• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
खालिद के ऑफीस के एक दो मुख्य-2 सिक्यॉरटी वालों के फेस मास्क जो मैने बनवाके रखे थे वो लिए,

उसके सेक्यूरिटी गार्ड की यूनिफॉर्म पहन कर अपनी बाइक लेकर निकल पड़ा.

हेड क्वॉर्टर से पहले ही मैने अपने बॅग और बाइक को एक सेफ जगह देख कर छुपा दिया और मेन गेट से हटके वहाँ का जयजा लेने लगा.

हेड क्वॉर्टर मेन रोड से हटकर कोई 500 मीटर अंदर एक सिंगल रोड से कनेक्टेड था.

थोड़ी देर वहीं छिप्कर बैठा में आस-पास की गति विधियों का जायज़ा लेता रहा,

लेकिन ऐसी-वैसी कोई हल-चल नही दिखी जिससे कोई अनुमान लगाया जा सके कि अंदर

कुछ अनहोनी जैसी घटित हुई हो.

कोई आधा घंटा मे ऐसे ही पड़ा रहा और फिर मेन गेट की तरफ बढ़ने लगा.

मेन गेट से लेकर रोड के दोनो तरफ घने उँचे पेड़ों की कतार जैसी मेन रोड तक थी,

मे उन्ही पेड़ों की आड़ लेता हुआ मेन गेट के करीब तक पहुँच गया.

अभी मे और आगे कुछ करता कि तभी मैने एक गाड़ी की हेड लाइट को मेन रोड से इस रोड पर मुड़ते देखा.

मे तुरंत ऐसी जगह छिप गया जहाँ हेडलाइट ना पड़ सके.

देखते-ही देखते एक जीप मेरे सामने से गुज़री, जिसमें मात्र एक ड्राइवर और उसके बाजू में बैठा एक सेक्यूरिटी गार्ड ही था.

जीप मेन गेट पर आकर रुकी और उसमें से वो गार्ड निकल कर गेट की तरफ बढ़ा,

सही मौका देखकर में उस जीप के नीचे सरक गया और दोनो व्हील के बीच के एक्सल को पकड़ कर चिपक गया.

थोड़ी ही देर में वो जीप गेट से होकर बिल्डिंग के अंदर चली गयी और आगे के लॉन से गुजरती हुई मेन बिल्डिंग के पोर्च में जाकर रुकी.

थोड़ी देर मे यूँही उससे चिपका रहा, कुछ मिनटों में जीप फिर आगे बढ़ी और घूम कर साइड में बने पार्किंग की ओर बढ़ गयी.

पार्किंग में जीप खड़ी होते ही मे उसके नीचे से निकला अभी वो ड्राइवर जो खुद भी एक सेक्यूरिटी गार्ड ही था,

वो जीप से उतर कर बिना उसकी चाबी निकाले एक तरफ को बने अपने क्वॉर्टर की तरफ बढ़ गया.

इस समय रात के 11:30 का समय हो रहा था, चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुया था,

इक्का-दुक्का सेक्यूरिटी गार्ड इधर-उधर खड़ा बीड़ी फूँक रहा था.

समय बर्बाद ना करते हुए मैने अपने कपड़ों में से एक मास्क निकाला जो उसके सेक्यूरिटी चीफ का था, पहना और ऑफीस के मुख्य गेट की तरफ चल दिया.

चीफ की आवाज़ मे फोन पर सुन ही चुका था, आवाज़ बदलने की अपनी कला का उपयोग मे भली भाँति करना जानता था.

गेट पर एक गार्ड खड़ा था, मुझे देखते ही वो कुछ चोन्का फिर सलाम करते हुए उसने मेरे लिए गेट खोल दिया.

मैने उसको पुछा, अभी जो गार्ड बाहर से आया था वो किधर गया, उसने मेरी तरफ आशंका भरी नज़रों से देखा,

मैने उसे झिड़कते हुए पुछा- जबाब क्यों नही देते…?

उसने हड़वाड़ाकर अपनी उंगली उठाकर एक तरफ को इशारा कर दिया..

मे बिना कुछ बोले उस तरफ को जाने वाली गॅलरी में बढ़ गया..

गॅलरी के दोनो तरफ लाइन से कमरे बने हुए थे, अभी मे गॅलरी में कुछ ही दूर चला था कि सामने से किसी के आने की आहट सुनाई दी,

मे झट से एक पास के ही कमरे में घुस गया और आने वाले की आहट लेने लगा.

ये वही गार्ड था जो उस जीप से आया था, जैसे ही वो मेरे वाले गेट से आगे बढ़ा मैने पीछे से निकल कर उसे आवाज़ दी…

मे – आए सुनो…!

वो अपने चीफ की आवाज़ सुन कर पलटा, लेकिन अपना नाम मेरे मुँह से ना सुन वो पहले चोन्का फिर बोला – जी जनाब..!

मे – इधर इतनी रात गये कहाँ से आ रहे हो..?

वो बुरी तरह चोन्कते हुए बोला - क्या जनाब ! आपको नही पता मे कहाँ से आ रहा हूँ..?

मे उसके सवाल पर गड़बड़ा गया… लेकिन फिर बात संभालते हुए बोला – नही वो मेरे दिमाग़ से निकल गया था,

वैसे तुम्हें तो बाहर भेजा था ना, फिर इधर से कहाँ से आ रहे हो ?

वो – बाहर से तो कब से लौट आया जनाब ! और खालिद साब का डिन्नर भी उनके ऑफीस में पहुँचा दिया, अभी वहीं से आ रहा हूँ.

मैने मन ही मन सोचा, तो ये उसका डिन्नर लेने गया था, फिर प्रत्यक्ष में अपने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए पुछा – अभी खालिद साब क्या कर रहे हैं..?

वो हंसते हुए बोला - अरे जनाब ! वो अपनी नयी माशुका को मनाने में लगे हैं, ताकि उसे खाना खिला सकें,

लेकिन पता नही वो क्यों बेसूध सी पड़ी है, उनकी बात ही नही सुन रही, पता नही क्यों इतनी ड्रामेबाज़ी में लगी हुई है..

मे – वैसे वो ठीक तो है या जनाब ने उसे कुछ ज़्यादा ही…. मे अपनी बात अधूरी छोड़कर हँसने की आक्टिंग करते हुए बोला..

