कुछ ही पॅलो मे हमारे सामने इंस्पेक्टर .आलोक और उनके 2 खास साथी हमारी नज़रों के सामने आ गये....
रूम मे इस वक़्त पोलीस की वर्दी देख कर सबकी सिट्टी-पिटी हम हो गई...एक तो पहले ही सब वसीम की मौत से परेशान थे उपर से पोलीस....ये तो आग मे घी का काम कर गये....
आलोक जैसे ही नीचे आए..वैसे ही आगे बढ़ते हुए सीधे वसीम की लाश के पास पहुँचे और निरीक्षण करने लगे.....
आलोक(कुछ देर लाश देखने के बाद)- ह्म्म...काफ़ी गुस्से मे मारा इसको....पूरा जिस्म छल्नि कर दिया....वैसे किया किसने...
आलोक के पूछते ही रिचा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाती हुई आगे आ गई...
रिचा- सर...इसने...हाँ..इस अकरम ने मारा इसे...और ये अंकित भी साथ है इसके....इन दोनो को पकड़ लो सर...दोनो को...
रिचा का अचानक यू बोलना मेरे लिए हैरानी की बात थी...शायद रिचा पोलीस को देख कर अपने आप को बचाने के चक्कर मे थी.....
आलोक- आप कौन...और यहाँ कैसे....
रिचा- मैं..मैं रिचा हूँ..और ये मेरा घर है सर...
आलोक- ओह्ह...तो ये आपका घर है...तो बताइए...आख़िर आपके घर मे ये सब चल क्या रहा है....
रिचा- सर...वो ..ये अंकित ने मुझे और मेरी बेटी को डरा-धमका कर ये सब नाटक किया...और फिर इसके दोस्त ने आ कर वसीम को मार डाला...आप इन दोनो को गिरफ्तार कर लीजिए...
आलोक(मुझे घूरते हुए)- तो अंकित ने ये सब नाटक रचा...हाँ...वैसे रिचा जी...क्या आप बता सकती है कि यहाँ क्या हुआ था...
रिचा- जी सर..मैं शुरू से बताती हूँ....
और फिर रिचा ने मेरे वहाँ आने से ले कर अब तक की सारी बातें आलोक को बता दी...
आलोक- ओह...तो आपका कहना है कि वसीम ने अंकित पर गोलिया चलाई...और अंकित बच गया...कैसे...
रिचा- हाँ सर...वो अंकित वहाँ से गायब हो गया था...और..और फिर आ गया...और...
रिचा जल्दी-जल्दी मे बोल गई और उसकी बात सुनकर आलोक ठहाका मार के हँस दिया और उसके साथी भी उसका साथ देने लगे....और मेरी भी मुस्की निकल गई...
आलोक(हसी रोकते हुए)- रिचा जी...आप कहना क्या चाहती है...क्या अंकित सूपरमन है जो गोली खाने के बाद भी जिंदा खड़ा है...और तो और उसके जिस्म पर एक भी गोली का निशान नही...
रिचा- मैं..मैं सच कह रही हूँ सर...ऐसा ही हुआ है...
आलोक- पर मैं आपकी बात...
मैं(आलोक को टोकते हुए)- सर..इसे छोड़ो...और आगे क्या करना है वो बताइए....
आलोक अकरम की तरफ बढ़ते हुए बोला...और उस तक पहुँचने के पहले ही मैने वो गन आलोक के हाथ मे पकड़ा दी...
मैं- ये रही...
आलोक- गुड...अब ..अकरम...तुम आराम से घर जाओ....
अकरम(चौंक कर)- घर जाउ...पर सर मैने...
मैं(बीच मे)- सुना ना...घर जाओ...बाकी बातें बाद ने करेंगे...चल जा...
फिर अकरम कुछ देर मुझे और आलोक को देखता रहा और फिर मेरे इशारा करने के बाद वो वहाँ से निकल गया ...
अकरम के जाने से रिचा सबसे ज़्यादा हैरान थी...इसलिए वो फिर से बोल पड़ी...
रिचा- सर...आपने उसे जाने क्यो दिया...उसी ने ये सब किया...उसे पकड़ लीजिए...
आलोक- वैसे रिचा जी...पकड़ने की बात है तो मैं आपकी सबसे पहले पकडू..क्योकि ये सब आपके घर मे हुआ..आपकी जानकारी मे...और आपकी आँखो के सामने...तो इस हिसाब से तो आप भी लफडे मे फस गई ना...
