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जहन्नुम की अप्सरा

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जहन्नुम की अप्सरा

फिर वही हुआ जिसका अन्दाज़ा इमरान पहले ही लगा चुका था....जैसे ही वह ‘भयानक आदमी’ वाला केस ख़त्म करके शादाब नगर से वापस आया, उसके बाप के दफ़्तर में उसकी पेशी हो गयी....

उसके बाप रहमान साहब इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर जनरल थे और होम सेक्रेटरी ने कई बार इमरान के कारनामों का ज़िक्र उनसे कर दिया था, वरना वे तो अब तक उसे निकम्मा और बेवक़ूफ़ समझते थे।

इमरान अपनी सभी बेवक़ूफ़ियों समेत उनके सामने पेश हुआ।

पहले वे उसे ख़ूँख़ार नजरों से घूरते रहे, फिर झल्लायी हुई आवाज़ में बोले, ‘‘बैठ जाओ।’’

उनकी मेज़ के सामने तीन ख़ाली कुर्सियाँ थीं। इमरान कुछ इस तरह बौखला कर इधर-उधर नाचने लगा जैसे उसकी समझ में ही न आ रहा हो कि उसे किस कुर्सी पर बैठना चाहिए।

‘‘बैठो!’’ रहमान साहब मेज़ पर घूँसा मार कर गरजे.... और इमरान एक कुर्सी में ढेर हो कर हाँफने लगा।

‘‘तुम बिलकुल गधे हो....!’

‘‘जी हाँ....!’’

‘‘शट अप!’’

इमरान ने बच्चे की तरह सिर झुका लिया।

‘‘तुमने शादाब नगर के स्मगलर को पकड़ने के लिए कौन-सा तरीक़ा अपनाया था?’’

‘‘वह....बात दरअसल यह है कि....मैंने एक जासूसी नॉवेल में पढ़ा था....।’’

‘‘जासूसी नॉवेल....?’’ रहमान साहब ग़ुर्राये।

‘‘जी हाँ....भला-सा नाम था....चेहरे की होरी....ओ लल लाहौल....हीरे की चोरी!’’

‘‘देखो! मैं बहुत बुरी तरह पेश आऊँगा। तुम डिपार्टमेंट को बदनाम कर रहे हो। शादाब नगर वाले दफ़्तर से तुम्हारे लिए कोई अच्छी रिपोर्ट नहीं आयी। यह सरकारी डिपार्टमेंट है, कोई थियेटर कम्पनी नहीं, जिसमें जासूसी नॉवेल स्टेज किये जायें और वह औरत कौन है, जो तुम्हारे साथ आयी है?’’

‘‘वह....वह रूशी है!....जी हाँ....’’

‘‘उसे क्यों लाये हो?’’

‘‘वह मेरे सेक्शन के लिए एक टाइपिस्ट की ज़रूरत थी न।’’

‘‘टाइपिस्ट की ज़रूरत थी?’’ रहमान साहब ने दाँत पीस कर दोहराया।

‘‘जी हाँ....!’’

रहमान साहब ने एक सादा काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लिखो।’’

इमरान लिखने लगा, ‘मेरे सेक्शन के लिए एक टाइपिस्ट की जरूरत थी....’

‘‘क्या लिख रहे हो?’’

इमरान ने जितना लिखा था, सुना दिया।

‘‘मैंने इस्तीफ़ा लिखने को कहा था?’’ रहमान साहब मेज़ पर घूँसा मार कर बोले।

इमरान ने दूसरा काग़ज़ उठाया और अपने चेहरे पर किसी किस्म के भाव ज़ाहिर किये बग़ैर इस्तीफा लिख दिया।

‘‘मुझे ख़ुद शर्म आती थी?’’ इमरान ने इस्तीफा रहमान साहब की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा। ‘‘इतने बड़े आदमी का लड़का और नौकरी करता फिरे, लाहौल विला क़ूवत....’’

‘हूँ....लेकिन अब तुम्हारे लिए कोठी में कोई जगह नहीं?’’ रहमान साहब ने जवाब दिया।

‘‘मैं गैराज में सो जाया करूँगा....आप उसकी फ़िक्र न करें।’’

‘‘नहीं! अब तुम फाटक में भी क़दम नहीं रखोगे?’’

‘‘फाटक!’’ इमरान कुछ सोचता हुआ बड़बड़ाने लगा। ‘‘चारदीवारी....तो काफ़ी ऊँची है।’’

वह ख़ामोश हो गया। फिर थोड़ी देर बाद बोला, ‘‘नहीं जनाब! फाटक में क़दम रखे बग़ैर तो कोठी में दाख़िल होना मुश्किल है।’’

‘‘गेट आउट....!’’

इमरान सिर झुकाये उठा और कमरे से निकल गया।

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तीन घण्टे के अन्दर-अन्दर पूरे डिपार्टमेंट को मालूम हो गया कि इमरान ने इस्तीफा दे दिया है....इस ख़बर पर सबसे ज़्यादा ख़ुशी कैप्टन फ़ैयाज़ को हुई....वह इमरान का दोस्त ज़रूर था, लेकिन उसी हद तक जहाँ ख़ुद उसके फ़ायदे को ठेस न लगती हो....इमरान के बाक़ायदा नौकरी में आ जाने के बाद से उसकी इज़्ज़त खतरे में पड़ गयी थी।

नौकरी में आ जाने से पहले इमरान ने कुछ केसों के सिलसिले में उसकी जो मदद की थी उसकी बिना पर उसकी साख बन गयी थी, लेकिन इमरान के नौकरी में आते ही अमली तौर पर फ़ैयाज़ की हैसियत ज़ीरो के बराबर भी नहीं रह गयी थी।

‘‘इमरान डियर!’’ फ़ैयाज़ उससे कह रहा था। ‘‘मुझे अफसोस है कि तुम्हारा साथ छूट रहा है।’’

‘‘किसी दुश्मन ने उड़ायी होगी!’’ इमरान ने लापरवाही से कहा....फिर फ़ैयाज़ का कन्धा थपकता हुआ बोला।

‘‘नहीं दोस्त! मैं क़ब्र में भी तुम्हारा साथ नहीं छो़ड़ूँगा! फ़िलहाल अपने बँगले के दो कमरे मेरे लिए ख़ाली करा दो।’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘वालिद साहब कहते हैं कि मैं अब उनकी कोठी में क़दम भी नहीं रख सकता, हालाँकि मुझे यक़ीन है कि मैं रख सकता हूँ।’’

‘‘ओह....अब मैं समझा....शायद इसकी वजह वह औरत है!’’ फ़ैयाज़ हँसने लगा।

‘‘हाँ, वह औरत!’’ इमरान आँखें फाड़ कर बोला। ‘‘तुम मेरे बाप को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हो....शट अप यू फ़ूल!’’

‘‘मेरा मतलब यह था....!’’

‘‘नहीं! बिलकुल शट अप! ख़बरदार, होशियार....तुम मेरी बात का जवाब दो! कमरे ख़ाली कर रहे हो....या नहीं?’’

‘‘यार, बात दरअसल यह है कि मेरी बीवी....क्या वह औरत भी तुम्हारे साथ ही रहेगी।’’

‘‘उसका नाम रूशी है।’’

‘‘ख़ैर, कुछ हो! हाँ, तो मेरी बीवी कुछ और समझेगी।’’

‘‘क्या समझेगी।’’

‘‘यही कि वह तुम्हारी नौकरानी है।’’

‘‘लाहौल विला क़ूवत....मैं तुम्हारी बीवी की बहुत इज़्ज़त करता हूँ।’’

‘‘मैं उस औरत के बारे में कह रहा था।’’ फ़ैयाज़ झेंपा भी और झल्ला भी गया।

‘‘ओह तो ऐसे बोलो ना! अच्छा ख़ैर....अगर तुम बँगले में जगह नहीं देना चाहते तो वह फ़्लैट ही मुझे दे दो जिसे तुम पगड़ी पर उठाने वाले हो।’’

‘‘कैसा फ़्लैट?’’ फ़ैयाज़ चौंक कर उसे घूरने लगा।

‘‘छोड़ो यार! अब क्या मुझे यह भी बताना पड़ेगा कि तुमने चार-पाँच फ़्लैटों पर नाजायज़ तौर पर क़ब्ज़ा कर रखा है!’’

‘‘ज़रा धीरे से बोलो! गधे कहीं के!’’ फ़ैयाज़ चारों तरफ़ देखता हुआ बोला।

‘‘फ़रमान बिल्डिंग वाले फ़्लैट की चाभी मेरे हवाले करो। समझे!’’