वो- पता नही जनाब मुझे तो वो कुछ बेहोशी जैसी हालत में लगी.

मैने कहा ठीक है तुम अपना काम करो, कुछ होगा तो खबर करता हूँ..

वो – जी जनाब ! बेहतर और इतना बोलकर वो वहाँ से चला गया…, उसके जाते ही मैने राहत की साँस ली…

मे कुछ देर वहीं सोच में डूबा खड़ा रहा फिर सर को झटक कर उसी तरफ बढ़ गया जिधर से वो आया था.

आगे जाकर वो गॅलरी दो तरफ को जाती थी, अब मे वहीं खड़ा सोचने लगा कि किधर जाउ..?

सारे कमरे या तो बंद थे या फिर अंधेरे में डूबे हुए थे.

कुछ सोच कर मे एक तरफ को बढ़ गया, भाग्यवस थोड़ा आगे जाते ही मुझे एक कमरे में रोशनी का एहसास हुआ और किसी के बड़बड़ाने की आवाज़ें सुनी.

 
मे उस कमरे के सामने पहुँचा, कमरे के शानदार गेट पर खालिद के नाम की प्लेट लगी थी, शक की अब कोई गुंजाइश ही नही थी, ये वही कमरा था.

मैने दरवाजे पर हाथ रखकर हल्का सा दबाब दिया, दरवाजा खुला हुआ था, ये दूसरा सौभाग्य था मेरे लिए,

मैने धीरे से उसे पुश किया और थोड़ी सी झिरी बनाकर अंदर का जायज़ा लेने लगा.

अंदर का दृश्य देखकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी और मारे गुस्से के मेरी आँखें और कान लाल हो गये मेरी मुत्ठियाँ अपने आप कस गयी,

गुस्से से मेरा चेहरा भट्टी की तरह धधकने लगा….!

दरवाजे में जगह बना कर मैने जैसे ही अंदर झाँका, मेरी नज़र सामने सोफे पर बेसूध पड़ी शाकीना पर पड़ी,

उसके शरीर पर कपड़े का एक रेशा तक नही था,

जगह-2 नोचने खसोटने के निशान बने हुए थे जो उसके दूध जैसे बदन पर सॉफ दिखाई दे रहे थे.

उसके बगल की सोफा चेयर पर मात्र अंडरवेर में बैठा खालिद, खाने में लगा हुआ था और साथ में शराब भी पी रहा था,

उसकी हालत बता रही थी कि वो इस समय कुछ ज़्यादा ही नशे में है..

कमरे का सीन देख कर मेरी आँखें गुस्से से जलने लगी, जी में आया, कि अभी के अभी इस हरम्जादे को शूट कर दूँ,

लेकिन मेरे विवेक ने काम किया और सोचा - ये तो इसके लिए बहुत आसान सी मौत होगी, और गोली चलते ही, हम यहीं घिर सकते हैं…

इसलिए मैने चुपके से गेट को खोला, अंदर गया और उसे अंदर से लॉक कर दिया.

लॉक करने से हल्की सी आवाज़ हुई तो उसने मेरी तरफ मुड़कर देखा, और नशे के झोंक में दहाडा, - ओये अब क्या लेने आया है यहाँ… जा डिस्टर्ब ना कर.. जाके सो जा.

मे उसकी बात अनसुनी करते हुए उसकी तरफ बढ़ता रहा, और सामने जाकर खड़ा हो गया..

वो शराब का ग्लास होठों से लगा कर चुस्की लेते हुए बोला- कोई काम था..?

मे – हां जनाब ! काम तो था, और वो भी बहुत ज़रूरी..!

वो – क्या है ? जल्दी बोल और निकल यहाँ से…

मे - आपकी थोड़ी खातिर तबज्ज़ो करनी थी…!

वो नशे की झोंक में ठहाका लगाते हुए बोला – हाहाहा… अरे यार तुम हमारी क्या खातिर तबज्जो करोगे, अब तो हमें अपनी इस जानेमन की खातिर करनी है.

देखो तो कैसी बेसूध पड़ी है, लगता है अब ये सुबह तक होश में आने वाली नही है,

हमने इसे बहुत समझाया लेकिन ये नही मानी, आख़िरकार हमें वो करना पड़ा जो हम नही करना चाहते थे इसके साथ,

बहुत कड़क माल थी साली, कितने दिनों से सबर किए हुए थे कि शायद अपनी मर्ज़ी से ही हमारी बाहों में आजाए,

लेकिन ना जाने किस मिट्टी की बनी थी ये, हर बार किसी मछलि की तरह हाथ से फिसल जाती थी.

आख़िरकार हमें इसे आयेपॉडिस का तगड़ा सा डोज देना ही पड़ा तब जाकर हाथ आई साली, वैसे है बहुत गरम माल.

वो जैसे जैसे ये सब बातें बताता जा रहा था, मेरे अंदर के गुस्से में इज़ाफा होता जा रहा था,

जब मेरी बर्दास्त करने की हद समाप्त हो गयी, तो स्वतः ही मेरे गले से गुर्राहट सी निकली - फिर भी तो तू इससे हार ही गया ना सुअर की औलाद…!

वो मेरे मुँह से ये शब्द सुनकर चोंक पड़ा, और अपनी लाल-लाल आँखों से मुझे घूर्ने लगा…!

उसे ये विश्वास ही नही हो रहा था, कि उसकी सेक्यूरिटी के चीफ में इतनी शराफ़त कहाँ से आ गयी,

कि एक लड़की के उपर हो रहे अनाचार से इस कदर दुखी हो जाए कि अपने ही बॉस से इस तरह बात करने लगे…!

उसे दाल में कुछ कला नज़र आने लगा, वो लड़खड़ा कर खड़ा हो गया और लाल -2 नशे से बोझिल आँखों को जबदस्ती से फाड़ते हुए बोला- क.क.क्या कहा तूने…?

तू इस अदना सी लड़की से हार गया कुत्ते… एक मामूली सी लड़की ने तुझे हरा दिया, रंडी की औलाद..

वो - तू नशे में तो नही है शकील, ये क्या बकवास कर रहा है, जानता नही किससे बात कर रहा है हरम्खोर… मे तेरी खाल खिचवा सकता हूँ..

तू ठहर ,… तेरी हिम्मत कैसे हुई मदर्चोद मुझसे इस तरह बात करने की..

