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चूतो का समुंदर

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रिचा की कहानी..............

ये बात तब की है...जब मैं छोटी सी...या यूँ कहूँ कि बड़ी हो रही थी.....

बाकी सबकी तरह मैं भी अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी जिंदगी गुज़ार रही थी....

मेरे पिता एक इज़्ज़तदार टीचर थे...और मेरी माँ एक घरेलू महिला....

फिर हम लोग उस गाओं मे आ कर रहने लगे जिस गाओं ने हमारी जिंदगी को बदल कर रख दिया.....

उस गाओं मे आते ही मेरे परिवार की जान-पहचान तुम्हारे दादाजी (आज़ाद) से हुई.....और फिर मेरी बर्बादी की शुरुआत भी......

मैं इस वक़्त उमर के उस पड़ाव पर थी...जब एक लड़की अपनी जवानी मे पहला कदम रखती है.....

इस उमर मे सभी लड़कियों की तरह मेरे दिल मे भी अरमान थे....मेरे अंदर भी जवानी हिलोरे मारती थी....पर मैं अपनी हद जानती थी...इसलिए कभी भी उस हद को पार करने की कोसिस नही की ..जो हद लड़कियों के लिए इस समाज ने बनाई है....

पर तभी कुछ ऐसा हुआ...जिसने मेरी जिबड़गी मे एक तूफान ला दिया....और वो तूफान लाने वाले 2 लोग थे...एक तो मेरी माँ....और दूसरा तुम्हारा दादा ..

हाँ...यही वो लोग थे...जिनकी वजह से मैं इस घटिया रास्ते पर चल निकली...और आज इस नरक मे जी रही हूँ....

असल मे मेरी माँ को आलीशान जिंदगी जीने का सपना था.....पर मेरे पिता से सदी होने के बाद उनके अरमान दिल मे ही रह गये...क्योकि मेरे पिता एक साधारण से टीचर थे.....

पर तभी मेरी माँ की आज़ाद से पहचान हुई....एक तरफ आज़ाद औरत के जिस्म का सौकीन था तो दूसरी तरफ मेरी माँ...पैसो की चाहत रखने वाली.....

इस तरह उन दोनो को अपना-अपना टारगेट मिल गया.....मेरी माँ को आज़ाद ने पैसे दिए...नौकरी दी ..आलीशान जिंदगी दी...और बदले मे मेरी माँ ने आज़ाद को अपना जिस्म दे दिया....और उसकी प्यास बुझाने लगी....

धीरे-धीरे मेरी माँ को आज़ाद का साथ प्यारा लगने लगा...और फिर तो उन्होने आज़ाद को ही अपना पति मान लिया...या यू कहे तो आज़ाद की रखेल बन गई....

वो दोनो मौका मिलते ही चुदाई के सागर मे गोते मारने लगे...यहाँ तक की उन्हे मेरी या मेरे पिता की भी परवाह नही थी....

कभी-कभी तो मेरे पिता जब घर पर होते...तो मेरी माँ बहाने से पीछे वाले बाथरूम मे जाती और आज़ाद को वहाँ बुला कर दम कर चुदवाती....

उनका ये सिलसिला चलता रहा...पर मुझे कोई फ़र्क नही पड़ा...क्योकि मुझे कुछ पता ही नही था....

पर इसी बीच मेरी मुलाक़ात आकाश से हुई....और उससे मिलने के बाद मैं दिल ही दिल मे उससे प्यार कर बैठी....और वो प्यार धीरे-धीरे मेरा जुनून बन गया.....

पर मैं ये भी जानती थी कि आकाश को पाना आसान नही....इसलिए मैने उस प्यार को दिल के कोने मे छिपा कर रखा......

पर दूसरी तरफ एक तूफान मेरी जिंदगी मे आने का इंतज़ार कर रहा था....और आख़िर कार वो दिन आ ही गया.....

मैं उस दिन स्कूल से जल्दी निकल आई....पर निकलते वक़्त मैने ये नही सोचा था कि आज का दिन मेरा नया जन्म होने वाला था....

उस दिन जब मैं घर पहुँची तो मुझे घर अंदर से लॉक मिला...जो होना नही चाहिए थे...क्योकि उस वक़्त तो माँ-पापा अपने-अपने काम पर होते है.....

मैने सोचा की शायद कोई आ गया होगा....पर तभी मुझे माँ की आवाज़ आई ..जो हँसते हुए बोल रही थी कि अंदर चलो ना.....

मैं ये बात सुन कर चौंकी...पर मैने सोचा कि शायद माँ-पापा साथ होंगे...और हसी-मज़ाक हो रहा है.....

मैं इतनी बड़ी तो थी ही कि उनकी बात का मतलब समझ सकूँ....इसलिए मैं मुस्कुरा दी और नॉक करने के लिए हाथ ही उठाया था कि...अगली आवाज़ आई...जिसे सुन कर मैं सन्न रह गई....वो मेरी माँ की थी....

""नही आज़ाद...आज गान्ड मत मारना...कल इतनी मारी थी कि अभी तक दर्द हो रहा है....""

""अरे मेरी जान....गांद मरवाने मे ही तो मज़ा है.....तू बस मज़ा कर...चल आजा....""

ये दो लाइन्स मेरी माँ और आज़ाद ने कही थी....मैं दोनो की आवाज़ पहचान गई....और बातें सुनते ही मेरा दिल धक कर के रह गया.....और मैं बिना कुछ कहे वही बैठ गई...और मेरी आँखो से आँसू छलक गये......
 
काफ़ी देर तक मैं आँसू बहाती रही....पर मेरे मन मे कही ना कही वो सब जानने की इक्षा होने लगी थी ...जो अंदर हो रहा था....

मेरे मन मे गुस्सा तो था...पर एक जिग्यासा भी थी....मैं देखना चाहती थी कि आख़िर मेरी माँ ये सब क्या और क्यो कर रही है....

इसीलिए मैने अपने आँसुओ को संभाला और वहाँ से उठ कर घर के पीछे गई ....जहा मेरा रूम था...और मैं जानती थी की उसकी एक खिड़की का लॉक खराब है...इसलिए वो खुली ही रहती है....

मैं उसी खिड़की से घर मे दाखिल हुई और दवे पैर उस रूम तक पहुँच गई...जहा मेरी माँ अपने जिस्म को आज़ाद से कुचलवा रही थी....

जब मेरी नज़र उन पर पड़ी तो उस वक़्त आज़ाद तेज़ी से मेरी माँ की गांद मार रहा था....और मेरी माँ ज़ोर से चीख-चीख कर आज़ाद को तेज़ी से चोदने को बोल रही थी.....

