वसीम(हँसता हुआ)- तू नही जानती...हां...तो अब उससे पूछता हूँ जो सब जानता है...
और वसीम ने एक झटके मे रिचा को धक्का देकर नीचे गिरा दिया और लपक कर रिया को अपनी गिरफ़्त मे ले लिया..और उस पर गन तान दी...
रिया- आआअहह..मोममम..
रिचा- वसीम...मेरी बेटी को छोड़...
वसीम(चीखते हुए)- चुउउउप्प्प्प....अब ना कोई बेटी...ना कोई माँ...सब मरेगे....बोल साली....तुझे तो पता होगा ना....कहाँ है वो....बोल...हां...
रिचा ने उठकर वसीम के पैर पकड़ लिए और अपनी बेटी को छोड़ने की मिन्नतें करने लगी...जबकि वसीम रिया के बालो को खीचते हुए अपना मुँह उसके कान के पास घुमा रहा था और गन को रिया के सीने पर फिरा रहा था....
वसीम(रिया को सूघ कर)- आहह...कच्ची कली....उउंम...क्यो मरना चाहती है...ये तेरे मरने की उमर नही....उउंम...बता दे...हाँ...बता दे...कहाँ है वो...उउंम...बोल ना...
रिचा(रोते हुए)- वसीम...मेरी बच्ची...मेरी बच्ची को छोड़ दे...वसीम ...छोड़ से उसे प्ल्ज़्ज़....
वसीम-चुप कर...और तू...आअहह...बोल भी दे...वरना जवानी का मज़ा लेने से पहले ही तू...हाहाहा..बोल ना(चिल्ला कर)
मैं- वसीम....छोड़ दो उसे....
वसीम मेरी आवाज़ सुन कर फिर से चारो तरफ देखने लगा.....
वसीम- छोड़ दूं..हाँ...अगर तू चाहता है कि मैं इसे छोड़ू तो पहले तू सामने आ...वरना...
मैं- देख...तेरी दुश्मनी मुझसे है...रिया को बीच मे मत ला...मुझसे बात कर...
वसीम(रिया के बाल खीच कर)- तो फिर आ और बचा ले इसे...दिखा अपनी मर्दानगी....साला...नमर्दो की तरह छिप बैठा है...आ ना...
मैं- हाहाहा....नमर्द वो होते है वसीम ख़ान जो औरत पर ज़ोर चलाते है....समझे...
वसीम- अबे चुप....सीधे से सामने आता है या फिर मैं इसे उपेर भेजू...हाँ...
वसीम ने रिया के बाल खीचे और गन को उसके माथे पर अड़ा दिया...
वसीम- बोल अंकित....आता है या टपका दूं इसे....हाँ...
मैं- वसीम...उसे कुछ किया तो...
वादिम(बीच मे)- भाड़ मे गया तू...अब ये गई...
मैं- सोनम...अभी...
और इससे पहले की वसीम कुछ समझ पाता ...रूम मे फिर से गोली चली और सीधा वसीम के हाथ पर टकराई....
हाथ पर गोली लगते ही वसीम के हाथ से गन छूट गई और दूर जा गिरी....
वसीम ने एक नज़र सोनम पर मारी और फिर रिया को एक तरफ फेक कर गन की तरफ बड़ा ही था कि दुबारा से गोली चलने की आवाज़ रूम मे गूँज उठी...
और ये आवाज़ होते ही वसीम अपनी जगह पर खड़ा रह गया.....और सोनम को घूर्ने लगा....
यहाँ रिया के गिरते ही रिचा ने उसे संभाला और अपने सीने से चिपका कर रोने लगी....
मैं- वसीम....इतनी हैरानी से मत देखो...गोली सोनम ने नही चलाई...बल्कि सोनू ने चलाई है...
मेरी बात सुनकर वसीम ने सोनू की तरफ देखा तो उसके हाथ मे गन थी और चेहरे पर मुस्कुराहट...जिसे देख कर वसीम गुस्से से बौखला गया....
वसीम(सोनू से)- तो तू बँधा नही था...ये सब एक नाटक था...हाँ...सब कुछ...एक नाटक....
मैं- बहुत अच्छे...(तालियाँ बजा कर)- तुम तो बड़े होसियार हो....जो इतनी जल्दी समझ गये...हाहहाहा....वसीम....आज तूने साबित कर दिया कि तो अकरम का बाप नही हो सकता...क्योकि ना ही तेरे पास मर्दानगी है और ना ही दिमाग़....
वसीम(चिल्ला कर)- अंकित...मैं क्या हूँ वो छोड़...अगर तू मर्द है तो सामने आ...ऐसे नमर्दो की तरह छिप कर बार क्यो करता है...हाँ..बोल...मर्द है कि नही...
मैं- बार...अबे मैं बार करता तो तू उपर पहुँच चुका होता...फिर भी ...चल आता हूँ....ये ले आ गया...