इतना कहकर वो लड़खड़ाता हुआ जैसे ही वो मेरी तरफ बढ़ा, मैने फ़ौरन उसका गला अपने हाथ में जकड लिया और अपनी पूरी ताक़त से एक घूँसा उसके थोबडे पर जड़ दिया..

खालिद को इस बात का तो कतयि गुमान नही था, कि मे उसके साथ ऐसा भी कर सकता हूँ…

वो बुरी तरह चिंघाड़ता हुआ दस फुट दूर जाकर गिरा, उसके मुँह से खून निकलने लगा.

खुद को संभालकर वो उठ खड़ा हुआ और अब वो अपने पूरे होशो हवास में दिखने लगा था,

अब वो समझ चुका था, कि उसके सेक्यूरिटी चीफ के भेष में मे कोई और हूँ, इसलिए अपनी खूनी नज़रों से मुझे घूरते हुए बोला – कॉन है तू..?

मे - तू मुझे अपने लिए मौत का फरिस्ता समझ रंडी की औलाद…,

तूने इस मासूम लड़की के साथ वहशियात दिखा कर अपनी मौत को दावत दी है हराम्जादे.

वो - तू यहाँ से बचके जाएगा तब ना.. देखता जा मे तेरा क्या हाल करता हूँ.. और इतना कह कर उसने अपने टेबल की तरफ छलान्ग लगा दी,

इससे पहले कि वो उसके दराज को खोल कर उसमें रखे अपने रिवॉल्वर को निकाल पाता,

मैने हवा में जंप लगाते हुए अपने पैर की ठोकर उसकी टेबल की दराज पर दे मारी..

उसका हाथ बुरी तरह से दराज में दबकर रह गया, वो दर्द से चीख पड़ा, उसका वो हाथ बुरी तरह ज़ख्मी हो चुका था.

फिर मैने उसका गला पकड़ कर हवा में उठाया और पूरी ताक़त से फर्श पर दे मारा,

उसका सर इतनी ज़ोर्से फर्श से टकराया कि वो पीछे से तरबूज की तरह खुल गया.

 
मैने अपना पैर उसके गले पर रख कर दबा दिया, वो कुछ देर मेरे पैर को अपने हाथों से जकड कर हटाने की कोशिश करता रहा,

उसके गले की नसें फूल गयी, साँसें रुकने लगी…, मुँह से गून..गून..की आवाज़ें निकल रही थी….

फिर उसने अपनी पूरी चेतना समेट कर मेरे पैर को पकड़ कर मुझे पीछे की तरफ धकेल दिया…

मे थोड़ा लड़खड़ा कर पीछे को हटा, इतने में ही वो उठ खड़ा हुआ… और गुर्राते हुए मेरे उपर झपटा…!

मानना पड़ेगा, यौही उसे इतने बड़े ओहदे पर नही बिठाया गया था, बहुत ताक़त और फुर्ती थी खालिद के शरीर में…

हम दोनो किन्हीं दो भैंसॉं की तरह एक दूसरे से भिड़े हुए थे…

मुझे लगा कि समय बर्बाद होता जा रहा है, अब जल्दी ही कुछ करना होगा,

खालिद के वार मुझे कमजोर करते जा रहे थे…फिर मैने अपनी पूरी आंतरिक शक्ति को इकट्ठा किया, और उसे अपने से दूर उच्छाल दिया…

मैने कुछ देर अपने गले को सहलाते हुए साँसों को इकट्ठा किया, खालिद को लगने लगा कि मे अब उसके मुक़ाबले कमजोर पड़ता जा रहा हूँ…

हालाँकि, वो भी पस्त होता जा रहा था, लेकिन अपने को मेरे उपर हाबी दिखाने की जी तोड़ कोशिश कर रहा था…

खून से लथपथ उसका चेहरा किसी भयवह आदमख़ोर जैसा लग रहा था…

मैने जानबूझकर अपने को थोड़ा सा कमजोर दिखाने की कोशिश की, इसलिए उसने इस बार अपनी पूरी ताक़त से मेरे उपर झपट्टा मारा,

मे फुर्ती से थोड़ा अपनी जगह से हटा, और उसके पैरो में अड़ंगी लगा दी…,

वो औंधे मुँह फर्श पर जा गिरा, इतना समय मेरे लिए काफ़ी था…

सो उच्छल कर मे उसकी पीठ पर सवार हो गया, अपना एक घुटना उसकी पीठ पर जमाकर, मैने अपना बाजू उसके गले में लपेट दिया…

घुटने का भरपूर दबाब पीठ पर डालते हुए मैने अपनी पूरी शक्ति से उसके गले को दबाए हुए उसकी गर्दन को उपर उठाता ही चला गया…

मेरे उपर इस समय जुनून सवार था… मुझे ये भी जानने का होश नही था कि उसकी क्या हालत हो रही होगी..

मे उसकी गर्दन को पीछे की तरफ मोड़ता ही चला गया, अंततः एक कड़क की आवाज़ के साथ उसकी गर्दन की हड्डी टूट गयी..

उसके हाथ पैर ढीले पड़ने लगे…

मैने यहीं बस नही की, चीते की फुर्ती से भी तेज उसके उपर से उठा, दोनो टाँगों को पकड़ कर ज़ोर से कमरे में चारों तरफ घुमाया,

और पूरी ताक़त से उसका सर कमरे की दीवार से दे मारा…

भड़ाक्कक….किसी तरबूज की तरह खालिद की खोपड़ी खुल गयी…

मैने अच्छी तरह उसकी साँसों को चेक किया और जब कन्फर्म हो गया कि अब ये मर चुका है,

अपने खंजर से उसके लिंग को काट कर एक कोने में फेंक दिया…

अब मुझे यहाँ से जल्द से जल्द शाकीना को लेकर निकलना था सो उसके कपड़े जो इधर-उधर बिखरे पड़े थे, इकट्ठा किए,

जैसे-तैसे करके उसके बदन में डाले और उसके बेहोश शरीर को कंधे पर लाद कर गेट से बाहर लाया, फिर बाहर से गेट लॉक किया और तेज-तेज कदमों से गॅलरी में बढ़ गया…

गेट पर खड़े गार्ड ने सवाल किया – अरे जनाब इसे क्या हुआ ..??

