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चुदासी माँ और गान्डू भाई

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रोज की तरह आज रात भी खाने खाने के बाद मैं, अजय और माँ तीनों टीवी के सामने आ बैठ गये।

विजय- "माँ, आज गाँव से चाचाजी का फोन आया था, कह रहे थे की हमारे खेत गाँव का सरपंच खरीदना चाह रहा है। 20 लाख में उससे बात हुई है। मैंने चाचाजी से कह दिया है की यहाँ से अजय सारे कागजात और पावर आफ अटार्नी लेकर गाँव आ जाएगा और रिजिस्ट्री का काम कर देगा। तो मुन्ना कल वकील से कागजात तैयार करा लेते हैं और कागज तैयार होते ही तुम गाँव के लिए निकल जाओ। कम से कम आधे पैसे तो खड़े करो।

क्यों माँ मुन्ना ही ठीक रहेगा ना?”

राधा- “हाँ, फिर वहाँ चाचाजी हैं, कोई फिकर की बात नहीं है। अजय कभी शहर में तो रहा नहीं है। यहाँ दो महीने हो गये उसे गाँव की याद आती होगी..."

विजय- “तभी तो मुन्ना को भेज रहा हूँ। वहाँ इसके खास दोस्त हैं। माँ यह वहाँ बहुत मस्ती करता था। यह अपने दो दोस्तों को तो बहुत ही खाश बता रहा था। कहता था की इसके दोनों दोस्त खेतों में पहले तो अच्छी तरह से सक्करकंदा सेंकते थे फिर इसे खिला-खिला के मजा देते थे। क्यों मुन्ना कभी माँ को भी सक्करकंदा खिलाते थे या सक्करकंदों का सारा मजा अकेले ही ले लेते थे। अब यहाँ शहर में तो इसे गाँव जैसे सक्करकंदा कहाँ मिलेंगे...”

अजय- “भैया नहीं जाना मुझे और ना ही सक्करकंदा खाने। मुझे तो यहाँ के बड़े-बड़े केले अच्छे लगते हैं। मैं तो यहीं स्टोर में रोज नये दोस्तों से केले लेकर खाया करूंगा। सक्करकंदे का इतना ही शौक है तो गाँव आप चले जाओ...” अजय ने मेरी ओर देखकर मुश्कुराते हुए कहा।

विजय- “भैया के रहते तुझे दोस्तों से केले लेकर खाने की क्या जरूरत है? भैया क्या तेरे लिए केलों की कभी भी

कमी रखेगा। तुझे दिन में और रात में जितने केले खाने हैं, मैं खिलाऊँगा। अभी तो तुम गाँव जाओ और वहाँ खेतों में मजा लो। तूने तो माँ को कभी सक्करकंदा खिलाए नहीं, पर मैं माँ के लिए केलों की कमी नहीं रबँगा...” हम इसी तरह काफी देर बातों का मजा लेते रहे। फिर माँ अपने कमरे में चली गई तो हम दोनों भाई अपने कमरे में आ गये। मैं अपने कमरे में आदमकद शीशा लगी ड्रेसिंग टेबल के सामने सिंगल सीटर सोफे पर बैठ गया।

 
अजय- “भैया आप बड़े वो हो। माँ के सामने ऐसी बातें करने की क्या जरूरत थी? कल मैंने कहा तो था की मुझे उन सब कामों की लिए अब किसी भी दोस्त की जरूरत नहीं है। जब आप जैसा बड़ा भैया मौजूद है तो मुझे नहीं जाना किसी दोस्त के पास। अब से मैं तो अपने सैंया भैया का मूसल ही अपनी गाण्ड में ठुकवाऊँगा.."

विजय- “अरे अजय तू कौन से उन सब कामों की बात कर रहा है, मैं कुछ समझा नहीं...” मैंने अजय का हाथ पकड़कर उसे खींचकर अपनी गोद में बैठा लिया और बहुत प्यार से पूछा।

अजय- “वही जो कल आपने अपने छोटे भाई के साथ किया था। शुरू में तो कल आपने जान ही निकाल दी थी ओर अब पूछ रहे हैं की कौन सा काम?”

विजय- “अरे भाई कुछ बताओ भी तो की मैंने तेरे साथ ऐसा कल क्या कर दिया था? कहीं कुछ गलत सलत हो

गया तो बड़ा भाई समझकर माफ कर दे...”

