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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

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एक दिन जब वो अपने बड़े चक (ज़मीन का एक बड़ा भाग) से दूसरी ज़मीन की तरफ जा रहे थे, और प्रेमा काकी अपने खेत घर के दरवाजे पर खड़ी थी, रामचंद काका कहीं खेतों में काम कर रहे थे…

अपने निचले होंठ के किनारे को दाँतों में दवाके बड़े मादक अंदाज में प्रेमा काकी ने रामसिंघ को पुकारा…… लल्ला जी ज़रा सुनो तो…

रामसिंघ ठितके, और उनकी ओर मुड़ते हुए पुछा जी काकी…

थोड़ा बहुत हमारे पास भी बैठ लिया करो… तुम तो हमारी ओर देखते तक नही, ऐसे बुरे लगते हैं तुम्हें…??

अरे नही काकी.. आप तो बहुत अच्छी लगती हो, आपको कॉन बुरा कह सकता है भला… थोड़ा सकुचाते हुए जबाब दिया रामसिंघ ने…

तो फिर हमारे साथ बोलते-बतियाते क्यों नही…?

व..वऊू… थोड़ा काम ज़्यादा रहता है, और वैसे भी आप हमारी चाची लगती हैं, तो आपसे क्या बात करें..? यही बस… और क्या, …थोड़ा असहज होते हुए जबाब दिया उन्होने…

सुना है आप हर किसी की मदद करते है, उनके काम आते हैं, तो हमारे दुख-दर्द की भी खैर खबर कर लिया करो,… थोड़ा मौसी भरे स्वर में बोली प्रेमा…

आपकी क्या परेशानी है बताइए मुझे, बस में हुआ तो ज़रूर पूरी करने की कोशिश करूँगा….

अब तुम्हें क्या बताएँ लल्लाजी, तुम्हारे काका को तो हमारी कोई फिकर ही नही है, अभी एक साल भी नही हुआ हमें इस घर आए हुए, और वो हमसे अभी से दूर-दूर रहने लगे हैं…, अब नही बनता था तो शादी क्यों की..? बात को लपेटते हुए कहा प्रेमा ने...

अब कुछ-2 रामसिंघ की समझ में आने लगा था कि काकी कहना क्या चाहती है, फिर्भी उन्होने अंजान बनते हुए कहा….

तो काकी अब इसमें में क्या कर सकता हूँ भला…? काका का काम तो काका ही कर सकते हैं ना…

तुम चाहो तो अपने काका से भी अच्छा काम कर सकते हो हमारे लिए…., और ये कहकर प्रेमा रामसिंघ की पीठ से सॅट गयी, और अपनी दोनो लंबी-लंबी बाहें उनके सीने पर लपेट कर अमरबेल की तरह लिपट गयी…

प्रेमा काकी से इस तरह की हरकत की उम्मीद नही थी रामसिंघ को…, उन्होने काकी के हाथ पकड़े और उन्हें अपने से अलग करते हुए कहा…

ये ठीक नही है काकी, और वहाँ से चले गये…..

उसी शाम जब वो गाओं पहुँचे, तो वहाँ चौपाल पर बैठे लोग आपस में बातें कर रहे थे, रामसिंघ भी चर्चा में शामिल हो गये…

जैसे ही उन्हें लोगों के बीच हो रही चर्चा का पता लगा, उनका मुँह खुला का खुला रह गया, और सकते में पड़ गये….

चौपाल की चर्चा का विषय था “रामचंद की प्रेमा भाग गई” जैसे ही ये बात रामसिंघ को पता लगी, फ़ौरन उनके दिमाग़ में सुबह वाली अपनी और प्रेमा काकी की मुलाकात घूम गई, कैसे वो उससे लिपट गयी और क्यों?…फिर भी उन्होने और ज़्यादा जानकारी के लिए वहाँ बैठे लोगों से पुछा…

राम सिंग- आख़िर हुआ क्या था..? असल मे ये नौबत क्यों और कैसे बनी..??

आदमी1- ज़्यादा तो पता नही चला.. लेकिन कुछ तो हुआ है, जो वो रामचंद काका से झगड़ा करके अपने कपड़े-लत्ते समेट कर चली गयी..

आदमी2- और वो काका को धमका भी गयी है, कि अगर तुम या कोई और तुम्हारे घर से मुझे लेने आया और ज़बरदस्ती की, तो में उसका गला काट दूँगी या खुद मर जाउन्गि…

काका और उनके घरवाले डरे हुए हैं… किसी की हिम्मत भी नही हुई उसे रोकने की, और वो अकेली ही चली गयी..

 
रामसिंघ को पूरी बात समझ में आ गई कि प्रेमा क्यों घर छोड़ के चली गयी है, फिर वो थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करके अपने घर आए और खाना वाना खा पीकर रामचंद काका के पास पहुँचे…

राम राम काका….. राम राम बेटा राम सिंग..., आओ-आओ कैसे हो, और इस वक़्त कैसे आना हुआ… ?

रामसिंघ- क्या काका, हमें आप अपना हितेशी नही समझते क्या..?

काका- क्यों ऐसा क्यों बोल रहे हो …?

रामसिंघ- गाओं में चर्चा है कि, ककीिई…मतलबव....नाराज़ होके…. चली गई हैं अपनी माँ के घर… थोड़ी हिचकिचाते हुए पुछा…

काका – हां यार… पता नही क्या हुआ उसको एक साथ, में खेत में काम कर रहा था, दोपहर में आई मेरे पास और झगड़ा करने लगी, कि तुम्हें सिर्फ़ काम-काम और सिर्फ़ काम ही दिखता है, घर में नई बीबी है उसकी कोई फिकर नही है…

मेने उसे बहुत समझाने की कोशिश कि और पुछा कि बात क्या है, लेकिन उसने मेरी एक ना सुनी और भनभनाते हुए वहाँ से चली आई,

पीछे-2 में भी आया और उसको समझाने लगा, लेकिन वो तो ज़िद पकड़ के बैठ गई कि अब मुझे तुम्हारे साथ नही रहना है, में अपने घर जा रही हूँ.. और खबरदार अगर मुझे लेने आए या किसी और को भेजा तो में या तो उसका कतल् कर दूँगी या खुद मर जाउन्गि.

मेरे तो हाथ-पैर फूल गये और डर के मारे मैं उसे रोकने की कोशिश भी नही कर पाया फिर, …थोड़ा रुक कर हताशा भरी आवाज़ में बोले…

अब क्या होगा बेटा…? हमारी तो कुछ समझ में नही आरहा… छोटे भाई की भी शादी नही हो पा रही, और अगर ये भी नही आई तो हमारा तो वंश ही डूब जाएगा….

रामसिंघ- आप चिंता मत करो काका… में कुछ हल निकालता हूँ…

काका – क्या कर सकोगे अब तुम…? अगर तुम्हारे पास कोई रास्ता है, ऐसा हो गया तो जीवन भर हम तुम्हारे अहसानमंद रहेंगे.. राम सिंग…, लेकिन ये होगा कैसे..?

उसकी आप चिंता मत करो.., जानकी भैया की ससुराल पड़ोस में ही है, और वहाँ के कुछ जाट जिनका आस-पास अच्छा प्रभाव है, वो मुझे जानते हैं, और बहुत मानते भी है, उनकी बात कोई नही टाल सकता…

लेकिन इससे तो बात फैल जाएगी, और हमारी कितनी बदनामी होगी, ये तो सोचो…

अरे काका… उसकी आप चिंता मत करो, में बात को सीधे-2 नही करूँगा, आप बेफिकर रहो और भरोसा रखो… सब ठीक हो जाएगा…

दूसरे दिन सुबह-2 राम सिंग चल दिए काका की ससुराल, और 2-3 घंटे की पैदल यात्रा के बाद करीब 10 बजे वो उनकी ससुराल में थे..

उधर काका की ससुराल में, प्रेमा घर पहुँची, तो उनके माँ-बाप भाई, सोच में पड़ गये, कि ये कैसे अकेली आ गयी वो भी सारे कपड़े-लत्ते समेट कर और सवालों की बौछार कर दी…

बाकी सब को तो उन्होने ज़्यादा कुछ नही बताया, लेकिन अकेले में अपनी माँ को सारी बात बता दी कि वो वहाँ क्यों खुश नही है, और अब वो नही जाएगी वहाँ पर…, और अगर तुम भी नही रखोगे तो में यहाँ से भी कहीं और चली जाउन्गी..,

माँ को लगा, कि अगर ज़्यादा कुछ इसको कहा तो बात और बिगड़ सकती है इसलिए वो चुप हो गयी थी…

राम सिंग जब प्रेमा के घर पहुँचे तो उस समय घर पर उनकी माँ और वोही थी, बाकी लोग खेतों में काम कर रहे थे…,

जैसे ही प्रेमा की नज़र राम सिंग पर पड़ी, मन ही मन वो बहुत खुश हुई, लेकिन प्रकट रूप से वो भड़क कर गुस्सा दिखाते हुए बोली…..,

क्यों आए हो यहाँ? उसी बुड्ढे ने भेजा होगा तुम्हें? है ना? साले की गान्ड में दम नही था तो व्याह क्यों किया? नही जाउन्गी अब वहाँ.

