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चाहत हवस की complete

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पिछले कुछ हफ़्तों से जब पहली बार से मैंने विजय को मेरी गाँड़ मारने की इजाजत दी थी, तब से मेरे जीवन का सबसे अच्छा समय शुरू हुआ था। हम दोनों माँ बेटे का सैक्स गजब का होता था, जिसमें एक तीव्रता, उत्साह होने के साथ साथ अन्तरंगता थी। विजय के पापा की डैथ के बाद चुदाई का सुख मैं भूल ही गयी थी। किसी गर्म खून के जवान मर्द के नीचे आने का मजा ही कुछ और था। और यदि वो जवान मर्द इतना प्यार करने वाला, और ध्यान रखने वाला हो तो फ़िर तो सोने पे सुहागा था।

अपने सगे बेटे से चुदने में जो मजा आने वाला था, मैं उसी के बारे में सोच रही थी। विजय जिस तरह मेरी चूत को चाटकर, चूत के दाने को सहला कर, मेरे मम्मों को दबाकर, निप्प्ल मसलकर, मेरी गाँड़ में अपना मूसल जैसा लण्ड पेलकर उसको अपने वीर्य के पानी से भर देता, ये सब मुझे बहुत आनंद देता।

हम दोनों माँ बेटे एक दूसरे के पहले की तुलना में बेहद करीब आ चुके थे, हम दोनों को एक दूसरे का साथ पसंद आता। एक दूसरे के साथ चिपक कर बैठना, जब चाहे एक दूसरे को बाँहों में भर लेना और एक दूसरे को कनखियों से निहारना आम बन चुका था।

मैं मन ही मन उन सभी सवालों को नकार देती जो बीच बीच में मेरे जेहन में आते, जैसे विजय की शादी के बाद हमारे इस नाजायज रिश्ते का क्या होगा? मैं किसी तरह अपने मन में उठते नकारात्मक सवालों को नजरअंदाज करने का प्रयास करती। लेकिन हमारे शारीरिक सम्बंधो के इस मुकाम पर पहुँचने के बाद इस तरह के सवाल या कहें तो मेरे मन में बसे डर का सामना कर पाना मुश्किल हो रहा था।

मुझे किसी तरह की कोई जलन की भावना नहीं थी, कि विजय की पत्नि मेरा स्थान ले लेगी। मैं विजय को बेहद प्यार करती थी लेकिन मेरी मंशा ये कतई नहीं थी कि विजय की सारी जिंदगी में सिर्फ़ अकेली मैं ही एक अकेली औरत रहूँ। देर सबेर विजय की शादी होना निश्चित थी, और मैं चाहती थी कि विजय अपनी पत्नि और होने वाले बच्चों के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत करे। मैं विजय से सच्चा प्यार करने लगी थी, और हमेशा करते रहने वाली थी। लेकिन क्या विजय शादी के बाद मुझे इतना ही प्यार करेगा?

ये ही सवाल मुझे बार बार परेशान कर रहा था। मैं विजय के साथ स्थापित सम्बधों को खत्म होते नहीं देखना चाहती थी। ये नाजुक रिश्ता मेरे लिये बेशकीमती हो चला था। कहीं मुझे लगता कि मुझे डरने की आवश्यकता नहीं है। मैं जब भी विजय की आँखों में देखती तो शारीरिक आकर्षण के साथ साथ मुझे उसकी आँखों में मेरे प्रति निश्चल प्यार दिखायी देता। जो कुछ शारीरिक सम्बंध हम दोनों बना चुके थे, या फ़िर बनाने वाले थे उन सब यादों को भुला पाना असम्भव था। मुझे तो पता था कि मैं इन यादों को सारे जीवन सहेज कर रखने वाली थी।

मुझे इस बात का एहसास था कि विजय के प्रति तीव्र आकर्षण ही मुझे सता रहा था। मेरा अपने बेटे विजय के प्रति प्यार ही मेरे डर की वजह बन रहा था।

अपना सिर झटकते हुए मैंने इस तरह के विचारों को दिमाग से बाहर निकालने का प्रयास किया। और मन ही मन मैंने अपने आप को ऐसी बेवकूफ़ी भरी बातें सोचने के लिये कोसा, ऐसी बेतुकी बातें सोचना व्यर्थ था। मैं किसी भी हालत में उस दिन को बर्बाद होने नहीं देना चाहती थी। ये मेरा नहीं मेरे बेटे विजय की खुशी का सवाल था।

मैंने अपने आप को आदमकद शीशे में देखत हुए अपने आप से बुदबुदाई, ''एकदम छिनाल लग रही हूँ ना।’’

''छिनाल नहीं मम्मी, आप तो मेरी जान हो, दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत।''

विजय रूम में आ गया था, और मुझे इस तरह नंगा देखकर मुस्कुरा रहा था। विजय का गठीला बदन बेहद आकर्षक लग रहा था, उसने अपनी शर्ट की स्लीव कोन्ही तक ऊपर चढा रखी थी। उसका इस तरह मुझे दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत बोलना मुझे रोमांचित कर गया, और मेरे दिमाग में आ रहे सारे शको-शुभा दूर हो गये। जैसे ही हम दोनों की नजर आपस में टकरायीं, मेरे बदन में खुशी की एक लहर सी दौड़ गयी। नंगे बदन इठला कर चलते हुए मैंने अपने आप को विजय की मजबूत बाँहों में समर्पित कर दिया।

***

''आ गया विजय बेटा?" मैंने विजय के गले में अपनी बाँहें डालते हुए कहा, विजय ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और वो मेरी नंगी पींठ और मेरी गाँड़ की मोटी मोटी गोलाईयों पर हाथ फ़िराने लगा।

''हाँ बस अभी आया,'' विजय अपनी पैण्ट में लण्ड के बने तम्बू को मेरी चूत के अग्रभाग पर दबाते हुए बोला। उसकी उँगलियां मेरे गदराये नंगे बदन को मेहसूस कर रही थीं। ''अब और इन्तजार नहीं होता मम्मी।''

''आह्ह, मेरा बेटा!" मैं घुटी हुई आवाज में बोली, विजय की आँखों में वासना के लाल डोरे तैरते हुए देख मुझे बेहद अच्छा लग रहा था। अपने आप को विजय को समर्पित करते हुए, मैंने उसे किस करने के लिये अपनी ओर खींच लिया।

हम दोनों एक दूसरे को इस तरह बेतहाशा चूमने लगे मानो कितने समय बाद मिले हों। चूमना बंद करते हुए जब मैंने विजय की चौड़ी छाती को नंगा करने के लिये उसकी शर्ट के बटन खोलने शुरू किये तो मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा और मेरी साँसें उखड़ने लगी।

जब विजय अपनी बैल्ट को खोल रहा था, तो मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठकर उसकी पैण्ट के हुक को खोलकर उसकी चैन खोलने लगी। मैंने अपना गाल उसके अन्डरवियर में लण्ड के बने तम्बू पर फ़िराते हुए कहा, ''अपनी मम्मी को उतारने दो बेटा।''

मैंने एक झटके में उसकी पैण्ट और अन्डरवियर को नीचे खींच दिया जिससे उसका फ़नफ़नाता हुए लण्ड बाहर निकल आया, और फ़ुंकार मारने लगा। जैसे ही मैंने उसके लण्ड के सुपाड़े पर अपना गाल छूआ, उसके लण्ड से निकल रहे चिकने लिसलिसे पानी से मेरा गाल गीला हो गया।

मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और एक संतुष्टीभरी गहरी साँस लेकर मैं विजय के लण्ड को स्वादिष्ट लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी। जब मैं अपने मुलायम होंठों को अपने बेटे विजय के तने हुए लण्ड, जिसकी नसें फ़ूल रही थीं, उस पर दबाकर हल्के हल्के कामुक अंदाज में चूम रही थी तो मेरी चूत की प्यास किसी रण्डी की तरह बलवती होने लगी थी, और मेरी चूत की फ़ांकें, चूत के रस से पनियाने लगी थी। विजय के मोटे लण्ड को अपने होंठों के बीच लेकर मुझे बहुत मजा आ रहा था। सब कुछ भूल कर मैं अपने बेटे के लण्ड से निकल रहे चिकने पानी की बूँदों को अपनी जीभ से चाट रही थी, और उसके आकर्षक लण्ड की पूरी लम्बाई पर अपनी जीभ फ़िराते हुए पर्र पर्र की आवाजों में डूबी जा रही थी।

जैसे ही विजय के लण्ड को उसकी मम्मी ने जड़ से पकड़ कर, चूमते चाटते हुए धीमे धीमे मुठियाना शुरू किया तो विजय के मुँह से कामक्रीड़ा के आनंद से भरी आह ऊह की आवाज निकलने लगी। हमेशा की तरह विजय को अपना लण्ड मेरे मुँह में घुसाकर चुसवाने में बेहद मजा आ रहा था। लेकिन उस दिन मैं उसके लण्ड को सॉफ़्ट और सैक्सी अंदाज में, उसके लण्ड को थूक से गीला करके, जीभ से नीचे से ऊपर तक चाटते हुए चूस रही थी। मैंने बस उसके लण्ड का सुपाड़ा ही मुँह के अंदर लिया था, लेकिन उतना ही बहुत था। अपनी माँ से अपने लण्ड को चुसवाते हुए विजय अपने हाथों की उँगलियों से मेरे बालों में कंघी करने लगा, और मेरे बालों को मेरे कान के पीछे कर दिया, जिससे वो अपनी मम्मी का खूबसूरत चेहरा देखते हुए, अपने लण्ड को अपनी मम्मी के मुँह में घुसा कर होंठों के बीच अंदर बाहर होता देखने का आनंद ले सके।

कुछ देर बाद मैं इस कदर चुदासी हो चुकी थी कि मुझसे और ज्यादा बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था। मेरे चूसते रहने के कारण विजय के लण्ड से चिकने पानी की बूँदें रह रह कर बाहर आ जातीं, और मैं हर बूँद का चाट लेती, लेकिन उन चिकने पानी की बूँदों को देखकर मेरी चूत विजय के लण्ड के वीर्य के पानी के लिये तरस उठती। विजय के लण्ड से निकले वीर्य को पीने की चाह के आगे मैं हार गयी, और फ़िर मैने विजय के लण्ड के बैंगनी रंग के लण्ड के सुपाड़े को अपने होंठों के बीच लेकर उसके थूक से सने पूरे लोहे जैसे सख्त लण्ड को अपने मुँह के अंदर ले लिया।

जैसे ही विजय के लण्ड का सुपाड़ा मेरे गले से जाकर टकराया, उसने मेरे सिर को पकड़ लिया और उसकी आँखें खुद-ब-खुद बंद हो गयीं। उसका लण्ड जो मैंने जड़ से पकड़ रखा था, उसको छोड़ दिया, और उसके लण्ड को मेरे गले में अंदर तक घुस जाने के लिये आजाद कर दिया, अब मेरे होंठ उसके लण्ड की जड़ पर टकरा रहे थे। विजय का लण्ड पूरा अपने मुँह में लेकर, मैं अपने एक हाथ को अपनी चूत के फ़ूले हुए दाने पर ले जाकर उसको घिसने लगी, और दूसरे हाथ को विजय की गाँड़ पर रखकर उसको अपनी तरफ़ खींचने लगी। कुछ सैकण्ड ऐसे ही विजय के लण्ड को पूरा अपने मुँह में रखकर, उसको फ़िर से अपने मुँह में अंदर बाहर करके फ़िर से उसको मुँह से चोदने लगी।
 
अपनी मम्मी के गर्म गर्म मुँह में अपने लण्ड को घुसाकर विजय जन्नत की सैर कर रहा था। मेरे सिर को अपने हाथों से पकड़े हुए, विजय अपनी गाँड़ को आगे पीछे करने लगा, और मेरे मुँह की चुदाई के साथ ताल में ताल मिलाने लगा। और कुछ देर बाद विजय बुदबुदाया, ''मैं झड़ने ही वाला हूँ… मम्मी…''

जैसे ही विजय के लण्ड से निकली वीर्य की पिचकारी मेरे गले से जाकर टकरायी, मैंने अपनी उँगली चूत के दाने को मसलते हुए, चूत में अंदर तक घुसा दी, और विजय के साथ मैं खुद भी झड़ गयी। विजय के लण्ड से मेरे गले में जो घुटन हो रही थी, वो मुझे और ज्यादा मजा दे रही थी। विजय का लण्ड मेरे मुँह में पूरा घुसा हुआ था, और वीर्य की पिचकारी पर पिचकारी मेरे गले में छोड़े जा रहा था, जिसको मैं साथ साथ निगले जा रही थी।

जब विजय का लण्ड फ़ड़कना बंद हो गया, और मैंने उसके लण्ड से निकली वीर्य की आखिरी बूँद चाट ना ली, तब जाकर मैंने उसके लण्ड को अपने होंठों के बीच से नहीं निकलने दिया। और फ़िर सारा वीर्य चाटने के बाद मैंने उसकी गोलीयों को टट्टों के ऊपर से चूम लिया, और फ़िर अपने होंठों पर जीभ फ़िराकर साफ़ करते हुए मैंने विजय की तरफ़ देखा।

''वाह मम्मी मजा आ गया,'' अपनी मम्मी को लण्ड से निकलती वीर्य की आखिरी बूँद चाटते हुए देख विजय बोला, ''इतना अच्छा वाला तो पहली बार झड़ा हूँ!" विजय जब ये बोल रहा था, तो मैंने अपने घुटनों के बल बैड पर बैठते हुए, उसके सिंकुड़ते हुए लण्ड को अपने मम्मों के बीच दबा लिया।

''मुझे भी बहुत मजा आया बेटा!" मैंने कहा, और फ़िर उसके लण्ड को अपने मम्मों के बीच लेकर, मम्मों को उसके लण्ड ऊपर नीचे करने लगी, और बीच बीच में उसके सुपाड़े के अग्र भाग को अपनी जीभ से चाट लेती, मैं उसके लण्ड को खड़ा ही रखना चाहती थी। विजय ने अपने हाथों से मेरे मम्मों को साइड से पकड़कर, लण्ड के ऊपर दबाते हुए, मेरे मम्मों को चोदने लगा। इस बीच मेरा भी एक हाथ मेरी चूत पर पहुँच गया, और मैं उस हाथ की ऊँगलियों को चूत की पनिया रही फ़ाँकों पर लगे जूस से गीला करने लगी।

