S
StoryPublisher
Guest
वही हुआ जैसा बिजय ने कहा था…यानी संसार भर के मीडिया के सामने उसने जावेद को नुसरत तुगलक को सौंपा और उन्होंने उसके लिए विशेष विमान का इंतजाम किया ।
विकास और नौशाद की मौजूदगी मीडिया से छुपाई गई थी ।
बिकास तो खैर बेहोश था ही ।
जो हो रहा था, नौशाद अंसारी को भी उस पर एतराज था ।
उसने विजय से कहा भी…"जावेद न हिंदुस्तान के लिए आतंकी हे, न पाकिस्तान के लिए-इसलिए उसे पाकिस्तान के हवाले नहीँ किया जाना चाहिए ।"
विजय ने यह कहा…"मैं अच्छी तरह जानता हू मंत्री जी कि सच्चाई वहीँ हे जो आप कह रहे हैं लेकिन राष्ट्र के सम्मान को बचाने के लिए कई बार वो करना पढ़ता है जो सही नहीं होता ।"
नौशाद को चुप रह जाना पडा ।
कर भी क्या सकता था वह !
प्रेस कांफ्रेंस के दरम्यान जावेद खामोश रहा । तूफान से पहले क्री सी खामोशी थी उसके चेहरे पर । पत्रकार ने अनेक सवाल किए मगर उसने किसी का ज़वाब न दिया ।
जबड़े कसे बैठा रहा ।
लेकिन जब प्रेस कांफ्रेंस ख़त्म की तरफ थी तो ज्वालामुखी की तरह फटकर बिजय की तरफ दखता हुआ गुर्राया था-"तुझें नहीं छाडूंगा मैं । मैंन तेरी लाश आरती के कदमों में डालने की कसम खाई है । गिरधर चाचा के खून की एक एक बूंद का हिसाब देना होगा तुझे और ये तो तूजानता ही है कि जावेद कै कानुन के मुताबिक खून का बदला खून हे ।"
भले ही उसके शब्दों ने वहां सनसनी फेला दी थी मगर बिजय पर उसकी धमकी का कोई असर नजर न आया ।
वह पूर्ववत: मुस्कराता रहा ।
हालांकि बिजय ने जावेद के साथ आरती, रूबिया, आफ्ताब, मोगली ओर किबला को भी नुसरत तुगलक के हवाले किया था मगर उन्हें मीडिया के सामने पेश नहीं किया गया ।
प्रेस कांफ्रेंस के बाद उधर बिजय, बिकास और नौशाद अंसारी को लेकर विशेष विमान से इंडिया के लिए रवाना हुआ इधर नुसरत तुगलक उन छओ को लेकर कूतूवमीनार जेसी इमारत की तरफ ।
जाहिर है कि उनकी गाडी के लिए हेडक्वार्टर के सारे दरवाजे खुलते चले गए ।
लिफ्ट द्वारा नीचे पहुंचे । दोनों तरफ सशस्त्र गार्डस से सुसज्जित गेलरियों से गुजरते हुए उस कमरे में दाखिल हुए जिसमें किसी समय बिजय को कैद किया गया था ।
वहां बिजय इस वक्त भी था । उन्हें आता देखते ही उसने नारा सा लगाया था…"आओ.....आओ तुगलक मिया और नुसरत महाशय । पूरी बारात लेकर आए तुम । इसका मतलब ये हुआ कि…मुकम्मल फतह कै साथ पधारे हो ?”
“ फ़तह कहां हुजूर ।"
" ये तो शुरुआत हे ।" नुसरत ने बड़े ही लच्छेदार अंदाज में कहा था…"कूछ लोग सोच रहे हें कि किस्सा खत्म हुआ । उस वक्त उनके दिमागों के परखच्व उढ़ जाएंगे जब पता लगेगा कि असली किस्सा तो अब शुरू हुआ हे ।'"
बिजय को, यानी उस शख्स का वहां देखकर जावेद, मोगली, आरती और रुबिया के चेहरों पर आश्चर्य कै भाव नजर आ रहे थे, जिसे उन्होने विकास और नौशाद के साथ बिमान मेँ सवार होकर भारत के लिए रवाना होत्ते देखा था ।
जावेद ने तो कह भी दिया-“ये क्या चक्कर है । इंडियन जासूस तुम हो या या वो जो विकास और चाचूक्रो भारत ले गया ?"