फिर क्या था....मेरे दिल की धड़कन बढ़ने लगी...और मैं अपने आपको संभाल कर उन दोनो की चुदाई देखने लगी....

उस दिन मेरी माँ ने लंड चूसा....चूत चुस्वाई.....बूब्स चुस्वाए.....चूत चुदवाइ...और फिर लंड रस भी पिया.....

मैने एक ही दिन मे चुदाई के काफ़ी पाठ देख लिए थे.....और ये सब देख कर मेरे जिस्म मे सनसनी पैदा होने लगी थी...मेरे बूब्स कड़क हो गये थे...और चूत से कुछ निकलता हुआ महसूस हो रहा था....

पर मैने खुद को संभाला और चुपके से वापिस घर से निकल आई...और थोड़ा घूमने के बाद घर आ गई....

उस दिन के बाद मेरे जिस्म मे अजीब सी हलचल पैदा हो गई थी...और इसी वजह से मैं बार-बार अपनी माँ की चुदाई देखने के लिए स्कूल से निकल आती और चुदाई देख कर मज़ा लेती....

पर कहते है ना कि छुदाई ऐसी चीज़ है जो देखने से ज़्यादा करने मे मज़ा आता है....और इंसान ना चाहते हुए भी इस दलदल मे खिंचा चला जाता है...

वही मेरे साथ हुआ....पर मुस्किल ये थी कि ना तो मेरे कोई बाय्फ्रेंड था...ना मुझे मेरा प्यार आकाश मिला था...तो मैं किसकी बाहों मे जाती....

यही सोचते हुए कई दिन निकल गये....और मैं माँ की चुदाई देखते हुए उंगलियों से चूत को ठंडा करना सीख गई....

पर एक दिन आज़ाद ने चुदाई के दौरान मेरा नाम लिया तो मैं शॉक्ड रह गई....

आज़ाद ने मेरे हुश्न की तारीफ़ की....खास कर मेरी गांद की....और इससे भी ज़्यादा शॉकिंग बात ये थी कि मेरी माँ ने भी हँसते हुए आज़ाद की हाँ से हाँ मिला दी...

फिर आज़ाद ने मुझे चोदने की बात की...जिसे सुनकर मैं सिहर उठी....पर मेरी माँ ने बोला की ""फसा लो और चोद लो...".... तो मेरा माइंड हिल गया....

मैं सोचने लगी कि कैसी माँ है ये...जो बेटी को ही चुदवाने को हाँ बोल गई....

ये बात मेरे मन मे हलचल मचाने लगी....और उसी बीच मैं भी आज़ाद के तगड़े लंड के बारे मे सोचने लगी....

पता नही क्यो....मैं अब चुदने को तैयार हो गई थी...वो भी आज़ाद से...और उसकी वजह थी....उसका तगड़ा लंड और मेरी माँ की सहमति.....

आख़िरकार एक दिन मैने वो किया जो मुझे नही करना चाहिए था....

जब मेरी माँ की चुदाई शुरू हुई तो मैं नंगी हो कर उन दोनो के पास चली गई....

मुझे यू देख कर दोनो शॉक्ड थे...पर आज़ाद की आँखो मे एक चमक भी थी....

मैं समझ गई कि आज तो मुझे लंड का स्वाद मिल ही जायगा....पर मेरे आने से वो दोनो चुपचाप हो गये थे...कोई कुछ बोल ही नही पा रहा था....

मैने सोचा कि अब मुझे ही कुछ करना होगा...और यही सोच कर मैने आज़ाद के पास जा जर उसका खड़ा हुआ लंड हाथ मे ले लिया और झुक कर मुँह मे डाल लिया....

मेरी माँ फटी आँखो से मुझे देख रही थी...पर मैने तो लंड चूसना शुरू कर दिया....और अपनी माँ को देख कर आँख मार दी....

फिर क्या था....माँ जान गई कि मैं इस खेल का मज़ा लेने आई हूँ...उसने आज़ाद को भी सब बता दिया...और आज़ाद को एक कच्ची कली मिल गई....

आज़ाद ने उस दिन मेरी गांद की सील तोड़ी...और दिन भर मेरी गांद मार कर सूजा डाली....

और कुछ दिन बाद मेरी चूत भी खोल दी...और फिर तो चूत और गांद....दोनो का भरपूर मज़ा लिया....

मेरी माँ भी खुस थी...वो भी हमारे साथ ही सेक्स का मज़ा लेती...और हम दोनो माँ-बेटी आज़ाद की रखेल बन गये....

धीरे -धीरे मेरी सेक्स की भूख बढ़ने लगी...और इसे मिटाने के लिए आज़ाद ने मेरे पापा को दूर गाओं मे ट्रास्फेर करवा दिया...

और फिर तो रात-दिन हम माँ-बेटी उसके लंड के मज़े मारने लगे....

मेरे जिस्म की भूख तो मिट रही थी...पर मेरे प्यार की भूख तो आकाश था....जो मुझे अभी मिटानी थी....

इसीलिए मैने एक दिन आज़ाद को अपने प्यार के बारे मे बताया.....

पर जैसा मैने सोचा था...ठीक उसका उल्टा हुआ....

मुझे लगा था कि शायद आज़ाद मेरे प्यार को समझेगा...पर उसने तो मुझे रंडी बोल कर दुतकार दिया....और आकाश के बारे मे ना सोचने की हिदायत दे दी.....

मुझे गुस्सा तो आया...पर मैं गुस्सा दवा गई...क्योकि मैं करती भी क्या...एक तो आज़ाद का रूतवा...और फिर उसके वो दो दोस्त....अली और मदन...जिनके होते हुए कोई आज़ाद का कुछ बिगाड़ भी नही सकता था.....

पर मैने दिल मे सोच लिया कि अब मैं आज़ाद की बेटी को भी अपनी तरह बना दूगी...तभी मेरे दिल को चैन आयगा....

और आज़ाद को बदमान कर के मिटा दूँगी....पर इसके लिए मुझे आज़ाद को उसके दोस्तो से अलग करना ज़रूरी था...जो नामुमकिन था....पर मुझे उम्मीद थी कि कुछ तो मेरे लिए अच्छा होगा...आज नही तो कल....और फिर ऐसा हुआ भी.....

मैने आरती को अपनी सबसे खास सहेली बना लिया था....पर फिर भी उसे सेक्स के लिए राज़ी नही कर पाई....

पर इसी बीच मुझे पता चला कि आमिर(सरफ़राज़ का भाई) आरती से बेहद प्यार करता है...

मैने सोचा कि आमिर की हेल्प से आरती को बदनाम करू...पर आमिर का प्यार सच्चा था....वो आरती से शादी करना चाहता था...ना कि सेक्स....
 