"ये देखो?" मैंने विजय को अपनी चुत में डूबी ऊँगली दिखाते हुए कहा। और विजय की वासना में लिप्त आँखों के सामने ही अपनी जीभ से चाटकर साफ़ कर दिया, और मेरी जीभ विजय के लण्ड से निकले वीर्य और मेरी चूत के रस के मिश्रित स्वाद का मजा लेने लगी।

विजय ऐसा होता देख और ज्यादा उत्तेजित हो गया, और तेजी से अपने लण्ड को मेरे मम्मों के बीच की दरार में अंदर बाहर करने लगा। अपने बेटे के लण्ड को अपने मम्मों के बीच की मुलायम खाई में फ़ँसाकर, मैं एक बार फ़िर से अपनी ऊँगली से चूत से टपक रहे रस में भिगोने लगी। और एक बार फ़िर से मादक आवाज निकालते हुए और विजय को तरसाते हुए उस ऊँगली को चाटा तो विजय गुर्राते हुए और जोरों से मेरे मम्मे चोदने लगा।

विजय का लण्ड हर सैकेण्ड और ज्यादा कड़क होता जा रहा था, और मैं उसे अपनी मादक और कामुक अदाओं से और ज्यादा तरसा रही थी। ''म्म्म्म्ह्ह्ह्… टेस्टी है,'' मैं कामुक अंदाज में बोली, और चूत के रस में गीली दूसरी ऊँगली को अपने होंठों पर रख लिया, ''तुमको पता है, मेरी चूत का रसीला पानी बहुत टेस्टी है… और अब तुम्हारे वीर्य से मिक्स होकर तो और भी ज्यादा अच्छा लग रहा है, बेटा।''

''हाँ मुझे पता है मम्मी,'' मेरे मम्मों के बीच अपने लण्ड को जोरों से पेलता हुआ विजय बोला, ''आपकी चूत तो वाकई में बहुत टेस्टी है मम्मी।'' और एक पल के लिये मेरे मम्मों को चोदना रोक कर वो बोला, ''मेरा तो मन कर रहा है अभी इसी वक्त आपकी चूत के रस को थोड़ा चाट ही लूँ।

इससे पहले की मैं सम्भल पाती, विजय ने मेरी टाँगों के बीच अपना चेहरा घुसा दिया, और अपने होंठों से मेरी चूत की फ़ाँकों पर लगे रस को अपनी जीभ से चाटने लगा। लेकिन ऐसा करते हुए उसको संतुष्टी नहीं मिली, तो विजय ने मुझे गोदी में उठा लिया, और मेरे गुदाज माँसल चूतड़ों को मसलते हुए मुझे बैड पर लिटा दिया। मैं किसी कच्ची कुँवारी लड़की की तरह उसकी इस हरकत से अचम्भित होते हुए खिलखिलाने लगी।

जैसे ही मैं बैड पर लेती, मैंने अपनी टाँगें फ़ैला कर चौड़ी कर दिया, और जैसा वो चाहे वैसा करने के लिये, विजय के सामने मैंने अपने आप को प्रस्तुत कर दिया। विजय के फ़ुँकारते हुए लण्ड को देखकर, मेरे मन में जल्द से जल्द उसको अपनी चूत में घुसवाने का मन करने लगा, और इसी इच्छा में मैं अपने होंठों को अपने दाँतों से काटने लगी। हाँलांकि उस वक्त विजय मन ही मन कुछ और ही करने की सोच रहा था।

''आप तो बहुत ज्यादा पनिया रही हो मम्मी!" विजय मेरी केले के तने मानिंद चिकनी जाँघों पर हाथ फ़िराते हुए, मेरी टाँगों के बीच आते हुए बोला। विजय मेरी पनिया कर रस से भीगी हुई चूत की दोनों फ़ाँकों और चूत के दाने को देखकर विस्मित हो रहा था। एक पल को उसकी नजर मेरी परोसी हुई सुंदर चूत से हटकर, ऊपर फ़ूले हुए चूत के दाने पर जाकर टिक गयी, और फ़िर वो मेरे शर्मा कर लाल हुए चेहरे को देखने लगा।

''मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मैं अपने जीवन में पहली बार किसी चूत को चोदने जा रहा हूँ,'' वो वासना में डूबकर उत्तेजित होकर हाँफ़ते हुए बोला, उसको अभी भी अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था। ''और वो चूत भी किसी और की नहीं आपकी है, मम्मी, बहुत मजा आ रहा है।''

अपने मम्मों को अपने हाथों से मसलते हुए, और अपनी टाँगों को और ऊपर उठाकर चौड़ा करते हुए, मैं अपने बेटे के सामने अपनी चूत चोदने के लिये परोस रही थी, मैंने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा, ''हाँ… बेटा… हाँआआ… चूस लो, चोद लो अपनी मम्मी की चूत को, जैसे चाहे जो चाहे कर लो बेटा हाँआआ!"

जैसे ही विजय अपनी जीभ लपलपाता हुआ मेरी चूत की तरफ़ बढा, मैं आनंदातिरेक में आहें भरने लगी। और जैसे ही उसने मेरी चूत को चाटना शुरू किया, मेरी आँखें स्वतः ही बंद हो गयी और मेरा पूरा बदन उत्तेजना में काँपने लगा। उसने मेरी चूत की दोनों फ़ाँको को अपने मुँह में भर लिया, और सपर सपर कर मेरी चूत को चुमते हुए चूसने लगा। बेहद उत्तेजित होने के कारण, कुछ ही सैकण्ड में मेरी चूत ने झड़ते हुए विजय के मुँह पर ही पानी छोड़ दिया, और मैं चरमोत्कर्ष पर पहुँचते हुए अपनी निप्पल को मींजते हुए जोर जोर से आहें भरने लगी।

''ओह्ह्ह्ह्ह्… विजय बेटाआआ, हाँआआआ…!"

जैसे ही मैं अपनी गाँड़ को उठाकर उसके खुले मुँह की तरफ़ उछालने लगी, विजय पागलों की तरह अपनी मम्मी की चूत को चाटकर खाने लगा, और बरसों से किसी चूत के रस के प्यासे की तरह चूत के पानी को पीने लगा। चूत के रस का स्वाद, मेरा कामुक अंदाज में कराहना, और अंततः अपनी मम्मी की चूत में लण्ड घुसाकर चोदने की आशा के साथ विजय मेरी चूत को दोगुने जोश के साथ चूसने लगा, और फ़िर उसने पहले एक और फ़िर दूसरी ऊँगली मेरी चूत में घुसा दी।

''हाँ बेटा, ऐसे ही!" मैं धीमे से बोली, लग रहा था कि मैं फ़िर से झड़ने वाली थी। ''बस ऐसे ही… ऐसे ही ऊँगली घुसाते रहो, बस ऐसे ही चाटते रहो! आहह्ह… तुम तो बहुत अच्छे से मजा दे रहे हो बेटा, अपनी मम्मी को!''

विजय पहले भी कई बार मेरी चूत को चूस और चाट चुका था, इसलिये वो मेरी हर हरकत से वाकिफ़ था, इसलिये इससे पहले कि मैं एक बार और झड़ जाती, विजय ने मेरी चूत को चाटना बंद कर दिया। मैं एक पल को नाखुश हो गयी। लेकिन फ़िर जैसे ही विजय ने अपनी जीभ से मेरी चूत के दाने को सहलाया, मेरे सारे बदन में एक तरंग सी दौड़ गयी और मेरे मुँह से जोर की आहह्ह निकल गयी।

''आह विजय बेटा!" मैं आनंदातिरेक में पूरे बदन को हिलाते हुए बोली, मेरा बेटा जो मजा मुझे दे रहा था वो अविस्मर्णीय था। जैसे ही विजय ने मेरी चूत में दो ऊँगलियाँ घुसाकर, चूत के दाने को अँगूठे से मसलना शुरू किया, मैंने बैडशीट को अपनी मुट्ठी में भर कर पकड़ लिया, और चीखते हुए बोली, ''आह्ह्ह्ह मेरा बेटा… हे भगवान…''

जब विजय ने मेरी चूत में ऊँगली घुसाना और जीभ से चाटना बंद किया, तब वासना मुझ पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी। जब मैंने अपनी मस्ती में बंद आँखो को खोला तो विजय को मेरे चेहरे की तरफ़ देखते हुए पाया। जब वो मेरी नंगी गोरी चिकनी चौड़ा कर फ़ैली हुई टाँगों के बीच झुका तो उसके मुँह और ठोड़ी पर मेरे चूत का रस लगा हुआ था, और उसका लण्ड फ़नफ़ना रहा था।
 
''आप बहुत मस्त हो मम्मी, झड़ते हुए आप एक दम मदमस्त हो जाती हो,'' वो मेरी जाँघों को सहलाते हुए मुस्कुराते हुए बोला।

''मूउआआ… मेरा प्यारा बेटा,'' मैं बुदबुदाई। ''तू तो मेरा बहुत प्यारा बेटा है, मेरी कितनी तारीफ़ करता है और कितना अच्छा सैक्स करता है, मैं तो झड़ने को मजबूर हो जाती हूँ बेटा!"

ये सुनकर वो थोड़ा हँसा, मैं भी उसके साथ हँस पड़ी। मैंने उसकी नजर को मेरे चेहरे से हटकर मेरे मम्मों को घूरते हुए पाया, और उसके लण्ड को चूत की लालसा में फ़ुँकार मारते हुए देखकर मुझे मन ही मन खुशी हो रही थी। वो थोड़ा गम्भीरता से बोला, ''सचमुच मम्मी, मुझे आपके साथ प्यार, सैक्स करने में बहुत मजा आता है। जब आप झड़ती हो ना, तब आप के चेहरे पर सुकून और प्रसन्नता देखकर मुझे अच्छा लगता है।

उसकी आवाज में और आँखों मुझे सच्चाई प्रतीत हो रही थी, और शब्द मानो उसके दिल से निकल रहे थे। मैंने उसकी बात सुनकर सहमती में बस ''हाँ बेटा,'' ही बोल पायी। मैं उसके प्यार का कोई सबूत नहीं माँग रही थी, लेकिन उसकी बातें मुझे अच्छी लग रही थीं। अपनी बाँहें फ़ैलाकर और टाँगें चौड़ी कर के मैं उसको आमंत्रित करने लगी, और मुस्कुराते हुए फ़ुसफ़ुसाते हुए बोली, ''आ इधर आ, चिपक जा मुझसे, जकड़ ले मुझे।''

विजय ने मेरे ऊपर आते हुए, अपनी माँ के खूबसूरत गठीले बदन को अपनी बाँहों में भर कर जकड़ लिया, और मैं भी उससे लिपट गयी। हमारे होंठ स्वतः ही पास आ गये, और हम दोनों प्रगाढ चुंबन लेने लगे। मेरे मम्मे उसकी छाती से दब रहे थे, मैं चूमते हुए कराह रही थी और उसका लण्ड मेरी पनियाती चूत के मुखाने पर टकरा रहा था। जब हम माँ बेटे कामक्रीड़ा में मस्त थे, तब मैं अपनी गाँड़ को ऊपर ऊँचकाते हुए अपनी चूत की दोनों भीगी हुई फ़ाँकों को उसकी लण्ड की पूरी लम्बाई पर घिसते हुए, फ़ड़क रहे चूत के दाने को लण्ड के दबाव से मसलने लगी। ऐसा करते हुए हम दोनों मस्ती में डूबकर, एक दूसरे के जिस्म की जरूरत को पूरा करने का मनोयोग से प्रयास कर रहे थे। मेरी चूत में तो मानो आग लगी हुई थी।

अब और ज्यादा बर्दाश्त करना मेरे लिये असम्भव होता जा रहा था। मैंने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर विजय के लण्ड को पकड़कर उसके सुपाड़े को मेरी चूत के मुखाने का रास्ता दिखाने लगी। जैसे ही उसके लण्ड ने पहली बार किसी चूत के छेद को छुआ तो विजय गुर्राने लगा। उसने मेरी टाँगों को थोड़ा और फ़ैला कर चौड़ा किया, जिससे उसको मेरी पनिया रही चूत में लण्ड घुसाने में आसानी हो सके।

"आह मम्मी…'' वो हाँफ़ते हुए बोला, और फ़िर अपने होंठों को मेरे होंठों से दूर करते हुए, मेरी आँखों में आँखें डालकर देखने लगा। ''मम्मी…'' उसके लण्ड का सुपाड़ा मेरी चूत के छेद की मुलायम, गीली गोलाई को अपने साइज के अनुसार खुलने पर मजबूर कर रहा था, विजय बुदबुदाते हुए बोला, ''आप बहुत अच्छी मम्मी हो, आई लव यू, मम्मा!"

