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जवानी की तपिश

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फ़िर मेरी तरफ देखकर हल्के से मुश्कुराई, और कहा-“कीप इट अप…”

मैंने मुश्कुराकर एक बार फ़िर उसकी होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उसके खूबसूरत लबों को एक बार फ़िर चूसने लगा। मुझे उसपर दिल से प्यार आ रहा था। मैं एक मिनट की किसिंग के बाद में अपने लण्ड को एक और झटका दिया और यह एक जोरदार झटका था, जिससे मेरे लण्ड अब सिर्फ़ 1…” ही बाहर रह गया था बाकी 8…” रजनी की कुँवारी चूत की गहराइयों में दाखिल हो चुका था।

रजनी ने एक हल्की सी चीख मारी और अपने लब मेरी लबों से छुड़ा लिए। अब वो अपना सिर दोनों तरफ जोर-जोर से मारते हुये गहरी-गहरी साँस ले रही थी। रजनी अपने दर्द को बहुत ही बर्दास्त कर रही थी। उसकी आँखों में आँसू आ गये थे। मैं और उसके दोनों हाथ मेरे कंधों पर अपने नाखूनों का दबाओ डाल रहे थे, जिससे मुझे भी तकलीफ का अहसास हो रहा था। मगर शायद रजनी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उसके नाखून मेरे कंधों मे गढ़ चुके हैं।

मैं अपने को कोई अहमियत ना देते हुए रजनी के चेहरे को अपने दोनों हाथों में भरते हुए बहुत ही प्यार से चूमने लगा। मैं कभी उसकी आँखों को चूम रहा था, तो कभी उसका गालों को।

धीरे-धीरे रजनी नॉर्मल होती गई। रजनी ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा-“बहुत जालिम हो बेदर्दी… यही दर्द देने के लिए तड़प रहे थे ना तुम? इसी दर्द के लिए तुमने मेरे सारे आदमी मार दिए?”

जिसे तुम दर्द का नाम दे रही हो उसे मैं अपनी मुहब्बत की इंतिहा समझता हूँ। इस दर्द के बाद जो तुम्हें जिंदगी का सुख और मजा मिलने वाला है, उसके आगे तुम्हें मेरा सब कुछ किया कम ही लगेगा…” यह कहकर मैंने अपने लण्ड को थोड़ा सा बाहर निकाला और फ़िर आराम से एक बार फ़िर अंदर कर दिया।

जिसके कारण रजनी के चहेरे पर दर्द को बर्दास्त का करने का भाव उभर आया। मैं आराम-आराम से अब हिलने लगा। चन्द मिनटों की रगड़ और हिलने के बाद रजनी के मुँह से दर्द के कारण निकलने वाली कराहें अब मजे की कारण निकलने वाली सिसकियों में बदलने लगी, जिसका साथ-साथ मेरी स्पीड भी बढ़ने लगी। अब रजनी इस दर्द को एंजाय करने लगी। मैं रजनी के ऊपर से उठ गया और उसकी टाँगों को दोनों हाथों में पकड़कर उसकी रानी को अपने राज से समलाने लगा। अब मेरे लंड अपनी जड़ तक रजनी की रानी में जा रहा था।

अब रजनी ने भी धीरे-धीरे नीचे से उछल-उछलकर मेरे लंड को लेने लगी, और मैंने अपनी स्पीड को और बढ़ाना शुरू कर दिया। 10 मिनट की चुदाई में ही रजनी एक बार फ़िर झटके लेने लगी, और उसका जिश्म एक बार फ़िर अकड़ने लगा, उसका खुद पर से कंट्रोल खतम हो गया, और उसके मुँह से अजीब आवाजें निकलने लगी। कुछ लम्हों की मस्ती के बाद उसका जिश्म ढीला पड़ चुका था। मगर मैंने उसको खातिर में ना लेटे हुये अपनी स्पीड में कोई कमी नहीं की।

चन्द मिनट की मेहनत के बाद रजनी एक बार फ़िर मेरा साथ देने लगी। अब वो भी नीचे से जोर-जोर से अपनी रानी को मेरे लण्ड पर मार रही थी, उसके मुँह से बेतरतीब अल्फाज निकल रहे थे।– “फाड़ दो… इसे फाड़ दो…जिसने तुम्हें तड़पाया है राज, उसे फाड़ दो। अह्ह मर गई अह्ह्ह… इस दर्द में इतना मजा है। अगर मुझे पहले पता होता तो हाहाहाहा…” वो जोर-जोर से हँसने लगी-“तो तुम्हें मेरे आदमी मारने की जरूरत नहीं पड़ती। मैं तुम्हारे आदमी मारकर तुमसे यह मजे लेती…”

मैं उसकी बेतरतीब बातें सुनकर मुश्कुरा रहा था।

यह अल्फाज मेरे लिए नये नहीं थे, जो-जो औरत मेरे नीचे आई थी वो ऐिे ही अल्फाज अदा करती थी।

 
मैं उसकी बेतरतीब बातें सुनकर मुश्कुरा रहा था।

यह अल्फाज मेरे लिए नये नहीं थे, जो-जो औरत मेरे नीचे आई थी वो ऐसे ही अल्फाज अदा करती थी।

रजनी-“आह्ह… ओह्ह… फक मी हार्ड… अह्ह… राज और जोर से… और जोर से… आई एम कमिंग अह्ह फक मी हार्ड…” और एक बार फ़िर रजनी का जिश्म अकड़ने लगा, और वो तीसरी बार फारिग हो चुकी थी।

मेरा दिल कर रहा था कि मैं उसकी पोजीशन चेंज करूँ, मगर मुझे पता था कि पोजीशन चेंज करने के बाद रजनी को एक बार फ़िर दर्द के माहौल से गुजरना पड़ेगा, तो मैंने सोचा कि आज उसे इसी पोजीशन में करूँगा। और मैंने अपने झटकों में तेजी कर दी। अब मैं भी करीब-करीब था। जैसे-जैसे मैं करीब होता जा रहा था मेरी वहशत बढ़ती जा रही थी। अब मुझे कुछ भी नहीं समझ में आ रहा था। मैंने रजनी की पतली कमर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया और खींच- खींच कर अपने लण्ड पर मारने लगा।

रजनी भी मेरी वहशत देखकर घबरा गई थी। उसे मजा तो आ रहा था। मगर लाल-लाल आँखें देखकर और मेरी ऐसी वहशत देखकर वो मुझे आवाजें देने लगी-“राज… राज मुझे दर्द हो रहा है राज…”

मुझ तक उसकी कोई आवाज नहीं पहुँच रही थी। मैं रिलेक्स होते हुए अक्सर ऐसे ही वहशत अंगेज हो जाता था। मेरे मुँह से अजीब-अजीब आवाजें निकल रही थी और मैं वहशतनाक आवाज के साथ ही फारिग हो गया। मेरा लण्ड अपना पानी छोड़ दिया, मेरा गाढ़ा-गाढ़ा और गरम पानी रजनी ने अपने अंदर महसूस करके एक बार फ़िर ‘अह्ह्ह’ की आवाजों के साथ अपना पानी भी छोड़ दिया। मैं अब बेसूध सा होकर रजनी के ऊपर गिर गया और रजनी ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया। और मेरे चेहरे को चूमने लगी और बड़े प्यार से मेरे सिर में उंगलियाँ फेरने लगी।

मैं धीरे धीरे रिलेक्स होने लगा। अब मैं गहरी-गहरी साँसें ले रहा था। रजनी बड़े प्यार से मुझे देख रही थी। मैं एक करवट लेकर रजनी के ऊपर से हट गया और खुद को बेड पर गिरा लिया।

रजनी ने करवट बदलकर मुझे देखा, और मुश्कुराते हुए कहा-“बड़े जालिम हो। क्या हो गया था तुम्हें आखीर में?”