Kamini wrote: ↑ 15 Aug 2017 11:32
स्वतंत्रता दिवस और श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभ कामनाएं.....//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f-1f3fb.svg//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f64f-1f3fb.svg
 
मैं हर तरफ से नाकामयाब हो रही थी....मुझे किसी तरह आज़ाद को बेइज़्ज़त करना था...पर कैसे....??

टाइम गुज़रता रहा और आज़ाद हम माँ-बेटी के बराबर मज़ा लेता रहा...और मेरे अंदर सेक्स की भूख बढ़ती रही.....

फिर वो वक़्त आया..जिसका मुझे इंतज़ार था....आकृति की शादी का वक़्त.....

आकृति की शादी के दौरान धर्मेश और आरती का प्यार परवान चढ़ने लगा...बस इज़हार बाकी था....ये बात मुझे आरती ने बताई...और मेरी हेल्प मागी....

बस तभी मेरे दिमाग़ मे एक मस्त प्लान आया...जिससे आरती और आज़ाद की बदनामी भी होगी और आज़ाद का उसके दोस्त अली से साथ भी टूट जायगा....

तभी आरती ने बोला कि अगर धर्मेश हाँ करता है तो उसे कल ही मेरे घर रिश्ता ले कर आना होगा.....

मैने आरती से बोला कि तू ग्राउंड मे गढ़े पोल के पास रुमाल रख दे...और अगर धर्मेश ने उठाया तो समझ लेना कि उसकी हाँ है....और नही उठाया तो ना....

आरती ने इसके लिए हाँ बोल दिया....और रुमाल रख कर निकल गई.....वहाँ मैने आमिर को बोल दिया कि मैने आरती को तुम्हारे प्यार के बारे मे बता दिया है....पर वो शर्मा रही है....पर, अब अगर आरती अपना रुमाल पोल के पास रख कर जाती है तो समझ लेना कि उसकी हाँ है...और फिर तू कल उसके घर रिश्ता ले कर चला जाना.....

सब कुछ प्लान के हिसाब से हुआ....आरती रुमाल रख कर चली गई...और उसके रुमाल को देख कर आमिर खुशी से अपने घर भाग गया....और फिर धर्मेश आया और उसने रुमाल उठा लिया...जिसे देख कर आरती खुश हो गई और घर आ गई...और धर्मेश भी ख़ुसी-ख़ुसी घर निकल गया....

सब खुश थे...पर मैं सबसे ज़्यादा खुश थी...क्योकि मैं जानती थी कि कल आरती , आमिर को दुतकारेगी और इसी वजह से अली और आज़ाद का रिश्ता टूट जायगा....

अगले दिन ठीक वैसा ही हुआ...जैसा मैने सोचा था...आरती ने आमिर को दुतकार के भगा दिया...और इसी वजह से आज़ाद ने भी अली को खरी-खोटी सुना दी....

दोनो बाप-बेटे रोते हुए वहाँ से निकल गये....पर आगे जो कुछ हुआ...वो मैने सपने मे भी नही सोचा था ...

आमिर इस दर्द और आरती के दुतकार को बर्दास्त नही कर पाया और घर जा कर फासी लगा ली.....जब अली और उसकी बीवी को ये पता चला तो दोनो अपने बेटे के गम मे पागल से हो गये और जिंदा लाश की तरह बेटे की लाश से लिपटे पड़े रहे....

मैं आमिर के घर का हाल जानने के लिए उसके घर पहुँची तो मैने देखा कि एक आदमी ने उसके घर को आग लगा थी...जिसमे आमिर के साथ-साथ उसके माँ-बाप भी जलने लगे....

वो आग लगाने वाला था सम्राट सिंग.....जो इसका इल्ज़ाम आज़ाद पर लगाना चाहता था...क्योकि कुछ देर पहले ही आज़ाद ने अली को जला डालने की धमकी दी थी....

मैं उस मंज़र को देख कर दहल उठी..और आज़ाद को बताने के लिए मूडी...पर सम्राट ने मुझे पकड़ लिया...और मेरे सामने दो रास्ते खोल दिए....या तो मरो...या उसका साथ दो....

तभी कहीं से सम्राट का बेटा आ गया...जिसने सम्राट को मेरे और आज़ाद के बारे मे बता दिया....मुझे नही पता था कि उसने मुझे कैसे देखा...पर उसके पास इस बात का सबूत भी था...एक वीडियो....

फिर मैने भी मुँह खोल दिया...और सम्राट को बता दिया कि मैं सिर्फ़ आज़ाद के परिवार को बर्बाद करना चाहती हूँ....कुछ भी करो...मुझे कोई मतलब नही...बस आज़ाद के परिवार को मिटा दो....

और इस तरह मैं सम्राट और उसके बेटे के साथ हो ली....

फिर सम्राट ने अपने प्लान के हिसाब से अली के बड़े बेटे सरफ़राज़ को आज़ाद का दुश्मन बना दिया....सम्राट ने सरफ़राज़ को ये यकीन दिला दिया कि उसके परिवार को आज़ाद ने जला दिया ......

मैं भी यही चाहती थी कि कुछ भी हो...बस आज़ाद का परिवार मिट जाए....और फिर मैं सम्राट के साथ-साथ उसके बेटे के साथ भी अपने जिस्म की आग बुझाने लगी......

तो इस तरह हम ने सरफ़राज़ को तुम्हारे परिवार का दुश्मन बना दिया......

ये बात सुनते ही मैने रिचा को एक जोरदार थप्पड़ मार दिया......जिससे रिचा एक तरफ लूड़क गई.....

मैं- साली रंडी...तू औरत है या वेश्या है....तुझे पता है..तेरी वजह से कितनी जाने गई है...कुछ पता भी है तुझे...हाँ....

रिचा(संभाल कर)- हाँ...मैं जानती हूँ...सब जानती हूँ....कि कितनी जाने गई मेरी वजह से.....पर इसके लिए मैं अकेली ज़िम्मेदार नही...समझे....

मैं(खड़ा हो कर)- बकवास बंद कर....तू ही ज़िम्मेदार है सबकी मौत की....मैं तुझे....ओह गॉड....तू आख़िर है क्या...साली रंडी...

रिचा(तुनक कर)- अभी से भगवान याद आ गया.....अभी तो बहुत कुछ जानना बाकी है....या फिर अब कुछ जानना नही चाहते....

मैं(गुस्से से रिचा को घूर कर)- हाँ..जानना है...अभी तो बहुत कुछ जानना है.....आख़िर पता तो चले कि तुझ जैसी रंडी ने क्या-क्या कारनामे किए....

