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""गुरु, इन रहस्यों को जानने के लिए मैँ भी बेचैन हूं जल्दी से इस टापू की ओर चलो I”
पढने के बाद विजय मुस्कराया और बोला…“तुम उधर मत जाना प्यारे वरना तुम भी हवा में उड़ने लगोगे I”
"गुरू . !" विकास इस प्रकार बोला मानो उसने तुरंत कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय ले लिया हो…“मैं सागर की गर्भ मे टुम्बकटू के यान की खोज करता हूं । आप दोनों इस टापू पर पहुंचकर इन अजीबोगरीब घटनाओं के बारे में पता लगाओ ।"
"अब तुम फालतू बातें न करो प्यारे, सभी ठीक है क्योंकि तुम्हारे दिमाग का बैलेंस बिगड़ गया है I” बिजय बोला-" अबे मियां, तुम्हें सागर के बीच मे यहां छोडकर हम भला यहां से कैसे जा सकते हैं . . .अगर कोई मुसीबत आई तो क्या होगा?"
“आप फिर भूल रहे हैं गुरु कि आप किसी भी स्थिति में मेरी सहायता नहीं करेगे ।” बिकास गुर्राया-""मैं सोच रहा था कि आप व्यर्थ ही यहां बोर होंगे । इससे अच्छा है कि आप टापू पर जाकर इन तिलिस्मी घटनाओँ का रहस्य जाने I”
विजय ने विकास को समझाने की भरपूर कोशिश की लेकिन विकास ने एक नहीं सुनी । वह अपनी जिद पर अड चुका था । ये सारा ज़माना जानता है कि जब बिकास क्रो किसी बात की जिद हो जाती है तो खुदा भी उसकी जिद नहीं तोड सकता, हजारों ढंग से विजय ने उसे समझाने की चेष्टा की,
लेकिन उसके भेजे में एक भी बात नही घुसी । अंत में यही हुआ कि विजय को विकास की जिद माननी पडी । निश्चय यही हुआ कि वह अकेला टुम्बकटू के यान तक पहुचने का प्रयास करेगा और धनुषटंकार एवं विजय टापू की ओर बढेगे । बिकास अपने अभियान पर बढने की पूरी तैयारी कर ही चुका था ।
बस चलते समय उसने एक बार विजय के चरण स्पर्श किए ।
"दो-तीन बच्चों और एक अदद बीबी के साथ समुद्र से बाहर आओ मेरे लाल. .!” अपने ढंग से आशीर्वाद देते हुए विजय ने उसके दोनों कान पकडकर उसे ऊपर उठाया और अपने गले से लिपटा लिया । विकास ने भी विजय को अपनी लम्बी बांहों में समेटा और शरारत के साथ पूरी शक्ति से भीचकर विजय की हड्रिडयां तक चटका देने का इरादा किया, लेकिन अजीब ढंग से बिजय उसकी बांहों में तड़पा और फिसलकर उसकी गिरफ्त से निकल गया ।
"क्यों बेटे...गुरु से उस्तादी I” बिजय उसे सामने खड़ा आंख मारकर कह रहा था ।
“लेकिन असली उस्ताद निकले आप ही गुरु. . ." बिकास मोहक ढंग से मुस्कराता हुआ बोला-“अच्छा प्यारे मोंटी, चले I”
धनुषटंकार ने डायरी का लिखा हुआ पेज उसकी तरफ बढाया । बिकास ने पढ़ा ।"…“हमारा आशीर्वाद चुम्बक की तरह आपसे चिपका हुआ है, गुरु ।"
इधर इस वाक्य को पढकर विकास मुस्कराया, उधर धनुषटंकार ने उसके चरण स्पर्श किए I उसी क्षण बिकास ने महसूस किया l नीचे से घनुषटंकार उसकी दोनो टांगे पक्रड़कऱ खींचना चाहता है । यह अनुभव होते ही बिकास ने फुर्ती का प्रदर्शन करके अपना स्थान छोड दिया । वास्तव में धनुषटंकार उसके दोनों पैर खींचकर उसे गिरा देना चाहता था, लेकिन बिकास की सतर्कता के कारण असफल होकर रह गया ।
"लो गुरु. . !" बिकास विजय से बोला…"ये भी साला हमारे ही नक्शे-कदम पर चल रहा है I"
"करनी तो भरनी ही पड़ेगी, बेटे. .!" विजय ने कहा…“जैसा तुम गुरु के साथ करोगे वैसा ही तुम्हारा चेला तुम्हारे साथ l"
तब तक धनुषटंकार दोनों बाहे बिकास के गले में डालकर उसके गालों पर दो'-तीन चुम्बन ले चुका था । विकास ने उसे प्यार किया और बोला…""सदा सुहागन रहो. . . I”
इस प्रकार. . .