और फिर बेसमेंट की सीडीयों पर किसी के जूतों की छाप सुनकर वसीम और बाकी सब वहाँ देखने लगे और कुछ ही देर मे उनके सामने मैं आ गया....
मैं- देख ले वसीम...आ गया तेरे सामने....
वसीम मुझे देख कर सिर्फ़ घूरते हुए दाँत पीसता रहा क्योकि वो जानता था कि वो इस वक़्त सोनू के गन पॉइंट पर है....ज़रा भी हिला तो गोली उसको चियर देगी...
मैने वसीम को घूर्ने के बाद रिचा और रिया को देखा...जो इस समय सहमी हुई थी....फिर मैने रिया को आँखो से कुछ इशारा किया और सामने जा कर उसी जगह खड़ा हो गया ..जहा मैं बँधा हुआ दिख रहा था....
मैं- लो वसीम...मैं वही आ गया..जहाँ तू चाहता था...उसी जगह...जहा तूने मेरे उपर गोलियाँ चलाई...ठीक है ना...
वसीम(गुस्से से)- लड़के...टेक्नालजी की वजह से मैं मिस हो गया...वरना तू अब तक उपर पहुँच चुका होता...
मैं(मुस्कुरा कर)- ह्म्म..सही कहा...पर क्या करे...तुझे उपर भेजे बिना मैं जा नही सकता ना....मुझे..तेरे पापो का हिसाब भी लेना है अभी...तभी तो तू भी जिंदा है अब तक...समझा...
वसीम(आगे बढ़ कर)- तेरी तो...
मैं- ना..ना..ये ग़लती मत करना...वरना दर्द सहते हुए पाप सुनने पड़ेंगे...समझा ना...एक कदम भी मेरे इजाज़त के बिना बदाया तो...ये देख रहो हो..सोनू..जानते हो ना इसे...इसका निशाना कैसा है...तुझे तो पता ही है...है ना...
मैं- देखते है वसीम ख़ान...कौन पछताने वाला है...अब आओ और उस चेयर पर बैठ जाओ...अब आमने-सांबे बैठ कर सब क्लियर कर लेते है...फिर देख लेगे कि उपर किसे जाना है...बैठो...
फिर वसीम और मैं आमने सामने चेयर पर बैठ गये....रिचा और रिया वसीम से कुछ दूरी पर खड़ी थी...सोनू वसीम पर निशाना लगाए बैठा था और सोनम चुप चाप बैठी हुई ये सब नज़ारा देख रही थी....
मैं- हाँ तो वसीम...नही...अब जब हम सॉफ-सॉफ बात करने वाले है तो फिर नाम भी सॉफ ही होने चाहिए....है ना...तो क्या कहूँ...हाँ...सरफ़राज़....तो बोलो सरफ़राज़....वो क्या वजह है....मतलब हमारी दुश्मनी की वजह....
वसीम(मुझे घूर कर)- मैं बोल चुका हूँ....वही वजह है...
मैं- ओह हो...(सिर खुज़ला कर) - सॉरी मैं भूल गया...ज़रा फिर से बताओगे...
वसीम(गुस्से से)- ये लड़के...ये कोई कहानी नही जो फिर से सुनाऊ...ये हक़ीक़त है...एक दर्दनाक हक़ीक़त....
मैं- हाँ...हो सकता है....और शायद सच भी हो...पर अगर ये सच है...तो एक बार फिर से बता दो....
वसीम(गुस्से से बौखला गया)- क्या फिर से...ये कोई मज़ाक है क्या....
मैं(कड़क आवाज़ मे)- सरफ़राज़...तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि बोलना शुरू करो...नही तो सोनू की गन बोलेगी...और गन का बोलना ज़्यादा दर्दनाक हो सकता है...है ना....
वसीम ने गुस्से से अपने हाथो को कुर्सी के हॅंडल पर पटका और फिर से मुझे घूर्ने लगा.....
मैं- सरफ़राज़ मियाँ...मुझे घूर्ने से काम नही चलेगा....अपने मुँह को कष्ट दो...और बोलना शुरू करो...जल्दी...
फिर वसीम कुछ देर तक खामोश रहा और फिर उसने बोलना शुरू कर दिया.....वसीम ने फिर से वही बातें दोहराई और मैं हर बात को गौर से सुनता रहा....
वसीम बात ख़त्म कर के फिर से रो पड़ा और अपने हाथो मे अपना चेहरा छिपा कर बैठ गया.....
मैं- हुह...रिचा...क्या तुम यहाँ आओगी....
जैसे ही मैने रिचा को आवाज़ दी तो वो सकपका गई...और सहमी हुई सी मेरे सामने आ कर खड़ी हो गई......
मैं- रिचा ..अब तुम कहो...जो तुमने बताया था...वो सच है ये जो आज सुना वो....बोलो...