रिचा- दिल थाम लो अंकित...कही धड़कने ना बंद जाए...अभी तो सिर्फ़ मेरा रंडीपन देखा है....मेरा शातिर और खूखार रूप देखना तो बाकी है अभी....

रिचा की बात सुनकर मैं गुस्से से दाँत पीसने लगा....पर तभी मेरा फ़ोन बजने लगा....

मैं(स्क्रीन देख कर)- डॅड....इस समय कॉल क्यो किया....

मैं(कॉल ले कर)- हाई डॅड....क्या हुआ....

और सामने से बात सुनकर मैने माथा पीट लिया.....

मैं- आररीए...ये क्या किया आपने....सब गड़बड़ कर दी....अच्छा एक काम करो....आप मेरे आने तक रूको...फिर कुछ सोचते है...ओके....

और कॉल कट कर के मैं फिर से रिचा के सामने बैठ गया.....

रिचा- क्या हुआ आकाश को....

मैं(मुस्कुरा कर)- मेरे रहते उनका बुरा तो हो नही सकता....खैर...अभी उनकी छोड़...और अपनी सुना....देखे तो तुम्हारा शातिर और ख़ूँख़ार रूप...हाँ...चल...शुरू हो जा....कहानी अभी बाकी है.........

रिचा - ह्म...वो तो है...पर ये कहानी नही हक़ीक़त है...हर एक लब्ज मेरी जिंदगी की कड़वी हक़ीक़त बयान करेगा.....

मैं- तेरी जिंदगी कैसे कड़वी हो गई...हाँ...अरे कडवाहेंट तो तूने घोल दी है....पता नही कितनो की जिंदगी मे....

रिचा(मुझे घूर कर)- ऐसा तुम सोचते हो....मैं नही....

मैं(गुस्से से)- ओह अच्छा....तो तू क्या सोचती है....क्या तुझे अपने किए पर कोई अफ़सोस नही....हाँ...

रिचा(उपर देख कर)- नही...बिल्कुल नही....

मैं(गुस्से से )- तू तो...चल छोड़....तुझसे बहस करने से कोई फ़ायदा नही....तू सिर्फ़ ये बता कि उसके बाद क्या हुआ....मतलब अली की फॅमिली को मिटाने के बाद तूने क्या किया...

रिचा(मुस्कुरा कर)- उसके बाद...उसके बाद ही तो असली काम शुरू हुआ था....
 
मैं- कितनी बड़ी कमीनी है तू...एक परिवार को मिटाने की बात पर तू मुस्कुरा रही है....सच मे...तुझसे बड़ी कमीनी मैने कभी नही देखी....

रिचा(हँसते हुए)- अच्छा....चलो मुझे कुछ तो माना....रंडी के अलावा...

मैं(गुस्से से)- बस...अब हसना बंद कर....चल एक बात बता....तेरी दुश्मनी तो मेरे दादाजी से थी...तो तूने अली के साथ इतना बुरा क्यो किया....हाँ...

रिचा- ओह्ह...लगता है तुझे सब डीटेल मे बताना होगा....तो सुन...कि आख़िर मैने अली को अपना टारगेट क्यो बनाया....सुनोगे तो समझ जाओगे....

मैं(कुछ सोच कर)- मतलब अली के साथ भी तेरी कुछ कहानी है...ह्म्म...चलो...पहले यही बता दो....चलो...पता तो चले कि सच क्या है....

और मैं सोफे पर फिर से पसर गया...और हाथ मे फ़ोन घूमाते हुए आगे की कहानी सुनने लगा....

रिचा की जुवानी...............

असल मे मेरी अली से दुश्मनी उस दिन से शुरू हुई थी....जिस दिन मैं उससे पहली बार मिली......

एक दिन जब आज़ाद मेरी माँ के साथ उसकी फॅक्टरी के कॅबिन मे मज़े मार रहा था.....तभी मैं माँ से मिलने वहाँ पहुँची ....

पर आज़ाद के दोस्त अली ने मुझे कॅबिन मे नही जाने दिया...बल्कि बाहर ही बैठा लिया.....

तब मेरे मन मे एक ख्याल आया...कि क्यो ना मैं अली को अपने दिल की बात बता दूं...आकाश को प्यार करने की बात....

मैने सोचा कि अली , आज़ाद का सबसे खास दोस्त है....अगर अली समझाएगा तो आज़ाद भी राज़ी हो जायगा....

फिर मैने उस बात को घुमा-फिरा कर अली को सब बता दिया...और अली भी इतना समझदार था कि मेरी बात का सही मतलब समझ गया...

पर अली ने फिर वो जवाब दिया...जिसे सुन कर मेरे दिल मे अली के खिलाफ नफ़रत का बीज डाल गया....

अली ने कहा....""देखो बेटा....इंसान भले ही तकनीक का सहारा लेकर आसमान तक पहुँच गया हो...पर उसे पन्छियो से अपनी बराबरी नही करना चाहिए.....इंसान ज़मीन पर ही अच्छा लगता है....आसमान मे नही उड़ सकता....ठीक है...""

अली के जवाब ने मुझे मेरी औकात बताई थी...और ये मुझे एक तीर की तरह अंदर तक चुभ गई थी.....

तभी मैने सोच लिया था कि अगर मौका मिला तो इस इंसान को इसकी औकात ज़रूर दिखाउन्गी....

और वो मौका मुझे आमिर के रूप मे मिला....उस दिन आमिर को आरती ने उसकी औकात दिखा दी...और साथ मे आज़ाद ने अली को भी......

पर बात यही ख़त्म नही होती...ये तो अली की सिर्फ़ एक ही ग़लती थी.....अभी तो और भी है....

अली के खिलाफ मेरी नफ़रत उस दिन और बढ़ गई...जिस दिन आज़ाद ने अली को मेरे साथ मज़े मारने का बोला....पर अली ने ये कह कर मुझे ठुकरा दिया....कि वो रंडियों को बाहों मे लेने का शौक नही रखता.....

उस दिन अली ने मेरे बजूद पर हमला किया था...और उसी दिन मैने सोच लिया था कि इस अली का मैं बजूद मिटा कर रख दूगी....

हालाकी अली की मौत मेरे हाथो नही हुई...पर मैं ही उसके परिवार के ख़ात्मे की ज़िम्मेदार थी....यही सोच कर मैं खुश हूँ....

और हाँ...इससे भी बड़ी ग़लती की थी अली ने...शायद सबसे बड़ी ग़लती....

और वो ग़लती थी आकाश की शादी करवाना.....

