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चीते का दुश्मन complete

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""गुरु, इन रहस्यों को जानने के लिए मैँ भी बेचैन हूं जल्दी से इस टापू की ओर चलो I”

पढने के बाद विजय मुस्कराया और बोला…“तुम उधर मत जाना प्यारे वरना तुम भी हवा में उड़ने लगोगे I”

"गुरू . !" विकास इस प्रकार बोला मानो उसने तुरंत कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय ले लिया हो…“मैं सागर की गर्भ मे टुम्बकटू के यान की खोज करता हूं । आप दोनों इस टापू पर पहुंचकर इन अजीबोगरीब घटनाओं के बारे में पता लगाओ ।"

"अब तुम फालतू बातें न करो प्यारे, सभी ठीक है क्योंकि तुम्हारे दिमाग का बैलेंस बिगड़ गया है I” बिजय बोला-" अबे मियां, तुम्हें सागर के बीच मे यहां छोडकर हम भला यहां से कैसे जा सकते हैं . . .अगर कोई मुसीबत आई तो क्या होगा?"

“आप फिर भूल रहे हैं गुरु कि आप किसी भी स्थिति में मेरी सहायता नहीं करेगे ।” बिकास गुर्राया-""मैं सोच रहा था कि आप व्यर्थ ही यहां बोर होंगे । इससे अच्छा है कि आप टापू पर जाकर इन तिलिस्मी घटनाओँ का रहस्य जाने I”

विजय ने विकास को समझाने की भरपूर कोशिश की लेकिन विकास ने एक नहीं सुनी । वह अपनी जिद पर अड चुका था । ये सारा ज़माना जानता है कि जब बिकास क्रो किसी बात की जिद हो जाती है तो खुदा भी उसकी जिद नहीं तोड सकता, हजारों ढंग से विजय ने उसे समझाने की चेष्टा की,

लेकिन उसके भेजे में एक भी बात नही घुसी । अंत में यही हुआ कि विजय को विकास की जिद माननी पडी । निश्चय यही हुआ कि वह अकेला टुम्बकटू के यान तक पहुचने का प्रयास करेगा और धनुषटंकार एवं विजय टापू की ओर बढेगे । बिकास अपने अभियान पर बढने की पूरी तैयारी कर ही चुका था ।

बस चलते समय उसने एक बार विजय के चरण स्पर्श किए ।

"दो-तीन बच्चों और एक अदद बीबी के साथ समुद्र से बाहर आओ मेरे लाल. .!” अपने ढंग से आशीर्वाद देते हुए विजय ने उसके दोनों कान पकडकर उसे ऊपर उठाया और अपने गले से लिपटा लिया । विकास ने भी विजय को अपनी लम्बी बांहों में समेटा और शरारत के साथ पूरी शक्ति से भीचकर विजय की हड्रिडयां तक चटका देने का इरादा किया, लेकिन अजीब ढंग से बिजय उसकी बांहों में तड़पा और फिसलकर उसकी गिरफ्त से निकल गया ।

"क्यों बेटे...गुरु से उस्तादी I” बिजय उसे सामने खड़ा आंख मारकर कह रहा था ।

“लेकिन असली उस्ताद निकले आप ही गुरु. . ." बिकास मोहक ढंग से मुस्कराता हुआ बोला-“अच्छा प्यारे मोंटी, चले I”

धनुषटंकार ने डायरी का लिखा हुआ पेज उसकी तरफ बढाया । बिकास ने पढ़ा ।"…“हमारा आशीर्वाद चुम्बक की तरह आपसे चिपका हुआ है, गुरु ।"

इधर इस वाक्य को पढकर विकास मुस्कराया, उधर धनुषटंकार ने उसके चरण स्पर्श किए I उसी क्षण बिकास ने महसूस किया l नीचे से घनुषटंकार उसकी दोनो टांगे पक्रड़कऱ खींचना चाहता है । यह अनुभव होते ही बिकास ने फुर्ती का प्रदर्शन करके अपना स्थान छोड दिया । वास्तव में धनुषटंकार उसके दोनों पैर खींचकर उसे गिरा देना चाहता था, लेकिन बिकास की सतर्कता के कारण असफल होकर रह गया ।

"लो गुरु. . !" बिकास विजय से बोला…"ये भी साला हमारे ही नक्शे-कदम पर चल रहा है I"

"करनी तो भरनी ही पड़ेगी, बेटे. .!" विजय ने कहा…“जैसा तुम गुरु के साथ करोगे वैसा ही तुम्हारा चेला तुम्हारे साथ l"

तब तक धनुषटंकार दोनों बाहे बिकास के गले में डालकर उसके गालों पर दो'-तीन चुम्बन ले चुका था । विकास ने उसे प्यार किया और बोला…""सदा सुहागन रहो. . . I”

इस प्रकार. . .

मनोरंजन से भरपूर विदाई के पश्चात विकास डेक के किनारे पर पहुंचा और फिर बिना किसी से भी कुछ कहे एकदम डेक पर से उफनते सागर में कूद गया । विजय और धनुषटंकार ने झपटकर उस स्थान को देखा जहां बिकास कूदा था, लेकिन अब वहां क्या था उफनत्ते हुए सागर की लहरें । पानी की इन दीवारों ने लड़कै को अपने आगोश में छुपा लिया था । न जाने क्यों...विजय और धनुषटंकार का दिल बडी तेजी से धड़क उठा था ।

और विकास!

मौत से खेलने का शौकीन ये लडका ।

ज्वार से गूंजते हुए सागर के पानी से टकराया-उफनती हुई लहरों ने उछालना चाहा किन्तु लहरों का कलेजा चीरकर लडका उसके सीने मेँ घुस गया ।

अपने हाथ…पैरों को गति देकर वह सागर के गर्भ मेँ उतरता ही चला गया । उमड़ती-घुमड़ती लहरों ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वो विकास था ।

भारत माता का एक ऐसा सपूत जो गरजते हुए सागर का सीना चीरकर उसके गर्भ में पहुचना खेल समझता था । लहरों के प्रयास को विफल करता हुआ वह नीचे. . और नीचे उतरता ही चला गया । उसके चारों तरफ पानी था... पानी...पानी-ही…पानी.. .मगर पानी का जिगर चीरकर वह सागर की अनंत गहराइयों में उतरता चला जा रहा था I हिंद का ये बेटा मौत से क्य डरता था? गेस मास्क उसके चेहरे पर चढा हुआ था । हेड पर रोशन टॉर्च बराबर उसका मार्गदर्शन कर रही थी । वह जानता था कि सागर में अनेक खतरे हैं l उनमे से किसी भी खतरे से टकराने के लिए उसकी मझर-गन पूरी तरह तैयार थी।

वह सागर के गर्भ में जितना नीचे उतरता चला जा रहा था लहरों की उथल-पुथल उतनी ही कम होती जा रही थी । सागर के नीचे जितना भी नीचे वह उतरता जा रहा था सागर उतना ही शांत होता जा रहा था । बीस मिनट पश्चात वह बिल्कुल शांत पडे सागर के पानी में तैर रहा था । उसके इर्द-गिर्द छोटी-छोटीं मछलियां अठखेलियां कर रही थीं मगर उनकी ओर किसी प्रकार का भी ध्यान न देकर वह सावधानी से इधर-उधर देख रहा था l साथ ही वह सागर की गहराइयों मे उतरता जा रहा था.. .नीचे, खूब नीचे ।

लगातार दो घंटे तक वह नीचे उतरता रहा ।

इस समय उसके पास जल में डूबी हुई चट्टाने थी । उसके चारों ओर चट्टानों का जाल-सा बिछा हुआ था । इसके अतिरिक्त छोटे-मोटे समुद्री कीड़े मंडरा रहे थे ।

लेकिन विकास निश्चित था क्योंकि वह जानता था कि कीडे उसे किसी प्रकार की हानि नहीं पहुचा सकते। इसे विकास का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि अभी तक उसका सामना किसी भी ऐसे समुद्गी जीव से नहीं हुआ था जिसके लिए उसे अपनी मझर-गन का इस्तेमाल करना पड़ता। इस समय भी वह बराबर टुम्बकटू के यान की तलाश में इधर-उधर तैर रहा था. . .मगर यह स्थान चारों तरफ से समुद्गी चट्टानों से घिरा हुआ था । चट्टानो में जगह-जगह दरारें बनी हुई थी । विकास को वह स्थान निश्चित नही मालूम था कि टुम्बकटू का यान कहां है? मालूम होता भी कैसे. . .टुम्बकटू ने यान की निश्चित दिशा और गहराई फिल्म में नहीं बताई थी । केवल सागर का ऊपर केंद्र लिखा था । उसने लिखा था कि फलां जगह के आसपास नीचे सागर में कहीं उसका यान है । वह उसी कैद्र पर उतरा था जहां तक का टुम्बकटू ने फिल्म में नक्शा बनाया था । बस. . .यही उस यान को तलाश करना था ।

उसे और कुछ नहीं सूझा तो चट्टानों के मध्य बनी अनेक चट्टानों में से एक चट्टान के अंदर प्रविष्ट होता चला गया । वह सागरीय चट्टान के बीच तैरता चला गया । चट्टान का चक्कर लगाने के बाद वह तीस मिनट पश्चात पुन: खुले सागर में आ गया. . ...लेकिन चट्टान का अंतिम मोड़ काटते ही

गेस-सिलेडर के पीछे उसकी आंखें उठी । उसे अपनी मंजिल मिल गई थी ।

उसके सामने ठीक वही दृश्य था जो टुम्बकटू की फिल्म में वह कई बार देख चुका था । एक विशाल यान ठीक उसी स्थिति मेँ उसके सामने था । विकास को लगा जेसे यान की फिल्म में यान की बाहरी बॉडी का फोटो इसी चट्टान से लिया गया था । पांच कोनों वाला वो बिचित्र यान उसके सामने था । मगर मंजिल को सामने देखकर लडके ने अपने दिमाग का वैलेस नहीं खोया । चट्टान की आड में छुपकर उसने भलीभांति यान के इर्द…गिर्द यान के द्धार की ओर तैरने लगा । यान का वो द्वार बंद था लेकिन विकास को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं थी । अपनी फिल्म में टुम्बकटू ने यान के इस द्धार को बाहर से खोलने की विधि स्पष्ट रूप से लिखीं थी ।

बिना किसी क्षति के विकास यान के द्वार तक पहुंच गया l

सम्पूर्ण यान सागरीय चट्टानों की भांति समुद्र के पानी मेँ डूबा हुआ था । बिकास तैरता हुआ यान की दीवार के करीब पहुचा । यान की दीवार से सटता हुआ बिकास द्धार की ओर बढ़ने लगा l द्वार के पास ही एक विशाल और भारी…सा बिचित्र-सी धातु का हेडिल था ।

बिकास ने अपनी मझर-गन कपडों में ढूंसी और दोनों हाथों से हैंडिंल पकड़कर उस पर झूल गया । कितु हैंडिल टस-से-मस नहीं हुआ ।

विकास ने एक बार पुन: हेंडिल पर अपनी उंगलियों की पकड़ सख्त की और एक बार पूरी शक्ति से उसने एक झटका दिया ।

अजीब-सी गड़गड़ाहट पानी का कलेजा दूर तक चीरती चली गई और इस्पात का भारी दरवाजा खुल गया ।

तैरता हुआ विकास पानी के साथ उसी मेँ प्रविष्ट हो गया । फिल्म में इस द्धार को बंद करने की युक्ति भी अंकित थी । तैरता हुआ वह यान के पानी से भरे कक्ष में आ गया l दीवार के अंदर भी एक वेसा ही हैँडिल था । पूरी शक्ति लगाकर विकास ने हेडिल ऊपर उटा लिया ।

उसी गड़गड़ाहट के साथ यान का द्धार पुन: बंद हो गया I

यान के उस कक्ष में अंधकार था । बिकास के शीर्ष पर लगी टॉर्च उसे पराजित कर रही थी I बिकास ने पहली बार ध्यान से कक्ष को देखा'-यान का यह कक्ष अत्यंत ही छोटा था । कक्ष मेँ विकास के सीने तक पानी भरा हुआ था । उसे अच्छी तरह याद था कि फिल्म में अगला दृश्य इसी कक्ष का था । उसे ये भी याद था कि इस कक्ष मेँ एक सीढी होनी चाहिए । उसकी टॉर्च का प्रकाश सीढियों पर पडा भी नहीं कि अंधेरे में ही सीढियां उसे चमक गई । सीढी इस तरह चमक रही थी जैसे अंधेरे में रखा हुआ सोना चमकता है ।
 
विकास की समझ में नहीं आया कि सीढी इतनी चमक क्यो रही है ।

कुछ सोचते हुए उसने अपने हेट के शीर्ष पर चमकती हुई टोंर्च आँफ़ कर दी । कक्ष मेँ चारों ओर गहन अंधकार छा गया । लेकिन यह देखकर उसकी आंखों में हत्का-सा आश्चर्य उभर आया कि इस गहन अंधेरे में सुनहरी सीढियां स्पष्ट चमक रही थीं । अगर यूं कहा जाए कि सीढियों की चमक से कक्ष में हल्का हल्का-सा सुनहरा प्रकाश था तब भी अतिशयोक्ति नहीं होगी ।

विकास को लगा कि सीढियां सोने की बनी हुई है ।

यह सीढी ठीक इस प्रकार की थी जैसे आमतौर पर लकडी की सीढियां होती हैं । सीढी का आधा भाग नीचे पानी मे गुम था और आधा ऊपर कक्ष की छत तक चला गया था ।

फिल्म में इस सीढी के बारे में केवल ये लिखा हुआ था कि इस कक्ष में एक सीढी होगीं जो कक्ष के फर्श से छत तक होगी । जब इस सीढी के सबसे निचले डंडे, अर्थात् जो डंडा पानी में डूबा हुआ होगा, पर पैर रखेंगे तो आगे बढने का रास्ता आपको खुद ही मिल जाएगा । उसमें ये नहीं बताया गया था कि ये सीढी गोल्ड की बनी हुईं होगी । एक क्षण तक विकास आश्चर्य के साथ उस सीढी को देखता रहा और अगले ही पल वह तैरकर उसके करीब पहुच गया । सीढी के पास जाकर उसने चमकते हुए डंडों को पकडा और पैर से सीढी के सबसे निचले डंडे को टटोलकर उस पर चढ गया ।

उसी क्षण ।

कक्ष में एक ऐसा धमाका हुआ जैसे कोई बम फटा हो । विकास के हाथ से सीढी छुटते छूटते रह गई । इस धमाके के कारण एक क्षण के लिए बिकास की आंखें बंद हो गई थी ।

और जब खुली तो एकदम इतनी तीव्र चमक उसकी आंखों में घुसी कि उसे पुन: आंखें बंद करनी पडी । इसके बाद उसने धीरे-धीरे आंखें खोली-उसकी आंखें न केवल खुली बल्कि हैरत से फैलती चली गईं ।

कक्ष की छत की सीढी के पास वाला थोड़ा-सा भाग गायब था और उस ऊपर वाले कक्ष से ऐसी तीव्र सुनहरी चमक उसी कक्ष में झांक रही थी कि एकटक विकास देख नहीं सका । उसने देखा…ये सुनहरी चमक गोल्ड के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की नहीं थी । उसने वही से खड़े-खड़े ऊपर देखा ।

इस कक्ष की छत में बने जिस गड्ढे से ये गोल्ड का चमकदार सुनहरा प्रकाश आ रहा था उस कक्ष की छत का थ्रोड़ा-सा भाग उसे चमक रहा था । उस छत को देखते ही उसकी आंखें हैरत से फटी-की-फ़टी रह गई । सारी छत अनेक चमकदार हीरों से जडी हुई थी ।

ऐसे चमकदार हीरे जिनकी और बिकास लगातार देख भी नहीं सका । विकास अपने दिमाग को समझा नहीं पा रहा था कि वो जो कुछ देख रहा है वह सवप्न नहीं हकीकत है । | उसके दिल मेँ उस कमरे में पहुचने की तीव्र जिज्ञासा जागी । किन्तु तभी । उसके दिमाग में जैसे एकदम खतरे की घंटी घनघना उठी । उसे याद आया,

फिल्म में लिखा था…"सावधान. . .पानी से भरे हुए कक्ष के ऊपर जो कक्ष है , आपके लिए एक अजीबोगरीब मुसीबत है । अगर आप सतर्क नहीं रहे तो यहीं पर धोखा खा जाएंगे l टुम्बकटू की फिल्म में लिखे ये शब्द विकास के मस्तिष्क-पटल पर उभरे और वह एकदम सतर्क हो गया l

उसके दिमाग में अजीबोगरीब प्रश्न चकराने लगे ।

इस कमरे पे उसके लिए क्या खतरा हो सकता है?

