कि ऐसे हालात में मै पागल ही हो जाता हूं।"

“ओके ।" अचानक विजय मुस्कराया-"गुप्त भवन चलते है।”

"वहा क्यों ? " विकास चौंका ।

“फैसला काले लड़र्के के सामने होगा ।"

“वे क्या करेंगे इसमें ? मामला आपके और मेंरे बीच का है ।" कहते कहते जेसे अचानक उसे कुछ ख्याल आया । बोला-"ओह समझा कि आप क्या सोच रहे हैँ ?'

"क्या सोच रहे हैं ? "

"कुछ दिन के लिए मुझे गुप्त भवन में कैद करना चाहते हैँ ताकि पाकिस्तान न जा सकू । तब तक वहां जावेद को...

"लाहोलबिलाकूबत , हमारे लिए कैसे कैसे घटिया ख्याल आने लगे हैं तुम्हारी खोपडी में !"

"मैँ सब समझता हू , गुप्त भवन नहीं जाऊंगा मैं ।"

"चलो प्यारे, हम तुम्हे एक ऐसी चीज़ दिखाएंगे जिसे देखकर तुम्हारी तबियत फड़क उठेगी ।”

“मतलब ? ”

"उस चीज़ क्रो देखकर पूछना ।”

"देख बाद में लूगा, पहले बता दीजिए ।"

“बात का दम मत निकालो यार ।”

“एक बार कहलवाएं या लाख बार, मैं वहां नहीं जाऊंगा ।”

"भल ही हम वहां तुम्हें जावेद से मिला दें ।”

"ज-जावेद से ?”

"हां ।"

"आप मजाक कर रहे हैं ।"

"नहीं दिलजले, मजाक की गुंजाइश ही कहा छोडी है तुमने !” विजय पूरी तरह सीरियस हो गया था-""हक्रीकत ये है कि मीडिया के सामने नुसरत तुगलक को हमने जो सौंपा था वह जावेद नहीं, जावेद की डमी थी । असली जावेद को हम उसी फ्लाइट में इंडिया ले आए जिससे तुम आए हो ।"

"क....क्या आप सच कह रहे हें ?”

"तुम्हारी कसम दिलजले ।”

"अरे वाह गुरु, आप ग्रेट हैं । वाकई ग्रेट हैं आप । आपको कोई नहीं समझ सकता ।" उसने उछलकर बिजय का गाल चूम लिया था…“कैसे किया ये चमत्कार ? सारे मीडिया को...

“बाकी सवालों का ज़वाब वहीँ देंगे प्यारे ।" बिजय खडा होता हुआ बोला-"पहले मिल लो उससे जिसके लिए मरे जा रहे हो!"

“नहीं गुरु ।" विकास ने उसका रास्ता रोका-"पहले बताओ ।'"

"वहीं बताएंगे ।”

बिकास ने उसे बहुत ही गहरी नजरों से देखते हुए कहा…"और अगर मैं वहां जाऊ ही नहीं ?"

"मतलब ? ”

"मतलब ये हरामजादे ।” कहने कै साथ उसने बिजय कें गाल पर इतनी जोर से चांटा मारा था कि हलक से चीख निकालने के साथ वह काफी दूर फ़र्श पर जा गिरा ।

गज़ब की फुर्ती के साथ उठने की कोशिश क्री थी उसने मगर अभी आधा ही उठ पाया था कि जबड़े पर विकास कै बूट की ठोकर पडी । वह दूसरी चीख कें साथ सोफ से जा टकराया ।

मुंह से खून बहने लगा था ।

उठने की कोशिश कर ही रहा था कि विकास ने जेब से रिवाल्वर निकालकर उसकी कनपटी से सटाते हुए कहा-"जरा भी चालाकी दिखाने की कोशिश की तो भेजा उडा दूंगा ।"

"य य तुम्हें क्या हो गया है दिलजले?"