मनोरंजन से भरपूर विदाई के पश्चात विकास डेक के किनारे पर पहुंचा और फिर बिना किसी से भी कुछ कहे एकदम डेक पर से उफनते सागर में कूद गया । विजय और धनुषटंकार ने झपटकर उस स्थान को देखा जहां बिकास कूदा था, लेकिन अब वहां क्या था उफनत्ते हुए सागर की लहरें । पानी की इन दीवारों ने लड़कै को अपने आगोश में छुपा लिया था । न जाने क्यों...विजय और धनुषटंकार का दिल बडी तेजी से धड़क उठा था ।
और विकास!
मौत से खेलने का शौकीन ये लडका ।
ज्वार से गूंजते हुए सागर के पानी से टकराया-उफनती हुई लहरों ने उछालना चाहा किन्तु लहरों का कलेजा चीरकर लडका उसके सीने मेँ घुस गया ।
अपने हाथ…पैरों को गति देकर वह सागर के गर्भ मेँ उतरता ही चला गया । उमड़ती-घुमड़ती लहरों ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वो विकास था ।
भारत माता का एक ऐसा सपूत जो गरजते हुए सागर का सीना चीरकर उसके गर्भ में पहुचना खेल समझता था । लहरों के प्रयास को विफल करता हुआ वह नीचे. . और नीचे उतरता ही चला गया । उसके चारों तरफ पानी था... पानी...पानी-ही…पानी.. .मगर पानी का जिगर चीरकर वह सागर की अनंत गहराइयों में उतरता चला जा रहा था I हिंद का ये बेटा मौत से क्य डरता था? गेस मास्क उसके चेहरे पर चढा हुआ था । हेड पर रोशन टॉर्च बराबर उसका मार्गदर्शन कर रही थी । वह जानता था कि सागर में अनेक खतरे हैं l उनमे से किसी भी खतरे से टकराने के लिए उसकी मझर-गन पूरी तरह तैयार थी।
वह सागर के गर्भ में जितना नीचे उतरता चला जा रहा था लहरों की उथल-पुथल उतनी ही कम होती जा रही थी । सागर के नीचे जितना भी नीचे वह उतरता जा रहा था सागर उतना ही शांत होता जा रहा था । बीस मिनट पश्चात वह बिल्कुल शांत पडे सागर के पानी में तैर रहा था । उसके इर्द-गिर्द छोटी-छोटीं मछलियां अठखेलियां कर रही थीं मगर उनकी ओर किसी प्रकार का भी ध्यान न देकर वह सावधानी से इधर-उधर देख रहा था l साथ ही वह सागर की गहराइयों मे उतरता जा रहा था.. .नीचे, खूब नीचे ।
लगातार दो घंटे तक वह नीचे उतरता रहा ।
इस समय उसके पास जल में डूबी हुई चट्टाने थी । उसके चारों ओर चट्टानों का जाल-सा बिछा हुआ था । इसके अतिरिक्त छोटे-मोटे समुद्री कीड़े मंडरा रहे थे ।
लेकिन विकास निश्चित था क्योंकि वह जानता था कि कीडे उसे किसी प्रकार की हानि नहीं पहुचा सकते। इसे विकास का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि अभी तक उसका सामना किसी भी ऐसे समुद्गी जीव से नहीं हुआ था जिसके लिए उसे अपनी मझर-गन का इस्तेमाल करना पड़ता। इस समय भी वह बराबर टुम्बकटू के यान की तलाश में इधर-उधर तैर रहा था. . .मगर यह स्थान चारों तरफ से समुद्गी चट्टानों से घिरा हुआ था । चट्टानो में जगह-जगह दरारें बनी हुई थी । विकास को वह स्थान निश्चित नही मालूम था कि टुम्बकटू का यान कहां है? मालूम होता भी कैसे. . .टुम्बकटू ने यान की निश्चित दिशा और गहराई फिल्म में नहीं बताई थी । केवल सागर का ऊपर केंद्र लिखा था । उसने लिखा था कि फलां जगह के आसपास नीचे सागर में कहीं उसका यान है । वह उसी कैद्र पर उतरा था जहां तक का टुम्बकटू ने फिल्म में नक्शा बनाया था । बस. . .यही उस यान को तलाश करना था ।