मैने फ़ौरन से भी पेस्टर जबाब दिया, इसकी हालत ज़्यादा खराब है, अभी हॉस्पीटल ले जाना पड़ेगा…

फिर उसने आगे कोई सवाल नही किया और मे उसके बेहोश शरीर को अपने कंधे पर लादे जीप की तरफ बढ़ गया.

मुझे पता था चाबी अभी भी जीप में ही है, सो उसको आगे की सीट पर टिकाया, वो इधर से उधर लुढ़क रही थी…

मुझे लगा ये आगे नही बैठ पाएगी, तो फिर ले जाकर उसको पीछे की सीट पर लिटाया और जीप मेन गेट की तरफ जीप दौड़ा दी.

गेट पर खड़े गार्ड्स ने रोकने की कोशिश की तो मैने उन्हें समझा दिया कि इसकी हालत ज़्यादा सीरीयस है,

इसे अभी के अभी मेडिकल ट्रीटमेंट की ज़रूरत है…अपने चीफ की बात भला वो कैसे ना मानते…

फिर उन्होने बिना कोई और सवाल किए गेट खोल दिया और मैने जीप बाहर को दौड़ा दी.

 
मेन रोड से थोड़ा पहले मेरा बॅग और बाइक थे सो जीप साइड में रोक कर अपना बॅग लिया, बाइक को वहीं छोड़ा और वहाँ से निकल लिया.

इस समय रात के 2:00 बज रहे थे, मैने जीप को शहर से बाहर जाने वाले रास्ते पर डाल दिया, मुझे अब शाकीना की चिंता सताने लगी थी.

पता नही उस हरम्जादे ने ड्रग्स कितनी मात्रा में उसको दिया था.

मे बीच- 2 में पीछे मुड़कर उस पर नज़र डाल लेता था, अब मुझे और शाकीना को इस शहर ही नही इस देश से ही बाहर निकलना था,

क्योंकि खालिद की मौत का पता चलते ही उन लोगों को समझने में ज़्यादा वक़्त नही लगना था कि ये क्यों और किस वजह से हुआ…!

शहर के पीछे छूटते ही, मैने जीप को बिना रोके ही अपने बॅग से ट्रांसमीटर निकाला और हॉटलाइन पर एनएसए को कॉल लगाई,

कॉल जाती रही लेकिन पिक नही हो रही थी, अब रात के दो बजे ये इतना आसान भी नही था कि वो कॉल पिक करते.

अब मेरे सामने एक ही रास्ता था, किसी तरह सुबह होने से पहले-2 मुझे झेलम के रास्ते कश्मीर में पहुँचना पड़ेगा,

ख़तरा बहुत था, जो गुज़रते वक़्त के साथ साथ बढ़ता ही जा रहा था…

लेकिन अब मेरे सामने और कोई रास्ता भी नही था, सो मैने जीप को अंधाधुंड रावलपिंडी की तरफ दौड़ा दिया..

फेब्रुवरी का मौसम खुली जीप में ठंड के मारे शरीर सुन्न सा पड़ रहा था, लेकिन मैने स्पीड कम नही की.

वैसे तो हम गरम जॅकेट डाले हुए थे, एक जॅकेट शाकीना के लिए भी लाया था जो बॅग से निकाल कर उसको भी पहना दी थी,

फिर भी एक तो खुला जंगल, उपर से खुली जीप की फुल स्पीड, ठंडी हवा कपड़ों को चीर कर शरीर में चुभ सी रही थी.

लेकिन ठंड का एक फ़ायदा भी हुया, शाकीना के ड्रग का असर कम होने लगा, और वो ठंडी हवा लगने से कुन्मूनाने लगी.

जब उसको कुछ होश आया तो अपने आप को खुली जीप में पिच्छली सीट पर पड़ा हुआ पाया ,

वो हड़बड़ा कर उठ गयी और जब उसने देखा कि कोई गार्ड उसे जंगल के रास्ते खुली जीप में डालकर ले जारहा है,

सबसे पहले उसके दिमाग़ ने यही सोचा, कि ये शायद मुझे मारकर जंगल में ठिकाने लगाने ले जा रहा है..

ये विचार आते ही वो बिना सोचे समझे ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगी…!

उसकी चीखें रात के सन्नाटे को चीरती हुई दूर-दूर तक फिजाओं में गूंजने लगी.

मैने फ़ौरन पीछे मुड़कर उसे आवाज़ दी, अपना मास्क मे पहले ही उतार चुका था…

अनायास ही मेरी आवाज़ सुन कर वो चोंक पड़ी और फिर जैसे ही उसने मुझे पहचाना, पीछे से ही मेरे गले से लिपट कर सुबकने लगी.

मैने उसे शांत रहने को कहा और जीप की स्पीड कम करके, हाथ का सहारा देकर आगे की सीट पर बिठा लिया….!!

आगे की सीट पर बैठकर उसने अपना सर मेरे कंधे से टिका लिया, उसकी पलकें ड्रग के असर से अभी भी भारी भारी सी थी,

उसने अपनी भीगी आँखों से मेरी ओर देखा और बोली-

मे तो खालिद के ऑफीस में थी, यहाँ कैसे आ गई ?, और हम यहाँ जंगलों में कहाँ जा रहे हैं..?

मे लाया हूँ तुम्हें वहाँ से निकाल कर,

बहुत देर तक जब तुम घर नही लौटी तो मैने वहाँ फोन किया जो उसके सेक्यूरिटी चीफ के पास था,

उसकी बातों से मुझे लगा कि तुम मुशिबत में हो.

फिर मैने उसे सारी बात बताई कि कैसे मे वहाँ पहुँचा और मैने उसे किस हालत में पाया.

शाकीना रोते हुए अपनी दास्तान बताने लगी, कि किस तरह से आज खालिद ने मुझे अपने पास बुलाकर मेरे साथ छेड़-छाड़ की,

फिर जब उसकी हवस ज़्यादा बढ़ गयी, तो उसने साफ-साफ शब्दों में मुझे उसके साथ सेक्स करने को कहा…

मेरे मना करने पर वो मेरे साथ ज़ोर ज़बरदस्ती करने लगा, फिर मैने उसे उसका प्रॉमिस याद दिलाया, जिसे सुनकर वो उस वक़्त तो मान गया…

लेकिन शाम की चाय पीने के कुछ देर बाद ही मेरा सर चकराने लगा, बदन में अजीब सी बैचैनि होने लगी…

मे उसके रूम में घर जाने के लिए पर्मीशन लेने गयी, जब उसने कारण पुछा कि इतनी जल्दी क्यों जाना चाहती हो….!