"दिलजले । दिलजले ।।। अब भी यह समझ रहा है कुत्ते कि मै तुझे गुरु ही समझ रहा हू ।” दांतों पर दांत जमाकर उसने रिवाल्वर के दस्ते का भरपूर वार उसके सिर पर किया ।

चीख के साथ दीवार से जा टकराया वह।

सिर से खून बहने लगा था मगर क्योंकि विकास जानता था कि उसे पूरी ट्रेनिंग के बाद बिजय बनाया गया है अर्थात् उसमें चुस्ती फुर्ती भी बिजय जैसी ही है इसलिए ज़रा भी मोका दिए बगेर पुन: रिवाल्वर उसके सिर से सटाता हुआ गुर्राया-"मैं ये भी जानता हूं हरामजादे कि तू यहां मुकम्मल सीक्रेट सर्विस क्रो नेस्तनाबूद करने कै मिशन पर आया हे । तुझे ये तो मालूम हे कि सीक्रेट सर्विस के आफिस को गुप्त भवन कहा जाता है मगर ये नहीं मालूम कि वह है कहा ? इसलिए, चालाकी से वहा चलने के लिए कह रहा था ताकि मैं तुझे वहा पहुंचा दू ओर तू अपना खेल, खेल जाए ।'"

एकाएक उसने हैरतअंगेज फुर्ती दिखाते हुए बिकास की वह कलाई पकडी जिसमेँ रिवाल्वर था और पलक झपकते ही उसे बुरी तरह उमेठ दिया मगर विकास ने उसी कलाई पर अपने पूरे जिस्म को कलाबाजी खिलाकर कोण बदल दिया था ।

हालाकि वह कलाइ अब भी कथित विजय की गिरफ्त मेंं थी लकिन विकास का रिवाल्वर न केवल उसक दूसरे हाथ में पहुंच चुका था बल्कि पुन: कथित विजय को कनपटी से सट चुका था, साथ ही गुर्राया था वह…"यदि तेरी मौत पर जावेद ने अपना नाम न लिख दिया होता कुत्ते तो अभी तक मैं तेरे जिस्म मेँ आग भर चुका होता ।'"

अब, विवश हो गया था वह । बोला-"त तुम्हें कैसे पता?"

“उन्होने खबर पहुंचाई जिनकी तू शक्ल बनाए घूम रहा है ।'"

“उ-उन्होने कब?" वह हैरान था-"बे तो कैद में हे ।'"

"उन्हें कैद करना तेरे उन जोकरों कें बसका नहीं है । मेरे गुरु वो हस्ती हैँ जो कैद में रहकर भी ऐसे ऐसे चमत्कार दिखा देते हैं जिनके बारे में कोई सोच भी नहीँ सकता ।'"
 
"म मतलब ? ”

“बात उस वक्त की है जब हम सबको राजदूत कै सुपुर्द करके तू अपने कमरे में जाकर सो गया था । सुबह के करीब पांच बजे मुझे होश में लाया गया । यह देखकर मै दंग रह गया कि होश में लाने वाले अलफांसे गुरु थे और राजदूत महोदय भी उनके साथ ही खड़ थे । अलफांसे गुरु ने कहा-‘जो विजय तुम्हारे साथ हे और सुबह को तुम्हें और नौशाद अंसारी को बिशेष विमान से इंडिया ले जाने वाला हे, वह नकली है । उसका मिशन इंडिया जाकर सीक्रेट सर्विस को नेस्तनाबूद करना है । तुम्हें बेहोश होने की एक्टिग करने के साथ इंडिया चले जाना है । बस इस बात का ध्यान रखना कि वह गुप्त भवन न जा पाए ।' यह सब सुनकर मैं हक्का बक्का रह गया । पूछा कि आपको यह सब कैस मालूम और बिजय गुरु कहा हैं ?' कहा…"फिलहाल वह नुसरत तुगलक की कैद में है पर फिक्र मत करो, सारा काम उसी के प्लान कै मुताबिक हो रहा है ।"