"विजय दी ग्रट तो हम ही है जावेद प्यारे, इन साले चलते पुर्जों ने सबक्रो फुद्दू बना दिया । यो इनके द्वारा तेयार किया गया 'विजय' था जो यहां से तुम्हारे चाचू और लूमड़ के साथ फरार हुआ । तभी तो इतनी आसानी से फरार हो गए वे। इन चलते पुजों क्रो पहले ही पता था कि गजाला के फ्लैट से लूमढ़ मिया' लिमोजीन में सवार हो गए हें । इन्होने जानबूझकर गाडी गैराज में खडी कराई ताकि लूमड़ भाइ को रहमान को कवर करके यहां पहुंचने का मौका मिल जाए । लूमढ़ मियां ने वही किया और समझते रहे कि वे बड़ा ग्रेट काम कर रहे हें । एक बार भी उनके दिमाग में यह बात नहीं आई कि रहमान नाम का ड्राइवर इतनी आसानी से मदद क्यों करता चला गया और उसे समुद्र में खुलने वाले रास्ते कै बारे में कैसे मालूम था । लब्लोलुबाब ये कि उसने इन्हीं की प्लानिंग के मुताबिक तुम्हारे चाचू ओर अपने विजय का यहां से फरार करा दिया ।”
जावेद की समझ में कुछ आया, कुछ नहीं भी आया मगर यह सवाल ज़रूर किया उसने-"इसका मतलब तो ये हुआ कि गिरधर चाचा का हत्यारा भी इनका विजय हे...यानी नकली विजय।"
“हममें किसी की हत्या करने की कूवत कहां हैं जावेद मियां, हम तो गाय के बच्चे है । जब से पाकिस्तान आए हैं, बस इन्हीं की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठा रहे हे । मरखना वैल तो इनका बिजय हे । टी टेन पर मंत्री जी को मार डालने की धमकी हो या सचमुच तुम्हारे चाचा का मार डालना । सबकुछ उसी ने किया हे । तुम लोगां को समुद्र के किनार से बेहाश करके भारतीय दुतावास मे भी उसी ने पहुंचाया और अब...दिलजले और मंत्रीजी को लेकर इंडिया भी गया है। हम तो यहां आराम फरमा रहे हैँ ।""
“कदम कदम पर वही हुआ 'हे मेरे बच्चे जो हमने चाहा ।" कहने कै साथ तुगलक ने गर्व से सीना चोड़ा कर लिया था-"यहां तक कि हाजी गल्ला को भी तुमने हमारी मर्जी से मारा ।"
"म मतलब? ” जावेद की खोपडी घूम गई । गहरी मुस्कान के साथ नुसरत ने आफताब से कहा था…"इसे मतलब समझाओ आफताब मिया' ।"
मारे हैरत के जावेद का बुरा हाल हो गया ।
चौंककर आफताब की तरफ देखा था उसने ।
और. ..उसके हौंठ़ं पर मौजूद धूर्त मुस्कान क्रो देखकर तो मानो दिमाग का फ्यूज ही उढ़ गया ।
133
अभी मामले को समझने की कोशिश कर हीँ रहा था कि आफ्ताब ने कहा…“तुम मूर्ख हो जो मेरे झांसे में आए । नाक तो बहुत छोटी चीज़ है, ये लोग मेरे सारे अंग भी काट डालें तो मेँ इनक खिलाफ नहीं हो सकता ।"
"और वो रोना धोना ? बदले की बात कहना ?"
"मुझ खुशी है कि तुम मेरी एक्टिग में फंस गए । मैंने तुम्हें हाजी गल्ला के बेडरूम में पहुंचा दिया । वो भी कितनी आसानी से ! तुम्हें तब भी, बाल बराबर भी शक न हुआ !"
जावेद ने आश्चर्य के साथ नुसरत तुगलक से पूछा…"हाजी गल्ला को मरवाकर तुम्हें क्या फायदा हुआ?”