अगर ये पता लग जाए कि खतरा किस प्रकार का है तो वह उस खतरे से निपटने के लिए भी तैयार हो जाए परंतु उसे केवल ये मालूम था कि ऊपर वाले कक्ष में कोई खतरा है, किंतु खतरा किस बात का है? इस बारे मेँ उसे कोई ज्ञान नहीं था I

लेकिन चाहे कुछ भी हो । आगे तो उसे बढना जरूर ही था l

वास्तव में यह बात सत्य थी कि खतरों से खेलने वाला व्यक्ति वहां तक पहुच ही नहीं सकता था I अपने लिबास से मझर-गन निकालकर उसने हाथ में ले ली । प्रत्येक खतरे का मुकाबला करने के लिए पूर्णतया तैयार होकर वह ऊपर चढा । मझर-गन का रुख ऊपर की ओर था और विकास की उंगली हर पल उसके ट्रेगर पर थी ।

किसी खतरे की प्रतीक्षा करता हुआ वह ऊपर पहुचा...लेक्रिन उस समय तक किसी भी प्रकार का खतरा उसके सामने नहीं आया I अब वह सीढी के सबसे ऊपरी डंडे पर खड़ा हो गया । उसके जिस्म का आधा ऊपरी भाग अब ऊपर वाले चमकते कक्ष में था I

बिकास ध्यान से पूरे कक्ष का निरीक्षण कर रहा था । इस कमरे का फर्श गोल्ड का था और पांच दीवारे तथा छत हीरों और जवाहरातों से जडी हुई थीं । उसे याद था कि फिल्प मेँ लिखा था…"इस कक्ष की एक दीवार में एक रिग होगा आपको वही रिग घुमाना है I आगे का रास्ता खुद ही आपके सामने होगा. ..लेकिन. ..सावधान...इस रिंग तक पेहुंचना हिमालय की चोटी पर चढने से भी कठिन है I

ये पंक्तियां बिकास के जेहन में चकरा रही थीं । वह पूरे ध्यान से देख रहा था कमरा एकदम खाली था । कुछ देर तक वह गन सम्भाले किसी खतरे की प्रतीक्षा में नीचे सीढी के एक डंडे से पैर उलझाए खडा रहा I

मगर. किसी प्रकार का कोई खतरा उसे नजर नहीं आया ।

उसकी दृष्टि अब दाईं ओर की दीवार के बीच बने पन्नों के उस रिग पर स्थिर थी ।

वह सोच रहा था कि फिल्म में लिखी हुई अभी तक एक भी बात गलत साबित नहीँ हुई है । क्रदचित इसलिए उसे लग रहा था कि इस रिंग तक पहुचते पहुंचते उस पर कोई खतरा अवश्य आएगा । मगर खतरा आएगा किस तरह का? इस प्रश्न का उत्तर विकास ने लाख सोचा लेकिन मिला नहीं ।

अंत में उसने यही निश्चय किया कि देखा जाएगा जो होगा । आगे तो बढना है ही l

बस यही सोचकर उसने अपना सीढी में उलझा हुआ पैर सीढी से निकालकर ऊपर वाले कक्ष के गोल्ड फर्श पर रखना चाहा. . परंतु उसी क्षण वह मात खा गया । एक क्षण में उसके जेहन में आया बो खतरे से घिर गया है । लेकिन खतरा ऐसा नहीं था जो उसे जरा भी सम्भलने का अवसर न देता । सीढी से पैर हटाते ही न केवल उसका बैलेंस एकदम बिगड गया बल्कि उसके अपने जिस्म पर उसका काबू नही रहा। एक क्षण के लिए उसे लगा कि उसका जिस्म एकदम भारहीन हो गया है । खतरे का आभास तो हुआ किन्तु इससे आगे उसका दिमाग काम भी नहीं कर पाया था कि क्षण-भर के लिए उसका जिस्म हवा में लहराया l

खटाक . . .

इस आवाज कै साथ ही बिकास का जिस्म बुरी तरह भिन्ना गया । सब कुछ इतनी तेजी से हुआ था कि वह यह भी नहीँ समझ पाया कि ये अचानक हो क्या गया? उसने तो केवल सीढी से पैर हटते ही. . .खुद को भारहीन महसूस किया । हवा में लहराया और अगले ही पल खटाक की आवाज़ के साथ उसका सिर कक्ष को छत से जाकर टकराया । यह तो गनीमत थी कि बिकास ने अभी तक गैस मास्क पहन रखा था बरना कठोर हीरों से टकराकर उसका सिर तरबूज़ की तरह फट गया होता । वह एकदम इस तरह छत की ओर खिंचा था मानो वह लोहा हो और छत चुम्बक ।

मझर-गन उसके हाथ से छूटकर उससे थोडी ही दूरी पर छत से चिपकी हुई थ्री ।

विकास का खुद सारा जिस्म छत से चिपका हुआ था । उसका चेहरा कक्ष के फर्श की ओर था । यानी वह छत से ठीक इस तरह चिपका हुआ था जैसे धरती पर कोई आदमी बिल्कुल चित्त अवस्था में लेट जाए यानी बिकास की गुद्दी...कमर, टांगों के पिछले भाग...सब कुछ छत से चिपका हुआ था और चेहरा, पेट, सीना इत्यादि फर्श को ओर । हीरों, पजों और गोल्ड की चमक उसकी आंखों में घुस रही थी ।

बिकास ने खुद को हिलाना-डुलाना चाहा. ..परंतु विफ़ल रहा ।

उसने तो कल्पना भी नहीं की थी कि वह ऐसे अजीब खतरे में घिरेगा? उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह इस अजीबोगरीब खतरे से निकले कैसे? वह पन्नों के बने उस रिग को देख रहा था और सोच रहा था ।

वास्तव में इस रिग तक पहुचना एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने से भी कठिन है । विकास के जिस्म का कोई भी अंग उसके नियंत्रण मेँ नहीं था । सारा खून उसके चेहरे पर जमा होता जा रहा था I खून से उसका चेहरा सुर्खं. . .और सुर्ख होता जा रहा था । उसे ऐसा लगा जैसे मौत नृत्य करती हुई उसकी तरफ बढ़ रही है. . . ।

फिनिश

विश्व के चुने हुए जासूसों से भरा हुआ वो बिशाल जलपोत सागर की छाती पर मस्त हाथी की भांति झूमता हुआ आगे बढ़ रहा था ।

जलपोत पर रूसो झंडा लहरा रहा था । जब बागारोफ इस जलपोत का प्रबंध करके बांड, माईक, रहमान इत्यादि जासूसों के पास पहुचा और उसे पता लगा कि टुम्बकटू उन सबको धोखा देकर फरार होने में सफल हो गया है.. .तो

बागारोफ ने चुन-चुनकर एक-एक जासूस क्रो अलग अलग सैक्सी गालियां सुना डाली ।

लेकिन अब क्या होना था?

चिडियां तो खेत चुग ही चुकी थीं ।

अंत में केवल इन महान जासूसों के पास रह गया टुम्बकटू का लेटर और नक्शा ।

एक वार फिर पुन: उन सब जासूसों के बीच मीटिंग हुई । इस मामले को लेकर ही कि उन्हें अब आगे करना क्या चाहिए? उनके हाथ मेँ इतने पापड बेलने के बाद आगे बढने का एक क्लू टुम्बकटू मिला था और वह भी हाथ से निकल गया ।

समस्या इसलिए खडी हो गई थी कि कई जासूसों ने यह सवाल उठा दिया था कि इस बात की क्या गारंटी है कि टुम्बकटू जो कुछ भी यहां छोड़ गया है वह सब सत्य है..?

यह भी तो सम्भव है कि टुम्बकटू उन्हें किसी प्रकारका धोखा देना चाहता हो ।

बस, यही एक समस्या अड़ गई । कुछ जासूसों का तर्क था कि टुम्बकटू को भला व्यर्थ ही अपने खजाने का पता देने की क्या ज़रूरत हे?
 
निश्चित रूप से वह जासूसों को परेशान कर रहा है मगर जासूसों का ख्याल था कि टुम्बकटू उन्हें बिल्कुल सही नक्शा दे गया है। जासूसों.

के विरोधी गुटों मे काफी देर तक गर्मा-गर्म बहस हुई और

अंत मेँ बागारोफ भिन्ना कर चीख पडा -"अबे हरामी के पिल्लो, केवल बड़बड़ ही करते रहोगे या कुछ काम भी करोगे । लुगाइयॉ की तरह ये बहस करना छोडो और कुछ निश्चय लो I"

अंत में निश्चय हुआ कि उनके पास टुम्बकटू के नक्शे के अतिरिक्त आगे बढ़ने के लिए और कुछ है नहीं I खाली बैठने से अच्छा है कि उसी कै आधार पर चला जाए. . .सम्भव है नक्शा सही हो । और. . . .

नतीजा ये हुआ कि उनका जलपोत इस समय उसी नक्शे कै आधार पर आगे बढ़ रहा था l इस यात्रा पर रवाना हुए आज उन्हें चौथा दिन था और इन चार दिनों मेँ उन पर किसी तरह की खास विपत्ति नहीं आई थी जबकि विश्व के महानतम जासूसों की ये टीम किसी भी तरह कै खतरे का मुकाबला करने कै लिए पूरी तरह तैयार और लैस थी ।

मंजिल पर पहुंचने कै लिए उन्हें अभी एक दिन की यात्रा और करनी थी । इस सारी यात्रा में वे इस बात का विशेष ख्याल रख रहे थे कि कहीं टुम्बकटू ने उन्हें गलत केंद्र न बता दिया हो. . इसलिए हमेशा दो-दो जासूसों का जोड़ा गोताखोरी की पोशाक पहनकर सम्भावित स्थानो पर सागर की गहराई तक जाकर भलीभांति निरीक्षण करते थे ।

पूरी सतर्कता के साथ अंतर्राष्टीय जासूसों का ये दल आगे बढ़ रहा था । उस समय बागारोफ अपने कक्ष में बैठा हुआ 'वोदका' (एक रूसी शराब) पी रहा था, तब वहाँ पर बांड ने प्रवेश किया ।

"तू बिना परमीशन कहां घुसता चला आ रहा है अंग्रेज़ की दुम I" उसे देखते ही बागारोफ ने आंखे निकाली ।

“आपको मालूम है चचा कि त्वांगली और रहमान गोताखोरी की पोशाक पहने हुए आज नीचे गए हैं I”

"अबे तो फिर दिक्कत क्या है, हरामी के पिल्ले I”

“चचा, वे नीचे से खतरे का सिग्नल दे रहे हैं I” बांड ने जेसे विस्फोट किया ।

"क्या…?" बागारोफ उछलकर खडा हो गया-"कैसा खतरा I”

"अभी तक ये पता नहीं लग पाया है, चचा I" बांड ने कहा…"लेकिन वे लगातार पिछले पंद्रह मिनट से खतरे का सिग्नल दे रहे हैं I"

"अबे तो चिडी के इक्को, पहले क्यों नहीं बताया ।" भडक गया बागारोफ…“आ मेरे साथ I”

और वे दोनों तेजी से चलते हुए मैसेज़-रूम मेँ आ गए । वहां पर पहले से ही माईक इत्यादि चार…पांच जासूस मौजूद थे l मगर बागारोफ भीड को चीरता हुआ ट्रांसमिटर पर पहुचा ।

वे नीचे गए गोताखोरों से बात नहीं कर सकते थे । उस ट्रांसमिटर में अलग-अलग रंग के कई बटन लगे हुए थे। हरा बटन जलने-बुझने का अर्थ था कि कोई खतरा नहीं है और गोताखोर सुरक्षित हैं । लाल बल्ब जलने-बुझने का अर्थ था'-खतरा! पीले बल्ब का अर्थ था वे वापस आ रहे हैं ।

नीले का मतलब था वे अभी सागर की और अधिक गहराई में उतर रहे हैं, इत्यादि ।

बागारोफ ने देखा'--रह-रहकर लाल बल्ब जल-बुझ रहा था ।

एक मिनट तक वह भी शांति के साथ बल्ब को देखता रहा । फिर अचानक चीख पडा…“अबे ओ चोट्टी के इतनी देर से ये खतरे का सिग्नल दे रहे हैं और तुम सब मुह लटकाए खडे हो-हरामजादों, गोताखोरी की पोशाक लाओ ।"

"चचा . . . ! "

“चुप भूतनी कै I" बागारोफ ने माईक क्रो एकदम डपट दिया-“साले खुद को तीसमारखां बनते हैं और वे इतनी देर से सिग्नल दे रहे है और तुम केवल देख रहे हो उनकी मदद के बारे में एक भी नहीं सोच रहा है I”

" सोचने की बात ये है चचा कि खतरा हो क्रिस प्रकार का सकता हे ।” बरगेन शॉ बोला जो इन चार दिनों में काफी स्वस्थ हो चुका था ।

"नीचे तेरी अमां रो रही होगी चटनी के ।’ भडक गया बागारोफ-"अबे उन्हें बचाओ. . .अबे मेरी पोशाक. . .!"

“चचा...।" बागारोफ की बात बीच में काटकर जेम्सबांड बोला…“देखो...!" उसका संकेत ट्रांसमिटर की तरफ़ था l

“क्या देखूं उल्लू के पट्ठे?" भडकता हुआ बागारोफ फिरक्नी की तरह ट्रांसमिटर की ओर घूम गया । उसने देखा…अब लाल बल्ब के स्थान पर रह-रहकर पीला बल्ब जल रहा था ।

इसका सीधा-सा मतलब था कि दोनों ऊपर आ रहे हैं । एक क्षण तक वह पुन: उसी क्रो देखता रहा । फिर चीखा-“अवे ऊंटनी वालों, मेरे बच्चे आ रहे हे जल्दी से लांच सागर में उतारो ।"

बागारोफ का आदेश जारी होते ही वह काम तेजी से होने लगा । बागारोफ, बांड और माईक भी उस कक्ष में से निकलकर तेजी के साथ नीचे की तरफ़ बढे l

रास्ते में बागारोफ न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता जा रहा था? बांड और माईक उसकी बड़बड़ाहट पर कोई ध्वनि नहीं दे रहे थे ।

जल्दी ही एक लांच सागर में उतारी गई । तीनों लांच पर सवार हुए और यान से थोडी दूर ही गए होंगे कि. . .

उनसे थोडी दूरी पर ही रहमान और त्वांगली सागर के गर्भ से निकलकर बाहर आए ।

"अबे चोट्टी वालों I” उन्हें देखते ही बागारोफ ने एक नारा…सा लगाया ।

माईक ने तुरंत मोड़कर लांच का रुख उनकी तरफ कर दिया । रहमान और त्वांगली ने भी बागारोफ की आवाज सुन ली थी । वे भी तेजी से तैरकर लांच की तरफ बढे ।

पांच मिनट बाद ही बागारोफ ने त्वांगली को और बांड ने रहमान को लांच पर खींच तिया l

“अबे, क्या हुआ मुर्दे की औलाद I” बागारोफ ने त्वांगली का गेस मास्क उतारते हुए कहा l

इधर बांड ने रहमान का फेस मास्क उतार दिया था । दोनों के चेहरे हल्दी की तरह पीले पड़े हुए थे ।

दोनों की सांसें थोंकनी की भांति चल रही थी । चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं मानो सागर मेँ नीचे के बेहद खौफनाक दृश्य देखकर आए हो ।

आंखों से मौत का भय झांक रहा था मानो नीचे मौत है ओर इस मौत से वे बडी कठिनता से पीछा छुड़ाकर आए हैं ।

बागारोफ पर जब नहीं रहा गया तो चीख ही पड़।…"अबे, क्या बात है कड़वे चीनी, नीचे क्या देखा?"

