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चुदासी माँ और गान्डू भाई

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साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
मेरी बात सुनकर माँ उठी और नाइट-गाउन की डोरी खोल दी। खुले गाउन के नीचे माँ ने कुछ भी नहीं पहन । रखा था और माँ ने गाउन अपनी बाँहों से निकाल दिया और मेरे सामने मेरी माँ पूरी नंगी होकर हँस रही थी। मैं बेड पर लेट गया और माँ को मेरे चेहरे पर घोड़ी नुमा बना लिया और माँ का मुँह मेरे पैरों की ओर कर दिया।

राधा की रसदार चूत का फाटक ठीक मेरे मुँह के ऊपर था और माँ का विशाल हौदे सा पिछवाड़ा मेरी आँखों के सामने था। बिल्कुल गोल शेप में बने नितंबों की दरार के बीचो-बीच माँ की गाण्ड का बड़ा सा गुलाबी छेद साफ दिख रहा था। छेद ज्यादा सिकुड़ा नहीं होकर खुला सा था। मैंने माँ की चूत अपने मुँह पर दबा ली और माँ की चूत जीभ अंदर घुसा-घुसाकर मस्त होकर चाटने लगा। माँ की चूत लसलसा रस छोड़ रही थी। मैंने माँ की चूत से जीभ निकालकर दो अंगुली उसमें डाल दी, जिससे चूत के गाढ़े रस से अंगुलियां सराबोर हो गई। अब वापस माँ की चूत पर मुँह लगा दिया और उंगलियों में लगा रस माँ की गाण्ड के छेद पर मलने लगा। इधर माँ के मुँह के सामने मेरा लण्ड तनटना रहा था जिसे माँ चूसने लगी यानी की हम दोनों 69 की पोजीशन में एक दूसरे की चूसा चूसी करने लगे।

इधर मैंने अंगुलियों में लगा सारा रस माँ की गाण्ड पर चुपड़ दिया और माँ की गाण्ड का छेद चिकना हो गया। अब मैंने अपनी इंडेक्स उंगली माँ की गाण्ड में पेलनी शुरू कर दी। माँ की गाण्ड बहुत ही कसी हुई थी। एक अंगुली भी आसानी से अंदर नहीं जा रही थी। चूत चाटते-चाटते मेरे मुँह में काफी थूक इकट्ठा हो गया था, जिसे एक हथेली पर लेकर माँ की गाण्ड पर अच्छे से मल दिया और इस बार कुछ जोर लगाकर गाण्ड में अंगुली घुसा तो आधी अंगुली अंदर चली गई। अब मैं धीरे-धीरे अंगुली भीतर बाहर करने लगा। कुछ देर में छेद ढीला हो गया और पूरी अंगुली भीतर बाहर होने लगी।

माँ मेरे लण्ड के ऊपर झुकी हुई धीरे-धीरे मेरे 11" लम्बे और मोटे लौड़े को अपने हलक में ले रही थी। वो मुँह में जमा हुए थूक से मेरे लण्ड को चिकना कर रही थी और अपना मुँह ऊपर-नीचे करते हुए पक्की लण्डखोर औरत की तरह मेरा लण्ड चूसे जा रही थी। अब लगभग मेरा पूरा लण्ड वो अपने मुँह में लेकर चूसने लगी थी। माँ के इस प्रकार लण्ड चूसने से मुझे बहुत मजा आ रहा था। मैं पहले से ही माँ की चूत अपने चेहरे पर दबाते हुए पूरी जीभ उसके अंदर डालकर चाट रहा था, और साथ ही माँ की गाण्ड अपनी इंडेक्स उंगली से मार रहा था। माँ के इस प्रकार जोश में भरकर लण्ड चूसने से मुझे भी जोश आ गया और मेरी अंगुली की स्पीड उसकी गाण्ड में बढ़ गई।