"हमारे अजीमूश्शानन मुल्क पर बोझ बन गया था गधे का पिल्ला, अमेरिका को पता लग गया था कि आइएसआईं ने उसे कहाँ छूपा रखा हे । देर-सवर व वेसे ही आपरेशन में इस हेडक्वार्टर क्रो ध्वस्त करने वाले थे जैसे में ओसामा बिन लादेन के मकान को किया था । हमने मुल्क की इज्जत भी बचाई और ये हेडक्वार्टर भी ।"
“हम फील्ड में भले ही नजर न आ रहे हों लेकिन सुर्दशन चक्र हमारा ही घूम रहा था । एक तरफ 'विजय' हमारे मिशन को अंजाम दे रहा था, दूसरी तरफ आफताब मियां, ओर देख लो…तुम हमारे पंजे मे हो, बिजय अपने मिशन पर निकल चुका हैं ।'"
"क्या अब भी उस बिजय का कोइ मिशन है?"
"इसीलिए तो कहा था हुजूर, इसीलिए तो कहा था कि किस्सा अभी खत्म नहीं हुआ है बल्कि किस्सा तो अब शुरू हुआ है । लोग साले "मिशन जावेद" में ही उलझे रहे ओर हमने खेल कुछ और ही खेल दिया…उससे बहुत ज्यादा ऊंचा खेल जितना लोग इसे समझ रहे थे । तुम हमारे लिए इतनी बडी प्राब्लम नहीं कि हमेँ इंडिया के सामने मदद की गुहार लगानी पढ़ती । तुम तो हमारे सामने बकरी के मेमने जैसे थे जावेद मियां, जिसे जब चाहते दबोच लेते । तुम्हारे बहाने से, हमने तो खेल ही कुछ और खेला । वो खेल जिस पर काफी पहले से काम कर रहे थे ।'"
"काफी पहले से ! क्या मतलब?"
"तो तुम क्या यह समझ रहे हो कि वह बिजय एकाध दिन या महीने में तैयार हो गया जो अलफांसे और विकास जैसी हस्तियों को धोखा दे सकै । कम से कम एक साल पहले से काम चल रहा था उस पर । गुरुओं के गुरु.. गुरुघंटाल की वीडियोज दिखा दिखाकर, इनके बारीक से बारीक हाव भावों को उसमें भरा जा रहा था और जब तैयार हो गया तो सवाल उठा…उसे कैसे असली बिजय से एक्सचेंज किया जाए ! तभी तुम सामने आए । तुम्हारी उठा पटक सामने आइ । हमें बहाना मिल गया । इंडिया से बिजय दी ग्रेट को भेजने के लिए कहा और प्रेस कांफ्रेंस कै जरिए सारी दुनिया ने देखा कि वे अपने मिशन में पूरी तरह कामयाब होकर इंडिया लौट गए हें । इधर हमारा काम हो गया उधर इंडिया की इज्जत रह गइ ।"
"उसके इंडिया जाने से क्या फायदा हुआ तुम्हें ?"
"बताओ गुरुदेव । " तुगलक ने बिजय से कहा-“इस सवाल का जवाब देते तुम्हीं अच्छे लगोगे । बहरहाल, हम तुम्हें पहले ही सबकुछ बता चुके हैं ।'"
अचानक पता नहीं विजय किस मूड में आ गया । बोला-"मैं तुम्हें एक खेल दिखाना चाहता हू ।”
"खेल ?”
"उसे देखकर तबियत झक्क हो जाएगी तुम्हारी । "
"कहना क्या चाहते हो बंदापरवर?"