"चचा...!" फूली हुई सांस पर काबू पाने की असफल चेष्टा करते हुआ बोला…उसने आगे भी बोलने का प्रयास किया लेकिन कंठ में जैसे सूखा पड़ गया ।

कुछ बोलने के स्थान पर उसके चेहरे का पीलापन बढ गया । आंखों से और भी अधिक भय झांकने लगा । चेहरा ऐसा हो गया जैसे बो अब मरा, अब मरा ।

"अबे, बक मुर्गी के, जल्दी बक क्या है?” बागारोफ़ झुंझला उठा…"अबे, नीचे क्या तेरी अम्मा नाच रही है?"

"च. . .च. . .चा. . .!" हिम्मत बटोर करके त्वांगली बोला…"भ. . .भूत. . ! "

और यह कहता-कहता त्वांगली एकदम बेहोश होकर लुढक गया, उसका अंतिम शब्द बांड के दिमाग मेँ विस्फोट-सा कर गया । उसके 'भूत' शब्द पर बांड और बागारोफ़ की आंखें मिली । बागारोफ़ बोला…“क्यों बे अंग्रेज के पिल्ले, इस चिड्रीमार ने क्या बका?”

"चचा, भूत कह रहा है ।” बांड ने बताया ।

“अजी भूत कह रहा है ।" बागारोफ़ झुंझला उठा…"ये साला चिडी का पंजा नीचे भूत देखकर आया है । अबे ओ बंगाली मुर्गे I" बागारोफ़ रहमान से बोला…“इस साले चिडीमार की मां तो मर गई, तू बता, अंदर क्या देखा? अबे, क्या तेरी भी मां वहां भूत बनकर नाच रही हे?"

“चचा. . .!" रहमान के होश गुम थे…“वो ठीक कहता है, सागर में भूत हैँ बहुत सारे ।"

"अबे, क्या बकता है?"

"यकीन करो चचा, नीचे भूत हैं, हजारों भूत…व. . .

"यकीन करो चचा, नीचे भूत हैं, हजारों भूत…व. . .वो हाथों से इशारा करके हमेँ बुला रहे थे l चचा, वे हजारो हैं . . लाखों ।"

""अबे, ऊंटनी के! भूत…बता क्या होती है?"

“भ. . .भूत ।।" रहमान के मुह से भी ये अंतिम शब्द निकला ।

और वह भी बेहोश होकर लुढक गया ।

जेम्सबांड और बागारोफ मुर्खों की तरह एक-दूसरे का मुह ताकते रह गए । दोनों में से कोई भी भूतों पर विश्वास नहीं करता था और ये दो महान जासूस इतने आतंकित थे कि दोनों भूत-भूत करके ही बेहोश हो गए? दोनों में से ये विश्वास किसी को भी नहीं आया कि सागर मेँ भूत हो सकते हैं I”

“क्यों बे चटनी के?” बागारोफ घूमकर माईक से बोला…"तूने इन चोट्टी वालों की बकवास सुनी?"

"क्या ख्याल है...?"

"इन्हें शक है, चचा l” लांच का संचालन करता हुआ माईक बोला-“दुनिया में भूत नाम की कोई वस्तु नहीं है, ये मन का शक है I”
 
“जिंदगी मेँ पहली बार तूने मार्के की बात कही है मुर्गी चोर ।" बागारोफ बोला-" पहली बात तो भूत नाम की कोई वस्तु नहीं होती और अगर होती भी है तो दुनिया का सबसे बड़ा भूत तो मैं खुद हू । वैसे तो मैंने भूत-प्रेतों के बहुत किस्से सुने हैं, लेकिन कसम इन ईंट के पंजों की, समुद्र कै भूत के बारे मेँ इनसे पहली बार सुन रहा हूं I"

"लेकिन एक सोचने की बात जरूर है, चचा ।" बांड कुछ सोचता हुआ बोला ।

" तू भी बक I”

"ये तो मैं भी नहीं मानता कि भूत होते हैं . . लेकिन सोचने की बात ये है कि इनका इस तरह घबराना, डरना और भय के कारण बेहोश तक हो जाना इस बात का सबूत है ही कि निश्चित रूप से इन्होंने सागर में कुछ देखा। इन्होंने भूत न…न देखे हों, लेकिन सम्भव है कि कोई बहुत ही भयानक वस्तु देखी हो और ये भयभीत हो गए हों और ये उस वस्तु को भूत समझे हौं, मेरा मतलब ये है कि यहां सागर में कोई अनोखा रहस्य तो है ही I”

"बात तो तेरी भी ठीक है, अंग्रेजी पुत्तर ।" बागारोफ बोला…“लेकिन ये साला बंगाली हिरन तो ये कह रहा था कि उसने हजारों-लाखों भूत देखे हैं । ऐसे क्या सागर में भूत तांडव नृत्य कर रहे हैं । खैर, पहले इन्हें जहाज पर पहुचाओ, तब देखेंगे कैसे भूत हैं?”

बांड और माईक को बागारोफ की बात उचित ही लगी I पंद्रह मिनट पश्चात ही तीनों त्वांगली और रहमान उनके बेहोश जिस्मों को लेकर जहाज पर पहुच गए । जहाज पर मौजूद अन्य जासूसों क्रो सारा किस्सा सुनाया गया तो किसी को भी ये विश्वास नहीं हुआ कि सागर मेँ भूत हो सकते हैं ।।

सभी बिज्ञान पर विश्वास करने वाले आधुनिक जासूस थे । पहली बात तो ये कि जासूसों मेँ से एक भी ऐसा नहीं था जो ऐसी ऊटपटांग बात पर विश्वास करता ओर उस पर भी तुर्रा ये कि "सागर के भूत एक नहीं हजारों-लाखो?"

एक भी जासूस ऐसा नहीं था जिसे विश्वास आ जाता l बहुत-से जासूस उन दोनों को होश में लाने की चेष्टा कर रहे थे । जलपोत उसी स्थान पर रोक दिया गया था ।

सारी बात सुनने के बाद आँस्ट्रेलिया का जासूस हेम्बलर बोला--'"भूत, ये क्या बकवास है! इनका दिमाग खराब हो गया है, मैं इस रहस्य का पता लगाकर आता हू ।"

ग्रेन मास्क ने जार्ज हेम्बलर का समर्थन किया और कहा कि इस बार गोताखोरी की पोशाक पहनकर जार्ज हेम्बलर कै साथ वह सागर के गर्भ में जाएगा और वास्तविकता का पता लगाकर लाएगा । अन्य कई जासूसों ने उनके साथ जाने का अनुरोध किया मगर तय यही हुआ कि हेम्बलर और मास्क ही नीचे जाएंगे ।

वे दोनों बाकायदा गए ।

धड़कते दिल से सारे जासूस पुन: ट्रांसमिटर के इर्द-गिर्द एकत्रित हो गए । तीस मिनट तक नीला बल्ब जलता-बुझता रहा जिसका सीधा'-सा अर्थ था कि ये बराबर सागर की गहराई में उतरते जा रहे हैं । खतरे का भी कोई सिग्नल उन्होंने नहीं भेजा । सब धड़कत्ते दिल से आने वाले पलों की इंतजार करते रहे । इसके पश्चात लगातार पंद्रह मिनट तक हरे बल्ब पर सिग्नल मिलता रहा ।

और तब सबके दिल बुरी तरह धक-धक करने लगे जब अचानक लाल बल्ब पर खतरे का सिग्नल मिलने लगा । सबने चौककर एक-दूसरे की ओर देखा। मानो वे एक-दूसरे से पूछ रहे हों, जो मैँ देख रहा हूं क्या तुम भी देख रहे हो?

लेकिन ये सत्य था सब ठीक ही दृश्य देख रहे थे l ट्रांसमिटर पर मिलने वाला खतरे का सिग्नल I

"ये भी उल्लू कै पटूठे गधे की औलाद हैं l” बागारोफ गाली-रूपी अलंकारों से सुशोभित करता हुआ बोला…" इन सालों का भी दम निकल गया ।"

इस बार हर जासूस सोचने पर विवश हो गया कि आखिर नीचे क्या है? ये खतरे कै सिग्नल दिए क्यों जा रहे है? हर जासूस इस रहस्यपूर्ण गुत्थी में उलझा रहा और सबकी निगाह ट्रांसमिटर पर अटकी रही l लगातार बीस-पच्चीस मिनट तक खतरे का सिग्नल मिलता रहा । इसके पश्चात एकदम पीला सिग्नल मिला I

"तो ये सुअर भी दुम दबाकर आ रहे हैं । साले चर्खीं के..." बागारोफ़ बुदबुदाया ।

उनके लिए भी माईक, बांड और बागारोफ़ भी लांच लेकर सागर में पहुंचे। जब वे बाहर आए तो उनकी हालत भी त्वांगली और रहमान की तरह खस्ता थी । चेहरे पीले पड़ चुके थे । आंखों से भय झाक रहा था और उनकी मांति ही भूत-भूत करके वे भी बेहोश हो गए थे ।

बागारोफ़ ये भूत-भूत की रट सुनकर भिन्ना उठा था । उसका दिल तो ऐसा चाहा कि वह हेम्बलर और ग्रेन मास्क की खोपडी तोड दे किंतु काफी कोशिश के बाद उसने अपने दिल से उठने वाली इस पवित्र भावना का गला घोंट दिया । उन्हें भी जलपोत पर लाया गया । जब अन्य जासूसों ने ये सुना कि वे दोनो भूत-भूत की रट लगाते हुए सागर से बाहर निकले हैं तो अधिकांश जासूस सकते की हालत में आ गए । उन्हें याद था कि दोनों ने जाते समय भूत शब्द का किस दृढता से विरोध किया था लेकिन बाहर आए भूत-भूत कहते हुए ।

कई जासूसों कं दिमाग में तो आया कि कही सागर में वास्तव में ही तो भूत नही हैं? इस बार हर व्यक्ति थोड़े दूसरे ढंग से सोचने पर विवश हो गया । माईक सोच रहा था कि भूत तो कुछ होते नहीं लेकिन सागर के गर्म में आखिर बो है कौन सी वस्तु जिसे देखकर चारों भूत-भूत क्री रट लगा रहे हैं? अजीब सी गुत्थी पेश हो गई थी ।

"मुझे लगता है हरामी के पिल्लो कि तुम सभी के दिमागों का बैलेंस एकदम बिगड गया है ।" बागारोफ भड़ककर बोला…“तुम सब सालो यही पर इश्क लड़ाओ इस बार मैं जा रहा हूं । मैं देखूंगा वो साले कौन-से भूत हैं?"

“तुम्हरि साथ मैं चलूगा, चचा l” जेम्सबांड ने कहा ।

"चुप बे चकरधिन्नी की औलाद. .!" भडक उठा बागारोफ…"बोलती पर ढक्कन लगाकर चुपचाप एक तरफ़ बैठ जा ।”

"चचा, मैं चलूगा I” ये आवाज़ माईक की थी ।

"क्यों रंडी की औलाद.. तुझमें क्या सुर्खी के पर लगे हैं जो वो मुर्गी चोर नहीं जाएगा I” बागारोफ उस पर इस प्रकार चढ दौड़ा मानो उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो-“अभी बूढी हड्रिडयों में जान है हरामी के पिल्लो. . .भूतों के लिए मैँ अकेला ही काफी हू'।"

बांड और माईक ने बागारोफ कै साथ चलने का काफी प्रयास किया लेकिन उसने बारी-बारी से दोनों को अपनी अलंकारयुक्त भाषा में खूब सुनाई ।

बागारोफ उसकी लिहाज से, क्योंकि जासूसों में सबसे बड़ा था इसलिए सभी उसकी इज्जत करते थे ।

इस इज्जत के कारण ही माईक और बांड को चुप रह जाना पड़ा । बड़बड़ाता हुआ बागारोफ गोताखोरी की पोशाक पहनने चला गया । "उम्र के साथ-साथ चचा का दिमाग सठिया गया है I" बांड उसके जाने के बाद माईक से बोला ।

"अकेले जाकर कहीँ चचा किसी मुसीबत में न र्फस जाएं ।" माईक ने सम्भावना व्यक्त की ।

“लेकिन उन्हें उनके निश्चय से रोक कौन सकता है?" बरगेन शा ने कहा ।

"चचा अब किसी की नहीं सुनेंगे. . . ।" माईक पुन: बोला ।

कुछ ही देर बाद बागारोफ गोताखोरी की पोशाक पहनकर बाहर आ गया । एक बार पुन: बांड बोला-"'मान जाओ चचा…किसी भी एक साथी को ले लो?”

"देख बे, मुर्गी चोर. . . I” बागारोफ गुर्राया---" अगर इस बार चटाख करने की कोशिश करेगा तो कान पर ऐसा हाथ मारूंगा कि सात पुश्तों तक औलाद बहरी पैदा होगी । अबे उल्लू की दुम, जरा ये तो सोच कि वे चारों साले चिड्रीमार ‘भूत-भूत करते हुए तो बाहर आए हैं लेकिन हजारों-लाखों भूतो में से इन्हें एक को भी किसी ने नहीं पकडा और पहले भी कह चुका हूं अंग्रेजी की दुम कि अगर नीचे भूत है तो दुनिया का सबसे बडा भूत मैं हूं ।"

बागारोफ को न मानना था और न ही वह माना ।

चेहरे पर मास्क चढाकर वह बेखौफ सागर में कूद गया, मझर-गन उसके दाएं हाथ में दबी हुई थी । रूस का ये सबसे बड़ा जासूस उत्तेजनात्मक स्थिति में भूतों से टकराने के लिए बराबर सागर के गर्भ मे उतरता जा रहा था ।

वह अपने साथियों को ट्रांसमिटर पर किसी प्रकार का कोई सिग्नल भी नहीं दे रहा था । वह अपनी पूरी तेजी के साथ सागर के गर्म में उतरता जा रहा था ।

निरंतर तीस मिनट तक वह नीचे-नीचे सागर में और अधिक नीचे उतरता चला गया ।

उसकी नजर अपने चारों ओर बडी सावधानी के साथ निरीक्षण कर रही थी ।

अचानक उसने एक दृश्य देखा और देखते ही बुरी तरह चोंक पड़ा । एकदम उसे भी लगा समुद्र का ये भाग हजारों भूतों के कब्जे में है । रहमान, त्वांगली हेम्बर की बात उसे ठीक ही लगी । अपने चारों ओर के दृश्य को देखकर उसके जिस्म में सनसनी-सी दोड़ गई । उसे ऐसा लगा जैसे मौत ने उसे चारों ओर से घेर लिया है । यह कहना अनुचित नहीँ होगा कि बागारोफ़ जैसा महान जासूस भी उस समय भूतों पर बिश्वास कर बैठा. . उसकी भी रूह फ़ना हो गई ।

इस समय उसके पैर सागर के रेतीले तले से टकराए थे । इस रेतीले तले में लम्बी-लम्बी समुद्गी घास उगी थी । अपने चारों ओर का दृश्य देखकर बागारोफ़ का सिर भिन्ना गया । उसके होश फाख्ता ही गए । कदाचित बागारोफ़ अपने जीवन मेँ पहली बार इतना अधिक भयभीत हुआ था ।

उसके इदं-गिर्द चारों और दुर दूर तक भूत थे । भयानक घिनौने और डरावने भूत ।

बागारोफ़ की उत्तेजना तेज हो चुकी थी । उसे लग रहा था कि वह भूतों के घेरे में र्फस गया है । किसी भी कीमत पर अब वह बच नहीं सकेगा।

उसके चारों ओर लम्बे लम्बे डरावने

भूत थे सैकडों! वे वास्तव मे हाथ हिला-हिलाकर जैसे उसे अपने पास बुला रहे थे ।

सागर का यह भाग जैसे उन्ही से भरा हुआ था । बागारोफ़ स्पष्ट देख रहा था उसके चारों ओर हजारों भूत थे । भयानक. . .डरावने और बेहद घृणित । उनके जिस्म पर कपड़े थे । जगह-जगह से फटे हुए चीथड़े से । वे सब सागर के रेत मे खड़े हुए इस तरह लहरा रहे थे जेसे नृत्य कर रहे हौं । उनके कपडे जगह-जगह से फ़टे हुए लीथड़े थे । वे सब सागर के रेत में खड़े हुए इस प्रकार लहरा रहे थे जैसे नृत्य कर रहे हो । इनके कपड़े पाश्चात्य सभ्यता के थे । हल्की हल्की सीटियों की आवाज पानी में तैर रही थी जो वहां बडी भयानक लग रही थी ।