मैंने मुश्कुराकर उसे देखा और कहा-“जब मैं रिलेक्स होने वाला होता हूँ तो मेरा खुद पर से कंट्रोल खतम हो जाता है। तुम्हें बहुत तकलीफ हुई…”

रजनी मुश्कुराकर मुझे देख रही थी-“नहीं बेदर्दी, तुमने तो मुझे वो दर्द दिया है जिस दर्द में सकून है, मजा है, और उस दर्द से मैं आज तक अंजान थी…” और उसने आगे बढ़कर मुझे एक बार फ़िर से चूम लिया, और फ़िर मेरी तरफ देखकर बोला-“मैंने तुम्हें बहुत तड़पाया है राज, अब मैं तुम्हें वो सकून दूँगी जो तुम्हें कभी ना मिला होगा। मैं तुमको दिल-ओ-जान से चाहने लगी हूँ, और अब तुम्हारे बगैर मेरा जीना मुश्किल होगा। मुझे खुद से दूर ना करना राज…”

मैंने भी उसे छूते हुए कहा-“रजनी, तुम मेरी जान हो। मैं तुम्हें खुद से कभी दूर नहीं करूँगा…” हम कुछ देर ऐसे ही बातें करते रहे।

फ़िर मैंने थोड़ा सा उठकर बेड के सिरहने से टेक लगा ली और और साइड पर पड़े अपने कपड़ों में से सिगरेट और लाइटर निकलकर एक सिगरेट जलाया और गहरा कश लेकर धुआँ छोड़ते हुए एक नजर कमरे में चारों तरफ घुमाई। पूरा कमरा मैदान-ए-जंग का मंज़र पेश कर रहा था। चारों तरफ लाशें बिखरी हुई थी।

मुझे इस तरह देखते हुये रजनी ने भी थोड़ा सा ऊपर उठकर अपना सिर मेरे सीने से लगाते हुए, हल्की से हँसी के साथ कहा-“मुझ जैसी औरत की सुहागरात ऐसी ही जगह होनी चाहिए थी। लाशों की सेज पर। तुमने मुझे फतेह किया है। अपनी ताकत के बल पर, जोर-ए-बाजू से। मैं आज से तुम्हारी गुलाम हूँ, राज तुम्हारी अदना कनीज…”

मैंने उसे अपने सीने से लगाते हुए कहा-“नहीं रजनी, तुम इस राज की रानी हो। मेरे दिल की मलिका हो। आई लव यू रजनी, आई लव यू…”

रजनी-“आई लव यू टू राज …” और वो मेरे सीने के साथ जोर से लग गई। देर तक तो मेरे सीने को छूती रही और फ़िर बहुत ही सकून से मेरी अगोश में समा गई। शायद वो थक कर सो चुकी थी।

मैंने उसे सोता महसूस करके बेड के सिरहने से टेक लगा दी, और अपनी आँखें बंद कर ली। मेरी आँखों के पीछे बीते वक्त की यादों की फ़िल्म चलने लगी।

मैं किंग था। अब अंडरवल्डट की दुनियाँ का किंग । एक दुनियाँ जिसके नाम से काँपती थी। अंडरवल्डट का डान, पूरे एशिया में होने वाला कोई भी क्राइम, उसके पीछे किसी ना किसी तरह मेरा ही हाथ होता था। मेरे हाथों कितने लोग मौत के घाट उतर चुके थे, मुझे उस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था। मैं एक सीधा-सादा सिंध की सोहनी धरती का रहने वाला, डान कैसे बना? वो पल आज तक मुझे ख्वाबों में तड़पाते रहते थे। आज मेरे अपनों में से कोई मेरे साथ नहीं था। मैं आज एक बेरहम कातिल था। यहाँ तक पहुँचने के लिए मुझे कितनी कठिन मंज़िलो से गुजरना पड़ा था, वो एक-एक पल मुझे याद है। मैं चाहूं भी तो उसे भूल नहीं सकता। क्योंकी अब मैं हूँ ‘किंग डान’

***** *****

 


सिंध की सोहनी धरती के दूसरे बड़े शहर हैदराबाद के एक बहुत बड़े प्राइवेट हॉस्पीटल में मेरी पैदाइश हुई। मैं अपने मुँह में सोने का निवाला लेकर पैदा हुआ था। मेरे वालिद अपने इलाके के बहुत बड़े ज़मींदार थे। हजारों एकड़ जमीन के मालिक। हमारा ताल्लुक सिंध के एक नामी गिरामी खानदान से था, पीरों की गढ़ी थी। मेरे वालिद भी अपने वालिदान की एक ही औलाद थे, और मैं भी उनकी एक ही एकलौती औलाद था। लेकिन अपनी माँ से (बाकी दूसरी बीवी से दो बेटियाँ थी) गाँव में हमारी बहुत बड़ी हवेली थी, मगर मेरे वालिद ने अपनी मर्जी से शहर की लड़की से शादी की थी। जिसके कारण हम लोग शहर में ही रहते थे।

दादा की मौत एक एक्सीडेंट में जवानी में ही हो गई थी। जिसके बाद मेरी दादी ने तमाम इंतज़ाम अपने हाथ में संभाला और मेरे वालिद की परवरिश की। उन्होंने मेरे वालिद को आला तालीम दिलाई। मेरे अब्बू और अम्मी की दोस्ती यूनिवर्सिटी में हो गई थी, और दोनों ने तमाम जिंदगी एक दूसरे के साथ गुजारने का इरादा कर लिया था। मगर इन तमाम मामलात में सबसे बड़ी रुकावट मेरी दादी थी, जो अपने बेटे की शादी अपने ही खानदान में अपनी बहन की बेटी से करवाना चाहती थी। जो कि अब्बू से 5 साल उमर में भी बड़ी थी।

इन तमाम मामलात पर खानदान में बहुत से सवाल उठे क्योंकी मेरी अम्मी का ताल्लुक एक गरीब खानदान से था। लेकिन बाबा ने अपनी मुहब्बत की खातिर सबसे झगड़ा किया, और एक शर्त पर बाबा को इजाजत मिली कि अम्मी से शादी के बाद वो अपने खानदान में भी शादी करेंगे और अम्मी कभी इस हवेली में कदम भी नहीं रखेंगी। इस पर भी मेरी दादी पहले तो नहीं मान रही थी। मगर अब्बू ने जब जान देने की धमकी दी तो वो मान गई। लेकिन उन्होंने मेरी अम्मी को कभी भी कबूल नहीं किया, और नहीं उन्हें कभी भी अपनी हवेली में कदम रखने दिया।