अजय- “कल आपने अपना केला मेरे में दिया तो था। 11' का सिंगापुरी केला छोटे भाई के पीछे में देते समय दया नहीं आई और अब माफी माँग रहे हैं। अभी भी गोद में बैठाकर अपना केला खड़ा करके नीचे गाण्ड में धंसा रहे हैं...”

विजय- “मुन्ना बताओ ना कल मैंने अपनी कौन सी चीज तेरी किस में दी थी?"

अजय- “भैया आप मुझे अपने जैसा बेशर्म बनाना चाहते हैं। आपने अपना लण्ड मेरी गाण्ड में दिया था। आप मेरे ऊपर सांड़ की तरह चढ़ गये थे और मेरी गाण्ड हुमच-हुमच कर मारी थी। जाइए मैं आपसे और ऐसी बातें नहीं करूंगा...”

विजय- “अरे तू मेरा प्यारा भाई तो है ही पर अब से तू मेरा गाण्ड दोस्त भी बन गया। जब हम आपस में गाण्ड मारा मारी का खेल खेलने लग गये तो हम दोनों एक दूसरे के गाण्ड दोस्त हो गये। जब तुझे अपनी गाण्ड मराने में शर्म नहीं है तो लण्ड, गाण्ड, मारना, चूसना इन सबकी खुलकर बातें करने का मजा ही ओर है...”

अजय- ठीक है भैया।।

विजय- “चल मुन्ना उठ, अपनी पैंट खोल...”

अजय- “किसलिए भैया?”

विजय- “तेरे जैसे मस्ताने लौंडे से जब मेरा जैसा पक्का लौंडेबाज पैंट खोलने के लिए कहता है तो तू मतलब

समझ...”

अजय- “भैया मुझे आज नहीं मरानी..."

विजय- "देखा, समझ आ गई ना। पर मराएगा नहीं तो क्या अपनी माँ चुदाएगा?”

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
अजय- “आप माँ को बार-बार बीच में लाते हैं। आप माँ के सामने भी कह रहे थे की मेरे दोस्त माँ को भी । सक्करकंदा खिलाते थे या नहीं? उन दोनों की क्या मजाल की मेरी माँ की तरफ आँख उठाकर भी देख लेते? सालों के काट के हाथ में पकड़ा देता। भैया आपकी भी हद हो गई। माँ को कह दिया की उसके लिए केलों की कमी नहीं रखेंगे। भला माँ क्या सोचेगी? अच्छा बताइए, क्या आप अपने नीचे वाला केला माँ को भी खिला देंगे?"

विजय- “अरे तू नहीं जानता, माँ जैसी जवान, शौकीन और मस्त औरत की पीड़ा। पिताजी ने पिछले 15 साल से बिस्तर पकड़ रखा था। वो अपने खुद के काम खुद नहीं कर सकते थे। तो माँ को चोदना तो दूर उसे वो शायद हाथ भी ना लगाते हों। और अपनी माँ जैसी स्वाभिमानी और मान मर्यादा का खयाल रखने वाली औरत से यह उम्मीद थोड़े ही की जा सकती है की उसने गाँव में यार पाल रखे हों। कहने का मतलब पिछले 15 साल से । उसकी चूत अनचुदी है, वो चुदासी है, उसे लण्ड की जरूरत है। भाई माँ की मस्त गदराई चूत और फूली गाण्ड की सेवा के लिए मेरा लौड़ा तो हमेशा तैयार है। अरे बाबा ना ना। मैंने भी किसके सामने यह बात कह दी। तू कहीं मेरा भी काट के मेरे हाथ में ना पकड़ा दे..” ।

अजय- “मेरे हाथों आप वाले की काटने की बात। भैया सुनकर ही मेरे शरीर में तो झुरझुरी सी दौड़ गई। आप वाले गुड्डे को तो मैं अपनी तिजोरी में बंद करके ताला लगा दूंगा...”

विजय- “अब पैंट भी खोलो ना, अपनी तिजोरी के मुँह का तो दर्शन करवा। माँ को चोदने की बात करके लण्ड मूसल सा खड़ा हो गया है। अपनी मस्त माँ को चोदने की बात करके यह हाल है तो उसको पूरी नंगी करके चोदते समय क्या होगा?”