जब मैने कारण बताया, तो उसने बड़े प्यार से मुझे वहीं उसके सोफे पर रिलॅक्स होने को कहा…

मेरी हालत नाज़ुक होती जा रही थी, मुझे लगने लगा कि अभी इस हालत में मे अकेली घर भी नही जा पाउन्गि,

इसलिए मैने उसी सोफे पर कुछ देर रेस्ट करने का सोचा, और वैसे भी उसके हॉ-भाव से लग नही रहा था कि वो मेरे साथ कुछ ग़लत करने का सोच रहा हो…

करीब आधे-एक घंटे की नींद के बाद अचानक ही मेरे बदन में चींटियाँ सी काटने लगीं,

स्वतः ही मेरे हाथ मेरे बदन पर पहुँच गये और में अपने नाज़ुक अंगों को सहलाने लगी…

उसी वक़्त वो अपने रूम में एंटर हुआ, और मेरी अवस्था देखकर उसके चेहरे पर स्माइल आ गयी,

 
मेरे पास बैठकर उसने मेरे बदन पर हाथ फिराया…ड्रग के असर की वजह से मुझे उसका हाथ लगाना अच्छा भी लगा,

लेकिन थोड़ा सा होश अभी वाकि था, सो उसके टच करते ही मे उठकर बैठ गयी, और घर जाने के लिए खड़ी हुई…

तभी उसने मेरा हाथ थामा, और एक झटके के साथ मुझे अपने उपर खींच लिया, मे सीधी उसकी गोद में जाकर गिरी…!

उसने मुझे अपनी बाहों में जकड लिया, मे कुछ देर उसकी बाहों से निकलने के लिए मचलती रही, लेकिन उसकी मजबूत पकड़ के आगे बेबस थी…

धीरे-2 उसके हाथ मेरे बदन पर चलने लगे, ड्रग के प्रभाव से कुछ ही देर में मेरा प्रतिरोध ख़तम हो गया और मैने अपने आप को उसके हवाले कर दिया…

मे जो भी कर रही थी, उसका मुझे कोई इल्म नही था…मे अपने होसो-हवास खोती जा रही थी…

मुझे यहाँ तक आभास हुआ कि वो मेरे उपर चढ़ रहा है, फिर उसके बाद क्या हुआ मुझे पता नही….

इतना बोलकर शाकीना फफक-फफक कर रो पड़ी, मैने उसके कंधे को सहला कर उसे शांत करने की कोशिश की…

शाकीना रोते हुए बोली – मुझे मुआफ़ कर देना मेरे सरताज, मे अपना वादा निभा ना सकी, अपने आप को नही बचा सकी…

मैने उसे समझाया – जान ! तुम्हें दुखी होने की या सफाई देने की कोई ज़रूरत नही है…, ये जो भी हुआ तुम्हारी बेबसी में हुआ…

बस अभी थोड़ा शांत रहो और मुझे ड्राइविंग पर फोकस करने दो…

जब मैने उसे उस बारे में बोलने से मना कर दिया तो फिर उसने पुछा - लेकिन अब हम जा कहाँ रहे हैं..?

मे – हिन्दुस्तान.. अब हम पाकिस्तान में नही रह सकते..!

वो- क्क्याअ..??? लेकिन क्यों..? क्यों नही रह सकते हम यहाँ..?

मे – क्योंकि मैने खालिद को मार डाला है.. अब उसके आदमी शिकारी कुत्तों की तरह हमारे पीछे पड़ जाएँगे, और कहीं से भी ढूंड निकालेंगे,

ये पता लगाने में तो उन्हें वक़्त भी नही लगेगा कि वो तुम्हारी वजह से मारा गया है..

अब हमें किसी भी तरह सुबह होने से पहले-2 ये मुल्क हर हालत में छोड़ना ही पड़ेगा.

कुछ देर तक वो सकते की हालत में बैठी रही फिर कुछ सोच कर बोली – लेकिन आपने उसे मारा क्यों..?

मे – क्योंकि उसने तुम्हारे साथ जो वहशियाना हरकत की, तो उसे देख कर मे अपने आप को रोक नही पाया, मुझे उसे मारना ही पड़ा.. और दूसरा कोई चारा भी नही बचा था मेरे पास..

बिना उसे ख़तम किए हमारा वहाँ से निकलना नामुमकिन था…

वो एकटक मुझे देखती रही, फिर अपने बाजुओं को मेरे गले में लपेटकर सूबकते हुए बोली – इतना प्यार करते हैं मुझे….!

मे – तुम भी तो करती हो ना ! मेरे एक इशारे पर बिना सोचे समझे तुमने अपने आप को मौत के मुँह में डाल दिया…!

वो एकदम मेरे शरीर से लिपट गयी और बोली – आइ लव यू जान..

मे – आइ लव यू टू.. डार्लिंग, अब देखो थोड़ा मुझे ड्राइविंग ध्यान से करने दो वरना हम कही टकरा जाएँगे,

आगे अंधेरा है, जंगल का इलाक़ा है.

मेरी बात समझ कर वो नॉर्मली मेरे कंधे से सर टिका कर बैठ गयी और अपना अगला सवाल किया – लेकिन मेरी अम्मी और बाजी का क्या होगा..?

उनके बारे में किसी को कुछ पता नही है, क्या तुमने अपने ऑफीस में किसी को बताया है..?

वो – नही..! लेकिन वो फिक्रमन्द तो होंगी..

मे – चिंता मत करो उन तक खबर पहुँचवा दूँगा, मेरा जबाब सुनकर वो कुछ अस्वस्त हुई और अपनी आखे बंद करके बैठ गयी..

जीप की स्पीड तेज होने की वजह से बातों-2 में रास्ते और समय का पता ही नही चला और हम 4:30पीएम को झेलम के किनारे तक पहुँच गये..

मैने जीप को झाड़ियों में छिपा दिया, शाकीना का हाथ पकड़ कर नदी के किनारे ले आया, और छिप्ते छिपते हम बॉर्डर तक आ गये..

अब हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल था बॉर्डर से नदी पार करना, जो कतयि आसान काम नही था.

