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Guest
मैं रूही की गान्ड पर थप्पड़ मारते हुए उसकी चुदाई करने लगा...और रूही भी गान्ड उछाल कर लंड का मज़ा लेने लगी....
रूही-आअहह….माअर……मार…ज़ोर से…आहह... आअहह…ज़ोर से…आअहह..ऊहह..ऊहह..
त्ततप्प…त्तप्प्प…आअहह…आहह..त्त्थप्प…त्ततप्प्प्प
मैं-यस…फाड़ता हूँ …ये ले…येस्स..येस्स...
रूही-आआहह..आहह..आह…आ..आह..आह..ज्जूओर्र..सससे..उउउम्म्म्ममम…हमम्म…आअहह...
थोड़ी देर की जोरदार चुदाई के बाद रूही झड़ने लगी…..
रूही-आअहह…अहहह..उउउंम…ऊहह..ऊहह..ऊहह..
ऊहह…ज्ज्ज्ूओर्र…सीई…म्म्मारईंन...आाऐययईईई….
उूउउंम्म…आहह…आहह…आह….
रूही के झाड़ते ही मैने चुदाई रोक दी...
रूही- बस...अब नही...आअहह...थक गई...आआहह...
मैं- चुप कर...अभी मेरा नही हुआ....
रूही- मैं तुम्हे ठंडा करती हूँ...
और रूही घुटनो पर बैठ गई और मैं भी उसके सामने खड़ा हो गया...
रूही ने जल्दी से मेरे लंड को मूह मे भरा और चूसना सुरू कर दिया....
रूही- सस्रररुउउप्प्प....सस्स्रररुउप्प्प...आअहह...उउउम्म्म्म ....
मैं- ओह्ह...जल्दी कर अब...
रूही-सस्स्स्सुउउउप्प्प…ऊओंम्म….उउउंम्म….सस्स्रर्र्र्र्रप्प्प्प....
मैं-आआहह…….क्कक्या चूस्ति हो….ऑर तेज,…हहाअ …ऐसे ही
रूही-सस्स्स्र्र्ररुउउप्प्प…..ऊओंम्म….उउउंम्म…सस्स्रररुउउप्प
मैं-आअहह…..ऐसे ही….ऑर तेज…मेरी रानी…आअहह…
रूही-सस्रररुउुउउप्प्प्प्प्प….सस्स्स्र्र्ररुउुउउप्प्प…..उूुउउम्म्म्ममनममम….सस्स्र्र्ररुउउउप्प्प्प
मैने फिर रूही का सिर पकड़ कर उसका मूह चोदना सुरू कर दिया....
रूही- क्क्हुउऊंम..उउंम...उउंम...क्क्हूम्म....उउम्म्म्म..
मैं- ओह्ह....येस्स....यीहह..यईह..यईह
रूही- उउंम्म...क्क्हुऊंम्म...क्क्हुऊंम....
मैं- ओह्ह.. मैं आया….डाल दूं अंदर…
रूही- उउंम..उउंम..उउउम्म्म्म...
और मैं रूही के मूह मे झड गया....और रूही मेरा लंड रस गटकने लगी.....
मेरा लंड खाली होते ही मैने लंड रूही के मूह से निकाल लिया...और मैं उसके साथ वही नीचे बैठ गया....
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यहाँ तो हम सब सुबह से मस्ती मे बिज़ी थे ..पर हमसे कही दूर एक औरत बहुत ही परेसान हो रही थी...
सुबह से जागने के साथ ही वो उस आदमी से दूसरे आदमी के पास चलने को बोल रही थी..जिससे आज़ाद का पता चल सके....
औरत- और कितनी देर...??
आदमी- बस मेडम..थोड़ी देर और..अभी वो जगा नही होगा...
औरत- क्यो..राक्षस है क्या...दोपहर होने आई और वो जगा नही होगा...
आदमी- अरे मेडम..राक्षस नही पर राक्षस से कम भी नही...पूरी रात शराब और सवाब मे डूबा रहता है...इसलिए देर से जागता है...बस कुछ देर और इंतज़ार कीजिए...
औरत- ह्म्न..ठीक है...इतना इंतज़ार किया तो थोड़ा और...
आदमी- वैसे मेडम..आपका नाम क्या है...??
औरत- तुम्हे नाम से क्या...अपने काम से काम रखो बस..
आदमी- जी मेडम...