आज़ाद ने तो आकाश को घर से दूर कर ही दिया था....पर उस साले अली ने एक पिता की तरह आकाश का ख़याल रखा था....और उसकी शादी अलका से करवा दी....

आकाश की शादी की बात सुनकर मैं टूट गई थी....मेरे बचे-खुचे अरमान भी ख़त्म हो गये थे.....

मैने सोचा था कि किसी तरह से आज़ाद को मजबूर करके अपनी शादी आलाश से करवा लूगी...पर उस अली की वजह से सब ख़त्म हो गया था...

बस...इस दिन से अली की मैं अली की मौत चाहने लगी थी....पर मैने तब ये नही सोचा था कि उसका अंत इस तरह से होगा...और अली के साथ उसकी बीवी और बेटा भी ख़त्म हो जायगा.......

खैर...मेरा इंतकाम तो पूरा हुआ...भले ही कैसे भी हुआ हो....

और फिर मेरा एक ही मक़सद बाकी रह गया था....वो था आज़ाद की बर्बादी....और उसके परिवार की भी....

और इस काम के लिए मुझे सम्राट का साथ मिला...और सम्राट के शातिर दिमाग़ की बदोलत मैने सरफ़राज़ को भी आज़ाद का दुश्मन बना दिया.....

पर ये मत सोचना कि ये काम सम्राट ने किया....असल मे सरफ़राज़ को वसीम बनाने का पूरा दारोमदार मेरा ही है.....

जब अली अपने बीवी और बेटे के साथ जल कर मर गया...तब मैं सम्राट से मिली....

सम्राट ने मुझे बताया कि उसने ये सब आज़ाद से बदला लेने को किया है...और मैं भी आज़ाद की दुश्मन थी...बस...हम दोनो दोस्त बन गये.....

फिर मैने सरफ़राज़ से मिली...और मैने उसे बॉटल मे उतारना शुरू कर दिया....और शुरुआत की अपने जिस्म से....

मैने सरफ़राज़ से 1 हफ्ते तक अपने जिस्म की प्यास बुझाई...और इसी दौरान उसके दिल मे आज़ाद के लिए ज़हर भर दिया....

मेरा तीर निशाने पर लगा....सरफ़राज़ ने आज़ाद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया...और उससे सीधा जा कर भिड़ गया....

पर आज़ाद का रूतवा और पैसा उसके आड़े आ गया और सरफ़राज़ को मायूषी हाथ लगी....

मुझे लगा कि कही सरफताज़ हथ्यार ना डाल दे...इसलिए मैने ही उसे पैसा और पॉवर हासिल करने का रास्ता दिखाया....

मैने ही उसे समझाया कि वो जावेद (जिसने सरफ़राज़ को गोद लिया था) की दौलत हथिया ले....जिससे वो दौलतमंद हो जायगा...और फिर आसानी से आज़ाद से टक्कर ले सकेगा....

पहले तो सरफ़राज़ ने आना-कानि की....पर मेरे जिस्म की गर्मी के आगे पिघल गया और तैयार हो गया.....

फिर उसने ना सिर्फ़ जावेद को रास्ते से हटाया...बल्कि हर एक इंसान को हटाता चला गया...जो उसके और दौलत के बीच आ सकता था.....

और फिर सारी दौलत अपने साथ ले कर सरफ़राज़ उसी सहर मे आ गया जहाँ आकाश रहता था.....एक नये नाम के साथ....वसीम ख़ान....

असले सरफ़राज़ आज़ाद को उसके बेटे की मौत का दर्द देना चाहता था....पर उसी दौरान आज़ाद गाओं से गायब हो गया....और यहाँ सहर मे आकाश ने अपनी बीवी अलका को खो दिया.....

तो इसीलिए सरफ़राज़ ने सहर मे आना ही ठीक समझा...ताकि आकाश पर नज़र रख सके...और आज़ाद के मिलते ही आकाश को मौत दे सके.....

पर इस बीच भी काफ़ी कुछ हुआ....जैसे की सरफताज़ को आकाश और सरिता का रिश्ता पता चलना.....

हाँ...सरिता...शायद तुम उसे ना जानते हो....पर सरिता भी हम मे से एक थी...जो आज़ाद और आकाश के खिलाफ थी....
 
raju raj wrote: ↑ 15 Aug 2017 19:14
please update more and fast

I already read yous post given by you so please write more
 
वो सरिता ही थी...जिसकी वजह से आकाश को घर से दूर जाना पड़ा.....

असल मे सरिता , आज़ाद के दोस्त मदन की बीवी थी....जो बाद मे आकाश की रखैल बन चुकी थी....

वैसे सरिता की कहानी काफ़ी लंबी है....पर उस कहानी का अब कोई मतलब नही....

क्योकि ना तो अब सरिता है और ना ही उसका अपना कोई....उसके अपनो मे सिर्फ़ मोहिनी और मोना ही बची थी...जो कुछ दिन पहले मारे गये....इसीलिए उसको छोड़ देते है....

चलो अब मैं बताती हूँ कि मैने अली की मौत के बाद सम्राट के साथ मिल कर क्या-क्या किया....

ये तो मैं बता ही चुकी हूँ कि मैने सरफ़राज़ को वसीम कैसे बनवाया.....ह्म्म..अब मैं बताती हूँ सम्राट के बारे मे....और उसके बेटो के बारे मे भी....

असल मे सम्राट की बीवी और बेटी मर चुकी थी....जिनकी मौत की वजह आज़ाद था....बस सम्राट ने मुझे इतना ही बताया....

और मैने भी उससे कुछ ज़्यादा नही पूछा...क्योकि मुझे उससे कोई मतलब नही था...मुझे तो सिर्फ़ सम्राट का साथ चाहिए था.....

हाँ...सम्राट के बड़े बेटे की भी एक कहानी है...वो मैं बता सकती हूँ....सुनो....

सम्राट का बड़ा बेटा समर सिंग उसी सहर मे पढ़ता था...जहा आकाश और अलका पढ़ते थे.....

समर दिल ही दिल मे अलका को बेहद प्यार करता था....वो किसी भी हाल मे अलका को पाना चाहता था....पर अलका तो सिर्फ़ आकाश से प्यार करती थी....

और जब अलका ने आकाश से शादी कर ली...तो समर पागल सा हो गया...वो बर्दास्त नही कर पाया....पर चाहते हुए भी आकाश या अलका का कोई नुकसान नही कर पाया.....

फिर समर को अपने पिता से ये बात पता चली कि आलाश का बाप ही उसकी माँ और बेहन की मौत का ज़िम्मेदार था...तो समर का गुस्सा और ज़्यादा बढ़ गया.....