मेरे दूसरी माँ से अब्बू को दो बेटियाँ हुईं। मगर कोई हवेली का वारिस ना हो सका, और दूसरी तरफ मेरे बाद अम्मी को दो बेटे और भी हुए, लेकिन वो छोटी उमर में ही चल बसे । मैं अपने अब्बू और अम्मी का लाड़ला था। हमारी जिंदगी बहुत सकून से गुजर रही थी। मैं शहर के बहुत बड़े स्कूल में तालीम हासिल कर रहा था। जब मैं मेट्रिक में था तो एक दैवी आफत हमारे घर पर टूट पड़ी। मेरे अब्बू और अम्मी को गाड़ी में जाते हुए कुछ अपराधियों ने गोलियाँ मारकर हलाक कर दिया। कोई कहता था कि दहशत गर्दि का वाकिया है, तो कोई कहता था कि खानदानी दुश्मनी है।

लेकिन मेरी तो हँसती खेलती दुनियाँ ही उजड़ गई। मेरा तो कोई भी नहीं था। ननिहाल की तरफ से एक मामू और एक खाला थी, जो अपने-अपने घरों में मसरूफ़ थे। मेरी दादी ने मेरी माँ को मरने के बाद भी माफ ना किया, और उनके जनाजे को मामू वगैरह के हवाले कर दिया और उनकी तदफीन हैदराबाद के ही कबिस्तान में हुई। मैं मामू के साथ पहली बार अपने खानदानी गाँव बाबा की तदफीन के वक्त पर गया। जहाँ मुझे बहुत से चेहरे नजर आए जिनकी आँखों में मेरे लिए नफरत और चन्द लोगों की आँखों में मेरे लिए मुहब्बत भी थी, जिनमें सलामू सर-ए-फेहररिस्त था।

सलामू बाबा का ख़ास आदमी था, और अक्सर बाबा के साथ शहर वाले घर पर भी आता था। वो मुसलसल मेरे साथ ही लगा रहा, और चुपके-चुपके मेरे तमाम खानदान के लोगों के बारे में मुझे बताता रहता। मामू तो उसी दिन वापिस चले गये, मगर मैं वहाँ अब्बू के सोयम पर रुक गया। मैंने वहाँ पर अपने अब्बू के कितने ही कजिन्स और अपने कजिन्स को देखा, जो मुझसे बात करने को भी तैयार नहीं थे। लेकिन हवेली का नौकर और गाँव के लोग मेरा बहुत खयाल रख रहे थे। ऐसा लगता था कि मैं उनके लिए सब कुछ हूँ।

मेरे वालिद ने मेरा नाम प्यार से बादशाह अली शाह रखा लेकिन सब लोग मुझे “साइन…” के नाम से पुकारते थे, क्योंकी यह नाम मेरे मरहूम दादा का था और उनका नाम कोई नहीं पुकारता था। मुझे देखकर वहाँ के लोग दबी-दबी फुसफुसाहटों में कुछ कह रहे थे जिनमें से कुछ बातें मेरे कानों तक भी पहुँची, और यही बात मेरे वालिद भी किया करते थे कि मेरी शकल-सूरत और कद-काठी बिल्कुल अपने दादा जैसा है।

16 साल की उमर में भी मेरी हाइट 6 फीट तक हो चुकी थी और बचपन से ही मुझे स्पोर्ट में कराटे और बाडी बिल्डिंग बहुत पसंद थी कराटे तो मैं अपनी 7 साल की उमर से कर रहा था और उसमें ब्लैकबेल्ट हासिल कर चुका था। मगर बाडी बिल्डिंग स्टार्ट किए हुए मुझे अभी एक साल ही हुआ था। मगर कुछ खाते पीते घराने से ताल्लुक होने और खानदानी विरासत में मिली हुई वजाहत की वजह से मैं एक मजबूत और चौड़े जिश्म का नौजवान था। घूंघराले बाल और सब्ज़ आँखों के साथ मेरी गोरी रंगत सबको मुझे बार-बार देखने पर मजबूर कर देती है। ऊँचे लंबे कद के कारण मैं सब में अलग ही नजर आता था। सारा दिन अब्बू की ताजियत के लिए आने वालों का ताँतां बँधा रहा।

शाम के वक्त कुछ भीड़ कम हुई तो सलामू मेरे पास आया-“छोटे साइन…”

मैं उस वक्त अब्बू और अम्मी की खयालात में गुम था। उनकी छोटी-छोटी बातें मुझे याद आ रही थीं। सलामू के इस तरह बुलाने से में चौंक गया और सलामू को अपने सामने देखकर पूछा-“क्या बात है सलामू?”

सलामू ने मुझे देखते हुए कहा-“साइन, आपको बड़ी साईएन ने हवेली बुलाया है…”

अब्बू की ताजियत के लिए आने वाले लोगों के लिए जो हिस्सा मुक़र्रर किया गया था वो हवेली से थोड़ा दूर हटकर एकांत में था। हवेली यहाँ से कुछ दूर थी। मैंने हैरत से सलामू की तरफ देखकर कहा-“किसने बुलाया है?”

तो सलामू ने मेरे करीब बैठते हुए आराम से कहा-“आपकी दादी हुजूर ने बुलाया है…”

मैं सलामू की बात सुनकर थोड़ा हैरान हुआ और एक दर्द भरी मुश्कुराहट से सलामू की तरफ देखते हुए कहा-“उनको मुझसे क्या काम है और क्यों बुलाया है मुझे?”

सलामू-वो आपसे मिलना चाहती हैं।

मैं-जब वो आज तक मुझसे नहीं मिली, तो अब क्यों मिलना चाहती हैं?

सलामू-छोटे साइन वो दादी हैं आपकी, और तुम उनके एकलौते बेटे की निशानी हो और इस तमाम जागीर का वारिस भी।

मेरे लबों पर एक जहरीली मुश्कुराहट आ गई-“बड़ी जल्दी अपने पोते का खयाल आ गया उनको? 16 साल मैंने आज तक अपने बाप के इलावा अपनी ददियाल के किसी रिश्तेदार को नहीं देखा और ना ही मुझे पता है कि उनमें कौन-कौन है? और यह जागीर?”

मैं एक बार फ़िर हँस पड़ा-“मेरी जागीर तो मेरे अब्बू और अम्मी थे, जो आज मेरे साथ नहीं हैं। मेरी जागीर तो लुट चुकी है। मैं किसी जागीर का वारिस नहीं। जाकर उनको कह दो कि मैं सिर्फ़ अपने बाप के सोयम तक यहाँ हूँ। उसके बाद यहाँ से चला जाउन्गा। उनका सिर्फ़ बेटा ही था। पोता कोई नहीं है…” यह सब कहते हुए मेरी आँखें लाल सुर्ख हो चुकी थीं, और आँसू से भर चुकी थीं, जिनको मैं बड़ी मुश्किल से रोके हुए था।

सलामू-पर छोटे साइन?

मैंने सलामू की बात फौरन काटते हुए कहा-“बस जाओ। मैं और कुछ नहीं सुनना चाहता…”

 
मैं एक बार फ़िर हँस पड़ा-“मेरी जागीर तो मेरे अब्बू और अम्मी थे, जो आज मेरे साथ नहीं हैं। मेरी जागीर तो लुट चुकी है। मैं किसी जागीर का वारिस नहीं। जाकर उनको कह दो कि मैं सिर्फ़ अपने बाप के सोयम तक यहाँ हूँ। उसके बाद यहाँ से चला जाउन्गा। उनका सिर्फ़ बेटा ही था। पोता कोई नहीं है…” यह सब कहते हुए मेरी आँखें लाल सुर्ख हो चुकी थीं, और आँसू से भर चुकी थीं, जिनको मैं बड़ी मुश्किल से रोके हुए था।

सलामू-पर छोटे साइन?