मेरी देखा देखी माँ ने भी मेरा लण्ड चूसते-चूसते मेरी गाण्ड दोनों हाथों से कुछ ऊपर उठा ली जिससे माँ को मेरी गाण्ड का छेद भली भाँति दिखने लगा। उसने ढेर सारा थूक अपने मुँह से निकाला और अपनी 2-3 अंगुली में । लेकर मेरी गाण्ड के छेद पर चुपड़ दिया। तभी माँ ने शरारत से अचानक मेरी गाण्ड में अपनी एक अंगुली जोर से घुसेड़ दी।

मैं इस अप्रत्याशित हमले के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था और जोर से चिहुँक पड़ा। तभी माँ ने अपनी अंगुली कुछ बाहर लेकर वापस जोर से मेरी गाण्ड में पूरी घुसेड़ दी। हालाँकि मैं खुद तो मुन्ना की गाण्ड पहले ही मार चुका था, पर मेरी खुद की गाण्ड अब तक बिल्कुल कुँवारी थी। मुझे यह भी नहीं याद पड़ता की कभी मैंने खुद की भी अंगुली शौक से अपनी गाण्ड में दी हो। पर आज मेरी बिल्कुल कुँवारी गाण्ड एक औरत के द्वारा मारी जा रही थी, चाहे वो अंगुली से ही मारी जाये, और वो औरत खुद मेरी माँ थी।

 
लेकिन इस घटना से मैं बहुत खुश हो गया की चलो माँ की मस्त गाण्ड मारने की राह आसान हो गई जिसे मैं काफी देर से अपने चेहरे के ठीक सामने लहराते देखकर मारने की फिराक में था। मेरी एक अंगुली माँ की गाण्ड में बड़ी आसानी से अंदर-बाहर हो रही थी। तभी मैंने अंगुली निकाल ली और इस बार दो अंगुली थूक से अच्छी तरह तर करके धीरे-धीरे बहुत जतन के साथ माँ की गाण्ड में पेलने लगा।

मैं माँ को जरा भी दर्द महसूस नहीं होने देना चाहता था, क्योंकी कहीं वो अपनी गाण्ड देने से मना नहीं कर दे। थोड़ी कोशिश के बाद मेरी दो अंगुली माँ की गाण्ड में जाने लगी। अब मुझे विश्वास हो गया की यह मेरा मूसल सा लण्ड अपनी गाण्ड में भी ले लेगी।

विजय- “माँ तुम्हारी गाण्ड तो बड़ी मस्त है। लगता है इसको मरवाने की भी पूरी शौकीन हो। देखो कितने आराम

से तुम्हारी गाण्ड मैं अपनी अंगुलियों से मार रहा हूँ...” मैंने आखिर पूछ ही लिया।

राधा- “नहीं रे तेरा बाप मेरी चूत की प्यास तो ठीक से बुझा नहीं पाता था, भला वो मेरी गाण्ड क्या मारता? कभी-कभी मैं ही यूँ ही अंगुली कर लिया करती थी..." माँ बोली।

विजय- “तो इसका मतलब अभी तक तुम्हारी गाण्ड कुँवारी है। माँ जैसे तूने मुझे अपनी 15 साल से अनचुदी चूत का मजा दिया, वैसे ही अब अपनी इस कुंवारी गाण्ड का मजा देना। तुम्हारी चूत का तो उद्घाटन नहीं कर सका पर अब तुम्हारी कुँवारी गाण्ड का उद्घाटन तो मैं जरूर करूँगा...” मैंने माँ की गाण्ड में अंगुली से खोदकर कहा।

राधा- “क्या कहता है तू? तुम्हारा घोड़े जैसा हलब्बी लौड़ा कल बड़ी मुश्किल से चूत में ले पाई थी। भला यह गाण्ड में कैसे जाएगा? यह तो मेरी गाण्ड को फाड़ के रख देगा। नहीं बाबा मुझे नहीं मरवानी तुमसे गाण्ड..." माँ ने पुरजोर विरोध किया।