रिचा- पर. .पर मैने बताया तो..कि...
मैं(बीच मे)- रिचा...चुप हो जाओ...(रिचा को घूर कर)- तुम्हे तो मैं बाद मे देखुगा...
आलोक- अंकित...तुम इन दोनो(सोनू और सोनम) को भी भेज दो....और इन्हे बता भी देना...
मैं- ह्म्म..वैसे वो ब्लड रिपोर्ट का क्या हुआ...
आलोक- वो मॅच हो गई...तुम सही थे...
मैं(वसीम की लाश देख कर)- तो मुजरिम हमारे सामने है...पर अफ़सोस इस बात का है कि ये जिंदा नही रहा...जिंदा होता तो शायद कुछ पता चल जाता कि उस फार्महाउस मे हुआ क्या था...
आलोक(सिर पकड़ कर)- वही तो...तुमने अकरम को रोका क्यो नही...
मैं- हुहम...रोकता तो तब..जब मौका मिलता....उसने तो मौंका ही नही दिया...आते ही गोलियाँ चला दी...
आलोक- खैर...जो हुआ सो हुआ...अब ये गन ले जाओ और इसे गायब कर दो...बाकी मैं देख लूगा...
मैं- ओके...थॅंक यू...
फिर आलोक ने मुझसे हाथ मिलाया और अपने साथियों से लाश उठाने और वहाँ की सॉफ-सफाई करने को बोल दिया....
ये सब देख कर रिचा की आँखे फटी रह गई....पर वो कर भी क्या सकती थी...चुपचाप रही...
फिर मैने सोनू और सोनम को घर भेजा और खुद रिचा और रिया के साथ बेसमेंट से बाहर निकल आया...जहाँ रॉनी मेरा वेट ही कर रहा था....
मैं- रॉनी...अब तू भी अपना सेटप निकाल और निकल...
रॉनी - ओके बॉस..
और फिर रॉनी अपना सेटप निकाल कर वहाँ से निकल गया....और रॉनी के जाने के बाद मैं रिचा को देख कर हँसने लगा...
मैं- क्या बोल रही थी...अब बोल..
रिचा(सहमी हुई)- क्क..कुछ नही..मैं तो बस...
मैं(गुस्से से)- जी तो करता है कि तुझे भी वसीम के पास पहुँचा दूं...पर ...अब मेरी बात सुन....तूने जो भी देखा, वो अपने तक रखना...वरना मैं हमेशा के लिए तुझे खामोश कर दूँगा...समझी...
रिचा(डरते हुए हाँ मे गर्दन हिलाने लगी..)
थोड़ी देर बाद आलोक वसीम की लाश को ले कर वहाँ से निकल गये और मैं भी रिचा को वॉर्निंग देकर निकल आया.....
वहाँ से निकल कर मैने सबसे पहले वो गन ठिकाने लगाई जिससे वसीम मारा गया था और फिर घर आ गया....
घर आने के बाद मेरे माइंड मे बस एक ही सवाल चल रहा था कि अब मुझे दो -दो बॅड न्यूज़ देनी है.....वो मैं कैसे दूं....
एक तरफ अकरम के घरवालो को वसीम की मौत की खबर देनी थी तो दूसरी तरफ सोनू और सोनम को उनकी माँ की मौत की खबर भी देनी थी....
पर तभी मेरा माथा ठनका....और मुझे याद आया कि विनोद भी मारा गया है....
मैं(मन मे)- बाकी सब तो ठीक है...पर विनोद की न्यूज़....कैसे संभालुगा मैं अनु को...उसके लिए तो उसका बाप ही सबकुछ था.....
मैं आज अपने आपको सच मे बेबस महसूस कर रहा था...भगवान ऐसा दिन किसी को ना दे जब उसे एक साथ तीन-तीन घरों मे बस न्यूज़ देनी पड़े...और वो भी उन्हे...जो उसके अपने ही हो....
काफ़ी देर तक अपने आप से बातें करने के बाद मैने डिसाइड किया कि आज साम तक सबको न्यूज़ दे दूँगा...फिर जो होगा देखा जायगा......
कमरे मे इस वक़्त सम्राट सिंग दारू के पेग लगा रहा था और वसीम को गालियाँ बक रहा था ...
जबकि उसके पास बैठी उसकी बेटी अपनी ही परेशानियों के बारे मे सोच रही थी....