अजय खड़ा हो गया और उसने अपनी पैंट और शर्ट उतार दी। अब वो ब्रीफ और बनियान में था। कहा- “भैया कल आपने मेरा चूस के जो मजा दिया था, उस मजा को तो मैं बता नहीं सकता। वैसा मजा मुझे कल से पहले जिंदगी में कभी नहीं मिला। लण्ड चुसवाने में इतना मजा है मुझे पता ही नहीं था। मैं तो सातवें आसमान की सैर कर रहा था। भैया आज मैं भी आपका चूसूंगा और आपको भी वो मजा दूंगा जो मजा कल आपने मुझे दिया था...”

मैंने ब्रीफ के ऊपर से अजय की उभरी गाण्ड अपनी मुट्ठी में कस ली और जोर-जोर से दबाने लगा- “तो तू मेरा लण्ड चूसेगा? कल तो तू बार-बार मुझे मना कर रहा था। तुझे पेशाब करने वाली चीज से घिन नहीं आएगी?”

अजय- “भैया, अब तो आप मेरे मुँह में धार भी मार देंगे तो घिन नहीं आएगी। भैया जितना प्यार मुझे आपसे है। उतना ही प्यार आपके लण्ड से है। मैं आपका गुलाम हूँ, आपके लण्ड का सेवक हूँ, आपकी हर बात मानना ही मेरा सबसे बड़ा धर्म है...”

 
विजय- “अरे मुन्ना आज तो तू बड़ी सयानी-सयानी बातें कर रहा है। एक ही दिन में तू बड़ा हो गया रे। जैसे कुँवारी लड़की एक बार चुदवाते ही पूरी सयानी हो जाती है वैसे ही भैया से एक बार गाण्ड मरवाते ही तू तो पूरा सयाना हो गया। इसका मतलब उन दोनों चूतियों ने तेरी ऊपर-ऊपर से मारी थी। वास्तव में तो तेरी गाण्ड कुँवारी ही थी, इसकी सील तो कल मैंने ही तोड़ी है। तो तू भैया का चूसेगा? तू भी क्या याद रखेगा? कल जितने प्यार से तेरी मारी थी आज उतने ही प्यार से तुझे चुसवाऊँगा..” यह कहकर मैंने अपना नाइट पायजामा, ब्रीफ और गंजी सारे कपड़े उतार दिए। मैंने दोनों टाँगें सोफे के हैंडल पर रख ली और सामने शीशे में बँटे सा सिर उठाए मेरे लण्ड का प्रतिबिंब मुझे गौरवान्वित कर रहा था।

अजय ब्रीफ और बनियान में खड़ा मेरे लण्ड को निहार रहा था। तभी मैं उठा और अजय के पीछे खड़ा हो गया। मेरा बिल्कुल सीधा खड़ा लण्ड उसकी गाण्ड की दरार में धंस रहा था। मैंने अजय की बनियान खोल दी और ठुड्डी से पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठा लिया और उसके चेहरे पर झुक गया। मुन्ना के मंद-मंद मुश्कुराते होंठों को अपने होंठों में कस लिया और अत्यंत कामतुर होकर उसके होंठ चूसने लगा। प्यारे भाई का लंबा सा चुंबन लेने के बाद मैं अजय के आगे घुटनों के बल बैठ गया और उसका ब्रीफ भी खोल दिया। अजय का लण्ड बिल्कुल खड़ा था। कुछ देर मैं उसकी गोटियों को दबाता रहा और उनसे खेलता रहा। दो-तीन बार लण्ड को भी मुट्ठी में कसा। अब मैं वापस खड़ा हो गया और एक पाँव ड्रेसिंग टेबल पर रख दिया।

विजय- “ले मुन्ना, देख इसे और खूब प्यार कर। खूब प्यार से पूरा मुँह में लेकर चूसना। ऐसा मस्त लण्ड चूसेगा

तो पूरा मस्त हो जाएगा। जितना मजा चुसवाने वाले को आता है उतना ही मजा चूसने वाले को भी आता है। आजकल की फारवर्ड और मस्त तबीयत की औरतें तो चुदवाने से पहले मर्दो का पूरा मुँह में लेकर जी भर के चूसती है और जब पूरी मस्त हो जाती हैं, तब गाण्ड उछाल-उछाल के चुदवाती हैं."