विजय- “माँ कल कितने प्यार से मैंने तुम्हारी चूत ली थी ना। थोड़ा भी दर्द महसूस होने दिया था क्या? मैं। उससे भी ज्यादा संभालकर और प्यार से तेरी गाण्ड लँगा। तेरे जैसी लंबी चौड़ी बड़ी गाण्ड वाली औरत की पूरी नंगी करके गाण्ड भी नहीं मारी तो फिर क्या मजा? तेरे जैसी मस्त गाण्ड वाली औरत अपने प्यारे को जब मस्त होकर गाण्ड देती है ना तो उसका यार बाग-बाग हो जाता है। उसका प्यार उस औरत के प्रति सैकड़ों गुना बढ़ । जाता है...” मैंने माँ की गाण्ड पर हाथ फेरते हुए कहा।

 
राधा- “लेकिन मैंने आज तक कभी मरवाई नहीं। ये तो मुझे पता है की शौकीन मर्दो को गाण्ड मारने का भी। शौक रहता है, और अपना शौक पूरा करने के लिए चिकने लौंडों को खोजते रहते हैं। हम औरतों की गाण्ड मर्दो के मुकाबले वैसी ही कुदरती भारी होती है तो ऐसे मर्द हमारी गाण्डों पर भी लार टपकाते रहते हैं पर भला हम औरतों को इसमें क्या मजा है?"

विजय- “माँ तुम नहीं जानती। कई मर्द कुदरती तौर पर तो मर्द होते हैं, पर उनके लक्षण औरतें जैसे होते हैं,

जैसे औरतों जैसे नाजुक, दाढ़ी मूंछ और छाती पर बालों का ना होना, औरतों के जैसे शर्माना इत्यादि। वैसे मर्द मारने वालों से ज्यादा मराने को लालायित रहते हैं। उन्हें मराने में जब मजा आता है तो इसका मतलब गाण्ड मराने का भी एक अनोखा मजा है, जो मराने वाले ही जानते हैं। तो तुम यह बात छोड़ो की गाण्ड मराने में तुम्हें मजा नहीं आएगा। जब तूने आज तक मराई ही नहीं तो तुम इसके मजे को क्या जानो? एक बार मेरे से अपनी गाण्ड मरवाके तो देखो। जैसे मेरे हलब्बी लौड़े से अपनी चूत का भोसड़ा बनवा के तुम मेरी रखेल बन गई हो । वैसे ही कहीं गाण्ड मरवाके पक्की गान्डू ना बन जाओ और गाण्ड मरवाने से पहले अपनी चूत मुझे छूने भी ना दो..."

मेरी बात सुनकर माँ ने कुछ नहीं कहा। मौन को सहमति मानते हुए मैं उठा और मेरी आल्मिरा से कंडोम का पैकेट और वैसेलीन का जार ले आया, जो कुछ दिन पहले मैं इसके छोटे बेटे की यानी की मेरे छोटे भाई मुन्ना की गाण्ड मारने के लिए लाया था। पैकेट से कंडोम निकलकर मैंने लण्ड पर चढ़ा ली। माँ को बेड पर घोड़ीनुमा बना दिया और माँ की गाण्ड पर अंगुली में ढेर सारी वैसलीन लेकर चुपड़ दी। 2-3 बार माँ की गाण्ड में अंगुली घुमाकर माँ की गाण्ड अंदर से पूरी चिकनी कर दी।

फिर मैंने अपना लण्ड अच्छे से चुपड़ लिया। आखिरकार, एक तगड़ी गाय पर जैसे सांड़ चढ़ता है वैसे ही मैं माँ पर चढ़ गया। मेरा सुपाड़ा बहुत ही फूला था, जिसका मुंड माँ की गाण्ड में नहीं जा रहा था। नीचे माँ भी । कसमसा रही थी। मैंने फिर थोड़ी वैसेलीन माँ की गाण्ड और मेरे लण्ड पर चुपड़ी। माँ से कहा की वह बाहर कीओर जोर लगाए। इस बार सुपाड़ा अंदर समा ही गया। माँ दर्द से छटपटाने लगी।