मैंने सलामू की बात फौरन काटते हुए कहा-“बस जाओ। मैं और कुछ नहीं सुनना चाहता…”

सलामू मेरा लहजा और मेरे चेहरे के भाव देखकर फौरन वहाँ से उठ गया और जल्दी-जल्दी औतक से निकल गया। मैंने एक बार फ़िर अपने पीछे रखी सिरहने को कमर से लगाते हुए दीवार से अपना सिर लगा दिया। और एक बार फ़िर माँजी की यादों ने मुझ पर हल्ला बोल दिया।

और माँजी की एक याद मेरी आँखों में भर आई। जब मेरा मेट्रिक का रजल्ट आया था और मैंने अपने डिस्ट्रिक्ट में टाप किया था। तब अम्मी और बाबा कितने खुश हुए थे। यह बात उनके साथ होने वाले हादसे से एक हफ़्ता पहले की है।

बाबा मेरे सामने सोफे पर बैठे थे और मेरा रिजल्ट देखकर उनके मुँह से जो पहला जुमला निकला-“वो मारा। अब मैं दिखाऊूँगा तुम्हारी दादी को कि तुम्हारी माँ ने हवेली से दूर होते हुए भी तुम्हारी कितनी अच्छी तालीम की है। अच्छी तालीम सिर्फ़ इन बड़ी-बड़ी हवेलीयों में रहने से ही नहीं मिलती। तुम्हारी माँ गरीब परिवार से थी तो क्या हुआ? लेकिन मेरी पसंद सही थी। वो इस लायक थी कि उसी पीरों की गढ़ी के वारिस की सही तालीम कर सके…”

बाबा की बातें सुनकर अम्मी के होंठ खुशी के मारे थरथराने लगे, और जो पहला जुमला उनके लबों पर आया उसमें बड़ी हिरत भरी हुई थी-“तो क्या अब अम्मा मुझे अपनी बहू की सूरत में कबूल कर लेंगी?”

अम्मा की बात सुनकर बाबा ने मुश्कुराते हुए अम्मा की तरफ देखा, और कहा-“जमीला, कैसी बातें करती हो? बहू तो तुम उस खानदान और हवेली की हो। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। झगड़ा इस बात का है कि क्या तुम में वो सब खूबियाँ हैं जो उस खानदान की बहू में होनी चाहिए?”

बाबा की बात सुनकर मैं बीच में बोल पड़ा-“बाबा क्या जरूरत हैं इन तमाम बातों की? और यह प्रमाखणत करने की कि मेरी माँ इस काबिल है या नहीं? मुझे पता है, आपको पता है कि मेरी माँ लाखों में एक है। दादी चाहे जो भी समझती रहें…”

मेरी बात सुनकर बाबा के चेहरे पर संजीदगी आ गई, और उन्होंने कहा-“नहीं बेटा, यह बहुत जरूरी है। मैं हमेशा अम्मी साईएन के आगे सुरखरू रहा हूँ। हर फ़ैसले में जो मैंने आज तक लिए हैं। और यह तो मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था। तुम चाहते हो कि मैं अम्मा साईएन की नजरों में अपने इस फ़ैसले पर हमेशा नादान रहूँ?”

मैं बाबा की यह बात सुनकर फौरन ही बाबा के कदमों में बैठ गया और जल्दी से बोला-“नहीं बाबा, मैं आपके और अम्मी के इस फ़ैसले को कभी कमजोर नहीं होने दूँगा। मैं ऐसा कुछ करूँगा कि दादी मेरी माँ पर फख्र करेंगी और आपके इस फ़ैसले को आपकी जिंदगी का सबसे दुरुस्त फैसला मानेंगी। यह मेरा आपसे वादा है…”

मेरी बात सुनकर बाबा ने मुझे दोनों बाजुओं से पकड़कर खड़ा कर दिया और खुद भी उसके साथ ही खड़े हो गये, और मुश्कुराती हुई नजरों से मेरे चेहरे को देखते हुए कहते लगे-“मेरा शेर बेटा…”

यह सब सोचते-सोचते कब मेरी आँख लग गई, मुझे पता ही ना चला। कोई मुझे जोर-जोर से हिलाकर उठा रहा था, और आवाजें दे रहा था। मैंने हल्के से अपनी आँखें खोलकर देखा तो सामने सलामू खड़ा हुआ था। मैंने हैरतजदा आँखों से सलामू की तरफ देखा।

तो सलामू ने कहा-“छोटे साईएन। ठंड बढ़ने लगी है और रात होने वाली है…”

मैं सलामू की बात सुनकर थोड़ा सीधा होकर बैठ गया और एक नजर चारों तरफ घुमाई तो हाल कमरा तकरीबन खाली हो चुका था, और खालू जी भी अपनी गाड़ी पर नजर नहीं आ रहे थे। खालू बाबा के बाद अब इस खानदान के बड़े थे। खालू से मतलब मेरी उस दूसरी माँ के बहनोई, जो बाबा की खानदानी बीवी थी। उसके इलावा वो मेरे दादा के छोटे भाई के बड़े बेटे भी थे।

इसी दौरान सलामू ने मुझे देखते बोला-“छोटे साईन। आप अंदर हवेली में चलें और वहाँ अपने कमरे में चलकर आराम करें। फ़िर सुबह यहाँ आ जाईएगा…”

मैं हवेली का नाम सुनकर चौंक गया। और जो पहला खयाल मेरे दिल में आया कि शायद दादी मुझे इस बहाने अपने पास बुलाना चाहती हैं। मैंने सलामू को देखकर कहा-“मैं यहाँ ठीक हूँ…”

सलामू-“साईन यहाँ मुनासिब नहीं है। आप अगर अपनी दादी से नहीं मिलना चाहते तो ना मिलें वो जनानखाने की तरफ हैं। मैं आपका इंतज़ाम मर्दानखाने की तरफ करवा देता हूँ, जहाँ खानदान के दूसरे मर्द हजरत आकर रुकते हैं…”

मैं-“क्या मतलब? खानदान के मर्द जनानखाने की तरफ नहीं जाते?” मैंने हैरत से कहा।

सलामू-नहीं छोटे साईन, यह गढ़ी बड़ी है। और जनानखाने में सिर्फ़ मुहरम अफ्राद को जाने की इजाजत है। कोई भी ना मुहरम अफ्राद जनानखाने की तरफ नहीं जा सकता।

मैंने कुछ सोचा और कुछ सोचते हुए उठ गया, कि चलो इसी बहाने हवेली तो देख लूँ, जिसका इतना जिकर सुना है। सलामू मुझे उठता हुआ देखकर खुश हो गया और जल्दी-जल्दी मुझे लेकर बाहर की तरफ चल पड़ा। मैं बाहर निकला तो मैंने दरवाजे के पास अपने रखे हुए जूते को देखा मगर वो मुझे कही नजर नहीं आए।

इसी दौरान सलामू ने एक तरफ देखते हुए आवाज लगाई-“अरे खामिसा, छोरा छोटे साईन के जूते ले आओ…”