फिर दोनो थोड़ा इंतज़ार करते रहे...और थोड़ी देर बाद एक बड़े से घर के सामने पहुच गये...
आदमी- मेडम..ये है उसका घर...जिसका नाम है रघु...ये आपको आज़ाद के बारे मे बता सकता है..
औरत- तो खड़े क्या हो...चलो अंदर...
जैसे ही दोनो गेट पर पहुचे तो गार्ड ने उन्हे रोक लिया....
तब उस आदमी ने गार्ड को कुछ कहा जिससे गार्ड अंदर गया और बाहर आते ही दोनो को अंदर कर दिया....
जैसे ही दोनो घर के अंदर आए तो एक नोकर मिल गया....
नौकर ने उन दोनो को बैठने को बोला और खुद उपेर चला गया....
थोड़ी देर बाद नौकर वापिस आया और सिर्फ़ उस औरत को उपर एक रूम मे छोड़ आया...
रूम मे एंटर होते ही औरत के सामने एक बड़ा सा ...मूछो वाला हॅटा-कट्ता मर्द आ गया...जो रघु था...
औरत- आप ही रघु है...
औरत के इतना बोलते ही रघु ने अपनी नशीली आँखो से औरत को घूर के देखा...
औरत- सॉरी...मैं तो बस पूछ रही थी...आप ही रघु...
रघु(बीच मे)- बंद करो....
औरत- क्या..??
रघु- गेट बंद करो...
औरत ने गेट लगाया और फिर से सवाल किया...
औरत- आप ही रघु है..??
रघु- तुम कौन हो...??
औरत- मैं...मेरा नाम दामिनी है...
रघु- यहाँ क्यो आई...??
दामिनी- मैं आज़ाद मल्होत्रा को ढूंड रही हूँ...किसी ने बताया कि तुम...
रघु(बीच मे)- तुम आज़ाद को कैसे जानती हो...
दामिनी- बस..जानती हूँ...
रघु- मैने कहाँ कैसे जानती हो...
दामिनी- इससे तुम्हे क्या...तुम सिर्फ़ ये बताओ कि वो है कहाँ...
रघु दामिनी की बात सुन कर गुस्से मे खड़ा हो गया और दाँत पीसते हुए दामिनी के पास आ गया...
रघु- ओये...जितना पुच्छू ना..उतना ही बोलने का....और मुझे ना कहने की ग़लती तो करना ना...समझी...
दामिनी(डरते हुए)- जी..ठीक है...
रघु- अब बोल ..कैसे जानती है तू आज़ाद को...??
दामिनी- वो..आज़ाद मेरे रिश्तेदार है...
रघु- हाहाहा...रिश्तेदार....
दामिनी- तुम हंस क्यो रहे हो...
रघु- आज़ाद का कोई रिश्तेदार उसे यहाँ ढूँढने नही आयगा..समझी...अब सच बोलो...
दामिनी- वो...मैं..आज़ाद...वो..
रघु- घबरा मत..सॉफ-सॉफ बोल...
दामिनी- ठीक है...मेरा कुछ हिसाब बाकी है उससे..
रघु- तो ऐसा बोल ना कि दुश्मनी है..
दामिनी- हाँ..है दुश्मनी...अब बताओगे कि वो कहाँ है...
रघु- ह्म्म...दुश्मनी...अच्छा है...
दामिनी- तो बताओ फिर..ताकि मैं जल्दी से अपना हिसाब पूरा कर सकूँ...
रघु- मुझे नही पता की आज़ाद अभी कहाँ है...
दामिनी- तो तुम किस काम के...मेरा टाइम बर्बाद कर दिया...
दामिनी गुस्से मे वहाँ से जाने लगी पर रघु ने उसे रोक लिया...
रघु- ओह..रुक...
दामिनी- यहाँ रुक कर मुझे क्या मिलेगा...
रघु- मुझे आज़ाद का पता नही...पर उस इंसान का पता है जो हमे आज़ाद तक पहुचा सकता है...
दामिनी- ह्म्म..तो बताओ..कौन है वो...??
रघु- तुम्हे मिलवा ही दूँगा...
दामिनी- चलो फिर...
रघु- आज नही...कल चलेगे....आज रात तो मुझे कीमत बसूलनी है तुमसे...
दामिनी- कैसी कीमत..??
रघु- आज़ाद तक पहुचने की कीमत....
और रघु ने एक कमीनी मुस्कान दे दी...दामिनी भी उसका मतलब समझ गई और मुस्कुराने लगी.....