राम सिंग थोड़ा मुस्कराते हुए बोले….,, अरे.. अरे.. काकी थोड़ा साँस तो लेने दो, और घर आए मेहमान को ना चाइ, ना पानी कुछ नही पुछा और चढ़ दौड़ी आप तो मेरे उपर कम-से-कम सुसताने तो दो मुझे…

प्रेमा की माँ… आओ, आओ बेटा बैठो, अरे प्रेमा तेरा गुस्सा उन लोगों से है, कम-से-कम इनकी थोड़ी बहुत आवभगत तो कर, चाइ-पानी पिला…

चाइ पानी ख़तम करने के बाद, प्रेमा अपनी माँ से बोली…., माँ तुम थोड़ा खेतो की तरफ घूम के आओ, मुझे इनसे अकेले में बात करनी है…

माँ जब बाहर चली गयी, तो प्रेमा तुरंत लपक कर राम सिंग के हाथ पकड़ कर बोली… क्यों आए हो अब यहाँ ?

देखो काकी..., आपको ऐसा नही करना चाहिए था, उनकी नही तो कम-से-कम आपने माँ-बाप की मान मर्यादा का तो ख्याल करना चाहिए था ..,

अच्छा !! और में अपनी जवानी जो अभी ठीक से शुरू भी नही हुई है, उसे ऐसे ही बर्बाद कर लूँ..? तुम भी जानते हो वो बुड्ढ़ा मुझे कितने दिन सुख दे पाएगा…? कान खोल कर सुनलो… उसके भरोसे तो में वहाँ नही रह सकती अब…

तो फिर क्या सोचा है आगे का…? मन टटोला राम सिंग ने प्रेमा का..

अभी तो कुछ नही, लेकिन कोई ना कोई तो मिलेगा, जो मेरे लायक हो और खुश रख सके ..

तो और कोई रास्ता नही है, जिससे आप काका के पास वापस लौट सको…., जानते हुए भी पुछा रामसिंघ ने…

प्रेमा भड़क कर…. रास्ता था तो..ओ.. , वो तुमने बंद कर दिया… में तुम्हें शुरू से ही पसंद करती थी, और सोचा था इसी के सहारे पड़ी रहूंगी यहाँ अगर ये अपनाले तो… लेकिन सब की इच्छानुसार सब कुछ तो नही होता है ना, … तो…अब..,

रामसिंघ- मुस्कराते हुए… में ये कहूँ कि वो रास्ता अभी भी खुल सकता है तो…..

सचह…. ! सच कह रहे हो तुम…. ओह्ह्ह… रामू तुम नही जानते, में तुम्हे किस हद तक पसंद करती हूँ… यह कह कर काकी, रामसिंघ के सीने से छिप्कलि की तरह चिपक गयी…

अगर तुम चाहो, तो जीवन भर में उस बुड्ढे के लूंज से खूँटे से बँधी रहूंगी और कोई शिकायत भी नही करूँगी, लेकिन तुम्हें वादा करना होगा, कि तुम मुझे हमेशा खुस रखोगे अपने इस औजार से… ये कह कर उन्होने उनके लंड को धोती के उपर से ही कस के मसल दिया..

वादा तो नही कर सकता काकी…ईई.., आह… ससुउउहह…, हां.. कोशिससश..आ.. करूँगा की आपको ज़्यादा तड़पना ना पड़े कभी, और ये कह कर उन्होने उसके कड़क 32” चुच्छे अपने कठोर और बड़े-बड़े हाथों से कस कर मसल दिए….

आआययईीीई…… रामुऊऊउ, क्या करते हो धीर्रररीए रजाअ…, दर्द होता है… और उचक कर रामसिंघ के होठों पे टूट पड़ी… किसी भूखी शेरनी की तरह….मानो उन्हें वो कच्चा ही चवा जाएगी….

प्रेमा वासना की आग में तड़प रही थी, वो रामसिंघ के होठों को अपने मुँह में भर कर लगभग चवाने सी लगी, उधर रामसिंघ ने भी अपना मुँह खोल दिया और अपनी मोटी लपलपाति जीभ को प्रेमा के मुँह में ठूंस दिया…,

एक दूसरे की जीभ आपस में कुस्ति करने लगी, खड़े-खड़े ही दोनों के शरीर काम वासना के आग से भभकने लगे…

कितनी ही देर वो एक-दूसरे में गूँथे रहे… प्रेमा किस तोड़ते हुए अपनी नशीली आँखें राम सिंग की आँखों में डाल के बोली…..

ऊहह… रामू में बहुत प्यासी हूँ, भगवान के लिए मेरी प्यास बुझा दो ना….

अरे मेरी जान... काकी…. अब देख में तेरी प्यास कैसे बुझाता हूँ… और उसके ब्लाउज को झटके से फाड़ दिया….और उसकी गोल-2 चुचियों जो ठीक रामसिंघ के हाथों के माप की थी हाथों में भर के ज़ोर से मींज दिया..

ऊओह…. ससिईइ… आअहह मेरे राजा, अब तो काकी सिियहह… कहना बंद कर्दे… में तुम्हारी काकी दिखती हूँ.?. और उसने रामू के लंड को धोती से बाहर निकाल लिया…

8”+ लंबा और 3.5” मोटा लंड जब प्रेमा ने हाथ में लपेटा, जो पूरी तरह हाथ में नही आया, एकदम कड़क, बबूल के चिकने और तेल पिलाए हुए डंडे की तरह,

हाई… मेरी रानी, तू तो अब मेरी काकी ही क्या, सब कुछ हो गई….अब ये दरवाज़ा तो बंद कर्दे रानी…. फिर देख तुझे कहाँ-कहाँ की सैर कराता हूँ अपने खुन्टे पे बिठा के….

प्रेमा ने लपक के दरवाजे को अंदर बंद करके कुण्डी लगा दी….

 
दोस्तो – चूँकि ये कहानी पुराने समय की, एक गाँव की कहानी है… सो क्वाइट पासिबल, दट सम वन मे अनेबल टू अंडरस्टॅंड वर्डिंग, प्लीज़ सजेस्ट इफ़ एनिवन फेसिंग दिस.

दोनो ने फटाफट अपने-अपने कपड़े उतार फेंके और मादर जात नंगे हो गये, रामसिंघ प्रेमा के शरीर की बनावट में ही खो गये, वो पहले अपनी नज़रों से उसके शरीर का रस्पान करते रहे, हाथ भी क्यों पीछे रहते, नज़रों के पीछे-2 वो भी दोनो अपना काम बखूबी निभाने लगे..

हिरनी जैसी कॅटिली आँखों में जैसे वो खो से गये, अपने डाए हाथ का अंगूठा उसके होंठो पर रखा और उनको हल्के से मसला, प्रेमा की आँखे बंद हो चुकी थीं, और वो आनेवाले सुखद पलों के इंतजार में खो सी गयी..

उसके गालों पर अपने खुरदुरे हाथ से सहलाते हुए, रामसिंघ के हाथ उसकी सुराहीदार गर्दन से होते हुए उसके वक्षस्थल पर आ जमे, दोनो कबूतरों को दोनो हाथों में भरकर ज़ोर से मसल दिया….

आसस्स्सिईईईईय्ाआहह….. धीरे… हीईीई… जालिमम्म्म, … ऐसे तो ना तडपा…, इन्हें चूस ले रजाआ…. आहह… बहुत परेशान करते हैं मुझी…. सीईईई..आअहह….

रामसिंघ ने अपनी जीभ के अगले सिरे से एक निपल को हल्के से कुरेदा, और दूसरे निपल को उंगली और अंगूठे में पकड़ के मरोड़ दिया…

प्रेमा की तो जैसे जान ही अटक गयी…. आअहह…. ससिईइ… ऊहह…उउंम्म… हाईए… चूसो इन्हें… निकाल दो इनका सारा रस्स्स….ऊहह माआ….हाईए...रामम….ये क्या हो रहा है….मुझे…..

फिर रामसिंघ ने चुचकों की चुसाइ शुरू करदी… दोनो चुचियों को बारी-2 से पूरी की पूरी मुँह भर-भर के जो चुसाइ की, 5 मिनट में प्रेमा की चूत पानी देने लगी… हाए राम…. चुचियों से ही पानी निकलवा दिया, तो जब चुदाई करोगे तब क्या होगा….

देखती जा मेरी रानी… चल आ अब ज़रा अपने प्यारे खिलोने की सेवा तो कर… कहकर अपना सोट जैसा लंड प्रेमा के मुँह में ठूंस दिया, प्रेमा हक्की-बक्की रह गई, उसे पता ही नही था कि लंड मुँह में भी लिया जाता है…??

शुरू में तो प्रेमा ने आनाकानी की लेकिन जैसे ही उसने हाथ से सुपाडे की चमड़ी पीछे की और सुर्ख लाल शिमला के आपल जैसा सुपाड़ा देखा और उसपे एक मोती जैसा दिखाई दिया, उसे चाटने का मन किया, और चाट भी लिया..

उम्म्म… ये तो टेस्टी है, हॅम… गल्प…गल्प उसे चाटने लगी, साथ-साथ हाथों से मसलती भी जारही थी,

रामसिंघ तो जैसे सातवे आसमान पर थे, मज़े में उन्होने सर को दवाके प्रेमा का मुँह अपने हथियार पे दवा दिया… प्रेमा अब मज़े ले-लेकर आधे लंड को मुँह में लेकर चूसे रही थी और आधे को मुट्ठी में दवा कर मुठिया भी रही थी.

कभी-कभी वो उनके नीचे लटके हुए दो आंडो को भी मुँह में भर कर चूसे लेती… जिससे रामसिंघ का मज़ा चौगुना हो गया,

थोड़ी देर में उन्हें लगने लगा कि, ये तो साली चूस के ही निबटा देगी.. उन्होने उसका मुँह अलग किया… और उसे धक्का देकर कमरे में पड़े पलंग के उपर धकेल दिया…

प्रेमा अपनी दोनों पतली एवं सुडोल टाँगे चौड़ी करके लेट गयी, घुटनो के उपर उसकी चिकनी और मुलायम गोल-गोल जंघें मानो, अविकसित केले का तना….