रिचा सहमी सी मेरे और वसीम के बीचो बीच खड़ी हुई थी...मेरा सवाल सुनकर उसने मूड कर वसीम को देखा...जो पहले से ही अपनी आँखे रिचा पर लगाए हुए था....उसकी आँखो को देख कर रिचा घबरा गई और तुरंत पलट कर मुझे देखने लगी....
मैं(आँखे घुमा कर)- अब सब हो गया ही तो बोल भी दो..ह्म्म..
रिचा- वो...वो असल मे...
मैं(ज़ोर से)- बोल ना....
रिचा- मैने झूठ कहा था...
रिचा ने स्पीड से बोला और फिर सहमी हुई आँखो से मुझे देखने लगी...
मैं(दाँत पीस कर)- तू नही सुधरने वाली...चल जा यहाँ से...
मेरे कहते ही रिचा लगभग भागते हुए वापिस अपनी जगह पर खड़ी हो गई....और फिर वसीम मुझे घूर्ने लगा...
वसीम- सच जान गये ना...
मैं- हाँ..जान गया...पर अभी बहुत कुछ बाकी है...
वसीम- बाकी...(हँसते हुए)- बाकी तो सच मे बहुत है...तेरा दादा...तेरा बाप और तू...अरे हाँ..तेरा चाचा भी तो है....सब बाकी है ...हाहाहा...
मैं- ह्म्म...सो तो है...और वो बाकी ही रहेगे...पर...पर..पर...आहह..यहा मैं तेरी बात कर रहा था...अपनी नही...
वसीम- मेरी बात...अब क्या बाकी रह गया....सब तो सुन लिया...
मैं(खड़ा हो कर)- असल मे...मैने एक नया फ़ोन लिया है...और इस फ़ोन की ख़ासियत ये है कि इसमे तुम्हारे मतलब का कुछ है...देखना चाहोगे...एक मिनट...
और फिर मैं वसीम की तरफ बड़ा और वीडियो ओपन करके फ़ोन उसे पकड़ा दिया....
वसीम(वीडियो देख कर)- तुम तो जान ही गये हो कि ये वीडियो किस का है...बचा क्या फिर...
मैं(चेयर के दोनो हॅंडल पर हाथ टिका कर)- दूसरा भी देख लो...फिर बात करेंगे.....
फिर मैं वापिस खड़ा हो गया और वसीम के बोलने का वेट करने लगा....
दूसरा वीडियो देखते हुए वसीम बार-बार नज़रे उठा कर मुझे देख रहा था...और उसकी आँखो मे मुझे बैचेनी सॉफ नज़र आ रही थी....
वसीम(वीडियो ख़त्म होते ही)- आख़िर तुम कहना क्या चाहते हो...मैं इसे नही जानता....
मैं- ओह हो...नही जानते...अच्छा एक बात बताओ...क्या तुम्हे मेरे माथे पर चूतिया लिखा नज़र आ रहा है...चूतिया....
मेरी बात सुनकर सोनू, सोनम और रिया हँस पड़े...जबकि रिचा और वसीम के होंठ सिले रहे...
वसीम- मैं..मैं सच मे...
मैं(बीच मे ताली मार कर)- सच मे...आहह...ये सच ही तो सुनना है सरफ़राज़ मियाँ...सच...अब..हम्म..देखो..भोले बनने का नाटक छोड़ो और ये बताओ कि सरिता को तुम कैसे जानते हो...
सरिता का नाम आते ही वसीम चौंक गया और रिचा की तरफ देखने लगा...
मैं- अरे...तुम उसे मत घूरो...उसने कुछ नही बताया...असल मे सरिता के बारे मे मुझे बहुत पहले से जानकारी है....तब तो मुझे रिचा के बारे मे कुछ पता भी नही था...हाँ..तो अब सवाल पर आते है...फिर से...सरिता को कैसे जानते हो....
वसीम(झल्ला कर)- ठीक है...मैं सरिता को जानता हूँ...असल मे इस वीडियो मे सरिता के साथ मैं ही बैठा हूँ....और ये तो तुम समझ ही गये होगे की हम दोनो ही तुम्हारी फॅमिली के दुश्मन थे...
मैं(ताली बजा कर)- बहुत अच्छे...सबाश अंकित...मैने जो सोचा था...वो सही निकला....तो अब आते है उस सवाल पर...जिसने मेरी लाइफ मे सबसे ज़्यादा खलबली मचा रखी है. ..
वसीम(मुझे देखता रहा और मेरे बोलने का वेट करता रहा)
मैं(वसीम की आँखो मे झाँक कर)- उस दिन...जब मेरी आरती बुआ, धर्मेश और सुभाष...दोनो फूफा जी..ये तीनो मारे गये....हाँ..साथ मे सरिता भी...उस दिन तुम वही थे...उसी घर मे...है ना....