''मैं भी तुझे बहुत प्यार करती हूँ बेटा,'' मैं उसके होंठों पर अपने होंठ रखकर प्यार से बारम्बार चूमते हुए बोली। जब मैंने अपनी टाँगें विजय की मजबूत पींठ के गिर्द लपेटीं, और उसको अपनी तरफ़ खींचा, जिससे उसका लण्ड पूरा मेरी चुदने को बेकरार चूत में घुस सके, तो एक बार को तो मानो मेरी साँस ही रुक गयी।

जैसे ही मेरी चूत के अंदरूनी होंठों ने खुलते हुए उसके लण्ड के अंदर घुसने के लिये रास्ता बनाया, और फ़िर ईन्च दर ईन्च अंदर घुसने लगा, तो हम दोनों कराह उठे। जब हम दोनों एक दूसरे की जीभ के साथ चूमा चाटी कर रहे थे, तब विजय का मोटा लण्ड आराम से मेरी पनिया रही चूत में धीमे धीमे अंदर घुस रहा था।

मेरे होंठों को चूसते हुए प्यार से धीमे धीमे, पूरे मजे लेते हुए, विजय अपना लण्ड अपनी माँ की चूत में घुसा रहा था। जैसे ही उसने अपने फ़नफ़नाते लण्ड का जोर का झटका मेरी चूत में मारा, उसकी आँखें बंद हो गयी। उसकी उम्र में दुनिया में सबसे ज्यादा एहमियत चूत की थी, और मेरी गीली चूत में अपना लण्ड अंदर और फ़िर और ज्यादा अंदर घुसाकर मुझे चोदने में जो मजा उसको आ रहा था, वो उसके लिये अकल्पनीय था। हाँलांकि पिछले हफ़्तों में विजय कई बार मेरी गाँड़ में अपना लण्ड घुसा चुका था, और मेरे मुँह में तो अनगिनत बार अपने लण्ड का पानी निकाल चुका था, लेकिन चूत का मजा अलग ही था।

मेरी चूत ने मेरे बेटे के लण्ड का स्वागत कम से कम अवरोध के साथ किया था, और जैसे ही उसने अपना लोहे जैसा कड़क लण्ड मेरी चूत में घुसाया था, मेरी गीली चूत ने उसको जकड़कर अपने अंदर समाहित कर लिया था। मेरी चूत किसी कुँवारी लड़की की तरह टाईट तो नहीं थी, लेकिन ज्यादा ढीली भी नहीं थी, गीली, भीगी हुई और उसके लण्ड को जकड़े हुए थी। मेरी चूत विजय के लण्ड को गर्माहट दे रही थी, और उसका स्वागत कर रही थी, और चूत की मखमली चिकनाहट उसके लण्ड का पूरा ख्याल रख रही थी, और उसके लण्ड की मोटाई के अनुसार अपने आप को ऐडजस्ट कर रही थी। विजय के लिये ये सब किसी सपने से कम नहीं था, वो अपने लण्ड से उस औरत की चूत को चोद रहा था, जिसको वो सबसे ज्यादा प्यार करता था। और वो औरत कोई और नहीं उसकी सगी माँ थी, जिसने उसे जीवन दिया था और अब उसको वो शारीरिक सुख देकर उसके जिस्म की पूरी कर रही थी, जो उसको कहीं और मिल पाना असम्भव था।

जब उसने पुरा लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया, तो मैं अपने होंठ चुसवाते हुए ही कराह उठी, क्योंकि मेरी चूत ने इतना बड़ा लण्ड कभी अंदर नहीं लिया था, विजय का लण्ड उसक पापा के लण्ड से कहीं ज्यादा बड़ा था। विजय अपना पूरा लण्ड मेरी मखमली मुलायम चूत में घुसाकर, अंदर बाहर करते हुए मुझे तबियत से चोद रहा था। हम दोनों मस्त होकर चुदाई का मजा ले रहे थे, तभी हाँफ़ते हुए विजय ने अपनी आँखेंकर देखा।जैसे ही हम दोनों की नजरें मिलीं, तब मुझे यकायक वास्तविकता का एहसास हुआ कि मेरे सगे बेटे का लण्ड मेरी चूत के अंदर गर्भाशय पर टक्कर मार रहा था। समाज की मर्यादा, वर्जना को लांघकर हम दोनों के शारीरिक सम्बंध, एक पल को सब कुछ मेरे दिमाग में कौंध गया।

''विजय बेटा, आहह्ह्ह्… बेटा विजय!"

यकायक मानो किसी वज्रपात की तरह मेरा स्खलन हो गया, स्खलित होते हुए मेरा पूरा बदन काँप गया, मेरी साँसें उखड़ने लगी, और मैं अपने बेटे की मजबूत बाँहों में ही मचलने लगी, मेरी चूत में घुसे उसके मोटे लण्ड से मुझे पूर्णता का एहसास हो रहा था, और झड़ते हुए मेरी चूत उसके लण्ड को निचोड़ रही थी। चरम पर पहुँच कर मैं मस्त होकर विजय को कस कर जकड़े हुए थी, उसके कन्धों को अपने नाखून से खरोंच रही थी, और अपनी टाँगों को उसकी कमर के गिर्द लपेट कर, कुछ कुछ आनंद से भरी आवाजें निकाल रही थी।

जब मेरी चूत विजय के पूरी तरह खड़े लण्ड को ऐंठने लगी, तो विजय भी घुटी घुटी आवाजें निकालने लगा। मेरी चूत धड़कते हुए मानो उसके लण्ड की मालिश कर रही थी, और उसकी सनसनाहट उसके सारे बदन में हो रही थी। अपनी मम्मी की चूत में लण्ड घुसाकर विजय को इतना ज्यादा मजा आ रहा था कि यदि उसने कुछ देर पहले मेरे मुँह में पानी ना निकाला होता, तो वो कब का मेरी चूत में स्खलित हो चुका होता।

झड़ने के बाद जब मैं थोड़ा होश में आई तो हम दोनों माँ बेटे वासना में डूबकर चूत में लण्ड घुसाकर लेटे हुए थे। विजय का चेहरे पर चमक थी, और उसकी आँखों में वासना, मैंने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा, ''म्म्म्ह्ह बेटा, तुम बहुत अच्छी चुदाई करते हो, मैं तो बहुत अच्छी वाली झड़ी हूँ।''

''मैं भी बस होने ही वाला था,'' विजय अपनी मम्मी की भीगी गीली चूत में अपना लण्ड थोड़ा और अंदर घुसाते हुए बोला। ''जैसा मैंने सोचा था, आप उससे भी बहुत ज्यादा अच्छी हो मम्मी…'' वो बुदबुदाते हुए बोला, और उसने मेरे मम्मों को मसल दिया, मेरी गर्म मुलायम चूत में अपना मूसल पेलते हुए बोला, ''आपकी चूत तो बहुत मस्त है!"

''ये अब तुम्हारी है बेटा, तुम्हारी मम्मी की चूत पर अब बस तुम्हारा अधिकार है बेटा,'' कसमसाती हुई किसी तरह जो आग मेरी चूत और संवेदनशील निप्पल में लगी हुई थी, उस पर काबू करते हुए मैं बोली।

विजय ने अपना पूरा लण्ड मेरी चूत में घुसा रखा था और मेरे चूत के दाने को भरपूर घिस रहा था, और धीरे धीरे झटके लगा रहा था, मानो वो हमेशा मेरी मुलायम प्यासी चूत में अपना लण्ड घुसा कर रखना चाहता था। उसकी ये कामुक हरकतें मुझे भी बहुत आनंदित कर रही थी।

मेरी आवाज भारी और घुटी हुई निकल रही थी, फ़िर भी मैं विजय से भीख माँगते हुए बोली, ''चोद दे बेटा, चोद दे अपनी मम्मी की चूत को, मार ले अपनी माँ की चूत विजय बेटा।'' मेरी बार सुनकर विजय के लण्ड में हरकत हुई, तो मुझे उत्साहवर्धन मिला, ''निकाल दे सारी गर्मी मेरी प्यासी चूत की, चोद दे इसे, निकाल दे अपने लण्ड का पानी अपनी मम्मी की चूत में, आह्ह्ह्… कब से लण्ड की भूखी है तेरी मम्मी की चूत, हाँ बेटा ऐसे ही चोद दे!"
 
विजय का दिमाग घूम रहा था, और उसके कानों में मेरी दर्खाव्सत गूँज रही थी, फ़िर उसने अपने लण्ड को मेरी चूत में अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। मेरी पनिया रही चिकनी चूत जिसने उसके लण्ड को जकड़ रखा था, उसमें उसने अपने मूसल लण्ड के धीरे धीरे झटके मारने शुरू किये। लेकिन कुछ ही सैकण्ड में उसकी बलवती होती चुदास और मेरी कामुक बातों का उस पर असर होने लगा, और वो मेरी चूत में अपने लण्ड के जोर जोर से झटके मारने लगा। और फ़िर वो अपनी मम्मी को पागलों की तरह चोदने लगा।

जब उसका लण्ड मेरी चूत में घुसता तो हर झटके के साथ हर बार उसकी स्पीड और गहराई तेज होती जा रही थी। विजय मस्ती में डूबकर आहें भर रहा था। मेरी मखमली चिकनी चूत के एहसास के साथ मेरी चूत जो उसके लण्ड को निचोड़ रही थी वो उसका हर झटके के साथ मजा दोगुना कर रही थी।

हम दोनों माँ बेटे ताल से ताल मिलाते हुए, स्वतः ही झड़ने के करीब पहुँच चुके थे। मेरी घुटी दबी आनंद से भरी आवाजें, उसके हर झटके की थाप के साथ चुदाई का मधुर संगीत बना रही थी। मैं अपने बेटे का लण्ड अपनी चूत में घुसवाकर मस्त हो रही थी, और विजय अपनी मम्मी की मुलायम मखमली चूत जिसने उसके लण्ड को अपनी चिकनाहट में जकड़ रखा था में अपने लण्ड को घुसाकर, अपनी मम्मी को मसलते हुए ताबड़तोड़ चोदे जा रहा था।

सारी दुनिया से बेखबर हम दोनों माँ बेटे आलिंगनबद्ध, दो जिस्मों को एक बनाकर, हर वर्जना को तोड़ते हुए चुदाई का अपार आनंद ले रहे थे। उस वक्त चूत और लण्ड का मिलन ही सर्वोपरी था। विजय के हर झटके के साथ ताल में ताल मिलाते हुए, मैं अपनी गाँड़ ऊपर उछाल रही थी, जिससे मेरी चूत का चिकना छेद उसके लण्ड को हर झटके को आराम से ऊपर होकर लपक लेता था, विजय मेरी गर्दन को तो कभी मेरी उभरे हुए निप्पल को चूस रहा था। विजय मेरे प्यार में वशीभूत, वासना में डूबकर अपनी खूबसूरत माँ को चोदे जा रहा था।

चुदाई के चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर मैं एक अलग ही दुनिया में मानो जन्नत की सैर कर रही थी, तभी विजय बोला, ''मेरा पानी निकलने ही वाला है, मम्मी,'' और फ़िर उसने अपने लण्ड अंधाधुंध मेरी रस टपका रही चूत में पेलना शुरू कर दिया। ''ओह मम्मी मैं बस आपकी चूत में झड़ने ही वाला हूँ, ओह्ह्ह मम्मी…''

अपने बेटे के लोहे के समान सख्त लण्ड के अंतिम झटकों को झेलते हुए मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थी। जैसे ही विजय के लण्ड ने अंतिम झटका मारा, मेरी चूत में से भी मानो ज्वालामुखी की तरह विस्फ़ोट हो गया। विजय अपने लण्ड को मेरी चूत में घुसाये गर्म गर्म वीर्य की धार पर धार से मेरी प्यासी चूत में बौछार कर रहा था। उसने इतना ज्यादा पानी छोड़ा कि मेरी चूत की सुरंग में मानो बाढ ही आ गई। वीर्य निकालते हुए विजय के मुँह से जो संतुष्टी भरी आवाज निकल रही थी, मेरी चीख उसका बराबर मुकाबला कर रही थी। मेरे गर्भाशय से टकराती उसके वीर्य के गर्म पानी की पिचकारी को मेहसूस करते हुए, मैं मन ही मन सोचने लगी कि विजय की जवानी में निकले इतने सारे वीर्य के पानी से कोई भी लड़की एक बार में ही गर्भवती हो जाये।

जैसे ही मैं अपने चर्मोमत्कर्ष पर पहुँची तो मेरी चूत ने विजय के लण्ड को कसकर जकड़ लिया, और उसको निचोड़ने लगी, और उसके तने हुए लण्ड को चूत के रस से नहलाने लगी। मैं अपने बेटे विजय के लण्ड से निकले वीर्य के पानी को अपनी चूत में मेहसूस करते हुए इस वर्जित सुख का आनंद ले रही थी। मैं विजय के कन्धों को अपने नाखून से नोंचने लगी, और अपनी टाँगें उसकी कमर पर कसकर लपेट लीं, और अपने बेटे के नीचे लेट हुए मैं काँप रही थी, मैं और विजय दोनों कामोन्माद में डूब रहे थे।

विजय इतना अच्छा वाला झड़ा था, कि जैसे ही उसके लण्ड से स्खलन बंद हुआ, वो मेरे गुदाज बदन पर निढाल होकर लेट गया। उसने अपना सिर मेरे मम्मों पर टिका लिया, और मेरे बदन की जानी पहचानी गंध को सूँघने लगा, मेरी सामान्य होती साँसें मानो उसको थपकी दे रही हों। विजय मेरी दिल की धड़कन को धीरे धीरे सामान्य होता सुन रहा था, मेरे पैरों की जकड़ उसकी कमर पर ढीली हो गयी थी, और मेरी बाँहों की जकड़ में भी अब हताशा की जगह प्यार था। अभी भी हम दोनों के यौनांग आपस में जुड़े हुए थे, और हम माँ बेटे दो संतुष्ट प्रेमियों की तरह कामोन्माद के अंतिम प्रहर का मजा ले रहे थे।

जब विजय ने आँखें खोलकर मेरी तरफ़ देखा, तब भी उसका सिंकुड़ा हुआ लण्ड मेरी रस से डूबी हुई चूत के अंदर था। मुझे उसकी तरफ़ मुस्कुराता हुआ देखता हुआ पाकर उसको थोड़ा अचरज हुआ, मेरा चेहरा दमक रहा था, मेरी आँखों में अजीब चमक थी। लेकिन मेरी आँखों से आँसू निकल कर मेरे गालों पर लुढक रहे थे।

''मम्मी…'' उसने गहरी साँस लेते हुए घबराकर मुझसे पूछा, ''क्या हुआ मम्मी?"