आहह… देखकर रामसिंघ के मुँह में पानी आगया, वो उसकी चिकनी जाँघो को सहलाते हुए अपने हाथो को छोटे-छोटे बालों से युक्त उसकी चूत पर लेगये…

एक के बाद एक दोनो हाथों को उसकी चूत के उपर फेरा…., और फिर नीचे की तरफ से हाथ को उल्टा करके, अपनी उंगिलयों से अंदर की तरफ से सहलाया….

प्रेमा आँखें बंद किए आनेवाले परमानंद की कल्पना में खोई हुई थी..

अपने दोनो हाथों के अंगूठे से उसकी चूत की फांकों को अलग किया…., चूत का अन्द्रुनि गुलाबी रंग का नज़ारा देखकर रामसिंघ की जीभ स्वतः ही उसपे चली गयी…

अपनी जीभ से दो-तीन बार उपर नीचे करके उसे कुरेदा, और फिर झटके से उसके क्लरीटस को उठा दिया…, कौए की चोंच जैसे उसके भागनाशे को मुँह में लेकर चूसने लगे…

प्रेमा आनंद सागर में गोते लगा रही थी, उसके मुँह से मादक सिसकारियाँ फुट रहीं थी,……

ऊओह…… रामुऊऊ…. आअहह… तुम कितने अच्चीए.. हो.. हाअययईए… मेरे राजा… उउउइइ…..म्माआ…..सस्सिईईईईय्ाआहह…

जीभ चूत की उपरी मंज़िल पे काम कर रही थी, इधर बेसमेंट को खाली देख कर, उनकी उंगलिया हरकत में आ गयी, झट से दो उंगलिया खचक से अंदर पेल दी…

उनकी एक उंगली ही एक साधारण लंड के जितनी मोटी थी, यहाँ तो दो-दो उंगलिया वो भी जड़ तक पेल रखी थी… प्रेमा सिसिया कर उठी,

जीभ और उंगलियों की मार, प्रेमा की चूत ज़्यादा देर तक नही झेल पाई और उसकी कमर स्वतः ही धनुष की तरह उपर को उठती चली गयी, और चीख मार कर बुरी तरह से झड़ने लगी…

आजतक, अपने जीवन में पहली बार उसे इस तरह का मज़ा मिला था, वो सोचने लगी, हे राम, बिना लंड के इतना मज़ा आया है, जब इसका लंड मेरी चूत को पेलेगा तब क्या होगा…?

आनेवाले समय में मिलनेवाले मज़े की परिकल्पना से ही वो सिहर उठी..और उसके शरीर में तरंगें सी उठने लगी……

प्रेमा अपने हाल ही में हुए ऑर्गॅनिसम की खुमारी में आँख बंद किए पलंग पे पड़ी थी, लेकिन रामसिंघ का लंड अब एक पल के लिए भी इंतजार करने को राज़ी नही था,

उन्होने अपना हाथ, उसकी चूत पे फिराया जो उसके रस से सराबोर थी, अपने मूसल को हाथ में पकड़ के उसकी चूत के उपर घिसा दो-तीन बार, प्रेमा को लगा जैसे कोई गरम रोड उसकी चूत के उपर रगड़ रहा हो.

चूत की फांकों को दोनो हाथों के अंगूठे से खोल कर अपने सुपाडे को उसके मुंहाने पे रख के हल्का सा धकेला, जिसकी वजह से लंड का सुपाडा चिकनी चूतरस से भीगी चूत में सॅट से फँस गया,

रामसिंघ के लंड का सुपाडा भी कम-से-कम दो-ढाई इंच लंबा और साडे तीन इंच से भी ज़्यादा मोटा था.

जैसे ही लंड का सुपाडा चूत में फिट हुआ, प्रेमा की हल्के दर्द और मज़े की वजह से आहह निकल गयी….

रामसिंघ की तुलना में प्रेमा का शरीर आधे से भी कम था, पतली कमर जो उनके हाथों में अच्छे से पकड़ में आरहि थी,

कमर के दोनो ओर हाथ रखकर उपर की ओर बढ़े और उनकी चुचियों पर पहुँच कर मसल डाला…

धीरे-धीरे लेकिन कड़े हाथों से मींजना शुरू कर दिया, दो-तीन रागडों में ही प्रेमा की चुचियाँ लाल सुर्ख हो गयी, दोनो निपल चोंच सतर करके 1” तक खड़े हो हो गये,

प्रेमा की हालत दर्द और मज़े की वजह से कराब होती जा रही थी, और उसके मुँह से स्वतः ही सिसकियों के साथ-2 अनाप-सनाप निकलने लगा…

 
रामसिंघ ने अपने दोनो हाथों को उसके कंधों पे टिका के एक मास्टर स्ट्रोक मारा, नतीजा, मोटा सोटा 3/4 तक चूत में जाके फिट होगया,

झटके की वजह से और लंड की मोटाई के साथ-2 डंडे जैसी कठोरता की वजह से प्रेमा की चूत में दर्द की एक लहर सी उठी, जिस कारण से उसके मुँह से कराह फुट पड़ी….

ओह्ह्ह्ह… रामुऊऊ… मर गाइिईई…. थोड़ा आराम से डालो ना… मेरी जान निकली जा रही है…

क्यों रानी… इतना बड़ा अभी तक नही लिया क्या…??

नही ऐसी बात नही है, लेकिन तुम्हारा सोटा कड़क ज़्यादा है, इसलिए ये खूँटे की तरह छिल सा रहा है…

रामसिंघ ने धीरे-2 उतने ही लंबाई से धक्के मारना शुरू कर दिया… 15-20 धक्कों के बाद ही प्रेमा को मज़ा आना शुरू हो गया और वो भी अपनी कमर उचकाने लगी.

रामसिंघ ने उचित मौका देख कर, एक जोरदार हिट किया, और ये छक्का!!!

लंड पूरा का पूरा चूत में जाके फँस गया, प्रेमा को लगा कि लंड का सुपाडा उसकी बच्चेदानी के अंदर फँस गया है,

उसके गले से गॅन…गॅन, जैसी आवाज़ें निकलने लगी, और चूत बुरी तरह से फैल कर लंड को जगह देने के बाद एकदम सील हो गयी, हवा जाने तक की जगह नही बची थी,

प्रेमा ने जिस तरह की चुदाई की कल्पना की होगी, आज उसे वो मिल रही थी, लेकिन उसके लिए उसे बहुत कुछ सहना पड़ रहा था..

प्रेमा की पतली कमर को अपने मजबूत हाथों के बीच पकड़ कर धक्के मारते हुए बोले…. हाईए.. रानी, वाकई में तेरी चूत बड़ी कसी हुई है,

मेरे लंड को छोड़ने को तैयार ही नही है… एकदम से जकड लिया है साली ने, और लंबे-2 शॉट मारना शुरू कर दिया…

चूँकि वो उसकी कमर जकड़े हुए धक्के लगा रहे थे इस वजह से जब लंड को बाहर खींचते तो हाथो के दबाव से कमर नीचे हो जाती, और जब अंदर डालते तो हाथ उसे कमर पकड़ कर उपर की ओर उठा लेते, नतीजा… लंड धक्के दर धक्के एक नयी खोज करने लगा, और हर बार एक नयी गहराई तक चला जाता.

धक्कों की गति निरंतर बढ़ती ही जा रही थी… थोड़ी ही देर में प्रेमा की चूत में खलबली होने लगी और वो झड़ने लगी…

किंतु चूँकि लंड पूरी तरह से फँसा होने के कारण उसके पानी को बाहर निकलने का रास्ता नही मिल रहा था, जिस कारण से उसकी चूत लंड के लगातार घर्षण के कारण अजीब सी आवाज़ें करने लगी…

फुकच्छ…फुकच.. ठप्प..ठप्प की आवाज़ों से संगीत सा पैदा हो रहा था…

कई देर तक जब रामसिंघ के धक्के निरंतर जारी रहे तो प्रेमा से अब सहन करना मुश्किल हो रह था, चूत रस से फुल थी और अंदर ही अंदर प्रेशर बन रहा था…

लल्ला.. थोड़ा रूको ना प्लस्सस… थोड़ा सांस लेने दो… सुन कर रामसिंघ उसके उपर से उठ खड़े हुए, और प्रेमा को भी नीचे खड़ा कर दिया…

पलंग के नीचे घोड़ी बना के पीछे से लंड पेलते हुए पुछा,,, क्यों मेरी चुदेल काकी, अब तो चलेगी ना काका के पास….

हां मेरे लंड राजा… अब तो में वैसे भी यहाँ नही रह पाउन्गी तुमहरे लंड के बिना… तुम कहोगे तो कुए में भी कूद जाउन्गी…

चोदो… और जोरे से चोदो मेरी चूत के मालिक…. आहह… आजतक कहाँ थे… हाईए… बहुत मज़ा आरहा है, और कस कस कर अपनी गान्ड को उनके मूसल के उपर पटकने लगी..

लगातार धुआधार चुदाई का नतीजा, प्रेमा की चूत फिर से पानी छोड़ने की कगार पे आ गई…

जोरे सीई…. और जोरे से चोदो… हइई… में गैइइ…. ऊओह… म्माऐईयईईई…….आअहह…आयईयीईईई….. और चूत ने पानी छोड़ दिया..