मैं सवाल कर के वसीम की आँखो मे देखता रहा क्योकि मैने अंधेरे मे तीर छोड़ा था और वसीम की आँखे ही मेरे सवाल का सही जवाब बता सकती थी...
वसीम मेरा सवाल सुन कर झेप सा गया...उसकी आँखो मे झेप देख कर मैं समझ गया कि मेरा तीर निशाने पर लगा है....
मैं- आअंन्न ..तुम वही थे...वही ...उसी घर मे...बोलो...थे ना...थे ना...
मैने दोनो हाथ वसीम की चेयर के हॅंडल पर पटके और उसे घूर्ने लगा...
वसीम- ह..हाँ..मैं था...हाँ...
मैं(गुस्से से)- तो तूने मारा मेरे दोनो फुफाओ को ...और तेरी वजह से मेरी बुआ नही रही..मेरे डॅड को गाओं ने निकाल फेका और मेरी बुआ की मासूम बेटी...उसे भी नही छोड़ा तूने...ले गया उसे......हाँ..
वसीम(चिल्ला कर)- नही...मैने नही मारा...ना ही किसी बच्ची को उठाया...मैं तो वहाँ से भाग गया था ...
मैं(वसीम की कलर पकड़ कर)- झूट मत बोलो मुझसे....सच बता...
वसीम(मेरी आँखो मे देख कर)- मैं सच बोल रहा हूँ...मैने सिर्फ़ सरिता पर फाइयर किया था...सिर्फ़ उसी को मारने मैं गया था...बाकी किसी को नही...
मैं(वसीम की गर्दन पर दवाब बढ़ा कर)- फिर से झूट...मुझे बेवकूफ़ समझता है....सरिता तेरे साथ थी तो तू उसे क्यो मारने लगा..हाँ....
वसीम- क्योकि मैं चाहता था कि सरिता की मौत का ज़िम्मेदार आकाश को बना दूं...जिससे सरिता के पति मदन और आज़ाद के बीच बचा-खुचा प्यार भी ख़त्म हो जाए...मदन भी आज़ाद का दुश्मन बन जाए..बस...इसी लिए मैने सरिता पर गोली चलाई और वहाँ से भाग निकला...
मैं(चिल्ला कर)- झूट...झूट...झूट...उस दिन वहाँ 3 लोग मारे गये थे...क्या वो अपने आप मर गये...हाँ...तूने ही मारा होगा ..तूने...
वसीम(बीच मे चिल्ला कर)- नही...वहाँ कोई और भी था...जो सरिता के साथ था....
मैं(हैरानी से)- कोई और....कौन...कौन था...
वसीम(सिर हिला कर)- नही जानता..बस ये पता है कि वो सरिता के कहने पर आया था....
वसीम- मैं सच बोल रहा हूँ...मैने सिर्फ़ सरिता को गोली मारी...मुझे नही पता कि वो सक्श कौन था...और किसने बाकी सबको मारा...और ना ही ये पता है कि आरती की बेटी कहाँ गई...सच मे...नही जानता...
मैं(अपना चेहरा सॉफ कर के)- आह..ओके...तो अब ये भी बता दे...कि एक सीधे-साधे किसान...अली ख़ान का बेटा....आख़िर इतना पैसे वाला कैसे हो गया....ह्म्म...सीधे शब्दो मे कहूँ..तो मैं सरफ़राज़ से वसीम बनने की कहानी जानना चाहता हूँ....
वसीम(हैरानी से)- इससे तुझे क्या लेना -देना....
मैं(कड़क आवाज़ मे)- जितना पूछा उतना बोल...कोई सवाल नही....क्योकि सवाल करने की हालत मे तू है ही नही...समझा...अब बोल...
वसीम(मुझे घूर कर)- तो सुन...सरफ़राज़ से वसीम ऐसे ही नही बन गया मैं...बहुत पापड वेले है...और बहुत से पाप भी किए है....समझा....
मैं- जानता हूँ...तू कमीना है...ये मत बता...ये बता कि क्या-क्या कमीनपन किया तूने...और किसके साथ...चल शुरू हो जा.....
वसीम(चेयर पर टिक कर)- क्या जानना है तुझे....लंबी कहानी है....कहाँ से शुरू करूँ...
मैं- हम दोनो ही जानते है कि मैं क्या जानना चाहता हूँ...अब देर मत कर....बोलना शुरू कर....
वसीम- एक सिगरेट पी लू...फिर बताता हूँ...
और वसीम ने सिगरेट सुलगाई और कस मार कर बोलना शुरू किया....
तो ये बात जबसे शुरू होती है...जब सरफ़राज़ अपना सब कुछ खो चुका था...
अपने परिवार की मौत के बाद सरफ़राज़ आज़ाद के पास गया....उससे लड़ा भी...पर आज़ाद सॉफ मुकर गया....आज़ाद का कहना था कि उसने आग नही लगाई....