सम्राट- इस साले वसीम को तो....मैं बोल रहा हूँ बेटी ...मैं इसे छोड़ूँगा नही ...जान से मार दूँगा साले को....
इससे पहले कि सम्राट की बेटी उसकी बात का कुछ जवाब देती या कहती....रूम का गेट खुला और सामने से सरद आ गया....
सरद- सुजाता....तू आ गई. ...
सुजाता- जी भैया...पर आप अकेले आए...बड़े भैया कहाँ है....
सम्राट(हैरानी से)- क्या हुआ...वो आ रहा है कि नही..
सरद(तेज साँसे लेते हुए)-ह्म ....वो आ रहे है...थोड़ी देर मे...
सम्राट(खड़ा हो कर)- पर तू ऐसे हाफ़ क्यो रहा है....क्या हुआ....
सरद- कुछ नही...बस दौड़ कर आया...इसलिए...
सुजाता(हैरानी से)- पर आपको दौड़ना क्यो पड़ा....कोई आपके पीछे था क्या...
सरद- नही...बस मुझे ऐसा लगा तो मैं भागने लगा....फिर देखा तो कोई नही था...
सुजाता- ठीक है...आप बैठिए....लीजिए पानी पीजिए....
फिर सुजाता ने सरद को पानी पिलाया और तीनो बैठ कर बातें करने लगे....
सरद- सुजाता...तेरा काम कहाँ तक पहुँचा....सब ठीक चल रहा है ना....
सुजाता- ठीक तो है...पर...वो अंकित...
सम्राट(सीप मार कर)- अंकित...साले को तभी ख़त्म कर देता तो सही था ...
सरद- क्या सही था....वो मर जाता तो सारी दौलत हाथ से जाती...
सम्राट(गुस्से से)- तो अभी कौन सी हाथ मे है..हाँ...
सम्राट की बात ख़त्म होते ही रूम मे एक चौथी आवाज़ गूँज उठी....
""हाथ मे नही है तो आ जाएगी....बस थोड़ा सबर से काम करना होगा...""
ये आवाज़ सुनते ही सम्राट, सरद और सुजाता की नज़रें गेट की तरफ घूम गई और सामने खड़े सक्श को देख कर तीनो के चेहरे चमक उठे....
सुजाता(आगे बढ़ कर)- बड़े भैया...
सुजाता आगे बड़ी और उस सक्श के गले लग गई...और उस सक्श ने भी बड़े प्यार से सुजाता को गले लगाया और उसका सिर सहलाने लगा....
""कैसी है मेरी गुड़िया...ठीक है ना...""
सुजाता- जी भैया...मैं ठीक हूँ...और आपसे मिल कर तो और भी ठीक हो गई...आइए...हम कब्से आप का वेट कर रहे थे....
""ह्म्म..चल....""
फिर वो सक्श भी सरद और सम्राट के साथ बैठ गया और सुजाता वही पास मे खड़ी हो गई...
सम्राट(पेग बना कर)- लो बेटे...
""जी पिताजी...वैसे...आपने इतने अर्जेंट मे क्यो बुलाया....जानते है ना कि कितना ख़तरा है....""
सम्राट- ह्म..जानता हूँ...पर क्या करूँ...तुझसे मिलने का मन कर रहा था...पता नही क्यो...मेरा दिल घबरा रहा है. .
""दिल घबरा रहा है...पर क्यो....आपको कौन सा डर है...""
सम्राट- डर...बेटा...जिस बाप के पूरे बच्चे अपनी जान ख़तरे मे डाले हुए अपने बाप का बदला लेने मे मसगूल हो...उस बाप के दिल से पूछो...डर तो लगेगा ही...
""ह्म्म..बात तो आपकी सही है पिताजी...पर अब आपको डरने की ज़रूरत नही....डरेगे तो वो लोग...जिन्होने हमे दर्द दिया था....मैं...मैं किसी को भी माफ़ नही करूँगा...सबको सज़ा दूँगा...""
अपने बेटे की बात सुनकर सम्राट के चेहरे पर खुशी उमड़ पड़ी...
सम्राट- मैं जानता हूँ मेरे बच्चे...तू अपने लक्ष्य को हासिल कर के रहेगा...ले...इसी बात पर चियर्स....
""जी...चीरसस्स.....""
फिर थोड़ी देर तक उन चारों के बीच मे बातें होती रही और पेग का दौर चलता रहा.....
लास्ट पेग ख़त्म कर के वो सक्श उठा और सरद को छिपे रहने की हिदायत दे दी...और साथ ही उसे आगे का प्लान समझा दिया....