उसे और कुछ नहीं सूझा तो चट्टानों के मध्य बनी अनेक चट्टानों में से एक चट्टान के अंदर प्रविष्ट होता चला गया । वह सागरीय चट्टान के बीच तैरता चला गया । चट्टान का चक्कर लगाने के बाद वह तीस मिनट पश्चात पुन: खुले सागर में आ गया. . ...लेकिन चट्टान का अंतिम मोड़ काटते ही
गेस-सिलेडर के पीछे उसकी आंखें उठी । उसे अपनी मंजिल मिल गई थी ।
उसके सामने ठीक वही दृश्य था जो टुम्बकटू की फिल्म में वह कई बार देख चुका था । एक विशाल यान ठीक उसी स्थिति मेँ उसके सामने था । विकास को लगा जेसे यान की फिल्म में यान की बाहरी बॉडी का फोटो इसी चट्टान से लिया गया था । पांच कोनों वाला वो बिचित्र यान उसके सामने था । मगर मंजिल को सामने देखकर लडके ने अपने दिमाग का वैलेस नहीं खोया । चट्टान की आड में छुपकर उसने भलीभांति यान के इर्द…गिर्द यान के द्धार की ओर तैरने लगा । यान का वो द्वार बंद था लेकिन विकास को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं थी । अपनी फिल्म में टुम्बकटू ने यान के इस द्धार को बाहर से खोलने की विधि स्पष्ट रूप से लिखीं थी ।
बिना किसी क्षति के विकास यान के द्वार तक पहुंच गया l
सम्पूर्ण यान सागरीय चट्टानों की भांति समुद्र के पानी मेँ डूबा हुआ था । बिकास तैरता हुआ यान की दीवार के करीब पहुचा । यान की दीवार से सटता हुआ बिकास द्धार की ओर बढ़ने लगा l द्वार के पास ही एक विशाल और भारी…सा बिचित्र-सी धातु का हेडिल था ।
बिकास ने अपनी मझर-गन कपडों में ढूंसी और दोनों हाथों से हैंडिंल पकड़कर उस पर झूल गया । कितु हैंडिल टस-से-मस नहीं हुआ ।
विकास ने एक बार पुन: हेंडिल पर अपनी उंगलियों की पकड़ सख्त की और एक बार पूरी शक्ति से उसने एक झटका दिया ।
अजीब-सी गड़गड़ाहट पानी का कलेजा दूर तक चीरती चली गई और इस्पात का भारी दरवाजा खुल गया ।
तैरता हुआ विकास पानी के साथ उसी मेँ प्रविष्ट हो गया । फिल्म में इस द्धार को बंद करने की युक्ति भी अंकित थी । तैरता हुआ वह यान के पानी से भरे कक्ष में आ गया l दीवार के अंदर भी एक वेसा ही हैँडिल था । पूरी शक्ति लगाकर विकास ने हेडिल ऊपर उटा लिया ।
उसी गड़गड़ाहट के साथ यान का द्धार पुन: बंद हो गया I
यान के उस कक्ष में अंधकार था । बिकास के शीर्ष पर लगी टॉर्च उसे पराजित कर रही थी I बिकास ने पहली बार ध्यान से कक्ष को देखा'-यान का यह कक्ष अत्यंत ही छोटा था । कक्ष मेँ विकास के सीने तक पानी भरा हुआ था । उसे अच्छी तरह याद था कि फिल्म में अगला दृश्य इसी कक्ष का था । उसे ये भी याद था कि इस कक्ष मेँ एक सीढी होनी चाहिए । उसकी टॉर्च का प्रकाश सीढियों पर पडा भी नहीं कि अंधेरे में ही सीढियां उसे चमक गई । सीढी इस तरह चमक रही थी जैसे अंधेरे में रखा हुआ सोना चमकता है ।
पढने के बाद विजय मुस्कराया और बोला…“तुम उधर मत जाना प्यारे वरना तुम भी हवा में उड़ने लगोगे I”
"गुरू . !" विकास इस प्रकार बोला मानो उसने तुरंत कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय ले लिया हो…“मैं सागर की गर्भ मे टुम्बकटू के यान की खोज करता हूं । आप दोनों इस टापू पर पहुंचकर इन अजीबोगरीब घटनाओं के बारे में पता लगाओ ।"
"अब तुम फालतू बातें न करो प्यारे, सभी ठीक है क्योंकि तुम्हारे दिमाग का बैलेंस बिगड़ गया है I” बिजय बोला-" अबे मियां, तुम्हें सागर के बीच मे यहां छोडकर हम भला यहां से कैसे जा सकते हैं . . .अगर कोई मुसीबत आई तो क्या होगा?"