मैंने लण्ड बाहर निकल लिया और माँ का छेद रूपये का आकर का खुला साफ दिख रहा था, जिसमें मैंने अंगुली में लेकर वैसेलीन भर दी और माँ पर फिर चढ़ बैठा। 2-3 बार केवल सुपाड़ा अंदर डालता और पूरा लण्ड वापस बाहर निकाल लेता। इसके बाद मैं सुपाड़ा डालकर गाण्ड पर लण्ड का दबाव बढ़ाने लगा। माँ जैसे ही बाहर को जोर लगाती लण्ड धीरे-धीरे माँ की गाण्ड में कुछ सरक जाता। माँ की गाण्ड बहुत ही कसी थी। फिर लण्ड पूरा निकाल लिया और माँ की गाण्ड और मेरे लण्ड को फिर वैसेलीन से चुपड़कर माँ पर चढ़ गया। इस बार धीरे-धीरे मैंने लण्ड माँ की गाण्ड में पूरा उतार दिया।

 
विजय- “हाय माँ... तेरी गाण्ड तो सोलह साल की कुंवारी छोकरी की चूत जैसे कसी हुई है। देखो कितने प्यार से मैंने पूरा लौड़ा तुम्हारी गाण्ड में पेल दिया बताओ तुम्हें दर्द हुआ?” मैं माँ की लटकती चूची दबाते हुए बोला। अब मैं माँ की गाण्ड से आधा के करीब लण्ड बाहर करके धीरे-धीरे फिर भीतर सरकाने लगा था।

राधा- “पहली बार जब अंदर घुसा था तो एक बार तो मेरी जान ही निकल गई थी। लेकिन अब जब अंदर जाता है तो गाण्ड में एक मीठी-मीठी सुरसुरी सी होती है। मारो मेरे राजा। आज तो तुमने मुझे एक नया मजा दिया है, एक नये स्वाद से अवगत कराया है...” माँ ने मेरे चूची दबाते हाथ को पकड़कर अपनी चूत पर रखते हुए कहा।

अब मैंने धक्कों की स्पीड बढ़ा दी। नीचे से माँ भी गाण्ड उछलने लगी थी। मैं समझ गया की माँ पूरी मस्ती में है, और पहली बार गाण्ड मरवाने का मजा लूट रही है। अगले 5 मिनट तक मैंने माँ की गाण्ड खुब कस के मारी। मैं पूरा लौड़ा गाण्ड से बाहर खींचकर एक ही धक्के में जड़ तक पेल रहा था। वैसेलीन से पूरी चिकनी गाण्ड में लण्ड ‘पछ-पछ’ करता अंदर-बाहर हो रहा था। थोड़ी देर बाद माँ की गाण्ड से लौड़ा निकाल लिया, कंडोम निकालकर साइड में रख दी और डागी स्टाइल में माँ पर चढ़कर चूत में एक ही शाट में पूरा लण्ड पेल दिया। मैं माँ को बेतहाशा चोदने लगा।

राधा गाण्ड पीछे ठेल-ठेलकर चुदवा रही थी। थोड़ी देर में मानो मेरे लण्ड पर अपनी गाण्ड पटकने लगी। तभी मेरे लण्ड से वीर्य का फव्वारा माँ की चूत में छूट पड़ा। उधर माँ भी जोर-जोर से हाँफने लगी। कुछ देर बाद हम दोनों शिथिल पड़ गये।

मैंने माँ को अपने आगोश में भर रखा था और माँ बिल्कुल मेरे से चिपकी मेरे साथ बिस्तर पर पड़ी थी। मैंने माँ से कहा- “माँ कल तो मुन्ना भी वापस आ जाएगा। खेतों की बिकवाली का सारा काम मुन्ना ने कर दिया है और रूपये तुम्हारे बैंक अकाउंट में डाल दिए हैं। कल शाम तक वो यहाँ पहुँच जाएगा...”

राधा- “देख तू बहुत चालू और खुले स्वाभाव का है। मुन्ना के जाते ही तूने अपनी माँ को अपनी बीवी बना लिया है, और उसके सब छेदों का मजा ले लिया है। पर मेरा अजय बेटा बहुत सीधा साधा है। ध्यान रखना की उसके सामने कोई ऐसी हरकत मत कर देना की बात बिगड़ जाए."