इसी दौरान एक शख्स धोती और एक पुराना सा कुर्ता जिस पर उसने बगैर बाजू वाला स्वेटर पहना हुआ था। जो जगह-जगह से फटा हुआ उसकी गरीबी की दास्तान सुना रहा था। अपने दोनों हाथों की हथेलियों पर जूते सजाये जैसे वो कोई बहुत ही मुबारक चीज हो, लाकर मेरे सामने रखे और मैं हैरत से बुत बना उसे देखता रहा। जूते नीचे रखने के बाद वो दोनों हाथों को जोड़कर घूटनों के बल मेरे सामने ही फर्श पर बैठ गया।

मैंने सलामू की तरफ देखा तो सलामू ने कहा-“साइन आपके मुरीद हैं बाबा। आप जूते पहनें और हैरान होना छोड़ दें…”

मैंने सलामू की तरफ देखते हुए थोड़ा गुस्से में कहा-“लेकिन यह तो इंसान की ताजलील है। मुझे यह सब पसंद नहीं…” और मैंने अपना पैर जूते की तरफ बढ़ा दिया, तो इसी वक्त उस खामिसो नामी शख्स ने जो मेरे जूतों के पास ही हाथ बाँधे बैठा था आगे बढ़कर जल्दी से मेरे एक पैर को थाम लिया।

मेरा पैर वैसे ही उठा का उठा रह गया। उसने जल्दी से अपने कंधे पर पड़े एक रूमाल को उतार लिया और फौरन मेरे पैर के नीचे के तलवों को सॉफ करने लगा। मैंने एक झटके से अपना पाँव पीछे कर लिया, और वो बड़ी मासूमियत और हैरत के मिले जुले भाव में मेरे चेहरे को देखने लगा। मेरे चहेरे पर गुस्से के भाव आ गये, और मैंने सलामू की तरफ देखा।

सलामू ने जल्दी से उसे देखते हुए कहा-“बाबा खामिसा तुम जाओ। छोटा साइन को यह सब पसंद नहीं है…”

 
सलामू ने जल्दी से उसे देखते हुए कहा-“बाबा खामिसा तुम जाओ। छोटा साइन को यह सब पसंद नहीं है…”

खामिसा के आँखों में आँसू से आ गये और वो जल्दी से दोनों हाथ बाँधकर काँपती हुई आवाज में बोला-“साइन मुझसे कोई गलती हो गई है क्या? अगर कोई गलती हो गई है तो खाल खींच लो, पर साईन मुझे इससे मना मत करो…”

मैं उसकी हालत देखकर घबरा गया और अपना पाँव पीछे करके जमीन पर रखा और दोनों हाथों से उसे बाजू से पकड़कर खामिसा को ऊपर उठा लिया और बोला-“मैं तुमसे नाराज नहीं हूँ। बाकी मुझे यह सब पसंद नहीं…”

खामिसा दोनों हाथ बाँधे मेरे सामने खड़ा हुआ था और मेरे इस तरह उसको उठाने से वो थरथर काँप रहा था। उसकी आँखें पानी से भर आई थी।

इसी दौरान एक तरफ से आवाज आई-“ओये छोरा। इधर आओ। इस शेरी को क्या पता की पीरों की शान क्या होती है?”

मैंने गर्दन घुमाकर देखा तो एक लगभग 5’6” कद का खूबसूरत नोजवान दो हथियारबन्दो के साथ खड़ा अपनी बड़ी और घनी मूँछो पर ताओ दे रहा है।

खामिसा अब तक मेरे सामने हाथ बाँधे खड़ा था। मगर अब उसकी हालत और पतली हो चुकी थी। वो बेचैनी का शिकार था कि क्या करे? मेरे पास खड़ा रहे या उधर चला जाए?

मैंने अजनबी नजरों से उसे देखा।

तो सलामू ने मेरे करीब आकर सरगोशी में कहा-“यह पीर जमील शाह हैं। पीर जमाल शाह के बड़े बेटे। (पीर जमाल शाह यानी के बाबा के कजिन)

उसने एक बार फ़िर खामिसा को आवाज लगाई-“छोरा सुना नहीं। इधर आ और असली पीरों की खिदमत कर, ताकी तुझे कुछ हासिल भी तो हो…”

मैंने खामिसा की तरफ देखा और हल्के से कहा-“जाओ…” मेरे बस जाओ कहने की ही देर थी खामिसा ने जमील शाह की तरफ दौड़ लगा दी।

मैंने जल्दी से अपने जूते पहने और सलामू के साथ आगे बढ़ गया। लेकिन पीछे से मुझे जमील शाह की बात करने की आवाज सुनाई दी।

“अरे छोरा वो आधा पीर है। उससे तुझे कुछ नहीं मिलना। हमारी चाकरी कर तेरी दुनियाँ भी बन जाएगी और मरने के बाद भी सुख में होगा…” इसके साथ ही कुछ कहकहों की आवाजें पीछे से सुनाई दी।

मैंने एक बार उनको मुड़कर देखा मगर मैं रुका नहीं। मैं उनकी बातों को कोई अहमियत नहीं देना चाहता था। क्योंकी मुझे ना उनसे कोई ताल्लुक रखना था, और ना ही इस पीरी मुरीदी से। मैं आगे बढ़ता रहा।

मगर सलामू ने भी शायद सब सुन लिया था। उसने बड़े धीरे से चारों तरफ देखते हुये मुझे कहा-“छोटे साईन आप इनकी बातों पर ध्यान ना दें। ऐसे बकवास करना उनकी आदत है। लेकिन यह जमील शाह है बहुत ही जालिम आदमी। सारे हरी इससे घबराते हैं। इसलिए इसको कोई इनकार नहीं करता…”
 
मगर सलामू ने भी शायद सब सुन लिया था। उसने बड़े धीरे से चारों तरफ देखते हुये मुझे कहा-“छोटे साईन आप इनकी बातों पर ध्यान ना दें। ऐसे बकवास करना उनकी आदत है। लेकिन यह जमील शाह है बहुत ही जालिम आदमी। सारे हरी इससे घबराते हैं। इसलिए इसको कोई इनकार नहीं करता…”

मैंने खामोशी से सलामू की बात सुनी और किसी रद्दे अमल की इजहार नहीं किया। हम गाँव की गलियों में से गुजरते हुए एक शानदार किलानुमा इमारत के सामने जा पहुँचे। उसकी दीवारों को देखने के लिए भी गर्दन को ऊँचा करना पड़ता था। यह थी पीरों की हवेली। जिस जगह ताजेयात के लिए लोगों के बैठने का इंतज़ाम था, वो जगह भी किसी से कम नहीं थी। मगर इतनी बड़ी हवेली, जिसकी दीवारें लगभग 20 फीट ऊूँची थी, और एक बड़ा सा लकड़ी का गेट चौबारे वाले बुर्जो के साथ बीच में नसाब था। बिल्कुल इसी तरह जैसे पुराने जमाने के किलों (फ़ोर्ट) में होता था। यह हवेली भी एक छोटा किला ही लग रही थी। मैं जैसे ही वहाँ पहुँचा तो गेट पर खड़े गार्ड ने जल्दी से मेरे लिए बड़ा दरवाजा खोल दिया।

मुझे समझ नहीं आई की उस बड़े दरवाजे में छोटा दरवाजा भी था, जिससे हम बड़े आसानी से गुजर सकते थे तो, बड़ा दरवाजा क्यों खोला गया है?