सरद- ओके भैया....ऐसा ही होगा...पर सुजाता...उसका क्या...
""सुजाता....अरे मुझे अपनी गुड़िया पर पूरा भरोशा है...वो अपना काम पूरा कर के ही आयगी....क्यो गुड़िया..""
सुजाता(मुस्कुरा कर)- जी भैया....वैसे अगर अंकित ना होता तो अब तक तो सारा काम तमाम कर दिया होता मैने...
""ह्म्म..अंकित...वो वाकई स्मार्ट है...उससे बच कर रहना...और हाँ...ग़लती से भी उसके साथ....समझ गई ना...""
सुजाता(चौंक कर)- जी...स..समझ गई...(मन मे)- अब क्या करूँ...मैने तो उसके साथ सब कर लिया...और फिर से मन होता है. ..
""ठीक है...और तेरा पति...उसका क्या हाल है...""
सुजाता- वो मस्त है...वो तो आकाश की जगह सेट हो गया...सब उसे ही आकाश समझते है....यहाँ तक की अंकित भी उसे अपना बाप समझता है...हहहे....
फिर सुजाता हँसने लगी और उसके साथ बाकी सब भी ठहाके मारने लगे....
तभी सुजाता की हँसी रुक गई...उसने खिड़की के पास किसी की परछाई देख ली और इशारे से सबको बता दिया....
सुजाता का इसरा समझ कर सरद चुपके से बाहर गया और थोड़ी देर बाद ही उस घुस्पेठिया को पकड़ लाया...
सरद- ये लो...पकड़ लाया घुस्पेठिये को....अब पूछ लो इससे कि ये है कौन...
उसे देख कर सुजाता की आँखे बड़ी हो गई...तभी सम्राट गुर्रा उठा...
सम्राट- पूछना क्या है...जो भी हो...मार दो....जिंदा छोड़ दिया तो मुसीबत हो सकती है...
सुजाता- सही कहा पिताजी...इसका जिंदा रहना बहुत बड़ी मुसीबत पैदा कर देगा....इसे मारना ही होगा...पर इसे मैं मारना चाहुगी....
सम्राट(मुस्कुरा कर)- ह्म...ये ले...ख़त्म कर दे....
और फिर सम्राट ने आगे बढ़ कर सुजाता को गन पकड़ा दी...और सुजाता ने बिना देरी किए हुए निशाना लगाया....
सुजाता- बहुत जासूसी हो गई...बाकी की उपर जा कर करो...
और फिर रूम मे दो बार गोली चलने की आवाज़ गूजी और इसी के साथ एक और जान जिस्म को छोड़ गई...
और जान लेने के बाद एक बार फिर से सम्राट आंड फॅमिली ने जोरदार ठहाका मारा और जश्न मनाने लगे.......
सहर मे बने एक पार्क मे............
वसीम, सुषमा और विनोद की मौत के बाद मेरा दिमाग़ बहुत ज़्यादा हिला हुआ था....इसलिए नही कि वो मारे गये...बल्कि इसलिए कि मुझे उनकी मौत की खबर उनके घरवालो को पहुँचानी थी.....
आज मैं अपने आपको बहुत कमजोर महसूस कर रहा था....मेरी हिम्मत ही नही हो रही थी किसी के घर मे न्यूज़ देने की...
आज पता चला कि लोग सच ही कहते है कि किसी को बुरी खबर देना आसान काम नही...
ये सब सोचते हुए जब मेरा मन बिचलित हो उठा तो मैं घर से निकल कर एक पार्क मे आ कर बैठ गया और अपने आदमी के आने का वेट करने लगा.....
पार्क मे बैठे हुए पन्छियो की आवाज़, फूलो की खुसबू और पेड़ो की सरसराहट ने मेरे दिमाग़ को थोड़ी राहत तो दी...लेकिन अभी भी मेरे अंदर हलचल मची हुई थी....
थोड़ी देर बाद स भी वहाँ पहुँच गया और मेरी हालत देख कर मुझे दिलासा देने लगा.....
स - क्या हीरो....यू मुँह लटका कर क्यो बैठा है....
मैं(चौंक कर)- आप...आइए...
स(मेरे सामने मे बैठते हुए)- ह्म्म..तुमने मेरी बात का जवाब नही दिया....
मैं(नम आँखो के साथ)- जवाब...शायद मेरे पास कोई जवाब ही नही....