"सुना मत, देखो।'" कहने के बाद वह उस वेड पर लेट गया जो उसके सोने के लिए ही उस हाल जैसे कमरे में डाला गया था । लेटने के बाद उसने कहा-"गौर से मेरे दाएं पैर क्रो देखो ।"
सबकी नज़रं उसके दाएं पैर मेँ मोजूद जूते पर जम गई ।
सिर्फ किबला था जिसके होठों पर रहस्यमय मुस्कान थिरक रही थी, जैसे जानता हो कि विजय क्या कर रहा हे ।
∆∆∆∆∆
∆∆∆∆∆
∆∆∆∆∆
∆∆∆∆∆
विकास और नौशाद की मौजूदगी मीडिया से छुपाई गई थी ।
बिकास तो खैर बेहोश था ही ।
जो हो रहा था, नौशाद अंसारी को भी उस पर एतराज था ।
उसने विजय से कहा भी…"जावेद न हिंदुस्तान के लिए आतंकी हे, न पाकिस्तान के लिए-इसलिए उसे पाकिस्तान के हवाले नहीँ किया जाना चाहिए ।"
विजय ने यह कहा…"मैं अच्छी तरह जानता हू मंत्री जी कि सच्चाई वहीँ हे जो आप कह रहे हैं लेकिन राष्ट्र के सम्मान को बचाने के लिए कई बार वो करना पढ़ता है जो सही नहीं होता ।"
नौशाद को चुप रह जाना पडा ।
कर भी क्या सकता था वह !
प्रेस कांफ्रेंस के दरम्यान जावेद खामोश रहा । तूफान से पहले क्री सी खामोशी थी उसके चेहरे पर । पत्रकार ने अनेक सवाल किए मगर उसने किसी का ज़वाब न दिया ।
जबड़े कसे बैठा रहा ।
लेकिन जब प्रेस कांफ्रेंस ख़त्म की तरफ थी तो ज्वालामुखी की तरह फटकर बिजय की तरफ दखता हुआ गुर्राया था-"तुझें नहीं छाडूंगा मैं । मैंन तेरी लाश आरती के कदमों में डालने की कसम खाई है । गिरधर चाचा के खून की एक एक बूंद का हिसाब देना होगा तुझे और ये तो तूजानता ही है कि जावेद कै कानुन के मुताबिक खून का बदला खून हे ।"
भले ही उसके शब्दों ने वहां सनसनी फेला दी थी मगर बिजय पर उसकी धमकी का कोई असर नजर न आया ।
वह पूर्ववत: मुस्कराता रहा ।
हालांकि बिजय ने जावेद के साथ आरती, रूबिया, आफ्ताब, मोगली ओर किबला को भी नुसरत तुगलक के हवाले किया था मगर उन्हें मीडिया के सामने पेश नहीं किया गया ।
प्रेस कांफ्रेंस के बाद उधर बिजय, बिकास और नौशाद अंसारी को लेकर विशेष विमान से इंडिया के लिए रवाना हुआ इधर नुसरत तुगलक उन छओ को लेकर कूतूवमीनार जेसी इमारत की तरफ ।
जाहिर है कि उनकी गाडी के लिए हेडक्वार्टर के सारे दरवाजे खुलते चले गए ।
लिफ्ट द्वारा नीचे पहुंचे । दोनों तरफ सशस्त्र गार्डस से सुसज्जित गेलरियों से गुजरते हुए उस कमरे में दाखिल हुए जिसमें किसी समय बिजय को कैद किया गया था ।
वहां बिजय इस वक्त भी था । उन्हें आता देखते ही उसने नारा सा लगाया था…"आओ.....आओ तुगलक मिया और नुसरत महाशय । पूरी बारात लेकर आए तुम । इसका मतलब ये हुआ कि…मुकम्मल फतह कै साथ पधारे हो ?”
“ फ़तह कहां हुजूर ।"
" ये तो शुरुआत हे ।" नुसरत ने बड़े ही लच्छेदार अंदाज में कहा था…"कूछ लोग सोच रहे हें कि किस्सा खत्म हुआ । उस वक्त उनके दिमागों के परखच्व उढ़ जाएंगे जब पता लगेगा कि असली किस्सा तो अब शुरू हुआ हे ।'"
बिजय को, यानी उस शख्स का वहां देखकर जावेद, मोगली, आरती और रुबिया के चेहरों पर आश्चर्य कै भाव नजर आ रहे थे, जिसे उन्होने विकास और नौशाद के साथ बिमान मेँ सवार होकर भारत के लिए रवाना होत्ते देखा था ।
जावेद ने तो कह भी दिया-“ये क्या चक्कर है । इंडियन जासूस तुम हो या या वो जो विकास और चाचूक्रो भारत ले गया ?"