‘‘ख़ुदा तुम्हें ग़ारत करे!’’ फ़ैयाज़ उसे घूँसा दिखाता हुआ दाँत पीस कर बोला।

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तीन-चार दिन बाद शहर के एक अख़बार में एक अजीबो-गरीब इश्तहार छपा। जिसकी सु़र्खी थी, ‘तलाक़ हासिल करने के लिए हमसे मिलें।’

इश्तहार का मज़मून था :

‘‘अगर आप अपने शौहर से तंग आ गयी हैं, तो तलाक़ के अलावा और कोई चारा नहीं....लेकिन अदालत से तलाक़ हासिल करने के लिए शौहर के खिलाफ़ ठोस क़िस्म के सबूत पेश करने पड़ते हैं। हम कम मेहनताना ले कर आपके लिए ऐसे सबूत मुहैया कर सकते हैं जो तलाक़ के लिए काफ़ी हों, सिर्फ़ एक बार हमसे मिल कर हमेशा के लिए सच्ची ख़ुशी हासिल कीजिए। मिलने का पता : रूशी ऐण्ड को., फ़रमान बिल्डिंग, फ़्लैट नम्बर ४।’’

कैप्टन फ़ैयाज़ ने यह इश्तहार पढ़ा और उसका मुँह हैरत से खुल गया! फ़रमान बिल्डिंग का चौथा फ़्लैट वही था जिसकी चाभी इमरान उससे ले गया था.... रूशी ऐण्ड को.!

फ़ैयाज़ सोचने लगा! रूशी....यह उसी औरत का नाम है जिसे इमरान शादाब नगर से लाया है।

फ़ैयाज़ अपना सिर खुजाने लगा....यह बिलकुल नयी हरकत थी....इससे शहर में अफ़वाहों की लहर दौड़ सकती थी, लेकिन इसे ग़ैरक़ानूनी नहीं कहा जा सकता था....यक़ीनन रूशी ऐण्ड कम्पनी उसके डिपार्टमेंट के लिए एक सिर दर्द बनने वाली थी....

फ़ैयाज़ ने हाथ-पैर फैला कर लम्बी अँगड़ाई ली और सिगरेट सुलगा कर दोबारा इश्तहार पढ़ने लगा।

उसने रूशी के बारे में सिर्फ़ सुना था....उसे देखा नहीं था।

वह थोड़ी देर बैठा सिगरेट पीता रहा....फिर उठ कर दफ़्तर से बाहर आया, मोटर साइकिल सँभाली और फ़रमान बिल्डिंग की तरफ़ रवाना हो गया।

फ़रमान बिल्डिंग तीन मंज़िला इमारत थी और उसके फ़्लैटों में ज़्यादातर प्राइवेट कम्पनियों के दफ़्तर थे।

कैप्टन फ़ैयाज़ चौथे फ़्लैट के सामने रुक गया जिस पर ‘‘रूशी ऐण्ड को.’’ का बोर्ड लगा हुआ था....फ़ैयाज़ ने बोर्ड पर लिखी पूरी इबारत पढ़ी।

‘‘रूशी ऐण्ड को....फॉरवर्डिंग ऐण्ड क्लीयरिंग एजेंट्स।’’

फ़ैयाज़ ने बुरा-सा मुँह बना कर अपने कन्धों को उचकाया और चिक हटा कर अन्दर दाख़िल हुआ।

कमरे में रूशी और इमरान के अलावा और कोई नहीं था। फ़ैयाज़ को देख कर इमरान ने कुर्सी की तरफ़ इशारा किया वह रूशी को कुछ लिखवा रहा था....‘‘मैं डॉक्टर वॉटसन....’’ उसने डिक्टेशन जारी रखा और रूशी की पेन्सिल बड़ी तेज़ी से काग़ज़ पर चलती रही।

आदमी को ज़िन्दगी में कभी-कभी ऐसे हादसे भी पेश आते हैं जो ज़िन्दगी के आख़िरी पलों में भी ज़रूर याद आते हैं।

‘‘मैं डॉक्टर वॉटसन....मरते वक़्त....एक बार यह ज़रूर सोचूँगा....सोचूँ....सोचूँ....सोचूँ....!’’

इमरान ‘‘सोचूँ....सोचूँ’’ रटता हुआ कुछ सोचने लगा....रूशी की पेन्सिल रुक गयी....वह पेन्सिल रख कर फ़ैयाज़ की तरफ़ मुड़ी।

‘‘कहिए?’’ उसने फ़ैयाज़ से कहा।

‘‘कहेंगे!’’ इमरान ने सिर खुजाते हुए कहा। ‘‘ज़रा देखना रजिस्टर में हमारी किसी मुवक्किला का नाम मिसेज़ फ़ैयाज़ तो नहीं है।’’

‘‘मुवक्किला!’’ रूशी ने हैरत जाहिर की।

‘‘ओह....हाँ....अच्छा....डिक्टेशन,’’ इमरान ने फिर उसे लिखने का इशारा किया।

‘प्लीज़....’’ फ़ैयाज़ हाथ उठा कर बोला। ‘‘डिक्टेशन फिर होता रहेगा।’’

‘‘क्या बात है सुपर फ़ैयाज़!’’ इमरान ने हैरत से कहा। ‘‘क्या तुम अपनी बीवी को तलाक़ देना चाहते हो?’’

‘‘तुम्हारी फ़र्म के इश्तहार में मेरा डिपार्टमेंट काफ़ी दिलचस्पी ले रहा है।’’

‘‘वेरी गुड!’’ इमरान सिर हिला कर बोला। ‘‘तब तो मैं इसी साल इन्कम टैक्स अदा करने के क़ाबिल हो जाऊँगा।’’

‘‘बकवास मत करो।’’

‘‘सुपर फ़ैयाज़! तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूँगा, अगर तुम अपने डिपार्टमेंट के शादीशुदा लागों की लिस्ट मुझे दे दो। मगर.... हिप....डैडी का नाम उसमें न होना चाहिए।’’

‘‘आख़िर इस हरकत का मतलब क्या है?’’

‘‘कैसी हरकत?’’

‘‘यही इश्तहार....!’’

‘‘इश्तहार....हाँ, इश्तहार क्या....?’’

‘‘यह क्या मामला है....और तुमने यहाँ फ़ॉरवर्डिंग और क्लीयरिंग का बोर्ड लगा रखा है?’’

‘‘यह शादी और तलाक़ का अंग्रेज़ी ट्रांसलेशन है।’’

‘‘लेकिन तुम यह गन्दा बिज़नेस नहीं कर सकते।’’

‘‘रूशी....तुम दूसरे कमरे में जाओ,’’ इमरान ने रूशी से कहा।

रूशी वहाँ से चली गयी।

‘‘औरत तो ज़ोरदार है!’’ फ़ैयाज़ अपनी एक आँख दबा कर बोला।

‘‘यही जुमला तुम्हारी बीवी तुम्हारे ख़िलाफ़ अदालत में सबूत के तौर पर पेश करके तलाक़ ले सकती है।’’

‘‘बकवास मत करो! तुम बड़ी मुसीबतों में फँस जाओगे।’’ फ़ैयाज़ ने कहा।

‘‘क्यों माई डियर! सुपर फ़ैयाज़ ?’’

‘‘बस यूँ ही!

‘‘हरकत ग़ैरक़ानूनी तो नहीं....!’’

‘‘ग़ैरक़ानूनी....’’ फ़ैयाज़ कुछ सोचने लगा फिर झल्ला कर बोला, ‘‘देखो इमरान, तुम डिपार्टमेंट के लिए सिर दर्द बनने वाले हो।’’

‘‘बस....इतनी-सी बात....!’’

इमरान कुछ और कहने वाला था कि एक अधेड़ उम्र की औरत कमरे में दाख़िल हुई। उसने दरवाज़े पर ही रुक कर कमरे का जायज़ा लिया....और फिर बिना किसी हिचकिचाहट के बोली। ‘‘मैं आपका इश्तहार देख कर आयी हूँ।’’

‘‘ओह....अच्छा....मिस रूशी अन्दर हैं।’’ इमरान ने खड़े हो कर दूसरे कमरे की तरफ़ इशारा किया।

औरत जल्दी से कमरे में चली गयी।

फ़ैयाज़, जो औरत को हैरत से देख रहा था, मेज़ पर कुहनियाँ टेक कर आगे झुकता हुआ धीरे से बोला। ‘‘यह तुम क्या कर रहे हो इमरान?’’

‘‘बिज़नेस माई डियर....सुपर फ़ैयाज़!’’ इमरान ने लापरवाही से जवाब दिया।

‘‘इस औरत को पहचानते हो?’’ फ़ैयाज़ ने पूछा।

‘‘मैं शहर की सारी बूढ़ी औरतों को पहचानता हूँ।’’

‘‘कौन है?’’

‘‘एक बूढ़ी औरत।’’ इमरान ने जवाब दिया।

‘‘बको मत यह लेडी तनवीर है।’’

‘‘तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है।’’

फ़ैयाज़ थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहा फिर बोला। ‘‘आख़िर यहाँ क्यों आयी है?’’