स- जवाब नही...नही...तुम ऐसा मत बोलो...क्योकि मैं जिस अंकित को जानता हूँ वो हर बात का जवाब रखता है....
मैं(गर्दन हिला कर)- नही...ऐसा कुछ नही....कभी-कभी हालात हर इंसान को मजबूर कर देते है....शायद इस वक़्त हालात मेरे खिलाफ है...
स(थोड़ी कड़क आवाज़ मे)- नही...मैं नही मानता....हालात इंसान को नही बनाते....इंसान ही हालातों को बनाता है....समझे.....
मैं(सामने देख कर)- शायद...पर इंसान के बनाए हालात उसी को मजबूर कर देते है....है ना...
स- ह्म्म...मानता हूँ...पर ये भी मानता हूँ कि जो इंसान हालातों के आगे मजबूर पड़ जाए वो बुजदिल होता है...अरे इंसान तो वो है जो हर हालात का सामना करे...उससे निकालने की कोसिस करे और अपने दम पर हालातों को अपने अनुकूल बना दे....
मैं(फीकी हँसी के साथ)- ये सब किताबी बातें है...हक़ीक़त नही...
स(थोड़ा गुस्से से)- हक़ीक़त ही किताबो मे लिख कर किताबी बात बन जाती है बच्चे.....किताब हक़ीक़त नही बनती....
मैं(तिलमिला कर)- जानता हूँ...सब जानता हूँ...पर मैं...मैं नही जानता कि मुझे क्या करना है..और कैसे....
स(गुस्से से)- ये बात अलका और आकाश का बेटा बोल रहा है....छ्ची...शर्म आनी चाहिए तुम्हे.....
मैं(स को देख कर)- आप सॉफ+सॉफ बोलिए ना...कि आप कहना क्या चाहते है...मेरे मोम-डॅड को बीच मे मत लाइए प्ल्ज़....
स- कहना क्या है....उठो...और इन हालातों का सामना करो...यू बैठ कर आँसू बहाने से कुछ नही होने वाला.....याद करो अपने माँ-बाप को...वो किन हालातों का सामना करके आगे बढ़े....और उनके सामने तो तुम्हारे हालात कुछ भी नही...समझे...
मैं(आँखो मे आँसू लिए)- तो क्या करूँ....उनका दिल चीर देने वाली न्यूज़ दे दूं...जिनको...जिनको मैं प्यार करता हूँ...जो मेरे अपनो के जैसे है..हाँ...
स(मेरे कंधे पर हाथ रख कर)- बच्चे....कभी-कभी अपनो को भी दर्द देना होता है...तुम्हे भी आज ऐसा ही करना होगा....
मैं(रोते हुए)- नही...मुझसे नही होगा...मुझ मे इतनी हिम्मत नही है...
स(खड़ा हो कर गुस्से मे)- तो रोता रह यहाँ बैठा-बैठा....और हाँ...ये भी भूल जाना कि तेरे कोई दुश्मन भी है...
स की बात सुनकर मैने गर्दन उठा कर उसे देखा...उसकी आँखे गुस्से से बड़ी हो चली थी....
स- ऐसे क्या देख रहा है...सब बोल रहा हूँ...तू इस लायक है ही नही कि अपने दुश्मनो से टक्कर ले सके....समझा...
मैं(खड़ा हो कर)- क्या मतलब...और मेरे दुश्मनो की बात कहाँ से आ गई...वो मॅटर अलग है...ये अलग...
स(बीच मे)- नही...अलग नही है....किस रास्ते पर तू आगे बढ़ना चाहता है...उसमे इससे भी बुरे हालात मिलेगे...इससे ज़्यादा दर्द देना होगा अपनो को...समझा....
स की बात सुनकर एक बार फिर मेरा माथा ठनका.....और मैं उसे घूर्ने लगा....
स- घूर्ो मत...ये सच है....अपने दुश्मनो को ख़त्म करने के लिए तुझे अपनो को भी दर्द देना होगा...ऐसा दर्द कि शायद वो बर्दास्त ना कर पाए....
मैं(स को घूरते हुए)- आप..आप किसकी बात कर रहे है...
स- तेरे दुश्मनो की और किसकी...
मैं(ज़ोर से)- तो इसमे मेरे अपने कहाँ से आ गये...हाँ...
स- अपने...शायद वैसे ही जैसे वसीम , और विनोद के साथ अकरम और अनु आ गई....