“आप फिर भूल रहे हैं गुरु कि आप किसी भी स्थिति में मेरी सहायता नहीं करेगे ।” बिकास गुर्राया-""मैं सोच रहा था कि आप व्यर्थ ही यहां बोर होंगे । इससे अच्छा है कि आप टापू पर जाकर इन तिलिस्मी घटनाओँ का रहस्य जाने I”
विजय ने विकास को समझाने की भरपूर कोशिश की लेकिन विकास ने एक नहीं सुनी । वह अपनी जिद पर अड चुका था । ये सारा ज़माना जानता है कि जब बिकास क्रो किसी बात की जिद हो जाती है तो खुदा भी उसकी जिद नहीं तोड सकता, हजारों ढंग से विजय ने उसे समझाने की चेष्टा की,
लेकिन उसके भेजे में एक भी बात नही घुसी । अंत में यही हुआ कि विजय को विकास की जिद माननी पडी । निश्चय यही हुआ कि वह अकेला टुम्बकटू के यान तक पहुचने का प्रयास करेगा और धनुषटंकार एवं विजय टापू की ओर बढेगे । बिकास अपने अभियान पर बढने की पूरी तैयारी कर ही चुका था ।
बस चलते समय उसने एक बार विजय के चरण स्पर्श किए ।
"दो-तीन बच्चों और एक अदद बीबी के साथ समुद्र से बाहर आओ मेरे लाल. .!” अपने ढंग से आशीर्वाद देते हुए विजय ने उसके दोनों कान पकडकर उसे ऊपर उठाया और अपने गले से लिपटा लिया । विकास ने भी विजय को अपनी लम्बी बांहों में समेटा और शरारत के साथ पूरी शक्ति से भीचकर विजय की हड्रिडयां तक चटका देने का इरादा किया, लेकिन अजीब ढंग से बिजय उसकी बांहों में तड़पा और फिसलकर उसकी गिरफ्त से निकल गया ।
"क्यों बेटे...गुरु से उस्तादी I” बिजय उसे सामने खड़ा आंख मारकर कह रहा था ।
“लेकिन असली उस्ताद निकले आप ही गुरु. . ." बिकास मोहक ढंग से मुस्कराता हुआ बोला-“अच्छा प्यारे मोंटी, चले I”
धनुषटंकार ने डायरी का लिखा हुआ पेज उसकी तरफ बढाया । बिकास ने पढ़ा ।"…“हमारा आशीर्वाद चुम्बक की तरह आपसे चिपका हुआ है, गुरु ।"
इधर इस वाक्य को पढकर विकास मुस्कराया, उधर धनुषटंकार ने उसके चरण स्पर्श किए I उसी क्षण बिकास ने महसूस किया l नीचे से घनुषटंकार उसकी दोनो टांगे पक्रड़कऱ खींचना चाहता है । यह अनुभव होते ही बिकास ने फुर्ती का प्रदर्शन करके अपना स्थान छोड दिया । वास्तव में धनुषटंकार उसके दोनों पैर खींचकर उसे गिरा देना चाहता था, लेकिन बिकास की सतर्कता के कारण असफल होकर रह गया ।
"लो गुरु. . !" बिकास विजय से बोला…"ये भी साला हमारे ही नक्शे-कदम पर चल रहा है I"
"करनी तो भरनी ही पड़ेगी, बेटे. .!" विजय ने कहा…“जैसा तुम गुरु के साथ करोगे वैसा ही तुम्हारा चेला तुम्हारे साथ l"
तब तक धनुषटंकार दोनों बाहे बिकास के गले में डालकर उसके गालों पर दो'-तीन चुम्बन ले चुका था । विकास ने उसे प्यार किया और बोला…""सदा सुहागन रहो. . . I”
इस प्रकार. . .