विजय- “माँ, तुम्हें बताया तो था की अब मुन्ना पहले जैसा भोला नहीं रहा। तेरे दोनों बेटे ठीक तेरे पर गये हैं,तेरे जैसे ही मौज मस्ती के, पहनने के, खाने पीने के, घूमने फिरने के शौकीन। मैं खुलकर करता हूँ तो वो थोड़ा झिझक कर। अपने भैया की हर खुशी के लिए मेरा मुन्ना पूरा तैयार रहता है। तुम उसकी बिल्कुल चिंता मत करो। उसका भी मैं कोई ना कोई रास्ता निकाल लँगा...”

थोड़ी देर बाद कल की तरह माँ अपना गाउन उठाकर अपने रूम में चली गई। दूसरे दिन मेरे स्टोर जाते समय माँ बिल्कुल सामान्य थी।

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
शाम 8:00 बजे जब मैं स्टोर से घर पहुँचा तो माँ ने दरवाजा खोला। मैं अंदर आया तो देखा की अजय सोफे पर बैठा था। अजय नहा धोकर बिल्कुल फ्रेश होकर शार्टस पहनकर बैठा हुआ था, इसका मतलब उसे आए देर हो। गई थी। मैं भी अपने रूम में चला गया और फ्रेश होकर, नाइट ड्रेस पहनकर बाहर आ गया। अजय और माँ 3 प्लेटों में खाना लगाकर डाइनिंग टेबल पर बैठे मेरा इंतजार कर रहे थे। खाने के दौरान अजय से गाँव की बातें छिड़ गई। माँ गाँव में एक-एक का हाल पूछ रही थी और अजय सारी बातें बताता जा रहा था।

खाना खतम करके हम तीनों मेरे रूम में आ गये। वहाँ भी हम तीनों बेड पर बैठकर गाँव की ही बातें करते रहे। अजय ने बताया की चाचाजी जल्द ही हमारे घर का भी कोई अच्छा ग्राहक खोज देंगे।

तभी मैंने अजय को छेड़ा- “मुन्ना तूने तो गाँव में पूरी मस्ती की होगी। और तुम्हारे पुराने यार दोस्तों का क्या हाल है? खेत वेत में उनके साथ गये की नहीं गये? वहाँ सक्करकंदों की तो कमी नहीं, खूब आते होंगे...”

अजय ने मेरी ओर देखकर आँखें तरेरी और मेरा हाथ दबा दिया, और कहा- “भैया मेरा तो वहाँ गाँव और कचहरी के बीच चक्कर काटते-काटते टाइम बीत गया। पर लगता है आपने यहाँ पूरी मस्ती की है। आपने तो एक सप्ताह में माँ को ही पूरा बदल दिया है। माँ को ऐसी क्या घुट्टी पिला दी की माँ पूरी जवान हो गई है...”

अजय की बात सुनकर माँ ने थोड़ी आँखें झुका ली। तभी मैंने पास में अधलेटे अजय की गाण्ड अपनी एक अंगुली से खोद दी।

तभी माँ ने अजय को कहा- “तुम दिन भर ट्रेन से चलकर आया है इसलिए आराम कर ले..." और खुद उठकर अपने कमरे में चली गई।

माँ के जाते ही अजय ने उठकर कमरे का दरवाजा बंद कर लिया, और कहा- “भैया मेरे गाँव जाते ही आपको यह चिंता सताने लगी की मैं गाँव जाते ही सारे काम भूलकर अपने दोनों दोस्तों के पास मरवाने ना भाग जाऊँ। जैसे बहुत सुंदर पत्नी के पति को हरदम यह चिंता सताए रहती है की मेरी गैरहाजिरी में यह किसी दूसरे के साथ मुँह काला ना कर ले, वैसे ही आपको यह चिंता खा रही थी? पर भैया चिंता मत करो जैसे माँ ने पूरा पतिव्रत धर्म निभाया है वैसे ही आपका भाई भी भ्रातृ धर्म निभा रहा है...”