मुझे ज़्यादा फिकर पाकिस्तान साइड से नही थी, वो तो मस्ती से पड़े सोते रहते होंगे, क्योंकि उन्हें किसी के आने जाने से कोई फरक नही पड़ना था,

कोई इधर से जाए या उधर से आए, दोनो ही सूरत में हिन्दुस्तान को ही नुकसान पहुँचाने वाले होंगे.

लेकिन जब हम हिन्दुस्तान की ज़मीन पर कदम रखेंगे, तो हालत संभालना थोड़ा मुश्किल होगा, अगर कहीं बीएसएफ ने हमें देखते ही गोली चला दी तो…?

लेकिन जाना तो था ही और वो भी रात के अंधेरे में, मैने सोचा चलो एक बार और एनएसए को कॉल करके देखते हैं..

मे टाय्लेट के बहाने थोड़ा सा झाड़ियों के पीछे तक गया और ट्रांसमीटर निकाल कर कॉल ट्राइ किया.

दो तीन बार की कोशिश के बाद कॉल पिक कर ली गयी, मैने उन्हें परिस्थिति से अवगत कराया,

 
पहले तो वो शाकीना की वजह से भड़क गये, लेकिन फिर ज़्यादा मिन्नतें करने के बाद बोले-

देखो अरुण मे अपने बिहाफ पर तुम्हें उसे लाने की पर्मीशन दे सकता हूँ,

लेकिन यहाँ उसे कैसे और किस तरह से रखना है, वो तुम्हारा पर्सनल मॅटर होगा,

और हां ! किसी भी तरह ये बात पब्लिकली नही होनी चाहिए..

मैने उन्हें आश्वस्त किया और बीएसफ से बात करने की रिक्वेस्ट की,

उनके हां बोलते ही मैने कॉल कट की, शाकीना के पास आकर उसका हाथ पकड़ा और अपना बॅग लेकर नदी के ठंडे पानी में उतर गये…….

नदी के पानी में पैर रखते ही हम दोनो की कंपकंपी छूट गयी, होठ ठंड से थर-थर काँपने लगे,

लेकिन हम पानी के अंदर और अंदर चलते चले गये, कुछ देर में हमारे शरीर एकदम सुन्न पड़ गये, और ठंड का असर कम होने लगा.

हम कोशिश में थे कि ज़्यादा से ज़्यादा किनारे की तरफ ही रहें जिससे हमें तैरने में अपनी एनर्जी वेस्ट ना करनी पड़े,

क्योंकि नदी का बहाब पाकिस्तान की तरफ था, और बहाब के विपरीत तैरना हर किसी के वश की बात नही….

लेकिन जैसे ही अपनी सीमा पर पहुँचे, यहाँ पानी के अंदर तक स्टील की वाइयर जाली से बाउंड्री जैसी थी, जिस लेवेल पर हम खड़े थे वहाँ तक तो वो जाली ज़मीन में अंदर तक गढ़ी हुई थी.

थोड़ा और अंदर गये, अब पानी हमारे गले से उपर तक था, पैरों से चेक किया तो जाली में यहाँ भी गॅप नही मिला,

फिर मैने उसको वहीं खड़ा रहने को कहा और मैने पानी के अंदर डुबकी लगा दी.

थोड़ी दूर तक जाली के सहारे-2 पानी के अंदर तैरने के बाद कुछ गॅप मिला जहाँ से एक आदमी सावधानी से ज़मीन से चिपक कर पार हो सकता था.

मे वापस आया और शाकीना को सब डीटेल में समझाया..

वो भी बड़ी जीवट वाली लड़की थी, तैरना तो उसे अच्छे से आता ही था, सो थोड़ी सी कोशिश के बाद हम सीमा पार कर गये…

आख़िरकार अपने प्यारे वतन की सीमा में आज 5 सालों के बाद मैने कदम रखा था.

भोर का उजाला अब जल्दी ही होने को था, धीरे-2 एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए हम दोनो किनारे तक पहुँचे और नदी की ठंडी रेत में थोड़ा सुसताने के लिए बैठ गये,

सुबह के धुंधले उजाले में नदी के झक्क नीले पानी में कल-कल करती लहरों का आनंद लेने लगे.

अभी हमें कोई 10 मिनट भी नही हुए थे वहाँ बैठे, की हमारे पीछे से एक कड़क आवाज़ कानों में पड़ी… हॅंड्ज़ अप…..!

हमने पीछे मुड़कर देखा, हमसे कुछ ही फ़ासले पर 4 बीएसफ के जवान हाथों में गन लिए जिनका निशाना हमारी ओर ही था खड़े थे,

उनमें से वही पहले वाले ने फिर से कड़कदार आवाज़ में कहा….

हाथ उपर, कोई हरकत की तो भून दिए जाओगे…

हम दोनो ने अपने-अपने हाथ उपर कर लिए, शाकीना डर के मारे थर-थर काँप रही थी…

मैने इशारे से उसे रिलॅक्स रहने को कहा…

वो जवान निशाना लगाए हुए हमारे नज़दीक तक आए और कोई 10 कदम दूर पर आकर खड़े हो गये..

उनमें से फिर वहीं जवान बोला – कॉन हो तुम लोग..? और यहाँ कैसे बैठे हो..?

मैने उन्हें सच बताना ही बेहतर समझा, इसलिए तुरंत कहा – हम पाकिस्तान की सीमा क्रॉस करके अभी-अभी आए हैं..

वो चोन्कते हुए बोला – क्या..?? तुम लोग पाकिस्तानी हो..??

मे – नही ! हम हिन्दुस्तानी हैं, क्या आप लोगों को अपने ऑफीसर की तरफ से कोई इन्फर्मेशन नही मिली.?

वो – नही अभी तक तो नही, वैसे कॉन हो तुम लोग..? क्या नाम है तुम्हारा..?

मे थोड़ा आगे की ओर बढ़ा तो उसने मुझे फिर से वॉर्न किया, फिर मैने उसको थोड़ा साइड में आने का इशारा किया,

कुछ सोचकर वो साइड को हुआ मे भी उसकी तरफ हाथ उपर किए हुए ही बढ़ा.

वो अभी भी उतनी ही दूरी बनाए हुए था, जब लगा कि अब मेरी बात शाकीना तक नही सुनाई देगी तो मे उससे कहा –

आप अपने ऑफीसर से कॉंटॅक्ट करो और उनको बोलो एजेंट 928 भारत लौट आया है..