समर ने सोच लिया कि वो आकाश को मिटा देगा और फिर अलका को हासिल कर लेगा.....पर ये इतना आसान नही था.....

तभी समर की मुलाक़ात मुझसे हुई...और मैने उसे ठंडे दिमाग़ से काम लेने को कहा....और यकीन दिलाया कि एक दिन अलका उसको मिल जाएगी....

फिर मैं समर के साथ भी अपने जिस्म की भूख मिटाने लगी.....

और कुछ टाइम बाद मेरे कहने पर ही...मैं और समर इसी सहर मे आ गये...जहाँ आकाश रहता था.....

और यहाँ आकर मुझे कामिनी और दामिनी के बारे मे पता चला...जो मुझे सरफ़राज़ ने बताया....

फिर मैने और दामिनी ने मिलकर अलका की सबसे खास सहेली रजनी और रजनी की फ्रेंड दीपा को भी अपने साथ मिला लिया....

रजनी की तो वैसे भी आकाश से दुश्मनी थी....पर दीपा की कोई दुश्मनी नही थी...वो तो बस सेक्स की भूखी थी...और इसी का फ़ायदा हम ने उठाया....

हम सब ने मिल कर तुम्हे उसी दलदल मे धकेल दिया...जिस दलदल मे तुम्हारे दादा ने हमें फेक दिया था....

हम सब सेक्स की प्यासी हो चुकी थी....हर वक़्त...हर जगह...बस सेक्स ही दिखता था....और इसकी वजह थी...तेरा दादा.... आज़ाद....

हम ने सोचा की तुझे मारने से कोई फ़ायदा नही....बस तुझे सेक्स की दलदल मे डाल दे और ये बात आकाश तक पहुचा दे...तो हमारे दिल को सुकून मिलेगा....और फिर हम तुम दोनो को मार कर अपना मक़सद पूरा करेंगे.....

अब तुम शायद सब कुछ समझ गये होगे....कि जो हुआ...वो क्यो हुआ और कैसे हुआ.....ओह हाँ....वो वीडियो....ह्म्म...तुम ये ज़रूर जानना चाहते होगे कि मैने अपने सगे बाप को और अपने पति को क्यो मारा...है ना.....तो सुनो...ये भी बता ही देती हूँ....

असल मे मेरा बाप बड़ा सीधा और सरीफ़ था...और साथ मे इंसाफ़ पसंद भी.....जिसकी कीमत उसे जान दे कर चुकानी पड़ी.....

असल मे एक दिन मेरे बाप ने मुझे आज़ाद के साथ सेक्स करते हुए पकड़ लिया.....

पर सेक्स के दौरान की बातें सुन कर उसे यकीन हो गया था कि ये सेक्स मेरी रज़ामंदी से हुआ...ना कि कोई जबर्जस्ति से....

फिर मेरे बाप ने मुझे समझाया....मारा भी....पर आज़ाद के खिलाफ कुछ ना कहा....

उसने कहा की कोई भी मर्द औरत की मर्ज़ी के बिना उसे हाथ नही लगा सकता...इसलिए ग़लती तुम्हारी है...आज़ाद की नही.....

बस उनकी यही बात मुझे अच्छी नही लगी कि उसने आज़ाद को बेगुनाह करार दे दिया....

इसलिए मैने भी अपने बाप के खिलाफ बग़ावत कर दी...और उनकी एक ना सुनी....

पर एक दिन मेरे बाप ने मेरा और समर का सेक्स देख लिया....और साथ मे ये भी सुन लिया कि कैसे हम ने अली को उसके परिवार के साथ जला डाला था....

उस दिन के बाद मेरे बाप ने मुझे धमकाना शुरू कर दिया...कि या तो ये सब बंद कर दो...या फिर वो आज़ाद को सब सच बता देगे....

पर बेचारे....अपनी बेटी के प्यार की वजह से आज़ाद को सच नही बोल पाए.....पर अब वो हमारे लिए ख़तरा बन चुके थे....मेरी सेक्स लाइफ के लिए भी...और आज़ाद को मिटाने के मंसूबे के लिए भी.....

आख़िर मैने भी तय कर लिया कि मुझे ऐसा कमजोर बाप नही चाहिए जो मेरे दुश्मन को सही समझे....

तो मैने खुद अपने हाथो से उसे गोली मार दी....पर कम्बख़्त उसी दिन सरफ़राज़ ने मुझे ब्लॅकमेल करने के इरादे से वो वीडियो बना ली....नही तो शायद किसी को कभी पता ही ना चलता कि मेरे बाप को खुद मैने मारा है.....

पर मुझे कोई अफ़सोस नही...मुझे जो सही लगा वही किया....और इसीलिए मैने अपने पति को भी उपर पहुँचा दिया...क्योकि वो भी मेरे मामले मे ज़्यादा टाँग अड़ा ने लगा था....

साला खुद तो बाहर रहता था और मेरे पीछे जासूस लगा दिए थे...ताकि मैं खुल के चुद भी ना सकूँ....

बस....इसीलिए उसे भी ठिकाने लगा दिया...

इतना बोल कर रिचा मुझे देखने लगी....उसकी आँखो मे कोई पछ्तावा नही था.....बल्कि एक खुशी थी...जैसे कोई महान काम किया हो उसने.....

मैं(गुस्से से)- कितनी बड़ी....आअहह...क्या बोलू तुझे....तुझे ज़रा भी पछ्तावा नही...हाँ...

रिचा- पछ्तावा...किस बात का पछ्तावा....हा...मैने जो भी किया वो अपने मक़सद के लिए, अपनी जिंदगी के लिए किया....मुझे कोई पछ्तावा नही....बस एक को छोड़ कर....

मैं- अच्छा...तो कुछ ऐसा भी है जिसका तुझे पछ्तावा है....ज़रा मैं भी तो सुनू.....

रिचा(मुझे घूर कर)- तुम्हे ना मारने का....

मैं(मुस्कुरा कर)- ओह्ह...मुझे मारना था...हाँ...

रिचा- हाँ...और ये काम बड़ी आसानी से हो भी जाता....पर हम ने सोचा कि बच्चे को क्यो मारे....इसे इस्तेमाल करेंगे....बस यही सोच कर हम रुक गये...वरना तभी मार डालते जब तुम बच्चे थे.....बस यही पछ्तावा हो रहा है....

मैं- आहह...खैर...ये पछ्तावा तो रहेगा ही...पर अब कुछ नही हो सकता....अब तो सिर्फ़ तुम मरोगी...और फिर तुम्हारे बाकी के साथी....

रिचा(गुस्से से)- अब मुझे मौत का कोई ख़ौफ़ नही....मेरी जिंदगी तो मेरी बेटी थी...जो तुमने छीन ली...अब तो बस मैं एक जिंदा लाश हूँ....