मैं(हैरानी से)- पर अब कौन आ सकता है...मतलब रिचा हो या सम्राट...वो तो...
स(बीच मे)- ये वक़्त ये सब सोचने का नही...वो आगे की बात है...अभी तुम वो सोचो जो तुम्हारे सामने है...जाओ और सामना करो अपनो का...जाओ...
मैं(झल्ला कर)- कैसे सामना करूँ...नही...ये मुझसे नही होगा...
स - तब तो मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ेगा कि अलका ने अपनी कोख से एक बुजदिल को पैदा किया है...
स की बात सुनकर मेरी आँखो मे गुस्सा उतर आया और मैने स की गर्दन दबोच ली...और उसकी गर्दन पर शिकंजा कसते हुए बोला....
मैं- मेरी माँ का नाम लिया तो....
स(मुस्कुराते हुए)- क्यो...सच्ची बात कड़वी लगी...हाँ...
मैं(गुस्से से)- चुप कर...मैं एक लब्ज भी नही सुनना चाहता...
स ने अचानक दाव पलटा और मेरे हाथो को अपनी गर्दन से झटक कर अलग कर दिया....
स(चिल्ला कर)- सुनना पड़ेगा....बार-बार सुनना पड़ेगा....समझा...और अगर नही सुनना है तो ये बुजदिली छोड़ और सामना कर...यहाँ बैठ कर हालातों पर आँसू मत बहा....
मैं स की बात सुन कर गुस्सा तो हुआ..पर उसकी बात को समझ कर गुस्से को काबू कर लिया और फिर अपने आँसू पोछने लगा...
स- अब जा...और दिखा मुझे ....कि तू वाकई उस माँ का बेटा है जो बुरे हालातों मे टूटना नही जानती थी...बल्कि मुश्किल से मुस्किल हालातों मे रास्ता बना लेती थी...
मैं स की बात सुनकर थोड़ा चौंका...पर फिर अपनी भावनाओ को दबा कर उसे घूरा और वहाँ से जाने लगा....
मैं(जाते हुए)- अब काम ख़त्म कर के ही मिलुगा आपसे.....आकाश और अलका ने बुजदिल को जन्म नही दिया...ये मैं दिखा दूँगा....
मैं गुस्से से फनफनाता हुआ वहाँ से निकल गया और मेरे पीछे स खड़ा हुआ मुस्कुरा उठा....
स(अपने आप से)- माफ़ करना अलका...आज तेरे बेटे को बहुत कुछ बोल गया...पर ये उसी के लिए ठीक होगा...क्योकि अगर आज वो टूट जाता तो आगे के हालातों मे क्या करता....आगे तो उसे इससे भी मुस्किल हालातों का सामना करना है...ह्म ..सॉरी अलका...
करीब 30 मिनट के अंदर अनु 5 बस्र रोते-रोते बेहोश हुई...जो सॉफ बता रहा था कि उसे अपने डॅड से कितना प्यार था....
अनु की हालत देख कर मेघा ने अपने आपको मजबूत किया और रक्षा को समझाते हुए उसे गले लगा लिया....
और दूसरी तरफ मैं अनु को अपने गले से चिपकाए बैठा रहा...
इस बीच रजनी आंटी ने संजू के पापा को और बाकी रिलेटिव्स को ये बॅड न्यूज़ दे दी...
शाम तक संजू के घर मे लोगो का जमाबाड़ा लगा हुआ था....संजू के पापा अपने भाई की मौत पर फुट-फुट कर रो रहे थे..और संजू उन्हे संभालने मे लगा हुआ था....
इस बीच इंस्पेक्टर.आलोक ने सुषमा, वसीम और विनोद की डेड बॉडीस को उनके घर तक पहुँचा दिया था....
जब मुझे लगा कि अनु थोड़ा नॉर्मल हो गई तो मैने उसे रजनी आंटी को सौंपा और संजू से क्रियाकर्म का इंतज़ाम करने का बोल कर वहाँ से निकल गया....
रात होने तक तीनो की अंतिम यात्रा निकल गई थी...
पहले सुषमा ...फिर विनोद और फिर वसीम....
एक-एक करके सब मिट्टी मे मिल गये....पर उनके घरवाले ...वो तो उनकी यादो मे बदहवास हुए रोते रहे...
रात को सबसे पहले मैं कामिनी के घर पहुँचा....वहाँ जाकर सोनू को समझाया ....कि वो ही घर जा मैं मेंबर है...इसलिए उसे खुद को संभाल कर आगे बढ़ाना होगा और अपनी बेहन और बाकी सब को संभालना पड़ेगा...