विजय- “मुन्ना, भ्रातृ धर्म नहीं बल्कि पतिव्रत धर्म कहो। बताओ क्या तुम मेरी लुगाई नहीं हो?” यह कहकर मैं बेड से खड़ा हो गया और अजय को बाँहों में भरकर उसके होंठ चूसने लगा। मैंने दोनों हाथ उसके औरतों जैसे भारी चूतड़ों पर रख दिए और उन्हें मुट्ठी में कसकर दबाने लगा। फिर मैं सोफे पर बैठ गया और अपने प्यारे मुन्ना को अपनी गोद में बैठा लिया। मेरा लण्ड बँटे की तरह तना हुआ था जो भाई की गुदाज गाण्ड में चुभ रहा था।

अजय- "नीचे आपका लोहे का डंडा पूरा गरम है, उसपर बैठकर ही मुझे तो बहुत मजा आ रहा है। चाचाजी और चाचीजी ने तो इतना कहा था की सप्ताह 10 दिन गाँव में ही ठहर जाओ, पर मैं तो काम खतम होते ही आपके इंडे की गर्मी लेने भागा-भागा चला आया। भैया आपसे मस्ती लेने के बाद मैंने तो किसी दूसरे की तरफ झाँकने की भी नहीं सोची। पर भैया आपने तो मेरे जाते ही माँ को मेरी भाभी जैसा बना दिया। माँ का पूरा कायाकल्प हो गया है, जैसे स्वर्ग से अप्सरा उतर आई हो। भैया जैसे मेरे को अपनी लुगाई बना लिया कहीं माँ को भी सचमुच में मेरी भाभी तो नहीं बना दिया? आप बड़े चालू हो। मेरे जाने के बाद तो आपको पूरा मौका मिला था। इस बीच आपने अपने लण्ड का स्वाद माँ को भी चखा दिया होगा...”

 
विजय- “मुझे तो शुरू से ही माँ जैसी बड़ी उमर की भरी पूरी खेली खाई औरतें पसंद है। आज की डाइटिंग करने वाली दुबली पतली लड़कियां क्या मेरा 11' का लौड़ा चुपचाप झेल पाएंगी? भीतर डालते ही साली चिल्लाना शुरू कर देंगी। उनकी हाय तौबा सुनकर ही आधी मस्ती तो हवा हो जाएगी। वहीं माँ जैसी प्यासी औरतें तड़प-तड़प कर बोल-बोलकर चुदवाती हैं, जैसे तुम मस्त होकर गाण्ड मरवाते हो। मुन्ना अपनी माँ बहुत तगड़ा माल है, हम दोनों भाइयों की तरह लंबे बदन की और मस्ती लेने की पूरी शौकीन है। मैं माँ जैसी मस्त औरत की झांटों से। भरी चूत का तो रसिया हूँ ही, पर तेरी गाण्ड का स्वाद मिलने के बाद फूली-फूली गुदाज गाण्ड का भी शौकीन बन गया हूँ। तूने अपनी माँ की गाण्ड देखी, साली क्या अपनी मस्त गाण्ड को मटकाती हुई घर में इधर से उधर फुदकती रहती है। बता ऐसी मस्त गाण्ड को देखकर मेरे जैसे लौंडेबाज का लौड़ा खड़ा नहीं होगा? क्या मेरी इच्छा नहीं होगी की इसे यहीं पटक हूँ और इसकी गाण्ड उघाड़ी करके इस पर सांड़ की तरह चढ़ जाऊँ..”

मैं अजय के सामने माँ के बारे में बहुत ही कामुक बातें करके उसके मन में भी माँ के प्रति काम जगाना चाहता था। मेरी गोद में बैठकर और ऐसी खुली बातें सुनकर अजय का लण्ड भी पूरा तन गया था। मैंने अजय का शार्टस अंडरवेर सहित उसकी टाँगों से निकाल दिया। अजय का प्यारा लण्ड पूरा तनकर खड़ा था। गुलाबी सुपाड़ा पूरा चमड़ी से बाहर आकर चमक रहा था। जितना प्यार मुझे अजय की गाण्ड से था उतना ही प्यार मुझे उसके लण्ड से भी था। मैंने उसके लण्ड को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया और हल्के-हल्के दबाने लगा।