मैं- ओह्ह...तो जिंदा लाश....और कुछ भी अगर तेरे इस शैतान दिमाग़ मे छिपा हो तो वो भी बता दो....ह्म्म...

रिचा(मुस्कुरा कर)- ह्म...और भी है...और ऐसा है ...कि तुम सुनोगे ना तो मुझे मार ही डालोगे....

मैं- मरेगी तो तू पक्का....पर इतनी आसानी से नही.....बहुत लोगो की मौत का हिसाब देना है तुझे....

रिचा(हँसते हुए)- हहेहेहहे.....मौत का....हहहे.....साले सब मेरी उंगलियों पर नाचते गये...और मर गये....हहहे...दीपा....रश्मि....मेरा बाप...मेरा पति...वसीम का खानदान...और..और वसीम खुद....हाँ...और अकरम ....साला वो समझता है कि वसीम ही शैतान था....जबकि वजह तो सिर्फ़ मैं थी...मैं...
 
तभी रूम का गेट खुलने की आवाज़ आई और तुरंत ही एक गोली चलने की आवाज़ हुई....

""द्ड़हाअयययययईंन...""

मैं(मूड कर)- न्न्ंहिि....रूको...रूको....

""ये औरत जिंदा रहने के लायक नही..."""

""द्द्धहाअयईईए.......द्द्धहााययईईंन्न....""

रिचा- न्णएन्न्...आआआअहह.....

और रूम मे 2 गोलियाँ और चली और साथ मे रिचा की जोरदार चीख से रूम दहल उठा......

रूम मे गोलियों की आवाज़ और रिचा की चीख गूजी ही थी कि मैं अपनी जगह से खड़ा हो गया और रिचा के सामने आ गया.....

मुझे रिचा के सामने देख कर अकरम ने अपनी पिस्टल नीचे कर ली और मुझे गुस्से से घूर्ने लगा....

मैं- अब घूर मत...मैं सिर्फ़ तुझे सच बताना चाहता था...इसीलिए तुझे कॉल कर के रिचा की सारी बात सुनवाई....पर मैं अभी इसे मरने नही दे सकता....

अकरम(गुस्से से)- पर क्यो....तूने सुना नही...इसने क्या-क्या घटिया काम किए....कितनी ही चाले चली और कितने मासूमो की मौत की वजह बनी...हाँ....

मैं- हाँ..सुना मैने...सब सुना....पर फिर भी...मैं इसे मरने नही दूँगा....मुझे अभी और भी बहुत कुछ पता लगाना है...जो सिर्फ़ यही बता सकती है.....संहझहे....

अकरम(मुँह बना कर)- ठीक है...नही मारूगा....ओके...ये ले...ये पिस्टल तू ही रख ले...वरना मैं तो इसे...ये ले...

और इतना बोलकर अकरम ने पिस्टल मेरी तरफ फेक दी और मैने पिस्टल उठा कर अकरम को शांति से बैठने को बोला...

मैं- अब शांत रहना....वैसे ...सब ठीक है ना....

अकरम(बैठते हुए)- ह्म्म...ठीक है...जैसा तूने कहा था.....

मैं- गुड...अब चुपचाप बैठ जा...और हाँ...वो गेट लगा दे पहले....

और अकरम ने गेट लगाया और चुपचाप बैठ गया....जब तक मैं भी अपनी जगह वापिस बैठ गया....

रिचा तो इन गोलियों की आवाज़ से आधी मर ही गई थी...और उपर से अकरम को देख कर तो बिल्कुल से ही....

मैं(रिचा से)- रिलॅक्स...तू मरी नही...जिंदा है....तुझे अभी तक गोली नही लगी...ह्म्म...चल पानी पी ले...अभी बहुत कुछ बकना है तुझे.....

फिर रिचा ने डरते हुए पानी पिया और थोड़ी देर तक लंबी सासे भरती रही.....

मैं- सब ठीक है...डर मत...तुझे अभी कोई नही मारेगा....समझी....

रिचा(सहम कर)- ये यहाँ कैसे....

मैं(मोबाइल दिखा कर)- कमाल की चीज़ है ना ये मोबाइल....है ना....आक्च्युयली इस मोबाइल के ज़रिए अकरम ने वो सब सुन लिया...जो तूने अभी-अभी मुझे बताया था....और वो सब सुनकर उसको गुस्सा आ गया...और अब वो यहाँ है...तेरे सामने....

रिचा(डरते हुए)- म्म..मुझे माफ़ कर ....

मैं(बीच मे)- माफी तो तू बाद मे माँगना....पहले मेरे सवालो के जवाब तो दे दे.....

रिचा- कौन से सवाल...

मैं- अभी तो बहुत से खास सवाल है....और मैं जानता हूँ कि इन सारे सवालो के जवाब मुझे सिर्फ़ तू ही दे सकती है...सिर्फ़ तू....

रिचा(सिर उठा कर)- ह्म....मुझे पता होगा तो सब बता दूगी.....

मैं- ह्म...तो सवाल रेणु से शुरू करते है....मैं जानता हूँ कि रेणु भी मुझे धोखा दे रही है....पर सवाल ये है कि क्यो...और किस लिए....आख़िर उसे मेरे खिलाफ करने वाला है कौन....क्योकि वो अपने आप तो मेरे खिलाफ जा नही सकती ...ये मैं जानता हूँ....तो बताओ....कौन है ...जो रेणु के दिमाग़ से खेल रहा है...हुह...

रिचा(मुस्कुरा कर)- रेणु ...ह्म...बड़ी प्यारी लड़की है....और दिमाग़ भी बहुत तेज है उसका....सच मे....

मैं(कड़क आवाज़ मे)- ये मेरे स्वाल का जवाब नही....मुझे वो बताओ जो मैं जानना चाहता हूँ....

रिचा- ह्म्म ....जानना चाहते हो...वैसे जानना तो तुमने बहुत कुछ है....मेरा मतलब रेणु के बारे मे...

रिचा की बात सुनकर मैने उसे घूर्ना जारी रखा....पर रिचा के चेहरे पर हल्की से मुस्कान तैर रही थी.....

मैं- मुझे तेरी मुस्कुराहट मे कोई दिलचस्पी नही...समझी....

रिचा- जानती हूँ....पर तुम बहुत कुछ नही जानते...बस यही सोच कर मुस्कुरा उठी....

मैं(गुस्से से)- अब बस भी करो....और सॉफ-सॉफ बको....