इधर रामसिंघ भी अपनी चरम सीमा पर पहुच चुके थे… उनके धक्कों की रफ़्तार अप्रत्याशित तेज हो गयी… हुन्न…हुन्न. उनके मुँह से ऐसी आवाज़ें निकालने लगे मानो कोई कुल्हाड़ी से किसी पेड़ के तने को काट रहा हो…

झटके से लंड निकाला, प्रेमा को पलटा कर सीधा किया और गोद में उठाकर लंड दुबारा डाल कर चोदने लगे…

प्रेमा ने भी अपनी बाहें उनके गले में डाल दी, और मस्त कमर उच्छल-उच्छल के चुदने लगी.

अंत में रामसिंघ ने प्रेमा को अपने लंड के उपर बुरी तरह कस लिया, और अपने लंड से उसकी चूत में फाइरिंग शुरू कर दी…

वीर्य की तेज धार को अपनी चूत में महसूस करके, एक बार फिर उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया…

जैसे ही उनका वीर्यपात पूरा हुआ, गोद में लिए ही लिए वो पलंग पे पसर गये और प्रेमा को अपने उपर कर के जकड लिया…

कितनी ही देर तक पड़े रहने के बाद जब दोनो की साँसे संयत हुई तब उन्हें होश आया, और एक दूसरे की बगल में एक-दूसरे के उपरे टांगे लपेटे पड़े रहे…

मज़ा आया काकी….

फिर काकी…?? सीने में धौल जमाते हुए…, आज तो मेरी टंकी ही खाली करदी तुम्हारे इस मूसल लंड ने… सच में कमाल की चुदाई करते हो…

तो क्या कहूँ…?? हंसते हुए उसकी गान्ड के छेद को कुरेदते हुए..

कम-से-कम अकेले में तो नाम ले सकते हो, वैसे भी में तुमसे उम्र में तो छोटी ही हूँ 2-4 साल.

ठीक है मेरी जान.. अकेले में प्रेमा रानी कहा करूँगा और सबके सामने काकी.. ठीक है,,

हां ठीक है…

अब क्या सोचा है..?? कब लॉटोगी… घर,

अभी… तुम्हारे साथ,… क्यों अपने साथ नही ले चलोगे…??

ऐसा नही है, बात ये है कि अगर मेरे साथ देख कर दूसरे लोग कुछ उल्टा-सीधा सोचेंगे…, काका के अलावा और किसी को पता नही है, कि में तुम्हें मनाने आया हूँ, समझी…

तो क्या हुआ, मुझे एक-दो दिन कहीं दूसरी जगह छिपा देना, उसके बाद में अकेली घर चली जाउन्गी… पर अब तुमहरे लंड के बिना तो चैन नही पड़ेगा..

कुछ सोच कर, हमारे गन्ने के खेतों में रह लोगि…

हाँ क्यों नही, एक-दो दिन तो कहीं भी रह लूँगी, बस खाने-पीने का जुगाड़ कर देना, और ये लंड डालते रहना…

रामसिंघ हंसते हुए, तो ठीक है, हो जाओ तैयार फिर चलने को…..

 
दोनो ने अपने-अपने कपड़े पहने, तब तक प्रेमा की माँ भी आ गई, उनसे थोड़ी-बहुत बात-चीत हुई, समझाया बुझाया, कि अब ऐसी नौबत नही आएगी..

माँ ने पुछा भी कि इतनी जल्दी ऐसा क्या हो गया जो मान गई…

गोल-मोल जबाब दे के और खाना खा पीक वो दोनो वहाँ से चल दिए, बोलते-बातें करते, एक दूसरे के साथ छेड़-छाड करते हुए, रास्ता आसान हो गया, और रात के अंधेरे में वो अपने खेतों पर पहुँच गये, प्रेमा को गन्ने के खेतों में छोड़ा, और रामसिंघ खुद अपने घर आ गये..

हां !! सही सोचा आपने, और उसका जबाब है, कि प्रेमा वाकई में बहुत बहादुर औरत थी, जो कि अकेली गन्ने के खेत में रात के अंधेरे में रह गई..

थोड़ी सी सोने लायक जगह बनाई, और एक चादर बिच्छा कर लेट गयी…

चूँकि ! रामसिंघ की ज़िम्मेदारी घर के बाहर के कामों की व्यवस्था करना था, सो किसी ने पुच्छने की ज़रूरत नही समझी कि सुबह से कहाँ थे.

पत्नी बेचारी वैसे ही बहुत सीधी-सादी थीं, उनकी तो ज़्यादा बात करने की हिम्मत ही नही होती थी पति से, और वैसे भी उनकी ज़रूरत तो वो चलते-फिरते ही पूरी कर देते थे.

घर से कुत्तों और जानवरों का बहाना करके रोटियों का इंतेजाम किया, कुछ साथ में खाने का बनिया के यहाँ से चीज़ें लेके खेतों पर चले गये, जो कि रोज़ ही वहीं सोते थे लगभग..

जाके प्रेमा को खाना खिलाया और फिर सारी रात उनकी एक-दूसरे की बाहों में कटी, 3-4 बार जमके चुदाई की, और वहीं खेत में गन्नों के बीच ही सो गये,

फाल्गुन का महीना था, ना ज़्यादा गर्मी, सर्दी जा चुकी थी, तो खुले में रात काटना अच्छा लगा…

सुबह रामसिंघ, रामचंद काका के यहाँ पहुँचे, जब उन्हें बताया कि काकी आने को राज़ी हो गयी हैं, और एक-दो दिन में आ जाएगी, किसी को जाने की ज़रूरत नही है…

ये सुन कर काका और परिवार वालों की खुशी का ठिकाना नही रहा, और वो लोग रामसिंघ को जी भर-भर के दुआएँ देने लगे..

इसी तरह तीन दिन निकल गये, प्रेमा का तो मन ही नही था, लेकिन काफ़ी समझा-बुझाने के बाद वो तैयार हुई और एक शाम को हल्के से अंधेरे में अपना समान उठाए घर पहुँच गई….

जब भी मौका लगता रामसिंघ और प्रेमा की चुदाई चलती रही, इसी तरह समय निकलता रहा, उन दोनो के बच्चे हुए, रामसिंघ के जहाँ अपनी पत्नी से 4 बच्चे थे, वहीं प्रेमा काकी ने भी 7 बच्चे निकाल दिए, 4 लड़के और 3 लड़कियाँ,

जिसमें सबसे बड़ा लड़का ही रामचंद काका के लंड से था, वाकी रामसिंघ और फिर बाद में प्रेमा के देवर से भी एक-दो, और भी… थे, जिनके नाम लेना ज़रूरी नही है.

समय निकलता रहा, परिवार बढते रहे, बड़े भाई के लड़कों और चाचा रामसिंघ में छत्तिस का आँकड़ा था, बड़े भाई चोरी छुपे अपने लड़कों को बढ़ावा देते रहे, जिससे वो बदतमीज़ तो थे ही, बदमाशों की संगत में ख़तरनाक होते जा रहे थे.

इन्ही ख़ुसी और गम के चलते, परिवार के सबसे छोटे लड़के ने जन्म लिया, जिसे हम पहले बता चुके हैं कि किन जटिलताओं में उसका जन्म हुआ.

जन्म दिन की ख़ुसीया भी मनाई गई, चाचा रामसिंघ इन्ही खुशियों को आज अपनी चुदेल काकी प्रेमा के उपर चढ़ कर उसकी गान्ड में लंड डालकर मना रहे थे..

प्रेमा कमर चलाते हुए– रामसिंघ…

रामसिंघ – हॅम..

एक बात कहनी थी तुमसे, तुम्हारे बारे में ही है, लेकिन सोच रही हूँ कैसे कहूँ…, कहूँ भी या नही…..

हां बोलो ना, क्या बात है ? और ऐसे क्यों बोला कि कहूँ या नही… क्या छुपाना चाहती हो मुझसे..?

नही ऐसा नही है, बात ही ऐसी है, पता नही तुम भरोसा करोगे या नही…

क्यों भरोसा क्यों नही करूँगा… आजतक किया ही है ना..

असल में तुम्हारे भतीजों की बात है, तो पता नही तुम मनोगे भी या नही..?

रामसिंघ के कान खड़े हो गये… और वो अपने धक्के रोक कर बोले,, बताओ प्रेमा क्या बात सुनी है तुमने…

में कल रात के करीब 12 बजे पेसाब के लिए उठी, तो सामने रास्ते पर कुछ लोगों को खड़े होके बात चीत करते दिखे, गौर से देखा तो मैने भूरे और जीमीपाल को तो पहचान लिया लेकिन वाकी कॉन थे ये पता नही…

तुमने उनकी बातें सुनी..??

ज़्यादा तो नही… में थोड़े चुपके से उनके नज़दीक गई और उस पेड़ की आड़ में खड़ी हो कर उनकी बातें सुनने लगी, रात के सन्नाटे में उनकी धीमी आवाज़ भी मेरे कानों तक पहुँच रही थी…

तू चिंता मत कर भाई, रामसिंघ चाचा को तो में छोड़ूँगा नही, ये शायद जीमीपाल था,

और दूसरे किसी में दम नही जो हमारा मुकाबला कर सके, जानकी चाचा और उसके लौन्डे तो साले डरपोक ही हैं, वो वैसे भी हमारा विरोध करने लायक नही हैं.

चल फिर ठीक है, कोई ठोस प्लान बनाते हैं उसे मारने का, कहीं फैल हो गये तो फँस जाएँगे…भूरे बोला..