"विजय दी ग्रट तो हम ही है जावेद प्यारे, इन साले चलते पुर्जों ने सबक्रो फुद्दू बना दिया । यो इनके द्वारा तेयार किया गया 'विजय' था जो यहां से तुम्हारे चाचू और लूमड़ के साथ फरार हुआ । तभी तो इतनी आसानी से फरार हो गए वे। इन चलते पुजों क्रो पहले ही पता था कि गजाला के फ्लैट से लूमढ़ मिया' लिमोजीन में सवार हो गए हें । इन्होने जानबूझकर गाडी गैराज में खडी कराई ताकि लूमड़ भाइ को रहमान को कवर करके यहां पहुंचने का मौका मिल जाए । लूमढ़ मियां ने वही किया और समझते रहे कि वे बड़ा ग्रेट काम कर रहे हें । एक बार भी उनके दिमाग में यह बात नहीं आई कि रहमान नाम का ड्राइवर इतनी आसानी से मदद क्यों करता चला गया और उसे समुद्र में खुलने वाले रास्ते कै बारे में कैसे मालूम था । लब्लोलुबाब ये कि उसने इन्हीं की प्लानिंग के मुताबिक तुम्हारे चाचू ओर अपने विजय का यहां से फरार करा दिया ।”
जावेद की समझ में कुछ आया, कुछ नहीं भी आया मगर यह सवाल ज़रूर किया उसने-"इसका मतलब तो ये हुआ कि गिरधर चाचा का हत्यारा भी इनका विजय हे...यानी नकली विजय।"
“हममें किसी की हत्या करने की कूवत कहां हैं जावेद मियां, हम तो गाय के बच्चे है । जब से पाकिस्तान आए हैं, बस इन्हीं की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठा रहे हे । मरखना वैल तो इनका बिजय हे । टी टेन पर मंत्री जी को मार डालने की धमकी हो या सचमुच तुम्हारे चाचा का मार डालना । सबकुछ उसी ने किया हे । तुम लोगां को समुद्र के किनार से बेहाश करके भारतीय दुतावास मे भी उसी ने पहुंचाया और अब...दिलजले और मंत्रीजी को लेकर इंडिया भी गया है। हम तो यहां आराम फरमा रहे हैँ ।""
“कदम कदम पर वही हुआ 'हे मेरे बच्चे जो हमने चाहा ।" कहने कै साथ तुगलक ने गर्व से सीना चोड़ा कर लिया था-"यहां तक कि हाजी गल्ला को भी तुमने हमारी मर्जी से मारा ।"
"म मतलब? ” जावेद की खोपडी घूम गई । गहरी मुस्कान के साथ नुसरत ने आफताब से कहा था…"इसे मतलब समझाओ आफताब मिया' ।"
मारे हैरत के जावेद का बुरा हाल हो गया ।
चौंककर आफताब की तरफ देखा था उसने ।
और. ..उसके हौंठ़ं पर मौजूद धूर्त मुस्कान क्रो देखकर तो मानो दिमाग का फ्यूज ही उढ़ गया ।
133
अभी मामले को समझने की कोशिश कर हीँ रहा था कि आफ्ताब ने कहा…“तुम मूर्ख हो जो मेरे झांसे में आए । नाक तो बहुत छोटी चीज़ है, ये लोग मेरे सारे अंग भी काट डालें तो मेँ इनक खिलाफ नहीं हो सकता ।"
"और वो रोना धोना ? बदले की बात कहना ?"
"मुझ खुशी है कि तुम मेरी एक्टिग में फंस गए । मैंने तुम्हें हाजी गल्ला के बेडरूम में पहुंचा दिया । वो भी कितनी आसानी से ! तुम्हें तब भी, बाल बराबर भी शक न हुआ !"
जावेद ने आश्चर्य के साथ नुसरत तुगलक से पूछा…"हाजी गल्ला को मरवाकर तुम्हें क्या फायदा हुआ?”