मेरी बात सुनकर अजय ड्रेसिंग टेबल पर मेरे खड़े लण्ड के सामने बैठ गया, मेरा मस्ताना लण्ड उसके चेहरे पर लहरा रहा था। मैंने अपना लण्ड एक हाथ में ले लिया और अजय के चेहरे पर लण्ड को फिराने लगा। ड्रेसिंग टेबल के आदमकद आईने में दोनों भाई यह मनोरम दृश्य देख रहे थे की बड़ा भैया अपने कमसिन छोटे भाई को अपना मस्ताना लण्ड कैसे दिखा रहा है।

विजय- “क्यों मुन्ना मुँह में पानी आ रहा है क्या? ले चूस इसे देख भैया तुझे कितने प्यार से अपना लौड़ा चूसा रहे हैं?”

मेरी बात सुनकर अजय ने मेरे लण्ड का सुपाड़ा अपने मुँह में ले लिया। वो काफी देर मेरे सुपाड़े पर अपनी जीभ फिराता रहा।

तभी मैं और आगे सरक गया और अजय के सिर के पीछे अपने दोनों हाथ रखकर उसके सिर को मेरे लण्ड पर दबाता चला गया। मुन्ना जैसे-जैसे अपना मुँह खोलता गया वैसे ही मेरा लण्ड उसके मुँह में समाने लगा। मेरा लण्ड शायद उसके हलक तक उतर गया था। उसके मुँह में थोड़ी भी जगह शेष नहीं बची थी। लण्ड उसके मुँह में ठस गया और चूसने के लिए उसके मुँह में और जगह नहीं बची थी।

 
विजय- “तेरा तो पूरा मुँह मेरे इस लण्ड से भर गया। चल पलंग पर चल। वहाँ तुझे लिटाकर तेरा मुँह ठीक से पेलूंगा..” मेरी बात सुनकर अजय ने लण्ड मुँह से निकाल दिया और बेड पर चिट लेट गया। मैंने उसके मुँह के दोनों ओर अपने घुटने रखकर आसन जमा लिया और उसके खुले मुँह में लण्ड पेलने लगा।

अब मैं लण्ड बाहर-भीतर कर रहा था जिससे की लण्ड उसके थूक से तर होकर चिकना हो रहा था। जैसे-जैसे लण्ड थूक से तर होने लगा वो आसानी से मुँह के अंदर समाने लगा और लण्ड को बाहर-भीतर करके मुन्ना के मुँह को चोदने में भी सहूलियत होने लगी। इस आसन में मैं काफी देर अजय के मुँह को चोदता रहा।

फिर इसी आसान में मैं अचानक पलट गया जिससे की मेरी गाण्ड अजय के चेहरे के सामने हो गई और मेरा मुँह ठीक अजय के खड़े लण्ड के सामने आ गया। मैंने पूरा मुँह खोलकर गप्प से अजय के लण्ड को अपने मुँह में भर लिया। मैं पूरी मस्ती में था। मैं बहुत तेजी से अपना मुँह ऊपर-नीचे करते हुए अजय के लण्ड को चूसने लगा। मेरी इस हरकत से अजय भी पूरी मस्ती में आ गया और पूरे मनोयोग से मेरे लण्ड को चूसने लगा। हम दोनों पूरे जवान सगे भाई वासना में भरे एक दूसरे के तगड़े लण्ड चूसे जा रहे थे।

तभी मैं करवट के बल लेट गया और अजय की मस्तानी गाण्ड मुट्ठी में जकड़कर उसे भी करवट के बल कर। लिया। मैंने अजय का लण्ड जड़ तक अपने मुँह में लेकर उसे कस के अपने मुँह पर भींच लिया। मेरी देखा देखी अजय ने भी वैसा ही किया। हम 69 की पोजीशन का पूरा मजा ले रहे थे। एक दूसरे के लण्ड को अपने-अपने मुँहों में दबाए अपने जोड़ीदार को ज्यादा से ज्यादा मजा देने की कोशिश कर रहे थे। वासना के अतिरेक में मैंने अजय की गाण्ड में एक अंगुली पेल दी और उसे आपने मुँह पर जकड़ने लगा।