इतना बोलके, वाकी 3 लोग अपनी-अपनी साइकल लेके दूसरे गाँव की तरफ चले गये, और वो दोनो भाई अपने गाँव की तरफ.

मैने जब ये सुना तो में तो एकदम सन्न रह गयी, कि ये तो नाश्पीटे, तुम्हें मारने की साजिश रच रहे हैं, इसलिए थोड़ा सावधान रहना.. कहीं सच में वो ऐसा ना करदें..

रामसिंघ भी सोच में पड़ गये, लेकिन प्रकट में बोले, अरे नही-नही वो ऐसा नही कर सकते, ऐसे ही कुछ बात कर रहे होंगे, किसी को मारना कोई खेल तमाशा नही है, वैसे भी वो कल के लौन्डे हैं मेरे सामने…

प्रेमा थोड़े चिंतित स्वर में…, फिर भी थोड़ी सावधानी से ही रहना…

चल ठीक है, अच्छा किया जो तुमने मुझे बता दिया… अब में चलता हूँ,

रामसिंघ वाकई में सोच में पड़ गये, वो जानते थे कि ये दोनो लड़के किस संगत में हैं आजकल.

अब रामसिंघ सतर्क हो चुके थे, उधर उन दोनो भतीजों को भी कोई मौका नही मिल पा रहा था..

 
समय बीतता गया, और एक दिन बड़े भाई स्वर्गवासी हो गये, बाप के मरते ही, उनके लड़ाकों ने बँटवारा कर लिया, और अपने हिस्से की ज़मीन और आधा घर ले लिया.

आधा घर इसलिए उन्हें मिल गया क्योनि छोटे भाई जो अपनी ससुराल में घर जमाई बन गये थे, उन्होने अपने हिस्से का घर भी उन नालयक भतीजों के नाम कर दिया..

संतोषी सदा सुखी, इस बात पे कायम जानकी लाल ने अपने छोटे भाई को समझा बुझा के शांत रहने के लिए मना लिया.

दोनो भतीजों ने अपनी मन मर्ज़ी शादियाँ भी कर ली, इसमें थोड़ा समय और आगे बढ़ गया. समय का पहिया कभी रुकता नही, वो सदैव चलता ही रहता है..

लेकिन कहते हैं ना कि, आग एक बार भड़क जाए, तो कुछ देर के लिए शांत ज़रूर हो जाती है, लेकिन बुझती तभी है, जब सब कुछ स्वाहा कर देती है…

और आग तो कभी बुझी ही नही थी...सुलग रही थी लगातार…..

भूरे लाल 6 फीट लंबा, मजबूत कद काठी का गोरा चिट्टा जवान था, वहीं जीमीपाल शरीर में उससे भी तगड़ा लेकिन थोड़ा साँवले रंग का था, भैसे की बराबर ताक़त थी जीमीपाल में, अपनी ताक़त का बड़ा घमंड भी था दोनो भाइयों में.

लेकिन पता नही उनकी ताक़त चाचा रामसिंघ और उनके दोनो बड़े बेटों के सामने फीकी पड़ जाती थी, लाख कोशिसों के बावजूद वी उनका कुछ नही बिगाड़ पाते थे, झगड़े होते रहे, इन सबके बीच जानकी लाल की भमिका एक बीच-वचाब के मधय्स्थ की ही रहती.

वो थोड़ा शांत स्वभाव के व्यक्ति थे, लेकिन पक्ष वो चाचा और उनके बेटों का ही लेते थे, क्योंकि अपने बड़े भाई के बेटों की आदतें उन्हें भी पसंद नही थी.

जानकी लाल के छोटे बेटे ब्रिज बिहारी और चाचा के छोटे बेटे यशपाल दोनो ही दूसरे शहर में रह कर पढ़ाई कर रहे थे,

चाचा के भी दोनो बड़े बेटों की शादियाँ हो चुकी थीं.

जीमीपाल की पत्नी उस समय शादी के बाद अपने मायके में गयी हुई थी, दोनो भाइयों चाचा की भाषा में दुर्योधन और दुशाशन का षड्यंत्र रंग लाने वाला था.

सेप्टेंबर का महीना था, बारिश बंद हो चुकी थी, लेकिन बाहर के वातावरण में रात के वक़्त थोड़ी ठंडक आ चुकी थी.

जैसा कि पहले लिखा जा चुका है, इनका घर बहुत बड़ा था, चार हिस्सों में बँटा हुआ, बीच में एक बहुत ही बड़ा आँगन, घर के बाहर पूरी लंबाई की बारादरी और उसके आगे बहुत बड़ा सा चबूतरा.

सारे घर के पुरुष या तो उस बारादरी में सोते थे या चबूतरे के उपर चारपाई बिच्छा कर सोते थे.

शड्यंत्रा की रात, बड़ी देर तक वो तीनों भाई, कुछ मशवरा करते रहे, चौथा चूँकि छोटा था, 18 साल की एज थी, उसको शामिल नही करते थे.

जिस समय का ये वाकया है, उस समय अरुण कोई 4 या 5 साल का था.

इन तीनों को छोड़ कर वाकी सभी लोग अलग-अलग चबूतरे पे सोए हुए थे, चाचा रामसिंघ बारादरी में एक किनारे चारपाई डालकर सोते थे.

देर रात जीमीपाल और दोनो भाई सोने के लिए अपने हिस्से के घर से बाहर आए, कॉन जनता था कि होनी क्या रंग दिखाने वाली है.

जीमीपाल के बिस्तर के अंदर एक तलवार छुपि हुई थी, उसका प्लान था, कि आज रात सुबह के प्रहर चाचा का कत्ल करके भाग जाएगा, थोड़ी देर में 2 किमी पे रेलवे स्टेशन था, जहाँ से सुबह 4 बजे एक ट्रेन उसकी ससुराल की तरफ जाती थी, उससे निकल भागेगा, सब जानेन्गे की वो तो ससुराल गया है.

प्लान के मुतविक, जीमीपाल के 4 साथी, गाँव के बाहर छुपे बैठे होंगे, अगर कोई ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो भी जाती है, कि वो फँस जाए तो वो लोग उसे बचा के निकल ले जाएँगे, ये बॅक-अप प्लान भी बना के रखा था.

थोड़ी ठंडी की वजह से चाचा रामसिंघ ने एक रज़ाई अपने सिर तक ओढ़ रखी थी,

ढाई बजे रात का वक़्त था, घनघोर अंधेरी काली रात, जीमीपाल अपने बिस्तर से उठा, बिस्तर गोल किया और घर के अंदर रखा, एक बॅग लटकाया कंधे पर जिसमें उसके कपड़े बगैरह थे.

सभी जानते हैं, 2- ढाई का वक़्त ऐसा होता है जिसमें हर आदमी गहरी नींद में होता है.

हाथ में नंगी तलवार लिए, चुपके से वो बारादरी जो चबूतरे के लेवेल की थी, और ज़मीन से कोई 2-21/2 फीट उँची थी. चाचा की चारपाई बारादरी में किनारे पर ही थी, सो उनकी चारपाई के बगल में पहुँचा.

उसने देखा कि चाचा तो रज़ाई ओढ़ के सो रहे है, अगर रज़ाई हटाता हूँ तो जाग सकते हैं, ताक़त का घमंड था ही, सोचा पूरी ताक़त से तलवार का बार करूँ तो गले तक बार कर सकती है.

ये सोच कर उसने तलवार उठाई और भरपूर ताक़त से रज़ाई के उपर से ही बार किया,

पहले बार में रज़ाई थोड़ा शरीर से उठी हुई थी सो उसका बार शरीर में चोट नही पहुँचा पाया,

लेकिन चाचा की नींद टूट गयी, फिर भी उन्होने अपना पूरा मुँह नही खोला सिर्फ़ आँखों तक रज़ाई नीचे की और दूसरे बार का इंतजार किया,

जब उसने देखा कि पहले बार का कोई ज़्यादा असर नही हुआ है, तो फिर से अपनी पूरी शक्ति लगा कर बार किया,

लेकिन तब तक चाचा चोकन्ने थे, और जब तक तलवार उन्हें कोई हानि पहुचाती, उन्होने दोनो हाथों से रज़ाई समेत तलवार को जकड लिया, फिर भी इस बार तलवार का बार अपना कुछ तो काम कर गया,

तलवार रज़ाई को चीरती हुई, उनकी गर्दन की वजे, उनकी ठोडी (चिन) में घुस गयी, उनके मुँह से एक दर्दनाक चीख निकल गयी.

भले ही जीमीपाल कितना ही ताक़तवर सही लेकिन वो चाचा के द्वारा जकड़ी हुई तलवार को छुड़ा नही पाया, और चीख सुन कर और लोग भी जाग गये.

हड़बड़ा कर वो तलवार वहीं छोड़ कर भाग लिया.

आनन फानन में सभी लोग उठकर उनके पास आ गये, देखा तो एक तलवार नीचे पड़ी है और उनकी चिन से खून निकल रहा है,

वैसे तो उन्होने जीमीपाल को पहचान ही लिया था, दूसरे उस तलवार पे भूरे लाल का नाम खुदा हुआ था, बात वहीं सॉफ हो गयी, की जीमीपाल कत्ल करने के इरादे से आया था और नाकाम हो कर भाग गया है.

इधर भूरे लाल बात खुलती देख, पेन्तरा बदल कर चाचा के पैरों में गिर पड़ा, और बोलने लगा...

चाचा कसम ख़ाता हूँ, मुझे इस बारे में कुछ पता नही है, आज से वो मेरे लिए मर गया, में उसे अब से इस घर में घुसने भी नही दूँगा वग़ैरह-2.