‘‘नो सर!’’ इमरान सिर हिला कर बोला। ‘‘हरगिज़ नहीं फ़ैयाज़ साहब! आपको ऐसी बात सोचने का कोई हक़ नहीं....यह मेरा और मेरे मुवक्किलों का मामला है।’’

‘‘सर तनवीर की शख़्सियत से शायद तुम वाकिफ नहीं हो। अगर मुसीबत में फँसे तो रहमान साहब भी तुम्हें नहीं बचा सकेंगे।’’

‘‘मैं अपने दफ़्तर में सिर्फ़ बिज़नेस की बातें करता हूँ!’’ इमरान बुरा-सा मुँह बना कर बोला। ‘‘अगर तुम मेरे मुवक्किल बनना चाहते हो तो शौक़ से यहाँ बैठो, वरना....बाय! क्या समझे। अभी मैंने कोई चपरासी नहीं रखा है, इसलिए मुझे ख़ुद ही तकलीफ़ करनी पड़ेगी।’’

फ़ैयाज़ उसे ग़ुस्से-भरी जैसी आँखों से घूरने लगा! फिर थोड़ी देर बाद बोला।

‘‘सुनो! यह रहने वाला फ़्लैट है और रहने ही के लिए इसका अलॉटमेंट हुआ था। तुम इसमें किसी क़िस्म का दफ़्तर नहीं खोल सकते, समझे।’’
 
‘‘यार, क्यों बेकार में गरम होते हो। जब बीवी को तलाक़ देना हो तो सीधे यहीं चले आना तुमसे कोई फ़ीस नहीं ली जायेगी।’’

‘‘अच्छा, मैं तुम्हें देख लूँगा....याद रखो, अगर एक हफ़्ते के अन्दर-अन्दर तुमने यहाँ से दफ़्तर का बोर्ड न हटवाया तो ख़ुद भुगतोगे।’’

‘‘भुगत लूँगा! अब तुम जाओ....यह बिज़नेस का वक़्त है और मेरी पार्टनर तुमसे कभी बेतकल्ल़ुफ नहीं होगी। इसलिए रोज़ाना इधर के चक्कर काटने की बात, अगर डॉक्टर नुस्खें में न लिखे तो बेहतर है।’’

इमरान ने मेज़ पर रखी हुई घण्टी बजायी और फिर हड़बड़ा कर बोला। ‘‘लाहौल विला क़ूवत! चपरासी तो अभी रखा ही नहीं है। फिर मैं घण्टी क्यों बजा रहा हूँ! यार फ़ैयाज़,ज़रा लपक कर पाँच रुपए के भुने हुए चने तो लाना....लंच का वक़्त होने वाला है....और एक रुपये की हरी मिर्चें, पुदीना मुफ़्त मिल जायेगा। बस मेरा नाम ले लेना। मैं जाता तो एक टमाटर भी पार कर लाता....ख़ैर कोशिश करना....’’

‘‘तुम्हें पछताना पड़ेगा।’’

‘‘मैंने अभी शादी तो नहीं की।’’

‘‘अच्छा!’’ फ़ैयाज़ भन्ना कर खड़ा हो गया। कुछ पल इमरान को घूरता रहा फिर कमरे से बाहर निकल गया।

इमरान के होंटों पर शरारती मुस्कुराहट थी।

थोड़ी देर बाद रूशी और लेडी तनवीर बाहर आ गयीं।

रूशी उससे कह रही थी, ‘‘आप इत्मीनान रखिए। आपको पल-पल की ख़बर दी जाती रहेगी। और यहाँ सारी बातें राज़ में रहेंगी।’’

‘‘शुक्रिया!’’ लेडी तनवीर ने कहा और बाहर चली गयी।

रूशी कुछ पल खड़ी मुस्कुराती रही। फिर उसने पाँच-पाँच सौ के बीस नोट ब्लाउज़ के अन्दर से निकाल कर इमरान के आगे डाल दिये।

‘‘वाह....वाह....’’ इमरान ने उल्लुओं की तरह आँखें फाड़ दीं।

‘‘मैं हमेशा पक्का सौदा करती हूँ।’’ रूशी अकड़ कर बोली।

‘‘यानी....बैठो....बैठो....क्या पियोगी।’’

‘‘यह कौन था, जो अभी आया था....?’’ रूशी ने बैठते हुए पूछा।

‘‘फ़िक्र न करो। ऐसे दर्जनों आते-जाते रहेंगे....हाँ, वह क्या चाहती है।’’

‘‘तुम क्या समझते हो....क्या वह अपने शौहर से तलाक़ चाहती होगी....!’’

‘‘मैं तो यह भी समझ सकता हूँ कि....ख़ैर....तुम अपनी बात बताओ।’’

‘‘वह एक आदमी के बारे में पता करना चाहती है....दस हज़ार एडवांस दिये हैं और बाक़ी चालीस हज़ार पूरी जानकारी हासिल कर लेने के बाद!’’

‘‘आ हा....पचास हज़ार....रूशी! तुमने गलती की.... मुझसे सलाह लिये बग़ैर तुम्हें रुपये हरगिज़ नहीं लेने चाहिएँ थे....क्या तुमने उसे रसीद दी है।’’

‘‘नहीं, कुछ नहीं! उसने रसीद माँगी ही नहीं।’’

‘‘मुझे पूरी बात बताओ, रूशी।

‘‘मेरा ख़याल है कि मामला बिलकुल सीधा-साधा है....’’ रूशी अक़्लमन्दी दिखाते हुए बोली। ‘‘वह इसी शहर के एक आदमी के बारे में मालूम करना चाहती है....और....वह इस जानकारी को तलाक़ के लिए इस्तेमाल नहीं करेगी।’’

‘‘वह आदमी कौन है....?’’

‘‘मैंने सब लिख लिया है!’’ उसने काग़ज़ का एक टुकड़ा इमरान की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।

इमरान ने काग़ज़ ले कर उस पर नज़रें जमा दीं।

‘‘हूँ,’’ थोड़ी देर बाद उसने लम्बी अँगड़ाई ली....और आँखें बन्द करके इस तरह आगे की तरफ़ हाथ बढ़ाया जैसे फ़ोन का रिसीवर उठाने का इरादा हो। लेकिन फिर चौंक कर रूशी की तरफ़ देखने लगा।

‘‘फ़ोन तो लेना ही पड़ेगा। उसके बग़ैर काम नहीं चल सकता।’’

‘‘फ़ोन गया जहन्नुम में....मैं यहाँ अकेले सोती हूँ, मुझे डर लगता है तुम रात को कहाँ रहते हो? पहले इसका जवाब दो।’’

‘‘रूशी! यह मत पूछो....हम सिर्फ़ पार्टनर हैं। हाँ....’’ इमरान ने दस नोट अलग किये और उन्हें रूशी की तरफ़ खिसकाता हुआ बोला। ‘‘अपना हिस्सा रखो....! हो सकता है कि बाक़ी चालीस हज़ार मिलने की नौबत ही न आये!’’

‘‘क्यों....?’’

‘‘तुमने मुझसे मशविरा किये बग़ैर केस ले लिया। ख़ैर....अभी नयी हो! फिर देखेंगे।’’

‘‘क्यों केस में क्या ख़राबी है।’’

‘‘वह उसके बारे में जानकारी क्यों लेना चाहती है।’’

‘‘यह उसने नहीं बताया।’’

‘‘कच्चा काम है पार्टनर!’’ इमरान सिर हिला कर बोला। ‘‘ख़ैर, मैं देखूँगा।’’

‘‘क्या देखोगे?’’

‘‘यह एक....ख़ैर, हाँ देखो....यह औरत यहाँ की मशहूर शाख़्सियतो में से है....!’’

‘‘अच्छा!’’

‘‘हाँ, लेडी तनवीर....!’’

‘‘लेडी....!’’ रूशी ने हैरत से कहा।

‘‘हाँ लेडी! तुम्हें हैरत क्यों है?’’

‘‘उसने मुझे अपना नाम मिसेज़ रफ़अत बताया था।’’

‘‘यही मैं कह रहा था कि कुछ घपला ज़रूर है....ख़ैर....! वह अपनी असलियत भी छिपाना चाहती है और एक ऐसे आदमी के बारे में जानकारी हासिल करना चाहती है जो उसकी बिरादरी का नहीं हो सकता।’’
 
‘‘क्यों तुमने बिरादरी का अन्दाज़ा कैसे कर लिया?’’

‘‘उसका पता!’’ इमरान सिर हिला कर रह गया।

‘‘पूरी बात बताओ?’’ रूशी झुँझला गयी।

‘‘वह एक ऐसी बस्ती है, जहाँ आम तौर पर मज़दूर बसते हैं....और जो तुम यह नम्बर देख रही हो, यह किसी आलीशान इमारत का नम्बर नहीं है, बल्कि एक मामूली-सी कोठरी का नम्बर है जिसमें मुश्किल से एक बड़ा पलँग आ सकेगा।’’

‘‘ओह! तब तो....!’’