सरफ़राज़ ने उसके बाद गाओं वालो से पूछ-ताछ की...पर पूरे गाओं मे आज़ाद का इतना रूतवा था कि कोई भी सच नही बोला....
हताश होकर सरफ़राज़ ने गाओं की सारी ज़मीन बेच दी...और वापिस सहर आने का मन बना लिया....
पर उसी वक़्त उस से मिलने सरिता आ पहुँची....और सरिता की बात सुनने के बाद सरफ़राज़ ने आज़ाद को ख़त्म करने का मन बना लिया...
पर आज़ाद को ख़त्म करने के लिए सिर्फ़ मन बनाना काफ़ी नही था....सबसे पहले आज़ाद के रुतवे को ख़त्म करना ज़रूरी था ...
इसलिए सरफ़राज़ ने आज़ाद पर नज़र रखना शुरू कर दिया...और एक दिन रिचा के साथ आज़ाद की रास लीला देख ली...
फिर क्या था...सरफ़राज़ ने रिचा को भी अपने साथ मिला लिया...और सरिता तो पहले से ही आज़ाद के खिलाफ थी...तो अब आज़ाद के खिलाफ तीन लोग हो गये...
फिर तीनो के बीच ये तय हुआ कि पहले आज़ाद के रुतवे को ख़त्म करना है और फिर उसकी दौलत को...और अंत मे उसकी फॅमिली को ....
पर उसके पहले आज़ाद की फॅमिली को तोड़ने का एक मौका मिल गया....और उस दिन आज़ाद की सबसे बड़ी ताक़त..उसका बड़ा बेटा आकाश...आज़ाद से अलग हो गया...
पर आकाश और आरती के जाने के बाद भी सरफ़राज़ के मन का कुछ नही हुआ...मतलब ये कि आज़ाद के रुतवे मे कोई कमी नही आई. ..
और आकाश भी सहर मे अमीर होता गया...जिसे सरफ़राज़ सबसे बड़ा दुश्मन मानता था..क्योकि आलाश ने आमिर को आरती से दूर रहने की धमकी दी थी...ये बात सरफ़राज़ को रिचा से पता चली थी...
तब सरफ़राज़ ने डिसाइड किया कि पहले वो खुद पैसे वाला बनेगा और फिर आकाश को तोड़ेगा...
सरफ़राज़ अपने प्लान मे लग गया....और उसे फ़ायदा हुआ अनवर के भरोशे का...
अनवर के हाथ मे जावेद ने पूरा बिज़्नेस दे रखा था...और अनवर आँख बंद कर के सरफ़राज़ की बात मान लेता था...
इसी वजह से सरफ़राज़ ने अनवर को धोखा दे कर कई घपले किए और दौलत जोड़ने लगा...
पर हर चोर एक दिन पकड़ा जाता है...वैसा ही सरफ़राज़ के साथ हुआ...
किसी ने जावेद को सरफ़राज़ के कारनामे सुना दिए....और जावेद ने बिना अनवर को बताए इंक्वाइरी करनी शुरू कर दी...
पर तभी आनवार की मौत हो गई और जावेद चुप रह गया....
और फिर जावेद ने ही सरफ़राज़ को सबनम से सदी करने को मना लिया...
फिर कुछ दिन सब ठीक चला...पर एक दिन सरफ़राज़ को पता चला कि जावेद अपना सबकुछ सबनम और उसके बच्चों के नाम करने वाला है....
तो सरफ़राज़ से रहा नही गया और उसने जावेद का आक्सिडेंट करवा दिया...जिसमे जावेद की बीवी भी मारी गई...
पर सरफ़राज़ के अरमान तब भी पूरे नही हुए...क्योकि वसीयत के मुताबिक सब कुछ अनवर के नाम था ..जो अब सबनम और उसके बच्चों के नाम हो गया...तो मजबूरी मे सरफ़राज़ को सबनम के साथ गुज़ारा करना पड़ा....
पर इसी बीच सरफ़राज़ ने चुपके से अपनी प्रेमिका सलमा से शादी कर ली थी...और उसने तय कर लिया था कि वो दोनो के साथ जिंदगी गुजारेगा...बिना किसी को खबर लगे....
पर सरफ़राज़ को झटका तब लगा...जब सादिया के साथ बने उसके नाजायज़ रिस्ते से सादिया प्रेगनेंट हो गई...
पहले तो सादिया ने बात को संभाल लिया कि वो ये बच्चा सकील का ही बताएगी...पर उसी दौरान सरफ़राज़ को पता चला कि सादिया के प्रेगनेंट होते ही सादिया और सबनम के माँ-बाप ने सब कुछ दोनो बहनो के नाम कर दिया....