रिचा- ठीक है...तो सुनो फिर....तुम तो ये भी नही जानते कि रेणु और कोई नही बल्कि तुम्हारी अपनी बेहन है....हाँ...तुम्हारी सौतेली बेहन....समझे.....

मैं(शॉक्ड)- ये...ये क्या बक रही हो तुम.....

रिचा- बक नही रही....सच बता रही हूँ....रेणु का बाप और कोई नही...बल्कि आकाश है...तेरा बाप....

मैं(गुस्से से)- चुप कर....अब एक भी झूठ बोला तो पूरी पिस्टल तेरे सीने मे दाग दूँगा....समझी....

रिचा(हँसते हुए)- मरे हुए को मौत का ख़ौफ़ मत दिखाओ....अगर सच जानना ही है तो सच सुनने का दम भी रखो....

मैं(अपने आप को शांत कर के)- तो तू ये कहना चाहती है कि मेरे डॅड का मेरी बुआ से.....नही...मैं ये मान ही नही सकता....ये झूठ है....

रिचा- सही कहा....तेरे डॅड और आकृति के बीच कुछ नही है.....

मैं- तो फिर तूने ये क्यो बोला साली कि रेणु के पापा मेरे डॅड ही है....हाँ...

रिचा- तुमने अभी आधी बात ही सुनी है....पहले पूरी तो सुन लो....फिर बोलना....

मैं- ओके....बताओ....सच क्या है....

रिचा- जैसे कि तुझे ये नही पता था कि रेणु का बाप आकाश ही है...वैसे ही तुझे रेणु की माँ का भी पता नही.....

मैं(हैरानी से)- मतलब....क्या रेणु मेरी बुआ की बेटी.....

रिचा(बीच मे)- नही....आकृति ने उसे सिर्फ़ पाला है....असल मे वो सरिता की बेटी है.....तेरे दादा के दोस्त की बीवी सरिता....नाम सुना है ना उसका.....

मैं- ह्म्म...सुना है....पर ये कैसे हो सकता है....और अगर ये बात सच है तो मेरे डॅड को इसकी जानकारी क्यो नही है ....

रिचा- ह्म्म...तेरा सवाल सही है....इस सब की ज़िम्मेदार तेरी बुआ है....जिसने ना सिर्फ़ दुनिया से बल्कि अपने भाई से भी रेणु का सच छिपा कर रखा....और उसे अपनी बेटी ही बताया....

मैं- ये कैसे मुमकिन है....मेरे डॅड को इतना तो पता होगा ही कि उनकी बेहन के कितने बच्चे है...हाँ....

रिचा- इस सवाल के जवाब के लिए तो तुम्हे अतीत मे ले जाना होगा.....तभी तुम समझ पाओगे कि जो भी हुआ...वो क्यो हुआ और कैसे हुआ....

मैं- तो फिर बताओ...क्या हुआ था...

एक बार फिर से रिचा ने अतीत के पन्ने खोल कर मैने सामने रखना शुरू कर दिया.....

ये तो तुम जान ही गये हो कि सरिता के आकाश से शारीरिक संबंध थे...और दोनो ही एक दूसरे के जिस्म की आग को कई बार ठंडा कर चुके थे....

पर जैसे ही आकाश को अलका से प्यार हुआ तो उसने सब छोड़ दिया...और अलका को सब सच भी बता दिया....

खैर...आकाश तो सुधर गया...पर सरिता को आकाश का दूर जाना खलने लगा....वो आकाश के सहारे आज़ाद से बदला लेना चाहती थी....ये मैं नही जानती कि किस बात का....

खैर...जब सरिता ने आकाश को खो दिया तो वो तड़पने लगी...और आकाश से नफ़रत भी करने लगी ....पर फिर भी उसे अपने मक़सद के लिए आकाश की ज़रूरत थी.....

इसलिए उसने आकाश को किसी तरह से एक आख़िरी बार सेक्स करने के लिए मना लिया...और इस तरह चुदाई करवाई...जैसे कि आकाश उसका रेप कर रहा हो....

सरिता ने इस चुदाई को कमरे मे क़ैद कर लिया और उसका इस्तेमाल कर के आलाश को सबकी नज़रों मे गिरा दिया और आज़ाद ने गुस्से मे आ कर आकाश को घर से निकाल दिया....

पर उस चुदाई का एक और नतीजा निकला....सरिता प्रेगनेंट हो गई....और उसे माँ बनने का सुख मिला.....
 
सरिता खुश थी...क्योकि उसने आज़ाद को एक गहरी चोट भी दे दी थी और वो माँ भी बनने वाली थी.....

सरिता ने अपने पति को ये शक़ नही होने दिया कि उसके पेट मे पल रहा बच्चा उसके पति का नही बल्कि आकाश का है......

वही बच्चा रेणु के रूप मे दुनिया मे आया....जो आकाश और सरिता की औलाद थी.....

पर जब तुम्हारे डॅड आकाश गाओं बापुस आए तो सरिता ने रेणु को आकृति को सौंप दिया और खुद आरती के घर चली गई...जहाँ आकाश आने वाला था....

सरिता जानती थी कि वहाँ कुछ ग़लत हो सकता है...इसलिए वो रेणु को आकृति के पास छोड़ गई....पर वो वहाँ से जिंदा वापिस नही आई....और इस तरह रेणु आकृति के पास ही रह गई .....

उस दिन आकृति ने भी अपने पति यानी सुभाष को खोया था...और वो उसका ज़िम्मेदार आकाश को ही मानती थी....इसलिए आकृति ने तय कर लिया कि अब रेणु को वो माँ बन कर पालेगी और वक़्त आने पर रेणु को सच बता कर आकाश से अपना और सरिता का बदला लेगी.....

और उसने दुनिया को ये बताया कि रेणु को उसने अडॉप्ट किया है...क्योकि उसे एक बेटी चाहिए थी....इसी वजह से आकाश को भी नही पता कि रेणु असल मे है कौन.....

पर सरफ़राज़ को ये बात पता थी....और उसने रेणु के बड़े होते ही उसे ये बात बता दी......

सरफ़राज़ से फ़ोन पर सच सुनकर रेणु ने आकृति से बात की और आकृति ने सारा सच रेणु को बता दिया.....

फिर क्या था...रेणु ने सरफ़राज़ से हाथ मिला लिया.....सिर्फ़ आकाश को मिटाने के लिए....हालाकी वो तुम्हे कोई नुकसान नही पहुँचना चाहती थी...पर अपने मक़सद के लिए उसे तुम्हे धोखा देना पड़ा.....

और हाँ...रेणु की नज़रों मे मदन ही उसका बाप है....क्योकि आकृति ने भी उसे यही बताया था....सच वो भी नही जानती.......
 
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