प्रोलॉग
तब तक विजय एक ताड़ के पेड़ के निकट पहुंच चूका था ....
फायरों की आवाज़ सुनकर वह तुरंत सावधानीवश जमीन पर लेट गया और पलट कर ईमारत की और देखा I
एक लम्बा सा आदमी जिसके कपडे फट कर उसके बदन पर चिथड़ों की तरह झूल रहे थे , बुरी तरह घबराया हुआ बहार निकला....
उसके पीछे-पीछे नंगी चण्डिकाओ का झुण्ड अपनी पूरी ताकत से चीखता चिल्लाता हुआ निकला....
उनके बाल चुड़ैलों की तरह बिखरे हुए थे और वे अपने बदसूरत नंगे शरीरो के साथ कोहराम मचाती हुई झाड़ियों और चट्टानों पर से कूदती हुई प्रचंड पागलपन के साथ अपने शिकार का पीछा कर रही थी ...I
कुछ छन तक तो वो उनसे जूझता रहा और फिर गिर पड़ा .,...
विजय को उसकी दर्द वहारी चिंघारे सुनाई दी.....
सब लड़कियों ने अपने दाँत उसके शरीर में फास दिए ....
उनकी यह दुर्दशा करने में उसका भी बहुत बड़ा हाथ था ....
एक ने तो अपने दातो से फूमाचु के नितम्बो का गोस्त काटकर खींच लिया और किसी जंगली जानवर की तरह चबाने लगी.
"यो तो उसे कच्चा हे चबाये जा रही है . I
विजय के मुख से बेसाख्ता निकला.
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वेद प्रकाश काम्बोज
का विजय, रघुनाथ सीरीज का
अजीबोगरीब घटनाओ से लबरेज एक हैरत अंगेज उपन्यास
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