बस...सरफ़राज़ का ईमान फिर डोल गया और उसने परवेज़ की दौलत के साथ सकील की दौलत भी हथियाने का प्लान कर लिया...
और एक दिन एक और आक्सिडेंट करा कर तीनो को दुनिया से विदा कर दिया....
अब सबनम के साथ सादिया भी सरफ़राज़ के हाथ मे थी और उनकी दौलत भी...
तो सरफ़राज़ सब कुछ बेच कर उस सहर मे आ गया जहाँ आकाश रहता था...एक नये काम और नये नाम के साथ....
ये थी कहानी....सरफ़राज़ के वसीम बनने की....
पूरी कहानी सुन कर वसीम मुझे देखने लगा...जबकि मेरी आँखो मे गुस्से की वजह से खून उतर आया था...
वसीम- सुन लिए मेरे कारनामे....आआ...
वसीम के बोलते ही मैने उसके मुँह पर एक मुक्का जड दिया....
मैं- तू इतना बड़ा कमीना निकलेगा....साले....
और फिर एक और मुक्का वसीम के मुँह पर पड़ा...पर वसीम हँसने लगा...
वसीम- ह...हहा....तू...तू अभी जानता ही क्या है...हाहाहा...हाँ...
मैं(गुस्से से सासे भरते हुए)- सही कहा...मैने सोचा भी नही था कि तू इतना ज़ालिम होगा कि खुद को पालने वाले को मार देगा...
वसीम- हह...नही-नही...मैने इनको मारा नही...मरवाया है...बस...एक को छोड़ कर....
मैं(हैरानी से)- तो क्या अनवर...उसे तूने मारा था...
वसीम(खड़ा हो कर)- हाँ...इन्ही हाथो से.....बहुत..बहुत..बेदर्द मौत दी थी उसे...
मैं(चिल्ला कर)- कमीने....वो तुझ पर भरोशा करता था और उसे तूने...
वसीम हँसते हुए मुझे देखने लगा और मेरी बात काट कर बोला...
वसीम- भरोशा...हाँ...भरोशा तो था ...पर क्या करे....मुझे दौलत चाहिए थी...दौलत...और..फिर उसे चुप भी तो करना था...सब जान जो गया था...मेरा प्लान...मेरी सोच..सब...
मैं- तो उसका आक्सिडेंट...
वसीम(हँसता हुआ)- वो तो बस दिखाने के लिए....नही तो मैं फस जाता तो...क्या करूँ...जोश मे आ कर बीच रास्ते मे ही उसे...
मैं वसीम की बात सुन कर शॉक्ड था...वो कितनी आसानी से हँसते हुए अनवर के मर्डर को बता रहा था.....
वसीम(हँसता हुआ)- उस दिन मैने उसे बहुत समझाया...पर वो तो सराफ़त का पुतला था...माना ही नही...
फिर मैं क्या करता...मेरे पास एक चाकू था....बड़ा नुकीला....
बस...गुस्से मे आ कर मैने उसके जिस्म मे एक के बाद एक...घापघाप चाकू घूप दिए....
एक..फिर...दो..फिर तीन...बस भोक्ता रहा...भोक्ता रहा....जब तक उसकी सासे उसके हलक से निकल नही गई...
वसीम यहाँ अपने कुकर्म को हँसते हुए खड़े-खड़े सुना रहा था और वहाँ मेरे चेहरे पर खून उतर रहा था....
वसीम- मुझे याद भी नही कि साले को कितनी बार चाकू मारा....मैं तो बस घोपता गया...घोपता गया...घोपता....आआआआआहह...
""ढ़हाायययययययययईए""
""आअहह....""
""ढ़हााआयययययन्न्नणणन्""
""आआहह....""
तभी अचानक रूम मे तीन फिरे हुए और वसीम के जिस्म मे छेद कर गये...
आवाज़ सुन कर हम सबकी नज़रे बेसमेंट के एंट्रेन्स पर घूम गई...
पर इससे पहले कोई कुछ बोलता...2 फाइयर और हुए और वसीम के जिस्म को चीर गये.....
हम सब अवाक हो कर सामने वाले सक्श को देख ही रहे थे कि तभी वसीम कराहता हुआ मुड़ा और फिर एक फाइयर हुआ...
लास्ट फाइयर वसीम के माथे पर होल बनाता हुआ निकल गया और इसी के साथ वसीम कटे पेड़ की तरह फर्श पर जा गिरा.....
और हम सब शॉक्ड रह गये....
मैं कभी वसीम को देखता तो कभी गोली चलाने वाले को....लेकिन मेरे मुँह से एक शब्द भी नही निकल रहा था....
समझ ही नही आ रहा था कि मैं क्या बोलू...क्या करूँ.....?????????