फिर भी रिपोर्ट तो करनी ही थी, सो थोड़ा देसी इलाज से खून को रोका और कुछ मलहम पट्टी करके सभी लोग कस्बे के थाने पहुँचे, वहाँ पोलीस ने डॉक्टर बुला के मेडिकल कराया, और रिपोर्ट लिखने का सिलसिला शुरू हुआ,

इन सब बातों में लगभग सुबह के 6 बज गये, चाचा रामसिंघ, उनके दोनो बेटे और उनके बड़े भाई जानकी लाल थाने में ये सब कार्यवाही करा रहे थे,

इतने में रेलवे पोलीस का एक आदमी थाने में आया और उसने खबर दी कि एक आदमी स्टेशन से पश्चिम की ओर ट्रॅक पर मरा पड़ा है, और उसके शरीर पर अनगिनत घाव हैं.

तुरंत थाने की एक जीप दौड़ी, और मौकाए वारदात से लाश लेकर आए, और लाकर उसे थाने में रखा,

जैसे ही सबकी नज़र उस लाश पर पड़ी, सबकी आँखें फटी की फटी रह गयी….

भूरे लाल समेत वहाँ मौजूद सभी लोगों की चीख निकल पड़ी उस लाश को देखकर,

 


ये जीमीपाल था, जिसके शरीर पर अनगिनत घाव थे, ऐसा लगता था मानो किसी भागते हुए जंगली सुअर को पीछा करते हुए तलवारों से मारा हो.

ये बॉडी कहाँ मिली तुम्हें, थानेदार ने एक सिपाही से पुछा जो उसे लेने गया था,

ये केबल से 1किमी दूर रेलवे ट्रॅक पर पड़ी थी साब, शायद इससे मारकर ट्रॅक पर डाला हो, सोचा होगा, कोई ट्रेन आके काट जाएगी, लोग सोचेंगे आक्सिडेंट हो गया होगा,

लेकिन ट्रेन के आने से पहले इसे अर्पेम वालों ने देख लिया, और यहाँ खबर करदी,

ह्म….. किसने किया होगा ये कत्ल…थानेदार बुदबुदाया…..

साब इन्होने… भूरेलाल रामसिंघ चाचा की ओर इशारा करके रोते हुए चिल्लाकर बोला….

क्या बकवास कर रहे हो, ये तो उल्टा तुम्हारे खिलाफ रिपोर्ट लिखने आए हैं, इनके ठोडी (चिन) में तुम्हारी तलवार का घाव है,

नही साब ये सब इनका ड्रामा है, अपने हाथ से अपने उपर घाव लगाके ये साबित करना चाहते हैं, कि ये तलवार का घाव है जो जीमीपाल ने मारी, तो फिर ये यहाँ मरा कैसे पड़ा है, सोचिए…..

थानेदार सोच में पड़ गया, उसे भी लगने लगा कि हो ना हो ये रामसिंघ वग़ैरह की ही साजिश हो,

अब मामला उल्टा पड़ गया, कहाँ तो वो लोग अपने उपर हुए अटॅक की रिपोर्ट लिखाने गये थे, और यहाँ जीमीपाल की मौत का उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है,

चाचा के अलावा और किसी ने उसे देखा भी नही था अटॅक करते हुए, तो उन्हें ही मुजरिम ठहराकर, केस बना दिया उनके खिलाफ,

जिसमें चाचा, उनके दोनो बेटे और साथ में जानकी लाल को भी साथ देने के जुर्म में अरेस्ट करके हवालात में बंद कर दिया,..

वो लाख चिल्लाते रहे कि हमने ये कत्ल नही किया, हम निर्दोस हैं, लेकिन पोलीस को तो बैठे बिठाए ही मुजरिम मिल गये, तो कॉन छान बीन करे.

पूरे घर में मातम छा गया, जीमीपाल की ससुराल से भी लोग आ गये उसकी पत्नी को लेके, वो भी उन्हें ही दोषी मानने लगे.

जीमीपाल की पत्नी दहाड़ें मार-मार कर रो रही थी, उसकी तो अभी जिंदगी शुरू भी नही हुई थी कि ख़तम भी हो गयी,

घर में केवल एक जेठानी थी, वाकी को तो वो गुनेहगर मान रहे थे..

मातम दोनो ही तरफ था, इधर भी घर के सभी पुरुषों को तो हवालात में बंद कर रखा था, वाकी तीन बाहर थे, और उन्हें खबर भी कर्वादी, कि वो यहाँ आएँ भी ना,

क्या पता भूरे उन्हें भी अरेस्ट करवा दे, अब तो ऐसा लगता था जैसे पोलीस उसी का काम कर रही हो.

इधर की तो किसी सिफारिस को भी सुनने को तैयार नही था वो दारोगा.

इस तरफ वाकी बचे सदस्यों में घर की 4 औरतें, 3 बच्चे, जिनमें चाचा रामसिंघ की सबसे छोटी बेटी नीनु 9-10 साल की, जानकी लाल का तीसरा बेटा श्याम बिहारी 8-9 साल का और अरुण 5 साल का.

4-5 दिन हवालात में रखने के बाद उन सभी को जैल भेज दिया गया, जो कि बड़े शहर में था,

उसी शहर में ब्रिज बिहारी पढ़ाई करते थे, इस समय बीएससीएजी कर रहे थे,

वहीं उन्होने अपने पिता, चाचा और चचेरे भाइयों से जैल में मुलाकात की, और उनके डाइरेक्षन में वकील बगैरह करके बैल कराने की कोशिश की,

चूँकि मामला अपने सगे परिवार के सदस्य के कत्ल का था, उसे संगीन दिखाकर, बेल भी कॅन्सल करवा दी,

सब जगह से उम्मीद के दरवाजे बंद थे, उधर फसल पक चुकी थी, लेकिन भूरे के डर से कोई मजदूर आने को तैयार नही थे, वो उनको डराता धमकाता था,

जानबूझ कर रातों को फसल का नुकसान करता, जानवरों को छोड़ कर, कहते है, जब बुरा वक़्त आता है तो दोस्त भी दुश्मन बन जाते हैं,

कल तक जो नाते रिस्तेदार जिनका गुणगान करते नही थकते थे, आज वही उन्हें गालियाँ देते थे, ये कैसा समय का चुका था, जिसमें से निकलने का कोई मार्ग नही सूझ रहा था,

बड़ी बुआ के दामाद नेताजी, उन्होने उन्हें कुछ ग़लत लगा और मदद की, उनके कहने पर पोलीस की देख-रेख में मजदूरों को बाहर से बुलवाकर फसल के काम निपटाए.

ब्रिज बिहारी और यशपाल रातों में आ-आ कर फसल का काम देखते…

ईश्वर की असीम कृपा हुई, फसल की पैदावार, गये सालों से भी अच्छी हुई, बावजूद इसके कि उन्हें नुकसान पहुचाने में भूरे & कंपनी. ने कोई कसर नही छोड़ी थी.

समय बीतता गया, 6 महीने जैल में काटने के बाद केस अदालत में शुरू हुआ.

एक दो सुनवाई में नेताजी की कृपा से वकील अच्छा मिल गया, उसने सच्चाई को समझा, और अपनी काबिलियत से उन्हें बेल दिलवाई…

केस चलता रहा, तारीखें पड़ती रही, इसी तरह दो साल और बीत गये, अरुण अब 7 साल का हो गया था.

एक दिन सभी लोग अदालत गये हुए थे, तीनों बच्चे खेतों में देखभाल के लिए गये हुए थे,

एक खाली जूते हुए खेत में ये तीनो खेल रहे थे छुआ-छुयि, बाजू में ही बाजरे का खेत था,

बाजरे में बाली आ चुकी थी, बहुत बड़े एरिया में था ये बाजरा, उस जूते हुए खाली खेत के दो तरफ.

एक बार अरुण (में) का नंबर आया उन्हें छुके आउट करने का, में उस बाजरे के खेत के पास खड़े आम के पेड़ को छुने गया था,

पेड़ को छुके में उन दोनो में से किसी एक को पकड़ता, जिससे मेरी टर्न ख़तम होती और छुये हुए की शुरू होती.

में उस पेड़ को छुके जैसे ही मुड़ा और उन दोनो को छुने आगे बढ़ा, वो दोनो मेरे पीछे देखकर चिल्लाए…

भागो… अरुण… भाग… वो दोनो चिल्लाते हुए गाँव की तरफ भागने लगे..

मेरी समझ में कुछ नही आया, कि आख़िर बात क्या है, जानने के लिए मैं जैसे ही पीछे मुड़ा,

मारे डर के मेरे रोंगटे खड़े हो गये, और टाँगें काँपने लगी..

बाज़ारे के खेत से निकल कर एक लकडभग्गा (हाइना), एक बुलडॉग से भी तगड़ा, कानों तक उसका मुँह फटा हुआ मेरी तरफ आरहा था.

मेरी तो गान्ड फट गयी, चीखते हुए पीछे की तरफ उल्टा ही हटने लगा, और वो लक्कड़भग्गा मेरी तरफ बढ़ता रहा,

निरंतर हम दोनो के बीच की दूरी कम से कम होती जा रही थी,

मैने सोचा अगर पलट कर भागता हूँ, तो ये पीछे से झपट कर खा जाएगा मुझे, इसलिए में रोता हुआ, उसपर नज़र गढ़ाए पीछे की तरफ हटता रहा.

एक समय पर हम दोनो के बीच की दूरी मात्र 6-8 फीट ही रह गयी, अचानक वो लक्कड़भग्गा मेरे उपर गुर्राते हुए झपटा…..