‘‘तुम मुझसे भी ज़्यादा बेवक़ूफ़ हो रूशी....मगर ख़ैर! परवाह न करो। तुम इस पेशे में बिलकुल नयी हो।’’

‘‘नहीं, इमरान डियर....अगर इसमें ख़तरा हो तो....हम उसके रूपये वापस कर दें।’’

‘‘घास खा गयी हो शायद! रुपये वापस करोगी। भूखी मरने का इरादा है क्या।’’

‘‘बैंक में मेरे पचास हज़ार रुपये हैं।’’ रूशी बोली।

‘‘उन्हें मेरे कफ़न-दफ़न के लिए पड़ा रहने दो।’’ इमरान ने ठण्डी साँस ली।

‘‘तुमने इस्तीफ़ा क्यों दिया, वाक़ई तुम उल्लू हो।’’

‘‘क्या तुम फिर अपनी पिछली ज़िन्दगी की तरफ़ लौट जाना चाहती हो।’’

‘‘हरगिज़ नहीं! यह ख़याल कैसे आया?’’ रूशी उसे घूरने लगी।

‘‘कुछ नहीं! अच्छा, मैं चला!’’ इमरान उठता हुआ बोला।

‘‘कहाँ चले?’’

‘‘उसके लिए जानकारी हासिल करूँगा, और हाँ अगर यहाँ कोई पुलिस वाला आ कर हमारी फ़र्म के बारे में पूछ-ताछ करे तो उसे मेरा कार्ड दे कर कहना कि फ़र्म का डायरेक्टर यही है। मुझे उम्मीद है कि वह चुपचाप वापस चला जायेगा।’’

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इमरान शाही बाग़ के इलाके में पहुँच कर एक जगह रुक गया वह यहाँ तक अपनी टू-सीटर पर आया था....गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी करके वह आगे बढ़ गया। मज़दूरों की वह बस्ती यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं थी जहाँ उसे पहुँचना था। उसके हाथ में एक बैग था और हुलिये से कोई डॉक्टर मालूम होता था। वह कमरों की एक लाइन के सिरे पर रुक गया। जिस आदमी के बारे में उसे जानकारी लेनी थी, वह उसी लाइन के एक कमरे में रहता था।

इमरान ने खुले हुए कमरों के दरवाज़ों पर दस्तक देनी शुरू की, लेकिन क़रीब-क़रीब हर जगह से उसे यही जवाब मिला कि टीके लग चुके हैं। उसने दो-एक आदमियों के बाज़ू भी खुलवा कर देखे। फिर आख़िरकार वह उस कमरे के सामने पहुँचा जिसमें वह आदमी रहता था। दरवाज़ा अन्दर से बन्द था। इमरान ने दस्तक दी, लेकिन जवाब नहीं मिला....वह बराबर दस्तक देता रहा....

‘‘चले जाओ.... ख़ुदा के लिए!’’ थोड़ी देर बाद अन्दर से आवाज़ आयी। ‘‘क्यों परेशान करते हो मुझे। किसी से नहीं मिलना चाहता।’’

‘‘मैं डॉक्टर हूँ।’’ इमरान ने कहा। ‘‘क्या आप टीका नहीं लगवायेंगे? यह बहुत ज़रूरी है हर एक के लिए।’’

‘‘मैं इसकी ज़रूरत नहीं समझता....आप जा सकते हैं।’’

‘‘अगर आपको इस शहर में रहना है तो आप टीके के बग़ैर नहीं रह सकते। क्या आप नहीं जानते कि इस मौसम में हमेशा महामारी फैलने का ख़तरा रहता है।’’

अन्दर से फिर कोई जवाब नहीं मिला।

बाहर कई आदमी इकट्ठे हो गए थे। उनमें से एक बोला। ‘‘वह बाहर नहीं आयेगा साहब।’’

‘‘क्यों?’’ इमरान ने हैरानी ज़ाहिर की।

‘‘वह किसी से नहीं मिलता....बड़े-बड़े लोग कारों पर बैठ कर आया करते हैं, लेकिन वह उन्हें टका-सा जवाब दे देता है।’’

‘‘यह बात है....अच्छा....मुझे उसके बारे में बताइए। मैं देखूँगा कि वह कैसे टीका नहीं लगवाता।’’

इमरान उस कमरे के सामने से हट आया। वे लोग जो अपने पड़ोसी के बारे में डॉक्टर को कुछ बताना चाहते थे, बदस्तूर उसके साथ लगे रहे। एक जगह इमरान रुक कर बोला। ‘‘उसका नाम क्या है?’’

‘‘नाम तो शायद किसी को भी मालूम न हो।’’

‘‘वह करता क्या है?’’

‘‘यह भी नहीं बताया जा सकता....एक महीने पहले यह कमरा किराये के लिए ख़ाली था। वह आया और यहाँ ठहर गया। दो-तीन दिन तक तो उसकी शक्ल दिखाई दी, उसके बाद से वह कमरे में बन्द रहने लगा.... कोई नहीं जानता कि उसका पेशा क्या है।’’

‘‘आप में से किसी ने कभी उसे देखा भी है?’’

‘‘क़रीब-क़रीब सभी ने देखा होगा, मगर उन्हीं दिनों में जब उसे यहाँ आये हुए ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा था। शुरू में वह पड़ोसियों से भी मिला करता था। लेकिन फिर अचानक उसने ख़ुद को इस कमरे में क़ैद कर लिया।

‘‘देखने से कैसा मालूम होता है?’’ इमरान ने पूछा।

‘‘देखने से,’’ बताने वाला कुछ सोचने लगा। फिर उसने कहा। ‘‘देखने से वह बहुत ही शरीफ़ मालूम होता है।’’

‘‘हैसियत?’’

‘‘हैसियत वही, जो इस बस्ती के दूसरे आदमियों की है।’’

‘‘लेकिन अभी कोई कह रहा था कि उससे मिलने के लिए बहुत बड़े-बड़े लोग आते हैं।’’

‘‘इसी पर तो हैरानी है! उसकी हैसियत ऐसी नहीं है कि वह कार रखने वालों से इस हद तक लगाव रख सके....लेकिन....’’

‘‘लेकिन क्या?’’ इमरान ने उससे पूछा।

‘‘कुछ नहीं! यही कि वह उन लोगों से भी मिलना नहीं पसन्द करता। ओह ज़रा देखिए! वह कार इधर ही आ रही है....आप देखिएगा तमाशा! वे लोग कितनी इज़्ज़त के साथ उससे बाहर निकलने को कहते हैं।’’

सामने से एक कार आ रही थी। हालाँकि यह गली ऐसी नहीं थी कि यहाँ कोई अपनी कार लाने की हिम्मत करता, मगर वह कार किसी-न-किसी तरह गली में घुस ही पड़ी थी।

स्टीयरिंग के पीछे एक आदमी बैठा दिख रहा था। कार ठीक उस कमरे के सामने रुक गयी। वह आदमी कार से उतर कर दरवाज़े पर दस्तक देने लगा। दूरी ज़्यादा होने के कारण इमरान कमरे के अन्दर से आने वाली आवाज़ न सुन सका, लेकिन वह दस्तक देने वाले को आसानी से देख सकता था। उसकी आवाज़ भी सुन सकता था।

इमरान ख़ामोशी से उसे देखता रहा, फिर उसने उसे दरवाज़े के पास से हटते देखा। वह अपनी कार की तरफ़ वापस जा रहा था।
 
‘‘मैं उसके भी टीका लगाऊँगा।’’ इमरान बड़बड़ाया और पास खड़े हुए लोग मुँह बन्द करके हँसने लगे।

इमरान उन्हें वहीं छोड़ कर आगे बढ़ गया। वह गलियों में घुसता हुआ फिर सड़क पर आ गया....और ठीक उस गली के सिरे पर जा खड़ा हुआ, जिससे उस आदमी की कार आने की उम्मीद थी।

जैसे ही कार गली से निकली, इमरान रास्ता रोक कर खड़ा हो गया।

‘‘क्या बात है?’’ कार वाले ने हैरानी से पूछा।

‘‘क्या आप महामारी का टीका ले चुके हैं?’’

‘‘नहीं! क्यों?’’