गोली चलने के बाद पूरे रूम मे ऐसी खामोशी छा गई थी कि जैसे वहाँ पर कोई जिंदा इंसान मौजूद ना हो...किसी के मुँह से शब्द तो निकलना दूर ...उनके साँस लेने की आवाज़े भी नही आ रही थी...शायद सबकी साँसे हलक मे अटक कर रह गई थी....
वसीम गोलियाँ खा कर खून से लत्पथ फर्श पर पड़ा था और उसे मारने वाला सीडीयों के पास खड़ा था....
ये सब देख कर सोनू और सोनम भी चेयर छोड़ कर खड़े हो चुके थे और हमारी तरह ही सकते मे थे.....
मैं, रिचा , रिया, सोनू और सोनम.....सब के सब बस वसीम की लाश और उसे लाश बनाने वाले सक्श को बारी-बारी देख रहे थे....
लगभग 2 मिनिट तक रूम को खामोशी ने जकड़े रखा....किसी की भी हिम्मत नही हुई इस खामोशी को तोड़ने की...सिबाए मेरे....
और उसकी वजह ये थी कि वसीम को मौत के घाट उतारने वाला मेरा खास दोस्त था....अकरम....
हाँ...अकरम ने ही अपने सौतेले बाप के जिस्म को गोलियों से छल्नि कर दिया था....
अकरम को देख कर मेरे अलावा सबके चेहरे पर ख़ौफ्फ फैल गया था....और तब मेरे मुँह से सिर्फ़ एक शब्द निकला....
मैं-अकरम.....
मेरी आवाज़ सुनकर अकरम ने मेरी आँखो मे देखा और आगे बढ़ने लगा....
अकरम का चेहरा अभी भी गुस्से और दर्द से भरा हुआ था....इसका सबूत उसकी लाल हो चुकी आँखे और उनसे निकलते आँसू थे....
अकरम आगे बढ़ते हुए मेरे बाजू मे आया और एक बार फिर से मुझे देखने लगा और फिर आगे बढ़ कर वसीम की लाश के पास पहुँचा....
पहले उसने कुछ पल लाश को देखा और फिर वो वसीम के सर के पास पैरो के बल उकड़ू बैठ गया....
अकरम के हाथ मे अभी भी गन थी...उसने गन को वसीम के माथे पर टीकाया और हँसने लगा....
अकरम- हाहहाहा....आआहाहहाहा.... .हह.. हाहहाहा.....
अकरम की हालत देख कर सब एक-दूसरे को देखने लगे और ये सवाल करने लगे की अकरम को क्या हो गया....
पर मैने फिर से एक बार अकरम को आवाज़ दी...इस बार मेरी आवाज़ कड़क और जोरदार थी....
मैं- अकरम.....
अकरम(मुझे देख कर)- हाहाहा...उठ साले...उठ.....हाहाहा.....अब उठ भी जा...उठ....
और अकरम ज़ोर से हँसने लगा...और फिर हँसते-हँसते उसकी आवाज़ मे दर्द झलकने लगा....
धीरे -धीरे उसकी हसी बंद पड़ गई और उसकी आँख से आँसू निकल पड़े....
अकरम खड़ा हुआ और एक जोरदार किक वसीम के सिर को मारी... और जब तक मैं कुछ बोल पता...उसके पहले अकरम ने एक के बाद एक किक वसीम के सिर पर मारनी शुरू कर दी....
अकरम- आहह....आ...एयेए...आहह...एयेए...
मैं-अकरम...रुक जा...अकरम....
और मैने आगे बढ़ कर अकरम का हाथ पकड़ा पर अकरम नही रुका वो बराबर वसीम को किक मारता गया...और चिल्लाने लगा....
अकरम- एयेए...उठ...उठ साले ...उठ...उठ.. आअहह....
जब मुझे अकरम रुकता हुआ नही दिखा तो मैने उसे कमर से पकड़ा और एक तरफ धकेल दिया....
मैं- अकरम....बस...रुक जा....
अकरम(आगे बढ़ते हुए)- तू हट जा अंकित....हट जा...
अकरम जैसे ही आगे आया तो मैने उसे पकड़ कर पीछे धकेल दिया...
मैं(चिल्ला कर)- बस. .अब रुक जा वरना....
अकरम(मुझे घूरते हुए)- हट जा अंकित...मैं कहता हूँ हट जा...मैं उसे जिंदा नही छोड़ूँगा....
मैं(चिल्ला कर)-वो मर चुका है....मर गया वो.. समझा....
मैं- हाँ...मर गया...अब तू चुप हो जा...बिल्कुल चुप.....
अकरम(अपने मुँह पर उंगली रख कर)- ह्म्म्मु..चुप...आआहहहाहा ......मर गया साला....हाहाहा....(मुझे देख कर)- ह्म...चुप हो गया...चुप...
और अकरम मुँह पर उंगली रख कर खड़ा हो गया....पर अगले ही पल ठहाके मार कर हँसने लगा.....