मेरी बगल में साईड से लेटते हुए, उसको लगा कि शायद मुझे कहीं दर्द हो रहा है, और उसने तुरंत अपने लण्ड को मेरी चूत से बाहर निकाल लिया। चूत में से लण्ड के बाहर निकलते ही मुझे कुछ रिक्तता का एह्सास हुआ, और मैं फ़िर से होश में आ गयी। मैंने पलक झपकाई और सिर को हिलाया, मानो मेरे खुद समझ नहीं आ रहा था कि मेरे गाल आँखों से निकले आँसू से क्यों भीग रहे थे। जैसे ही विजय पींठ के बल सीधा लेटा, मैं उसके पीछे पीछे उसके ऊपर सवार हो गयी, और अपनी चूत जिससे वीर्य चूँ कर बाहर टपक रहा था, उसको विजय के सिंकुड़े हुए मुलायम लण्ड पर रख कर दबा दिया।

विजय की गोद में बैठकर, मैं उसके उदास चेहरे को सहलाने लगी, और मुस्कुराते हुए उसको खुश करने का प्रयास करने लगी। और फ़िर भावुक भरभराई आवाज में बोली, ''कुछ नहीं हुआ बेटा, परेशान होने की कोई बात नहीं है, सब ठीक है।''

''तो फ़िर आप रो क्यों रहीं थीं?" विजय हकलाते हुए बोला, वो मेरे होंठों पर लगातार बनी मुस्कान देखकर वो थोड़ा उलझन में पड़ गया। ''अगर मेरी वजह से आपको दर्द हुआ है, तो मुझे माफ़ कर दो मम्मी, लेकिन…''

"सच में बेटा, सब ठीक है,'' विजय के होंठों को चूमने के लिये जैसे ही मैं आगे झुकी, मेरे मम्मे विजय की बलिष्ठ छाती को दबाने लगे। ''कुछ नहीं हुआ, तुम्हारी वजह से कुछ दर्द नहीं हुआ है, असल में तो तुमने तो मुझे बहुत अच्छा प्यार किया, मजा आ गया, मैं तो…''

मैं आह भरकर गुस्से में दूसरी तरफ़ देखने लगी। मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था, कि मैंने बेकार में इतने अच्छे खासे अपने बेटे से चुदाई के सुंदर मौके को बेकार कर दिया था। अपनी असुरक्षा के बारे में इस वक्त सोचना बेमानी था।

''सच सच बताओ, मम्मी,'' विजय जिद करते हुए बोला, वो समझ गया था कि मैं कुछ छुपा रही थी। ''मैं आपको रोता हुआ नहीं देख सकता, कभी नहीं।''

जैसे ही मैंने उसकी तरफ़ चेहरा घुमाया, उसने मेरे गालों को अपने हाथों में भर लिया, और अपनी ऊँगलियों से मेरे आँसू पोंछने लगा। हम दोनों माँ बेटे एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे, मैंने एक आह भरकर सिर हिलाते हुए बात को टालने की कोशिश की।

''अरे बेटा, कुछ नहीं, मैं तो बस वैसे ही…हम दोनों के बार में सोच रही थी। मैं भी कभी कभी कैसी बच्चों जैसी स्वार्थी हरकत कर बैठती हूँ।'' मैं झेंप कर हँसते हुए बोली, जिस से बात आई गयी हो जाये।

"आप स्वार्थी नहीं हो मम्मी,'' विजय ने मेरी पींठ और गदराये बदन को सहलाते हुए कहा। ''एक बार आप बताओ तो सही कि आप किस बात से परेशान हो, हम मिल कर कोई समाधान निकालेंगे। मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ, बस आप बताओ मुझे।''

''ओह बेटा, तू नहीं मानेगा,'' उसकी बात सुनकर मैं पिघल गयी। मैं अपने आप पर काबू नहीं रख पायी, और मैंने झुककर विजय के होंठों को चूम लिया, और फ़िर अपने मम्मे उसकी छाती पर दबाते हुए उसके कन्धे पर अपना सिर रख दिया।

विजय मेरे गालों को अपने हाथों से सहला रहा था, और उसका लण्ड मेरी वीर्य से भीगी चूत की फ़ाँकों के बीच दबा हुआ था। मैंने सिर घुमाकर विजय की निश्चल सतेज आँखों में देखा। उसके प्यार से अभीभूत होकर, उसकी बलिष्ठ बाहों में आ रहा सुरक्षा का एहसास, मुझे सब कुछ सच सच बोलने को मजबूर कर रहा था। मैं ऐसे सच्चे भरोसेमंद प्यार करने वाले से कुछ भी नहीं छुपाना चाहती थी, और अपनी असुरक्षा वाली बात उसको बताने को मजबूर हो गयी थी।

''मैं तो बस भविष्य के बारे में सोच रही थी, बेटा,'' मैं धीमे से बोली, आर फ़िर अपने आप शब्द मेरे मुँह से निकलते चले गये। ''कुछ साल बाद जब तुम्हारी शादी हो जायेगी बेटा, मुझे डर है कहीं हमारा ये सब खत्म ना हो जाये,'' मैं गहरी साँस लेते हुए बोली। फ़िर इससे पहले कि मैं हताश होती, मैंने अपने आप को हिम्मती बहादुए दिखाते हुए कहा, ''और शायद वो ही ठीक भी होगा, और ऐसा ही होना चाहिये। मुझे पता है लेकिन मैं बर्दाश्त करने को तैयार हूँ, लेकिन मैं अपने आप को उस वक्त के लिये मानसिक रूप से तैयार कर रही हूँ। और वो सब सोच के ही मैं उदास हो जाती हूँ, मुझे माफ़ कर दो, मैंने तुम्हारा मूड खराब कर दिया।'' मैंने विजय के गालों को सहलाकर उसको चूमते हुए कहा, ''बस इसीलिये मैं थोड़ा परेशान थी, तुम्हारी मम्मी तुम्हारी कमी को बहुत ज्यादा मेहसूस करेगी बेटा…।''

विजय की आवाज भर्रा कर काँपने लगी, वो किसी तरह बोला, ''आप कहना क्या चाहती हो, खत्म हो जायेगा, क्यों खत्म हो जायेगा, और मेरी शादी तो होने में अभी काफ़ी साल बाकी हैं, पहले तो हम गुड़िया की शादी करेंगे, और फ़िर…''

और फ़िर मैं कुछ देर तक विजय को लगातार चूमती रही, और उसको खामोश रहने पर मजबूर कर दिया। जैसे ही मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर से हटाये, मैं तुरंत बोली, "बेटा, मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, मैं चाहती हूँ कि तुमको दुनिया की सारी खुशियाँ मिलें, तुम हमेशा खुश रहो। मुझे पता है तुम उस बारे में अभी सोचना भी नहीं चाहते हो, लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि एक बार जब तुम्हारी शादी हो जायेगी तो तुम अपनी जवान बीवी से प्यार करने लगोगे। मुझे गलत मत समझो लेकिन ऐसा होना निश्चित है… मुझे तुमको खुश देखकर खुशी होगी, मैं अपनी बहू यानि तुम्हारी बीवी का बाँहें खोलकर स्वागत करूँगी, और तुम दोनों को एक साथ खुश देखकर, मैं दुनिया की सबसे खुश माँ होऊँग़ी। विजय मैं चाहती हूँ कि तुमको दुनिया की सब कामयाबी मिले और तुम हँसी खुशी अच्छा जीवन बिता सको। मैं तुमको अभी और हमेशा इतना ही प्यार करती रहूँगी। बस ये ही बात थी।''

एक बार फ़िर, मेरे चेहरे पर आँखों मे आँसू और होंठों पर मुस्कान एक साथ आ गये। मैंने विजय को कसकर अपनी बाँहों में जकड़ लिया, विजय मेरे उसके प्रति प्यार की गहराई देखकर अचम्भित हो रहा था। मेरी निष्ठा और दुलार ने उसको अभिभूत कर दिया था। मेरा प्यार हमारे भावनात्मक लगाव और शारीरिक सम्बंधों से आगे निकल चुका था। ये उस ऊँचाई को छू गया था कि मैं उसका त्याग करने को तैयार थी, जिससे वो मुझे पीछे छोड़कर, अपनी जिंदगी के रास्ते अपने आप तय कर सके। हाँलांकि विजय जानता था कि वो ऐसा कुछ नहीं करेगा, लेकिन फ़िर भी वो अपनी मम्मी की त्याग भावना को देखकर अवाक था। मैं तो उससे विरह का दर्द झेलने के लिये तैयार थी, क्योंकि ये उसके भले के लिये अच्छा था।
 
जब विजय भावनाओं में डूबा हुआ था, तभी विजय के लण्ड में हरकत होने लगी, मेरी पनियाती गर्म चूत के दोनों बाहरी फ़ाँकों के बीच दबा हुआ, वो फ़िर से खड़ा होने लगा। विजय अच्छी तरह समझ रहा था कि उसको कभी कोई मेरी तरह ऐसा निस्वार्थ प्यार नहीं करेगा। मेरा सच्चा प्यार और मेरे गुदाज गदराये बदन का सामीप्य उसको फ़िर से उत्तेजित कर रहा था, और उसके लण्ड में हलचल बढने लगी थी।

वो बड़बड़ाते हुए अपनी जीवनदायनी माँ जिसने उसको देखभाल कर पाल पोस के बड़ा किया था को सम्बोधित करते हुए बोला, ''आई लव यू, मम्मी, विश्वास करे मैं आपको हमेशा ऐसे ही प्यार करता रहूँगा।'' विजय ने मुझे अपनी बाँहों मे जकड़ लिया, और मेरी आँखों में आँखें डालकर देखने लगा, वो शायद कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसको शब्द नहीं मिल रहे थे। ''कुछ नहीं बदलेगा, सब ऐसे ही चलता रहेगा, मैं कैसे कहूँ…''

उसकी बात सुनकर मैं हँसने लगी, मैं उसके दिल से निकल रही भावनाओं को समझ रही थी। विजय की बाँहों में पिघलते हुए, मैंने उसके माथे पर अपना माथा छुला कर दबाते हुए कहा, ''मैं समझ रही हूँ बेटा, तुम ज्यादा मत सोचो।''

हम दोनों माँ बेटे, एक नवविवाहित युगल की तरह एक दूसरे को बारम्बार लगातार चूमने लगे, और जो कुछ हम दोनों ने एक दूसरे से कहा था, उसको जिस्मानी तौर से साबित करने लगे।

कुछ देर प्यार से धीरे चीरे चूमने के बाद हम दोनों बेताब होकर चूमाचाटी करने लगे। विजय मेरी नंगी चिकनी पींठ को सहलाते हुए, बीच बीच में मेरी गाँड़ की मोटी उभरी हुई गोलाइयों को दबा कर मसल रहा था, और मैंने अपने बेटे के चेहरे को अपने हाथों में पकड़ रखा था। इस दौरान मैं विजय की गोद में बैठकर अपनी गाँड़ उछाल रही थी, और अपनी भीगी गीली चूत की फ़ाँकों और चूत के उभरे हुए दाने को उसके खड़े लण्ड पर घिस रही थी। अपने मम्मों को विजय की छाती पर दबाते हुए, विजय की जीभ को चूसते हुए, होंठों पर होंठ घिसते हुए, मैं विजय के ऊपर छाई हुई थी।

जैसे ही मैंने विजय को चूमना बंद करते हुए, अपने आप को उसके पेट के निचले हिस्से से अपने आप को थोड़ा सा ऊपर उठाया, विजय सिहर गया। विजय के लोहे जैसे कड़क लण्ड को अपने हाथ से पकड़कर मैं उसको अपनी चिकनी चूत के छेद का रास्ता दिखाने लगी। और फ़िर उसके लण्ड को अपनी चूत में घुसाकर, उसके ऊपर लेटते हुए मैंने अपने मम्मे विजय के चेहरे पर रख दिये। जैसे ही विजय का शूल जैसा लण्ड मेरी चूत को चीरता हुआ मेरी प्यासी चूत की गुफ़ा में अंदर घुसा, मेरी चूत की पंखुड़ियाँ स्वतः ही खुल कर उसको निगलने लगी। विजय के लाजवाब मूसल जैसे लण्ड को अपनी चूत में फ़िसलकर अंदर घुसते हुए मुझे जो पूर्णता का एहसास हो रहा था, उस की वजह से मेरे मुँह से अपने आप आहें निकल रही थी। जब उसका लण्ड पूरा मेरी चूत में घुस गया तो उसका अण्डकोश मेरी गाँड़ के छेद को छूने लगा, और लण्ड मेरी गर्म चूत के छेद में जितना अंदर जा सकता था उतना अंदर घुसा हुआ था।

विजय के लण्ड को अपनी चूत में घुसाकर, उसके ऊपर सवारी करते हुए, अपनी नशीली आँखें खोलकर मैं अपने बेटे को देखकर मुस्कुराई। मेरे बदन में चुदाई का खुमार चढने लगा था, और मेरी आँखें सवतः ही बंद होने लगी थी।

''तू मेरा बहुत प्यार बेटा है विजय, मैं तुझे बहुत प्यार करती हूँ… बहुत ज्यादा बेटा… ओह्ह्ह्…''

''आह मम्मी, मैं भी आपको बहुत प्यार करता हूँ…''

इससे पहले कि विजय कुछ और बोलता मैं उसके ऊपर सवार होकर चुदाई शुरू कर दी। मानो मेरे ऊपर किसी आत्मा का साया हो, मैं पागलों की तरह उसके लण्ड को अपनी चूत में घुसाकर उसके ऊपर कूद रही थी। हम दोनों अपने यौनांगों को आपस में चिपका कर चुदाई का मजा ले रहे थे, हम समझ चुके थे कि दोनों को ही सबसे ज्यादा मजा सहवास में आता था, और इससे बेहतर कुछ और नहीं लगता था, मैं बेसुध होकर विजय के लण्ड को अंदर घुसाये ऊपर नीचे हो रही थी।

अपनी चूत को अपने बेटे के लण्ड पर बार बार पेलते हुए एक ख्याल मेरे जेहन में आ रहा था कि विजय के लण्ड को मेरी वीर्य से भरी चिकनी चूत में ज्यादा से ज्यादा अंदर ले सकूँ। इस पल को अपने जेहन में संजोते हुए, चुदाई के इस बेहतरीन पल जिसमें विजय का लण्ड मेरी चूत के अंदर बाहर हो रहा था, मैं उसके लण्ड पर उछलते हुए आनंदित होकर धीमे धीमे चीख रही थी। मैं बता नहीं सकती कि अपने बेटे के प्यारे लण्ड को अपनी चुत में घुसाकर मुझे जिस पूर्णता का एहसास हो रहा था वो अवर्णनीय है।

ताल में ताल मिलाते हुए विजय भी अपने लण्ड के नीचे से ऊपर झटके मार रहा था। मेरी चूत की फ़ाँको ने उसके लण्ड को जकड़ रखा था और उनके बीच वो अपने लण्ड को पिस्टन की तरह अंदर बाहर कर रहा था। मेरे चूतड़ों को अपनी उसने अपनी हथेली में भर कर वो उनको मसल कर मींड़ते हुए अपने डण्डे जैसे लण्ड के ऊपर उछाल रहा था। मेरे उछलते हुए मम्मे देखकर वो उनके निप्पल को मुँह में भरकर चूसने से अपने आप को रोक नहीं पाया, और बारी बार से उनको कभी चूमकर, तो कभी चूसकर और मींजकर अपनी भड़ास निकालने लगा, मैं पागलों की तरह कसमसाते हुए चीखने लगी।

अपने बेटे के लण्ड पर सवारी करते हुए, रतिक्रीड़ा में डूबकर मैं कामोन्माद के चरम के करीब पहुँच रही थी। विजय के कंधो को अपने हाथों में पकड़कर मैंने स्पीड तेज कर दी, विजय के लण्ड पर अपनी रस से भीगी चूत की छेद के थाप मारते हुए, मेरा बदन काँप रहा था और मैं रिरिया रही थी।

''अंदर ही पानी निकाल देना बेटा, आह्ह्ह्… विजय मैं बस होने ही वाली हूँ! आह चोद दे अपनी मम्मी को, निकाल दे अपना पानी मम्मी की चूत में!"