‘‘तब तो मैं टीके लगाये बग़ैर आपको यहाँ से न जाने दूँगा। इस बस्ती में दो-एक केस हो चुके हैं।’’

‘‘आप कौन हैं?’’ कार वाला उसे घूरता हुआ बोला।

‘‘मेडिकल ऑफ़िसर ऑन आउटडोर डयूटीज़,’’ इमरान ने संजीदगी से कहा। ‘‘हमें सबको यह टीका लगाने का हुक्म मिला है। इनकार करने वाले पुलिस के हवाले भी किये जा सकते हैं।’’

कार वाला हँसने लगा।

‘‘जाने दीजिए!’’ उसने स्टीयरिंग घुमाते हुए कहा।

‘‘मैं ज़बर्दस्ती लगाऊँगा। अगर आप इनकार करेंगे तो मैं आपकी कार मैं ही में बैठ कर कोतवाली तक चलूँगा।’’

‘‘चलो,’’ उसने लापरवाही से कहा फिर अपनी जेब में हाथ डालता हुआ बोला। ‘‘तुम कार्ड ले कर भी कोतवाली जा सकते हो। मैं वहाँ सीधे बुला लिया जाऊँगा।’’

इमरान ने उसका कार्ड ले कर पढ़ा। जिस पर ‘‘सर तनवीर’’ लिखा हुआ था।

‘‘सर तनवीर,’’ इमरान धीरे से बड़बड़ाया।

‘‘जनाब....आप मेरे ख़िलाफ़ एक शिकायतनामा लिख कर इस कार्ड के साथ जिसे चाहें भेज सकते हैं। अब इजाज़त दीजिए।’’

कार फ़र्राटे भरती हुई आगे निकल गयी। इमरान बायें हाथ से अपना माथा रगड़ रहा था।

तो यह सर तनवीर है....इसकी बीवी ने उस आदमी के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए दस हज़ार रुपए नक़द दिये थे....चालीस हज़ार और देने का वादा था....मामला उलझ गया। इमरान काफ़ी देर तक वहीं खड़ा ख़यालों में खोया रहा।

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थोड़ी देर बाद वह एक पब्लिक टेलीफ़ोन बूथ में सर तनवीर के फ़ोन नम्बर डायल कर रहा था।

‘‘हैलो....! कौन है....क्या लेडी साहिबा हैं? ओह.... अच्छा आप ज़रा उन्हें इत्तला दे दें....शुक्रिया....!’’

इमरान कुछ पल खामोश रहा फिर बोला। ‘‘हैलो....! लेडी तनवीर....देखिए, मैं रूशी ऐण्ड कम्पनी का एक नुमाइन्दा हूँ....जी हाँ ....बहुत ज़रूरी....आपको एक ज़रूरी बात बताना चाहता हूँ....जी हाँ....जी हाँ ....वही मामला है, मिलेंगी.... शुक्रिया।’’

इमरान रिसीवर हुक में लगा कर बूथ से निकल आया।

अब उसकी टू-सीटर टिपटॉप नाइट क्लब की तरफ़ जा रही थी। सूरज डूब चुका था और धीरे-धीरे अँधेरा फैलता जा रहा था।

नाइट क्लब में इमरान को ज़्यादा देर तक लेडी तनवीर का इन्तज़ार नहीं करना पड़ा....दोनों ऐसे कोने में जा बैठे जहाँ वे आसानी से हर तरह की बातचीत कर सकते थे।

‘‘क्या बात है?’’ लेडी तनवीर बोली। ‘‘मेरा ख़याल है कि मैं पहले भी कहीं आपको देख चुकी हूँ।’’

‘‘मेरे दफ़्तर में ही देखा होगा....मैं रूशी की फ़र्म का जूनियर पार्टनर हूँ।’’

‘‘ओ हो....अच्छा....हाँ, मैंने वहीं देखा था।’’ लेडी तनवीर ने सिर हिला कर कहा। ‘‘खास बात क्या है?’’

‘‘मिस्टर तनवीर भी उस आदमी में दिलचस्पी ले रहे हैं।’’ इमरान ने एकदम से कहा और लेडी तनवीर के चेहरे पर नज़र जमा दी।

‘‘नहीं!’’ लेडी बुरी तरह चौंक पड़ी।

‘‘जी हाँ....?’’

लेडी तनवीर का चेहरा अचानक पीला पड़ गया। वह बार-बार अपने होंटों पर ज़बान फेर रही थी।

‘‘तुम किस तरह कह सकते हो?’’

‘‘मैंने उन्हें अपनी आँखों से उस आदमी के दरवाज़े पर दस्तक देते हुए देखा है।’’

‘‘क्या वह सर तनवीर से मिला था?’’

‘‘नहीं! वह किसी से नहीं मिलता....उसका कमरा हर वक़्त बन्द रहता है। मेरा ख़याल है कि अभी तक उन दोनों की मुलाक़ात नहीं हुई। पड़ोसियों का कहना है कि उसके दरवाज़े पर कारें आती हैं। बड़े-बड़े आदमी उससे मिलना चाहते हैं, लेकिन वह किसी से भी नहीं मिलता।’’

लेडी तनवीर कुछ देर तक ख़ामोश रही फिर धीरे से बोली, ‘‘अगर सर तनवीर भी इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं तो उसे यहाँ से चला जाना चाहिए।’’

‘‘लेकिन आपने मेरे दफ़्तर में अपना नाम और पता गलत क्यों लिखवाया है?’’ इमरान ने पूछा।

‘‘ओह....मैंने गलती की थी....मेरी मदद करो। मेरी नीयत में कोई खोट नहीं था। सिर्फ़ राज़दारी के ख़याल से मैंने ऐसा किया था, वरना तुम्हारे फ़ोन पर यहाँ दौड़ी न आती। साफ़ कह देती कि तुम्हें गलत-फहमी हुई है। मैं किसी रूशी ऐण्ड कम्पनी को नहीं जानती।’’

‘‘लेकिन वह है कौन?’’

‘‘यह नहीं बता सकती....पहले मैं यह चाहती थी कि उसके यहाँ आने का मक़सद मालूम करूँ, मगर अब यह चाहती हूँ कि वह इस शहर ही से चला जाये....क्या तुम मेरी मदद कर सकोगे....बोलो....मुआवज़ा एक लाख....और तुम्हें यह भी मालूम करना होगा कि सर तनवीर की पहुँच उस तक कैसे हुई।’’

‘‘देखिए मैडम....मामला बड़ा टेढ़ा है....’’

‘‘क्यों, टेढ़ा क्यों है?’’ लेडी तनवीर उसे घूरने लगी। वह अपनी हालत पर क़ाबू पा चुकी थी।

‘‘आप उस आदमी में दिलचस्पी क्यों ले रही हैं जब कि वह आपकी बिरादरी का भी नहीं?’’

‘‘एक लाख की पेशकश तुम्हारी शक्ल देखने के लिए नहीं है!’’ लेडी तनवीर ने ऐंठते हुए कहा।

‘‘मैं कभी इस गलत-फहमी में नहीं पड़ा।’’ इमरान मुस्कुरा कर बोला।

‘‘एक लाख सिर्फ़ इसीलिए हैं कि तुम किसी बात की वजह पूछने की बजाय काम करोगे।’’

‘‘बहुत ख़ूब! अब मैं समझ गया। लेकिन लेडी तनवीर....अगर वह यहाँ से जाने पर तैयार न हुआ तो....उस सूरत में मुझे क्या करना होगा।’’

‘‘तो अब सूरत भी मैं ही बताऊँ....एक लाख....’’

‘‘ठहरिए....एक दूसरी बात भी समझ में आ रही है!’’ इमरान ने धीरे से कहा। कुछ पल ख़ामोश रहा फिर बोला। ‘‘अगर वह जाने पर तैयार न हो तो दूसरी सूरत भी हो सकती है।’’

‘‘क्या?’’ लेडी तनवीर आगे की तरफ़ झुक गयी।

‘‘उसे क़त्ल कर दिया जाये?’’

लेडी तनवीर घबरा कर पीछे हट गयी। उसकी आँखें हैरत और ख़ौफ़ से फैल गई थीं।

‘‘नन....नहीं....हरगिज़ नहीं।’’ वह हकलायी।

‘‘फिर सोच लीजिए! कभी-कभी राज़दारी के लिए सब कुछ करना पड़ता है।’’

‘‘क्या मतलब?’’ लेडी तनवीर अचानक चौंक पड़ी।

‘‘सर तनवीर उसमें दिलचस्पी ले रहे हैं।’’ इमरान धीरे से बड़बड़ाया।

‘‘साफ़-साफ़ कहो लड़के! मुझे परेशान न करो।’’

‘‘ख़ैर, हटाइए! यह ज़रूरी बात नहीं....मुझे तो सिर्फ़ इतना करना है कि उसे यहाँ से खिसका दूँ....अगर न जाये तो....बोलिए....ख़त्म कर दिया जाये न उसे।’’

‘‘नहीं....हरगिज़ नहीं।’’

‘‘किसी को कानों-कान ख़बर न होगी....और एक लाख में सिर्फ़ पचास का इज़ाफ़ा....डेढ़ लाख में मामला फ़िट।’’

‘‘क्या तुम लोग यह भी करते हो?’’

‘‘लोग नहीं, सिर्फ़ रूशी।’’

‘‘क्या वह ऐंग्लो इण्डियन लड़की?’’