ये सीटियां भी वे ही बजा रहे थे । कपड़े जगह-जगह से फट गए थे । किसी के जिस्म पर उखड़ा हुआ थोड़ा-सा गोश्त था तो कोई मात्र हड्डियों का कंकाल था । पानी मेँ वे इस प्रकार थिरकते से लग रहे थे मानो अपनी दुनिया में एक जिंदे व्यक्ति को देखकर खुशी से झूम रहे हों । उनके चारों और कई तो ऐसे ये जो सीधे उसी की ओर देख रहे थे और हाथ हिला-हिंलाकर उसे बुला रहे ये । बागारोफ ने ध्यान से देखा तो झुरझुरी-स्री उसके जिस्म मेँ दौड़ गई ।

उनके पैर लम्बी-लम्बी घास में छुपे हुए थे ।
 
सागर के गर्भ मे यह दृश्य बेहद डरावना लगता था, चागारोफ़ अभी अपने होश ठिकाने पर लगा भी नही पाया था कि उसके समीप खड़ा एक भूत तेजी से उस पर झपटा ।

अपनी पूरी फुर्ती का प्रदर्शन करके बागारोफ ने यह स्थान छोड दिया और उसने थोडी दूर जाकर उसकी ओर देखा तो महसूस किया कि वह भूत उसी को घूर रहा था और भयानक ढंग से हाथ हिला-हिलाकर उसे अपने करीब बुला रहा था ।

बागारोफ़ जैसे व्यक्ति का चेहरा भी पीला पड़ गया ।

शरीर मे काटो तो खून नहीं ।

बागारोफ़ ने अपनी ओर झपटने वाले भूत के चेहरे को ध्यान से देखा तो सिहर उठा । उस भूत के चेहरे पर नाममात्र को भी गोश्त नहीं था । मात्र हड्डियों का ढांचा। जिस्म के कपड़े चिथड़े से होकर उसकी हड्डियों पर झूल रहे थे । आंखों के स्थान पर दो गहरे गहरे गड्ढे थे । बागारोफ़ ने उन गड्ढो में देखा तो मौत की साफ़ परछाईं उसकी आंखों में उभर आई । सागर का पानी भूत की खोखली आंखों में से आर-पार हो रहा था l हड्डियों के बीच से पानी रिस रहा था ।

बागारोफ़ को ऐसा लग रहा था जैसे भूत बराबर उसी को घूर रहा है ।

जल्दी से घबराकर बागारोफ़ ने उस पर से अपनी नजर हटाई लेकिन जिधर भी नजर जाती उधर ही भूत । उसे महसूस हुआ कि सब उसी को घूर रहे हैं । जैसे एक शिकार को चारों और से शिकारियों की पूरी टोली ने घेर लिया हो । बागारोफ़ को गश-सा आने लगा ।।

उसे लगा अगर वह ज्यादा देर यहां रहा तो निश्चित रूप से ये भूत उसे मार डालेंगे । बस, उसने तेजी से अंगडाई ली और पानी में ऊपर उठता चला गया I भागने का प्रयास करते हुए बागारोफ़ की नजर अचानक एक काफी बडी मछली पर पडी । उसने देखा वह मछली दूर खडे हुए एक भूत कै चेहरे पर मौजूद उधड़ा हुआ गोश्त नोचकर भाग गई l

यह दृश्य बागारोफ ने स्पष्ट देखा और न जाने क्या सोचकर उसने भागने का प्रोग्राम एकदम केंसिल कर दिया ।

उसने सोचा…मछली भूत के चेहरे का गोश्त नोंचकर ले गई और भूत केवल अपने स्थान पर खडा हुआ लहराता रहा!

इसका मतलब चक्कर कुछ और है I इस बार उसने साहस करके अपनी मझर-गन सीधी की और एक भूत के चेहरे का निशाना लेकर तड़ातड़ दो तीन फायर कर दिए । मझर-गन की गोलियां भूत के चेहरे से टकराईं और यह देखकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि उस भूत का गर्दन से लेकर चेहरे और सिर वाला भाग गोलियां लगते ही एकदम खील-खील होकर बिखर गया I

अपनी सफ़लता पर बागारोफ़ की आंखे चमक उठी ।

उसका भय एकदम समाप्त हो गया । खोया हुआ आत्मविश्वास पूरी दृढ़ता के साथ वापस आ गया । अब क्या था? उसने तेजी से दूसरे कंकाल को निशाना लगाया । गोली कंकाल की रीढ की हड्डी से टकराई और उसी के साथ कंकाल लचककर टूटा और गिर गया I

इसके बाद ।

बागारोफ ने पांच-सात कंकालों को एकदम मझर-गन का निशाना बनाया । परिणाम यही था I अब उसका भय बिल्कुल ही समाप्त हो गया, वह पुन: तेजी से तैरकर उस कंकाल की ओर बढा जिसको उसने अब से पहले निशाना बनाया था । खासतौर से वह उसकी ओर इसलिए बढा क्योंकि उसकी गर्दन से ऊपर का भाग तो खील खील होकर बिखर ही गया था किंतु धड का हिस्सा अभी तक पानी में खड़ा उसी प्रकार लहरा रहा था ।

बेखौफ उसके करीब पहुंचकर बागारोफ ने पानी मेँ लहराते हुए कंकाल को दाएं हाथ से पकडा। उसके हाथ लगते ही कंकाल एकदम बिखर गया । उसकी गली हुई हड्डियां खील-खील होकर बिखर गईं । बिखरा हुआ कंकाल सागर के पानी में मिल गया l

बागारोफ के होंठों पर ऐसी मुस्कान नृत्य कर उठी मानो उसने दुनिया की महानतम समस्या सुलझा दी हो ।

और उधर ।

जलपोत पर जासूसों की सम्पूर्ण टीम वेहद बेचैन थी । जब से बागारोफ समुद्र में कूदा था तब से अभी तक उसकी और से किसी प्रकार का भी कोई सिग्नल ट्रांसमिटर पर इधर नहीं मिला था । बागारोफ को सागर में विलीन हुए पूरा एक घंटा हो चुका था । अभी तक किसी प्रकार का कोई सिग्नल न पाकर सारे जवान बुरी तरह बौखला चुके थे । सबके दिमागों में अजीब-अजीब…सी दुष्कृत्य घटनाओं का आवागमन होरहा था । सबके बीच में सन्नाटे की एक लम्बी दोबार थी । एक घंटे से लगातार सबकी निगाह बडी उत्सुकता के साथ ट्रांसमिटर पर जमी हुई थीं । मगर निराशा. . .निराशा. ..घोर निराशा।

“यार अजीब सनकी बूढा है कोई सिग्नल ही नहीं भेजा I” काफी देर से इस वाक्य की बांड अपने जहन मेँ ही दबाकर रख रहा था जो माईक ने एकदम कह दिया ।

"समझ मेँ नहीं आता कि अब क्या किया जाए?" बांड ने कहा ।

"बांड. . .मैं देखता हू ।" कहकर माईक तेजी से गोताखोरी की पोशाक पहनने चला गया l

केवल दस मिनट मेँ वह तैयार होकर बाहर आया और बोला…"मैं देखता हूं बांड कि बूढे को किस आफ़त ने घेर लिया I”

अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि अचानक ट्रांसमिटर पिक-पिक करने लगा । विद्युत गति से दोनों ट्रांसमिटर की ओर घूम गए I ट्रांसमिटर हरा सिग्नल दे रहा था । सभी जासूसों के चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे ।

“लो साला अब सलामती की खबर दे रहा है I” बांड मुस्कराता हुआ बोला ।

"अजीब व्यक्ति है यार. . .तब से क्या सो रहा था?" माईक बुदबुदाया । सभी ट्रांसमिटर पर देख रहे थें ।

हरा सिग्नल मिल रहा था ।

इसका सीधा अर्थ ये था कि बागारोफ़ सुरक्षित है । कुछ देर हरे सिग्नल कै पश्चात पीला सिग्नल मिला । अर्थात् वागारोफ लोट रहा है ।

तुरंत माईक और बांड लांच लेकर उसके स्वागत में सागर में पहुच गए । माईक और बांड सहित अब सब जासूसों के दिल यह जानने के लिए धडक रहे थे कि देखते हैं बागारोफ क्या तीर मार आया है?

क्योंकि हरा सिग्नल मिलने का सीधा-सा कारण था कि बागारोफ़ सफ़ल ही गया हे l

उस क्षण जब बागारोफ सागर की सतह पर उभरा ।

"इधर चचा ।" माईक ने लांच पर से आवाज लगाई । बांड ने लांच का रुख तुरंत बागारोफ की ओर किया ।

बांड और माईक के अतिरिक्त जहाज के डेक पर खड़े हुए अन्य जासूसों ने भी बागारोफ को देखा तो एक बार को तो सबके जिस्म में सिहरन-सी दीड गई । उन्होंने देखा…बागारोफ़ के दोनों हाथों में दो कंकाल फसे हुए थे । उन्हें घसीटता हुआ वह बराबर लांच की और बढ़ रहा था ।

सभी जासूस उसे हैरतअंगेज दृष्टि से देख रहे थे ।

लांच उसके करीब पहुची । बागारोफ़ ने माईक को बाएं हाथ में थमा कंकाल थमाया । माईक ने कंकाल पकड़ तो लिया किंतु एक तीव्र घृनात्मक दुर्गध उसकी नाक में से होकर भेजे में उतरती चली गई ।

वह बदूबू उसी ककात से उठ रही थी । माईक को लगा कि इस भयानक सड़ांघ से उसका भेजा फ़ट जाएगा । किन्तु फिर भी उसने ककाल को खीचकर लांच में डाल लिया ।

इसके पश्चात बागारोफ़ ने बाएं हाथ में पकड़ा कंकाल उसे थमाया । भेजे को चीरती हुई ऐसी भयानक सड़ांघ उसमें से भी उठ रही थी । दोनों कंकालों कै पैर में लोहे की मोटी-मोटी वेडियां पडी हुई थी ।

दोनों कंकालों मेँ से ऐसी बदूबू उठ रही थी जैसे महीने-भर की सड्री हुईं लाश से उठ रही हो । ये बदूबू बांड के भेजे में भी उतरती चली गई । उसे लगा कि उसका दिमाग एकदम सड़ गया है । परंतु सांस रोककर वह बिना कुछ बोले बागारोफ़ के लांच पर चढने की प्रतीक्षा करता रहा ।

लांच पर आते ही बागारोफ़ ने अपना गेस मास्क उतार दिया । वही तेज सड़ांध उसके नथुनों में भी घुसती चली गई ।

"ये क्या उठा लाए, चचा?"

"ये ही तो हैं, वो साले समुद्री भूत I” बागारोफ़ बोला…"मैँ कहता था ना कि मैं सब भूतों का बाप हू ।"

"पूरा चक्कर क्या था, चचा?” लांच को जलपोत की और बढाते हुए बांड ने प्रश्न किया । “पूरा चक्कर सबको एक साथ जलपोत पर बताऊंगा हरांमखोंरों, वहीं चलो I”

और पंद्रह मिनट बाद ।

दोनों कंकाल बीच में पड़े थे और उनके चारों ओर जासूस खड़े थे । बागारोफ बडी शान से नमक-मिर्च लगाकर अपनी बहादुरी की कहानी सुना रहा था । अपनी डीग में वह उन तमाम बातों को छुपा गया था जब उन्हें वास्तव में भूत समझकर भागने लगा था । उसने तो बताया था कि पहली ही नज़र मे पहचान गया था कि ये भूत-वूत कुछ नही हे l चक्कर कुछ और ही है-बस उसने तुरंत झपट्टा मारकर कंकालों को पकड़ लिया ।

"लेकिन चचा, सागर में इन्हें देखकर भूतों का भ्रम क्यो होता था?" यह प्रश्न बरगेन शॉ ने किया ।

"अबे, भूतों का भ्रम कहां होता था उल्लू की दुम फाख्ता I” बागारोफ बोला…“वे ही साले चार चिड्रीमार इन्हें भूत समझते थे । मैं तो देखते ही समझ गया था कि ये भूत नहीं हैं । वैसे मैं यह समझ गया फि वे चारों इन्हें भूत कैसे समझे I”

"तो वही बता दो, चचा ।" माईक ने कहा ।

"असल बात ये थी कि इनके पैर सागर के रेत में बुरी तरह धंसे हुए थे । वहां रेत मे लम्बी-लम्बी घास थी । कुछ तो पैर रेत में धंसे हुए थे और कुछ इनके घुटनों तक का भाग लम्बी…लम्बी घास में उलझा रहता था । ये में तुम्हें बता ही चुका हूं कि सागर के तल मे ऐसे कंकाल सैकडों की संख्या मे थे । रेत में र्फसे और घास में उलझे होने के कारण ये गिरते नहीं थे । पानी की लहरों के सहारे ये लहराते-से रहते थे । पानी की लहरों पर ही इनके हाथ चलते थे...गर्दन भी हिलती थी

कभी-कभी जब पानी मे कोई तेज लहर इनसे टकराती तो ये बड्री जोर से लहराते जिसके कारण ऐसा प्रतीत होता कि ये हम पर झपट रहे हैं । वैसे सागर के तल में किसी भी आदमी का इनसे डर जाना बहुत ही स्वाभाविक बात थी । सागर के गर्भ मे जहां एक अथवा दो इंसान अकेले होते हे. . .वहां वे खुद को इन हजारों कंकालों के बीच में पाएं तो अच्छे-अच्छी के होश फाख्ता हो जाएं! कंकाल क्रो देखकर तो वैसे ही इंसान चीख पडता है और उस समय की कल्पना तो आप सरलता से ही कर सकते हैं जब दो व्यक्ति सागर के गर्भ मेँ हजारों कंकालों को एक ही स्थान पर देखें । आधे होश तो इन्हें देखते ही फाख्ता हो जाते हैं । इंसान की सोचने-समझने की बुद्धि एकदम समाप्त हो जाती है । तब इनके पानी में लहराते जिस्म हिलते हुए हम इंसानों क्रो ये सोचने पर विवश कर देते हैं कि ये जीवित हैँ । बस, इंसान घबरा जाता है और इनकी हर हरकत ऐसी लगती है जैसे ये उसी को बुला रहे हो । अत: यही सब देखकर ये चारों चोट्टी के भयभीत हो गए और 'भूत-भूत करने लगे ।"

"लेकिन आप नहीँ डरे चचा ।" बांड होंठों-ही-होंठो में मुस्कराता हुआ बोला ।।

"हम डरते तो इन्हें यहां तक ले आते?"

"लेकिन तुमने इनसे डरने का और भूत समझने का कारण इस ढंग से बताया हे चचा कि ऐसा लगता है जैसे यह सव आप-बीती हो ।” माईक ने कहा ।

“अबे. . .क्या कहा चूहे की औलाद ।” बागारोफ़ राशन-पानी लेकर माईक पर चढ गया--""साले अपने टोरिग ।"

"नहीं चचा, ऐसी बात नहीं ।" माईक हंसता हुआ हाथ जोडकर बोला ।

“लेकिन चचा, आपने एक घंटे तक कोई सिग्नल क्यों नहीं दिया?" जेम्सबांड ने प्रश्न किया l

"सस्पेंस बनाने के लिए I" बागारोफ़ ने बडी अदा के साथ अपने गंजे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा ।
 
इसके बाद उनके बीच थोडी देर के लिए सन्नाटा छा गया फिर इस सन्नाटे को बागारोफ़ ने ही तोड़ा…'"अबे, तुम क्या सारे-के-सारे चुकंदर की औलाद हो...साले जिस बात का जवाब देने के लिए मैं बेचैन हो रहा हूं. . .वह प्रश्न किसी ने किया ही नहीं?”

"कौन-सा प्रश्न, चचा?" बरगेन शॉ ने पूछा l

"अबे, यही आडू के बच्चे कि ये हजारों कंकाल सागर में पैदा कहां से हो गए?"