विजय भी झड़ने ही वाला था, लेकिन वो अब भी मेरे मम्मों का मोह नहीं छोड़ पा रहा था, एक निप्पल को मुँह में भरकर वो तेजी से अपनी गाँड़ को उछालकर अपनी माँ की मोहक गर्म चूत में अपने लण्ड को पेलने लगा। बेकरार होकर उसके लण्ड पर उछलते हुए, मैं कसमसाते हुए काँपने लगी, कामोन्माद में डूबकर बड़बड़ाने लगी, '' चोदो, बेटा, हाँ ऐसे ही, तुम भी मेरे साथ ही हो जाओ बेटा, अपनी मम्मी के साथ साथ झड़ जा……!"

झड़ते हुए बीच बीच में सिंकुड़ कर जैसे जैसे मेरी चूत की मखमली पकड़ उसके लण्ड पर मजबूत होने लगी। तभी विजय ने एक अंतिम झटका मारा, और उसका ज्वालामुखी मेरी चूत के अंदर ही फ़ूट गया। विजय के लण्ड को चूत में अंदर तक घुसाते हुए मैं उसके लक्कड़ जैसे लण्ड पर ऊपर से नीचे होते हुए बैठ गयी, विजय का लण्ड अपनी मम्मी की चूत की सुरंग में अंदर तक घुसकर वीर्य की धार पर धार निकाल रहा था।

झड़ते हुए पगलाकर मैं मस्ती में चीखने लगी, मेरी चूत का निकलता हुआ पानी मेरे बेटे के लण्ड से निकल रही वीर्य की बौछार से मिश्रित हो रहा था। झड़ते हुए विजय की मस्ती भरी आवाज घुटी घुटी सी बाहर आ रही थी, क्योंकि उसने अभी भी मेरे एक निप्पल को किसी भूखे बच्चे की तरह मुँह में भर रखा था, मेरे संवेदनशील निप्पल को उसका इस तरह चूसना, झड़ते हुए मुझे और ज्यादा मजा दे रहा था। विजय का मोटा मूसल लण्ड एक बार फ़िर से अपने वीर्य की पिचकारी मार मारकर मेरी चूत को वीर्य के गाढे पानी से भर रहा था, मेरी चूत में मानो बाढ आ गयी थी।

उस जबरदस्त चरमोत्कर्ष के बाद मेरी तो मानो आवाज ही गायब हो गयी, मेरे पूरे बदन में गजब का हल्कापन मेहसूस हो रहा था। मैंने करवट लेकर अपना सिर विजय की छाती के ऊपर रख दिया, और सोचने लगी कि किस तरह मैंने अपने बदन को अपने बेटे को सौंप, उसकी बाँहों में समर्पण कर चुदाई का मजा लिया था, किस तरह उसने मेरी चूत को वीर्य के गाढे पानी से भर दिया था, मैं उन पलों का आँख बंद कर संवरण करने लगी।

विजय ने पहली बार किसी चूत में अपना लण्ड घुसाकर चुदाई का मजा लिया था, उसके लिये यह इसलिये और ज्यादा अविस्मरणीय था क्योंकि वो चूत उसकी प्यारी मम्मी की थी। लेकिन शायद विजय और मेरा दोनों का ही मन अभी भरा नहीं था।

कुछ देर वैसे ही लेट कर आराम करते हुए, हम दोनों एक दुसरे को सहलाते हुए, चूमते हुए, साथ चिपक कर अठखेलियाँ करते रहे। और फ़िर नींद के आगोश में चले गए।

अगले दिन सारा समय हम एक दूसरे के साथ उस होटल के कमरे में एक साथ ही रहे। हम दोनों ही ज्यादा से ज्यादा समय एक दूसरे का साथ ही रहकर बिताना चाहते थे। सारा दिन हम दोनों ने कभी चूसकर तो कभी चुदाई करते हुए बिताया, बस खाना खाने, पानी पीने और टॉयलेट जाने को छोड़कर हम कामक्रीड़ा में व्यस्त रहे।

जब हम दोनों बिस्तर में ना भी होते, तब भी हम दोनों नंगे ही रहते, और एक दूसरे के नग्न बदन के स्पर्षसुख का मजा लेते रहते। जब चाहे एक दूसरे के होंठों को चूम लेते, जिस से जिस्म की भूख फ़िर जाग उठती और हमारे जिस्म एक दूसरे में आलिंगनबद्ध हो जाते, और हम फ़िर से चुदाई शुरू कर देते। हम किशोर नवविवाहितों जैसा बर्ताव कर रहे थे, हम माँ बेटे प्यार के बंधन को समझते हुए बार बार एकाकार हो जाते।
 
शाम हो गयी थी, बाहर अंधेरा होने लगा था, और मैं बिस्तर पर घोड़ी बनी हुई कराह रही थी, विजय पीछे से अपना लण्ड मेरी चूत में तेजी से पेल रहा था, तभी उसने मेरी वीर्य से भरी चूत में से अपना लण्ड फ़च्च की आवाज के साथ बाहर निकाल लिया, मुझे रिक्तता का अनचाहा अनुभव होने लगा। लेकिन जैसे ही विजय के लण्ड ने मेरी गाँड़ के छेद को छुआ तो मेरी नाराजगी खुशी में तब्दील हो गयी। हाँफ़ते हुए विजय ने अपने फ़नफ़नाते वीर्य के पानी से चिकने हुए लण्ड के सुपाड़े को मेरी गाँड़ की मोटी गुदाज गोलाईयों के बीच की दरार में घुसाते हुए मेरी गाँड़ के छेद पर सहलाना शुरू कर दिया।

सिर उठाकर कंधे के ऊपर से पीछे देखते हुए मैंने शैतानी भरे अंदाज में कहा, ''ओह बेटा, मैं तो सोच रही थी कि कहीं तू मेरे उस छोटे से छेद को भूल तो नहीं गया!"

विजय थोड़ा शर्माते हुए हँस दिया, लेकिन जब उसकी आँखें मेरी आँखों से मिली तो उनमें वासना साफ़ झलक रही थी। ''ऐसा हो सकता है क्या मम्मी! मैं तो आपकी चूत को बस थोड़ा आराम देना चाह रहा था बस…''

''ऑ… मेरा प्यारा बेटा, कितना समझदार है!"

बैड पर उल्टा लेटे हुए अपनी गाँड़ की गोलाईयों को अपने दोनों हाथों में भरकर मैंने अपनी गाँड़ को चौड़ा करके खोल दिया, जिससे विजय मेरी गाँड़ के छोटे से गुलाबी छेद में लण्ड आसानी से घुसा सके, ऐसा करते हुए मेरे चेहरे पर चिर परिचित मुस्कान आ गयी। जैसे ही विजय ने मेरे ऊपर आते हुए अपने बदन का भार मेरे ऊपर डाला, मैं मस्त होकर कसमसाकर उठी और मेरे मुँह से हल्की सी चीख निकल गयी। जब विजय मेरी गाँड़ में अपने लण्ड को आसानी से घुसाने के लिये अपने वीर्य के पानी और मेरी चूत के रस से चिकना कर रहा था, तो बस उसकी हल्के हल्के गुर्राने की आवाज और मेरे कराहने की धीमी आवाजों के सिवा और कोई वार्तालाप नहीं हो रहा था।

इससे पहले कि विजय का लण्ड मेरे गुदाद्वार में प्रवेश करता, मैं अपनी गाँड़ में विजय के लण्ड के घुसने की उत्सुकता के कारण अपने बेटे के सामने पूर्ण रूप से समर्पण कर चुकी थी। मैंने अपनी गाँड़ की माँसपेशियों को ढीला कर दिया, और विजय के वीर्य के वीर्य के पानी से चिकने हुए लण्ड को मेरी रबर समान लचीली गाँड़ में घुसने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई। जैसे ही विजय के मूसल जैसे लण्ड ने मेरी गाँड़ के छेद को चौड़ा करते हुए धीरे से अंदर प्रवेश करना शुरू किया, मैं कराह उठी। विजय जैसा पहले कई बार कर चुका था, उसी तरह आराम से मेरी गाँड़ में अपना लण्ड घुसाकर, उसको अंदर बाहर करते हुए पेलना शुरू कर दिया। मेरी गाँड़ के द्वार को पूरी तरह खुलने के लिये शुरू में वो हल्के हल्के झटके मार रहा था, और साथ साथ मेरी अनोखी टाईट गाँड़ की गर्माहट का मजा ले रहा था। और फ़िर उसने अपना पूरा लण्ड मेरी गाँड़ में घुसा दिया, उसके टट्टे मेरी चूत से टकराने लगे।

विजय ने अपना एक हाथ बैड पर टिका कर अपना वजन उस प ले लिया, और दूसरे हाथ से वो मेरी चूत के दाने को सहलाने लगा। विजय का मांसल बदन मेरे गदराये गुदाज शरीर के ऊपर छाया हुआ था, और मेरी गाँड़ उसके लण्ड की मोटाई के अनुसार अपने आप को ऐड्जस्ट कर रही थी। विजय का सिर मेरे कन्धे पर टिका हुआ था, और वो मेरी गर्दन को चूमते हुए अपनी कमर को आगे पीछे कर अपने लण्ड से मेरी गाँड़ में आराम से धीरे धीरे गहरे झटके मार रहा था।

मजे से गाँड़ मरवाने का जुनून इस कदर मेरे ऊपर सवार हो गया था कि मैं विजय के गुर्राने का जवाब भी अपनी धीमी चीखों के साथ नहीं दे रही थी। हर झटके के साथ जब उसका लण्ड मेरी गाँड़ में अंदर घुसता तो बार बार विजय अपनी मम्मी की गाँड़ की भक्ती की गवाही देता, और मेरे कान को चूसते हुए, धीमे से मेरी तारीफ़ के कुछ शब्द कह देता। जिस तरह से मेरी चूत के दाने के सहला कर गोलाई में मसलते हुए विजय मेरी टाईट गाँड़ के छेद में अपने मोटे लण्ड को अंदर गहराई तक पेल रहा था, मैं मस्त होकर निढाल होते हुए लम्बी लम्बी साँसे लेते हुए खुशी से काँप रही थी।

और फ़िर जब विजय झड़ा तो जितना भी वीर्य उस दिन के चुदाई समारोह के दौरान उसकी गोटियों में बचा था उसने मेरे गुदा द्वार को भर दिया। मैं तो इतनी बार झड़ चुकी थी कि मानो मैं निढाल होकर बेहोश हो चुकी थी। लेकिन एक बार अंत में फ़िर से मेरा बदन में झड़ते हुए काँप उठा, ऐसा विजय के मेरे चूत के फ़ूले हुए दाने को रगड़ने की वजह से हुआ। लेकिन मुझे पता नहीं चल रहा था कि मस्ती मेरी चूत में आ रही थी या फ़िर ऐंठते हुए संवेदनशील गाँड़ के छेद में से।

उस वक्त ये बात कोई मायने नहीं रखती थी। चरमोत्कर्ष की ऊँचाई से नीचे आते हुए हम दोनों माँ बेटे अगल बगल टाँग में टाँग फ़ँसा कर, दोनों पसीने में तरबतर निढाल होकर हाँफ़ रहे थे, और एक दूसरे को जकड़े हुए लेटे हुए थे। नींद के गहरे आगोश में जाते हुए मेरी आँखों के बंद होने से पहले मुझे बस इतना याद है कि विजय मेरे मम्मों को अपनी बाहों में जकड़ते हुए मेरी गर्दन को चूम रहा था।

अगले दिन जब मेरी आँख खुली तो होटल के रूम की खिड़की से आती तेज धूप बता रही थी कि दोपहर हो गयी थी। मैंने विजय को अपने पास बैठकर मुझे निहारते हुए पाया।

''गुड मॉर्निंग मम्मी,'' विजय ने मुझसे कहा, और फ़िर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये। ''मैं तो बहुत देर से जागा हुआ हूँ, शायद मेरा छोटू तो मेरे से भी पहले उठ गया था,'' विजय मुस्कुराकर अपने लण्ड की तरफ़ इशारा करते हुए बोला।

मैं खिलखिला कर हँस दी, और विजय के लण्ड को हल्का सा सहलाकर अपने हाथ में पकड़ में पकड़ कर हिलाने लगी।

विजय खुश होकर मुझसे जोरों से चिपक गया, और मेरे होंठों को चूमने लगा। शायद विजय मुझे इतना प्यार से चूमकर अपनी व्यक्त ना की जा सकने वाली खुशी और प्रसन्नता का इजहार कर रहा था।

मैं उसके लण्ड को जल्दी तेजी से मुठियाने लगी, विजय ने एक पल को चूमना छोड़ कराहने लगा।

''जोर से करो मम्मी, आह्ह्…'' विजय चीख कर बोला।

''ना बेटा,'' मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया। और फ़िर विजय को सीधा लिटाते हुए, उसके ऊपर सवार होकर मैंने थोड़ा गम्भीर होते हुए कहा, ''मैंने ठान लिया है कि जब भी हम दोनों साथ होंगे, मैं एक पल भी जाया नहीं होने दूँगी बेटा।''

विजय ने हामी में सिर हिला दिया, और मैंने उसका लण्ड पकड़कर अपनी चूत के छेद पर लगा दिया। ''अगले हफ़्ते जब तक गुड़िया बुआ के घर से वापस नहीं लौटकर आती, मैं हर एक पल को जीवन भर सहेज कर रखना चाहती हूँ, विजय बेटा,'' मैंने उसके मूसल जैसे लण्ड के ऊपर अपनी पनियाती मुलायम चूत को रगड़ते हुए कहा। ''और गुड़िया के लौटने के बाद तब की तब देखेंगे।''

जैसे ही विजय के लण्ड के ऊपर बैठते हुए उसको अपनी चूत के अंदर लिया, हम दोनों एक साथ कराह उठे। लण्ड ईन्च दर ईन्च मेरी चूत में घुसता जा रहा था, मैंने आह भरते हुए विजय से पूछा, ''अपनी मम्मी को ऐसे ही प्यार करते रहोगे ना बेटा?"