‘‘जी हाँ! बस यह समझिए जिसे एक बार देख लिया वह हमेशा के लिए क़त्ल हो गया।’’

‘‘क्या बकवास है।’’

‘‘आ हाँ....यही तो आप नहीं समझीं! क़त्ल से मेरी मुराद यह थी कि रूशी उसे अपने इश्क़ के जाल में फँसा कर यहाँ से हटा ले जायेगी।’’

‘‘कच्चा ख़याल है। पहली बात तो वह बूढ़ा है। दूसरी, पक्का किरदार का मालिक....यह तरीक़ा बिलकुल बेकार साबित होगा।’’

‘‘शायद उसकी आप ही की-सी उम्र होगी।’’ इमरान ने पूछा और गौर से उसके चेहरे का जायज़ा लेने लगा। लेडी तनवीर ने फ़ौरन जवाब नहीं दिया। वह काफ़ी चालाक औरत थी। उसने लापरवाही से कहा। ‘‘यह बिलकुल बेकार सवाल है।’’

‘‘अच्छा, अब मैं कुछ नहीं पूछूँगा, सिर्फ़ इतना बता दीजिए कि आप उसे कब से जानती हैं।’’

‘‘यह भी ग़ैरज़रूरी है....’’

‘‘ख़ैर....मगर मुझे हैरत है कि सर तनवीर की पहुँच उस तक कैसे हुई....अगर वे....उसे जानते हैं तो फिर आपकी बातें मनगढ़न्त साबित होंगी।

‘‘तुम मुझसे क्या उगलवाना चाहते हो।’’ लेडी तनवीर यूँ ही मुस्कुरा पड़ी।

‘‘यही कि यहाँ आने पर उसने आपसे मिलने की कोशिश की थी या नहीं।’’

‘‘तुम ग़लत समझे हो....’’ लेडी तनवीर ने संजीदगी से कहा। ‘‘वह कोई ऐसा आदमी नहीं है जिससे मुझे ब्लैकमेलिंग का ख़तरा हो। उससे किसी तरह मिलो और इस बात पर तैयार करो कि वह यहाँ से चला जाये। तुम उसे बता सकते हो कि यह लेडी तनवीर की ख़्वाहिश है।’’

‘‘और अगर सर तनवीर ने यह ख़्वाहिश ज़ाहिर की कि वह यहीं रह जाये तो?’’ इमरान ने पूछा।

‘‘सर तनवीर!’’ लेडी तनवीर के चेहरे पर उलझन के आसार नज़र आने लगे। ‘‘मैं नहीं समझ सकती कि सर तनवीर उसे किस तरह जानते हैं और उसमें क्यों दिलचस्पी ले रहे हैं।’’

‘‘अच्छा, अगर सर तनवीर को मालूम हो जाये कि आप भी इसमें दिलचस्पी ले रही हैं तो उन पर इसका क्या असर होगा।’’

लेडी तनवीर कुछ मिनट इमरान को ग़ौर से देखती रही, फिर बोली। ‘‘लड़के, तुम बहुत चालाक हो। मगर इस चक्कर में न पड़ो। वैसे इतना ज़रूर कहूँगी कि सर तनवीर की मुलाक़ात उससे न होने पाये तो बेहतर है....बस, अब जाओ....इस दौरान अगर कोई ख़ास ज़रूरत पेश आये तो मुझे फ़ोन कर सकते हो....मुझे यक़ीन है कि तुम इस काम को बेहतर तौर पर कर सकोगे।’’

‘‘सिर्फ़ एक बात और!’’ इमरान जल्दी से बोला।

‘‘नहीं, अब कुछ नहीं।’’ लेडी तनवीर अपना पर्स उठाते हुए बड़बड़ायी।

‘‘पहले आप सिर्फ़ उस आदमी के बारे....!’’

‘‘शट अप!’’ लेडी तनवीर मुस्कुरा कर आगे बढ़ गयी! इमरान उसे जाते देखता रहा....

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रात बहुत अँधेरी थी....शाम ही से बादल मँडरा रहे थे और अब तो पूरा आसमान बादलों से ढँक गया था। इमरान लेडी तनवीर के बारे में सोचता हुआ अपनी टू-सीटर चला रहा था। कुछ ही देर पहले उससे जो बातें हुई थीं वे काफ़ी पेचीदा थीं। वह एक लाख ख़र्च करने का इरादा रखती है और काम सिर्फ़ इतना था कि उस गुमनाम आदमी को शहर से कहीं और भेज दिया जाये और वह आदमी लेडी तनवीर की बिरादरी से ताल्लुक़ नहीं रखता था।

इस सिलसिले में सिर्फ़ एक ही बात सोची जा सकती थी। कि हो सकता है कि कभी लेडी तनवीर से उसके नाजायज़ ताल्लुक़ात रहे हों....और अब उसे उस आदमी से ब्लैकमेलिंग का ख़तरा हो।

मगर....यह ख़याल भी ज़्यादा देर तक क़ायम न रह सका, क्योंकि लेडी तनवीर ज़्यादा परेशान मालूम नहीं होती थी। हालाँकि सर तनवीर के हवाले से भी उसने जो थोड़ी-बहुत बेचैनी ज़ाहिर की थी, वह इमरान को बनावटी ही मालूम हुई थी। यानी वह बेकार ही यह ज़ाहिर करना चाहती थी कि सर तनवीर की मुलाक़ात उस आदमी से नहीं होनी चाहिए।

केस दिलचस्प था....इमरान ने फिर टू-सीटर का रुख़ शाही बाग़ ही की तरफ़ मोड़ दिया। वह एक बार फिर उस संदिग्ध आदमी के कमरे का दरवाज़ा खुलवाने की कोशिश करना चाहता था....

कार एक महफ़ूज़ जगह छोड़ कर वह मज़दूरों की बस्ती की तरफ़ पैदल चल पड़ा।

इस वक़्त उस बस्ती में बिलकुल अँधेरा था....गलियों में कहीं-कहीं लैम्प की रोशनी के धब्बे दिख जाते....यह रोशनी भी उन मज़दूरों के कमरों की थी जिन्हें शायद मिलों में रात की शिफ़्ट पर काम करने जाना था....

इमरान गलियों से गुज़रता रहा, लेकिन किसी ने भी उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया। कभी-कभार एक आध कुत्ता ग़ुर्राता और फिर ख़ामोश हो कर बैठ जाता।

वह उसी गली में पहुँच गया जहाँ उसे जाना था.... फिर वह उस कमरे की तरफ़ बढ़ ही रहा था कि अचानक उसे ठिठक जाना पड़ा, क्योंकि किसी ने कमरे का दरवाज़ा अन्दर से खोला था।

वह एक तरफ़ हट गया....किसी ने कमरे से निकल कर दरवाज़ा बन्द किया। उसने अपने दायें हाथ में कोई भारी-सी चीज़ लटका रखी थी। फिर इमरान ने उसे गली के दूसरे सिरे की तरफ़ जाते देखा। इमरान भी धीरे-धीरे चलने लगा। लेकिन वह एक दीवार से लिपटा हुआ आगे बढ़ रहा था। उसने महसूस कर लिया था कि कोई उसका पीछा कर रहा है।

सड़क पर पहुँच कर उस आदमी ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी, लेकिन यहाँ वह चोरों की तरह इधर-उधर नहीं देख रहा था....उसका रुख़ ताँगा स्टैंड की तरफ़ था।

इमरान भी चलता रहा....और फिर जब वह एक ताँगे पर बैठ गया तो इमरान ने अपनी कार की तरफ़ दौड़ना शुरू कर दिया जो वहाँ से काफ़ी दूरी पर थी....और ताँगा उल्टी दिशा में जा रहा था।

कार तक पहुँचते-पहुँचते ताँगा नज़रों से ग़ायब हो गया। इमरान को बड़ी मायूसी हुई, मगर उसने हिम्मत नहीं हारी।

कार स्टार्ट करके वह भी उधर ही रवाना हो गया जिधर ताँगा गया था। उसे यक़ीन था कि अगर ताँगा किसी घनी बस्ती में न मुड़ा तो उसे ज़रूर मिल जायेगा।

सड़क सुनसान थी। आगे चल कर कार की हेड लाइट में ताँगा दिखाई दिया....लेकिन यह ज़रूरी नहीं था कि यह वही ताँगा रहा हो जिसकी उसे तलाश थी....उसने कार की रफ़्तार बहुत कम कर दी।

साथ ही उसने महसूस किया कि ताँगा की रफ़्तार पहले से ज़्यादा हो गयी है....और फिर एक जगह अचानक ताँगा रुक गया....सड़क पर आगे चढ़ाई थी....और ताँगा कार से ज़्यादा ऊँची जगह पर था। अचानक वह कार की रोशनी में आ गया और इमरान ने पीछे बैठे हुए आदमी की शक्ल अच्छी तरह देख ली....लेकिन पहनावे से वह कोई मज़दूर या कम हैसियत का आदमी नहीं मालूम होता था। जिस्म पर एक लम्बा कोट था और सिर पर हैट....दाढ़ी से बूढ़ा मालूम होता था, क्योंकि वह बिलकुल सफ़ेद थी।

उसने जल्दी से हैट का कोना चेहरे पर झुका लिया और कोट के कॉलर खड़े कर लिये....शायद घोड़े के साज़ में कोई ख़राबी आ गयी थी जिसे ताँगे वाला नीचे खड़ा ठीक कर रहा था।