“मैने तो यह प्रश्न इसलिए नहीं पूछा चचा क्योंकि मुझे इस प्रश्न का उत्तर मालूम है I" जेम्सबांड ने कहा ।

"अबे, भाग ओ मुर्गी के बच्चे… ।" बागारौफ ने उसे लताड़ा-“तेरे तो बाप को भी पता नहीं होगा । पता है तो जवाब दे I"

"मेने इन कंकालों के पैरों में पडी हुई ब्रेडियां देख ली हैं, चचा ।" बांड बोला…" इन पर अभी तक हिटलर की मोहर स्पष्ट चमक रही हैं । सजा देने मे हिटलर भी दुनिया के चंद लोगों में से एक था । मेरे ख्याल से ये उसके युद्ध…बंदी थे जिन्हें उसने जीवित ही बेडियों में कसकर सागर में डाल दिया । इस समय तक समुद्गी जीव नोच-नोचकर इनका गोश्त खा गए. . . और ये बेचारे बदनसीब कंकाल रेत मे घंसकर खड़े रह गए ।"

“मान गए हरामी की दुम कि बुद्धि का स्टॉक तेरे पास भी है-- बागारोफ बोला…“कुछ कंकालों की तो हड्डियां तक भी इतनी गल चुकी थी कि हाथ लगाते ही वे खील खील होकर बिखर जाते थे । हरामजादे हिटलर की कारस्तानी ने आज हमे चकरघिन्नी बना दिया ।"

उसी समय हल्की…सी कराह ने सबका ध्यान आकर्षित किया । सबने देखा…त्वांगली कराहकर होश में आ रहा था ।

उसी समय बागारोफ को एक अजीबोगरीब शरारत सूझी । उसने कंकाल उठाया और फर्श पर पड़े त्वांगली के सामने आ गया और त्वांगली ने कराहकर एकदम चौंककर आंख खोली I

बागारोफ ने फुर्ती से कंकाल उसकी आंखों के सामने करके उसके ऊपर फेक दिया ।

"भ. . .भ. . .भूत ।" भयभीत होकर एकदम त्वांगली चीखा और पुन: बेहोश हो गया ।

जासूसों के जबर्दस्त कहकहे से सारा जलपोत गूंज उठा ।

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फिनिश

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"अबे यार, धनुषटंकार इस समस्या को तुम ही सुलझाओ ना. . . ।" बिजय चालक-कक्ष मे ही घनुषटंक्रार के पास बैठा हुआ कह रहा था-“साली एक कुतिया पाली थी और साली एक चूहे के इश्क में पागल होकर हमारे दिल पर चार फौ चालिस बोल्ट पावर का धक्का लगाकर उसके साथ चली गई । अब सोच रहे हैं कि क्या पाले । बिल्ली पाले तो कुत्ते से इश्क लड़ाएगी । चीता पाले तो शेरनी से इश्क लडाएगा. . लकड़बग्गा पाले तो. . . ।" और इसी प्रकार विजय लगातार बकवास करता

जा रहा था I

उसके समीप ही बैठा धनुषटंकार मोटर बोट का संचालन कर रहा था । विजय की बकवास के बीच वह बड़े भोलेपन से उसकी ओर देखता और मासूमियत के साथ पलकें झपका देता । इस समय उनकी मोटर बोट का रुख उसी टापू को ओर था, जिस पर उन्होंने जलती हुई आग और आग के ऊपर जलते हुए उढ़ते जानवर देखे थे । अब वे टापू के काफी करीब पहुच गए थे । निस्सदेह बिजय प्रत्यक्ष में बकवास करता नजर आ रहा था...किन्तु वास्तविकता ये थी कि टापू के वे जितना करीब पहुचते जा रहे थे. . .विजय उतना ही सतर्क होता जा रहा था ।

तब जबकि वे टापू के काफी करीब पहुच गए, उन्होंने देखा. . .टापू एकदम निर्जन-सा लगता था । सागर के किनारे लम्बी-लम्बी झाडियां थीं । सारे टापू पर अजीब-अजीब लम्बे वृक्ष थे । वृक्षो के पीछे छुपे टापू का वे अधिक भाग नहीं देख सके थे । सारा टापू एक घना जंगल-सा प्रतीत होता था । बिजय की आंखें भली-भांति किनारे का निरीक्षण कर रही थीं । र्कितु अभी तक उसे किसी भी प्रकार के खतरे का आभास नहीं मिला था और देखते-ही-देखते मोटर बोट साहिल पर पहुच गया था ।

धनुषटंकार और विजय इंजन बंद करके डेक पर आ गए । लंगर डाला गया और विजय से पहले धनुषटंकार किनारे की लम्बी घास में कूद गया । विजय अभी कूदना ही चाहता था कि एक फुंफकार सुनकर उसके कान खडे हो गए । विजय ने चौंककर देखा-किनारे पर घास में धनुषटंकार भी उसके सामने अपने दो पैरों पर खडा उससे टकराने के लिए तैयार था ।

नाग के जिस्म का एक तिहाई भाग हवा में लहरा रहा था ।

इस प्रकार वह धनुषटंकार से ऊंचा ही लग रहा था l बिल्कुल स्याह रंग का ये काला नाग देखने में वेहद खतरनाक लग रहा था । एक ही पल में विजय ने पूरी स्थिति का अध्ययन किया और पलक झपकते ही उसने जेब से रिवॉल्वर निकाल लिया ।

उसी क्षण. . .वातावरण के सन्नाटे में धनुषटंकार की ची-ची ।। विजय ने देखा…धनुषटंकार की आंखें फ़न उठाए नाग पर जमी हुई थी और दायां हाथ ऊपर उठाकर वह बिजय को ऐसा संकेत कर रहा था जैसे कोई बहादुर लड़ाका अपने शिकार पर अपने किसी साथी को हमला करते देखकर रोकता हुआ कहता है-"ठहरो, ये मेरा शिकार है l’

धनुषटंकार की ये हरकत देखकर विजय के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान दोड़ गई ।

उसने सोचा…धनुषटंकार में एक…एक आदत विकास की आती जा रही है l विजय बहादुर था । अपने जीवन मेँ वह न जाने कितने खतरनाक इंसानों और जानवरों से टकराया था किंतु फिर भी वह बहादुरी से अधिक दिमाग को महत्व देता था । असमय की बहादुरी दिखाना वह मूर्खता समझता था l उसका सिंद्धांत था क्रि दुश्मन को खत्म करना है…चाहे किसी भी प्रकार हो... l अगर दुश्मन सरल ढंग से समाप्त हो सकता है तो व्यर्थ की बहादुरी दिखाना उचित नहीं है. . .ओर बिल्कुल इसके विपरीत मार थाड-विकास का सिद्धांत. . .उनका कहना था कि दुश्मन को बहादुरी से खत्म करो l उसी सिद्धांत पर इस समय धनुषटकार भी चल रहा था । एक बार तो बिजय के दिमाग में आया कि धनुषटंकार के संकेत क्रो नजरंदाज करके नाग को गोली से उडा दे ।

किन्तु. . .नहीँ. . अगले ही पल उसने विचार बदल दिया ।

वह जानता था कि अगर उसने ऐसा कर दिया तो धनुषटंकार पजामे से बाहर आ जाएगा । उसने यही उचित समझा कि वह धनुषटंकार को अपने अरमान निकालने के लिए पूरा अवसर दे I.

. .रिवॉत्त्वर उसने ताने रखा ताकि अगर धनुषटंकार पराजित-सा होता लगे तो वह नाग को तुरंत गोली मार दे ।

वह देख रहा था…धनुषटंकार और नाग आमने-सामने थे । नाग मस्ती के साथ अपना फन हवा में लहरा रहा था । इधर दोनों पैरों पर खड़े हुए धनुषटंकार के हाथ कैरेट की सूरत बनाए तैयार थे । एकाएक नाग ने बडी तेजी से धनुषटंकार पर अपने फन का वार किया किंतु धनुषटंकार उससे भी कही अधिक फुर्तीला निकला-वह अपनी बंदरानी हरकत दिखाकर उछला और नाग के पीछे कूदा । नाग का फन घास से टकराया I लेकिन तुरंत ही वह पुन: खडा हो गया । अभी नाग धनुषटंकार पर वार करने ही वाला था कि धनुषटंकार ने झपटकर उसका फ़न थाम लिया । नाग ने अपने बाकी जिस्म को धनुषटंकार की बांह से लपेटना चाहा किंतु धनुषटंकार ने उसे इतना अवसर न देकर अपने हाथ में दबा हुआ फन घास के नीचे धरती पर रगड़ दिया ।

नाग बिलबिला उठा ।

एक बार धनुषटंकार ने उसके रगड़े हुए फ़न को देखा और फन पर अपने मुंह से ढेर सारा थूक निकालकर थूक दिया ।

फिर उसका फ़न धरती पर रगड दिया । चांदनी रात में विजय को नाग ओर बंदर की यह लडाई काफी रोमांचक लग रही थी I कुछ देर बाद धनुषटंकार ने नाग को मारकर रस्सी की भांति एक तरफ फेंक दिया ।

"जियो बेटा धनुषटंकार बेड़ा कर दो आर पार I” विजय ने वहीँ से नारा लगाया और रिवॉल्वर जेब मेँ रखकर किनारे पर आ गया I

बडी शान के साथ धनुषटंकार ने अपनी जेब से सिगार निकाला I

"नहीं बे, जानवर ।” उसका इरादा भांपते ही बिजय बोला…“अभी केवल मारा-मारी ही सीखे हो बेटे ।” जासूसी के पैंतरे अभी हमसे सीखने पड़ेगे, ये सिगार किसी को भी हमारी स्थिति का पता बताता रहेगा और हम किसी को देख भी नहीं सकॅगे ।"

धनुषटंकार क्रो अपने स्वामी की बात एकदम उचित लगीं । उसने सिगार वापस रख लिया । धनुषटंकार फुदकता-सा बिजय से आगे-आगे चल रहा था I लम्बी घास को पार करके वे वृक्षों की और घुस रहे थे I जैसे ही थनुषटंकार पहले वृक्ष के नीचे पहुचा, एकदम अप्रत्याशित ढंग से वृक्ष की टहनियां झुकी और उन्होंने धनुषटंकार को अपने बीच में कसकर एकदम ऊपर उठा लिया । धनुषटकार की चीं-चीं से सारा जंगल गूंज उठा I

बिजय पेड़ से अभी थोड़ा पीछे था I उसने यह दृश्य देखा तो एक ही पल में भयानक खतरे को भांप गया I वह समझ गया कि ये वृक्ष मांसाहारी हैं I वह जानता था अगर उसने जल्दी ही कोई उपाय नहीं किया तो ये वृक्ष धनुषटंकार का सारा खून पी डालेगा और अंत में उसकी हड्रिडयां पेड के नीचे पडी रह जाएंगी I वृक्ष की टहनियों मेँ उलझा हुआ धनुषटंकार बराबर चीख रहा था । विजय ने गजब की फुर्ती का प्रदर्शन करते हुए जेब से कटार निकाली और गोरिंल्ले की भांति सीधा उस टहनी पर झपटा जिसमें धनुषटंकार फंसा हुआ था । उसने कटार का वार अपनी पूरी शक्ति से उन टहनियों में से एक की जड़ पर किया l

टहनी एकदम कटकर नीचे जा गिरी । इसके साथ ही धनुषटंकार नीचे गिरा I

"'बंदर मियां, सागर की ओर भागो I” टहनियों से उलझा हुआ विजय चीखा-वृक्ष की टहनियां उसे अपनी गिरफ्त में लेना चाह रही थीं ।

विजय का कटार वाला हाथ बिजली की गति से भी कहीँ अधिक तेजी के साथ चल रहा था, जो भी टहनी उसे जकड़ने की कोशिश करती, वह कटार से उसी को काट डालता I

मांसाहारी वृक्ष से विजय का ये अजीबोगरीब युद्ध पांच मिनट तक चला I

पांच मिनट पश्चात बिजय को एक ऐसा क्षण मिला, जब वह किसी भी टहनी की पकड़ में नहीं था। बिजय ने इसी क्षण का लाभ उठाया और एक जम्प के साथ हवा में तैरता हुआ सागर की ओर वृक्ष की रेंज के बाहर धरती पर जाकर गिरा । वही पर खड़ा हुआ धनुषटंकार वृक्ष से अपने स्वामी का ये अजीब युद्ध देख रहा था । विजय तो मांसाहारी वृक्षों के बारे मेँ पहले से जानता था किन्तु धनुषदंकार के लिए एक अजूबा था I आज से पूर्व उसने कभी ऐसा विचित्र वृक्ष नहीं देखा था I

विजय उछलकर खडा हो चुका था किंतु धनुषटंकार अभी तक आंख फाड़-फाढ़कर उस वृक्ष को देख रहा था ।

"अब वहां कहां देख रहे हो मियां बजरबटूटू?" बिजय बोला…"बच गए वरना तुम्हारी रामलीला ही खत्म थी ।”

अब विजय को जंगल में घुसने के लिए रास्ते की तलाश थी I यह तो वह जानता था कि यहां सारे, हर पेड़ मांसाहारी नहीँ है । किंतु आगे बढने के लिए यह जानना बहुत आवश्यक था कि कौन…सा वृक्ष मांसाहारी है ? कौन-सा नहीं । समस्या थी, यह पता लगाने की I अचानक उसके दिमाग में एक उपाय आया, वह धनुषटंकार से बोला…“प्यारे घसीटा, सुन, ज़रा उस नाग को तो दूंढ़कर लाओ जिसे तुमने शहीद किया था I”

धनुषटंक्रार की समझ में ये तो आया नहीं कि आखिर स्वामी अब उस मरे हुए नाग का करेंगे क्या, परंतु फिर भी आदेश का पालन करता हुआ वह उधर चल दिया जिधर उसने नाग फेंका था । चांदनी रात में उसे नाग को दूंढ़ने मे अधिक देर नहीं लगी I रस्सी की भांति लटकाए उसे धनुषटंकार विजय के पास ले आया l

"अब घसीटाराम, एक रस्सी का प्रबंध करना होगा ।”

जबाब में धनुषटंकार ने अपने कोट की जेब से रेशम की डोरी निकालकर विजय को थमा दी । विजय ने मरे हुए नाग क्रो रेशम की डोरी से बांधा और उसे मांसाहारी पेढ़ के नीचे फेंक दिया । बडी तेजी से वृक्ष की डालियां सर्प की ओर झपटीं किंतु विजय ने उनसे अधिक फुर्ती का प्रदर्शन करके रेशमी की डोरी क्रो झटका देकर सर्प को अपनी ओर खींच लिया। धनुषटंकार कुछ समझा और कुछ नहीं समझा।

विज़य सर्प को लेकर एक-दूसरे वृक्ष की ओर बढा, इसी प्रकार सर्प को वृक्ष के नीचे फेंका, वृक्ष की डाले उसी प्रकार सर्प पर झपटीं, बिजय ने पुन: उसे खींच लिया । इस प्रकार अब विजय के लिए यह पता लगाना सरल हो गया कि कौन-सा वृक्ष मांसाहारी है और कौन-सा नहीं । जब उसने पाचवे वृक्ष के नीचे सांप डाला तो वृक्ष में किसी प्रकार की कोई हरकत नहीं हुई, विजय उसी पेड़ के नीचे से आगे बढा । धनुषटंकार उसके पीछे-पीछे था । इस समय धनुषटंकार वृक्षों से भयभीत-सा नजर आ रहा था ।

अभी वे इस वृक्ष की सरहद को पार भी नही कर पाए थे कि अचानक वे दोनों बुरी तरह चोंक पडे…परंतु इससे पूर्व कि कोई भी कुछ कर सके उन्होंने खुद को एक मजबूत जाल में फंसा पाया । हुआ ये था कि चमत्कारिक ढंग से उनके ऊपर एक लाल सुर्ख जाल आकर गिरा और वे उसमें फंसते चले गए ।

"आदरणीय झकझकिए महोदय, सत्-सतृ प्रणाम ।" जंगल मे ही टुम्बकटू की आवाज गूंजी ।

बिजय और धनुषटंकार ने देखा, उनके सामने खडा टुम्बकटू लहरा रहा था । उसके जिस्म पर अनेकों घाव थे किंतु होंठो पर वही मुस्कान थी जो हमेशा रहती थी । एक क्षण के लिए तो विजय चौंककर रह गया, फिर बोला…“अबे कार्टून मियां, तुम यहां?"