मैं एक गहरी साँस लेकर रुक गयी, विजय का लण्ड अभी आधा ही मेरी चिकनी चूत में घुसा था, तभी हम दोनों की आँखें मिल गयी। विजय रूँधे गले के साथ किसी तरह बोला, ''हाँ मम्मी हमेशा…''

और फ़िर मेरी गाँड़ की गुदाज गोलाईयों को अपने हाथों में भरकर विजय मुझे अपने लण्ड के ऊपर उछालने लगा, बस एक दो बार उछालने के बाद उसका लण्ड पूरा मेरी चूत के अंदर घुस गया। जब मैं विजय के ऊपर सवारी कर रही थी, तब अपनी माँ की चूत की चिकनी मखमली दीवार का घर्षण अपने लण्ड पर ऊपर से नीचे तक मेहसूस करते हुए विजय गुर्राने लगा था, मेरी आँखें बंद होने लगी थीं, और मेरे बड़े बड़े मम्मे हर उछाल के साथ उछल रहे थे।
 
''ओह मम्मी हम ऐसे ही चुदाई किया करेंगे, हमेशा… ऐसी ही चुदाई… बहुत मजा आता है मम्मी…आई लव यू मम्मी…!"

''म्म्मुआआ… आई लव यू बेटा!" मैं धीमे से बोली, अपने बेटे के लण्ड को एक बार फ़िर से अपनी चूत में जड़ तक घुसा कर, मैं खुशी के मारे काँप रही थी।

मुस्कुराते हुए मैं थोड़ा आगे झुक गयी, मेरे मम्मे विजय की छाती से मसलने लगे, हम दोनों के होंठ एक दूसरे को छूने लगे, मैं अपनी प्यासी चूत को विजय के फ़नफ़नाते लण्ड पर रगड़ते हुए मानो दही बिलोने लगी। मुझे विजय के लण्ड का अपनी चूत में घुसे होने का एहसास बहुत अच्छा लग रहा था, जिस तरह से विजय का लण्ड मेरी चूत को पूरी तरह भर देता था, चूत के छेद को खोलते हुए, चूत की गुफ़ा में मजे से अंदर घुस जाता था, और चूत के अंदर हर संवेदनशील हिस्से को प्यार से सहला देता था, वो एक मस्त एहसास था।

मैं आनंदित होकर मस्ती में डूबी हुई थी, और विजय अपने लण्ड को मेरी चूत में घुसाकर, हर झटके के साथ अपनी गाँड़ ऊपर करते हुए, मुझे अपने ऊपर उछाल रहा था, हम दोनों के बदन स्वतः ही चुदाई की ताल से ताल मिला रहे था।

अपने बेटे विजय के खुले हुए होंठों को चूसते हुए, एक माँ के मुँह से जो वाक्य निकला उसके हर शब्द में सच्चाई थी : "बेटा, हम दोनों हमेशा ऐसे ही किया करेंगे… हाँ सच में बेटा… हाँ…''

***

गुड़िया के मुँह से उसकी मम्मी की अपने बेटे से चुदाई की दास्तान सुनने के बाद मेरे लण्ड में भी हरकत होने लगी थी। मेरा भी मन गुड़िया से लण्ड चुसवाने का करने लगा, मैंने अपने वॉलट में से हजार रुपये का नोट निकाला और गुड़िया की चुँचियों को दबाते हुए, और अपने लण्ड को पाजामे में से बाहर निकलाते हुए मैंने गुड़िया को एक हजार रुपये देते हुए पूछा से , “लेकिन तुम तो बता रहीं थीं कि तुमको भी विजय कई बार चोद चुका है, उसकी शुरूआत कब और कैसे हुई, उसके बारे में भी बताओ ना।

गुड़िया मेरे लण्ड को अपने सीधे हाथ में लेकर हिलाने लगी, और अपने मुँह में लेकर चूसने से पहले, उसने अपने भाई विजय से अपनी चुदाई की जो कहानी सुनाई वो कुछ इस तरह थी:

अब आगे की कहानी गुड़िया की जुबानी

मम्मी की विजय से हुई चुदाई के किस्से सुनकर मुझे भी विजय से चुदवाने का मन करने लगा था, जब मम्मी को अपने सगे बेटे विजय से चुदने में कोई एतराज नहीं था, तो मैं तो उस समय कच्ची कली थी, जिसकी चूत में हमेशा खुजली मची रहती थी।

जब विजय और मैंने जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो एक बार मम्मी को हम दोनों को एक साथ अकेला छोड़कर किसी वजह से मामा के घर जाना पड़ा, उस दिन से हमारी जिन्दगी ही बदल गयी। जाने से पहले मम्मी मुझे विजय का ठीक से ध्यान रखने का बोल कर गयी थीं।

मुझे अच्छी तरह याद है, वो जून का महीना था, रात में खाना खाने के बाद, लाईट ऑफ़ होने के कुछ देर बाद ही विजय खिसक कर मेरे पास आ गया और उसने कुछ देर बाद ही विजय ने मेरी पैण्टी में हाथ घुसा दिया था, और मैने भी अपनी टाँगें फ़ैलाकर मेरी पनिया रही चूत के साथ खेलने का उसको भरपूर मौका दिया था। विजय मुझे खींच कर कमरे में ले गया था, और जल्दी से घुटनों के बल बैठकर उसने एक झटके में उसने मेरी पैण्टी उतार कर मेरे घुटनों तक ला दी थी।

मैं खिसक कर बैड के सिरहाने पर सहारा लगा कर बैठ गयी, और अपनी टाँगें फ़ैला दी। विजय ने जब मेरी पैण्टी उतारनी शुरु की तो मैंने भी अपनी गाँड़ उठा दी, और उसे ऐसा करने में उसका सहयोग दिया। विजय मेरी नरम मुलायम और इर्द गिर्द झाँटों के हल्के हल्के बालों से घिरी खूबसुरत चूत को देखकर दीवाना हो गया। मैंने अपनी टाँगें थोड़ी और फ़ैला दी, जिससे उसको मेरी चूत का और बेहतर दीदार हो सके। जैसे ही मैंने अपनी टाँगें थोड़ा और फ़ैलायीं, मेरी चूत के दोनों होंठ अलग अलग हो गये और मानो मेरी गुलाबी चूत मेरे भाई विजय को सामने देख मुस्कुराने लगी।

विजय का लण्ड उसके पाजामे में तम्बू बना रहा था। विजय ने अपने पाजामे का नाड़ा खोला और पाजामे और अन्डरवियर को नीचे खिसका दिया, उसका लण्ड एकदम लोहे के डण्डे की तरह सख्त हो चुका था, लण्ड का सुपाड़ा फ़ूल कर लाल हो रहा था, जैसे ही विजय अपने लण्ड को मेरी चूत के मुँह की तरफ़ लाया, मैं सिहर उठी। जैसे ही उसने अपने लण्ड को मेरी चूत के होंठो पर रगड़ा, मैं बिन पानी मछली की तरह तड़पने लगी।

जैसे ही विजय ने अपने लण्ड को मेरी चूत में घुसाने का प्रयास किया, मैं दर्द के मारे चील्लाने लगी। मेरी कुँवारी चूत में पहली बार किसी का लण्ड घुस रहा था। कुछ देर प्रयास करने के बाद जब विजय का बड़ा लण्ड मेरी छोटी सी चूत में घुसने में असफ़ल रहा, तो विजय ने ढेर सारा थूक अपने लण्ड के सुपाड़े पर लगा लिया। हम दोनों ने पापा को मम्मी को चोदते हुए ऐसा करते हुए देखा था। विजय की ये ट्रिक कार कर गयी और मेरी चूत की दोनों पन्खुड़ियाँ अलग अलग होकर विजय के लण्ड का स्वागत करने लगी, विजय के लण्ड का सुपाड़ा और लण्ड भी कुछ ईन्च मेरी चूत में आसानी से अन्दर घुस गया।

मेरा भाई विजय मेरी चूत की चिकनाहट और गर्माहट को अपने लण्ड से मेहसूस कर रहा था, मेरी चूत चुदने को बेकरार होकर बेपनाह पनिया रही थी। विजय का लण्ड मानो कोई गर्म छुरी हो जो अमूल बटर को काट रहा हो। मेरी चुदने को बेकरार चूत उसके लण्ड की पुरी लम्बाई पर चिकने लिसलिसे पानी की एक पतली सी परत चढा रही थी, जिससे उसके लण्ड को और ज्यादा गहराई तक जाने में आसानी हो सके।

किसी रोबोट की मानिंद मेरे भाई विजय की कमर स्वतः ही आगे पीछे होने लगी और उसका लण्ड मेरी चूत में हल्के हल्के धीरे धीरे अन्दर बाहर होने लगा। विजय के लण्ड और मेरी चूत में मानो आग लगी हुई थी। मेरी चूत में विजय के लण्ड के अन्दर बाहर होने से जो घर्षण हो रहा था वो दोनों के बदन में बेपनाह आग रही था। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि क्यों चुदाई रिश्ते नाते मर्यादा सब कुछ भुलाने पर मजबूर कर देती है।

विजय के टट्टों में उबाल आना शुरु हो गया था, और मैं भी अपनी चूत की आग बुझाने के लिये अपनी गाँड़ उठा उठाकर अपने भाई विजय से मस्त चुदाई करवाने में उसका भरपूर सहयोग कर रही थी। एक बारगी जब हम दोनों, की आँख आपस में मिली तो मुझे एहसास हुआ कि विजय अपना पूरा लण्ड मेरी चूत में पेलकर मेरी चूत की पूरी गहराई को अपने लण्ड से नाप रहा था। मेरी चूत अब बड़ी आसानी से उसके पूरे लोहे जैसे लण्ड को निगलकर उसके लण्ड के झटकों के साथ खुल और सिंकुड़ रही थी। ये मेरी पहली चुदाई थी, लेकिन मैं अपने भाई विजय के लण्ड के झटकों से ताल से ताल मिलाते हुए कराह रही थी। मेरा भाई विजय मेरी चूत को अन्दर बाहर, ऊपर नीचे तो कभी साईड से, हर तरफ़ से चोद रहा था, और मेरी चूत उसको हर तरह से चोदने के लिये आमंत्रित कर रही थी। अपने माँ बाप और माँ और भाई की चुदाई देख देख कर ही शायद मैं एक्स्पर्ट हो गयी थी। विजय क लण्ड मेरी कुँवारी चूत का भोग करते हुए और मेरे करहाने की आवाज सुनकर मेरी छोटी सी चूत पर और ज्यादा ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा था। जो कुछ हो रहा था वो नैचुरल था, मेरी चूत ने शुरु में जो प्रतिरोध किया था, उसे भूलकर वो अब चुदाई में सह्योग कर रही थी।
 
एक बार थोड़ी जब विजय ने एक जोर का झटका मारा तो मानो मेरी तो जान ही निकल गयी, और मेरे मुँह से बरबस चीख निकल गयी, और मेरी चूत ढेर सारा पानी छोड़कर स्खलित हो गयी। कुछ देर बाद विजय ने मेरी चूत से अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। विजय ने जब अपने लण्द और मेरी चूत की तरफ़ देखा तो उसे और मुझे एहसास हुआ कि मेरी कुँवारी चूत की झिल्ली फ़टने से जो खून निकला था उसकी वजह से विजय का लण्ड लाल खून से लिसा हुआ था, और बैडशीट पर भी खून के दाग लग गये थे। मैं अपना कौमार्य अपने सगे भाई से चुदकर खो चुकी थी, जो कुछ हो चुका था उस पर पछताना अब व्यर्थ था।

हम दोनों की साँस अभी भी तेज तेज चल रही थी, लेकिन मेरे भाई विजय का लण्ड का स्पर्श पाते ही मेरी चूत फ़िर से पनियाने लगी और मेरे शरीर में 440 वोल्ट का करेन्ट दौड़ गया। अब मुझे समझ में आ रहा था कि जब पापा मम्मी को चोदते थे तो दोनों के मुँह से वो कराहने की मदमस्त आवाज क्यों और कैसे निकलती थीं।

मेरे चुदने की लालसा फ़िर से बलवती होने लगी थी, मैं बैड पर थोड़ा नीचे खिसक आई और अपनी दोनों टाँगों को अपने दोनों हाथों से उठाकर, अपनी चूत को खोलकर मैं अपने भाई विजय को अपना लण्ड डालकर मुझे चोदने के लिये आमंत्रित और प्रोत्साहित करने लगी। मैंने मम्मी को पापा और विजय से चुदते हुए ऐसा करते हुए देखा था, और विजय ने भी वो ही किया जो उसने पापा को करते हुए देखा था, और जो वो खुद मम्मी को चोदते हुए करता था, उसने अपने हाथ पर ढेर सारा थूक लिया और पहन्ले उससे अपने लण्ड के सुपाड़े को गीला किया और बाकि को मेरी चूत के होठों और छेद के ऊपर घिस दिया, उसके ऐसा करते ही मेरी चूत को चमकने लगी। मेरे भाई विजय की आँखों में भी मेरी चमकती गीली चूत को देखकर एक अजीब चमक आ गयी।