सोनू को समझा कर मैं संजू के घर गया...वहाँ की हालत पहले से ठीक थी...
क्योकि रजनी आंटी, उनके पति और संजू ने मेघा, अनु और रक्षा को संभाल लिया था...
अनु ने रोना तो बंद कर दिया था...पर वो अब तक एक शब्द नही बोली थी...शायद इस दर्द से उभरने मे उसे टाइम लगेगा...
वहाँ का महॉल देखने के बाद मैं अकरम के घर पहुँच गया...जहाँ मैने रुकने का फ़ैसला किया था...क्योकि मुझे अकरम की सबसे ज़्यादा टेन्षन थी...कही वो अपने आप को इस सब का ज़िम्मेदार मानकर कुछ ग़लत ना कर बैठे....
इसलिए मैने पारूल को संजू के घर छोड़ा और खुद अकरम के घर रुक गया.....
रात जैसे-जैसे रात घहराती गई वैसे-वैसे घर मे रोने की आवाज़े कम होती गई....
एक तरफ सादिया ने ज़िया और गुल को ले जा कर संभाला तो अकरम ने अपनी माँ को...और जूही की ज़िम्मेदारी मुझे मिली...
आधी रात तक मैं जूही को समझाता रहा पर उसने एक शब्द भी नही बोला बस रोती -रोती सो गई...
वहाँ सबनम के रूम मे अकरम का साथ देने उसकी गर्लफ्रेंड रूही भी मौजूद थी...
इन दोनो से जैसे-तैसे सबनम को सुलाया और फिर अकरम ने मुझे मेसेज कर के वसीम के रूम मे बुला लिया....
मैं- अकरम...तू ठीक है ना...
अकरम(अपनी गर्दन हिला कर)- ह्म...
मैं- चल बैठ कर बात करते है...
फिर हम दोनो बैठ तो गये...पर अगले 5 मिनिट तक कोई कुछ भी नही बोला...
मैं इसलिए चुप था क्योकि मुझे सझ नही आ रहा था कि अकरम को क्या कहूँ....क्योकि उसने ये दर्द अपने आप को खुद ही दिया था....
भले ही अकरम ने गुस्से मे आ कर वसीम को मार डाला था पर अंदर ही अंदर वो अपनी करनी पर पछता रहा था...ये उसका चेहरा सॉफ बयान कर रहा था....
थोड़ी देर की खामोशी के बाद मैने अकरम के कंधे पर हाथ रखा तो वो थोड़ा सा झटका खा कर मुझे देखने लगा....
मैं- क्या सोच रहा है....
अकरम(लंबी साँस ले कर)- कुछ..कुछ नही...बस मैं....
और अकरम कुछ कहते-कहते रुक गया....
मैं(अकरम का कंधा दबा कर)- तू अपने आप को दोष मत दे....
अकरम(सिर हिला कर)- ये मुमकिन नही....मेरे लिए तो नही...
मैं- मुमकिन है...बस ये बात दिमाग़ मे डाल के कि वसीम की मौत का ज़िम्मेदार मैं हूँ मैं...ठीक है...
अकरम मेरी बात सुनकर कुछ कहने को हुआ तो मैं फिर बोल पड़ा...
मैं- नही अकरम...मैं ये बात जोश मे आ कर नही बोल रहा....सच्चाई यही है...आज अगर वसीम ख़ान हमारे बीच नही रहे तो उसका इकलौता रीज़न सिर्फ़ मैं हूँ मैं...
अकरम(कुछ सोच कर)- संजू और सोनू के घर सब कैसे है....
मैं- हालत ठीक नही...पर पहले से बेहतर है....
अकरम(मुँह लटका कर)- अंकित...ये मौत भी कितनी अजीब होती है ना...आती है एक को और दर्द देती है सबको...
मैं- ह्म...सही कहा....
फिर कुछ देर तक रूम मे खामोशी छा गई....
मैं(कुछ देर तक अकरम को देखने के बाद)- क्या सोच रहा है...
अकरम(आह भर कर)- बस...इस रूम को देख रहा हूँ...बहुत सी यादें है इस रूम के साथ...डॅड...वसीम के साथ....
अकरम बोलते-बोलते रुआंसा हो गया...तो मैने उसे अकेला छोड़ने का फ़ैसला किया ...