सलामू ने शायद मेरे चेहरे पर इस हैरत को पढ़ लिया, कहा-“आप वारिस है इस गढ़ी के, और गढ़ी के वारिसों के लिए छोटा दरवाजा नहीं खुलता…”

सलामू की बात सुनकर मेरे चेहरे पर एक जहरीली मुश्कुराहट दौड़ गई। लेकिन मैंने सलामू को कहा कुछ नहीं। दिल में सोचा कि जो करते हैं करने दो। मैंने कौन सा हमेशा यहाँ रहना है? मैंने कदम आगे बढ़ा दिए। लेकिन मेरे दिमाग़ में तूफान मौजूद था। आज मैं उस हवेली में कदम रखने जा रहा था, जहाँ मेरी माँ को कभी दाखिल नहीं होने दिया गया। वो अपने आपको इस हवेली की बहू तसलीम करवाने का ख्वाब दिल में लेकेर हमेशा के लिए दुनियाँ छोड़ गई।

बाबा जो चाहते थे कि मेरी माँ यहाँ आये और इसी हवेली में राज करे। वो भी अब इस दुनियाँ में ना रहे। और आज मैं इस हवेली में क्यों दाखिल हो रहा हूँ? यह सब सोचकर मेरे कदम एक बार फ़िर रुक गये।

मुझे रुकता देखकर सलामू चौंक गया मेरे चेहरे के भाव पढ़कर सलामू ने जल्दी से मेरी पीठ पर हाथ रखा, और एक लंबी साँस लेकर बोला-“छोटे साईन, इस हवेली ने आपकी माँ को वाकई कुछ ना दिया हो, मगर इस हवेली में आना और अपनी गढ़ी संभालना आपके बाबा का बहुत बड़ा ख्वाब था। आज आप इस हवेली में दाखिल हो गये हो। गढ़ी भी दूर नहीं…”

मैंने लरजती नजरों से सलामू की तरफ देखा और उसके गले लग गया। मुझे किसी अपने की कमी महसूस हो रही थी। एक सलामू ही था जिसने मुझे गोद में खिलाया था, घुमाया था। वही था जो बाबा के साथ हमारे पास शहर आता था। बाबा अक्सर कहते था कि कभी कोई बुरा वक्त आए तो हम लोग सलामू पर आँखें बंद करके भरोसा कर सकते हैं।

और आज मुझे अहसास हो गया था कि सलामू गाँव का उजड्ड और अनपढ़ बंदा होने के साथ-साथ बहुत तजुर्बेकार आदमी था, जो मेरे चेहरे के भाव में से अंदाज़ा लगा गया कि मैं क्या सोच रहा हूँ? बाबा ने उसे अपने साथ रखकर यह फैसला भी सही किया था। सलामू मेरी पीठ को थपक रहा था। मुझे ऐसा लगा की शायद बाबा मेरी साथ ही हैं और मेरा होसला बढ़ा रहे हैं। मैंने नजरें भर का सलामू को देखा, तो उसके चेहरे पर एक मुहब्बत भरी मुश्कुराहट थी।

मैंने एक बार फ़िर कदम आगे बढ़ा दिया। मेनगेट के बाद बहुत दूर तक सीधा रास्ता जाता था जिसको दो हिस्सों में बाँटा गया जहाँ बीच में एक ग्रीन बेल्ट था और रोड के दोनों तरफ खूबसूरत लान। सामने दो मंज़िला हवेली अपनी और अपने रहने वालों की कदामत का मंज़र पेश कर रही थी। सूरज ढलने ही वाला था, रोशनी हल्की होने लगी थी इसी दौरान किसी ने हवेली की तमाम लाइटें जला दी थी। लेकिन इतनी बड़ी हवेली होने के बावजूद ऐसा लगता था कि पूरी हवेली खाली है। कहीं कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी।

हवेली के मेनगेट के सामने एक बहुत बड़ा कार पोर्च बना हुआ था। हम लोग मेनगेट से जैसे ही अंदर दाखिल हुए तो सामने एक बहुत बड़ा हाल था, जिसकी छत दूसरी मंज़िल की छत तक चली गई थी और उसके ऊपर एक गुंबदनुमा छत बनी हुई थी, जिसमें एक बहुत कीमती फ़ानूस लटक रहा था। हाल को बहुत ही कीमती चीजों से सजाया गया था। मेनगेट के बिल्कुल सामने एक और बड़ा गेट था जो बंद था।

मुझे उस गेट को दिखाते हुए सलामू ने कहा-“यह जनानखाने का गेट है और इस तरफ किसी गैर मेहराम को जाने की इजाजत नहीं…”

मैंने एक गहरी नजर से इस दरवाजे की तरफ देखा, और फ़िर दायें और बायें तरफ बनी हाल के साईड से राहदारियों की तरफ देखा जिसमें हल्की सी रोशनी फैली हुई थी। मैं आगे बढ़कर हाल के बीचोबीच आया और उन राहदारियों की तरफ देखा तो उनमें तरतीब के साथ दोनों तरफ दरवाजे और खिड़कियाँ नजर आईं।

सलामू ने फ़िर कहा-“यह मेहमान खाने हैं…” फ़िर सलामू मुझे लेकर एक तरफ बनी हुई सीढ़ियों से ऊपर की मंज़िल की तरफ बढ़ गया।

मैं जैसे ही ऊपर पहुँचा तो सामने बने हुए एक कमरे का अचानक से दरवाजा खुला और एक बहुत ही खूबसूरत लड़की, मामूली से कपड़ों में सिर पर दुपट्टा ओढ़े बाहर निकली। उसने अपने हाथ में एक ट्रे उठाई हुई थी। वो मामूली कपड़े भी उसकी खूबसूरती में कोई कमी नहीं ला पा रहे थे। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें साँवला बदन, और सीने के उभार उसकी भरपूर जवानी का पता दे रहे थे। वो दरवाजे से निकलते ही मुझे और सलामू को देखकर चौंक गई। उसने जल्दी से एक हाथ से अपने दुपट्टे को चेहरे पर कर लिया, जैसे मुझसे परदा करना चाह रही हो।

मैंने उसे ऐसा करते देखकर उसपर से नजरें हटा ली।

सलामू उसे परदा करते देखकर जल्दी से बोला-“अरे छोरी चेहरा क्यों छुपा रही हो? यह कोई गैर नहीं हैं। इस हवेली के मालिक और वारिस छोटे साईन हैं…”

छोटे साईन का सुनकर उस लड़की को जैसे झटका सा लगा, और दुपट्टा उसके हाथ से गिर सा गया और वो फौरन आगे बढ़ी और मेरे कदमों में बैठकर मेरे पैर चूमने लगी।
 
सलामू उसे परदा करते देखकर जल्दी से बोला-“अरे छोरी चेहरा क्यों छुपा रही हो? यह कोई गैर नहीं हैं। इस हवेली के मालिक और वारिस छोटे साईन हैं…”

छोटे साईन का सुनकर उस लड़की को जैसे झटका सा लगा, और दुपट्टा उसके हाथ से गिर सा गया और वो फौरन आगे बढ़ी और मेरे कदमों में बैठकर मेरे पैर चूमने लगी।