"क्यों मियां, हम यहां नहीं हो सकते?"

"हो क्यों नहीं सकते हो यार, बिल्कुल हो सकते हो।” बिजय बोला…"" मगर मियां, हमसे इश्क लडाने का यह कौन-सा ढंग है?"

"इश्क लड़ाने का भी अपना-अपना तरीका होता हे प्यारे झकझकिए ।" टुम्बकटू ने कहा----"इश्क क्री बाते करने के लिए ये उचित स्थान नहीं है, आराम से बैठकर बाते करेगे !" कहते ही दुम्बकटू ने आबाज लगाई-"झबरू l”

इसके बाद ।

विजय ने जो कुछ देखा उसे कमाल की ही संज्ञा दी जा सकती थी ।

उसने देखा-उनके ऊपर वाले पेड़ से एक शेर उड़ता हुआ नीचे आया ।
 
विजय को लगा ये सब उसकी आंख का भ्रम है । उसने पूरे ध्यान से देखा किंतु जो वह देख रहा था वह सत्य था । वास्तव में पेड़ के ऊपर से उडता हुआ जंगल की धरती पर एक शेर ही आया था । एकदम काला, भयानक और मोटा-ताजा.. .लम्बा...वह शेर ही था I किंतु उसके बड़े-बड़े पंख भी थे, इन्हीं के सहारे वह उडता हुआ धरती पर आते ही वह गर्दन झुकाकर टुम्बकटू के सामने इस प्रकार खडा हो गया मानो उसका गुलाम हो ।

"कार्टून भाई. . . ।" बिजय शेर की तरफ घूस्ता दुआ बोला…"ये क्या चमत्कार है?”

"चमत्कार केवल तुम्हारे लिए है, मेरे लिए नहीं…।” टुम्बकटू ने कहा-"तुम शायद इसे शेर समझ रहे हो किंतु असलियत ये है कि ये शेर नहीँ है l चंद्रमा का एक जानवर हे I ये ठीक है कि इसका ढांचा यहां के शेर से मिलता है, अंतर केवल इतना है कि शेर के पंख नहीं होते, और इनके पंख हैं । जैसे धरती पर ऐसे हुलिए के जानवर क्रो शेर कहा जाता है, उसी तरह चंद्रमा पर इसे झबरू कहा जाता है ।शेर की भांति ही इसके अंदर भी हमारी बात समझने का दिमाग नहीँ है परंतु क्योंकि ये मेरा पालतू झबरू है इसलिए मेरी विशेष भाषा समझता है और उसका पालन करता है ।"

“इसका मतलब आग के ऊपर यही महाराज उड़ रहे थे?" विजय ने कहा ।

"केवल यही नहीं महोदय, सुनिए! रोबिन और ब्लाउंड इत्यादि भी थे ।” टुम्बकटू ने बताया-"अब तुम ये पूछोगे क्रि ये मैं क्या ऊटपटांग नाम ले रहा हूं। इसका जवाब ये है कि वे चंद्रमा के अन्य जानवरों के नाम हैं जिनका ढांचा यहाँ के कुत्ते, बिल्ली इत्यादि से मिलता है । उनमें भी केवल इतना ही अंतर है कि इनके पंख हैं और यहां के जानवरों के पंख नहीं होते अत: ये उड़ सकते हैं और वे उड़ नहीं पाते. . . I”

“लेकिन मियां खां. . .हमने तो ये देखा था कि वे सब आग कें ऊपर उड़ रहे थे और खुद भी जल रहे थे ।"

“तुम फिर गलत समझें मि. झकझकिए, वह आग नहीं जान्द थी ।"

"जान्द ।" विजय ने दोहराया-"ये साली क्या वस्तु होती है, मियां? "

"अब ये तो मैं तुम्हें क्या बताऊं कि क्या वस्तु होती है I" टुम्बकटू बोला…“एक बात पहले तुम बताओ ।”

"पूछो? "

"तुम मुझे ये बता दो कि आग क्या वस्तु होती है?" टुम्बकटू ने बडा गहरा प्रश्न किया ।

टुम्बकटू के इस प्रश्न पर थोडा उलझते हुए बिजय ने ज़वाब दिया…“मियां . . .ये सवाल तो ऐसा है कि दिमाग चकरघिन्नी बनकर रह जाता डै । दुनिया में हजारों वस्तु है जैसे कपडा रोटी, पानी, किताब लेकिन कोई ये पूछे कि किताब क्या वस्तु हे तो इसका जवाब तो यही हो सकता हे कि किताब एक ऐसी वस्तु है जो पढने के काम आती है , पानी ऐसो वस्तु है जो प्यास बुझाता है इत्यादि, इस प्रकार वस्तुओं के नाम लेते ही उसके गुणों का बोध होता है । आग शब्द कहते ही हर व्यक्ति समझ जाता है कि यह एक ऐसी वस्तु है जो किसी को भी जलाने की क्षमता रखती है ।"

“लेकिन आग का नाम रोटी क्यों नहीँ रखा गया?" टुम्बकटू ने विचित्र-सा प्रश्न किया ।

"लगता हैं कार्टून प्यारे कि तुम्हारे दिमाग का बैलेंस गड़बड़ा गया है ।" बिजय बोला…“मियां रोटी और आग का क्या मेल. . .रोटी पेट की आग बुझाती हे और आग चाहे जहां आग लगा देती है I”

"ये तुम केवल इसलिए कह रहे हो क्योकि धरती पर पैदा होने के बाद तुम्हें रोटी और आग के गुण बताए गए हैं ।" टुम्बकटू ने कहा-“जरा ये सोचो कि अगर घरती के हर मानव को पैदा होते ही ये शिक्षा दी जाती कि जो वस्तु खाने के काम आती है उसका नाम आग है और जो कही भी आग लगा देती है उसे रोटी कहते हैं । यानी अगर रोटी का नाम आग होता और आग का रोटी तो क्या अंतर पडता?"

"तुम्हारी ये ऊटपटांग बाते अपने भेजे मे नहीं घुस रही हैं, मियां ।"

"मैं तुम्हें ये बताना चाहता हूं कि किसी भी वस्तु का नाम बदलने से उसके गुण नहीं बदलते। नाम तो केवल अपनी सहूलियत के लिए रख दिए जाते हैं l जैसे जब में पहली बार आप लोगों के सामने आया तो मैंने अपना नाम टुम्बकटू बताया, अब अगर तुम किसी से मेरा नाम लेते हो तो मेरा ढांचा उसकी आंखों के सामने तैर जाता है । अगर मैं तुम्हें अपना कोई दूसरा नाम बताता तो भी मैं ही रहता. . .गुण तो नहीं बदल सकते ।"

“मियां, ये बात तो शेक्सपियर महोदय ही कह गए ।" विजय बोला-"लेकिन हमारी बुद्धिमानी में ये बात नहीं आईं कि तुम ये फ्लासफी क्यों झाड़ने लगे । मैंने तो तुमसे उस वस्तु के बारे में पूछा था जिसे हम आग कहते हैं और तुम जान्द. . . I”

"मैं तुम्हें उसी बात का जवाब दे रहा हूं । तुमने पूछा था कि जान्द क्या वस्तु होती है? इसका जवाब देने के लिए ही मैंने तुमसे पूछा था कि आग क्या वस्तु हे? इसका जवाब तुमने ये दिया कि आग एक ऐसी वस्तु है जो किसी वस्तु को जलाने की क्षमता रखती है । यानी किसी वस्तु का नाम लेने से उसके गुणों का बोध होता है । मैं तुम्हें यही समझाना चाहता था कि अगर तुम चंद्रमा की भाषा जानते होते, जान्द कहते ही तुम समझ जाते कि यह क्या वस्तु होती है?”

"तो भाई साहब, इस साली जान्द के गुण ही बता दो I”

“जान्द देखने में तुम्हारी आग जैसी वस्तु होती है किंतु इसके गुण तुम्हारी आग से बिल्कुल विपरीत होते हैं । आग गर्म होती हे लेकिन जान्द एकदम ठंडी । कदाचित तुम्हें मेरी बात विचित्र-सी लग रही हे लेकिन ये सच है कि जान्द आग जैसी लगती है खैर, इस तरह तुम्हें विश्वास नहीं आएगा I” टुम्बकटू ने अपने टेक्सीकलर कोट की जेब में हाथ डालते हुए कहा…“मैं तुम्हें दिखाता हू।" कहकर उसने पीली-सी एक गोल गेद जैसी वस्तु निकाली और उस जाल के ऊपर रख दी जिसके अंदर विजय और धनुषटंकार कैद थे l इसके बाद एक हरी…सी छडी निकालकर उसने गोल गेंद जैसी वस्तु से छुआ दी । फटाक-ठीक इस प्रकार की आवाज हुई जैसे पेट्रोल में एकदम आग लगा दी हो । साथ ही सारा जाल आग की लपटों मेँ घिर गया । विजय और धनुषटंकार टुम्बकटू की इस अजीबोगरीब हरकत पर एकदम बौखला गए ।

किंतु उस क्षण उनके आश्चर्य का ठिकाना नही रहा जब उन्होंने देखा कि पूरा जाल यहां तक क्रि उनका थोडा जिस्म उन्हीं लपटों में घिर गया था र्कितु उससे जलना तो दूर, उन्हें हल्की…सी गर्मी का भी अनुभव नही हो रहा था । इसके विपरीत उन्हें हल्की-हल्की ठंड अवश्य लगने लगी थी ।

ये लपटें उनके जिन स्थानों से स्पर्श कर रही थीं वहां उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे बर्फ का कोई छोटा-सा टुकडा रखा हो ।

"अवे मियां कार्टून. . .बंद करो ये बंगाल का जादू।" विजय बोला ।

मुस्कराता हुआ टुम्बकटू बेधड़क उन लपटों में घुस गया I बोला…"इसे कहते हैं, जान्द ।" और कहने के साथ ही उसने उस गेंद जैसी गोल वस्तु पर अपना हाथ रख दिया । लपटे एकदम न जाने कहां गायब हो गई । टुम्बकटू ने उस वस्तु को उठाकर पुन: जेब में डाल लिया ।

“तो इसका मतलब ये हुआ प्यारे कार्टून कि हमने जो कुछ वहां से देखा था वह हमारी आग नहीं बल्कि तुम्हारी जान्द थी और तुम्हारे ये पंख वाले जानवर उसके ऊपर उछल कूद रहे थे ।" बिजय ने कहा ।

"मैँ जानता था कि तुम जान्द के बारे में कुछ नहीं जानते और जान्द को आग ही समझोगे I” टुम्बकटू ने कहा-“पंख वाले इन जानवरों क्रो मैंने जान्द के ऊपर उड़ने का आदेश दिया क्योंकि मुझे मालूम था कि जब तुम ये सब वहां से देखोगे तो यह तुम्हारे लिए एक बडा रहस्य होगा ।”

"लेकिन तुम्हारी इस हरकत का कारण? "

"जो कारण था वो पूरा हो चुका है, यानी तुम इस जाल में फंस चुके हो I” टुम्बकटू ने कहा…"मैं जानता था कि इस रहस्य को जानने के लिए तुम टापू पर आओगे । तुम्हें यहां बुलाने के लिए ही मैंने ये साधारण हरकत की जो तुम्हारे लिए बेहद विचित्र थी । तुम यहां आए और मेरे जाल मेँ फंस गए लेकिन बापू…जान अर्थात् तुम्हारा शिष्य समुद्र के रास्ते से ही हमारे यान मेँ पहुच गया I एक तरह से यू कहना चाहिए कि अपने षडूयंत्र में मुझे आधी सफलता मिली ।"

"लेकिन तुम हमें गिरफ्तार करना क्यों चाहते हो?”

"सीधी सी- बात है कि तुम मेरे रहस्यों तक पहुच गए हो । और मैंने वचन दिया है कि जो मेरे रहस्यों तक पहुंचकर उस वस्तु क्रो प्राप्त कर लेगा, जिसकी प्राप्ति पर वह अपने भगवान से भी श्रेष्ट हो जाएगा, मैं उसका गुलाम बन जाऊंगा । मुझे क्योंकि गुलाम बनने का शोक तो है नहीं इसलिए मैं अपना हर प्रयास करूंगां कि आप लोग उस वस्तु को प्राप्त न कर सकै । आप यहां तक पहुच गए हैं. . .अतः अब या तो आप मुझे अपना गुलाम ही बनाएंगे अन्यथा अंजाम मोत होगी ।”

"इसका मतलब ये हुआ कार्टून प्यारे कि हमारी तुम्हारी ठन गई I”

"बिल्कुल ठन गई ।" टुम्बकटू ने मुस्कस्ते हुए ज़वाब दिया l

" बैसे वो चीज क्या है प्यारे. . .जो हमेँ प्राप्त करनी हैं ?"

“तुमने एक बार फिर बिल्कुल बेकार प्रश्न किया है।" टुम्बकटू ने कहा…“तुमसे पहले भी कह चुका हू कि वस्तु की वेल्यू नाम से नहीं गुणों से होती है । मैं तुम्हें उस वस्तु का नाम तो बता दू किन्तु जब तक तुम उसके गुण नहीं जानोगे

उसका महत्व नही समझोगे, मान लो कि उसका नाम 'चंद्रवटी' है. I”

"'चंद्रवटी!" बिजय ने नाम दोहराया-"अब ये भी बता दो कि इसके गुण क्या हैं?"

"ऐसी भी क्या जल्दी है. . . ?" टुम्बकटू चालाकी के साथ मुस्कराता हुआ बोला-"गुण भी सब बहुत जल्दी जान जाओगे ।"

कुछ देर तक उनके बीच यू ही ऊटपटांग वार्तालाप होती रही ' फिर टुम्बकटू बोला-“खैर यहां से चलते हैं । कहने के पश्चात वह पंख वाले शेर अर्थात् झबरू की और घूमा और बिचित्र सी ऊटपटांग भाषा मेँ उससे कुछ बोला । इस भाषा को विजय अथवा धनुष्टंकार में से कोई भी कुछ नहीं समझा | थोडी देर तक टुम्बकटू झबरू को कुछ समझाता रहा I जाल की गठरी उसने झबरू की पीठ पर रख दी

झबरू उन्हें लेकर जंगल में एक तरफ को चल दिया । टुम्बकटू भी उसके साथ था ।

आधे घंटे तक वे घने जंगल में यात्रा करते रहे I इसके बाद वे एक पथरीली-सी गुफा में घुस गए । विजय का मस्तिष्क बराबर इस जाल से निकलने की युक्ति सोच रहा था किंतु सफल नहीं हो पा रहा था । जाल में उसके हाथ…पैर इस प्रकार उलझे हुए थे कि वह उन्हें हिला तक नहीं सकता था । जिस गुफा से वे इस समय गुजर रहे थे उसमें अंधेरा था र्कितु झबरू बढा चला जा रहा था l

न जाने गुफा के कितने मोडों को पार करके वे एक पत्थरों के ऐसे चौड़े-से स्थान पर पहुच गए जो देखने में एक कमरा-सा लगता था । कमरे के बीचोंबीच जान्द की लपटें लपलपा रही थीं । जिसके कारण कमरे मेँ प्रकाश था ।

बिजय ने देखा कमरे में कुछ ऐसी-ऐसीं मशीनें फिट थी ।

जिनसे ये स्पष्ट होता था कि यहां कोई वैज्ञानिक रहता है । झबरू कमरे में खड़ा हो गया l बिजय जाल मेँ फंसा हुआ ही टुम्बकटू की एक…एक हरकत देख रहा था I टुम्बकटू उसकी और घूमकर बोला ।

"प्यारे झकझकिए, अब मैं तुम्हें वह यान दिखाता हू जो तुमने मेरी फिल्म मेँ देखा था l” कहते हुए टुम्बकटू ने आगे बढकर एक अजीब-सी मशीन का हेंडिल घुमा दिया । एक कांच की प्लेट पर ठीक टी.वी. स्क्रीन की भांति पानी में डूबे हुए यान का चित्र उभर आया l