अजय भी उधर खूब तेजी से मेरे लण्ड को मुँह से बाहर-भीतर करता हुआ चूसे जा रहा था। उसने भी मेरे दोनों नितंब अपने हाथों में समा लिए थे और मेरे लण्ड को जड़ तक अपने मुँह में लेकर अपने नथुने मेरी झांटों से । भरे जंगल में गड़ा दिए। मेरी मर्दाना खुश्बू में मस्त होकर मेरा भाई मेरा लण्ड बड़े चाव से चूसे जा रहा था। अब मैं किसी भी समय छूट सकता था। मेरी साँसें तेज-तेज चलने लगी। मैंने अजय के लण्ड को अपने मुँह में कस लिया मानो की मैं उसके रस की एक-एक बूंद निचोड़ लेना चाहता हूँ। तभी मैंने अपनी दोनों टाँगों के बीच अजय के सिर को जकड़ लिया ताकी जब में झरझरा के झडू तब मेरा लण्ड किसी भी हालत में उसके मुँह से बाहर ना निकले।

तभी मेरे लण्ड से लावा बह निकला। मैं पूर्ण संतुष्ट होकर झड़ रहा था। रह-रहकर मेरे वीर्य की धार अजय के मुँह में गिर रही थी। अजय ने मेरे पूरे लण्ड को मुँह में ले रखा था और भाई के इस अनमोल मर्दाने रस को सीधे अपने हलक में उतार रहा था। तभी अजय ने भी गाढ़े वीर्य की पिचकारी मेरे मुँह में छोड़ दी। मैंने उसके लण्ड को मुँह में कस लिया और उसके वीर्य की एक-एक बूंद उसके लण्ड से निचोड़कर पीने लगा। उधर अजय भी मेरे वीर्य की एक भी बूंद व्यर्थ नहीं कर रहा था। हम दोनों भाई इसी मुद्रा में काफी देर पड़े रहे। अजय का लण्ड मेरे मुँह में शिथिल पड़ता जा रहा था साथ ही मेरा लण्ड भी मुरझाने लगा।

काफी देर बाद अजय उठा। उसने ब्रीफ और बनियान पहन ली और बेड पर निढाल होकर पड़ गया।मैं वैसे ही पड़ा रहा और उसी मुद्रा में मुझे नींद आ गई। सुबह जब नींद खुली तो अजय गाढ़ी नींद में था। मैं अपनी स्थिति देखकर और रात के घटनाक्रम को याद करके मुश्कुरा उठा और वैसे ही बाथरूम में घुस गया।

स्टोर पहुँचकर मैंने एक वकील से बात की और अजय को उसके साथ कोर्ट भेज दिया। उसने पावर आफ अटार्नी तैयार कर दी। यह तय हो गया की अजय आज रात ही 10:00 बजे ट्रेन से गाँव के लिए निकल जाएगा जो गाँव से 25 किलोमीटर दूर स्टेशन पर सुबह पहुँच जाती थी। रात घर पहुँचकर अजय को खेत के पट्टे और अन्य जरूरी कागजात सौंप दिए, सारी बातें समझा दी और उसे अपनी बाइक पर बिठाकर स्टेशन छोड़ दिया। स्टेशन से वापस घर पहुँचने के बाद माँ से कोई बात नहीं हुई और मैं अपने रूम में जाकर सो गया।

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दूसरे दिन सुबह जब नींद टूटी तो मैं अपनी माँ के बारे में सोचने लगा। मेरी माँ यानी की मेरी प्यारी राधा रानी 46 साल की हैं, पर किसी भी हालत में 40 साल से ज्यादा की नहीं लगती। माँ भी हम दोनों भाइयों की तरह ही कद्दावर कद की और सुगठित शरीर की है। माँ का शरीर मांसल और भरा हुआ है पर किसी भी हालत में मोटी नहीं कही जा सकती। एक सुंदर औरत के शरीर में जहाँ भराव होने चाहिए वहीं पर भराव हैं। गोल चेहरा और उसपर फूले-फूले गाल की गालों को चूसते-चूसते जी नहीं भरे, सदा मुश्कुराते रसीले होंठ जिनका रसपान करने को कोई भी आतुर हो जाय, छाती पर दो कसे हुए बड़े-बड़े गोल स्तन की उनका मर्दन करने हथेली में खुजली चल पड़े, फिर कुछ पतली कमर और कमर खतम होते ही भारी उभरे हुए नितंब और विशाल फैली हुई जांघे की बस उनका तकिया बनाकर सोते रहें और सोते रहें।