कथित बिजय को जेसे लकवा मार गया था ।

"अलफासे गुरु ने मुझे यह भी बता दियाहै कि तेरे चेहरे पर जो मेकअप हे, इसे किसी भी चीज़ से साफ नहीं किया जा सकता मगर अब तुझे, मुझे अपना असली नाम बताना होगा ।"'

"र रहमत खान ।" उसे कहना पड़ा ।

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ऐसा लग रहा था जेसे विजय जूते कै अंदर मोजूद अपने पैर के अंगूठे को हिला रहा हो ।

किबला के अलावा किसी की भी समझ में न आया कि वह क्या कर रहा था ।

"बात खोपडी में घुस नहीं रही हुजूरेआला ।” अंतत: तुगलक को कहना पड़ा-"ये क्या बाजीगरी दिखा रहे हैं आप ?”

तभी, वातावरण में 'पिंग पि'ग' की आवाज गुजीं ।

""अरे ये क्या हुआ ?' कहने के साथ किवला ने अपनी जेब से पेजर जैसा यंत्र निकाला और किसी कै भी कुछ समझने से पहले उसे तुगलक की आंखों के सामने करता बोला…"देखना सर, क्या लिखा आया हे इसमे ? दरअसल मेरे पास चश्मा नहीं है !"

तुगलक ने स्क्रीन पर लिखे मेटर को पढा । लिखा था-“मै इसी तरह सारी जानकारियां लूमड़ तक पहुचाता रहा…विजय दी ग्रेट । "

उपरोक्त पंक्ति को पढते ही तुगलक कै जहन में बिजली की सी गति से 'खतरा' शब्द कौंधा परंतु देर हो चुकी थी ।

इससे पहले कि वह कुछ करता, किवला दूसरी जेब से रिवाल्वर निकालकर उसकी कनपटी से सटाते हुए कहा था…"जरा भी हरकत की तो कोई हरकत करने लायक नहीं रहोगे ।”

तुगलक के मुंह से निकला-"क किबला तुम.. .

"अलफांसे कहते है मुझे ।"' वह कहता चला गया-“किबला तुम्हारे विजय, हमारे बिकास और इंडिया के ला मिनिस्टर के साथ बिशेष बिमान के लगेज केविन में सवार होकर इंडिया पहुच चुका हे । आं हां हां...हिलना नहीँ तुगलक मिंया' ओर तुम भी कोई हरकत मत करना नुसरत भाई वरना दो हंसों का जोडा बिछुड जाएगा । मेरी उंगली की जुबिश तुम्हारे साथी को खुदागंज़ पहुचा देगी। "'

विजय ने झपटकर अपने दोनों हाथ पीछे से नुसरत की गर्दन पर जमाते हुए कहा…"गलत बात है लूमड़ मियां, दो हंसों के जोडे क्रो बिछाड़ना बहुत गलत बात हे । हम ये अन्याय नहीं होने दंगे । उधर तुम अपनी लिबलिबी दवाओ, इधर हम इसका टेंटवा दबा देते हें । दोनों यार गले में बांहं डालकर जहन्नुम मे दाखिल होंगे तो खुदा भी खुश हो जाएगा । हमेशा साथ रहे हें, साथ ही रहने चाहिएं ।"'

नुसरत तुगलक ही नहीँ, सभी सन्न रह गए थे ।

आफताब का हाथ अपनी जेब की तरफ रेंगा ही था कि किबला बने अलफांसे का रिवाल्वर गर्जा ।

अगर यह लिखा जाए तो गलत न होगा कि आफताब के मुंह से ठीक से चीख भी न निकल सकी थी क्योकि गोली ठीक वहां लगी थी जहा' उसकी नाक होनी चाहिए थी ।

खोपडी के पीछे से खून का फव्वारा सा उछला था और साथ हीँ वह उछलकर पीछे जा गिरा था बल्कि अगर यह कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा कि गिरा वह नहीं था बल्कि उसकी लाश गिरी थी।