मैं(अकरम की पीठ थपथपा कर)- तू बैठ ..मैं बाद मे आता हूँ...
और इतना बोलकर मैं हॉल मे आ गया ...वहाँ मेरी नज़र वसीम के सामान पर पड़ी...जो इंस्पेक्टर.आलोक दे गये थे..
मैने सामान मे से वसीम का फ़ोन लिया और चेक करने लगा....
फ़ोन चेक करते-करते मैने एक वीडियो देखा..जिसे देख कर मेरा माइंड घूम गया.....
मैं- ये कैसे हो सकता है...उसने तो कहा था कि...एक मिनट...कॉंटॅक्ट देखता हूँ....
वीडियो बंद कर के मैने जल्दी से कॉंटॅक्ट लिस्ट चेक की और एक नाम पढ़ कर मुझे फिर से झटका लगा....
मैं(गुस्से से)- तो क्या ये मुझसे झूठ....पता करना होगा....
और मैने तुरंत वो नंबर डाइयल कर दिया....
नंबर लगते ही सामने वाले ने हेलो बोला तो मेरी आँखो मे गुस्सा उतर आया...
सामने से हेलो-हेलो बोला जा रहा था और मेरा गुस्सा मेरी आँखो मे धधक रहा था.....
आख़िरकार मैने गुस्से से फ़ोन कट कर दिया और अपने आप से बोल पड़ा....
मैं- आख़िर मेरे साथ ही क्यो....क्यो....?????
फ़ोन पर आवाज़ सुनने के बाद मुझे गुस्सा भी आ रहा था और अपनी किस्मत पर रोना भी....
मैं(मन मे)- रेणु....मैं सोच भी नही सकता था कि तुम मुझे धोखा दोगि...क्यो...क्यो किया तुमने ऐसा....
रेणु की सच्चाई सामने आते ही मेरी आँखे गुस्से से भरी हुई थी...पर कहीं ना कहीं एक बार फिर से मेरा दिल टूटा था...और इसका सबूत मेरी आँखो से निकलने वाली आँसू की बूंदे थी....
आज मुझे मेरा वो सपना सच जैसा लग रहा था जिसमे मेरे चारो तरफ से हाथ आकर मेरी गर्दन दबोचते थे.....पर मैने ये कभी नही सोचा था कि वो सारे हाथ मेरे अपनो के होंगे......
इस समय मेरे दिल मे कई सवाल उठ रहे थे और हर एक सवाल मे कुछ और सवाल भी छुपे हुए थे....
और इस सब सवालो मे सबसे बड़ा सवाल ये थे कि आख़िर रेणु ने मुझसे झूट क्यो बोला....क्यो उसने सच्चाई छिपा कर रखी....
आज तक तो मैं ये समझ रहा था कि रेणु मेरे कहने पर रिचा और दूसरों के साथ मिल गई....और वो उन सब के मास्टरमाइंड का पता कर के मुझे बताएगी....
पर ये वीडियो देख कर सारी पिक्चर सॉफ हो गई...रेणु ना सिर्फ़ वसीम को जानती थी बल्कि उसके साथ अपने जिस्म की भूख भी मिटाती थी.....
मेरा दिल तो कर रहा था कि अभी रेणु के पास जाउ और उससे पुच्छू कि आख़िर उसने मुझे अंधेरे मे क्यो रखा......
पर मेरे दिमाग़ ने मुझे जाने से रोक दिया....दिमाग़ ने कहा कि नही...अभी नही..पहले ये तो पता कर कि सच्चाई क्या है...और क्यो है...
क्या जो दिख रहा है वही सच है...????
अगर हाँ..तो उसकी वजह क्या है...???
वो रेणु...जो कभी मुझ पर जान छिडकती थी...उसने मुझसे झूट क्यो बोला...सच्चाई क्यो छिपाई...???
क्या वो ये सब दिल से कर रही है या उसकी कोई मजबूरी है.....ये जाने बिना रेणु से कुछ कहना सही नही होगा....
क्या पता वो किसी खास वजह से चुप हो और मेरे कहने से.......नही-नही....अभी मेरा उससे कुछ बोलना सही नही....
सबसे पहले मुझे सच की जड़ तक पहुँचना होगा...तभी कोई एक्शन लुगा....
ये सब बाते सोच कर मैने स को कॉल किया और उसे काम समझा दिया...और फिर मैं रेणु के बारे मे सोचते हुए वही हॉल मे ही सो गया......