खेली खाई, बड़ी उमर की, भरे बदन की सलीके से रहनेवाली औरतें सदा से ही मेरी कमजोरी रही हैं। फिर मेरी माँ तो साक्षात रति देवी की अवतार थी और हर दिन नये-नये रूप में नई सज-धज के साथ मेरी आँखों के आगे रहती थी, तो उसकी ओर मेरा आकर्षित होना स्वाभाविक था। जैसे मुझे अजय के रूप में अनायास ही एक पटा पटाया मस्त, चिकना लौंडा मिल गया और दो ही दिन में वो मेरा दीवाना हो गया, मेरे हर हुकुम का गुलाम हो गया। क्या वैसे ही मेरे सपनों की रानी राधा भी मुझे मिल जाएगी?

मैं माँ के मामले में कोई भी जल्दबाजी नहीं करना चाहता था, ऐसी कोई भी हरकत नहीं करना चाहता था की उसका दिल दुख जाय। मैं धीरे-धीरे माँ को अपनी बना लेना चाहता था की उसके साथ खुलकर मैं अपनी हवस मिटाऊँ, अपने जैसी बेबाक बेशर्म बनाकर खुलकर उसके साथ व्यभिचार करूँ, बिल्कुल खुली बातें करते हुए उसके शरीर के खजाने को भोगू। ऐसी माँ पाने के लिए मैं कितना ही इंतजार कर सकता था। माँ के साथ यह सब करने में अजय अब मेरे लिए बड़ा नहीं था बल्कि मेरा सहयोगी साबित होने वाला था। अजय जैसे शौकीन लौंडे के साथ माँ को भोगने में तो और मजा आएगा। अजय गान्डू तो है, पर पूरा मर्द भी है, एक बार उसे माँ की जवानी चखा दूंगा तो वो मेरा और पक्का चेला बन जाएगा।

सुबह 10:00 बजे स्टोर जाते समय माँ ने रोज की तरह नाश्ता कराया। हम दोनों भाई दिन का भोजन स्टोर के कैंटीन में ही करते थे।

नाश्ता करते समय मैंने माँ से कहा- “माँ अभी कुछ ही दिनों पहले चंडीगढ़ में एक बहुत आलीशान मल्टीप्लेक्स खुला है। उसमें बड़ी मस्त पिक्चर लगी है। उसमें शहर की सबसे अच्छी रेस्टोरेंट भी खुली है। मैंने भी उसे अभी तक नहीं देखा। बोलो, तुम्हारी इच्छा हो तो शाम को पिक्चर देखेंगे और वहीं खाना खाएंगे...”

राधा- “बेटा मैं तो आज से 10-12 साल पहले पास वाले शहर में गाँव की कुछ लोगों के साथ 'जै संतोषी माँ देखने गई थी। मुझे तो पिक्चर देखकर बहुत मजा आया था। उसके बाद तो मुझे वहाँ गाँव से शहर पिक्चर दिखाने कौन ले जाता?”

विजय- “अरे माँ, अब पुरानी बातों को भूल जाओ। अब मैं हूँ ना। तुम्हें खूब पिक्चर दिखाऊँगा। मैं 5:00 बजे घर

आ जाऊँगा और आज बाहर का ही मजा लेंगे...”

माँ ने खुश होकर हामी भर दी।

शाम को मेरे स्टोर में कुछ काम आ गया तो मैंने माँ को मोबाइल पर कह दिया की वो तैयार होकर 6:00 बजे तक स्टोर में ही आ जाये, वहीं से सीधे सिनेमा हाल में चले जाएंगे। मैंने अड्वान्स में दो टिकेट बुक करवा रखी थी और शो ठीक 6:30 पर शुरू होने वाला था। माँ सज-धज के 6:00 बजे स्टोर में आ गई। माँ ने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी और मैचिंग ब्लाउज़ पहन रखा था। हल्के मेकप में भी माँ का रूप निखरा हुआ था। हम फौरन । स्टोर से निकल गये और 15 मिनट में हम बाइक पर हाल में पहुँच गये। हाल बहुत ही शानदार बना था। हाल के इंटीरियर मन को मोहने वाले थे।