उसने वहीं खड़े-2 ट्रांसमीटर से अपने कॉंमांडेंट को कॉंटॅक्ट किया और जो मैने बोला था वही सब उसने कहा.

 
अबतक उसके कमॅंडर को मेसेज मिल चुका था सो जैसे ही ये बात उसने सुनी, उसने फ़ौरन ऑर्डर दिया कि उनको सेक्यूरिटी में लेकर कॅंप तक सुरक्षित पहुँचाओ.

उसने मुझे सेलूट करने की कोशिश की तो मैने इशारे से उसे रोक दिया, हमने अपने हाथ नीचे किए और उनके पीछे-2 चल दिए.

थोड़ी दूर पर उनकी जीप खड़ी थी, उन्होने हमें उसमें बिठाया और कॅंप में सुरक्षित पहुँचाने का ड्राइवर को बोल कर वो लोग फिर से अपनी ड्यूटी पर लग गये.

पूरे रास्ते शाकीना मुझे अजीब सी नज़रों से घूरती रही, मैने उसके लवो को चूमते हुए कहा – ऐसे क्या देख रही हो जानेमन, अब हम एकदम सेफ हैं.., अब डरने की कोई वजह नही रही.

उसने मुझे अजीब सी नज़रों से घूरते हुए सवाल किया – आप पाकिस्तानी नही हो..? अब तक आपने जो बताया क्या वो सब झूठ था..?

मैने थोड़ा झिझकते हुए कहा- हां ये सच है, कि मे पाकिस्तानी नही हूँ,

लेकिन ये भी सच है, कि मे तुम सब लोगों का हितेशी हूँ, और दिल से चाहता था, कि तुम लोगों को मूषिबतों से बचाऊ.

वो मेरी बात सुनकर चुप रह गयी और गुम-सूम सी मेरी बगल में बैठी रही, फिर उसने कॅंप में पहुँचने तक कोई बात नही की.

ना जाने इस समय उसके मन में क्या चल रहा था..? सो मैने भी उसे इस वक़्त छेड़ना उचित नही समझा…

मैने एक दो बार उसको पुछ्ने की कोशिश भी की, लेकिन उसने मेरी बात का कोई जबाब नही दिया…!

कॅंप पहुँच कर में वहाँ के कमॅंडर इन चीफ से मिला जो हमारा ही इंतजार कर रहा था,

हमारी हालत ठंड की वजह से बहुत खराब थी, कपड़े गीले हो रहे थे, जिनमें से अभी भी पानी टपक रहा था…

उसने हमें फ़ौरन एक कॅंप में भिजवा दिया और हमारे लिए गरम कपड़ों का भी इंतेज़ाम करवाया.

कॅंप के अंदर पहुँच कर हमने अपने कपड़े चेंज किए और फिर एक अलाब के पास बैठ गये, जिसकी आग की गर्मी से हमें कुछ राहत मिली.

मैने शाकीना को अपनी ओर खींचने की कोशिश की, तो उसने मेरा हाथ हटा दिया और अपना मुँह दूसरी ओर करके आग सेंकने लगी.

मैने प्यार से उसके कंधे पर हाथ रख कर सहलाया और बोला – क्या हुआ शाकीना ? क्या मेरे साथ आकर तुम खुश नही हो..?

मेरी बात सुनकर उसने पलट कर मेरी ओर देखा, उसकी आँखों से दो बूँद पानी की टपक पड़ी, फिर अपने आपको संभालते हुए बोली –

मैने आपके उपर अपनों से भी कहीं ज़्यादा यकीन किया, लेकिन आपने मुझे उस यकीन के काबिल नही समझा और अपनी पहचान छुपाये रखी.

यकीन मानिए, अगर आप अपनी हक़ीक़त पहले मुझे बता देते तो मुझे आपसे कोई शिकवा- शिकायत नही होती,

बल्कि और ज़्यादा फक्र होता..की मैने एक सच्चे इंसान से मुहब्बत की है.

मे – तो अब क्या तुम्हें अपनी मुहब्बत पर एतवार नही रहा..? या तुम्हें मेरी मंशा पर शक है, अगर समझ सको तो मे अब भी मजबूर था,

क्योंकि अगर मे ऐसा करता तो ये मेरे अपने मुल्क के साथ गद्दारी होती, जो मे अपने जीते जी तो नही कर सकता था.

क्या तुम यही चाहती हो कि मे अपने मुल्क के साथ गद्दारी करूँ..? या कभी तुम्हें मेरी नीयत में खोट नज़र आया..?

वो – नही ! कभी नही, और मे भी ये कभी नही चाहूँगी की आप अपने मुल्क के साथ गद्दारी करो..,

ये कहकर वो फिर से मेरे सीने से लग कर सुबकने लगी और आगे बोली –

लेकिन अब मुझे अपनी अम्मी और बाजी की फिकर हो रही है, आपने कहा था कि आप उनको सब कुछ बता देंगे.. तो..

मैने कहा - बिल्कुल ! अभी लो और फिर मैने अपने स्पेशल नंबर से रहीम चाचा को कॉल लगाई, कुछ देर बेल जाने के बाद कॉल पिक हुई..

दूसरी ओर से उनकी आवाज़ आई – हेलो ! कॉन..?

मे – रहीम चाचा ! सलाम बलेकुम. ! मे अशफ़ाक़ बोल रहा हूँ.

वो - हां अशफ़ाक़ मियाँ बोलिए कहाँ से बोल रहे हैं आप..?

मे – चाचा मे इंडिया से बोल रहा हूँ..

वो – इंडिया से…? ओ…तो ये जो यहाँ सुबह-सुबह पूरे शहर में जो हंगामा बरप रहा है, वो तुम्हारी देन है…

मे – क्या हंगामा बरप रहा है वहाँ चाचा..?

वो – खालिद की लाश बहुत ही बुरी हालत में उसके ऑफीस में मिली है, तभी से पोलीस कातिल को पूरे शहर में शिकारी कुत्तों की तरह खोज रही है…

खबर है, कि देर रात कोई उसके सेक्यूरिटी चीफ के भेस में उसके ऑफीस गया था… और उसी ने उसको कत्ल कर दिया है…

मे – और कोई बात तो नही चल रही..?

वो – मुझे लगता है, कि असल बात दबाई जा रही है, वैसे तुम्हारा मक़सद क्या था उसे कत्ल करने का..?