इस बार मेरी चूत ने कोई प्रतिरोध नहीं किया, और विजय का जिद्दी लण्ड एक बार में ही मेरी चूत के अन्दर तक घुस गया। मैंने और मेरे भाई विजय दोनों ने पापा को मम्मी के ऊपर चढकर मिशनरी पोजीशन में ही चोदते हुए देखा था, शायद उस समय तक हम दोनों को किसी और पोजिशन का पता भी नहीं था। लेकिन उसका एक फ़ायदा तो हुआ, हम दोनों एक दूसरे का चेहरा देख पा रहे थे, लेकिन जैसे ही विजय का लण्ड पूरा मेरी चूत में घुसा, मेरी आँखें खुदबखुद बन्द होने लगीं, और वही हाल विजय का भी था, लेकिन जब भी बीच बीच में थोड़ी आँख खुलती तो एक दूसरे के चेहरे के भाव देखकर पता चल जाता कि दोनों को चुदाई में कितना ज्यादा मजा आ रहा था।

विजय अपने लण्ड से मेरी चूत को मूसल की तरह ताबड़ तोड़ कूट रहा था। मेरी चूत की दीवार और ज्यादा फ़ैलती जा रही थी, जिससे विजय का मोटा लण्ड और ज्यादा आसानी से अन्दर बाहर हो रहा था। मेरे भाई विजय का लण्ड के गहरे झटके मेरी चूत की सुरंग की खुजली मिटा रहा था। मेरी चूत की माँसपेशियाँ कभी टाईट होकर और कभी लूज होकर दर्द और चुदाई के सुख को आत्मसात कर रही थीं। मुझे इस बात पर गर्व हो रहा था कि मैं अपनी चूत की खुजली अपने भाई के लण्ड से मिटा रही थी, ना कि भाग कर किसी बाहरी आवारा लड़के के साथ, इस से घर परिवार की इज्जत पर दाग लगने का कोई खतरा नहीं था।

ये विचार मेरे दिमाग में आते ही और ज्यादा चुदासी हो उठी, और अपनी गाँड़ उठा उठा कर विजय का चुदाई में सहयोग देने लगी। और तभी मेरी चूत ने ढेर सारा पानी छोड़ दिया और मैं स्खलित हो गयी। मेरे भाई को विजय को कुछ समझ नहीं आया और उसने लण्ड का एक जोर का झटका मार कर अपना पूरा लण्ड मेरी चूत में अन्दर तक घुसा दिया। मुझे मानो जन्नत दिखाई दे गयी।

उस वक्त चुदाई के मामले में मैं और विजय दोनों ही नौ सीखिया थे, हाँलांकि मम्मी को चोदकर विजय मुझसे कुछ थोड़ा ज्यादा जानता था, लेकिन किसी जवान लड़की की कुँवारी टाईट चुत चोदने को उसे भी पहली बार मिली थी। कहाँ मम्मी का ढीला ढाला भोसड़ा और कहाँ मेरी टाईट कुँवारी चूत, हल्की झाँटों से घिरी मेरी कुँवारी चूत देखकर वो भी पागल हो गया था। झड़ते हुए हुए जब मेरी चूत की माँस पेशियों ने मेरे भाई विजय के लण्ड को निचोड़ना शुरु किया, तो उसकी गोलियों में भी उबाल आने लगा। उसने तुरंत अपना लण्ड मेरी चूत में से बाहर निकाल लिया और तभी उसके लण्ड से वीर्य की जो पिचकारी निकली उसने मेरे पेट, मेरी चूँचियों और मेरे चेहरे सभी को अपने पानी से तर बतर कर दिया। मैं विजय के लण्ड को अपने एक हाथ की मुट्ठी में लेकर आगे पीछे करने लगी, और उसके लण्ड को अपनी चुँचियों और निप्पल पर रगड़ने लगी, जिससे उसके वीर्य की आखिरी बूँद तक बाहर निकल जाये। मैं इस बात से खुश थी कि उसने समय रहते अपना लण्ड बाहर निकाल लिया, मैं किसी भी शर्त पर गर्भवती नहीं होना चाहती थी॥

और उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया। जब कोई लड़की एक बार कौमार्य खो देती है तो वो लड़की और ज्यादा बेशर्म हो जाती है। गुड़िया मेरी तरफ़ देखकर थोड़ा मुस्कुरायी, और फ़िर हँसते हुए बोली, इसीलिए उस दिन के बाद जब भी आपने हजार के तीन नोट दिखाये, मैंने भी अपनी चूत खोल कर आपको दे दी। मैं उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया, और उसे पैण्ट की जेब से दो और हजार के नोट दिखाकर मुस्कुराने लगा।

मुझे मुस्कुराते हुए देखकर वो बोली, अब ज्यादा मत मुस्कुराओ विशाल बाबू, आपको शायद पता नहीं है कि आपकी गिफ़्टी दीदी एक बार मुझे आपक लण्ड चूसते हुए छुप कर देख चुकी हैं। पिछले हफ़्ते वो जॉब से जल्दी आ गयीं थीं और वो अपनी चाबी से मेन गेट का दरवाजा खोलकर अंदर आकर हमारी चुदाई देख चुकी हैं। चुदने के बाद आपको सोता हुआ छोड़कर जब मैं किचन में बर्तन साफ़ करने जा रही थी, तो मुझे दीदी के रूम से कुछ आवाज सुनाई दी, जब मैंने थोड़ा सा दरवाजा खोल कर देखा तो दीदी बैड पर नंगी होकर अपनी चूत मे उँगली कर रही थी। जब मैं घर का सारा काम खत्म करके मेन गेट खोलकर जाने लगी, तो वो अपने रूम के डोर पर खड़ी होकर मुझे घूर रहीं थीं। हाँलांकि इस बारे में उन्होने मुझसे कभी कोई बात नहीं की है, और शायद मेमसाहब को भी कुछ नहीं बताया है। लेकिन सावधान रहना। गुड़िया की ये बात सुनकर मेरे पैरों के तले से तो मानों जमीन ही खिसक गयी।

गुड़िया बोली ये दो हजार के नोट अपनी जेब में वापस रख लो, बस एक हजार लण्ड चूसने के दे दो, जीजू भी लन्दन से आने वाले हैं, शायद वो दीदी को कम्पनी से साथ लेते हुए ही आयेंगे। अगर दीदी और जीजू जल्दी आ गये तो हम दोनों की खैर नहीं, जब कभी सब लोग कहीं बाहर गये होंगे तब इत्मीनान से तुमसे चुदवाऊँगी।

*****
 
अब मेरी यानि विशाल की कहानी

मैं एक बार से पाठकों को अपने परिवार के बार में एक बार फिर से याद दिला दूँ, मेरे परिवार में मेरे पापा, मम्मी मेरी गिफ़्टी दीदी और मैं चार लोग हैं। हम लोग नोएडा में रहते हैं। मेरे पापा और मम्मी दोनों सरकारी जॉब में हैं। दीदी की पिछले साल ही शादी हुई है, अजय जीजू की लन्दन में बैंक में अच्छी जॉब है, लेकिन जीजू शादी के बाद दीदी को वीसा प्रॉब्लम के कारण लन्दन नहीं ले जा पाये हैं, गिफ़्टी दीदी अभी भी हमारे साथ ही रहकर अपनी सॉफ़्ट्वेयर कम्पनी में जॉब कर रही है। जीजू हर दो तीन महिने में आते जाते रहते हैं।

गुड़िया के जाने के कुछ देर बाद ही दीदी और जीजू एक साथ वापस आ गये। दीदी अपनी चाबी से मेन गेट का दरवाजा खोला, और वो दोनों दीदी के रूम में चले गये। मैं दबे पाँव दीदी के रुम के पास गया, और दरवाजे की झिर्री में से अन्दर का नजारा झाँक कर देखने लगा। जीजू का लण्ड दीदी के मुंह में पूरा घुसा हुआ था, दीदी जीजू के मोटे लण्ड को अपने होंठों के बीच लेकर अन्दर बाहर करते हुए चूस रही थी। जीजू दीदी को मस्ती में अपना लण्ड चूसते हुए देख रहे थे।

अपने दीदी और जीजू को काम क्रीड़ा में लगे हुए देखत हुए, मैंने भी अपने लण्ड को बॉक्सर से बाहर निकाल कर मुट्ठी में ले लिया, और कल्पना करने लगा कि मेरा लण्ड दीदी में मुँहे में घुसा हुआ है। थोड़ा हिलाने के बाद जब लण्ड पूरा खड़ा हो गया तो मैं उसे दीदी के मुँह में पेलने की कल्पना करते हुए मुठियाने लगा। मेरा मन कर रहा था कि काश मैं भी इस वक्त बाहर झिर्री से झाँकने की जगह कमरे के अंदर होता। लेकिन ऐसा होना असम्भव था। लेकिन मुझे मन ही मन इस बात कि खुशी हो रही थी कि मेरा लण्ड जीजू से कहीं ज्यादा बड़ा और मोटा था।

मैं दीदी को मस्त होकर जीजू का लण्ड चूसते हुए देख रहा था। दीदी का छरहरा इकहरा बदन और बार बार जब दीदी के खुले हुए बाल चेहरे पर आ जाते तो दीदी उनको एक हात से पीछे कर देतीं। मैं दीदी के रसीले होंठों को जीजू के लण्ड के सुपाड़े के गिर्द जकड़े हुए देख रहा था। क्या मस्त गुलाबी होंठ थे दीदी के, उनके उभरे हुए गाल, हिरनी जैसी आँखें आह्ह्…

मेरी नजर नीचे आते हुए दीदी के मस्त उभारों को निहारने लगीं। जीजू अब बैड पर लेटकर दीदी को लण्ड चूसते हुए देख रहे थे, और दीदी के झुकने की वजह से उनकी चूँचियाँ नीचे लटक रही थीं। इतनी दूर से भी दीदी के एकदम कड़क और खड़े निप्पल साफ़ दिखायी दे रहे थे। दीदी की पतली कमर, मोटी गाँड़ और गोरी लम्बी पतली टाँगें किसी को भी पानी निकालने पर मजबूर कर देते।

मैं दीदी के नग्न बदन को निहारते हुए मुठिया रहा था, और उधर दीदी इतने दिनों बाद मिले लण्ड को मस्त होकर चूस रही थी। कुछ समय बाद जीजू के लण्ड ने पानी छोड़ दिया और दीदी उसको पूरा निगल गयी, ये सब देख मुझसे भी और बर्दाश्त नहीं हुआ और मेरे लण्ड ने भी अपना लावा दरवाजे की किवाड़ पर पिचकारी मार मार के उन्डेल दिया।

मेरा मन ही मन सोच रहा था कि काश जीजू की तरह मैं भी अपने लण्ड से निकला वीर्य का पानी दीदी के मुँह में निकाल पाता। लेकिन शायद अपनी सगी बड़ी बहन के साथ ऐसा कर पाना सम्भव था। मैं कुछ देर और उनके आगे की हरकतों को वहीं पर खड़ा होकर देखता रहा, लेकिन शायद दीदी को एहसास था कि मम्मी पापा के ऑफ़िस से आने का टाईम हो रहा था, इसलिये वो तुरंत अटैच्ड टॉयलेट में घुस गयीं। मैं भी ड्रॉईंगरूम में आकर टीवी देखने लगा और दीदी जीजू के बाहर आने का इंतजार करने लगा।

उस शाम मम्मी पापा को किसी शादी पार्टी में जाना था, इसलिये वो हम तीनों को घर पर टीवी पर मूवी देखता हुआ छोड़कर चले गये। मम्मी पापा के जाने के कुछ मिनट बाद ही दीदी जीजू अपने रूम में चले गये, और मैं बेवकूफ़ों की तरह टीवी देख रहा था उस वक्त जब दीदी जीजू अपने रूम मे नंगे होकर लण्ड चूत का चुदाई का खेल, खेल रहे थे। मेरे कदम बरबस ही दीदी के रुम की तरफ़ बढ चले, मुझे ये देख कर आश्चर्य हुआ कि उन्होने अपने रूम का दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया था, और रूम की लाईट भी जल रही थी। मुझे गैलरी में से अंदर का साफ़ साफ़ नजर आ रहा था।

जीजू ने दीदी का टॉप उठाकर सिर के ऊपर से निकाल दिया था और वो दीदी की ब्रा में कैद चूँचियों को निहार रहे थे। मैं पिछले कुछ सालों से जब से दीदी पर कमसिन जवानी चढने लगी थी, तब से उनकी चूँचियों को निरंतर निहारा करता था, और वो कब नींबू के साईज से C कप साइज की हुई थीं, इसका मेरे पास पूरा लेखाजोखा था।

जीजू ने दीदी की ब्रा खोलकर उनके मम्मों को दबाना और चूसना चालू कर दिया था, और जब जीजू दीदी के निप्पल को मींज रहे थे तब मेरे दिमाग में अंतर्द्वंद चल रहा था कि क्या इस तरह अपनी सगी बड़ी बहन को अपने पति के साथ काम क्रीड़ा में रत देख कर मुट्ठ मारना सही है या नहीं। दीदी ने जीजू के धकेलकर बैड पर लिटा दिया और उनके लोअर को नीचे खींच कर उतार दिया, और फ़िर जीजू के लण्ड को चूसने लगी। मैंने गुड़िया को हजार रुपये देकर चोदा तो कई बार था, लेकिन इस तरह तन्मयता से उसने मेरे लण्ड को कभी नहीं चूसा था, जैसा दीदी जीजू के लण्ड को चूस रही थी।

मैं जब इन्ही विचारों में मग्न था तभी मेरा लण्ड फ़िर से फ़नफ़ना कर खड़ा हो गया, लेकिन तभी दीदी और जीजू ने अपने कपड़े पहनने शुरु कर दिये, मैं तुरंत ड्रॉईंगरूम में आकर सोफ़े पर बैठ कर टीवी पर चल रही मूवी देखने लगा। कुछ पल बाद ही दीदी और जीजू भी ड्रॉईंगरूम में मेरे पास आकर मूवी देखने लगे। दीदी की नजर बार बार मेरे बॉक्सर में बने तम्बू पर जा रही थी, वो कनखियों से जीजू को भी देख रही थीं कि उन्होने मेरे लण्ड से बॉक्सर में बने तम्बू को नोटिस किया है या नहीं, लेकिन जीजू मूवी देखने में मग्न थे। दीदी ने उस दिन से पहले मेरे लण्ड को इस तरह कभी नहीं देखा था, और देखती भी क्यों आखिर मैं उनका छोटा भाई था। लेकिन आज जिस तरह मेरा लण्ड बॉक्सर में तम्बू बनाकर खड़ा था, तो उनकी नजर का मेरे लण्ड पर जाना लाजमी थी।