"यार टुम्बकटू।" विजय मूड में ही बोला…“तुम तो पूरे वैज्ञानिक हो रहे हो I”

“अजी कहां झकझक्रिए महोदय l” टुम्बकटू एकदम उस शायर की भांति बोला जो अपनी शायरी की तारीफ सुनकर बोलता है…“बस, हम तो आपके गुलाम है…जो भी कुछ टूटा-फूटा है आपकी सेवा मेँ पेश कर रहे हैं । अब में इस यान तक पहुचने का आपको ऐसा रास्ता बताता हू जो मेरी फिल्म में नही था ।" कहने के बाद उसने मशीन का एक बटन् दबा दिया ।

"इधर देखो ।" टुम्बकटू ने कांच की प्लेट की ओर इशारा किया ।
 
विजय और धनुषटंकार ने कांच की प्लेट की ओर देखा…उसने देखा. . .यान से एक बडा और चमकदार-सा डिब्बा बाहर आया । ये डिब्बा रेल के डिब्बे की भांति बडा ओर चारों ओर से बंद था । यान के अंदर से सरककर वह सागर के पानी को चीरता हुआ आगे बढ रहा था । डिब्बे का बहुत सारा भाग यान से बाहर आ चुका था और अभी तक वह यान से बाहर निकलता जा रहा था ।

ठीक उसी प्रकार जैसे कोई लम्बी रेल यान के अंदर से निकलकर पानी में आ रही हो ।

पहले बिजय को यान से निकलता हुआ ये चमकदार बॉक्स ही नजर आया था फिर ये बॉक्स जैसे-जैसे करीब आता गया, विजय ने देखा कि वह यान कै गर्भ से इस प्रकार निकल रहा है जैसे वह किसी गुफा से बहुत दुर खड़ा है और गुफा के मुंह से किसी रेलगाडी को निकलते देख रहा है । सुनहरे चमकदार बाँक्स की चौडाई ठीक रेल कै एक डिब्बे के बराबर थी और लम्बाई बढ़कर प्रतिपल एक लम्बी रेल की भांति होती जा रही थी । कुछ ही देर बाद बॉक्स का अगला भाग किसी खोखली दीवार में धंस गया और पिछला भाग अभी तक यान के गर्भ में था । रेल जैसा ये बाक्स अब रुक चुका था । विजय स्क्रीन पर साफ़ देख रहा था । यान से पानी के बीच होता हुआ ये बाँक्स उस दीवार तक आ गया था ।

“झबरू ।" टुम्बकटू ने शेर जैसे जानवर को आदेश दिया…"नीचे चलने के लिए तैयार ।"

आदेश प्राप्त होते ही झबरू कमरे के एक खास स्थान पर जाकर खडा हो गया । बिजय और धनुषटंकार उसकी पीठ पर उसी प्रकार पडे थे । टुम्बकटू के एक बटन दबाते ही फ़र्श का वह हिस्सा जहां झबरू खडा था, धीरे…धीरे नीचे खिसकने लगा । दो मिनट चलकर फर्श का वह टुकडा रूक गया । फर्श का ये टुकडा उन्हें दूसरे कमरे मेँ ले आया था । विजय ने ऊपर देखा…इस कमरे के ऊपर की छत में उस टुकड़े के बराबर मोखला बना हुआ था जिस पर झबरू खडा था । उसी पल छत का एक और दुकड़ा इस्पात की एक बडी रांड पर फिसलता हुआ नीचे आया । उस टुकडे पर टुम्बकटू खडा था ।

“तुम देख रहे हो प्यारे क्रि हम इस कमरे के बीच मेँ लटक रहे हैं ।" टुम्बकटू बोला…“लेकिन लगता है कि अभी भी तुम्हारी समझ में पूरा चक्कर नहीं आया है । खैर, मैं तुम्हें समझाता हू ।” टुम्बकटू दाईं दीवार की ओर संकेत करके बोला-"बो देखो ।"

विजय ने देखा तो पाया । उसी चमकदार बॉक्स का अगला भाग इस समय इसी कमरे में था । बॉक्स दीवार में इस तरह फिक्स था कि बॉक्स की दीवार और कमरे की दीवार के बीच से हवा भी पास नहीं हो सकती थी । अभी विजय सारा चक्कर समझने की चेष्टा कर ही रहा था कि टुम्बकटू ने चमकते हुए बॉक्स के अगले भाग पर लगा एफ़ बटन दबा दिया । बॉक्स का आगे वाला भाग गड़गड़ाहट के साथ खुल गया । बिजय ने देखा अंदर से बॉक्स खाली था और जिस धातु का बाँक्स बना हुआ था उस धातु की चमक का पर्याप्त प्रकाश उसके अंदर था।

"शायद तुम समझ गए होगे कि इसके अंदर से होते हुए हम यान में पहुंच सकते हैं l” टुम्बकटू ने कहा---" हम इस कमरे के बीच में इसलिए रुके हुए हैं क्योकि नीचे पानी भरा हुआ है । ये वो पानी है जो बॉक्स का अगला भाग अपने साथ धकेलता हुआ लाता है । तुम क्योकि झबरू की पीठ पर हो इसलिए नीचे नहीं देख पा रहे हो । बैसे कमरे में जब पानी अधिक हो जाता है तो पाइप के जरिए पुन: सागर में पहुचा दिया जाता है ।”

टुम्बकटू के प्रबंध देखकर विजय दंग रह गया ।।

फिनिश

विकास के जिस्म का सम्पूर्ण खून जैसे उसके चेहरे पर सिमट आया था । चमकते हुए उस कक्ष से वह अमी तक छत से चिपका हुआ था? उसकी दृष्टि उस चमकदार रिग पर थी,

जिस तक पहुचना वास्तव मेँ कठिन था । काफी देर से वह इस मुसीबत से छुटकारा पाने का प्रयास कर रहा था मगर अभी तक दिमाग कोई ऐसी योजना सोचने मेँ सफ़ल नहीं हो पाया था जो उसे इन परिस्थितियों से छुटकारा दिला सकती । इस समय तो जैसे उसके दिमाग की सोचने-समझने की शक्ति ही समाप्त ही चुकी थी । उसके मस्तिष्क में जैसे हजारों चीटियां रेंग रही थीं ।

उसी क्षण-उसके कानों में हल्की…सी गड़गड़ाहट का शोर आया!

"बापूजान, आदाब अर्ज है ।" टुम्बकटू की ये आवाज गोल्ड के कमरे की दीवारों से टकराई ।

बिकास समझ गया कि ये गड़गड़ाहट और टुम्बकटू की आवाज उसके ऊपर से आ रही है और विवशता ये थी कि विकास बेचारा ऊपर देख नहीं सकता था । अपनी गर्दन को इधर-उधर हिलाने की उसने चेष्टा की भी किंतु असफल होकर बोला…“अबे लम्बे अंकल ये क्या चक्कर है?”

“ये चक्कर मेँ चक्कर मिलकर घनचक्कर बन गया है, बापूजान I” टुम्बकटू की आवाज गूंजी-“वैसे मेरे लिए और कोई सेवा है?”

"यार लम्बू अंकल, सेवा तो ये है कि पहले हमेँ सीधा करो I” काफी कठिनाई के बावजूद ही विकास बोला ।

"बात ये है बापूजान कि हम दोनो मेँ से एक का उल्टान होना ही चाहिए I” टुम्बकटू का स्वर पुन: उसी प्रकार गूंजा…"उस पाइप मेँ ततैये घुसेड़कर तुमने हमारा उल्टान कर दिया था । अब हमने तुम्हारा उल्टान कर दिया है अगर हमने तुम्हें सीधा कर दिया तो तुम हमेँ उल्टा कर दोगे ।"

"लेकिन लम्बू अंकल, ये माजरा क्या है?”

"माजरा नहीं बापूजान, बल्कि दरअसल ये बाजरा है ।" टुम्बकटू ने कहा…“धरती पर छोटे-छोटे बच्चों क्रो पढाया जाता है कि पेड से फल टूटकर धरती पर ही क्यों गिरता है. ..वह हवा मे ऊपर क्यों नहीं उड जाता.. .क्या तुम इस सवाल का जवाब दे सकते हो, बापू?"

"जरूर दे सकते है, लम्बू मियां ।" विकास ने कहा…-"बात दरअसल ये है कि धरती में गुरूत्वाकर्षण शक्ति होती है । इसी गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ऊपर उछाली गई कोई भी वस्तु सीधी धरती पर आकर गिरती हे ।"

"बस बापू-इसीं छोटे-से चफ्फर में आप र्फस गए हैं ।" टुम्बकटू ने बताया…“आपके इस नालायक पुत्र ने इस कक्ष की गुरूत्वाकर्षण शक्ति छत पर केंद्रित कर दी है. . और उसी का प्रभाव है कि आप छत पर ऐसे आराम फरमा रहे हे जैसे फर्श पर लेटे हों ।"

"अजीब उल्टा चक्कर है, अंकल l”

"उल्टा तुम्हारे लिए होगा, बापू। हमारे लिए तो यही सीधा है I”

"अब मुझे सीधा तो करो ।"

"शर्त ये होगी बापूजान कि सीधे होते ही आप मुझे उल्टा नही करेगे ।" टुम्बकटू ने कहा ।

विवशता ऐसी थी कि विकास को शर्त माननी पडी । उसके शर्त मानने की देर थी कि छत का वह थोड़ा सा भाग जिससे वह चिपका हुआ था, हल्की-स्री गड़गड़ाहट के साथ छत से निकलकर और ऊपर खिसकने लगा । छत के दुकड़े से उसी प्रकार चिपका हुआ वह छत से ऊपर आ गया और छत को अब वह देख सकता था । छत में वह स्थान रिक्त था जहां दुकड़े पर इस समय भी विकास चिपका हुआ था ।

एक क्षण पश्चात ही उस रिक्त स्थान को उसी के साइज के एक दूसरे चमकदार दुकड़े ने भर दिया ।

अभी वह इसके लिए तैयार भी नही था कि वह चिपके हुए टुकडे से टूटकर धम्म से फ़र्श पर आ गिरा । गोल्ड के इस सुनहरे और कठोर फर्श पर इस प्रकार अचानक गिर जाने के कारण उसकी कई हड्रिडयां कीर्तन कर उठी किंतु इसके बावजूद भी वह उछलकर इसप्रकार खड़ा हुआ मानो वह रबर का बना हो ।

ठीक सामने उससे भी लम्बा गन्ने जैसा टुम्बकटू खड़ा था ।

एक क्षण के लिए छलावा और शेतान ने एक…दूसरे की आंखों में झांका ।

दोनों के होंठों पर अजीब-स्री मुस्कान दोड़ गई ।

"लम्बू अंक्ल...ये सब साला चक्कर क्या है?” सन्नाटे की दीवार को विकास के शब्दों ने तोड़ा ।

"जब यहां तक आ ही गए हो बापू तो चक्कर भी सब समझ में आ जाएगा I” टुम्बकटू ने बडी अदा के साथ अपनी रंगीन सिगरेट सुलगाई और हरा धुआं सुनहरे कक्ष में उडाता हुआ बोला'-'"लेकिन मेरा सवाल ये हैं कि उससे पहले तुम अपने गुरु ओर चेले यानी झकझकिए और बंदर से जरूर मिलना चाहोगे ।"

"क्या मतलब?” हल्के-से चौंका विकास…“वे दोनों भी यहां पहुच गए I”

"बंदा परवर की नजरे इनायत चाहिए I” अदब से झुककर टुम्बकटू बोला ।

"लेकिन कैसे?"

"अपने-अपने ढंग हैं, बापूजान. . . I" कहता हुआ टुम्बकटू लहराया-“जरूरी नहीँ कि बताया ही जाए ।"

"खैर...पहले उनसे मिलवाओ तो सही ।" न जाने क्या सोचकर बिकास ने कहा l

“ब्लाउंड. . . I” टुम्बकटू ने तुरंत कहा l

जवाब में अपने बड़े-बड़े पंखों पर उडती हुई एफ बिल्ली उसी कमरे में प्रविष्ट हुई। उसे देखकर बिकास आश्चर्यचकित-सा रह गया ।

उसने टुम्बकटू से लगभग वही प्रश्न किए जो उससे पहले बिजय कर चुका था। जबाब णे टुम्बकटू ने उसे वही सब बता दिया जो उसने बिजय क्रो बताया था । ये ही बातें करते हुए वे हीरों की बनी हुई एक गैलरी में से गुजर रहे थे । ब्लाउंड अर्थात पंखों वाली बिल्ली उनके साथ थी l
 
टुम्बकटू का सारा यान गोल्ड का बना हुआ था । गोल्ड कै ऊपर हीरे और पन्ने जड़े हुए थे I ऐसे-ऐसे चमकदार हीरे जिनकी ओर देखने से आंखें चुधियां जाती थीं । गैलरी में होकर वे हीरों-पन्नों से उसी प्रकार चमकते हुए एक लम्बे-चोड़े हाल में पहुच गए ।

हॉल में जगह-जगह हीरों से जड़े हुए खम्बे थे ।

"अबे तुम भी आ गए दिलजले मियां ।" एकाएक उस हाल में विजय क्री आवाज़ गूंजी ।

तेजी से पलटकर बिकास ने उधर देखा-ओर देखा तो देखता ही रह गया ।

उस हाल के एक कोने में बिजय और धनुषटंकार बड़े विचित्र से ढंग से कैद थे ।

उनकें गर्दन तक के जिस्म हाँल के फर्श के नीचे धंसे हुए थे । दोनों के केवल चेहरे ही फर्श से ऊपर थे । ऐसा लगता था जैसे उनके गर्दन तक के भाग को फर्श कै नीचे दबा दिया गया हो I

विकास ने उनकी और देखा तथा बोला-" हम तो आ गए गुरु लेकिन आपकी स्थिति पर हमें दुख है !"

"चिंता मत करो बेटा...कुछ देर बाद हम भी तुम्हारी स्थिति पर दुख प्रकट करेगे. . .ये साला कार्टून अपने सिंगही चचा का भी बाप है ।"

"लम्बू अंकल... l" बिकास टुम्बकटू से बोला…“तुम्हें कम-से-कम इस बात का तो ख्याल रखना था कि गुरु के सामने चेला आ रहा हैं । अब जरा तुम्ही सोचो कि हम गुरु को अपना पक्का शिष्य होने का प्रमाण कैसे दे सकत्ते हैं । चरण नहीँ हे तो छुएं क्या?”

“हम भला आपकी शान में इतनी लम्बी-चौडी गुस्ताखी कैसे कर सकते हैं, बापूजान?" अजीब से ढंग से लहराता हुआ टुम्बकटू बोला…"अभी प्रबंध करते हैं I” कहने के एकदम बाद उसने अपने मुंह से एक ऐसी अजीब आवाज निकाली जिसे विजय, विकास और धनुषटंकार किसी प्रकार की संज्ञा नहीं दे सके । किंतु इस आवाज का परिणाम ये हुआ कि हाल की दीवारों में चारों ओर धड़धड़ शटर-से खुलते चले गए । तीनों ने देखा हाल के चारों ओर लगभग बीस पंख वाले अजीब-अजीब शक्ल के जानवर खड़े थे । उसमें शेर, गीदड़,

चीता, कुत्ता, बिल्ली, गधा और गाय जेसी शक्ल के भी जानवर थे । अंतर केंवल इतना था कि उन सब जानवरों के पंख थे और धरती के इन जानवरों के पंख नहीं होते ।

"आप तीनों महानुभावों में से कोई भी किसी सरकारी पवित्र हरकत करने से पहले ये अच्छी तरह सोच ले कि इनमे से हर नस्ल का जानवर अपने ढंग से खतरनाक है । बिल्ली जैसी सूरत के उस जानवर का नाम ब्लाउंड हे ।" टुम्बकटू उसकी ओर संकेत करके बोला-" किंतु वह चूहे नही बल्कि पवित्र हरकत करने वाले आदमियों को खाता हे । अगर आपने किसी भी प्रकार की कोई... ।"

"अमां यार कार्टून मियां. . .क्यों मेजा खा रहे हो?" विजय ने उसे बीच में ही रोक दिया…"हमने कभी पवित्र हरकत करना हीँ नहीँ सीखा…-हमे खोलो?"