इमरान ने रफ़्तार और कम करके बेकार में हॉर्न देना शुरू कर दिया। हालाँकि वह क़तरा कर भी निकल सकता था....मक़सद दरअसल ये था कि वह कोचवान और सवार को धोखे में रख कर ताँगे के क़रीब पहुँच जाये।

‘‘अबे ओ ताँगे वाले.... ख़रगोश की औलाद!’’ इमरान ताँगे के क़रीब पहुँच कर गरजा।

‘‘साहब, बहुत जगह है!’’ ताँगे वाले ने कहा।

‘‘किधर जगह है....?’’ इमरान कार से उतर कर चीख़ा। ‘‘बढ़ाओ....सड़क के नीचे उतारो।’’

वह ताँगे की पिछली सीट के क़रीब पहुँच चुका था।

‘‘यह तो ज़बर्दस्ती की बात है जनाब!’’ ताँगे वाला भी झल्ला गया।

इमरान पिछली सीट पर हाथ रखता हुआ धीरे से बोला। ‘‘सरकार, मुझे लेडी तनवीर ने भेजा है।’’

बूढ़ा खाँस कर रह गया।

‘‘मैं आप ही से कह रहा हूँ।’’ इमरान ने कहा।

लेकिन दूसरे ही पल में कोई ठण्डी-सी चीज़ उसके माथे पर आ गिरी।

‘‘पीछे हट जाओ!’’ बूढ़ा धीमी आवाज़ में बोला। ‘‘मोरीना सलानियो को कुतियों की मौत मरना पड़ेगा। यह बूढ़े ग़ज़ाली का फ़ैसला है।’’

‘‘लेकिन मैंने क्या क़सूर किया है, चचा ग़ज़ाली!’’ इमरान ने शरीफ़ाना अन्दाज़ में कहा।

‘‘तुम्हारा कोई क़सूर नहीं है....इसीलिए तो ट्रिगर अपनी जगह पर है....वरना तुम्हारी खोपड़ी में एक रंगीन-सा सूराख़ हो जाता।’’

‘‘और मैं उसे देख कर ख़ुश भी न हो पाता।’’ इमरान ने एक लम्बी साँस ली....इतने में ताँगे वाले ने आगे बढ़ना चाहा, लेकिन बूढ़े ने उसे रोक दिया।

‘‘मोरीना से कह दो....कि ग़ज़ाली बच्चा नहीं है।’’

‘‘मैं किसी मोरीना को नहीं जानता चचा ग़ज़ाली! मुझे तो लेडी तनवीर ने भेजा है। अगर उन्हीं का नाम मोरीना....तो मुझे मोनोबाओ रेलवे स्टेशन तक पैदल जाना पड़ेगा....’’

‘‘लेडी तनवीर....!’’ बूढ़ा धीरे से बड़बड़ाया....‘‘लेडी तनवीर....!’’

ऐसा लग रहा था कि जैसे वह कुछ याद करने के लिए अपने ज़ेहन परज़ोर दे रहा हो।

‘‘सर तनवीर की बीवी तो नहीं?’’ उसने पूछा।

‘‘आप समझ गये न। देखिए मैं न कहता था....हाँ!’’

‘‘लेकिन उसने क्यों भेजा है?’



‘‘बस, समझ जाइए!’’ इमरान हँसने लगा।

‘‘क्या समझ जाऊँ?’’

‘‘वही न! जो लेडी तनवीर आपसे चाहती हैं।’’

‘‘मैं क्या बता सकता हूँ कि वह क्या चाहती है?’’ बूढ़ा बोला।

‘‘वह चाहती हैं कि आप इस शहर से चले जाइए।’’

‘‘ओ हो....मैं समझा!’’ बूढ़े ने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा। ‘‘लेकिन उसे फ़िक्रमन्द न होना चाहिए! उससे कह देना कि ग़ज़ाली अपने एक निजी काम से यहाँ आया था, जिस दिन हो गया, यहाँ से चला जायेगा! वह यहाँ रहने के लिए नहीं आया।’’

‘‘मगर....आप सर तनवीर से मिलते क्यों नहीं?’’ इमरान ने पूछा।

‘‘मैं नहीं जानता था कि वह यहीं रहता है! लेडी तनवीर से कह देना। ग़ज़ाली दिल का बुरा नहीं है....अच्छा, अब तुम जा सकते हो....!’’

बूढ़े ने रिवॉल्वर उसके माथे से हटा ली।

‘‘मगर चचा! सर तनवीर तो बराबर आपके कमरे का दरवाज़ा पीटते रहे हैं।’’

‘‘सर तनवीर!’’ बूढ़े की आवाज़ में हैरत थी।

‘‘हाँ चचा ग़ज़ाली....’’

‘‘मैं नहीं समझ सकता!’’ बूढ़ा बड़बड़ा कर रह गया....

‘‘सर तनवीर आपसे क्या चाहते हैं?’’

‘‘बस जाओ....! जो कुछ मैंने कहा है लेडी तनवीर से कह देना....ताँगा बढ़ाओ।’’

घोड़े की टापें सन्नाटे में गूँजने लगीं....और इमरान ने चिल्ला कर पूछा। ‘‘चचा ग़ज़ाली, आपके पास रिवॉल्वर का लाइसेंस तो होगा ही!’’

‘‘हाँ भतीजे....तुम इत्मीनान रखो!’’ बूढ़े की आवाज़ आयी....ताँगा काफ़ी दूर निकल गया था।

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दूसरी सुबह के सारे अख़बार ऐलफ़्रेड पार्क में किसी अधेड़ उम्र आदमी की लाश बरामद होने की कहानी सुना रहे थे। पुलिस का नज़रिया और दूसरे पहलू भी छपे थे। इमरान अपने तलाक़ दफ़्तर में उदास बैठा था....रूशी दूसरे कमरे से निकल कर शायद चाय का पैकेट लेने के लिए बाहर जाने लगी....इमरान ने बड़ी फुर्ती से अपनी दायीं टाँग आगे बढ़ा दी। रूशी बेख़बर थी इसलिए पेट के बल धड़ाम से ज़मीन पर जा गिरी। साथ ही उसके मुँह से इमरान के लिए कुछ ग़लत जुमले भी निकल गये।

मगर इमरान ने कुछ इस तरह गर्दन हिला कर ‘‘ठीक है’’ कहा जैसे उसने रूशी की बातें सुनी ही न हों। वह आगे की तरफ़ झुका हुआ होंट सिकोड़े उसे देख रहा था....रूशी के ज़मीन से उठते ही वह सीधा हो कर बैठ गया।

‘‘तुम बिलकुल जंगली हो!’’ रूशी पैर पटक कर चीख़ी।

‘‘सब ठीक है जाओ!’’ इमरान ने बड़ी संजीदगी से कहा।

‘‘नहीं जाऊँगी!’’ रूशी ने रुँधी आवाज़ में कहा और फिर कमरे में वापस चली गयी।

इमरान ने गमगीन अन्दाज़ में अपना सिर हिलाया और सामने फैले हुए अख़बार की तरफ़ देखने लगा।

कुछ देर बाद उसने रूशी को आवाज़ दी।

‘‘नहीं आऊँगी!’’ रूशी ने दूसरे कमरे से ललकारा। ‘‘तुम जहन्नुम में जाओ।’’

‘‘मुझे रास्ता नहीं मालूम रूशी डियर....वरना कभी का चला गया होता....तुम मेरी बात तो सुनो!’’

‘‘नहीं सुनूँगी! मुझसे मत बोलो।’’

इमरान को उठ कर उसी कमरे में जाना पड़ा जहाँ रूशी थी....वह पलँग पर औंधी पड़ी हुई दिखी....

‘‘आख़िर बात क्या है?’’ उसने बड़ी मासूमियत से पूछा।

‘‘चले जाओ यहाँ से। शर्म नहीं आती....औरतों से इस तरह का मज़ाक़ करते हो। बिलकुल जंगली हो।’’

‘‘अब मौक़े पर कोई और न मिले तो मैं क्या करूँ!’’ इमरान ने दबी आवाज़ में कहा। ‘‘वैसे मैं यही कोशिश करता हूँ कि औरतों से ये क्या....किसी तरह का मज़ाक़ न करूँ।’’

‘‘यहाँ से चले जाओ!’’ रूशी और ज़्यादा झल्ला गयी।

‘‘तुम कहती हो तो चला जाऊँगा! वैसे मैं तुमसे यह पूछने आया था कि भेड़ के बच्चे को मेमना कहते हैं या भैंस के बच्चे को....और आदमी के बच्चे को सिर्फ़ बच्चा क्यों कहते हैं। आदमी क्यों नहीं कहते।’’

रूशी उठ बैठी....कुछ पल इमरान को घूरती रही फिर कुछ कहने ही वाली थी कि बाहर से किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी। बाहर का दरवाज़ा बन्द था।

‘‘कौन है?’’ इमरान ने तेज़ आवाज़ में पूछा।

‘‘मैं हूँ फ़ैयाज़!’’