दीदी के मुँह में अभी भी जीजू के वीर्य का स्वाद आ रहा था, और आज उनकी पिछले दो महिने से बिना चुदी चूत की आग अभी तक जीजू के लण्ड ने शांत नहीं की थी। दिन में दो बार जीजू का लण्ड चूसने के बाद, और अब अपने भाई के लण्ड के साइज का अनुमान लगाते हुए उनकी चूत ने पनिया कर पैण्टी को गीला कर दिया था।

दीदी को अपने आप पर भरोसा नहीं हो रहा था कि वो अपने छोटे भाई के लण्ड के बारे में सोच रही थीं, वो मूवी देखत हुए बीच बीच में अब मेरे बैठते जा रहे लण्ड को कनखियों से देख लेतीं।

मूवी के खत्म होने से कुछ देर पहले ही मम्मी पापा वापस घर आ गये, और मूवी खत्म होने के बाद हम सभी अपने अपने कमरों में चले गये। मैं बैड पर लेटा लेटा सोच रहा था कि जीजू किस तरह दीदी को पूरा नंगा कर के, उनकी गोरी लम्बी टाँगों को फ़ैला कर, मसल मसल कर चोद रहे होंगे। ये सोचते हुए मैं मुट्ठ मार रहा था।

और उधर शायद गिफ़्टी दीदी भी जीजू के लण्ड को पकड़कर अपनी चूत में घुसा रही थीं तो उनके जेहन में भी अपने छोटे भाई के बॉक्सर में, लण्ड के बने तम्बू की तस्वीर घूम रही थी। अगले दिन अजय जीजू फ़िर से लण्दन जाने वाले थे इसलिये उस रात दीदी को जीजू से चुदना लाजमी था।

हम दोनों भाई बहन अपने अपने जिस्म की आग को शांत करके, अलग अलग रूम में जब नींद के आगोश में आ रहे थे, तब भी दोनों के दिमाग में एक दूसरे के जिस्म को नंगा देखने के नये नये तरीके आ रहे थे।
 
कुछ दिन बाद एक दिन सुबह मैंने एक स्पाई कैमरा ऑनलाईन मंगाकर बाथरूम में ट्यूब्लाइट के पास छिपा कर लगा दिया। अपने रूम में आकर मैं इन्तजार करने लगा कि गिफ़्टी दीदी नहाने जायें और फ़िर मैं उस कैमरे की मैमोरी को लैप्टॉप से अटैच कर के उनके नंगे बदन को देखूँ। मैं अपने कमरे में बैठकर इन्तजार करने लगा। बाथरूम से जब दो बार शॉवर की आवाज आ गयी, तो मैं धड़कते दिल के साथ नहाने के लिये बाथरूम की तरफ़ चल दिया। जब मैं बाथरूम के डोर पर खड़ा था, तभी बाथरूम का दरवाजा खोलकर गिफ़्टी दीदी बाहर निकलीं, उन्होने अपने बदन पर सिर्फ़ तौलिया लपेट रखी थी। दीदी को इस रूप में देखकर मेरे लण्ड में हलचल शुरू हो गयी। हम दोनों एक दूसरे की तरफ़ देखकर मुस्कुरा दिये। मैंने अंदर घुसकर बाथरूम का दरवाजा बंद कर लिया। मैंने तुरंत बॉक्सर उतार कर शॉवर चालू कर दिया, मैं दुविधा में था कि पहले नहाऊँ या पहले कैमरा चैक करूँ, लेकिन फ़िर मैंने पहले नहाना ही उचित समझा, क्योंकि नहाने के बाद कैमरा मुझे अपने साथ ले जाना था।

मैं बेहद एक्साईटेड हो रहा था, मेरा लण्ड खड़ा होकर फ़नफ़ना रहा था, शॉवर जैल से अपने लण्ड को चिकना कर के मुट्ठ मारने के सिवा मेरे पास कोई उपाय नहीं था। जब मैं बाथरूम के फ़र्श पर बैठकर अपने लण्ड पर शॉवर जैल लगाकर सड़के मार रहा था, तभी बाथरूम का दरवाजा खुला। औए जब गिफ़्टी दीदी बाथरूम के अंदर दाखिल हुई तो उस हालत में मेरी तो सिट्टी पिट्टी ही गुम हो गयी।

"सॉरी विजय, मैं अपना हेयर ब्रश भूल गयी थी,'' वो बिना कुछ देखे, अंदर आते हुए बोली। लेकिन बाहर जाते हुए जैसे ही उसने मेरी तरफ़ देखा, तो उसकी नजर मेरे खड़े फ़नफ़नाते लण्ड पर टिक गयी, जो मानो दीदी को अटैन्शन पोजीशन में सैल्यूट मार रहा था। दीदी बाहर निकल गयी और मैं फ़िर से फ़र्श पर बैठकर लण्ड के सड़के मारकर मुट्ठ मारने लगा।

और उधर दीदी अपने बैड पर बैठकर एक हाथ से अपनी चूँचियों को दबा रही थी और दूसरे हाथ की उँगलियां अपनी चूत में घुसा रही थी। दीदी अपने भाई के इतने बड़े लण्ड को देखकर आश्चर्य चकित थी, उसके दिमाग में बस मेरे लण्ड की तस्वीर ही घूम रही थी। उस दिन मेरे बॉक्सर में बने लण्ड के तम्बू से उसको कुछ तो एहसास हो गया था, लेकिन आज आँखों से छत की तरफ़ खड़ा फ़नफ़नाता लण्ड देखकर वो विचार मग्न थी। वो बैड पर लेटकर कल्पना कर रही थी कि ऐसे बड़े लण्ड को अपने होंठों के बीच लेकर चूसने में, और हाथ से हिलाने में, उसके सुपाड़े को जीभ से चाटने में और फ़िर पूरा मुँह के अंदर लेकर पानी निकालने में कितना मजा आयेगा।

''शायद, ऐसा हो पाना मेरी किस्मत में है ही नहीं,'' चूत में ऊँगली कर झड़ने के बाद दीदी अपने आप को सांत्वना देते हुए मन ही मन बोली।

मैंने अपने रूम में आकर, कैमरे को लैपटॉप से कनैक्ट किया, और वीडियो देखने लगा। हो कुछ स्क्रीन पर मैं देख रहा था, उसको देखकर मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने रिवाईण्ड कर के देखा, गिफ़्टी दीदी से पहले भी कोई बाथरूम में गया था, ओ ओ होहो ये तो मेरी मम्मी थी।

मैंने शुरु में फ़ास्ट फ़ोरवर्ड कर लिया था, क्योंकि शायद शुरु में मैं मम्मी को नंगा नहीं देखना चाह रहा था, लेकिन तभी शॉवर बंद करके मम्मी ने एक टांग उठाकर जब अपनी झाँटों की शेविंग शुरु की तो कैमरे का फ़ोकस सीधा उनकी चूत पर था। मैंने प्लेयर की स्पीड नॉर्मल कर दी, और मम्मी को झाँटें साफ़ करते हुए देखने लगा। मम्मी ने झाँटों की शेव कर के, अपनी चूत को एकदम चिकना कर लिया।

मेरे मन में मेरी मम्मी के प्रति भावनाएँ बदलने लगीं। मैं उनके बदन को निहारने लगा,मम्मी के बदन में एक अलग ही कशिश थी, मैंने मम्मी को इस नजर से पहले कभी नहीं देखा था। हाँलांकि वो दीदी से थोड़ा ज्यादा मोटी थी, लेकिन उनका बदन एकदम गदराया हुआ था, और हर जगह उचित मात्रा में माँस भरा हुआ था। मम्मी को नंगा देखकर लग रहा था कि दीदी कुछ ज्यादा ही पतली दुबली हैं। मम्मी के मम्मे थोड़ा लटक से गये थे, इस वजह से दीदी की चुँचियों से थोड़ा छोटे लग रहे थे, लेकिन उन पर वो बड़े बड़े निप्पल बेहद आकर्षक लग रहे थे। स्क्रीन पर मम्मी को कपड़े पहनते हुए देखकर मैं फ़िर से अपने लण्ड को हिलाने लगा।

फ़िर मैंने जल्दी से वीडीयो को फ़ास्ट फ़ॉरवर्ड करके वहाँ पर ले गया, जब दीदी बाथरूम में घुसती हैं, और फ़िर जैसे ही दीदी ने अपने कपड़े उतारकर नंगा होना शुरू किया, मैं वो देखकर अपने लण्ड को हिलाने लगा। जैसे ही दीदी की चूँचियों या चूत का कोई साफ़ दृष्य आता, मैं वीडियो को पॉज कर देता। दीदी ने अपनी झाँटें ट्रिम कर रखी थीं, लेकिन मैं दीदी की चूत को उतनी अच्छी तरह नहीं देख पा रहा था, जिस तरह मैंने मम्मी की चूत देखी थी। मेरे पास ज्यादा टाईम नहीं था, और मुझे कॉलेज भी जाना था, मैं जल्दी से लैपटॉप बंद कर करके, तैयार होकर कॉलेज के लिये निकल गया, लेकिन उस दिन मुझे जो भी लड़की दिखायी देती, उसकी मैं दीदी और मम्मी से तुलना करने लगता, और मन ही मन सोचने लगता कि इसने झाँटें साफ़ कर रखी होंगी या नहीं, या फ़िर जब ये अपनी ब्रा खोलेगी तो इसकी चूँचियाँ कैसी कड़क या मुलायम होंगी।

*****


उधर दीदी का भी यही हाल था, ऑफ़िस में वो हर मर्द को देखकर सोच रही थी कि उसका लण्ड उसके भाई के लण्ड से बड़ा होगा या छोटा। जब अजय जीजू लन्च के टाईम दीदी के ऑफ़िस गये, तो दीदी ने रेस्टोरेण्ट की टेबल के नीचे अपने हाथ में जीजू क लण्ड पकड़कर उनको मुट्ठ भी मारी। जीजू की मुट्ठ मारते हुए भी दीदी जीजू के लण्ड की मेरे लण्ड से मन ही मन तुलना कर रही थी। दीदी मन ही मन सोच रही थी कि क्या उसको कभी इस तरह अपने भाई का लण्ड पकड़ने का मौका मिलेगा। ये सब सोचकर दीदी बहुत ज्यादा चुदासी हो गयी थी, और वो टॉयलेट में जाकर अपनी चूत में उंगली करने लगी। अपनी चूत को अपनी उँगली से सहलाते हुए वो कल्पना कर रही थी कि वो मेरे लण्ड को अपने मुँह में भरकर चूस रही है।

उस दिन के बाद जब भी बाथरुम में मुझे लॉण्ड्री के कपड़ों में दीदी की पैण्टी दिखायी देती, मैं उसको अपने लण्ड के गिर्द लपेट कर मुट्ठ मार करता। और कभी कभी जब कभी मम्मी की पैण्टी दिखायी दे जाती, तो उनकी चिकनी चूत की कल्पना कर के उस में अपने लण्ड का पानी निकाल देता।

एक दिन मैं दीदी की पैण्टी अपने रूम में मुट्ठ मारने के लिये ले आया था, लेकिन उसको वापस लॉण्ड्री के कपड़ों में रखना भूल गया।

''विशाल, क्या तुमने मेरी…'' ये बोलते हुए जैसे ही गिफ़्टी दीदी मेरे रूम में दाखिल हुई, वो मुझे उस हालत में देख कर शॉक हो गयीं। मैं अपने बैड पर बैठा हुअ, अपने खड़े लण्ड को पकड़कर सड़का मार रहा था, मेरे लण्ड से कुछ लिपटा हुआ भी था, दीदी मेरे लण्ड को और मेरे हाथ को देख रही थी, मैंने एक झटके में अपने ऊपर कम्बल खींच लिया।


दीदी फ़र्श पर गिरी उस चीज को देखने लगी जो मेरे लण्ड से लिपटी हुई थी, और कम्बल खींचते हुए नीचे गिर गयी थी। जैसे ही दीदी ने अपनी पैण्टी को देखा, उन्होने एक गहरी साँस ली। असलियत में येए वो ही पैण्टी थी जो दीदी ने पिछले दिन पहनी थी।

''ये क्या कर रहे हो विशाल?" वो सकते में बोली।

''ओह सॉरी दीदी,'' इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं बोल पाया, मेरा चेहरा एक दम सुर्ख लाल हो गया था। हाँलांकि दीदी मेरे रूम में मुझे मुट्ठ मारते हुए देखने के लिये ही आयी थी, लेकिन जब उसने देखा कि मैं उसकी पैण्टी को मुट्ठ मारने के लिये इस्तेमाल कर रहा हूँ तो वो शॉक हो गयी थी।

''ये तुम मेरी पैण्टी में सड़का मार रहे थे?'' दीदी ने मेरे पर आरोप लगाते हुए पूछा।

''ऊम्… हाँ… वो … क्या… सॉरी दीदी, पता नहीं… वो मुझे लॉण्ड्री बास्केट में …'' इसके आगे मैं कुछ नहीं बोल पाया।

''मेरी पैण्टी में … मम्मी को बताऊँ ये सब!"

''प्लीज नहीं दीदी, मम्मी को प्लीज मत बताना, आप जो कहोगी मै वो सब काम करूँगा… पर प्लीज मम्मी को मत बताना… प्रॉमिस ऐसा फ़िर कभी नहीं करूँगा दीदी।''

''चलो ठीक है, मम्मी को नहीं बताऊँगी, लेकिन तुमको जो मैं कहूंगी मेरे वो सारे काम करने होंगे!"

''थैन्क यू, दीदी''

''और सुनो…''

''क्या दीदी…''

''मुझे अपने लण्ड दिख़ाओ''

''क्या!"


"मैं उसे देखना चाहती हूँ। लगता है बहुत बड़ा है, मैं देखना चाहती हूँ कि मेरे भाई का लण्ड कितना बड़ा है,'' दीदी ने कहा। दीदी मन ही मन खुश थी जिस तरह से सब कुछ घटित हुआ था। वो खुश थी कि वो मेरे लण्ड को इतने करीब से देख पायेगी जिस की उसने कल्पना भी नहीं की थी।
 
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