हमला उसने अपनी पूरी शक्ति से किया था, मैने फ़ौरन एक तरफ को छलान्ग लगा दी,

वो जानवर झोंक में आगे गिरा, उसका मुँह ज़मीन में गीली जुति हुई मिट्टी में घुस गया,

वो उठा और अपने मुँह और आँखों में घुसी हुई मिट्टी को फडफडा के झटका.

भाग्यवश मैने जिधर छलान्ग लगाई थी उधर पेड़ से कटी हुई कुछ लड़कियाँ पड़ी थी,

 
मेरे नन्हे दिमाग़ ने काम करना शुरू किया, मैने मन ही मन फ़ैसला कर लिया कि मरना तो है ही क्यों ना कोशिश की जाए.

स्कूल में मास्टर जी ने पढ़ाया था, कि आदमी को मरते दम तक प्रयास करते रहना चाहिए.

मेरे हाथ सबसे नज़दीक पड़ी एक लकड़ी पर जाम गये, ये लकड़ी एक लाठी के बरार मोटी और तकरीवन 5 या 6 फीट लंबी थी, और उसका एक सिरा वाइ की शेप में था,

में अपने पैरों के पंजों पर लकड़ी को कस के पकड़ के बैठ गया, लेकिन लकड़ी को उठाया नही.

लक्कड़भग्गा अपना मुँह झाड़ के दुबारा पलटा, इस बार उसने और गुस्से में मुझ पर हमला किया,

जैसे ही वो मुँह फाड़ कर मेरे उपर झपटा, झटके से में लकड़ी लेके उठा, और उसका वाई शेप वाला सिरा उसके मुँह में घुसेड दिया अपनी पूरी शक्ति और साहस के साथ.

वाई वाला सिरा, उस लक्कड़भग्गे के मुँह को और ज़्यादा खोलता चला गया, उसकी शक्ति छ्छीड हो गयी, उपर से मैने और ताक़त लगा उसे पीछे धकेला.

लक्कड़भग्गा गान्ड के वाल पीछे गिरा, फ़ौरन मैने लकड़ी घुमा कर उसके जबड़े पर कस्के रसीद कर दी.

लकड़ी के भरपूर बार से लक्कड़भग्गा ज़मीन पर दो-तीन पलटी खा गया,

उसका हौसला जबाब दे गया, कुछ देर के लिए वो ऐसे ही पड़ा रहा, मौका देख कर मैने दो-तीन बार और कस्के कर दिए उसके सर पर.

वो भयानक काले मुँह वाला जीव, निर्जीव सा पड़ा रह गया,

जब मुझे लगा कि अब ये उठके पीछे से बार करने की स्थिति में नही है, तब में वहाँ से सर पे पैर रखके भागा.

में बेतहासा घर की ओर भागे जा रहा था, कि थोड़ी दूर पर ही गाँव की तरफ से बहुत सारे लोग लाठी, डंडा लेके भागते हुए उधर को ही आते हुए दिखे.

में समझ गया कि ये लोग मुझ को बचाने के लिए आरहे हैं, में वहीं रुक गया और उन लोगों का इंतजार करने लगा.

सभी घरवाले, साथ में कुछ और मोहल्ले वाले भी थे, पास आए, और मुझे सही सलामत देखकर तसल्ली हुई.

पुच्छा की क्या-क्या हुआ, मैने सब बात बताई,

उस जगह गये तो देखा की वो लक्कड़भग्गा अभी भी वही पर मुँह से हल्की-2 गर्र्रर, गार्रररर की आवाज़ें निकालते हुए पड़ा था.

सभी लोगों ने मुझे शाबाशी दी, और मेरे भाई-बहन को बहुत डांता, मैने कहा कि इसमे इनकी कोई ग़लती नही, वो तो अचानक से आ गया,

माँ ने मुझे अपनी छाती से चिपका लिया और बलाएँ लेने लगी.

उसी दिन अदालत से लौटते समय जैल के 6 महीनों में चाचा के दूसरे बेटे मेघ सिंग की दोस्ती एक गुंडे से हो गयी थी वो मिल गया.

उसने कत्ल की सारी सच्चाई बताई, कि जीमीपाल का मर्डर क्यों और किसने किया.

अगली सुनवाई में उसे कोर्ट में गवाह के तौर पर पेश किया गया, और वहाँ उसने जो सच्चाई बयान की वो कुछ इस प्रकार थी ……

विश्वा और जीमीपाल की कॉलेज के दीनो से खास दोस्ती थी, कारण था दोनो की आदतें एक-जैसी थी, वो कहते हैं ना कि, जैसे को तैसा मिल ही जाता है.

दोनो ही गुंडे टाइप थे तो दोस्ती तो लाज़िमी ही थी, धीरे-2 वो दोस्ती गहरी और गहरी होती गयी,

जीमीपाल विश्वा के घर भी आने-जाने लगा, यहाँ तक कि कॉलेज ख़तम होने के बाद भी उसका विश्वा के घर आना-जाना लगा रहा,

विश्वा की एक छोटी बेहन थी, जिसकी आँखें जीमीपाल से लड़ गयी, वो उसके मर्दाने शरीर पर मर मिटी,

जीमीपाल की शादी के बाद भी उनका मिलना जुलना बंद नही हुआ, इसी चक्कर में वो प्रेग्नेंट हो गयी,

एक दिन वो चुदाई कर रहे थे, कि विश्वा ने उन्हें देख लिया, लेकिन सामने नही आया, और चुपके से उन्हें देखता रहा,

चुदाई के बाद विश्वा की बेहन ने बॉम्ब फोड़ा, कि वो उसके बच्चे की माँ बन गयी है,

जीमीपाल हड़वाड़ा गया, कुछ सोच विचार के उसने कहा कि तुम अबॉर्षन करा लो, में अब तुमसे शादी तो कर नही सकता.

वो सुनने को तैयार नही हुई, तो वो उसके साथ डाँट-दपट करके, गाली-गलोज करके चला आया,

विश्वा को ये बात नागवार गुज़री, और उसने मन ही मन जीमीपाल को सबक सिखाने की ठान ली,

बेहन को उसने समझा बुझ के, उसका अबॉर्षन करा दिया, लेकिन जीमीपाल को ये जाहिर नही होने दिया कि वो उसकी करतूत से वाकिफ़ है,

मौका विश्वा के हाथ लग गया, जब जीमीपाल, भूरे चाचा के मारने का प्लान बना रहे थे, तब उन्होने सोचा कि अगर किसी तरह पकड़े जाने का खतरा पैदा हुआ तो कोई तो चाहिए जो बचा सके,

फ़ौरन उन दोनो को विश्वा का नाम याद आया, उन्होने उससे बात की तुम सिर्फ़ अपने दो-तीन दोस्तों के साथ गाँव के बाहर छिप के नज़र रखना,

वैसे तो ये नौबत आएगी ही नही, क्योंकि रात के इतने वक़्त आदमी को उठाने में भी समय लगता है, तो भीड़ होने के चान्स कम हैं.

दिखावे के लिए विश्वा ने थोड़ी ना-नुकर की, पर अंत में मान गया..

 
विश्वा उस रात अपने तीन दोस्तों के साथ आकर गाँव के बाहर छिप गया, तब बैठे-2 उसने अपने दोस्तों से कहा…

देखो रे… हमारी जीमीपाल के चाचा से कोई जाती दुश्मनी नही है और ना ही दोस्ती, वो उसको मारे या छोड़े, हमें इसमें कोई इंटरेस्ट नही है,

अगर वो उसको मारने में कामयाब हो गया, और यहाँ से भागा तो हम उसके पीछे-2 भागेंगे, ठीक है,

एक साथी- हां ये तो तय हुआ ही था,

विश्वा- हां लेकिन उसके आगे क्या करना है, ये तय नही हुआ था ना..

दूसरा साथी – तो क्या करना है अब…

विश्वा – देखो मुझे इस हरामी से बदला लेना है, इसने दोस्ती में धोखा दिया है, अब मौका हाथ आया है…

तीसरा साथी चोन्क्ते हुए,… तो अब तू क्या करना चाहता है..??

विश्वा- जैसे ही वो हरामी अपने चाचा को मार कर यहाँ से गुजरेगा, हम उसके पीछे-2 उसी रफ़्तार से भागेंगे, जिस रफ़्तार से वो भाग रहा होगा,

कुछ 1 किमी दूर जाके हम उसे रोकेंगे, वो जैसे ही रुकेगा, हम उसपे अटॅक कर देंगे और मार-काट के रेल की पटरी पे डाल देंगे, जिससे ये एक रेल हादसा दिखेगा,

साँझ गये तुम लोग…थोड़े समझा-बुझाने पर वो विश्वा की बात मान गये.

फिर वही हुआ जो तय हुआ था, उन्होने 1 किमी तक उसका पीछा किया, फिर उसे आवाज़ देकर रोका, कि अब कोई नही आरहा पीछे से,

जीमीपाल जैसे ही रुका, वो चारों उसके पास पहुँचे, नॉर्माली बातें करने लगे, उसने सपने में भी नही सोचा होगा कि ये लोग उसके साथ क्या करने वाले हैं…

जीमीपाल आगे और बराबर में विश्वा का एक साथी, विस्वा और दोनो साथी पीछे-2 चल रहे थे, बात-चीत करते हुए,

विश्वा के पास तलवार थी और उसके साथियों के पास लंबे-2 छुरे, वही जीमीपाल निहत्था था,

थोड़ी दूर और चलने के बाद विश्वा ने पीछे से बार किया, जैसे वो पलटा, दूसरे ने छुरा भोक दिया उसके पेट में,

वाकई में जीमीपाल बहुत बहादुर था, बावजूद चारों ओर से हथियारों से उसपे बार पे बार हो रहे थे, फिर भी वो बहुत देर तक उन लोगों का मुकाबला करता रहा,

सरकारी वकील ने उसे पुछा भी, कि ये बात तुम्हें कैसे पता हैं, क्या तुम भी थे उनलोगों में,

गवाह – नही वकील साब, उनमें से एक मेरा उठक-बैठक वाला है, एक दिन दारू के अड्डे पे नशे में बक गया ये सब,

जज ने फ़ैसला अगले तारीख तक मुल्तवी किया, और पोलीस को हिदायत दी कि विश्वा और उसके साथियों को गिरफ्तार करे.

