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मैं शंकर कुमार झा … आपसे मुखातिब हूँ. यह बात कुछ 6 महीने पहले की है. हमारी गौशाला से सटे मकान में कोलकाता से एक बंगाली परिवार रहने को आया था. पति पत्नी और उनका एक बेटा (नितेश उम्र 18-19). उनके बेटे का दाखिला जमशेदपुर के एनआईटी कॉलेज के बी.टेक. में हुआ है और वो हॉस्टल में ही रहता है. पति का नाम रमेश, उम्र 48 की है. वो एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते हैं और ज्यादातर घर से बाहर ही होते हैं. उनकी पत्नी, कौशल्या, उम्र 45 साल, हॉउस वाइफ के साथ एक एलआईसी एजेंट भी है. वो बहुत हँसमुख और मिलनसार महिला है. उसका रंग गोरा है, लगभग 5 फ़ीट 5 इंच की ऊंचाई. उभरे हुए सुडौल स्तन, मस्त ठुमकते हुए नितम्ब, कमसिन चिकनी कमर, रसीले होंठ.. वो एक भरी पूरी औरत है. उसे देख कर मानो बदन में बिजली सी दौड़ जाती है. मन करने लगता है कि उसे बांहों में लेकर खूब प्यार करूँ.. प्यार करूँ से मतलब, उसकी जमके लूँ.
पड़ोसी होने की वजह से वो अक्सर हमारे घर आया करती थी और मेरी बहू से भी उसकी अच्छी खासी मित्रता हो गयी थी. वे दोनों टीवी देखना, बाजार जाना साथ ही करने लगी थीं.
मैं हमेशा की तरह स्कूल से छुट्टी के बाद गौशाला की देख रेख करता हूँ और रात को खाना खा कर हो सके, तो गौशाला में बने कमरे में ही सो जाता हूँ. मुझे चाय पीने की बहुत आदत है और कौशल्या मेरी पड़ोसन काफी अच्छा चाय बनाती है मैं हमेशा चाय के बहाने उसका रूप निहारने उसके घर चला जाता था. उसे भी चाय पीते वक्त मुझे कंपनी देना अच्छा लगता था. हम काफी बातें करते थे, वो मुझसे काफी घुल मिल गयी थी. शनिवार के दिन हमारे स्कूल की छुट्टी जल्दी हो जाती है.
एक दिन स्कूल से निकलने के बाद घर आया, तो देखा कि कौशल्या हमारे घर में अकेली थी.
“क्या बात है कौशल्या जी, आप अकेली हैं.. क्या ऑफिस की छुट्टी है आपकी? और मेरी बहू रानी कहां गयी?”
“जी.. आज मेरी छुट्टी है, आपके बेटे और बहू बच्चे को लेकर डॉक्टर के पास रूटीन चेकअप के लिए गए हैं. आपकी बहू ने कहा था कि आप स्कूल से जल्दी आ जाएंगे, सो उसने मुझसे थोड़ा घर का ध्यान रख लेने को कहा है. आप फ्रेश हो जाइए, मैं आपके लिए खाना परोस दूंगी.
“अरे नहीं नहीं.. आप क्यों तकलीफ करती हो.. मैं खुद ले लूंगा.”
“कोई परेशानी नहीं है, आप फ्रेश होके आइए, मैं खाना गर्म करती हूँ, वरना फिर कभी चाय नहीं पिलाऊंगी.”
“ठीक है जी.. लेकिन आप अपने लिए भी निकाल लो, दोनों साथ ही खा लेंगे.”
खाना परोसने के दौरान मेरा सारा ध्यान कौशल्या की बड़े बड़े रसीले स्तनों पर ही था. वो भी खुले मिजाज की महिला मानो जानबूझ कर अपने जिस्म का मुजाहिरा कर रही थी. जैसे रूप की धनी कुछ छींटों की बरसात कर रही हो.
अब करें क्या … बस फिलहाल देख कर ही थोड़ी आंख सेंक लो, पर मन ने तो खजाना लूटने की तय कर ली थी. इस औरत की कुछ बात ही अलग थी, इसे देख कर ही उत्तेजना चरम सीमा पर आ जाती है. सारा ज्ञानपीठ, समझ बूझ, आत्मसंयम सब दरकिनार हो जाता है और मैं वासना की भूख में डूब जाता हूँ. हो भी क्यों ना.. 8 वर्षों से मैंने किसी स्त्री को आंख उठा कर नहीं देखा था, लेकिन कौशल्या की मिलनसारिता और हँसमुख मिजाज ने मुझसे बातें करना सिखा दिया था. उसका ये व्यवहार मुझे उसके कुछ ज्यादा करीब ले गया था.