विजय- “देख माँ के बारे में ऐसी बातें सुनकर ही तेरा कैसे खड़ा हो गया है? अरे अपनी माँ राधा रानी चीज ही ऐसी है की हर कोई उसे चोदना चाहे, उसकी गाण्ड मारना चाहे। भाई मैं तो जैसे तेरा दीवाना हूँ वैसे ही अपनी माँ का भी पूरा दीवाना हूँ। तू बता यदि तेरे को माँ की चूत चोदने को मिल जाय तो तू क्या उसे चोद देगा? माँ जैसी मस्त औरत की चूत और गाण्ड बड़े भाग्यशाली को ही मस्ती करने के लिए मिलती है। हम दोनों तो बड़े खुशनशीब हैं की कम से कम वो हरदम हमारी नजरों के सामने तो है। देखना मैं जल्द ही कोई ऐसा रास्ता निकाल लँगा की हम दोनों भाई एक साथ उसकी मस्त जवानी का मजा लूटेंगे।

मैं उसकी चूत में पेलूंगा तो तुम उसकी गाण्ड मारना, उसके मुँह में अपना पूरा लण्ड डालकर उसे खूब चुसवाना। एक बार माँ तैयार हो जाएगी तो हम दोनों भाइयों को खूब मस्ती करवाएगी। मुन्ना तुझसे एक बात मैं अपने दिल की कहता हूँ की अपनी माँ खूब कड़क माल है। तूने देखा माँ के सेक्सी अंग क्या मस्त हैं? गुलाब की पंखुड़ी से रसभरे होंठ की उन्हें चूसने से जी ना भरे, फूले-फूले चिकने गाल की मुँह में लेकर उन्हें चुभलाते रहो, क्या बड़ी-बड़ी गोल-गोल और बिल्कुल शेप में चूचियां की दबाते-दबाते हाथ ना थकें, पतली कमर, चौड़ी-चौड़ी चिकनी जांघे और माँ की मस्त गाण्ड देखी पीछे कितनी उभरी हुई है और बिल्कुल तरबूज जैसे दो चूतड़। और एक बात तुझे और बताता हूँ, जब । उसकी बाकी चीजें इतनी मस्त है तो उसकी दोनों टाँगों के बीच छुपा हुआ खजाना कितना मस्त होगा?

दूसरी ओर पापा दुबले पतले से सूखे हुए थे और बीमार ही रहते थे, और माँ के सामने तो बिल्ली के सामने चूहे जैसे दिखते थे। मैं सोचता रहता हूँ की माँ जैसी कड़क और मस्त औरत को वो संतुष्ट भी कर पाते थे या बीच में ही पहुँचाकर खुद कुल्ला कर पीछे हट जाते थे। अब माँ को जो मजा पापा नहीं दे सके वही मजा माँ को हम दो भाई मिलकर दें तो कैसा रहेगा?

मुन्ना- “भैया आप बहुत गंदे तो हो ही, साथ ही पूरे बदमाश और बेशर्म भी हो। भला कोई अपनी माँ को इस नजरिए से देखता है? आपने तो मुझे अपनी जोरू बना ही लिया। जैसे लोग अपनी लुगाई के साथ करते हैं वैसे ही आप अपनी इस बिना व्याही जोरू के साथ करते हो। क्या मेरी गाण्ड से आपका मन नहीं भरा जो माँ को चोदना चाहते हैं और उसकी गाण्ड मारना चाहते हैं..."

 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
मुन्ना- “भैया आप बहुत गंदे तो हो ही, साथ ही पूरे बदमाश और बेशर्म भी हो। भला कोई अपनी माँ को इस नजरिए से देखता है? आपने तो मुझे अपनी जोरू बना ही लिया। जैसे लोग अपनी लुगाई के साथ करते हैं वैसे ही आप अपनी इस बिना व्याही जोरू के साथ करते हो। क्या मेरी गाण्ड से आपका मन नहीं भरा जो माँ को चोदना चाहते हैं और उसकी गाण्ड मारना चाहते हैं..."