पोलीस जब उनके ठिकाने पर पहुँची, तो उन लोगों ने मुक़ाबला किया, जिसमे विश्वा और एक उसका साथी पोलीस की गोली का शिकार हो गये,

लेकिन दो बचे हुए लोगो ने अदालत में कबूल कर लिया, और अदालत ने जानकी लाल, रामसिंघ और उनके दोनो बेटों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया.

भूरेलाल इस फ़ैसले से तिलमिला गया, लेकिन कर भी क्या सकता था, पर उसने उन्हें चोट पहुँचने की लत को सिरे से ख़तम नही किया और नये मौके की तलाश में जुट गया…

वक़्त किसी का गुलाम नही होता, वो तो अपनी मन्थर गति से चलता ही रहता है,

ब्रिज लाल भैया ने अपना पोस्ट ग्रॅजुयेशन कॉलेज में टॉप किया, जिसकी वजह से उसी कॉलेज ट्रस्ट ने उन्हें ऐज आ लेक्चरर अपायंट कर लिया,

पढ़ाकू ब्रिज भैया साथ-2 में पीएचडी करते रहे और उन्होने देश की एक नामी गिरामी यूनिवर्सिटी में ऐज आ प्रोफेसर जाय्न कर लिया,

इसी बीच मेरी दोनो बड़ी बहनों की शादियाँ हो गयी, चाचा की बेटी भी शादी के लायक हो चली थी, तो कुछ दिनो में उसकी भी शादी हो गयी.

चचेरे भाई यशपाल भैया भी पोस्ट ग्रॅजुयेशन करके हरियाणा में सरकारी जॉब पे लग गये.

श्याम भाई 10थ पास करके, दूसरे शहर में आगे की पढ़ाई करने चले गये, जैसा कि मैने पहले बताया है, हमारे लोकल टाउन वाले कॉलेज में अग्रिकल्चर 10थ तक ही था.

में अब 10थ में आचुका था, मेरे सब्जेक्ट मत, बाइयालजी, साइन्स इंग्लिश के साथ थे,

हालाँकि मेरा इंटेरेस्ट मैथ में बिल्कुल भी नही था, मुझे लिटरेचर वाले सब्जेक्ट ज़्यादा पसंद थे,

लेकिन घर में अपनी चाय्स किसी की भी नही चली तो मेरी क्या चलती, पिता जी की ज़िद, कि उनके दो बेटे मैथ पढ़ेंगे, और तो कृषि.

तो एक तो सबसे बड़े भैया मैथ पढ़ ही चुके थे, वो मैथ के लेक्चरर थे इंटर कॉलेज में.

हमारी और चाचा की खेती वाडी शामिल ही थी, केवल खाना पीना रहना करना अलग-2 था,

अब चूँकि पिता जी भी बूढ़े हो चले थे, तो ज़्यादा मेहनत का काम उनसे होता नही था,

चाचा की तरफ से खेतो में काम करने वेल 3 लोग थे, और हम दो ही, तो हमने एक पर्मनेंट मजदूर रख लिया था, इस तरह से बॅलेन्स रखा.

 
हम दोनो छोटे भाइयों पर बचपन से ही घर खेत के कामों का बोझ रहा फिर भी हम पढ़ाई और काम का बॅलेन्स बनाए हुए, बस पास होते रहे.

10थ तक आते-आते, 14 साल की उम्र में ही मेरी हाइट कोई 5’5” हो चुकी थी, चूँकि घर में खाने की कोई कमी नही थी, मन मर्ज़ी दूध कहो, घी खाओ, कोई हाथ पकड़ने वाला नही था,

रात के खाने के बाद रूटिन से डेढ़ लिटेर दूध में 50ग्राम घी और एक देसी अंडा(एग) मीठा डालके पीना और खेतों में जी तोड़ मेहनत करना,

अगर काम कम हो जाता तब डंड पेलना, समय मिला तो पढ़ाई करना यही रुटीन था मेरा,

थोड़ा बहुत यार दोस्तों के साथ मौज मस्ती भी होती रहती थी,

बॉडी एकदम स्टील के माफिक सॉलिड थी, नया-नया फिल्मों का शौक लग चुका था, अमिताभ बच्चन के फॅन थे, तो उनके जैसे हो बाल, कान ढके हुए, शर्ट के कॉलर पीछे से दिखते नही थे बालों की वजह से.

कपड़े भी शेम टू शेम, 28” की मोहरी की बेलबटम, जांघों में एकदम कसी हुई… अब आप समझ ही गये होंगे उस फैसन के बारे में.

ज़्यादा अंग्रेज जैसा तो नही, लेकिन सॉफ रंग, गोल चेहरा, कुल मिला कर एक टीनेज हीरो, ये पर्सनाल्टी थी मेरी.

संगीत का बहुत शौक था, किशोर दा के गाने हर समय ज़ुबान पर रहते, चलते-फिरते, काम करते वक़्त भी वोही गुनगुनाना…. एक दम मस्त लाइफ.

वो भी क्या दिन थे, इतनी मेहनत के बावजूद एक नयी उमंग, मस्ती सी भरी रहती थी दिल में.

गाँव में ही एक कीर्तन मंडल था, जिसका में लेड गायक था, चारों ओर बहुत नाम हो चुका था हमारा.

यही नाम मेरे कॉलेज में काम आया…

उन दिनों, हमारे कॉलेज में शिक्षामंत्री का इनस्पेक्षन होनेवाला था, जिसके स्वागत की तैयारियाँ चल रही थी महीनों पहले से.

उसमें संगीत प्रोग्राम भी देना था, जिसके लिए अच्छे-2 बच्चों का सेलेक्षन हुआ, जो भी इंट्रेस्टेड थे उन्होने अपने-2 नाम लिखा दिए,

मेरा नाम भी मुझे बिना पुच्छे ही हमारे गाँव के सीनियर लड़कों ने लिखा दिया,

लिस्ट सर्क्युलेट हुई तब पता चला, और दूसरे दिन से पप्पू मास्टर साब (<5” फीट की हाइट, शरीर में भी हल्के हिन्दी के टीचर एज करीब 40-42, सौम्या स्वाभाव) उनके पास टाइम टेबल से रिहर्सल के लिए जाना था,

लड़के और लड़कियाँ दोनो ने ही इस प्रोग्राम में पार्टिसिपेट करना था,

सबका ट्रेल लिया गया, अपनी अपनी स्पेशॅलिटी के हिसाब से, मुझे एक ड्रामा, कब्बली और एक डुयेट के लिए सेलेक्ट किया गया.

मेरे साथ डुयेट में एक लड़की, रिंकी जैन को गाना था, बॉब्बी फिल्म का गाना “हम तुम एक कमरे में बंद हों, और चाबी खो जाए”

इस फिल्म के गानों का बड़ा क्रेज़ था उस टाइम..

रिंकी जैन- क्या लिखूं उसके बारे में, शायद मेरे पास शब्दों की कमी है, या मेरी कल्पना शक्ति इतनी अच्छी नही है कि कुछ लिख सकूँ.

अल्हड़ बाला, मीडियम हाइट, खूबसूरत इतनी की पुछो मत, वैसे तो उस उम्र में खूबसूरती निखारना शुरू ही होती है,

काले थोड़े घुघराले बाल पीठ के निचले भाग तका आते थे, गोल गुलाबी चेहरा, हिरनी जैसी कॅटिली आँखें लगता था जैसे कुछ कहने वाली हैं.

सुराहीदार गर्दन, कच्चे अमरूदो जैसे उठे हुए कड़क वक्ष, स्कूल शर्ट में और भी सुंदर दिखते थे, एकदम पतली कोई 22 की कमर,

कमर के जस्ट थोड़ा सा स्लोप लेता हुआ जांघों का उभार, पीछे से थोड़े से बाहर को निकलते हुई गोल-गोल चूतड़, लेकिन एकदम टाइट, ज़रा सी भी थिरकन नही.

घुटनों तक की स्कर्ट में से झाँकती हुई मांसल जांघे, जब चलती थी तो लगता था मानो कोई वाटिका में तितली उड़ रही हो,

कॉलेज के सीनियर 12थ तक के स्टूडेंट भी इस मौके की तलाश में रहते थे, कि सिर्फ़ एक मौका इसके नज़दीक जाने का मिल जाए, तो चैन आजाए.

उसे देखते ही मेरा मन बार-बार किशोरदा का वो गाना गुनगुनाने का करता था और गुनगुनाने लगता भी था.


रूप तेरा ऐसा दर्पण में ना समाय,

खुश्बू तेरे तन की मधुबन में ना समय,

हो मुझे खुशी मिली इतनी….. हो मुझे खुशी मिली इतनी,

जीवन में ना समय,

पलक बंद करलूँ कही छलक ही ना जाए….
 
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