पूरे रूम मे कुछ देर तक अकरम के ठहाके गूंजते रहे....अकरम हँसते हुए वसीम को गालियाँ बक रहा था और ज़ोर-ज़ोर से हँस रहा था....
और अकरम की ये हालत देख कर बाकी सब बस परेशानी मे उसे देख रहे थे....
काफ़ी देर तक मैं अकरम को रोकता रहा...पर वो नही माना...तो फिर मैने आगे बढ़ कर एक जोरदार थप्पड़ अकरम को जड़ दिया....
थप्पड़ पड़ते ही अकरम की हसी बंद हो गई और वो एक तरफ सिर झुकाए सिसकने लगा...
अकरम(सिसकते हुए)- वो..मर गया...मर गया मेरे बाप का कातिल...मर गया...
जैसे ही अकरम ने चेहरा उठाया तो उसका चेहरा आँसुओ और दर्द से भर चुका था...ये देखते ही मैने अकरम को गले लगा लिया और अकरम ने भी मुझे कस के गले लगा लिया और रोने लगा....
अकरम(रोते हुए)- अंकित...इसने मेरे डॅड को....
अकरम इससे ज़्यादा कुछ बोल नही पाया बस सिसकते हुए रोने लगा और उसका दर्द देख कर मेरी आँखो मे भी आँसू निकल आए....
अकरम मुझे अपने गले से लगाए रोता रहा और मैं उसे दिलासा देते हुए चुप करता रहा...
करीब 5-6 मिनट बाद अकरम का रोना कम हुआ तो मैने उसे ले जा कर चेयर पर बैठाया और रिया से पानी मग़वा कर उसे पानी पिला दिया....
फिर अकरम का रोना बंद हो गया...और रूम मे एक बार फिर से खामोशी छा गई......
मैं- अकरम...तू ठीक है ना....
अकरम मेरी बात सुनकर मुझे देखने लगा...पर अब वो एक शब्द भी नही बोला....बस थोड़ी देर बाद सिर हिला कर इशारा कर दिया और फिर से आँखे झुका ली....
मैं फिर अकरम के पास जा कर झुका और उसके कंधों पर हाथ रख कर दुवारा वही सवाल दोहराया....
इस बार अकरम ने मुँह खोल दिया...लेगीं बस ह्म्म बोल कर रह गया....
मैं(उठ कर)- ओके...वो गन मुझे दे...जल्दी...
अकरम(मुझे देख कर)- क्या...गन...क्यो...
मैं- सवाल नही...बस गन दे...और ये बता कि तू यहाँ पहुँचा कैसे....
मैने लास्ट लाइन इतनी ज़ोर से कही कि रिया तो दुबक ही गई....पर अकरम पर कोई असर नही हुआ...उसने बस अपनी गन मेरी तरफ बढ़ा दी और खामोश नज़रों से मुझे देख कर नीचे देखने लगा ...
मैं(चिल्ला कर)- मैं कुछ पूछ रहा हूँ....तू यहाँ क्यो आया....
अकरम(धीरे से)- मुझे ज़िया ने बताया कि डॅड...मतलब वसीम गन ले कर निकला है...तो मैं....(चुप हो गया )
मैं- तो मैं क्या...आगे बोल...
अकरम- मुझे लगा कि वसीम तुझे मारने.....
मैं(बीच मे)- बस....समझ गया....इस बारे मे बाद मे बात करेंगे....
अकरम(मुझे देख कर)- मैने जो किया उसका मुझे कोई अफ़सोस नही...इसने मेरे डॅड को और...
मैं(तेज आवाज़ मे)- बोल ना बस...बाद मे बात करेंगे...अभी तुझे यहाँ से जाना होगा....
अकरम(हैरानी से)- जाना...क्यो...मैने जो किया वो पूरे होश मे किया ...और अब मैं क़ानून की नज़र मे गुनहगार हूँ.....
मैं- ज्म..तो तू क्या चाहता है अब...
अकरम- इसमे चाहना क्या....मैं अपने गुनाह की सज़ा भुगतने के लिए तैयार हूँ....
मैं(गुस्से मे)- पर मैं तैयार नही...इसलिए अपना मुँह बंद रख और निकल यहाँ से ....
अकरम- नही अंकित...मैं ऐसा नही कर सकता....तू जानता है कि मैं क़ानून की कितनी इज़्ज़त करता हूँ...
मैं- इज़्ज़त माइ फुट....मुझे क़ानून से कुछ लेना-देना....अभी मुझे सिर्फ़ तेरी फ़िक्र है...सिर्फ़ तेरी...समझा तू...
अकरम- पर....मैं...
मैं(चिल्ला कर)- चुप...बस...अब मुझे कुछ नही सुनना....मैने कहा ना...
तभी सीडीयों पर किसी के आने की आहट हुई और हम सबकी निगाहे सीडीयों की तरफ टिक गई...