मे कुछ देर चुप रहा, फिर मैने उन्हें सारी दास्तान कह सुनाई…,

फिर उनसे शाकीना के बारे में उसकी अम्मी और दूसरे परिवार के लोगों को इत्तला करने को कहा, इस हिदायत के साथ कि ये बात आम ना होने पाए…, अपने लोगों तक ही सीमित रहे…

बस आप उनको इतना समझा देना कि कंपनी के किसी ज़रूरी काम की वजह से मैने दोनो को दुबई भेज दिया है, अब वो दोनो वहाँ का काम संभालेंगे…

 
रहीम चाचा से बात करने के बाद अब वो कुछ आश्वस्त दिखाई देने लगी और मेरे हाथों को चूम कर शुक्रिया कहा.

मैने उसकी थोड़ी के नीचे अपना हाथ रखकर पुछा – तुम्हें मेरे साथ आकर कोई अफ़सोस तो नही हो रहा शाकीना..?

उसने ना में अपनी गर्दन हिलाई और मेरे बदन से लिपट गयी.., मेरे सीने के बालों को सहलाते हुए बोली-

मैने तो बहुत पहले अपनी किस्मत आपके नाम लिख दी है, तो अब अफ़सोस कैसा..आप जो करेंगे मुझे मजूर होगा…

उसके ये लफ़्ज सुनकर मैने उसे अपने सीने में भींच लिया और उसके लज़्ज़त भरे लवो को चूमकर बोला-

ओह्ह..शाकीना..मेरी जान, तुम सच में कितनी मासूम हो, आँख बंद करके मुझ पर भरोसा करती रही, और मे कितना मजबूर था, कि तुम्हें अपनी हक़ीकत से रूबरू ना करा सका…

हो सके तो मुझे मुआफ़ कर देना मेरी जान…

उसने भी मेरे इर्द गिर्द अपनी बाहों का घेरा कस दिया और मेरे सीने में मुँह छिपाकर बोली –

मैने आपसे सच्ची मुहब्बत की है मेरे सरताज, आपकी सच्चाई क्या है, इससे मुझे कोई सरोकार नही…

अभी हम कुछ और आगे बोलते कि तभी किसी के आने की आहट सुन कर वो मुझसे अलग हो गयी.

बीएसएफ का एक जवान हमारे लिए ब्रेकफास्ट लेकर आया था, उससे ब्रेकफास्ट लेकर मैने उसके चीफ के बारे में पुछा तो उसने बताया कि वो अपने ऑफीस में ही हैं,

आप लोग नाश्ता करके वहीं आ जाओ, वो आपका ही इंतजार कर रहे हैं.

हम दोनो ने मिलकर नाश्ता किया, अब शरीर में गर्माहट आ चुकी थी,

शाकीना भी अब नॉर्मल दिखाई दे रही थी, ड्रग्स का असर काफ़ी हद तक कम हो गया था.

नाश्ता ख़तम करके मैने उसे वहीं थोड़ा रेस्ट लेने को बोला और मे कमॅंडेंट से मिलने उसके ऑफीस की तरफ बढ़ गया.

करीब एक घंटे बाद हम बीएसएफ की जीप में श्रीनगर एर पोर्ट की तरफ जा रहे थे.

शहर पहुँचकर मैने एटीएम से कुछ पैसे निकाले,

एक शॉपिंग सेंटर के बाहर गाड़ी रोक कर दोनो के लिए कुछ कपड़े खरीदे और वहीं ट्राइयल रूम में जा कर चेंज किए.

श्रीनगर से देल्ही की फ्लाइट ली और उड़ चले अपने देश की राजधानी को…

देल्ही पहुँचकर एरपोर्ट के पास ही एक होटेल में शाकीना को छोड़ा, कुछ मेडिसिन्स ली जो उसके ज़ख़्मों पर लगानी थी और कुछ एंटी-ड्रग्स उसको दिए.

एक बार शाकीना के कपड़े निकाल कर पूरे शरीर पर बने खरोंचों पर लेप लगाया, इस दौरान हम दोनो ही एक्शिटेड हो गये,

ड्रग का असर अभी कुछ वाकी था, जिसके असर से वो सेक्स के लिए उतावली सी दिखने लगी, और मेरे शरीर से लिपट गयी…

लेकिन मैने अपने आप पर कंट्रोल रखते हुए कहा – शाकीना मेरी जान अभी तुम आराम करो, ये समय इस काम के लिए सही नही है,

वो तड़प्ते हुए बोली – क्यों अभी समय क्यों सही नही है, अशफ़ाक़ प्लीज़ मुझे अपने आगोश में समेट लो,

मैने उसके होठों को चूमते हुए कहा – अभी तुम तक़लीफ़ में हो, पहले अपने बदन के घावों को सही कर्लो, ठीक है…

मेरी बात सुनकर वो एकदम मायूस हो गयी, उसने मुझे अपने बंधन से आज़ाद कर दिया… और उसकी आँखें छल-छला गयी..

फिर रुँधे स्वर में बोली – मे समझ सकती हूँ अशफ़ाक़, अब मे आपके काबिल नही रही, मेरे बदन को उस नामुराद ने गंदा जो कर दिया है…

उसकी बात सुनकर मे तड़प उठा, मैने उसके बदन की खरोंचों की परवाह ना करते हुए उसे अपने आगोश में कस लिया और उसकी दबदबाई हुई आँखों में झाँकते हुए कहा….

ये तुम क्या कह रही हो मेरी जान, क्या तुम ये समझ रही हो कि उस हरामी ने धोके और फरेब से तुम्हें मजबूर कर दिया तो तुम मेरे लिए नापाक हो गयी..?

भले ही मैने तुम्हें अपने साथ निकाह करने से रोका हो, लेकिन सच्चे दिल से मुहब्बत की है मैने तुम्हें…!

तुम मेरे दिल का वो हिस्सा हो शाकीना, जिसमें हर किसी को जगह नही दी जाती..

मैने तुम्हें दिल से चाहा है मेरी जान, शरीर से नही…

आइन्दा ऐसे शब्द अपने मुँह से निकाले भी ना, तो तुम मेरा मरा हुआ मुँह देखो…गी….

मेरे शब्दों को पूरा भी नही करने दिया उसने, अपने लरजते लव मेरे होठों पर रख दिए, और फिर दीवानवार वो मुझे चूमती चली गयी…

 
Back
Top