मनोरंजन से भरपूर विदाई के पश्चात विकास डेक के किनारे पर पहुंचा और फिर बिना किसी से भी कुछ कहे एकदम डेक पर से उफनते सागर में कूद गया । विजय और धनुषटंकार ने झपटकर उस स्थान को देखा जहां बिकास कूदा था, लेकिन अब वहां क्या था उफनत्ते हुए सागर की लहरें । पानी की इन दीवारों ने लड़कै को अपने आगोश में छुपा लिया था । न जाने क्यों...विजय और धनुषटंकार का दिल बडी तेजी से धड़क उठा था ।
और विकास!
मौत से खेलने का शौकीन ये लडका ।
ज्वार से गूंजते हुए सागर के पानी से टकराया-उफनती हुई लहरों ने उछालना चाहा किन्तु लहरों का कलेजा चीरकर लडका उसके सीने मेँ घुस गया ।
अपने हाथ…पैरों को गति देकर वह सागर के गर्भ मेँ उतरता ही चला गया । उमड़ती-घुमड़ती लहरों ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वो विकास था ।
भारत माता का एक ऐसा सपूत जो गरजते हुए सागर का सीना चीरकर उसके गर्भ में पहुचना खेल समझता था । लहरों के प्रयास को विफल करता हुआ वह नीचे. . और नीचे उतरता ही चला गया । उसके चारों तरफ पानी था... पानी...पानी-ही…पानी.. .मगर पानी का जिगर चीरकर वह सागर की अनंत गहराइयों में उतरता चला जा रहा था I हिंद का ये बेटा मौत से क्य डरता था? गेस मास्क उसके चेहरे पर चढा हुआ था । हेड पर रोशन टॉर्च बराबर उसका मार्गदर्शन कर रही थी । वह जानता था कि सागर में अनेक खतरे हैं l उनमे से किसी भी खतरे से टकराने के लिए उसकी मझर-गन पूरी तरह तैयार थी।
वह सागर के गर्भ में जितना नीचे उतरता चला जा रहा था लहरों की उथल-पुथल उतनी ही कम होती जा रही थी । सागर के नीचे जितना भी नीचे वह उतरता जा रहा था सागर उतना ही शांत होता जा रहा था । बीस मिनट पश्चात वह बिल्कुल शांत पडे सागर के पानी में तैर रहा था । उसके इर्द-गिर्द छोटी-छोटीं मछलियां अठखेलियां कर रही थीं मगर उनकी ओर किसी प्रकार का भी ध्यान न देकर वह सावधानी से इधर-उधर देख रहा था l साथ ही वह सागर की गहराइयों मे उतरता जा रहा था.. .नीचे, खूब नीचे ।
लगातार दो घंटे तक वह नीचे उतरता रहा ।
इस समय उसके पास जल में डूबी हुई चट्टाने थी । उसके चारों ओर चट्टानों का जाल-सा बिछा हुआ था । इसके अतिरिक्त छोटे-मोटे समुद्री कीड़े मंडरा रहे थे ।
लेकिन विकास निश्चित था क्योंकि वह जानता था कि कीडे उसे किसी प्रकार की हानि नहीं पहुचा सकते। इसे विकास का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि अभी तक उसका सामना किसी भी ऐसे समुद्गी जीव से नहीं हुआ था जिसके लिए उसे अपनी मझर-गन का इस्तेमाल करना पड़ता। इस समय भी वह बराबर टुम्बकटू के यान की तलाश में इधर-उधर तैर रहा था. . .मगर यह स्थान चारों तरफ से समुद्गी चट्टानों से घिरा हुआ था । चट्टानो में जगह-जगह दरारें बनी हुई थी । विकास को वह स्थान निश्चित नही मालूम था कि टुम्बकटू का यान कहां है? मालूम होता भी कैसे. . .टुम्बकटू ने यान की निश्चित दिशा और गहराई फिल्म में नहीं बताई थी । केवल सागर का ऊपर केंद्र लिखा था । उसने लिखा था कि फलां जगह के आसपास नीचे सागर में कहीं उसका यान है । वह उसी कैद्र पर उतरा था जहां तक का टुम्बकटू ने फिल्म में नक्शा बनाया था । बस. . .यही उस यान को तलाश करना था ।