अब मैं मन ही मन बस कौशल्या के बारे में सोचने लगा था. उसके बारे में सोच कर रोज दो बार बाथरूम में हस्तमैथुन करता था. मन बड़ा असंतुष्ट रहता था. अब मुझे अकेलेपन का अहसास होने लगा था. मेरे अन्दर का उत्तेजित जानवर, बस कौशल्या पर टूट पड़ना चाहता था. पर करें क्या.. वो किसी और की धर्मपत्नी है और मैं एक विधुर हूँ.
पड़ोसी होने की वजह से वो अक्सर हमारे घर आया करती थी और मेरी बहू से भी उसकी अच्छी खासी मित्रता हो गयी थी. वे दोनों टीवी देखना, बाजार जाना साथ ही करने लगी थीं.
मैं हमेशा की तरह स्कूल से छुट्टी के बाद गौशाला की देख रेख करता हूँ और रात को खाना खा कर हो सके, तो गौशाला में बने कमरे में ही सो जाता हूँ. मुझे चाय पीने की बहुत आदत है और कौशल्या मेरी पड़ोसन काफी अच्छा चाय बनाती है मैं हमेशा चाय के बहाने उसका रूप निहारने उसके घर चला जाता था. उसे भी चाय पीते वक्त मुझे कंपनी देना अच्छा लगता था. हम काफी बातें करते थे, वो मुझसे काफी घुल मिल गयी थी. शनिवार के दिन हमारे स्कूल की छुट्टी जल्दी हो जाती है.
एक दिन स्कूल से निकलने के बाद घर आया, तो देखा कि कौशल्या हमारे घर में अकेली थी.
“क्या बात है कौशल्या जी, आप अकेली हैं.. क्या ऑफिस की छुट्टी है आपकी? और मेरी बहू रानी कहां गयी?”
“जी.. आज मेरी छुट्टी है, आपके बेटे और बहू बच्चे को लेकर डॉक्टर के पास रूटीन चेकअप के लिए गए हैं. आपकी बहू ने कहा था कि आप स्कूल से जल्दी आ जाएंगे, सो उसने मुझसे थोड़ा घर का ध्यान रख लेने को कहा है. आप फ्रेश हो जाइए, मैं आपके लिए खाना परोस दूंगी.
“अरे नहीं नहीं.. आप क्यों तकलीफ करती हो.. मैं खुद ले लूंगा.”
“कोई परेशानी नहीं है, आप फ्रेश होके आइए, मैं खाना गर्म करती हूँ, वरना फिर कभी चाय नहीं पिलाऊंगी.”
“ठीक है जी.. लेकिन आप अपने लिए भी निकाल लो, दोनों साथ ही खा लेंगे.”
खाना परोसने के दौरान मेरा सारा ध्यान कौशल्या की बड़े बड़े रसीले स्तनों पर ही था. वो भी खुले मिजाज की महिला मानो जानबूझ कर अपने जिस्म का मुजाहिरा कर रही थी. जैसे रूप की धनी कुछ छींटों की बरसात कर रही हो.
अब करें क्या … बस फिलहाल देख कर ही थोड़ी आंख सेंक लो, पर मन ने तो खजाना लूटने की तय कर ली थी. इस औरत की कुछ बात ही अलग थी, इसे देख कर ही उत्तेजना चरम सीमा पर आ जाती है. सारा ज्ञानपीठ, समझ बूझ, आत्मसंयम सब दरकिनार हो जाता है और मैं वासना की भूख में डूब जाता हूँ. हो भी क्यों ना.. 8 वर्षों से मैंने किसी स्त्री को आंख उठा कर नहीं देखा था, लेकिन कौशल्या की मिलनसारिता और हँसमुख मिजाज ने मुझसे बातें करना सिखा दिया था. उसका ये व्यवहार मुझे उसके कुछ ज्यादा करीब ले गया था.
अब मैं मन ही मन बस कौशल्या के बारे में सोचने लगा था. उसके बारे में सोच कर रोज दो बार बाथरूम में हस्तमैथुन करता था. मन बड़ा असंतुष्ट रहता था. अब मुझे अकेलेपन का अहसास होने लगा था. मेरे अन्दर का उत्तेजित जानवर, बस कौशल्या पर टूट पड़ना चाहता था. पर करें क्या.. वो किसी और की धर्मपत्नी है और मैं एक विधुर हूँ.