मैं उसकी यह हरकत देखकर घबरा सा गया। मैंने जल्दी से नीचे देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गई। नीचे बैठे हुए उसके खुले गले से उसका आधा खुला सीना बिल्कुल सॉफ दिखाई दे रहा था। यहाँ तक कि उसके सीने पर कोई ब्रा भी नजर नहीं आ रही थी।

मुझे इस तरह नीचे देखते हुए देखकर सलामू ने जल्दी से कहा-“साईन यह हवेली की नौकरानी है। अपना बख्सु है ना मलही, उसकी बेटी है, और मुरीद है आपकी…”

मैंने सलामू की बात सुनकर जल्दी से अपना चेहरा ऊपर किया, और सलामू को देखने लगा। मैंने अपने चेहरे के भाव को सलामू से छुपाते हुए अपने चेहरे को नॉर्मल रखा। मुझे डर था कि कहीं सलामू मेरी चोरी पकड़ ना ले। मैंने गर्दन हिलाई और उससे थोड़ा दूर हटकर खड़ा हो गया।

सलामू ने मुझे दूर होते देखकर जल्दी से उसे कहा-“चल उठ सारा, और जल्दी से छोटे साईन के लिए खाने का इंतज़ाम कर…”

वो जल्दी से उठी और तेज-तेज कदमों से सीढ़ियाँ उतरती हुई जनानखाने वाले दरवाजे में गायब हो गई। मेरी नजरें उसका पीछा कर रही थीं। मैं खुद पर काबू नहीं रख पा रहा था। वो जितनी सामने से खूबसूरत थी, उतनी ही पीछे से भी। उसकी उभरी-उभरी गाण्ड के दोनों पाट उसके तेजी से सीढ़ियों से उतरते वक्त इस तरह हिल रहे थे, जैसे कहीं किसी की दिल की रियासत में जलजला आ गया हो। मुझे अपने अंदर कुछ ऐंठन सी होने लगी।

मेरा बचपन में ही हुश्न परस्त वाकिया हुआ था। जिंदगी में पहली बार मेरा दिल सिक्स क्लास में अपनी एक खूबसूरत टीचर को देखकर बहुत धड़का था और उसकी धड़कन 8वी क्लास में पहुँचकर उसी टीचर ने रोकी थी। क्या गजब की टीचर थी। वो मेरी स्कूल टीचर होने के इलावा मेरी सेक्स टीचर भी थी। उसने मुझे सेक्स के मामले में इतना ठीक कर दिया था कि मेट्रिक तक आते-आते मैं अपनी कितनी ही क्लास फेलोज को अपनी मर्दानगी का सबूत दे चुका था।

सलामू की आवाज ने मुझे अपने खयालों से चौंका दिया-“छोटे साईन, क्या सोच रहे हैं?”

“कुछ नहीं…” मैंने जल्दी से कहा।

सलामू मुझे लेकर एक कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ा, और दरवाजा खोलकर मुझे अंदर दाखिल होने का इशारा किया। मैंने कमरे में दाखिल होकर एक नजर कमरे पर डाली। बहुत ही शानदार और सजा हुआ रूम था। रूम की एक-एक चीज से मालिकों की अमीरी का पता चलता था।

मैं अभी चारों तरफ देख ही रहा था कि सलामू ने जल्दी से कहा-“छोटे साईन आप जल्दी से नहा धो लें। मैं आपके लिए रात के कपड़े निकाल देता हूँ…”

मैंने हैरत से सलामू को देखते हुए जुमला दोहराया-“रात के कपड़े?”

सलामू मुश्कुराते हुए-“जी छोटे साईन, आपके मामूजान वापिसी में आपके कपड़ों का बैग मुझे दे गये थे। उसमें से कपड़े निकालकर मैंने इस अलमारी में रखवा दिए हैं…”

मैंने बड़े से डबलबेड पर बैठते हुए अपने जूते उतारे। इस दौरान सलामू जल्दी से एक दो पट्टे वाली चप्पल ले आया, जो एक साइड पर रखी हुई थी। मैंने उन्हें यह करता देखकर जल्दी से कहा-“चाचा, आप मेरे लिए ये सब ना किया करें। आप मेरे बड़े हैं, और वैसे भी मुझे यह सब पसंद नहीं…”

मेरी बात सुनकर सलामू की आँखों में आँसू भर आए, और उसने शराफत भरे अंदाज में जल्दी से कहा-“अच्छा छोटे साईन आइन्दा नहीं करूँगा। बस आप जल्दी से फ्रेश हो जाओ। सारा अभी खाना लाती ही होगी…”

मैं मुश्कुराता हुआ वाशरूम की तरफ बढ़ गया। वाशरूम में पहुँचकर मैं अपने कपड़े उतारकर शावर के नीचे खड़ा हो गया। शावर में गरम पानी का कनेक्शन भी मौजूद था। मैंने मिक्सर सेट किया और उसके साथ ही जिश्म को सकून देता हुआ गरम पानी मेरे बदन पर गिरने लगा। जिसके कारण मेरे जिश्म की सारी थकान उतरने लगी और मैंने अपनी आँखें बंद की तो, घर की नौकरानी सारा एकदम से मेरी नजरों के सामने घूम गई। उसका गोरा और साँवला जिश्म का खयाल मेरे अंदर गर्मी बढ़ाने लगा।

वालिदान की जुदाई के दुख में सारा का नजर आना मेरे लिए एक खुशगवार अहसास था। लेकिन एक लम्हे में ही अम्मी और बाबा की जुदाई का दुख मेरे ऊपर फ़िर से हावी होने लगा। और पता नहीं कब शावर से बहते पानी की बूँदों के साथ ही मेरी आँखों से भी आँसू की धारा बहने लगी। ना मालूम कितना वक्त गुजर गया, जिसका मुझे अहसास ही ना रहा। वाशरूम का दरवाजा बजने की आवाज पर मैं चौंका, और जल्दी से शावर बंद करके बाहर की आवाज सुनने लगा।

बाहर सलामू मुझे पुकार रहा था-“छोटे साईन, छोटे साईन…”

मैंने जल्दी से दरवाजे के करीब जाकर जवाब दिया-“जी चाचा…”

सलामू-साईन आपके कपड़े ले लें, और सारा खाना भी ले आई है।

मैंने थोड़ा सा दरवाजा खोलकर चाचा से नाइट ड्रेस ले ली। ट्राउजर और शर्ट लेकर मैंने जल्दी से चेंज किया और बाहर निकल आया। बाहर रूम में सारा एक तरफ फर्श पर बैठी थी और उसने खाने की ट्रे सोफा के सामने रखी टेबल पर रखी हुई थी। मुझे आता देखकर वो जल्दी से खड़ी हो गई। सलामू भी एक साइड पर मौजूद था। सारा को देखकर मेरे दिल की धड़कनें एक बार फ़िर तेज हो गई थीं। मगर मैंने खुद पर कंट्रोल करते हुए आगे बढ़कर सोफा पर बैठ गया, जिसके सामने खाने की ट्रे, एक टेबल पर सफेद कपड़े से ढकी हुई थी। सारा ने जल्दी से आगे बढ़कर खाने की ट्रे पर से पाश हटाया तो पूरी ट्रे कई तरह के खानों से भरी हुई थी।