‘‘तुम आ गये बेटा!’’ इमरान धीरे से बड़बड़ाता हुआ दूसरे कमरे में चला गया।

दरवाज़े के क़रीब पहुँच कर वह एक पल के लिए रुका....फिर एक तरफ़ हट कर दरवाज़ा खोल दिया....

जैसे ही फ़ैयाज़ अन्दर आया इमरान की दायीं टाँग उसके पैरों में उलझ गयी....और फ़ैयाज़ बेख़बरी में ज़मीन पर ढेर हो गया....

लेकिन! वह दूसरे ही पल उलट कर इमरान पर आ गिरा....यह और बात है कि इस हरकत से भी तकलीफ़ उसी को हुई हो क्योंकि उसका घूँसा इमरान की बजाय दीवार पर पड़ा था! इमरान एक तरफ़ हट कर ललकारा। ‘‘आप के लिए चाय लाऊँ....!’’

‘‘चाय के बच्चे! यह क्या हरकत थी?’’ फ़ैयाज़ ने झपट कर उसका कॉलर पकड़ लिया।

‘‘हाँय....हाँय....!’’ इमरान धीरे से बोला। ‘‘वह देख रही होगी।’’

फ़ैयाज़ ने कॉलर छोड़ दिया और बौखला कर दूसरे कमरे की तरफ़ देखने लगा! रूशी सचमुच दरवाज़े पर खड़ी दोनों को हैरत से देख रही थी।

‘‘ओ हो....रूशी....!’’ इमरान जल्दी से बोला। ‘‘इनसे मिलो....ये फैपटेन कैयाज़....अर्र लाहौल....कैप्टन फ़ैयाज़ हैं! मेरे गहरे दोस्त! हाँ....और यह मेरी पार्टनर रूशी....सीनियर पार्टनर समझो! क्योंकि रूशी ऐण्ड को....! हिप!’’

फ़ैयाज़ ने जल्दी में दो-चार जुमले कहे और कुर्सी पर गिर कर हाँफने लगा। वह अब भी इमरान को घूर रहा था।

‘‘रूशी!’’ इमरान तेज़ आवाज़ में बड़बड़ाया। ‘‘अब तो चाय का इन्तज़ाम करना ही पड़ेगा। ये बहुत बड़े आदमी हैं। सी.बी.आई. के सुपरिन्टेंडेण्ट....!’’

‘‘ओ हो!’’ रूशी मुस्कुरा कर बोली। ‘‘आपसे मिल कर बड़ी ख़ुशी हुई।’’

‘‘मुझे भी!’’ फ़ैयाज़ जवाब देते हुए मुस्कुराया।

इमरान ने उर्दू में कहा। ‘‘फ़ैयाज़ साहब, ख़याल रहे कि मैं तलाक़ दिलवाने का धन्धा करता हूँ। ज़रा अपनी मुस्कुराहट ठीक करो....होंटों के कोने काँप रहे हैं और यह जिन्सी लगावट की पहचान है....यक़ीन मानो मैं तुम्हारी बीवी से एक पैसा फ़ीस नहीं लूँगा! तुम केस भी तो दिलवाओ....ऐसी ख़िदमत करूँगा कि तबियत ख़ुश हो जायेगी तुम्हारी!’’

फ़ैयाज़ कुछ न बोला! इमरान के ख़ामोश होते ही रूशी ने पूछा। ‘‘क्यों कैप्टन....सी.बी.आई. में इमरान का क्या ओहदा था?’’

‘‘मेरा मातहत था!’’ फ़ैयाज़ ने अकड़ कर कहा।

‘‘अरे ख़ुदा ग़ारत करे....!’’ इमरान बड़बड़ाया। ‘‘अच्छा, मैं तुमसे निपट लूँगा।’’

रूशी हँसते हुए दूसरे कमरे में चली गई।

‘‘हाँ, अब बताओ।’’ फ़ैयाज़ आस्तीन चढ़ाने की कोशिश करता हुआ बोला। ‘‘किसी दिन मैं तुम्हारी शेख़ी निकाल दूँगा।’’

‘‘शेख़ी नहीं पठानी कहो! मैं पठान हूँ! समझे।’’

‘‘तुम कोई भी हो! लेकिन ये क्या हरकत थी....आख़िर कब तक तुम्हारा बचपना बर्दाश्त किया जायेगा।’’

‘‘तुम कैप्टन फ़ैयाज़....तुम इसे बचपना कह रहे हो। मुझे हैरत है! अगर तुम जेम्स बॉण्ड के ज़माने में होते तो तुम्हें गोली मार दी जाती और बिलकुल जेम्स बॉण्ड ही की तरह जानता हूँ तुम इस वक़्त यहाँ क्यों आये हो?’’

‘‘क्यों आया हूँ?’’ फ़ैयाज़ ने पूछा।

‘‘मैं यह भी बता सकता हूँ कि किस तरह आये हो।’’

‘‘किस तरह आया हूँ।’’

‘‘सिर के बल चलते हुए! अब पूछो डॉक्टर वॉटसन कि यह बात मैंने इतने भरोसे के साथ क्यों कही है? जवाब यह है प्यारे वॉटसन कि मुझे तुम्हारे बालों में कुछ छोटे-छोटे तिनके दिखाई दे रहे हैं! हा हा हा....देखा है न यही बात....!’’

‘‘बोर मत करो।’’ फ़ैयाज़ ने बुरा-सा मुँह बनाया। ‘‘मैं एक ज़रूरी काम से तुम्हारे पास आया हूँ।’’

‘‘मैं आज का अख़बार पूरा पढ़ चुका हूँ।’’ इमरान संजीदगी से बोला, ‘‘हालाँकि वह इश्तहार भी पढ़ डाले हैं जिन्हें शादीशुदा आदमियों के अलावा और कोई शरीफ़ आदमी नहीं पढ़ता।’’

‘‘तो तुम समझ गये?’’ फ़ैयाज़ मुस्कुराया।

‘‘मैं बिलकुल समझ गया....न सिर्फ़ समझ गया, बल्कि काम भी शुरू कर दिया है।’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब मैं ज़रूर बताता, मगर उसी सूरत में अगर घूँसा दीवार पर पड़ने को बजाय मेरे जबड़े पर पड़ा होता.... ख़ैर.... होगा मुझे क्या....जो बोएगा, सो काटेगा....फ़ैयाज़ साहब! हिप.... अरे....रूशी....चाय!’’

‘‘नहीं, मैं चाय नहीं पियूँगा।’’

‘‘हालाँकि तुम पिछली रात से अब तक जागते रहे हो अभी तुमने नाश्ता भी नहीं किया! रूशी कटलेट बड़े अच्छे बनाती है! हालाँकि अभी वह भी इसी ज़मीन पर औंधे मुँह गिर चुकी है।’’

‘‘वह भी!’’ फ़ैयाज़ ने हैरत से दोहराया। ‘‘इमरान तुम आदमी हो या जानवर....’’

‘‘वह भी उस वक़्त से बराबर यही एक सवाल दोहरा रही है!’’ इमरान ने लापरवाही से कहा। ‘‘मैं ख़ुद को हर तरह से इत्मीनान दिलाने की कोशिश करूँगा कि चाहे वह एक ऐंग्लो इण्डियन लड़की हो, चाहे कैप्टन फ़ैयाज़ और अब मुझे यक़ीन आ गया है कि उस लाश के बारे में तुम लोगों का नज़रिया बिलकुल ग़लत है।’’

‘‘क्या मतलब?’’ फ़ैयाज़ सँभल कर बैठ गया।

‘‘तुम्हारा यही नज़रिया है कि मरने वाला किसी चीज़ से ठोकर खा कर गिरा....उसके माथे में चोट आयी....और कोई ज़हरीली चीज़ इतनी तेज़ी से ज़ख़्म के रास्ते ख़ून में घुस गयी कि गिरने वाले को उठने का भी मौक़ा न मिला....मैं यह नहीं कहता कि मौत के बारे में डॉक्टरों की राय ग़लत है! इस तरह किसी का मर जाना समझ से बाहर है! लेकिन यह ख़याल कि वह ठोकर खा कर गिरा....और उसका माथा ज़ख़्मी हो गया। मगर नहीं, ठहरो, क्या उसकी लाश किसी ऐसी जगह मिली है जहाँ की ज़मीन साफ़ न हो.... या गिरने की सूरत में उसका सिर किसी ऐसी चीज़ से जा टकराया हो जो ज़मीन की सतह से ऊँची हो!’’

‘‘नहीं....! लाश ऐलफ़्रेड पार्क में मिली थी और वहाँ दूर-दूर तक कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जो ज़मीन की सतह से ऊँची हो।’’

‘‘तब मेरी जान यह बताओ कि तुम्हारा माथा क्यों नहीं ज़ख्मी हुआ....और रूशी भी बेदाग़ माथा लिये घूम रही है। तुम दोनों ही बेख़बरी में काफ़ी दूर से गिरे थे....! बताओ!’’

फ़ैयाज़ पलकें झपकाने लगा....!
 
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