"हमारे अजीमूश्शानन मुल्क पर बोझ बन गया था गधे का पिल्ला, अमेरिका को पता लग गया था कि आइएसआईं ने उसे कहाँ छूपा रखा हे । देर-सवर व वेसे ही आपरेशन में इस हेडक्वार्टर क्रो ध्वस्त करने वाले थे जैसे में ओसामा बिन लादेन के मकान को किया था । हमने मुल्क की इज्जत भी बचाई और ये हेडक्वार्टर भी ।"
“हम फील्ड में भले ही नजर न आ रहे हों लेकिन सुर्दशन चक्र हमारा ही घूम रहा था । एक तरफ 'विजय' हमारे मिशन को अंजाम दे रहा था, दूसरी तरफ आफताब मियां, ओर देख लो…तुम हमारे पंजे मे हो, बिजय अपने मिशन पर निकल चुका हैं ।'"
"क्या अब भी उस बिजय का कोइ मिशन है?"
"इसीलिए तो कहा था हुजूर, इसीलिए तो कहा था कि किस्सा अभी खत्म नहीं हुआ है बल्कि किस्सा तो अब शुरू हुआ है । लोग साले "मिशन जावेद" में ही उलझे रहे ओर हमने खेल कुछ और ही खेल दिया…उससे बहुत ज्यादा ऊंचा खेल जितना लोग इसे समझ रहे थे । तुम हमारे लिए इतनी बडी प्राब्लम नहीं कि हमेँ इंडिया के सामने मदद की गुहार लगानी पढ़ती । तुम तो हमारे सामने बकरी के मेमने जैसे थे जावेद मियां, जिसे जब चाहते दबोच लेते । तुम्हारे बहाने से, हमने तो खेल ही कुछ और खेला । वो खेल जिस पर काफी पहले से काम कर रहे थे ।'"
"काफी पहले से ! क्या मतलब?"
"तो तुम क्या यह समझ रहे हो कि वह बिजय एकाध दिन या महीने में तैयार हो गया जो अलफांसे और विकास जैसी हस्तियों को धोखा दे सकै । कम से कम एक साल पहले से काम चल रहा था उस पर । गुरुओं के गुरु.. गुरुघंटाल की वीडियोज दिखा दिखाकर, इनके बारीक से बारीक हाव भावों को उसमें भरा जा रहा था और जब तैयार हो गया तो सवाल उठा…उसे कैसे असली बिजय से एक्सचेंज किया जाए ! तभी तुम सामने आए । तुम्हारी उठा पटक सामने आइ । हमें बहाना मिल गया । इंडिया से बिजय दी ग्रेट को भेजने के लिए कहा और प्रेस कांफ्रेंस कै जरिए सारी दुनिया ने देखा कि वे अपने मिशन में पूरी तरह कामयाब होकर इंडिया लौट गए हें । इधर हमारा काम हो गया उधर इंडिया की इज्जत रह गइ ।"
"उसके इंडिया जाने से क्या फायदा हुआ तुम्हें ?"
"बताओ गुरुदेव । " तुगलक ने बिजय से कहा-“इस सवाल का जवाब देते तुम्हीं अच्छे लगोगे । बहरहाल, हम तुम्हें पहले ही सबकुछ बता चुके हैं ।'"
अचानक पता नहीं विजय किस मूड में आ गया । बोला-"मैं तुम्हें एक खेल दिखाना चाहता हू ।”
"खेल ?”
"उसे देखकर तबियत झक्क हो जाएगी तुम्हारी । "
"कहना क्या चाहते हो बंदापरवर?"
"सुना मत, देखो।'" कहने के बाद वह उस वेड पर लेट गया जो उसके सोने के लिए ही उस हाल जैसे कमरे में डाला गया था । लेटने के बाद उसने कहा-"गौर से मेरे दाएं पैर क्रो देखो ।"
सबकी नज़रं उसके दाएं पैर मेँ मोजूद जूते पर जम गई ।
सिर्फ किबला था जिसके होठों पर रहस्यमय मुस्कान थिरक रही थी, जैसे जानता हो कि विजय क्या कर रहा हे ।
∆∆∆∆∆
∆∆∆∆∆
∆∆∆∆∆
∆∆∆∆∆