तुगलक ने मोंके का फायदा उठाने की कोशिश ज़रूर की परंतु इधर अलफांसे था । उसे कोई भी मौका दिए बगेर रिवाल्वर को पुन: उसकी कनपटी से सटाता गुर्राया-“तुझे भी यहां से वहां पहुचने में उतनी ही देर लगेगी जितनी आफ्ताब को लगी है ।"

तुगलक कै सारे इरादे ध्वस्त हो गए । उधर नुसरत कै इरादे पहले ही ध्वस्त हुए पड़े थे क्योंकि विजय उसकी जेब से रिवाल्वर निकालकर उसी की पसलियों पर रख चुका था ।

सबकुछ इतनी तेजी से हुआ था कि जावेद, आरती और मोगली की समझ में कुछ न आया । भौंचक्के से रह गए थे वे ।

फिर, सबसे पहले जावेद ने खुद को संभाला ।

उसने वही फुर्ती से आफताब की लाश की जेब से रिवाल्वर निकालकर नुसरत तुगलक पर तान दिया था ।

"आदमी हमेशा तब मारा जाता है नुसरत मियां जब वह आवर कान्फिडेस का शिकार हो जाता है ।"' विजय ने कहा…“अब देखो न, तुमने यह सोचकर इनमें से किसी को हथकडी तक न पहनाइ कि अपनी रियासत में हो,यहां कोई कुछ नहीँ कर सकता । यहीं भूल गए कि ये कमरा साऊंडप्रूफ हैं । एक गोली चली हे । तुम्हारा प्यादा मर चुका हे लेकिन बाहर बालों को भनक तक न है । "

"तुमने एक वार फिर साबित कर दिया गुरूदेव कि तुम वाकई गुरुओं के गुरु...गुरुघंटाल हो ।"' नुसरत ने तुरंत "शाक्ड स्थिति' से निकलकर अपनी 'रौ' में आते हुए कहा…“किवला को अंतर्राष्टीय घपड़चट्टू कब बना दिया तुमने?"

"ये पवित्र काम पिछली रात इंडियन दूतावास में हुआ ।"

"पर कैसे ? "'

"तुम तो पूरे ही घोंचू निकले मियां, अभी तक नहीं समझे ! नहीं समझे तो देखो इसे ।"' कहने के साथ बिजय ने अपने दाएं पैर का जूता निकालकर दूर फैका, दूसर हाथ से पैर के अंगूठे के आकार का पेजर जेसा यंत्र निकालकर उसे दिखाता हुआ बोला…"इस पर हम बगेर देखे, पैर के अंगूठे सै ही कोइ भी मेसेज़ टाइप करके लूमड़ के यंत्र पर भेज सकते हें । बल्कि जब से तुमने हमेँ अपनी शाही मेहमान नवाजी में रखा है तभी से लगातार भेज रहे हें । इसलिए इन्हे मालूम था कि तुम्हारे प्लान के मुताबिक रहमान की मदद से जिस बिजय को कैद से निकालकर ले जा रहे हैं, वह नकली है । हमारे निर्देश पर उसके साथ उसी तरह काम करते रहे जेसे उसे असली विजय समझ रहे हों । हमारे ही निर्देश पर दुतावास में इन्होने तुम्हारे प्यादे का भेद दिलजले को भी बता दिया । वह इंडिया में उसकी चटनी बना देगा मगर मारेगा नहीं क्योकि वह जावेद का शिकार हे ।"'

तुगलक वाला…"ये तो नहले पर दहला हो गया हुजूर ।"'

"अब सवाल ये है कि तुम यहा से निकलोगे कैसे ?" तुगलक ने कहा…"समुद्र में खुलने वाला रास्ता भी तुम्हारे काम आने वाला नहीं है क्योंंकि दोनों बार वह हमारे ही आदेश पर खुला था ।"‘

"काम तो अब भी तुम्हारे ही आदेश पर होगा ।" अलफासे ने कहा-“पर हमेँ उस रास्ते की जरूरत नहीं है ।”

"फिर किस रास्ते की जरूरत हैं ?”