मुस्कराकर टुम्बकटू ने अपना सलाई जैसा दायां हाथ तुरंत ऊपर उठा दिया । उसका ये सकेंत पता नहीं किसने कहां से देखा और कौन-सा बटन दबाया कि विजय और धनुषटंकार के जिस्म सरकते हुए पूरे हाल के फर्श पर आ गए ।

विकास ने विजय के चरण स्पर्श किए…धनुषटंकार ने विकास के । इस बीच तीनो के दिमाग ऐसा कुछ करने की सोच रहे थे जिससे टुम्बकटू की इस कैद से छुटकारा पाया जा सके, मगर तीनों में से किसी का भी दिमाग अमी तक कोई उपाय सोचने में समर्थ नहीं हो पाया था ।

"हमारे ख्याल से अब आपका मधुर मिलन समाप्त हो गया हैं I" उसी समय तीनों के कानों में टुम्बकटू की आवाज पडी ।

"वो तो हो गया कार्दून प्यारे । इस समय बिजय अपनी सबसे पुरानी चाल अर्थात् समय बिताने वाली चाल चलता हुआ बोला-“लेकिन यार, जरा ये तो बताओं कि क्या तुम वास्तव में धरती के सबसे बड़े अमीर हो?"

"अजी बंदा किस काबिल है?” झट से टुम्बकटू बोला…"बस, आपकी मेहरबानी है l”

"खैर, हमारी मेहरबानी तो है ही ।" बिजय किसी बुजुर्ग की भांति गर्दन हिलाता हुआ बोला--""लेकिन मियां खां, हमे तो यार सब खजाना धोखा ही लगता है l सच यार कार्टून, तुझे भड़गूजे की अम्मा की कसम, ये बताओ कि वास्तव में ही ये हीरे असली हैं?”

"क्यों, तुम्हें इनके असली होने में कोई संदेह है?" टुम्बकटू आराम से अपनी सिगरेट में कश लगाता हुआ बोला ।

”बस है।" विजय इस प्रकार लापरवाही के साथ बोला मानो अगर वे हीरे असती भी हैं तो उसके कहते ही नकली हो जाएंगे । हम तो मान नहीं सकते कि ये असली हैं ।"

“तुम्हारे न मानने से क्या होता है, हैं तो असली ही ।”

“नहीं प्यारे।” बिजय अपने ही मूड में बोला-" भड़भूजे की अम्मा की कसम खाओ वरना हम मानेंगे नहीं ।"

टुम्बकटू मुस्कराकर अभी कोई जवाब देना ही चाहता था कि विकास बोला…"तो क्या लम्बू अंकल आपके पास यही दौलत है, जिसके बूते पर तुमने यह कह दिया कि तुम्हारे पास इतनी दौलत है कि पूरे विश्व की दौलत भी तुम्हारी दौलत के सामने एक बटा दस है ।।”

"नहीं बापू और भी ज्यादा माल हे ।" टुम्बकटू ने कहा…“आओ, मैं आप लोगों को दिखाता हूं।”

इसके बाद टुम्बकटू आगे और तीनों उसके पीछे उन्हें चारों ओर से घेरे हुए अजीब किस्म के जानवर । वे सब हाल के एक ओंर गैलरी मे बढ गए ।

बिजय, बिकास और घनुषटंक्रार के दिमाग काफी तेजी से काम कर रहे थे ।

सबसे अधिक तेजी से धूम रहा था धनुषटंकार का दिमाग । वह चल जरूर रहा था किंतु उसका हाथ धीरे धीरे अपने कोट की जेब की और रेग रहा था । कदाचित वह हंगामा करना चाहता था कि तभी एक भयंकर गर्जना से पूरा वातावरण दहल उठा ।

हवा में फ़ड़फ़ड़ाने की आवाज़!

एक गधे जैसा जानवर हवा मे पंख फडफडाकर म चमत्कृत कर देने वाली फुर्ती कै साथ धनुषटंकार पर झपटा था ।

बेचारा घनुषटंकार काफी इरार्दो के बावजूद भी वह कुछ नहीं कर पाया ।

सबने केवल इतना देखा…गधे जैसे जानवर ने उसे अपने लम्बे जबड़े में फसाया और तेजी से झटका देकर दूर फेक दिया, सब देखते ही रह गए और घनुषटंकार की लाश हीरों की धरती पर पडी रह गई । विजय और बिकास देखते ही रह गए l उन्हें विश्वास नहीं आया कि घनुषटंकार का अंत इतनी जल्दी और सरलता से हो सकता है । विकास का पूरा जिस्म क्रोध और उत्तेजना से कांप उठा । उसकी आंखें लाल हो गईं I

उसकी आंखों के सामने धनुषटंकार की मौत ।।

विकास के जिस्म का ज़र्रा…जर्रा तन उठा ।
 
बस ऐसे समय पर उसकी सोचने-समझने की बुद्धि समाप्त हो जाती थी I उसने आव देखा न ताव दनाक से एक जम्प घनुषटंकार के हत्यारे जानवर पर लगा दी । अगले ही क्षण बिकास उस गधे जैसे जानवर से गुथा हुआ था । उसी पल अन्य जानवरों ने भी उस पर झपटना चाहा कि...

एकदम टुम्बकटू हाथ उठाकर विचित्र-सी आवाज में जाने क्या चीखा?

एकदम, जैसे जानवरों के पैरों में ब्रेक लग गए l

धनुष्टंकार का हत्यारा जानवर भी एकदम विकास से अलग हो गया । बिकास खूनी भेड्रिए की भांति एकदम पलटा और दहाडा----" टुम्बकटू , मै तुम्हारे इस यान को खाक मे मिला दूँगा ।"

" जोश में मत आओ बापूजान I" टुम्बकटू उसी प्रकार बोला-"जो हुआ है, ठीक हुआ है, निश्चित ही उसने कोई हरकत की होगीं !"

"हरामजादे ।” चीखकर विकास ने उस पर झपटना चाहा किं बिजय ने हाथ पकड लिया । बिखरे हुए बिकास को वह काफी कठिनता से काबू में लाया ।

टुम्बकटू कह रहा था…"घबराने की बात नहीं हे प्यारे बापूजान, हम मरे हुए को जिंदा भी कर लेते हैं I"

विकास तो खैर, इस समय उसका वाक्य सुनने अथवा उसे समझने की शक्ति खो चुका था । किन्तु टुम्बकटू के इस वाक्य ने विजय के मस्तिष्क में अवश्य धमाका-सा किया किंतु फिर भी न जाने क्या सोचकर वह चुप रह गया?

बिकास धनुषटंकार के जिस्म के पास बैठा और उसकी नब्ज देखी । यह महसूस करते ही कि घनुषटंकार स्वर्ग सिधार चुका है, लडके की आंखों में आंसू आ गए । वह बुरी तरह धनुषटंकार की लाश से लिपट गया । रोते-रोते ही उसका चेहरा सुर्ख होता चला गया ।

दहकती आंखों से उसने टुम्बकटू की ओर देखा और खूंखार स्वर में गुर्राया…""इस धरती पर बिकास के बहुत दुश्मन हैं टुम्बकटू न जाने कितने इंसान विकास के खून के प्यासे हैं, लेकिन आज मेरी एक बात याद रखना । विकास तुमसे घनुषटंकार की मौत का बदला लेगा…जरूर लेगा, ये सारी दुनिया जानती है टुम्बकटू-तुम मी जानते हो जव विकास बदला लेता है तो, तो मौत भी

जिंदगी कै लिए पनाह मांगली है । अपनी उस मां की कसम खाता हूं टुम्बकटू जिसके आंचल का दूध पिया है, मैं बदला लूगा, धरती से पाताल तक तुम्हें नहीं छोडूंगा, तुम्हारी मौत मेरे हाथ से होगी, मौत भी ऐसी टुम्बकटू किं फिर कभी कोई विकास के किसी प्यारे को ओर आंख उठाकर भी नहीं देख सकेगा-निर्मम बदला I"

इस तरह एक बार फिर भावुकता में बह गया विकास । बिजय ने उसे समझाने का प्रयास किया था किन्तु बह विजय पर भी गुर्रा-गुर्राकर आता था ।

बडी कठिनता से विकास समझा कि इस समय परिस्थिति ऐसी है कि वह वास्तव में कुछ नहीं कर सकता । धनुषटंक्रार की लाश को हाथों में उठाकर वह उसके साथ गैलरी मेँ आगे बढ़ गया । विजय और बिकास दोनों ही इस परिस्थिति में कुछ करना चाहते थे परंतु सफ़लता प्राप्त नहीँ हो रही थी ।

गेलरी के अनेक मोड़ पार करने के बाद वे एक छोटे-से कक्ष मेँ पहुचे । छोटे…से कक्ष मेँ पहुंचकर टुम्बकटू ने एक बटन दबाया ।

गड़गड़ाहट के साथ कक्ष की एक पूरी-की-पूरो दीवार हट गई । दीवार हटते ही बिजय और बिकास की आंखें महान आश्चर्य से उबल पड्री ।

दौलत. . .दौलत . . .दौलत ।

इतनी बेशुमार दौलत उन्होने जिंदगी मेँ कभी नहीं देखी थी । जिधर नज़र डालो चमकदार, हीरे, पन्ने, मोती उन पर नजर नही ठहरती थी l यह एक बेहद विशाल कमरा था और पूरा एक-से-एक चमकदार हीरों से भरा पड़ा था । हाल मे दौलत का जैसे पहाड-सा बन गया था I

"ये है बो धन ।” टुम्बकटू बोला--""जो निश्चित रूप से सारी दुनिया की दौलत से ज्यादा है । तुम यानी धरती के निवासी आज तक दुनिया का सबसे नायाब हीरा "कोहिनूर का हीरा" समझते हो लेकिन देखो, कोहिनूर का हीरा इनमे से किसी भी एक हीरे के सामने कांच का टुकडा-सा लगता है I”

“लेकिन मियां. . . I" बिजय बोला-“यहां यानी धरती पर हीरों की इतनी कीमत क्यो? क्यों लोग उसे कीमती समझते है...?"

"जब दोलत की मात्रा बढ जाती है तो उसका महत्त्व कम हो जाता है l” टुम्बकटू ने कहा-"जिस अनुमान में दौलत की मात्रा बढती है उसी अनुमान में उसका महत्त्व कम होता जाता जाता है । दौलत का महत्त्व तभी तक हे जब तक उसकी मात्रा सीमित हो । तुम्हारा सवाल यानी हीरे की इतनी वैल्यू क्यों है? लोग हीरे क्रो इतना कीमती क्यों समझते हैं? वास्तव में यह एक अहम सवाल है । ये सवाल यूं ही किसी के दिमाग में ज़न्मना कठिन है । तुम्हारे दिमाग में भी महज इस कारण से यह प्रश्न जन्मा है क्योंकि हीरे को आज से पहले तुम असीमित कीमती समझते थे । किसी भी एक हीरे कौ देखने के लिए लालायित रहते थे, वे ही हीरे आज तुम्हारी आंखों फे सामने मिट्टी की भांति पड़े हैं । इतने सारे हीरों को एक साथ देखकर इनके प्रति तुम्हारा महत्त्व भी कम हो गया है । इसीलिए तुम्हरि दिमाग मे प्रश्न जन्मा कि लोग आखिर हीरे की इतना महत्त्व क्यों देते हैं?"

"यार कार्टून मियां, तुम तो हमारी जरा-सी बात पर ही भाषण देने लगे हो I” विजय बोला-“ यार हमें तो तुम ये बताओ कि वे कौन…सी वस्तु हैं जिसे पाकर मानव भगवान से भी ऊपर हो जाएगा l”

" उससे पहले जरा तुम एक और वस्तु देख लो . . . !” कहने के बाद उसने एक अन्य बटन दबाया l हल्की-सी गड़गड़ाहट के साथ कमरे की दूसरी दीवार भी एक ओर हट गई ।

उसी क्षण . . .एक जबर्दस्त गर्जना से सारा यान दहल उठा ।

विजय और विकास तक के कलेजे दहलकर रह गए । उनकी आत्मा तक इस भयानक गर्जना से कांप उठी ।

उन्होंने देखा इधर भी उनकी आँखों के सामने एक ऐसा ही लम्बा…चौड़ा हॉल था । उस हाँल मे एक जानवर टहल रहा था । हाथी जैसै जिस्म का एक विशाल और भयानक जानवर । हाथी जैसी ही उसकी सूंड थी । उसी की गर्जना से वे दहल उठे थे ।

विजय और बिकास की आंखे गहन आश्चर्य से फैल गई ।

वे उसी अजीब और खौफनाक जानवर को देख रहे थे । उसका हाथी जैसा विशाल जिस्म एकदम खून की तरह सुर्ख था । लम्बी, लंगूर से भी पांच गुनी लम्बी पूंछ । आगे सूड कै पास मुंह से बाहर निकलते हुए चार भयानक नोकीले और दो…दो फुट लम्बे दांत...एक-एक पैर जैसे सो…सौ किलो का था । पैरों में बढे हुए लम्बे-लम्बे नाखून. ..पंखो जैसे कान . . .कटोरे जैसी आंखें ।

सब कुछ मिलाकर वह बेहद भयानक ओर डरावना लग रहा था ।

अभी वह पुन: जोर से गर्जना चाहता था कि टुम्बकटू का गन्ने जैसा जिस्म उसके सामने लहरा उठा।

हाथ उठाकर टुम्बकटू ने अपनी बिचित्र-सी भाषा में न जाने क्या कहा कि ऊपर को उठती हुई उसकी लाल सुर्ख सूंड सम्मान प्रदर्शित करके झुकती चली गई । वह अगले घुटनों पर बैठकर टुम्बकटू के सामने गुलाम की भांति लम्बी दुम को हिलाने लगा ।

बिजय और विकास आश्चर्य के साथ उस जानवर और टुम्बकटू को देख रहे थे ।

जानवर क्रो शांत करने के बाद टुम्बकटू उन दोनों के समीप आया और बोला…“बापूजान, ये है चीता जो मेरे इस खजाने का रखवाला है । मेने कहा था कि इस खजाने तक पहुचने वाला व्यक्ति चीते का दुश्मन होगा । तुम. . .बापूजान, तुम. . .आज टुम्बकटू कह रहा है कि तुम दुनिया के सबसे बड़े जासूस हो.. लेकिन तुम्हें याद होगा. . .जो लेटर तुमने मेरे जूते मेँ से निकालकर पढा था…उसमें लिखा था कि सबसे बड़ा जासूस ही चीते का दुश्मन होगा । अब तुम समझ सकते हो बापूजान कि तुम हो 'चीते के दुश्मन' और तुम्हारे सामने है यह चीता? तुम्हे ये मी याद होगा कि इस चीते ने अमृत पी लिया है, यानी ये मर नहीं सकता । अब अगर तुम मेरे इस यान क्रो प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें इस चीते से लड़ना होगा I”

"अबे. . .अबे ओ कार्दून भाई I" एकदम बोखलाकर विजय बोला…“मियां, तुम्हारे दिमाग का बैलेंस तो ठीक है ना?"

"क्यों, इसमें बैलेंस बिगड़ने की क्या बात है?"

"अबे मियां, देख नहीं रहे कि हमारा दिलजला कैसा सुकुमार बालक है और तुम इसे इस हाथी से लडने को कह रहे हो । ऊपर से यह भी कह रहे हो कि इस चिड्रीमार ने अमृत पी लिया हे-मतलब, ये मरेगा नहीं तो क्या प्यारे हमारे दिलजले को मारना चाहते हो?"

"बिना इससे टकराए तो विकास सबसे बडा जासूस वन नही सकेगा ।"

"तो प्यारे हमें अपने सुकुमार को सबसे बड़ा जासूस बनाना भी नही है I" विजय बोला--"'मियां, अगर हमारा दिलजला इसके सामने खड़ा हो गया तो यकीन मानो ये रहेगा ही नहीं । इस साले हाथी को तुम चीता कहते हो?”

"इससे टकराए बिना तो तुम इस यान को भी प्राप्त नहीं कर सकोगे ।"
 

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