 
मैंने थोड़ा सा दरवाजा खोलकर चाचा से नाइट ड्रेस ले ली। ट्राउजर और शर्ट लेकर मैंने जल्दी से चेंज किया और बाहर निकल आया। बाहर रूम में सारा एक तरफ फर्श पर बैठी थी और उसने खाने की ट्रे सोफा के सामने रखी टेबल पर रखी हुई थी। मुझे आता देखकर वो जल्दी से खड़ी हो गई। सलामू भी एक साइड पर मौजूद था। सारा को देखकर मेरे दिल की धड़कनें एक बार फ़िर तेज हो गई थीं। मगर मैंने खुद पर कंट्रोल करते हुए आगे बढ़कर सोफा पर बैठ गया, जिसके सामने खाने की ट्रे, एक टेबल पर सफेद कपड़े से ढकी हुई थी। सारा ने जल्दी से आगे बढ़कर खाने की ट्रे पर से पाश हटाया तो पूरी ट्रे कई तरह के खानों से भरी हुई थी।

मैं इतना सब कुछ देखकर घबरा गया, और जल्दी से बोला-“यह सब इतना कुछ कौन खाएगा? मुझे तो वैसे भी कुछ अच्छा नहीं लग रहा…”

मेरी बात सुनकर सारा जल्दी से शोख अंदाज में बोली-“कहाँ साईं। यह सब तो मैं अकेले ही खा जाऊँ, और आप तो इतने तगड़े जवान हो, आप नहीं खा पाओगे?”

उसकी बात सुनकर सलामू जल्दी से बोला-“छोरी ज़्यादा जबान मत चला…” फ़िर मेरी तरफ देखकर बोला-“छोटे साईं, आपने जो खाना हो वो खा लें, बाकी यह वापिस ले जाएगी। और इस छोरी की बातों को दिल पर मत लेना, इसे तो ऐसे ही ज़्यादा बोलने की आदत है…”

मैंने सारा की तरफ देखा तो वो सलामू चाचा की डाँट सुनकर मुँह फुलाए एक तरफ खड़ी थी। मैंने शोख नजरों से उसकी तरफ देखा, और खामोशी से खाना खाने लगा।

इसी दौरान चाचा सलामू बोले-“छोटे साईं। आप खाना खाकर आराम करिए, मैं दूसरे मेहमानों का इंतज़ाम देख लूँ । सरकार की तदफीन पर बहुत दूर-दूर से लोग आए हुए हैं…”

मैंने गर्दन हिलाते हुए चाचा सलामू को जाने का इशारा किया, और वो बाहर निकल गया। चाचा सलामू के बाहर निकलते ही सारा जल्दी से मेरे करीब आकर टेबल के पास बैठ गई। मैंने नजरें उठाकर सारा की तरफ देखा। वो बड़ी मासूमियत से मुझे देख रही थी। मुझे अपनी तरफ देखते हुए पाकर उसने कहा-“साईं, आपने अपने दादा साईं की तस्वीर देखी है?”

मैंने हल्के से कहा-“नहीं…”

उसने जल्दी से कहा-“आप बिल्कुल अपने दादा जैसे दिखते हैं। लोग कहते हैं कि वो भी आपकी तरह ही जवानी में ऐसे ही गबरू जवान थे…”

मैंने उसे देखते हुई कहा-“तुमने मेरे दादा की तस्वीर कहाँ देख ली?”

उसने जल्दी से कहा-“बड़ी साईं के रूम में आपके दादा की बहुत बड़ी तस्वीर लगी हुई है…”

मैंने उसका जवाब सुनकर कोई जवाब नहीं दिया और फ़िर से खाने लगा। मैं जानबूझ कर उसकी तरफ से नजरें चुरा रहा था। उसकी गहरी और बड़ी-बड़ी खूबसूरत आँखें मुझे अपनी तरफ खींच रही थीं, और मैं इस वक़्त जबकी मेरे वालिदान को गुजरे हुए दो दिन भी नहीं हुए थे, ऐसा कुछ नहीं करना चाहता था कि जिस पर मुझे अपने आप पर शर्मिंदा होना पड़े।

उसने एक बार फ़िर जल्दी से कहा-“छोटे साईं, अब आप यही रहोगे ना?”

उसकी इस बात पर मैंने एक बार फ़िर नजरें उठाकर उसे देखा। उसकी आँखों में एक हसरत सी महसूस हुई और एक बे-यकीनी का अहसास भी हुआ, कि कहीं मैं यह ना कह दूँ कि मैं यहाँ नहीं रहूँगा।

मैंने उसकी बे-यकीनी को यकीन में बदल दिया। उसपर से नजरें हटाते हुए हल्के से कहा-“नहीं…”

“क्यों, आप यहाँ क्यों नहीं रहेंगे? यह सब कुछ आप ही का तो है, और अब आप इस गढ़ी के वारिस भी तो हैं…” उसके लहजे में एक तड़प सी थी।

मैंने अपना हाथ खाने से रोक लिया। मेरे चेहरे पर उसकी बात सुनकर एक बार फ़िर गुस्से के भाव आ गये थे। मैंने बड़ी मुश्किल से खुद पर कंट्रोल करते हुए, सख़्त आवाज में उसे कहा-“मेरा इस गढ़ी से कोई ताल्लुक नहीं और ना ही मुझे इस तमाम दौलत और जायदाद का कोई शौक है। मैं बाबा के सोयम के बाद एक लम्हा भी यहाँ रुकना पसंद नहीं करूँगा…”

“मगर उनका क्या होगा, जो आपसे बहुत सी उम्मीदें लगाए बैठे हैं?” सारा ने कहा।

मैंने हैरत से सारा की तरफ देखा-“किसका क्या होगा? कौन मुझसे उम्मीदें लगाए बैठा है?”

सारा-आपकी दादी, आपकी दूसरी माँ, आपकी दो बहनें, और इस इलाके के वो तमाम लोग जो आपके बाबा के वफादार थे और अब आपके हैं।

मैं-“मेरा उन लोगों से कोई ताल्लुक नहीं। जिनको मैं नहीं जानता। मेरा रिश्ता इस गाँव के हवाले से सिर्फ़ अपने बाबा के साथ था, जो अब टूट चुका है…” कहकर मैंने उसके चेहरे को देखा तो उसकी बड़ी-बड़ी आँखें पानी से भरी हुई थीं। मुझे देखकर सारा उठ गई और अपने दुपट्टे से अपनी आँखों में आए आँसू को सॉफ किया और जल्दी से एक साइड पर रखे फ्रिज की तरफ बढ़ गई। फ्रिज खोलकर उसने एक पानी की बोतल निकाली और साइड टेबल पर रखा ग्लास उठाकर मेरी तरफ बढ़ी।

मैं खामोशी से उसे यह सब कुछ करते देखता रहा।

फ़िर उसने बोतल खोलकर एक ग्लास पानी का भरा, और मेरे सामने बोतल और ग्लास दोनों रख दिए। फ़िर रुंधी हुई आवाज में बोली-“साईं, आप आराम से खाना खा लें, मैं यह बर्तन सुबह ले जाऊँगी…” यह कहकर वो तेजी से रूम से बाहर निकल गई, और मैं चाहते हुए भी रोक ना पाया।

 
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