 
पिक्चर शुरू होने के कुछ देर पहले हम हाल में आ गये। कुछ ही देर में हाल की बत्तियां गुल हो गई और कुछ

आड्स के बाद पिक्चर शुरू हो गई। पिक्चर कुछ रोमांटिक और बहुत मस्त थी। हीरो हीरोइन की छेड़छाड़, मस्त गाने, द्विअर्थी संवाद, बेडरूम दृश्य इत्यादि सारा मशाला था। पिक्चर 9:00 बजे के करीब खतम हो गई। कुछ देर मल्टीप्लेक्स के शापिंग सेंटर्स देखे और फिर रेस्टोरेंट में आ गये। माँ की पसंद पूछकर खाने का आर्डर दिया, तबीयत से दोनों ने भोजन का आनंद लिया और 10:30 के करीब घर पहुँच गये। हमारी आज की शुरुआती शाम बहुत ही अच्छी गुजरी। माँ को सब कुछ बहुत अच्छा लगा।

घर पहुँचकर माँ बहुत खुश थी। सोफे पर बैठते हुए माँ बोली- “विजय बेटा, तुम मेरा कितना खयाल रखते हो।। तुम्हारे साथ पिक्चर देखकर, घूमकर, होटेल में खाना खाकर बहुत अच्छा लगा। यहाँ शहर में लोग अपने हिसाब से जिंदगी जीते हैं। मैं तो गाँव में लोगों का ही सोचती रहती थी की लोग क्या सोचेंगे? लोग क्या कहेंगे? और अपनी सारी जिंदगी यूँ ही गंवा दी...”

माँ की यह बात सुनते ही मैं बोल पड़ा- “माँ गंवा कहाँ दी, अभी तो शुरू हुई है...”

माँ पिक्चर की बात छेड़ती हुई बोली- “बताओ इन सिनेमाओं की हेरोइनों के रख-रखाव और अंदाज के सामने हम लोगों की क्या जिंदगी है?”

विजय- “माँ वो हेरोइन तुम्हारे सामने क्या हैं? वो तो पाउडर और क्रीम में पुती हुई रहती हैं। तुम्हारे सामने तो ऐसी हजारों हेरोइन पानी भरती हैं...”

राधा- “अच्छा तो ऐसा मेरे में क्या देखा है?"

विजय- “तुमको क्या पता है की तुम्हारे में क्या है? कहाँ तुम्हारा सब कुछ नेचुरल और उनका सब कुछ बनावटी और दिखावटी...”

राधा- “तुम आजकल बातें बड़ी प्यारी-प्यारी करते हो और आजकल मेरा लाड़ला बहुत शरारती हो गया है। यह सब ऐसी पिक्चर देखने का असर है..." माँ ने मेरी ओर देखकर हँसके कहा।

विजय- “माँ तुम्हारी ऐसी मुश्कुराहट पर तो मैं सब कुछ कुर्बान कर दें...” हम कुछ देर इसी तरह बातें करते रहे।

और फिर माँ उठ खड़ी हुई और अपने रूम की ओर चल दी। मैं भी अपने रूम में आ गया और बेड पर पड़ा-पड़ा काफी देर माँ के बारे में ही सोचता रहा और ना जाने कब नींद आ गई।

इसके दूसरे दिन रात के खाने के बाद मैं और माँ टीवी के सामने बैठे थे।

विजय- “माँ, तुम्हें कल अच्छा लगा ना?”

राधा- “हाँ विजय बेटा, अच्छा क्यों नहीं लगेगा? जब तुम्हारी उमर के बेटे अपने दोस्तों के साथ पिक्चर जाते हैं, बाहर खाते हैं तब तुम्हें अपनी इस अधेड़ माँ की याद रहती है, माँ के सुख दुख की फिकार रहती है...”

 
विजय- "माँ, तुम अपने आपको अधेड़ क्यों कहती हो? अभी तो तुम पूरी जवान हो। कल तुम्हें बताया तो था की तुम्हारे सामने तो पिक्चर की हेरोइनें भी फीकी हैं। फिर तुम्हारा खयाल नहीं रखूगा तो और किसका रखेंगा? मुझे पता है वहाँ गाँव में तो तूने अपनी आधी जिंदगी यूँ ही घुट-घुट के बिता दी, जब तुम्हारे मौज मस्ती करने के दिन थे, तभी पिताजी ने बिस्तर पकड़ लिया और फर्ज़ के आगे तुम मन मसोसकर रह गई। पर अब मैं यहाँ तुझे दुनियां का हर सुख दूंगा, तुम्हारे हर शौक पूरे करूंगा। चलो माँ तुम्हें एक जगह की आइसक्रीम खिलाकर लाता हूँ..”