उसे और कुछ नहीं सूझा तो चट्टानों के मध्य बनी अनेक चट्टानों में से एक चट्टान के अंदर प्रविष्ट होता चला गया । वह सागरीय चट्टान के बीच तैरता चला गया । चट्टान का चक्कर लगाने के बाद वह तीस मिनट पश्चात पुन: खुले सागर में आ गया. . ...लेकिन चट्टान का अंतिम मोड़ काटते ही
गेस-सिलेडर के पीछे उसकी आंखें उठी । उसे अपनी मंजिल मिल गई थी ।
उसके सामने ठीक वही दृश्य था जो टुम्बकटू की फिल्म में वह कई बार देख चुका था । एक विशाल यान ठीक उसी स्थिति मेँ उसके सामने था । विकास को लगा जेसे यान की फिल्म में यान की बाहरी बॉडी का फोटो इसी चट्टान से लिया गया था । पांच कोनों वाला वो बिचित्र यान उसके सामने था । मगर मंजिल को सामने देखकर लडके ने अपने दिमाग का वैलेस नहीं खोया । चट्टान की आड में छुपकर उसने भलीभांति यान के इर्द…गिर्द यान के द्धार की ओर तैरने लगा । यान का वो द्वार बंद था लेकिन विकास को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं थी । अपनी फिल्म में टुम्बकटू ने यान के इस द्धार को बाहर से खोलने की विधि स्पष्ट रूप से लिखीं थी ।
बिना किसी क्षति के विकास यान के द्वार तक पहुंच गया l
सम्पूर्ण यान सागरीय चट्टानों की भांति समुद्र के पानी मेँ डूबा हुआ था । बिकास तैरता हुआ यान की दीवार के करीब पहुचा । यान की दीवार से सटता हुआ बिकास द्धार की ओर बढ़ने लगा l द्वार के पास ही एक विशाल और भारी…सा बिचित्र-सी धातु का हेडिल था ।
बिकास ने अपनी मझर-गन कपडों में ढूंसी और दोनों हाथों से हैंडिंल पकड़कर उस पर झूल गया । कितु हैंडिल टस-से-मस नहीं हुआ ।
विकास ने एक बार पुन: हेंडिल पर अपनी उंगलियों की पकड़ सख्त की और एक बार पूरी शक्ति से उसने एक झटका दिया ।
अजीब-सी गड़गड़ाहट पानी का कलेजा दूर तक चीरती चली गई और इस्पात का भारी दरवाजा खुल गया ।
तैरता हुआ विकास पानी के साथ उसी मेँ प्रविष्ट हो गया । फिल्म में इस द्धार को बंद करने की युक्ति भी अंकित थी । तैरता हुआ वह यान के पानी से भरे कक्ष में आ गया l दीवार के अंदर भी एक वेसा ही हैँडिल था । पूरी शक्ति लगाकर विकास ने हेडिल ऊपर उटा लिया ।
उसी गड़गड़ाहट के साथ यान का द्धार पुन: बंद हो गया I
यान के उस कक्ष में अंधकार था । बिकास के शीर्ष पर लगी टॉर्च उसे पराजित कर रही थी I बिकास ने पहली बार ध्यान से कक्ष को देखा'-यान का यह कक्ष अत्यंत ही छोटा था । कक्ष मेँ विकास के सीने तक पानी भरा हुआ था । उसे अच्छी तरह याद था कि फिल्म में अगला दृश्य इसी कक्ष का था । उसे ये भी याद था कि इस कक्ष मेँ एक सीढी होनी चाहिए । उसकी टॉर्च का प्रकाश सीढियों पर पडा भी नहीं कि अंधेरे में ही सीढियां उसे चमक गई । सीढी इस तरह चमक रही थी जैसे अंधेरे में रखा हुआ सोना चमकता है ।