विजय- “अरे तुम तो मेरी इतनी प्यारी लुगाई हो, जिसे मैं दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ। तुमसे मैं। अपना कुछ भी छिपाकर नहीं रखेंगा, जो तेरे साथ करूंगा सब बताकर करूंगा और खूब प्यार से करूंगा। मैं तो तुमसे पूरा खुल गया हूँ इसलिए मन में कुछ भी ना छिपाकर तुझसे दिल की बात कर रहा हूँ। मैं जिससे प्यार करता हूँ उससे कुछ नहीं छिपाता और सच्चे प्यार में कुछ छिपाया भी नहीं जाता। जानता है तेरी गाण्ड पर मेरा दिल क्यों आया हुआ था? दर्शल मुझे माँ की उभरी हुई फूली-फूली गाण्ड बहुत प्यारी लगती थी। हाल में जब मैं सोफे पर बैठा होता था और वो अपनी भारी-भरकम गाण्ड मटका-मटकाकर इधर से उधर फुदकती रहती थी तब अक्सर मेरा दिल करता रहता था की इसे यहीं कार्पेट पर पटक-पटक कर और ससड़ी कमर तक ऊँची उठाकर इस पर पीछे से चढ़ जाऊँ और अपना 11" लंबा और 4” मोटा हलब्बी लौड़ा एक ही बार में इसकी गाण्ड में जड़ तक उतार दूं। तुम्हारी गाण्ड भी माँ की गाण्ड जैसी बहुत मस्त है। अब मुझे माँ की गाण्ड तो मिलने वाली नहीं थी, पर जब मुझे पता चला की तू अपनी गाण्ड का मजा लेने का शौकीन है तो मैंने फौरन मन में ठान लिया की अपने प्यारे कमसिन मुन्ने को क्यों ना अपना लौंडा बना लिया जाय? अच्छा मुन्ना तुम तो गाँव में इतने वर्षों से हो, तूने तो वहाँ कई लड़कियां चोदी होंगी? खाली लोगों को अपनी गाण्ड देकर ही मजा लेते हो या किसी लड़की या औरत की ली भी है?”

अजय- “भैया मुझे तो लड़कियों और औरतों से बात करने में और उनकी ओर आँख उठाकर देखने में ही शर्म

आती है, उन्हें चोदना तो बहुत दूर की बात है। मैंने इस रूप में आज तक किसी भी औरत की कल्पना तक नहीं की है...”

विजय- “तो क्या तूने आज तक किसी जवान औरत की चूत भी नहीं देखी? पर तू माँ के साथ तो हमेशा रहता था। माँ की चूत तो तूने किसी भी तरह जरूर देखी होगी? माँ के सोते समय, नहाते समय कभी तो मौका मिला होगा। बता ना अपनी प्यारी राधा देवी की मस्तानी चूत कैसी दिखती है?”

अजय- “हाँ भैया, कई बार देखी पर ठीक से नहीं देखी। माँ खेत में बैठकर मूतती थी तब एक बार यूँ ही नजर पड़ गई। इसके बाद जब भी माँ मूतने बैठती मैं छुप जाता और माँ को मूतते हुए देखने लगा। दूर से माँ की दोनों जांघों के बीच काले-काले बालों का बड़ा सा झुरमुट भर दिखता था और उसके बीच से छूर की आवाज से मूत की धार निकलती हुई दिखती थी। भैया माँ का मूतने का वो दृश्य बहुत ही गजब का होता था। माँ का मूत बहुत वेग से निकलता था...”

विजय- “मुन्ना तेरी यह बात सुनकर तो मेरा मन मस्ती से भर गया है, लण्ड अकड़ने लगा। मैं कामवासना से जलने लगा हूँ। जी तो करता है की माँ के उस बहते झरने के आगे मुँह खोल दें और उस मस्तानी धार को। गटागट पी जाऊँ। क्या माँ की वो झांटदार चूत देखकर तेरा लण्ड खड़ा नहीं होता था?”

अजय- “होता था भैया। तभी तो जब भी मौका मिलता था मैं जरूर देखता था। मैं इतना मस्त हो जाता था की मेरे पाँव आपने आप किसी ऐसे दोस्त की तलाश में मुड़ जाते थे जिसके साथ मस्ती कर सकें..."

 
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