राधा- “अब इतनी रात गये?”

विजय- “तो क्या? यहाँ तो इसी समय लोग बाग बाहर निकलते हैं। फिर आज मुन्ना भी नहीं है। मुन्ना रहता है।

तो गप्प सप्प करने में मजा आता है...”

मैं और माँ 15 मिनट में ही थोड़े तैयार होकर ऐसे एक मशहूर आइसक्रीम पार्लर पर पहुँच गये जहाँ अधिकतर नौजवान अपनी गर्लफ्रेंड के साथ आइसक्रीम का मजा लेने आते हैं। मैं दो आइसक्रीम कैंडी ले आया और एक माँ को दे दी। फिर हम दोनों एक दूसरे के देखते हुए मस्ती से कैंडी चूस मजा लेने लगे। माँ को मुँह गोल बनाकर कैंडी चूसते देखकर मेरी नीचे वाली कैंडी में हलचल होने लगी और मैं इसी सोच में माँ को लेकर वापस घर आ गया और अपने कमरे में जाकर बेड पर अकेला पड़ गया की एक दिन माँ मेरे वाला भी इसी कैंडी की तरह चूसेगी।

दूसरा दिन सनडे का था। सनई को मैं हमेशा देर से उठता हूँ। आज हालाँकि नींद तो रोज वाले समय पर खुल गई, फिर भी सनडे की वजह से बिस्तर पर पड़ा था। मेरी माँ हालाँकी आज तक गाँव में ही रही थी, पर वो आधुनिकता की, शहरी सभ्यता की शौकीन जरूर है। तभी तो उसे विधवा होते हुए भी बन-ठन के रहने में, शृंगार करने में, रोमांटिक पिक्चर देखने में, रोमांटिक जगहों का सैर सपाटा करने में संकोच नहीं हो रहा था। इन सब । में उसे आनंद आ रहा था। यही तो मैं चाहता था की उसे आनंद मिले। मुझे पक्का भरोसा है की मेरे द्वारा यदि उसे आनंद मिलता जाएगा तो एक दिन उसके द्वारा भी मुझे आनंद मिलेगा। पर मैं खुलकर माँ पर यह बिल्कुल प्रगट नहीं कर रहा था की वास्तव में मेरे मन में क्या है?

आज तैयार होकर नाश्ता-कम-लंच करते-करते 11:00 बज गये। नाश्ता खतम करके मैंने माँ को बता दिया की अभी तो मुझे किसी सप्लायर के यहाँ सैंपल देखने जाना है, पर मैं 5-6 बजे तक वापस आ जाऊँगा तब शाम का प्रोग्राम बनाएंगे। जिस सप्लायर के पास मुझे जाना था उसके पास ओवरसाइज ब्रा, पैंटी और नाइटी का नया स्टाक आया हुआ था। मैं 6:30 बजे के करीब वापस घर आ गया। माँ सोफे पर बैठी कोई सीरियल देख रही थी। मेरे हाथ में सैंपल गारमेंट्स का एक बड़ा सा पैकेट था जो मुझे उस सप्लायर ने दिया था।

राधा- “जरा देखें तो आज मेरा लाल मेरे लिए क्या नया लेकर आया है?” यह कहकर माँ ने मेरे हाथ से पैकेट ले लिया और उसे खोलने लगी।

उसमें से दो ऐसी पैंटी निकली जो मुश्किल से चूत भर को ढक सके और उन दो में से एक ट्रॅन्स्परेंट भी थी। दो। ही बिना बाँह की तंग और टाइट ब्रा थी। एक झीनी नाइटी थी और एक खुली लेडीस नाइटगाउन था। सारे माँ की साइज के थे क्योंकी इस लाइन में काम करने से मुझे एग्ज़ेक्ट पता था की माँ को किस साइज के फिट बैठेगे। माँ उलट पलट के देखती रही।

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
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