"कुतुबमीनार की छत पर एक छोटा सा हैलीकाप्टर खड़ा देखा था हमने ।"' विजय बोला…"सीमा पार करने के लिए वो मिल जाए तो तुम्हारी बडी मेहरबानी होगी ।"

"पर उस तक आपको पहुंचने कौन देगा हुजूर । बीच में इतने सारे गार्ड खडे हैं और सबके हाथों मेँ एक सैंतालिस हैं ।"

"आप पहुँचाएंगे जनाब, जब वे आपको हमारी धार पर देखेंगे तो सबकी एकै सेंतात्तिसों को जंग लग जाएगा ।"

"मतलब हम खुद तुम्हें यहां से निकालें ?"

"नहीं निकालोगे तो हम तुम्हारे जिस्मों से रूह निकाल लेगे ।" खतरनाक लहजे में ये अलफाज़ अलफांसे ने कहे थे-“ये तमंचे हमने दिखाने कै लिए तुम्हारी कनपटियों से नहीं लगाए हुए हैं ।"

दोनों चुप हो गए । एक दूसरे की तरफ देखा था उन्होंने । एकाएक जावेद ने खतरनाक लहजे में कहा-"बोलो । वरना ये मारें, न मारें । मैँ तुम्हें ज़रूर गोली मार दूंगा ।”

"और तुम जानते हो । "' अलफांसे ब्रोला-"निकल हम तब भी जाएंगें । फर्क सिर्फ इतना होगा कि कुछ लहु गिरानी पडेगी । हम अनेक बार इससे भी ज्यादा टिपिकल ज़गहो से निकल चुके हैँ ।” नुसरत ने तुगलक से कहा-"क्या कहते हो तुगलक भैया?"

"जान है जहान हे नुसरत बहना ।"" तुगलक बोला ।

"वेसे भी जब सारी बाजी हार ही चुँकै हैं तो जान देने से क्या फायदा ? फिर कभी शतरंज की कोई बाजी बिछाएंगे ।" तुगलक ने बिजय से कहा…"हम `तैयार हें गुरुजी ।"

"तो चलौ ।"" जावेद गुर्राया ।

इस तरह. ..सफर चालू हुआ ।

गेलरी में पहुंचते ही गार्डस की गनें तनीं मगर नुसरत तुगलक कै हुक्म पर झुक गई । सारे रास्ते यही होता रहा ।

लिफ्ट द्वारा कुतुबमीनार की छत पर पहुंचे ।

हेलीकाप्टर में बैठने की बारी आईं तो अलफांसे ने कहा-“तुममें से एक क्रो हमारे साथ चलना होगा ।"

“ऐसा क्यों ? " दोनों ने एकसाथ पूछा ।

"ताकि हेलीकाप्टर उड़ते ही कोइ उसे उड़ा न सकें ।"

"ऐसा नहीं होगा ।""

“एक को तो बैठना पडेगा, फैसला कर लो…कौन बैठेगा ? जो बैठेगा, बार्डर पर पैराशूट से कूद सकता है ।"

"तू बैठ । तुझे चड्डी खाने का बड़ा शौक है ।" तुगलक बोला ।

नुसरत ने कहा-"तूचढ़ जा । तेरी अम्मी ने मुझें बताया था कि तुझे पैराशूट से कूदने में बहुत मजा आता हे ।"

जावेद गुर्राया-"जल्दी फेसला करो ।"

"चलता हूं न मियां ! " तुगलक बोला…"नाराज़ क्यों होते हो ? ""

इस तरह-नुसरत और रूबिया कै अलावा सभी हेलीकाप्टर मेँ सवार हो गए ।

पायलट सीट विजय ने संभाली थी । बार्डर पर तुगलक क्रो पैराशूट के साथ गिराता हुआ हैलीकाप्टर भारतीय सीमा में दाखिल हो गया ।

समाप्त
 
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